जब साजन ने खोली मोरी अंगिया-1
स्नानगृह में
स्नानगृह में जैसे ही नहाने को मैं निर्वस्त्र हुई
मेरे कानों को लगा सखी, दरवाज़े पे कोई दस्तक हुई
धक्-धक् करते दिल से मैंने दरवाज़ा सखी री, खोल दिया
उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया!
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आते ही साजन ने मुझको अपनी बाँहों में कैद किया
होंठों को होंठों में लेकर उभारों को हाथों से मसल दिया
उस रात की बात न पूछ सखी जब साजन ने खोली मोरी अंगिया!
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फिर साजन ने, सुन री ओ सखी, फव्वारा जल का खोल दिया
भीगे यौवन के अंग-अंग को होंठों की तुला में तौल दिया
उस रात की बात न पूछ सखी जब साजन ने खोली मोरी अंगिया!
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कंधे, स्तन, कमर, नितम्ब कई तरह से पकड़े, मसले और छोड़े गए
गीले स्तन सख्त हाथों से आंटे की भांति गूंथे गए
जल से भीगे नितम्बों को दांतों से काट-कचोट लिया
उस रात की बात न पूछ सखी जब साजन ने खोली मोरी अंगिया!
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मैं विस्मित सी, सुन री ओ सखी, साजन की बाँहों में सिमटी रही
साजन ने नख से शिख तक ही होंठों से अति मुझे प्यार किया
उस रात की बात न पूछ सखी जब साजन ने खोली मोरी अंगिया!
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चुम्बनों से मैं थी दहक गई, जल-क्रीड़ा से बहकी मैं सखी
बरबस झुककर स्व मुख से मैंने साजन के अंग को दुलार किया
उस रात की बात न पूछ सखी जब साजन ने खोली मोरी अंगिया!
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चूमत-चूमत, चाटत-चाटत साजन पंजे पर बैठ गए
मैं खड़ी रही साजन ने होंठ नाभि के नीचे पहुँचाय दिया
उस रात की बात न पूछ सखी जब साजन ने खोली मोरी अंगिया!
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मेरे गीले से उस अंग से उसने जी भर के रसपान किया
मैंने कन्धों पे पाँव को रख रस के द्वार को खोल दिया
उस रात की बात न पूछ सखी जब साजन ने खोली मोरी अंगिया!
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मैं मस्ती में थी डूब गई क्या करती हूँ न होश रहा
साजन के होंठों पर अंग को रख नितम्बों को चहुँ-ओर हिलौर दिया
उस रात की बात न पूछ सखी जब साजन ने खोली मोरी अंगिया!
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साजन बहके-दहके-चहके मोहे जंघा पर ही बिठाय लिया
मैंने भी उसकी कमर को अपनी जंघाओं में फँसाय लिया
उस रात की बात न पूछ सखी जब साजन ने खोली मोरी अंगिया!
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जल से भीगे और रस में तर अंगों ने मंजिल खुद खोजी
उसके अंग ने मेरे अंग के अंतिम पड़ाव तक प्रवेश किया
उस रात की बात न पूछ सखी जब साजन ने खोली मोरी अंगिया!
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ऊपर से जल कण गिरते थे नीचे दो तन दहक-दहक जाते
चार नितम्ब एक दंड से जुड़े एक दूजे में धँस-धँस जाते
मेरे अंग ने उसके अंग के एक-एक हिस्से को फांस लिया
उस रात की बात न पूछ सखी जब साजन ने खोली मोरी अंगिया!
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जैसे वृक्षों से लता, सखी, मैं साजन से लिपटी थी यों
साजन ने गहन दबाव देकर अपने अंग से मुझे चिपकाय लिया
उस रात की बात न पूछ सखी जब साजन ने खोली मोरी अंगिया!
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