स्नेहा की अजीबो गरीब हरकतें-1
Hindi Chudai Kahani
तो कहानी शुरु करते है। उन दिनों मैं एक शख्स के साथ काम करता था, जो नगर सेवक के चुनाव में खड़ा था। मेरे कहने पर उसने झाड़ू-पोचे के लिये एक औरत को नियुक्त किया था, जो उसी के घर में काम करती थी। वह शादी-शुदा औरत थी और तीन लड़को की मां थी। वो देखने में भी काफी सुंदर थी। अब आगे की कहानी उसकी ज़ुबानी- पहले ही दिन वह साड़ी पहनकर ऑफिस में दाखिल हुई थी और बिना कुछ कहे झाड़ू लेकर सफाई करने लगी थी। वो देखने में काफी अच्छी थी, लेकिन उस दिन हमारे बीच कुछ बातें नहीं हुई थी और मैंने भी कोई बात करने की कोशिश नही की। दूसरे दिन उसने आते ही अपना परिचय देते हुए कहां था- काम-वाली: मेरा नाम स्नेहा है। जिसका मतलब होता है प्यार ! मैं आप को बहुत प्यार करूंगी और आपकी दोस्त बनकर रहूंगी । उसकी ये बात सुन कर मैं चकित सा रह गया था। मेरी उम्र उस वक्त 65 साल की हो चुकी थी और किसी ने मेरे साथ ऐसी बातें नहीं की थी। मैं उसकी इस तरह की बात से काफी प्रभावित हो गया था। हम दोनों के बीच कम से कम 30 साल का अंतर था और उस हिसाब से हमारे बीच एक ही रिश्ता हो सकता था, और वह रिश्ता था बाप बेटी का। मैं इसी सोच को लेकर आगे बढ़ रहा था । फिर हम दोनों काफी नजदीक आ गये थे और हम दोनों आपस मे अपनी सारी बातें शेयर करते थे । एक बाप-बेटी वाला स्पर्श और मस्ती मज़ाक हमारे बीच शुरू हो गया था। मैं उसके हाथ पकड़ता था और उसके गालों को सहलाता था और उसको अपने शरीर से दबोचता था। इस सब पर स्नेहा ने कोई एतराज़ नहीं जताया था। मुझे भी इस सब में मज़ा आता था। वह जब भी पैसे की मांग करती थी, तो मैं उसकी मदद भी करता था । मैं किसी ना किसी बहाने से उसको छूने की कोशिश करता था। एक बार मैंने सिर दर्द का झूठा बहाना बनाया था और उसने मेरे सिर को अपने हाथों से दबाया था। उसका ये स्पर्श मुझे अच्छा लगा था। बाद में उसने मुझे कुछ कहा, जिस्से मैं अचरज में पड़ गया। वो बोली- स्नेहा: मुझे भी सिर दर्द हो रहा हैं। आप भी मेरे सिर को दबाइये। फिर मैं तुरंत ही उसका सिर दबाने लगा था। फिर कुछ देर बाद उसने शिकायत की- स्नेहा: मेरी छाती में दर्द हो रहा हैं । मैं उसके बारे में कुछ कहूं, या अपनी कोई प्रतिक्रिया प्रदर्शित करू, उसके पहले उसने अपने ब्लाऊज़ के ऊपर के दो हुक्स खोल दिए। अब मुझे उसका यौवन उभार साफ दिख रहा था ! उसे देख कर मैं विचलित हो गया और एक पल मेरे मन में ख़्याल आया, कि मैं उसको बोलूं- मैं (मन में): लाओ मैं तुम्हारी छाती पर बाम लगा देता हूं। मेरा दिल तो कर रहा था, कि उसी वक्त कुछ कर डालूं, लेकिन मैं ये बोलने का साहस नहीं जुटा पाया। यह उसकी तरफ से एक आहवाहन था। फिर वो खुद अपनी छाती की मुरम्मत करने लगी। जो भी हो, लेकिन उसके बाद काफी कुछ बदल गया था।