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ऐसा क्यूँ होता है?

Story Hindi 3 pages 12 years ago

ऐसा क्यूँ होता है?
यह आपबीती मेरे एक सीनियर की है जिनका नाम अजय जायसवाल है।

जायसवाल साहब एक बड़ी कंपनी के मैनेजर है जहाँ मैं बतौर रिसेप्शनिस्ट काम कर रही हूँ।

जायसवाल साहब ने मुझे एक शाम अपने केबिन में बुलाया और यह घटना सुनाई क्योंकि मैं जायसवाल साहब की काफी करीबी थी।

कंपनी में बड़ा कॉन्ट्रैक्ट दिलाने पर लोग न जाने क्या क्या तोहफा पेश करते हैं और इस बार जायसवाल साहब को कुछ अलग ही तोहफा मिला।

जायसवाल साहब की उम्र करीब पचास रही होगी, कॉन्ट्रैक्ट दिलवाने के एवज में उन्हें फाइव स्टार होटल मे आने का निमन्त्रण मिला।

अरविन्द कुशवाह और जितेंद्र कुशवाह -कुशवाह ग्रुप के चेयरमैन हैं।

महाराजा सूइट में डिनर के बाद ब्लैक लेबल व्हिस्की देते हुए अरविन्द- अरे जायसवाल साहब यह उपहार तो ले लीजिये..

जायसवाल- बस अब चलूँगा ! बहुत देर हो गई, घर पर बीवी और मेरी बेटी इंतज़ार कर रहे होंगे।

जितेंद्र उनके हाथ में दस लाख का चेक थमाते हुए- अरे साहब, यह लीजिये… …और मेरी मानिये, आज रात यहीं रुक जायें।

जायसवाल- दस लाख?

जितेंद्र- बस हमारे तरफ से एक नजराना !

तभी कमरे की घंटी बजी… एक नवयौवना अन्दर आई। उम्र कोई रही होगी उनकी अपनी बेटी जितनी… बीस इक्कीस साल की, गोरी, पतली सी… सलवार सूट में… स्लीवलेस सूट में उसके गोरी गोरी पतली बाजू बहुत सुन्दर लग रही थी।

जितेंद्र- आप यहीं आराम कीजिए, हम चलते हैं जायसवाल साहब !

अरविन्द- आज रात इस रेवती की सेवा का आनन्द लीजिए, ऐश कीजिए…

देखते देखते दोनों उन दोनों को कमरे में अकेले छोड़ कर कमरे से निकल गए।

जायसवाल के शब्दों में:

रेवती ने ड्रिन्क्स बनाई, मेरे पास आई और मुझे ड्रिंक्स पिलाने लगी।

मैं- कहाँ की हो तुम?

रेवती- देवास की…

मैं- और घर पर कौन कौन है?

रेवती- क्या साब… शादी मनाने का है क्या…?

मैं- मेरे शादी तो कब की हो गई… तेरे बराबर तो मेरी बेटी है।

रेवती- होगी… तो…? अब साहब मौज करो ना !

यह कह कर उसने अपने कपड़े खोल लिए… अब उसने सिर्फ ब्रा और पैंटी पहन रखी थी… काले रंग की …

पता नहीं उसे देख मुझे अपनी बेटी क्यूँ याद आ रही थी.. वही डील डौल… वैसा ही रंग !

मैं ख्यालों में खोया था और रेवती ने मेरे कपड़े उतारने शुरु कर दिये थे।

मैं अब सिर्फ अंडरवियर में था… वो भी ब्रा पैंटी में.. मेरी उम्र से देखो तो बिलकुल बच्ची थी !

वो मेरे पास आकर बैठ गई और अपने होंठ मेरे होंठों से चिपका दिए।

बिल्कुल बेबी वाले होंठ थे… आज बड़े दिनों बाद किसी को इस तरह चूम रहा था। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं।

अच्छा भी लग रहा था और बुरा भी…

बुरा इसलिए क्यूंकि अब मेरी उम्र नहीं रह गई थी ये सब करने की… अब तो मैं अपनी बीवी से ही कहाँ सेक्स कर पाता हूँ !

वो अक्सर पूजा पाठ में लगी रहती और मैं कामों में व्यस्त रहता !

सेक्स किये अरसा बीत गया था… लेकिन यह लड़की अलग ही थी !

बिल्कुल मासूम… मैं उसके होंठ चूसे जा रहा था… बहुत मुलायम थे… बहुत कोमल !

उसके मुख से मीठी मीठी महक आ रही थी और उसके लब बहुत ही मीठे लग रहे थे।

कुछ देर प्रगाढ़ चुम्बन करने के बाद मैंने उसे हटाया तो उसने अपने ब्रा खोल दी और उसके कप अपने दुग्ध उभारों से हटाये…

गोल गोल मुलायम स्तन…

मैंने छुआ !

रेवती- क्यूँ अंकल कैसे लगे…?

मैं- अंकल…?

रेवती- अब आपकी उम्र के लोगो को अंकल ही बोलूँगी ना?

मैं- तुम अंकल नहीं, सेक्स के दौरान मुझे पापा भी बोल सकती हो !

इससे पहले वो कुछ समझती मैं झट से उसके उरोज चूसने लगा।

छोटी छोटी अधखिली चूचियों को मैं चूसे जा था… उसके चूतड़ों को दबा रहा था।

सोच रहा था कि मेरी बेटी के भी बिलकुल ऐसे ही बूब्स और कूल्हे होंगे… इतने ही मुलायम…

मेरा लंड खड़ा हो गया था… मैंने उसे बिस्तर में पटका, दोनों पैर फैलाए और लंड घुसाने लगा..

रेवती- अहह अंकल, दर्द हो रहा है…

मैं- बस थोड़ी देर… पहले चुदाई हुई है न…?

रेवती- हुई तो है लेकिन इतना बड़ा लंड कभी नहीं मिला…

मेरा लंड बहुत दिनों बाद चोदने को आतुर था, मैंने उसकी योनि में उंगली डाली, एकदम छोटा सा छेद था…

मैं- अरे क्या जांघें हैं… सींक सलाई सी… पतली सी… खाती नहीं हो क्या ठीक से??

रेवती- खाती हूँ पर बदन में कुछ लगता ही नहीं !

मैं- अरे खूब खाया करो… मेरी बेटी भी तेरी ही उम्र की है… देखो मलाई मक्खन खाकर एकदम मस्त है !

रेवती- मस्त बोले तो..?

मैं- अरे उसकी भरी हुई जांघें… ये मोटे मोटे चूचे… और फूले हुए चूतड़ !

रेवती- बहुत सुन्दर है क्या??

मैं- हाँ बहुत सुन्दर…

फिर मैं उसकी जांघें फैला कर अपना लण्ड घुसेड़ने लगा।

रेवती- ई..ई… बस बस ! धीरे धीरे थोड़ा थोड़ा घुसाओ !

मुझे ऐसे लग रहा था कि किसी बच्ची की चुदाई कर रहा था मानो मैं…

मैं उसके गुलाब के पंखुड़ी के माफिक होंठों को चूसे जा रहा था…

रेवती- अंकल आप बहुत भारी हो…

मैं- अरे कुतिया ! कब से बोले जा रही है… दम नहीं है तो चुदवाने क्यूँ आई?

मुझे गुस्सा आ गया…साली रण्डी होकर भी इतने नखरे दिखा रही थी… मैंने उसकी पतली कमर को पकड़ा और लंड की रफ़्तार बढ़ा दी

और कुछ झटकों के बाद अपना वीर्य उसकी बुर में त्याग दिया।

वो मचल उठी…

उसे मैंने उस रात तीन बार चोदा।

अब पता नहीं कहाँ होगी पर अक्सर उसकी याद आ जाती है और उसे चोदने का बहुत मन करने लगता है !

श्रेया यानि मैं- इसमें बुराई क्या है, हजारों लोग ऐसी लड़कियों से सेक्स करते हैं।

जायसवाल- बुराई यह नहीं थी, बुराई तो अब मैं कर रहा हूँ, रोज़ अपने ही घर में !

मैं- मैं कुछ समझी नहीं सर?

जायसवाल- अरे तेरी आंटी के तो अब लटक गए हैं… मोटी थुलथुली हो गई है, क्या चोदूँगा उसे ! अब बस मैं अपनी बेटी को छुप छुप कर देखता रहता हूँ।

मैं- लेकिन यह गलत है अंकल !

जायसवाल- मैं जानता हूँ… कल रात वो जब कपड़े बदल रही थी, तब मैं उसे देख रहा था। मैं मुठ मारने लगा हूँ उसके नाम की… डरता हूँ कुछ हो न जाये !

मैं- तो उसे कहीं बाहर पढ़ने भेज दो?

जायसवाल- हाँ यही ठीक रहेगा… जब से रेवती की चुदाई की है सेक्स मेरे भेजे में घुस गया है… पिछली कुछ रातों से अजीब हरकतें कर रहा हूँ…

एक रात मेरी बेटी मुझसे लिपट के सो रही थी… मुझसे रहा नहीं जा रहा था… मैं वहाँ से उठ कर चला गया।

मैं- नहीं, आप अपनी सोच को सुधारिये, बेटी के लिए ऐसा सोचना बिल्कुल ठीक नहीं है… आप वादा कीजिए कि ऐसा वैसा कुछ नहीं करोगे !

जायसवाल- ठीक है वादा… मैं अपना तबादला दूसरे शहर करवा लूँगा, इससे मैं वहाँ अकेला रह लूँगा !

अंकल अपना तबादला करवा कर चले भी गए।

तो सहेलियो, आपके लिए श्रेया की बस एक सलाह है कि व्यस्क हो जाने के बाद अपने पापा या भाई के साथ न सोयें… मर्द तो मर्द होते हैं…

अपना ख्याल रखिये, सुरक्षित रहिये !

श्रेया अहूजा

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