मेरी बेकाबू बीवी-2
मेरी बीवी चिल्ला कर पैर पटकने लगी पर दोस्त ने कस कर उसकी नंगी चूत को ना सिर्फ मसला बल्कि उंगलियाँ चूत में डाल कर हिलाने लगा।
अब वो गुस्से और उत्तेजना से बिफर गई, बोली- अभी मज़ा चखाती हूँ ! मुझे नंगी करके तुम बच नहीं सकते !
कुछ देर बाद मेरी बीवी ने भी उसकी पैंट खोल कर उसका कड़क हो चुका लण्ड निकाल कर उसे रंग डाला।
मेरी नादान बीवी यह नहीं समझ पाई कि मर्द को तो हर हाल में मज़ा ही आता है।
उस समय जो होली चल रही थी वो रंग लगाने से ज्यादा एक दूसरे को नंगा करने की होड़ थी।
होली के दौरान हमेशा ही वो मेरी पत्नी के और मैं उसकी पत्नी के वक्ष पर तो रंग अवश्य ही लगाते हैं और वो दोनों भी हमारी शर्ट, बनियान या तो उतार देती थी या फाड़ देती थी। और दोस्तो, यह प्रकृति का नियम है कि जब आप अश्लीलता की एक हद पार करते हो, जैसे हम होली में अक्सर अर्धनग्न हो जाया करते थे, पर आज की होली पूर्ण नग्नता की और बढ़ चुकी थी, यानि समूची हदें पार कर रही थी क्योंकि दोस्त की बीवी मौजूद थी ही नहीं और मैं और मेरी बीवी वैसे ही बहुत ही ज्यादा खुले विचारों के हैं।
और कुछ ही देर में वो दोनों पूर्णतया नग्न हो चुके थे, दोस्त ने बची खुची चड्डी भी खींच कर निकाल फेंकी, अब उन दोनों के बीच वस्त्रों का कोई व्यवधान नहीं था।
तो दोस्तो, अब जो होने जा रहा था, वो होली नहीं, बल्कि वासना का जबरदस्त खेल था।
मेरा लण्ड उन्हें इस हालत में देख कर तन्ना गया था, मेरे दोस्त का लण्ड भी पूरे आकार में फौलाद हो रहा था, इसके अलावा दोस्त अपने ससुराल से जबरदस्त होली खेल कर आया था तो वो पूरा काले रंग में सराबोर होकर एकदम राक्षस सा लग रहा था, उसके शरीर के बाल उसे और भयानक बना रहे थे।
इसके विपरीत मेरी नग्न हो चुकी बीवी का नग्न सौन्दर्य देखते ही बनता था जैसे उसके नंगे जिस्म पर बॉडी पेंट किया हो, वक्ष पर गहरा गुलाबी रंग, चेहरा लाल सुर्ख, दो रंगे हाथों के निशाँ उसकी चूत तक जाते हुए उसके पेट और कमर को रंग गए थे, झांटें रंगों के मिश्रण से अजीब तरह से उलझ गई थी और बहुत से बाल टूट कर दोस्त के हाथ में चिपक गए थे, उभरे और ठोस कूल्हों पर अपेक्षाकृत रंग कम लगा था, उसके चिकने पैर चितकबरे रंग में थे।
कुल मिला कर मेरे सामने ब्यूटी एण्ड द बीस्ट का नज़ारा पेश हो रहा था जहाँ एक नग्न राक्षस की बाहों में एक निर्वस्त्र सुंदरी समाई हुई थी, क्योंकि अब दोनों गहरे आलिंगनबद्ध हो गए थे, और वो उसकी पीठ से लेकर कूल्हे के उभार तक रंग लगाने के बहाने सहलाता जा रहा था, दबाये जा रहा था, और वो उसका कड़क लण्ड हाथ से सहलाते हुए, उसकी बालों से भरपूर छाती में चेहरा छुपाये हुए निढाल सी हो गई थी।
असल में वो सुबह से होली खेल खेल कर थक भी गई थी और पूरे मोहल्ले के मर्दों ने कम से कम उसके साथ तो होली जरूर ही खेली थी।