सेठानी का पालतू चोदू
कुलदीप वर्मा
हैलो दोस्तो, मैं कुलदीप वर्मा श्रीगंगानगर, राजस्थान का रहने वाला हूँ।
आज मैं आपको अपने जीवन की एक छोटी सी घटना, जो आज से लगभग 3 साल पहले 2009 में हुई थी, बताता हूँ।
मैं उस समय एक सेठजी के यहाँ दुकान पर काम करता था। सेठ की दुकान घर के बाहर ही थी, जिसका एक दरवाजा घर के अन्दर ही खुलता था।
जब मैं नया-नया दुकान पर काम करने गया, तो मैं घर के अन्दर जाते हुए शर्माता था, पर जल्द ही सबके साथ परिचय हो गया और मैं सबसे घुल-मिल गया।
अब मैं घर के अन्दर जाने लगा।
सेठजी का एक लड़का है जो शहर से बाहर पढ़ता है।
सेठजी दुकान के काम के लिए कई बार शहर से बाहर जाते थे और दो-तीन दिन में लौटते थे।
सेठजी एक बार दुकान के काम से शहर से बाहर गए। मैं दुकान पर अकेला था, उस दिन रविवार का दिन था।
रविवार को दुकान जल्दी ही बंद कर देते थे, तो मैंने भी दोपहर 12 बजे दुकान बंद कर दी और चाबी देने सेठानी के पास गया।
मैंने आवाज़ लगाई पर सेठानी ने कोई जवाब नहीं दिया तो मैंने सोचा कि अपने कमरे में कोई काम कर रही होंगी, मैं उनके कमरे में चला गया।
सेठानी सोई हुई थीं और उन्होंने गाउन पहन रखा था और उनकी जांघ तक का नजारा दिख रहा था।
जब मैंने आवाज़ दी तो वो उठीं।
मैंने पूछा- आपको क्या हुआ, आपकी तबियत तो सही है?
सेठानी बोलीं- मेरे सर में दर्द हो रहा है।
मैंने कहा- मैं डॉक्टर को बुला लाता हूँ।
वो बोलीं- डॉक्टर को मत बुलाओ, मेडिकल स्टोर से गोली ले आ.. अभी सही हो जाएगा।
मैंने कहा- ठीक है अभी लाता हूँ।
मैं मेडिकल से दवा ले कर पांच मिनट में आया और सेठानी को दवा दे दी।
उन्होंने कहा- मेरे पैर दुःख रहे हैं, जरा दबा दे..!
वो बेड पर लेट गईं।
मैंने उनके पैर दबाने शुरू किए। पांच मिनट बाद उन्होंने अपना एक पैर मोड़ लिया, जिससे मुझे उनकी नीले रंग की पैंटी साफ़ दिख रही थी।
यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं !
मैं धीरे-धीरे पैर दबाते हुए कई बार हाथ घुटनों से ऊपर ले जाने लगा, उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा तो धीरे-धीरे कर मैंने गाउन को ऊपर कर दिया जिससे कि मुझे उनकी पैंटी साफ़ दिख रही थी।
तभी मैंने सामने शीशे में देखा की सेठानी मेरी आँख बचा कर आँख खोल कर मुझे देख रही थीं।
मैं सोच रहा था कि उन्हें नीद आ गई है, पर अब मुझे मालूम हुआ कि यह तो सोने का नाटक कर रही है।
मैं सब समझ गया सेठानी की चूत कुलबुला रही है, सो मैंने भी देर न करते हुए उनकी जाँघों पर हाथ फिराना शुरू किया और अब कभी-कभी मेरा हाथ उनकी चूत को भी छू रहा था।
उन्होंने अपनी दोनों टाँगें फैला दीं, बस मुझे हरी झंडी मिल गई। मैं अब उनकी चूत को हर बार जोर से दबा देता।
फिर हाथ फेरते-फेरते मैंने एक हाथ उनकी पैंटी के अन्दर चूत में डाल दिया। सेठानी की चूत को हाथ लगते ही वो सिसक पड़ी।