गणित का ट्यूशन-3
गणित का ट्यूशन-1गणित का ट्यूशन-2
मैं अपनी ऑनलाइन मित्र की कहानी बता रहा हूँ। बात उन दिनों की है जब रेखा जवानी में कदम रख ही रही थी। गणित सीखने रेखा उनके पिता के सीनियर राकेश के पास जाने लगी। राकेश एक नंबर का ठर्की और बेशर्म आदमी था। आगे की घटना रेखा की जुबानी:
जवानी में काम सब पर हावी होता है। राकेश अंकल की अश्लीलता और फूहड़ता में घिन आती थी पर विमला के साथ सेक्सी बातें या किसी काल्पनिक मर्द के साथ काम क्रीड़ा की सोच अच्छी लगती थी और चूत टपक पड़ती थी।
राकेश अंकल की हरकतें मैंने सब से छिपाई विमला से भी, शायद पापा के ऊपर बोझ न पड़े इसलिए। ऐसे भी इम्तिहान नज़दीक थे तो थोड़े दिन की ही बात थी।
फिर वो दिन आया जिस में मैंने घृणा की चरम को महसूस किया। शायद खुशी बाद में आई इसलिए मैं राकेश अंकल की वो घृणित हरकत भूल सकी।
राकेश अंकल को भी मालूम था कि मेरे इम्तिहान नज़दीक आ रहे है और फिर मैं नहीं आऊँगी तो उन्होंने उलटी चाल चली।
नंगी तस्वीरों वाली मैगज़ीन के बजाए दफ़्तर की एक फाइल रख कर थोड़ी देर के लिए कई चले गए।
वो फाइल थी अप्रैसल्स (मूल्यांकन) की।
ज़ाहिर है मेरे पिताजी की भी होगी क्योंकि वो मेरे पिता के बॉस थे। खोल के देखा तो सबसे ऊपर उनकी ही CR थी।
लौटते ही बोले- ओ हो… यह फाइल यहाँ कैसे रह गई?, तुमने देखा तो नहीं?
मैंने ना में सर हिला दिया।
वो फाइल ले कर मेरे पास एकदम सट कर बैठ गए- अगर तुम मदद करोगी तो तुम्हारे पिताजी को तरक्की मिल जाएगी।
‘क…क…क्या करना होगा?’ मैंने कांपती आवाज़ में कहा और मेरी आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा।
राकेश अंकल ने सोफे के नीचे से अपनी नग्न तस्वीरों वाली मैगज़ीन निकाली और बोले- इन पे हाथ फिराने में वो मज़ा नहीं आता जो असली में आता है।
मैं कुछ नहीं बोली बस घबरा गई कि अब क्या होने वाला है।
‘ना, इतना मत घबराओ, मैं तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती नहीं करूँगा… अगर तुम सहयोग करोगी तो !’ राकेश अंकल ने किसी फ़िल्मी विलेन की तरह कहा।
‘हाँ मैं तुम्हारा कौमार्य भी भंग नहीं करूँगा। ऐसी गलती नहीं करता मैं जो मुझे कानूनी पचड़े में फसा दे।’
‘अब जल्दी से अपने कपड़े निकाल दो।’ राकेश अंकल ने कहा- नहीं तो मैं फाइल क्लोज़ करूँ तुम्हारे पापा की।
मैं वो पल बयां नहीं कर सकती। फिर एक अजीब विचार आया और मैं बोल पड़ी- ठीक है, अगर तुम मेरा कौमार्य नहीं तोड़ोगे तो मैं सहयोग दूंगी पर पहले मेरे सामने मेरे पापा की शीट भरो।
एक कमसिन जवान लड़की के जिस्म की छुवन और नाज़ुक लेकिन सुडौल चूचों को चूसने की ललक ने राकेश अंकल को दिमाग की बजाए लिंग से सोचने पर मज़बूर कर दिया और उन्होंने हाँ कह दी।
मेरे सामने मेरे पापा को प्रमोशन के लिए उपयुक्त होने को मोहर लगाई। कार्यालय की प्रक्रिया का मुझे कोई ज्ञान नहीं था।