♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.......{01}
मेरा नाम विराज है, विराज सिंह बघेल। मुम्बई में रहता हूॅ और यहीं एक मल्टीनेशनल कम्पनी में नौकरी करता हूॅ। कम्पनी में मेरे काम से मेरे आला अधिकारी ही नहीं बल्कि मेरे साथ काम करने वाले भी खुश रहते हैं। सबके सामने हॅसते मुस्कुराते रहने की आदत बड़ी मुश्किल से डाली है मैंने। कोई आज तक ताड़ नहीं पाया कि मेरे हॅसते मुस्कुराते हुए चेहरे के पीछे मैंने ग़मों के कैसे कैसे अज़ाब पाल रखे हैं।
अरे मैं कोई शायर नहीं हूं बस कभी कभी दिल पगला सा जाता है तभी शेरो शायरी निकल जाती है बेतुकी और बेमतलब सी। मेरे खानदान में कभी कोई ग़ालिब पैदा नहीं हुआ। मगर मैं..????न न न न
अच्छा ये ग़ज़ल मैंने ख़ुद लिखी है ज़रा ग़ौर फ़रमाइए.....
ज़िन्दगी भी क्या क्या गुल खिलाती है।
कितने ग़म लिए हाॅथ में मुझे बुलाती है।।
कोई हसरत कोई चाहत कोई आरज़ू नहीं,
मेरी नींद हर शब क्यों ख़्वाब सजाती है।।
ख़ुदा जाने किससे जुदा हो गया हूॅ यारो,
किसकी याद है जो मुझे आॅसू दे जाती है।।
मैंने तो हर सू फक़त अपने क़ातिल देखे,
किसकी मोहब्बत मुझे पास बुलाती है।।
हर रोज़ ये बात पूॅछता हूं मौसमे ख़िज़ा से,
किसकी ख़ुशबू सांसों को मॅहका जाती है।।
हा हा हा हा बताया न मैं कोई शायर नहीं हूं यारो, जाने कैसे ये हो जाता है.?? मैं खुद हैरान हूॅ।
छः महीने हो गए हैं मुझे घर से आए हुए। पिछली बार जब गया था तो हर चीज़ को अपने हिसाब से ब्यवस्थित करके ही आया था। कभी कभी मन में ख़याल आता है कि काश मैं कोई सुपर हीरो होता तो कितना अच्छा होता। हर नामुमकिन चीज़ को पल भर में मुमकिन बना देता मगर ये तो मन के सिर्फ खयाल हैं जिनका वास्तविकता से दूर दूर तक कोई नाता नहीं। पिछले दो सालों में इतना कुछ हो गया है कि सोचता हूं तो डर लगता है। मैं वो सब याद नहीं करना चाहता मगर यादों पर मेरा कोई ज़ोर नहीं।
माॅ ने फोन किया था, कह रही थी जल्दी आ जाऊॅ उसके पास। बहुत रो रही थी वह, वैसा ही हाल मेरी छोटी बहेन का भी था। दोनो ही मेरे लिए मेरी जान थी। एक दिल थी तो एक मेरी धड़कन। बात ज़रा गम्भीर थी इस लिए मजबूरन मुझे छुट्टी लेकर आना ही पड़ रहा है। इस वक्त मैं ट्रेन में हूॅ। बड़ी मुश्किल से तत्काल का रिज़र्वेशन टिकट मिला था। सफ़र काफी लम्बा है पर ये सफर कट ही जाएगा किसी तरह।
ट्रेन में खिडकी के पास वाली सीट पर बैठा मैं खिड़की के बाहर का नज़ारा कर रहा था। काम की थकान थी और मैं सीट पर लेट कर आराम भी करना चाहता था, इस लिए ऊपर वाले बर्थ के भाई साहब से हाॅथ जोड़ कर कहा कि आप मेरी जगह आ जाइए। भला आदमी था वह तुरंत ही ऊपर के बर्थ से उतर कर मेरी जगह खिड़की के पास बड़े आराम से बैठ गया। मैं भी जल्दी से उसकी जगह ये सोच कर बैठ गया कि वो भाई साहब मेरी जगह नीचे बैठने से कहीं इंकार न कर दे।
पूरी सीट पर लेटने का मज़ा ही कुछ अलग होता है। बड़ा सुकून सा लगा और मैंने अपनी आंखें बंद कर ली। आॅख बंद करते ही बंद आॅखों के सामने वही सब दिखना शुरू हो गया जो न देखना मेरे लिए दुनियां का सबसे कठिन कार्य था। इन कुछ सालों में और कुछ दिखना मानो मेरे लिए कोई ख़्वाब सा हो गया था। इन बंद आॅखों के सामने जैसे कोई फीचर फिल्म शुरू से चालू हो जाती है।
चलिए इन सब बातों को छोंड़िए अब मैं आप सबको अपनी बंद आॅखों में चल रही फिल्म का आॅखों देखा हाल बताता हूॅ।
जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूॅ कि मेरा नाम विराज है, विराज सिंह बघेल। अच्छे परिवार से था इस लिए किसी चीज़ का अभाव नहीं था। कद कठी किसी भी एंगल से छः फीट से कम नहीं है। मेरा जिस्म गोरा है तथा नियमित कसरत करने के प्रभाव से एक दम आकर्षक व बलिस्ठ है। मैंने जूड़ो कराटे एवं मासल आर्ट्स में ब्लैक बैल्ट भी हासिल किया है। ये मेरा शौक था इसी लिए ये सब मैंने सीखा भी था मगर मेरे घर में इसके बारे में कोई नहीं जानता और न ही कभी मैंने उन्हें बताया।
मेरा परिवार काफी बड़ा है, जिसमें दादा दादी, माता पिता बहेन, चाचा चाची, बुआ फूफा, नाना नानी, मामा मामी तथा इन सबके लड़के लड़कियाॅ आदि।
कहने को तो मैं इतने बड़े परिवार का हिस्सा हूं मगर वास्तव में ऐसा नहीं है। ख़ैर कहानी को आगे बढ़ाने से पहले आप सबको मैं अपने पूरे खानदान वालों का परिचय दे दूॅ।
मेरे दादा दादी का परिवार.....
गजेन्द्र सिंह बघेल (दादा67) एवं इन्द्राणी सिंह बघेल (दादी60)
1, अजय सिंह बघेल (दादा दादी के बड़े बेटे)(50)
2, विजय सिंह बघेल (दादा दादी के दूसरे बेटे)(45)
3, अभय सिंह बघेल (दादा दादी के तीसरे बेटे)(40)
4, सौम्या सिंह बघेल (दादा दादी की बड़ी बेटी)(35)
5, नैना सिंह बघेल (दादा दादी की सबसे छोटी बेटी)(28)
कहानी जारी रहेगी,,,,,,
1, अजय सिंह बघेल का परिवार.....
अजय सिंह बघेल (मेरे बड़े पापा)(50)
प्रतिमा सिंह बघेल (बड़े पापा की पत्नी)(45)
● रितू सिंह बघेल (बड़ी बेटी)(24)
● नीलम सिंह बघेल (दूसरी बेटी)(20)
● शिवा सिंह बघेल (बेटा)(18)
2, विजय सिंह बघेल का परिवार....
विजय सिंह बघेल (मेरे पापा)(45)
गौरी सिंह बघेल (मेरी माॅ)(40)
● विराज सिंह बघेल (राज)....(मैं)(20)
● निधि सिंह बघेल (मेरी छोटी बहेन)(^^)
3, अभय सिंह बघेल का परिवार....
अभय सिंह बघेल (मेरे चाचा)(40)
करुणा सिंह बघेल (मेरी चाची)(37)
● दिव्या सिंह बघेल (मेरे चाचा चाची की बेटी)(^^)
● शगुन सिंह बघेल (मेरे चाचा का बेटा जो दिमाग से डिस्टर्ब है)(^^)
4, सौम्या सिंह बघेल का परिवार.....
सौम्या सिंह बघेल (मेरी बड़ी बुआ35) जो कि शादी के बाद उनका सर नेम बदल गया। अब वो सौम्या सिंह बस हैं।
* राघव सिंह (सौम्या बुआ के पति और मेरे फूफा जी)(38)
● अनिल सिंह (सौम्या बुआ का बेटा)(^^)
● अदिति सिंह (सौम्या बुआ की बेटी)(^^)
5, नैना सिंह बघेल (मेरी छोटी बुआ 28) जो शादी के बाद अब नैना सिंह हैं। इनकी शादी अभी दो साल पहले हुई है। अभी तक कोई औलाद नहीं है इनके। नैना बुआ के पति का नाम आदित्य सिंह(32) है।
तो दोस्तों ये था मेरे खानदान वालों का परिचय। मेरे नाना नानी लोगों का परिचय कहानी में आगे दूंगा जहां इन लोगों का पार्ट आएगा।
मेरे दादा जी के पास बहुत सी पुस्तैनी ज़मीन जायदाद थी। दादा जी खुद भी दो भाई थे। दादा जी अपने पिता के दो बेटों में बड़े बेटे थे। उनके दूसरे भाई के बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं। दादा जी बताया करते थे कि उनका छोटा भाई राघवेन्द्र सिंह बघेल जब 20 वर्ष का था तभी एक दिन घर से कहीं चला गया था। पहले सबने इस पर ज्यादा सोच विचार नहीं किया किन्तु जब वह एक हप्ते के बाद भी वापस घर नहीं आया तो सबने उन्हें ढूॅढ़ना शुरू किया। ये ढूॅढ़ने का सिलसिला लगभग दस वर्षों तक जारी रहा मगर उनका कभी कुछ पता न चला। किसी को ये भी पता न चल सका कि राघवेन्द्र सिंह आख़िर किस वजह से घर छोंड़ कर चला गया है? उनका आज तक कुछ पता न चल सका था। सबने उनके वापस आने की उम्मीद छोंड़ दी। वो एक याद बन कर रह गए सबके लिए।
दादा जी उस जायदाद के अकेले हक़दार रह गए थे। समय गुज़रता गया और जब मेरे दादा जी के बेटे पढ़ लिख कर बड़े हुए तो सबने अपना अपना काम भी सम्हाल लिया। बड़े पापा पढ़ने में बहुत तेज़ थे उन्होंने वकालत की पढ़ाई पूरी की और सरकारी वकील बन गए। मेरे पिता जी पढ़ने लिखने में हमेशा ही कमज़ोर थे, उनका पढ़ाई में कभी मन ही नहीं लगता था। इस लिए उन्होंने पढ़ाई छोंड़ दी और घर में रह कर इतनी बड़ी जमीन जायदाद को अकेले ही सम्हालने लगे। छोटे चाचा जी बड़े पापा की तरह तो नहीं थे किन्तु पढ़ लिख कर वो भी सरकारी स्कूल में अध्यापक हो गए।
उस समय गाॅव में शिक्षा का बहुत ज्यादा क्रेज नहीं था। किन्तु इतना कुछ जो हुआ वो सब दादा जी के चलते हुआ था। आगे चल कर सबकी शादियां भी हो गई। बड़े पापा सरकारी वकील थे वो शहर में ही रहते थे, और शहर में ही उन्हें एक लड़की पसंद आ गई जिससे उन्होंने शादी कर ली। हलाॅकि बड़े पापा के इस तरह शादी कर लेने से दादा जी बहुत नाराज़ हुए थे। किन्तु बड़े पापा ने उन्हें अपनी बातों से मना लिया था।
छोटे चाचा जी ने भी वही किया था यानि अपनी पसंद की लड़की से शादी। दादा जी उनसे भी नाराज़ हुए किन्तु फिर उन्होंने कुछ नहीं कहा। चाचा जी से पहले मेरे पिता जी ने दादा जी की पसंद की लड़की से शादी की। मेरे पिता पढ़े लिखे भले ही नहीं थे लेकिन मेहनती बहुत थे।
वो अकेले ही सारी खेती बाड़ी का काम करते थे और इतना ज्यादा ज़मीनों से अनाज की पैदावार होती कि जब उसे शहर ले जा कर बेचते तो उस समय में भी हज़ारो लाखों का मुनाफ़ा होता था।
मेरे पिता जी बहुत ही संतोषी स्वभाव वाले इंसान थे। सबको ले कर चलने वाले ब्यक्ति थे, सब कहते कि विजय बिलकुल अपने बाप की तरह ही है। मेरी माॅ एक बहुत ही सुन्दर लेकिन साधारण सी महिला थीं। वो खुद भी पढ़ी लिखी नहीं थी लेकिन समझदार बहुत थी। मेरे माता पिता के बीच आपस में बड़ा प्रेम था। बड़े पापा बड़े ही लालची और मक्कार टाईप के इंसान थे। वो हर चीज़ में सिर्फ़ अपना फायदा सोचते थे। जबकि छोटे चाचा ऐसे नहीं थे। वो ज्यादा किसी से कोई मतलब नहीं रखते थे। अपने से बड़ों की इज्ज़त करते थे। लेकिन ये भी था कि अगर कोई किसी बात के लिए उनका कान भर दे तो वो उस बात को ही सच मान लेते थे।
बड़े पापा सरकारी वकील तो थे लेकिन उस समय उन्हें इससे ज्यादा आमदनी नहीं हो पाती थी। वो चाहते थे कि उनके पास ढेर सारा पैसा हो और तरह तरह का ऐसो आराम हो। लेकिन ये सब मिलना इतना आसान न था। दिन रात उनका दिमाग इन्हीं सब चीज़ों में लगा रहता था। एक दिन किसी ने उन्हें खुद का बिजनेस शुरू करने की सलाह दी थी। लेकिन बिजनेस शुरू करने के लिए सबसे पहले ढेर सारा पैसा भी चाहिए था। जिसने उन्हे खुद का बिजनेस शुरू करने की सलाह दी थी उसन उन्हें बिजनेस के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी भी दी थी।
कहानी जारी रहेगी,,,
बड़े पापा के दिमाग में खुद का बिजनेस शुरू करने का जैसे भूत सवार हो गया था। वो रात दिन इसी के बारे में सोचते। एक रात उन्होंने इस बारे में अपनी बीवी प्रतिमा को भी बताया। बड़ी मां ये जान कर बड़ा खुश हुईं। उन्होंने बड़े पापा को इसके लिए तरीका भी बताया। तरीका ये था कि बड़े पापा को खुद का बिजनेस शुरू करने के लिए दादा जी से पैसा माॅगना चाहिए। दादा जी के पास उस समय पैसा ही पैसा हो गया था ये अलग बात है कि वो पैसा मेरे पिता जी की जी तोड़ मेहनत का नतीजा था।
अपनी बीवी की ये बात सुन कर बड़े पापा का दिमाग दौड़ने लगा। फिर क्या था दूसरे ही दिन वो शहर से गाॅव दादा जी के पास पहुंच गए और दादा जी से इस बारे में बात की। दादा जी उनकी बात सुन कर नाराज़ भी हुए और पैसा देने से इंकार भी किया। उन्होंने कहा कि तुमने अपनी नौकरी से आज तक हमें कितना रुपया ला कर दिया है? हमने तुम्हें पढ़ाया लिखाया और इस काबिल बनाया कि आज तुम शहर में एक सरकारी वकील बन गए तथा अपनी मर्ज़ी से शादी भी कर ली। हमने कुछ नहीं कहा। सोच लिया कि चलो जीवन तुम्हारा है तुम जैसा चाहो जीने का हक़ रखते हो।
मगर ये सब क्या है बेटा कि तुम अपनी नौकरी से संतुष्ट नहीं? और खुद का कारोबार शुरू करना चाहते हो जिसके लिए तुम्हें ढेर सारा पैसा चाहिए?
दादा जी की बातों को सुन कर बड़े पापा अवाक् रह गए। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि दादा जी पैसा देने की जगह ये सब सुनाने लगेंगे। कुछ देर बाद बड़े पापा ने उन्हें समझाना शुरू कर दिया। उन्होंने दादा जी को बताया कि वो ये बिजनेस साइड से शुरू कर रहे हैं और वो अपनी नौकरी नहीं छोंड़ रहे। बड़े पापा ने दादा जी को भविष्य के बारे में आगे बढ़ने की बहुत सी बातें समझाईं। दादा जी मान तो गए पर ये जरूर कहा कि ये सब रुपया विजय(मेरे पिता जी) की जी तोड़ मेहनत का नतीजा है। उससे एक बार बात करना पड़ेगा। दादा जी की इस बात से बड़े पापा गुस्सा हो गए बोले कि आप घर के मालिक हैं या विजय? किसी भी चीज़ का फैसला करने का अधिकार सबसे पहले आपका है और आपके बाद मेरा क्योंकि मैं इस घर का सबसे बड़ा बेटा हूं। विजय होता कौन है कि आपको ये कहना पड़े कि आपको और मुझे उससे बात करना पड़ेगा?
बड़े पापा की इन बातों को सुनकर दादा जी भी उनसे गुस्सा हो गए। कहने लगे कि विजय वो इंसान है जिसकी मेहनत के चलते आज इस घर में इतना रुपया पैसा आया है। वो तुम्हारे जैसा ग्रेजुएट होकर सरकरी नौकरी वाला भले ही न बन सका लेकिन तुमसे कम नहीं है वह। तुमने अपनी नौकरी से क्या दिया है कमा कर आज तक ? जबकि विजय ने जिस दिन से पढ़ाई छोंड़ कर ज़मीनों में खेती बाड़ी का काम सम्हाला है उस दिन से इस घर में लक्ष्मी ने अपना डेरा जमाया है। उसी की मेहनत से ये रुपया पैसा हुआ है जिसे तुम माॅगने आए हो समझे ?
दादा जी की गुस्से भरी ये बातें सुन कर बड़े पापा चुप हो गए। उनके दिमाग में अचानक ही ये ख़याल आया कि मेरे इस प्रकार के ब्योहार से सब बिगड़ जाएगा। ये ख़याल आते ही उन्होंने जल्दी से माफी माॅगी दादा जी से और फिर दादा जी के साथ मेरे पिता जी से मिलने खेतों की तरफ बढ़ गए।
खेतों में पहुॅच कर दादा जी ने मेरे पिता जी को पास बुला कर उनसे इस बारे में बात की और कहा कि अजय(बड़े पापा) को खुद का कारोबार शुरू करने के लिए रुपया चाहिए। इस पर पिता जी ने कहा कि वो इन सब चीज़ों के बारे में कुछ नहीं जानते आप जो चाहें करें। आप घर के मुखिया हैं हर फैसला आपको ही करना है। पिता जी की बात सुन कर दादा जी खुश हो गए। उन्हें मेरे पिता जी पर गर्व भी हुआ। जबकि बड़े पापा मन ही मन मेरे पिता को गालियां दे रहे थे।
ख़ैर उसके बाद बड़े पापा ने खुद का कारोबार शुरू कर दिया। जिसके उद्घाटन में सब कोई शामिल हुआ। हलाकि उन्होंने मेरे माता पिता को आने के लिए नहीं कहा था फिर भी मेरे माता पिता खुशी खुशी सबके साथ आ गए थे।
दादा जी के पूछने पर बड़े पापा ने बताया था कि एक शेठ की वर्षों से बंद पड़ी कपड़ा मील को उन्होंने सस्ते दामों में ख़रीद लिया है अब इसी को नए सिरे से शुरू करेंगे। दादा जी ने देखा था उस कपड़ा मील को, उसकी हालत ख़राब थी। उसे नया बनाने में काफी पैसा लग सकता था।
चूॅकि दादा जी देख चुके थे इस लिए मील को सही हालत में लाने के लिए जितना पैसा लगता दादा जी देते रहे। करीब छः महीने बाद कपड़ा मिल सही तरीके चलने लगी। ये अलग बात थी उसके लिए ढेर सारा पैसा लगाना पड़ा था।
इधर मेरे पिता जी की मेहनत से काफी अच्छी फसलों की पैदावार होती रही। वो खेती बाड़ी के विषय में हर चीज़ का बारीकी से अध्ययन करते थे। आज के परिवेश के अनुसार जिस चीज़ से ज्यादा मुनाफा होता उसी की फसल उगाते। इसका नतीजा ये हुआ कि दो चार सालों में ही बहुत कुछ बदल गया। मेरे पिता जी ने दादा जी की अनुमति से उस पुराने घर को तुड़वा कर एक बड़ी सी हवेली में परिवर्तित कर दिया।
कहानी जारी रहेगी,,,,,
हलाॅकि दो मंजिला विसाल हवेली को बनवाने में भारी खर्चा लगा। घर में जितना रुपया पैसा था सब खतम हो गया बाॅकि का काम करवाने के लिए और पैसों की ज़रूरत पड़ गई। दादा जी ने बड़े पापा से बात की लेकिन बड़े पापा ने कहा कि उनके पास रुपया नहीं है उनका कारोबार में बहुत नुकसान हो गया है। दादा जी को किसी के द्वारा पता चल गया था कि बड़े पापा का कारोबार अच्छा खासा चल रहा है और उनके पास रुपयों का कोई अभाव नहीं है।
बड़े पापा के इस प्रकार झूॅठ बोलने और पैसा न देने से दादा जी बहुत दुखी हुए। मेरे पिता जी ने उन्हें सम्हाला और कहा कि ब्यर्थ ही बड़े भइया से रुपया माॅगने गए थे। हम कोई दूसरा उपाय ढूंढ़ लेंगे।
छोटे चाचा स्कूल में सरकारी शिक्षक थे। उनकी इतनी सैलरी नहीं थी कि वो कुछ मदद कर सकते। मेरे पिता जी को किसी ने बताया कि बैंक से लोंन में रुपया ले लो बाद में ब्याज के साथ लौटा देना।
उस आदमी की इस बात से मेरे पिता जी खुश हो गए। उन्होंने इस बारे में दादा जी से बात की। दादा जी कहने लगे कि कर्ज़ चाहे जैसा भी हो वह बहुत ख़राब होता है और फिर इतनी बड़ी रकम ब्याज के साथ चुकाना कोई गुड्डा गुड्डी का खेल नहीं है। दादा जी ने कहा कि घर का बाकी का बचा हुआ कार्य बाद में कर लेंगे जब फसल से मुनाफ़ा होगा। मगर मेरे पिता जी ने कहा कि हवेली का काम अधूरा नहीं रहने दूंगा, वो हवेली को पूरी तरह तैयार करके ही मानेंगे। इसके लिए अगर कर्ज़ा होता है तो होता रहे वो ज़मीनों में दोगुनी मेहनत करेंगे और बैंक का कर्ज़ चुका देंगे।
दादा जी मना करते रह गए लेकिन पिता जी न माने। सारी काग़ज़ी कार्यवाही पूरी होते ही पिता जी को बैंक से लोंन के रूप में रुपया मिल गया। हवेली का बचा हुआ कार्य फिर से शुरू हो गया।
मेरे पिता जी पर जैसे कोई जुनून सा सवार था। वो जी तोड़ मेहनत करने लगे थे। जाने कहां कहां से उन्हें जानकारी हासिल हो जाती कि फला फसल से आजकल बड़ा मुनाफ़ा हो रहा है। बस फिर क्या था वो भी वही फसल खेतों में उगाते।
इधर दो महीने के अन्दर हवेली पूरी तरह से तैयार हो गई थी। देखने वालों की आंखें खुली की खुली रह गईं। हवेली को जो भी देखता दिल खोल कर तारीफ़ करता। दादा जी का सिर शान से उठ गया था तथा उनका सीना अपने इस किसान बेटे की मेहनत से निकले इस फल को देख कर खुशी से फूल कर गुब्बारा हुआ जा रहा था।
हवेली के तैयार होने के बाद दादा जी की अनुमति से पिता जी ने एक बड़े से भण्डारे का आयोजन किया जिसमें सम्पूर्ण गाॅव वासियों को भोज का न्यौता दिया गया। शहर से बड़े पापा और बड़ी माॅ भी आईं थीं।
बड़े पापा ने जब हवेली को देखा तो देखते रह गए। उन्होंने स्वप्न में भी उम्मीद न की थी कि उनका घर कभी इस प्रकार की हवेली में परिवर्तित हो जाएगा। किन्तु प्रत्यक्ष में वे हवेली को देख देख कर कहीं न कहीं कोई कमी या फिर ग़लती निकाल ही रहे थे। बड़ी माॅ का हाल भी वैसा ही था।
हवेली को इस प्रकार से बनाया गया था कि भविष्य में किसी भी भाई के बीच किसी प्रकार का कोई विवाद न खड़ा हो सके। हवेली का क्षेत्रफल काफी बड़ा था। भविष्य में अगर कभी तीनो भाईयों का बॅटवारा हो तो सबको एक जैसे ही आकार और डिजाइन का हिस्सा समान रूप से मिले। हवेली काफी चौड़ी तथा दो मंजिला थी। तीनो भाईयों के हिस्से में बराबर और समान रूप से आनी थी। हवेली के सामने बहुत बड़ा लाॅन था। कहने का मतलब ये कि हवेली ऐसी थी जैसे तीन अलग अलग दो मंजिला इमारतों को एक साथ जोड़ दिया गया हो।
अपडेट......... 02
अब तक......
बड़े पापा ने जब हवेली को देखा तो देखते रह गए। उन्होंने स्वप्न में भी उम्मीद न की थी कि उनका घर कभी इस प्रकार की हवेली में परिवर्तित हो जाएगा। किन्तु प्रत्यक्ष में वे हवेली को देख देख कर कहीं न कहीं कोई कमी या फिर ग़लती निकाल ही रहे थे। बड़ी माॅ का हाल भी वैसा ही था।
हवेली को इस प्रकार से बनाया गया था कि भविष्य में किसी भी भाई के बीच किसी प्रकार का कोई विवाद न खड़ा हो सके। हवेली का क्षेत्रफल काफी बड़ा था। भविष्य में अगर कभी तीनो भाईयों का बॅटवारा हो तो सबको एक जैसे ही आकार और डिजाइन का हिस्सा समान रूप से मिले। हवेली काफी चौड़ी तथा दो मंजिला थी। तीनो भाईयों के हिस्से में बराबर और समान रूप से आनी थी। हवेली के सामने बहुत बड़ा लाॅन था। कहने का मतलब ये कि हवेली ऐसी थी जैसे तीन अलग अलग दो मंजिला इमारतों को एक साथ जोड़ दिया गया हो।
अब आगे..........
इसी तरह सबके साथ हॅसी खुशी समय गुज़रता रहा। बड़े पापा और बड़ी माॅ का ब्यौहार दिन प्रतिदिन बदलता जा रहा था। उनका रहन सहन सब कुछ बदल गया था।
इस बीच उनको एक बेटी भी हुई जिसका नाम रितु रखा गया, रितु सिंह बघेल। बड़े पापा और बड़ी माॅ अपनी बच्ची को लेकर शहर से घर आईं और दादा दादी जी से आशीर्वाद लिया। उन्होंने एक बढ़िया सी कार भी ख़रीद ली थी, उसी कार से वो दोनों आए थे।
दादा जी बड़े पापा और बड़ी माॅ के इस बदलते रवैये से अंजान नहीं थे किन्तु बोलते कुछ नहीं थे। वो समझ गए थे कि बेटा कारोबारी आदमी हो गया है और उसे अब रुपये पैसे का घमण्ड होने लगा है। दादा जी ये भी महसूस कर रहे थे कि उनके बड़े बेटे और बड़ी बहू का मेरे पिता के प्रति कोई खास बोलचाल नहीं है। जबकि छोटे चाचा जी से उनका संबंध अच्छा था। इसका कारण शायद यह था कि छोटे चाचा भले ही किसी से ज्यादा मतलब नहीं रखते थे लेकिन स्वभाव से बहुत गुस्से वाले थे। वो अन्याय बरदास्त नहीं करते थे बल्कि वो इसके खिलाफ़ लड़ पड़ते थे।
अपने अच्छे खासे चल रहे कारोबार के पैसों से बड़े पापा ने शहर में एक बढ़िया सा घर भी बनवा लिया था जिसके बारे में बहुत बाद में सबको पता चला था। दादा जी बड़े पापा से नाराज़ भी हुए थे इसके लिए। पर बड़े पापा ने उनको अपनी लच्छेदार बातों द्वारा समझा भी लिया था। उन्होंने दादा जी को कहा कि ये घर बच्चों के लिए है जब वो सब बड़े होंगे तो शहर में इसी घर में रह कर यहाॅ अपनी पढ़ाई करेंगे।
समय गुज़रता रहा, और समय के साथ बहुत कुछ बदलता भी रहा। रितु दीदी के पैदा होने के चार साल बाद बड़े पापा को एक और बेटी हुई जबकि उसी समय मैं अपने माता पिता द्वारा पैदा हुआ। मेरे पैदा होने के एक दिन बाद ही बड़े पापा को दूसरी बेटी यानी नीलम पैदा हुई थी। उस समय पूरे खानदान में मैं अकेला ही लड़का था। मेरे पैदा होने पर दादा जी ने बहुत बड़ा उत्सव किया था तथा पूरे गाॅव वालों को भोज करवाया था। हलाॅकि मेरे माता पिता ये सब बिल्कुल नहीं चाहते थे क्यों कि इससे बड़े पापा और बड़ी माॅ के दिल ओ दिमाग में ग़लत धारणा पैदा हो जानी थी। लेकिद दादा जी नहीं माने बल्कि इन सब बातों की परवाह किए बग़ैर वो ये सब करते गए। इसका परिणाम वही हुआ जिसका मेरे माता पिता जी को अंदेशा था। मेरे पैदा होने की खुशी में दादा जी द्वारा किये गए इस उत्सव से बड़े पापा और बड़ी माॅ बहुत नाराज़ हुईं। उन्होंने कहा कि जब उनको बच्चियां पैदा हुई तब ये जश्न क्यों नहीं किया गया? जिसके जवाब में दादा जी ने नाराज़ हो कर कहा कि तुम लोग हमें अपना मानते ही कहाॅ हो? सब कुछ अपनी मर्ज़ी से ही कर लेते हो। कभी किसी चीज़ के लिए हमारी मर्ज़ी हमारी पसंद या हमारी सहमति के बारे में सोचा तुम लोगों ने? तुम लोगों ने अपनी मर्ज़ी से शहर में घर बना लिया और किसी को बताया भी नहीं, अपनी मर्ज़ी या पसंद से गाड़ी खरीद ली और किसी को बताया तक नहीं।
इन सब बातों का कोई जवाब है तुम लोगों के पास? क्या सोचते हो तुम लोग कि तुम्हारी ये चीज़ें कहीं हम लोग माॅग न लें? या फिर तुमने ये सोच लिया है कि जो तुमने बनाया है उसमे किसी का कोई हक़ नहीं है?
दादा जी की गुस्से से भरी ये सब बातें सुन कर बड़े पापा और बड़ी माॅ चुप रह गए। उनके मुख से कोई लफ्ज़ नहीं निकला। जबकि दादा जी कहते रहे, तुम लोगों ने खुद ही हम लोगों से खुद को अलग कर लिया है। आज तुम्हारे पास रुपया पैसा आ गया तो खुद को तोप समझने लगे हो। मगर ये भूल गए कि जिस रुपये पैसे के नशे में तुमने हम लोगों को खुद से अलग कर लिया है उस रुपये पैसे की बुनियाद हमारे ही खून पसीने की कमाई के पैसों से तैयार की है तुमने। अब चाहे जितना आसमान में उड़ लो मगर याद रखना ये बात।
कहानी जारी रहेगी,,,,,,,
दादा जी और भी जाने क्या क्या कहते रहे । बड़े पापा और बड़ी माॅ कुछ न बोले। दूसरे दिन वो लोग वापस शहर चले गए। लेकिन इस बार अपने दिल ओ दिमाग में ज़हर सा भर लिया था उन लोगों ने।
छोटे चाचा और चाची सब जानते थे और उनकी मानसिकता भी समझते थे लेकिन सबसे छोटे होने के कारण वो बीच में कोई हस्ताक्षेप करना उचित नहीं समझते थे। वो मेरे माता पिता की बहुत इज्ज़त करते थे। वो जानते थे कि ये सब कुछ मेरे पिता जी के कठोर मेहनत से बना है। हमारी सम्पन्नता में उनका ही हाॅथ है। मेरी माॅ और पिता बहुत ही शान्त स्वभाव के थे। कभी किसी से कोई वाद विवाद करना मानो उनकी फितरत में ही शामिल न था।
मेरे जन्म के दो साल बाद बड़े पापा और बड़ी माॅ को एक बेटा हुआ था। जिसका नाम शिवा सिंह रखा गया था। उसके जन्म पर जब वो लोग घर आए तो दादा जी ने शिवा के जन्म की खुशी में उसी तरह उत्सव मनाया तथा पूरे गाॅव वालों को भोज करवाया जैसे मेरे जन्म की खुशी में किया था। मगर इस बार का उत्सव पहले के उत्सव की अपेक्षा ज़्यादा ताम झाम वाला था क्योंकि बड़े पापा यही करना या दिखाना चाहते थे। दादा जी इस बात को बखूबी समझते थे।
समय गुज़रता रहा और यूं ही पाॅच साल गुज़र गए। मैं पाॅच साल का हो गया था। सब घर वाले मुझे बहुत प्यार करते थे। मेरे जन्म के चार साल बाद ही मुझे मेरे माता पिता द्वारा एक बहेन मिल गई थी। उसका नाम निधि रखा गया। छोटे चाचा और चाची को भी एक बेटी हो गई थी जो अब एक साल की थी। उसका नाम दिव्या था। दिव्या ऊम्र में मेरी बहेन निधि से मात्र दस दिन छोटी थी। दोनों एक साथ ही रहती। उन दोनों की किलकारियों से पूरी हवेली में रौनक रहती। दिव्या बिल्कुल चाची पर गई थी। एक दम गोरी चिट्टी सी। दिन भर मैं उनके साथ खेलता, वो दोनो मेरा खिलौना थीं। हमेशा उनको अपने पास ही रखता था।
बड़े पापा और बड़ी माॅ मेरी बहेन निधि और चाचा चाची की बेटी दिव्या दोनो के जन्म पर उन्हें देखने आए थे। खास कर छोटे चाचा चाची की बेटी को देखने।
सबकी मौजूदगी में उन्होंने मुझे भी अपना प्यार दिया। वो सबके लिए उपहार स्वरूप कपड़े लाए थे। इस बार उनका रवैया तथा वर्ताव पहले की अपेक्षा बहुत अच्छा था। वो सबसे हॅस बोल रहे थे। उनकी बड़ी बेटी रितु जो मुझसे चार साल बड़ी थी वो बिल्कुल अपनी माॅ पर गई थी। उसके स्वभाव में अपनी माॅ की तरह ही अकड़ूपन था जबकि उसकी छोटी बहेन जो मेरी ऊम्र की थी वो उसके विपरीत बिलकुल साधारण थी। ख़ैर दो दिन रुकने के बाद वो लोग वापस शहर चले गए।
मैं पाॅच साल का हो गया था इस लिए मेरा चाचा जी के स्कूल में ही पढ़ाई के लिए नाम लिखवा दिया गया था। मेरा अपने खिलौनों अर्थात् निधि और दिव्या को छोंड़ कर स्कूल जाने का बिलकुल मन नहीं करता था जिसके लिए मेरी पिटाई भी होती थी। छोटे चाचा को उनके गुस्सैल स्वभाव के चलते सब डरते भी थे। मैं भी डरता था उनसे और इसी डर की वजह से मुझे उनके साथ ही स्कूल जाना पड़ता। हलाॅकि चाचा चाची दोनों ही मुझ पर जान छिड़चते थे लेकिन पढ़ाई के मामले में चाचा जी ज़रा स्ट्रिक्ट हो जाते थे।
मेरे माता पिता दोनो ही पढ़े लिखे नहीं थे इस लिए मेरी पढ़ाई की जिम्मेदारी चाचा चाची की थी। चाचा चाची दोनो ही मुझे पढ़ाते थे। इसका परिणाम ये हुआ कि मै पढ़ाई में शुरू से ही तेज़ हो गया था। जब मैं दो साल का था तब मेरी बड़ी बुआ यानी सौम्या सिंह की शादी हुई थी जबकि छोटी बुआ नैना सिंह स्कूल में पढ़ती थीं। मेरी दोनों ही बुआओं का स्वभाव अच्छा था। छोटी बुआ थोड़ी स्ट्रिक्ट थी वो बिलकुल छोटे चाचा जी की तरह थीं। मैं जब पाॅच साल का था तब बड़ी बुआ को एक बेटा यानी अनिल पैदा हुआ था।
पूरे गाॅव वाले हमारी बहुत इज्ज़त करते थे। एक तो गाॅव में सबसे ज्यादा हमारे पास ही ज़मीनें थी दूसरे मेरे पिता जी की मेहनत के चलते घर हवेली बन गया तथा रुपया पैसा हो गया। हमारे घर से दो दो आदमी सरकारी सर्विस में थे। खुद का बहुत बड़ा करोबार भी चल रहा था। उस समय इतना कुछ गाॅव में किसी और के पास न था। दादा जी और मेरे पिता जी का ब्यौहार गाॅव में ही नहीं बल्कि आसपास के गावों में भी बहुत अच्छा था। इस लिए सब लोग हमें इज्ज़त देते थे।
इसी तरह समय गुज़रता रहा। कुछ सालों बाद मेरे छोटे चाचा चाची और बड़ी बुआ को एक एक संतान हुईं। चाचा चाची को एक बेटा यानी शगुन सिंह बघेल और बड़ी बुआ को एक बेटी यानी अदिति सिंह हुई। चाचा चाची का बेटा शगुन बड़ा ही सुन्दर था। उसके जन्म में भी दादा जी ने बहुत बड़ा उत्सव मनाया तथा पूरे गाॅव वालों को भोज कराया। बड़े पापा और बड़ी माॅ ने भी कोई कसर नहीं छोंड़ी थी खर्चा चरने में। सबने बड़ी बुआ को भी बहुत सारा उपहार दिया था। सब लोग बड़ा खुश थे।
कुछ सालों बाद छोटी बुआ की भी शादी हो गई। वो अपने ससुराल चली गईं। हम सभी बच्चे भी समय के साथ बड़े हो रहे थे।
कहानी जारी रहेगी,,,,,,,,
बड़े पापा और बड़ी माॅ ज्यादातर शहर में ही रहते। वो लोग तभी आते थे गाॅव जब कोई खास कार्यक्रम होता। उनके कारोबार और उनके पैसों से किसी को कोई मतलब नहीं था। मेरे माता पिता के प्रति उनके मन में हमेशा एक द्वेश तथा नफरत जैसी बात कायम रही। हलाॅकि वो इसका कभी दिखावा नहीं करते थे लेकिन सच्चाई कभी किसी पर्दे की गुलाम बन कर नहीं रहती। वो अपना चेहरा किसी न किसी रूप से लोगों को दिखा ही देती है। दादा जी सब जानते और समझते थे लेकिन बोलते नहीं थे कभी।
मेरे माता पिता के मन में बड़े पापा और बड़ी माॅ के प्रति कभी कोई बुरी भावना या ग़लत विचार नहीं रहा बल्कि वो हमेशा उनका आदर तथा सम्मान ही करते थे। मेरे पिता जी उसी तरह ज़मीनों में खेती करके फसल उगाते थे, अब फर्क ये था कि वो ये सब मजदूरों से करवाते थे। ज़मीनों में बड़े बड़े आमों के बाग़ हो गए थे, साग सब्जियों की भी पैदावार होने लगी थी। खेतों के बीच एक बड़ा सा घर भी बनवा लिया गया था। कहने का मतलब ये कि हर सुविधा हर साधन हो गया था। पहले जहाॅ दो दो बैलों के साथ हल द्वारा खेतों की जुताई होती थी अब वहाॅ ट्रैक्टर द्वारा जुताई होने लगी थी। हमारे पास दो दो ट्रैक्टर हो गए थे। दादा जी के लिए पिता जी ने एक कार भी खरीद दी थी तथा छोटे चाचा जी के लिए एक बुलेट मोटर साइकिल जिससे वे स्कूल जाते थे। दादा दादी बड़े गर्व व शान से रहते थे। मेरे पिता जी से वो बहुत खुश थे।
मगर कौन जानता था कि इस हॅसते खेलते परिवार की खुशियों पर एक दिन एक ऐसा तूफ़ान कहर बन कर बरपेगा कि सब कुछ एक पल में आईने की तरह टूट कर बिखर जाएगा????
अपडेट हाज़िर है दोस्तो, आप सबका सहयोग तथा आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा।
अपडेट........ 《03》
अब तक.....
मेरे माता पिता के मन में बड़े पापा और बड़ी माॅ के प्रति कभी कोई बुरी भावना या ग़लत विचार नहीं रहा बल्कि वो हमेशा उनका आदर तथा सम्मान ही करते थे। मेरे पिता जी उसी तरह ज़मीनों में खेती करके फसल उगाते थे, अब फर्क ये था कि वो ये सब मजदूरों से करवाते थे। ज़मीनों में बड़े बड़े आमों के बाग़ हो गए थे, साग सब्जियों की भी पैदावार होने लगी थी। खेतों के बीच एक बड़ा सा घर भी बनवा लिया गया था। कहने का मतलब ये कि हर सुविधा हर साधन हो गया था। पहले जहाॅ दो दो बैलों के साथ हल द्वारा खेतों की जुताई होती थी अब वहाॅ ट्रैक्टर द्वारा जुताई होने लगी थी। हमारे पास दो दो ट्रैक्टर हो गए थे। दादा जी के लिए पिता जी ने एक कार भी खरीद दी थी तथा छोटे चाचा जी के लिए एक बुलेट मोटर साइकिल जिससे वे स्कूल जाते थे। दादा दादी बड़े गर्व व शान से रहते थे। मेरे पिता जी से वो बहुत खुश थे।
मगर कौन जानता था कि इस हॅसते खेलते परिवार की खुशियों पर एक दिन एक ऐसा तूफ़ान कहर बन कर बरपेगा कि सब कुछ एक पल में आईने की तरह टूट कर बिखर जाएगा????
अब आगे.....
"ओ भाई साहब! क्या आप मेरे इस समान को दरवाज़े तक ले जाने में मेरी मदद कर देंगे ?" सहसा किसी आदमी के इस वाक्य को सुन कर मैं अपने अतीत के गहरे समंदर से बाहर आया। मैंने ऊपर की सीट से खुद को ज़रा सा उठा कर नीचे की तरफ देखा।
एक आदमी ट्रेन के फर्स पर खड़ा मेरी तरफ देख रहा था। उसका दाहिना हाॅथ मेरी सीट के किनारे पर था जबकि बाॅया हाॅथ नीचे फर्स पर रखी एक बोरी पर था। मुझे कुछ बोलता न देख उसने बड़े ही अदब से फिर बोला "भाई साहब प्लेटफारम आने वाला है, ट्रेन बहुत देर नहीं रुकेगी यहाॅ और मेरा सारा सामान यहीं रह जाएगा। पहले ध्यान ही नहीं दिया था वरना सारा सामान पहले ही दरवाजे के पास ले जा कर रख लेता।"
उसकी बात सुन कर मुझे पूरी तरह होश आया। लगभग हड़बड़ा कर मैंने अपने बाएं हाॅथ पर बॅधी घड़ी को देखा। घड़ी में दिख रहे टाइम को देख कर मेरे दिलो दिमाग़ में झनाका सा हुआ। इस समय तो मुझे अपने ही शहर के प्लेटफार्म पर होना चाहिए। मैं जल्दी से नीचे उतरा, तथा अपना बैग भी ऊपर से निकाला।
"क्या ये ट्रेन गुनगुन पहुॅच गई ?" फिर मैंने उस आदमी से तपाक से पूॅछा।
"बस पहुॅचने ही वाली है भाई साहब।" उस आदमी ने कहा "आप कृपा करके जल्दी से मेरा ये सामान दरवाजे तक ले जाने में मेरी मदद कर दीजिए।"
"ठीक है, क्या क्या सामान है आपका?" मैंने पूॅछा।
"चार बोरियाॅ हैं भाई साहब और एक बड़ा सा थैला है।" उसने अपने सभी सामानों पर बारी बारी से हाॅथ रखते हुए बताया।
मैंने एक बोरी को एक हाॅथ से उठाया किन्तु भारी लगा मुझे। मैंने उस बोरी को ठीक से उठाते हुए उससे पूछा कि क्या पत्थर भर रखा है इनमें? वह हॅसते हुए बोला नहीं भाई साहब इनमें सब में गेहूॅ और चावल है। पिछली रबी बरसात न होने से हमारी सारी फसल बरबाद हो गई। अब घर में खाने के लिए कुछ तो चाहिए ही न भाई साहब इस लिए ये सब हमें हमारी ससुराल वालों ने दिया है। ससुराल वालों से ये सब लेना अच्छा तो नहीं लगता लेकिन क्या करें मुसीबत में सब करना पड़ जाता है।"
ट्रेन स्टेशन पर पहुॅच ही चुकी थी लगभग, हम दोनों ने मिल कर सीघ्र ही सारा सामान दरवाजे पर रख चुके थे। थोड़ी ही देर में ट्रेन प्लेटफार्म पर पहुचकर रुक गई। वो आदमी जल्दी से उतरा और मैंने ऊपर से एक एक करके उसका सामान उसे पकड़ाता गया। सारा सामान सही सलामत नीचे उतर जाने के बाद मैं भी नीचे उतर गया। वो आदमी हाॅथ जोड़ कर मुझे धन्यवाद करता रहा। मैं मुस्कुरा कर एक तरफ बढ़ गया।
स्टेशन से बाहर आने के बाद मैंने बस स्टैण्ड जाने के लिए एक आॅटो पकड़ा। लगभग बीस मिनट बाद मैं बस स्टैण्ड पहुॅचा। यहाॅ से बस में बैठ कर निकल लिया अपने गाॅव 'हल्दीपुर'।
हल्दीपुर पहुॅचने में बस से दो घण्टे का समय लगता था। बस में मैं सीट की पिछली पुस्त से सिर टिका कर तथा अपनी दोनो आॅखें बंद करके बैठ गया। आॅख बंद करते ही मुझे मेरी माॅ और बहन का चेहरा नज़र आ गया। उन्हें देख कर आॅखें भर आईं। बंद आॅखों में चेहरे तो और भी नज़र आते थे जो मेरे बेहद अज़ीज़ थे लेकिन मैं उनके लिए अब अज़ीज़ न था।
सहसा तभी बस में कोई गाना चालू हुआ। दरअसल ये बस वालों की आदत होती है जैसे ही बस किसी सफर के लिए निकलती है बस का ड्राइवर गाना बजाना शुरू कर देता है ताकि बस में बैठे यात्रियों का मनोरंजन भी होता रहे।
कहानी जारी रहेगी,,,,,,,
अरे! ये ग़ज़ल तो ग़ुलाम अली साहब की है। ग़ुलाम अली साहब मेरी रॅग रॅग में बस गए थे आज कल। आप क़यामत तक सलामत रहें खान साहब आपकी ग़ज़लों ने मुझे एक अलग ही सुकून दिया है वरना दर्द-दिल और दर्दे-ज़िंदगी ने कब का मुझे फना कर दिया होता। फिर आ गया हूॅ उसी शहर उसी गली कूचे में जिसने जाने क्या क्या अता कर दिया है मुझे। उफ्फ़ ये बस का ड्राइवर भी यारो, क्या मेरे दिल का हाल जान गया था जो उसने मुझे सुकून देने के लिए ये ग़ज़ल शुरू करके सिर्फ़ और सिर्फ़ मुझे सुनाने लगा था? अच्छा ही हुआ कुछ पल ही सही सुकून तो मिल जाएगा मुझे। चलो अब कुछ न कहूॅगा, ग़ज़ल सुन लूॅ पहले फिर आगे का हाल सुनाऊॅगा आप सबको।
हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफ़िर की तरह।
सिर्फ़ इक बार मुलाक़ात का मौका दे दे।।
मेरी मंज़िल है कहाॅ, मेरा ठिकाना है कहाॅ,
सबहो तक तुझसे बिछड़ कर मुझे जाना है कहाॅ।
सोचने के लिए इक रात का मौका दे दे।। हम तेरे शहर में.....
अपनी आखों में छुपा रखे हैं जुगनूॅ मैंने,
अपनी पलकों पे सजा रखे हैं आॅसू मैंने।
मेरी आखों को भी बरसात का मौका दे दे।। हम तेरे शहर में.....
आज की रात मेरा दर्दे-मोहब्बत सुन ले,
कॅपकपाते हुए होठों की शिकायत सुन ले।
आज इज़हारे-ख़यालात का मौका दे दे।। हम तेरे शहर में.....
भूलना था तो ये इक़रार किया ही क्यों था?
बेवफ़ा तूने मुझे प्यार किया ही क्यों था ?
सिर्फ़ दो चार सवालात का मौका दे दे।। हम तेरे शहर में......
अरे! क्यों बंद हो गई ये ग़ज़ल? खान साहब कुछ देर और गाते न...मेरे लिए। हाय, क्या कहूॅ अब किसी को? दिल में इक तूफान मानो इंकलाब ज़िन्दाबाद का नारा सा लगाने लगा था। बहुत सी बातें बहुत सी यादें दिलो दिमाग़ को डसने लगी थी। मैं शायर तो नहीं उस दिन भी कहा था आप सबसे, आज भी कहता हूॅ। ऐसा लगता है जैसे मेरा दिल खुद ही लफ्ज़ों में पिरो कर अपना हाल आप सबको सुनाने लगेगा। मगर अभी नहीं दोस्तो, अपनी खुद की लिखी ग़ज़ल आगे कहीं सुनाऊॅगा।
ख़ैर वक़्त को तो गुज़रना ही था आख़िर, सो गुज़र गया और मैं अपने गाॅव हल्दीपुर पहुॅच गया। ये वही गाॅव है जिसके किसी छोर पर मेरे पिता जी द्वारा बनवाई गई हवेली मौजूद है।
मगर मैं,मेरी माॅ और बहन अब उस हवेली में नहीं रहते। मेरे पिता जी तो अब इस दुनियाॅ में हैं ही नहीं। जी हाॅ दोस्तो मेरे पिता जी अब इस जहां में नहीं हैं।
हम तीन लोग यानी मैं मेरी माॅ और बहन अब खेतों के पास बने घर में रहते हैं। मगर बहुत जल्द हम लोगों का अब यहाॅ से भी तबादला होने वाला है।
उस समय शाम होने लगी थी जब मैं अपनी माॅ बहन के पास पहुॅचा। मुझे देख कर दोनो ही मुझसे लिपट गईं और फूट फूट कर रोने लगीं। मैंने थोड़ी देर उन्हें रोने दिया। फिर दोनो को खुद से अलग करके पास ही रखी एक चारपाई पर बैठा दिया। मेरी छोटी बहन निधि ने पास ही रखे एक घड़े से ग्लास में मुझे पानी दिया।
"माॅ, क्या फिर बड़े पापा ने?" अभी मेरी बात पूरी भी न हुई थी कि माॅ ने कहा "बेटा अब हम यहाॅ नहीं रहेंगे। हमें अपने साथ ले चल। हम तेरे साथ मुम्बई में ही रहेंगे। यहाॅ हमारे लिए कुछ नहीं है और न ही कोई हमारा है।"
"माॅ, क्या फिर बड़े पापा ने आपको कुछ कहा है?" मेरे अंदर क्रोध उभरने लगा था।
"सब भाग्य की बातें हैं बेटा।" माॅ ने गंभीरता से कहा "जब तक हमारे भाग्य में दुख तक़लीफें लिखी हैं तब तक ये सब सहना ही पड़ेगा।"
"माॅ चुप बैठने से कुछ नहीं होता।" मैंने कहा "किसी के सामने झुकना अच्छी बात है लेकिन इतना भी नहीं झुकना चाहिये कि हम झुकते झुकते एक दिन टूट ही जाएं। अपने हक़ के लिए लड़ना पड़ता है माॅ। ये मान मर्यादा की बातें सिर्फ़ हम ही बस क्यों सोचें? वो क्यों नहीं सोचते ये सब?"
"सब एक जैसे अच्छे विचारों वाले नहीं होते बेटा।" माॅ ने कहा "अगर वो ये सब सोचते तो क्या हमें इस तरह यहाॅ रहना पड़ता?"
"यहाॅ भी कहाॅ रहने दे रहे हैं माॅ।"मैं आवेश मे बोला "उन्होंने हमें इस तरह निकाल कर बाहर फेंक दिया है जैसे कोई दूध पर गिरी मक्खी को निकाल कर फेंक देता है। सारा गाॅव जानता है कि वो हवेली मेरे पिता जी के खून पसीना बहा कर कमाए हुए रुपयों से बनी है। और उनका वो कारोबार भी मेरे पिता जी के रुपयों की बुनियाद पर ही खड़ा है। ये कहाॅ का न्याय है माॅ कि सब कुछ छीन कर हमें दर दर का भिखारी बना दिया जाए?"
"हमें कुछ नहीं चाहिए बेटे।" माॅ ने कहा "मेरे लिए तुम दोनों ही मेरा सब कुछ हो।"
"आपकी वजह से मैं कुछ कर नहीं पाता माॅ।" मैंने हतास भाव से कहा"वरना इन लोगों को इनकी ही ज़ुबान से सबक सिखाता मैं।"
"किसी को कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है बेटे।" माॅ ने कहा "जो जैसा करेगा उसे वैसा ही एक दिन फल भी मिलेगा। ईश्वर सब देखता है।"
"तो क्या हम हर चीज़ के लिए ईश्वर का इन्तज़ार करते बैठे रहें ?" मैने कहा "ईश्वर ये नहीं कहता कि तुम कोई कर्म ही न करो। अपने हक़ के लिए लड़ना कोई गुनाह नहीं है।"
"भइया कल बड़े पापा ने।
" निधि ने अभी अपनी बात भी पूरी न की थी कि माॅ ने उसे चुप करा दिया "तू चुप कर, तुझे बीच में बोलने को किसने कहा था?"
"उसे बोलने दीजिए माॅ।" मैंने कहा मुझे लगा निधि कुछ खास बात कहना चाहती है। "तू बता गुड़िया क्या किया बड़े पापा ने कल ?"
"कुछ नहीं बेटा ये बेकार ही जाने क्या क्या अनाप सनाप बकती रहती है।" माॅ ने जल्दी से खुद ही ये कहा।
"मैं अनाप सनाप नहीं बक रही हूॅ माॅ।" इस बार निधि की आखों में आॅसू और लहजे में आवेश था बोली "कब तक हर बात को सहते रहेंगे हम? कब तक हर बात भइया से छिपाएंगी आप? इस तरह कायर बन कर जीना कहाॅ की समझदारी है?"
"तो तू क्या चाहती है?" माॅ ने गुस्से से कहा "ये कि ऐसी हर बातें तेरे भाई को बताऊं जिससे ये जा कर उनसे लड़ाई झगड़ा करे? बेटा उन लोगों से लड़ने का कोई फायदा नहीं है। उनके पास ताकत है पैसा है हम अकेले कुछ नहीं कर सकते। लड़ाई झगड़े में कभी किसी का भला नहीं हुआ मेरे बच्चों। मैं नहीं चाहती कि किसी वजह से मैं तुम लोगों को खो दूॅ।"
कहने के साथ ही माॅ रोने लगी। मेरा कलेजा हाहाकार कर उठा। माॅ को यूं बेबसी में रोते देख मुझे ऐसा लग रहा था कि सारी दुनिया को आग लगा दूॅ। मेरे माता पिता जैसा दूसरा कोई नहीं था। वो हमेशा दूसरों की खुशी के लिए जीते थे। कभी किसी की तरफ आॅख उठा कर नहीं देखा। कभी किसी को बुरा भला नहीं कहा।
"हम कल ही यहाॅ से कहीं दूर चले जाएंगे बेटा।" माॅ ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा "मुझे किसी से कुछ नहीं चाहिए, दो वक़्त की रोटी कहीं भी रह कर कमा खा लेंगे।"
"ठीक है माॅ।" मैं भला कैसे इंकार करता। "जैसा आप कहेंगी वैसा ही होगा। यहाॅ जो भी आपका और गुड़िया का ज़रूरी सामान हो वो ले लीजिए। हम कल सुबह ही निकलेंगे।"
"वैसे तो कोई ज़रूरी सामान यहाॅ नहीं है बेटा।" माॅ ने कहा "बस पहनने वाले हमारे कपड़े ही हैं।"
"और आपके गहने जेवर वगैरा ?" मैंने पूॅछा।
"गहने जेवर मुझ विधवा औरत के किस काम के बेटा?" माॅ ने कहा।
"भइया कल बड़े पापा और बड़ी मां यहां आईं थी।" निधि ने कहा "वो माॅ के सब जेवर उठा ले गईं और बहुत ही बुरा सुलूक किया हमारे साथ। और पता है भइया वो शिवा मुझे गंदे तरीके से छू रहा था। बड़े पापा भी माॅ को बहुत गंदा बोल रहे थे।"
"क् क्या ?????" मेरा पारा एक पल में चढ़ गया। "उन लोगों की ये ज़ुर्रत कि वो मेरी माॅ और बहन के साथ इस नीचता के साथ पेश आएं? छोड़ूॅगा नहीं उन हरामज़ादों को मैं।"
"न नहीं बेटा नहीं।" माॅ ने मुझे सख़्ती से पकड़ कर कहा "उनसे उलझने की कोई ज़रूरत नहीं है। वो बहुत ख़राब लोग हैं, हम कल यहाॅ से चले जाएंगे बेटा बहुत दूर।"
माॅ ने मुझे सख़्ती से पकड़ा हुआ था, जबकि मेरी रॅगों में दौड़ता हुआ लहू उबाल मार रहा था। मुझे लग रहा था कि अभी जाऊं और सबको भूॅन कर रख दूॅ।
"मुझे छोंड़ दीजिए माॅ।
" मैंने खुद को छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा "मैं इन कमीनों को दिखाना चाहता हूं कि मेरी माॅ और बहन पर गंदी हरकत करने का अंजाम क्या होता है?"
"न नहीं बेटा तू कहीं नहीं जाएगा।" माॅ ने कहने के साथ ही मेरा दाहिना हाॅथ पकड़ कर अपने सिर पर रखा और कहा "तुझे मेरी क़सम है बेटा। तू उन लोगों से लड़ने झगड़ने का सोचेगा भी नहीं।"
"मुझे अपनी कसम दे कर कायर और बुज़दिल न बनाइए माॅ।" मैंने झुंझला कर कहा "मेरा ज़मीर मेरी आत्मा मर जाएगी ऐसे में।"
"सब कुछ भूल जा मेरे लाल।" माॅ ने रोते हुए कहा "एक तू ही तो है हम दोनों का सहारा। तुझे कुछ हो गया तो क्या होगा हमारा?"
माॅ ने मुझे समझा बुझा कर शान्त कर दिया। मैं वहीं चारपाई पर आॅखें बंद करके लेट गया। जबकि माॅ वहीं एक तरफ खाना बनाने की तैयारी करने लगी और मेरी बहन निधि मेरे ही पास चारपाई में आ कर बैठ गई।
इस वक़्त जहाॅ हम थे वो खेत वाला घर था। घर तो काफी बड़ा था किन्तु यहाॅ रहने के लिए भी सिर्फ एक कमरा दिया गया था। बांकी हर जगह ताला लगा हुआ था। खेतों में काम करने वाले मजदूर इस वक़्त नहीं थे और अगर होंगे भी तो कहीं नज़र नहीं आए। पता नहीं उन लोगों के साथ भी जाने कैसा वर्ताव करते होंगे ये लोग?
ख़ैर जो रूखा सूखा माॅ ने बनाया था उसी को हम सबने खाया और वहीं सोने के लिए लेट गए। चारपाई एक ही थी इस लिए उसमें एक ही ब्यक्ति लेट सकता था। मैंने चारपाई पर माॅ को लिटा दिया हलाॅकि माॅ नीचे ही ज़मीन पर सोने के लिए ज़ोर दे रही थी पर मैं नहीं माना और मजबूरन माॅ को ही चारपाई पर लेटना पड़ा। नीचे ज़मीन पर मैं और निधि एक चादर बिछा कर लेट गए।
मेरी आॅखों में नींद का कहीं दूर दूर तक नामो निशान न था। यही हाल सबका था। मुझे रह रह कर गुड़िया की बात याद आ रही थी कि बड़े पापा और उनके बेटे ने मेरी माॅ और बहन के साथ गंदा सुलूक किया। इन सब बातों से मेरा ख़ून खौल रहा था मगर माॅ की क़सम के चलते मैं कुछ कर नहीं सकता था।
मगर मैं ये भी जानता था कि माॅ की ये क़सम मुझे कुछ करने से अब रोंक नहीं सकती थी क्योंकि इन सब चीच़ों से मेरा सब्र टूटने वाला था। मेरे अंदर की आग को अब बाहर आने से कोई रोंक नहीं सकता था। मैं अब एक ऐसा खेल खेलने का मन बना चुका था जिससे सबकी तक़दीर बदल जानी थी।
दोस्तो अपडेट दे दिया है,,,
आशा करता हूॅ कि आप सबको पसंद आएगा और अगर न पसंद आए तो बेझिझक आप सब अपनी बात कह कर मेरी ग़लतियों तथा कमियों से मुझे अवगत करा दीजिएगा। आप सबकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा।
धन्यवाद !!
अपडेट...........《 04 》
अब तक....
मेरी आॅखों में नींद का कहीं दूर दूर तक नामो निशान न था। यही हाल सबका था। मुझे रह रह कर गुड़िया की बात याद आ रही थी कि बड़े पापा और उनके बेटे ने मेरी माॅ और बहन के साथ गंदा सुलूक किया।
इन सब बातों से मेरा ख़ून खौल रहा था मगर माॅ की क़सम के चलते मैं कुछ कर नहीं सकता था।
मगर मैं ये भी जानता था कि माॅ की ये क़सम मुझे कुछ करने से अब रोंक नहीं सकती थी क्योंकि इन सब चीच़ों से मेरा सब्र टूटने वाला था। मेरे अंदर की आग को अब बाहर आने से कोई रोंक नहीं सकता था। मैं अब एक ऐसा खेल खेलने का मन बना चुका था जिससे सबकी तक़दीर बदल जानी थी।
अब आगे..........
दूसरे दिन लगभग आठ बजे। विराज अपनी माॅ गौरी और बहन निधि को लेकर घर से बाहर निकल कर आया ही था कि सामने से उसे एक मोटर साइकिल आती नजर आई।
"फिर आ गया कमीना।" निधि ने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा।
"गुड़िया।" माॅ यानि गौरी ने लगभग डाटते हुए निधि से कहा__"ऐसे गंदे शब्द किसी को भी नहीं बोलना चाहिए और वो तो फिर भी तुम्हारा भाई है।"
"माॅ शिवा भइया ने भाई होने का कौन सा फर्ज़ निभाया है?" निधि ने कहा__"और वो हमें अपना समझते ही कहाॅ हैं? उनके लिए तो हम बाजार की रं....।"
"गुड़िया.....।" गौरी जोर से चीखी थी। अभी वह कुछ और भी कहती कि उससे पहले ही उसने देखा कि सामने से मोटर साईकिल से आता हुआ शिवा पास आ गया था। उसने शख्ती से अपने होंठ भींच लिए।
शिवा ने एक एक नज़र उन सब पर डाली और बहुत ही कमीने ढंग से मुस्कुराते हुए बोला__"अरे भाई भी आ गया। वाह भाई वाह लगता है धंधे का समय हो गया है तुम लोगों का। सुबह सुबह दुकान तो सभी खोलते हैं मगर मुझे जरा ये तो बताओ कि तुम लोगो की दुकान किस जगह खुलेगी? वो दरअसल क्या है न कि मैं सोच रहा हूॅ कि तुम लोगों की दुकान की बोहनी मैं ही कर दूॅ अपने कुछ दोस्तों को साथ लाकर।"
शिवा की बातें ऐसी नहीं थी जिनका मतलब उनमें से कोई समझ न सकता था। विराज का चेहरा गुस्से से आग बबूला हो चुका था। उसकी मुट्ठियाॅ कस गई थीं। ये देख गौरी ने फौरन ही अपने बेटे का हाॅथ पकड़ लिया था। उसे पता था कि विराज ये सब सहन नहीं कर सकता और गुस्से में न जाने क्या कर डाले।
"देखो तो कैसे फड़फड़ा रहा है भाई।" विराज को गुस्से में उबलता देख शिवा ने चहकते हुए कहा__"अरे ठंड रख भाई ठंड रख। तुम्हारे इस धंधे में इसकी कोई जरूरत नहीं है। बल्कि इस धंधे में तो बडे प्यार और धैर्य की ज़रूरत होती है। ज़बान में शहद सी मिठास डालनी होती है जिससे ग्राहक को लुभाया जा सके। ख़ैर छोंड़ो ये बात..सब सीख जाओगे भाई। धीरे धीरे ही सही मगर धंधा करने का तरीका आ ही जाएगा। अच्छा ये तो बता दो यार कि अपनी माॅ बहन को लेकर किस जगह दुकान खोलने वाले हो?"
"आपको ज़रा भी शर्म नहीं आती भइया ऐसी बातें कहते हुए।" निधि ने रुॅधे गले से कहा__"आपको ज़रा भी एहसास नहीं है कि हम आपके अपने हैं और आप अपनों के लिए ही ऐसा बोल रहे हैं?"
"अलेलेलेले।" शिवा ने पुचकारते हुए कहा__"मेरी निधि डार्लिंग ये कैसी बातें कह रही है? मैं तो अपना समझ कर ही ऐसा बोल रहा हूॅ।
तुम सबका भला चाहता हूॅ तभी तो चाहता हूॅ कि तुम्हारी दुकान की बोहनी सबसे पहले मैं ही करूॅ।"
इससे पहले कि कोई कुछ और बोल पाता शिवा मोटर साईकिल से नीचे औंधा पड़ा नज़र आया। उसके मुह से खून की धारा बहने लगी थी। किसी को समझ ही नहीं आया कि पलक झपकते ही ये कैसे हो गया। गौरी और निधि हैरत से आंखें फाड़े शिवा को देखने लगी थी। होश तब आया जब फिज़ा में शिवा की चीखें गूॅजने लगी थी। दरअसल शिवा की अश्लीलतापूर्ण बातों से विराज ने गुस्से से अपना आपा खो दिया था और माॅ के हाथ से अपना हाथ छुड़ा कर शिवा पर टूट पड़ा था। गौरी को तो पता भी नहीं चला था कि विराज ने उसके हाथ से अपना हाथ कब छुड़ाया और कब वह शिवा की तरफ झपटा था?
उधर शिवा की दर्दनाक चीखें वातावरण में गूॅज रही थी। विराज बुरी तरह शिवा की धुनाई कर रहा था। ऐसा नही था कि शिवा कमजोर था बल्कि वह खुद भी तन्दुरुस्त तबियत का था किन्तु विराज मासल आर्ट में ब्लैक बैल्ट होल्डर था। शिवा उसे छू भी नही पा रहा था जबकि विराज उसे जाने किस किस तरह से मारे जा रहा था। गौरी और निधि मुह और आखें फाड़े देखे जा रही थी। निधि की खुशी का तो कोई ठिकाना ही न था। उसने ऐसी मार धाड़ भरी फाइटिंग फिल्मों में ही देखी थी और आज तो उसका अपना सगा बड़ा भाई खुद ही किसी हीरो की तरह फाईटिंग कर रहा था। उसका मन कर रहा था कि वह ये देख कर खुशी से नाचने लगे किन्तु माॅ के रहते उसने अपने जज़्बातों को शख्ती से दबाया हुआ था।
"न नहीं.....।" अचानक ही गौरी चीखी, उसे जैसे होश आया था। दोड़ कर उन दोनो के पास पहुॅची वह और विराज को पकड़ने लगी__"छोंड़ दे बेटा उसे। भगवान के लिए छोंड़ दे। वो मर जाएगा तुझे मेरी कसम छोंड़ दे उसे।"
माॅ की कसम सुनते ही विराज के हाथ पाॅव रुक गए। मगर तब तक शिवा की हालत ख़राब हो चुकी थी। लहूलुहान हो चुका था वह। जिस्म का ऐसा कोई हिस्सा नही बचा था जहाॅ से खून और चोंट न नज़र आ रही हो। अधमरी सी हालत में वह जमीन पर पड़ा था। मुह से कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी शायद बेहोश हो चुका था वह।
विराज के रुकते ही गौरी ने जाने किस भावना के तहत विराज के दोनो गालों पर थप्पड़ों की बरसात कर दी।
"ये तूने क्या किया, तू इतना क्रूर और निर्दयी कैसे हो गया?" गौरी रोए जा रही थी__"क्या मैंने तुझे यही संस्कार दिए थे कि तू किसी को इस तरह क्रुरता से मारे?"
कहानी जारी रहेगी,,,,,,,,,
"ये इसी लायक था माॅ।" माॅ का मारना जब रुक गया तो विराज कह उठा, उस पर गुस्सा अब भी विद्यमान था बोला__"इसने आपको और मेरी गुड़िया को कितना गंदा बोला था माॅ। किसी के सामने इतना भी नहीं झुक सकता मैं। मेरे सामने कोई आपको और गुड़िया को ऐसी सोच के साथ अपशब्द कहे मैं हर्गिज भी बरदास्त नहीं करूॅगा। मैं ऐसी गंदी जुबान बोलने वाले का किस्सा ही खतम कर दूॅगा।"
"ये तूने ठीक नहीं किया बेटे।
" गौरी की आखें नम थी__"उसकी हालत तो देख। ऐसी हालत में उसे जब उसके माॅ बाप देखेंगे तो वो चैन से नहीं बैठेंगे।"
"क्या करेंगे वो?" विराज के लहजे मे पत्थर सी कठोरता थी__"मैं किसी से नहीं डरता। जिसे जो करना है करे अब मैं भी पीछे हटने वाला नहीं हूॅ माॅ और.....और आप भी अब मुझे अपनी कसम देकर रोकेंगी नहीं। हर बार आपकी कसम मुझे कुछ भी करने से रोंक लेती है। आपको ये एहसास भी नहीं है माॅ कि उस हालत में मुझ पर क्या गुज़रती है? मुझे खुद से ही नफरत होने लगती है माॅ। मैं अपने आपसे नज़रें नहीं मिला पाता। मुझे ऐसे बंधन में मत बाॅधा कीजिए माॅ वरना मैं जी नहीं पाऊॅगा।"
"नहीं मेरे बच्चे।" गौरी उसे अपने सीने से लगा कर रो पड़ी__"ऐसा मत कह मैं माॅ हू तेरी। तुझे कुछ हो न जाए इस लिए डर कर तुझे अपनी कसम में बाॅध देती हूॅ। मुझे माफ कर दे मेरे लाल, मैं जानती हूॅ कि मेरा बेटा एक सच्चा मर्द है। मेरी कसम में बॅध कर तेरी मरदानगी व खुद्दारी को चोंट लगती है। मगर, मैं तेरे पिता और अपने सुहाग को खो चुकी हूॅ अब तुझे नहीं खोना चाहती। तू हम दोनो मां बेटी का एक मात्र सहारा है बेटा। इस दुनिया में कोई हमारा नहीं है।"
"मुझे कुछ नहीं होगा माॅ।" विराज ने माॅ के सीने से अलग हो कर तथा अपने दोनों हाथों से मां का मासूम सा चेहरा सहलाते हुए बोला__"इस दुनिया की कोई भी ताकत मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। अब समय आ गया है ऐसे बुरे लोगों को उनके किये की सज़ा देने का।"
"ये तू क्या कह रहा है बेटा ?" गौरी के चेहरे पर न समझने वाले भाव उजागर हो उठे__"नही नही, हमें किसी को कोई सज़ा नहीं देना है बेटा। हम यहाॅ अब एक पल भी नहीं रुकेंगे। इससे पहले कि शिवा की हालत के बारे में किसी को कुछ पता चले हमें यहाॅ से निकल जाना चाहिए।"
"माॅ सही कह रही हैं भइया।" निधि ने भी पास आते हुए कहा__"अब हमें यहाॅ एक पल भी नहीं रुकना चाहिए। आप नहीं जानते हैं हम लोगों की पल पल की ख़बर बड़े पापा को होती है और इसमें कोई शक नहीं कि उन्हें अब तक ये न पता चल गया हो कि यहाॅ क्या हुआ है?"
"हाॅ बेटा चल जल्दी चल यहा से।" गौरी ने घबराते हुए कहा__"उनका कोई भरोसा नहीं है कि वो कब यहा आ जाएं।"
"मैं भी देखना चाहता हूं माॅ कि बड़े पापा क्या कर लेंगे मेरा और आप दोनों का?" विराज ने कहा__"बहुत हो गया अब। वो समझते होंगे कि हम उनसे डरते हैं। आज मैं उन्हें दिखाऊंगा कि मैं कायर और डरपोंक नहीं हूॅ। अब तक इस लिए चुप था क्योंकि आपने मुझे अपनी कसम से बाॅधे रखा था। मगर अब और नही माॅ, मैं कायर और डरपोंक नहीं बन सकता। मेरा ज़मीर मुझे चैन से जीने नहीं देगा। क्या आप चाहती हैं माॅ कि मैं घुट घुट कर जिऊॅ?"
"नहीं मेरे लाल।
" गौरी मानो तड़प उठी, बोली__"मैं ये कैसे चाह सकती हूं भला कि मेरे जिगर का टुकड़ा मेरी आॅखों का नूर यूॅ घुट घुट कर जिये वो भी सिर्फ मेरी वजह से? मगर तू तो जानता है बेटा कि मै एक माॅ हूं, दुनिया की कोई भी माॅ ये नहीं चाहती कि उसके लाल के ऊपर किसी भी तरह का कोई संकट आए।"
"फिक्र मत कीजिए माॅ।" विराज ने कहा__"आपका प्यार और आशीर्वाद इतना कमज़ोर नहीं है जिससे कोई बला मुझे किसी तरह का नुकसान पहुॅचा सके।"
"बहुत बड़ी बड़ी बातें करने लगा है तू तो।" गौरी ने विराज के चेहरे को अपने दोनो हाथों में लेकर कहा__"लगता है मेरा बेटा अब बड़ा हो गया है।"
"हाॅ माॅ, भइया अब बहुत बड़े हो गए हैं।" निधि ने मुस्कुराते हुए कहा__"और इतना ही नहीं मेरे भइया किसी सुपर हीरो से कम नहीं हैं। मेरे अच्छे और प्यारे भइया।" कहने के साथ ही निधि विराज की पीठ से चिपक गई।
"ये कितना ही बड़ा हो गया हो गुड़िया।"गौरी ने कहा__"मगर मेरे लिए तो ये आज भी मेरा छोटा सा बच्चा ही है।"
"और मैं?" निधि ने विराज की पीठ से चिपके हुए ही शरारत से कहा।
"तू तो हम सबकी छोटी सी गुड़िया है।" विराज ने कहा और उसे अपनी पीठ से खींच कर गले से लगा लिया। ये देख गौरी की आखें भर आईं।
"ऐसे ही तुम दोनो भाई बहन में स्नेह और प्यार बना रहे मेरे बच्चों।"गौरी ने अपनी छलक आई आखों को अपने आॅचल के छोर से पोंछते हुए कहा__"मगर इस स्नेह और प्यार में अपनी इस अभागन माॅ को न भूल जाना तुम दोनो।"
कहानी जारी रहेगी,,,,,,,
विराज ने अपनी माॅ की इस बात को जब सुना तो उसने अपना एक हाथ फैला दिया। गौरी ने जब ये देखा तो वो भी अपने बेटे के चौड़े सीने से जा लगी। कुछ देर यू ही सब एक दूसरे से गले मिले रहे फिर सब अलग हुए।
"अब हमें चलना चाहिए बेटा।" गौरी ने गंभीर भाव से कहा__"ज्यादा देर यहाॅ पर रुकना अब ठीक नहीं है।"
"पर माॅ, ।" विराज अपनी बात भी न पूरी कर पाया था कि गौरी ने उसकी बात को काटते हुए कहा__"अभी यहां से चलो बेटा। अभी सही समय नहीं है ये किसी चीज़ के लिए। यहाॅ हम उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते क्योकि यहा उनकी ताकत ज्यादा है। पुलिस प्रसासन भी उनका ही कहना मानेंगे इस लिए कह रही हूं कि यहां रह कर कुछ भी करना ठीक नहीं है। मैं जानती हूं कि तुम्हारे अंदर प्रतिशोध की आग है और जब तक वो आग तुम्हारे अंदर रहेगी तुम चैन से जी नही सकोगे। इस लिए अब मैं तुम्हें किसी बात के लिए रोकूॅगी नहीं, हाॅ इतना जरूर कहूॅगी कि जो कुछ भी करना ये ध्यान में रख कर ही करना कि तुम्हारे बिना हम माॅ बेटी का क्या होगा?"
"आप दोनो की सुरक्षा मेरी पहली प्राथमिकता होगी माॅ।" विराज को जैसे उसकी मन की मुराद मिल गई थी। अंदर ही अंदर कुछ भी करने की आज़ादी के एहसास को महसूस करके ही वह खुश हो गया था किन्तु प्रत्यक्ष में बोला__"अब वह होगा माॅ जिससे आपको अपने इस बेटे पर गर्व होगा।
चलिए अब चलते हैं यहाॅ से।"
इसके बाद तीनों ही चल पड़े वहाॅ से। सामान ज्यादा कुछ था नहीं। पैदल चलते हुए लगभग बीस मिनट में तीनो मेन रोड के उस जगह पहुॅचे जहाॅ से बस मिलती थी। हलाकि ये जगह उनके गाॅव के पास की नहीं थी किन्तु गौरी ने ही घूम कर इधर से आने को कहा था। शायद उसके मन में इस बात का अंदेशा था कि अगर शिवा की पिटाई का पता उसके घर वालों को हो गया होगा तो वो लोग उसे ढूॅढ़ते हुए आ भी सकते थे।
हलाकि ये गौरी के मन का वहम ही साबित हुआ। क्योकि अभी तक कोई भी उन्हें ढंढ़ने नहीं आया था जबकि वो बस में सवार हो कर शहर के लिए निकल भी चुके थे। कदाचित शिवा की हालत के बारे में अब तक किसी को पता न चला था। वरना अब तक वो शहर के लिए निकल न पाते। मगर गौरी के मन में उन लोगों के आ जाने का ये डर तब तक बना ही रहा जब तक कि ट्रेन में बैठ कर मुम्बई के लिए निकल न गए थे। जबकि विराज और निधि ऐसे वर्ताव कर रहे थे जैसे उन्हें इस सबका कोई भय ही न था।
ट्रेन जब स्टेशन से बहुत दूर निकल गई तब जा कर गौरी के मन से थोड़ा भय कम हुआ और वह भी सामान्य हो गई। दिलो दिमाग मे विचारों का बवंडर सा चल रहा था। कैसा समय आ गया था उनके जीवन में जिसकी शायद उन्होंने स्वप्न में भी कल्पना न की थी। अपने ही घर से बेदखल कर दिया गया था उन्हें और आज ये आलम था कि उन्हें अपनी जान तथा इज्जत बचाने के लिए भी बहुत दूर कहीं छिप जाने पर बिवस होना पड़ रहा था। गौरी विचारों के सागर में गोते लगा रही थी। उसका चेहरा बेहद ही विचलित और उदास हो उठा था। आखों में आसू तैरने लगे थे। विराज अपनी माॅ को ही देखे जा रहा था। उसे एहसास था कि उसकी माॅ के दिलो दिमाग मे इस समय क्या चल रहा है। उसके माता पिता हमेशा ही उसके लिए एक आदर्श थे। वह अपनी माॅ और बहन को एक पल के लिए भी विचलित या उदास नहीं देख सकता था। उसकी बहन निधि उसकी एक बाह थामे उसके कंधे में अपना सिर टिकाए बैठी थी। आज उसे अपने बड़े भाई पर पहले से कहीं ज्यादा स्नेह और प्यार आ रहा था। उसे लग रहा था कि उसके भइया के रहते अब दुनिया की कोई बला उन पर अपना असर नहीं दिखा सकती थी।
विराज का चेहरा एकाएक पत्थर की तरह शख्त हो गया। मन ही मन उसने शायद कोई संकल्प सा ले लिया था। आखों में खून सा उतरता हुआ नजर आया। नथुने फूलने पिचकने लग गए थे। सहसा गौरी की नजर अपने बेटे पर पड़ी। बेटे की हालत का अंदाजा होते ही उसकी आखें भर आईं। उसने शीघ्रता से विराज को अपने सीने में छुपा लिया। माॅ का ह्रदय ममता के विसाल सागर से भरा होता है जिसकी ठंडक से तुरंत ही विराज शान्त हो गया। 'फिक्र मत कीजिए माॅ अब ऐसा तांडव होगा कि हमारा बुरा करने वालों की रूह काॅप जाएगी।' विराज ने मन ही मन कहा और अपनी आखें बंद कर ली।
दोस्तो अपडेट हाज़िर है....
अपडेट......... 《 05 》
अब तक.....
विराज का चेहरा एकाएक पत्थर की तरह शख्त हो गया। मन ही मन उसने शायद कोई संकल्प सा ले लिया था। आखों में खून सा उतरता हुआ नजर आया। नथुने फूलने पिचकने लग गए थे। सहसा गौरी की नजर अपने बेटे पर पड़ी। बेटे की हालत का अंदाजा होते ही उसकी आखें भर आईं। उसने शीघ्रता से विराज को अपने सीने में छुपा लिया। माॅ का ह्रदय ममता के विसाल सागर से भरा होता है जिसकी ठंडक से तुरंत ही विराज शान्त हो गया। 'फिक्र मत कीजिए माॅ अब ऐसा तांडव होगा कि हमारा बुरा करने वालों की रूह काॅप जाएगी।' विराज ने मन ही मन कहा और अपनी आखें बंद कर ली।
अब आगे.......
विराज अपनी माॅ और बहन को लेकर मुम्बई के लिए निकल चुका था। जबकि यहाॅ हवेली में माहौल बड़ा ही गर्म था। शिवा का जब शाम तक कोई अता पता न चला तो उसके पिता अजय सिंह तथा माॅ प्रतिमा को चिंता हुई। अजय सिंह ने अपने आदमियों को शिवा की तलाश मे पूरे गाॅव तथा आस पास के गावों में भेज दिया और खुद अपने खेत में बने मकान की तरफ चल दिया। उसके साथ कुछ आदमी और थे।
अजय सिंह अपनी वकील की नौकरी छोंड़ चुका था। अब वह बिजनेस मैन था तथा सारी जमीनों पर मजदूरों द्वारा फसल उगाता था। उसने अपने सबसे छोटे भाई अभय को भी अपनी तरफ कर लिया था। ये कैसे हुआ ये तो खैर बाद में पता चलेगा।
अजय सिंह अपने आदमियों के साथ जब खेत वाले मकान पर पहुचा तो वहा का नजारा देख कर हक्का बक्का रह गया। मकान में जो कमरा विराज की माॅ और उसकी बहन के लिए दिया गया था वो खुला पड़ा था और बाहर शिवा की मोटर साईकिल एक तरफ पड़ी थी। कुछ दूरी पर अजय सिंह का बेटा अधमरी हालत मे पड़ा था खून से तथपथ। अपने बेटे की ऐसी हालत देख कर अजय सिंह की मानो नानी मर गई।
अजय सिंह को समझ न आया कि उसके बेटे की ये हालत कैसे हो गई? उसने शीघ्र ही अपने बेटे को उठाया और अपनी गोंद मे लिया। एक आदमी जल्दी ही ट्यूब बेल से पानी लाया और शिवा के चेहरे पर हल्के हल्के छिड़का। थोड़ी ही देर मे शिवा को होश आ गया। अजय सिंह ने अपने आदमियों से कह कर उसे अपनी कार मे बिठाया और हास्पिटल की तरफ बढ़ गया।
रास्ते में अजय सिंह के पूछने पर शिवा ने सुबह की सारी राम कहानी अपने पिता को बताई। अजय सिंह ये जान कर चौंका कि उसका भतीजा विराज यहा आया था और उसने ही शिवा की ये हालत की है। इतना ही नही वो ये सब करने के बाद उसकी जानकारी में आए बग़ैर बड़ी आसानी से अपनी माॅ और बहन को अपने साथ ले भी गया। अजय सिंह को ये सब जानकर बेहद गुस्सा आया। उसने तुरंत ही किसी को फोन लगाया और कुछ देर बात करने के बाद फोन काट दिया।
"तुम फिक्र मत करो बेटे।" फिर उसने शिवा से कहा__"बहुत जल्द वो हरामज़ादा तुम्हारे कदमों के नीचे होगा। मैंने पुलिस को इनफार्म कर दिया है और कह दिया है कि उन सबको किसी भी हालत में पकड़ कर हमारे पास ले कर आएॅ।
"
"उस कमीने ने मुझे बहुत मारा है डैड।" शिवा ने कराहते हुए अपने पिता से कहा__"मैं उसे छोड़ूॅगा नहीं, जान से मार दूॅगा उस हरामजादे को।"
"चिन्ता मत करो बेटे।" अजय सिंह ने भभकते हुए लहजे में कहा था__"सबका हिसाब देना पड़गा उसे। अभी तक मै नरमी से पेश आ रहा था। मगर अब मै उन्हें दिखाऊगा कि मुझसे और मेरे बेटे से उलझने का अंजाम क्या होता है?"
"मालिक हम हास्पिटल पहुॅच गए हैं।" ड्राइविंग करते हुए एक आदमी ने कहा।
उस आदमी की बात सुन कर अजय सिंह ने कार से उतर कर शिवा को भी सहारा देकर नीचे उतारा और हास्पिटल के अंदर की तरफ बढ़ गया।
एक घंटे बाद अजय सिंह अपने बेटे के साथ हवेली मे पहुचा। शिवा की हालत अब बेहतर थी क्योकि हास्पिटल में उसकी ड्रेसिंग हो गई थी। अजय सिंह ने अपनी पत्नी प्रतिमा को सब बताया कि क्या क्या हो गया है आज। सारी बाते सुन कर प्रतिमा की भी भृकुटी तन गई। उसने तो सर पर आसमान ही उठा लिया।
"ये सब आपकी वजह से हो रहा है।" प्रतिमा ने गुस्से से कहा__"मैं तो उस दिन भी कह रही थी कि नाग नागिन और उनके सॅपोलों को कुचल दीजिए मगर आप ही नहीं माने।"
"धीरे बोलो प्रतिमा।" अजय ने सहसा तपाक से बोला__"दीवारों के भी काॅन होते हैं।"
"मुझे किसी की परवाह नही है।" प्रतिमा ने कहा__"आज अगर मेरे बेटे को कुछ हो जाता तो आग लगा देती इस हवेली को।"
"मैने उनका इंतजाम कर दिया है।"अजय सिंह ने कहा__"वो हमसे बच कर कहीं नही जा पाएंगे। बस इंतजार करो वो सब तुम्हारे सामने होंगे फिर जो दिल करे करना उन सबके साथ।"
"डैड मैं तो बस निधि को चाहता हू।" शिवा कमीने ढंग से मुस्कुराया था बोला__"बाकी का आप और माॅम जानो।"
"जो कुछ करना सोच समझ कर करना बेटे।" अजय सिंह ने राजदाराना लहजे में कहा__"तुम्हारे दादा दादी की चिन्ता नहीं है हमें। बस अपने चाचा अभय से जरा सावधान रहना। उसे ये सब पता न चल पाए कि हम क्या कर रहे हैं? हमने बड़ी मुश्किल से उसे अपनी तरफ किया है।"
"वो तो ठीक है डैड।" शिवा ने कहा__"लेकिन ऐसा कब तक चलेगा? आखिर चाचा लोगो को हम अपने सभी कामों मे शामिल कब करेंगे?"
"बेटा ये इतना आसान नहीं है।" अजय ने कहा__"तुम्हारे चाचा और चाची लोग जरा अलग तबियत के हैं।"
"अगर ऐसा नही हो सकता तो।" प्रतिमा ने कहा__"तो फिर हमारे पास एक ही रास्ता है।"
"हमें कोशिश करते रहना चाहिए।"अजय ने कहा__"तुम भी करुणा पर कोशिश करती रहो।"
तभी अजय का मोबाइल बजा।
"लो लगता है उन लोगों को ढूॅढ़ लिया गया है।" अजय सिंह ने अपनी कोट की जेब से मोबाइल निकालते हुए कहा और मोबाइल की काॅल को रिसीव कर कान से लगा लिया। उधर से जाने क्या कहा गया जिसे सुन कर अजय सिंह के चेहरे पर गुस्से के भाव आ गए।
कहानी जारी रहेगी,,,,,,,
"ऐसा कैसे हो सकता है?"अजय सिंह गुर्राया__"वो लोग ट्रेन से कैसे गायब हो गए? तुम उन्हें ढूॅढ़ो और शीघ्र हमारे पास लेकर आओ वरना ठीक नहीं होगा समझे?"
"-----------------"
"अरे जाएगे कहाॅ?" अजय ने कहा__"ठीक से ढूॅढ़ो उन्हें।" कहने के साथ ही अजय ने फोन काट दिया।
"क्या हुआ?" प्रतिमा ने पूछा__"किससे बात कर रहे थे आप?"
"डीसीपी अशोक पाठक से।" अजय ने बताया__"उसका कहना है कि विराज अपनी माॅ और बहन सहित ट्रेन से गायब हैं।"
"क् क्या...???" प्रतिमा और शिवा एक साथ उछल पड़े___"ऐसा कैसे हो सकता है भला? वो सब मुम्बई के लिए ही निकले थे।"
"हो सकता है कि वो लोग ट्रेन में बैठे ही न हों।" प्रतिमा ने सोचने वाले भाव से कहा__"कदाचित उन्हे ये अंदेशा रहा हो कि उनकी करतूत का पता चलते ही उन्हे पकड़ने के लिए आप उनके पीछे पुलिस को या अपने आदमियों को लगा देंगे। इस लिए वो ट्रेन से सफर करना बेहतर न समझे हों।"
"ऐसा नहीं है।" अजय ने कहा__"क्योकि विराज ने तत्काल रिज़र्वेशन की तीन टिकटें ली थीं। रेलवे कर्मचारियों के पास इसका सबूत है कि उन्होने तत्काल रिजर्वेशन की तीन टिकटें ली थी मुम्बई के लिए।"
"तो फिर वो कहाॅ गायब हो गए?" शिवा ने कहा__"उन्हे ये जमीन खा गई या आसमान निगल गया?
"चिंता मत करो।" अजय सिंह ने कहा__"हम उन्हें जरूर ढूंढ् लेंगे।"
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,
अपडेट.............. 《 06 》
अब तक,,,,,,
"ऐसा नहीं है।" अजय ने कहा__"क्योकि विराज ने तत्काल रिज़र्वेशन की तीन टिकटें ली थीं। रेलवे कर्मचारियों के पास इसका सबूत है कि उन्होने तत्काल रिजर्वेशन की तीन टिकटें ली थी मुम्बई के लिए।"
"तो फिर वो कहाॅ गायब हो गए?" शिवा ने कहा__"उन्हे ये जमीन खा गई या आसमान निगल गया?
"चिंता मत करो।" अजय सिंह ने कहा__"हम उन्हें जरूर ढूंढ् लेंगे।"
अब आगे,,,,,,,
उधर विराज अपनी माॅ और बहन को ट्रेन से उतार कर अब बस पकड़ चुका था। उसका खयाल था कि बस से वह किसी अन्य शहर जाएगा और फिर वहाॅ से किसी दूसरी ट्रेन से मुम्बई जाएगा।
"तुम हमें ट्रेन से उतार कर बस में क्यों लाए बेटा?" माॅ गौरी ने सबसे पहले यही सवाल पूछा था।
"ट्रेन में जाने से खतरा था माॅ।" विराज ने कहा__"बड़े पापा ने हमें पकड़ने के लिए अपने आदमी भेजे थे जो सभी जगह चेक कर रहे थे।"
"क् क्या..???" गौरी बुरी तरह चौंकी___"पर तुम्हें कैसे पता?"
"मुझे इस बात का पहले से अंदेशा था माॅ।" विराज ने कहा__"इस लिए मैंने अपने एक दोस्त को बड़े पापा की हर गतिविधि की खबर रखने के लिए कह दिया था फोन के जरिए। जब हम लोग ट्रेन मे बैठ कर चले थे तब तक ठीक था। आप जानती है ट्रेन वहा से निकलने के बाद एक जगह रुक गई थी और फिर छ: घंटे रुकी रही। क्योंकि उसमें कोई तकनीकी खराबी थी। मेरे दोस्त का फोन शाम को आया था उसने बताया कि बड़े पापा ने हमे ढूढ़ने के लिए हर जगह अपने आदमी भेज दिये हैं।
मुझे पता था ट्रेन मे उनके आदमी हमे बड़ी आसानी से ढूढ़ लेंगे क्योकि उन्हे रेल कर्मचारियो से हमारे बारे में पता चल जाता और हम पकड़े जाते। इस लिए मैंने आप सबको ट्रेन से उतार कर किसी अन्य तरीके से मुम्बई ले जाने का सोचा।"
"आपने बहुत अच्छा किया भइया।"निधि ने कहा__"अब वो हमें नही ढूढ़ पाएंगे।"
"इतना लम्बा चक्कर लगाने का यही मतलब है कि वो हमें उस रूट पर ढूढ़ेगे जबकि हम यहा हैं।" विराज ने कहा__"मैं अकेला होता तो ये सब नही करता बल्कि खुल कर उन सबका मुकाबला करता मगर आप लोगों की सुरक्षा जरूरी थी।"
"अभी मुकाबला करने का समय नही है बेटा।" गौरी ने कहा__"जब सही समय होगा तब मैं खुद तुझे नही रोकूॅगी।"
"आप बस देखती जाओ माॅ।" विराज ने कहा__"कि अब क्या करता हूॅ मैं?"
"हाॅ भइया आप उन्हें छोंड़ना नहीं।" निधि ने कहा__"बहुत गंदे लोग हैं वो सब। हमे बहुत दुख दिया है उन्होने।"
"फिक्र मत कर मेरी गुड़िया।" विराज ने कहा__"मैं उन सबसे चुन चुन कर हिसाब लूॅगा।"
ऐसी ही बातें करते हुए ये लोग दूसरे दिन मुम्बई पहुॅच गए। विराज उन दोनो को सुरक्षित अपने फ्लैट पर ले गया। ये फ्लैट उसे कम्पनी द्वारा मिला था जिसमें दो कमरे एक ड्राइंग रूम एक डायनिंग रूम एक लेट्रिन बाथरूम तथा एक किचेन था। पीछे की तरफ बड़ी सी बालकनी थी। कुल मिलाकर इन सबके लिए इतना पर्याप्त था रहने के लिए।
विराज चूॅकि यहाॅ अकेला ही रहता था इस लिए वो साफ सफाई से ज्यादा मतलब नही रखता था। हलाॅकि सफाई वाली आती थी लेकिन वो सफाई नही करवाता था ऐसे ही रहता था। फ्लैट की गंदी हालत देख कर दोनो माॅ बेटी ने पहले फ्लैट की साफ सफाई की। विराज ने कहा भी कि सफर की थकान है तो पहले आराम कीजिए, सफाई का काम वह कल करवा देगा जब सफाई वाली बाई आएगी तो लेकिन माॅ बेटी न मानी और खुद ही साफ सफाई में लग गईं।
इस बीच विराज मार्केट निकल गया था किराना का सामान लाने के लिए। हलाकि कंपनी से रहने खाने का सब मिलता था लेकिन विराज बाहर ही होटल मे खाना खाता था। फ्लैट में गैस सिलेंडर और चूल्हा वगैरा सब था किन्तु राशन नही था। दो कमरों मे से एक कमरे में ही एक बेड था। किचेन बड़ा था जिसमें एक फ्रिज़ भी था। ड्राइंग रूम मे एक बड़ा सा एल सी डी टीवी भी था।
लगभग दो घंटे बाद विराज मार्केट से लौटा। उसने देखा कि फ्लैट की काया ही पलट गई है। हर चीज अपनी जगह ब्यवस्थित तरीके से रखी गई थी। विराज को इस तरह हर जगह आॅखें फाड़े देखता देख निधि ने कहा__"न आप खुद का खयाल रखते हैं और न ही किसी और चीज का। लेकिन अब ऐसा नही होगा, अब हम आ गए हैं तो आपका अच्छे से खयाल रखेंगे।"
"ओहो क्या बात है।"विराज मुस्कुराया__"हमारी गुड़िया तो बड़ी हो गई लगती है।"
"हाॅ तो?" निधि विराज के बगल से सट कर खड़ी हो गई__"देखिए आपके कंधे तक बड़ी हो गई हूॅ।"
"हाॅ हाॅ तू तो मेरी भी अम्मा हो गई है न।
" गौरी ने कहा__"धेले भर की तो अकल है नहीं और बड़ी बड़ी बाते करने लगी है।"
"देखिए भइया जब देखो माॅ मुझे डाॅटती ही रहती हैं।"निधी ने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा।
"मत डाॅटा कीजिए माॅ गुड़िया को।" विराज ने निधि को अपने सीने से लगाते हुए कहा__"ये जैसी भी है मेरी जान है ये।"
"सुन लिया न माॅ आपने?" निधि ने विराज के सीने से सिर उठा कर अपनी माॅ गौरी की तरफ देख कर कहा__"मैं भइया की जान हूॅ और हाॅ...भइया भी मेरी जान हैं...हाॅ नहीं तो।"
"अच्छा ठीक है बाबा।" गौरी ने हॅस कर कहा__"अब भाई को छोंड़ और जा जाकर नहा ले, फिर मुझे भी नहाना है और खाना भी बनाना है।"
"मैं खाना बाहर से ही ले आया हूॅ माॅ।" विराज ने कहा__"आप लोग खा पी कर आराम कीजिए कल से यहीं खाना पीना बनाना।"
"अब ले आया है तो चल कोई बात नहीं।" गौरी ने कहा__"लेकिन आज के बाद बाहर का खाना पीना बंद। ठीक है न??"
"जैसा आप कहें माॅ।" विराज ने कहा और सारा सामान अंदर किचन में रख दिया।
गौरी के कहने पर निधि नहाने चली गई। जबकि विराज वहीं ड्राइंग रूम में रखे सोफे पर बैठ गया। अचानक ही उसके चेहरे पर गंभीरता के भाव गर्दिश करने लगे थे। गौरी किचेन में सामान सेट कर रही थी।
विराज के मोबाइल पर किसी का काॅल आया। उसने मोबाईल की स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नाम को देखा तो होठों पर एक अजीब सी मुस्कान उभर आई।
"मैं आ गया हूॅ।" विराज ने कहा__"और अब मैं तैयार हूॅ उस काम के लिए, बोलो कहाॅ मिलना है?""
"__________________"
"ठीक है फिर।" विराज ने कहा और फोन काट दिया। 'अजय सिंह बघेल अब अपनी बरबादी के दिन गिनने शुरू कर दे क्योकि अब विराज दि ग्रेट का क़हर तुम पर और तुमसे जुड़ी हर चीज़ पर टूटेगा'
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,
ब बेटे।" गौरी बुरी तरह रोते हुए अपने बेटे के चौड़े सीने से जा लगी। उसने कस कर विराज को जकड़ा हुआ था। विराज ने भी माॅ को छुपका लिया फिर बोला__"नहीं माॅ, अब आप रोएंगी नहीं। रोने धोने वाला वक्त गुज़र गया। अब तो रुलाने वाला वक्त शुरू होगा।"
"कितनी नासमझ थी मैं।" गौरी ने विराज के सीने से लगे हुए ही गंभीरता से कहा__"मैं जिस बेटे को छोटा और अबोध समझ रही थी तथा ये भी कि वो बहुत मासूम है नासमझ है अभी, मगर वो तो अपनी छोटी सी ऊम्र में भी कहीं ज्यादा समझदार और जिम्मेदार हो गया है। मैंने सब कुछ अपने बेटे से छुपाया, सिर्फ इस लिए कि मैं अपने बेटे को खो देने से डरती थी।"
"आप एक माॅ हैं माॅ।" विराज ने कहा__"और आपने जो कुछ भी किया अपनी ममता से मजबूर हो कर किया। इस लिए इसके लिए मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है। लेकिन हाॅ एक शिकायत जरूर है।"
"अच्छा।" गौरी ने विराज के सीने से अपना सिर अलग किया तथा ऊपर बेटे के की आखों मे प्यार से देखते हुए कहा__"ऐसी क्या शिकायत है मेरे बेटे को मुझसे, जरा मुझे भी तो पता चले।"
"शिकायत यही है कि।
" विराज ने कहा__"आप हर पल खुद को दुखी रखती हैं और अपनी आॅखों पर तरस खाने की बजाय उन्हें रुलाती रहती हैं। ये हर्गिज़ भी अच्छी बात नहीं है।"
"अब से ऐसा नहीं होगा।" गौरी ने मुस्कुराते हुए कहा__"अब मैं न तो खुद को दुखी रखूॅगी और न ही अपनी आखों को रुलाऊॅगी। अब ठीक है न?"
"यही बात आप मेरी कसम खा कर कहिए।" विराज ने कहने के साथ ही माॅ गौरी का दाहिना हाॅथ पकड़ कर अपने सिर पर रखा।
"न नहीं नहीं।" गौरी ने विराज के सिर से तुरंत ही अपना हाॅथ खींच लिया__"मैं इसके लिए तुम्हारी कसम नहीं खा सकती मेरे लाल। तुम तो जानते हो एक माॅ अपने बच्चों के लिए कितना संवेदनशील होती है। उसका ममता से भरा हुआ ह्रदय इतना कोमल और कमजोर होता है कि अपने बच्चों के लिए एक पल में पिघल जाता है। सीने में पल भर में भावना का ऐसा तूफान उठ पड़ता है कि उसे रोंकना मुश्किल हो जाता है, और आंखें तो जैसे इस इंतजार में ही रहती हैं कि कब वो छलक पड़ें।"
विराज माॅ की बात सुन कर मुस्करा उठा। माॅ के सुंदर चहरे और नील सी झीली आखों में खुद के लिए बेशुमार स्नेह व प्यार देखता रहा और हौले से झुक कर पहले उन आखों को फिर माॅ के माॅथे को प्यार से चूॅम लिया।
"क्या बात है?" गौरी विराज के इस कार्य पर मुस्कुराई तथा अपनी आखों की दोनो भौहों को ऊपर नीचे करके कहा__"आज अपनी इस बूढ़ी माॅ पर बड़ा प्यार आ रहा है मेरे बेटे को।"
"प्यार तो हमेशा से था माॅ।" विराज ने कहा__"और हमेशा रहेगा भी। मगर आपने खुद को बूढ़ी क्यों कहा?"
"अरे पगले! अब मैं बूढ़ी हूॅ तो बूढ़ी ही कहूॅगी न खुद को।" गौरी ने हॅस कर कहा।
"नहीं माॅ।" विराह कह उठा__"आप बूढ़ी बिलकुल भी नहीं हैं। आप तो गुड़िया की बड़ी बहन लगती हैं। आप खुद देख लीजिए।" कहने के साथ ही विराज ने माॅ गौरी को कमरे में एक तरफ दीवार से सटे एक बड़े से आदम कद आईने के सामने ला कर खड़ा कर दिया।
"ये ये सब क्या कर रहा है बेटा?" गौरी हॅसते हुए बोली, उसने सामने लगे आईने में खुद को देखा। उसके पीछे ही विराज उसे उसके दोनो कंधों से पकड़े हुए खड़ा था।
"अब गौर से देखिए माॅ।" विराज ने आईने में अपनी माॅ को देखते हुए मुस्कुरा कर कहा__"देखिए अपने आपको। आप अब भी मेरी माॅ नहीं बल्कि मेरी बड़ी बहन लगती हैं न?"
"हे भगवान!" गौरी ने हॅसते हुए कहा__"तुम्हें मैं तुम्हारी बड़ी बहन लगती हूॅ? कोई और सुने तो क्या कहे?"
"मुझे किसी से क्या मतलब?" विराज ने कहा__"जो सच है वो बोल रहा हूॅ। गुड़िया आपकी ही फोटो काॅपी है माॅ। मतलब आप जब गुड़िया की उमर में रहीं होंगी तब आप बिलकुल गुड़िया जैसी ही दिखती रही होंगी।"
"हाॅ तुम्हारी ये बात तो सच है बेटे कि गुड़िया मुझ पर ही गई है।" गौरी ने कहा__"सब कोई यही कहता था कि गुड़िया की शक्लो सूरत मुझसे मिलती जुलती है। लेकिन मैं उसके जैसी अल्हड़ और मुहफट नहीं थी।"
"वो अभी बच्ची हैं माॅ।
"विराज ने कहा__"उसमें अभी बहुत बचपना है। उसे यूॅ ही हॅसने खेलने दीजिए, वो ऐसे ही अच्छी लगती हैं।"
"उसकी उमर में मैंने जिम्मेदारी और समझदारी से रहना सीख लिया था बेटा।" गौरी ने सहसा गंभीर होकर कहा__"अब वो बच्ची नहीं रही, भले ही दिल और दिमाग से वह बच्ची बनी रहे। मगर,,,,,"
"वैसे दिख नहीं रही वो।" विराज ने कहा__"कहाॅ है वह?"
"ऊपर छत पर गई थी कपड़े डालने।" गौरी ने कहा।
"कोई हमें याद करे और हम तुरंत उसके सामने न आएं ऐसा कभी हो सकता है क्या?" सहसा कमरे के दरवाजे से अंदर आते हुए निधि ने कहा__"वैसे किस लिए याद किया गया है हमें? जल्दी बताया जाए क्योंकि हम बहुत बिजी हैं, हमें अभी कपड़े डालने जाना है ऊपर छत पर।"
"इस लड़की का क्या करूॅ मैं?" गौरी ने अपना माथा पीट लिया।
"बस प्यार कीजिए माॅ प्यार।" निधि ने अपने दोनो हाॅथों को इधर उधर घुमाते हुए कहा__"हम आपके बच्चे हैं, हमें बस प्यार कीजिए।"
"तू रुक अभी तुझे बताती हूॅ मैं।" गौरी उसे मारने के लिए निधि की तरफ लपकी, जबकि निधि जिसे पहले ही पता था कि क्या होगा इस लिए वह तुरंत ही विराज के पीछे जा छुपी और बोली__"भईया बचाइए मुझे नहीं तो माॅ मारेंगी मुझे। मैं आपकी जान हूॅ न? अब बचाइये अपनी जान को, हाॅ नहीं तो।"
"रुक जाइए माॅ।" विराज ने माॅ को रोंक लिया__"मत मारिए इसे। आपने देखा न इसके आते ही वातावरण कितना खुशनुमा हो जाता है।"
"हाॅ माॅ।" निधि तुरंत बोल पडी__"मेरी बात ही अलग है। आप समझती ही नहीं हैं जबकि भइया मुझे अच्छे से समझते हैं, हाॅ नहीं तो।"
"तेरे भइया ने ही तुझे बिगाड़ रखा है।" गौरी ने कहा__"अब जा कपड़े डाल कर आ जल्दी।"
"आपकी जान का इतना बड़ा अपमान।" निधि ने पीछे से विराज की तरफ अपना सिर करते हुए कहा__"बड़े दुख की बात है कि आप कुछ नहीं कर सकते मगर, हम चुप नहीं रहेंगे एक दिन इस बात का बदला जरूर लेंगे, देख लीजियेगा, हाॅ नहीं तो।"
"क्या बड़बड़ा रही है तू?" गौरी ने आखें दिखाते हुए कहा।
"कुछ नही माॅ।" निधि ने जल्दी से कहा__"वो भइया को हनुमान चालीसा का रोजाना पाठ करने को कह रही थी।"
"वो क्यों भला?" गौरी के माॅथे पर बल पड़ता चला गया। जबकि निधि की इस बात से विराज की हॅसी छूट गई। वो ठहाके लगा कर जोर जोर से हॅसने लगा था। निधि अपनी हॅसी को बड़ी मुश्किल से रोंके इस तरह मुॅह बनाए खड़ी थी जैसे वो महामूर्ख हो। इधर विराज के इस प्रकार हॅसने से गौरी को कुछ समझ न आया कि उसका बेटा किस बात इतना हॅसे जा रहा है?
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,,,,,,,
आशा करता हूॅ कि आप सबको पसंद आएगा,,,,,,,,
अपडेट...........《 08 》
अब तक....
"क्या बड़बड़ा रही है तू?" गौरी ने आखें दिखाते हुए कहा।
"कुछ नही माॅ।" निधि ने जल्दी से कहा__"वो भइया को हनुमान चालीसा का रोजाना पाठ करने को कह रही थी।"
"वो क्यों भला?" गौरी के माॅथे पर बल पड़ता चला गया। जबकि निधि की इस बात से विराज की हॅसी छूट गई।
वो ठहाके लगा कर जोर जोर से हॅसे जा रहा था। निधि अपनी हॅसी को बड़ी मुश्किल से रोंके इस तरह मुह बनाए खड़ी थी जैसे वो महामूर्ख हो। इधर विराज के इस प्रकार हॅसने से गौरी को कुछ समझ न आया कि उसका बेटा किस बात इतना हॅसे जा रहा है?
अब आगे,,,,,,
इसी तरह एक हप्ता गुज़र गया। इस बीच विराज अपनी माॅ और बहन को लेकर जगदीश ओबराय के बॅगले में आकर रहने लगा था। जगदीश ओबराय इन लोगों के आने से बहुत खुश हुआ था। गौरी को अपनी छोटी बहन के रूप में पाकर उसे बेहद खुशी हुई, गौरी भी उसे अपने बड़े भाई के रूप में पाकर खुश हो गई थी। निधि तो सबकी लाडली थी ही, अब जगदीश के लिए भी वह एक गुड़िया ही थी।
निधि का स्वभाव चंचल था। उसमें बचपना था तथा वह शरारती भी बहुत थी किन्तु पढ़ाई लिखाई में उसका दिमाग बहुत तेज़ था। उसने दसवीं क्लास 90% मार्क्स के साथ पास किया था। इसके आगे वह पढ़ न सकी थी क्योकि तब तक हालात बहुत खराब हो चुके थे। गाॅव में दसवीं तक ही स्कूल था। आगे पढ़ने के लिए उसे पास के शहर जाना पड़ता, हलाॅकि शहर जाने में उसको कोई समस्या नहीं थी किन्तु हालात ऐसे थे कि उन माॅ बेटी का घर से निकलना मुश्किल हो गया था। आए दिन अजय सिंह का बेटा शिवा गलत इरादों से उसे छेंड़ता था। ये दोनो बाप बेटे एक ही थाली में खाने वाले थे। अजय सिंह की नीयत गौरी पर खराब थी। जबकि गौरी उसके मझले स्वर्गीय भाई विजय सिंह की बेवा थी तथा निधि उसकी बेटी समान थी। ये दोनो बाप बेटे अपने ही घर की इज्जत से खेलना चाहते थे। पैसे और ताकत के घमंड में दोनो बाप बेटे रिश्तों की मान मर्यादा भूल चुके थे।
जगदीश ओबराय ने निधि की पढ़ाई को ध्यान में रखते हुए उसका एडमीशन सबसे अच्छे स्कूल में करवा दिया था। अभी वक्त था इस लिए स्कूल में दाखिला बड़ी आसानी से हो गया था। अब निधि रोजाना स्कूल जाती थी। अपनी पढ़ाई के पुनः प्रारम्भ हो जाने से निधि बहुत खुश थी।
विराज अब चूॅकि खुद ही जगदीश ओबराय की सारी सम्पत्ति का इकलौता मालिक था इस लिए अब वह कंपनी में मैनेजर के रूप में नहीं बल्कि कंपनी के एम डी के रूप में जाता था। कंपनी में काम करने वाला हर ब्यक्ति ये जान कर आश्चर्य चकित था कि कंपनी में काम करने वाला एक मैनेजर आज इस कंपनी का मालिक है, यानी उन सबका मालिक। किसी को ये बात हजम ही नहीं हो रही थी। हर ब्यक्ति विराज और विराज की किस्मत से रक़्श कर रहा था। विराज के उच्च अधिकारी जो पहले विराज को हुक्म देते थे तथा उसे तुच्छ समझते थे वो अब विराज के सामने उसके महज एक इशारे से किसी गुलाम की तरह सर झुकाए खड़े हो जाते थे। कोई भी उच्च अधिकारी विराज के सामने किसी गुलाम की तरह झुकना नही चाहता था और न ही उसको अपना बाॅस मानना चाहता था किन्तु अब ये संभव नही था।
सच्चाई सबके सामने थी और उस सच्चाई को स्वीकार करके उसको अपनाना सभी के लिए अब अनिवार्य था। विराज ये सब बातें अच्छी तरह जानता था। इस लिए उसने सबसे पहले एक मीटिंग रखी जिसमें कंपनी के सभी उच्च अधिकारी शामिल थे। मीटिंग में विराज ने बड़ी शालीनता से सबके सामने ये बात रखी कि अगर किसी के दिलो दिमाग में कोई बात है तो वो खुल कर जाहिर करे। वो अब ओबराय कंपनीज का मालिक है इससे अगर किसी को कोई तकलीफ हो तो वो बता दे अन्यथा बाद में किसी का भी गलत ब्यौहार या किसी भी तरह की गलत बात का पता चलते ही उसे कंपनी से आउट कर दिया जाएगा।
विराज ने ये भी कहा कि आज वह भले ही ओबराय कंपनीज़ का मालिक बन गया है लेकिन वह कंपनी में काम करने वाले सभी कर्मचारियों को हमेशा अपना दोस्त या भाई ही समझेगा।
विराज की इन बातों से मीटिंग रूम में बैठे काफी उच्च अधिकारी प्रभावित हुए और कुछों के चेहरे पर अब भी अजीब से भाव थे। सबके चेहरों के भावों को बारीकी से जाॅचने के बाद विराज ने अंत मे ये भी कहा कि अगर किसी के दिलो दिमाग में ऐसी बात है कि वो इस सच्चाई को स्वीकार नहीं कर रहे हैं तो वो शौक से अपना अपना स्तीफा देकर जा सकते हैं।
कुछ लोग हालातों से बड़ा जल्दी समझौता करके आगे बढ़ जाते हैं किन्तु कुछ ऐसे भी होते हैं जो बिना मतलब का खोखला सम्मान और गुरूर लेकर खाली हाॅथ बैठे रह जाते हैं। कहने का मतलब ये कि मीटिंग के बाद एक हप्ते के अंदर अंदर कंपनी के काफी उच्च अधिकारियों ने स्तीफा दे दिया। विराज जैसे जानता था कि यही होगा। इस लिए उसने पहले से ही ऐसे लोगों को उनकी जगह फिट किया जो उसकी नज़र में इमानदार व वफादार होने के साथ साथ उसके अपने मित्र भी थे।
ऐसे ही पन्द्रह बीस दिन गुज़र गए। विराज अब कुशलतापूर्वक कंपनी का सारा कारोबार सम्हालने लगा था। जगदीश ओबराय उसकी हर तरह से मदद भी कर रहा था। उसने एक ग्राण्ड पार्टी रखी जिसमें शहर के सभी बड़े बड़े लोग आमंत्रित थे। यहाॅ तक कि मंत्री मिनिस्टर तथा पुलिस महकमें के उच्च अधिकारी वगैरा सब। इस पार्टी को रखने का एक खास मकसद था और वो था विराज को सबके सामने प्रमोट करना। जगदीश ने स्टेज में जा कर तथा एनाउंसमेन्ट कर सबको बताया कि उसकी सारी मिल्कियत का अब से विराज ही अकेला वारिस तथा मालिक है। सब ये सुन कर हैरान भी थे और खुश भी। सभी बड़े बड़े लोगों से विराज को मिलवाया गया।
कहानी जारी रहेगी,,,,,,,
अब विराज कोई आम इंसान नहीं रह गया था बल्कि अब उसे सारा शहर जानता था। प्रेस और मीडिया वालों को कुछ सोचकर जगदीश ने पार्टी में आने नहीं दिया था। अब उसका सम्मान और रुतबा वैसा ही हो गया था जैसे खुद जगदीश ओबराय का था। गौरी व निधि इस सबसे बहुत ही खुश थीं। उनके मन में जगदीश के प्रति बड़ा आदर और सम्मान हो गया था।
अब ये सब जगदीश को पूरी तरह अपना मानने लगे थे। उन्होंने ये ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि ऐसा असंभव कार्य भी कभी होगा लेकिन सच्चाई अब उनके सामने थी। आज गौरी का बेटा हज़ारों करोड़ों रूपये की सम्पत्ति का मालिक था। गौरी इस बात के लिए भगवान का लाख लाख शुक्रिया अदा कर रही थी।
जगदीश ओबराय हार्ट का मरीज़ था। उसने अपने जीवन में एक ही झटके में अपनों को खोया था। उसके एक ही बेटा था, अमरीश ओबराय। अमरीश की नई नई शादी हुई थी और वो अपनी बीवी के साथ हनीमून के लिए इटली जा रहा था। किन्तु इटली जा रहा विमान क्रैस हो गया और एक ही झटके में विमान में बैठे सभी पैसेंजर मौत को प्राप्त हो गए थे। उस हादसे से जगदीश की मुकम्मल दुनिया ही तबाह हो गई। उसका अपना कोई नहीं बचा था। उसकी इतनी बड़ी दौलत और इतने बड़े कारोबार को सम्हालने वाला कोई नहीं बचा था। उसकी पत्नी तो पहले ही गुज़र गई थी जिससे वह बेहद प्यार करता था। इस सबसे जगदीश दिल का मरीज़ बन गया था, उसे दो बार दिल का दौरा पड़ चुका था जिसमें वह बड़ी मुश्किल से बचा था। वह रात दिन इसी सोच में मरा जा रहा था कि उसके बाद उसकी मिल्कियत का अब क्या होगा? उसके कम्पटीटर कहीं न कहीं इस बात से खुश थे और जो उसके घनिष्ठ मित्र थे वो जगदीश की इस हालत से दुखी थे। वह चाहता तो इस उमर में भी दूसरी शादी कर सकता था जिसके लिए उसके खास चाहने वाले मित्रों ने सुझाव भी दिया था। किन्तु जगदीश ने दूसरी शादी करने से साफ मना कर दिया था। उसका कहना था कि इस उमर में वह किसी से शादी नहीं करेगा, लोग उसके बारे में क्या सोचेंगे कि उसने अपनी बेटी की उमर वाली लड़की से शादी की।
अपनों के खोने का दुख और उसके द्वारा रात दिन सोचते रहने की वजह से वह दिल का मरीज़ बन गया था। इतने बड़े बॅगले में वह अकेला रहता था, ये अकेलापन उसे किसी सर्प की भाॅति रात दिन डसता रहता था। नौकर चाकर तो बहुत थे लेकिन जिनसे उसके मन को तथा आत्मा को सुकून व त्रप्ति मिलती वो उसके अपने नहीं थे। विराज के आने से उसे ऐसा लगा जैसे उसे उसका खोया हुआ बेटा अमरीश मिल गया था। उसने विराज के बारे में गुप्त रूप से सारी मालुमात की थी। विराज के अपनों ने उसके और उसकी माॅ बहन के साथ क्या अत्याचार किया ये उसको पता चला था। विराज का नेचर उसे बहुत अच्छा लगा। विराज एक होनहार तथा मेहनती लड़का था। जगदीश ने फैसला कर लिया था कि विराज ही अब उसका 'अपना' होगा। उसने विराज को अपने बॅगले में बुलवाया और तसल्ली से उससे बात की। उसने विराज से उसके बारे में सब बातें पूछी और खुद भी अपने मन की बात विराज को बताई कि वह क्या चाहता है। अपने बाॅस व मालिक की ये बातें सुन कर विराज चकित था, उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि कोई ऐसा भी कर सकता है।
विराज ने जगदीश की बातें सुनकर ये कहा कि उसे सोचने के लिए वक्त चाहिए।
जगदीश ने उसे वक्त दिया और विराज वहाॅ से चला आया था। उसने अकेले में इस बारे में बहुत सोचा। उसे जगदीश के प्रति ऐसा कुछ भी नहीं लगा कि इस सबके पीछे जगदीश का कोई गलत इरादा या मकसद हो। कंपनी में काम करने वाले सभी कर्मचारियों की तरह वह भी ये बात जानता था कि उसके मालिक जगदीश ओबराय निहायत ही एक सच्चे व नेकदिल इंसान हैं। उनकी नेकनीयती व नरमदिली का कंपनी के कुछ उच्च अधिकारी लोग ग़लत फायदा उठा रहे थे। जिनका उसने बड़ी सफाई से पर्दाफाश किया था। किसी को इस बात का पता तक न चला था। विराज ने पक्के सबूत इकट्ठा करके सीधा जगदीश ओबराय के सामने रख दिया था। जगदीश ओबराय विराज के इस कार्य और उसकी इस इमानदारी से बेहद प्रभावित हुए थे। उन्होंने विराज को अपनी सभी कंपनियों की गुप्तरूप से जाॅच पड़ताल का काम सौंप दिया किन्तु प्रत्यक्ष रूप में वह कंपनी का एक मैनेजर ही रहा।
जगदीश ओबराय के द्वारा सौंपे गए इस गुप्त कार्य को उसने बड़ी ही कुशलता तथा सफाई से अंजाम दिया। एक महीने के अंदर अंदर ही उन सबको तगड़े नोटिश के साथ कंपनी से तत्काल निकाल दिया गया। किसी को कुछ सोचने समझने का मौका तक नहीं मिला और न ही किसी को ये समझ आया कि ये अचानक उनके साथ क्या और कैसे हो गया? सबूत क्योंकि पक्के थे इस लिए उन सबको वो सब भारी हरजाने के साथ देना पड़ा जो उन सबने कंपनी से खाया था। एक झटके में ही सबके सब भीख माॅगने की हालत में आ गए थे। बात अगर इतनी ही बस होती तो भी ठीक था किन्तु उनके द्वारा किये गए इन कार्यों के लिए उन सबको जेल का दाना पानी भी मिलना नसीब हो गया था।
विराज द्वारा किये गए इस अविश्वसनीय कार्य से जगदीश ओबराय बहुत खुश हुए। उनके मन में विचार आया कि विराज के बारे में उन्होंने जो फैसला लिया है वो हर्गिज भी ग़लत नही है।
दोस्तो आप सब समझ सकते हैं कि ये सब बताने के पीछे मेरा क्या मकसद हो सकता है? और अगर नहीं समझे हैं तो बता देता हूॅ,,, दरअसल बात ये है कि किन परिस्थितियों की वजह से विराज को आज ये सब प्राप्त हुआ ? आखिर विराज में जगदीश को ऐसा क्या नज़र आया कि उसने उसे अपना सब कुछ मान भी लिया और सब कुछ दे भी दिया? हलाॅकि आज के युग की सच्चाई ये है कि आप भले ही किसी के लिए अपना सब कुछ निसार कर दीजिए किन्तु बदले में आपको कुछ मिलने की तो बात दूर आपके द्वारा किये गए इस बलिदान का कोई एहसान तक नहीं मानता। ख़ैर, जाने दीजिए.....हम कहानी पर चलते हैं।
कहानी जारी रहेगी,,,,,,,,
डैड मुझे इसके आगे की पढ़ाई मुम्बई से करना है।"नीलम ने बड़ी मासूमियत से कहा था__"मेरी सब दोस्त भी वहीं जा रही हैं।"
"अरे बेटा।
" अजय सिंह चौंका था__"मगर यहाॅ क्या परेशानी है भला? यहाॅ भी तो पास के शहर में बहुत अच्छा काॅलेज है?"
"यहाॅ के काॅलेजों में कितनी अच्छी शिक्षा मिलती है ये तो आप भी अच्छी तरह जानते हैं डैड।" नीलम ने कहा__"मुझे अपनी डाक्टरी की बेहतर पढ़ाई के लिए बेहतर शिक्षा की आवश्यकता है।"
"अच्छी बात है बेटी।" अजय सिंह ने कहा__"लेकिन मुम्बई से अच्छा तो तुम्हारे लिए दिल्ली रहेगा। क्योकि दिल्ली में तुम्हारी बड़ी बुआ भी है। तुम अपनी सौम्या बुआ के साथ रह कर वहाॅ बेहतर पढ़ाई कर सकती हो।"
"नहीं डैड।" नीलम ने बुरा सा मुह बनाया__"मैं मुम्बई में अपनी मौसी के यहाॅ रह कर पढ़ाई करूॅगी। आप तो जानते हैं कि मौसी की बड़ी बेटी अंजली दीदी आजकल मुम्बई में ही एक बड़े हास्पिटल में एज अ डाक्टर काम करती हैं। उनके पास रहूॅगी तो उनसे मुझे बहुत कुछ सीखने को भी मिलेगा।"
"ये सही कह रही है डैड।" रितु ने कहा__"अंजली दीदी के पास रह कर इसे अपनी पढ़ाई के लिए काफी कुछ जानने समझने को भी मिल जाएगा। आप इसे बड़ी मौसी के पास ही जाने दीजिए।"
"ठीक है बेटी।" अजय सिंह ने कहा__"तुम्हारी भी यही राय है तो नीलम अब मुम्बई ही जाएगी।"
"ओह थैंक्यू सो मच डैड एण्ड।" नीलम ने खुश हो कर अजय सिंह से कहने के बाद रितू की तरफ पलट कर कहा__"एण्ड थैंक्स यू टू दीदी।"
"कौन कहाॅ जा रहा है डैड?" बाहर से ड्राइंग रूम में आते हुए शिवा ने कहा।
"तुम्हारी नीलम दीदी मुम्बई जा रही है अपनी बड़ी मौसी पूनम के पास।" अजय सिंह ने कहा__"ये वहीं रह कर अपनी डाक्टरी की पढ़ाई करेगी।"
"क क्या..???" शिवा उछल पड़ा__"नीलम दीदी मुम्बई जाएंगी? नहीं डैड आप इन्हें मुम्बई कैसे भेज सकते हैं? जबकि आप जानते हैं कि हमारा सबसे बड़ा दुश्मन विराज मुम्बई में ही है।"
"अरे उससे कोई फर्क नहीं पड़ता बेटे।" अजय सिंह ने कहा__"और उससे डरने की भी कोई जरूरत नहीं है। और वैसे भी उसे क्या पता चलेगा कि नीलम कहाॅ है? वो तो किसी होटल या ढाबे में कप प्लेट धो रहा होगा। उसे इस काम से फुर्सत ही कहाॅ मिलेगी कि वो नीलम को खोजेगा?"
"हा हा हा आप सच कहते हैं डैड।" शिवा ठहाका लगा कर जोरों से हॅसते हुए कहा__"वो यकीनन किसी होटल या ढाबे में कप प्लेट ही धो रहा होगा।"
"ख़ैर छोंड़ो।" अजय सिंह ने नीलम की तरफ देख कर कहा__"तो तुम्हें कब जाना है मुम्बई?"
"मैं तो कल ही जाने का सोच रही हूॅ डैड।" नीलम ने कहा__"मैंने सारी तैयारी भी कर ली है।"
"चलो ठीक है।" अजय सिंह ने कहा__"मैं तुम्हारे लिए ट्रेन की टिकट का बोल देता हूॅ।"
"जी डैड।" नीलम ने कहा और ऊपर अपने कमरे की तरफ पलट कर चली गई।
"तू भी कुछ करेगा कि ऐसे ही आवारागर्दी करता इधर उधर घूमता रहेगा?" सहसा किचेन से आती हुई प्रतिमा ने कहा__"सीख कुछ इनसे।
ऐसे कब तक चलेगा?"
"इतना ज्यादा पढ़ लिख कर क्या करना है माॅम?" शिवा ने बेशर्मी से खीसें निपोरते हुए कहा__"डैड की दौलत काफी है मेरे उज्वल भविष्य के लिए। मैंने सही कहा न डैड?" अंतिम वाक्य उसने अजय सिंह की तरफ देखते हुए कहा था।
"बात तो तुम्हारी ठीक है शहज़ादे।" अजय सिंह पहले मुस्कुराया फिर थोड़ा गंभीर हो कर बोला__"लेकिन जीवन में उच्च शिक्षा का होना भी बहुत जरूरी होता है। माना कि मैने तुम्हारे लिए बहुत सारी दौलत बना कर जोड़ दी है लेकिन ये दौलत कब तक तुम्हारे लिए बची रहेगी? दौलत कभी किसी के पास टिकी नहीं रहती। उसको बनाए रखने के लिए काम करके उसे कमाना भी जरूरी है। आज जितना हम उसे खर्च करते हैं उससे कहीं ज्यादा उसे प्राप्त करना भी जरूरी है।"
"ओह डैड आप तो बेकार का लेक्चर देने लगे मुझे।" शिवा ने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा__"इतना तो मुझे भी पता है कि दौलत को पाने के लिए काम करना भी जरूरी है और अच्छे काम के लिए अच्छी शिक्षा का होना जरूरी है। तो डैड, मैं पढ़ तो रहा हूॅ न?"
"जिस तरह की तुम पढ़ाई कर रहे हो न।" प्रतिमा ने तीखे लहजे में कहा__"उसका पता है मुझे।"
"ओह माॅम अब आप भी डैड की तरह लेक्चर मत देने लग जाना।" शिवा ने कहा।
"ये लेक्चर तुम्हारे भले के लिए ही दिया जा रहा है बेटे।" अजय सिंह ने कहा__"इस पर ग़ौर करो और अमल भी करो।"
"जी डैड कर तो रहा हूॅ न?" शिवा ने कहा और सोफे से उठ कर अपने कमरे की तरफ चला गया। किन्तु वह ये न देख सका कि उसके पैन्ट की बाॅई पाॅकेट से उसकी कौन सी चीज़ गिर कर सोफे पर रह गई थी।
अजय सिंह और प्रतिमा की नज़रें एक साथ उस चीज़ पर पड़ीं। और उस चीज़ को पहचानते ही दोनो अपनी अपनी जगह बैठे उछल पड़े। प्रतिमा ने अपना हाॅथ आगे बढ़ा कर उस चीज को उठा लिया। वो कण्डोम का पैकिट था। पैकिट खुला हुआ था मतलब उसमे मौजूद कण्डोमों में से कुछ का इस्तेमाल हो चुका था। प्रतिमा ने अपने पति अजय सिंह की तरफ अजीब भाव से देखा।
"ये है आपके शहजादे की पढ़ाई।" प्रतिमा के लहजे में कठोरता थी बोली__"और ये सब सिर्फ आपके लाड प्यार का नतीजा है।"
"इस उमर में ये नेचुरल बात है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा__"क्या तुम भूल गई कि हम दोनों ने खुद शादी के पहले इसका कितना इस्तेमाल किया था?"
"हाॅ मगर तब आप नौकरी पेशा थे।" प्रतिमा के चेहरे पर कुछ पल के लिए शर्म की लाली छाई थी किन्तु उसने शीघ्र ही खुद को नाॅर्मल करते हुए कहा था__"लेकिन शिवा अभी पढ़ रहा है। अगर इसी तरह चलता रहा तो वो क्या कर पाएगा भविश्य में?"
"तुम बेवजह छोटी सी बात को इतना तूल दे रही हो यार।" अजय सिंह ने कहा__"मुझे तुमसे ज्यादा चिंता है उसके भविश्य की, अगर नहीं होती तो ये सब नहीं करता। और अब इस बारे में कोई बात नही होगी समझी न?"
प्रतिमा कुछ न बोली। इसके साथ ही ड्राइंग रूम में सन्नाटा छा गया।
कुछ देर की ख़ामोशी के बाद अजय सिंह ने कहा__"अब यूॅ मुह न फुलाओ मेरी जान, आज रात तुम्हें खुश कर दूॅगा चिन्ता मत करो।"
"क्या सच में?" प्रतिमा के चेहरे पर खुशी छलक पड़ी__"लेकिन दो राउण्ड से पहले नहीं सोने दूॅगी मैं आपको ये सोच लेना।"
"ठीक है मेरी जान।" अजय सिंह मुस्कुराया__"एक एक राउण्ड तुम्हारे आगे पीछे से अच्छे से लूॅगा।"
"अच्छा जी?" प्रतिमा मुस्कुराई__"आप तो जब देखो मेरे पिछवाड़े के पीछे ही पड़े रहते हो।"
"औरत को पीछे से रगड़ रगड़ कर ही ठोंकने में हम मर्दों को मज़ा आता है डियर।" अजय सिंह ने कहा__"और तुम्हारे पिछवाड़े की तो बात ही अलग है यार।"
"और किसके किसके पिछवाड़े की बात अलग है?" प्रतिमा ने अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कुराते हुए कहा__"ज़रा ये भी तो बताइए।"
"तुम अच्छी तरह जानती हो मेरी जान।" अजय सिंह के चेहरे पर अजीब से भाव थे__"फिर क्यों पूॅछ रही हो?"
"बताने में हर्ज़ ही क्या है?" प्रतिमा हॅसी__"बता ही दीजिए।"
"तुम्हारे बाद अगर किसी और के पिछवाड़े में अलग बात है तो वो है हमारी बड़ी बेटी रितू। हाय क्या पिछवाड़ा है ज़ालिम का बिलकुल तुम्हारी तरह ही है उसका पिछवाड़ा।"
"अपनी ही बेटी पर नीयत बुरी है आपकी?" प्रतिमा ने कहने के साथ ही मैक्सी के ऊपर से अपने एक हाॅथ से अपनी चूॅत को बुरी तरह मसला फिर बोली__"मगर ये जान लीजिए कि रितू का पिछवाड़ा इतनी आसानी से मिलने वाला नही है आपको।"
"यही तो रोना है यार।" अजय सिंह आह सी भरते हुए बोला__"तुमको मेरी ख्वाहिश का पता है फिर भी अब तक कुछ नहीं किया।"
"चिंता मत कीजिए।" प्रतिमा ने कहा__"आपके लिए एक नई चूॅत और एक नए पिछवाड़े का इंतजाम कर दिया है मैंने।"
"क् क्या सच में..???"अजय सिंह खुशी से झूम उठा__"ओह डियर आखिर तुमने कर ही दिया। मगर, ये तो बताओ किसकी चूत और पिछवाड़े का इंतजाम किया है तुमने?"
"अभी थोड़ी कसर बाॅकी है जनाब।" प्रतिमा ने कहा__"मगर मुझे यकीन है कि एक दो दिन में काम हो जाएगा आपका।"
"काश! गौरी को हासिल कर पाता मैं।" अजय सिंह बोला__"उस पर तो मेरी तब से नज़र थी जब वह ब्याह कर इस घर में आई थी। एक झलक उसके जिस्म की देखी थी मैंने। एक दम दूध सा गोरा रंग था उसका और बनावट ऐसी कि उसके सामने कुदरत की हर कृति फीकी पड़ जाए।"
"कम से कम मेरे सामने उसकी खूबसूरती का बखान मत किया कीजिए आप।" प्रतिमा ने तीखे भाव से कहा__"आपको कितनी बार ये कहा है मैने। फिर भी आप उस हरामजादी की तारीफ करके मेरा खून जलाने से बाज नहीं आते हैं।"
"क्या करूॅ मेरी जान?" अजय सिंह कह उठा__"तुम्हारे बाद मुझे अगर किसी से प्यार हुआ है तो वो थी गौरी। मैं चाहता तो कब का उसकी खूबसूरती का रसपान कर लेता किन्तु मैने ऐसा नही किया। मैं उसे प्यार से हासिल करना चाहता था। तभी तो मैंने ये सब किया, उसको इतने दुख दिए और उसके लिए सारे रास्ते बंद कर दिए।
मगर फिर भी कुछ हासिल नहीं हुआ और अब होगा भी कि नहीं क्या कहा जा सकता है?"
"आपने तो उन लोगों की खोज में अपने आदमी लगाए थे न?" प्रतिमा ने कहा__"उन लोगों ने क्या रिपोर्ट दी उनके बारे में?"
"मेरे आदमी खाली हाॅथ वापस आ गए थे।" अजय सिंह के चेहरे पर कठोरता के भाव उजागर हुए__"वो हरामी की औलाद विराज बड़ा ही चतुर व चालाक निकला। उसने अपनी माॅ और बहन को किसी दूसरे शहर के रूट से उन्हें मुम्बई ले जाने में कामयाब हो गया था।"
"शायद उसे अंदेशा था कि आप उन्हें पकड़ने के लिए अपने आदमियों को भेजेंगे।" प्रतिमा ने सोचपूर्ण भाव से कहा।
"हाॅ यही बात रही होगी।" अजय सिंह बोला__"वर्ना वो ऐसा काम क्यों करता? मगर कब तक मुझसे छिपा कर रखेगा वो अपनी माॅ और बहन को? मैं चैन से बैठा नहीं हूॅ प्रतिमा, बल्कि आज भी मेरे आदमी उनकी खोज में मुम्बई की खाक़ छान रहे हैं।"
"ये आपने अच्छा किया है।" प्रतिमा ने सहसा आवेशयुक्त स्वर में कहा था__"जब आपके आदमी उन सबको पकड़ कर यहा लाएंगे तो मैं अपने हाॅथों से उस कुत्ते को गोली मारूंगी जिसने उस दिन मेरे बेटे का वो हाल किया था।"
"तुम्हारी ये इच्छा जरूर पूरी होगी डियर।" अजय सिंह ने भभकते लहजे में कहा__"और अब मैं भी गौरी को बीच चौराहे पर रगड़ रगड़ कर ठोंकूॅगा। अब बात प्यार की नहीं रह गई बल्कि अब प्रतिशोध की है। मेरे उस प्रण की है जो मैंने वर्षों पहले लिया था।"
"किस प्रण की बात कर रहे हैं डैड?" रितू ऊपर से सीढ़िया उतरते हुए पूछी।
"कुछ नहीं बेटी बस ऐसे ही बात कर रहे थे हम लोग।" प्रतिमा ने जल्दी से बात को टालने की गरज से कहा। जबकि अजय सिंह अपनी बड़ी बेटी को एकटक देखे जा रहा था।
रितू नहा धो कर तथा एक दम फ्रेस होकर आई थी। इस वक्त उसके गोरे किन्तु मादकता से भरे जिस्म पर एक दम टाइट फिटिंग वाले कपड़े थे। जिसमें उसकी भरपूर जवानी साफ उभरी हुई नजर आ रही थी। अजय सिंह मंत्रमुग्ध सा उसे देखे जा रहा था। उसकी आखों में हवस और वासना के कीड़े गिजबिजाने लगे थे। अपने पति को अपनी ही बेटी की तरफ यूं हवस भरी नज़रों से देखते देख प्रतिमा ने तुरंत ही उसे खुद की हालत को सम्हाल लेने की गरज से कहा__"आपको आज पिता जी और माता जी से मिलने जाना था न?"
अजय सिंह प्रतिमा के इस वाक्य को सुन कर चौंका तथा तुरंत ही वास्तविक माहौल में लौटते हुए कहा__"हाॅ जाना तो है। क्या तुम साथ नहीं चलोगी?"
"नहीं आप हो आइए।" प्रतिमा ने कहा__"पिछली बार गई थी उनसे मिलने आपके साथ। उनसे मिलने का कोई फायदा तो है नहीं। न वो कुछ बोलते हैं और न ही हिलते डुलते हैं फिर क्या फायदा उनसे मिलने का?"
"डैड क्या कुछ संभावना है कि कब तक दादा दादी ठीक होंगे?" रितू ने पूछा।
"बेटा डाॅ. की तरफ से यही कहना है कि कुछ कहा नहीं जा सकता इस बारे में।" अजय सिंह बोला__"याददास्त का मामला होता ही ऐसा है।
"
"डैड आपके दोस्त कमिश्नर अंकल तो अब तक पता नहीं लगा पाए कि दादा दादी की कार को किसने और क्यों टक्कर मारी थी?" रितू ने सहसा तीखे भाव से कहा__"आज दो साल हो गए इस बात को और पुलिस के हाॅथ कोई छोटा सा सुराग तक नहीं लगा। बड़ा गुस्सा आता है मुझे अपने देश की इस निकम्मी पुलिस पर। आज अगर मैं होती पुलिस डिपार्टमेन्ट में तो इस केस को कब का क्लियर करके मुजरिमों को जेल की सलाखों के पीछे पहुॅचा दिया होता। लेकिन कोई बात नहीं डैड...जल्द ही इस निकम्मी पुलिस के बीच मुझ जैसी एक तेज़ तर्रार पुलिस आफिसर इन्ट्री करेगी। फिर मैं खुद इस केस पर काम करूॅगी, और केस को पूरा साल्व करूॅगी।"
रितू की ये बातें सुनकर अजय सिंह और प्रतिमा को साॅप सा सूॅघ गया। चेहरे पर घबराहट के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे थे। किन्तु जल्द ही उन दोनों ने खुद को सम्हाला।
"मतलब मेरे लाख मना करने और समझाने पर भी तुमने पुलिस फोर्स ज्वाइन करने का अपना इरादा नहीं बदला?" अजय सिंह ने नाराज़गी भरे स्वर में कहा__"तुम जानती हो बेटी कि मुझे तुम्हारा पुलिस फोर्स ज्वाइन करने का फैसला बिलकुल भी पसंद नहीं है। तुम्हें कोई ज़रूरत नहीं थी कोई नौकरी करने की, भला क्या कमी की है हमने तुम्हें कुछ देने में?"
"ये नौकरी मैं किसी चीज़ के अभाव में नहीं कर रही हूॅ डैड।" रितू ने शान्त भाव से कहा__"आप जानते हैं कि पुलिस आफिसर बनना मेरा एक ख्वाब था। पुलिस आफिसर बन कर मैं उन लोगों का वजूद मिटाना चाहती हूं जो इस देश और समाज के लिए अभिशाप हैं।"
"तुम ये भूल रही हो बेटी कि तुम एक लड़की हो, एक औरत ज़ात जिसे खुद कदम कदम पर किसी मर्द के द्वारा मजबूत सुरक्षा की आवश्यकता होती है।" प्रतिमा ने समझाने वाले भाव से कहा__"और पुलिस फोर्स तो ऐसी है कि इसमें रोज़ एक से बढ़ कर एक खतरनाक अपराधियों का सामना करना पड़ता है जिसका मुकाबला करना तुम्हारे लिए बेहद मुश्किल है।"
"आप मुझे एक आम लड़की समझकर कमजोर समझती हैं माॅम जबकि रितू सिंह बघेल कोई आम लड़की नहीं है।" रितू के चेहरे पर कठोरता थी__"बल्कि मैं मिस्टर अजय सिंह बघेल की शेरनी बेटी हूॅ। और मुझसे टकराने में किसी अपराधी को हजार बार सोचना पड़ेगा। आप जानती हैं न माॅम कि मैंने मासल आर्ट्स में ब्लैक बैल्ट हासिल किया है। क्योंकि मुझे पता है कि एक आम लड़की पुलिस में किसी अपराधी का सामना नहीं कर सकती। इसी लिए मैंने किसी भी तरह के अपराधियों से डॅटकर कर मुकाबला करने के लिए मासल आर्ट्स की ट्रेनिंग ली थी।"
अजय सिंह और प्रतिमा दोनों जानते थे कि रितू अपने कदम अब वापस नहीं करेगी।
इस लिए चुप रह गए किन्तु अंदर से ये सोच सोच कर घबरा भी रहे थे कि अगर रितू ने पुलिस आफिसर के रूप में अपने दादा दादी के एक्सीडेंट वाला केस अपने हाॅथ में लिया तो क्या होगा?????"
दोस्तो आपके सामने अपडेट हाज़िर है....आपकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा,,,,,,
अपडेट.............《 09 》
अब तक....
"आप मुझे एक आम लड़की समझकर कमजोर समझती हैं माॅम जबकि रितू सिंह बघेल कोई आम लड़की नहीं है।" रितू के चेहरे पर कठोरता थी__"बल्कि मैं मिस्टर अजय सिंह बघेल की शेरनी बेटी हूॅ। और मुझसे टकराने में किसी अपराधी को हजार बार सोचना पड़ेगा। आप जानती हैं न माॅम कि मैंने मासल आर्ट्स में ब्लैक बैल्ट हासिल किया है। क्योंकि मुझे पता है कि एक आम लड़की पुलिस में किसी अपराधी का सामना नहीं कर सकती। इसी लिए मैंने किसी भी तरह के अपराधियों से डॅटकर कर मुकाबला करने के लिए मासल आर्ट्स की ट्रेनिंग ली थी।"
अजय सिंह और प्रतिमा दोनों जानते थे कि रितू अपने कदम अब वापस नहीं करेगी। इस लिए चुप रह गए किन्तु अंदर से ये सोच सोच कर घबरा भी रहे थे कि अगर रितू ने पुलिस आफिसर के रूप में अपने दादा दादी के एक्सीडेंट वाला केस अपने हाॅथ में लिया तो क्या होगा?????"
अब आगे,,,,,,,
अजय सिंह अपने आॅफिस के शानदार केबिन में रिवाल्विंग चेयर पर बैठा कुछ फाइलों को इधर उधर रख रहा था कि तभी उसके केबिन का डोर नाॅक हुआ।
"कम इन।" उसने बिना सर उठाए ही कहा।
इसके साथ ही केबिन का डोर खुला और एक ब्यक्ति अंदर दाखिल हुआ। पचास से पचपन की उमर का वो मोटा सा आदमी था, आखों पर मोटे लैंस का चश्मा लगा रखा था उसने। उसके दाहिने हाॅथ में एक फाइल थी। चेहरे पर बारह बजे हुए थे। बड़ी ही दयनीय स्थिति में अपनी जगह खड़ा था वह।
केबिन के अंदर पैना सन्नाटा छाया रहा। अजय सिंह को जब ध्यान आया कि अभी कोई उसके केबिन में आया है तो उसने सिर उठा कर सामने देखा। नज़र केबिन में आने वाले ब्यक्ति पर पड़ी, साथ ही उसकी वस्तुस्थिति पर, तो अजय सिंह चौंका।
"क्या बात है दीनदयाल?" अजय सिंह ने पूॅछा__"तुम्हारे चेहरे पर इतना पसीना क्यों आ रहा है? तुम्हारी तबियत तो ठीक है न?"
"स सर व वो वो।" दीनदयाल हकलाते हुए बोलना चाहा।
"क्या हुआ?" अजय सिंह बोला__"तुम इस तरह हकला क्यों रहे हो भई?"
"सर बहुत बड़ी गड़बड़ हो गई।" दीनदयाल रो देने वाले लहजे में बोला__"हम बरबाद हो गए।"
"ये क्या बक रहे हो तुम?" अजय सिंह बुरी तरह चौंका__"तुम होश में तो हो न?"
"मैं पूरी तरह होश में हू सर।" दीनदयाल बोला__"सब कुछ बरबाद हो गया सर।"
"साफ साफ बोलो दीनदयाल।" अजय सिंह तीखे स्वर में बोला__"यू पहेलियाॅ न बुझाओ। ऐसा क्या हुआ है जिससे तुम सब कुछ बरबाद हो जाने की बात कर रहे हो?"
"सर पिछले महीने।" दीनदयाल बोला__"हमें जो करोड़ों का टेंडर मिला था वह सब महज एक फ्राड ही निकला।
"
"क क्या मतलब?" अजय सिंह बुरी तरह चौंका था।
"मतलब साफ है सर।" दीनदयाल बोला__"हमें जिस फाॅरेन की पार्टी से करोड़ों का टेंडर मिला था वो सब झूॅठ था। हमें बरबाद करने के लिए यह किसी की सोची समझी चाल थी। हमने उस टेंडर के हिसाब से आज एक महीने से भारी मात्रा में कपड़े तैयार किये हैं जिसके लिए हमें करोड़ों की लागत का खर्च करना पड़ा किन्तु अब सब कुछ बरबाद हो गया।"
अजय सिंह ये सुनकर किसी स्टेचू की तरह बिना हिले डुले बैठा रह गया। ऐसा लग रहा था जैसे ये सब जानकर उसे साॅप सूॅघ गया हो। चेहरा निस्तेज हो गया था उसका।
"हमने यकीनन बहुत बड़ा धोखा खाया है सर।" दीनदयाल हतास भाव से बोला__"हमें इस बारे में सोचना चाहिये था। अब क्या होगा सर, हम इतने बड़े नुकसान की भरपाई कैसे कर सकेंगे?"
"उसके बारे में कुछ पता किया क्या तुमने?" अजय सिंह ने अजीब भाव से पूछा।
"एक हप्ते से मैं सिर्फ इसी काम में लगा हुआ था सर।" दीनदयाल ने कहा__"मगर उस फाॅरेनर का कहीं कुछ पता नहीं चल सका। उसकी हर एक बात झूठी ही साबित हुई सर। होटल सनशाइन में पता किया तो होटल के मैनेजर ने बताया कि स्टीव जाॅनसन व एॅजेला जाॅनसन नाम के कोई भी फाॅरेनर यहाॅ पिछले एक महीने से नहीं ठहरे थे। ये दोनो पति पत्नी जिस कंपनी को अपनी कह रहे थे उसका कहीं कोई वजूद ही नहीं, जबकि अब से एक हप्ते पहले कंपनी की बाकायदा वेबसाइट हमने खुद देखी थी, जिसमें सब डिटेल्स थी।"
"कौन ऐसा कर सकता है हमारे साथ?" अजय सिंह मानो खुद से ही पूछ रहा था__"हमारी तो किसी से इस तरह की कोई दुश्मनी भी नहीं है फिर कौन इतना बड़ा नुकसान कर सकता है हमारा?"
"जिसने भी ये सब किया है सर।" दीनदयाल बोला__"उसने इस सबकी तैयारी बहुत पहले से कर रखी थी। हर चीज़ सोची समझी थी। एक एक प्वाइंट को बारीकी से जाॅच कर उस पर काम किया गया था वर्ना क्या हमें कुछ पता न चलता? "
"नुकसान तो हो ही गया दीनदयाल।" अजय सिंह बोला__"लेकिन इसका पता करना भी सबसे ज्यादा जरूरी है। हमें हर हाल में पता करना होगा कि वो दोनों कौन थे तथा हमारे साथ इतना बड़ा धोखा करके आख़िर क्या मिला उन्हें?"
"एक बुरी ख़बर और भी है सर।" दीनदयाल दीन हीन लहजे के साथ बोला__"समझ में नहीं आता कि कैसे कहूॅ आपसे?"
"आज क्या हो गया है तुम्हें दीनदयाल?" अजय सिंह एक झटके से अपनी चेयर से उठते हुए बोला__"ये क्या मनहूस ख़बरें लेकर आए हो आज हमारे पास?"
"माफ़ कीजिए सर।" दीनदयाल ने सर झुका लिया__"मगर मैं क्या करूॅ? मुझे खुद भी समझ में नहीं आ रहा है कि ये सब क्या हो रहा है?"
"अब बताओ भी कि तुम्हारी दूसरी बुरी ख़बर क्या है?" अजय सिंह ने कहा।
"सर अरविंद सक्सेना जी हमारी कंपनी से अपनी पार्टनरशिप तोड़ रहे हैं।" दीनदयाल ने ये कह कर जैसे धमाका सा किया था।
"क् क्या..
????"अजय सिंह बुरी तरह चौंका__"ये क्या कह रहे हो दीनदयाल? भला सक्सेना हमसे पार्टनरशिप क्यों तोड़ रहा है? उसने इसके बारे में हमसे तो कोई बात नहीं की अब तक? सक्सेना को फोन लगाओ हम उससे बात करेंगे अभी।"
"सर वो यहीं आ रहे हैं।" दीनदयाल ने कहा__"मुझे फोन करके उन्होंने मुझसे आपके बारे में पूछा की आप कहां हैं तो मैंने बता दिया कि आज आप यहीं हैं तो बोले ठीक है आ रहे हैं। उनका लहजा बड़ा अजीब था सर, मैंने वजह पूछी तो बोले कि आपसे पार्टनरशिप तोड़ना है। उनकी ये बात सुन कर मेरा तो दिमाग ही सुन्न पड़ गया था"
अभी अजय सिंह कुछ कहने ही वाला था कि केबिन के डोर में नाॅक हुआ। दीनदयाल ने कहा__"लगता है मिस्टर सक्सेना ही हैं।"
"ठीक है तुम जाओ अब।" हम बाद में तुमसे बात करेंगे।"
"ओके सर।" दोनदयाल ने कहा और केबिन का डोर खोला तो बाहर से सक्सेना अंदर दाखिल हुआ जबकि दीनदयाल सक्सेना को नमस्कार कर बाहर निकल गया।
"आओ आओ सकसेना।" अजय सिंह ने सक्सेना का इस्तकबाल करते हुऐ कहा और हैण्डशेक किया उससे।
"कैसे हो अजय सिंह?" सक्सेना ने हाॅथ मिलाने के बाद कहा।
"बेहतर।" अजय सिंह ने संक्षिप्त सा जवाब दिया।
"मेरे यहाॅ आने की वजह तो तुम्हें पता चल ही गई होगी?" सक्सेना ने कहा।
"हाॅ मुझे दीनदयाल अभी यही बता रहा था।" अजय सिंह ने गंभीरता से कहा__"और ये जानकर दुख भी हुआ कि तुम मुझसे पार्टनरशिप तोड़ रहे हो। जहाॅ तक मेरा अंदाज़ा है मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है जिसकी वजह से तुम पार्टनरशिप तोड़ रहे हो।"
"मुझे पता है कि तुमने वाकई कुछ नहीं किया है।" सक्सेना ने सपाट लहजे में कहा__"लेकिन फिर भी मैं ये पार्टनरशिप तोड़ रहा हूॅ, क्योकि मुझे अब विदेश में सेटल होना है अपने परिवार के साथ। यहाॅ का सब कुछ बेच कर अब विदेश में ही रहूगा तथा वहीं कारोबार करूगा।"
"तो पार्टनरशिप तोड़ने की ये वजह है?" अजय सिंह ने कहा।
"बिलकुल।" सक्सेना ने कहा__"और अब मैं चाहता हूॅ कि तुम मेरा सब कारोबार खुद खरीद लो तथा मेरे हिस्से का जो कुछ है उसे मुझे देकर मुझे जाने दो।"
"यार ऐसा भी तो किया जा सकता है कि तुम विदेश में रह कर भी मेरे साथ पार्टनरशिप में ये कारोबार चला सकते हो।" अजय सिंह ने एक साॅस में ही सारी बात कर दी__"उसके लिए पार्टनरशिप तोड़ने की क्या बात है?"
"तुम्हारी बात अपनी जगह बिलकुल ठीक है अजय सिंह।" सक्सेना ने कहा__"लेकिन मेरा इरादा अब इस कारोबार को करने का बिलकुल भी नहीं है। कोई दूसरा कारोबार करने का सोचा है मैंने।"
"अब जब तुमने मन बना ही लिया है तो कोई क्या कर सकता है भला?" अजय सिंह बोला__"खैर कब जा रहे हो?"
"तुम हिसाब किताब क्लियर कर लो।"सक्सेना ने कहा__"तब तक मैं कुछ और इंतजाम कर लेता हूॅ"
"ठीक है सक्सेना।" अजय सिंह ने कहा__"हिसाब किताब भी हो जाएगा। मगर यार मेरा कुछ तो खयाल किया होता।
"
"क्या करूॅ यार?" सक्सेना ने कहा__"तुम्हारे लिए अफसोस तो हो रहा है मगर अब और नहीं रुक सकता। ये सब तो मैं बहुत पहले से करने की सोच रहा था किन्तु हर बार तुम्हारा खयाल आ जाने से मैंने खुद को रोंके रखा।"
"हिसाब किताब तो ठीक है।" अजय सिंह ने कहा__"लेकिन कुछ समय की मोहलत चाहता हूॅ क्योंकि इस वक्त पैसे का बड़ा लोचा हो रखा है ये तो तुम्हें भी पता चल ही गया होगा?"
"हाॅ पता चला है मुझे इस बारे में।" सक्सेना ने कहा__"पर यार इतने नुकसान से क्या फर्क पड़ता है तुम्हें? और वैसे भी कारोबार में नफा नुकसान तो चलता ही रहता है।"
"बात ये नहीं है कि क्या फर्क पड़ता है?" अजय सिंह ने कहा__"बात है रेपुटेशन की। लोग क्या सोचेंगे कि अजय सिंह बघेल को कोई ब्यक्ति चुतिया बना कर चला गया और उसे इसका पता भी नहीं चला।"
"हाॅ ये तो सही कहा तुमने।"सक्सेना ने कहा__"इज्ज़त का कचरा हो गया।"
कहानी जारी रहेगी,,,,,,,
"मैं उस हरामजादे को छोंड़ूॅगा नहीं सक्सेना।" अजय सिंह ने एकाएक गुस्से में बोला__"उसको ढूॅढ़ कर उसे ऐसी मौत दूॅगा कि उसकी रूह फिर दुबारा ऐसे किसी शरीर को धारण नहीं करेगी। मुझे अपने नुकसान का कोई ग़म नहीं है सक्सेना,ये करोड़ों का नुकसान मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता। मगर मेरी इज्ज़त को शहर भर में यूॅ दाग़दार करके उसने ये अच्छा नहीं किया। उसे इसकी कीमत अपनी जान दे कर चुकानी पड़ेगी।"
"उसके साथ ऐसा होना भी चाहिए अजय सिंह।" सक्सेना ने एक सिगरेट सुलगाई और फिर एक गहरा कस लेकर उसका धुआॅ ऊपर की तरफ उछालने के बाद कहा__"वैसे क्या लगता है तुम्हें, ये किसका काम हो सकता है?"
"ये तो पक्की बात है सक्सेना कि वो दोनों विदेशी नहीं थे।" अजय सिंह बोला__"बल्कि वो दोनों हमारे ही देश के और हमारे ही शहर के कोई पहचान वाले ही थे।"
"ये बात तुम इतने विश्वास और दावे के साथ कैसे कह सकते हो अजय सिंह?" सक्सेना हल्के से चौंका था फिर बोला__"जबकि तुम्हारे पास इस बात का कोई छोटा सा सबूत तक नहीं है।"
"ग़लती मेरी भी है सक्सेना।" अजय सिंह ने कहा__"एक महीने पहले जब उनसे हमें ये टेंडर मिला था तब हमें ये अंदाज़ा नहीं था, बल्कि हम सोच भी नहीं सकते थे कि हम इन लोगों द्वारा किसी साजिश का शिकार होने जा रहे हैं। हम तो खुश थे कि हमारे कपड़ों की खासियत से प्रभावित होकर कोई विदेशी हमसे डील कर रहा है और इतनी ज्यादा मात्रा में हमसे कपड़े की माॅग कर रहा है। उस समय दिलो दिमाग में यही था कि अब हमारा संबंध विदेशी लोगों से हो रहा है जिससे निकट भविश्य में हमारे कारोबार को और भी फायदा होगा। किसी साजिश का हम सोच ही नहीं सके थे क्योकि उन लोगों का सब कुछ परफेक्ट था। और वैसे भी हमें इससे क्या लेना देना था कि वो कितनी बड़ी कंपनी के मालिक थे, हमें तो उनकी डील से मतलब था जिसके लिए हमे करोड़ों का मुनाफ़ा होने वाला था।
"
"वो सब तो ठीक है अजय।" सक्सेना बीच में ही अजय की बात काट कर कह उठा__"मगर तुम कह रहे हो कि वो विदेशी नहीं थे ये बात तुम दावे के साथ कैसे कह सकते हो?"
"मैं बताते हुए वहीं आ रहा था सक्सेना।" अजय सिंह बोला__"ख़ैर अब जबकि ये सब हो गया उससे यही समझ आता है कि ये काम किसी फाॅरेनर का नहीं है। क्योंकि आज तक हमारा किसी भी तरह का लेन देन किसी विदेशी से नहीं हुआ और जब कोई लेन देन ही नहीं हुआ किसी विदेशी से तो किसी तरह की रंजिश के तहत किसी फाॅरेनर का ये सब करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। अब सोचने वाली बात है कि जब हमारा किसी विदेशी से कोई ब्यौसायिक संबंध ही नहीं था तो कोई विदेशी किस वजह से हमारे साथ इतनी बड़ी साजिश करके हमें धोखा देगा अथवा हमारा इतना बड़ा नुकसान करेगा?"
"तुम्हारा तर्क बिलकुल दुरुस्त है अजय।" सक्सेना सोचपूर्ण भाव के साथ बोला__"फिर तो यकीनन ये काम किसी ऐसे ब्यक्ति का है जो तुम्हें अच्छी तरह जानता भी है और तुम्हारा बुरा भी चाहता है। कौन हो सकता है ऐसा ब्यक्ति?"
"यही तो सोच रहा हूॅ सक्सेना।" अजय सिंह बोला__"मगर जेहन में ऐसे किसी ब्यक्ति का चेहरा नहीं आ रहा।"
"ये काम तुम्हारे किसी कम्पटीटर का ही हो सकता है।" सक्सेना ने कहा__"ये एक ब्यौसायिक मामला है अजय। ब्यौसाय से जुड़े तुम्हारे किसी कम्पटीटर ने ही इस काम को अंजाम दिया हो सकता है, जिनके बारे में फिलहाल तुम ठीक से सोच नहीं पा रहे हो। इस लिए अच्छी तरह सोचो कि ये किसने किया हो सकता है?"
"मुझे तो कुछ और ही लगता है सक्सेना।" अजय सिंह ने सोचपूर्ण भाव से कहा__"ये काम मेरे किसी कम्पटीटर का भी नहीं है क्योकि इन सबसे मेरे बहुत अच्छे संबंध हैं।"
"ये क्या कह रहे हो तुम?" सक्सेना चौंका__"अगर ये सब तुम्हारे किसी कम्पटीटर का नहीं है तो फिर किसका है? कहीं तुम इन सबके लिए मुझे तो नहीं जिम्मेदार ठहरा रहे हो?"
"हाॅ ये भी हो सकता है सक्सेना।" अजय सिंह ने सपाट लहजे में कहा__"इस सब में सबसे पहले उॅगली तो तुम पर ही उठेगी। आख़िरकार तुम मेरे बिजनेस पाटनर हो"
"क्या मेरे बारे में तुम ऐसा सोचते हो कि मैं अपने घनिष्ठ मित्र के साथ ऐसा नीच काम करूॅगा?" सक्सेना ने कहा__"तुम मेरे बारे में अच्छी तरह जानते हो अजय कि मैं ऐसा किसी के भी साथ नहीं कर सकता। मेरी फितरत इस तरह किसी को धोखा देने की नहीं है।"
"रुपये पैसे के लिए कोई भी ब्यक्ति किसी के भी साथ कुछ भी कर सकता है सक्सेना।" अजय सिंह ने अजीब भाव से कहा__"मैं तुम पर कोई इल्ज़ाम नहीं लगा रहा लेकिन इस तरह का सवाल तो खड़ा होगा ही।
कानून का कोई भी नुमाइंदा तुमसे ये सवाल कर सकता है कि तुम अचानक ही अजय सिंह से पार्टनशिप तोड़ कर तथा अपना हिसाब किताब करके हमेशा के लिए विदेश क्यों जा रहे हो जबकि हाल ही में अजय सिंह के साथ ऐसा संगीन वाक्या हो गया?"
"तुम तो मुझ पर साफ साफ इल्जाम लगाते हुए कानून के लपेटे में डालने की बात कर रहे हो अजय सिंह।" सक्सेना दुखी भाव से बोला__"जबकि भगवान जानता है कि मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया।"
"भगवान तो सबके विषय में सब जानता है सक्सेना।" अजय सिंह ने कहा__"लेकिन इंसान नहीं जानता। इंसान तो वही जानता है जो उसे या तो नज़र आता है या फिर जो समझ आता है। आज जो हालात बने हैं उससे साफ तौर पर यही समझ आता है कि ये सब तुम्हारे अलावा दूसरा कौन और क्यों कर सकता है भला?"
अरविन्द सक्सेना मूर्खों की तरह देखता रह गया अजय सिंह को। उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे कि वह अभी अपने सिर के बाल नोंचने लगेगा।
"मुझे समझ नहीं आ रहा अजय सिंह कि मैं तुम्हें कैसे इस बात का यकीन दिलाऊॅ?" सक्सेना असहाय भाव से बोला__"कि ये सब मैं करने के बारे में सोच तक नहीं सकता। तुम जानते हो हम दोनो ऐसे हैं कि एक दूसरे का सब कुछ जानते हैं। हम दोनों के संबंध तो ऐसे हैं कि हम अपनी अपनी बीवियों को भी आपस में बाॅट लेते हैं। क्या कोई इतना भी घनिष्ठ मित्र हो सकता है किसी का? जिसके साथ ऐसे संबंध हों वो भला अपने दोस्त का इतना बड़ा अहित कैसे कर देगा यार?"
"तुम तो यार एक दम से सीरियस ही हो गए सक्सेना।" अजय सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा__"मैं तो बस एक तर्कसंगत बात कह रहा था कि इस वाक्ये के बाद किसी भी ब्यक्ति के मन में सबसे पहले यही विचार उठेगा जो अभी मैने तर्क के द्वारा कहा था।"
"तुम मुझे जान से मार दो अजय सिंह मुझे ज़रा भी फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन ऐसे इल्जाम लगा कर मारोगे तो मैं मर कर भी कहीं चैन नहीं पाऊॅगा।" सक्सेना ने कहा।
"छोड़ो इस बात को और ये बताओ कि विदेश कब जा रहे हो?" अजय सिंह ने पूछा।
"दो दिन बाद।" सक्सेना ने कहा__"कल तक यहाॅ के सारे करोबार का रुपया मेरे एकाउंट में आ जाएगा और परसों यहाॅ से निकल जाऊॅगा। लेकिन.....।"
"लेकिन..??" अजय सिंह ने पूछा।
"लेकिन उससे पहले मैं चाहता हूॅ कि।" सक्सेना ने कहा__"हम लोगों का एक शानदार प्रोग्राम हो जाए।"
"जाने से पहले मेरी बीवी के मजे लेना चाहते हो।" अजय सिंह हॅसा।
"हाॅ तो बदले में तुम्हें भी तो मेरी बीवी से मजे लेना है।" सक्सेना ने भी हॅसते हुए कहा__"और वैसे भी मेरी बीवी तो रात दिन तुम्हारा ही नाम जपती रहती है। पता नहीं क्या जादू कर दिया है तुमने? साली मुझे बड़ी मुश्किल से हाॅथ लगाने देती है।"
"अच्छा ऐसा क्या?" अजय सिंह जोरों से हॅसा।
"हाॅ यार।" सक्सेना बोला__"और पता है विदेश जाने के लिए तो मान ही नहीं रही थी वो।
जब मैने उसे ये कहा कि तुम हर महीने हमसे मिलने तथा मस्ती करने आओगे तब कहीं जाकर मानी थी वो।"
"मतलब कि अब मुझे हर महीने तुम्हारे पास इस सबके लिए आना पड़ेगा?"अजय सिंह मुस्कुराया।
"हाॅ बिलकुल।" सक्सेना ने कहा__"और वो भी भाभी जी के साथ।"
"सोचना पड़ेगा सक्सेना।" अजय सिंह बोला__"और वैसे भी अभी मेरे पास सिर्फ एक ही अहम काम है, और वो है उन लोगों का पता लगाना जिनकी वजह से आज मुझे करोड़ों का नुकसान हुआ है तथा मेरी इज्ज़त की धज्जियाॅ उड़ी हैं।"
"हाॅ ये तो है।" सक्सेना ने कहा__"अगर कभी मेरी ज़रूरत पड़े तो बेझिझक याद करना अजय, तुम्हारे एक बार के कहने पर मैं तुम्हारे पास आ जाऊॅगा।"
"ठीक है सक्सेना।" अजय सिंह बोला__"कल तक मैं तुम्हारा हिसाब किताब करके तुम्हारे एकाउंट में पैसे डाल दूॅगा।"
ऐसी ही कुछ और औपचारिक बातों के बाद सक्सेना वहाॅ से चला गया। जबकि अजय सिंह ये न देख सका कि जाते समय सक्सेना के होठों पर कितनी जानदार मुस्कान थी?
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,,
आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा,,,
अपडेट.............《 10 》
अब तक.....
"सोचना पड़ेगा सक्सेना।" अजय सिंह बोला__"और वैसे भी अभी मेरे पास सिर्फ एक ही अहम काम है, और वो है उन लोगों का पता लगाना जिनकी वजह से आज मुझे करोड़ों का नुकसान हुआ है तथा मेरी इज्ज़त की धज्जियाॅ उड़ी हैं।"
"हाॅ ये तो है।" सक्सेना ने कहा__"अगर कभी मेरी ज़रूरत पड़े तो बेझिझक याद करना अजय, तुम्हारे एक बार के कहने पर मैं तुम्हारे पास आ जाऊॅगा।"
"ठीक है सक्सेना।" अजय सिंह बोला__"कल तक मैं तुम्हारा हिसाब किताब करके तुम्हारे एकाउंट में पैसे डाल दूॅगा।"
ऐसी ही कुछ और औपचारिक बातों के बाद सक्सेना वहाॅ से चला गया। जबकि अजय सिंह ये न देख सका कि जाते समय सक्सेना के होठों पर कितनी जानदार मुस्कान थी?
अब आगे......
"ये सब क्या है डैड?" शिवा ड्राइंग रूम में दाखिल होते हुए तथा उत्तेजित से स्वर में बोला__"देखिए आज के अख़बार में क्या ख़बर छपी है?"
"क्या हुआ बेटे?" सोफे पर बैठे अजय सिंह ने सहसा चौंकते हुए पूॅछा__"कैसी ख़बर की बात कर रहे हो तुम?"
"आप खुद ही देख लीजिए डैड।" शिवा ने अपने हाॅथ में लिए अख़बार को अपने पिता की तरफ एक झटके से बढ़ाते हुए कहा__"देख लीजिए कि किस तरह अख़बार वालों ने आपकी इज्ज़त की धज्जियाॅ उड़ाई हैं?"
अजय सिंह शिवा के हाॅथ से अख़बार लेने के बाद उस पर नज़रें दौड़ाई। अख़बार के फ्रंट पेज पर ही बड़े अच्छरों में छपी हेडलाइन को पढ़ कर उसके होश उड़ गए। अख़बार में छपी हेडलाइन कुछ इस प्रकार की थी।
"मशहूर बिजनेसमैन अजय सिंह किसी अग्यात शख्स द्वारा धोखे का शिकार"
हल्दीपुर(गुनगुन): शहर के मशहूर बिजनेसमैन अजय सिंह को किसी अग्यात ब्यक्ति द्वारा करोड़ों रुपये का चूना लगाने का संगीन मामला सामने आया है।
प्राप्त सूत्रों के अनुसार ये जानकारी मिली है कि मशहूर बिजनेसमैन अजय सिंह किसी विदेशी ब्यक्ति के साथ पिछले महीने करोड़ों रुपये की डील की थी। उस डील के तहत अजय सिंह द्वारा विदेशी ब्यक्ति को करोड़ों रुपये के बेहतरीन कपड़ों के थान सौंपे जाने थे। किन्तु पिछले दिन ही शाम को अजय सिंह के पीए को ये पता चला कि उनका जिस विदेशी ब्यक्ति के साथ करोड़ों का सौदा हुआ था वो दरअसल सिरे से ही फर्ज़ी था। कहने का मतलब ये कि विदेशी ब्यक्ति ने करोड़ों के कपड़े तैयार करवाए और उन कपड़ों के थान को लेने की बजाय बिना कुछ बताए लापता हो गया। मिली जानकारी के अनुसार विदेशी ब्यक्ति ने खुद को दूसरे देश का मशहूर बिजनेसमैन बताया जिसके सबूत के तौर पर खुद अजय सिंह द्वारा उस विदेशी ब्यक्ति की कंपनी प्रोफाइल भी देखी गई थी। विश्वस्त सूत्रों द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार अजय सिंह को करोड़ों रूपये के धोखे का पता तब चला जब उनकी फैक्ट्री में तैयार कपड़ों का करोड़ों रुपये के थान जिनमें और भी बहुत सी चीज़ें शामिल थी डील के लिए तैयार था। किन्तु उस सब को लेने वाला विदेशी नदारद था। उसके साथ कंटैक्ट करने की सारी कोशिशें जब नाकाम हो गईं और जब दो दिन तक भी विदेशी डीलर का पता न चला तो तब अजय सिंह को समझ आया कि उनके साथ कोई गेम खेल गया। मगर अब हो भी क्या सकता था? मिली जानकारी के अनुसार अजय सिंह की फैक्ट्री से तैयार करोड़ों की थान का अब कोई लेनदार न होने की वजह से भारी नुकसान हुआ है। ये विचार करने योग्य बात है कि विदेशी बिजनेसमैन के साथ ब्यौसायिक संबंध बनाने के चक्कर में अजय सिंह जैसे पढ़े लिखे व सुलझे हुए बिजनेसमैन बिना सोचे समझे करोड़ों की डील करके खुद का नुकसान कर बैठे। कदाचित् बाहरी मुल्कों से ब्यौसायिक संबंध बनाने के लालच में ही इतने बड़े धोखे और नुकसान के भागीदार बन बैठे।
अख़बार में छपी इस ख़बर को पढ़कर अजय सिंह का दिमाग़ सुन्न सा पड़ गया था। उसे समझ नहीं आया कि ये बात अख़बार वालों को किसने बताया हो सकता है? काफी देर तक अजय सिंह के दिमाग के घोड़े इस बात की खोज में भटकते रहे।
"किस सोच में पड़ गए डैड?" सहसा शिवा ने पिता की तरफ गौर से देखते हुए कहा__"और ये सब आख़िर है क्या ? अख़बार में छपी इस ख़बर का क्या मतलब है डैड??
अजय सिंह को समझ न आया कि अपने बेटे को क्या जवाब दे। फिर पता नहीं जाने क्या सोच कर उसने अपना मोबाइल निकाला और किसी को फोन लगा कर मोबाइल कान से लगा लिया।
कुछ देर कानों में रिंग जाने की आवाज़ सुनाई देती रही फिर उधर से काल रिसीव की गई।
"ये सब क्या है दीनदयाल?" काल रिसीव होते ही अजय सिंह लगभग आवेश में बोला__"आज के अख़बार में हमारे संबंध में ये क्या बकवास छापा है अख़बार वालों ने??"
"--------------"उधर से जाने क्या कहा गया।
"हम कुछ नहीं सुनना चाहते।" अजय सिंह पूर्वत आवेश में ही बोला__"आख़िर इस बात की ख़बर अख़बार वालों को किसने दी?"
"_________________"
"अरे तो पता लगाओ दीनदयाल।" अजय सिंह ने कहा__"अख़बार वालों को क्या कोई ख़्वाब चमका है जो उन्हें इस बारे में ये सब पता चला?"
"_______________"
"वही तो कह रहे हैं हम दीन के दयाल।" अजय सिंह बोला__"अख़बार वालों को ये ख़बर देने वाला वही है जिसने इस साजिश को रच कर इसे अंजाम दिया है। तुम जल्द से जल्द पता लगाओ कि कौन है ये नामुराद जो हमारी इज्ज़त की धज्जियाॅ उड़ाने पर तुला हुआ है?"
"_______________"
"हम कुछ नहीं जानते दीनदयाल।" अजय सिंह इस बार गुर्राया__"24 घंटे के अंदर उस शख्स को ढूॅढ़ कर हमारे सामने हाज़िर करो। वर्ना तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा।"
इतना कहने के बाद अजय सिंह ने फोन काट कर मोबाइल को सोफे पर लगभग फेंक दिया था। इस वक्त अजय सिंह के चेहरे पर क्रोध और अपमान का मिला जुला भाव गर्दिश करता नज़र आ रहा था।
"क्या बात है डैड?" शिवा अपने पिता के चेहरे के भावों को गौर से देखते हुए बोला__"आप कुछ परेशान से लग रहे है?"
"अभी हम किसी से बात करने के मूड में नहीं हैं बेटे।" अजय सिंह ने अजीब लहजे मे कहा__"इस लिए तुम जाओ यहाॅ से, हमें कुछ देर अकेले में रहना है।"
शिवा पूछना तो बहुत कुछ चाहता था किन्तु अपने पिता का खराब मूड देख कर चुपचाप वहाॅ से अपने कमरे की तरफ बढ़ गया।
"बेटे को तो टाल दिया आपने।" सहसा प्रतिमा ने ड्राइंगरूम में आते हुए कहा__"मगर मुझे इस तरह टाल नहीं सकते आप।"
"प्रतिमा प्लीज़।" अजय सिंह ने झ़ुझलाते हुए कहा__"मैं इस वक्त किसी से कोई बात नहीं करना चाहता।"
"ये तो कोई बात न हुई।" प्रतिमा ने कहा__"किसी बात को लेकर अगर आप परेशान हैं तो आपको देखकर हम सब भी परेशान हो जाएंगे। इस लिए जो भी बात है बता दीजिए कम से कम मन को शान्ति तो मिलेगी।"
अजय सिंह जानता था कि प्रतिमा बात को बिना जाने नहीं मानेगी, इस लिए उसने उसे सबकुछ बता देना ही बेहतर समझा। एक गहरी साॅस लेकर उसने प्रतिमा को सारी बातें बता दी जो पिछले महीने से अब तक उसके साथ हुआ था। सब कुछ जानने के बाद प्रतिमा भी गंभीर हो गई।
"लेकिन आप ये कैसे पता लगाएंगे कि किसने आपके साथ ये सब किया है?" प्रतिमा ने कहा__"जबकि आपके पास उसके बारे में कोई सबूत नहीं है। अगर आप ये समझते हैं कि उनके चेहरे की बिना पर उन्हें खोजेंगे तो तब भी आप उन्हें नहीं खोज पाएंगे।"
"तुम ऐसा कैसे कह सकती हो भला?" अजय सिंह चौंकते हुए बोला था।
"सीधी सी बात है।" प्रतिमा ने कहा__"वो जो भी थे आपसे या आपके पीए से हमेशा फाॅरेनर की वेशभूसा या शक्ल में ही मिले थे। मतलब साफ है कि वो लोग शुरू से ही आपसे या आपके पीए से अपनी असलियत छुपाना चाह रहे थे, ये भी कि आपको तथा आपके पीए को उनके बारे में ज़रा सा भी किसी प्रकार का शक न हो।
आज ये आलम है कि वो अपने मकसद में उसी तरह कामयाब हो कर गायब हो गए जैसा उन्होंने कर गुज़रने का प्लान बनाया रहा होगा।"
अजय सिंह अपनी बीवी की इस बात को सुन कर अवाक् सा रह गया। प्रतिमा को इस तरह देखने लगा था वह जैसे प्रतिमा की गर्दन अपने धड़ से अलग हो कर हवा में कत्थक करने लगी हो।
"क्या मैंने कुछ ग़लत कहा डियर?" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए पूछा।
"कभी कभी तुम्हारा दिमाग़ भी किसी सफल जासूस की तरह चलता है।" अजय सिंह बोला__"यकीनन तुम्हारा ये तर्क अपनी जगह एक दम दुरुस्त है। तुम्हारी बातों में वजन है, और अगर तुम्हारी इस बात के अनुसार सोचा जाए तो अब हमारे लिए ये बेहद मुश्किल काम है उन लोगों को ढूॅढ़ पाना।"
"वकालत की पढ़ाई आपने ही नहीं बल्कि मैंने भी की है जनाब।" प्रतिमा ने हॅस कर कहा__"ये अलग बात है कि मैंने इस पढ़ाई के बाद वकील बन कर किसी कोर्ट में किसी के पक्ष में वकालत नहीं की।"
"अच्छा ही किया न।" अजय सिंह ने भी हॅस कर कहा__"वर्ना बड़े बड़े वकीलों की छुट्टी हो जाती।"
"ऐसा आप कह सकते हैं।" प्रतिमा ने अर्थपूर्ण लहजे में कहा__"क्योंकि आपको ही अपनी छुट्टी हो जाने का अंदेशा हुआ नज़र आया है।"
"तुम ऐसा सोचती हो तो चलो ऐसा ही सही।" अजय सिंह बोला__"लेकिन इस बारे में अब तुम्हारा क्या खयाल है, मेरा मतलब कि अब हम कैसे उन लोगों का पता लगाएंगे?"
"सब कुछ बहुत सोच समझ कर पहले से ही प्लान बना लिया था उन लोगों ने।" प्रतिमा ने सोचने वाले भाव से कहा__"इस लिए इस बारे में पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता कि वो हमारे द्वारा पता कर ही लिए जाएंगे।"
अजय सिंह का खयाल भी यही था इस लिए कुछ बोला नहीं वह।जबकि,,,,
"वैसे आपका अपने उस भतीजे के बारे में क्या खयाल है?" प्रतिमा ने कहा__"हो सकता है ये सब उसी का किया धरा हो?"
"नहीं यार।" अजय सिंह कह उठा__"उससे इस सब की उम्मीद मैं नहीं करता। क्योंकि जिस तरह से सोच समझ कर तथा प्लान बना कर हमसे धोखा किया गया है वैसा करना विराज के बस का रोग़ नहीं है। वो साला तो किसी होटल या ढाबे में अपने साथ साथ अपनी माॅ बहन को भी कप प्लेट धोने के काम में लगा दिया होगा। इतना कुछ करने के लिए दिमाग़ चाहिए और फाॅरेनर लुक पाने के लिए ढेर सारा पैसा जो उसके पास होने का कोई चान्स ही नहीं है। तुम बेवजह ही इस सबके पीछे उसको ही जिम्मेदार ठहरा रही हो प्रतिमा।"
"हमें हर पहलू पर गौर करना चाहिए डियर हस्बैण्ड।" प्रतिमा ने कहा__"एक अच्छा इन्वेस्टिगेटर वही होता है जो हर पहलू के बारे में सोच विचार करे। ज़रा सोचिए...इस तरह की घटनाएं तभी से शुरू हुईं हैं जबसे विराज अपने साथ अपनी माॅ बहन को लेकर यहाॅ से मुम्बई गया है। इसके पहले आज तक कभी भी ऐसी कोई बात नहीं हुई।
उसका हमारे बेटे को बुरी तरह मार पीटकर यहाॅ से जाना, ट्रेन से अपनी माॅ बहन सहित रहस्यमय तरीके से गायब हो जाना, और अब ये.....आपका किसी के द्वारा इस तरह धोखा खा कर नुकसान हो जाना। ये तो आपको भी पता है कि कोई दूसरा आपके साथ ऐसा नहीं कर सकता फिर बचता कौन है??"
अजय सिंह के दिलो दिमाग़ में अचानक ही मानो धमाके से होने लगे। प्रतिमा द्वारा कहा गया एक एक शब्द उसके मनमस्तिष्क पर गहरी चोंट कर रहा था। जबकि....
"वर्तमान समय में अगर कोई आपके खिलाफ खड़ा हो सकता है तो वो है विराज।" प्रतिमा गंभीरता से कह रही थी__"आपसे जिसे सबसे ज्यादा तक़लीफ है तो वो है विराज। बात भी सही है डियर हस्बैण्ड...हमने उनके साथ क्या क्या बुरा नहीं किया। हर दुख दिये उन्हें, यहां तक कि हमारी वजह से आज वो अपने ही घर से बेघर हैं। ख़ैर...इन सब बातों के कहने का मतलब यही है कि मौजूदा हालात में इस सबके पीछे अगर किसी पर सबसे ज्यादा उॅगली उठती है तो सिर्फ विराज पर।"
अजय सिंह के पास कहने के लिए जैसे कुछ था ही नहीं, जबकि उसकी खामोशी और उसके चेहरे पर तैरते हज़ारों भावों को बारीकी से परखते हुए प्रतिमा ने पुन: कहा__"आप हमेशा इस बात पर ज़ोर देते हैं कि विराज मुम्बई में किसी होटल या ढाबे में कप प्लेट धोता होगा और अब अपनी माॅ बहन को भी इसी काम में लगा दिया होगा। लेकिन क्या आपके पास अपकी इस बात का ठोस सबूत है? क्या आपने कभी अपनी आॅखों से देखा है कि विराज मुम्बई में किसी होटल या ढाबे में कप प्लेट धोने का काम करता है...नहीं न?? बल्कि ये सिर्फ आपकी अपनी सोच है जो ग़लत भी हो सकती है।"
"तुमने तो यार मेरा ब्रेन वाश ही कर दिया।" अजय सिंह गहरी साॅस ली, उसकी आॅखों में अपनी पत्नी के प्रति प्रसंसा के भाव थे__"यकीनन तुममें एक अच्छे इन्वेस्टिगेटर होने के गुण हैं। तो तुम्हारे मतानुसार ये सब जो कुछ हुआ है उसका जिम्मेदार सिर्फ विराज है?"
"मै ये नहीं कहती डियर हस्बैण्ड कि ये सब विराज ने ही किया है।" प्रतिमा ने अजीब भाव से कहा__"बल्कि मैं तो सिर्फ संभावना ब्यक्त कर रही हूॅ कि किसने क्या किया हो सकता है। पक्के तौर पर तो तभी कहा जाता है न जब हमारे पास किसी बात का ठोस व पुख्ता सबूत हो??"
"आई एग्री विद यू माई डियर।" अजय ने मुस्कुराते हुए कहा__"तो हम अब इस थ्योरी के साथ चलेंगे कि ये सब विराज ने किया हो सकता है। लेकिन अब सवाल ये है कि...कैसे?? इतना कुछ वो कैसे कर सकता है भला जबकि इतना कुछ कर गुजरने की काबिलियत उसमे है ही नहीं इतना तो मुझे यकीन है?"
"आपका ये यकीन बेमतलब भी तो हो सकता है डियर हस्बैण्ड।" प्रतिमा ने तर्क किया__"क्योकि आपके पास अपने इस यकीन की भी ठोस वजह नहीं है ये मुझे पता है।"
"अब बस भी करो यार।
" अजय सिंह ने बुरा सा मुॅह बनाया__"आज क्या मूॅग की दाल में भीमसेनी काजल मिला कर खाया है तुमने? मेरी हर बात की हर विचार की धज्जियाॅ उड़ाए जा रही हो तुम।"
"मेरा ऐसा करने का कोई इरादा नहीं था डियर हस्बैण्ड।" प्रतिमा मुस्कुराई__"मैने तो बस अपने विचार और तर्क पेश किये हैं, और अपने डियर हस्बैण्ड को सही राह की तरफ जाने का मार्ग बताने की कोशिश की है।"
अजय सिंह को प्रतिमा पर बेहद प्यार आया, और उसने आगे बढ़ कर अपनी पत्नी को अपनी बाॅहों मे भर लिया। कुछ पल उसकी आॅखों में झाॅकने के बाद उसने झुक कर प्रतिमा के रस भरे अधरों को अपने होठों के बीच भर कर उन्हें चूमने चूसने लगा।
प्रतिमा के जिस्म में आनंद की मीठी मीठी लहरें तैरने लगी। उसने भी अपने दोनो हाॅथ अजय सिंह के गले में डालकर इन होठों के चुंबन तथा चुसाई का भरपूर आनंद लेने लगी। वे दोनो भूल गये कि इस वक्त वे अपने बेडरूम में नहीं बल्कि ड्राइंगरूम में हैं जहाॅ पर किसी के भी द्वारा देख लिए जाने का खतरा था।
अजय सिंह बुरी तरह प्रतिमा के होठों को चूस रहा था। उसका बाॅया हाॅथ सरकते हुए सीथा प्रतिमा के दाॅएं बोबे पर आकर बड़े आकार के बोबे को सख्ती से अपनी मुट्ठी में भर कर मसलना शुरू कर दिया। अपनी चूॅची को इस तरह मसले जाने से प्रतिमा के मुॅह से एक दर्दयुक्त किन्तु आनंद से भरी हुई आह निकल गई जो अजय सिंह के होठों के बीच ही दब कर रह गई। ये दोनों जैसे सब कुछ भूल चुके थे, ये भी कि अपने कमरे से ड्राइंगरूम की तरफ आता हुआ उनका बेटा शिवा अपने माॅम डैड को इस हालत में देख कर भी वापस नहीं पलटा था बल्कि वहीं छुपकर इस नज़ारे का मज़ा लेने लगा था। उसके होठों पर बेशर्मी से भरी मुस्कान तैरने लगी थी तथा साथ ही अपने दाएॅ हाथ से पैन्ट के ऊपर से ही सही मगर अपने लौड़े को मसले भी जा रहा था।
........
दोस्तो आपके सामने अपडेट हाज़िर है,,,,,
आप सबकी बेक़रारी को देख कर मैंने आज अपडेट लिखने की कोशिश की, ये अलग बात है कि बार बार नींद की वजह से परेशान भी होना पड़ा। मगर आपके प्यार के लिए कुछ तो करना ही था आज।
आप सबकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा,,,,,
अपडेट........... 《 11 》
अब तक,,,,,,,
अजय सिंह बुरी तरह प्रतिमा के होठों को चूस रहा था। उसका बाॅया हाॅथ सरकते हुए सीथा प्रतिमा के दाॅएं बोबे पर आकर बड़े आकार के बोबे को सख्ती से अपनी मुट्ठी में भर कर मसलना शुरू कर दिया। अपनी चूॅची को इस तरह मसले जाने से प्रतिमा के मुॅह से एक दर्दयुक्त किन्तु आनंद से भरी हुई आह निकल गई जो अजय सिंह के होठों के बीच ही दब कर रह गई। ये दोनों जैसे सब कुछ भूल चुके थे, ये भी कि अपने कमरे से ड्राइंगरूम की तरफ आता हुआ उनका बेटा शिवा अपने माॅम डैड को इस हालत में देख कर भी वापस नहीं पलटा था बल्कि वहीं छुपकर इस नज़ारे का मज़ा लेने लगा था।
उसके होठों पर बेशर्मी से भरी मुस्कान तैरने लगी थी तथा साथ ही अपने दाएॅ हाथ से पैन्ट के ऊपर से ही सही मगर अपने लौड़े को मसले भी जा रहा था।
अब आगे,,,,,,,
"तुम दोनों ने बहुत ही बेहतर तरीके से इस काम को अंजाम दिया है मेरे बच्चो।" ड्राइंगरूम में सोफे पर बैठे जगदीश ओबराय ने मुस्कुराते हुए कहा__"अजय सिंह सोच भी नहीं सकता है कि उसके साथ ये खेल खेलने वाले वो दो फाॅरेनर कौन थे?"
"खेल ऐसा ही होगा अंकल जो किसी को समझ में ही न आए।" विराज ने प्रभावशाली स्वर में कहा__"और अजय सिंह के साथ अब वो होगा जो उसने सोचा भी न होगा।"
"मैं तो बेवजह ही तुम्हें इसके लिए किसी ऐक्टर या माॅडल का सजेशन दे रहा था बेटे।" जगदीश ने कहा__"मुझे लगता था कि इस काम के लिए एक ऐक्टर ही बेहतर हो सकता है क्योकि उन्हें हर तरह के किरदार निभाने का तरीका और अनुभव होता है। जबकि तुमने खुद ही इस काम को करने का ज़ोर दिया।"
"मेरे ज़ोर देने की वजह आप अच्छी तरह जानते हैं अंकल।" विराज ने कहा__"आप जानते हैं कि ये जंग मेरी है और इस जंग में मुझे ही हिस्सा लेकर इसे इसके अंजाम तक पहुचाना है। रही बात फाॅरेनर बन कर अजय सिंह से खेल खेलने की तो इसमें फाॅरेनर के रोल के लिए किसी ऐक्टर की ज़रूरत ही नहीं थी, हाॅ फाॅरेनर लुक की आवश्यकता ज़रूर थी तो उसके लिए आपने मेकअप आर्टिस्ट को बुलवाया ही था। उसने मुझे स्टीव जाॅनसन और गुड़िया(निधि) को एॅजिला जाॅनसन का मेकअप करके लुक दे दिया। उसके बाद आपने देखा ही कि कैसे हम दोनों भाई बहन ने अजय सिंह के साथ ये खेल खेला। मुझे गुड़िया(निधि) की फिक्र ज़रूर थी लेकिन उसने भी अपना एॅजिला जाॅनसन का रोल बेहतरीन तरीके से अदा किया। हलाकि मैं ये नहीं चाहता था कि एॅजिला जाॅनसन के रूप में मेरी पत्नी का किरदार गुड़िया निभाए क्योंकि वो मेरी बहन है, लेकिन गुड़िया की ही ज़िद थी कि ये किरदार वही निभाएगी। ख़ैर जो हुआ अच्छे तरीके से हो गया।"
"अजय सिंह उन दोनो फाॅरेनर को ढूॅढ़ने की जी तोड़ कोशिश कर रहा होगा।" जगदीश ने कहा__"मगर ढूॅढ़ नहीं पाएगा। ढूॅढ़ भी कैसे पाएगा, जबकि स्टीव जाॅनसन और एॅजिला जाॅनसन नाम के इन लोगों का कहीं कोई वजूद ही नहीं है। ये बात तो वो सोच ही नहीं सकता कि जिन दो फाॅरेनर से वह मिला था वो कोई और नहीं बल्कि उसके ही अपने हैं जिनके साथ उसने बुरा करने में कोई कसर नहीं छोंड़ी।"
"हर चीज़ का हिसाब लूॅगा अंकल हर चीज़ का।" विराज ने कहा__"ये तो अभी ट्रेलर है, अभी आगे खुलकर खेल होगा।"
"अरविन्द सक्सेना को इस खेल में कैसे शामिल किया तुमने?" जगदीश के मन में ये सवाल पहले से था__"वो तो अजय सिंह का ही बिजनेस पार्टनर है न?"
"सक्सेना को इस खेल में शामिल नहीं किया अंकल।" विराज जाने क्या सोच कर मुस्कुराया था बोला__"बल्कि उसे अजय सिंह से अलग हो जाने के लिए मजबूर किया था मैंने।
"
"क्या मतलब?" जगदीश ने चौंकते हुए कहा__"और वह तुम्हारे द्वारा भला कैसे इस सबके लिए मजबूर हो गया??"
"किसी की कमज़ोर नस अगर आपके पास आ जाए तो आप उससे कुछ भी करा सकते हैं अंकल।" विराज ने कहा__"सक्सेना के साथ वही मामला हुआ है।"
"बात कुछ समझ में नहीं आई बेटे।" जगदीश ने उलझन भरे भाव से कहा__"ज़रा बात को स्पष्ट करके बताओ।"
"दरअसल बात ये है अंकल कि अजय सिंह और सक्सेना बिजनेस पार्टनर के अलावा भी बहुत कुछ हैं।" विराज ने कहा__"आप यूॅ समझिए कि ये दोनो हर चीज़ मिल बाॅटकर खाते पीते हैं। फिर वो चीज़ चाहे कितनी ही पर्शनल क्यों न हो। अगर स्पष्ट रूप से कहा जाए तो ये कि उन दोनों में उस तरह का संबंध है जिसे ये समाज अनैतिक करार देता है। ये दोनों अपनी खुशी और आनंद को पाने के लिए एक दूसरे की बीवियों के साथ जिस्मानी संबंध बनाते हैं।"
"क् क्या?????" जगदीश ओबराय ये बात सुनकर इस तरह उछला था जैसे कि जिस सोफे पर वह बैठा था वो अचानक ही गर्म शोलों में तब्दील हो गया हो, बोला__"ये तुम क्या कह रहे हो बेटे?"
"यही सच है अंकल।" विराज ने ज़ोर दे कर कहा__"अब आप समझ सकते हैं कि अजय सिंह किस हद तक कमीना इंसान है।"
जगदीश ओबराय मुह और आखें फाड़े देखता रह गया था विराज को। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अजय सिंह इस हद तक गिर सकता है। जबकि,,,,
"मेरे पास सक्सेना की यही कमज़ोरी थी अंकल।" विराज कह रहा था__"मैंने बड़ी मुश्किल से किसी के द्वारा सक्सेना के कुछ ऐसे फोटोग्राफ्स हाॅसिल कर लिए थे जिनमें सक्सेना की अपनी बीवी किसी गैर के साथ सेक्स कर रही थी और सक्सेना एक दूसरे आदमी द्वारा सेक्स(गाॅड मरवा रहा था) कर रहा था। इन फोटोग्राफ्स के आथार पर ही मैंने सक्सेना को मजबूर किया कि वो अजय सिंह से अलग हो जाए वर्ना उसके इन फोटोग्राफ्स को सार्वजनिक कर दिया जाएगा। फिर क्या था, सक्सेना को अजय सिंह से अलग होना पड़ा। अजय सिंह तो ये भी नहीं जानता कि सक्सेना के ही द्वारा अभी और क्या होने वाला है?"
"क्या मतलब?" जगदीश चौंका__"अभी और क्या करवा रहे हो तुम सक्सेना से?"
"आपको भी पता चल जाएगा अंकल।" विराज ने मुस्कुराते हुए कहा__"बस इंतज़ार कीजिए थोड़ा।"
"कम से कम मुझे बताने में तो तुम्हें कोई हर्ज़ नहीं होना चाहिए।" जगदीश ने हॅस कर कहा।
"इन बातों में मज़ा तभी आता है अंकल जब वो चीज़ हो जाए जो हम चाहते हैं।" विराज ने कहा__"और वैसे भी सस्पेन्स नाम की चीज़ कुछ समय तक तो रहना ही चाहिए।"
"तुम और तुम्हारी बातें।" जगदीश ने मुस्कुरा कर कहा__"इतना जल्दी समझ में कहाॅ आती हैं? ख़ैर तुम्हारे लिए एक ख़बर है हमारे पास।"
"कैसी ख़बर अंकल?" विराज ने पूॅछा।
"अजय सिंह की बड़ी बेटी रितू अब पुलिस आफिसर बन गई है।"
"ये तो अच्छी बात है न उनके लिए।
" विराज ने कहा__"वैसे भी बहुत जल्द उन्हें नए पुलिस वालों से संबंध बनाना पड़ेगा जिससे उसके किसी काम में किसी तरह की रुकावट न हो सके।"
"जो भी हो।" जगदीश ने कहा__"मुझे पता चला है कि तुम्हारे दादा दादी का केस बहुत जल्द रितू अपने हाॅथ में लेने वाली है।"
"उससे कुछ नहीं होगा अंकल।" विराज के चेहरे पर गंभीरत थी__"अजय सिंह अपनी पहुॅच और पावर से इस केस को इसके अंजाम तक पहुॅचने ही नहीं देगा। रितू दीदी अपने सीनियर के आदेश के खिलाफ कुछ नहीं कर सकती।"
"देखते हैं क्या होता है?" जगदीश ने कहा__"ख़ैर छोंड़ो ये सब...अभी आफिस जा रहे हो क्या?"
"हाॅ कुछ ज़रूरी काम भी है।" विराज कुछ सोचते हुए बोला।
जगदीश ने बड़े गौर से विराज के चेहरे की तरफ देखा, जिसमें कभी कभी पीड़ा के भाव आते और लुप्त होते नज़र आ रहे थे। विराज ने जगदीश को जब इस तरह अपनी तरफ देखते पाया तो कह उठा__"ऐसे क्यों देख रहे हैं अंकल?"
"देख रहा हूॅ कि कितनी सफाई से तुम अपने उस दर्द को छुपा लेते हो जो तुम्हारे दिल में है।" जगदीश ने कहा__"वो दर्द पारिवार से संबंधित नहीं है वो तो किसी से बेपनाह मोहब्बत करने वाला है।"
"ऐसा कुछ नहीं है अंकल।" विराज ने नजरें चुरा कर कहा और एक झटके से सोफे से उठ कर खड़ा हो गया।
"आखें सब बयां कर देती हैं बेटे।" जगदीश ने कहा__"हमने बहुत दुनियाॅ देखी है, इतना तो हम महसूस कर सकते हैं कि सामने वाले के दिल में क्या है? और वैसे भी मोहब्बत एक ऐसी चीज़ होती है जो हर हाल में अपने होने का सबूत देती है।"
"पता नहीं आप क्या कह रहे हैं अंकल?" विराज ने कहा__"चलता हूॅ मैं।"
विराज वहाॅ से बाहर निकल गया, जबकि जगदीश वहीं बैठा रहा आॅखों में आॅसुओं के कतरे लिए।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
"आइये दीदी।" करुणा ने दरवाज़े से हटकर प्रतिमा को अंदर की तरफ आने का रास्ता देते हुए कहा__"मैं कल आपका इंतज़ार कर रही थी लेकिन आप आई ही नहीं।"
"हाॅ वो कमर में दर्द था तो नहीं आ पाई।" प्रतिमा ने कहा और अंदर की तरफ आ कर ड्राइंगरूम में रखे सोफे पर बैठ गई, फिर करुणा की तरफ देख कर कहा__"अगर कोई ज़रूरी काम था तो तुम ही आ जाती मेरे पास। अब इतना दूर भी तो नहीं है कि तुम आ न सको।"
(आप सब दोस्तों को तो पता ही होगा कि इन लोगों का घर कैसा है? ये घर नहीं बल्कि हवेली थी जो विराज के पिता विजय सिंह ने बनवाई थी। आपने पढ़ा होगा कि हवेली तीनो भाइयों के हिस्से को ध्यान में रख कर बनवाई गई थी। जैसे तीन दो मंजिला विशाल घर को आपस में जोड़ दिया गया हो।)
"आप तो जानती हैं दीदी कि इन्हें(अभय सिंह बघेल) मेरे कहीं आने जाने से तक़लीफ होती है।" करुणा ने कहा__"और वैसे भी घर का इतना सारा काम हो जाता है कि उसी में सारा समय निकल जाता है।"
"मैंने तो अभय से जाने कितनी बार कहा है कि घर के काम के लिए एक दो नौकरानी रखवा दो।
" प्रतिमा ने कहा__"मगर न वो मेरी सुनते हैं और न ही अपने बड़े भाई अजय की सुनते हैं। आख़िर हम कोई ग़ैर नहीं अपने ही तो हैं। भला क्या ज़रूरत है अभय को स्कूल में पढ़ाने की? माना कि सरकारी नौकरी है मगर इस नौकरी मिलता क्या है? अपना परिवार भी ढंग से नहीं चला सकते इस नौकरी के रुपये पैसे से। अजय ने कितनी बार कहा है कि अभय बिजनेस में उनका हाॅथ बॅटाए जिससे रुपये पैसे की कोई कमी न आए। मगर,,,,,
"जाने दीजिए दीदी।" करुणा ने बेचैनी से पहलू बदला__"आप तो जानती हैं कि वो इस नौकरी और इस नौकरी से मिलने वाली तनख्वाह से खुश हैं। मैंने भी तो उन्हें बहुत समझाया है मगर वो हमेशा की तरह मेरी बात पर मुझे नसीहतें देने लगते हैं कि 'मैं एक शिक्षक हूॅ, गुरू हूॅ.....स्कूल में बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर उनका उज्वल भविश्य बनाना मेरा फर्ज़ है। स्कूल के बच्चे हमारे देश का भविश्य हैं। और भी न जाने क्या क्या भाषण देने लगते हैं।"
"हाॅ जानती हूॅ मुझे भी कभी कभी जब मैं उससे बात करूॅगी तो इसी तरह भाषण देने लगते हैं।" प्रतिमा ने कहा__"दिव्या तो अभी अभय के साथ ही स्कूल में होगी न?"
"जी वो तो शाम को उनके साथ ही आएगी।" करुणा ने कहा__"और सुनाइए क्या हो गया था आपकी कमर को??"
"मत पूॅछो करुणा।" प्रतिमा ने अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कुराते हुए कहा__"कल तो सारा बदन टूट रहा था लेकिन....हाय मज़ा भी बहुत आया था।"
"मतलब भाई साहब ने कल आपकी हालत बिगाड़ दी।" करुणा मुस्कुराई।
"और नहीं तो क्या।" प्रतिमा ने कहा__"पूरे चार राउण्ड में बुरी तरह रगड़े हैं मुझे।"
"अच्छा तो है न।" करुणा ने एकाएक कुछ उदास भाव से कहा__"आपको शान्ति तो मिल जाती है।"
"अभय से उसके इलाज के संबंध में बात किया कि नहीं तुमने?" प्रतिमा ने पूॅछा।
"वो नहीं मानते हैं दीदी।" करुणा ने अजीब भाव से कहा__"कहते हैं कि अब ज़रूरत ही क्या है? दो बच्चे तो हो ही गए हैं हमारे। अब इलाज़ की कोई ज़रूरत नहीं है।"
दोस्तो बात दरअसल ये है कि दो साल पहले अभय सिंह अपनी मोटर साइकिल (बुलेट जो विराज के पिता ने खरीद कर दी थी) से स्कूल जा रहा था, पता नहीं उसका ध्यान कहाॅ था, उसे पता ही नहीं चला और मोटर साइकिल सड़क से नीचे उतर गई। अभय सिंह कुछ कर न सका क्योंकि तब तक देर हो चुकी थी। भारी भरकम बुलेट के साथ लुढ़कते हुए अभय सिंह नीचे पहुॅच गया। ज़मीन से काफी ऊॅची सड़क थी। इस छोटे से एक्सीडेन्ट में अभय सिंह को काफी चोंटें लगी तथा दाहिना हाॅथ भी टूट गया। ख़ैर ये सब तो इलाज़ में ठीक हो जाना था किन्तु दो दिन बाद जब अभय सिंह अपनी पत्नी करुणा के साथ संभोग करना चाहा तो उसका लिंग ही न खड़ा हुआ। करुणा ने कई तरह से लिंग को खड़ा करने की कोशिश की किन्तु कोई फायदा न हुआ।
तब ये बात सामने आई कि एक्सीडेन्ट में अभय सिंह के प्राइवेट पार्ट में भी अंदरूनी चोंट लगी थी, अभय सिंह चूॅकि बेहोश हो गया था इस लिए उसे पता ही नहीं चला। ख़ैर अब समस्या हो गई कि अभय सिंह का लिंग ही नहीं खड़ा हो रहा, इस बात से अभय सिंह से ज्यादा करुणा परेशान हो गई। करुणा ने इसके लिए अभय सिंह को इलाज़ करवाने का कहा लेकिन लाज और शरम के कारण अभय सिंह इसके लिए तैयार ही न हुआ। करुणा ने उसे बहुत समझाया, ये तक कहा कि वो सेक्स के बिना कैसे रह पाएगी? इस पर अभय सिंह नाराज़ भी हुआ, और कहा कि दो बच्चे हो गए हैं। रही बात सेक्स की तो खुद पर काबू रखना सीखो, जीवन में सेक्स ही सब कुछ नहीं होता। अभय सिंह वैसे भी गुस्सैल स्वभाव का था इस लिए करुणा बेचारी मन मार रह गई। ये बात अभय के अलावा सिर्फ करुणा ही जानती थी, बाॅकी किसी को कुछ पता नहीं था। फिर ऐसे ही लगभग एक साल बाद बेध्यानी में ये राज़ की बात करुणा के मुख से प्रतिमा के सामने निकल गई। बाद में करुणा ने विनती करते हुए प्रतिमा से कहा भी कि ये बात वो किसी से न बताएं। औरतज़ात के पेट में कहाॅ देर तक कोई बात रह पाती है, नतीजतन उसने उसी दिन अजय सिंह से ये सब बता दिया। अजय सिंह ये जानकर हैरान हुआ कि उसका छोटा भाई अभय सिंह अब अपनी बीवी के साथ संभोग करने के काबिल नहीं रहा। किन्तु अगले ही पल उसे खुशी भी हुई इस बात से। वो जानता था कि करुणा अभी भरपूर जवानी में है और वो सेक्स के बिना रह नहीं पाएगी। हलाॅकि ये उसकी सोच ही थी, और इसी सोच के आधार पर वह जाने क्या क्या ख्वाब सजा बैठा। उसने प्रतिमा से इस बारे में बात की कि वह करुणा को उसके साथ संभोग के लिए तैयार करे। प्रतिमा अपने पति को अच्छी तरह जानती थी कि अजय सिंह औरत की चूत का कितना दिवाना है, अगर नहीं होता तो अपनी ही बेटी पर नीयत ख़राब नहीं करता। ख़ैर प्रतिमा तो खुद ही चाहती थी कि अभय व करुणा उनके साथ हर काम में शामिल हो जाएं। इस लिए उसने दूसरे दिन से ही करुणा से नज़दीकियाॅ बढ़ाना चालू कर दिया। करुणा किसी भी मामले में प्रतिमा से कम न थी। बल्कि ऊपर ही थी, प्रतिमा के मुकाबले वह अभी जवान ही थी। किन्तु स्वभाव से सरल व बहुत कम बोलने वाली औरत थी। अभय सिंह से उसने प्रेम विवाह किया था। अभय के अलावा किसी दूसरे मर्द के बारे में वह सोचना भी गुनाह मानती थी।
प्रतिमा पढ़ी लिखी तथा खेली खाई औरत थी, किसी को कैसे फॅसाना है ये उसे अच्छी तरह आता था। काम मुश्किल तो था लेकिन असंभव नहीं। मगर प्रतिमा की सारी कोशिशें बेकार गईं अर्थात् वह करुणा को इस सबके के लिए तैयार न सकी। दरअसल वह खुल कर ये तो कह नहीं सकती थी कि 'आओ और मेरे पति से संभोग कर लो।' इस लिए उसने उससे सेक्स से संबंधित अपनी लाइफ के बारे में बता बता कर ही करुणा के मन में सेक्स की फीलिंग्स भरने का प्रयास करती रही।
वह अजय के साथ अपनी सेक्स लाइफ के बारे में खुल कर उससे बात करती थी। शुरू शुरू में तो करुणा ऐसी बातें सुनती ही नहीं थी कदाचित उसे प्रतिमा के मुख से ऐसी अश्लीलतापूर्ण बातों से बेहद शरम आती थी। इस लिए हर बार वह प्रतिमा के सामने हाॅथ जोड़ कर उससे ऐसी बातें न करने को कहने लगती थी, लेकिन प्रतिमा भला कहाॅ मानने वाली थी? वह तो उसके पास आती ही एक मकसद के साथ थी। ख़ैर धीरे धीरे करुणा को भी इन सब बातों को सुनने की आदत हो गई।
"ये तो कोई बात न हुई करुणा।" प्रतिमा कह रही थी__"आखिर कब तक ऐसा चलेगा? अभय को तुम्हारे बारे में कुछ तो सोचना चाहिए। उसे सोचना चाहिए कि अभी तुम्हारी उमर ही क्या हुई है? अभी तो तुम जवान हो, और शादीशुदा जवान औरत बिना सेक्स के कैसे रहेगी?"
"जाने दीजिए दीदी।" करुणा ने एक गहरी साॅस ली__"अब तो आदत हो गई है। अब इन बातों की तरफ ध्यान ही नहीं जाता मेरा। घर के काम और बच्चों में ही सब समय निकल जाता है।"
"और जब रात होती है तथा अभय के साथ एक ही बिस्तर पर लेटती हो तब क्या इस तरफ ध्यान नहीं जाता होगा?" प्रतिमा ने कहा__"जरूर जाता होगा छोटी, और ये सोच कर दुख भी होता होगा कि कुछ हो ही नहीं सकता।"
"ऐसा नहीं है दीदी।" करुणा ने भावहीन स्वर में कहा__"मैं तो इनके(अभय) साथ सोती ही नहीं। बल्कि मैं तो हमेशा अपने बेटे शगुन के साथ ही सोती हूॅ। आप तो जानती हैं वो दिमाग से डिस्टर्ब है, रात में उसे देखना पड़ता है वर्ना जागने के बाद वह कब किधर चला जाए पता ही नहीं चलता।"
"फिर भी करुणा।" प्रतिमा ने कहा__"मन को कितना भी बहला लो लेकिन जो तक़लीफ और दुख का कारण है उसका ख्याल तो आ ही जाता है। जवान औरत को अपनी सेक्स की गर्मी को बर्दास्त कर पाना ज़रा मुश्किल होता है।"
"किया भी क्या जा सकता है? करुणा ने सिर झुकाते हुए कहा__"इन्होंने तो जैसे कसम खा ली है कि इलाज़ नहीं करवाएंगे। क्या उनकी इच्छा नहीं होती होगी इसकी? मगर जैसे उन्होंने खुद की इच्छाओं को दबा लिया है वैसे ही मैने भी दबा लिया है।"
"हाय कैसे रह लेती हो तुम?" प्रतिमा ने कहने के साथ ही साड़ी के ऊपर से करुणा की नज़र में अपनी चूत को मसला__"मुझसे तो एक दिन भी बगैर लंड के नहीं रहा जाता। हर रात रगड़ रगड़ कर चुदवाना पड़ता है शिवा के डैड से। मौका मिलता है तो दिन में भी चुदवा लेती हूॅ। कसम से करुणा शिवा के डैड का लंड घोड़े जैसा है और जब तक उस घोड़े जैसे लंड से अपने आगे पीछे पेलवा नहीं लेती न तब तक चैन नहीं आता।"
"आपके मज़े हैं फिर तो।" करुणा ने हॅसते हुए कहा__"आपका भाग्य अच्छा है दीदी, जो आपको इतना कुछ मिल रहा है।"
"भाग्य बनाना पड़ता है छोटी।" प्रतिमा ने कहा__"तुमने अपना भाग्य खुद ही बिगाड़ रखा है तो कोई क्या कर सकता है?"
"मैंने कैसे अपना भाग्य बिगाड़ लिया भला?" करुणा के माॅथे पर अनायास ही बल पड़ता चला गया__"आप तो जानती हैं कि.
...ये,
"एक ही बात है।" प्रतिमा ने करुणा की बात को काटकर कहा__"वर्ना चार दिन की ज़िन्दगी में हर चीज़ का मज़ा लिया जा सकता है।"
"मतलब???" करुणा ने नासमझने वाले भाव से पूॅछा।
"अब अगर मैं कुछ कहूॅगी तो तुम्हें लगेगा कि ये मैं क्या ऊल जलूल बक रही हूॅ?" प्रतिमा ने अजीब भाव से कहा था।
"मैं ऐसा क्यों कहूॅगी दीदी?" करुणा ने हॅस कर कहा।
"तुम भी जानती होगी कि बड़े बड़े शहरों में कैसे लोग हर पल का आनंद लेते हैं?" प्रतिमा ने धड़कते दिल के साथ कहा__"वहाॅ शहरों में कोई औरत तुम्हारी तरह इस तरह नहीं बैठी नहीं रह जाती हैं बल्कि ऐसे हालात में भी अपने जिस्म की भूॅख को मिटाने के लिए रास्ता खोज लेती हैं।"
"क्या मतलब??" करुणा ने हैरानी से पूॅछा था__"किस तरह का रास्ता दीदी??"
"ज्यादा भोली न बनो तुम।" प्रतिमा ने कहने के साथ ही अजीब सा मुॅह बनाया फिर मुस्कुरा कर बोली__"तुम भी अच्छी तरह जानती हो कि मेरे कहने का क्या मतलब था?"
"कसम से दीदी मेरी कुछ समझ में नहीं आया कि आप क्या कह रही हैं?" करुणा ने कहा।
"जैसे लड़के लड़कियाॅ गर्लफ्रैण्ड ब्वायफ्रैण्ड बना कर शादी के पहले ही सब कुछ कर लेते हैं न।" प्रतिमा ने कहा__"उसी तरह शादीशुदा औरत मर्द भी करते हैं। फर्क ये है कि कोई खुशी खुशी करता है और कोई यही सब मजबूरी में करता है।"
"ओह! तो आप ये कहना चाहती हैं कि जैसे शहर के औरत मर्द शादी के बाद भी किसी को गर्लफ्रैण्ड व ब्वायफैण्ड बना कर सब कुछ करते हैं।" करुणा कह रहक थी__"वैसे ही उनकी तरह मुझे भी करना चाहिए?"
"तो इसमें ग़लत क्या है?" प्रतिमा ने कह दिया ये अलग बात है कि इसके साथ ही उसके दिल की धड़कन भयवश बढ़ गई थी।
"क्या???" करुणा ने बुरी तरह उछलते हुए कहा__"मतलब आप इस चीज़ को ग़लत नहीं मानती हैं??"
"बिलकुल।" प्रतिमा ने स्पष्ट लहजे में कहा__"हर इंसान की अपनी ज़रूरतें और चाहतें हैं, और ज़रूरतों तथा अपनी चाहतों को पूरा करना ग़लत नहीं हो सकता।"
"मतलब आप अगर मेरी जगह होतीं तो वो सब ज़रूर करतीं?" करुणा ने चकित भाव से कहा__"जो आज के समय में शहर वाले करते हैं?"
"बेशक।" प्रतिमा ने कहा__"जैसा कि मैने पहले ही बताया कि अपनी ज़रूरतों और चाहतों को पूरा करना कोई ग़लत नहीं है। जैसे मर्द अपनी खुशी के लिए हम पत्नियों के रहते हुए भी बाहरी औरत से जिस्मानी संबंध बना लेते हैं वैसे ही हम औरते किसी गैर मर्द से संबंध क्यों नहीं बना सकतीं? आख़िर इन सबके लिए हम औरतों पर ही पाबंदी क्यों? क्या हमारी इच्छाओं तथा ख्वाहिशों का कोई मोल नहीं?"
करुणा चकित थी प्रतिमा की बातें सुन कर। उसका मुॅह भाड़ की तरह खुला रह गया था।
"इतना हैरान न हो छोटी।" प्रतिमा कह रही थी__"आज के समय की यही सच्चाई है और यही माॅग भी है। ये सब बातें ऐसी नहीं हैं जिनके बारे में तुम्हें पता नहीं होगा।"
"हाॅ सुना तो मैंने भी है दीदी।
" करुणा ने कहा__"मगर ये भी जानती हूॅ कि हर इंसान की अपनी अपनी सोच होती है, जिसे जो अच्छा लगता है वो वही करता है।"
"अपनी इच्छाओं का गला घोंट कर जीना कोई बुद्धिमानी नहीं है।" प्रतिमा ने एक लम्बी साॅस खींचते हुए कहा__"मर्द अगर हमारी ज़रूरत पूरी नहीं कर सकता तो ये उसकी ग़लती है। किसी चीज़ की कुर्बानी देना अच्छी बात है लेकिन इस तरह नहीं....अगर इलाज़ संभव है तो उसका इलाज़ करवाना ही चाहिए।"
करुणा भला क्या कहती? उसका दिमाग़ तो जैसे जाम हो गया था। प्रतिमा बड़े ग़ौर से करुणा को देखने लगी थी। उसने मन ही मन सोचा कि ऐसा क्या करूॅ कि ये शीशे में उतर जाए? कुछ समय तक जब कोई कुछ न बोला तो सहसा करुणा चौंकी, जाने किन खयालों में खो गई थी वह?
"आप बैठिए दीदी।" करुणा ने सहसा उठते हुए कहा__"मैं आपके लिए चाय बना कर लाती हूॅ।"
"अरे रहने दो छोटी।" प्रतिमा ने कहा__"मैं चाय पीकर आई थी।"
"तो क्या हुआ दीदी।" करुणा ने हॅस कर कहा__"मेरे हाॅथ की भी पी लीजिए चाय।"
"अच्छा ठीक है मगर एक शर्त पर।" प्रतिमा ने मुस्कुराकर कहा।
"शर्त???" करुणा चकराई__"कैसी शर्त दीदी?"
"यही कि चाय स्पेशल दूध की होनी चाहिए।" प्रतिमा ने कहा।
"दूध तो अच्छा ही है दीदी।" करुणा ने हॅस कर कहा__"ये(अभय) सुबह शाम भैंस का ताज़ा दूध ही लेकर आते हैं, उसमें पानी नहीं डालते।"
"ओफ्फो।" प्रतिमा ने बुरा सा मुह बना कर कहा__"भैंस का दूध स्पेशल कहाॅ हुआ?"
"हाॅ तो मेरे पास भैंस का ही दूध है।" करुणा ने कहा__"आप कहें तो दुकान से कोई दूसरा दूध मॅगवा दूॅ चाय के लिए।"
"अरे जब घर में ही स्पेशल दूध है तो दुकान से मॅगवाने की क्या ज़रूरत है?" प्रतिमा ने द्विअर्थी भाव से कहा।
"घर में तो भैंस का ही है।" करुणा ने भोलेपन से कहा__"आपको बताया तो था अभी।"
"अरे मैं तुम्हारे दूध की बात कर रही हूॅ छोटी।" प्रतिमा हॅसी__"तुम्हारे अपने दूध की।"
"मेरे अपने दू.....?" करुणा को जब समझ आया तो बुरी तरह झेंप गई वह। लाज और शरम की लाली चेहरे पर फैलती चली गई। फिर खुद को सम्हाल कर बोली__"क्या दीदी आप भी।"
"अरे ठीक ही तो कह रही हूॅ मैं।" प्रतिमा ने हॅसते हुए कहा__"तुम्हारे अपने दूध से स्पेशल कोई और दूध भला कहाॅ होगा?"
"इस तरह तो आपका भी दू....ध।" करुणा ने मुस्कुरा कर कहा__"स्पेशल हुआ न?"
"अरे मेरा दूध अब स्पेशल कहाॅ रहा मेरी प्यारी बहन।" प्रतिमा ने आह सी भरी।
"क्यों क्या हुआ आपके दू....ध को?" दूध शब्द पर करुणा की ज़ुबान लड़खड़ा जाती थी कदाचित ये सोच कर कि ये दूध वाली बात खुद के ही दूध की थी।
"क्या बताऊॅ छोटी?" प्रतिमा ने कहा__"मेरे दूध की तो हालत ही ख़राब रहती है।"
"ऐसा क्यों दीदी?" करुणा चकरा गई।
"क्योंकि रात भर शिवा के डैड मेरे दूध को बुरी तरह मसलते जो हैं।
" प्रतिमा ने कहने के साथ ही अपने दोनों हाॅथों से अपने बड़े बड़े खरबूजों को पहले ज़ोर से मुट्ठियों में मसला फिर हल्के हल्के सहलाने लगी। ये देख कर करुणा बुरी तरह शरमा गई।
"देख न करुणा।" प्रतिमा ने अपने खरबूजों को दोनों हाॅथों से तौलते हुए कहा__"कैसे मसल मसल कर इतने बड़े बड़े कर दिये हैं वो।"
"आपके दिमाग में तो जब देखो तब यही सब बातें होती हैं।" कहने के साथ ही करुणा किचेन की तरफ बढ़ गई। उसके पीछे पीछे प्रतिमा भी चल दी।
"तुम्हारे भी दूध खरबूजे जैसे ही हैं करुणा।" प्रतिमा ने किचेन में पहुॅच कर तथा करुणा के सीने की तरफ गौर से देखते हुए कहा__"बस मसले कम गए हैं ये। जाने कब से अभय ने इन्हें देखा तक न होगा, है न छोटी??"
"अब बस भी कीजिए दीदी।" करुणा लाज व शरम से गड़ी जा रही थी।
"ओये होये।" प्रतिमा ने उसे पीछे से पकड़ कर अपनी बाहों में ले लिया तथा पीछे से ही अपने गालों को करुणा के गालों से रगड़ते हुए कहा__"देखो तो कैसे नई नवेली दुल्हन की तरह शरमा रही है। सच कहती हूॅ छोटी तुम्हें देखकर कोई नहीं कह सकता कि तुम दो बच्चों की माॅ हो।"
"अच्छा तो फिर चार बच्चों की माॅ कहेंगे।" करुणा ने शरारत से कहा।
"चार क्यों?" प्रतिमा ने कहने के साथ ही करुणा के पेट में चिहुॅटी काटी__"बल्कि दस कहेंगे। अब ठीक है न?"
"आआआआहहह दीदी।" चिहुॅटी काटने से करुणा एक दम से चीखते हुए उछल पड़ी थी बोली__"प्लीज दीदी चिहुॅटी मत काटिये न।"
"अच्छा तो फिर क्या काटूॅ?" प्रतिमा ने कहने के साथ ही अपने दाहिने हाॅथ की अॅगुली को करुणा के सपाट नंगे पेट में हौले हौले तथा गोल गोल घुमाना शुरू कर दिया।
"उउउउफफफफफ दीदी।" करुणा ने कसमसाते हुए कहा__"ये क्या कर रही हैं आप?"
"तुम चाय बनाने पर ध्यान दो छोटी।" प्रतिमा ने उसी हालत में कहा__"मैं तो अपनी प्यारी बहन को लाड कर रही हूॅ।"
"ये लाड नहीं है दीदी।" करुणा ने बड़ी ही चतुराई से खुद को प्रतिमा के बाहुपाश से आज़ाद करते हुए कहा__"ये तो कुछ और ही लगता है। और अब आप मुझे तसल्ली से चाय बनाने दीजिए, कोई छेड़खानी नहीं करेंगी आप।"
"ठीक है।" प्रतिमा ने मन ही मन हज़ारों गालियाॅ दी उसे किन्तु प्रत्यक्ष में कहा__"तुम्हें तो मेरा यानी अपनी बड़ी बहन का प्यार भी कुछ और लगता है।"
"ऐसा नहीं है दीदी।" आप तो बेवजह ही नाराज़ हो रहीं हैं।"
"रहने दो।" प्रतिमा ने छोटे बच्चे की तरह तुनक कर कहा__"सब जानती हूॅ मैं।"
तब तक चाय बन चुकी थी। करुणा ने चाय को दो कप में डाला तथा एक कप करुणा को थमाया और एक कप खुद लेकर उसे धीरे धीरे पीने लगी। जबकि प्रतिमा के मन में यही चल रहा था कि 'आज फिर एक बार मेरी कोशिश बेकार रही।'
दोस्तों अपडेट हाज़िर है,,,,,,
आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा........
अपडेट............ 《 12 》
अब तक,,,,,,
"ठीक है।
" प्रतिमा ने मन ही मन हज़ारों गालियाॅ दी उसे किन्तु प्रत्यक्ष में कहा__"तुम्हें तो मेरा यानी अपनी बड़ी बहन का प्यार भी कुछ और लगता है।"
"ऐसा नहीं है दीदी।" आप तो बेवजह ही नाराज़ हो रहीं हैं।"
"रहने दो।" प्रतिमा ने छोटे बच्चे की तरह तुनक कर कहा__"सब जानती हूॅ मैं।"
तब तक चाय बन चुकी थी। करुणा ने चाय को दो कप में डाला तथा एक कप करुणा को थमाया और एक कप खुद लेकर उसे धीरे धीरे पीने लगी। जबकि प्रतिमा के मन में यही चल रहा था कि 'आज फिर एक बार मेरी कोशिश बेकार रही।'
अब आगे,,,,,,,,
उधर मुम्बई में इस वक्त ड्राइंग रूम में रखे सोफों पर क्रमशः जगदीश ओबराय, विराज, गौरी तथा निधी आदि बैठे हुए थे।
"इस सब की क्या ज़रूरत है अंकल?" विराज ने कहा__"आप जानते हैं कि जीवन में मेरा सिर्फ एक ही मकसद है और वो है अजय सिंह का खात्मा। मैं अपने इस मकसद को पूरा करने के लिए अब किसी भी प्रकार का ब्यवधान नहीं चाहता।"
"जगदीश भैया ठीक ही कह रहे हैं बेटे।" गौरी ने समझाने वाले लहजे से कहा__"उच्च शिक्षा का होना भी ज़रूरी है। इस लिए तुम अपनी पढ़ाई को भी पूरा करो। हम में से कोई तुम्हें ये नहीं कह रहा कि तुम अपने मकसद से पीछे हटो, बल्कि वो तो तुम्हारा अब प्रण बन गया है उसे तुम ज़रूर पूरा करो। लेकिन साथ साथ अपनी पढ़ाई भी करते रहोगे तो कुछ ग़लत नहीं हो जाएगा।"
"हाॅ भइया।" निधि ने विराज के दाहिने बाजू को मजबूती से पकड़ते हुए कहा__"माॅ और अंकल सही कह रहें हैं आपको अपनी पढ़ाई कान्टीन्यू रखनी चाहिए। और फिर हम दोनों साथ में ही काॅलेज जाया करेंगे। कालेज में अगर मुझे कोई छेड़े तो आप उसकी जम कर धुनाई भी किया करना बिलकुल फिल्म के हीरो की तरह, हाॅ नहीं तो।"
"गुड़िया ने भी कह दिया तो ठीक है अंकल मैं अपनी पढ़ाई जारी करता हूॅ।" विराज ने निधि के सिर पर प्यार से हाॅथ फेर कर कहा__"मैं कल ही किसी मेडिकल काॅलेज में एडमीशन करवा लेता हूॅ।"
"उसकी ज़रूरत नहीं है बेटे।" जगदीश ने हॅस कर कहा__"मैंने आलरेडी तुम्हारा एडमीशन एक बढ़िया से मेडिकल काॅलेज में करवा दिया है।"
"क् क्या???" विराज ने चौंकते हुए कहा।
"हाॅ बेटे।" जगदीश ने हॅस कर कहा__"मुझे पता था कि तुम्हें इसके लिए मानना ही पड़ेगा, इस लिए मैंने पहले ही तुम्हारा एडमीशन करवा दिया है। कल कालेज जा कर सबसे पहले प्रिंसिपल से मिल लेना। दरअसल एडमीशन तो मैंने करवा दिया है किन्तु फार्म वगैरा में साइन तो तुम्हारे ही लगेंगे न। इस लिए जा कर पहले ये सब क्लियर कर लेना। बाॅकी किसी चीज़ की फिक्र मत करना। यूॅ समझना कि अपना ही काॅलेज है।"
"शुक्रिया अंकल।" विराज एकाएक सहसा गंभीर हो गया__"आपने इतना कुछ हमारे लिए कर दिया है जिसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता।
आप हमारे जीवन में भगवान बन कर आए हैं वर्ना हर चीज़ से बेबस व लाचार हम आखिर क्या कर पाते?? ये मेरे ऊपर आपका कर्ज़ है जिसे मैं किसी भी जनम में उतार नहीं सकता।"
"ये सब कह कर तुमने मुझे पराया कर दिया बेटे।" जगदीश भावुक होकर बोला था__"जबकि मैं तुम सबको अपना परिवार ही मानने लगा हूॅ।"
"नहीं अंकल।" विराज सोफे से उठ कर तुरंत ही जगदीश के पैर पकड़ लिया, बोला__"मेरे कहने का मतलब वो नहीं था। आप पराए कैसे हो जाएंगे भला? आप हमारे लिए पराए हो भी नहीं सकते हैं। आप तो अपने व पराए से परे हैं अंकल। आप इस कलियुग के अद्वतीय इंसान हैं जिनके अंदर सिर्फ और सिर्फ नेकदिली और सच्चाई है।"
"ये सच है भैया।" गौरी की आॅखों में आॅसू थे, बोली__"आप हमारे लिए अपनों से भी बढ़ कर हैं, अपने कैसे होते हैं ये भी हमने देखा है मगर आप ग़ैर होकर भी अपने से बढ़ कर हैं। राज तो नासमझ है आप उसकी बात पर ये बिलकुल न समझें कि हम आपको पराया समझते हैं। बल्कि अगर दिल की सच्चाई बताऊॅ तो वो ये है कि अब आपके लिए अपनी जान तक कुर्बान करने का मन करने लगा है। हमारे ह्रदय में आपका स्थान बहुत ऊॅचा है भैया...बहुत ऊॅचा।"
"तुमने ये सब कह कर मुझे वो खुशी दी है बहन जो संसार भर की दौलत मिल जाने पर भी न होती।" जगदीश ने अपनी आॅखों में छलक आए आॅसुओं को पोंछते हुए कहा__"इसके पहले ऐसा लगता था जैसे ये संसार महज एक कब्रिस्तान है जहाॅ कोई इंसान तो क्या परिंदा तक नहीं है। कदाचित् सब कुछ खोकर और अकेलेपन में ऐसा ही महसूस होता है। मगर तुम सबके आ जाने से ये वीरान सा जीवन जैसे फिर से हरा भरा और खुशहाल हो गया है।"
"मैं तो आपको अपने भाई के रूप में पाकर धन्य ही हो गई हूॅ भैया।" गौरी ने कहा__"मेरा अपना कोई भाई न था, एक भाई के लिए तथा उसकी कमी से हमेशा दिल में दर्द रहा था। आपके मिलने से अब मन को त्रप्ति मिल गई है।"
"ये सब ईश्वर की ही कृपा है बहन।" जगदीश ने कहा__"वो जो भी करता है बहुत कुछ सोच कर ही करता है। इसके पहले कौन किसे जानता था किन्तु आज ऐसा है जैसे हम सब कभी गैर थे ही नहीं। सच कहता हूॅ बहन ईश्वर की इस इनायत से बहुत खुश हूॅ मैं।"
"अच्छा अब बहुत हो गया ये इमोशनल ड्रामा।" निधि ने भोलेपन से कहा__"कुछ खाने पीने की बात कीजिए न। मेरे पेट में पता नहीं कितने चूहे हैं जो काफी देर से उछल कूद कर रहे हैं। आप में से किसी को इसका खयाल ही नहीं है....जाओ नहीं बात करना किसी से अब, हाॅ नहीं तो।"
"चूहे तो मेरे पेट में भी कूद रहे हैं गुड़िया।" विराज ने अजीब सा मुह बना कर कहा__"मुझे भी किसी से बात नहीं करना अब, हाॅ नहीं तो।"
"क्या??????" निधि उछल पड़ी__"आपने मेरी नकल की? मतलब आपने मुझे चिढ़ाया? जाओ आपसे तो बिलकुल बात नहीं करनी, हाॅ नही तो।"
"ठीक है फिर।" विराज ने सोफे पर से उठते हुए कहा__"मैं अकेले ही चला जाता हूॅ आइसक्रीम खाने।"
"नननहीहीं।
" निधि चीखी और उछल कर फौरन ही खड़ी हो गई__"आप अकेले आइसक्रीम खाने नहीं जा सकते मैं भी चलूॅगी आपके साथ और अगर आप अपने साथ मुझे न ले गए तो सोच लीजिएगा, हाॅ नहीं तो।"
"जो मुझसे बात नहीं करता मैं उसे अपने साथ कहीं नहीं लेकर जाता।" विराज ने अकड़ते हुए कहा__"तुम मुझसे बात नहीं कर रही तो तुम्हें अपने साथ लेकर क्यों जाऊॅ??"
"अरे मैं तो ऐसे ही कह रही थी।" निधि ने चापलूसी वाले अंदाज़ में कहा__"और वैसे भी मैं आपकी जान हूॅ न? आप अपनी जान के बिना कैसे चले जाएॅगे, हाॅ नहीं तो।"
"कोई कहीं नहीं जाएगा।" गौरी ने कहा__"चुप चाप बैठो दोनो, मैं खाना लेकर आती हूॅ।"
"नहीं नहीं।" निधि ने बच्चों की तरह कूदते हुए इंकार किया__"मुझे आइसक्रीम ही खाना है, हाॅ नहीं तो।"
"हा हा हा इन्हें जाने दो बहन।" जगदीश ने हॅसते हुए कहा__"जाओ बेटे, तुम गुड़िया को आइसक्रीम खिला कर आओ।"
"भैया आप नहीं जानते हैं।" गौरी ने जगदीश से कहा__"इसे आइसक्रीम की लत फिर से पड़ जाएगी। पहले ये बिना आइसक्रीम के एक दिन नहीं रहती थी। बड़ी मुश्किल से तो इसकी आइसक्रीम छूटी है।"
"एक दिन में कुछ नहीं होता।" जगदीश ने गौरी से कहने के बाद निधि की तरफ मुखातिब हो कर कहा__"और हाॅ बेटी, ज्यादा आइसक्रीम मत खाना। सेहत के लिए अच्छी नहीं होती।"
"जी अंकल।" कहने के साथ ही निधि ने विराज का बाजू पकड़ा और बाहर की तरफ खींचते हुए ले जाने लगी।
..................
दूसरे दिन विराज काॅलेज पहुॅचा। निधि उसके साथ ही थी। हलाॅकि ये उसका काॅलेज नहीं था किन्तु फिर भी उत्सुकतावश वह विराज के साथ ज़िद करके आई थी।
काॅलेज को देखकर दोनो भाई बहन चकित रह गए। विराज की आॅखों में जाने क्या सोच कर आॅसू आ गए जिसे उसने बड़ी ही सफाई से पोंछ लिया था। निधि तो कालेज की खूबसूरती में ही खोई हुई थी।
कुछ देर काॅलेज को देखने के बाद विराज निधि के साथ कालेज के अंदर गया। कालेज में थोड़ी देर इधर उधर घूमने के बाद निधि को विराज ने कालेज की कन्टीन में बैठा कर खुद प्रिंसिपल से मिलने उसके आफिस की तरफ बढ़ गया।
रास्ते में एक आदमी से उसने प्रिंसिपल का आफिस पूॅछा और आगे बढ़ गया। कुछ देर बाद ही वह प्रिंसिपल के आफिस में प्रिंसिपल के सामने खड़ा था। उसने अपना नाम बताया, हलाॅकि जगदीश ओबराय ने सबकुछ पहले ही सेट कर दिया था। इस लिए विराज को ज्यादा परेशानी नहीं हुई।
सारी फारमेलिटी पूरी करने के बाद तथा अपने कोर्स से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण जानकारी लेने के बाद वह प्रिंसिपल के आफिस से बाहर आकर कालेज की कन्टीन की तरफ बढ़ गया। कन्टीन से निधि को साथ लेकर वह कालेज से बाहर आ गया।
"तो आख़िर आपको आपके पसंद का काॅलेज मिल ही गया न भइया?" रास्ते में बाइक पर पीछे बैठी निधि ने विराज से सट कर तथा विराज के कान के पास मुह ले जाकर बोली__"एक ऐसा काॅलेज जिसमें पढ़ने की कभी आपने तमन्ना की थी, और आज जब आपकी तमन्ना पूरी हुई तो आपकी आॅखों से आॅसू छलक पड़े। है न ?"
"न नहीं तो।" बाइक चला रहा विराज निधि की बात पर बुरी तरह चौंका था, बोला__"ऐसा कुछ नहीं है।"
"आप समझते हैं कि।" निधि ने कहा__"मुझे कुछ पता ही नहीं चला जबकि मैंने अपनी आॅखों से देखा भी और दिल से महसूस भी किया।"
"बहुत बड़ी बड़ी बातें करने लगी है गुड़िया।" विराज ने हॅस कर कहा__"ऐसी जैसे कि कोई सयाना हो जाने पर करता है।"
"हाॅ तो मैं बड़ी हो गई न।" निधि ने भोलेपन से कहा__"आपने देखा था न उस दिन? मैं आपके कंधे से थी, और अब कुछ दिन बाद आपके काॅन से भी हो जाऊॅगी..देख लीजिएगा, हाॅ नहीं तो।"
"हाॅ तू तो कुछ दिन में मेरे सिर के ऊपर से भी निकल जाएगी गुड़िया।" विराज ने हॅसते हुए कहा।
"मुझे ऐसा क्यों लगता है जैसे ये कह कर आपने मेरा मज़ाक उड़ा दिया है?" निधि ने सोचने वाले भाव से कहा__"और अगर ऐसा ही है तो बहुत गंदे हैं आप। जाइए नहीं बात करना अब आपसे, हाॅ नहीं तो।"
"अरे ये क्या बात हुई गुड़िया??" विराज बुरी तरह हड़बड़ा गया।
"बात मत कीजिए अब।" निधि जो अब तक विराज से चिपकी हुई थी अब पीछे हट गई, फिर बोली__"वैसे तो बड़ा कहते हैं कि मैं आपकी जान हूॅ, और अब अपनी ही जान का मज़ाक उड़ा रहे हैं, हाॅ नहीं तो।"
"अच्छा बाबा ग़लती हो गई।" विराज ने खेद भरे स्वर में कहा__"क्या अपने भइया को माफ़ नहीं करेगी गुड़िया??"
"अब आप माफ़ी मत माॅगिए।" निधि तुरंत ही खिसक कर विराज से फिर चिपक गई__"मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता।"
"तू सचमुच मेरी जान है गुड़िया।" विराज ने भावुक होकर कहा__"तेरी एक पल की भी बेरुखी मैं सह नहीं सकता। मुझसे अगर कोई ग़लती हो जाए तो तू मुझे उसकी सज़ा दे देना लेकिन न ही कभी मुझसे नाराज़ होना और न ही ये कहना कि मुझसे बात नहीं करना।"
"भइया...।" निधि की रुलाई फूट गई, उसने अपने दोनो हाॅथ विराज के दोनो साइड से निकाल कर विराज के पेट पर कस लिया। फिर बोली__"आपसे नाराज़ होकर या आपसे बात न करके क्या मैं भी एक पल रह पाउॅगी? अगर मैं आपकी जान हूॅ तो आप भी तो मेरी जान हैं भइया।"
"चल अब तू रो मत गुड़िया।" विराज ने माहौल को बदलने की गरज से कहा__"हम दुकान के पास आ गए हैं। यहां पर मुझे कुछ किताबें वगैरा लेनी हैं। तू बता तुझे क्या चाहिए?"
"मुझे न।" निधि ने खुशी से कहा__"मुझे न एक टच स्क्रीन वाला मोबाइल लेना है और हाॅ आप भी टच स्क्रीन वाला मोबाइल ले लीजिए। ये की-पैड को अब रिटायर कर दीजिए, हाॅ नहीं तो।"
"क्यों अच्छा तो है ये मोबाइल।" विराज ने कहा__"इसमें क्या खराबी है भला? तुझे पता है इसकी बैटरी हप्तों तक चलती है।"
"मैं कुछ नहीं जानती।
" निधि ने कहा__"मैंने कह दिया है कि लेना है तो लेना है बस, हाॅ नहीं तो।"
"अब तो लेना ही पड़ेगा।" विराज ने मुस्कुरा कर कहा__"मेरी गुड़िया, मेरी जान ने कह दिया है तो।"
"हाॅ नहीं तो।" निधि खुश हो गई।
"चलो पहले मोबाइल ही ले लेते हैं।" विराज ने कहा__"उसके बाद किताबें खरीद लूॅगा।"
ये कह विराज ने बाइक को मोबाइल स्टोर की तरफ मोड़ लिया। लगभग पाॅच मिनट बाद ही वो दोनो मोबाइल स्टोर में थे।
"गुड़िया।" विराज ने धीरे से कहा__"किस कंपनी का लेना है मोबाइल और कितने रुपये वाला??"
"मैं क्या बताऊॅ?" निधि ने भी विराज की तरह धीरे से ही कहा__"मुझे इस बारे में तो वैसे भी कुछ नहीं पता।"
"फिर अब क्या करें??" विराज ने कहा__"ये तो कमाल ही हो गया गुड़िया। मोबाइल खरीदने आ गए हैं लेकिन हमें यही पता नहीं है कि कौन सी कंपनी का तथा कितने रुपये तक का मोबाइल लेना है?"
"दुकान वाले से पूॅछ लेते हैं न।" निधि ने बुद्धि दी__"उसे तो सब कुछ पता ही होगा।"
"अरे हाॅ गुड़िया।" विराज ने अपने सिर में हाॅथ की थपकी लगा कर कहा__"ये तो मैने सोचा ही नहीं था। अच्छा हुआ तुमने बता दिया वर्ना यहाॅ से वापस जाना पड़ता। है न???"
"अब ज्यादा ड्रामा मत कीजिए।" निधि ने हॅस कर कहा__"मुझे पता है आप बुद्धू बनने का नाटक कर रहे हैं।"
"मतलब तूने पकड़ लिया??" विराज मुस्कुराया।
"और नहीं तो क्या।" निधि हॅसी__"सरलाॅक होम्स एक ज़माने में हमसे जासूसी की ट्रेनिंग लेने आता था, हाॅ नहीं तो।"
"एक्सक्यूज़मी सर।" तभी सहसा उन लोगों के पास शोरूम का एक ब्यक्ति आकर बोला__"व्हाट कैन आई हेल्प यू??"
"हमें किसी अच्छी कंपनी का सबसे अच्छा मोबाइल या आईफोन दिखाइए।" विराज ने उस ब्यक्ति से कहा।
उस ब्यक्ति ने आज के चलन के हिसाब से कई तरह के मोबाइल लाकर टेबल पर रख दिया तथा उन डिब्बों पर लिखी बातों को बता बता कर मोबाइल फोन की खासियत बताने लगा। फिर उसने आईफोन के कुछ सेट दिखाने लगा।
लगभग आधे घंटे बाद दोनो ही शोरूम से बाहर निकले। उन दोनों के हाॅथ में एक एक मोबाइल था।
"भइया आप मुझे सिखा दीजियेगा कि कैसे चलाते हैं??" निधि ने रास्ते में कहा।
"ठीक है गुड़िया।" विराज ने कहा__"चल अभी किताबें भी लेना है।"
"वैसे आपका काॅलेग कब से शुरू होगा?" निधि ने पूॅछा।
"एक हप्ते बाद।" विराज ने कहा।
"भइया मुझे भी आपके साथ इसी काॅलेज में पढ़ना है।" निधि ने कहा।
"अगले साल से तू भी इसी कालेज में आ जाना।" विराज ने कहा।
ऐसी ही बातें करते हुए दोनो बहन भाई बाइक से घर पहुॅच गए। विराज अपने मन पसंद कालेज में पढ़ने से बेहद खुश था। मगर वह नहीं जानता था कि अब आगे क्या होने वाला था??????
दोस्तो, अपडेट हाज़िर है,,,
आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा,,,,,,,
अपडेट.........《 13 》
अब तक,,,,,,
"भइया आप मुझे सिखा दीजियेगा कि कैसे चलाते हैं??" निधि ने रास्ते में कहा।
"ठीक है गुड़िया।
" विराज ने कहा__"चल अभी किताबें भी लेना है।"
"वैसे आपका काॅलेग कब से शुरू होगा?" निधि ने पूॅछा।
"एक हप्ते बाद।" विराज ने कहा।
"भइया मुझे भी आपके साथ इसी काॅलेज में पढ़ना है।" निधि ने कहा।
"अगले साल से तू भी इसी कालेज में आ जाना।" विराज ने कहा।
ऐसी ही बातें करते हुए दोनो बहन भाई बाइक से घर पहुॅच गए। विराज अपने मन पसंद कालेज में पढ़ने से बेहद खुश था। मगर वह नहीं जानता था कि अब आगे क्या होने वाला था??????
अब आगे,,,,,,,
उस वक्त रात के एक बज रहे थे। अजय सिंह अपने कमरे में अपनी बीवी प्रतिमा के साथ घमासान सेक्स करने में ब्यस्त था। दोनो ही मादरजात नंगे थे। इस वक्त अजय सिंह प्रतिमा को पिछवाड़े से ठोंके जा रहा था।
"ले मेरी जान और ले।" अजय सिंह प्रतिमा को घोड़ी बनाकर तथा एक हाॅथ से उसके सिर के बाल पकड़े उसके पिछवाड़े में दनादन पेलते हुए बोला__"अपने पिछवाड़े को और टाइट कर मेरी रंडी साली।"
"आहहहहह ऐसे ही आआआहहहह और जोर से अंदर तक घुसा न भड़वे साले।" प्रतिमा मजे में बोलती जा रही थी__"आआहहह हाॅ ऐसे ही..हुमच हुमच के बजा मेरी गाॅड को वर्ना तेरे लंड को काट कर फेंक दूॅगी आआआहहहहह।"
"साली मेरा लंड काट कर फेंक देगी तो फिर किससे अपनी चूॅत और गाॅड मरवाएगी बोल मादरचोद साली रंडी?"अजय सिंह ने प्रतिमा के गोरे गोरे किन्तु गद्देदार गाॅड पर जोर से थप्पड़ मारते हुए कहा।
"आआआहहहह उसकी चिंता तू मत कर अजय सिंह।" प्रतिमा ने कहा__"दुनियाॅ बहुत बड़ी है, जिसको भी अपनी चूत और गाॅड दिखाऊॅगी वो साला कुत्ते की तरह अपनी लार टपकाते हुए दौड़ा चला आएगा।"
"अच्छा....मतलब तू सारी दुनिया से अपनी चूत और गाॅड मरवा लेगी?" अजय सिंह ने फिर से उसके पिछवाड़े पर जोर से थप्पड़ मारते हुए कहा__"और किस किस से मरवाएगी साली?"
"आआआहहहह और जोर से पेल न भड़वे की औलाद साले दम नहीं है क्या?" प्रतिमा ने अपने सिर को उठा पीछे अजय सिंह की तरफ देख कर कहा__"मैं तो विजय से भी अपनी चूत और गाॅड मरवाना चाहती थी और इसके लिए मैंने कितनी कोशिश की, मगर वो हरामी साला हरिश्चंद्र था न। उसने हर बार मुझे इज्जत मर्यादा का पाठ पढ़ा कर दुत्कार दिया। मेरे जैसी खूबसूरत सेक्सी औरत को दुत्कार दिया था उस हिंजड़े ने। आआहहहह तभी तो मर गया हरामी।"
"अरे सही सही बोल कुतिया।" अजय सिंह ने प्रतिमा की गाॅड से अपने हथियार को निकाल कर उसे पलटा कर बिस्तर पर सीधा लेटाया और फिर उसकी दोनो टाॅगों को उठा कर प्रतिमा के सिर के दोनो तरफ झुका दिया जिससे उसका पिछवाड़ा अच्छे से उठकर पोजीशन में आ गया। अजय सिंह ने फिर से उसकी गाॅड में लंड डाल कर पेलना शुरू कर दिया।
"आआहहहह हाॅ सही से ही तो बोल रही हूॅ आआआहहह।" प्रतिमा ने मजे में आहें भरकर कहा।
"सही सही कहाॅ बोल रही है साली?" अजय सिंह अपने एक हाॅथ से प्रतिमा की एक चूॅची को जोर से मसल कर कहा__"मेरा भाई क्या ऐसे ही मर गया था??"
"आआआहहहह और जोर जोर से मसल न साले भड़वे।" प्रतिमा ने अपने एक हाॅथ को नीचे से बढ़ा कर अपनी चूॅत के दाने को मसलते हुए मजे में कहा__"आआआहहहह हाॅ ऐसे ही...हाय इस मज़े के लिए तो मैं सबकी रंडी बनने को तैयार हूॅ अजय। मेरी वो ख्वाहिश कब पूरी करोगे तुम??"
"कर दूॅगा मेरी जान।" अजय सिंह झुक कर प्रतिमा के होठों पर एक जोरदार चुंबन लिया फिर बोला__"मुझे याद है....तेरी ख्वाहिश...कि तू तीन तीन लंड से एक साथ मज़े करना चाहती है...अपने सभी छेंद पर एक साथ लंड डलवाना चाहती है। रुक जा कुछ दिन करता हूॅ कुछ। मगर पहले ये तो बता कि कैसे मेरा भाई मर गया था?"
"आआआहहहहहह मरना ही था उस कमीने को..आआहहह मेरी बात मान लेता तो आज ज़िंदा होता और ऐस भी करता। मगर सत्यवादी बने रह कर मर जाना ही नियति में लिखा लिया था उसने....आआआहहह मगर एक बात है उसका लंड तुमसे भी बड़ा था..पूरा का पूरा साॅड था वो।"
"तुमने कब देखा उसके लंड को?" अजय सिंह ने एक पल रुक कर पूछा और फिर से धक्के लगाने लगा।
"आआआहहह एक दिन दोपहर में खेत पर गई थी अपनी गरमा गरम चूत लेकर।" प्रतिमा ने कहा__"सोच लिया था कि आज इस कमीने से अपनी चूत और गाॅड दोनो मरवा कर ही जाऊॅगी। उस समय खेत मे कोई नहीं था। खेत के मकान के एक कमरे में वो विजय कमीना दोपहर को आराम फरमा रहा था। मैं चुपके से अंदर कमरे मे पहुॅची...आआआहहहह....देखा तो वो गहरी नींद में सोया हुआ नज़र आया। बदन में ऊपर एक बनियान तथा नीचे लुंगी लगा रखी थी उसने। मुझे लगा इससे बढ़िया सुनहरा मौका इससे चुदने का फिर नहीं मिलेगा। ये सोचकर मैंने जल्दी से अपने बदन से सारे कपड़े उतार कर नंगी हो गई और चुपके से विजय की तरफ बढ़ी जो पास ही चारपाई पर सोया हुआ था।"
"क्या हुआ रुक क्यों गई?" अजय सिंह प्रतिमा के एकाएक चुप हो जाने पर कहा__"आगे क्या हुआ था फिर??"
"तुम रुक गए तो मैं भी रुक गई।" प्रतिमा ने कहा__"तुम मेरी कुटाई करते रहो...तभी तो मजे में बताऊगी न।"
"ओह हाॅ।" अजय सिंह चौंका और फिर से धक्के लगाते हुए बोला__"अब बताओ।"
"आआहहहहह हाॅ ऐसे ही आआआहहह जोर जोर से चोदो मुझे।" प्रतिमा ने मजे से आंखें बंद करते हुए कहा__"विजय चारपाई पर चूॅकि गहरी नींद में सोया हुआ था इस लिए उसे ये पता नहीं चला कि उसके कमरे में कौन क्या करने आया है? मैं उसके हट्टे कट्टे शरीर को देख कर आहें भरने लगी थी। चारपाई के पास पहुॅच कर मैंने दोनों हाॅथों से विजय की लुंगी को उसके छोरों से पकड़ कर आहिस्ता से इधर और उधर किया। जिससे विजय के नीचे वाला हिस्सा नग्न हो गया। लुंगी के अंदर उसने कुछ नहीं पहन रखा था। मैंने देखा गहरी नींद में उसका घोंड़े जैसा लंड भी गहरी नींद में सोया पड़ा था।
लेकिन उस हालत में भी वह लम्बा चौड़ा नज़र आ रहा था। उसका लंड काला या साॅवला बिलकुल नहीं था बल्कि गोरा था बिलकुल अंग्रेजों के लंड जैसा गोरा। कसम से अजय उसे देख कर मेरे मुॅह में पानी आ गया था। मैंने बड़ी सावधानी से उसे अपने दाहिने हाॅथ से पकड़ा। उसको इधर उधर से अच्छी तरह देखा। वो बिलकुल किसी मासूम से छोटे बच्चे जैसा सुंदर और प्यारा लगा मुझे। मैंने उसे मुट्ठी में पकड़ कर ऊपर नीचे किया तो उसका बड़ा सा सुपाड़ा जो हल्का सिंदूरी रंग का था चमकने लगा और साथ ही उसमें कुछ हलचल सी महसूस हुई मुझे। मैंने ये महसूस करते ही नज़र ऊपर की तरफ करके गहरी नींद में सोये पड़े विजय की तरफ देखा। वो पहले की तरह ही गहरी नींद में सोया हुआ लगा। मैंने चैन की साॅस ली और फिर से अपनी नज़रें उसके लंड पर केंद्रित कर दी। मेरे हाॅथ के स्पर्श से तथा लंड को मुट्ठी में लिए ऊपर नीचे करने से लंड का आकार धीरे धीरे बढ़ने लगा था। ये देख कर मुझमें अजीब सा नशा भी चढ़ता जा रहा था, मेरी साॅसें तेज़ होने लगी थी। मैंने देखा कि कुछ ही पलों में विजय का लंड किसी घोड़े के लंड जैसा बड़ा होकर हिनहिनाने लगा था। मुझे लगा कहीं ऐसा तो नहीं कि विजय जाग रहा हो और ये देखने की कोशिश कर रहा हो कि उसके साथ आगे क्या क्या होता है? मगर मुझे ये भी पता था कि अगर विजय जाग रहा होता तो इतना कुछ होने ही न पाता क्योंकि वह उच्च विचारों तथा मान मर्यादा का पालन करने वाला इंसान था। वो कभी किसी को ग़लत नज़र से नहीं देखता था, ऐसा सोचना भी वो पाप समझता था। मेरे बारे में वो जान चुका था कि मैं क्या चाहती हूॅ उससे इस लिए वो हवेली में अब कम ही रहता था। दिन भर खेत में ही मजदूरों के साथ वक्त गुज़ार देता था और देर रात हवेली में आता तथा खाना पीना खा कर अपने कमरे में गौरी के साथ सो जाता था। वह मुझसे दूर ही रहता था। इस लिए ये सोचना ही ग़लत था कि इस वक्त वह जाग रहा होगा। मैंने देखा कि उसका लंड मेरी मुट्ठी में नहीं आ रहा था तथा गरम लोहे जैसा प्रतीत हो रहा था। अब तक मेरी हालत उसे देख कर खराब हो चुकी थी। मुझे लग रहा था कि जल्दी से उछल कर इसको अपनी चूत के अंदर पूरा का पूरा घुसेड़ लूॅ। किन्तु जल्दबाजी में सारा खेल बिगड़ जाता इस लिए अपने पर नियंत्रण रखा और उसके सुंदर मगर बिकराल लंड को मुट्ठी में लिए आहिस्ता आहिस्ता सहलाती रही। उसको अपने मुह में भर कर चूसने के लिए मैं पागल हुई जा रही थी, जिसका सबूत ये था कि मैं अपने एक हाथ से कभी अपनी बड़ी बड़ी चूचियों को मसलने लगती तो कभी अपनी चूॅत को। मेरे अंदर वासना अपने चरम पर पहुॅच चुकी थी। मुझसे बरदास्त न हुआ और मैंने एक झटके से नीचे झुक कर विजय के लंड को अपने मुह में भर लिया....और यही मुझसे ग़लती हो गई। मैंने ये सब अपने आपे से बाहर हो कर किया था।
विजय का लंड जितना बड़ा था उतना ही मोटा भी था। मैंने जैसे ही उसे झटके से अपने मुह में लिया तो मेरे ऊपर के दाॅत तेज़ी से लंड में गड़ते चले गए और विजय के मुख से चीख निकल गई साथ ही वह हड़बड़ा कर तेज़ी से चारपाई पर उठ कर बैठ गया। अपने लंड को मेरे मुख में देख वह भौचक्का सा रह गया किन्तु तुरंत ही वह मेरे मुह से अपना लंड निकाल कर तथा चारपाई से उतरकर दूर खड़ा हो गया। उसका चेहरा एक दम गुस्से और घ्रणा से भर गया। ये सब इतना जल्दी हुआ कि कुछ देर तो मुझे कुछ समझ ही न आया कि ये क्या और कैसे हो गया। होश तो तब आया जब विजय की गुस्से से भरी आवाज़ मेरे कानों से टकराई।
"ये क्या बेहूदगी है?" विजय लुंगी को सही करके तथा गुस्से से दहाड़ते हुए कह रहा था__"अपनी हवस में तुम इतनी अंधी हो चुकी हो कि तुम्हें ये भी ख़याल नहीं रहा कि तुम किसके साथ ये नीच काम कर रही हो? अपने ही देवर से मुह काला कर रही हो तुम। अरे देवर तो बेटे के समान होता है ये ख़याल नहीं आया तुम्हें?"
मैं चूॅकि रॅगे हाॅथों ऐसा करते हुए पकड़ी गई थी उस दिन इस लिए मेरी ज़ुबान में जैसे ताला सा लग गया था। उस दिन विजय का गुस्से से भरा वह खतरनाक रूप मैंने पहली बार देखा था। वह गुस्से में जाने क्या क्या कहे जा रहा था मगर मैं सिर झुकाए वहीं चारपाई के नीचे बैठी रही उसी तरह मादरजात नंगी हालत में। मुझे ख़याल ही नहीं रह गया था कि मैं नंगी ही बैठी हूॅ। जबकि,,,
"आज तुमने ये सब करके बहुत बड़ा पाप किया है।" विजय कहे जा रहा था__"और मुझे भी पाप का भागीदार बना दिया। क्या समझता था मैं तुम्हें और तुम क्या निकली? एक ऐसी नीच और कुलटा औरत जो अपनी हवस में अंधी होकर अपने ही देवर से मुह काला करने लगी। तुम्हारी नीयत का तो पहले से ही आभास हो गया था मुझे इसी लिए तुमसे दूर रहा। मगर ये नहीं सोचा था कि तुम अपनी नीचता और हवस में इस हद तक भी गिर जाओगी। तुममें और बाज़ार की रंडियों में कोई फर्क नहीं रह गया अब। चली जाओ यहाॅ से...और दुबारा मुझे अपनी ये गंदी शकल मत दिखाना वर्ना मैं भूल जाऊॅगा कि तुम मेरे बड़े भाई की बीवी हो। आज से मेरा और तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं...अब जा यहाॅ से कुलटा औरत...देखो तो कैसे बेशर्मों की तरह नंगी बैठी है?"
विजय की बातों से ही मुझे ख़याल आया कि मैं तो अभी नंगी ही बैठी हुई हूॅ तब से। मैंने सीघ्रता से अपनी नग्नता को ढॅकने के लिए अपने कपड़ों की तरफ नज़रें घुमाई। पास में ही मेरे कपड़े पड़े थे। मैंने जल्दी से अपनी साड़ी ब्लाउज पेटीकोट तथा ब्रा पैन्टी को समेटा किन्तु फिर मेरे मन में जाने क्या आया कि मैं वहीं पर रुक गई।
विजय की बातों ने मेरे अंदर ज़हर सा घोल दिया था। जो हमेशा मुझे इज्ज़त और सम्मान देता था आज वही मुझे आप की जगह तुम और तुम के बाद तू कहते हुए मेरी इज्ज़त की धज्जियाॅ उड़ाए जा रहा था।
मुझे बाजार की रंडी तक कह रहा था। मेरे दिल में आग सी धधकने लगी थी। मुझे ये डर नहीं था कि विजय ये सब किसी से बता देगा तो मेरा क्या होगा। बल्कि अब तो सब कुछ खुल ही गया था इस लिए मैंने भी अब पीछे हटने का ख़याल छोंड़ दिया था।
मैने उसी हालत में खिसक कर विजय के पैर पकड़ लिए और फिर बोली__"तुम्हारे लिए मैं कुछ भी बनने को तैयार हूॅ विजय। मुझे इस तरह अब मत दुत्कारो। मैं तुम्हारी शरण में हूॅ, मुझे अपना लो विजय। मुझे अपनी दासी बना लो, मैं वही करूॅगी जो तुम कहोगे। मगर इस तरह मुझे मत दुत्कारो...देख लो मैंने ये सब तुम्हारा प्रेम पाने के लिए किया है। माना कि मैंने ग़लत तरीके से तुम्हारे प्रेम को पाने की कोशिश की लेकिन मैं क्या करती विजय? मुझे और कुछ सूझ ही नहीं रहा था। पहले भी मैंने तुम्हें ये सब जताने की कोशिश की थी लेकिन तुमने समझा ही नहीं इस लिए मैंने वही किया जो मुझे समझ में आया। अब तो सब कुछ जाहिर ही हो गया है,अब तो मुझे अपना लो विजय...मुझे तुम्हारा प्यार चाहिए।"
"बंद करो अपनी ये बकवास।" विजय ने अपने पैरों को मेरे चंगुल से एक झटके में छुड़ा कर तथा दहाड़ते हुए कहा__"तुझ जैसी गिरी हुई औरत के मैं मुह नहीं लगना चाहता। मुझे हैरत है कि बड़े भइया ने तुझ जैसी नीच और हवस की अंधी औरत से शादी कैसे की? ज़रूर तूने ही मेरे भाई को अपने जाल में फसाया होगा।"
"जो मर्ज़ी कह लो विजय।" मैंने सहसा आखों में आॅसू लाते हुए कहा__"मगर मुझे अपने से दूर न करो। दिन रात तुम्हारी सेवा करूॅगी। मैं तुम्हें उस गौरी से भी ज्यादा प्यार करूॅगी विजय।"
"ख़ामोशशशश।" विजय इस तरह दहाड़ा था कि कमरे की दीवारें तक हिल गईं__"अपनी गंदी ज़ुबान से मेरी गौरी का नाम भी मत लेना वर्ना हलक से ज़ुबान खींचकर हाॅथ में दे दूॅगा। तू है क्या बदजात औरत...तेरी औकात आज पता चल गई है मुझे। तेरे जैसी रंडियाॅ कौड़ी के भाव में ऐरों गैरों को अपना जिस्म बेंचती हैं गली चौराहे में। और तू गौरी की बात करती है...अरे वो देवी है देवी...जिसकी मैं इबादत करता हूॅ। तू उसके पैरों की धूल भी नहीं है समझी?? अब जा यहाॅ से वर्ना धक्के मार कर इसी हालत में तुझे यहाॅ से बाहर फेंक दूॅगा।"
मैं समझ चुकी थी कि मेरी किसी भी बात का विजय पर अब कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं था। उल्टा उसकी बातों ने मुझे और मेरे अंतर्मन को बुरी तरह शोलों के हवाले कर दिया था। उसने जिस तरीके से मुझे दुत्कार कर मेरा अपमान किया था उससे मेरे अंदर भीषण आग लग चुकी थी और मैंने मन ही मन एक फैंसला कर लिया था उसके और उसके परिवार के लिए।
"ठीक है विजय सिंह।" फिर मैंने अपने कपड़े समेटते हुए ठण्डे स्वर में कहा था__"मैं तो जा रही हूं यहाॅ से मगर जिस तरह से तुमने मुझे दुत्कार कर मेरा अपमान किया है उसका परिणाम तुम्हारे लिए कतई अच्छा नहीं होगा।
ईश्वर देखेगा कि एक औरत जब इस तरह अपमानित होकर रुष्ट होती है तो भविष्य में उसका क्या परिणाम निकलता है??"
इतना कह कर मैं वहाॅ से कपड़े वगैरा पहन कर चली आई थी। फिर उसके बाद क्या हुआ ये तो तुम्हें पता ही है अजय।
"हाॅ मेरी जान।" अजय सिंह जो जाने कब से रुका हुआ था अब फिर से प्रतिमा की गाॅड में लंड डाल कर धक्के लगाने लगा था, बोला__"मेरे कहने पर तुमने इस सबकी कोशिश तो बहुत की मगर वो बेवकूफ का बेवकूफ ही रहा। सोचा था कि मिल बाॅट कर सब खाएंगे पियेंगे मगर उसकी किस्मत में मरना ही लिखा था तो मर गया।"
"आआआआहहहह अब जरा मेरी चूॅत का भी कुछ ख़याल करो।" प्रतिमा ने सहसा सिसकते हुए कहा__"इसके साथ भी इंसाफ करो न आआआहहहह।"
अजय ने प्रतिमा के पिछवाड़े से लंड निकाल कर उसकी चूॅत में एक ही झटके से पेल दिया और दनादन धक्के लगाने लगा।
"आआआहहहहह अअअअजजजयययय ऐसे ही जोर से करते रहो।" प्रतिमा ने आनंद में सिसकते हुए कहा__"आआहह बहुत मज़ा आ रहा है।"
"ले मेरी रंडी और ले।" अजय के धक्कों की रफ्तार बढ़ती जा रही थी__"करुणा की चूॅत और गाॅड कब दिलाओगी यार। अब इंतज़ार नहीं होता मुझसे।"
"आआआआहहह कोशिश तो कर ही रही हूॅ मैं।" प्रतिमा ने कहा__"कल भी गई थी उसके पास। पहले तो कुछ समय के लिए मुझे लगा कि वह शीशे में उतर गई है लेकिन जल्द ही मेरी सारी कोशिशों पर पानी भी फिर गया।"
"मुझे लगता है तुम्हारी सारी कोशिशें यू ही बेकार जाती रहेंगी।" अजय ने जोर का शाॅट मारते हुए कहा__"जबकि मैं अब और इंतज़ार नहीं कर सकता। कसम से जब भी उसे देखता हूॅ तो लगता है कि अभी उसे जबरजस्ती अपने नीचे लेटा कर उसकी चूॅत और गाॅठ की ठोंकाई शुरू कर दूॅ।"
"आआआआहहहहह थोड़ा और जोर से धक्के मारो।" प्रतिमा ने कहा__"ऐसा सोचना भी मत अजय। वो ऐसी वैसी औरत नहीं है। जबरजस्ती करने से मुसीबत भी हो सकती है। अभय को ज़रा भी पता चला तो अंजाम अच्छा नहीं होगा।"
"तो फिर क्या करूॅ मैं?" अजय ने आवेश में कहने के साथ ही पूरी रफ्तार से धक्के लगाने लगा था__"तुमसे तो कुछ हो ही नहीं रहा।"
"आआआआहहहहहह मेरे पपपपास एएएक प्लललान है अजय।" प्रतिमा धक्कों की वजह से बुरी तरह पड़ी पड़ी हिल रही थी__"उससे शायद तुम्हाहाहारा काम होहोहो सकता है।"
"अरे तो जल्दी बताओ न डियर।" अजय सिंह अपने चरम पर पहुॅचते हुए बोला__"क्या प्लान है तुम्हारे पास?"
"आआआआआहहहहह अजय और जोर से करो मैं छूटने वाली हूॅ आआआहह।" प्रतिमा ने कहने के साथ ही जबरदस्त झटका खाया। उसकी कमर कमान की तरह झटके खाते हुए तनी हुई थी और कुछ ही पल में वह शान्त पड़ गई।
"आआआहहह प्रतिमा मैं भी आया।" अजय सिंह भी झड़ते हुए प्रतिमा के ऊपर पसर गया।
अभी ये दोनो अपनी अपनी साॅसें बहाल ही कर रहें थे कि बेड के एक तरफ टेबल पर रखे लैण्डलाइन फोन की घण्टी घनघना उठी। फोन की घण्टी से दोनों ही चौंके।
"इतनी रात को भला किसका फोन हो सकता है?" दोनो के मन में एक ही सवाल उभरा।
"उठ कर देखो न किसका फोन है?" अजय के नीचे दबी प्रतिमा ने कसमसाते हुए कहा।
अजय सिंह किसी तरह उठ कर केड्रिल से रिसीवर को उठाकर काॅन से लगाने के साथ ही कहा__"ह हैलो।"
".............................."
"क क्या???" उधर से कुछ कहा गया जिसे सुन कर अजय बुरी तरह उछल पड़ा था।
".............................."
"ये तुम क्या कह रहे हो?" अजय का चेहरा सफेद फक्क पड़ता चला गया__"और और कैसे हुआ ये सब?"
".............................."
"ओके ओके हम आ रहे हैं।" कहने के साथ ही अजय ने रिसीवर को वापस केड्रिल पर पटका और तुरंत ही उठ कर बाथरूम की तरफ बढ़ गया।
कुछ देर बाद अजय सिंह बाथरूम से हाॅथ मुॅह धोकर निकला और आनन फानन में अपने कपड़े पहने उसने।
"अरे क्या बात है अजय?" प्रतिमा बुरी तरह चौंकते हुए बेड पर उठकर बैठते हुए बोली__"इतनी रात को कहाॅ जा रहे हो तुम? और और अभी किसका फोन आया था?"
"अभी कुछ बताने का समय नहीं है।" अजय सिंह कार की चाभी अपने एक हाॅथ में थामते हुए बोला__"अभी मुझे यहाॅ से फौरन ही निकलना होगा, मेरा इंतज़ार मत करना।"
कहने के साथ ही अजय सिंह कमरे से बाहर निकल गया जबकि प्रतिमा नंगी हालत में ही भाड़ की तरह अपनी आॅखें और मुॅह फाड़े दरवाजे की तरफ देखती रह गई इस बात से बेख़बर की दो आॅखें निरंतर उसके नंगे जिस्म को देखे जा रही हैं।
दोस्तो अपडेट हाज़िर है..........
आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा,,,,,,,
अपडेट........《 14 》
अब तक,,,,,,
"अरे क्या बात है अजय?" प्रतिमा बुरी तरह चौंकते हुए बेड पर उठकर बैठते हुए बोली__"इतनी रात को कहाॅ जा रहे हो तुम? और और अभी किसका फोन आया था?"
"अभी कुछ बताने का समय नहीं है।" अजय सिंह कार की चाभी अपने एक हाॅथ में थामते हुए बोला__"अभी मुझे यहाॅ से फौरन ही निकलना होगा, मेरा इंतज़ार मत करना।"
कहने के साथ ही अजय सिंह कमरे से बाहर निकल गया जबकि प्रतिमा नंगी हालत में ही भाड़ की तरह अपनी आॅखें और मुॅह फाड़े दरवाजे की तरफ देखती रह गई इस बात से बेख़बर की दो आॅखें निरंतर उसके नंगे जिस्म को देखे जा रही हैं।
अब आगे.......
अजय सिंह को शहर में अपनी कपड़ा मील की फैक्टरी पहुॅचते पहुॅचते लगभग सुबह हो गई थी। देर रात तक तो वह खुद ही अपनी पत्नी प्रतिमा के साथ मौज मस्ती में ब्यस्त रहा था।
अजय सिंह ने जब फैक्टरी के सामने अपनी कार रोंकी तो वहाॅ का माहौल ही अलग था। हर तरफ आग और धुएॅ का साम्राज्य नज़र आ रहा था। फैक्टरी के चारो तरफ भीषण आग की लपटें आसमान को छूती नज़र आ रही थी। दमकल की कई गाड़ियाॅ इस आग को बुझाने की कोशिश में लगी हुई थी। फैक्टरी में काम करने वाले कुछ मजदूर भी इधर उधर नज़र आ रहे थे।
अजय सिंह की हालत तो फोन में मिली जानकारी से ही खराब थी किन्तु खुद अपनी आॅखों से ऐसा भयानक मंज़र देख कर उसकी रही सही कसर भी काफूर हो गई।
उसके चेहरे पर उसी तरह के भाव थे जैसे सब कुछ लुट जाने पर होते हैं।
अजय सिंह लुटे पिटे भाव के साथ कार से नीचे उतरा और फैक्टरी की तरफ चल दिया। अभी वह कुछ ही कदम आगे बढ़ा था कि उसका पीए दीनदयाल शर्मा उसकी तरफ ही आता हुआ नज़र आया। उसके चेहरे पर भी बड़े अजीब से भाव थे।
"सब कुछ बरबाद हो गया सर।" दीनदयाल करीब पहुॅचते ही हताश भाव से बोला__"कुछ भी शेष नहीं बचा। फैक्टरी के हर हिस्से में भीषण आग लगी हुई है। पिछले दो घंटे से फायर ब्रिगेड वाले इस आग पर काबू पाने की कोशिश में लगे हुए हैं।"
"क कैसे हुआ दीनदयाल?" अजय सिंह की आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी गहरे कुएॅ से बोल रहा हो__"आख़िर कैसे हुआ ये सब? फैक्टरी में आग कैसे लग गई?"
"मुझे खुद भी कुछ समझ में नहीं आ रहा सर कि ये सब कैसे हो गया?" दीनदयाल दीन हीन लहजे से ही कहा__"फैक्टरी के अंदर आग लगने का सवाल ही नहीं था क्योकि इसके काफी तगड़े इतजामात थे। यहाॅ तक कि फैक्टरी में काम करने वाले मजदूरों को भी फैक्टरी के अंदर बीड़ी सिगरेट तम्बाकू या गुटका खाने की इजाज़त नहीं थी।"
"तो फिर कैसे लगी ये आग?" अजय सिंह आवेश मे बोला__"मुझे इस बारे में ठोस सबूत के साथ जानकारी चाहिए दीनदयाल। तुम जानते हो कि इससे हमें कितना बड़ा नुकसान हुआ है। जिस तरह आग लगी हुई नज़र आ रही है उससे साफ ज़ाहिर होता है कि फैक्टरी के अंदर की हर चीज़ ख़ाक़ में मिल चुकी है। तुम अंदाज़ा लगा सकते हो कि कितना नुकसान हो गया है।"
"मैं जानता हूॅ सर।" दीनदयाल ने कहा__"पूरी की पूरी फैक्टरी ही जल गई है, ये कोई मामूली बात नहीं है। ये करोड़ों से भी ऊपर का नुकसान है।"
"पुलिस को सूचित किया?" अजय सिंह ने पूॅछा।
"जी सर पुलिस को सूचित कर दिया गया है और पुलिस का एक इन्स्पेक्टर अंदर आपकी ही प्रतीक्षा कर रहा है।" दीनदयाल ने कहा__"वो कह रहा है कि आज के बाद से यहाॅ के थाने से उसका तबादला हो जाएगा और अब उसकी जगह पर आपकी बेटी रितू सिंह बघेल इंस्पेक्टर का चार्ज सम्हालेंगी।"
"ओह आई सी।" अजय सिंह के चेहरे पर सोचपूर्ण भाव नुमायां हुए__"तो वही हुआ जो हम नहीं चाहते थे, ख़ैर।"
कहने के साथ ही अजय सिंह फैक्टरी की तरफ बढ़ गया। ये लिखने की आवश्यकता नहीं कि उसके पीछे पीछे ही उसका पीए दीनदयाल भी बढ़ गया था।
कुछ देर में ही अजय सिंह उस इंस्पेक्टर के सामने था जिसकी पुलिस की वर्दी पर लगी नेम प्लेट पर उसका नाम अनिल वर्मा लिखा नज़र आया। कद काठी से ठीक ठाक ही नज़र आ रहा था वह। तीस से बत्तीस की उमर का रहा होगा। उसने अजय सिंह को देख कर बड़े ही अदब से नमस्ते किया।
"ठाकुर साहब बड़े ही अफसोस की बात है।" फिर उस इंस्पेक्टर ने कहा__"कि आपकी फैक्टरी में लगी आग से दूर दूर तक कुछ भी साबुत बचा हुआ नज़र नहीं आ रहा है।
इससे इस बात का अंदाज़ा लगाना ज़रा भी मुश्किल नहीं है कि इस हादसे से आपको भारी भरकम नुकसान हो गया है, अगर...।"
अजय सिंह ने उसके 'अगर' पर अचानक ही कहते हुए रुक जाने पर उसकी तरफ सवालिया निगाहों से देखा।
"अगर आपने अपनी इस फैक्टरी का जीवन बीमा पहले से नहीं करवाया हुआ है तो।" फिर उसने ये कह कर अपने पिछले कथन को पूरा किया__"वैसे पूछना तो नहीं चाहिए मगर फिर भी आपसे पूॅछने की ये हिमाक़त कर ही लेता हूॅ, ड्यूटी इज ड्यूटी भले ही आज ही बस के लिए यहां के एरिये का इंचार्ज हूॅ कल से तो आपकी बेटी ही इस सबकी तहकीक़ात करेंगी न। ख़ैर, तो मैं ये पूछने की हिमाक़त कर रहा था कि..क्या लगता है आपको...ये आग किसने लगाई हो सकती है आपकी इस विसाल फैक्टरी में?"
"ये पता लगाना तो तुम्हारा काम है इंस्पेक्टर।" अजय सिंह ने तनिक कठोरता से कहा था, उसे इस इंस्पेक्टर का बिहैवियर आज कुछ बदला हुआ लगा था, इसके पहले तो ये सब खुद उसके ही पालतू कुत्ते जैसे थे, बोला__"और अगर नहीं पता लगा सकते तो यहाॅ तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं है समझे?"
"अरे आप तो नाराज़ हो गए लगते हैं ठाकुर साहब।" इंस्पेक्टर ने मुस्कुराकर कहा__"माफ कीजियेगा। पर सवाल तो मैंने ठीक ही पूॅछा था आपसे।"
"हाॅ तो हमें भी इस बारे में भला कैसे पता होगा कि ये आग किसने लगाई है?" अजय सिंह उखड़े हुए लहजे से बोला__"अगर पता होता तो क्या वो अब तक ज़िन्दा बचा होता?"
"हाॅ ये तो है।" इंस्पेकटर ने अजीब भाव से अपने सिर को हिलाया__"आपके हाॅथों अब तक तो उसका कल्याण हो जाना निश्चित ही था।"
"वैसे ये तुम कैसे कह सकते हो?" सहसा इस बीच दीनदयाल ने सवाल किया__"कि फैक्टरी में लगी ये आग किसी के द्वारा लगाई गई है?"
"देखा आपने ठाकुर साहब।" इंस्पेक्टर ने तपाक से कहा__"आपका ये पीए कितना दिमाग़दार है? मेरे पूॅछने पर जो सवाल आपको पहले ही मुझसे पूॅछना चाहिये था वो आपने नहीं पूॅछा लेकिन आपके इस दीन के दयाल ने पूॅछ लिया। ख़ैर, अब जबकि पूॅछ ही लिया है तो मुझे भी सवाल का जवाब देने में कोई ऐतराज़ नहीं है। बात दरअसल ये है ठाकुर साहब कि फैक्टरी में लगी आग अगर साधारण रूप से लगी होती तो उसका रूप इतना उग्र न होता, ऐसा मेरा मानना है..जोकि बाॅकि सबके नज़रिये से ग़लत भी हो सकता है। ख़ैर....अब जबकि आग इस प्रकार भीषण रूप से लगी हुई है कि फैक्टरी का कोई कोना तक खाली नहीं बचा है तो कहीं न कहीं मन में ये बात आ ही जाती है कि हो सकता है ये आग किसी के द्वारा सोच समझ कर तथा तसल्ली से इस प्रकार लगाई गई हो कि आपकी फैक्टरी का कोई भी हिस्सा राम नाम सत्य होने से न बच सके।"
अजय सिंह को इंस्पेक्टर की ऊल जलूल बातों से गुस्सा तो बहुत आ रहा था किन्तु वो उसकी इन सब बातों से सहमत भी था। यकीनन ऐसा हो सकता था।
क्योंकि पिछले कुछ समय से जिस तरह की घटनाएं उसके साथ घट रही थी उससे यही ज़ाहिर होता था कि एक बार फिर किसी ने उसके साथ इस प्रकार का नुकसानदायी खेल खेला है। ये अलग बात है कि इस बार इस खेल में उसकी समूची फैक्टरी को ही आग के हवाले कर दिया गया था। अजय सिंह को समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर कौंन है जो उसके साथ ये सब कर रहा है?
"ठाकुर साहब इसी दुनियाॅ में हैं न आप?" उधर इंस्पेक्टर ने अजय सिंह को गहरी सोच में डूबे हुए देखकर कहा__"अगर हैं तो प्लीज ज़रा ग़ौर फरमाइये, मुझे आपसे कुछ सवालात करने हैं।"
"कैसे सवालात इंस्पेक्टर?" अजय सिंह बोला।
"यही कि फैक्टरी में लगी इस भीषण आग में किसी की जान तो नहीं गई न?" इंस्पेक्टर ने पूछा__"क्योंकि अगर ऐसा हो गया तो आपके लिए मुसीबत हो सकती है। फैक्टरी तो जल ही गई ऊपर से इस आग में जिनकी जान चली गई होगी उससे लम्बा बखेड़ा भी खड़ा हो जाएगा। अच्छा खासा केस बनेगा और आपको कानून की गिरफ्त में भी लेना पड़ सकता है।"
"ज्यादा बकवास करने की ज़रूरत नहीं है इंस्पेक्टर।" अजय सिंह गुर्राया__"जो भी होगा हम देख लेंगे। तुम अपना काम करो और फुटास की गोली लो, समझे??"
"जैसी आपकी मर्ज़ी ठाकुर साहब।" इंस्पेक्टर ने कहा और एक तरफ बढ़ गया।
"दीनदयाल।" इंस्पेक्टर के जाने के बाद अजय सिंह दीनदयाल से मुखातिब होकर कहा__"इस सबका न्यूज और मीडिया वालों को पता नहीं चलना चाहिए।"
"वैसे तो अब तक ये बात लगभग फैल ही चुकी होगी सर।" दीनदयाल ने कहा__"फिर भी न्यूज और मीडिया वालों से कुछ भी छुपा नहीं रह सकेगा। क्योंकि ये कोई साधारण मामला नहीं है, वो तो अच्छा हुआ कि हमारी फैक्टरी शहर से हट कर तथा शहर की आबादी से बहुत दूर थी जिससे फैक्टरी के अलावा बाकी और किसी का कुछ भी नुकसान नहीं हुआ। वर्ना सोचिए अगर ये फैक्टरी शहर में किसी आबादी वाली जगह पर होती तो क्या होता? आग की भीषण लपटों से आस पास के मकानों या और भी बहुत सी चीज़ों पर आग लग जाती जिसके परिणाम की कल्पना ही बड़ी भयंकर है। इस सबके बाद हम कहीं मुॅह छुपाने के काबिल नहीं रह जाते। जनता और कानून हमारे पीछे ही पड़ जाते।"
"जो नहीं हुआ उसके बारे में बात करने का कोई मतलब नहीं है दीनदयाल।"अजय सिंह ने गहरी साॅस ली__"यूॅ तो कानूनी रूप से इस बात की जाॅच तो होगी ही कि फैक्टरी में आग लगने की मुख्य वजह क्या थी? मगर....हमें तो पहले से ही इस बात का अंदेशा है कि इस सबमें उसी का हाॅथ है जिसने पिछले कुछ समय से हमारे साथ खेल खेलना शुरू किया है। समझ में नहीं आता कि आख़िर क्यों कर रहा है वो ऐसा? क्यों हमें बरबाद करने पर तुला हुआ है वो?"
"हैरत की बात है सर।" दीनदयाल ने गंभीरता से कहा__"हमें अब तक उसके बारे में कुछ पता नहीं चल पाया। वो हर बार धोखे से हमारा कुछ न कुछ नुकसान कर देता है और हम कुछ नहीं कर पाते।
"
ये दोनो ऐसे ही अपना माथा पच्ची करने में लगे रहे। फैक्टरी के अंदर अब काफी हद तक आग पर काबू पा लिया गया था।
....................
उधर मुम्बई में आज एक बार फिर सब लोग एक साथ ड्राइंगरूम में रखे कीमती सोफों पर बैठे हुए थे।
"शहर के मशहूर बिजनेस मैन अजय सिंह की फैक्टरी में लगी आग, जिसमें सबकुछ जल कर खाक़ हो गया।" निधि ने अखबार में छपी ख़बर को पढ़ते हुए कहा__"मिली जानकारी के अनुसार ये आग उस समय लगी जब सारा शहर रात के अॅधेरे में गहरी नींद सोया पड़ा था। रात दो से तीन बजे के बीच फैक्टरी में आग लगी, और धीरे धीरे समूची फैक्टरी भीषण आग की चपेट में आ गई। फैक्टरी में मौजूद वर्कर खुद इस बात से अंजान हैं। फैक्टरी में लगी आग के उग्र रूप धारण करने से पहले ही फायर ब्रिगेड वालों को सूचित किया गया, जब तक दमकल की गाड़ियाॅ वहाॅ पहॅची तब तक फैक्टरी में लगी आग भयंकर रूप धारण कर चुकी थी। लगभग चार घंटे की मसक्कत के बाद फायर ब्रिगेड द्वारा इस भयंकर आग पर काबू पाया गया। फैक्टरी में आग लगने की सूचना फैक्टरी के मालिक अजय सिंह बघेल को दे दी गई थी। फैक्टरी में आग लगने से जो करोड़ों का नुकसान हुआ है उससे फैक्टरी के मालिक अजय सिंह गहरे सदमे में हैं। हमें विश्वस्त सूत्रों द्वारा ये पता चला है कि फैक्टरी के मालिक अजय सिंह ने अपनी फैक्टरी का कोई जीवन बीमा वगैरा नहीं करवा रखा था, इस लिए अब आप समझ सकते हैं कि आग लगने की वजह से फैक्टरी के मालिक अजय सिंह का कितना नुकसान हुआ होगा। फैक्टरी में आग लगने की वजह अभी तक सामने नहीं आई है। इस बारे में अभी पुलिस द्वारा जाॅच पड़ताड़ की जा रही हैं।"
"कैसी रही अंकल?" विराज ने होठों पर मनमोहक मुस्कान बिखेरते हुए कहा__"अजय सिंह को एक और झटका दे दिया मैंने।"
"तो क्या यही वो काम था जिसे तुम अजय सिंह के बिजनेस पार्टनर अरविंद सक्सेना द्वारा अंजाम देने की बात कह रहे थे?" जगदीश ने हैरत से कहा__"पर कैसे हुआ ये सब?"
"हाॅ राज कैसे किया तुमने ये सब?" गौरी ने भी चौंकते हुए पूछा।
"सब कुछ शुरू से और अच्छे से आप लोगों को बताता हूॅ।" विराज ने एक लम्बी साॅस खींचते हुए कहा__"जब अजय सिंह का बिजनेस पार्टनर अरविंद सक्सेना अपने उन फोटोग्राफ्स की वजह से मेरे इशारों पर काम करने को तैयार हो गया तो मैने उससे अजय सिंह के बिजनेस से संबंधित और भी कुछ महत्वपूर्ण जानकारी हाॅसिल की जिसका किसी को कुछ पता नहीं था।"
"क्या मतलब??" विराज की इस बात पर सब एक साथ चौंके थे__"कैसी जानकारी??"
"अरविंद सक्सेना के अनुसार।" विराज ने इत्मीनान से कहा__"अजय सिंह कपड़ा मील की आड़ में गैर कानूनी धंधा भी करता है। जिसमें गाॅजा, अफीम, चरस, आदि कई चीज़ें शामिल हैं। इन सबसे उसे लाखों करोड़ों का भारी मुनाफा होता है।
चूॅकि ये गैर कानूनी धंधा है इस लिए इसमें उसे कानून का भी डर था मगर उसने अपनी चतुराई से कानून को भी इसमें शामिल कर लिया। कहने का मतलब ये कि इस धंधे से होने वाले मुनाफे में पुलिस और कानून के कई सारे नुमाइंदों का भी हिस्सा होता था। पुलिस और कानून का साथ मिलते ही ये धंधा और भी जोर शोर से चलने लगा मगर छिप छिपाकर ही। अजय सिंह की फैक्टरी शहर से बाहर ऐसी जगह पर है जहाॅ आबादी न के बाराबर ही है इस लिए फैक्टरी में ही इन सब चीज़ों का भी एक अलग से कारखाना बनाया गया था जो फैक्टरी के नीचे तहखाने में था। अब आप समझ सकते हैं कि अजय सिंह क्या है? कपड़ा मील की कमाई से इतना मुनाफा नहीं था जितना इस गैर कानूनी धंधे से था। ये तो ख़ैर शुरूआत है, अभी और भी बहुत सी चीज़ें हैं जिनके बारे में कोई नहीं जानता।"
"तुम तो जान ही गए होगे न?" जगदीश ने कहा__"फिर तो कोई समस्या ही नहीं है।"
"मुझे भी उतना ही पता है जितना सक्सेना को पता था।" विराज ने कहा।
"क्या मतलब??" जगदीश चौंका।
"सक्सेना अजय सिंह का पार्टनर ज़रूर था अंकल।" विराज कह रहा था__"लेकिन उसे खुद ये नहीं पता था कि उसका बिजनेस पार्टनर अजय सिंह वास्तव में है क्या? अरविंद सक्सेना एक फट्टू किस्म का इंसान था तथा साफ दिल का, ये अलग बात है कि उसका कैरेक्टर बाॅकी चीज़ में अजय सिंह से जुदा नहीं था। हाॅ ये जरूर था कि सक्सेना गैर कानूनी काम करने से डरता था, और शायद यही वजह रही थी कि अजय सिंह ने इस धंधे में सक्सेना को शामिल न करके उसे इससे दूर ही रखा। ख़ैर, एक दिन सक्सेना को किसी वजह से ये पता चल गया कि अजय सिंह गैर कानूनी धंधा भी करता है। उसने अपनी आखों से फैक्टरी के बेसमेंट में बने एक अलग ही कारखाने को देखा था। अजय सिंह को ये पता नहीं था कि सक्सेना उसकी असलियत जान चुका है। सक्सेना ने कभी अजय सिंह से इस बात का ज़िक्र भी नहीं किया। क्योकि वह जानता था कि इस धंधे में कोई किसी का नहीं होता, अगर बात इधर से उधर हो गई तो उसकी जान भी जा सकती है। सक्सेना उस दिन से परेशान भी रहने लगा किन्तु उसने ये सब अजय सिंह पर ज़ाहिर न होने दिया। वो अब किसी तरह अजय सिंह से पार्टनरशिप तोड़कर उससे कहीं दूर चला जाना चाहता था, मगर सवाल था कि कैसे करे ये सब? फिर एक दिन वो मेरी पकड़ में आ गया, मैने जब उसे अपने तरीके से टार्चर करके उससे अजय सिंह के बारे में पूॅछा तथा उससे पार्टनरशिप तोड़ने की बात कही तो वह कुछ देर न नुकुर करने के बाद इसके लिए तैयार हो गया। उसने मुझसे शर्त रखी कि इस सबमें उसका नाम नहीं आना चाहिए और उसे सुरक्षित इस देश से बाहर परिवार सहित भेज दिया जाए। मुझे उसकी शर्त से कोई आपत्ति नहीं थी इस लिए मैंने भी उसकी शर्त मान ली।"
"तो अजय सिंह का एक सच ये भी बाहर आ गया कि वह अपने इस बिजनेस की आड़ में गैर कानूनी काम भी करता है।
" जगदीश ने गहरी साॅस लेते हुए कहा__"खैर तो तुमने इस सबके बाद सक्सेना से कैसे इस काम को अंजाम दिलवाया?"
"हे भगवान।" गौरी आश्चर्यचकित भाव के साथ कह उठी__"कितना गिरा हुआ इंसान है ये, ऐसा कोई काम नहीं बचा जो इसने किया नहीं है।"
"मेरा बस चले तो।" निधि ने बुरा सा मुॅह बनाते हुए कहा__"ऐसे ब्यक्ति को बीच चौराहे पर गोली मार दूॅ, हाॅ नहीं तो।"
"सक्सेना के बाॅकी जो छोटे मोटे कारोबार थे उन्हें मैंने आपके द्वारा खरीद लिया।" विराज कह रहा था__"और उसके एकाउन्ट में पैसा भी डलवा दिया गया। साथ ही उसको उसके परिवार सहित विदेश जाने का इंतजाम भी कर दिया गया था। अब सक्सेना के पास एक ही काम रह गया था जिसे वो मेरे कहने पर करने वाला था। कल रात उसने फैक्टरी जा कर बेसमेंट में तीन टाइम बम्ब फिट किये थे। ये काम उसने बड़ी सावधानी से तथा किसी की नज़र में आए बिना किया था। इस बात का खयाल किया गया था कि उस समय फैक्टरी में कोई न हो क्योंकि इससे बाॅकी तमाम वर्कर्स की या बहुत से बेकसूर लोगों की जान जाने का भी भीषण खतरा था। फिर सक्सेना ने बताया कि फैक्टरी में हप्ते में एक दिन का अवकाश होता है और इत्तेफाक़ से कल अवकाश ही था। तीन घंटे के टाइम के बाद बमों को फटना था। बमों के फटने से पहले ही सक्सेना अपने परिवार के साथ विदेश जाने वाली फ्लाइट पर बैठ कर निकल लिया था और इधर तीन घंटे बाद फैक्टरी के अंदर धमाका हो जाना था और खेल खतम।"
"बहुत खूब बेटे।" जगदीश के चेहरे पर प्रसंसा के भाव थे, बोला__"जब दिमाग़ से ही काम हो जाए तो हाॅथ पैर चलाने की ज़रूरत ही क्या है? वेल डन बेटे....आई एम प्राउड आफ यू।"
"वाह भइया वाह आपने तो कमाल ही कर दिया।" निधि ने खुशी में झूमते हुए कहा__"और साड़ी को फाड़ कर रुमाल कर दिया, हाॅ नहीं तो।"
"बेटा जो कुछ भी करना बहुत सोच समझ कर करना।" गौरी अंदर ही अंदर अपने बेटे के इस सराहनीय कार्य से खुश तो थी किन्तु प्रत्यक्ष में उसने यही कहा__"क्योंकि तुम जिसके साथ ये जंग कर रहे हो वो बहुत खराब आदमी है।"
"फिक्र मत कीजिए माॅ।" विराज ने सहसा ठंडे स्वर में कहा__"उस खराब आदमी के पर ही तो कुतर रहा हूॅ और एक दिन उसे अपाहिज भी कर दूॅगा। उसके लिए बहुत कुछ सोच रखा है मैंने। समय आने पर आप देखेंगी कि उसका क्या हस्र करता हूॅ मैं।"
"इस धमाके के बाद तो उसकी हालत खराब हो गई होगी बेटे।" जगदीश ने कहा__"संभव है कि इस हादसे की जाॅच ही न करवाए वो।"
"आपने बिलकुल ठीक कहा अंकल।" विराज ने कहा__"फैक्टरी में हुए इस भीषण काण्ड की जाॅच नहीं करवाएगा वो। क्योकि इससे उसे मिलेगा तो कुछ नहीं बल्कि उल्टा जाॅच से फॅस ज़रूर जाएगा। पुलिस और फाॅरेंसिक डिपार्टमेंट वाले हर चीज़ को बारीकी से जाॅचेंगे परखेंगे।
उस दौरान वो लोग फैक्टरी का चप्पा चप्पा छान मारेंगे और इस सबसे उन्हें वो सबूत भी मिलेंगे जो इस बात की चीख चीख कर गवाही देंगे कि शहर का मशहूर बिजनेस मैन ग़ैर कानूनी धंधा भी करता था। बस खेल खतम।"
"देखते हैं क्या होता है?" जगदीश ने कहने के साथ ही पहलू बदला__"वैसे अब आगे का क्या करने का विचार है?"
"अभी और कुछ नहीं करना है।" सहसा गौरी ने हस्ताक्षेप किया__"अपनी पढ़ाई पर भी ध्यान देना कुछ, ये काम तो होता ही रहेगा।"
"गौरी बहन सही कह रही है राज।" जगदीश ने अपनेपन से कहा__"कुछ दिन में तुम्हारा काॅलेज भी शुरू हो जाएगा इस लिए अपने मन को थोड़ा शान्त भी रखो।"
"मैं भी यही सोच रहा हूॅ।" विराज ने मुस्कुरा कर कहा__"कुछ दिन अजय सिंह को भी अपनी हालत पर काबू पा लेना चाहिए। वर्ना कहीं ऐसा न हो कि हादसे पर हादसे देख कर वह हार्ट अटैक से ही मर जाए। फिर किससे मैं अपने तरीके से इंतकाम ले सकूॅगा?"
"एक के मर जाने से क्या होता है भइया?" निधि ने कहा__"सब उसके जैसे ही तो हैं, उनका भी वही हाल करना, हाॅ नहीं तो।"
निधि की बात पर सब मुस्कुरा कर रह गए।
अपडेट हाज़िर है दोस्तो......
आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा,,,,,,,,,
अपडेट.........《 15 》
अब तक......
"देखते हैं क्या होता है?" जगदीश ने कहने के साथ ही पहलू बदला__"वैसे अब आगे का क्या करने का विचार है?"
"अभी और कुछ नहीं करना है।" सहसा गौरी ने हस्ताक्षेप किया__"अपनी पढ़ाई पर भी ध्यान देना कुछ, ये काम तो होता ही रहेगा।"
"गौरी बहन सही कह रही है राज।" जगदीश ने अपनेपन से कहा__"कुछ दिन में तुम्हारा काॅलेज भी शुरू हो जाएगा इस लिए अपने मन को थोड़ा शान्त भी रखो।"
"मैं भी यही सोच रहा हूॅ।" विराज ने मुस्कुरा कर कहा__"कुछ दिन अजय सिंह को भी अपनी हालत पर काबू पा लेना चाहिए। वर्ना कहीं ऐसा न हो कि हादसे पर हादसे देख कर वह हार्ट अटैक से ही मर जाए। फिर किससे मैं अपने तरीके से इंतकाम ले सकूॅगा?"
"एक के मर जाने से क्या होता है भइया?" निधि ने कहा__"सब उसके जैसे ही तो हैं, उनका भी वही हाल करना, हाॅ नहीं तो।"
निधि की बात पर सब मुस्कुरा कर रह गए।
अब आगे.......
अजय सिंह की हवेली में इस वक्त बड़ा ही अजीब सा माहौल था। ड्राइंगरूम में रखे सोफों पर इस वक्त परिवार के लगभग सभी सदस्य बैठे हुए थे। अजय सिंह, प्रतिमा, शिवा, अभय सिंह, करुणा, दिव्या तथा अभय व करुणा का दिमाग़ से डिस्टर्ब बेटा शगुन। शगुन अपनी माॅ करुणा के साथ की इस वक्त शान्त बैठा था कदाचित सब कोई खामोश व गुमसुम बैठे हुए थे इस लिए उन सबको देखकर वह भी चुपचाप बैठा था वर्ना आम तौर पर वह कोई न कोई विचित्र सी हरकतें करता ही रहता था। इन लोगों के बीच परिवार के दो सदस्य अभी अनुपस्थित थे, और वो थीं अजय सिंह व प्रतिमा की दोनों बेटियाॅ।
अजय की छोटी बेटी नीलम मुम्बई में है, हलाॅकि उसे फैक्टरी में लगी आग की वजह से हुए भारी नुकसान की सूचना दे दी गई थी और वह मुम्बई से निकल भी चुकी थी यहाॅ आने के लिए। जबकि अजय सिंह की बड़ी बेटी रितू सुबह पुलिस स्टेशन चली गई थी, क्योंकि आज उसे चार्ज सम्हालना था। रितू को अपने पिता के साथ हुए हादसे का दुख तो था लेकिन वो कर भी क्या सकती थी? हाॅ ये ज़रूर उसके दिमाग़ में था कि इस केस की छान बीन वो बारीकी से खुद करेगी तथा इसके साथ ही यह पता भी लगाएगी कि ये सब कैसे हुआ??
(आप सबको बताने की ज़रूरत नहीं है कि ये सब लोग इस तरह गुमसुम से क्यों बैठे हुए थे। फिर भी बताना तो हर लेखक का फर्ज़ होता है कि वो हर बात को विस्तार से अपने पाठकों को बताए भी और समझाए भी।)
"क्या कुछ पता चला भैया कि फैक्टरी में किस वजह से आग लगी थी?" सहसा वहाॅ पर फैले इस सन्नाटे को अभय सिंह ने अपने कथन से चीरते हुए कहा__"आपने तो कहा था न कि पुलिस और फाॅरेंसिक डिपार्टमेंट के लोग इसकी बारीकी से छान बीन कर रहे थे?"
"किसी को कोई सुराग़ नहीं मिला छोटे।" अजय सिंह ने गंभीरता से कहा__"सबका यही कहना है कि शार्ट सर्किट की वजह से फैक्टरी में आग लगी थी। उस दिन क्योंकि अवकाश था इस लिए फैक्टरी में काम करने वाले वर्कर्स नहीं थे। फैक्टरी के अंदर कोई नहीं था और जो वहाॅ पर गार्ड्स वगैरा थे वो सब तो बाहर ही रहते हैं इस लिए किसी को पता ही नहीं चला कि फैक्टरी के अंदर कब क्या हुआ? जब तक पता चला तब तक फैक्टरी के अंदर भरे कपड़ों के स्टाक में आग पकड़ चुकी थी। फैक्टरी का इन्ट्री गेट बाहर से लाॅक था जिसकी चाभी मैनेजर के पास थी उस रात। मैनेजर किसी काम से बाहर था, तो आनन फानन में लाॅक तोड़ने की कोशिश की गई। लाक ऐसा था कि दरवाजे के अंदर से कनेक्टेड था जिसे खोल पाना आसान न था इस लोहे के दरवाजे को फिर किसी तरह ट्रक द्वारा तोड़ना पड़ा। इस काम में समय लग गया जिस वजह से आग ने उग्र रूप धारण कर लिया। फिर फायर ब्रिगेड वालों को सूचित किया गया। जब तक दमकल की गाड़ियाॅ वहाॅ पहुॅची तब तक फैक्टरी के अंदर लगी आग बेकाबू हो चुकी थी और फिर सब कुछ खाक़ हो गया।"
(आप लोग समझ ही गए होंगे कि अजय सिंह ये सब बातें अपने से बना कर ही अभय से कही थी। भला वो और क्या बताता उन लोगों से?)
"मैं इस बात को नहीं मानती डैड।" सहसा तभी ड्राइंगरूप में इंस्पेक्टर की वर्दी पहने हुए अजय सिंह की बेटी इंस्पेक्टर रितू ने दाखिल होते हुए कहा।
पुलिस इंस्पेक्टर की वर्दी में बला की खूबसूरत लग रही थी रितू। ऐसा लगता था जैसे ये पुलिस की वर्दी जन्म जन्मांतर से बनी ही उसके लिए थी। उसे इस रूप में देखकर वहाॅ बैठे सब लोगों की आॅखें फटी की फटी रह गईं। एकटक, अपलक देखते ही रह गए थे सब लोग उसे।
वर्दी की टाइट फिटिंग में उसके बदन के वो सब उभार स्पष्ट नज़र आ रहे थे जिससे उसके भरपूर जवान हो जाने का पता चल रहा था। अजय सिंह तथा शिवा की आंखें कुछ अलग ही नज़ारा कर रही थी। ये बात किसी ने महसूस की हो या न की हो किन्तु उन बाप बेटों की फितरत से बाखूबी परिचित प्रतिमा ने साफ तौर पर महसूस किया। और अभय व करुणा की मौजूदगी को ध्यान में रखते हुए उसने तुरंत ही उन बाप बेटों को उनकी वास्तविक स्थित में ले आने की गरज से किन्तु सावधानी से कहा__"वाह मेरी बेटी पुलिस की वर्दी में कितनी सुन्दर लग रही है, कहीं किसी की नज़र न लग जाए तुझे। चल मैं तेरे कान के नीचे नज़र का काला टीका लगा देती हूॅ।"
"इसकी कोई ज़रूरत नहीं है माॅम।" रितु ने हॅस कर कहा__"यहाॅ पर सब अपने ही तो बैठे हैं। भला अपनों की भी कहीं नज़र लगती है क्या?"
"क्या पता?" प्रतिमा ने एक सरसरी सी नज़र अपने पति व बेटे पर डाली फिर बोली__"लग भी सकती है।"
अजय सिंह और शिवा दोनो ही प्रतिमा की इस बात पर चौंके और सम्हल कर बैठ गए। ये देख प्रतिमा मन ही मन मुस्कुराई थी।
"बहुत बहुत बॅधाई हो रितू।" करूणा ने मुस्कुराकर कहा__"आज से तुम पुलिस वाली बन गई हो।"
"धन्यवाद चाची जी।" रितू ने कहा तथा एक हाॅथ में पकड़े हुए पुलिस रुल को अपने दूसरे हाॅथ की हॅथेली पर हल्के से मारते हुए कहा__"मैं आपकी इस बात को नहीं मानती डैड कि आपकी फैक्टरी में लगी आग किसी शार्ट सर्किट की वजह से लगी है।"
"ये तुम क्या कह रही हो बेटी?" अजय सिंह मन ही मन उसकी इस बात से चौंका था किन्तु चेहरे पर उन भावों को उजागर न करते हुए प्रत्यक्ष में कहा __"अगर आग शार्ट सर्किट की वजह से नहीं लगी है तो फिर किस वजह से लगी है? जबकि पुलिस और फाॅरेंसिक डिपार्टमेंट के लोग अपनी छान बीन में इसी बात की पुष्टि करके गए थे?"
"यही तो हैरानी की बात है डैड।" रितू ने चहलकदमी करते हुए कहा__"वो लोग उस बात की पुष्टि कर गए जिसका कहीं कोई वजूद ही नहीं था, जबकि उस तरफ उन लोगों ने ज़रा भी ग़ौर नहीं किया जिस तरफ किसी बात के प्रमाण मिल जाने के किसी हद तक चान्सेस थे।"
"क्या मतलब है तुम्हारा?" अजय सिंह इस बार लाख कोशिशों के बाद भी अपने चेहरे पर बुरी तरह चौंकने के भाव न छिपा सका। वह तो चकित भी हो गया था कि उसकी बेटी जो अब तक साधारण सी थी वो अब इस रूप में ऐसी बातें भी करने लगी थी। उसे समझ न आया कि उसकी बेटी के अंदर कौन सा जासूसी कीड़ा समा गया है?
"मेरा मतलब तो स्वीमिंगपुल में भरे पानी की तरह साफ ही है डैड।" उधर रितू अजीब से अंदाज़ में अपने ही बाप की धड़कने बढ़ाते हुए कह रही थी__"मुझे तो ऐसा लगता है जैसे फैक्टरी में छान बीन करने आए पुलिस तथा फाॅरेंसिक डिपार्टमेंट के लोग छान बीन की महज औपचारिकता निभा कर चले गए हैं।
वर्ना इतने भीषण काण्ड की इतनी मामूली सी वजह बता कर नहीं चले जाते बल्कि कुछ और ही पता करते।"
अजय सिंह अपनी पुलिस की वर्दी पहने बेटी को मुॅह बाए देखता रह गया। कानों में कहीं दूर से हथौड़े की चोंट का एहसास करने लगा था वो। फिर सहसा जैसे उसे वस्तुस्थित का ख़याल आया तो बोला__"मतलब क्या है बेटी? क्या तुम ये कहना चाहती हो कि तुम्हारे ही पुलिस डिपार्टमेंट के लोगों ने अपनी छान बीन में ग़लत रिपोर्ट दी है? जबकि तुम्हारे अनुसार उनकी इस रिपोर्ट के उलट कुछ और ही रिपोर्ट निकल सकती थी? इससे तो यही ज़ाहिर होता है कि तुम्हें अपने ही पुलिस डिपार्टमेंट की इस छान बीन के फलस्वरूप बनाई गई रिपोर्ट पर शक है?"
"मैंने ये कब कहा डैड कि मुझे अपने डिपार्टमेंट द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट पर शक है?" रितू ने कहा__"मैंने तो सिर्फ अपनी बात रखी है इस सिलसिले में कि अगर औपचारिकता की बजाय ठीक तरह से छान बीन की जाती तो शायद निष्कर्श कुछ और ही निकलता।"
"तुम्हारे कहने का मतलब तो वही हुआ बेटी।" अजय सिंह जाने क्या सोच कर पल भर को मुस्कुराया था, फिर बोला__"तुम्हें लगता है कि तुम्हारे डिपार्टमेंट वालों ने अपनी छान बीन में महज अपनी औपचारिकता निभाई है। इसका मतलब तो यही हुआ कि उन्होंने तुम्हारी नज़र में गंभीरता से छानबीन ही नहीं की।"
"बिलकुल।" रितू ने कहा__"पर ये उन पर मेरा कोई आरोप नहीं है डैड। क्योंकि मुझे पता है सबका अपना अपना दिमाग़ होता है, और सब अपने उसी दिमाग़ की वजह से किसी भी चीज़ का रिजल्ट निकालते हैं। जिसका जितना दिमाग़ चलता है वो उतना ही बता पाता है, मगर ज़रूरी नहीं होता कि कोई सच उतने ही दिमाग़ से निकलने वाला सच कहलाए। ख़ैर जाने दीजिए...मैं आपको ये खुशख़बरी सुनाने आई हूॅ कि इस केस को मैंने रिओपेन किया है जिसके लिए मैंने कमिश्नर से बड़ी मिन्नते की थी। मुझे अंदेशा है कि मेरे डिपार्टमेंट ने ठीक तरह से छान बीन नहीं की। इस लिए अब ये केस मैंने खुद अपने हाॅथ में लिया है और अब मैं खुद इसकी छानबीन करूॅगी।"
"क क्या????" अजय सिंह उछल पड़ा, चहरे पर पसीने की बूॅदे झिलमिला उठीं। फिर जल्दी ही उसने खुद को सम्हालते हुए कहा__"भला इसकी क्या ज़रूरत थी बेटी? मेरा मतलब है कि मान लो ये पता लग भी जाए कि फैक्टरी में आग वास्तव में किस वजह से लगी थी तो भी क्या होगा? क्या इससे वो सब वापस मिल जाएगा जो जल कर खाक़ मे मिल चुका है?"
"मैं मानती हूॅ डैड कि अब वो सब कुछ नहीं मिल सकता जो जल कर खाक़ हो गया है।" रितु ने कहा__"लेकिन छान बीन से हकीक़त का पता भी तो चलना चाहिए। आखिर पता तो चलना ही चाहिए कि फैक्टरी में आग खुद लगी थी या किसी के द्वारा लगाई गई थी?"
"किसी के द्वारा?" सहसा इस बीच अभय ने कहा__"इसका क्या मतलब हुआ रितू बेटी?"
"मतलब साफ है चाचा जी।
" रितू ने अभय से मुखातिब होकर कहा__"फैक्टरी में आग अगर खुद नहीं लगी रही होगी तो ज़ाहिर है किसी के द्वारा आग लगाई गई थी। उस सूरत में सवाल यही उठता है कि किसने और किस वजह से फैक्टरी में आग लगाई? आप ही बताइए क्या ये जानना ज़रूरी नहीं है कि हम ऐसे इंसान का पता लगाएं जिसने हमारी फैक्टरी को आग लगा कर हमारा सब कुछ बरबाद कर दिया?"
"बिलकुल बेटा।" अभय ने कहा__"अगर छानबीन में यही सच सामने आता है तो इसका पता तो चलना ही चाहिए कि किसने ये सब किया और क्यों किया?"
अजय सिंह के काॅनों में सीटियाॅ सी बजने लगी थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह ऐसा क्या करे कि उसकी बेटी फैक्टरी की दुबारा छानबीन न करे? क्योंकि उसे पता था कि अगर रितू ने दुबारा छानबीन शुरू की तो वो सच्चाई भी सामने आ जाएगी जिसको वह किसी भी कीमत पर सामने नहीं लाना चाहता। पहले जो छानबीन हुई थी उसमें अजय सिंह ने ऊपर ऊपर से ही फैक्टरी की छानबीन करवाई थी वो भी सिर्फ औपचारिकता के लिए। सब उसके ही आदमी थे, पुलिस भी और फाॅरेंसिक डिपार्टमेंट के लोग भी। किन्तु अब ये केस फिर से रिओपेन हो गया, वो भी उसकी अपनी ही बेटी के द्वारा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अपनी बेटी को दुबारा से छानबीन करने से कैसे रोंके?
"रितू दीदी ठीक ही कह रही हैं डैड।" सहसा इस बीच काफी देर से चुपचाप बैठा शिवा भी अपने अंदाज़ में कह उठा__"फैक्टरी की दुबारा से छानबीन तो होनी ही चाहिए। कम से कम असलियत तो सामने आ ही जाए कि किसने ये सब किया है? कसम से डैड...जिसने भी ये किया होगा उसको छोड़ूॅगा नहीं मैं। कुत्ते से भी बदतर मौत मारूॅगा उसे।"
"खामोशशशशश।" अजय सिंह लगभग चीखते हुए कहा था__"चुपचाप बैठो, नहीं तो कमरे में जाओ अपने। तुम्हें बीच में बोलने की कोई ज़रूरत नहीं है समझे??"
"पर डैड मैंने ऐसा क्या ग़लत कह दिया?" शिवा ने बुरा सा मुॅह बनाते हुए कहा__"जिसकी वजह से आप मुझे इस तरह डाॅटकर चुप करा रहे हैं।"
अजय सिंह का जी चाहा कि वह अपने इस नालायक बेटे को गोली मार दे, किन्तु फिर बड़ी मुश्किल से अपने गुस्से को काबू में किया उसने।
"मैं तो कहता हूॅ बेटी कि बेवजह ही तुम इसके लिए परेशान हो रही हो।" अजय सिंह ने बात को किसी तरह सम्हालने की गरज से कहा__"क्योंकि अगर ये पता चल भी गया कि फैक्टरी में आग खुद नहीं लगी थी बल्कि किसी के द्वारा लगाई गई थी तो तब भी ये कैसे पता लगाओगी कि किसने ये सब किया? वो जो कोई भी रहा होगा वो इतना बेवकूफ नहीं रहा होगा कि इतना बड़ा काण्ड करने बाद अपने पीछे अपने ही खिलाफ कोई सबूत या कोई सुराग़ छोंड़ गया होगा। क्योकि ये तो उसे भी भली भाॅति पता होगा कि इतना कुछ करने के बाद अगर वह पकड़ा जाएगा तो उसके लिए अच्छा नहीं होगा, बल्कि पकड़े जाने पर जेल की सलाखों के पीछे पहुॅचा दिया जाएगा।
"
"जुर्म चाहे जितनी होशियारी या सफाई से किया जाए डैड।" रितु ने कहा__"वह कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में ऐसा सबूत या सुराग़ ज़रूर छोंड़ जाता है जिसकी बिना पर जुर्म करने वाले को कानून के हाॅथों पकड़ कर जेल की सलाखों के पीछे पहुॅचा दिया जा सके। मुझे पूरा यकींन है डैड...जिसने भी ये सब किया है वो अपने पीछे अपने ही खिलाफ सबूत या सुराग़ ज़रूर छोंड़ कर गया होगा। आप खुद सरकारी वकील रह चुके हैं इस लिए ये बात आप भी अच्छी तरह जानते हैं कि मुजरिम के खिलाफ जब कोई एक सबूत या सुराग़ कानून के हाॅथ लग जाता है तो फिर ज्यादा समय नहीं लगता उस मुजरिम को पकड़ कर जेल की सलाखों के पीछे डाल देने में।"
अजय सिंह हैरान भी था और परेशान भी। हैरान इस लिए कि उसकी बेटी के मुख से जिस तरह के डायलाॅग निकल रहे थे उसकी उसने कल्पना तक न की थी और परेशान इस लिए कि अपनी ही बेटी द्वारा इस छानबीन को करने से वह किसी भी तरीके से रोंक नहीं पा रहा था। अपनी बेटी द्वारा छानबीन करने की उसकी ज़िद को देख उसका दिल बैठा जा रहा था। हलाॅकि वह चाहता तो बेटी को ठेस लहजे में कह कर इसके लिए मना कर देता किन्तु तब हालात और बात दोनो ही बिगड़ जाते। उसकी बेटी के मन में ये बिचार ज़रूर उठता कि उसका बाप उसके द्वारा इस छानबीन को न करने पर इतना ज़ोर क्यों दे रहा है? बेटी क्योंकि अब पुलिस वाली बन चुकी थी इस लिए अब उसके सोचने का नज़रिया बदल चुका था। उसे तो अब हर आदमी में एक मुजरिम नज़र आने लगा था जिससे उसकी निगाह अब सबको शक की दृष्टि से देखने लगी थी। इस लिए अजय सिंह अब ये किसी कीमत पर भी नहीं चाह सकता था कि किसी भी वजह से उसके प्रति उसकी बेटी के सोचने का नज़रिया बदल जाए।
"चलती हूॅ डैड।" सहसा रितू ने अपनी खूबसूरत कलाई पर बॅधी एक कीमती घड़ी पर नज़रें डालते हुए कहा__"मैं आपका पुलिस स्टेशन में इंतज़ार करूॅगी।" फिर उसने अभय की तरफ भी देख कर कहा__"चाचा जी आपका भी।"
इतना कहने के बाद ही वह खूबसूरत बला पलटी और लम्बे लम्बे डग भरती हुई ड्राइंगरूम से बाहर निकल गई। किन्तु उसके जाते ही वहाॅ पर ब्लेड की धार जैसा पैना सन्नाटा भी खिंच गया।
अजय सिंह का दिल जैसे धड़कना भूल गया था। उसे अपनी आंखों के सामने अॅधेरा सा नज़र आने लगा। जाने क्या सोचकर वह तनिक चौंका तथा साथ ही घबरा भी गया। फिर एक ठंडी साॅस खींचते हुए, तथा अपनी आॅखों को मूॅद कर सोफे की पिछली पुश्त से अपना पीठ व सिर टिका दिया। आॅख बंद करते ही उसे फैक्टरी के बेसमेंट मे बने उस कारखाने का मंज़र दिख गया जहां पर सिर्फ और सिर्फ ग़ैर कानूनी चीज़ें मौजूद थी। ये सब नज़र आते ही अजय सिंह ने पट से अपनी आंखें खोल दी तथा एक झटके से सोफे पर से उठा और अपने कमरे की तरफ भारी कदमों से बढ़ गया।
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,
आप सबकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा......
अपडेट.........《 16 》
अब तक.......
"चलती हूॅ डैड।" सहसा रितू ने अपनी खूबसूरत कलाई पर बॅधी एक कीमती घड़ी पर नज़रें डालते हुए कहा__"मैं आपका पुलिस स्टेशन में इंतज़ार करूॅगी।" फिर उसने अभय की तरफ भी देख कर कहा__"चाचा जी आपका भी।"
इतना कहने के बाद ही वह खूबसूरत बला पलटी और लम्बे लम्बे डग भरती हुई ड्राइंगरूम से बाहर निकल गई। किन्तु उसके जाते ही वहाॅ पर ब्लेड की धार जैसा पैना सन्नाटा भी खिंच गया।
अजय सिंह का दिल जैसे धड़कना भूल गया था। उसे अपनी आंखों के सामने अॅधेरा सा नज़र आने लगा। जाने क्या सोचकर वह तनिक चौंका तथा साथ ही घबरा भी गया। फिर एक ठंडी साॅस खींचते हुए, तथा अपनी आॅखों को मूॅद कर सोफे की पिछली पुश्त से अपना पीठ व सिर टिका दिया। आॅख बंद करते ही उसे फैक्टरी के बेसमेंट मे बने उस कारखाने का मंज़र दिख गया जहां पर सिर्फ और सिर्फ ग़ैर कानूनी चीज़ें मौजूद थी। ये सब नज़र आते ही अजय सिंह ने पट से अपनी आंखें खोल दी तथा एक झटके से सोफे पर से उठा और अपने कमरे की तरफ भारी कदमों से बढ़ गया।
अब आगे......
उस वक्त दोपहर के लगभग साढ़े ग्यारह या बारह के आसपास का समय था जब अजय सिंह, प्रतिमा व अभय सिंह रितू के कहे अनुसार फैक्टरी पहुॅचे। इन लोगों के साथ अजय सिंह का बेटा शिवा भी आना चाहता था किन्तु अजय सिंह उसे अपने साथ नहीं लाया था। उसे डर था कि कहीं वह किसी समय ऐसा वैसा न बोल बैठे जिससे कोई बात बिगड़ जाए। शिवा इस बात से अपने स्वभाव के चलते नाराज़ तो हुआ लेकिन पिता के द्वारा सख़्ती से मना कर देने पर वह मन मसोस कर रह गया था।
फैक्टरी के अंदर जाने से पहले की तरह ही कानूनन अभी प्रतिबंध लगा हुआ था। हलाॅकि पहले हुई छानबीन के मुताबिक प्रतिबंध हटाया ही जा रहा था कि ऐन समय पर रितू के द्वारा जब केस फिर से रिओपेन हो गया तो प्रतिबंध पूर्वत् लगा ही रहा। इसके साथ ही जाने क्या सोच कर इंस्पेक्टर रितू ने वहाॅ की सिक्योरिटी भी टाइट करवा दी थी।
अजय सिंह ने अपनी तरफ से कोशिश तो बहुत की कि उसे एक बार फैक्टरी के अंदर जाने दिया जाए लेकिन उसकी एक न चली थी। उसे इस बात ने भी बुरी तरह हैरान व परेशान कर दिया था कि इस शहर का पूरा पुलिस डिपार्टमेंट ही बदल दिया गया है। ऊॅची रैंक के सभी अफसरों का तबादला हो चुका था एक दिन पहले ही। सब-इंस्पेक्टर से लेकर कमिश्नर तक सबका तबादला कर दिया गया था। अजय सिंह इस बात से बेहद परेशान हो गया था, पुलिस कमिश्नर उसका पक्का यार था जिसके एक इशारे पर उसका हर काम चुटकियों में हो जाता था।
अजय सिंह अपनी हार न मानते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री से भी संबंध स्थापित कर इस केस को रफा दफा करने का दबाव बढ़ाने को कहा किन्तु मुख्यमंत्री ने ये कह कर अपने हाॅथ खड़े कर दिये थे कि वह ऐसा चाह कर भी नहीं कर सकता क्योंकि ऊपर से हाई कमान का शख्त आदेश था कि इस केस से संबंधित किसी भी प्रकार की बात किसी के द्वारा नहीं सुनी जाएगी और न ही किसी के द्वारा कोई हस्ताक्षेप किया जाएगा। पुलिस को पूरी इमानदारी के साथ इस केस की छानबीन करने की छूट दी जाए।
प्रदेश के मुख्यमंत्री की इस बात ने अजय सिंह की रही सही उम्मीद को भी तोड़ दिया था। उसकी हालत उस ब्यक्ति से भी कहीं ज्यादा गई गुज़री हो गई थी जिसे चलने के लिए दो दो बैसाखियों का भी मोहताज होना पड़ता है। अजय सिंह की समझ में नहीं आ रहा था कि एक ही दिन में ये क्या हो गया है? शहर के सारे पुलिस डिपार्टमेंट का क्यों तबादला कर दिया गया?? और....और ऐसा क्या है जिसके चलते प्रदेश के सीएम तक को अपने हाॅथ मजबूरीवश खड़े कर देने पड़े? लाख सिर खपाने के बाद भी ये सब बातें अजय सिंह की समझ में नहीं आ रही थीं। वह इतना ज्यादा परेशान व हताश हो गया था कि उसे हर तरफ सिर्फ और सिर्फ अॅधेरा ही अॅधेरा दिखाई देने लगा था। ऐसा लगता था कि वह चक्कर खा कर अभी गिर जाएगा। हलाॅकि वो ये सब अपने चेहरे पर से ज़ाहिर नहीं होने देना चाहता था किन्तु वह इसका क्या करे कि लाख कोशिशों के बाद भी दिलो दिमाग़ में ताण्डव कर रहे इस तूफान को वह अपने चेहरे पर उभर आने से रोंक नहीं पा रहा था।
इंस्पेक्टर रितु पुलिस की वर्दी पहने कुछ ऐसे पोज में खड़ी थी कि अजय सिंह को वह किसी यमराज की तरह नज़र आ रही थी।
images
अजय सिंह अपनी ही बेटी से बुरी तरह भयभीत हुआ जा रहा था। बार बार वह अपने रुमाल से चेहरे पर उभर आते पसीने को पोछ रहा था।
"मैं आप सबको ये बताना चाहती हूॅ कि फैक्टरी की इसके पहले हुई छानबीन से मेरा कोई मतलब नहीं है।" रितु ने अजय सिंह के साथ आए बाॅकी सब पर एक एक नज़र डालने के बाद अजय सिंह से कहा__"अब क्योंकि ये केस फिर से मेरे द्वारा रिओपेन हुआ है तो इस केस की छानबीन मैं शुरू से और नए सिरे से ही करूॅगी। उम्मीद करती हूॅ कि आपको इस सबसे कोई ऐतराज़ नहीं होगा बल्कि इस छानबीन में आप खुद पुलिस का पूरा पूरा सहयोग देंगे।"
"तुमने बेकार ही इस केस को रिओपेन किया है बेटी।" अजय सिंह ने नपे तुले भाव से कहा__"मैं तो कहता हूॅ कि अभी भी कुछ नहीं हुआ है, अभी भी इस केस की फाइल बंद की जा सकती है। कोई ज़रूरत नहीं है इस सबकी, क्योंकि इससे वो सब कुछ मुझे वापस तो मिलने से रहा जो जल कर खाक़ हो गया है।"
"अब ये केस रिओपेन हो चुका है ठाकुर साहब।" रितु ने अपने ही बाप को ठाकुर साहब कह कर संबोधित किया।
अजय सिंह इस बात से हैरान रह गया, जबकि रितु कह रही थी__"और जब तक इस केस से संबंधित कोई रिजल्ट सामने नहीं आता तब तक ये केस क्लोज नहीं हो सकता। केस को क्लोज करना मेरे बस में नहीं है बल्कि ये ऊपर से ही आदेश है कि केस को अब अच्छी तरह से ही किसी नतीजे के साथ बंद किया जाए।"
"ठीक है रितु बेटी।" सहसा प्रतिमा ने कहा__"तुम अपनी ड्यूटी निभाओ, हम भी देखना चाहते हैं कि इस सबके पीछे किसका हाॅथ है?"
"मुआफ़ कीजिये, इस वक्त मैं आपकी बेटी नहीं बल्कि एक पुलिस आॅफिसर हूॅ और अपनी ड्यूटी कर रही हूॅ।" रितु ने सपाट लहजे से कहा__"एनीवे, तो शुरू करें ठाकुर साहब??"
रितु की बात से जहाॅ प्रतिमा को एक झटका सा लगा वहीं अजय सिंह की घबराहट बढ़ने लगी थी।
"मेरा सबसे पहला सवाल।" रितु ने कहा__"फैक्टरी में आग लगने की सूचना सबसे पहले आपको कैसे हुई?"
अजय सिंह क्योंकि समझ चुका था इस लिए अब उसने भी अपने आपको इस केस से संबंधित किसी भी प्रकार की छानबीन या तहकीकात के लिए तैयार कर लिया।
"फैक्टरी में आग लगने की सूचना उस रात लगभग तीन बजे मेरे पीए के द्वारा मुझे मिली।" अजय सिंह ने कहा__"मैं अपनी पत्नी के साथ अपने कमरे में उस वक्त सोया हुआ था, जब मेरे पीए का फोन आया था। उसने ही बताया कि हमारी फैक्टरी में आग लग गई है।"
"इसके बाद आपने क्या किया?" रितू ने पूछा।
"मैने वही किया।" अजय सिंह कह रहा था__"जो हर इंसान इन हालातों में करता है। अपने पीए के द्वारा फोन पर मिली सूचना के तुरंत बाद ही मैं वहां से शहर के लिए निकल पड़ा। जब सुबह के प्रहर मैं यहाॅ पहुॅचा तो सब कुछ तबाह हो चुका था।"
"फैक्टरी पहुॅच कर आपने क्या ऐक्शन लिया?" रितू ने पूछा।
"किसी प्रकार का ऐक्शन लेने की हालत ही नहीं थी उस वक्त मेरी।" अजय सिंह बोला__"अपनी आॅखों के सामने अपना सब कुछ खाक़ में मिल गया देख होश ही नहीं था मुझे। कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या करूॅ क्या न करूॅ? वो तो मेरे पीए ने ही बताया कि फैक्टरी में आग लगने के बाद उसने इस संबंध में क्या क्या किया है?"
"मैं आपके पीए का बयान लेना चाहती हूॅ।" रितू ने कहा__"आप उन्हें बुला दीजिए प्लीज।"
अजय सिंह को बुलाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी क्यों पीए वहीं था, और पीए ही बस क्यों बल्कि फैक्टरी के स्टाफ का लगभग हर ब्यक्ति वहाॅ मौजूद था। सबको पता हो चुका था कि फैक्टरी की दुबारा छानबीन हो रही है इस लिए हर ब्यक्ति उत्सुकतावश वहाॅ मौजूद था।
अजय सिंह ने इशारे से पीए को बुलाया। वह तुरंत ही हाज़िर हो गया।
"आपका नाम?" रितु ने पीए के हाज़िर होते ही सवाल किया।
"जी मेरा नाम दीनदयाल शर्मा है।" पीए ने बताया।
"ठाकुर साहब की फैक्टरी में कब से ऐज अ पीए काम कर रहे हैं?" रितू ने पूछा।
"जी लगभग छः साल हो गए।" दीन दयाल ने कहा।
"छः साल काफी लम्बा समय होता है ये तो आप भी जानते होंगे?" रितु ने अजीब भाव से कहा__"कहने का मतलब ये कि इन छः सालो में आपको अपने मालिक और उनके काम के बारे अच्छी तरह जानकारी होगी।"
"जी शायद।" दीनदयाल ने अनिश्चित भाव से कहा__"शायद शब्द इस लिए कहा कि छः साल अपने मालिक के नजदीक रह कर भी ये बात मैं दावे के साथ नहीं कह सकता कि मैं उनके और उनके काम के बारे में पूरी तरह ही जानता हूॅ। बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जो कोई भी मालिक अपने किसी नौकर को बताना ज़रूरी नहीं समझता।"
"आपने बिलकुल ठीक कहा।" रितू ने कहा__"खैर, तो अब आप बताइये कि उस रात क्या क्या और किस तरह हुआ?"
"ज जी क्या मतलब?" दीनदयाल चकराया।
"मेरे कहने का मतलब है कि जिस रात फैक्टरी में आग लगी थी।" रितू ने कहा__"उस रात की सारी बातें आप विस्तार से बताइए।"
दीनदयाल ने कुछ पल सोचा फिर वो सब बताता चला गया जो उस रात हुआ था। उसने वही सब बताया जो हवेली में अभय सिंह से पूछने पर अजय सिंह ने उसे बताया था और उधर मुम्बई में निधि ने सबको अखबार के माध्यम से बताया था। (दोस्तो, आप सबको भी पता ही होगा)
सब कुछ सुनने के बाद रितू ने गहरी साॅस ली और वहीं पर चहलकदमीं करते हुए कहा__"तो आपकी और पुलिस की छानबीन के बाद तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार फैक्टरी में आग लगने की मुख्य वजह सिर्फ सार्ट शर्किट ही है?"
"जी पुलिस ने तो अपनी यही रिपोर्ट छानबीन के बाद तैयार करके दी थी।" दीनदयाल ने कहा।
"क्या आपने इस बात पर विचार नहीं किया या फिर क्या आपने इस नज़रिये से नहीं सोचा कि फैक्टरी में आग किसी के द्वारा लगाई गई भी हो सकती है?" रितू ने पूछा था।
"इस बारे में न सोचने की भी वजह थी इंस्पेक्टर।" सहसा अजय सिंह ने कमान सम्हालते हुए कहा__"दरअसल जिस दिन फैक्टरी में आग लगी थी उस दिन सभी वर्कर्स के लिए अवकाश था। इस लिए उस रात फैक्टरी में कोई था ही नहीं। और जब कोई था ही नहीं तो भला इस बारें में कैसे कह सकते थे किसी अन्य के द्वारा फैक्टरी में आग लगी?"
"चलिए मान लिया कि उस रात अवकाश के चलते कोई भी वर्कर फैक्टरी में नहीं था।" रितू ने कहा__"किन्तु सवाल ये है कि अवकाश के चलते क्या कोई भी फैक्टरी में नहीं था? जहाॅ तक मुझे पता है तो इतनी बड़ी फैक्टरी में अवकाश के चलते हर कोई फैक्टरी से नदारद नहीं हो सकता। मतलब फैक्टरी की सुरक्षा ब्यवस्था के लिए वहाॅ गार्ड्स मौजूद होते हैं और बहुत मुमकिन है कि फैक्टरी के स्टाफ में से भी कोई न कोई फैक्टरी में मौजूद रहता है।"
"बिलकुल इंस्पेक्टर।" अजय सिंह ने कहा__"हप्ते में एक दिन फैक्टरी बंद रहती है इस लिए फैक्टरी में काम करने वाले मजदूरों को अवकाश दे दिया जाता है।
लेकिन उस अवकाश वाले दिन ऐसा नहीं होता कि पूरी फैक्टरी सुनसान हो जाती है, बल्कि फैक्टरी की देख रेख और उसकी सुरक्षा ब्यवस्था के लिए वहाॅ पर चौबीसों घंटे सिक्योरिटी गार्ड्स रहते हैं तथा फैक्टरी स्टाफ के भी कई मेंबर फैक्टरी में रहते हैं।" इतना कहने के बाद अजय सिंह एक पल रुका फिर कुछ सोच कर बोला__"अगर तुम्हारा ख़याल ये है इंस्पेक्टर कि इन्हीं सब लोगों में से ही किसी ने फैक्टरी में आग लगाई हो सकती है तो तुम्हारा ख़याल ग़लत है। क्योकि ये सब मेरे सबसे ज्यादा फरोसेमंद आदमी हैं जिनकी ईमानदारी पर मुझे लेस मात्र भी शक नहीं है।"
"अपने आदमियों पर भरोसा करना बहुत अच्छी बात है ठाकुर साहब।" रितू ने कहा__"लेकिन अंधा विश्वास करना कोई सबझदारी नहीं है। ख़ैर, तो आपके कहने का मतलब है कि फैक्टरी से रिलेटेड किसी भी ब्यक्ति ने फैक्टरी में आग नहीं लगाई हो सकती?"
"बिलकुल।" अजय सिंह ने जोर देकर कहा__"इन पर मेरा ये भरोसा ही है वर्ना अगर भरोसा नहीं होता तो मैं पहले ही इन सब पर इस सबके लिए शक ज़ाहिर करता और तुम्हारे पुलिस डिपार्टमेंट से इस बारे में तहकीकात करने की बात कहता। और एक पल के लिए अगर मैं ये मान भी लूॅ कि मेरे आदमियों में से ही किसी ने ये काम किया हो सकता है तब भी ये साबित नहीं हो सकता। क्योकि अवकाश वाले दिन फैक्टरी में ताला लगा होता है और बाकी के फैक्टरी स्टाफ मेंबर फैक्टरी से अलग अपनी अपनी डेस्क या केबिन में होते हैं। यहाॅ पर अगर ये तर्क दिया जाए कि अवकाश से पहले ही या फैक्टरी में ताला लगने से पहले ही किसी ने ऐसा कुछ कर दिया हो जिससे फैक्टरी के अंदर आग लग जाए तब भी ये तर्कसंगत नहीं है। क्योकि ये तो हर स्टाफ मेंबर जानता है कि फैक्टरी में हुए किसी भी हादसे से सबसे पहले उन्हीं पर ही शक किया जाएगा, उस सूरत में उन पर कड़ी कार्यवाही भी की जाएगी और अंततः वो पकड़े ही जाएॅगे। इस लिए कोई भी स्टाफ मेंबर जानबूझ कर अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मार लेने वाला काम करेगा ही नहीं।"
"आपके तर्क अपनी जगह बिलकुल ठीक हैं ठाकुर साहब।" रितु ने एक हाॅथ में पकड़े हुए पुलिसिया रुल को अपने दूसरे हाॅथ की हॅथेली पर हल्के से मारते हुए कहा__"अब इसी बात को अपने फैक्टरी स्टाफ के नज़रिये से देख कर ज़रा ग़ौर कीजिए। कहने का मतलब ये कि मान लीजिए कि मैं ही वो फैक्टरी की स्टाफ मेंबर हूॅ जिसने फैक्टरी में आग लगाई है और मैं ये बात अच्छी तरह जानती हूॅ कि मेरे द्वारा किए गए काण्ड से आपका शक सबसे पहले मुझ पर ही जाएगा जो कि स्वाभाविक ही है, इस लिए आपके मुताबिक मैं ये काम नहीं कर सकती, क्योंकि सबसे पहले मुझ पर ही शक जाने से मैं फॅस जाऊॅगी, ये आप सोचते हैं। जबकि मैंने आपकी सोच के उलट ये काम कर ही दिया है और आप सोचते रहें कि मैंने ये काम नहीं किया हो सकता।
"
"दिमाग़ तो तुमने काबिले-तारीफ़ लगाया है इंस्पेक्टर।" अजय सिंह ने मुस्कुराकर कहा__"यकीनन तुमने दोनो पहलुओं के बारे में बारीकी से सोच कर तर्कसंगत विचार प्रकट किया है लेकिन ये एक संभावना मात्र ही है, कोई ज़रूरी नहीं कि इसमें कोई सच्चाई ही हो।"
"सच्चाई का ही तो पता लगाना है ठाकुर साहब।" रितु ने कहा__"और उसके लिए हर किसी के बारे में दोनों पहलुओं पर सोचना ही पड़ेगा। ख़ैर, मुझे ऐसा लगता है कि आप ही इस प्रकार से सोच विचार नहीं करना चाहते, जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए। ये सोचने वाली बात है।"
अजय सिंह ये सुन कर एक पल के लिए गड़बड़ा सा गया। फिर तुरंत ही सहल कर बोला__"ऐसा कुछ नहीं है इंस्पेक्टर। मैं तो बस इस लिए नहीं सोच विचार कर रहा क्योंकि मेरे हिसाब से इस सबका रिजल्ट पहले निकाला जा चुका है।"
अजय सिंह की इस बात से रितू ने कुछ न कहा बल्कि बड़े ग़ौर से अपने पिता के चेहरे की तरफ देखती रही। ऐसा लगा जैसे कि वह अपने पिता के चेहरे पर उभर रहे कई तरह के भावों को समझने की कोशिश कर रही हो। वहीं अजय सिंह ने जब अपनी बेटी को अपनी तरफ इस तरह गौर से देखते हुए देखा तो उसे बड़ा अजीब सा महसूस हुआ। उससे नज़रें मिलाने में उसकी हिम्मत जवाब देने लगी। उसे लगा कहीं ऐसा तो नहीं कि उसकी बेटी उसके चेहरे के भावों को पढ़ कर ही सारा सच जान गई हो। इस एहसास ने उसे अंदर तक कॅपकॅपा कर रख दिया। बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हालते हुए कहा__"क्या हुआ इंस्पेक्टर, इस तरह क्यों देख रही हो मुझे? अपनी कार्यवाही को आगे बढ़ाओ।"
"देख रही हूॅ कि आपके चेहरे पर उभरते हुए अनगिनत भाव किस बात की गवाही दे रहे हैं?" रितू ने अजीब से भाव से कहा।
"क क्या मतलब??" अजय सिंह बुरी तरह चौंका था।
"जाने दीजिए।" रितू ने कहा__"देखिए फारेंसिक डिपार्टमेंट वाले भी आ गए। आइए फैक्टरी के अंदर चलते हैं।"
अजय सिंह एकाएक अंदर ही अंदर बुरी तरह घबरा सा गया। उसे तो लगने लगा था कि बातें अब तक उसके पक्ष में ही हैं और इतनी पूछताॅछ के बाद कार्यवाही बंद कर दी जाएगी। लेकिन उसे अब महसूस हुआ कि ये सब तो महज एक औपचारिक पूछताॅछ थी असली छानबीन तो अब शुरू होगी।
फाॅरेंसिक डिपार्टमेंट की टीम आ चुकी थी तथा खोजी दस्ता भी। गाड़ियों से निकल कर सब बाहर आ गए। अजय सिंह उस वक्त और बुरी तरह चौंका जब गाड़ियों के अंदर से कुछ कुत्ते बाहर निकले। अजय सिंह को समझते देर न लगी कि ये कुत्ते इस सबकी छानबीन मे उन सबकी सहायता के लिए ही हैं।
पल भर में ही अजय सिंह की हालत ख़राब हो गई। इस सबके बारे में उसने ख्वाब तक में न सोचा था। आज पहली बार उसे लगा कि अपनी बेटी रितू को पैदा करके उसने बहुत बड़ी भूल की थी।
दोस्तो अपडेट हाज़िर है......
मुआफ़ करना मैंने यहीं पर कुछ सोचते हुए इस अपडेट को विराम दे दिया है।
अपनी राय और सुझाव देते रहिए,,,,,,
कुछ सवाल हैं आप सबके लिए,,
क्या लगता है आपको इस छानबीन को अजय सिंह रोंक पाएगा या नहीं????
क्या इंस्पेक्टर रितू को ये पता चलेगा कि किस वजह से फैक्टरी में आग लगी थी?????
छानबीन के दौरान कैसे हालात बनेंगे?????
छानबीन में अजय सिंह की असलियत सामने आएगी कि नहीं...और अगर आएगी तो क्या सीन होगा उस समय???
असलियत का पता चलने के बाद अभय सिंह का क्या रियेक्शन होगा????
अजय सिंह की असलियत खुद उसकी पत्नी प्रतिमा को पता है कि नहीं?????
ऐसे बहुत से सवाल हैं दोस्तो.....आप भी अपना अपना विचार ब्यक्त कीजिए और अगले अपडेट से अपने विचारों का मिलान कीजिए कि आपके विचार कहाॅ तक सही थे।
धन्यवाद,,,,,
अपडेट...........《 17 》
अब तक......
"देख रही हूॅ कि आपके चेहरे पर उभरते हुए अनगिनत भाव किस बात की गवाही दे रहे हैं?" रितू ने अजीब से भाव से कहा।
"क क्या मतलब??" अजय सिंह बुरी तरह चौंका था।
"जाने दीजिए।" रितू ने कहा__"देखिए फारेंसिक डिपार्टमेंट वाले भी आ गए। आइए फैक्टरी के अंदर चलते हैं।"
अजय सिंह एकाएक अंदर ही अंदर बुरी तरह घबरा सा गया। उसे तो लगने लगा था कि बातें अब तक उसके पक्ष में ही हैं और इतनी पूछताॅछ के बाद कार्यवाही बंद कर दी जाएगी। लेकिन उसे अब महसूस हुआ कि ये सब तो महज एक औपचारिक पूछताॅछ थी असली छानबीन तो अब शुरू होगी।
फाॅरेंसिक डिपार्टमेंट की टीम आ चुकी थी तथा खोजी दस्ता भी। गाड़ियों से निकल कर सब बाहर आ गए। अजय सिंह उस वक्त और बुरी तरह चौंका जब गाड़ियों के अंदर से कुछ कुत्ते बाहर निकले। अजय सिंह को समझते देर न लगी कि ये कुत्ते इस सबकी छानबीन मे उन सबकी सहायता के लिए ही हैं।
पल भर में ही अजय सिंह की हालत ख़राब हो गई। इस सबके बारे में उसने ख्वाब तक में न सोचा था। आज पहली बार उसे लगा कि अपनी बेटी रितू को पैदा करके उसने बहुत बड़ी भूल की थी।
अब आगे......
इंस्पेक्टर रितू के निर्देशानुसार पुलिस और बाॅकी विभाग की टीम्स फैक्टरी की तरफ बढ़ चली, और साथ ही बढ़ चली थी अजय सिंह की हृदय गति। हलाॅकि उसके साथ आए बाॅकी सब नार्मल थे। प्रतिमा और अभय के चेहरे पर गंभीरता के भाव ज़रूर थे किन्तु ये दोनो अजय सिंह की तरह अपनी हालत से लाचार या परेशान नहीं थे।
छानबीन करने आई बाॅकी सब टीमों के पीछे पीछे अजय, प्रतिमा व अभय भी चल रहे थे किन्तु अजय सिंह के कदम बड़ी मुश्किल से उठ रहे थे।
"सब ठीक हो जाएगा अजय।" सहसा प्रतिमा ने अजय की हालत देख उसे दिलाशा देने की गरज से कहा__"अब तो हमारी बेटी ने खुद ही इस केस को अपने हाॅथ में ले लिया है। मुझे पूरा यकीन है कि वो सब कुछ पता कर लेगी। हमारी फैक्टरी में आग लगाने के पीछे तथा हमें बरबाद करने के पीछे जिस किसी का भी हाॅथ होगा वह उसे ज़रूर पकड़ लेगी। तुम बस खुद को सम्हालो और अपनी ऐसी शकल न बनाए रखो।
"
"भाभी बिलकुल ठीक कह रही हैं बड़े भइया।" अभय ने कहा__"आपको अब इस तरह परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है। यकीनन रितू बेटी के चलते सब कुछ ठीक हो जाएगा। मुझे अपनी भतीजी पर गर्व है कि उसने पुलिस फोर्स ज्वाइन किया और ज्वाइन करते ही उसे अपनी ही फैक्टरी में लगी आग का ये केस मिल गया। मुझे उसकी काबिलियत पर पूरा भरोसा है। आप बेफिक्र हो जाइए भइया...इवरीथिंग विल वी आलराइट।"
अजय सिंह इन दोनो को भला क्या कहता??? वह भला क्या कहता कि वह किस बात से परेशान है? वह भला क्या कहता कि जिस भतीजी पर वह गर्व कर रहा है उसकी उसी भतीजी की वजह से आज वह पल पल इस हालत से मरा जा रहा है। हालात ने कितना बेबस व लाचार बना दिया था उसे कि सक्षम होने के बावजूद भी वह कुछ नहीं कर सकता था। हिन्दू धर्म के जितने भी देवी देवताओं का उसे पता था उसने उन सबको मन ही मन याद करके उनसे ये फरियाद कर डाली थी कि ये केस तथा ये छानबीन बस यहीं पर रुक जाए मगर ऐसा होता उसे अब तक नज़र नहीं आया था। इतना बेबस तथा इतना परेशान आज से पहले वह अपनी ज़िन्दगी में कभी न हुआ था। उसने तो ये तक सोच लिया था कि अगर ये छानबीन रुक जाए तथा ये केस बंद हो जाए तो वह अब से इस गैर कानूनी काम को करने से हमेशा के लिए तौबा कर लेगा। मगर ये भी सच है न दोस्तो कि जब हम किसी चीज़ के बीज बो चुके होते हैं तो फिर बाद में हमें उस बीज के द्वारा उत्पन्न हुई फसल को काटना भी पड़ता है या उस बीज से उग आए फल को खाना भी पड़ता है। यही नियति बन गई थी अजय सिंह की, मगर अब वह अपने ही द्वारा बोये हुए बीज से उत्पन्न हुए फल को खाना नहीं चाहता था।
उधर फैक्टरी के इंट्री गेट पर लगे ताले को पुलिस के एक हवलदार ने अपनी जेब से चाभी निकाल कर खोला। ताला खोलने के बाद भारी भरकम लोहे के गेट को दो आदमी की मदद से खोला गया। गेट के खुलते ही सब अंदर की तरफ बढ़ गए। पुलिस के साथ आए खोजी कुत्ते भी एक पुलिस वाले के हाथ में थमी जंजीर के सहारे फैक्टरी के अंदर चले गए। ये लिखने की आवश्यकता नहीं कि इन सबके पीछे अजय, प्रतिमा व अभय भी अंदर चले गए।
ये एक बहुत बड़ा फार्म हाउस हुआ करता था पहले। अजय सिंह ने जब इस बिजनेस की शुरुआत की थी तो किसी दूसरे सेठ की वर्षों से बंद कपड़ा फैक्टरी को सस्ते दामों में खरीदा था। (ये सब बातें कहानी के पहले या दूसरे अपडेट में बताई जा चुकी हैं) उस समय ये कपड़ा फैक्टरी शहर के बीच ही बनी हुई थी। कुछ सालों बाद जब अजय सिंह की इस बिजनेस से अच्छे खासे मुनाफे के रूप में तरक्की हुई तो उसने इस फैक्टरी को नये सिरे से तथा नई मशीनों के साथ शुरू करने का विचार किया। अजय सिंह क्योंकि बहुत ही लालची व महत्वाकांक्षी आदमी था, और बढ़ती आय के साथ उसकी बुरी आदतों में भी इज़ाफा हुआ इस लिए पैसे के लिए वह उन रास्तों को भी अपना लिया जिसे गैर कानूनी कहा जाता है।
इस रास्ते में उसके कई अपने गैर कानूनी लोग भी थे। किन्तु गैर कानूनी काम में रिश्क बहुत था तथा शहर के बीच उस छोटी सी फैक्टरी में इस काम को अंजाम देने में आसानी नहीं होती थी। कभी भी लोगों के बीच खुद की असलियत सामने आ जाने का खतरा बना रहता था। इस लिए उसने बहुत सोच समझ कर शहर से बाहर एक बहुत बड़ी ज़मीन ख़रीदी तथा वहाॅ पर इसने नये तरीके से फैक्टरी का निर्माण किया। फैक्टरी काफी बड़ी थी तथा उसके नीचे एक बड़ा बेसमेंट भी बनवाया गया था जो सिर्फ गैर कानूनी चीज़ों के उपयोग में ही आता था। यहाॅ पर उसे किसी चीज़ का खतरा नहीं था। फैक्टरी में मजदूरों को हप्ते में एक दिन अवकाश देने के पीछे भी उसका एक मकसद था। वो मकसद ये था कि अवकाश वाले दिन ही वह स्वतंत्र रूप से अपने गैर कानूनी धंधे को चलाता था। जिसके बारे में कभी किसी को भनक तक न लगी थी। फैक्टरी को बहुत सोच समझ कर ही बनवाया गया था। फैक्टरी के अंदर सिर्फ मशीनें थी जहाॅ पर मजदूर काम करते थे, जबकि फैक्टरी के आला अफसर या बाॅकी स्टाफ फैक्टरी से दूर कुछ फाॅसले पर बने एक बड़े से आफिस में होते थे।
अजय सिंह ने कदाचित ख़्वाब में भी न सोचा था कि कभी ऐसा भी समय उसके जीवन में आ जाएगा जब उसकी इस विसाल फैक्टरी में आग लग जाएगी और इस सबकी छानबीन खुद उसकी ही बेटी पुलिस इंस्पेक्टर बन कर करेगी। कानून का डर उसे कभी नहीं था क्योंकि उसने कानून के नुमाइंदों को अपने वश में कर लिया था। हर महीने वह अच्छी खासी रकम पुलिस के आला अफसरों तक पहुॅचवा देता था। उसके मंत्री तक से अच्छे संबंध थे इस लिए उसे इस धंधे में किसी का कोई डर नहीं था। मगर होनी को कौन टाल सकता था भला? होनी तो अटल होती है, बिना बताए तथा बिना किसी सूचना के वो अपना काम कर डालती है। यही अजय सिंह के साथ हुआ था।
ख़ैर ये सब तो बीती बातें हैं दोस्तो, आइए हम सब वर्तमान की तरफ चलते हैं और देखते हैं कि आगे क्या हो रहा है?
फैक्टरी के अंदर का नज़ारा ही कुछ अलग था। जैसा कि आप सब जानते हैं कि फैक्टरी में भीषण आग लगी हुई थी जिसमें सब कुछ जल कर खाक़ में मिल चुका था। अंदर हर चीज़ कोयला बन चुकी थी। हर जगह पानी में सनी हुई राख तथा टूटे हुए बहुत से टुकड़े पड़े थे। कुछ पल के लिए तो रितू को भी समझ न आया कि इस राख में वह क्या तलाश करे? किन्तु कुछ तो करना ही था, केस रिओपेन हुआ था। इस लिए बिना किसी नतीजे के वह बंद नहीं हो सकता था। ऊपर से आदेश था कि छानबीन अच्छे से होनी चाहिए।
पुलिस के खोजी कुत्ते तथा फाॅरेंसिक डिपार्टमेंट के लोग अपने अपने काम में लग गए। खुद रितू भी वहाॅ की हर चीज़ को बारीकी से देख देख कर जाॅच करने लगी। जबकि इधर अजय, प्रतिमा व अभय चुपचाप उन सबकी कार्यप्रणाली को देखते रहे।
बड़ी बड़ी मशीनों पर जले हुए कपड़ों की राख तथा टुकड़े लिपटे हुए थे।
कहीं कहीं पर पिघले हुए शीशे एवं प्लास्टिक नज़र आ रहे थे। अजय सिंह ये सब होने के बाद पहली बार ये सब ध्यान से देख रहा था तथा साथ ही अंदर ही अंदर दुखी भी हो रहा था। कुछ भी हो आखिर उसकी मेहनत का पैसा था वह, फिर चाहे गैर कानूनी वाला हो या फिर सच्चाई वाला।
"मैडम, यहाॅ पर कुछ है।" सहसा एक हवलदार रितू को दूर से ही चिल्लाते हुए कहा।
रितु के साथ साथ सबके कान खड़े हो गए। अजय सिंह की बढ़ी हुई धड़कन मानों उसे रुकती हुई प्रतीत हुई। चेहरे पर तुरंत ही ढेर सारा पसीना उभर आया, तथा चेहरा भय व घबराहट की वजह से पीला पड़ता चला गया। उसने जल्दी से खुद को सम्हाला। अपने दाहिने हाॅथ में लिए रुमाल से उसने तुरंत ही अपने चेहरे का पसीना पोंछा और सरसरी तौर पर इधर उधर देखा। प्रतिमा उसे देख कर तुरंत ही उसके करीब गई तथा हौले से पूछा__"क्या बात है अजय, तुम इतना परेशान और घबराए हुए क्यों लग रहे हो?"
"म मैं क कहाॅ परेशान हूॅ?" अजय सिंह हकलाते हुए बोला__"मैं ठीक हूॅ? ऐसा क्यों लगता है तुम्हें कि मैं परेशान व घबराया हुआ हूॅ?"
प्रतिमा ने उसे बड़े ग़ौर से देखा, फिर कहा__"मुझे ऐसा क्यों लगता है अजय कि जैसे तुम मुझसे कुछ छुपा रहे हो? या फिर ऐसा कि तुम किसी बात से इस लिए घबरा रहे हो कि किसी को वो बात पता न चल जाए।"
अजय सिंह हड़बड़ा गया, आॅखें फाड़े प्रतिमा को देखने लगा। मन में विचार उभरा 'बेटी क्या कम थी जो अब उसकी माॅ भी मेरी जान लेने पर उतारू हो गई है'।
"ऐसे क्यों देख रहे हो मुझे?" प्रतिमा ने कहा__"क्या मैंने कुछ ग़लत कह दिया है?"
"देखो प्रतिमा।" अजय सिंह ने खुद को सम्हाल कर कहा__"मैं इस वक्त किसी से कुछ नहीं कहना चाहता, इस लिए बेहतर होगा कि तुम भी मुझसे कोई सवाल जवाब न करो।"
"मैं तुम्हारी पत्नी हूॅ अजय।" प्रतिमा ने एकाएक अधीरता से कहा__"तुम्हें इस तरह परेशानी की हालत में नहीं देख सकती। तुम जानते हो कि हर काम में मैं तुम्हारे साथ हूॅ, फिर चाहे वो काम कैसा भी क्यों न हो। तुम्हारी खुशी के लिए हर वो काम कर जाती हूॅ जिसे करने का तुम मुझसे कहते हो। मैं ये भी जानती हूॅ कि तुम मुझसे कोई भी बात नहीं छुपाते फिर ऐसी क्या बात हो गई है जिसे तुम मुझसे छुपा कर खुद अंदर ही अंदर घुटे जा रहे हो?"
"ऐसी कोई बात नहीं है।" अजय सिंह ये सोच कर घबराया जा रहा था कि कहीं कोई ये सब बातें सुन न ले, इस लिए वह बोला__"अब चुप हो जाओ प्लीज।"
"अगर ऐसी कोई बात नहीं है तो यही बात तुम मेरे सिर पर हाॅथ रख कर कहो।" प्रतिमा ने कहने साथ ही अजय सिंह का एक हाॅथ पकड़ कर अपने सिर पर रख लिया।
"ये क्या पागलपन है यार?" अजय सिंह ने तुरंत ही प्रतिमा के सिर से अपना हाॅथ एक झटके में खींच कर थोड़ी ऊॅची आवाज़ में कहा था।
उसकी आवाज़ सुन कर अभय का ध्यान उनकी तरफ गया तो वह सीघ्र ही उनके पास आकर ब्याकुलता से बोला__"क्या हुआ भइया? कुछ परेशानी है क्या?"
"न नहीं छोटे।" अजय सिंह मन ही मन झुंझला उठा था किन्तु प्रत्यक्ष मे उसने यही कहा__"ऐसी कोई बात नहीं है।"
अभय ने उसके चेहरे की तरफ कुछ पल देखा फिर वह वापस अपनी जगह पर आकर खड़ा हो गया। जबकि अभय के जाते ही अजय सिंह ने प्रतिमा की तरफ देख कर कहा__"फार गाड शेक..अब कुछ मत बोलना।"
"ये तुम बिलकुल भी अच्छा नहीं कर रहे हो अजय।" प्रतिमा ने कहा__"अगर कोई बात है तो तुम्हें मुझसे बेझिझक बता देना चाहिए, हो सकता है कि मैं तुम्हारी कोई मदद कर सकूॅ।"
"अगर कोई बात है भी तो।" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली__"तो इस वक्त नहीं बता सकता, बट बिलीव मी तुम्हें सब कुछ ज़रूर बताऊॅगा। अब जाओ यहाॅ से और मुझे अकेला मेरे हाल पर छोंड़ दो।"
प्रतिमा ने कुछ देर अजय की आंखों में देखा और फिर पलट कर अभय के पास आ गई। उसके मन में हज़ारों विचार किसी बिच्छू की तरह डंक मार मार कर उछल कूद कर रहे थे।
उधर हवलदार के चिल्लाने पर रितू तेज़ी से उसके करीब पहुॅची। रितू के आते ही हवलदार ने सामने की तरफ इशारा किया। रितू ने हवलदार की बताई हुई जगह को देखा तो चौंक गई। दरअसल पिघले हुए प्लास्टिक के नीचे कोई चीज़ थी लाल रंग की। रितू फर्स पर बैठ कर उसे ध्यान से देखने लगी। अपने हाॅथों में ग्लव्स पहन कर उसने उस लाल रंग की चीज़ को उठा लिया। अभी वह उसे ध्यान से देख ही रही थी कि फाॅरेंसिक टीम का एक ब्यक्ति उसके नज़दीक आकर बोला__"मैडम, यहाॅ पर एक बेसमेंट भी है।"
"क्या??" रितू चौंकी।
"यस मैडम।" उस ब्यक्ति ने कहा__"खोजी कुत्ते के द्वारा पता चला है।"
" चलो दिखाओ।" रितू तुरंत ही उठकर चल दी। कुछ देर में ही वो ब्यक्ति रितू को लेकर उस जगह पहुॅचा। रितू ने देखा सचमुच वो तहखाना ही था। किन्तु वह ये देख कर चौंकी कि वह अस्त ब्यस्त हुआ लग रहा था जैसे किसी चीज़ से उसे उड़ाया गया हो। उसे तुरंत ही अपने हाॅथ में ली हुई चीज़ का खयाल आया। उसने अपने हाॅथ में ली हुई चीज़ को उस ब्यक्ति को दिखाकर पूछा__"इस चीज़ को देखो और बताओ ये क्या है?"
"अजयययययय।" अचानक ही एक ज़ोरदार चीख फिज़ा को चीरती हुई सबके कानों से टकराई।
चीख बाहर से आई थी, रितू के साथ साथ सबने सुना किन्तु रितू बाहर की तरफ ये कह कर दौड़ पड़ी कि__"माॅम।"
यकीनन ये चीख प्रतिमा की ही थी। रितू ने बाहर आकर देखा उसकी माॅ और अभय चाचा उसके डैड के पास अजीब हालत में बैठे थे। अजय सिंह जमीन में पड़ा था। अभय ने तुरंत ही उसे अपनी गोंद मे लिटा लिया था।
"माॅम।" रितू करीब पहुॅचते ही बोली__"ये क्या हुआ? डैड इस तरह जमीन में कैसे?"
"पता नहीं बेटा अचानक ही खड़े खड़े धड़ाम से गिर गए।
" प्रतिमा ने रोते हुए कहा__"शायद फैक्टरी की ये हालत देख इन्हें गहरा सदमा लगा है जिसके चलते ये चक्कर खाकर गिर गए हैं।"
अजय सिंह पानी से सनी राख पर गिरा था। जमीन में हर तरफ छोटे बड़े पत्थर भी पड़े थे जो अजय सिंह के सिर पर लगे थे और उसके सिर से खून बहने लगा था।
"इन्हें हास्पिटल लेकर जाना पड़ेगा रितू बेटा।" अभय ने कहने के साथ ही अजय सिंह को दोनो हाथों से पकड़ कर उठा लिया और तेज़ कदमों के साथ लोहें वाले गेट से बाहर निकल गया।
"मैं भी उनके साथ हास्पिटल जा रही हूं बेटी।" प्रतिमा ने कहा__"तुझे अपनी ड्यूटी करना है तो कर या तू भी अपने डैड के साथ चल।"
"साॅरी माॅम।" रितू की आॅख में आॅसू आ गए__"इस वक्त मैं आनड्यूटी पर हूॅ और केस के सिलसिले में यहाॅ अपनी टीम्स के साथ हूॅ इस लिए मैं डैड के साथ नहीं जा सकती। लेकिन डैड से कहना कि मुझे उनकी इस हालत से बहुत तकलीफ हो रही है।"
"अच्छी बात है।" प्रतिमा ने कहा और बाहर की तरफ दौड पड़ी। जबकि अपने आॅसू पोंछते हुए रितू पलटी और फैक्टरी के अंदर की तरफ बढ़ गई।
"मैडम ये तो किसी टाइम बम्ब के टुकड़े जैसा लगता है।" रितू के आते ही फारेंसिक टीम के उस आदमी ने कहा।
"क्या???" रितू उछल पड़ी__"ये क्या कह रहे हैं आप??"
"जी पक्के तौर पर तो नहीं कह सकता मगर ज्यादातर संभावना यही है।" उस आदमी ने कहा__"और अगर इस संभावना को सच मान लिया जाय तो ऐसा भी लगता है कि किसी टाइम बम्ब द्वारा ही इस बेसमेंट को उड़ाया गया है। बेसमेंट की हालत इस बात का सबूत है मैडम।"
रितू को उस आदमी की बात में सच्चाई के ढेर सारे अंश महसूस हुए। क्योकि बेसमेंट की हालत सचमुच ऐसी थी जैसे उसे बम्ब के द्वारा उड़ाया गया हो।
"अगर ऐसा है तो।" रितू ने कहा__"ये साबित हो गया कि फैक्टरी में लगी आग महज सार्ट शर्टिक से नहीं बल्कि किसी के द्वारा बम्ब से लगाई गई।"
"बिलकुल।" उस आदमी ने कहा।
"मतलब साफ है कि किसी ने टाइम बम्ब को तहखाने में फिट किया।" रितू कह रही थी__"और वो बम्ब अपने निर्धारित समय पर फट गया। बम्ब के फटते ही बेसमेंट उड़ गया और इसके साथ ही उसके अंदर से तेज़ी से आग का झोंका बाहर आकर यहाॅ चारो तरफ फैले कपड़ों और मशीनों से टकराया। कपड़ों पर लगी आग ने तेज़ी से अपना काम किया और देखते देखते सारी फैक्टरी में आग ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया।"
"निःसंदेह।" आदमी ने कहा__"और क्योंकि फैक्टरी बाहर से अवकाश के चलते बंद थी इस लिए जब तक किसी को पता चलता तब तक आग ने उग्र रूप धारण कर सबकुछ बरबाद कर दिया।"
"बेसमेंट के अंदर की क्या पोजीशन है?" रितू ने कहा__"अगर अंदर जाने लायक है तो चलकर जाॅच शुरू करते हैं। देखते हैं और क्या पता चलता है?"
कहने के साथ ही रितू और वो आदमी बेसमेंट के अंदर की तरफ देखने लगे। बेसमेंट के अंदर पुलिस और फाॅरेंसिक के कुछ लोग थे। रितू भी उनके बीच पहुॅच गई।
उधर अजय सिंह को आनन फानन में अभय ने कार में पिछली सीट पर प्रतिमा की गोंद में लिटाया और खुद ड्राइविंग सीट पर बैठकर कार स्टार्ट की। लगभग बीस मिनट बाद वो सब हास्पिटल में थे।
अजय सिंह को तुरंत ही एक रूम में ले जाया गया और डाक्टर ने उसका चेकअप शुरू कर दिया।
अपडेट हाज़िर है दोस्तो.....
मुआफ़ करना, एक बार फिर से कुछ सोच कर अपडेट को यहीं पर विराम दे दिया है मैंने।
आप सबके सामने कुछ सवाल भी तो छोंड़ना है यारो...
क्या हुआ था अजय सिंह को???
अजय सिंह सच में सदमें की वजह से चक्कर खाकर गिरा था या इसमें भी उसकी कोई चाल थी???
इंस्पेक्टर रितू को बेसमेंट में क्या क्या मिला होगा???
क्या रितू के सामने उसके बाप का गैर कानूनी काला सच आ पाया या नहीं?????
इस केस में क्या नतीजा निकलेगा????
क्या फैक्टरी में आग लगने की सच्चाई सामने आई और अगर आई तो क्या ये पता चला कि किसने ये सब किया????
अजय सिंह अब क्या करेगा????
आप लोगों से शिकायत है कि आप लोग अपनी राय या अपनी बात खुल कर तथा दिल से नहीं देते हैं। जबकि हर अपडेट में मैं बस यही उम्मीद करके बैठा होता हूॅ। ख़ैर जाने दीजिए, हाॅ नहीं तो....!!
अपडेट............《 18 》
अब तक......
"निःसंदेह।" आदमी ने कहा__"और क्योंकि फैक्टरी बाहर से अवकाश के चलते बंद थी इस लिए जब तक किसी को पता चलता तब तक आग ने उग्र रूप धारण कर सबकुछ बरबाद कर दिया।"
"बेसमेंट के अंदर की क्या पोजीशन है?" रितू ने कहा__"अगर अंदर जाने लायक है तो चलकर जाॅच शुरू करते हैं। देखते हैं और क्या पता चलता है?"
कहने के साथ ही रितू और वो आदमी बेसमेंट के अंदर की तरफ देखने लगे। बेसमेंट के अंदर पुलिस और फाॅरेंसिक के कुछ लोग थे। रितू भी उनके बीच पहुॅच गई।
उधर अजय सिंह को आनन फानन में अभय ने कार में पिछली सीट पर प्रतिमा की गोंद में लिटाया और खुद ड्राइविंग सीट पर बैठकर कार स्टार्ट की। लगभग बीस मिनट बाद वो सब हास्पिटल में थे।
अजय सिंह को तुरंत ही एक रूम में ले जाया गया और डाक्टर ने उसका चेकअप शुरू कर दिया।
अब आगे.......
शाम होने से पहले पहले अजय सिंह को हास्पिटल से डिस्चार्ज कर दिया गया था। डाॅक्टर ने बताया था कि अजय सिंह को किसी गहन चिन्ता तथा किसी सदमे की वजह से चक्कर आया था। बाॅकी उन्हें कोई बीमारी नहीं है। हास्पिटल से डिस्चार्ज होने के बाद अजय सिंह अपनी पत्नी प्रतिमा तथा छोटे भाई अभय के साथ सीधा हवेली ही आ गया था। फैक्टरी में हो रही छानबीन का क्या नतीजा निकला ये उसे पता नहीं था। हलाॅकि उसका पीए और बाॅकी स्टाफ फैक्टरी में ही थे। हास्पिटल से हवेली लौटते समय सारे रास्ते अजय सिंह ख़ामोश रहा। अभय सिंह कार को ड्राइव कर रहा था जबकि अजय सिंह व प्रतिमा कार की पिछली सीट पर बैठे थे।
प्रतिमा ने इस समय अभय की मौजूदगी में अजय सिंह से कुछ भी पूॅछना उचित नहीं समझा था इस लिए वह भी चुप ही रही। ये अलग बात है कि उसके दिलो दिमाग़ में विचारों का बवंडर चल रहा था।
हवेली पहुॅच कर वो सब कुछ देर ड्राइंग रूम में बैठे रहे। अभय सिंह थोड़ी देर बाद अपने घर की तरफ चला गया। अजय सिंह व प्रतिमा का बेटा शिवा इस वक्त हवेली में नहीं था।
सोफे पर बैठा अजय सिंह खामोश था किन्तु अब उसके चेहरे पर गहन सोच और चिन्ता के भाव फिर से नुमायाॅ होने लगे थे। उसका ध्यान फैक्टरी में हो रही छानबीन पर ही लगा हुआ था।
"इस तरह चिन्ता करने से कुछ नहीं होगा अजय।" प्रतिमा अपने सोफे से उठकर अजय वाले सोफे पर उसके करीब ही बैठ कर बोली__"अब जो होना है वो तो होकर ही रहेगा। हलाॅकि मैं ये नहीं जानती कि ऐसी कौन सी बात है जिसकी वजह से तुमने अपनी ये हालत बना ली है किन्तु इतना ज़रूर समझ गई हूॅ कि ये चिन्ता या ये सदमा सिर्फ फैक्टरी में आग लगने से हुए नुकसान बस का नहीं है, बल्कि इसकी वजह कुछ और ही है।"
अजय सिंह कुछ न बोला, बल्कि ऐसा लगा जैसे उसने प्रतिमा की बात सुनी ही न हो। वह पूर्वत उसी तरह सोफे पर बैठा रहा। जबकि उसके चेहरे की तरफ ग़ौर से देखते हुए तथा उसके दोनो कंधों को पकड़ कर झिंझोड़ते हुए प्रतिमा ने ज़रा ऊॅचे स्वर में कहा__"होश में आओ अजय, क्या हो गया है तुम्हें? प्लीज मुझे बताओ कि ऐसी कौन सी बात है जिसकी चिन्ता से तुमने खुद की ऐसी हालत बना ली है?"
प्रतिमा के इस प्रकार झिंझोड़ने पर अजय सिंह चौंकते हुए गहन सोच और चिन्ता से बाहर आया। उसने अजीब भाव से अपनी पत्नी की तरफ देखा फिर एकाएक ही उसके चेहरे के भाव बदले।
"इस छानबीन को होने से रोंक लो प्रतिमा।" अजय सिंह भर्राए से स्वर में कहता चला गया__"अपनी बेटी से कहो कि वह फैक्टरी की छानबीन न करे, वर्ना सब कुछ बरबाद हो जाएगा। ये सब रोंक लो प्रतिमा, मैं तुम्हारे पैर पड़ता हूॅ। प्लीज रोंक लो अपनी बेटी को।"
प्रतिमा हैरान रह गई अपने पति का ये रूप देख कर। किसी के सामने न झुकने वाला तथा किसी से न डरने वाला और न ही किसी से हार मानने वाला इंसान इस वक्त दुनिया का सबसे कमज़ोर व दीन हीन नज़र आ रहा था। प्रतिमा को कुछ पल तो समझ ही न आया कि वह क्या करे किन्तु फिर तुरंत ही जैसे उसे वस्तुस्थित का आभास हुआ।
"कैसे इस सबको रोंकूॅ अजय?" प्रतिमा ने अधीरता से कहा__"तुमने तो मुझे कुछ बताया भी नहीं कि बात क्या है? आज तक अपनी हर बात मुझसे शेयर करते रहे मगर ऐसी क्या बात थी जिसे तुमने मुझसे कभी शेयर करने के बारे में सोचा तक नहीं? क्या तुम ये समझते थे कि तुम्हारी किसी बात से मुझे कोई ऐतराज़ होता? या फिर तुम ये समझते थे कि मैं तुम्हें किसी काम को करने से रोंक देती?? तुम जानते हो अजय कि मैं तुमसे कितना प्यार करती हूॅ तथा ये भी जानते हो कि तुम्हारे कहने पर दुनियाॅ का हर नामुमकिन व असंभव काम करने को तुरंत तैयार हो जाती हूॅ, फिर वो काम चाहे जैसा भी हो। मगर इसके बावजूद तुमने मुझसे कोई बात छुपाई अजय। क्यों किया तुमने ऐसा?"
"मुझे माफ कर दो प्रतिमा।" अजय सिंह ने प्रतिमा के दोनो हाॅथों को थाम कर कहा__"मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हो गई। तुम चाहो तो इस सबके लिए मुझे जो चाहे सज़ा दे दो लेकिन इस सबको रोंक लो प्रतिमा...वर्ना बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा। मैं अपनी ही बेटी की नज़रों में गिर जाऊॅगा, उसका और उसके कानून का मुजरिम बन जाऊॅगा।"
"ऐसी क्या बात है अजय?" प्रतिमा ने झुॅझलाकर कहा__"आखिर तुम कुछ बताते क्यों नहीं? जब तक मुझे बताओगे नहीं तो कैसे मुझे समझ आएगा कि आगे क्या करना होगा मुझे?"
"क्या बताऊॅ प्रतिमा।" अजय सिंह ने हताश भाव से कहा__"और किन शब्दों से बताऊॅ? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है।"
"भला ये क्या बात हुई अजय?" प्रतिमा ने उलझ कर कहा__"जो जैसा है उसे वैसा ही बताओ न।"
अजय सिंह ने एक गहरी साॅस ली। अंदाज़ ऐसा था उसका जैसे किसी जंग के लिए खुद को तैयार कर रहा हो।
"मुझसे वादा करो प्रतिमा।" सहसा अजय सिंह ने प्रतिमा का हाॅथ अपने हाॅथ में लेकर कहा__"कि मेरे द्वारा सब कुछ जानने के बाद तुम मुझसे न तो नाराज़ होओगी और ना ही मुझे ग़लत समझोगी।"
"ठीक है मैं वादा करती हूॅ।" प्रतिमा ने कहा__"अब बताओ क्या बात है??"
"म मैं अपने इस बिजनेस के साथ साथ ही।" अजय सिंह ने धड़कते दिल के साथ कहा__"एक और बिजनेस करता हूॅ प्रतिमा लेकिन वो बिजनेस गैर कानूनी है।"
"क क्या????" प्रतिमा बुरी तरह उछल पड़ी__"य..ये तुम क्या कह रहे हो अजय? तुम गैर कानूनी बिजनेस भी करते हो??"
"मुझे माफ कर दो प्रतिमा।" अजय सिंह ने भारी स्वर में कहा__"पर यही सच है। मैं शुरू से ही इस धंधे में था।"
प्रतिमा आश्चर्यचकित अवस्था में मुह और आॅखें फाड़े अजय सिंह को देखे जा रही थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अजय सिंह गैर कानूनी काम भी करता है। कुछ देर तक वह अवाक् सी देखती रही उसे फिर एक गहरी साॅस लेते हुए गंभीरता से बोली__"क्यों अजय क्यों...आख़िर क्या ज़रूरत थी तुम्हें ऐसा काम करने की? तुम्हें तो पता था कि ऐसे काम का एक दिन बुरा ही नतीजा निकलता है।
फिर क्यों किया ऐसा?? आखिर किस चीज़ की कमी रह गई थी अजय जिसके लिए तुम्हें गैर कानूनी काम भी करना पड़ गया??"
"ये सब मेरी ही ग़लती से हुआ है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा__"मेरी ही महत्वाकांछाओं के चलते हुआ है। मैं हमेशा इसी ख्वाहिश में रहा कि मेरे और मेरे बच्चों के पास धन दौलत व ऐश्वर्य की कोई कमी न हो। मेरा एक बहुत बड़ा नाम हो और सारी दुनियाॅ मुझे पहचाने। इसके लिए मैं कुछ भी करने को तैयार था, इस बारे में कभी नहीं सोचा कि मेरी इन चाहतों से कभी मुझे ऐसा भी दिन देखना पड़ सकता है।"
"अब क्या होगा अजय?" प्रतिमा ने कहा__"तुम्हारी ख्वाहिशों ने आज क्या सिला दिया है तुम्हें और तुम्हारे साथ साथ हम सबको भी। क्या होगा जब सबको ये मालूम होगा कि तुम गैर कानूनी धंधा भी करते हो?"
"मुझे और किसी की परवाह नहीं है प्रतिमा।" अजय सिंह बोला__"मुझे तो बस इस बात की चिन्ता है कि इस सबके बाद मैं अपनी ही बेटी की नज़रों में गिर जाऊॅगा। कानून के प्रति उसकी ईमानदारी और आस्था देख कर यही लगता है कि वह मुझे इस काम की वजह से जेल की सलाखों के पीछे भी डाल सकती है।"
"ये कैसे कह सकते हो तुम?" प्रतिमा ने चौंकते हुए कहा__"हमारी बेटी भला ऐसा कैसे कर सकती है?"
"वो यकीनन ऐसा ही कर सकती है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा__"क्यों कि फैक्टरी में हो रही छानबीन में उसे वो सब मिल जाएगा जो ये साबित करेगा कि मैं गैर कानूनी धंधा करता हूॅ।"
"तुम्हारे कहने का मतलब है कि फैक्टरी में ही तुमने अपने गैर कानूनी धंधों के सबूत छोंड़ रखे हैं?" प्रतिमा की धड़कनें रुकती सी प्रतीत हुई उसे__"और वो सब सबूत अब रितू के हाॅथ लग जाएंगे?"
"बिलकुल।" अजय सिंह के चेहरे पर चिंता के भाव थे__"यही सच है प्रतिमा। फैक्टरी में ही मैंने एक गुप्त तहखाना बनवाया हुआ था, और उसी तहखाने में मैं गुप्तरूप से अपना ये गैर कानूनी धंधा करता था। इस धंधे में कानून के द्वारा पकड़े जाने का मुझे कोई डर नहीं था क्योंकि मेरे संबंध कानून तथा मंत्रियों से थे। ये सब मेरे इस धंधे से होने वाले मुनाफे से हिस्सा पाते थे। अगर ये कहूॅ तो ग़लत न होगा कि इन्हीं लोगों की कृपा से मेरा ये धंधा चल रहा था।"
"अगर ऐसी बात है तो तुम्हें इतना परेशान और चिन्ता करने की क्या ज़रूरत है?" प्रतिमा ने कहा__"ये सब तुम रोंकवा भी तो सकते हो। कानून और मंत्रियों में तो सब तुम्हारे ही आदमी हैं, तो उनसे कह कर इस छानबीन को रुकवाया भी तो जा सकता है?"
"अब ऐसा नहीं हो सकता प्रतिमा।" अजय सिंह बोला__"क्योंकि इसके पहले जो छानबीन हुई थी वो मेरे अनुरूप हुई थी। उसमें सब मेरे ही आदमीं थे लेकिन अब जो छानबीन हो रही है उसमें मैं कुछ नहीं कर सकता।"
"क्यों?" प्रतिमा चौंकी__"क्यों नहीं कर सकते? अब क्या हो गया है ऐसा?"
"अब वो हुआ है प्रतिमा।
" अजय सिंह ने गहरी साॅस छोंड़ी__"जिसके बारे में मैं कभी सोच भी नहीं सकता था।"
"क्या मतलब??" प्रतिमा हैरान।
"मतलब कि रातों रात सारे पुलिस डिपार्टमेंट को बदल दिया गया।" अजय सिंह कह रहा था__"पुलिस में कमिश्नर तक जो भी मेरे आदमी थे उन सबका तबादला कर दिया गया है। अब तुम समझ सकती हो कि इन हालात में मैं क्या कर सकता हूॅ। मंत्री से मदद माॅगी लेकिन उसने भी अपने हाॅथ खड़े कर लिए। मंत्री ने कहा कि वो कुछ नहीं कर सकता क्योंकि ये सब ऊपर हाई कमान के आदेश पर हो रहा है।"
"हे भगवान!" प्रतिमा चकित भाव से बोली__"ये तो बहुत ही सीरियस मामला हो गया है।"
"वही तो।" अजय सिंह ने कहा__"मुझे समझ में नहीं आ रहा कि ऐसा क्यों हो रहा है? आखिर क्या वजह है जो इस सबके लिए हाई कमान से आदेश दिया गया? आखिर किस वजह से रातों रात इस शहर के सारे पुलिस विभाग का तबादला कर दिया गया?"
"यकीनन अजय।" प्रतिमा ने कुछ सोचते हुए कहा__"ये तो बड़ा ही पेंचीदा मामला हो गया है। लेकिन रितु ने तो कहा था कि इस केस को उसने रिओपेन करवाया है, उस सूरत में मामले को इतना सीरियस नहीं होना चाहिए था। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी बेटी ने ही हाई कमान को किसी ज़रिये इस सबके लिए सूचित किया हो?"
"हो भी सकता है और नहीं भी?" अजय सिंह ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा।
"क्या मतलब?" प्रतिमा के माथे पर सिलवटें उभरी।
"साधारण रूप से अगर हम ये सोच कर चलें।" अजय सिंह बोला__"कि रितू ने सिर्फ अपने पिता की फैक्टरी में आग लगने से हुए भारी नुकसान के चलते ये सोच कर इस केस को रिओपेन करवाया है कि कदाचित ये सब हमारे किसी दुश्मन के द्वारा ही किया गया हो सकता है तो इस मामले की छानबीन साधारण तरीके से ही होती। लेकिन अगर हम ये सोचें कि हो सकता है रितू को किसी वजह से ये पता चला हो कि उसका बाप इस बिजनेस की आड़ में गैर कानूनी धंधा भी करता है तो यकीनन इस केस की छानबीन का ये मामला संगीन है।"
"बात तो तुम्हारी बिलकुल दुरुस्त है अजय।" प्रतिमा ने कहा__"लेकिन सवाल ये उठता है कि रितू को ये कैसे पता चल सकता है कि उसका बाप ये सब भी करता है??"
"संभव है कि पुलिस में आते ही थाने में उसने बारीकी से सभी फाइलों का अध्ययन किया हो?" अजय सिंह ने कहा__"उन्हीं फाइलों में कहीं उसे कोई ऐसा सबूत मिला हो जिससे उसे इस सबका पता चल गया हो। कानून में आस्था रखने वाली हमारी बेटी ने इस सबके पता चलते ही ये सोच लिया हो कि उसे अपने बाप को गैर कानूनी धंधा करने के जुर्म में गिरफ्तार करके जेल की सलाखों के पीछे डाल देना चाहिए।"
"ये सब तो ठीक है अजय।
" प्रतिमा ने कहा__"लेकिन क्या ये संभव है कि किसी थाने में तुम्हारे खिलाफ कोई ऐसा सबूत फाइल के रूप में कहीं दबा हो सकता है? जैसा कि तुमने कहा था कि इसके पहले इस शहर में पुलिस महकमें में कमिश्नर तक की रैंक का कानूनी नुमाइंदा तुम्हारा ही आदमी था, तो क्या ये संभव है कि पुलिस के तुम्हारे ही आदमियों ने अपने थाने में कहीं तुम्हारे ही खिलाफ़ कोई सबूत बना कर रखा हुआ हो सकता था?"
"इस बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता।" अजय सिंह ने कहा__"ऐसा हो भी सकता है। संभव है किसी पुलिस के नुमाइंदे ने गुप्त रूप से मेरे खिलाफ़ किसी प्रकार का सबूत बना कर रखा रहा हो। आखिरकार पुलिस तो पुलिस ही होती है, वो न तो किसी की दोस्त हो सकती है और न ही दुश्मन।"
"इन सब बातों के बाद तो यही निष्कर्स निकलता है।" प्रतिमा ने गंभीरता से कहा__"कि हमारी बेटी को किसी वजह से अपने पिता के खिलाफ कोई सबूत मिला और अब वह पक्के तौर पर बारीकी से छानबीन करके कुछ और ठोस सबूत हासिल करना चाहती है जिससे उसे तुमको जेल की सलाखों के पीछे डालने में कोई अड़चन न हो सके।"
"हो सकता है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कुछ सोचते हुए कहा__"लेकिन एक बात समझ में नहीं आ रही।"
"कौन सी बात अजय?" प्रतिमा ने ना समझने वाले भाव से अजय सिंह की तरफ देखते हुए कहा था।
"यही कि रातों रात सारे पुलिस डिपार्टमेंट का तबादला क्यों कर दिया गया?" अजय सिंह बोला__"ये छानबीन तो वैसे भी हो जाती। कोई भी पुलिस का अफसर इस छानबीन में किसी भी प्रकार का हस्ताक्षेप नहीं करता। फिर क्यों तबादला कर दिया गया सबका?"
"अगर इस बात को हम अपनी इंस्पेक्टर बेटी के हिसाब से सोचें तो संभव है उसी ने इस सबके लिए ऊपर हाई कमान को अर्जी लिख कर गुज़ारिश की हो या फिर इसकी माॅग की हो?" प्रतिमा ने संभावना ब्यक्त की__"क्योकि शायद उसे इस बात की खबर हो कि इस शहर का सारा पुलिस विभाग तुम्हारे हाॅथों में है।"
"नहीं प्रतिमा।" अजय सिंह ने मजबूती से अपने सिर को इंकार के भाव से हिलाते हुए कहा__"रातों रात शहर के सारे पुलिस विभाग का तबादला कर देना कोई मामूली बात नहीं है, और उस सूरत में तो बिलकुल भी नहीं जबकि हमारी बेटी ने अभी अभी पुलिस फोर्स ज्वाइन किया हो। किसी भी नये पुलिस वाले के लिए इतनी दूर तक पहुॅच रखना नामुमकिन है प्रतिमा। पुलिस में रह कर बहुत दिन तक पहले पुलिस के दाॅव पेंच सीख कर उसका अनुभव करना पड़ता है। मैं ये बात मानता हूॅ कि हमारी बेटी ने पुलिस में आते ही किसी मॅझे हुए पुलिस अफसर की भाति पुलिसिया तौर तरीका अपना लिया है और उसका अंदाज़ भी अनुभवी लगता है लेकिन फिर भी इस बात को हजम करना मुश्किल है कि उसने ही शहर के सारे पुलिस विभाग को बदल देने की अपील की हो सकती है।"
"तो फिर।" प्रतिमा ने कहा__"तुम्हारे ख़याल से ये सब किसने किया हो सकता है?"
"यही तो समझ नहीं आ रहा।
" अजय सिंह ने कहा__"दिमाग़ की नशें दर्द करने लगी हैं इस सबके बारे में सोचते सोचते।"
"तुम एक शख्स को तो भूल ही गए हो अजय।" प्रतिमा ने मानो धमाका करने वाले भाव से कहा__"ये सब उसने भी तो किया हो सकता है?"
"किसकी बात कर रही हो तुम?" अजय सिंह चौंका था।
"तुम्हारे भतीजे विराज की बात कर रही हूॅ मैं।" प्रतिमा ने कहा।
"वो साला इस मामले में कहाॅ से फिट होता है प्रतिमा?" अजय सिंह ने अजीब भाव से कहा।
"बात इस मामले में उसके फिट होने की नहीं है अजय।" प्रतिमा ने गहरी साॅस लेकर कहा__"बल्कि बात है ऐसे मामले में हर तरह की संभावना की। हमें भले ही लगता है कि विराज का इस मामले में कोई हाॅथ नहीं हो सकता किन्तु सवाल है कि क्यों नहीं हो सकता उसका हाॅथ?"
"बेवकूफों की तरह बात मत करो प्रतिमा।" अजय सिंह ने झुंझलाते हुए कहा__"मामले की गंभीरता और उसकी पेंचीदगियों को समझो। उसकी कोई औकात नहीं हो सकती इस सबमें शहर के सारे पुलिस विभाग का तबादला करवा देने की और न ही ये औकात हो सकती है कि वह सीधा हाई कमान से इस सबके लिए बात कर सके। तुम्हारा दिमाग़ फिर गया लगता है।"
"चलो मान लिया कि उसकी कोई औकात नहीं हो सकती इन सब कामों को करवाने की।" प्रतिमा ने ज़ोर देकर कहा__"मगर क्या ये नहीं हो सकता कि उसने ही हमारी फैक्टरी में बम्ब लगा कर सब कुछ आग के हवाले कर दिया हो? तुम हर बार उसकी औकात की बात करके उसे तुच्छ समझ लेते हो अजय जबकि उसे तुच्छ समझ लेने का भी तुम्हारे पास कोई सबूत नहीं है। जबकि कम से कम उसकी इतनी तो औकात हो ही सकती है कि वह फैक्टरी में किसी भी तरह ही सही लेकिन आग लगा सके।"
अजय सिंह खामोश रह गया। प्रतिमा की बातों में उसे सौ मन की सच्चाई नज़र आई। और इस एहसास ने ही उसे हिला कर रख दिया कि ये सब उसके भतीजे विराज ने किया हो सकता है।
"ये तो तुम भी अच्छी तरह समझते हो अजय कि वो हमें अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझता है।" प्रतिमा कह रही थी__"उसे लगता है कि हमने उसे और उसके परिवार को बरबाद कर दिया है। इस लिए इस सबका प्रतिशोध लेने के लिए वह क्या नहीं कर सकता? वह हर उस काम को कर गुज़रने पर अमादा हो सकता है जिस काम से वह हमारा बाल भी बाॅका कर सके।"
अजय सिंह कुछ कह न सका। किसी गहरी सोच में डूबा नज़र आने लगा था वह।
"तुमने कहा था कि तुम्हारे आदमी उन्हें ढूॅढ़ने के लिए मुम्बई की खाक़ छान रहे है।" प्रतिमा मजबूत लहजे में कहती जा रही थी__"जबकि आज तक तुम्हारे आदमियों के हाॅथ में उनसे संबंधित कोई छोटा सा सुराग़ भी नहीं लग सका। इस बारे में क्या कहोगे तुम, बताओ?"
"क्या कहूॅ यार?" अजय सिंह के चेहरे पर कठोर भाव उभरे__"जाने कहाॅ गुम हो गए हैं वो सब? उन सुअर की औलादों को ये ज़मीन खा गई है या आसमान निगल गया है। एक बार....सिर्फ एक बार मेरे हाॅथ लग जाएॅ फिर देखना क्या हस्र करता हूॅ मैं उन सबका।
"
"मुझे नहीं लगता अजय कि तुम उन लोगों का कुछ कर लोगे।" प्रतिमा ने अजीब भाव से कहा__"जबकि लग ये रहा है कि वो कमीना रंडी की औलाद विराज हमारा ही बेड़ा गर्क़ कर रहा है।"
अभी ये सब बातें ही कर रहे थे कि बाहर से किसी के आने की आहट सुनाई दी। कुछ ही पल में इंस्पेक्टर रितू ड्राइंग रूम में दाखिल हुई। उसके चेहरे पर थकान के भाव गर्दिश करते नज़र आ रहे थे। अजय सिंह अपनी बेटी को देखकर घबरा सा गया। उसे लगा फैक्टरी की छानबीन में रितू को उसके काले कारनामों का सारा काला चिट्ठा मिल गया है और अब वह उसे गिरफ्तार करने आई है।
"आई एम साॅरी डैड।" रितू ने आते ही अजय सिंह का हाॅथ पकड़ कर तथा खेद भरे लहजे में कहा__"मैं आपके साथ हास्पिटल नहीं जा सकी। आप तो मेरी मजबूरी समझ सकते हैं डैड, उस वक्त मैं अपनी ड्यूटी को छोंड़ कर नहीं जा सकती थी आपके साथ। उस सूरत में तो हर्गिज़ नहीं जब किसी केस की छानबीन चल रही हो। एनीवे, अब आपकी तबियत कैसी है?"
अजय सिंह को समझ नहीं आ रहा था कि रितू को देख कर अब वह कैसा रिऐक्ट करे? मनो-मस्तिष्क में हज़ारों ख़याल मानो ताण्डव सा करने लगे थे। पल भर में ढेर सारा पसीना उसके सफेद पड़ चुके चेहरे पर उभर आया था। दोनो कानों में दिल पर धम्म धम्म करके पड़ने वाली किसी भारी हथौड़े की चोंट उसकी हृदय की गति को रोंक देने के लिए काफी थी जो सुनाई दे रही थी। जबकि उसके अंदर की हालत से अनभिज्ञ रितु ने अपने पिता को खामोश देख कर पुनः कहा__"प्लीज डैड, अब माफ भी कर दीजिए न अपनी इस बेटी को। आपको पता है आपकी उस हालत से मैं कितना परेशान और दुखी हो गई थी। लेकिन घटना स्थल पर मौजूद रहना मेरी मजबूरी थी, आप तो समझ सकते हैं न डैड? लेकिन इस सबसे फुर्सत होकर मैं सीघ्र ही पुलिस स्टेशन से भागी भागी आपसे मिलने आई हूॅ।"
अजय सिंह के मन मस्तिष्क में एकाएक मानो झनाका सा हुआ। दिमाग़ की सारी बत्तियाॅ जल उठीं। दिमाग़ ने सही तरीके से काम करना शुरू कर दिया। मन में बिजली की सी तेज़ी से ये ख़याल उभरा कि 'उसकी बेटी इस तरह बिहैव क्यों कर रही है जैसे कहीं कुछ हुआ ही न हो? इसके मासूम बर्ताव से तो यही लग रहा है जैसे छानबीन करते हुए तहखाने में इसे कुछ नहीं मिला वर्ना उसके हाथ अगर कोई गैर कानूनी चीज़ लग गई होती तो ये यहाॅ अपने पीछे पुलिस फोर्स लेकर तथा अपने हाॅथ में हॅथकड़ी लेकर उसे गिरफ्तार करने आती। लेकिन ऐसा तो दूर दूर तक होता हुआ दिखाई नहीं देता। इसका क्या मतलब हो सकता है?'
अजय सिंह के दिमाग़ में एकाएक जैसे हज़ार तरह के सवाल खड़े हो गए थे लेकिन जवाब किसी का नहीं था उसके पास।
मन में ये ख़याल बार बार किसी हथौड़े की भाॅति चोंट मार रहे थे कि आख़िर क्या हुआ फैक्टरी की छानबीन में? उसकी बेटी को तहकीकात में उसके खिलाफ क्या कोई गैर कानूनी चीज़ मिली?
"क्या बात है डैड?" अपने पिता को गहरे समुद्र में डूबे देख रितू ने इस बार अपने दोनों हाॅथों की मदद से झिंझोड़ते हुए कहा था__"आप कुछ बोलते क्यों नहीं है? कहाॅ खोए हुए हैं आप?"
"आॅ..हाॅ...तु..तुमने कुछ कहा क्या बेटी?" अजय सिंह बुरी तरह चौंकते हुए कहा था। एकाएक ही उसके मन में ये ख़याल उभरा कि 'ये क्या बेवकूफी कर रहा है अजय सिंह, अपने आपको सम्हाल वर्ना तेरी हालत और तेरे चेहरे की ये हालत देख कर तेरी बेटी को कहीं सचमुच कुछ पता न चल जाए।' इस ख़याल के द्वारा खुद को समझाए जाने पर अजय सिंह ने तुरंत ही अपने आपको सम्हाला। और फिर मुस्कुरा कर उसने अपनी बेटी की तरफ देखा।
"मैं ये कह रही हूॅ डैड कि आप कुछ बोल क्यों नहीं रहे थे?" रितू कह रही थी__"पता नहीं कहाॅ खोए हुए थे आप?"
"कुछ नहीं बेटा।" अजय सिंह ने एक नज़र अपनी पत्नी की तरफ डालने के बाद कहा__"तुम सुनाओ, कैसा रहा पुलिस के रूप में आज का तुम्हारा पहला दिन?"
अजय सिंह ये पूॅछने से हिचकिचाने के साथ साथ डर भी रहा कि 'आज तहकीकात में क्या हुआ?' इस लिए ये न पूछ कर कुछ और ही पूॅछ बेठा था।
"बहुत अच्छा था डैड।" रितू ने मुस्कुरा कर कहा__"बस थोड़ा थक गई हूॅ।"
"अभी आदत नहीं है न।" सहसा इस बीच प्रतिमा कह उठी__"जब इस सबकी आदत हो जाएगी तो सब ठीक हो जाएगा।"
"आप ठीक कहती हैं माॅम।" रितू ने कहा__"धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा। लेकिन अभी तो आप मुझे मस्त गरमा गरम काॅफी पिलाइए प्लीज।"
"अभी बना कर लाती हूॅ बेटी।" प्रतिमा ने हॅस कर कहा और सोफे से उठ कर अंदर किचेन की तरफ चली गई।
इधर अजय सिंह सोच रहा था कि आज की छानबीन के संबंध में उसकी बेटी ने अभी तक कोई बात क्यों नहीं की?? वह खुद इस बारे में पूॅछने से हिचकिचा भी रहा था और डर भी रहा था। लेकिन ये भी सच था कि उसके लिए इस सबके बारे में जानना निहायत ही ज़रूरी था। मगर सबसे बड़ा सवाल था कि वह अपनी बेटी से पूॅछें कैसे???
"डैड, आपने अभी तक मुझसे पूछा नहीं।" सहसा रितू ने अजीब से अंदाज़ में कहा__"कि आज फैक्टरी में हुई छानबीन में क्या नतीजा निकला??"
अजय सिंह मन ही मन बुरी तरह चौंका भी और घबरा भी गया, किन्तु अपने किसी भी भाव को चेहरे पर उभरने नहीं दिया। खुद को मजबूती से सम्हाल कर संतुलित लहजे से कहा__"पूॅछ कर क्या करूॅगा बेटी? इस सबसे कुछ होने वाला तो है नहीं। क्या इस सबसे वो सब कुछ वापस मिल जाएगा जो जल कर खाक़ में मिल चुका है?"
"बात सब कुछ मिल जाने की नहीं है डैड।
" रितू ने कहा__"बल्कि इस बात की है कि ये सब किसने और किस वजह से किया? आपको ये जानकर हैरानी के साथ साथ शायद खुशी भी होगी कि फैक्टरी में आग किसी सार्ट शर्किट की वजह से नहीं बल्कि फैक्टरी के तहखाने में किसी के द्वारा लगाए गए टाइम बम्ब के भीषण धमाके से उत्पन्न हुई आग से लगी थी।"
"क् क्या????" अजय सिंह बुरी तरह चौंकने का बेहतरीन नाटक किया था फिर बोला__"ये ये क्या कह रही हो तुम?"
"ये सच है डैड।" रितू ने कहा__"मगर मैं इस बात से हैरान हूॅ कि इसके पहले हुई छानबीन में ये सब क्यों नहीं बताया पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में? जबकि ये सब बातें कोई भी साधारण ब्यक्ति जाॅच करके बता सकता था। ये अपने आप में एक बहुत बड़ा सवाल है डैड। ख़ैर पुलिस इंक्वायरी में इस सबका जवाब उन पुलिस आफिसर्स को ही देना पड़ेगा जिन्होंने इसके पहले फैक्टरी की छानबीन की थी। मगर इस सबका जवाब आपको भी देना पड़ेगा डैड। मुझे पक्का यकीन है कि पुलिस द्वारा इस प्रकार की छानबीन करके रिपोर्ट आपके कहने पर ही बनाई गई थी।"
अजय सिंह अवाक् सा देखता रह गया अपनी बेटी को। फिर तुरंत ही खुद को सम्हालते हुए कहा__"ये सब झूॅठ है बेटी। हमने ऐसी कोई रिपोर्ट बनाने के लिए नहीं कहा।"
"आप अपनी इस बात को साबित नहीं कर पाएंगे डैड।" रितू ने कहा__"सारे हालात इस बात की चीख चीख कर गवाही दे रहे हैं कि इसके पहले की गई छानबीन महज एक औपचारिकता बस थी। वर्ना कोई भी पुलिस वाले अंधे नहीं थे जो उन्हें ये न दिखता कि फैक्टरी में लगी आग किसी के द्वारा लगाए गए टाइम बम्ब की मेहरबानी थी। इसके बावजूद उन्होंने अपनी रिपोर्ट में यही दिखाया कि फैक्टरी में आग सिर्फ शार्ट शर्किट की वजह से लगी थी। यहाॅ पर कोई भी सवाल खड़ा कर सकता है डैड कि सब कुछ स्पष्ट नज़र आते हुए भी पुलिस ने ऐसी रिपोर्ट क्यों बनाई? इसमें पुलिस का क्या मकसद था? या फिर एक ही बात हो सकती है कि पुलिस को ऐसी ही रिपोर्ट बनाने के लिए खुद आपने कहा हो। अगर यही सच है तो फिर यहाॅ पर सवाल खड़ा हो जाता है कि आपने पुलिस को ऐसी रिपोर्ट बनाने के लिए क्यों कहा??? बात यहीं पर खत्म नहीं हो जाती डैड, बल्कि ऐसी स्थिति में फिर और भी सवाल खड़े होने लगते हैं जिनका जवाब मिलना ज़रूरी हो जाता है।"
अजय सिंह को लगा कि अभी ज़मीन फटे और वह उसमें पाताल तक समाता चला जाए। हलाॅकि रितू ने कोई तीर नहीं मार लिया था ये सब करके क्योंकि फैक्टरी की छानबीन अगर पहले ही पूरी ईमानदारी से की गई होती तो पहले ही पुलिस को ये सब पता चल जाता। लेकिन क्योंकि ऐसा हुआ नहीं था। बल्कि अजय सिंह अपने तरीके से रिपोर्ट बनवा कर चैन से बैठ गया था। वो भला कैसे इस बात की कल्पना कर लेता कि अगले ही दिन उसकी अपनी बेटी इन गड़े मुर्दों को निकाल कर उसकी हालत को खराब करना शुरू कर देगी।
"आपकी ख़ामोशी इस बात का सबूत है डैड कि आप ही ने पुलिस को ऐसी रिपोर्ट बनाने को कहा था।" रितू ने कहा__"क्या आप बताने का कष्ट करेंगे कि आपने ऐसा क्यों किया?"
अजय सिंह क्योंकि जानता था कि इस संबंध में अब झूॅठ बोलने का कोई मतलब नहीं है इस लिए सच बताना ही बेहतर समझा उसने।
"ये सच है बेटी कि मेरे ही कहने पर पुलिस ने वैसी रिपोर्ट बनाई थी।" अजय सिंह ने गंभीरता से कहा__"लेकिन ये सब करना मेरी मजबूरी थी बेटी क्योंकि मैं इस सबको और अधिक उछालना नहीं चाहता था। मैं नहीं चाहता था बेटी कि मेरी इज्जत का अब और कचरा हो। सब कुछ तो जल ही गया था, कुछ मिलना तो था नहीं, इस लिए कम से कम अपनी इज्जत को तो नीलाम होने से बचा लेता। इसी वजह से बेटी...सिर्फ इसी वजह से मैंने पुलिस अधिकारियों से मिन्नतें कर करके ऐसी रिपोर्ट बनाने को कहा था।"
रितू देखती रही अपने पिता के चेहरे की तरफ। अंदाज़ ऐसा था जैसे परख रही हो कि उसके बाप की बातों में कितनी सच्चाई है? जबकि अपनी बेटी को इस तरह अपनी तरफ देखते हुए देख अजय सिंह के दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं थी।
"वाह डैड वाह!" रितू ने अजीब भाव से कहा__"आपने तो ये सब करके कमाल ही कर दिया। मतलब आपने ये भी नहीं सोचा कि अगर इस सबकी पुलिस द्वारा बारीकी से तहकीकात करवाई जाए तो इससे आपको कुछ हासिल भी हो सकता है?"
तभी प्रतिमा हाॅथ में ट्रे लिए ड्राइंगरूम में दाखिल हुई। उसने एक एक कप सबको पकड़ाया और खुद भी एक कप लेकर वहीं सोफे पर बैठ गई।
"इससे भला क्या हासिल होता बेटी?" अजय सिंह ने कहा था।
"छानबीन से ये तो पता चल ही गया है डैड कि फैक्टरी में आग टाइम बम्ब के फटने से लगी थी।" रितू ने कप में भरी काॅफी का एक सिप लेकर कहा__"अब ये पता लगाना पुलिस का काम है कि फैक्टरी में टाइम बम्ब किसने फिट किया था? आपके अनुसार उस दिन और रात अवकाश के चलते फैक्टरी बंद थी तथा बाहर से फैक्टरी में ताला भी लगा था। अब सोचने वाली बात है कि कोई बाहरी आदमी कैसे ये सब कर सकता है? क्योंकि सबसे पहले तो उसे फैक्टरी के अंदर पहुॅच पाना ही नामुमकिन था, कारण फैक्टरी में जो ताला लगा था वो कोई साधारण झूलने वाला ताला नहीं था जिसे आराम से तोड़ कर फैक्टरी अंदर जाया जा सके, बल्कि गेट पर जो ताला था वो लोहे वाले गेट के अंदर फिक्स था।"
"ताला खोलना कोई बड़ी बात या कोई समस्या नहीं है बेटी।" सहसा प्रतिमा ने हस्ताक्षेप किया__"आज के समय में एक से बढ़ कर एक खलीफा हैं जो पलक झपकते ही कोई भी ताला खोल भी सकते हैं और उसे तोड़ भी सकते हैं।"
"यू आर अब्सोल्यूटली राइट माॅम।" रितू ने मुस्कुरा कर कहा__"पर उस स्थिति में ये संभव नहीं है जबकि फैक्टरी के गेट पर दरबान मौजूद हों। मैंने इसकी जाॅच की है और पता चला है कि गेट पर दरबान मौजूद था।
अब सवाल ये है कि दरबान की मौजूदगी में कोई बाहरी आदमी अंदर कैसे जा सकता है?"
"इसका मतलब तो यही हुआ कि गेट पर तैनात दरबान झूॅठ बोल रहा है।" प्रतिमा ने कहा__"या फिर ऐसा भी हो सकता है कि फैक्टरी का ही कोई स्टाफ मेंबर फैक्टरी के अंदर गया हो। स्टाफ के अंदर जाने पर गेट में मौजूद दरबान को कोई ऐतराज़ नहीं हो सकता था।"
"अगर कोई स्टाफ का ही आदमी फैक्टरी के अंदर गया था।" रितू ने कहा__"तो दरबान को इस बात की जानकारी पुलिस के पूछने पर देनी चाहिए थी। मगर इस संबंध में दरबान का हर बार यही कहना है कि रात कोई भी ब्यक्ति फैक्टरी के अंदर नहीं गया।"
"बड़ी हैरत की बात है ये।" प्रतिमा कह उठी__"जब फैक्टरी के अंदर कोई गया ही नहीं तो फैक्टरी के अंदर, वो भी तहखाने में टाइम बम्ब क्या कोई भूत लगा कर चला गया था???"
"यही तो सोचने वाली बात है माॅम।" रितू ने हॅस कर कहा__"खैर, पता चल ही जाएगा देर सवेर ही सही। मैं तो डैड से ये कह रही थी कि उन्होंने इस सबके बारे में जानना ज़रूरी क्यों नहीं समझा? आखिर ये जानना तो ज़रूरी ही था कि किसने ये सब किया?"
अजय सिंह के मन में सिर्फ यही सवाल चकरा रहे थे, और वो ये थे कि 'तहखाने में उसकी बेटी को और क्या मिला? क्या उसके हाॅथ कोई ऐसी चीज़ लगी जिससे उसकी असलियत रितू को पता चल सके? इस बारे में रितू ने अभी तक कोई बात नहीं की, इसका मतलब उसे कुछ भी नहीं मिला। मगर ऐसा कैसे हो सकता है???? तहखाने में तो गैर काननी वस्तुओं का अच्छा खासा स्टाक था। क्या वह सब भी आग में जल गया है??? कहीं ऐसा तो नहीं कि रितु को सब पता चल गया हो किन्तु इस वक्त वह अंजान बनी होने का नाटक कर रही हो? हे भगवान! कैसे पता चले इस सबके बारे में??? मेरे गले में तो अभी भी जैसे कोई तलवार लटक रही है।
अपडेट हाज़िर है दोस्तो......
आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा,,,,,,,,,
अपडेट............《 19 》
अब तक......
"बड़ी हैरत की बात है ये।" प्रतिमा कह उठी__"जब फैक्टरी के अंदर कोई गया ही नहीं तो फैक्टरी के अंदर, वो भी तहखाने में टाइम बम्ब क्या कोई भूत लगा कर चला गया था???"
"यही तो सोचने वाली बात है माॅम।" रितू ने हॅस कर कहा__"खैर, पता चल ही जाएगा देर सवेर ही सही। मैं तो डैड से ये कह रही थी कि उन्होंने इस सबके बारे में जानना ज़रूरी क्यों नहीं समझा? आखिर ये जानना तो ज़रूरी ही था कि किसने ये सब किया?"
अजय सिंह के मन में सिर्फ यही सवाल चकरा रहे थे, और वो ये थे कि 'तहखाने में उसकी बेटी को और क्या मिला? क्या उसके हाॅथ कोई ऐसी चीज़ लगी जिससे उसकी असलियत रितू को पता चल सके? इस बारे में रितू ने अभी तक कोई बात नहीं की, इसका मतलब उसे कुछ भी नहीं मिला। मगर ऐसा कैसे हो सकता है???? तहखाने में तो गैर काननी वस्तुओं का अच्छा खासा स्टाक था।
क्या वह सब भी आग में जल गया है??? कहीं ऐसा तो नहीं कि रितु को सब पता चल गया हो किन्तु इस वक्त वह अंजान बनी होने का नाटक कर रही हो? हे भगवान! कैसे पता चले इस सबके बारे में??? मेरे गले में तो अभी भी जैसे कोई तलवार लटक रही है।
अब आगे........
अभी ये सब बातें ही कर रहे थे कि बाहर से किसी के आने की आहट सुनाई दी उन्हें। पलट कर देखा तो अभय और शिवा के साथ नीलम अपने हाथ में एक हैण्डबैग लिए आ रही थी।
"डैड...।" अपने पिता को देखते ही नीलम दौड़ कर आई और अजय सिंह से लिपट गई। अजय सिंह ने उसके सिर पर प्यार से हाॅथ फेर कर कहा__"कैसी है मेरी बेटी??"
"मैं बिलकुल अच्छी हूॅ डैड।" नीलम ने कहा__"आपकी याद बहुत आती थी वहाॅ।"
"ओह अच्छा जी।" अजय सिंह ने मुस्कुरा कर कहा और फिर नीलम को साइड से छुपका लिया।
अभय व शिवा भी आकर वहाॅ पर रखे सोफों पर बैठ गए। अपने डैड से अलग होने के बाद नीलम अपनी माॅ और बहन से गले मिली।
"कन्ग्रैट्स दी।" नीलम ने रितू के गले मिलते हुए कहा__"आख़िर आपकी ख़्वाहिश पूरी हो ही गई। आप अब एक पुलिस इंस्पेक्टर बन गई हैं।"
"थैंक्यू छोटी।" रितू ने मुस्कुरा कर कहा__"और बता, मुम्बई में तेरी पढ़ाई कैसी चल रही है? काॅलेज अच्छा है न? और माॅसी लोग सब कैसे हैं?"
"सब अच्छे हैं दी।" नीलम ने मुस्कुराते हुए कहा__"और काॅलेज भी अच्छा ही होगा?"
"अच्छा होगा?" रितू ने ना समझने वाले भाव से कहा__"इस बात से क्या मतलब है तेरा?"
"मतलब ये कि काॅलेज जाना अभी शुरू नहीं किया है मैने।" नीलम ने कहा__"क्योंकि काॅलेज खुलने में अभी पाॅच दिन का समय शेष है।"
"ओह।" रितू ने कहा__"चल कोई बात नहीं। तू बैठ, मैं ज़रा कपड़े चेन्ज कर लूॅ। अभी भी पुलिस की यूनीफार्म ही पहन रखी हूॅ मैं।"
"ओके दी।" नीलम ने कहा और एक बार फिर अपने पिता की तरफ पलटते हुए कहा__"डैड, ये सब कैसे हुआ?"
"बस हो गया बेटी।" अजय सिंह भला अब उसे क्या बताता__"सब नसीब की बातें हैं।"
"ऐसा क्यों कहते हैं डैड?" नीलम ने अजय सिंह का हाॅथ अपने हाॅथ में लेकर कहा__"बिना वजह के कैसे हमारी फैक्टरी में आग लग सकती है? ज़रूर कोई वजह रही होगी। आप पुलिस के द्वारा पता लगवाइए डैड।"
"पुलिस पता लगा रही है दी।" सहसा शिवा कह उठा__"और आपको पता है, रितू दीदी ही इस सबका पता लगा रही हैं? देखना सब कुछ पता लग जाएगा जल्द ही। जिसने भी ये सब किया होगा न मैं उसे छोंड़ूॅगा नहीं।"
"ज़्यादा सूरमा बनने की ज़रूरत नहीं है तुम्हें।" नीलम ने कहा__"अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। और ये तो अच्छी बात है कि इस सबकी जाॅच दीदी कर रही हैं, है न डैड?" अंतिम वाक्य उसने अपने पिता की तरफ देख कर कहा था।
"ह हाॅ बेटी।" अजय सिंह चौंकते हुए बोला था__"यकीनन इस सबका पता चल ही जाएगा।
"
"क्या अभी तक कुछ पता नहीं चला भइया?" अभय ने कहा__"मेरा मतलब है कि रितू ने इस बारे में अभी तक क्या कुछ नहीं बताया कि उसकी छानबीन में क्या नतीजा निकला?"
"नतीजा सिर्फ इतना ही निकला है चाचा जी कि हमारी फैक्टरी में आग किसी के द्वारा फैक्टरी के तहखाने में लगाए गए टाइम बम्ब से लगी थी।" अंदर की तरफ से आते हुए रितू ने कहा__"और आपको ये जानकर हैरानी होगी कि फैक्टरी के तहखाने में लगभग दो से तीन टाइम बम्ब लगाए गए थे।"
"क्या??????" लगभग वहाॅ मौजूद हर कोई बुरी तरह चौंका था, फिर अभय ने पूॅछा__"लेकिन फैक्टरी के अंदर तहखाना कहाॅ से आ गया और तो और उस तहखाने के अंदर जाकर किसने टाइम बम्ब लगाया हो सकता है??"
"ये सवाल तो मेरे पास भी है चाचा जी कि फैक्टरी में कोई तहखाना कैसे था?" रितू ने अभय से कहने के बाद अपने पिता की तरफ देखा__"क्या आप बताएॅगे डैड कि फैक्टरी में तहखाने का क्या काम था?"
अजय सिंह बुरी तरह घबरा गया, लेकिन तुरंत ही सहल कर बोला__"फैक्टरी के अंदर अगर कोई तहखाना था तो इसमें कौन सी बड़ी बात है बेटी? मैंने तो बस शौक के लिए बनवाया था। क्या तहखाना बनवाना भी कोई कानूनन जुर्म है?"
"जुर्म तो नहीं है डैड।" रितू ने सपाट लहजे में कहा__"लेकिन तहखाने का निर्माण आम तौर पर लोग अपनी किसी प्राइवेसी के चलते बनवाते हैं। ख़ैर, क्योंकि तहखाने में तीन तीन टाइम बम्ब लगाए गए थे और जब वो फटे तो सब कुछ जल कर खाक़ में मिल गया। हलाॅकि तहखाने में शायद कुछ नहीं था क्योंकि अगर होता तो हमारे हाॅथ कुछ न कुछ ज़रूर लगता। वहाॅ तो बस फैक्टरी के जले हुए कुछ अवशेष ही पड़े थे।"
रितू की ये बात सुन कर कि 'तहखाने में कुछ नहीं था' अजय सिंह बुरी तरह मन ही मन चौंका था। उसके दिमाग़ का फ्यूज उड़ गया। फिर जब दिमाग़ ने काम करना शुरू किया तो सबसे पहले उसके दिमाग़ में यही सवाल उभरा कि ऐसा कैसे हो सकता है? तहखाने में मौजूद उसकी गैरकानूनी चीज़ें कहाॅ गईं? क्या सब कुछ जल गया??? मगर सवाल ये है कि अगर जल गया होता तो रितू को कुछ तो उसके अवशेष सबूत के तौर पर मिलते?
अजय सिंह कुछ समझ नहीं पा रहा था कि ये सब क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसकी बेटी इस बारे में झूॅठ बोल रही हो कि तहखाने में उसे कुछ नहीं मिला है? मगर रितू उससे झूॅठ क्यों बोलेगी? बल्कि होना तो ये चाहिए था कि अगर उसके खिलाफ कोई सबूत उसे मिल जाता तो अब तक रितू को उसे हॅथकड़ी लगा कर गिरफ्तार कर लेना चाहिए था। मगर उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया, क्यों? आख़िर क्या चक्कर है ये? अजय सिंह जितना सोचता उतना ही उलझता जा रहा था। यहाॅ तक कि सोचते सोचते उसका दिमाग़ हैंग सा होने लगा था।
"ये तो बहुत ही गंभीर बात है रितू बेटी।" अभय ने कहा__"फैक्टरी में बम्ब लगाया किसी ने और सब कुछ जला कर खाक़ कर दिया।
भला ये सब किसने किया होगा? क्या ये किसी दुश्मन का किया धरा है?"
"ये तो डैड ही बता सकते हैं।" रितू ने कहा__"डैड को ये अच्छी तरह पता होगा कि इस बिजनेस में उनका कौन दुश्मन है? जिसने इतने बड़े काम को अंजाम दिया है।"
"मैं खुद इस बात से हैरान व परेशान हूॅ बेटी।" अजय सिंह बोला__"क्योंकि मेरी समझ में मेरा ऐसा कोई भी शत्रू नहीं है जिसने ये सब किया हो। मेरे सबसे बहुत अच्छे संबंध थे और हैं बेटी। भला मैं बिना वजह और बिना सबूत के किसका नाम लूॅ कि हाॅ इसी ने मेरी फैक्टरी में आग लगाई है?"
"लेकिन बिना वजह के ये भी तो संभव नहीं है भइया कि कोई भी शख्स हमारे साथ इतना बड़ा कारनामा करे?" अभय ने कहा__"मैं समझ सकता हूॅ और जानता हूॅ कि यकीनन आपका कोई दुश्मन नहीं है लेकिन आप खुद सोचिए कि बिना किसी वजह के ये सब कोई क्यों करेगा?"
"मैं नहीं जानता छोटे।" अजय सिंह हताश भाव से बोला__"मैं नहीं जानता कि किसने ये सब करके मुझसे अपनी दुश्मनी निकाली है? अगर जानता तो क्या मैं इस तरह चुप चाप बैठा होता? बल्कि अगर जानता कि ये सब किसने किया है तो अपने हाथों से उसे गोली मार देता। ये भी न पूॅछता गोली मारने से पहले उससे कि ये सब उसने क्यों किया था?"
"आप परेशान मत होइए डैड।" रितू ने कहा__"मैं इस सबका पता लगा कर ही रहूॅगी कि किसने ये सब किया है?"
इसके साथ ही ड्राइंग रूम में सन्नाटा छा गया। कुछ देर बाद सब वहाॅ से चले गए। अजय सिंह अपने कमरे में चला गया, उसका सिर बड़ा ज़ोरों से दर्द कर रहा था। कमरे में आकर वह बेड पर आखें बंद करके लेट गया।
"क्या हुआ अजय?" कमरे के अंदर आते ही प्रतिमा ने कमरे का दरवाज़ा बंद करने के बाद कहा__"तबीयत तो ठीक है न तुम्हारी?"
"सिर में बड़ा दर्द हो रहा है प्रतिमा ज़रा कोई टेबलेट तो दो।" अजय सिंह ने कहा__"ऐसा लगता है जैसे सिर फट जाएगा।"
प्रतिमा ने पास ही रखी आलमारी से एक बाक्स मे रखी कुछ दवाइयों से एक गोली निकाली और अजय सिंह की तरफ बढ़ा दिया।
"अरे क्या गोली ऐसे ही खाऊॅगा?" अजय सिंह बोला__"पानी भी दो न।"
"पानी बगल से टेबल में रखा है।" प्रतिमा ने कहा__"मैं पहले पानी ही लाई थी यहाॅ, जानती थी कि तुम्हारा सिर दर्द कर रहा है और तुम्हें इसके लिए गोली खानी पड़ेगी।"
अजय सिंह कुछ न बोला। बगल में टेबल पर रखे पानी के ग्लास को एक हाॅथ से उठाया और गोली को मुह में डालने के बाद उसे पानी के साथ निगल गया। जबकि प्रतिमा बेड पर उसके समीप ही बैठ गई।
"अब तो तुम्हें इतना परेशान नहीं होना चाहिए अजय।" प्रतिमा ने हल्के स्वर में कहा__"क्योंकि तुम जिस बात से डर रहे थे वो तो हुई ही नहीं। हमारी बेटी को फैक्टरी के तहखाने में कुछ भी ऐसा नहीं मिला जिससे ये साबित हो कि तुम गैर कानूनी धंधा भी करते हो।
इस लिए अब जब ऐसा कुछ उसे मिला ही नहीं तो किसी बात से डरने या परेशान होने की अब कोई ज़रूरत नहीं है तुम्हें। बस शुकर मनाओ कि फैक्टरी के साथ साथ वो सब भी जल गया।"
"तुम सबसे बड़ी बात पर ग़ौर ही नहीं कर रही हो प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा__"तुम इस बात की तरफ ध्यान क्यों नहीं दे रही हो कि फैक्टरी के तहखाने में बम्ब फिट किया था किसी ने?"
"हाॅ तो?" प्रतिमा ने लापरवाही से कहा।
"तो ये कि जिसने भी तहखाने में बम्ब लगाया।" अजय सिंह बोला__"क्या उसने न देखा होगा कि तहखाने में क्या क्या चीज़ें मौजूद हैं? बल्कि यकीनन देखा होगा उसने। अब अगर हमारी बेटी ये कह रही है कि उसे तहखाने में कुछ नहीं मिला तो इसका क्या मतलब हो सकता है? इसके तो दो ही मतलब हो सकते हैं, और वो ये कि या तो हमारी बेटी हमसे झूॅठ बोल रही है कि उसे तहखाने में कुछ नहीं मिला या फिर ऐसा हो सकता है कि जिसने तहखाने में बम्ब लगाया उसने ही तहखाने में मौजूद सारी गैर कानूनी चीज़ों को गायब कर दिया।"
प्रतिमा चकित सी देखती रह गई अजय सिंह को। कुछ देर यूॅ ही देखने के बाद उसने कहा__"ओह माई गाड अजय, ये तो मैंने सोचा ही नहीं था। हद हो गई, भला इस बात पर मेरा ध्यान क्यों नहीं गया?"
"क्योंकि औरतों का दिमाग़ उसके घुटनों में होता है न।" अजय सिंह हॅस पड़ा।
"ज्यादा शुभम कुमार बनने की कोशिश मत करो।" प्रतिमा ने बुरा सा मुह बनाया था।
"शु शुभम कुमार???" अजय सिंह चकरा गया__"ये किस चिड़ीमार का नाम है?"
"तुम शुभम कुमार को नहीं जानते?" प्रतिमा ने हैरत से कहा__"अरे ये बहुत बड़ा डिटेक्टिव है। जासूसी टाइप के उपन्यास भी लिखता है ये। इसके आगे जेम्स बाॅण्ड वगैरा सब फेल हैं। ऐसा इसका मानना है, हलाॅकि मैं इसे ज्यादा भाव नहीं देती"
"हाहाहाहा ज्यादा भाव देना भी नहीं मेरी जान।" अजय सिंह हॅसा__"वर्ना उसका जासूसी दिमाग़ तुम्हारे पिछवाड़े में घुस जाएगा।"
"उसके बारे में ऐसा मत बोलो डियर।" प्रतिमा ने कहा__"वो बड़ा शरीफ लड़का है।"
"लड़का है???????" अजय सिंह चौंका__"ये क्या कह रही हो?"
"अरे अभी वो लड़का ही है।" प्रतिमा ने कहा__"बेचारा अभी कुवाॅरा है न इस लिए।"
"हाहाहाहा अच्छा अब छोड़ो इस लड़के की बात को।" अजय सिंह ने एकाएक गंभीर होकर कहा__"मैं ये कह रहा था कि हमारी बेटी को अगर तहखाने से कुछ नहीं मिला तो इसकी यही दो वजह हो सकती हैं।"
"लेकिन रितू इस बात को क्यों छुपाएगी भला?" प्रतिमा ने कहा__"बल्कि अगर उसके पास कोई ऐसा सबूत होता तो वह किसी भी समय तुम्हारे हाॅथ में हॅथकड़ी डाल देती। मुझे तो लगता है कि रितू को सचमुच तहखाने से कुछ नहीं मिला है। बल्कि तुम्हारा ये ख़याल ज्यादा सही लगता है कि तहखाने में टाइम बम्ब लगाने वाले ने ही उन सब चीज़ों को गायब किया है।
"
"लेकिन ये हैरत के साथ साथ अविश्वास वाली बात भी है कि बंद फैक्टरी के अंदर तथा तहखाने का भी लाॅक तोड़ कर वो शख्स अंदर पहुॅच कैसे गया?" अजय सिंह ने कहा__"और तहखाने से सारी चीज़ें गायब कैसे किया उसने? क्या वो सब चीज़ें वह अपने साथ ले गया? जबकि फैक्टरी के गेट पर तैनात दरबान के अनुसार गेट पर बाहर से ताला ही लगा था। कहने का मतलब ये कि ये सब अगर उसने ही किया है तो कैसे किया ये?"
"यकीनन अजय।" प्रतिमा ने गहरी साॅस लेते हुए कहा__"ये बड़े ही आश्चर्य की बात है। कोई बंद फैक्टरी के तहखाने में आसानी से पहुॅच गया और अपना सारा काम बड़ी आसानी से ही करके उड़नछू हो गया। किसी को इस सबकी कानों कान भनक तक न लगी। यकीन नहीं होता।"
"अगर ऐसा ही है।" अजय सिंह कह रहा था__"तो सबसे बड़ी परेशानी की बात तो अब हुई है प्रतिमा। ज़रा सोचो जिसने भी ये सब किया है वो कभी भी हमारे खिलाफ वो सब चीजें पुलिस तक पहुॅचा सकता है, या फिर उन सब चीज़ों के आधार पर वह कभी भी हमें ब्लैकमेल कर सकता है। हमारा जीना हराम कर सकता है प्रतिमा...समझ में नहीं आता कि अब क्या करूॅ मैं??"
"अब तो यही कर सकते हैं कि हम उस शख्स के ब्लैकमेल करने का इंतज़ार करें।" प्रतिमा ने कहा__"इसके सिवा दूसरा कोई रास्ता भी नहीं है।"
अजय सिंह चिंता व परेशान सा बैठा रह गया। उसे क्या पता था कि ये सब चक्कर चलाने वाला वही है जिसे वह होटल या ढाबे में कप प्लेट धोने वाला समझता है।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
"ये क्या कह रहे हो तुम?" जगदीश ने चौंकते हुए सामने सोफे पर बैठे विराज की तरफ देख कर कहा__"अजय सिंह की फैक्टरी के तहखाने से वो सारी चीज़ें तुमने गायब करवाई थी???"
"यही सच है अंकल।" विराज ने अजीब भाव से कहा__"और ये सब करने के पीछे भी मेरा एक मकसद था।"
"कैसा मकसद राज?" गौरी ने हैरानी से अपने बेटे की तरफ देखते हुए कहा।
"मैं नहीं चाहता था कि अजय सिंह अपनी ही बेटी की वजह से इतना जल्दी कानून के हाॅथ लग जाए।" विराज ने कहा__"अगर ऐसा हो जाता तो खेल का मज़ा ही ख़राब हो जाता अंकल। जेल में पहुॅच कर अजय सिंह को वो मज़ा नहीं मिल पाता जो मज़ा आने वाले समय में मेरे द्वारा उसे मिलने वाला है। उसकी जगह जेल में नहीं है अंकल बल्कि जेल के बाहर ही है। मैं उसे कभी भी कोई शिकायत का मौका नहीं देना चाहता, वर्ना जेल में बंद होने पर वो ये कहेगा कि मुझे तो अपने हाॅथ पैर चलाने का मौका ही नहीं दिया गया। अब आप ही बताइए अंकल, क्या ऐसा करना सही होगा? नहीं न......इसी लिए मैंने उसे उसकी बेटी द्वारा जेल जाने से बचा लिया।"
"वो सब तो ठीक है बेटे।" जगदीश ने कहा__"मगर मुझे ये समझ नहीं आ रहा कि तहखाने से वो सब चीज़ें तुमने कैसे और कब गायब करवाई?"
"आपके सभी सवालों का जवाब आपको दूॅगा अंकल।" विराज ने हॅस कर कहा__"लेकिन उससे पहले मैं गरमा गरम चाय पीना चाहता हूॅ।
फिर तसल्ली से आपको समझा समझा कर सब कुछ बताऊॅगा।"
"ये तो चीटिंग है भइया।" निधि ने बुरा सा मुॅह बना कर कहा__"कितना अच्छा मज़ा आ रहा था मुझे और आपने इंटरवल करके सारा मज़ा ही ख़राब कर दिया मेरा। जाइए मुझे बात ही नहीं करना आपसे, हाॅ नही तो।"
"तुमने बिलकुल ठीक कहा बेटी इसने सारा मज़ा ख़राब कर दिया।" जगदीश ने हॅस कर कहा__"मैं भी अब इससे बात नहीं करूॅगा। अपने आपको बड़ा सूरमा समझने लगा है ये। है न बेटी?"
"बिलकुल।" रितू ने मुॅह फुला कर कहा__"हाॅ नहीं तो।"
"चुप कर।" सोफे से उठते हुए गौरी ने निधी को झिड़का__"हाॅ नहीं तो की बच्ची, वर्ना लगाऊॅगी एक।"
"भइया।" निधी ने विराज की तरफ मासूमियत से देखकर कहा__"देख लीजिए आपकी जान को माॅ एक लगाने को कह रही हैं। आप ऐसे कैसे चुप बैठ सकते हैं? हाॅ नहीं तो।"
गौरी तब तक अंदर किचेन की तरफ जा चुकी थी। जबकि निधि की इस बात से विराज बोला__"मैं चुप नहीं बैठा हूॅ लेकिन माॅ को कुछ कह भी तो नहीं सकता न गुड़िया। समझा कर न।"
"हांएॅ।" निधि एक दम से विराज से दूर हटते हुए बोली__"अब तो पक्का आपसे बात नहीं करूॅगी। देख लेना, हाॅ नहीं तो।" इतना कहने के बाद वह उठी और जगदीश वाले सोफे पर जा कर जगदीश के बिलकुल पास बैठ गई मुॅह फुला कर।
"आपको पता है अंकल।" विराज ने निधि की तरफ देखते हुए कहा__"आज शाम को मैं शिप द्वारा समंदर में घूमने का मज़ा लेने की सोच रहा था गुड़िया के साथ, लेकिन कोई बात नहीं मैं माॅ को लेकर चला जाऊॅगा। ठीक रहेगा न अंकल..माॅ भी समंदर में घूमने का आनंद ले लेंगी।"
"वाॅव, समंदर में बहुत मज़ा आएगा न भइया?" निधि बिजली की स्पीड से जगदीश वाले सोफे से उठकर विराज के पास उससे चिपक कर बैठते हुए बोली__"मैं न शिप के ऊपर बैठूॅगी जैसे फिल्मों में हीरो हिरोईन बैठते हैं, हाॅ नहीं तो।"
"तू कैसे बैठ जाएगी भला?" विराज ने कहा__"तू तो मेरे साथ जाएगी ही नहीं। मैं माॅ को लेकर जाऊॅगा।"
"ऐसा नहीं हो सकता।" निधि ने अकड़ कर कहा__"मैं जाऊॅगी और आपके ही साथ जाऊगी, और अगर आप मुझे अपने साथ नहीं जाएॅगे तो ये आपके लिए अच्छा नहीं होगा। देख लेना, हाॅ नहीं तो।"
"नहीं वो माॅ कह रही थीं कि गुड़िया यहीं रह कर अपनी पढ़ाई करेगी।" विराज ने कहा__"और वो मेरे साथ शिप में घूमने जाएंगी। इस लिए तुम मेरे साथ नहीं जा पाओगी।"
"मैं कुछ नहीं जानती।" निधि ने सहसा रुआॅसे होकर कहा__"मैं आपके साथ ही जाऊॅगी। क्या आप मुझे नहीं ले चलेंगे अपने साथ....मैं आपकी जान हूॅ ना?" कहते कहते निधि की आॅखों से आॅसू छलक गए, ये देख विराज का कलेजा हाहाकार कर उठा। उसे खुद पर बेहद गुस्सा आया कि वो अपनी गुड़िया को इस तरह भला कैसे रुला सकता है?
विराज ने उसे अपने सीने से छुपका लिया, निधि खुद भी उससे किसी फेवीकोल की तरह चिपक गई थी।
"मुझे माफ कर दे मेरी गुड़िया।
" फिर विराज ने भर्राए गले से कहा__"मैं तो बस मज़ाक कर रहा था। तुझे चिढ़ा रहा था और कुछ नहीं। चल अब रोना नहीं...तू जानती है न कि मैं अपनी जान की आॅखों में आॅसू नहीं देख सकता। और हाॅ...शिप में जाने का कोई प्रोग्राम नहीं था वो तो बस ऐसे ही कह रहा था मैं लेकिन अब ज़रूर हम दोनो संडे को शिप में बैठ कर समंदर में घूमेंगे और खूब मज़ा करेंगे ठीक है न?"
"हाॅ नहीं तो।" निधि ने हल्का सा सिर उठा कर विराज की तरफ मुस्कुरा कर कहा और फिर से उसके सीने में अपना चेहरा छुपा लिया। सामने बैठा जगदीश ओबराय ये सब देख कर मुस्कुरा रहा था। उसकी आॅखों में भी आॅसू थे।
"कहाॅ घूमने जाने और मज़ा करने की बात कर रहे हो तुम दोनो?" हाॅथ में ट्रे लिए आते हुए गौरी ने कहा।
"पता है माॅ।" निधि ने विराज के सीने से सिर उठा कर तथा मारे खुशी के कहा__"संडे को मैं और भइया समुंदर में शिप में बैठ कर घूमेंगे और खूब मस्ती करेंगे। हाॅ नहीं तो।" निधि की इस बात से विराज ने अपना सिर पीट लिया जबकि......
"क्या???" गौरी ने हैरानी से निधि और विराज की तरफ देख कर कहा__"नहीं तुम लोग कहीं नहीं जाओगे। समुंदर में तो बिलकुल भी नहीं।"
गौरी ने सबको चाय दी और खुद भी एक कप लेकर वहीं सोफे पर बैठ गई। जबकि उसकी इस बात से निधि का चेहरा उतर गया। उसने कातर भाव से विराज की तरफ देखा। विराज ने इशारे से कहा कि 'तू चिन्ता मत कर हम ज़रूर चलेंगे'। विराज के इस इशारे से निधि का चेहरा फिर से खिल उठा। और अब वह मुस्कुराते हुए आराम से चाय पीने लगी। उसे यूॅ मुस्कुराता देख गौरी का माथा ठनका, बोली__"अब इस तरह मुस्कुरा क्यों रही है? चुप चाप चाय पी।"
"अब क्या मैं मुस्कुरा भी नहीं सकती माॅ?" रितू ने हॅस कर कहा__"आप भी कमाल करती हैं।" इतना कहने के बाद एकाएक ही उसने विराज की तरफ देखा और धीरे से बोली__"हाॅ नहीं तो।"
उसकी इस क्रिया से चाय पी रहे विराज को ज़ोर का ठस्का लग गया और वह खाॅसने लगा। खाॅसने के साथ साथ वह हॅस भी रहा था। जबकि उसके इस प्रकार एकाएक खाॅसने से निधि हड़बड़ा गई। जानती तो वह भी थी कि उसके भाई को अचानक ठस्का क्यों लगा था जिसकी वजह से उसे खाॅसी आने लगी थी इस लिए पकड़े जाने के डर से हड़बड़ा गई थी वह।
"क्या हुआ बेटा?" गौरी ने चौंकते हुए पूछा।
"ये दोनो एक नम्बर के शैतान हैं गौरी बहन।" जगदीश ठहाका लगा कर हॅसते हुए बोला था__"तुम नहीं समझ पाई कि इन दोनो ने आपस में क्या खिचड़ी पका ली है?"
"मैं सब जानती हूॅ भइया।" गौरी ने भी हॅस कर कहा__"ये दोनो सोचते हैं कि ये मुझे बेवकूफ बना लेते हैं। ये दोनो ये भूल जाते हैं कि इन्होंने मुझे नहीं बल्कि मैंने इन दोनो को पैदा किया है।"
विराज और निधि ने एक दूसरे की तरफ अजीब भाव से इस तरह देखा जैसे चोरी पकड़ी गई हो।
"ख़ैर, अब बताओ राज।
" जगदीश ने कहा__"कि फैक्टरी के तहखाने से वो सब चीज़ें तुमने कब और कैसे गायब करवाई थी और ये भी कि किसके द्वारा?"
"आपको याद होगा अंकल।" विराज ने कहना शुरू किया__"मैंने आपसे कहा था कि 'अजय सिंह तो ये सोच भी नहीं सकता कि मैं अरविंद सक्सेना के द्वारा अभी और क्या खेल खलने वाला हूॅ'। जैसा कि मैने आपको बताया था कि सक्सेना की कमज़ोरी फोटोग्राफ्स के रूप में मेरे पास थी। इस लिए वह मेरे कहने पर कुछ भी करने को मजबूर था, और बदले में मैं उसे उसके परिवार सहित सुरक्षित विदेश भेजवा दूॅगा। अजय सिंह की नज़र में सक्सेना पहले ही उससे अपना हिसाब किताब करके विदेश जा चुका था जबकि सच्चाई कुछ और ही थी। सक्सेना तो उस दिन विदेश जाने वाली फ्लाइट पर बैठा था जिस रात अजय सिंह की फैक्टरी में आग लगी थी। मुझे सक्सेना के द्वारा ये पता था कि हप्ते में एक दिन व रात फैक्टरी में मजदूरों का अवकाश रहता है, यानी फैक्टरी बंद रहती है। इसी बात का ख़याल रख कर ही प्लान बनाया गया था। सक्सेना के अनुसार फैक्टरी का मेन गेट जो कि लोहे से बना हुआ है, उसकी चाभी मैनेजर या अजय सिंह के पीए के पास रहती है। सक्सेना ने उस चाभी की डुप्लीकेट चाभी पहले ही बनवा ली थी। इस लिए फैक्टरी के अंदर जाने की समस्या नहीं रह गई थी। समस्या थी तहखाने के अंदर पहुॅचने की। क्योंकि तहखाने के गेट पर पिनकोड सिस्टम वाला लाॅक था, जिसका पिनकोड सिर्फ अजय सिंह ही जानता था। इस लिए पिनकोड हासिल करने के लिए दिमाग़ का प्रयोग किया गया। सक्सेना को ये तो पता ही था कि अजय सिंह अवकाश वाले दिन या रात ही अपने गैर कानूनी धंधे वाला काम करता था। मैने सक्सेना के द्वारा पिनकोड हासिल करने के लिए उस रात तहखाने के पिनकोड लाॅक सिस्टम पर एक पाॅलिथिन नम्बरों के ऊपर इस प्रकार चिपकवा दी कि अजय सिंह ग़ौर से देखने पर भी ताड़ न पाए कि सिस्टम के ऊपर पाॅलिथिन चढ़ी हुई है। अजय सिंह जब तहखाने के अंदर जाने के लिए सिस्टम पर पिन नम्बर डालता तो वो सब पिन नंबर्स उस पाॅलिथिन में अजय सिंह के फिंगर प्रिंट्स के रूप में छप जाते। यहाॅ पर एक सवाल ये भी था कि अगर पिन का कोई नम्बर यानी संख्या एक से दो या तीन बार अजय सिंह के द्वारा डाल दी जाती तो कैसे पता चलता कि उस संख्या के कितने नंबर थे? एक्सपर्ट ने बताया था कि जो नंबर एक बार डाला जाएगा वो पाॅलिथिन पर कम दबाव के साथ छपेगा जबकि अगर कोई नंबर दो या तीन बार दबाया जाएगा वो ज्यादा दबाव के साथ छपेगा। इसके बाद उन नंबरों को चेक कर लिया जाएगा। मैं एक्सपर्ट की इस बात से मुतमईन न था क्योंकि इससे नंबर इधर उधर भी हो सकते थे। इस लिए पाॅलिथिन के साथ साथ मैने वहाॅ पर एक मिनी कैमरा इस प्रकार लगवाया कि उसमें अजय सिंह का पिन कोड डालना स्पष्ट दिखाई दे। बस फिर क्या था..
अजय सिंह जब वहाॅ आया तो सब कुछ रिकार्ड हो गया। अजय सिंह कभी सोच भी नहीं सकता था कि कोई उसके लिए कितना बड़ा खेल रच रहा है। ये सब काम तब हुआ था जब सक्सेना ने पार्टनरशिप नहीं तोड़ी थी अजय सिंह से।"
"तुम्हारे कहने का मतलब है।" जगदीश ने बीच में ही विराज की बात काटते हुए कहा__"कि ये सब तुम सक्सेना से पहले ही करा चुके थे? लेकिन इस बीच अगर अजय सिंह पिनकोड बदल देता तो क्या करते तुम?"
"मेरे दिमाग़ में भी यही सवाल था अंकल।" विराज ने कहा__"इस लिए जब दूसरा अवकाश हुआ फैक्टरी में तो सक्सेना ने मेरे कहने पर फिर से वहाॅ पर मिनी कैमरा लगा दिया था, कारण यही जानना था कि अजय सिंह ने पिनकोड बदल दिया है या पहले वाला ही है। मगर बाद में पता चला कि पिनकोड पहले वाला ही था।"
"चलो ये तो ठीक है।" जगदीश ने कहा__"लेकिन इतना कुछ पता करने के बाद तुमने ये सब पहले ही क्यों नहीं कर दिया था? मेरा मतलब है कि पहले ही फैक्टरी में आग क्यों नहीं लगवाई थी, इतने दिन बाद ही क्यों किया ऐसा?"
"इसमें भी एक मज़ेदार खेल छुपा था अंकल।" विराज ने मुस्कुरा कर कहा था__"मुझे पता था कि अजय सिंह की बेटी पुलिस की ट्रेनिंग कर रही है, उसकी ट्रेनिंग के बाद सीधा उसे किसी थाने में चार्ज सम्हाल लेना था। मैंने सोचा क्यों न अजय सिंह की बेटी को उसके थाना इंचार्ज बनते ही उसके बाप की फैक्टरी का केस सौंप कर उसे एक तोहफा दिया जाए। बस यही सोच कर कुछ दिन रुका रहा था मैं। आपसे कहा था कि मंत्री जी से बात करके रितू सिंह बघेल को वहीं का थाना उसकी पहली पोस्टिंग में मिले। बस सब कुछ सेट करने के बाद प्लान के अनुसार काम शुरू हो गया। फैक्टरी के बाहर गेट पर एक ही दरबान था उस रात, दूसरा दरबान नहीं था। पता चला था कि उस रात उसकी बीवी को बच्चा होने वाला था इस लिए वह छुट्टी लेकर चला गया था। उसकी जगह दूसरा कोई दरबान था ही नहीं। एक दरबान बचा था वह भी डबल ड्यूटी की वजह से उस रात आधी रात के समय कुर्सी में बैठा बार बार जम्हाई ले रहा था। उसे इस तरह जम्हाई लेता देख सक्सेना ने उसे क्लोरोफाॅम डाला हुआ रुमाल सुॅघा दिया। कुछ ही पल में बेचारा अंटा गाफिल हो गया। उसके बाद कोई समस्या ही नहीं थी। सक्सेना डुप्लीकेट चाभी की सहायता से फैक्टरी का गेट खोल कर अंदर गया उसके साथ चार आदमी और थे उसकी सहायता के लिए। सबके अंदर आते ही सक्सेना ने अंदर से गेट भी बंद कर लिया। तहखाने के पास पहुॅच कर उसने तहखाने के गेट पर लगे पिन सिस्टम पर कोड नंबर डाला और दरवाजा खोल कर तहखाने के अंदर पहुॅच गया। सभी ने तहखाने में मौजूद गैर कानूनी सामान को अपने साथ लाई हुई बोरियों में भरना शुरू कर दिया। एक घंटे बाद वो सब लोग तहखाने में रखी हर गैर कानूनी चीज़ को बोरियों में भर लिया था। उसके बाद वहाॅ तीन टाइम बम्ब लगा कर वो सब सुरक्षित बाहर आ गए।
फैक्टरी का बाहर वाला गेट उसी तरह बाहर से लाॅक करके वो सब वहाॅ से लौट आए। अपने पीछे कोई सबूत नहीं छोंड़ा था उन्होने। हलाॅकि बम्ब के फटने पर कोई सबूत रह ही नहीं जाना था लेकिन बाहर गेट पर सबूत हो सकते थे इसके लिए उन लोगों ने पहले से ही अपने हाथों में दस्ताने पहन रखे थे। इतनी बड़ी बात को अंजाम दिया गया लेकिन किसी को उस रात कोई भनक तक न हुई। कारण एक तो रात का समय, दूसरे बाॅकी स्टाफ फैक्टरी से दूर बने आफिसों में था और सबसे बड़ी बात किसी को गुमान ही नहीं था कि कोई इस सबके लिए शहर से दूर यहाॅ आएगा।"
"तो आख़िर इस तरह तुमने सक्सेना और कुछ आदमियों के द्वारा ये सब करवाया था?" जगदीश ओबराय ने कहा__"सक्सेना तो उसी रात अपने परिवार के साथ बम्ब फटने के तीन घंटे पहले ही विदेश जाने के लिए फ्लाइट में बैठ चुका था, किन्तु वो आदमी कौन थे? उन सबको इस बारे में पता है, हो सकता है वो इस सबका कभी भाॅडा फोड़ दें तो क्या करोगे तुम?"
"पहली बात तो वो ये सब करेंगे नहीं क्योंकि वो यही जानते हैं कि ये सब उन्होने किसी माफिया गैंग के लिए किया है।" विराज ने कहा__"सक्सेना भी उन सबकी तरह ही उस रात अपने चेहरे पर नकाब पहना हुआ था। सक्सेना ने उनसे यही कहा था कि वो माफिया का आदमी है। इस सबका कोई डर नहीं है। दूसरी बात ये है कि मैं खुद भी ज्यादा दिनों तक इस सबको अजय सिंह से छुपा कर नहीं रखूॅगा। बल्कि डंके की चोंट पर उसके सामने जाकर उसे बताऊॅगा कि उसके साथ जो कुछ भी अब तक हुआ है वो सब मैंने किया है।"
"वो सब तो ठीक है राज।" जगदीश ने कहा__"लेकिन इंस्पेक्टर रितू तो छानबीन कर ही रही है न? संभव है कि वह किसी तरह इस सबका पता लगा ले कि ये सब तुमने किया है तो??"
"उससे कुछ भी फर्क नहीं पड़ता अंकल।" विराज ने कहा__"क्योंकि आगे चल कर मैं खुद ही ये सब उन लोगों को बताऊॅगा कि मैंने ही ये सब किया है। और यकीन मानिए अंकल उनमें से कोई भी मेरा बाल भी बाॅका नहीं कर सकेगा। रही बात उस पुलिस वाली की तो वो भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती, क्योंकि सब कुछ जान लेने से या पता कर लेने से कुछ नहीं होता। बल्कि किसी भी चीज़ को साबित करने के लिए उस कानून वाली के पास सबूत और गवाह होने चाहिए, बिना सबूत के वो मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। और सबूत उसे इस जनम में तो क्या किसी भी जनम में नहीं मिलेंगे।"
"जुर्म चाहे जितनी सफाई से किया जाए राज।" जगदीश ने कहा__"वो अपने पीछे कोई न कोई ऐसा सबूत ज़रूर छोंड़ जाता है जिसकी वजह से वो एक दिन कानून की गिरफ्त में आ जाता है।"
"आप बताइए अंकल।" विराज ने मुस्कुराते हुए कहा__"मैंने इस सबके पीछे क्या सबूत छोड़ा है? जबकि मैंने अभी तक जो कुछ भी किया वो भी यहीं बैठे बैठे किया है। इस सबको अंजाम देने वाले तो कोई और ही थे।"
"अरविंद सक्सेना तुम्हारे लिए एक कमज़ोर प्वाइंट है बेटे।
" जगदीश ने कहा__"मान लो तहकीकात में रितू को ये पता चल जाए कि इस सबमें सक्सेना का हाॅथ है तो? वह सक्सेना को शक की बिना पर धर लेगी और फिर उससे सारा सच उगलवा लेगी। सक्सेना को पुलिस के सामने ये कबूल करना ही पड़ेगा कि ये सब उसने तुम्हारे कहने पर किया था।"
"इतनी दूर तक जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी अंकल।" विराज ने कहा__"क्यों कि उससे पहले मैं ही मैदान में आ जाऊॅगा। मैं खुद उन लोगों के सामने इस सबका इकबाले जुर्म करूॅगा। और पता है अंकल, अजय सिंह को ये भी एहसास दिलाऊॅगा कि उसका गैर कानूनी सामान अभी भी मेरे पास ही है, तथा उसके खिलाफ ऐसे ऐसे सबूत भी हैं मेरे पास जिससे उसको कानून के लपेटे में आने के लिए ज़रा भी देर नहीं लगेगी। बेचारा खुद ही इस सबके डर से अपनी इंस्पेक्टर बेटी से मेरी पैरवी करने लगेगा।"
"बात तो तुम्हारी ठीक है।" जगदीश हॅस पड़ा__"संभावनाओं पर कुछ नहीं होता, कानून को तो सबूत चाहिए। और सबूत कोई है नहीं। वाह....ये तो कमाल हो गया बेटे।"
"अभी तो दिमाग़ से ही उनकी हालत खराब कर रखी है अंकल।" विराज ने कहा__"जबकि मैदान में खुल कर आना अभी बाॅकी है। जिस दिन आमने सामने का खेल होगा न उस दिन से अजय सिंह हर पल रोएगा, गिड़गिड़ाएगा, रहम की भीख माॅगेगा मुझसे और मेरी माॅ से।"
"उसके साथ यही होना चाहिए राज बेटे।" जगदीश ने कहा__"जो अपने माॅ बाप और भाई का न हुआ बल्कि उनके साथ इतना घिनौना कर्म किया ऐसे गंदे इंसान के साथ किसी भी कीमत पर रहम नहीं होना चाहिए।"
"उनके लिए रहम शब्द मैंने अपनी डिक्शनरी से निकाल कर फेंक दिया है अंकल।" विराज ने एकाएक ठंडे स्वर में कहा__"एक एक चीज़ का हिसाब लूॅगा मैं।"
"मैं तो उस कमीने शिवा को अपने हाथों से कुत्ते की तरह मारूॅगी।" सहसा निधि ने तपाक से कहा__"मुझे उसकी शकल से भी नफरत है। हाॅ नहीं तो।"
निधि के इस तकिया कलाम को सुन कर सब मुस्कुरा कर रह गए।
अपडेट हाज़िर है दोस्तो.....
आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा,,,,,,,,,
अपडेट.............《 20 》
अब तक.......
"बात तो तुम्हारी ठीक है।" जगदीश हॅस पड़ा__"संभावनाओं पर कुछ नहीं होता, कानून को तो सबूत चाहिए। और सबूत कोई है नहीं। वाह....ये तो कमाल हो गया बेटे।"
"अभी तो दिमाग़ से ही उनकी हालत खराब कर रखी है अंकल।" विराज ने कहा__"जबकि मैदान में खुल कर आना अभी बाॅकी है। जिस दिन आमने सामने का खेल होगा न उस दिन से अजय सिंह हर पल रोएगा, गिड़गिड़ाएगा, रहम की भीख माॅगेगा मुझसे और मेरी माॅ से।"
"उसके साथ यही होना चाहिए राज बेटे।" जगदीश ने कहा__"जो अपने माॅ बाप और भाई का न हुआ बल्कि उनके साथ इतना घिनौना कर्म किया ऐसे गंदे इंसान के साथ किसी भी कीमत पर रहम नहीं होना चाहिए।"
"उनके लिए रहम शब्द मैंने अपनी डिक्शनरी से निकाल कर फेंक दिया है अंकल।" विराज ने एकाएक ठंडे स्वर में कहा__"एक एक चीज़ का हिसाब लूॅगा मैं।
"
"मैं तो उस कमीने शिवा को अपने हाथों से कुत्ते की तरह मारूॅगी।" सहसा निधि ने तपाक से कहा__"मुझे उसकी शकल से भी नफरत है। हाॅ नहीं तो।"
निधि के इस तकिया कलाम को सुन कर सब मुस्कुरा कर रह गए।
अब आगे......
ऐसे ही कुछ दिन गुज़र गए। अजय सिंह अब अपनी हालत पर काबू पा चुका था। बल्कि ये कहिये कि हर बात से काफी हद तक बेफिक्र हो चुका था। उसकी बेटी रितू द्वारा उसे पता चल चुका था कि तहखाने में बाॅकी कुछ नहीं मिला था। हलाॅकि रितू को इस बात के पता होने का सवाल ही नहीं था कि उसका बाप गैर कानूनी काम करता है। उसने तो फाॅरेंसिक रिपोर्ट को देखकर यही बताया था कि फैक्टरी में आग टाइम बम्ब के द्वारा ही लगी थी। अब उसकी तहकीकात सिर्फ इसी तरफ थी कि फैक्टरी के अंदर जाकर तहखाने में टाइम बम्ब किसने लगाया था??
रितू को एक सवाल ये भी परेशान कर रहा था कि इस केस की बारीकी से जाॅच पड़ताल कराने के पीछे होम मिनिस्टर का क्या मकसद था?? उसने तो सिर्फ केस को रिओपेन करने की अप्लीकेशन बस दी थी। उसका मकसद तो सिर्फ ये पता करना था कि इस केस में पुलिस ने इस प्रकार की रिपोर्ट क्यों बनाई थी?? दूसरी बात ये थी कि उसे लगता था कि फैक्टरी में लगी आग महज कोई इत्तेफाक़ की बात नहीं थी। बल्कि उसके पिता के किसी दुश्मन द्वारा लगाई गई थी। इस लिए वह इस सबका पता करके उस ब्यक्ति द्वारा अपने पिता के हुए भारी नुकसान की भरपाई करना चाहती थी। उसे तो इस बात से भी हैरानी थी कि रातों रात इस शहर के सारे पुलिस डिपार्टमेंट का तबादला क्यों कर दिया गया था??? इसके पीछे क्या सिर्फ ये वजह थी कि इस केस की पुलिस ने अपनी पूरी ईमानदारी के साथ छानबीन नहीं की, बल्कि किसी के कहने पर ऐसी रिपोर्ट तैयार की?? क्या सिर्फ यही वजह थी या फिर इसके पीछे भी कोई ऐसा कारण है जो फिलहाल अभी उसकी समझ से बाहर नज़र आ रहा है??
अजय सिंह बेफिक्र ज़रूर हो गया था किन्तु इस बात का उसे एहसास था कि एक तलवार अभी भी उसकी गर्दन पर लटकी हुई है, जो कभी भी उसका गला रेत सकती है। वह पक्के तौर पर समझ चुका था कि तहखाने से वह सब चीज़ें तहखाने में टाइम बम्ब लगाने वाले ने ही गायब की हैं। वह नहीं जानता था कि ये सब किसने किया है लेकिन इतना अवश्य जानता था कि देर सवेर उस ब्यक्ति का इस संबंध में कोई न कोई मैसेज ज़रूर आएगा। अजय सिंह उसी मैसेज के इन्तज़ार में था। दूसरी बात अपने बिजनेस को फिर से खड़ा करने के लिए वह कार्यरत भी हो गया था। फैक्टरी भले ही जल गई थी उसकी लेकिन उसके पास पैसों की कमी नहीं थी। गैर कानूनी धंधे में उसने बड़ी धन दौलत इकट्ठी कर ली थी। उसने फैक्टरी को फिर से शुरू करने के लिए उसकी मरम्मत का काम शुरू करवा दिया था। इस समय वह रात दिन इसी में ब्यस्त रहता था। उसकी छोटी बेटी नीलम वापस मुम्बई जा चुकी थी।
अजय सिंह फैक्टरी को फिर से शुरू करने के लिए कार्यरत था, इस बात से अंजान कि उसके पीछे उसका बेटा शिवा अपने आचरण से क्या हंगामा खड़ा करने जा रहा था???
शिवा का ज्यादातर समय अपने आवारा दोस्तों के साथ मस्ती करने और गाॅव की किसी न किसी लड़की को पटा कर उनके साथ अपने अंदर की हवस मिटाने में जाता था। माॅ बाप की तरह वो भी अपने ही घर की औरतों व लड़कियों को गंदी नज़रों से देखता था और रात दिन अपनी ही माॅ बहनों तथा चाची को अपने नीचे लेटाने की सोचता रहता था।
ऐसे ही एक दिन उसकी हरकतों की वजह से हंगामा हो गया। अपने बाप की तरह ही उसकी नीयय अपनी चाची करुणा पर बिगड़ी हुई थी। करुणा की बेटी दिव्या भी जवान हो रही थी, हलाॅकि अभी वह स्कूल में पढ़ती थी किन्तु आज की जनरेशन ज़रा एडवाॅस होती है, ये अपनी ऊम्र से पहले ही जवान हो जाते हैं। खेला खाया शिवा चाची की बेटी दिव्या को भी हवस भरी नज़रों से देखता था। चाची के गदराए व खूबसूरत जिस्म का वह शुरू से ही दिवाना था। किन्तु कुछ कर नहीं सकता था क्योंकि वह अपने चाचा अभय के गुस्सैल स्वभाव के चलते डरता था, दूसरी बात उसकी चाची करुणा भी ऐसी वैसी औरत नहीं थी जिससे वह अपने इरादों में कामयाब हो पाता। उससे जितनी हो सकती थी उतनी कोशिश वह फिर भी किया करता था। मतलब चाची के पास उठना बैठना तथा उनके द्वारा दिये गए हर काम को खुशी खुशी करना। उनसे हॅसना बोलना, बातों के बीच यदा कदा मज़ाक भी कर लेना। करुणा ज्यादातर दिन में अकेली ही होती थी, उसके साथ उसका बारह साल का दिमाग़ से डिस्टर्ब बेटा शगुन रहता था। उसका पति और बेटी दिव्या सुबह स्कूल चले जाते थे, फिर शाम चार बजे के आस पास ही आते थे। सुबह दस बजे से चार बजे तक करुणा अकेली ही घर में रहती थी। हलाॅकि दिन भर वह कोई न कोई काम करती ही रहती थी ताकि उसका समय पास हो जाए।
एक दिन की बात है, उस दिन गुरूवार था। अभय व दिव्या रोज़ की तरह स्कूल गए हुए थे। शिवा की आदत थी कि वह करुणा के घर तभी जाता था जब उसका चाचा और चाचा चाची की बेटी स्कूल चले जाते थे। उसे अपनी चाची करुणा की दिनचर्या का बखूबी पता था। वह जानता था कि चाचा और दिव्या के स्कूल जाने के बाद ही करुणा नहाने जाती थी बाॅथरूम में। बाहर मेन गेट बंद रहता था किन्तु अंदर से कुंडी नहीं लगी होती थी। करुणा कुंडी नहीं लगाती क्योंकि उसे पता होता था कि शिवा आएगा। ख़ैर, रोज़ की तरह ही शिवा उस दिन भी अपने निर्धारित समय पर पहुॅचा। दरवाजे को हल्के से खोल कर वह अंदर दाखिल हो गया। अपनी चाची के नहाने के समय पर वह इसी लिए आता था कि वह किसी तरह अपनी चाची को बाथरूम में नहाते हुए देख सके। हलाॅकि ऐसा कभी हुआ नहीं था बल्कि वह हमेशा अपने मनसूबों में नाकामयाब रहा था।
यानी उसकी चाची कमरे से अटैच बाथरूम में जाने से पहले अपने उस कमरे का दरवाजा बंद करके अंदर से कुंडी लगा देती थी। शिवा को अपनी चाची को नहाते देखने के लिए पहले चाची के कमरे में जाना पड़ता फिर बाथरूम में। जबकि दरवाजा ही बंद रहता था इस लिए वह कुछ कर ही नहीं सकता था। वह अपनी चाची से कह भी नहीं सकता था कि आप अपने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद मत किया कीजिए।
मगर कहते हैं न कि होनी अटल होती है। यानी जिस वक्त जो होना होता है वो होकर ही रहता है। कहने का मतलब ये कि करुणा बाथरूम में नहाने जाने से पहले आज अपने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद करना भूल गई, या यूॅ कहिए कि नियति के चलते उससे ये भूल हो गई।
शिवा जब भी आता था तो सबसे पहले ये ज़रूर चेक करता था कि उसकी चाची ने दरवाजा अंदर से बंद किया है या नहीं। हलाकि वह जानता था कि चाची दरवाजा खुला रखने की ग़लती कभी नहीं करती हैं, फिर भी वह अपनी तसल्ली के लिए एक बार ज़रूर चेक करता था। आज भी उसने ऐसा ही किया, और दरजाजा जब उसकी उम्मीद के विपरीत उसके द्वारा दिए गए हल्के से दबाव में बेआवाज़ तथा बिना किसी विरोध के खुलता चला गया तो वह पहले तो हैरान हुआ मगर जल्द ही उसका मन मयूर खूशी से नाचने भी लगा। वह दबे पाॅव कमरे में दाखिल हुआ। उसकी धड़कने एकाएक बढ़ गई थीं जिसके धक धक करने की हर थाप उसे अपनी कनपटियों में बजती महसूस हो रही थी।
कमरे में पहुॅचते ही उसने देखा कि बेड पर उसकी चाची के वो कपड़े रखे हैं जिन्हें उसकी चाची नहाने के बाद पहनने वाली थी। शिवा ने आगे बढ़ कर उन कपड़ों को ग़ौर से देखा। साड़ी ब्लाउज पेटीकोट व ब्रा पैन्टी सब बड़े सलीके से रखे हुए थे। शिवा की नज़र ब्रा और पैन्टी पर पड़ी। उसने बिना कुछ सोचे समझे तथा बिना एक पल गवाॅए अपना हाॅथ बढ़ा कर बेड से चाची की लाल रंग की ब्रा को उठा लिया। ब्रा अच्छी क्वालिटी की थी, उसके कप देख कर शिवा की आॅखों में अजीब सी चमक आ गई। उसने ब्रा को अच्छी तरह से उलटा पलटा कर देखा। 36D पर नज़र पड़ते ही वह अजीब तरह से मुस्कुराया और फिर उस ब्रा को अपनी नाॅक के पास लाकर उसे सूॅघने लगा। ब्रा की सुगंध ने अपना असर दिखाया और शिवा की आॅखें एक अजीब सी खुमारी से बंद होती चली गई। उसका रोम रोम रोमाॅच से भरता चला गया। कुछ देर इसी तरह वह ब्रा को सूॅघता रहा फिर उसने अपनी आॅखें खोली और ब्रा से नज़र हटा कर उसने बेट पर पड़ी चाची की पैन्टी की तरफ देखा। तुरंत ही उसने पैन्टी को उठा लिया और उसे भी उलट पलट कर देखने लगा 38 साइज पर नज़र पड़ी तो एक बार फिर वह अजीब तरह से मुस्कुराया और फिर सीघ्र ही पैन्टी के उस भाग को अपनी नाॅक के पास लाकर सूॅघने लगा जिस भाग में उसकी चाची का योनि भाग होता है। पैन्टी के योनि भाग को सूॅघते ही उसकी आॅखें पुनः बंद होती चली गई।
वह अपनी नाॅक से ज़ोर ज़ोर से साॅसे खींचने लगा। तभी वह किसी आहट से बुरी तरह चौंका, उसने तुरंत अपनी आॅखें खोल कर इधर उधर देखा किन्तु कहीं कोई नहीं था, बस कानों में कमरे से अटैच बाथरूम में पानी गिरने की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
शिवा को सहसा ख़याल आया कि चाची तो अंदर बाॅथरूम में है। जिसे नहाते हुए देखने के लिए वह न जाने कब से तड़प रहा था। आज उसे ये सुनहरा मौका मिला है तो उसे ये मौका किसी भी कीमत पर गवाॅना नहीं चाहिए। ये सोचते ही उसने अपने हाॅथ में ली हुई ब्रा पैन्टी को बेड पर उसी तरह सलीके से रख दिया और फिर पलट कर दबे पाॅव बाथरूम के दरवाजे की तरफ बढ़ा।
बाथरूम के दरवाजे के पास पहुॅच कर उसने देखा कि बाथरूम का दरवाजा बंद तो था किन्तु अंदर से कुंडी नहीं लगी थी। बल्कि हल्का सा खुला ही नज़र आ रहा था। करुणा ने शायद इस लिए बाथरूम की कुंडी अंदर से नहीं लगाई थी कि उसकी समझ में कमरे का दरवाजा अंदर से बंद है, इस लिए किसी के अंदर आने का कोई सवाल ही नहीं है। जबकि इधर शिवा ये देख कर हैरानी के साथ साथ खुश हो गया कि उसकी चाची ने आज हर तरफ से उसका रास्ता खुला रखा है।
शिवा ने अपने ज़ोर ज़ोर से धड़क रहे दिल के साथ बाथरूम के दरबाजे में बाहर इस तरफ लगे हैण्डल को आहिस्ता से पकड़ कर दरवाजे को बाथरूम की तरफ हल्के से ढकेला। परिणामस्वरूप दरवाजा बेआवाज़ खुलता चला गया किन्तु शिवा ने दरवाजे को ज्यादा खोलना मुनासिब न समझा बल्कि उतना ही खोला जितने में वह अंदर नहाती हुई अपनी चाची को आराम से देख सके। शिवा ने धाड़ धाड़ बजती हुई अपने दिल की धड़कनों के साथ बाथरूम के अंदर की तरफ देखा....और यहीं पर दो चीज़ें एक साथ हुईं। इधर शिवा ने अंदर नहाती हुई अपनी चाची के बेपर्दा जिस्म को देखा और उधर बाहर से कमरे में दाखिल होकर अभय ने बाथरूम में अंदर की तरफ झाॅकते अपने भतीजे शिवा को देखा। और....और.....
"शिवाऽऽऽऽऽऽऽऽ।" अभय ने शेर की तरह दहाड़ते हुए आकर शिवा को पीछे से उसके शर्ट की कालर से पकड़ कर अपनी तरफ एक झटके से खींचा, और खींचते हुए ही कमरे से बाहर बड़े से ड्राइंगरूम में ले गया। और इसके बाद शुरू हुई शिवा की लात घूॅसों से धुनाई।
"तेरी हिम्मत कैसे हुई हरामखोर अपनी चाची को बाथरूम में इस तरह नहाते हुए देखने की??" अभय ने गुस्से से कहने के साथ ही शिवा को उठा कर पक्के फर्स पर पटक दिया। शिवा की दर्द भरी चीख पूरे घर में गूॅज गई।
"बोल हरामजादे बोल।" फर्स पर दर्द से कराहते शिवा के पेट में अभय ने ज़ोर से लात जमाते हुए कहा__"तेरी हिम्मत कैसे हुई ये नीच काम करने की?? बोल वर्ना यहीं पर ज़िदा दफन कर दूॅगा।"
"मु मुझे माफ आहहहह कर दीऽऽजिए चाचा जी।" लात घूॅसों के निरंतर पड़ने से कराहते हुए शिवा ने अपने हाॅथ जोड़ने का प्रयास करते हुए कहा__"मुझे माफ कर दीजिए, मुझसे ग़लती हो गई।
आहहहहह माफ कर दीजिए चाचा जी...अब दुबारा ऐसा कभी नहीं करूॅगा चाचा जी। आहहहहह एक बार माफ कर दीजिए आहहहह।"
"तुझे माफ कर दूॅ कुत्ते???" शिवा को कालर से पकड़ कर उठाते हुए अभय ने गुर्राते हुए कहा__"नहीं हर्गिज़ नहीं। तू माफी के लायक नहीं है। तूने जो नीच काम करने का दुस्साहस किया है उसके लिए तो तुझे जिदा मार देना चाहिए।"
इधर अभय लात घूॅसों से शिवा की कुटाई किये जा रहा था उधर करुणा की हालत भी खराब हो गई थी। दरअसल अभय जब पहली बार कमरे में आकर शिवा को बाथरूम में झाॅकते देख दहाड़ा था तभी करुणा उछल पड़ी थी। अभय के मुख से शिवा का नाम सुनते ही वह समझ गई थी कि क्या माज़रा है? उसे इस ख़याल ने ही बुरी तरह हिला कर रख दिया था कि उसकी जेठानी का लड़का शिवा जो खुद भी उसके बेटे के समान ही है वो उसे नंगी हालत में नहाते हुए बाहर से छिप कर देख रहा था। इतना ही नहीं वह अभय के द्वारा ये नीच काम करते हुए रॅगे हाथों पकड़ा भी गया था।
करुणा मारे शर्म के तथा इस हादसे से बाथरूम के फर्स में उसी तरह नंगी हालत में बैठी तथा अपने दोनो घुटनों के बीच मुॅह छुपाए बुरी तरह रोए जा रही थी। उसकी मारे शर्म और अभय के डर से हिम्मत ही नहीं हो रही थी कि वह यहाॅ से बाहर कमरे में जाए। उसे जैसे खुद का होश ही नहीं रहा था कि वह इस वक्त किस हालत में है। उसके कानों में बाहर से आती आवाज़ें साफ सुनाई दे रही थी। जिन आवाज़ों में शिवा की दर्द भरी चीखें और अभय का शेर की तरह गरजना शामिल था।
इधर अभय सिंह शिवा को लात घूॅसों से मारते मारते अधमरा कर दिया। शिवा इतनी कुटाई के बाद बेहोश हो चुका। उसके जिस्म में कई जगह नीले निशान पड़ चुके थे। आॅख नाॅक मुॅह सब फूल गए थे, तथा नाॅक व होंठ फट गए थे जहाॅ से खून बह रहा था। शिवा के बेहोश होने के बाद भी अभय सिंह का गुस्सा शान्त नहीं हुआ था। उसने शिवा को उठा कर अपने कंधे में डाला और घर से बाहर निकल गया।
घर से बाहर आकर अभय अपने बड़े भाई अजय सिंह के घर की तरफ बढ़ता चला जा रहा था। कछ ही देर में वह अजय सिंह के घर के अंदर ड्राइंगरूम में पहुॅच गया। ड्राइंग रूम में इस वक्त कोई नज़र न आया।
"भाभीऽऽऽऽ।" अपने कंधे पर शिवा को उसी तरह लिए हुए अभय ड्राइंग रूम में खड़े होकर पूरी शक्ति से चिल्लाया था।
उसके इस तरह चिल्लाने का असर ये हुआ कि दो पल में ही कमरे से बाहर लगभग दौड़ती हुई प्रतिमा ड्राइंगरूम में दाखिल होती नज़र आई।
"क् क्या हुआ अभय???" प्रतिमा ने आते ही अभय से पूछा__"क्या बात है तुम इस तरह चिल्लाए क्यों???"
प्रतिमा की बात सुन कर अभय सिंह ने अपने कंधे से शिवा को उतार कर सामने रखे सोफे के पास जाकर सोफे पर शिवा को लगभग पटक दिया। प्रतिमा की नज़र जैसे ही अपने बेटे की अधमरी हालत पर पड़ी तो उसके हलक से चीख निकल गई।
"ये ये क्या हो गया मेरे बेटे को?" प्रतिमा दौड़ कर शिवा के चेहरे को अपने हाॅथों में लेकर रोते हुए बोली__"किसने की मेरे बेटे की ऐसी हालत??? अभय इसे कहाॅ से लेकर आए हो तुम?? प्लीज बताओ क्या हुआ है इसे?? किसने किया ये सब??"
"मैंने की है इसकी ये दुर्दसा।" अभय ने बर्फ की मानिंद ठंडे स्वर में कहा__"और जी तो चाहता है कि इसे अभी जान से मार दूॅ।"
"अभऽऽऽय।" प्रतिमा एक झटके में खड़ी होकर चिल्लाते हुए कहा__"तुम होश में तो हो? ये क्या बोल रहे हो तुम??"
"शुकर मनाइए भाभी कि मैंने अपना होश नहीं खोया था।" अभय ने पहली बार अपनी भाभी की आॅखों में आॅखें डाल कर तथा गुर्राते हुए कहा__"वर्ना जिस बेटे को बेटा कहते हुए आपकी ज़ुबान नहीं थकती न उसे आज ज़िन्दा ही ज़मीन के अंदर दफन कर दिया होता।"
"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझसे इस लहजे में बात करने की?" प्रतिमा ने चीखते हुए कहा__"तुम भूल गए हो कि तुम किससे बात कर रहे हो? अपने से बड़ों की तमीज़ भूल गए हो तुम? और.....और मेरे बेटे के बारे में ऐसा बोलने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी??"
"मुझे तमीज़ और संस्कार न बताइए भाभी।" अभय ने कठोर भाव से कहा__"बल्कि इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत आपके बेटे को है, इस हरामज़ादे को सिखाइए तमीज़ और संस्कार। आज इसने जो नीच हरकत की है, इसकी जगह कोई और होता तो अब तक मेरे हाॅथों जान से मार दिया गया होता। आपका और बड़े भइया का ख़याल कर लिया इस लिए इसे ज़िन्दा छोंड़ दिया है मैंने। मगर आइंदा अगर इसने मेरे घर की तरफ देखने की भी ज़ुर्रत की तो इसके लिए अच्छा नहीं होगा।"
प्रतिमा को एकाएक झटका सा लगा। सारा गुस्सा सारा चीखना चिल्लाना साबुन के झाग की तरह डण्डा पड़ता चला गया। अभय की इस बात ने उसे अंदर ही अंदर बुरी तरह चौंका दिया कि उसके बेटे ने कोई नीच हरकत की है। अपने पति व बेटे की रॅग रॅग से वाकिफ प्रतिमा समझ गई कि उसके बेटे ने कोई ग़लत हरकत की है, मगर क्या??
"आख़िर ऐसा क्या किया है मेरे बेटे ने अभय??" प्रतिमा ने तनिक हल्के लहजे से कहा__"जो तुम इसे जान से मार देने की बात कर रहे हो?"
"क्या बताऊॅ आपको?" अभय ने अजीब भाव से कहा__"मुझे तो आपसे बताने में भी शर्म आती है लेकिन इस हरामज़ादे को उस नीच काम करने में ज़रा भी शर्म नहीं आई।"
"अभय प्लीज, बताओ मुझे कि क्या किया है इसने??" प्रतिमा का दिल बुरी तरह धड़कने लगा था किसी आशंकावश।
"ये करुणा को उसके बाथरूम में छिप कर नहाते हुए देख रहा था।" अभय ने गुर्राते हुए कहा__"आज स्कूल में एक मास्टर की मृत्यु हो गई थी इस लिए स्कूल में सभी बच्चों की छुट्टी कर दी गई। मैं भी घर लौट आया, मगर मुझे क्या पता था कि घर आते ही मुझे इसकी गंदी करतूत देखने को मिलेगी? जैसे ही मैं कमरे में दाखिल हुआ तो मेरी नज़र बाथरूम के दरवाजे से छिप कर बाथरूम में देखते आपके इस नीच बेटे पर पड़ी।
ये करुणा को नहाते हुए जाने कब से देख रहा था। इसे इस बात का भी ख़याल नहीं रहा कि करुणा इसकी चाची है जो खुद इसके माॅ के ही समान है उसे यह इस नीचता से कैसे देख सकता है??"
"सचमुच अभय।" प्रतिमा ने सारी बात सुनते ही दुखी भाव से कहा__"इसने बहुत बड़ा पाप किया है। इसे ऐसा करने की तो बात दूर बल्कि ऐसा करने की सोचना भी नहीं चाहिए था। अच्छा किया तुमने जो इसे इसकी नीचता की सज़ा दे दी। ये माफी के लायक नहीं है अभय....मगर मैं तुमसे हाॅथ जोड़ कर माफी माॅगती हूॅ इसकी तरफ से। आइंदा ये ऐसा कुछ नहीं करेगा।"
"जिसके मन में इस तरह के नीच और बुरे विचार एक बार पैदा हो जाते हैं वो इतना जल्दी ज़हन से नहीं जाते।" अभय ने कहा__"इस लिए इससे मेरा भरोसा अब उठ चुका है, और अब अगर ये मेरे घर के आस पास भी नज़र आया तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा?"
"अब ये कुछ भी ऐसा वैसा नहीं करेगा अभय।" प्रतिमा ने कहा__"मैं इस बात का वचन देती हूॅ तुम्हें। मैं बहुत शर्मिंदा हूॅ कि मेरे बेटे ने ऐसी नीच व घटिया हरकत की।"
"ये सब आप और बड़े भइया के लाड़ प्यार का नतीजा है भाभी।" अभय ने कहा__"आप लोगों ने हमेशा इसकी ग़लतियों पर पर्दा डाला है, वर्ना ये ऐसा न बनता। मुझे इसकी करतूतों के बारे में सब पता है, ये गाॅव की हर लड़की और औरत पर गंदी नज़र रखता है। लेकिन मुझे ये नहीं पता था कि इसकी गंदी नज़र अपनी ही माॅ समान चाची पर भी हैं, और क्या पता इसकी ये गंदी नज़रें परिवार की किन किन लड़कियों और औरतों पर हैं??? जिसे अपनी हवस के आगे रिश्तों का कोई ख़याल ही न हो वो परिवार की किसी भी औरत के बारे में कुछ भी सोच और कर सकता है।"
"ऐसा नहीं है अभय।" प्रतिमा की ये सोच कर अब हालत ख़राब होने लगी थी कि अभय उसके बेटे की करतूतों को जानता है और उसके बारे में अब ऐसा बोल रहा है। वो तो जानती ही थी कि उसका बेटा अपने बाप की तरह ही परिवार की हर लड़की व औरत को अपने नीचे लेटाना चाहता है। उसका बस चले तो वो अपनी माॅ को भी अपने नीचे लेटाने में एक पल भी जाया न करे। आज उसी बेटे की करतूतों से सारा बना बनाया खेल बिगड़ गया था। अभय के सामने ये सब हो गया इस लिए हालातों को सम्हालने की गरज़ से उसने कहा__"मेरा बेटा इतना नीच और गिरा हुआ नहीं है कि वो परिवार की औरतों के बारे में ऐसा सोचे। मैं मानती हूॅ कि उसने ग़लती की है, और इस उमर में ऐसा हो जाता है, लेकिन ये सच है कि उसे अपनी माॅ समान चाची को ऐसे छिप कर नहाते हुए नहीं देखना चाहिए था। मैं समझाऊॅगी उसे कि ऐसा सोचना भी पाप है। तुम प्लीज ये सब बातें अजय से मत कहना वो इस सबके लिए इसे माफ नहीं करेंगे, बल्कि इसे मार मार कर घर से निकाल देंगे।"
"आप अब भी इसे बचाने के बारे में सोच रही हैं?" अभय ने एकाएक आवेशयुक्त लहजे से कहा__"इसकी ऐसी नीच हरकतों को बड़े भइया से छुपाने की बात कर रही हैं आप? नहीं भाभी नहीं...
इसने जो किया है उसका पता बड़े भइया को भी चलना चाहिए। उन्हें भी तो पता चले कि उनका सपूत कितने बड़े बड़े काम करता है, ताकि उनका सिर गर्व से उठ जाए।"
प्रतिमा उससे क्या कहती??? उससे क्या कहती कि जिन बातों को वह अपने बड़े भाई से बताने की बात कर रहा है, उन सब बातों का उसके भाई को पहले से ही सब पता है। बल्कि अगर ये कहा जाए तो ज़रा भी ग़लत न होगा कि इस सबका असली कर्ता धर्ता ही वही है। मगर प्रतिमा ये सब अभय से कह नहीं सकती थी बल्कि उसने तो प्रत्यक्ष में बस यही कहा__"मैं तुम्हारे आगे हाॅथ जोड़ती हूॅ अभय, प्लीज इस सबके बारे में तुम अजय से कुछ मत कहना। वो इसे घर से निकाल देंगे। मैं मानती हूॅ कि इसने जो किया है वो माफी के काबिल नहीं है लेकिन प्लीज अभय इसे इसकी पहली और आख़िरी ग़लती समझ कर माफ़ कर दो, और इस सबको भूल जाओ। मैं तुमसे वादा करती हूॅ कि अब से ये तुम्हारे घर की तरफ कभी देखेगा भी नहीं।"
अभय गुस्से से भरी आॅखों से प्रतिमा की तरफ देखता रहा। कुछ बोला नहीं उसने जबकि उसके इस प्रकार गुस्से से देखने पर प्रतिमा ने कहा__"अभय, शान्त हो जाओ प्लीज। तुम चाहो तो इसके कुकर्म की मुझे जो चाहे सज़ा दे दो। इसने तुम्हारी पत्नी व अपनी चाची को जिस नीचता से छिप कर नहाते हुए देखा है उसके लिए तुम जो चाहे मुझे सज़ा दे दो। तुम्हारी हर सज़ा को मैं बिना कुछ बोले स्वीकार कर लूॅगी। मगर इस सबको भूल कर इसे माफ कर दो प्लीज।"
"भगवान जानता है कि मैंने कभी अपने परिवार के बारे में ग़लत नहीं सोचा, बल्कि हमेशा सबको अपना मान कर उन्हें यथोचित सम्मान दिया है।" अभय कह रहा था__"विजय भइया की मौत तथा माॅ बाबू जी के कोमा में चले जाने के बाद इस हवेली में रहने वालों की सोच को न जाने क्या हो गया है?? मुझे नहीं पता कि गौरी भाभी, तथा उनके बच्चों ने ऐसा क्या कर दिया था कि उन्हें उसकी कीमत इस हवेली से तथा सबसे रिश्ता तोड़ कर चुकानी पड़ी। मुझे यकीन नहीं होता कि विजय भइया और गौरी भाभी ने कभी कोई ग़लत कदम उठाया रहा होगा। बल्कि वो तो ऐसे थे कि उन्हें अगर देवी देवता की तरह पूजा भी जाता तो ग़लत न होता। विजय भइया की मौत के बाद ऐसा क्या हो गया था कि गौरी भाभी को उनके बच्चों सहित इस हवेली से बाहर हमारे खेत में बने मकान के सिर्फ एक ही कमरे में रह कर अपना जीवन यापन करना पड़ा। बात यहीं पर खत्म नहीं हो जाती बल्कि सोचने वाली बात ये भी है उन लोगों ने इस सबके बाद भी ऐसा क्या कर दिया था कि उन्हें खेत के उस कमरे को भी छोंड़ कर जाना पड़ा??? जहाॅ तक मुझे पता है विराज आया था अपनी माॅ और बहन से मिलने। सुबह शिवा के साथ उसकी मार पीट हुई थी। शायद यही वजह रही होगी कि वो लोग इस डर से वहाॅ से भी पलायन कर गए कि शिवा के साथ मार पीट करने से अजय भइया उन पर गुस्सा करेंगे।
मैं सोचता था कि विराज ने शिवा के साथ मार पीट क्यों की थी?? मगर अब समझ गया हूॅ कि शिवा को मार मार कर अधमरा कर देने की वजह इसकी ही कोई नीच हरकत रही होगी। इस नीच की गंदी नज़र गौरी भाभी या निधि बिटिया पर भी रही होगी। गौरी भाभी ने अपने बेटे को इसकी इन नीच हरकतों के बारे में बताया होगा और कहा होगा कि बेटा हमें यहाॅ से ले चल। यकीनन यही सब बातें हुई रही होंगी।"
अभय सिंह क्या क्या बोले जा रहा था ये सब अब प्रतिमा के सिर के ऊपर से जाने लगा था। उसके पैरों तले से ज़मीन कब की निकल चुकी थी। दिलो दिमाग़ में भयंकर विस्फोट हो रहे थे। दिल की धड़कनें रुक रुक कर इस तरह चल रही थीं जैसे उसे ज़िंदा रखने के लिए उस पर कोई एहसान कर रही हों। आॅखों के सामने अॅधेरा छाने लगा था। ज़हन में एक ही ख़याल कत्थक कर रहा था कि 'सब कुछ खत्म'।
"आज इसने ये सब करके मुझे इस सबके बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया है भाभी।" अभय सिंह नाॅनस्टाप कहे जा रहा था__"और अब मैं खुद पता करूॅगा कि सच्चाई क्या है? मैं गौरी भाभी और उनके बच्चों को खोजूॅगा, और उनसे पूॅछूॅगा कि उन्होंने ऐसा क्या किया था कि उन लोगों को अपने ही घर से सब कुछ छोंड़ कर जाना पड़ा?? अब से मेरे पास सिर्फ यही एक काम होगा भाभी, मैं हर कीमत पर इस सच्चाई का पता लगाऊॅगा।"
इतना कह कर अभय सिंह वहाॅ से चला गया अपने घर की तरफ, इस बात से अंजान कि घर में कौन सी आफत उसका इन्तज़ार कर रही है?? जबकि उसकी इन बातों से प्रतिमा को लगा कि उसे चक्कर आ जाएगा। उसने बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हाला और असहाय अवस्था में धम्म से सोफे पर लगभग गिर सी पड़ी।
इधर करुणा अब अपने कपड़े वगैरा पहन चुकी थी। तथा बेड पर गुमसुम सी बैठी थी। उसके पास ही उसकी बेटी दिव्या बैठी थी। दिव्या उमर में छोटी भले ही थी किन्तु हमेशा शान्त रहने वाली ये लड़की सब बातों को समझती थी। उसे अपने बड़े पापा व बड़ी माॅ का ये बेटा शिवा कभी पसंद नहीं आया था। वह इतनी नासमझ नहीं थी कि शिवा की हरकतों तथा उसकी आॅखों में गिजबिजाते हवस के कीड़ों को पहचान न पाती। उसने हज़ारों बार अपनी आॅखों से देखा था कि शिवा हमेशा उसकी माॅ और खुद उसे भी कभी कभी गंदी नज़र से देखता था। वह उसकी हवस से भरी नज़रों को हमेशा अपने सीने पर मौजूद छोटे छोटे उभारों पर महसूस करती थी। किन्तु डर व संकोच की वजह से वह कभी इस सबके बारे में अपनी माॅ से नहीं बताती थी।
अभय और दिव्या दोनो साथ ही स्कूल से घर आए थे। और आते ही जो हंगामा हुआ था उस सबको दिव्या ने अपनी डरी सहमी आॅखों से देखा था। वह समझ गई थी कि उसका बाप शिवा को किस बात पर इतनी बुरी तरह मार रहा था। उसने चुपके से अपनी माॅ के कमरे में जा कर बाथरूम में देखा था। बाथरूम में उसकी माॅ नग्न अवस्था में फर्स पर अपने दोनो घुटनों के बीच मुह छुपाए बैठी रो रही थी।
अपनी माॅ को नग्न अवस्था में बैठे इस तरह रोते देख वह हैरान रह गई थी। पहली बार अपनी ही माॅ को नंगी हालत में देखा था उसने। जबकि खुद के जिस्म को अपने सामने भी देखने का कभी उसे ख़याल ही नहीं आया था।
डरी सहमी हालत में वह कुछ देर अपनी माॅ को देखती रही फिर हिम्मत करके वह पलटी और बेड से अपनी माॅ के सारे कपड़े उठा कर उसने बाथरूम के बाहर से ही करुणा की तरफ उछाल दिया। अपने नंगे बदन पर अचानक कपड़ों के पड़ने से करुणा बुरी तरह हड़बड़ा गई। उसकी नज़र पहले खुद के ऊपर गिरे हुए कपड़ों पर पड़ी फिर बाथरूम के गेट पर डरी सहमी खड़ी अपनी बेटी पर। दिव्या पर नज़र पड़ते ही वह चौंकी। एकाएक ही उसे अपनी नग्नता का एहसास हुआ। उसने हड़बड़ाकर अपने नंगे बदन को छिपाने के लिए उन कपड़ों से अपने बदन के गुप्तांगों को ढॅका। जबकि बाथरूम के गेट पर खड़ी दिव्या सीघ्र ही अपनी नज़रें अपनी माॅ पर से हटा कर वापस पलट गई। बाहर शिवा की धुनाई और उसकी दर्द में डूबी हुई चीखें चालू थी। कुछ देर बाद करुणा अपने कपड़े पहन कर बाथरूम से बाहर निकली और बेड पर बैठी अपनी बेटी दिव्या को देख कर उसके जिस्म में एक अजीब सी झुरझुरी महसूस होती चली गई। चेहरे पर लाज और शर्म की लाली फैल गई और उसका सिर झुक गया। अपनी ही बेटी से नज़र मिलाने की हिम्मत न हुई उसमें।
"मम्मी।" दिव्या बेड से उठकर तथा दौड़ते हुए आकर अपनी माॅ से लिपट गई। उसकी आॅखों से आॅसू बहने लगे थे। करुणा को समझ न आया कि वह अपने सीने से लिपटी तथा आॅसू बहाती बेटी से क्या कहे?? उसके दिलो दिमाग़ में अंधड़ सा मचा हुआ था। कमरे के बाहर से अब कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। शायद अभय शिवा को लेकर जा चुका था।
करुणा कुछ पल बुत बनी खड़ी रही फिर जाने क्या सोच कर उसने अपने सीने से दिव्या को अलग करके कहा__"जाओ अपने कमरे में और अपनी इस स्कूली ड्रेस को चेंज कर लो।"
दिव्या ने अजीब भाव से अपनी माॅ के चेहरे की तरफ देखा, और फिर पलट कर कमरे से बाहर निकल गई। इधर दिव्या के जाते ही करुणा के चेहरे पर एकाएक पत्थर जैसी कठोरता आ कर ठहर गई। ऐसा लगा जैसे उसने किसी बात का बहुत बड़ा फैंसला कर लिया हो।
अपडेट हाज़िर है दोस्तो......
आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा,,,,,,,,,
अपडेट.........《 21 》
अब तक.......
डरी सहमी हालत में वह कुछ देर अपनी माॅ को देखती रही फिर हिम्मत करके वह पलटी और बेड से अपनी माॅ के सारे कपड़े उठा कर उसने बाथरूम के बाहर से ही करुणा की तरफ उछाल दिया। अपने नंगे बदन पर अचानक कपड़ों के पड़ने से करुणा बुरी तरह हड़बड़ा गई। उसकी नज़र पहले खुद के ऊपर गिरे हुए कपड़ों पर पड़ी फिर बाथरूम के गेट पर डरी सहमी खड़ी अपनी बेटी पर। दिव्या पर नज़र पड़ते ही वह चौंकी। एकाएक ही उसे अपनी नग्नता का एहसास हुआ।
उसने हड़बड़ाकर अपने नंगे बदन को छिपाने के लिए उन कपड़ों से अपने बदन के गुप्तांगों को ढॅका। जबकि बाथरूम के गेट पर खड़ी दिव्या सीघ्र ही अपनी नज़रें अपनी माॅ पर से हटा कर वापस पलट गई। बाहर शिवा की धुनाई और उसकी दर्द में डूबी हुई चीखें चालू थी। कुछ देर बाद करुणा अपने कपड़े पहन कर बाथरूम से बाहर निकली और बेड पर बैठी अपनी बेटी दिव्या को देख कर उसके जिस्म में एक अजीब सी झुरझुरी महसूस होती चली गई। चेहरे पर लाज और शर्म की लाली फैल गई और उसका सिर झुक गया। अपनी ही बेटी से नज़र मिलाने की हिम्मत न हुई उसमें।
"मम्मी।" दिव्या बेड से उठकर तथा दौड़ते हुए आकर अपनी माॅ से लिपट गई। उसकी आॅखों से आॅसू बहने लगे थे। करुणा को समझ न आया कि वह अपने सीने से लिपटी तथा आॅसू बहाती बेटी से क्या कहे?? उसके दिलो दिमाग़ में अंधड़ सा मचा हुआ था। कमरे के बाहर से अब कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। शायद अभय शिवा को लेकर जा चुका था।
करुणा कुछ पल बुत बनी खड़ी रही फिर जाने क्या सोच कर उसने अपने सीने से दिव्या को अलग करके कहा__"जाओ अपने कमरे में और अपनी इस स्कूली ड्रेस को चेंज कर लो।"
दिव्या ने अजीब भाव से अपनी माॅ के चेहरे की तरफ देखा, और फिर पलट कर कमरे से बाहर निकल गई। इधर दिव्या के जाते ही करुणा के चेहरे पर एकाएक पत्थर जैसी कठोरता आ कर ठहर गई। ऐसा लगा जैसे उसने किसी बात का बहुत बड़ा फैंसला कर लिया हो।
अब आगे,,,,,,,
अभय गुस्से में तथा भभकते हुए अजय सिंह के घर से बाहर आकर अपने घर की तरफ जाने लगा। अभी वह अपने घर की बाउंड्री पार ही किया था कि उसे उसकी बेटी दिव्या भागते हुए घर से बाहर उसकी तरफ ही आती दिखी। बुरी तरह रोये जा रही थी वह। अभय को देख कर वह उससे रोते हुए लिपट गई, फिर तुरंत ही अपने पिता से अलग हुई।
"पापा वो म मम्मी...मम्मी ने।" दिव्या रोये जा रही थी। उसके मुख से कुछ निकल ही नहीं रहा था।
"क्या हुआ बेटी...क्या कह रही है तू?" अभय अंजानी आशंका से घबरा गया।
"पापा, वो मम्मी कमरे का दरवाजा ही नहीं खोल रही हैं।" दिव्या ने रोते हुए कहा__"मैने बहुत बार मम्मी को पुकारा लेकिन मम्मी न तो दरवाजा खोल रही हैं और ना ही कुछ बोल रही हैं। पापा मम्मी ने कहीं कुछ कर तो नहीं लिया? आप उन्हें बचा लीजिए जल्दी से।"
"क्याऽऽऽ???" अभय बुरी तरह चौंका, और साथ ही दौड़ पड़ा घर के अंदर की तरफ। उसके पीछे दिव्या भी रोते हुए दौड़ पड़ी थी।
अभय जितना तेज़ दौड़ सकता था उतना तेज़ दौड़ कर ही उस कमरे के पास पहुॅचा था जिस कमरे के अंदर करुणा थी।
"करुणाऽऽऽ दरवाजा खोलो।" अभय ने चीखते हुए कहा__"ये क्या बेवकूफी है??? दरवाजा खोलो जल्दी। करुणाऽऽऽ।"
अभय के चिल्लाने का कोई असर न हुआ। वह कुछ देर इसी तरह करुणा को पुकारता रहा। मगर ना तो दरवाजा खुला और ना ही अंदर से करुणा ने कुछ कहा। अभय को किसी अनिष्ट की आशंका हुई।
उसने दरवाजे को तोड़ने की कोशिश करने लगा।
"करुणा, प्लीज दरवाजा खोलो।" अभय दरवाजे को तोड़ने के साथ साथ कहता भी जा रहा था__"ये तुम क्या पागलपन कर रही हो? अगर तुम ये समझती हो कि इस सबमें तुम्हारा कोई दोस है तो तुम ग़लत समझ रही हो करुणा। तुम मेरी करुणा हो, मुझे तुम पर खुद से भी ज्यादा भरोसा है। तुम कभी ग़लत नहीं हो सकती। मैं जानता हूॅ कि उस हरामज़ादे ने ही तुम्हें ग़लत इरादे से देखने की कोशिश की है। तुम तो उसे अपना बेटा ही मानती हो करुणा। तुम कहीं भी ग़लत नहीं हो, प्लीज ऐसा वैसा कुछ मत करना।"
अभय पूरी शक्ति से कमरे के दरवाजे को तोड़ने के लिए धक्के मार रहा था। पास में ही उसकी बेटी दिव्या भी खड़ी थी, जो सिसक सिसक कर रोये जा रही थी। अंदर ही किसी कमरे में शगुन के रोने की भी आवाज़ आ रही थी। लेकिन उसके रोने की तरफ किसी का ध्यान नहीं था।
"तुम मुझे सुन रही हो न करुणा?" अभय अधीर भाव से कह रहा था__"तुम्हें मेरी कसम है, तुम कोई भी ग़लत क़दम नहीं उठाओगी। तुम मेरी जान हो करुणा, तुम्हारे बिना जीने की मैं सोच भी नहीं सकता। तुम्हें ये सब करने की या सोचने की कोई ज़रूरत नहीं है। तुम मेरी नज़र में उसी तरह गंगा की तरह पवित्र हो करुणा। प्लीज ऐसा वैसा कुछ मत करना, वर्ना तुम्हारी कसम सारी दुनियाॅ को आग लगा दूॅगा मैं।"
बड़ी मुश्किल से और भीषण प्रहार के बाद आख़िर दरवाजा टूट ही गया। कमरे के अंदर की तरफ टूट कर गिरा था दरवाजा। अभय ने एक भी पल नहीं गॅवाया। बिजली की सी तेज़ी से वह कमरे के अंदर दाखिल हुआ। और.......
"न नहींऽऽऽऽ।" अभय के हलक से चीख निकल गई। कमरे में पहुॅचते ही उसने देखा कि करुणा कमरे की छत पर लगे पंखे के नीचे रस्सी के सहारे झूल रही थी। रस्सी का फंदा उसके गले में था तथा रस्सी का दूसरा सिरा कमरे की छत पर बीचो बीच लगे लोहे के कुंडे में फॅसा था। नीचे फर्स पर एक स्टूल लुढ़का हुआ पड़ा था।
स्पष्ट था कि करुणा ने आत्म हत्या करने के लिए ही ये सब किया था। वह इस घटना के बाद खुद को ही इस सबका दोसी मानती थी। वो समझती थी कि अब वह किसी को मुॅह दिखाने के काबिल नहीं रही है। वह समझती थी कि इस सबके बाद उसके पति उसे ग़लत समझेंगे। शायद इसी वजह से उसने ये क़दम उठाया था।
अभय बुरी तरह उसके पैरों से लिपटा रोये जा रहा था, उसकी बेटी दिव्या का भी वही हाल था। अचानक अभय को जाने क्या सूझा कि उसने तुरंत ही बेड को खींचा और करुणा के पैरों के नीचे उसी लुढ़के पड़े स्टूल को रखा। जिससे करुणा के गले में फॅसा रस्सी का फंदा टाइट न हो। अभय खुद बेड पर चढ़ गया और करुणा के गले से रस्सी के फंदे को छुड़ाने लगा।
कुछ ही पल में करुणा के गले से रस्सी का फंदा निकल गया। करुणा के गले में फंदा फॅसा हुआ था जिसकी वजह से करुणा की आॅखें व जीभ बाहर आ गई थी।
अभय ने करुणा को अपने दोनो हाथों से सम्हाल कर उसी बेड पर आहिस्ता से लिटाया, और करुणा की नब्ज चेक करने लगा। अभय ये महसूस करते ही खुश हो गया कि करुणा की नब्ज अभी चल रही है। मतलब उसने करुणा को सही समय पर सही सलामत बचा लिया था। अगर थोड़ी देर और हो जाती तो शायद भगवान भी करुणा को मौत से बचा नहीं पाते। अभय ने खुश हो कर करुणा को खुद से चिपका लिया। दिव्या भी दौड़ कर अपनी माॅ से लिपट गई।
करुणा अभी बेहोशी की अवस्था में थी। अभय के कहने पर दिव्या ने तुरंत ही एक ग्लास में पानी लाकर अभय को दिया। अभय उस पानी से हल्के हल्के छीटे डालकर करुणा को होश में लाने की कोशिश करने लगा। कुछ ही देर में करुणा को होश आ गया। उसने गहरी गहरी साॅसे लेते हुए अपनी आॅखें खोली। सबसे पहले नज़र अपने पति पर ही पड़ी उसकी। वस्तुस्थित का ख़याल आते ही उसका चेहरा बिगड़ने लगा। आॅखों से आॅसू बहने लगे।
"मुझे क्यों बचाया अभय आपने?" फिर उसने उठकर रोते हुए कहा__"मुझे मर जाने दिया होता न। इस सबसे मुक्ति तो मिल जाती मुझे।"
"तुमने ये सब करने से पहले क्या एक बार भी नहीं सोचा था करुणा कि तुम्हारे बाद मेरा और हमारे बच्चों का क्या होता?" अभय ने भर्राए स्वर में कहा__"तुमने क्या सोच कर ये सब किया करुणा? क्या तुम ये समझती थी कि इस सबकी वजह से मैं तुम पर किसी प्रकार का शक या तुम पर कोई लांछन लगाऊॅगा?? नहीं करुणा नहीं..हमारा प्यार इतना कमज़ोर नहीं है जो इतनी सी बात पर तुम्हें मुझसे जुदा कर देगा। मुझे तो हर हाल में तुम पर यकीन है करुणा लेकिन शायद तुम्हें मुझ पर यकीन नहीं रहा। तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं था, अगर होता तो इतना बड़ा फैसला नहीं करती तुम।"
"मुझे माफ कर दीजिए अभय।" करुणा ने रोते हुए कहा__"मैं जानती हूॅ कि आपको मुझ पर हर तरह से भरोसा है। मगर हालात ऐसे बन गए थे कि मुझे यही लग रहा था कि इस सबकी वजह से मैं अब कहीं भी किसी को मुह दिखाने के काबिल नहीं रही। इसी लिए मैं इस सबको सहन नहीं कर पाई और खुद को खत्म करने का फैसला कर लिया था।"
"आज अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो।" अभय ने एकाएक ठंडे स्वर में कहा__"मैं उस हरामज़ादे को ज़िंदा नहीं छोंड़ता जिसकी वजह से ये सब हुआ।"
"मुझे नहीं पता था अभय कि वो कमीना मुझे इस नज़र से देखता है।" करुणा ने कहा__"अगर पता होता तो कभी उसे इस घर में घुसने ही नहीं देती।"
"पापा, शिवा भइया बहुत गंदे हैं।" सहसा इस बीच दिव्या ने भी हिम्मत करके कहा__"वो अक्सर अकेले में मुझे गंदी नज़र से देखते हैं।"
"क्याऽऽ???" अभय बुरी तरह उछल पड़ा, फिर गुर्राते हुए बोला__"उस हरामखोर की ये हिम्मत थी की वो मेरी बेटी को भी गंदी नज़र से देखता था?? नहीं छोंड़ूॅगा उस नीच और घटिया इंसान को, अभी उसे जान से मार दूॅगा मैं।
"
अभय ये सब कह कर बेड से उठने ही लगा था कि करुणा ने हड़बड़ा कर तुरंत ही अभय का हाॅथ पकड़ लिया, फिर बोली__"नहीं अभय, आप ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे। जो कुछ हुआ उससे ये तो पता चल ही गया है कि वो कैसा लड़का है। इस लिए अब उससे कोई मतलब नहीं रखेंगे हम, और ना ही उसे इस घर में आने देंगे।"
"करुणा उस नीच की हिम्मत तो देखो,वो हमारी इस नन्हीं सी बच्ची के बारे में भी ऐसी नीयत रखता है।" अभय ने मारे गुस्से के उफनते हुए कहा__"उसने एक बार भी नहीं सोचा होगा कि वो ये सब क्या सोचता है और करने का इरादा रखता है? नहीं करुणा, ऐसे नीच और गिरी हुई सोच वाले लड़के को एक पल भी जीवित रखना पाप है। मुझे भइया भाभी की कोई परवाह नहीं है, मैं उसे किसी भी कीमत पर अब ज़िंदा नहीं छोंड़ूॅगा।"
"नहीं अभय, प्लीज रुक जाइए। आपको मेरी कसम।" करुणा ने भारी स्वर में कहा__"सबसे पहले हमें उसके माता पिता से इस बारे में बात करना चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि उनका बेटा कैसी सोच रखता है अपने ही घर की माॅ बहनों के लिए। जल्दबाज़ी में उठाया हुआ क़दम अच्छा नहीं होता अभय। खुद को शान्त कीजिए"
"मैं भाभी से बोल आया हूॅ कि आज के बाद अगर उनके इस नीच बेटे ने मेरे घर की तरफ देखा भी तो उसके लिए अच्छा नहीं होगा।" अभय ने कहा।
"ये आपने अच्छा किया।" करुणा ने कहा__"दीदी ज़रूर इस संबंध में बड़े भइया से बात करेंगी।"
"हमसे बहुत बड़ी ग़लती हुई है करुणा।" अभय ने एकाएक अधीर होकर कहा__"आज मुझे एहसास हो रहा है कि क्यों मेरी देवी समान गौरी भाभी हम सबको छोंड़ कर इस हवेली से अलग खेतों में बने उस मकान पर रहती थी? सिर्फ इसी हरामज़ादे की वजह से करुणा। उस रात विराज आया था मुम्बई से, और सुबह उसने ही शिवा को मार मार कर अधमरा किया था। तब हमने सोचा था कि उसने बेवजह ही किसी खुंदक में शिवा को मारा था। जबकि अब मुझे सब बातों की समझ आई है कि क्यों विराज ने शिवा को मारा था?"
"क्या मतलब है आपका?" करुणा चौंकी।
"इसी नीच की वजह से करुणा।" अभय ने आवेश में कहा__"ये तो समझ ही गई हो तुम कि शिवा अपने ही घर की माॅ बहनों के बारे में ऐसी नीयत रखता है। उसने उसी नीयत से गौरी भाभी और हमारी फूल सी बच्ची निधि पर भी यही सब किया रहा होगा। इसी वजह से ये सब हुआ है।"
"लेकिन अगर ऐसी बात थी तो।" करुणा ने सोचने वाले भाव से कहा__"गौरी दीदी को इस बारे में बड़ी दीदी और बड़े भइया को बताना चाहिए था। अगर वो ये सब उनसे बताती तो वो अपने बेटे पर लगाम लगाती। लेकिन वो तो हवेली ही छोंड़ कर खेतों वाले मकान में गुड़िया के साथ रहने लगी थी। क्या सिर्फ इतनी सी बात की वजह से??"
"वजह तो हमें यही बताया था भइया भाभी ने कि गौरी भाभी ने प्रतिमा भाभी के कमरे से उनके जेवर चुराए थे।" अभय ने कहा__"और इतना ही नहीं बल्कि बड़े भइया को अपने रूप जाल में फसाने की कोशिश भी की थी।
इस लिए बड़े भइया ने उन लोगों को हवेली से निकाल दिया था।"
"हाॅ तो ग़लत क्या था अभय?" करुणा ने अजीब भाव से कहा__"गौरी दीदी ने तो सच में बड़े भइया के साथ ग़लत करने की कोशिश की थी। इस सबका सबूत भी दिखाया था प्रतिमा दीदी ने हम लोगों को। उन फोटोग्राफ्स में साफ साफ दिखता था कि कैसे गौरी दीदी ने बड़े भइया को उनके ही कमरे में अपनी बाहों में जकड़ा हुआ था।"
"क्या ये स्वाभाविक बात लगती है करुणा कि बड़े भइया गौरी भाभी के साथ उस स्थित में हों और दूसरा कोई उस स्थिति में उनकी फोटो खींचे?" अभय ने सोचने वाले भाव से कहा__"जबकि उस स्थिति में होना तो ये चाहिए था कि अगर गौरी भाभी ने बड़े भइया को ग़लत नीयत से जकड़ा हुआ था तो इस सबका बड़े भइया विरोध करते, और गौरी भाभी को इस सबके लिए डाॅटते। दूसरी बात उन लोगों की उस वक्त की फोटो बनाने वाला कौन था?? अगर फोटो खींचने वाली प्रतिमा भाभी थी तो उन्हें फोटो खींचने की बजाय इस सबको रोंकना था। आखिर फोटो खींचने के पीछे उनका क्या उद्देश्य था? क्या सिर्फ ये कि हम सब उन फोटोज़ को देख कर ये यकीन कर सकें कि गौरी भाभी सच में बड़े भइया के साथ ये सब करने की नीयत रखती हैं या ये सब करती भी हैं???"
"आप कहना क्या चाहते हैं अभय??" करुणा ना समझने वाले भाव से बोली।
"आज के इस हादसे से मेरे सोचने का नज़रिया बदल गया है करुणा।" अभय ने गंभीर लहजे में कहा__"हम सब जानते थे कि विजय भइया और गौरी भाभी किसी देवी देवता से कम नहीं थे। उन्होंने भूल से भी किसी के साथ कभी भी कुछ ग़लत नहीं किया था। वो पढ़ाई लिखाई में भले ही ज़ीरो थे, लेकिन जब से उन्होने खेती बाड़ी का काम सम्हाला था तब से हमारे घर के हालात हज़ार गुना बेहतर हो गए थे। यहाॅ तक कि उनकी मेहनत और लगन से किसी भी चीज़ की कभी कोई कमी न रही थी। उनकी ही मेहनत और रुपये पैसे से इतनी बड़ी हवेली बनी और उनके ही पैसों से बड़े भइया ने अपने कारोबार की बुनियाद रखी थी। माॅ बाबूजी विजय भइया और गौरी भाभी को सबसे ज्यादा मानते थे। विजय भइया और गौरी भाभी ने कभी भी मुझे किसी बात के लिए कुछ नहीं कहा, बल्कि विजय भइया ने तो उस समय के हिसाब से मुझे एक बुलेट मोटर साइकिल खरीद कर दी थी। पूरे गाॅव में किसी के पास बुलेट नहीं थी। इतना ही नहीं उन्होंने अपने ही पैसों से बाबूजी के लिए एक शानदार कार खरीदी थी ताकि बाबूजी बड़े शान से उसमें सवारी करें। घर का बड़ा बेटा होने का जो फर्ज़ अजय भइया को निभाना चाहिये था वो फर्ज़ विजय भइया निभा रहे थे वो भी अपनी पूरी निष्ठा के साथ। मुझे याद है करुणा कि अजय भइया और प्रतिमा भाभी कभी भी विजय भइया और गौरी भाभी से ठीक से बात नहीं करते थे। बल्कि उनके हर काम में कोई न कोई नुक्स निकालते ही रहते थे।
फिर समय गुज़रा और एक रात विजय भइया को किसी ज़हरीले सर्प ने काट लिया और वो इस दुनिया से चल बसे। उनके इस दुनिया से जाते ही हम सबकी खुशियों पर ग्रहण सा लग गया करुणा। माॅ बाबूजी को उनकी मौत से गहरा सदमा लगा था। हम सब उनके सदमे की वजह से परेशान हो गए थे। बड़े भइया और भाभी ने ही उन्हें सम्हाला था। एक दिन माॅ बाबूजी उसी कार से शहर जा रहे थे तो रास्ते में उनका एक्सीडेंट हो गया और वो दोनो उस एक्सीडेंट की वजह से कोमा में चले गए। समझ में नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा था हम सबके साथ?"
"इन सब बातों को सोचने का क्या मतलब है अभय?" करुणा ने कहा__"जो होना था वो तो हो ही गया। इसमें कोई क्या कर सकता था भला?"
"मैं ये सब कभी नहीं भूला करुणा।" अभय ने कहा__"मैं कभी किसी से कुछ कहता नहीं मगर मेरे अंदर हमेशा ये सब गूॅजता रहता है। आज के इस हादसे ने मेरी आॅखें खोल दी है करुणा। इस हादसे ने ये सोचने पर मजबूर कर दिया है मुझे कि ये जो कुछ भी हुआ वो सब क्या सच था या फिर किसी झूॅठ को छुपाने के लिए उस पर इन सब बातों को गढ़ कर पर्दा डाला गया था? ये तो सच है करुणा कि माॅ बाप का खून और उनके अच्छे संस्कारों की वजह से ही कोई औलाद सही रास्तों पर चलते हुए भविश्य में अपने अच्छे काम और नाम की वजह से अपने माॅ बाप और कुल का नाम रोशन करते हैं। शिवा को देख कर अंदाज़ा लगाना कोई मुश्किल नहीं है कि उसकी परवरिश और उसके खून में कितनी गंदगी है। दुनियाॅ में बहुत से ऐसे माॅ बाप हैं जिनके एक ही बेटा होता है मगर वो अपने एक ही बेटों को क्या ऐसे संस्कार देते हैं जिसकी वजह से वो अपने ही घर की माॅ बहनो पर बुरी नीयत रखे?? नहीं करुणा नहीं....कम से कम मेरी जानकारी में तो ऐसे माॅ बाप और ऐसे बेटे नहीं हैं। ज़रूर इनमें ही कहीं न कहीं कोई ख़राबी है। मैने फैंसला कर लिया है कि मैं खुद सारी सच्चाई का पता लगाऊॅगा।"
"सच्चाई???" करुणा चौंकी__"कैसी सच्चाई अभय?"
"वहीं सच्चाई करुणा।" अभय ने मजबूत लहजे में कहा__"जो हमसे छुपाई गई और उसके बदले कुछ और ही हमें दिखाया गया। उस समय मैंने इस सबका पता करने की कोशिश इस लिए नहीं की थी क्यों जो कुछ मुझे सबूत के साथ दिखाया गया था उससे मैं अत्यधिक क्रोध और गुस्से में था। उस सूरत में मैं उन लोगों की शकल तक नहीं देखना चाहता था। मगर अब नहीं, अब मैं पता लगाऊॅगा इस सबका। मैं मुम्बई जाऊगा करुणा...और गौरी भाभी तथा उनके दोनो बच्चों को ढूढूॅगा। उनसे ही सच्चाई का पता चलेगा। मैने अपने गुस्से और नाराज़गी की वजह से इतने साल बर्बाद कर दिये। कभी सोचा तक नहीं कि एक बार गौरी भाभी से भी पूछ लेना चाहिए कि उन पर जो आरोप लगाया गया था वो सच भी था या झूॅठ? काश! मैंने ये सब उनसे पूछा होता। अरे कानून भी हर मुजरिम को अपनी सफाई में कुछ कहने का अवसर देता है, जबकि मैंने तो पूॅछा तक नहीं था।
मान लो कि अगर गौरी भाभी पर लगाए गए सारे आरोप सिरे से ही ग़लत हों तो सोचो क्या होगा करुणा? मैं अपनी ही नज़रों में गिर जाऊॅगा। कितना बड़ा पापी कहलाऊॅगा कि अपनी देवी समान भाभी पर लगे झूॅठे आरोपों को सच मान कर उनके बारे में क्या क्या सोच लिया था मैंने?? मुझे नरक में भी जगह नहीं मिलेगी करुणा....मैं तो शर्म से ही मर जाऊॅगा।"
"खुद को सम्हालिए अभय।" करुणा की आॅखें छलक पड़ी थी__"यकीनन हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई है। मगर अब जो हो गया उसे लौटाया भी तो नहीं जा सकता न? ईश्वर जानता है कि इस सबके बाद भी हमने कभी उनका बुरा नहीं चाहा है। हमें जो कुछ बताया गया था उससे हमें दुख ज़रूर पहुॅचा मगर इसके बावजूद हमने कभी उनके बारे में बुरा नहीं चाहा। आज आपने अगर इस सबका पता लगाने का फैसला कर ही लिया है तो ये अच्छी बात है अभय। सच्चाई का पता तो चलना ही चाहिए।"
"तुम चिन्ता मत करो करुणा।" अभय ने कहा__"मैंने अब इस बात को जानने का फैसला कर लिया है कि इस सबके पीछे की सच्चाई क्या है। मैं कल ही स्कूल में लम्बी छुट्टी की अर्ज़ी दे दूॅगा। अब मेरे पास सिर्फ यही काम रहेगा..किसी भी हाल में सच्चाई का पता लगाना।"
"आप हर सच्चाई का ज़रूर पता लगाइये अभय।" करुणा ने कहा__"लेकिन इस बात का भी ध्यान दीजिए कि वो लोग भी शान्त नहीं बैठेंगे जिन्होंने गौरी दीदी पर ये सब आरोप लगाये थे। संभव है कि अपनी पोल खुल जाने के डर से वो कोई भी कठोर कदम उठा लें। इस लिए उन लोगों से सतर्क और सावधान रहिएगा।"
"चिन्ता मत करो करुणा।" अभय ने कठोर भाव से कहा__"मुझे पता है कि अपने रास्ते पर आने वाली रुकावट से कैसे निपटना है।"
"फिर भी सावधान रहिएगा।" करुणा ने कहा__"क्योंकि इस सबसे ये तो समझ आ ही गया है कि वो लोग किसी के साथ कुछ भी कर सकते हैं।"
"कुछ भी करने वालों को मैं देख लूॅगा करुणा।" अभय ने कहा__"मेरे मुम्बई जाने के बाद तुम यहाॅ सबकी देख भाल अच्छे से करना। दिव्या तब तक स्कूल नहीं जाएगी जब तक मैं मुम्बई से लौट नहीं आता।"
"क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम सब ही मुम्बई चलें?" करुणा ने कहा__"कौन जाने आपके जाने के बाद यहाॅ कैसे हालात बन जाएॅ? उस स्थिति में मैं अकेली औरत भला किसी का कैसे मुकाबला करूॅगी??"
"मैं तुम सबको मुम्बई नहीं ले जा सकता क्योंकि मुम्बई में तुम लोगों को लिए मैं कहाॅ कहाॅ भटकूॅगा? अंजान शहर में अपना कहीं कोई ठिकाना भी तो होना चाहिए।" अभय ने कहा__"इस लिए तुम ऐसा करो कि कुछ दिन के लिए दिव्या और शगुन को लेकर अपने मायके चली जाओ। वहाॅ तुम सब सुरक्षित रहोगे, और मैं भी तुम लोगों के लिए निश्चिंत रहूॅगा।"
"हाॅ ये ठीक रहेगा।" करुणा ने कहा__"आप मेरे भाई को फोन कर दीजिए वो आ जाएगा और हम लोगों को अपने साथ ले जाएगा।"
"ठीक है।" अभय ने कहा__"मैं बात करता हूॅ तुम्हारे भाई से, तब तक तुम ज़रा चाय तो बना कर पिला दो मुझे।
"
"जी अभी लाई।" करुणा ने बेड से उठते हुए कहा।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,
अपडेट हाज़िर है दोस्तो.....
आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा,,,,,,
दोस्तो आपको पहले ही बता चुका हूॅ कि इस समय मैं काम के सिलसिले में घर से बाहर हूॅ, इस लिए अपडेट देने में सक्षम नहीं हूॅ। आप मेरी मजबूरी समझेंगे, यही आशा करता हूॅ।
अपडेट...........《 22 》
अब तक,,,,,,,
"चिन्ता मत करो करुणा।" अभय ने कठोर भाव से कहा__"मुझे पता है कि अपने रास्ते पर आने वाली रुकावट से कैसे निपटना है।"
"फिर भी सावधान रहिएगा।" करुणा ने कहा__"क्योंकि इस सबसे ये तो समझ आ ही गया है कि वो लोग किसी के साथ कुछ भी कर सकते हैं।"
"कुछ भी करने वालों को मैं देख लूॅगा करुणा।" अभय ने कहा__"मेरे मुम्बई जाने के बाद तुम यहाॅ सबकी देख भाल अच्छे से करना। दिव्या तब तक स्कूल नहीं जाएगी जब तक मैं मुम्बई से लौट नहीं आता।"
"क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम सब ही मुम्बई चलें?" करुणा ने कहा__"कौन जाने आपके जाने के बाद यहाॅ कैसे हालात बन जाएॅ? उस स्थिति में मैं अकेली औरत भला किसी का कैसे मुकाबला करूॅगी??"
"मैं तुम सबको मुम्बई नहीं ले जा सकता क्योंकि मुम्बई में तुम लोगों को लिए मैं कहाॅ कहाॅ भटकूॅगा? अंजान शहर में अपना कहीं कोई ठिकाना भी तो होना चाहिए।" अभय ने कहा__"इस लिए तुम ऐसा करो कि कुछ दिन के लिए दिव्या और शगुन को लेकर अपने मायके चली जाओ। वहाॅ तुम सब सुरक्षित रहोगे, और मैं भी तुम लोगों के लिए निश्चिंत रहूॅगा।"
"हाॅ ये ठीक रहेगा।" करुणा ने कहा__"आप मेरे भाई को फोन कर दीजिए वो आ जाएगा और हम लोगों को अपने साथ ले जाएगा।"
"ठीक है।" अभय ने कहा__"मैं बात करता हूॅ तुम्हारे भाई से, तब तक तुम ज़रा चाय तो बना कर पिला दो मुझे।"
"जी अभी लाई।" करुणा ने बेड से उठते हुए कहा।
अब आगे,,,,,,,,
जैसा कि अभय ने निर्णय ले लिया था इस लिए उसने ससुराल में अपने साले युवराज सिंह को फोन कर दिया था और उसे जल्द से जल्द यहाॅ से करुणा के साथ दिव्या तथा शगुन को ले जाने के लिए कह दिया था। अभय के साले युवराज ने अचानक इस तरह यहाॅ आने और फिर अपने साथ उसकी बहन व भांजा भांजी को घर ले जाने का कारण पूॅछा तो अभय ने कुछ नहीं बताया। बस यही कहा कि वह कुछ दिनों के लिए बाहर जा रहा है।
अभय ने करुणा तथा दिव्या से भी कह दिया था कि इस बात की चर्चा वो लोग अपने मायके तथा ननिहाल में किसी से नहीं करेंगी। अभय की ससुराल हल्दीपुर से ज्यादा दूर नहीं थी। बल्कि एक घंटे की दूरी पर थी। इस लिए उसके साले को आने में ज़्यादा देर नहीं हुई।
करुणा ने अपने पति अभय के लिए शाम का खाना बना कर रख दिया था जिसे वह गरम करके शाम को खा लेगा और खुद भारी मन से अपने बच्चों को लेकर अपने भाई के साथ अपने मायके मणिपुर चली गई थी। अभय ने उसे बता दिया था कि वह अगले दिन सुबह ही यहाॅ से मुम्बई के लिए निकलेगा।
अभय ने अपनी पत्नी और बच्चों को अपने साले के साथ बेहद ही गुप्त रूप से भेजा था। किसी को भनक तक न लगने दी थी कि उसकी पत्नी और बच्चे किसके साथ कब कहाॅ गए हैं?
करुणा ने अभय से कहा था कि वह आज रात यहाॅ हवेली में न रहे बल्कि अपने किसी दोस्त या मित्र के यहाॅ रात रुक जाए और सुबह वहीं से मुम्बई के लिए रवाना हो जाएं। करुणा ये सब किसी अंजानी आशंका की वजह से कह रही थी जबकि उसकी इस सलाह पर अभय ने आवेश में कहा था__"मैं किसी से बाल बराबर भी नहीं डरता करुणा। मैंने किसी के साथ कोई ग़लत काम नहीं किया है, इस लिए किसी से डरने का सवाल ही नहीं है। रही बात बड़े भइया की तो उन्हें भी देख लूॅगा। मैं भी तो देखूॅ कि कितने बड़े तीसमारखाॅ हैं वो???" करुणा अभय की इस बात पर कुछ न बोल सकी थी।
उधर प्रतिमा ने अपने पति अजय सिंह को फोन करके आज हुई इस घटना के बारे में सब कुछ बता दिया था। जिसे सुन कर अजय सिंह के पैरों तले से ज़मीन निकल गई थी। उसे अपने बेटे पर बेहद गुस्सा आ रहा था। उसी की वजह से ये सब हुआ था वर्ना अभय ये सब कभी न सोचता कि उससे क्या कुछ छुपाया गया था??
अजय सिंह अपने बेटे के इस कार्य पर गुस्सा तो बहुत हुआ था किन्तु वह ये भी जानता था कि अब गुस्सा करने का कोई मतलब नहीं है। यानी जो होना था वो तो हो ही चुका था। अब तो उसे ये करना था कि इससे आगे कोई बात बढ़े ही न और ना ही उस पर कोई बात आए।
अजय सिंह अपनी फैक्टरी को फिर से चालू करने की कोशिशों में लगा हुआ था इस लिए वह ज्यादातर हवेली से बाहर ही रहता था। किन्तु आज हुई इस घटना की जानकारी जब उसकी पत्नी द्वारा फोन के माध्यम से उसे मिली तो वह शहर से हवेली आने के लिए कह दिया था प्रतिमा से। उसने ये भी हिदायत दी थी कि आज की घटना के बारे में उसकी बेटी रितू को पता न चले। जबकि अपने बेटे शिवा को कुछ दिन के लिए शहर में बने मकान पर रहने के लिए कह दिया था। ऐसा इस लिए था क्योंकि शिवा की बुरी हालत देखकर कोई भी ढेरों सवाल पूॅछने लगता। जबकि रितू तो अब पुलिस वाली थी, हर बात पर शक करना उसका पेशा था। दूसरी बात वह अपने भाई की आवारा गर्दी करने वाली इस असलियत से अंजान भी नहीं थी। इस लिए वह कई तरह के सवाल पूछने लगती सबसे। अजय सिंह ने प्रतिमा से ये भी कह दिया था कि वह हवेली में रहने वाले नौकर व नौकरानियों को भी इस बात की ठोस शब्दों में हिदायत दे दे कि वो लोग आज हुई इस घटना के बारे में एक लफ्ज़ भी रितू से न कहें या उनके द्वारा किसी तरह रितू के कानों तक ये बात न पहुॅचे।
अजय सिंह शाम को हवेली पहुॅचा था। हवेली में शमशान की तरह सन्नाटा फैला हुआ था। ऐसा लगता था जैसे इतनी बड़ी हवेली में किसी जीव का कहीं कोई वजूद ही न हो। अजय सिंह समझ सकता था कि हवेली में ये सन्नाटा क्यों फैला हुआ है।
उसकी बेटी रितू किसी केस के सिलसिले में बाहर ही थी, यानी अभी तक वह हवेली नहीं लौटी थी पुलिस थाने से। जबकि शिवा अजय सिंह के पालतू कुछ आदमियों के साथ शहर वाले मकान में कुछ दिन रहने के लिए चला गया था।
अजय सिंह खामोशी से अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। कमरे में पहुॅचते ही अजय सिंह ने देखा कि उसकी बीवी प्रतिमा बेड पर पड़ी है। बेड पर पड़ी प्रतिमा एकटक व निरंतर कमरे की छत पर झूल रहे पंखे को घूरे जा रही थी। बल्कि अगर ये कहें तो ज़रा भी ग़लत न होगा कि वह पंखे को भी नहीं घूर रही थी वह तो बस शून्य में ही देखे जा रही थी। उसका मन कहीं और ही भटका हुआ नज़र आ रहा था। कदाचित् यही वजह थी कि उसे कमरे में अजय सिंह के दाखिल होने का ज़रा भी एहसास न हुआ था।
अजय सिंह ने गौर से अपनी बीवी की तरफ देखा फिर उसने अपने जिस्म पर मौजूद कोट को उतार कर उसे दीवार पर लगे एक हैंगर पर लटका दिया। इसके बाद वह बेड की तरफ बढ़ा। प्रतिमा अभी भी कहीं खोई हुई शून्य में घूरे जा रही थी।
"ऐसे किन ख़यालों में गुम हो प्रतिमा?" अजय सिंह ने उसे देखते हुए कहा__"जिसकी वजह से तुम्हें ये भी एहसास नहीं हो रहा कि मैं कब से इस कमरे में आया हुआ हूॅ?"
"सब कुछ खत्म हो गया अजय।" प्रतिमा उसी मुद्रा में तथा अजीब से भाव के साथ बिना अजय की तरफ देखे ही बोली__"सब कुछ खत्म हो गया। कुछ भी शेष नहीं बचा। हमने गुज़रे हुए कल में जो कुछ भी अपने हित के लिए किया था वो सब अब बेपर्दा हो चुका है। कैसी अजीब सी स्थित हो गई है हमारी। मैं और तुम ज़िंदा तो हैं मगर ऐसा लगता है जैसे हमारी एक एक साॅस हमारे मरे हुए होने की गवाही दे रही है। हम ऐसे जी रहे हैं अजय जैसे हर साॅस हमने किसी से उधार ली हुई है। आज आलम ये है कि हम अपने ही बच्चों के बीच डर डर कर जीवन का एक एक पल गुज़ार रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं अजय कि हमने जो कुछ भी अपने सुख सुविधा के लिए अपनों के साथ किया है उसी का प्रतिफल आज हमें इस रूप में मिल रहा है?"
"ये तुम क्या कह रही हो प्रतिमा?" अजय सिंह पहले तो चौंका था फिर अजीब भाव से प्रतिमा की तरफ देखते हुए कहा__"यकीन नहीं होता यार। अरे इतनी सी बात पर तुम इतना हताश व विचलित हो गई??? नहीं डियर, तुम इतनी निराशावादी बातें नहीं कर सकती। तुमने तो गुज़रे हुए कल में मेरे कहने पर ऐसे ऐसे कठिन व हैरतअंगेज कामों को अंजाम दिया है जिसे करने के लिए कोई साधारण औरत सोच भी न सके।"
"मैं भी तो एक इंसान हूॅ, एक औरत ही हूॅ अजय।" प्रतिमा ने बेड से उठ कर तथा गंभीर होकर कहा__"भले ही गुज़रे हुए कल में मैंने तुम्हारे कहने पर या हमारे हित के लिए हैरतअंगेज कामों को अंजाम दिया हो मगर मुझे इस बात का भी एहसास है कि वह सब जो मैने किया था वो निहायत ही ग़लत था।
ये एक सच्चाई है अजय कि इंसान जो कुछ भी कर्म करता है उसके बारे में वो इंसान भी भली भाॅति जान रहा होता है कि वह किस प्रकार का कर्म कर रहा है? इंसान जान रहा होता है कि वह ग़लत कर्म कर रहा है इसके बावजूद वह रुकता नहीं है बल्कि ग़लत कर्म को करता ही चला जाता है। कदाचित् इस लिए कि उसमें ही उसका हित होता है। जब इंसान सिर्फ अपने ही हित के लिए ज़ोर देता है तब वह ये नहीं देखता कि अपने हित में उसने किस किस की खुशियों की या किस किस के जीवन की बलि चढ़ा दी है?"
"ये आज तुम्हें क्या हो गया है प्रतिमा?" अजय सिंह हैरान परेशान होकर बोला__"कैसी बहकी बहकी बातें कर रही हो तुम?"
"सच्चाई किसी भी तरह की हो अजय उसे सुन कर ऐसा ही लगता है सबको।" प्रतिमा ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा__"क्या ये सच नहीं है कि हमने सिर्फ अपने स्वार्थ व हित के लिए अपने ही रिश्तों के साथ अहित किया है? ये बात तुम भी भली भाॅति जानते और समझते हो अजय। हाॅ ये अलग बात है कि तुम इस सब को स्वीकार न करो।"
"इन सब बातों का अब कोई मतलब नहीं रह गया है प्रतिमा।" अजय ने बेचैनी से पहलू बदलते हुए कहा__"और मत भूलो इसके पहले तुमने भी इन सब बातों के बारे में नहीं सोचा था। आज ऐसा क्या हो गया है जिसकी वजह से तुम किसी के साथ सही ग़लत और हित अहित की बातें करने लगी? "
"आज हालात बदल गए हैं अजय।" प्रतिमा ने कहा__"पहले हम दूसरों के साथ अहित कर रहे थे इस लिए कुछ भी नहीं सोच रहे थे। मगर आज जब हमारे साथ अहित होने लगा है तब हमें इन सबका एहसास होना स्वाभाविक ही है। ये इंसानी फितरत है अजय, जब तक कोई बात खुद पर नहीं आती तब तक हमें किसी बात का एहसास ही नहीं होता।"
"ये सब बेकार की बातें हैं प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा__"आज की घटना से तुम ज़रा विचलित हो गई हो। जबकि इस सबसे इतना परेशान या दुखी होने की कोई ज़रूरत नहीं है।"
"तुम्हें आज के समय की वस्तुस्थित का एहसास ही नहीं है अजय।" प्रतिमा ने कहा__"अगर होता तो समझते कि हालात किस कदर बिगड़ गए हैं। ज़रा सोचो अजय...जो अभय आज तक हमारी ही कही बातों पर आॅख बंद करके यकीन करता आया था वही आज हमारी हर बात पर शक करने लगा है। इतना ही नहीं उसने तो हर सच्चाई का पता लगाने के लिए कदम भी उठाने की बात कर रहा था। अगर उसने ऐसा किया और इस सबसे उसे सारी सच्चाई का पता चल गया तो सोचो क्या होगा अजय?"
"कुछ नहीं होगा प्रतिमा।" अजय ने बड़ी सहजता से कहा__"तुम बेकार ही इतना परेशान हो रही हो। तुम्हें मैंने बताया नहीं है...हमारी सारी ज़मीन और ज़ायदाद अब सिर्फ हमारे ही बच्चों के नाम पर हैं। ये हवेली भी मैंने तुम्हारे नाम पर करवा दी है। मैं जब चाहूॅ तब अभय को इस हवेली और सारी ज़मीनों से बेदखल कर सकता हूॅ। यूॅ समझो कि वो सिर्फ मेरे रहमो करम पर इस हवेली पर है।
मुम्बई में किसी होटल या ढाबे पर अपनी माॅ बहन के साथ कप प्लेट धोने वाले उस हरामज़ादे विराज का तो पत्ता ही साफ है। इस लिए कानूनन कोई कुछ भी नहीं कर सकता मेरा। अभय को अगर सच्चाई का पता चल भी गया तो क्या कर लेगा हमारा??"
प्रतिमा अवाक् सी देखती रह गई अजय की तरफ। उसे कुछ कहने के लिए तुरंत कुछ सूझा ही नहीं। जबकि.....
"मैने कहा था न कि तुम बेकार ही इतना परेशान हो रही हो।" अजय सिंह ने मुस्कुराते हुए प्रतिमा के खूबसूरत चेहरे को सहला कर कहा__"तुमने तो खुद मेरे साथ कानून की एल एल बी की है। इस लिए जानती हो कि कानूनन कोई कुछ नहीं कर सकता। मैंने सारी ज़मीनें हमारे बच्चों के नाम कर दी हैं। और अगर कोई बात होगी भी तो इनमें से किसी के पास इतनी क्षमता ही नहीं है कि ये लोग ज़मीन ज़ायदाद को पाने के लिए मेरे साथ कोई मुकदमा वगैरह कर सकें। और अगर इन लोगों ने मुकदमा चलाने की कोशिश भी की तो सारी ज़िन्दगी इनसे कोर्ट कचहरी का चक्कर लगवाऊॅगा। इतने में ही इन सबका मूत निकल जाएगा।"
"वो सब तो ठीक है अजय।" प्रतिमा के चेहरे पर पहली बार राहत के भाव उभरे थे, किन्तु फिर तुरंत ही असहज होकर बोली__"लेकिन हम अपनी बेटियों को इस सबके लिए कैसे कन्विंस करेंगे? नीलम का तो भरोसा है कि वो हमसे कोई सवाल जवाब नहीं करेगी, लेकिन रितू का कुछ कह नहीं सकते। वो शुरू से ही तेज़ तर्रार रही हैं और न्यायप्रिय भी। अब तो वह पुलिस वाली भी बन गई है इस लिए इस सबका पता चलते ही वह कहीं हम पर ही न कोई केस ठोंक दे।"
"हद करती हो यार।" अजय सिंह ठहाका लगा कर हॅसते हुए बोला__"अपनी ही बेटी से इतना डरने लगी हो तुम।"
"ज्यादा शेखी न बघारो तुम।" प्रतिमा ने अजीब भाव से कहा__"आज भले ही इतना हॅस रहे हो तुम, मगर थोड़े दिन पहले तुम्हारी भी जान हलक में अटकी पड़ी थी जब रितू ने फैक्टरी वाला केस रिओपेन किया था।"
"यार सच कह रही हो तुम।" अजय सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा__"यकीनन उस समय मेरी हालत की वाट लगी हुई थी। कितनी अजीब बात थी कि मेरी ही बेटी मेरी ही*****मारने पर तुली हुई थी। भला उस बेचारी को क्या पता था कि उसके द्वारा इस प्रकार से मेरी*****मारने से मुझे कितनी तक़लीफ हो रही थी।"
"अब आए न लाइन पर।" प्रतिमा खिलखिला कर हॅसते हुए बोली__"बड़ा उड़ने लगे थे अभी तो।"
"यार मेरा तो के एल पी डी भी हो गया।" अजय सिंह ने उदास भाव से कहा__"मेरे बेटे ने ही सारा काम खराब कर दिया वर्ना करुणा की आगे पीछे से लेने का चान्स बन ही जाना था। अब तो ये असंभव नहीं तो नामुमकिन ज़रूर हो गया है।"
"असंभव क्यों नहीं??" प्रतिमा चौंकी।
"असंभव इस लिए नहीं क्यों कि मैं चाहूॅ तो अभी भी उसको आगे पीछे से ठोंक सकता हूॅ।" अजय सिंह ने कहा__"लेकिन ये सब अब प्यार या उसकी रज़ामंदी से नहीं हो सकेगा बल्कि इसके लिए मुझे बल का प्रयोग करना पड़ेगा।
"
"क्या मतलब है तुम्हारा?" प्रतिमा हैरान।
"साली को उठवा लूॅगा किसी दिन।" अजय सिंह सहसा कठोर भाव से बोला__"और शहर में अपने नये वाले फार्महाउस पर रखूॅगा उसे। वहीं रात दिन उसकी आगे पीछे से लूॅगा। इतना ही नहीं अपने आदमियों को भी मज़ा करने का कह दूॅगा। मेरे आदमी उसकी आगे पीछे से बजा बजा कर उसकी***** का ****** बना देंगे।"
"ऐसा सोचना भी मत।" प्रतिमा ने आॅखें फैलाकर कहा__"वर्ना अभय तुम्हें कच्चा चबा जाएगा।"
"अभय की माॅ की ***** साले की।" अजय ने कहा__"उसने अगर ज्यादा उछल कूद करने की कोशिश की तो उसका भी वही अंजाम होगा जो विजय का हुआ था, लेकिन ज़रा अलग तरीके से।"
"उसकी छोंड़ो अजय।" प्रतिमा ने सहसा पहलू बदलते हुए कहा__"हमारी बेटी रितू के बारे में सोचो। उसे इस झमेले के लिए कैसे मनाएंगे?"
"उसकी भी फिक्र मत करो डियर।" अजय सिंह ने कुछ सोचते हुए कहा__"तुम तो जानती हो कि मुझे अपने रास्तों पर किसी तरह के काॅटें पसंद नहीं हैं। हम दोनो उसे इस सबके लिए पहले प्यार से समझाएंगे, अगर उसे हमारी बातें समझ आ गईं तो ठीक है वर्ना मजबूरन उसके साथ भी हमें बल का प्रयोग करना ही पड़ेगा।"
"न नहीं अजय नहीं।" प्रतिमा ने सहसा घबरा कर कहा__"तुम उसके लिए ऐसा कैसे कह सकते हो? वह हमारी अपनी बेटी है। हर ब्यक्ति की अपनी एक फितरत होती है, रितू की फितरत हम जैसी नहीं है तो इसमें उसकी क्या ग़लती है? इंसान का स्वभाव जन्म से ही बनने लगता है, और फिर हर इंसान का अपना एक प्रारब्ध भी तो होता है। सब एक जैसी सोच विचार के नहीं हो सकते अजय, ये प्रकृति के नियमों के खिलाफ है।"
"मुझे पता है प्रतिमा।" अजय सिंह ने गंभीरता से कहा__"मैं जानता हूॅ कि हमारी बेटी उनमें से है जिनकी रॅगों में सच्चाई और ईमानदारी का खून दौड़ता है। लेकिन हमारे साथ मामला ज़रा जुदा है, यानी हमारी बेटी का ये सच्चाई और ईमानदारी वाला खून भविस्य में हमारे लिए बड़ी मुसीबत भी खड़ी कर सकता है।"
"ऐसा कुछ नहीं होगा अजय।" प्रतिमा ने मजबूती से कहा__"मैं अपनी बेटी को अपने तरीके से समझाऊॅगी। वो ज़रूर मेरी बात को समझेगी और मानेगी भी।"
"अच्छी बात है।" अजय ने कहा__"तुम उसे अपने तरीके से ज़रूर समझा देना। क्योंकि तुम्हारे बाद अगर मुझे समझाना पड़ा उसे तो हो सकता है मेरा समझाना तुम्हें पसंद न आए।"
"मैं ज़रूर समझाऊॅगी अजय।" प्रतिमा के जिस्म में ठण्डी सी सिहरन दौड़ती चली गई थी, फिर बोली__"लेकिन अब अभय के बारे में भी तो सोचो। उसने साफ शब्दों में कहा है कि वह इस सच्चाई का पता लगाएगा कि गौरी और उसके बच्चों के साथ वास्तव में हुआ क्या था? इस लिए वह इस सबका पता लगाने के लिए मुम्बई में विराज तथा विराज की माॅ बहन के पास जाने का बोल रहा था। अगर उसे सारी बातों का पता चल गया तो क्या होगा अजय??"
"उसे जाने दो मेरी जान।
" अजय ने अजीब से लहजे में कहा__"उसे सारी सच्चाई का पता लग भी जाएगा तो अब कोई कुछ भी नहीं कर सकेगा। जिस चीज़ के लिए हमने ये सब किया था वो तो हमें हासिल हो ही चुका है। इस लिए जाने दो जिसे जहाॅ जाना हो। विराज के साथ साथ उसकी माॅ बहन को तो मेरे आदमी भी ढूॅढ़ रहे हैं। अच्छा है कि अभय भी उन्हें तलाश करेगा वहाॅ मुम्बई में। साला इतनी बड़ी मुम्बई में कहाॅ ढूॅढेगा उन कप प्लेट धोने वालों को?"
"इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।" प्रतिमा ने कहा__"संभव है किसी संयोग के चलते अभय उन लोगों को ढूॅढ़ ही ले।"
"अगर ऐसा है तो मैं अपने कुछ आदमियों को अभय के पीछे लगा देता हूॅ।" अजय ने कुछ सोचते हुए कहा__"यदि अभय उन लोगों को ढूॅढने में कामयाब हो जाएगा तो मेरे आदमी तुरंत ही इस बात की मुझे सूचना दे देंगे।"
"हाॅ ये बिलकुल ठीक रहेगा अजय।" प्रतिमा ने खुश होकर कहा__"उस सूरत में तुम अपने आदमियों को आदेश दे देना कि वो इन सबको किसी भी तरह यहाॅ हमारे पास ले आएं। उसके बाद हम अपने तरीके से उन सबका कल्याण करेंगे।"
"ऐसा ही होगा मेरी जान।" अजय सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा__"सब कुछ हमारे हिसाब से ही होगा और अभय के यहाॅ से जाते ही मैं उसकी खूबसूरत बीवी करुणा को भी अपने आदमियों के द्वारा उठवा लूॅगा।"
"ऐसा करना हमारे लिए कहीं खतरे का सबब न बन जाए अजय।" प्रतिमा ने अजय को अजीब भाव से देखते हुए कहा__"मुझे लगता है कि इस काम में तुम्हें अभी इतनी जल्दी इतना बड़ा क़दम नहीं उठाना चाहिए।"
"एक दिन तो ये होना ही है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा__"और वैसे भी आज जिस तरह के हालात बन गए हैं उससे सारी बातें सबके सामने आ ही जाएॅगी। इस लिए जब सारी बातों को खुल ही जाना है तो इस काम में मैं देरी क्यों करूॅ? मुझे हर हाल में अपनी ख्वाहिशों को परवान चढ़ाना है डियर। मेरी शुरू से ही ये ख्वाहिश थी कि मैं गौरी तथा करुणा को अपने इसी बेड पर अपने नीचे लिटाऊॅ और उन दोनो के खूबसूरत किन्तु गदराए हुए मादक जिस्म का भोग करूॅ।"
"ख्वाहिश तो तुम्हारी अपनी बेटियों को भी अपने नीचे लिटाने की है अजय।" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा__"तो क्या अपनी बेटियों के साथ भी अपने छोटे भाईयों की बीवियों की तरह जबरदस्ती करोगे?"
"अगर ज़रूरत पड़ी तो ऐसा भी करुॅगा मेरी जान।" अजय ने स्पष्ट भाव से कहा__"लेकिन हमारी बेटियों को मेरे नीचे लाने की जिम्मेदारी तुम्हारी है। तुम अगर इस काम में सफल हो जाती हो तो अच्छी बात है वर्ना घी निकालने के लिए मुझे अपनी उॅगली को टेंढ़ा करना ही पड़ेगा।"
प्रतिमा हैरान परेशान सी देखती रह गई अपने पति को। वह समझ नहीं पा रही थी कि उसका पति किस तरह का इंसान है??????
-------------------------
उधर मुम्बई में।
विराज अपने वादे के अनुसार रविवार यानी स्कूल की छुट्टी के दिन निधि को बड़े से शिप में समुंदर घुमाने ले आया था।
निधि बेहद खुश थी इस सबसे। पता नहीं क्या क्या उसके दिमाग़ में चलता रहता था। कदाचित् फिल्में देखने का असर ज्यादा हो गया था उस पर।
पिछली सारी रात वह विराज के कमरे में रही थी। सारी रात उसने तरह तरह की योजनाएं बना बना कर विराज को बताती रही थी कि कल समुंदर में किस किस तरह से हम मस्ती करेंगे। उसकी ऊल जुलूल बातों से विराज बुरी तरह परेशान हो गया था। किन्तु वह उसे कुछ कह नहीं सकता था क्योंकि निधि उसकी जान थी। उसकी खुशी के लिए वह कुछ भी कर सकता था। विराज ने उसकी सभी बातों पर अमल करने का उसे वचन दिया और फिर प्यार से उसे अपने सीने से छुपका कर कहा था__"गुड़िया अब हम लोग सो जाते हैं, कल सुबह हमें जल्दी निकलना भी है न।" विराज की इस बात से और उसको इस तरह सीने से छुपका लेने से निधि खुश हो गई और खुशी खुशी ही नींद की आगोश में चली गई थी।
सुबह हुई तो दोनो ने नास्ता पानी किया और कुछ ज़रूरी चीज़ें लेकर घर से निकल पड़े। गौरी के द्वारा उन्हें शख्त हिदायतें भी दी गई थी कि वहाॅ पर सावधानी से ही काम लेना और शाम होने से पहले पहले घर वापिस आ जाना। विराज निधि को लेकर कार से निकल गया था।
जगदीश ओबराय की अच्छी जान पहचान थी जिसकी वजह से विराज को किसी बात की कोई परेशानी नहीं हुई थी। कहने का मतलब ये कि विराज ने एक बेहतरीन सुख सुविधा सम्पन्न शिप को शाम तक के लिए बुक करवा लिया था।
6842361_20181010062626659_1_XLARGE.jpg
शिप मे दो चालक और एक गाइड करने वाला था बाॅकी पूरा शिप खाली ही था। इस खूबसूरत शिप में चढ़ कर निधि खुशी से फूली नहीं समा रही थी। उसका बस चलता तो वह मारे खुशी के आसमान में उड़ने लगती। वह विराज से चिपकी हुई थी। फिर वह उससे अलग होकर शिप के किनारे पर आ गई तथा यहीं से हर तरफ का नज़ारा करने लगी थी। विराज उसे इस तरह खुश होते देख खुद भी खुश था। उसे आज पहली बार यहाॅ खुले आसमान के नीचे समुंदर में इस तरह अपनी बहन के साथ आकर खुशी हुई थी। वह अपनी बहन को ही देख रहा था, जो कभी कहीं देखती तो कभी कहीं और देखने लगती। उसके लिए ये सब नया था, हलाॅकि फिल्मों में उसने जाने कितनी दफा एक से बढ़कर एक सीन्स देखे थे। किन्तु यह नज़ारा उसके जीवन का पहला और वास्तविक था। विराज अपनी गुड़िया को इस तरह खुश होते देख खुद भी खुश था। फिर एकाएक ही जाने क्या सोच कर उसकी आॅखों में आॅसू आ गए। कदाचित् ये सोच कर कि इसके पहले उन लोगों ने ऐसी किसी खुशी को पाने की कल्पना भी न की थी। उसके अपनों ने किस तरह उसे और उसकी माॅ बहन को हर चीज़ से बेदखल कर दिया था। कुछ दर्द ऐसे भी थे जो अक्सर तन्हाई में उसे रुलाते थे।
अभी वह ये सब सोच कर आॅसू बहा ही रहा था कि निधि उसके सामने आ गई। उसने निधि को देखकर जल्दी से मुह फेर लिया ताकि वह उसकी आॅखों में आॅसू न देख सके।
"आप क्या समझते हैं मुझे कुछ पता नहीं चलता??" निधि ने भर्राए गले से कहा__"अगर आप ऐसा समझते हैं तो ग़लत समझते हैं आप। संसार की ऐसी कोई चीज़ नहीं है जिसे देख कर मैं अपने होश खो दूॅ और मुझे ये भी न पता चल सके कि जो मेरी जान है उसे किस पल किस दर्द ने आकर रुला दिया है। आप कहीं भी रहें लेकिन मैं ये महसूस कर लेती हूॅ कि आप किस लम्हें में किस दर्द से गुज़रे हैं।"
"ये सब क्या बोल रही है पगली?" विराज ने खुद को सम्हालते हुए तथा हॅसते हुए कहा__"चल छोंड़ ये सब और आ हम दोनों एंज्वाय करते हैं।"
"आप बातों को टालिये मत।" निधि ने विराज के चेहरे की तरफ एकटक देखते हुए कहा__"मुझे वचन दीजिए कि आज के बाद आप कभी भी अपनी आॅखों में आॅसू नहीं लाएॅगे।"
"जिन चीज़ों पर किसी इंसान का कोई बस ही न हो उन चीज़ों के लिए कैसे भला कोई वचन दे सकता है गुड़िया?" विराज ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा__"हाॅ इतना ज़रूर कह सकता हूॅ कि आइंदा ऐसा न हो ऐसी कोशिश करूॅगा।"
निधि एक झटके से विराज से लिपट गई, उसकी आॅखों में आॅसू थे, बोली__"क्यों उन सब चीज़ों के बारे में इतना सोचते हैं आप जिनके बारे में सोचने से हमें सिर्फ दुख और आॅसू मिलते हैं? मत सोचा कीजिए न वो सब...आप नहीं जानते कि आपको इस तरह दुख में आॅसू बहाते देख कर मुझ पर और माॅ पर क्या गुज़रती है? सबसे ज्यादा मुझे तक़लीफ होती है...आप उसे भूल जाइए न भाईया...क्यों उसे इतना याद करते हैं जिसे आपकी पाक मोहब्बत की कोई क़दर ही न थी कभी।"
विराज के दिलो दिमाग़ को ज़बरदस्त झटका लगा। ये क्या कह गई थी उसकी गुड़िया?? उसे ऐसा लगा जैसे उसके पास में ही कोई बम्ब बड़े ज़ोर से फटा हो और फिर सब कुछ खत्म व शान्त। कानों में सिर्फ साॅय साॅय की ध्वनि गूॅजती महसूस हो रही थी। विराग किसी बुत की तरह खड़ा रह गया था। उसकी पथराई सी आॅखें निधि के उस चेहरे पर जमी हुई थी जिस चेहरे को आॅसुओं ने धो डाला था। फिर सहसा जैसे उसे होश आया। उसने निधि के मासूम से चेहरे को अपनी दोनों हॅथेलियों के बीच लिया और झुक कर उसके माॅथे पर एक चुबन लिया। इसके बाद वह पलटा और शिप के अंदर की तरफ चला गया। जबकि निधि वहीं पर खड़ी रह गई।
जब काफी देर हो जाने पर भी विराज अंदर से न आया तो निधि के चेहरे पर चिंता व परेशानी के भाव गर्दिश करने लगे। उसे अपने भाई के लिए चिन्ता होने लगी और उसका दिलो दिमाग बेचैन हो उठा। वह तुरंत ही अंदर की तरफ बढ़ गई। समुंदर में उठती हुई लहरों के बीच तैरता हुआ शिप बढ़ता ही जा रहा था। निधि जब अंदर पहुॅची तो शिप में मौजूद गाइड करने वाला आदमी बाहर की ही तरफ आता दिखाई दिया। निधि ने उससे विराज के बारे में पूछा तो उसने हाथ के इशारे से एक तरफ संकेत किया और बाहर निकल गया। जबकि निधि उसकी बताई हुई दिशा की तरफ बढ़ गई।
एक कमरे में दाखिल होते ही उसकी नज़र जैसे ही अपने भाई पर पड़ी तो उसे झटका सा लगा। उसके पाॅव वहीं पर ठिठक गए। उसकी आॅखों से बड़े तेज़ प्रवाह से आॅसू बहने लगे। उसका दिल बुरी तरह हाहाकार कर उठा था।
अपडेट हाज़िर है दोस्तो.....
आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा,,,,,
दोस्तो ये अपडेट कल रात ही आधे से ज्यादा तैयार किया था, आज जैसे जैसे समय मिला इसे पूरा किया और आपके सामने हाज़िर कर दिया,,,,,
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट...........《 23 》
अब तक,,,,,,
निधि एक झटके से विराज से लिपट गई, उसकी आॅखों में आॅसू थे, बोली__"क्यों उन सब चीज़ों के बारे में इतना सोचते हैं आप जिनके बारे में सोचने से हमें सिर्फ दुख और आॅसू मिलते हैं? मत सोचा कीजिए न वो सब...आप नहीं जानते कि आपको इस तरह दुख में आॅसू बहाते देख कर मुझ पर और माॅ पर क्या गुज़रती है? सबसे ज्यादा मुझे तक़लीफ होती है...आप उसे भूल जाइए न भाईया...क्यों उसे इतना याद करते हैं जिसे आपकी पाक मोहब्बत की कोई क़दर ही न थी कभी।"
विराज के दिलो दिमाग़ को ज़बरदस्त झटका लगा। ये क्या कह गई थी उसकी गुड़िया?? उसे ऐसा लगा जैसे उसके पास में ही कोई बम्ब बड़े ज़ोर से फटा हो और फिर सब कुछ खत्म व शान्त। कानों में सिर्फ साॅय साॅय की ध्वनि गूॅजती महसूस हो रही थी। विराग किसी बुत की तरह खड़ा रह गया था। उसकी पथराई सी आॅखें निधि के उस चेहरे पर जमी हुई थी जिस चेहरे को आॅसुओं ने धो डाला था। फिर सहसा जैसे उसे होश आया। उसने निधि के मासूम से चेहरे को अपनी दोनों हॅथेलियों के बीच लिया और झुक कर उसके माॅथे पर एक चुबन लिया। इसके बाद वह पलटा और शिप के अंदर की तरफ चला गया। जबकि निधि वहीं पर खड़ी रह गई।
जब काफी देर हो जाने पर भी विराज अंदर से न आया तो निधि के चेहरे पर चिंता व परेशानी के भाव गर्दिश करने लगे। उसे अपने भाई के लिए चिन्ता होने लगी और उसका दिलो दिमाग बेचैन हो उठा। वह तुरंत ही अंदर की तरफ बढ़ गई। समुंदर में उठती हुई लहरों के बीच तैरता हुआ शिप बढ़ता ही जा रहा था। निधि जब अंदर पहुॅची तो शिप में मौजूद गाइड करने वाला आदमी बाहर की ही तरफ आता दिखाई दिया। निधि ने उससे विराज के बारे में पूछा तो उसने हाथ के इशारे से एक तरफ संकेत किया और बाहर निकल गया। जबकि निधि उसकी बताई हुई दिशा की तरफ बढ़ गई। एक कमरे में दाखिल होते ही उसकी नज़र जैसे ही अपने भाई पर पड़ी तो उसे झटका सा लगा। उसके पाॅव वहीं पर ठिठक गए। उसकी आॅखों से बड़े तेज़ प्रवाह से आॅसू बहने लगे। उसका दिल बुरी तरह हाहाकार कर उठा था।
अब आगे,,,,,,
कमरे के दरवाजे पर अपनी आॅखों से डबडबाते आॅसू के साथ खड़ी निधि अपने भाई विराज को देखे जा रही थी जो अपने दाहिने हाॅथ में मॅहगी शराब की बोतल को मुॅह से लगाए गटागट पिये जा रहा था। देखते ही देखते सारी बोतल खाली हो गई।
विराज ने खाली बोतल को बार काउंटर पर पटका और फिर से एक बोतल उठा ली उसने।
निधि को जैसे होश आया, वह बिजली की सी तेज़ी से कमरे के अंदर विराज के पास पहुॅची और हाॅथ बढ़ा कर एक झटके से विराज के हाॅथ से बोतल खींच ली।
"ये क्या पागलपन है भइया?" निधि ने रोते हुए किन्तु चीख कर कहा__"आप शराब को हाॅथ कैसे लगा सकते हैं? क्या उसका ग़म इतना बड़ा है कि उसके ग़म को भुलाने और मिटाने के लिए आपको इस शराब का सहारा लेना पड़ रहा है? क्यों भइया क्यों...क्यों उसको याद करके घुट घुट के जी रहे हैं? एक ऐसी बेवफा के लिए जिसको आपके सच्चे प्यार की कोई कद्र ही न थी। जिसने आपकी गुरबत को देख कर आपका साथ देने की बजाय आपका साथ छोंड़ दिया। क्यों भइया....क्यों ऐसे इंसान को याद करना? क्यों ऐसे इंसान की यादों में तड़पना जिसको प्यार और मोहब्बत के मायने ही पता नहीं?"
विराज ख़ामोश खड़ा था। उसका चेहरा आॅसुओं से तर था। चेहरे पर ज़माने भर का दर्द जैसे तांडव कर रहा था। आॅखें शराब के नशे में लाल सुर्ख हो चली थीं। निधि क्या बोल रही थी उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। जबकि निधि ने उसे पकड़ कर आराम से वहीं रखे एक सोफे पर बिठाया और खुद भी उसके पास ही बैठ गई।
"तु तुझे ये सब कैसे पता चला गुड़िया?" फिर विराज ने लरजते हुए स्वर में कहा।
"आप सारी दुनियाॅ को बहला सकते हैं भइया,लेकिन अपनी गुड़िया को नहीं।" निधि ने कहा__"मुझे इस बात का आभास तो पहले से ही था कि आप जो हम सबको दिखा रहे हैं वैसा असल में है नहीं। मैंने अक्सर रातों में आपको रोते हुए देखा था। एक दिन जब आप किसी काम से बाहर गए हुए थे तो मैंने आपके कमरे की तलाशी ली। उस समय मैं खुद नहीं जानती थी कि आपके कमरे में मैं क्या तलाश कर रही थी? किन्तु इतना ज़रूर जानती थी कि कुछ तो मिलेगा ही ऐसा जिससे ये पता चल सके कि आप अक्सर रातों में क्यों रोते हैं? काफी तलाश करने के बाद जो चीज़ मुझे मिली उसने अपनी आस्तीन में छुपाई हुई सारी दास्तां को मेरे सामने रख दिया। मेरे हाॅथ आपकी डायरी लग गई थी....उसी से मुझे सारी बातें पता चलीं। डायरी में आपके द्वारा लिखा गया एक एक हर्फ़ ऐसा था जिसने मुझे और मेरी अंतर्आत्मा तक को झकझोर कर रख दिया था भइया। अच्छा हुआ कि वो डायरी मुझे मिल गई थी वर्ना भला मैं कैसे जान पाती कि आप अपने सीने में कितना बड़ा दर्द छुपा कर हम सबके सामने हॅसते बोलते रहते हैं?"
"ये सब माॅ से मत बताना गुड़िया।" विराज ने बुझे स्वर में कहा__"वर्ना माॅ को बहुत दुख होगा। उन्होंने बहुत दुख सहे हैं, मैं उन्हें अब किसी भी तरह दुखी नहीं देख सकता।"
"और मुझे???" निधि ने विराज की आॅखों में बड़ी मासूमियत से देखते हुए कहा__"क्या मुझे दुखी सकते है आप??"
"नहीं, हर्गिज़ नहीं गुड़िया।
" विराज ने कहने के साथ ही निधि के चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों के बीच लिया__"तू तो मेरी जान है रे। तेरी तरफ तो दुख की परछाई को भी न फटकने दूॅ।"
"अगर ऐसी बात है तो क्यों खुद को इतनी तकलीफ़ देते हैं आप?" निधि ने रुआॅसे स्वर में कहा__"आप भी तो मेरी जान हैं, और मैं भला अपनी जान को दुख में देख कर कैसे खुश रह सकती हूॅ, कभी सोचा है आपने? आप तो हमेशा उसी की याद में दुखी रहते हैं, उसी के बारे में सोचते रहते हैं। आपको इस बात का ख़याल ही नहीं रहता कि जो सचमुच आपसे प्यार करते हैं वो आपको इस तरह दुखी देख कर कैसे खुश रह सकते हैं?"
विराज कुछ न बोला। सोफे की पिछली पुश्त से पीठ टिका लिया उसने और अपनी आॅखें बंद कर ली। उस पर अब नशा हावी हो गया था। दुख दर्द जब असहनीय हो जाता है तो वह कुछ भी कर गुज़रने पर उतारू हो जाता है। आज तक उसने शराब को हाथ भी न लगाया था। अपने इस दर्द को किसी से बयां भी न किया था, किन्तु आज अपनी ये सच्चाई जब निधि के मुख से सुनी तो उसे जाने क्या हुआ कि उसके जज्बात हद से ज्यादा मचल गए और उसने शराब पी। हलाकि वह अंदर इस लिए आया था क्योंकि वह निधि के सामने खुद को इस हाल में नहीं दिखा सकता था। जब वह कमरे में आया तो नज़र कमरे में ही एक तरफ लगे बार काउंटर पर पड़ी। अपनी हालत को छुपाने के लिए उसने पहली बार शराब की तरफ अपना रुख किया था। जुनून के हवाले हो चुके उसने शराब की बोतल ही मुख से लगा ली और सारी बोतल डकार गया। किन्तु अब उस पर शराब का नशा तारी हो चुका था।
निधि कोई बच्ची नहीं थी बल्कि सब समझती थी। उसे एहसास था कि शराब ने उसके भाई पर अपना असर दिखा दिया है। क्या सोच कर आए थे दोनो यहाॅ लेकिन क्या हो गया था। निधि को अपने भाई की इस हालत पर बड़ा दुख हो रहा था। वह आॅखे बंद किये अपने भाई को ही देखे जा रही थी। उसने उसे झकझोर कर पुकारा, तो विराज हड़बड़ा कर उठा। इधर उधर देखा फिर नज़र निधि पर पड़ी तो एकाएक ही वह चौंका। उसे निधि के चेहरे पर किसी और का ही चेहरा नज़र आ रहा था। वह एकटक देखे जा रहा था उसे। फिर एकाएक ही उसके चेहरे के भाव बदल गए।
"अब यहाॅ क्या देखने आई हो विधि?" विराज भावावेश में कह रहा था__"देख लो तुमने जो ग़म दिये थे वो थोड़ा कम पड़ गए वर्ना आज मैं ज़िंदा नहीं रहता बल्कि कब का मर गया होता या फिर पागल हो गया होता। लेकिन चिन्ता मत करो, क्योंकि ज़िन्दा भी कहाॅ हूॅ मैं? हर पल घुट घुट कर जीता हूॅ मैं। इससे अच्छा तो ये होता कि तुम मुझे ज़हर दे देती। कम से कम एक बार में ही मर जाता।"
इधर विराज जाने क्या बोले जा रहा था जबकि उधर निधि पहले तो बुरी तरह चौंकी थी फिर जब उसे सब कुछ समझ आया तो उसका दिल तड़प उठा। उसने कुछ कहा नहीं बल्कि अपने भाई को बोलने दिया ये सोच कर कि ये उसके अंदर का गुबार है। इस गुबार का निकलना भी बहुत ज़रूरी है।
उसे जाने क्या सूझी कि उसने इस सबके लिए खुद विधि का रोल प्ले करने का सोच लिया।
"क्यों किया ऐसा विधि?" विराज भर्राए गले से कह रहा था__"क्या यही प्यार था? क्या तुम्हें मेरे धन दौलत से प्यार था? और जब तुमने देखा कि मेरे अपनों ने मुझे मेरी माॅ बहन सहित हर चीज़ से बेदखल कर दिया है तो तुमने भी मुझे दुत्कार दिया? क्यों किया ऐसा विधि....?"
"प्यार व्यार ये सब फालतू की बाते हैं मिस्टर विराज।" विधि का रोल कर रही निधि ने अजीब भाव से कहा__"समझदार आदमी इनके चक्करों में पड़ कर अपना समय बर्बाद नहीं करता। मैने तुमसे प्यार किया था क्योंकि तुम उस समय अमीर थे। तुम्हारे पास धन था दौलत थी। उस समय तुम मेरे लिए कुछ भी खरीद कर दे सकते थे। तुमसे शादी करती तो सारी ज़िन्दगी ऐश करती। मगर तुम तो अपनों के द्वारा दर दर का भिखारी बना दिये गए। भला कोई भिखारी मेरी ज़रूरतों को कैसे पूरा कर पाता? इस लिए मैंने समझदारी से काम लिया और तुमसे जो प्यार का चक्कर चलाया था उसे खत्म कर दिया। हर ब्यक्ति अपने सुख और हित के बारे में सोचता है। मैं ने भी तो यही सोचा था, इसमें भला मेरी क्या ग़लती?"
"कितनी आसानी से ये सब कह दिया तुमने?" विराज के अंदर जैसे कोई हूक सी उठी थी, बोला__"क्या एक पल के लिए भी तुम्हारे मन में ये ख़याल नहीं आया कि तुम्हारे इस तरह के कठोर बर्ताव से मुझ पर क्या गुज़री रही होगी? क्या तुम्हें एक पल के लिए भी नहीं लगा कि तुम ये जो कुछ कर रही हो वह कितना ग़लत है? क्या तुझे एक पल के लिए भी नहीं लगा था कि तेरे इस तरह दुत्कार देने से सारी ऊम्र मैं सुकून से जी नहीं पाऊॅगा? बता बेवफा....बता बेहया लड़की?"
विराज एकाएक ही बुरी तरह चीखने चिल्लाने लगा था। जुनून और पागलपन सा सवार हो गया था उस पर। उसने एक झटके में निधि की गर्दन को अपने दोनो हाॅथों से दबोच लिया। निधि को इस सबकी उम्मीद नहीं थी। इस लिए जैसे ही विराज ने अपने दोनो हाॅथों से उसकी गर्दन दबोची वैसे ही वह बुरी तरह घबरा गई। जबकि विराज जुनूनी हो चुका। इस वक्त उसके चेहरे पर नफरत घृड़ा और गुस्सा जैसे कत्थक करने लगा था। आॅखें तो नशे में वैसे ही लाल सुर्ख हो गई थी पहले से अब चेहरा भी सुर्ख पड़ गया था।
निधि ने तो स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि ऐसा भी हो सकता है। विराज ने उसकी गर्दन को शख्ती से दबोचा हुआ था। निधि बुरी तरह सहम गई थी। डर और भय के चलते उसका चेहरा निस्तेज़ का हो गया था। जबकि.....
"अब बोलती क्यों नहीं खुदगर्ज़ लड़की? बोल क्यों किया मेरे दिल के साथ इतना बड़ा खिलवाड़?" विराज भभकते स्वर में बोले जा रहा था__"बोल क्यों मेरी पाक भावनाओं को पैरों तले रौंदा था? बोल कितनी धन दौलत चाहिए तुझे? आज तो मैं फिर से अमीर हो गया हूॅ....मेरे पास आज इतनी दौलत है कि तेरे जैसी जाने कितनी लड़कियों को एक साथ उस दौलत से तौल दूॅ।
कहीं ऐसा तो नहीं कि तुझे पता चल गया हो कि मैं फिर से धन दौलत वाला हो गया हूॅ और इस लिए तू फिर से अपना फरेबी प्यार मेरे आगे परोसने आ गई? नहीं नहीं...अब मुझे तेरे इस घिनौने प्यार की ज़रूरत नहीं है। बल्कि अब तो मैं तेरे जैसी लड़कियों को अपनी उसी दौलत से दो कौड़ी के दामों में खरीद कर अपने नीचे सुलाऊॅगा और रात दिन रगड़ूॅगा उन्हें समझी तू???"
"भ भइया...ये क् क्या हो गया है आ आपको?" निधि बड़ी मुश्किल से बोल पा रही थी__"मैं वि विधी नहीं बल्कि मैं आ आपकी गुड़िया हूॅ भइयाऽऽ।"
विराज इस तरह रुक गया जैसे स्टैचू में तब्दील हो गया हो। कानों में सिर्फ एक यही वाक्य गूॅज रहा था 'मैं वि विधी नहीं बल्कि मैं आ आपकी गुड़िया हूॅ भइयाऽऽ।' बार बार यही वाक्य कानों में गूॅज रहा था। एक झटके से विराज ने निधि की गर्दन से अपने हाॅथ खींचे। एक पल में ही उसकी बड़ी अजीब सी हालत हो गई। आॅखें फाड़ कर निधि को देखा उसने। और फिर फूट फूट कर रो पड़ा वह। निधि को अपने सीने से छुपका लिया उसने।
"मुझे माफ कर दे...माफ कर दे मुझे।" विराज ने निधि को अपने सीने से अलग करके अपने दोनो हाथ जोड़ कर कहा__"ये मैं क्या कर रहा था गुड़िया? अपने इन्हीं हाॅथों से अपनी जान से भी ज्यादा प्यारी अपनी गुड़िया का गला दबा रहा था मैं। मुझे माफ कर दे गुड़िया, मुझसे कितना नीच काम हो गया...तू तू मुझे इस सबके लिए कठोर से भी कठोर सज़ा दे गुड़िया।"
"भइयाऽऽ।" निधि का दिल हाहाकार कर उठा, उसने एक झटके से विराज को खुद से चिपका लिया। बुरी तरह रोये जा रही थी वह। वह जानती थी कि ये जो कुछ भी हुआ उसमें विराज की कहीं कोई ग़लती नहीं थी। वो तो बस एक गुबार था, जो इस प्रकार से निधि को ही विधी समझ कर उसके अंदर से फट पड़ा था।
जाने कितनी ही देर तक यही आलम रहा। निधि अपने भाई को शान्त कराती रही। शराब के नशे में विराज वहीं निधि की गोंद में सिर रख कर सो गया था। निधि बड़े प्यार से उसके सिर के बालों पर उॅगलियाॅ फेरती जा रही थी। उसकी नज़रें अपने भाई के उस चेहरे पर जमी हुई थी जिस चेहरे पर इस वक्त संसार भर की मासूमियत विद्यमान थी।
'आप चिन्ता मत कीजिए भइया, आपकी ये गुड़िया आपको इतना प्यार करेगी कि आप संसार के सारे दुख सारे ग़म भूल जाएॅगे। आप मेरी जान हैं और मैं आपकी जान हूॅ। इस लिए आज से आपकी खुशी के लिए मैं वो सब कुछ करूॅगी जिससे आपको खुशी मिले। ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट............《 24 》
अब तक,,,,,,
"मुझे माफ कर दे...माफ कर दे मुझे।" विराज ने निधि को अपने सीने से अलग करके अपने दोनो हाथ जोड़ कर कहा__"ये मैं क्या कर रहा था गुड़िया? अपने इन्हीं हाॅथों से अपनी जान से भी ज्यादा प्यारी अपनी गुड़िया का गला दबा रहा था मैं। मुझे माफ कर दे गुड़िया, मुझसे कितना नीच काम हो गया...
तू तू मुझे इस सबके लिए कठोर से भी कठोर सज़ा दे गुड़िया।"
"भइयाऽऽ।" निधि का दिल हाहाकार कर उठा, उसने एक झटके से विराज को खुद से चिपका लिया। बुरी तरह रोये जा रही थी वह। वह जानती थी कि ये जो कुछ भी हुआ उसमें विराज की कहीं कोई ग़लती नहीं थी। वो तो बस एक गुबार था, जो इस प्रकार से निधि को ही विधी समझ कर उसके अंदर से फट पड़ा था।
जाने कितनी ही देर तक यही आलम रहा। निधि अपने भाई को शान्त कराती रही। शराब के नशे में विराज वहीं निधि की गोंद में सिर रख कर सो गया था। निधि बड़े प्यार से उसके सिर के बालों पर उॅगलियाॅ फेरती जा रही थी। उसकी नज़रें अपने भाई के उस चेहरे पर जमी हुई थी जिस चेहरे पर इस वक्त संसार भर की मासूमियत विद्यमान थी।
'आप चिन्ता मत कीजिए भइया, आपकी ये गुड़िया आपको इतना प्यार करेगी कि आप संसार के सारे दुख सारे ग़म भूल जाएॅगे। आप मेरी जान हैं और मैं आपकी जान हूॅ। इस लिए आज से आपकी खुशी के लिए मैं वो सब कुछ करूॅगी जिससे आपको खुशी मिले। ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
अब आगे,,,,,,,,
विराज को लगभग चार घंटे बाद होश आया। निधि की गोद में सिर रखे वह उसी तरह लेटा हुआ था। उसके सिर पर निधि का हाॅथ था और वह खुद भी वहीं पर यूॅ ही सो गई थी। दोनो ही नहीं जानते थे कि जिस शिप में वो दोनो इस वक्त थे वह कहाॅ से कहाॅ घूमते हुए पहुॅच गया था।
विराज को जब होश आया तो उसने अपने सिर को निधि की गोद में टिका हुआ पाया। उसने देखा कि उसकी जान उसके सिर पर अपना हाॅथ रखे यूॅ ही सो गई थी। उसके खूबसूरत चेहरे पर संसार भर की मासूमियत विद्यमान थी। विराज को उस पर बड़ा प्यार आया। वह आहिस्ता से निधि की गोद से उठा और फिर निधि को बड़ी ही आसानी से अपनी बाजुओं में उठा लिया। पास में ही एक तरफ रखे सोफे पर उसने निधि को आहिस्ता से लिटाया। उसके बाद वह खुद भी उसके चेहरे के समीप ही बैठ गया और अपनी गुड़िया को सोते देखने लगा। कुछ देर यूॅ ही देखने के बाद वह झुका और निधि के माथे पर आहिस्ता से चूॅमा फिर उठ कर बाथरूम की तरफ बढ़ गया।
विराज के जाते ही निधि ने मुस्कुराते हुए पट से अपनी आॅखें खोल दी। कुछ पल जाने क्या सोचती रही फिर उसने बहुत ही धीमे स्वर में कहा__"आपको तो ये भी नहीं पता जान जी कि किस किसी लड़की के माथे पर नहीं बल्कि उसके होंठो पर किया जाता है। लेकिन आप चिन्ता मत कीजिए....आप ये भी जानने लगेंगे...मैं सब बताऊॅगी न आपको, हाॅ नहीं तो।" ये कह कर वह हॅस पड़ी फिर सहसा शर्मा भी गई वह। अपने दोनो हाथों द्वारा तुरंत ही अपना चेहरा छुपा लिया उसने।
कुछ देर बाद विराज जब बाथरूम से वापस आया तो उसने अपनी गुड़िया को अपने ही हाथों अपने चेहरे को छुपाये हुए पाया। उसे लगा गुड़िया अभी भी उसके लिए दुखी है, इस लिए वह तुरंत ही उसके पास पहुॅचा और फर्स पर उसके घुटनों के पास बैठ गया।
"तू दुखी मत हो गुड़िया।
" विराज ने अपने हाॅथों द्वारा निधि के चेहरे से उसके हाॅथों को हटाते हुए कहा__"मैं तुझसे वादा करता हूॅ कि अब से मैं खुद को दुखी नहीं करूॅगा। उसकी यादों पर तो मेरा कोई ज़ोर नहीं है लेकिन अब उसकी यादों से मैं खुद को विचलित नहीं करूॅगा।"
"ये तो बहुत अच्छी बात है भइया।" निधि ने कहा__"उस लड़की को याद करके अपने दिल को क्यों तकलीफ़ देना जिसे प्यार की परिभाषा का ज्ञान ही न हो।"
"तू सही कह रही है गुड़िया।" विराज के चेहरे पर एकाएक ज़लज़ले के से भाव आए, बोला__"लेकिन इसका हिसाब तो मैं उससे लूॅगा गुड़िया। उसे मेरे साथ इस खिलवाड़ को करने की सज़ा ज़रूर मिलेगी मेरे हाथों। ऐसा हाल करूॅगा उसका कि फिर किसी के साथ ऐसा करने की हिम्मत भी नहीं करेगी वो।"
"क्या आपका ऐसा करना मेरा मतलब है कि उसे सज़ा देना उचित है भइया?" निधि ने कहा__"उसने जो किया उसे उसका फल भगवान खुद ही दे देगा। आपने उससे सच्चा प्यार किया था, इस लिए आप उसके लिए अपने मन में ऐसा विचार कैसे रख सकते हैं??"
"मैं जानता हूॅ गुड़िया कि प्यार में बदले की ऐसी भावना या विचार रखना उचित नहीं है।" विराज ने कहा__"लेकिन किसी को आईना दिखाना तो सर्वथा उचित है न। वही करना चाहता हूॅ मैं।"
"ठीक है आपको जो अच्छा लगे वो कीजिये भइया।" निधि ने कहा__"शायद इससे आपके दिल को सुकून मिल जाए।"
"माफ़ करना गुड़िया।" विराज ने खेद भरे स्वर में कहा__"मैं तुझे यहाॅ किस लिये लाया था और क्या हो गया। लेकिन तू फिक्र मत कर, अभी तो बहुत समय है। चल हम दोनो अब इस टूर का आनन्द लेते हैं।"
"कोई बात नहीं भइया।" निधि ने प्यार भरे लहजे में कहा__"आपसे बढ़ कर मेरे लिए कुछ भी नहीं है। आप मेरी जान हैं, और जब मेरी जान ही खुश नहीं रहेगी तो भला मैं कैसे किसी चीज़ से खुश रह सकती हूॅ?"
"तू और तेरी ये बातें।" विराज ने मुस्कुरा कर कहा__"मेरी समझ से बाहर हैं गुड़िया।"
"ऐसा क्यों?" निधि ने विराज की तरफ गौर से देखते हुए कहा था।
"कभी कभी मुझे ऐसा लगा करता है जैसे तेरे अलावा भी तुझ में कोई और कैरेक्टर है जो कुछ और कहने लगता है।" विराज ने कहा__"कुछ ऐसा कहने लगता है जो मेरी समझ में ही नहीं आता।"
"अच्छा, ऐसा आपको क्यों लगता है भइया?" निधि ने धड़कते दिल से कहा__"कि मेरे अंदर कोई और भी कैरेक्टर है जो कुछ और ही कह डालता है?"
"पता नहीं गुड़िया।" विराज ने कहा__"कभी कभी लगता है जैसे तू अब मेरी वो गुड़िया नहीं रही जो हर चीज़ को अपनी मधुर व चुलबुली बातों से हस कर उड़ा देती थी बल्कि अब तू बड़ी हो गई लगती है। इतनी बड़ी कि तेरी बातों में अब किसी रहस्य तथा किसी दूसरे ही अर्थ का आभास होता है जो समझ से परे होता है।"
निधि अपलक देखती रह गई विराज को। उसके दिल की धड़कने अनायास ही बढ़ गई थी।
उसे समझ में न आया कि वो क्या जवाब दे???
"मैं सच कह रहा हूॅ न गुड़िया?" उसे चुप देख विराज ने कहा__"ऐसी ही बात है न तुझ में?"
"पता नहीं भइया।" निधि ने सिर झुका कर कहा__"जाने क्यों ऐसा लगता है आपको, जबकि ऐसी तो कोई बात ही नहीं है।"
"चल कोई बात नहीं गुड़िया।" विराज ने निधि के चेहरे को अपने दोनो हाॅथों में लेते हुए कहा__"पर तू इतना समझ ले कि तेरा ये भाई तुझसे बहुत प्यार करता है और तुझे हमेशा खुशियों से चहकती व फुदकती हुई ही देखना चाहता है।"
विराज की बातें सुन कर निधि की आॅखें भर आई। उसके दिल में भावना का एक तीब्र भूचाल सा आ गया। उसी भावना के वशीभूत होकर वह विराज से लिपट गई। विराज के सीने में चेहरा छुपाए हुए ही बोली__"पर ये तभी संभव है जब आप भी खुश रहेंगे। अगर आप किसी बात से दुखी होंगे तो मैं भी दुखी हो जाऊॅगी।"
"ऐसा क्यों भला?" विराज ने कुछ सोचते हुए पूछा था।
"क्योंकि मैं आपसे प्या....।" निधि कहते हुए अचानक ही रुक गई। उसे एकाएक ही ध्यान आया था कि वह ये क्या बोलने वाली थी। उसकी हालत पल भर में ख़राब हो गई। दिल की धड़कने इतनी तीब्र हो गई उसकी धमक कनपटियों में स्पष्ट सुनाई देने लगी थी। उसने तुरंत ही बात को सम्हालते हुए बड़ी मुश्किल से कहा__"क्यों कि आप हमारे लिए सब कुछ हैं भ भइया...अगर आप ही इस तरह दुखी रहेंगे तो हम माॅ बेटी कैसे खुश रह सकेंगे भला?"
निधि ने भले ही अपनी समझ में बात को सम्हाल लिया था किन्तु उसके पहले अधूरे वाक्य ने ही सारी सच्चाई स्पष्ट कर दी थी। विराज ने पूछा ही इस तरह था कि जल्दबाजी और बेध्यानी में उसके मुख से वो निकल गया था जो वर्षों से उसके दिल में पनप रहा था। विराज ये सुन कर तथा ये जान कर बुरी तरह हिल गया था कि उसकी जान उसकी गुड़िया उससे प्यार करती है। यही वो बातें थी जो द्विअर्थी होती थी और विराज को समझ में नहीं आती थी। किन्तु आज संयोगवश सब कुछ सामने आ गया था। निधि खुद ही बेख़याली में बोल गई थी।
अपने भाई को खामोश जान कर निधि को झटका सा लगा। उसे समझते देर न लगी कि सब गड़बड़ हो चुका है। मतलब उसका भाई उसके पहले ही अधूरे वाक्य को सुन कर समझ चुका है कि उसकी सच्चाई क्या है। बात को सम्हालने की उसकी कोशिश बेकार हो चुकी थी। हालत ये हो गई उसकी कि अपने भाई से नज़र मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी अब। भाई के सीने में चेहरा छुपाए वह वैसी ही खड़ी रही। उसे लग रहा था कि ये ज़मीन फटे और वह पाताल तक उसमे समाती चली जाए। मगर चाह कर भी तो वह ऐसा न कर सकी। उसके होंठ घबराहटवश बुरी तरह थरथरा रहे थे।
वातावरण में अजीब सी शान्ति छा गई थी। काफी देर तक यही आलम रहा। दोनो में से कोई भी कुछ न बोल रहा था। विराज तो जैसे वहाॅ था ही नहीं बल्कि किसी गहरे ख़यालों के समंदर में डूबा हुआ नज़र आ रहा था।
बार बार उसके ज़ेहन में यही बात गूॅज रही थी कि उसकी गुड़िया उसकी अपनी बहन उससे प्यार करती है।
"भ भइया।" सहसा निधि ने हिम्मत जुटा कर तथा विराज के सीने से अपना चेहरा उठा कर विराज की तरफ देखते हुए धीमे स्वर में कहा__"क्या बात है...आप एकदम से चुप क्यों हो गए? क्या मुझसे कोई ग़लती हो गई? अगर ऐसा है तो मुझे माफ़ कर दीजिए प्लीज़।"
विराज के कानों में निधि की जब ये बातें पड़ीं तो वह ख़यालों के गहरे समुद्र से बाहर आया। वस्तुस्थित का आभास होते ही उसने निधि की तरफ अजीब भाव से देखा। निधि खुद भी उसी की तरफ देख रही थी किन्तु सीघ्र ही उसकी नज़रें झुक गईं। जाने क्यों अपने भाई की आॅखों से आॅखें न मिला सकी वह। कदाचित् इस लिए कि उसके दिल का भेद उसके भाई के सामने खुल चुका था।
"आज का पिकनिक टूर यहीं पर खत्म हो चुका गुड़िया।" सहसा विराज ने सपाट भाव से कहा__"अब हम वापस घर चल रहे हैं।"
इतना कह कर विराज ने निधि को खुद से अलग किया और बाहर की तरफ चल दिया। निधि को जाने क्यों ऐसा लगा जैसे उसका सब कुछ लुट गया है, उसके सीने में बड़ा तेज़ दर्द उठा। आॅखों के सामने अॅधेरा सा छा गया। ऐसा लगा जैसे वह अभी गश खा कर वहीं फर्स पर गिर पड़ेगी। लेकिन अंतिम समय में उसने बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हाल लिया। दिल में उमड़ते हुए जज़्बातों में प्रबलता आ गई जिसकी वजह से उसकी रुलाई फूट गई। वह जी जान से विराज की तरफ दौड़ी और पीछे से विराज की पीठ से लिपट कर ज़ार ज़ार रोने लगी।
___________________________
"ये तुम क्या कह रहे हो हरिया?" अजय सिंह बुरी तरह चौंका था__"तुमने अच्छी तरह पता किया तो है न ?"
"जी हाॅ मालिक।" हरिया नाम का एक आदमी जो कि अजय सिंह का ही आदमी था बोला__"मैने अच्छी तरह पता किया है। आपके छोटे भाई कल ही यहाॅ से बम्बई के लिए निकल गए थे। उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चों को कल ही उदयपुर भेज दिया था। मेरे एक खास आदमी ने अपनी आॅखों से उनको जाते हुए देखा था। उसी ने बताया कि छोटी मालकिन(करुणा) के भाई उनके साथ ही थे।"
अजय सिंह ये सब जान कर बुरी तरह भिन्ना गया। उसने तो सोचा था कि अभय के जाते ही वह करुणा को उठवा लेगा और उसे अपने नये फार्महाउस पर रखेगा। उसके बाद वह जिस तरह चाहेगा करुणा के गदराए हुए व मादक से जिस्म का मज़ा लूटेगा। किन्तु हरिया की इस ख़बर ने उसके सभी अरमानों पर पानी नहीं फेरा था बल्कि बाल्टी भर पेशाब कर दिया था। उसे इस बात की कतई उम्मीद नहीं थी कि उसका छोटा भाई अभय इतना शातिर दिमाग़ निकलेगा जो इतना आगे का सोच कर अपना खेल खेल जाएगा।
अजय सिंह चाहता तो करुणा को उसके मायके से भी उठवा सकता था किन्तु उस सूरत में बहुत बड़ा बवाल हो जाता। इस लिए अब वह अपने हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं कर सकता था। करुणा नाम की खूबसूरत चिड़िया अब उसके हाॅथ से निकल गई थी।
अजय सिंह ने सोचा था कि अभय के पीछे अपने आदमियों को लगा देगा किन्तु वो भी न कर सका वह। क्योंकि उसे पता ही न चल पाया था कि अभय सिंह ने कब क्या किया था?
"तुम पता करो हरिया।" फिर उसने कुछ सोचते हुए कहा__"अभय मुम्बई जा चुका है या नहीं?"
"वो तो कल ही यहाॅ से चले गए थे मालिक।" हरिया ने कहा__"और आज तो वो बम्बई पहुॅच भी गए होंगे।"
"अरे बेवकूफ कल वो मुम्बई कैसे जा सकता है?" अजय सिंह ने हुड़की दी__"शाम से पहले तक तो वो यहीं था, और शाम को भला कौन सी ट्रेन इस शहर से मुम्बई जाती है। वह तो दोपहर को जाती है। मतलब साफ है कि अभय कल नहीं आज गया होगा मुम्बई।"
"ये तो मैने सोचा ही नहीं मालिक।" हरिया ने सिर झुका कर कहा__"छोटे मालिक अगर आज गए होंगे तो कल ही पहुॅचेंगे बम्बई। अब हम क्या करें मालिक?"
"अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है हरिया।" अजय सिंह ने कहा__"ये तो तुम्हें भी मालूम है कि हमारे कुछ आदमी मुम्बई में ही हैं जो विराज और उसकी माॅ बहनों की खोज में लगे हुए हैं। हम अपने उन आदमियों को फोन करके कह देंगे कि वो अभय पर नज़र रखें। अभय कल मुम्बई पहुॅचेगा। मुम्बई में जैसे ही वह ट्रेन से उतरेगा वैसे ही हमारे आदमी उसके पीछे लग जाएंगे।"
"ये तो बहुत बढ़िया आइडियवा है मालिक।" हरिया ने इंग्लिश की माॅ बहन एक करते हुए कहा__"छोटे मालिक जहाॅ जहाॅ जाएॅगे हमारे आदमीं भी उनके पीछे जाएॅगे।"
"अब तुम जाओ हरिया।" अजय सिंह ने कहा__"हम भी किसी ज़रूरी काम से बाहर जा रहे हैं।"
"ठीक है मालिक।" कहते हुए हरिया चला गया वहाॅ से।
अजय सिंह ने मोबाइल निकाल कर मुम्बई में स्थित अपने आदमियों को फोन लगाया। अपने आदमियों को सारी बातें समझाने के बाद उसने फोन काट दिया।
अभी वह इस सबसे फारिग़ ही हुआ था कि सामने से उसकी इंस्पेक्टर बेटी रितू आती हुई दिखी। अजय सिंह उसे देख कर बस आह सी भर कर रह गया। पुलिस की चुस्त दुरुस्त वर्दी में उसकी बेटी ग़ज़ब ढा रही थी। जिस्म का एक एक उभार साफ नज़र आ रहा था। अजय सिंह की आॅखें एकटक रितू के सीने पर टिकी हुई थी। जहाॅ पर रितू के सीने के दो ठोस किन्तु बड़े बड़े वक्ष उसके चलने के कारण एक रिदम पर ऊपर नीचे कूद से रहे थे।
अजय सिंह अपनी बेटी के वक्षों को ललचाई नज़रों से देख ही रहा था कि तभी अंदर से आती हुई प्रतिमा की नज़र अजय सिंह पर पड़ी। अपने पति को अपनी ही बेटी के बड़े बड़े पर्वत शिखरों को ललचाई नज़रों से देखते देख वह मन ही मन कह उठी 'उफ्फ अजय तुम कभी नहीं सुधर सकते।'
"अरे...तुम अभी तक यहीं बैठे हो?" प्रतिमा ने तुरंत ही अजय सिंह का ध्यान भंग करने की गरज से कहा__"तुम तो कह रहे थे कि शहर जाना था?"
अजय सिंह चौंका, उसने तुरंत ही अपनी बेटी पर से नज़रे हटा ली।
कुछ पल के लिए उसके चेहरे पर ऐसे भाव उभरे जैसे इस सबसे वह बेहद शर्मसार हुआ हो किन्तु फिर अगले ही पल खुद को सम्हाल कर बोला__"ह हाॅ हाॅ बस निकल ही रहा हूॅ मैं।"
तब तक रितू भी आकर वहाॅ पर रखे एक सोफे पर लगभग पसर सी गई। अपने सिर से पुलिस की कैप उतार कर तथा हाथ में लिए पुलिस रुल को उसने एक तरफ रख दिया और फिर अपनी माॅ की तरफ देखते हुए कहा__"माॅम एक कप काॅफी मिलेगी क्या??"
"अभी लाई बेटी।" कहते हुए प्रतिमा वापस पलट गई और किचेन की तरफ चली गई।
"लगता है मेरी बेटी के सीने में काम और जिम्मेदारी का बोझ बहुत ही ज्यादा है।" अजय सिंह ने पुनः रितू के सीने की तरफ एक नज़र डाल कर कहा था।
"सीने पर?????" रितू ने चकरा कर कहा__"काम और जिम्मेदारी का बोझ तो कंधों पर होता है ना डैड??"
"ओह हाॅ हाॅ बेटी।" अजय सिंह बुरी तरह हड़बड़ा गया। उसके चेहरे पर घबराहट के भाव भी उभरे किन्तु फिर तुरंत ही सम्हल कर बोला__"यू आर राइट....अब्सोल्यूटली राइट।"
"डैड कल से शिवा कहीं नज़र नहीं आ रहा?" रितु ने पहलू बदलते हुए कहा__"और ना ही चाचा चाची जी वगैरा कहीं नज़र आ रहे हैं?"
"शिवा तो शहर में है बेटी।" अजय ने राहत की साॅस लेते हुए कहा__"बाॅकियों का मुझे पता नहीं। सब अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं। कहीं आने जाने के लिए वो किसी से पूछना ज़रूरी नहीं समझते। ख़ैर तुम बताओ, तुम्हारे केस का क्या हुआ? मेरा मतलब है कि क्या ये पता चल सका कि हमारी फैक्टरी में किसने बम्ब फिट किया था?"
"नहीं डैड।" रितू ने कहा__"बड़ा ही पेंचीदा मामला है। इस मामले में कुछ भी पता नहीं चल सका कि वो कौन था? हाॅ इतना जरूर पता किया कि फैक्टरी के गेट के बाहर मौजूद गार्ड झूठ बोल रहा था। दरअसल जिस रात ये हादसा हुआ था उस रात गेट पर एक ही गार्ड था और वो भी चौबीस घंटे की ड्यूटी पर। इस लिए रात में वह गेट के बाहर रखी कुर्सी पर बैठा बैठा ही ऊॅघ रहा था। इसके बाद उसने ये बताया कि उसे ये आभास हुआ कि कोई चीज़ उसकी नाॅक के पास लाई गई थी। जिसके असर से उसे पता ही नहीं चला कि वह कब बेहोश हो गया था? उसके बाद तब उसे होश आया जब फैक्टरी में लगी आग से अफरा तफरी मची हुई थी। यकीनन जो चीज़ उसके नाॅक के पास लाई गई थी वह क्लोरोफाॅम डाला हुआ कोई रुमाल रहा होगा या फिर खुद क्लोरोफाॅम की बाॅटल। इस हादसे से वह गार्ड बहुत ज्यादा डर गया था इसी लिए शुरू में उसने यही कहा था कि वह रात भर जागता रहा था और उसके सामने कोई भी ऐसा ब्यक्ति नहीं आया था जो फैक्टरी के अंदर गया हो।"
"तो फिर क्या फायदा हुआ तुम्हारे द्वारा केस को रिओपन करने से?" अजय सिंह ने रितू की तरफ अजीब भाव से देखते हुए कहा__"आख़िर क्या नतीजा निकला बेटी? वरना जिस तरह से तुमने इस केस को रिओपन किया था उससे तो यही ज़ाहिर हो रहा था कि इस बार कोई न कोई सुराग़ ज़रूर पुलिस के हाथ लगेगा।
दूसरी बात ये भी मुझे पता चली थी कि इस केस के रिओपन होने के तुरंत बाद ही रातों रात शहर के सारे पुलिस डिपार्टमेन्ट का तबादला कर दिया गया था। सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ था?"
"ये सवाल तो मेरे लिए भी सोचने का विषय बना हुआ है डैड।" रितू ने सोचने वाले भाव से कहा__"मुझे खुद ये बात समझ में नहीं आ रही कि गृह मंत्री ने शहर के सारे पुलिस विभाग का रातों रात तबादले का आदेश किस वजह से दिया था? अगर हम ये सोचें कि इसकी वजह ये है कि पिछली बार फैक्टरी के केस में पुलिस ने अपनी पूरी ईमानदारी से तहकीकात नहीं की थी बल्कि ग़लत रिपोर्ट तैयार की थी तो भी ये इतनी बड़ी वजह नहीं हो सकती कि इसकी वजह से शहर के सारे पुलिस विभाग का इस तरह तबादला कर दिया जाए। पिछली रिपोर्ट पर ऊपर से इंक्वायरी भी हुई थी। जिसमें पुलिस के उस अफसर ने ये बयान दिया था कि ऐसी रिपोर्ट बनाने के लिए आपने कहा था क्यों कि आप नहीं चाहते थे कि इसकी वजह से आपकी इज्जत नीलाम हो जाए। ख़ैर, आपके कहने पर उस अफसर ने भले ही ग़लत रिपोर्ट बनाई थी लेकिन इसके लिए उसे ज्यादा से ज्यादा सस्पेंड किया जा सकता था मगर ऐसा नहीं हुआ बल्कि शहर का सारा पुलिस विभाग ही बदल दिया गया। यही वो बात है डैड जिसने दिमाग़ का दही किया हुआ है।"
"हम्म...यकीनन।" अजय सिंह ने गहन सोच के साथ कहा__"बात तो वाकई बड़ी ही चक्करदार है बेटी। और सबसे बड़ी समस्या तो ये है कि इस बारे में गृहमंत्री से पूछा भी नहीं जा सकता।"
तभी प्रतिमा हाथ में ट्रे लिए हुई आई। उसने काफी का कप रितू को दिया और चाय का एक कप अजय सिंह को और चाय का ही एक कप खुद लेकर वहीं सोफे पर बैठ गई।
"क्या बातें हो रही हैं बाप बेटी के बीच?" प्रतिमा ने मुस्कुरा कर कहा था।
अजय सिंह ने संक्षेप में उसे बता दिया। सुन कर प्रतिमा ने कहा__"ये तो सचमुच बड़ी सोचने वाली बात है। इस केस में आख़िर ऐसा क्या था जिसके लिए खुद गृहमंत्री को भी हस्ताक्षेप करना पड़ा? इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने रातो रात शहर के सारे पुलिस विभाग का तबादला भी कर दिया था।"
प्रतिमा की इस बात के बाद वहाॅ पर सन्नाटा छा गया। कोई कुछ न बोला, कदाचित् इस लिए कि किसी के पास इसका कोई जवाब नहीं था। ये अलग बात थी सबके मन में ये बात गहन रूप से विचाराधीन थी।
_________________________
"नहीं...प्लीज़ रुक जाइये...आप इस तरह कैसे जा सकते हैं?" निधि ने रोते हुए कहा था__"हम तो पिकनिक टूर पर आए थे न, फिर इतनी जल्दी ये टूर कैसे समाप्त हो जाएगा? और....और ये अचानक क्या हो गया है आपको जो ये कह रहे हैं कि हम अब घर चलेंगे???"
"मुझे कुछ नहीं हुआ है।" विराज ने अजीब भाव से कहा__"हम घर जा रहे हैं बस और कोई बात नहीं।"
ये कह विराज ने निधि को अपनी पीठ पर से अलग कर आगे बढ़ने के लिए कदम बढ़ाया। किन्तु ज्यादा दूर जा नहीं सका वह।
क्योंकि उसके कानों में तुरंत ही निधि का करुणायुक्त वाक्य टकराया__"आपको मेरी कसम है अगर आपने एक क़दम भी आगे बढ़ाया तो मैं अपनी जान दे दूॅगी। मुझे बताइये कि आख़िर क्या हो गया है ऐसा जिसकी वजह से आप अचानक ही इस तरह का बर्ताव करने लगे। अगर मुझसे कोई ग़लती हो गई है तो आप उसके लिए मुझे जो चाहे सज़ा दे दीजिए....मुझे आपकी हर सज़ा मंजूर है। लेकिन अपने प्रति आपकी ऐसी बेरुखी मैं सह नहीं सकती।"
"मेरी इस बेरुखी की वजह तुम अच्छी तरह जानती हो।" विराज ने एक झटके में पलट कर कहा था__"तुम जानती हो कि किस वजह से मेरा बर्ताव अचानक ही बदल गया है। अगर नहीं जानती तो इस तरह रोती नहीं और ना ही मुझे अपनी कसम देती।"
निधि देखती रह गई विराज को। उसे तुरंत कोई जवाब न सूझा था। आॅखों में आॅसू लिए वह बड़ी मुश्किल से अपने दिल के जज़्बातों को काबू में करने की नाकामयाब कोशिश कर रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो विराज से क्या कहे?
"तुम ऐसा कैसे कर सकती हो गुड़िया?" उसे चुप देख विराज ने कहा__"क्या एक बार भी तुम्हें ये ख़याल नहीं आया कि तुम ये क्या कर रही हो? क्या एक बार भी ये नहीं सोचा कि मैं तुम्हारा सगा भाई हूॅ? क्या एक बार भी नहीं सोचा कि जो रिश्ता तुम बना रही हो वो भाई बहन के बीच नहीं हो सकता? क्यों गुड़िया, क्यों किया ऐसा?"
"मुझे माफ कर दीजिये।" निधि की रुलाई फूट गई, बोली__"मैंने जान बूझ कर ये सब नहीं किया। ये तो बस हो गया। कब कैसे मुझे खुद पता नहीं चला। आप यकीन कीजिए भइया, मैने ये नहीं किया। आप तो जानते हैं न कि कोई किसी से जान बूझ कर या सोच समझ कर प्यार नहीं करता बल्कि लोगों को किसी खास ब्यक्ति से प्यार खुद ही हो जाता है। और उसे स्वयं इस बात का पता नहीं चल पाता। वैसा ही मेरे साथ हुआ है भइया।"
"लेकिन ये ग़लत है मेरी गुड़िया।" विराज ने कहा__"क्या तू नहीं जानती ये बात?"
"मैं जानती हूॅ कि ये ग़लत है।" रितु ने नज़रें झुका कर किन्तु भारी स्वर में कहा__"ये भी जानती हूॅ कि देश समाज भाई बहन के बीच इस रिश्ते को कभी मान्यता नहीं दे सकता बल्कि ऐसे रिश्ते को पाप समझ कर ऐसा रिश्ता रखने वाले को गाॅव समाज से बहिस्कृत कर देता है। इसी लिए मैने कभी आपके सामने ये ज़ाहिर नहीं होने दिया कि मेरे दिल में आपके लिए क्या है? मैने अकेले में खुद को लाखों बार समझाया कि मुझे अपने दिलो दिमाग़ से आपके प्रति ऐसे ख़याल निकाल देना चाहिए क्यों कि ये ग़लत था। मगर मेरा दिल खुद के द्वारा लाखों बार समझाने के बाद भी मेरी नहीं सुनता। मैं क्या करूॅ भइया....हाय कितनी बुरी हूॅ मैं और कितनी बद्किस्मत भी हूॅ कि जिससे मुझे जीवन में पहली बार दिलो जान से प्यार हुआ वो मेरे भाई हैं तथा एक ही माॅ की कोख से जन्में हैं। मेरे दिल ने जिनकी अटूट चाहत व हसरत पाल बैठा वो उसे कभी मिल ही नहीं सकते।
"
कहते कहते निधि वहीं फर्स पर असहाय अवस्था में बैठ कर ज़ार ज़ार रोने लगी। जाने कब से उसके दिल में ये गुबार बाहर निकलने के लिए मचल रहा था। आज उस गुबार ने दिल की कैद से बाहर निकल आने का जैसे रास्ता ढूॅढ़ लिया था। हमेशा हॅसती खेलती व शरारतें करने वाली निधि आज जैसे इस सबके बाद दुख का दर्पण बन गई थी। जिस दिन उसे इस बात का एहसास हुआ था कि उसे अपने ही भाई से प्यार हो गया है उस दिन वह खूब रोई थी। क्योंकि वह इस बात को भली भाॅति जानती और समझती थी कि ये ग़लत है। अपने ही भाई को अपना महबूब बना लेना कतई उचित नहीं है। इस संबंध को समाज निम्न दृष्टि से देखता है। उसने इस बारे में अपने आपको बहुत समझाया था। सबके सामने उसी तरह हॅसती मुस्कुराती रहती किन्तु अपने कमरे में रात की तन्हाई में जब उसका मन भटकते हुए अपने भाई तक पहुॅच जाता तो सहसा उसको झटका सा लग जाता था। धड़कने रुक सी जाती उसकी और ये ख़याल उसे पल में रुला देता कि ये उसके दिल ने क्या कर दिया? वह रात रात भर इस बारे में सोचती रहती और भावना व जज़्बातों के भॅवर में खुद को रुलाती रहती। दिल के हाॅथों मजबूर हो चुकी थी वह। छोटी सी इस ऊम्र में उसके दिल ने ये कैसा रोग़ लगा लिया था, और लगाया भी था तो किसका.....खुद अपने ही भाई का? जो उसका कभी हो ही नहीं सकता था।
उस दिन तो वह बहुत रोई थी जिस दिन उसे ये पता चला था कि उसका भाई किसी ऐसी लड़की से प्यार करता है जिसने उसके भाई को सिर्फ इस लिए दुत्कार कर छोंड़ दिया है कि अब वह धन दौलत वाला नहीं रहा। इस बात ने निधि के दिल में जाने क्यों जलन पैदा कर दी थी उस वक्त। लेकिन वहीं इस बात से उसके मन को थोड़ा राहत भी हुई थी कि वह लड़की अब उसके भाई को छोंड़ कर उसके जीवन से जा चुकी है। निधि खुद से ये सवाल करती कि उसको इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि उसके भाई के जीवन से कोई लड़की जा चुकी है या नहीं। पर दिल के किसी कोने से उसे ये आवाज़ भी आती कि 'बहुत फर्क पड़ता है....राज सिर्फ मेरे हैं'
अपने दिल की इस आवाज़ को सुन कर उसके रोंगटे खड़े हो जाते। उसका मन मयूर नाचने लग जाता था। मगर जब उसे इस बात का बोध होता कि वो जिसे प्यार करती है तथा जिसको अपना बनाने की हसरत रखती है वो तो उसका सगा भाई है जिसे वो किसी भी कीमत पर अपना नहीं बना सकती तो उसका दिल बैठ जाता। ये एहसास उसे एक ही पल में ज़िन्दा लाश में तब्दील कर देता। उसके अंदर एक हूक सी उठती और फिर आॅखों से मानो गंगा जमुना बहने लग जातीं। उसे लगता कि इस दुनिया में उससे ज्यादा कोई दुखी नहीं है।
निधि को इस तरह ज़ार ज़ार रोते देख विराज तड़प कर रह गया। आख़िर थी तो उसकी बहन ही। ऐसी बहन जिसकी आॅखों में आॅसू का एक कतरा भी वह नहीं देख सकता था।
हालातों ने भले ही अपना चेहरा बदल लिया था और ये बता दिया था कि उसकी बहन के मन में वो जाने कब से एक महबूब बन कर बैठा हुआ था लेकिन वह तो अभी भी यही समझता था न कि निधि उसकी बहन ही है। जिसको वह किसी भी तरह दुख में नहीं देख सकता। इस लिए इसके पहले जो उसने बेरुखी का आवरण धारण कर लिया था उस आवरण को उसने सीघ्र ही दरकिनार कर दिया और तुरंत ही झुक कर फर्स पर बैठी रो रही अपनी बहन को उसके दोनो कंधों से पकड़ कर हौले से उठाया और अपने सीने से लगा लिया।
"बस कर अब।" विराज ने भर्राए हुए गले से कहा__"तू जानती है ना कि मैं तेरी आॅखों में आॅसू का एक कतरा भी नहीं देख सकता। इस तरह रो कर क्यों मेरे हृदय को चोंट पहुॅचा रही है गुड़िया? चल अब शान्त हो जा।"
"मुझे माफ़ कर दीजिए भइया।" निधि ने विराज के सीने से लगे हुए कहा__"लेकिन ये सच है कि मैं आपसे बेइंतहा प्यार करती हूॅ और आपके बिना एक पल भी जीने का सोच भी नहीं सकती। मैं जानती हूॅ भइया कि ये ग़लत है पर आप मेरी बेबसी को भी समझिये। आप मेरे मन मंदिर में इस हद तक बस चुके हैं कि अब मैं ही क्या बल्कि खुद भगवान भी मेरे मन मंदिर से आपको नहीं निकाल सकता। आप मेरे नहीं हो सकते और ना ही मैं आपको इस बात के लिए मजबूर करूॅगी कि आप मेरे हो जाइये। बस एक ही विनती है आपसे कि आप मुझे ये नहीं कहेंगे कि मैं आपसे प्यार का रिश्ता न रखूॅ, क्योंकि ये मेरे बस में नहीं है भइया।"
"ये हमारे भाग्य की कैसी विडम्बना है गुड़िया?" विराज ने अत्यंत गंभीर होकर किन्तु दुखी भाव से कहा__"मैं समझ सकता हूॅ तेरे दिल की हालत को क्योंकि मैं उस हालत से आज भी गुज़र रहा हूॅ। मगर ज़रा हम दोनो भाई बहन के नसीब का खेल तो देखो...जिसको मैने टूट कर चाहा उसने मुझे सिर्फ इस लिए ठुकरा दिया कि मैं रुपये पैसे वाला नहीं रहा था और जिसे तुम टूट कर चाहती हो वो तुम्हारा हो ही नहीं सकता। ये प्यार मोहब्बत क्यों ऐसी होती है? इसके नसीब को क्यों इस तरह का बना दिया है भगवान ने कि ये जिस किसी से होगी वो उसका हो ही नहीं सकेगा? क्यों ऐसी मोहब्बत बनाई बनाने वाले ने? क्या सिर्फ इस लिए कि मोहब्बत करने वाले अपने महबूब के विरह में जीवन भर तड़पें??"
"शायद इसी लिए राज।" निधि ने कहीं खोए हुए कहा था। उसे इस बात का आभास ही नहीं था कि वह अपने बड़े भाई को उसके नाम से संबोधित कर ये कहा था। जबकि...
"र राज..???" विराज बुरी तरह चौंका था। उसने निधि को खुद से अलग कर उसके चेहरे की तरफ हैरानी से देखा।
"क क्या हुआ भइया??" निधि चौंकी, उसको कुछ समझ न आया कि उसके भाई ने अचानक उसे खुद से अलग क्यों किया।
"क्या बताऊॅ??" विराज ने अजीब भाव से उसे देखते हुए कहा__"सुना है इश्क़ जब किसी के सर चढ़ जाता है तो उस ब्यक्ति को कुछ ख़याल ही नहीं रह जाता कि वह किससे क्या बोल बैठता है?"
"आप ये क्या कह रहे हैं?" निधि ने उलझन में कहा__"मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा?"
"अरे पागल तूने अभी अभी मुझे मेरा नाम लेकर पुकारा है।" विराज ने कहा__"हाय मेरी बहन प्रेम में कैसी बावली और बेशर्म हो गई है कि अब वो अपने बड़े भाई का नाम भी लेने लगी।"
"क क्याऽऽ????" निधि बुरी तरह उछल पड़ी। हैरत और अविश्वास से उसका मुॅह खुला का खुला रह गया। फिर सहसा उसे एहसास हुआ कि उसके भाई ने अभी क्या कहा है। उसका चेहरा लाज और शर्म से लाल सुर्ख पड़ता चला गया। नज़रें फर्स पर गड़ गईं उसकी। छुईमुई सी नज़र आने लगी वह। उसे इस तरह खड़े न रहा गया। कहीं और मुह छुपाने को न मिला तो पुनः वह विराज से छुपक कर उसके सीने में चेहरा छुपा लिया अपना। विराज को ये अजीब तो लगा किन्तु अपनी बहन की इस अदा पर उसे बड़ा प्यार आया। जीवन में पहली बार वह अपनी बहन को इस तरह और इतना शर्माते देखा था।
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,
आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा,,,,,
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट....... 《 26 》
अब तक,,,,,,,,
"शायद इसी लिए राज।" निधि ने कहीं खोए हुए कहा था। उसे इस बात का आभास ही नहीं था कि वह अपने बड़े भाई को उसके नाम से संबोधित कर ये कहा था। जबकि...
"र राज..???" विराज बुरी तरह चौंका था। उसने निधि को खुद से अलग कर उसके चेहरे की तरफ हैरानी से देखा।
"क क्या हुआ भइया??" निधि चौंकी, उसको कुछ समझ न आया कि उसके भाई ने अचानक उसे खुद से अलग क्यों किया।
"क्या बताऊॅ??" विराज ने अजीब भाव से उसे देखते हुए कहा__"सुना है इश्क़ जब किसी के सर चढ़ जाता है तो उस ब्यक्ति को कुछ ख़याल ही नहीं रह जाता कि वह किससे क्या बोल बैठता है?"
"आप ये क्या कह रहे हैं?" निधि ने उलझन में कहा__"मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा?"
"अरे पागल तूने अभी अभी मुझे मेरा नाम लेकर पुकारा है।" विराज ने कहा__"हाय मेरी बहन प्रेम में कैसी बावली और बेशर्म हो गई है कि अब वो अपने बड़े भाई का नाम भी लेने लगी।"
"क क्याऽऽ????" निधि बुरी तरह उछल पड़ी। हैरत और अविश्वास से उसका मुॅह खुला का खुला रह गया। फिर सहसा उसे एहसास हुआ कि उसके भाई ने अभी क्या कहा है। उसका चेहरा लाज और शर्म से लाल सुर्ख पड़ता चला गया। नज़रें फर्स पर गड़ गईं उसकी। छुईमुई सी नज़र आने लगी वह। उसे इस तरह खड़े न रहा गया। कहीं और मुह छुपाने को न मिला तो पुनः वह विराज से छुपक कर उसके सीने में चेहरा छुपा लिया अपना। विराज को ये अजीब तो लगा किन्तु अपनी बहन की इस अदा पर उसे बड़ा प्यार आया। जीवन में पहली बार वह अपनी बहन को इस तरह और इतना शर्माते देखा था।
अब आगे,,,,,,,
विराज अपनी बहन को अभी इस तरह शर्माते देख ही रहा था कि उसकी पैन्ट की पाॅकेट में पड़ा मोबाइल बज उठा। दोनो ही मोबाइल की रिंगटोन सुन कर चौंके।
"आपका मोबाइल भी न।" निधि ने बुरा सा मुह बना कर कहा__"ग़लत समय पर ही बजता है।"
"अरे! ऐसा क्यों कह रही है तू?" विराज ने पाॅकेट से मोबाइल निकालते हुए कहा था।
"अब जाने दीजिए।" निधि विराज से अलग होकर बोली__"आप देखिये, जाने कौन कबाब में हड्डी बन गया है, हाॅ नहीं तो।"
विराज उसकी बात पर मुस्कुराया और मोबाइल की स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नाम को देख तनिक चौंका फिर मुस्कुरा कर काॅल को रिसीव कर कानों से लगा लिया।
".................।" उधर से जाने क्या कहा गया जिसे सुन कर विराज बुरी तरह चौंका।
"ये क्या कह रहे हो तुम?" विराज ने हैरानी से कहा था।
"...............।" उधर से फिर कुछ कहा गया।
"भाई तूने बहुत अच्छी ख़बर दी है।" विराज खुश होकर बोला__"चल ठीक है मैं देख लूॅगा।"
"..............।"
"ओह तो ये बात है।" विराज ने सहसा सपाट भाव से कहा__"चल कोई बात नहीं भाई। देख लेंगे सबको। और हाॅ...सुन, मैने तेरा काम कर दिया है ठीक है न? चल रख फोन।"
"किससे बात कर रहे थे आप?" निधि ने उत्सुकतावश पूछा।
"अपना ही एक आदमी था गुड़िया।" विराज ने कहा__"उसने फोन करके बहुत अच्छी ख़बर सुनाई है। हमें अब इस टूर को यहीं खत्म करना होगा। क्योंकि बहुत ज़रूरी काम से मुझे कहीं जाना है।"
"क्या मुझे नहीं बताएॅगे?" निधि ने तिरछी नज़र से देखते हुए किन्तु इक अदा से कहा__"कि ऐसी क्या ख़बर सुनाई आपके उस आदमी ने जिसकी वजह से आपको अब जल्दी यहाॅ से निकलना होगा??"
"अरे पागल तुझसे भला क्यों कोई बात छुपाऊॅगा मैं?" विराज हॅसा__"चल रास्ते में बताता हूॅ सब कुछ।"
इसके बाद दोनो भाई बहन शिप के पायलट को सूचित कर शिप को वापस लौटने के लिए कह दिया। लगभग आधे घंटे बाद वो समुंदर के किनारे पर पहुॅचे। इस बीच विराज ने निधि को फोन पर हुई बातों के बारे में बता दिया था जिसे सुन कर वह भी खुश हो गई थी।
शिप से बाहर आकर विराज उस जगह निधि को लेकर गया जहाॅ पर उसकी कार पार्क की हुई थी। दोनो कार में बैठ कर घर की तरफ तेज़ी से बढ़ गए थे। इस बीच विराज ने फोन लगा कर किसी से बातें भी की थी।
शाम होने से पहले ही जब दोनो घर के अंदर पहुॅचे तो माॅ गौरी को ड्राइंगरूम में एक तरफ की दीवार पर लगी बड़ी सी एल ई डी टीवी पर सीरियल देखते पाया। गौरी ने जब अपने बच्चों को देखा तो पहले तो वो चौंकी फिर मुस्करा कर बोली__"आ गए तुम दोनो? चलो अच्छा किया जो जल्दी ही आ गए। जाओ दोनो खुद को साफ सुथरा कर लो तब तक मैं चाय बना कर लाती हूॅ।"
निधि और विराज दोनो अपने अपने कमरे की तरफ बढ़ गए। कुछ ही देर में दोनो फ्रेस होकर आए और सोफों पर बैठ गए। तभी गौरी हाथ में ट्रे लिए आई और दोनो को चाय दी और खुद भी एक कप चाय लेकर वहीं सोफे पर बैठ गई।
"माॅ चाचा जी आ रहे हैं आज।" विराज ने चाय की एक चुश्की लेकर कहा__"और मुझे जल्द ही रेलवे स्टेशन जाना होगा उन्हें रिसीव करने के लिए।"
"क्या कह रहा है तू......अभय आ रहा है???" गौरी बुरी तरह चौंकी थी, बोली__"पर तुझे कैसे पता इसका?"
"गाॅव के एक दोस्त ने मुझे फोन पर इस बात की सूचना दी है माॅ।" विराज ने सहसा गंभीर होकर कहा__"उसने बताया कि अभय चाचा चुपचाप ही हमसे मिलने के लिए गाॅव से निकले हैं। उसने ये भी बताया कि पिछले दिन हवेली में कोई बातचीत हो गई थी और अभय चाचा बहुत गुस्से में भी थे।"
"ऐसी क्या बातचीत हुई होगी?" गौरी ने मानो खुद से ही सवाल किया था, फिर तुरंत ही बोली__"और क्या बताया तेरे उस दोस्त ने?"
"मुझे तो ऐसा लगता है माॅ कि कोई गंभीर बात है।" विराज ने कहा__"मेरा दोस्त कह रहा था कि बड़े पापा ने अभय चाचा के पीछे अपने आदमियों को लगाया हुआ है। इससे तो यही लगता है कि वो अभय चाचा के द्वारा हम तक पहुॅचना चाहते हैं।"
"ठीक कहता है तू।" गौरी ने कहा__"ऐसा ही होगा। और अगर कोई बात हो गई है तो उससे अभय और उसके बीवी बच्चों पर ख़तरा भी होगा। उन्हें पता नहीं है कि उनका बड़ा भाई कितना बड़ा कमीना है।"
"इसी लिए तो मैं उन्हें लेने जा रहा हूॅ माॅ।" विराज ने कहा__"चाचा जी को तो शायद इस बात का अंदेशा भी न होगा कि उनके पीछे उनके बड़े भाई साहब ने अपने आदमी लगा रखे हैं।"
"अगर ये सच है कि अभय के पीछे तेरे बड़े पापा ने अपने आदमी लगा रखे हैं तो तू कैसे अभय को उन आदमियों की नज़रों से बचा कर लाएगा?" गौरी ने कहा__"तुझे तो पता भी नहीं है कि वहाॅ पर किन जगहों पर वो आदमी मौजूद होकर अभय पर नज़र रखे हुए हैं?"
"आप फिक्र मत कीजिए माॅ।" विराज ने कहा__"मैं चाचा जी को सुरक्षित वहाॅ से ले आऊॅगा और उन आदमियों को इसकी भनक भी नहीं लगेगी।"
"ठीक है बेटे।" गौरी ने सहसा फिक्रमंद हो कर कहा__"सम्हल कर जाना और अपने चाचा को सुरक्षित लेकर आना।"
"ऐसा ही होगा माॅ।" विराज ने कहा__"आप बिलकुल भी फिक्र मत कीजिए। मैं उन्हें सुरक्षित ही लेकर आऊॅगा।"
ये कह विराज सोफे से उठ कर बाहर की तरफ चला गया। कुछ ही देर में उसकी कार हवा से बातें कर रही थी। लगभग पन्द्रह मिनट बाद उसकी कार मेन रोड से उतर कर एक तरफ को मुड़ गई। कुछ दूर जाने के बाद विराज ने कार को सड़क के किनारे लगा कर उसे बंद कर दिया और बाॅई कलाई पर बॅधी रिस्टवाच पर ज़रा बेचैनी से नज़र डाली। उसके बाद राइट साइड की तरफ बनी हुई सड़क की तरफ देखने लगा। उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे किसी के आने का इन्तज़ार कर रहा हो।
कुछ ही देर में उस सड़क से उसे चार आदमी आते हुए दिखे। उन चारो आदमियों में एक की वेशभूसा सामान्य थी किन्तु बाॅकी के तीनों आदमियों के जिस्म पर कुली की पोशाक थी। थोड़ी ही देर बाद वो चारो विराज की कार के ड्राइविंग डोर के पास आकर खड़े हो गए।
"आने में इतना समय क्यों लगा दिया तुम लोगों ने?" विराज ने कहा__"मैने तुम लोगों को फोन पर बोला था न कि मुझे एकदम तैयार होकर यहीं पर मिलना।"
"साहब वो रामू की बेटी की तबियत बहुत ख़राब थी।" एक आदमी ने कहा__"इस लिए उसे अस्पताल लेकर जाना पड़ गया था। उसके पास पैसे नहीं थे तो हम सबने पैसों की ब्यवस्था की फिर उसे अस्पताल ले गए। उसी में समय लग गया साहब।"
"क्या हुआ उसकी बेटी को?" विराज ने चौंकते हुए पूछा था।
"पता नहीं साहब।" उस ब्यक्ति ने कहा__"एक हप्ते से बुखार थी उसे। थोड़ी बहुत गोली दवाई करवाई थी रामू ने। लेकिन आज दोपहर उसकी तबीयत कुछ ज्यादा ही बिगड़ गई इस लिए उसे अस्पताल लेकर जाना पड़ गया।"
"चलो कोई बात नहीं।" विराज ने कहा__"रामू को बोलो कि पैसों की चिन्ता न करे। उसकी बेटी के इलाज में जो भी पैसा लगेगा उसे हमारी कंपनी देगी। उसको बोलो कि वो अपनी बेटी का इलाज बेहतर तरीके से करवाए।"
"जी साहब।" उस आदमी ने खुश होकर कहा__"मैं अभी उसे बोलता हूॅ।"
कहने के साथ ही उस आदमी ने अपनी सर्ट की पाॅकेट से एक छोटा सा कीपैड वाला फोन निकाला और उस पर रामू का नम्बर देख उसे लगा दिया। उसने रामू को सारी बात बताई। उसके बाद उसने फोन बंद कर दिया।
विराज ने कार की डैसबोर्ड पर रखा एक लिफाफा उठाया। उसमे से उसने जो चीज़ें निकाली वो कोई फोटोग्राफ्स थे।
"इनमें से एक एक फोटोग्राफ्स तुम चारो अपने पास रखो।" विराज ने कहा__"इस फोटो में जो आदमी है उसे अच्छी तरह देख लो। क्योंकि इस आदमी को बड़ी सावधानी से रेलवे स्टेशन के बाहर लाना है तुम लोगों को।"
"पर साहब इतनी भीड़ में हम उन्हें खोजेंगे कैसे?" एक आदमी ने कहा__"दूसरी बात क्या पता कौन से डिब्बे में होंगे वो?"
"वो जनरल डिब्बे में ही हैं।" विराज ने कहा__"इस लिए तुम लोग सिर्फ जनरल डिब्बे में ही उन्हें खोजोगे। कहीं और खोजने की ज़रूरत नहीं है। बाॅकी तो सब कुछ तुम्हें फोन पर समझा ही दिया था मैने।"
"ठीक है साहब।" दूसरे आदमी ने कहा__"हम सब इस बात का ख़याल रखेंगे कि उनके पीछे लगे हुए उन आदमियों को पता न चल सके कि वो जिनका पीछा कर रहे हैं वो उनकी आॅखों के सामने से कैसे गायब हो गया??"
"वैरी गुड शंकर।" विराज ने कहा__"अभी ट्रेन के आने में समय है। तब तक मैं तुम्हें एक किराए की टैक्सी का इन्तजाम भी कर देता हूॅ। तुम उन्हें रेलवे स्टेशन से बाहर लाओगे, एक आदमी बाहर टैक्सी में बैठा तुम लोगों का इन्तज़ार करेगा। जैसा कि अभी तुम में से एक आदमी को छोंड़ कर बाकी तीनो कुली के वेश में हो इस लिए तुम तीनो में से जिसे भी वो मिलें तो उनके पास जाकर बड़ी सावधानी से सिर्फ वही कहना जो फोन पर समझाया था।"
"ऐसा ही होगा साहब।" एक अन्य आदमी ने कहा__"आप बेफिक्र रहिए।"
"अच्छी बात है।" विराज ने कहा__"चलो बैठो सब, हमें निकलना भी है अब।
"
विराज के कहने पर चारो आदमी खुशी से बैठ गए जबकि विराज ने कार को स्टार्ट कर आगे बढ़ा दिया।
---------------------
मुम्बई जाने वाली ट्रेन के उस जनरल कोच में भीड़ तो इतनी नहीं थी किन्तु नाम तो जनरल ही था। कोई किसी को भी बैठने के लिए सीट देने को तैयार नहीं था। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो ज़बरदस्ती लड़ झगड़ कर अपने बैठने के लिए सीट का जुगाड़ कर ही लेते हैं। यहाॅ प्यार इज्जत या अनुनय विनय करने वाले को कोई सीट नहीं देता और ना ही सीट के ज़रा से भी हिस्से में कोई बैठने देता है। जनरल कोच में तो ऐसा है कि अगर आप गाली गलौच या लड़ना जानते हैं या फिर तुरंत ही किसी भी ब्यक्ति पर हावी हो जाना जानते हैं तो बेहतर है। क्योंकि उससे आपको जल्द ही कहीं न कहीं सीट मिल जाती है बैठने के लिए। लेकिन उसमें भी शर्त ये होती है कि आपके पास अपनी सुरक्षा के लिए अपने साथ कुछ लोगों का बैकप होना ज़रूरी है वरना अगर आप अकेले हैं और अकेले ही तोपसिंह बनने की कोशिश कर रहे हैं तो समझिये आपका बुरी तरह पिट जाना तय है।
अभय सिंह गरम मिज़ाज का आदमी था। उसे कब किस बात पर क्रोध आ जाए ये बात वो खुद ही आज तक जान नहीं पाया था। मगर आज उस पर कोई क्रोध हावी न हुआ था। उसने सीट के लिए किसी से कुछ नहीं कहा था, बल्कि हाॅथ में एक छोटा सा थैला लिए वह दरवाजे के पास ही एक तरफ कभी खड़ा हो जाता तो कभी वहीं पर बैठ जाता। सारी रात ऐसे ही निकल गई थी उसकी।
ट्रेन अपने नियमित समय से चार घंटे लेट थी। ये तो भारतीय रेलवे की कोई नई बात नहीं थी किन्तु इस सबसे यात्रियों को जो परेशानी होती है उसका कोई कुछ नहीं कर सकता, ये एक सबसे बड़ी समस्या है। यद्यपि अभय को समय का आभास ही इतना नहीं हुआ था क्योंकि वो तो अपने परिवार और अपने बीवी बच्चों के बारे में ही सोचता रहा था। रह रह कर उसके मन में ये विचार उठता कि उसने अपनी देवी समान भाभी के साथ अच्छा नहीं किया। उसे अपने भतीजे का भी ख़याल आता कि कैसे वह उसे हमेशा इज्जत व सम्मान देता था। परिवार में वही एक लड़का था जिस पर संस्कार और शिष्टाचार कूट कूट कर भरे हुए थे। उसे अपने इस भतीजे पर बड़ा स्नेह और फक्र भी होता था। उसकी भतीजी निधि उसकी लाडली थी। वह परिवार में सबसे ज्यादा निधि को ही प्यार और स्नेह देता था। सब जानते थे कि अभय गुस्सैल स्वभाव का था किन्तु उसका गुस्सा कपूर की तरह उस वक्त काफूर हो जाता जब उसकी लाडली भतीजी अपनी चंचल व नटखट बातों से उसे पहले तो मनाती फिर खुद ही रूठ जाती उससे। उसका अपनी किसी भी बात के अंत में 'हाॅ नहीं तो' जोड़ देना इतना मधुर और हृदय को छू लेने वाला होता कि अभय का सारा गुस्सा पल में दूर हो जाता और वह अपनी लाडली भतीजी को खूब प्यार करता। परिवार की बाॅकी दो भतीजियाॅ उसके पास नहीं आती थी, क्यों कि वो सब उससे डरती थी।
अभय का दिलो दिमाग़ गुज़री हुई बातों को सोच सोच कर बुरी तरह दुखी होता और उसकी आॅखें भर आतीं। वह अपने मन में कई तरह के संकल्प लेता हुआ खुद के मन को हल्का करने की कोशिश करता रहा था।
आख़िर वह समय भी आ ही गया जब ट्रेन मुम्बई के कुर्ला स्टेशन पर पहुॅची। अभय अपनी सोचों के अथाह समुद्र से बाहर आया और उठ कर गेट की तरफ चल दिया। काफी भीड़ थी अंदर, लोग जल्द से जल्द नीचे उतरने के लिए जैसे मरे जा रहे थे। अभय खुद भी लोगों के बीच धक्के खाते हुए गेट की तरफ आ रहा था। हलाॅकि खड़ा वह गेट के थोड़ा पास ही था किन्तु वह इसका क्या करता कि पीछे से आॅधी तूफान बन कर आते हुए लोग बार बार उसे पीछे धकेल कर खुद आगे निकल जाते थे। वह बेचारा बेज़ुबान सा हो गया था। कदाचित् उसकी मानसिक स्थित उस वक्त ऐसी नहीं थी कि वह लोगों के द्वारा खुद को बार बार पीछे धकेल दिये जाने पर कोई प्रतिक्रिया कर सके।
कुछ देर बाद आख़िर वह गेट के पास पहुॅचा और ट्रेन से नीचे उतर गया। प्लेटफार्म पर आदमी ही आदमी नज़र आए उसे। उसे समझ न आया कि किस तरफ जाए? इतने बड़े मुम्बई शहर में वह अपनी भाभी व उनके दोनो बच्चों को कहाॅ और कैसे ढूॅढ़ेगा? उसका तो खुद का कहीं ठिकाना नहीं था। उसे अब महसूस हुआ कि वो कितना असहाय और थका हुआ लग रहा है। भूख और प्यास ने जैसे उस पर अब अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था। वह अपने साथ खाने पीने की कोई चीज़ लेकर नहीं चला था। कल अपने दोस्त के घर से खाकर ही चला था। हलाॅकि इतने बड़े सफर के लिए उसके दोस्त की बीवी ने खाने का एक टिफिन तैयार कर दिया था किन्तु अभय ने जाने क्या सोच कर मना कर दिया था।
ट्रेन से उतर कर अभय ने उसी तरफ चलने के लिए अपने कदम बढ़ाए जिस तरफ सारे लोग जा रहे थे। अभी वह कुछ कदम ही चला था कि एक कुली उसके पास आया और उसके अत्यंत निकट आकर बड़े ही रहस्यमय किन्तु संतुलित स्वर में बोला__"साहब जी! आपके भतीजे विराज जी आपको लाने के लिए हमें भेजे हैं। कृपया आप मेरे साथ जल्दी चलें।"
अभय सिंह को पहले तो कुछ समझ न आया फिर जब उसके विवेक ने काम किया तो कुली की इस बात को समझ कर वह बुरी तरह चौंका। उसके चेहरे पर अविश्वास के भाव नाच उठे। उसके मुख से हैरत में डूबा हुआ स्वर निकला__"क् कौन हो तुम? और कहाॅ है मेरा भतीजा?"
"साहब जी अभी आप ज्यादा कुछ न बोलिए।" उस कुली ने कहा__"बस मेरे साथ चलिए और अपना ये बैग मुझे दीजिए। और हाॅ, आप चेहरे से ऐसा ही दर्शाइये जैसे आप अपना सामान कुली को देकर उसके साथ बाहर जा रहे हैं। इधर उधर कहीं मत देखिएगा।"
"अरे...ऐसे कैसे भाई?" अभय को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये क्या हो रहा है उसके साथ__"कौन हो तुम और ये सब क्या है?"
"ओह साहब जी समझने की कोशिश कीजिए।" कुली ने चिन्तित स्वर में कहा__"यहाॅ पर ख़तरा है आपके लिए। इस लिए जल्दी से चलिए मेरे साथ।
स्टेशन से बाहर आपके भतीजे विराज जी आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।"
अभय के दिलो दिमाग़ में झनाका सा हुआ। एकाएक ही उसके दिमाग़ की बत्ती जल उठी। उसके मन में विचार उठा कि ये आदमी मुझे जानता है और मेरे लिए ही आया है, वरना दूसरे किसी आदमी को ये सब भला कैसे पता होता? दूसरी बात ये विराज का नाम ले रहा है और कह रहा है कि मेरा भतीजा स्टेशन से बाहर मेरी प्रतीक्षा कर रहा है। लेकिन ख़तरा किस बात का है यहाॅ??
अभय को पूरा मामला तो समझ न आया किन्तु उसने इतना अवश्य किया कि अपना बैग उस कुली को दे दिया। कुली उसका बैग लेकर तुरंत ही पलटा और स्टेशन के बाहर की तरफ चल दिया। उसके पीछे पीछे अभय भी चल दिया। दिमाग़ में कई तरह के विचारों का अंधड़ सा मचा हुआ था उसके।
स्टेशन से बाहर आकर वो कुली अभय को लिए एक टेक्सी के पास पहुॅचा। टैक्सी के अंदर बैग रख कर कुली ने अभय को टैक्सी के अंदर बैठने को कहा। लेकिन अभय न बैठा, उसने सशंक भाव से देखा कुली की तरफ। तब कुली ने एक तरफ हाॅथ का इशारा किया। अभय ने उस तरफ देखा तो चौंक गया, क्योंकि जिस तरफ कुली ने इशारा किया था उस तरफ उसका भतीजा विराज खड़ा था। विराज ने दूर से ही टैक्सी में बैठ जाने के लिए इशारा किया।
अभय अपने भतीजे को देख खुश हो गया और उसने राहत की सास भी ली। वह जल्द ही टैक्सी में बैठ गया। टैक्सी के अंदर चार आदमी थे। अभय के बैठते ही टैक्सी तुरंत आगे बढ़ गई। अभय को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे ये सब पहले से ही प्लान बनाया हुआ था। किन्तु उसे ये समझ न आया कि इस सबकी क्या ज़रूरत थी? आख़िर ये क्या चक्कर है?
"तुम सब लोग कौन हो भाई?" टैक्सी के कुछ दूर जाते ही अभय ने पूछा__"और ये सब क्या चक्कर है? मेरा मतलब है कि मुझे इस तरह रहस्यमय तरीके से क्यों ले जाया जा रहा है?"
"साहब जी ये तो हम भी नहीं जानते कि क्या चक्कर है?" कुली बने शंकर ने कहा__"हम तो वही कर रहे हैं जो करने के लिए विराज साहब ने हमे आदेश दिया था।"
अभय ये सुन कर मन ही मन चौंका कि ये विराज को साहब क्यों कह रहा है? किन्तु फिर प्रत्यक्ष में बोला__"ओह, तो अभी हम कहाॅ चल रहे हैं? और मेरा भतीजा विराज कहाॅ गया? वो इस टैक्सी में क्यों नहीं आया?"
"वो अपनी कार में हैं साहब जी।" शंकर ने कहा__"वो हमें आगे एक जगह मिलेंगे।"
"अ अपनी..क..कार में?" अभय लगभग उछल ही पड़ा था। उसे इस बात ने उछाल दिया कि उसके भतीजे के पास कार कहाॅ से आ गई? वह तो खुद भी यही समझ रहा था कि विराज कोई मामूली सा काम करता होगा यहाॅ।
"जी साहब जी।" उधर अभय के मनोभावों से अंजान शंकर ने कहा__"आगे एक जगह पर हमें विराज साहब मिल जाएॅगे। फिर आपको उनके साथ उनकी कार में बैठा कर हम इस टैक्सी को वापस कर देंगे जहाॅ से लाए थे।
"
"क्या मतलब?" अभय चौंका, झटके पर झटके खाते हुए पूछा__"कहाॅ से लाए थे इसे? क्या ये टैक्सी तुम्हारी नहीं है?"
"नहीं साहब जी, ये टैक्सी तो हमने किराए पर ली थी।" शंकर ने कहा__"विराज साहब ने ऐसा ही कहा था। बाॅकी सारी बातें वही बताएॅगे आपको।"
अभय उसकी बात सुनकर चुप रह गया। उसे समझ में आ चुका था कि सारी बातें विराज से ही पता चलेंगी। क्योंकि इन्हें ज्यादा कुछ पता नहीं है। शायद विराज ने इन्हें नहीं बताया था। पर ये लोग विराज को साहब क्यों कह रहे हैं? क्या वो इन लोगों का साहब है? अभय का दिमाग़ जैसे जाम सा हो गया था।
अभय को ये बात हजम नहीं हो रही थी। लेकिन उसने फिर कुछ न कहा। टैक्सी तेज़ रफ्तार से कई सारे रास्तों में इधर उधर चलती रही। कुछ ही देर में टैक्सी एक जगह पहुॅच कर रुक गई। टैक्सी के रुकते ही शंकर नीचे उतरा और पीछे का गेट खोल कर अभय को उतरने का संकेत दिया। अभय उसके संकेत पर टैक्सी से उतर आया। अभी वह टैक्सी से उतर कर ज़मीन पर खड़ा ही हुआ था कि तभी।
"प्रणाम चाचा जी।" अभय के उतरते ही एक तरफ से आकर विराज ने अभय के पैर छूकर कहा__"माफ़ कीजिएगा आपको इस तरह यहाॅ लाना पड़ा।"
"अरे राज तुम?? सदा ही खुश रहो।" अभय ने कहा और एकाएक ही भावना में बह कर उसने विराज को अपने गले से लगा लिया, फिर बोला__"आ मेरे गले लग जा मेरा शेर पुत्तर। कदाचित् मेरे दिल को ठंडक मिल जाए।"
अभय की आॅखों में आॅसू छलक आए थे। उसने बड़े ज़ोर से विराज को भींच लिया था। विराज को भी आज अपने चाचा जी के इस तरह गले लगने से बड़ा सुकून मिल रहा था। आज मुद्दतों बाद कोई अपना इस तरह मिला था। शिकवे गिले तो बहुत थे लेकिन सब कुछ भूल गया था विराज। कुछ देर ऐसे ही दोनो गले मिले रहे। फिर अलग हुए। अभय अपने दोनो हाॅथों से विराज का सुंदर सा चेहरा सहला कर उसके शरीर के बाॅकी हिस्सों को देखने लगा।
"कितना दुबला हो गया है मेरा बेटा।" अभय ने भर्राए स्वर में कहा__"पगले अपना ठीक से ख़याल क्यों नहीं रखता है तू? और भ भाभी कैसी हैं...और...और वो मेरी लाडली गुड़िया कैसी है..बता मुझे??"
"सब लोग एकदम ठीक हैं चाचा जी।" विराज ने कहा__"चलिए हम वहीं चलते हैं।"
"हाॅ हाॅ चल राज।" अभय ने तुरंत ही कहा__"मुझे जल्दी से ले चल उनके पास। मुझे भाभी के पास ले चल...मुझे उनसे....।"
वाक्य अधूरा रह गया अभय सिंह का..क्यों कि दिलो दिमाग़ में एकाएक ही तीब्रता से जज्बातों का उबाल सा आ गया था। जिसकी वजह से उसका गला भारी हो गया और उसके मुख से अल्फाज़ न निकल सके।
विराज अपने साथ अभय को लिए कुछ ही दूरी पर खड़ी अपनी कार के पास पहुॅचा। फिर उसने कार का दूसरी तरफ वाला गेट खोल कर अंदर अभय को बैठाया। इस बीच शंकर ने अभय का बैग विराज की कार के अंदर रख दिया था। विराज खुद ड्राइविंग डोर खोल कर ड्राइविंग शीट पर बैठ गया।
खिड़की के पास आ गए शंकर से उसने कहा__"उस टैक्सी को वापस कर देना। और ये पैसे रामू को दे देना, और ये तुम सब के लिए।"
विराज ने कार में ही रखे एक छोटे से ब्रीफकेस को खोल कर उसमे से दो हज़ार के नोटों की एक गड्डी शंकर को पकड़ाया था जो रामू की बेटी के इलाज़ के लिए था बाॅकी अलग से दो सौ के नोटों की एक गड्डी उन चारों के लिए। पैसे लेकर चारो ही खुशी खुशी वहाॅ से चले गए।
विराज ने कार स्टार्ट की और आगे चल दिया। अभय ये सब देख कर हैरान भी था और खुश भी।
"ये सब क्या चक्कर था राज?" अभय ने पूछा__"उन लोगों ने बताया कि ये सब करने के लिए उन्हें तुमने कहा था, लेकिन इस सबकी क्या ज़रूरत थी भला?"
"ऐसा करना ज़रूरी था चाचा जी।" विराज ने ड्राइविंग करते हुए कहा__"क्योंकि आपके पीछे कुछ ऐसे आदमी लगे थे जो आपकी निगरानी के लिए लगाए गए थे, बड़े पापा जी के द्वारा।"
"क क्या मतलब??" अभय बुरी तरह चौंका था, बोला__"बड़े भइया ने अपने आदमी मेरे पीछे लगा रखे थे? लेकिन क्यों और कैसे? और...और तुझे कैसे पता ये सब?"
"मुझे सबका पता रहता है चाचा जी।" विराज ने कहा__"वक्त और हालात ने सब कुछ सिखा दिया है आपके इस बेटे को। कल जब आप गाॅव से चले थे तब आपके वहाॅ से चलने की सूचना मुझे मेरे एक दोस्त ने फोन पर दी थी। उसने बताया था कि हवेली में कुछ बातचीत हो गई थी और आप हम लोगों से मिलने के लिए मुम्बई निकल चुके हैं। उसने ये भी बताया कि आपके पीछे बड़े पापा ने अपने आदमी भी लगा दिये हैं जो यहीं मुम्बई में हमारी खोज में न जाने कब से मौजूद थे।"
"ओह तो भइया ने ऐसा भी कर दिया मेरे पीछे?" अभय का चेहरा एकाएक सुलगता सा प्रतीत हुआ__"खैर कोई बात नहीं, उनसे उम्मींद भी क्या की जा सकती है? ख़ैर, तो तुम्हें इस सबकी जानकारी तुम्हारे दोस्त ने दी थी फोन के माध्यम से?"
"जी चाचा जी।" विराज ने कहा__"मुझे लगा कहीं आप पर किसी प्रकार का कोई ख़तरा न हो इस लिए मैने ऐसा किया। मैं खुद स्टेशन के अंदर नहीं गया क्योंकि संभव है बड़े पापा के आदमियों की नज़र मुझ पर पड़ जाती, उसके बाद उनके लिए हर काम आसान हो जाता। इस लिए मैंने उन सबसे बचने का ये उपाय किया। कुली के वेश में मेरे आदमी आपको सुरक्षित स्टेशन से बाहर ले आएॅगे। उसके बाद आपको टैक्सी में बैठा कर मेरे आदमी शहर में तब तक इधर उधर सड़कों में घूमते जब तक कि उन्हें ये एहसास न हो जाए कि किसी के द्वारा उनका पीछा अब नहीं किया जा रहा है। कहने का मतलब ये कि अगर बड़े पापा के आदमी किसी तरह आपको देख लिये हों और आपका पीछा करने लगे हों तो मेरे आदमी टैक्सी को तेज़ रफ्तार में इधर उधर घुमा कर उन आदमियों को गोली दे देंगे। उसके बाद मेरे आदमी सीधा वहाॅ आ जाते जहाॅ पर मैंने उन्हें अपने पास आने को बोला था। यहाॅ से मैं आपको अपनी कार में बैठा कर ले जाता। बड़े पापा के आदमी ढूॅढ़ते ही रह जाते उस टैक्सी को।
"
"ओह तो ये प्लान था तुम्हारा?" अभय ये सोच सोच कर हैरान था कि उसका इतना संस्कारी और भोला भाला भतीजा आज इतना कुछ सोचने लगा है, बोला__"बहुत अच्छा किया तुमने राज। मैं तुम्हारी इस समझदारी से बहुत खुश हूॅ।" अभय कुछ पल रुका और फिर एकाएक ही उसके चेहरे पर दुख के भाव आ गए, बोला__" कितना ग़लत था मैं....अपने क्रोध और अविवेक के कारण कभी नहीं सोच सका कि वास्तव में क्या सही था क्या ग़लत? अपने देवता जैसे विजय भइया और देवी जैसी अपनी गौरी भाभी पर शक किया और उनसे ये भी न जानने की कोशिश की कभी कि उन पर लगाए गए आरोप सच भी हैं या ये सब आरोप किसी साजिश के तहत उन पर थोपे गए थे? राज बेटे, अपने देवी देवता जैसे भईया भाभी के साथ मैने ये अच्छा नहीं किया। भगवान मुझे इस सबके लिए कभी माफ़ नहीं करेगा।"
ये कहने के साथ ही अभय की आवाज़ भर्रा गई। उसका चेहरा दुख और ग्लानिवश बिगड़ गया। उसकी आॅखों से आॅसू बह चले। विराज अपने चाचा जी के इस रूप को देख कर खुद भी दुखी हो गया था। वह जानता था कि उसके चाचा चाची का कहीं कोई दोष नहीं था। उनका अपराध तो सिर्फ इतना था कि उन्हें जो कुछ बताया और दिखाया गया था उसी को उन्होंने सच मान लिया था। अपने क्रोध की वजह से चाचा ने कभी ये जानने की कोशिश ही नहीं की थी कि सच्चाई वास्तव में क्या थी?
खैर कुछ ही समय में विराज अपने घर पहुॅच गया। एक बड़े से मेन गेट पर दो गार्ड खड़े थे। विराज की कार देखते ही दोनो गार्ड्स ने मेन गेट खोला। उसके बाद विराज ने कार को अंदर की तरफ बढ़ा दिया। लम्बे चौड़े लान से चलते हुए उसकी कार पोर्च में आकर खड़ी हो गई। दोनो चाचा भतीजा अपनी अपनी तरफ का गुट खोल कर नीचे उतरे। अभय की नज़र जब सामने बड़े से बॅगला टाइप घर पर पड़ी तो वह आश्चर्यचकित सा होकर देखने लगा उसे। इधर उधर दृष्टि घुमा कर देखने लगा हर चीज़ों को।
"राज बेटा ये कहाॅ आ गए हम?" अभय ने अजीब भाव से पूॅछा__"ये तो किसी बहुत ही बड़े आदमी का बॅगला लगता है।"
"आपने बिलकुल सही कहा चाचा जी ये किसी बहुत बड़े आदमी का ही बॅगला है लेकिन।" विराज ने कहा__"लेकिन अब ये बॅगला और ये सब प्रापर्टी आपके इस राज बेटे की ही है।"
"क् क्याऽऽ?????" अभय बुरी तरह चौंका था। आश्चर्य और अविश्वास से उसका मुह खुला का खुला रह गया, बोला__"ये ये सब तेरा है?? लेकिन ये सब तेरा कैसे हो गया राज? क्या तू सच कह रहा है?"
"चलिए अंदर चलते हैं।" विराज ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा__" माॅ और गुड़िया आपका इन्तज़ार कर रही हैं।"
अभय विराज की इस बात पर उसके साथ बॅगले के अंदर की तरफ बढ़ा ही था कि कोई तेज़ी से आया और एक झटके से उससे लिपट गया। अभय इस सबसे पहले तो हड़बड़ाया फिर जब उसकी नज़र लिपटने वाले पर पड़ी तो अनायास ही मुस्कुरा उठा वह।
"अरे ये तो मेरी लाडली गुड़िया है।
" अभय ने निधि के सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए कहा__"राज, ये मेरी गुड़िया है, ये...।"
अभय का गला भर आया, उसके जज्बात उसके काबू में न रहे। उसने निधि को अपने से छुपका लिया और रो पड़ा वह। उसे इस ख़याल ने बुरी तरह रुला दिया कि आज मुद्दतों के बाद उसने अपनी गुड़िया पर अपना प्यार लुटाने को मिला है। इसके पहले तो वह जैसे पत्थर का बन गया था। उसके दिलो दिमाग़ में इन सबके लिए क्रोध और घृणा भर दी गई थी। पहले जब उसकी भाभी और गुड़िया खेतों पर बने मकान के एक कमरे में रहती थीं तो वह किसी किसी दिन जाता था लेकिन फिर जैसे ही उसे उस सबका ख़याल आता वैसे ही उसका मन क्रोध और गुस्से से भर जाता और वह पत्थर का बन कर वापस चला आता। अपनी लाडली को प्यार व स्नेह देने के लिए वह तड़प जाता लेकिन आगे बढ़ने से हमेशा ही खुद को रोंक लेता था वह।
"आप आ गए न चाचू" निधि ने रोते हुए कहा__"मैं जानती थी कि आप मेरे बिना ज्यादा दिन नहीं रह सकेंगे वहाॅ पर। लेकिन आने में इतनी देर क्यों कर दी आपने? जाइये आपसे बात नहीं करना मुझे, हाॅ नहीं तो।"
ये कह कर निधि अपने चाचू से अलग हो गई और रूठ कर एक तरफ को मुह कर लिया। अभय को लगा कि उसका हृदय फट जाएगा। अपनी गुड़िया के मुख से बस यही सुनने के लिए तो तरस गया था वह। 'हाॅ नहीं तो' जाने इन शब्दों में ऐसा क्या था कि सुन कर अभय को लगा कि इन शब्दों को सुनने के बाद इस वक्त अगर उसे मृत्यु भी आ जाए तो उसे कोई ग़म न होगा।
"तू रूठ जाएगी तो मैं समझूॅगा कि मुझसे ये सारा संसार रूठ गया मेरी बच्ची।" अभय ने तड़प कर कहा__"यहाॅ तक कि वो ईश्वर भी। और फिर उसके बाद मेरे लिए एक पल भी जीने का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।"
"न नहीं चाचू नहीं।" निधि तुरंत ही अभय से लिपट गई। उसकी आॅखों से आॅसू बह चले। रोते हुए बोली__"प्लीज ऐसा मत कहिए। आप तो मेरे सबसे अच्छे चाचू हैं। मैं आपसे नाराज़ नहीं हूॅ। और हाॅ आज के बाद ऐसा कभी मत बोलियेगा नहीं तो सच में मैं आपसे बात नहीं करूॅगी, हाॅ नहीं तो।"
जाने कितनी ही देर तक अभय अपनी लाडली को स्नेह और प्यार के वशीभूत हुए खुद से छुपकाए रहा। उसके सिर पर प्यार से हाॅथ फेरता रहा। विराज ये सब नम आॅखों से देखता रहा।
"अगर अपनी लाडली भतीजी से मिलना जुलना हो गया हो तो अपनी भाभी से भी मिल लो अभय।" सहसा गौरी की ये आवाज़ गूॅजी थी वहाॅ। वह काफी देर से बॅगले के मुख्य दरवाजे पर खड़ी ये सब देख रही थी। उसकी आॅखों में भी आॅसू थे।
गौरी की इस आवाज़ को सुन कर अभय और निधि एक दूसरे से अलग हुए। अभय ने पलट कर गौरी की तरफ देखा। जो उसी की तरफ करुण भाव से देख रही थी। उसकी आॅखों में अपने लिए वही आदर वही स्नेह देख कर अभय का दिलो दिमाग़ अपराध बोझ से भर गया। उसे खुद पर इतनी शर्म और ग्लानी महसूस हुई कि उसे लगा ये धरती फटे और वह उसमें रसातल तक समाता चला जाए।
दिलो दिमाग़ में भावनाओं का तेज़ तूफान चलने लगा। हृदय की गति तीब्र हो गई। उसे अपनी जगह पर खड़े रहना मुश्किल सा प्रतीत होने लगा।
बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला और नयनों में नीर भरे वह तेज़ी से गौरी की तरफ बढ़ा। गौरी के पास पहुॅचते ही वह अपनी देवी समान भाभी के पैरों में लगभग लोट सा गया। उसके जज्बात उसके काबू से बाहर हो गए। फूट फूट कर रो पड़ा वह। मुह से कोई वाक्य नहीं निकल रहे थे उसके।
अपने पुत्र समान देवर को इस तरह बच्चों की तरह रोते देख गौरी का हृदय हाहाकार कर उठा। वह जल्दी से नीचे झुकी और अभय को उसके दोनो कंधों से पकड़ कर बड़ी मुश्किल से उठाया उसने। अभय उससे नज़र नहीं मिला पा रहा था। उसका समूचा चेहरा आॅसुओं से तर था।
"अरे ऐसे क्यों रहे हो पागल?" गौरी खुद भी रोते हुए बोली__"चुप हो जाओ। तुम जानते हो कि मैने हमेशा तुम्हें अपने बेटे की तरह समझा है। इस लिए तुम्हें इस तरह रोते हुए नहीं देख सकती। चुप हो जाओ अभय। अब बिलकुल भी नहीं रोना।"
ये कह कर गौरी ने अभय को अपने सीने से लगा लिया। अपनी भाभी की ममता भरी इन बातों से अभय और भी सिसक सिसक कर रो पड़ा। उसकी आत्मा चीख चीख कर जैसे उससे कह रही थी 'देख ले अभय जिस देवी समान भाभी पर तूने शक किया था और उनके ऊपर लगाए गए आरोपों को सच समझ कर उनसे मुह मोड़ लिया था, आज वही देवी समान भाभी तुझे अपने बेटे की तरह प्यार व स्नेह देकर अपने सीने से लगा रखी है। उसके मन में लेश मात्र भी ये ख़याल नहीं है कि तुमने उनके और उनके बच्चों से किस तरह मुह मोड़ लिया था?'
अभय अपनी आत्मा की इन बातों से बहुत ज्यादा दुखी हो गया। उसे खुद से बेहद घृणा सी होने लगी थी।
"मुझे इस प्रकार अपने ममता के आचल में मत छुपाइये भाभी।" अभय गौरी से अलग होकर बोला__"मैं इस लायक नहीं हूॅ। मैं तो वो पापी हूॅ जिसके अपराधों के लिए कोई क्षमा नहीं है। अगर कुछ है तो सिर्फ सज़ा। हाॅ भाभी....मुझे सज़ा दीजिए। मैं आप सबका गुनहगार हूॅ।"
"ये कैसी पागलपन भरी बातें कर रहे हो अभय?" गौरी ने दोनो हाॅथों के बीच अभय का चेहरा लेकर कहा__"किसने कहा तुमसे कि तुमने कोई अपराध किया है? अरे पगले, मैंने तो कभी ये समझा ही नहीं कि तुमने कोई अपराध किया है। और जब मैने ऐसा कुछ समझा ही नहीं तो क्षमा किस बात के लिए? हाॅ ये दुख अवश्य होता था कि जिस अभय को मैं अपने बेटे की तरह मानती थी वह जाने क्यों अपनी भाभी माॅ से अब मिलने नहीं आता? क्या उसकी भाभी माॅ इतनी बुरी बन गई थी कि वो अब मुझसे बात करने की तो बात ही दूर बल्कि नज़र भी ना मिलाए?"
"इसी लिए तो कह रहा हूॅ भाभी।" अभय रो पड़ा__"इसी लिए तो....कि मैं अपराधी हूॅ। मेरा ये अपराध क्षमा के लायक नहीं है। मुझे इसके लिए सज़ा दीजिए।"
"मैंने तुम्हें हमेशा अपना बेटा ही समझा है अभय।
" गौरी ने अभय की आॅखों से आॅसू पोंछते हुए कहा__"इस लिए माॅ अपने बेटे की किसी ग़लती को ग़लती नहीं मानती। बल्कि वह तो उसे नादान समझ कर प्यार व स्नेह ही करने लगती है। चलो, अब अंदर चलो।"
गौरी ने ये कह अभय को उसके कंधों से पकड़ कर अंदर की तरफ चल दी। उसके पीछे विराज और निधि भी अपनी अपनी आॅखों से आॅसू पोंछ कर चल दिये।
-----------------------
"तुम लोग सब के सब एक नम्बर के निकम्मे हो।" उधर हवेली में अजय सिंह फोन पर दहाड़ते हुए कह रहा था__"किसी काम के नहीं हो तुम लोग। पिछले एक महीने से तुम लोग वहाॅ पर केवल मेरे रुपयों पर ऐश फरमा रहे हो। एक अदना सा काम सौंपा था तुम लोगों को और वह भी तुम लोगों से नहीं हुआ। हर बार अपनी नाकामी की दास्तान सुना देते हो तुम लोग।"
"......................।" उधर से कुछ कहा गया।
"कोई ज़रूरत नहीं है।" अजय सिंह गस्से में गरजते हुए बोला__"तुम लोगों के बस का कुछ नहीं है। इस लिए फौरन चले आओ वहाॅ से।"
ये कह कर अजय सिंह ने मारे गुस्से के लैंड लाइन फोन के रिसीवर को केड्रिल पर लगभग पटक सा दिया था। उसके बाद ड्राइंगरूम के फर्स पर बिछे कीमती कालीन को रौंदते हुए आकर वह वहीं सोफे पर धम्म से बैठ गया।
सामने के सोफे पर बैठी प्रतिमा क्रोध और गुस्से में उबलते अपने पति को एकटक देखती रही। इस वक्त कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं हुई थी उसमे। जबकि अजय सिंह का चेहरा गुस्से में तमतमाया हुआ लाल सुर्ख पड़ गया था। कुछ पल शून्य में घूरते हुए वह लम्बी लम्बी साॅसें लेता रहा। उसके बाद उसने कोट की जेब से सिगारकेस निकाला और उससे एक सिगार निकाल कर होठों के बीच दबा कर उसे लाइटर से सुलगाया। दो चार लम्बे लम्बे कश लेने के बाद उसने उसके गाढ़े से धुएॅ को अपने नाक और मुह से निकाला।
"तुझे तो कुत्ते से भी बदतर मौत दूॅगा हरामज़ादे।" सहसा वह दाॅत पीसते हुए कह उठा__"बस एक बार मेरे हाॅथ लग जा तू। उसके बाद देख कि क्या हस्र करता हूॅ तेरा?"
"क्या बात है अजय?" प्रतिमा ने सहसा मौके की नज़ाक़त को देखकर पूछा__"फोन पर क्या बातें बताई तुम्हारे आदमियों ने?"
"सबके सब हरामज़ादे निकम्मे हैं।" अजय सिंह कुढ़ते हुए बोला__"आने दो सालों को एक लाइन से खड़ा करके गोली मारूॅगा मैं"
"अरे पर बात क्या हुई अजय?" प्रतिमा चौंकी थी__"तुम इतना गुस्से में क्यों पगलाए जा रहे हो?"
"तो क्या करूॅ मैं?" अजय सिंह जैसे बिफर ही पड़ा, बोला__"अपने आदमियों की एक और नाकामी की बात सुन कर क्या मैं कत्थक करने लग जाऊॅ?"
"एक और नाकामी???" प्रतिमा उछल सी पड़ी थी, बोली__"ये क्या कह रहे हो तुम?"
"हाॅ प्रतिमा।" अजय सिंह बोला__"फोन पर मेरे आदमियों ने बताया कि अभय उन्हें गच्चा दे गया।"
"गच्चा दे गया??" प्रतिमा ने ना समझने वाले भाव से कहा__"इसका क्या मतलब हुआ?"
"मेरे आदमियों के अनुसार।" अजय सिंह ने कहा__"अभय उन्हें ट्रेन से उतरते हुए दिखा।
उसके बाद वह किसी कुली को अपना बैग देकर उसके साथ स्टेशन के बाहर चला गया। बाहर आकर वह एक टैक्सी में बैठा और वहाॅ से आगे बढ़ गया। मेरे आदमी भी उस टैक्सी के पीछे लग गए। लेकिन उसके बाद वो टैक्सी अचानक ही कहीं गायब हो गई। मेरे उन आदमियों ने उस टैक्सी को बहुत ढूॅढ़ा मगर कहीं उसका पता नहीं चल सका।"
"ये तो बड़ी ही अजीब बात है।" प्रतिमा ने हैरानी से कहा__"कहीं ऐसा तो नहीं कि अभय को इस बात का शक़ हो गया हो कि कोई उसका पीछा कर रहा है और उसने टैक्सी वाले से कहा हो कि वह पीछा करने वालों को गच्चा दे दे।"
"हो सकता है।" अजय सिंह ने सोचने वाले भाव से कहा__"मेरे आदमी ने बताया कि अभय के पास जब कुली आया तो उनके बीच पता नहीं क्या बातें हुईं थी जिसकी वजह से अभय के चेहरे पर चौंकने वाले भाव उभरे थे। ऐसा लगा जैसे वह किसी बात पर चौका हो और वह उस कुली के साथ जाने के लिए तैयार न हुआ था। लेकिन फिर बाद में वह आसानी से अपना बैग कुली को दे दिया और चुपचाप उसके पीछे पीछे चल भी दिया था। चलते समय भी उसके चेहरे पर गहन सोच व उलझन के भाव थे।"
"हाॅ तो इसमें इतना विचार करने की क्या बात है भला?" प्रतिमा ने कहा__"ऐसा तो होता ही है कि आम तौर पर कुलियों की बात पर यात्री लोग इतनी आसानी से आते नहीं हैं। दूसरी बात अभय की उस समय की मानसिक स्थित भी ऐसी नहीं रही होगी कि वह इस तरह किसी कुली के साथ कहीं चल दे।"
"हो सकता है कि तुम्हारी बात ठीक हो लेकिन।" अजय सिंह बोला__"लेकिन इसमें भी सोचने वाली बात तो है ही कि कुली ने ऐसा क्या कहा कि सुनकर अभय बुरी तरह चौंका था और फिर बाद में रहस्यमय तरीके से उस कुली के साथ चल दिया था? कहने का मतलब ये कि उसकी हर एक्टीविटी रहस्यमय लगी थी।"
"अगर ऐसा है भी तो इसमें हम क्या कर सकते हैं?" प्रतिमा ने कहा__"क्योंकि अभय नाम का पंछी तो आपके आदमियों की आॅखों के सामने से गायब ही हो चुका है अब।"
"ये सब मेरे उन हरामज़ादे आदमियों की वजह से ही हुआ है प्रतिमा। खैर छोड़ो ये सब।" अजय सिंह ने गहरी साॅस लेकर कहा__"ये बताओ कि तुमने अपना काम कहाॅ तक पहुॅचाया?"
"अ अपना काम??" प्रतिमा ने ना समझने वाले भाव से कहा__"कौन से काम की बात कर रहे हो तुम?"
"तुम अच्छी तरह जानती हो प्रतिमा कि मैं किस काम के बारे में पूछ रहा हूॅ तुमसे?" अजय सिंह का लहजा सहसा पत्थर की तरह कठोर हो गया__"और अगर तुम इस काम में सीरियस नहीं हो तो बता दो मुझे। अपने तरीके से शिकार करना भली भाॅति आता है मुझे।"
"ओह तो तुम उस काम के बारे में पूछ रहे हो?" प्रतिमा को जैसे ख़याल आया__"यार तुम तो जानते हो कि ये करना इतना आसान नहीं है। भला मैं कैसे अपनी बेटी से ये कह सकूॅगी कि बेटी अपने बाप के पास जा और उनके नीचे लेट जा। ताकि तेरे मदमस्त यौवन का तेरा बाप भोग कर सके।"
"अच्छी बात है प्रतिमा।
" अजय सिंह ने ठंडे स्वर में कहा__"अब तुम कुछ नहीं करोगी। जो भी करुॅगा अब मैं ही करूॅगा।"
"न नहीं नहीं अजय।" प्रतिमा बुरी तरह घबरा गई, बोली__"तुम खुद से कुछ नहीं करोगे। मैं अतिसीघ्र ही अपनी बेटी को तुम्हारे नीचे सुलाने के लिए तैयार कर लूॅगी।"
"अब तुम्हारी इन बातों पर ज़रा भी यकीन नहीं है मुझे।" अजय ने कहा__"बहुत देख ली तुम्हारी कोशिशें। तुमने करुणा के बारे में भी यही कहा था और अब अपनी बेटी के लिए भी यही कह रही हो। तुम्हारी कोशिशों का क्या नतीजा निकलता है ये मैं देख चुका हूॅ। इस लिए अब मैं खुद ये काम करूॅगा और तुम मुझे रोंकने की कोशिश नहीं करोगी।"
"पर अजय ये तुम ठीक...।" प्रतिमा का वाक्य बीच में ही रह गया।
"बस प्रतिमा, अब कुछ नहीं सुनना चाहता हूॅ मैं।" अजय सिंह कह उठा__"अब तुम सिर्फ देखो और उसका मज़ा लो।"
प्रतिमा देखती रह गई अजय को। उसका दिल बुरी तरह घबराहट के कारण धड़कने लगा था। चेहरा अनायास ही किसी भय के कारण पीला पड़ गया था उसका। मन ही मन ईश्वर को याद कर उसने अपनी बेटी की सलामती की दुवा की।
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.........《 27 》
अब तक,,,,,,,
"अच्छी बात है प्रतिमा।" अजय सिंह ने ठंडे स्वर में कहा__"अब तुम कुछ नहीं करोगी। जो भी करुॅगा अब मैं ही करूॅगा।"
"न नहीं नहीं अजय।" प्रतिमा बुरी तरह घबरा गई, बोली__"तुम खुद से कुछ नहीं करोगे। मैं अतिसीघ्र ही अपनी बेटी को तुम्हारे नीचे सुलाने के लिए तैयार कर लूॅगी।"
"अब तुम्हारी इन बातों पर ज़रा भी यकीन नहीं है मुझे।" अजय ने कहा__"बहुत देख ली तुम्हारी कोशिशें। तुमने करुणा के बारे में भी यही कहा था और अब अपनी बेटी के लिए भी यही कह रही हो। तुम्हारी कोशिशों का क्या नतीजा निकलता है ये मैं देख चुका हूॅ। इस लिए अब मैं खुद ये काम करूॅगा और तुम मुझे रोंकने की कोशिश नहीं करोगी।"
"पर अजय ये तुम ठीक...।" प्रतिमा का वाक्य बीच में ही रह गया।
"बस प्रतिमा, अब कुछ नहीं सुनना चाहता हूॅ मैं।" अजय सिंह कह उठा__"अब तुम सिर्फ देखो और उसका मज़ा लो।"
प्रतिमा देखती रह गई अजय को। उसका दिल बुरी तरह घबराहट के कारण धड़कने लगा था। चेहरा अनायास ही किसी भय के कारण पीला पड़ गया था उसका। मन ही मन ईश्वर को याद कर उसने अपनी बेटी की सलामती की दुवा की।
--------------------
अब आगे,,,,,,,,
अभय को अपने साथ लिए गौरी ड्राइंग रूम में दाखिल हुई, उसके पीछे पीछे विराज और निधि भी थे। गौरी ने अभय को सोफे पर बैठाया और खुद भी उसी सोफे पर उसके पास बैठ गई। विराज और निधि सामने वाले सोफे पर एक साथ ही बैठ गये।
अभय सिंह का मन बहुत भारी था। उसका सिर अभी भी अपराध बोझ से झुका हुआ था। गौरी इस बात को बखूबी समझती थी, कदाचित इसी लिए उसने बड़े प्यार से अपने एक हाथ से अभय का चेहरा ठुड्डी से पकड़ कर अपनी तरफ किया।
"ये क्या है अभय?" फिर गौरी ने अधीरता से कहा__"इस तरह सिर झुका कर बैठने की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम अपने दिलो दिमाग़ से ऐसे विचार निकाल दो जिसकी वजह से तुम्हें ऐसा लगता है कि तुमने कोई अपराध किया है। तुम्हारी जगह कोई दूसरा होता तो वह भी वही करता जो उन हालातों में तुमने किया। इस लिए मैं ये समझती ही नहीं कि तुमने कोई ग़लती की है या कोई अपराध किया है। इस लिए अपने मन से ये ख़याल निकाल दो अभय और अपने दिल का ये बोझ हल्का करो, जो बोझ अपराध बोझ बन कर तुम्हें शान्ति और सुकून नहीं दे पा रहा है।"
"भाभी आप तो महान हैं इस लिए इस सबसे आप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।" अभय ने भारी स्वर में कहा__"किन्तु मैं आप जैसा महान नहीं हूॅ और ना ही मेरा हृदय इतना विशाल है कि उसमें किसी तरह के दुख सहजता से जज़्ब हो सकें। मैं तो बहुत ही छोटी बुद्धि और विचारों वाला हूॅ जिसे कोई भी ब्यक्ति जब चाहे और जैसे भी चाहे अपनी उॅगलियों पर नचा देता है। शायद इसी लिए तो....इसी लिए तो मैं समझ ही नहीं पाया कि कभी कभी जो दिखता है या जो सुनाई देता है वह सिरे से ग़लत भी हो सकता है।"
"ये तुम कैसी बातें कर रहे हो अभय?" गौरी ने दुखी भाव से कहा__"भगवान के लिए ऐसा कुछ मत कहो। अपने अंदर ऐसी ग्लानी मत पैदा करो और ना ही इन सबसे खुद को इस तरह दुखी करो।"
"मुझे कहने दीजिए भाभी।" अभय ने करुण भाव से कहा__"शायद ये सब कहने से मेरे अंदर की पीड़ा में कुछ इज़ाफा हो। आप तो मुझे सज़ा नहीं दे रही हैं तो कम से कम मैं खुद तो अपने आपको सज़ा और तकलीफ़ दे लूॅ। मुझे भी तो इसका एहसास होना चाहिए न भाभी कि जब हृदय को पीड़ा मिलती है तो कैसा लगता है? हमारे अपने जब अपनों को ही ऐसी तक़लीफ़ देते हैं तो उससे हमारी अंतर्आत्मा किस हद तक तड़पती है?"
"नहीं अभय नहीं।" गौरी ने रोते हुए अभय को एक बार फिर से खींच कर खुद से छुपका लिया, बोली__"ऐसी बातें मत करो। मैं नहीं सुन सकती तुम्हारी ये करुण बातें। मैंने तुम्हें अपने बेटे की तरह हमेशा स्नेह दिया है। भला, मैं अपने बेटे को कैसे इस तरह तड़पते हुए देख सकती हूॅ? हर्गिज़ नहीं....।"
देवर भाभी का ये प्यार ये स्नेह ये अपनापन आज ढूॅढ़ने से भी शायद कहीं न मिले। विराज और निधि आॅखों में नीर भरे उन्हें देखे जा रहे थे। कितनी ही देर तक गौरी अभय को खुद से छुपकाए रही। सचमुच इस वक्त ऐसा लग रहा था जैसे अभय दो दो बच्चों का बाप नहीं बल्कि कोई छोटा सा अबोध बालक हो।
"राज।" सहसा गौरी ने विराज की तरफ देख कर कहा__"तुम अपने चाचा जी को उनके रूम में ले जाओ। लम्बे सफर की थकान बहुत होगी। नहा धो कर फ्रेस हो जाएॅगे तो मन हल्का हो जाएगा।"
"जी माॅ।" विराज तुरंत ही सोफे से उठ कर अभय के पास पहुॅच गया। गौरी के ज़ोर देने पर अभय को विराज के साथ कमरे में जाना ही पड़ा।
जबकि अभय और विराज के जाने के बाद गौरी उठी और अपनी आॅखों से बहते हुए आॅसुओं को पोंछते हुए किचेन की तरफ बढ़ गई।
--------------------
हवेली में डोर बेल की आवाज़ सुनकर प्रतिमा ने जाकर दरवाजा खोला। दरवाजे के बाहर खड़े जिस चेहरे पर उसकी नज़र पड़ी उसे देख कर वह बुरी तरह चौंकी।
"अरे नैना तुम??" प्रतिमा का हैरत में डूबा हुआ स्वर__"आओ आओ अंदर आओ। आज इतने महीनों बाद तुम्हें देख कर मुझे बेहद खुशी हुई।"
दोस्तो ये नैना है....आप सबको तो बताया ही जा चुका है परिवार के सभी सदस्यों के बारे में। फिर भी अगर आप भूल गए हैं तो आप एक बार इस कहानी का पहला अपडेट चेक कर सकते हैं। पहले अपडेट में आपको पता चल जाएगा कि नैना कौन है?
नैना जैसे ही दरवाजे के अंदर आई प्रतिमा ने उसे अपने गले से लगा लिया। प्रतिमा ने महसूस किया कि नैना के हाव भाव बदले हुए हैं। प्रतिमा की बात का उसने मुख से कोई जवाब नहीं दिया था बल्कि वह सिर्फ हल्का सा मुस्कुराई थी। उसकी मुस्कान भी शायद बनावटी ही थी। क्योंकि चेहरे के भाव उसकी मुस्कान से बिलकुल अलग थे।
"दामाद जी कहाॅ हैं?" नैना से अलग होकर प्रतिमा ने दरवाजे के बाहर झाॅकने के बाद पूछा था।
"मैं अकेली ही आई हूॅ भाभी।" नैना ने अजीब भाव से कहा__"सब कुछ छोंड़ कर।"
"क्याऽऽ???" नैना की बात सुनकर प्रतिमा ने चौंकते हुए कहा__"सब कुछ छोंड़ कर से क्या मतलब है तुम्हारा??
"मैंने आदित्य को तलाक दे दिया है।" नैना ने कठोरता से कहा__"अब उससे और उसके घर वालों से मेरा कोई रिश्ता नहीं रहा।"
"त तलाऽऽक????" प्रतिमा बुरी तरह उछल पड़ी__"ये क्या कह रही हो तुम?"
"हाॅ भाभी।" नैना ने कहा__"मैने उस बेवफा को तलाक दे दिया है, और उससे सारे रिश्ते नाते तोड़ कर वापस अपने माॅ बाप व भइया भाभी के पास आ गई हूॅ।"
प्रतिमा की अजीब हालत हो गई उसकी बातें सुनकर। हैरत व अविश्वास से मुह फाड़े वह अपनी छोटी ननद नैना को अपलक देखे जा रही थी। फिर सहसा उसकी तंद्रा तब भंग हुई जब उसके कानों में अंदर से आई उसके पति अजय की आवाज़ गूॅजी। अंदर से अजय सिंह ने आवाज़ लगा कर पूछा था कि कौन आया है बाहर?
अजय सिंह की आवाज़ से प्रतिमा को होश आया जबकि नैना अपने हाॅथ में पकड़ा हुआ बड़ा सा बैग वहीं छोंड़ कर अंदर की तरफ भागी। नैना को इस तरह भागते देख प्रतिमा चौंकी फिर पलट कर पहले दरवाजे को बंद किया उसके बाद नैना के बैग को उठा अंदर की तरफ बढ़ गई।
उधर भागते हुए नैना ड्राइंग रूम में पहुॅची। उसी समय अजय सिंह भी अपने कमरे से इधर ही आता दिखा। नैना अपने बड़े भाई को देख एक पल को ठिठकी फिर तेज़ी से दौड़ती हुई जा कर अजय सिंह से लिपट गई।
"भइयाऽऽ।" नैना अजय से लिपट कर बुरी तरह रोने लगी थी। अजय सिंह उसे इस तरह देख पहले तो चौंका फिर उसे अपनी बाॅहों में ले प्यार व स्नेह से उसके सिर व पीठ पर हाॅथ फेरने लगा।
"अरे क्या हुआ तुझे?" अजय सिंह उसकी पीठ को सहलाते हुए बोला__"इस तरह क्यों रोये जा रही है तू?"
अजय सिंह के इस सवाल का नैना ने कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि वह ज़ार ज़ार वैसी ही रोती रही। नैना अपने भाई के सीने से कस के लगी हुई थी। ऐसा लगता था जैसे उसे इस बात का अंदेशा था कि अगर वह अपने भाई से अलग हो जाएगी तो कयामत आ जाएगी।
प्रतिमा भी तब तक पहुॅच गई थी। अपने भाई से लिपटी अपनी ननद को इस तरह रोते देख उसकी आॅखों में भी पानी आ गया। काफी देर तक यही आलम रहा। अजय सिंह ने उसे बड़ी मुश्किल से चुप कराया। फिर उसे उसके कंधे से पकड़ कर चलते हुए आया और उसे सोफे पर आराम से बैठा कर खुद भी उसके पास ही बैठ गया।
"प्रतिमा दामाद जी कहाॅ हैं?" फिर अजय ने प्रतिमा की तरफ देखते हुए पूछा__"उन्हें अपने साथ अंदर क्यों नहीं लाई तुम?"
"दामाद जी नहीं आए अजय।" प्रतिमा ने गंभीरता से कहा__"नैना अकेली ही आई है।"
"क्या???" अजय चौंका__"लेकिन क्यों? दामाद जी साथ क्यों नहीं आए? मेरी फूल जैसी बहन को अकेली कैसे आने दिया उन्होंने? रुको मैं अभी बात करता हू उनसे।"
"अब फोन करने की कोई ज़रूरत नहीं है अजय।" प्रतिमा ने कहा__"नैना अब हमारे पास ही रहेगी....।"
"हमारे पास ही रहेगी??" अजय चकराया, बोला__"इसका क्या मतलब हुआ भला?"
"वो...वो नैना ने दामाद जी को तलाक दे दिया है।" प्रतिमा ने धड़कते दिल के साथ कहा__"इस लिए अब ये यहीं रहेंगी।"
"व्हाऽऽट???" अजय सिंह सोफे पर बैठा हुआ इस तरह उछल पड़ा था जैसे उसके पिछवाड़े के नीचे सोफे का वह हिस्सा अचानक ही किसी बड़ी सी नोंकदार सुई में बदल गया हो, बोला__"ये सब क्या...ये तुम क्या कह रही हो प्रतिमा? नैना ने दामाद जी को तलाक दे दिया है? अरे लेकिन क्यों??"
प्रतिमा के कुछ बोलने से पहले ही नैना एक झटके से उठी और रोते हुए अंदर की तरफ भाग गई। अजय सिंह मूर्खों की तरह उसे जाते देखता रहा।
"प्रतिमा सच सच बताओ।" फिर अजय ने उद्दिग्नता से कहा__"आख़िर ऐसी क्या बात हो गई है जिसकी वजह से नैना ने दामाद जी को तलाक दे दिया है?"
"सारी बातें मुझे भी नहीं पता अजय।" प्रतिमा ने कहा__"नैना ने अभी कुछ भी नहीं बताया है इस बारे में।"
"उससे पूछो प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा__"उससे पूछो कि क्या मैटर है? उसने अपने पति को किस बात पर तलाक दे दिया है?"
"ठीक है मैं बात करती हूॅ उससे।" प्रतिमा कहने के साथ ही उठ कर उस दिशा की तरफ बढ़ गई जिधर नैना गई थी। जबकि अजय सिंह किसी गहरी सोच में डूबा नज़र आने लगा था।
---------------------
"मिस्टर चौहान।" हास्पिटल की गैलरी पर दीवार से सटी बेंच पर बैठे एक ऐसे शख्स के कानों से ये वाक्य टकराया जिसके चेहरे पर इस वक्त गहन परेशानी व दुख के भाव थे। उसने सिर उठा कर देखा। उसके सामने एक डाक्टर खड़ा उसी की तरफ संजीदगी से देख रहा था।
"मिस्टर चौहान।" डाक्टर ने कहा__"प्लीज आप मेरे साथ आइए।
मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बातें करनी है।"
"डाक्टर मेरी बेटी कैसी है अब?" बेन्च से एक ही झटके में उठते हुए उस शख्स ने हड़बड़ाहट से पूछा था__"वो अब ठीक तो है ना?"
"अब वो बिलकुल ठीक है मिस्टर चौहान लेकिन।" डाक्टर का वाक्य अधूरा रह गया।
"ल लेकिन क्या डाक्टर?" शख्स ने असमंजस से पूछा।
"आप प्लीज़ मेरे साथ आइए।" डाक्टर ने ज़ोर देकर कहा__"मुझे आपसे अकेले में बात करनी है। प्लीज़ कम हेयर...।"
कहने के साथ ही डाक्टर एक तरफ बढ़ गया। उसे जाते देख वो शख्स भी तेज़ी से उसके पीछे लपका। चेहरे पर हज़ारों तरह के भाव एक पल में ही गर्दिश करते नज़र आने लगे थे उसके। कुछ ही देर में डाक्टर के पीछे पीछे वह उसके केबिन में पहुॅचा।
"मिस्टर चौहान।" डाक्टर अपनी चेयर के पास पहुॅच कर तथा अपने सामने बड़ी सी टेबल के पार रखीं चेयर की तरफ हाथ के इशारे के साथ कहा__"हैव ए सीट प्लीज़।"
डाक्टर के कहने पर वो शख्स जिसे डाक्टर उसके सर नेम से संबोधित कर रहा था किसी यंत्रचालित सा आगे बढ़ा और एक हाथ से चेयर को पीछे कर उसमें बैठ गया। उसके बैठ जाने के बाद केबिन में दोनो के बीच कुछ देर के लिए ख़ामोशी छाई रही।
"कहो डाक्टर।" फिर खामोशी को चीरते हुए उस शख्स ने भारी स्वर में कहा__"क्या ज़रूरी बातें करनी थी आपको?"
"मिस्टर चौहान।" डाक्टर ने भूमिका बनाते हुए किन्तु संतुलित लहजे में कहा__"मैं चाहता हूॅ कि आप मेरी बातों को शान्ती और बड़े धैर्य के साथ सुनें।"
"आख़िर बात क्या है डाक्टर?" शख्स ने सहसा अंजाने भय से घबरा कर कहा था, बोला__"मुझे पता है कि मेरी बेटी के साथ किसी ने रेप किया है जिसकी वजह से उसकी आज ये हालत है। मैं धरती आसमान एक कर दूॅगा उस हरामज़ादे को ढूढ़ने में जिसने मेरी बेटी को आज इस हालत में पहुॅचाया है। उसे ऐसी मौत दूॅगा कि फरिश्ते भी देख कर थर थर काॅपेंगे।"
"प्लीज़ कंट्रोल योरसेल्फ मिस्टर चौहान प्लीज।" डाक्टर ने कहा__"आपको इसके आगे जो भी करना हो आप करते रहियेगा, लेकिन उसके पहले शान्ती और धैर्य के साथ आप मेरी बातें सुन लीजिए।"
"ठीक है कहिए।" उस शख्स ने गहरी साॅस ली।
"ये तो आप जानते ही हैं कि आपकी बेटी के साथ क्या हुआ है।" डाक्टर ने कहा__"पर ये आधा सच है।"
"क्या मतलब?" चौहान चौंका।
"आपकी बेटी के साथ एक से ज्यादा लोगों ने रेप की वारदात को अंजाम दिया है?" डाक्टर ने संजीदगी से कहा__"उसने खुद शराब पी थी या फिर उसे पिलाई गई थी। ऐसी शराब जिसमें ड्रग्स मिला हुआ था। इससे यही साबित होता है कि ये सब जिन लोगों ने भी किया है पहले से ही सोच समझकर किया है।"
"ये आप क्या कह रहे हैं डाक्टर?" चौहान की हालत खराब थी, बोला__"मेरी बेटी के साथ इतना कुछ किया उन हरामज़ादों ने।"
"ये सब तो कुछ भी नहीं है।" डाक्टर ने गंभीरता से कहा__"बल्कि अब जो बात मैं आपको बताना चाहता हूॅ वो बहुत ही गंभीर बात है।
मैं चाहता हूॅ कि आप मेरी उस बात को सुनकर अपना धैर्य नहीं खोएंगे।"
"आख़िर ऐसी क्या बात है डाक्टर?" चौहान हतोत्साहित सा बोला__"क्या कहना चाहते हैं आप? साफ साफ बताओ क्या बात है?"
"आपकी बेटी प्रेग्नेन्ट है।" डाक्टर ने मानो धमाका सा किया था__"वह भी दो महीने की।"
"क्याऽऽ????" चेयर पर बैठा चौहान ये सुन कर उछल पड़ा था, बोला__"ये आप क्या कह रहे हैं डाक्टर? ऐसा कैसे हो सकता है?"
"इस बारे में भला मैं कैसे बता सकता हूॅ मिस्टर चौहान?" डाक्टर ने कहा__"ये तो आपकी बेटी को ही पता होगा। मैंने तो आपको वही बताया है जो आपकी बेटी की जाॅच से हमें पता चला है।"
चौहान भौचक्का सा डाक्टर को देखता रह गया था। उसके दिलो दिमाग़ में अभी तक धमाके हो रहे थे। असहाय अवस्था में बैठा रह गया था वह।
तभी केबिन का गेट खुला और एक नर्स अंदर दाखिल हुई।
"सर वो पुलिस बाहर आपका इन्तज़ार कर रही है।" नर्स ने डाक्टर की तरफ देख कर कहा था।
"ठीक है हम आते हैं।" डाक्टर ने उससे कहा फिर चौहान की तरफ देख कर कहा__"मिस्टर चौहान आइए चलते हैं।"
उसके बाद दोनो केबिन के बाहर आ गए। चौहान के चेहरे से ही लग रहा था कि वह दुखी है, किन्तु अपने इस दुख को वह जज़्ब करने की कोशिश कर रहा था।
बाहर गैलरी में आते ही डाक्टर को पुलिस के कुछ शिपाही दिखाई दिये। वह चौहान के साथ चलता हुआ रिसेशन पर पहुॅचा। जहाॅ पर इंस्पेक्टर की वर्दी में रितू खड़ी थी। सिर पर पी-कैप व दाहिने हाॅथ में पुलिसिया रुल था जिसे वह कुछ पलों के अन्तराल में अपनी बाॅई हथेली पर हल्के से मार रही थी।
"हैलो इंस्पेक्टर।" डाक्टर रितू के पास पहुॅचते ही बोला था।
"क्या उस लड़की को होश आ गया डाक्टर?" रितू ने पुलिसिया अंदाज़ में पूछा__"मुझे उसका स्टेटमेन्ट लेना है।"
"मिस रितू।" डाक्टर ने कहा__"बस कुछ ही समय में उसे होश आ जाएगा फिर आप उसका बयान ले सकती हैं।" डाक्टर ने कहने के साथ ही चौहान की तरफ इशारा करते हुए कहा__"ये उस लड़की के पिता हैं। मिस्टर शैलेन्द्र चौहान।"
"ओह आई सी।" रितू ने चौहान की तरफ देखते हुए कहा__"मुझे दुख है अंकल कि आपकी बेटी के साथ ऐसा हादसा हुआ?"
"सब भाग्य की बातें हैं बेटा।" चौहान ने हारे हुए खिलाड़ी की तरह बोला__"हम चाहे सारी ऊम्र सबके साथ अच्छा करते रहें और सबका अच्छा भला सोचते रहें लेकिन हमें हमारे भाग्य से जो मिलना होता है वो मिल ही जाता है।"
"हाॅ ये तो है अंकल।" रितू ने कहा__"ख़ैर, आपकी बेटी का ये केस फाइल हो चुका है, बस आपके साइन की ज़रूरत है। लड़की के बयान के बाद पुलिस इस केस को अच्छी तरह देख लेगी। जिसने भी इस घिनौने काम को अंजाम दिया है उसको बहुत जल्द जेल की सलाखों के पीछे अधमरी अवस्था में पाएंगे आप।
"
"उससे क्या होगा बेटी?" चौहान ने गंभीरता से कहा__"क्या वो सब वापस हो जाएगा जो लुट गया या बरबाद हो गया है?"
"आप ये कैसी बातें कर रहे हैं अंकल?" रितू ने हैरत से कहा__"क्या आप नहीं चाहते कि जिसने भी आपकी बेटी के साथ ये किया है उसे कानून के द्वारा शख्त से शख्त सज़ा मिले?"
"उसे कानून नहीं।" चौहान के चेहरे पर अचानक ही हाहाकारी भाव उभरे__"उसे मैं खुद अपने हाथों से सज़ा दूॅगा। तभी मेरी और मेरी बेटी की आत्मा को शान्ती मिलेगी।"
"तो क्या आप कानून को हाथ में लेंगे?" रितू ने कहा__"नहीं अंकल, ये पुलिस केस है और उसे कानूनन ही सज़ा प्राप्त होगी।"
"तुम अपना काम करो बेटी।" चौहान ने कहा__"और मुझे मेरा काम अपने तरीके से करना है।"
तभी वहाॅ पर एक नर्स आई। उसने बताया कि उस लड़की को होश आ गया है और उसे दूसरे रूम में शिफ्ट कर दिया गया है। नर्स की बात सुनकर डाक्टर ने रितू को उससे बयान लेने की परमीशन दी किन्तु ये भी कहा कि पेशेन्ट को ज्यादा किसी बात के लिए मजबूर न करें। चौहान साथ में जाना चाहता था किन्तु रितू ने ये कह कर उसे रोंक लिया कि ये पुलिस केस है इस लिए पहले पुलिस उससे मिलेगी और उसका बयान लेगी।
इंस्पेक्टर रितू अपने साथ एक महिला शिपाही को लिए उस कमरे में पहुॅची जिस कमरे में उस लड़की को शिफ्ट किया गया था। डाक्टर खुद भी साथ आया था। किन्तु फिर एक नर्स को कमरे में छोंड़ कर वह बाहर चला गया था।
हास्पिटल वाले बेड पर लेटी वह लड़की आॅखें बंद किये लेटी थी। ये अलग बात है कि उसकी बंद आॅखों की कोरों से आॅसूॅ की धार सी बहती दिख रही थी। उसके शरीर का गले से नीचे का सारा हिस्सा एक चादर से ढ्का हुआ था। कमरे में कुछ लोगों के आने की आहट से भी उसने अपनी आॅखें नहीं खोली थी। बल्कि उसी तरह पुर्वत् लेटी रही थी वह।
"अब कैसी तबियत है तुम्हारी?" रितू उसके करीब ही एक स्टूल पर बैठती हुई बोली थी। उसके इस प्रकार पूॅछने पर लड़की ने अपनी आॅखें खोली और रितू की तरफ चेहरा मोड़ कर देखा उसे। रितू पर नज़र पड़ते ही उसकी आॅखों में हैरत के भाव उभरे। ये बात रितू ने भी महसूस की थी।
"अब कैसा फील कर रही हो?" रितु ने पुनः उसकी तरफ देख कर किन्तु इस बार हल्के से मुस्कुराते हुए पूछा__"अगर अच्छा फील कर रही हो तो अच्छी बात है। मुझे तुमसे इस वारदात के बारे में कुछ पूछताॅछ करनी है। लेकिन उससे पहले मैं तुम्हें ये बता दूॅ कि तुम्हें मुझसे भयभीत होने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं भी तुम्हारी तरह एक लड़की ही हूॅ और हाॅ तुम मुझे अपनी दोस्त समझ सकती हो, ठीक है ना?"
लड़की के चेहरे पर कई सारे भाव आए और चले भी गए। उसने रितू की बातों का अपनी पलकों को झपका कर जवाब दिया।
"ओके, तो अब तुम मुझे सबसे पहले अपना नाम बताओ।" रितू ने मुस्कुरा कर कहा।
"वि वि...विधी।" उस लड़की के थरथराते होठों से आवाज़ आई।
उसका नाम सुन कर रितू को झटका सा लगा। मस्तिष्क में जैसे बम्ब सा फटा था। चेहरे पर एक ही पल में कई तरह के भाव आए और फिर लुप्त हो गए। रितू ने सीघ्र ही खुद को नार्मल कर लिया।
"ओह....कितना खूबसूरत सा नाम है तुम्हारा।" रितू ने कहा। उसके दिमाग़ में कुछ और ही ख़याल था, बोली__"विधी...विधी चौहान, राइट?"
लड़की की आॅखों में एक बार पुनः चौंकने के भाव आए थे। एकाएक ही उसका चेहरा सफेद फक्क सा पड़ गया था। चेहरे पर घबराहट के चिन्ह नज़र आए। उसने अपनी गर्दन को दूसरी तरफ मोड़ लिया।
"तो विधी।" रितू ने कहा__"अब तुम मुझे बेझिझक बताओ कि क्या हुआ था तुम्हारे साथ?"
रितू की बात पर विधी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वह दूसरी तरफ मुह किये लेटी रही। जबकि उसकी ख़ामोशी को देख कर रितू ने कहा__"देखो ये ग़लत बात है विधी। अगर तुम कुछ बताओगी नहीं तो मैं कैसे उस अपराधी को सज़ा दिला पाऊॅगी जिसने तुम्हारी यानी मेरी दोस्त की ऐसी हालत की है? इस लिए बताओ मुझे....सारी बातें विस्तार से बताओ कि क्या और कैसे हुआ था?"
"मु मुझे कुछ नहीं पता।" विधी ने दूसरी तरफ मुह किये हुए ही कहा__"मैं नहीं जानती कि किसने कब कैसे मेरे साथ ये सब किया?"
"तुम झूॅठ बोल रही विधी।" रितू की आवाज़ सहसा तेज़ हो गई__"भला ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम्हारे साथ इतना कुछ हुआ और तुम्हें इस सबके बारे में थोड़ा सा भी पता न हुआ हो?"
"भला मैं झूॅठ क्यों बोलूॅगी आपसे?" विधी ने इस बार रितू की तरफ पलट कर कहा था।
"हाॅ लेकिन सच भी तो नहीं बोल रही हो तुम?" रितू ने कहा__"आख़िर वो सब बताने में परेशानी क्या है? देखो अगर तुम नहीं बताओगी तो सच जानने के लिए पुलिस के पास और भी तरीके हैं। कहने का मतलब ये कि, हम ये पता लगा ही लेंगे कि तुम्हारे साथ ये सब किसने किया है?"
बेड पर लेटी विधी के चेहरे पर असमंजस व बेचैनी के भाव उभरे। कदाचित् समझ नहीं पा रही थी कि वह रितू की बातों का क्या और कैसे जवाब दे?
"तुम्हारे चेहरे के भाव बता रहे हैं विधी कि तुम मेरे सवालों से बेचैन हो गई हो।" रितू ने कहा__"तुम जानती हो कि तुम्हारे साथ ये सब किसने किया है। लेकिन बताने में शायद डर रही हो या फिर हिचकिचा रही हो।"
विधी ने कमरे में मौजूद लेडी शिपाही व नर्स की तरफ एक एक दृष्टि डाली फिर वापस रितू की तरफ दयनीय भाव से देखने लगी। रितू को उसका आशय समझते देर न लगी। उसने तुरंत ही लेडी शिपाही व नर्स को बाहर जाने का इशारा किया। नर्स ने बाहर जाते हुए इतना ही कहा कि पेशेन्ट को किसी बात के लिए ज्यादा मजबूर मत कीजिएगा क्योंकि इससे उसके दिलो दिमाग़ पर बुरा असर पड़ सकता है। नर्स तथा लेडी शिपाही के बाहर जाने के बाद रितू ने पलट कर विधी की तरफ देखा।
"देखो विधी, अब इस कमरे में हम दोनो के सिवा दूसरा कोई नहीं है।
" रितू ने प्यार भरे लहजे से कहा__"अब तुम मुझे यानी अपनी दोस्त को बता सकती हो कि ये सब तुम्हारे साथ कब और किसने किया है?"
"क..क कल मैं अपने एक दोस्त की बर्थडे पार्टी में गई थी।" विधी ने मानो कहना शुरू किया, उसकी आवाज़ में लड़खड़ाहट थी__"वहाॅ पर हमारे काॅलेज की कुछ और लड़कियाॅ थी जो हमारे ही ग्रुप की फ्रैण्ड्स थी और साथ में कुछ लड़के भी। पार्टी में सब एंज्वाय कर रहे थे। मेरी दोस्त परिधि ने मनोरंजन का सारा एरेन्जमेन्ट किया हुआ था। जिसमें बियर और शराब भी थी। दोस्त के ज़ोर देने पर मैंने थोड़ा बहुत बियर पिया था। लेकिन मुझे याद है कि उस बियर से मैने अपना होश नहीं खोया था। हम सब डान्स कर रहे थे, तभी मेरी एक फ्रैण्ड ने मेरे हाॅथ में काॅच का प्याला पकड़ाया और मस्ती के ही मूड में मुझे पीने का इशारा किया। मैंने भी मुस्कुरा कर उसके दिये हुए प्याले को अपने मुह से लगा लिया और उसे धीरे धीरे करके पीने लगी। किन्तु इस बार इसका टेस्ट पहले वाले से अलग था। फिर भी मैंने उसे पी लिया। कुछ ही देर बाद मेरा सर भारी होने लगा। वहाॅ की हर चीज़ मुझे धुंधली सी दिखने लगी थी। उसके बाद मुझे नहीं पता कि किसने मेरे साथ क्या किया? हाॅ बेहोशी में मुझे असह पीड़ा का एहसास ज़रूर हो रहा था, इसके सिवा कुछ नहीं। जब मुझे होश आया तो मैंने अपने आपको यहाॅ हास्पिटल में पाया। मुझे नहीं पता कि यहाॅ पर मैं कैसे आई? लेकिन इतना जान चुकी हूॅ कि मेरा सबकुछ लुट चुका है, मैं किसी को मुह दिखाने के काबिल नहीं रही।"
इतना सब कहने के साथ ही विधी बेड पर पड़े ही ज़ार ज़ार रोने लगी थी। उसकी आॅखों से आॅसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। इंस्पेक्टर रितू उसकी बात सुनकर पहले तो हैरान रही फिर उसने उसे बड़ी मुश्किल से शान्त कराया।
"तुम्हें यहाॅ पर मैं लेकर आई थी विधी।" रितू ने गंभीरता से कहा__"पुलिस थाने में किसी अंजान ब्यक्ति ने फोन करके हमें सूचित कर बताया कि शहर से बाहर मेन सड़क के नीचे कुछ दूरी पर एक लड़की बहुत ही गंभीर हालत में पड़ी है। वो जगह हल्दीपुर की अंतिम सीमा के पास थी, जहाॅ से हम तुम्हें उठा कर यहाॅ हास्पिटल लाए थे।"
"ये आपने अच्छा नहीं किया।" विधी ने सिसकते हुए कहा__"उस हालत में मुझे वहीं पर मर जाने दिया होता। कम से कम उस सूरत में मुझे किसी के सामने अपना मुह तो न दिखाना पड़ता। मेरे घर वाले, मेरे माता पिता को मुझे देख कर शर्म से अपना चेहरा तो न झुका लेना पड़ता।"
"देखो विधी।" रितू ने समझाने वाले भाव से कहा__"इस सबमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है और ये बात तुम्हारे पैरेन्ट्स भी जानते और समझते हैं। ग़लती जिनकी है उन्हें इस सबकी शख्त से शख्त सज़ा मिलेगी। तुम्हारे साथ ये अत्याचार करने वालों को मैं कानून की सलाखों के पीछे जल्द ही पहुचाऊॅगी।"
विधी कुछ न बोली।
वह बस अपनी आॅखों में नीर भरे देखती रही रितू को। जबकि,,
"अच्छा ये बताओ कि तुम्हारी दोस्त की पार्टी में उस वक्त कौन कौन मौजूद था जिनके बारे में तुम जानती हो?" रितू ने पूछा__"साथ ही ये भी बताओ कि तुम्हें उनमें से किन पर ये शक़ है कि उन्होने तुम्हारे साथ ऐसा किया हो सकता है? तुम बेझिझक होकर मुझे उन सबका नाम पता बताओ।"
विधी कुछ देर सोचती रही फिर उसने पार्टी में मौजूद कुछ लड़के लड़कियों के बारे में रितू को बता दिया। रितू ने एक काग़ज पर उन सबका नाम पता लिख लिया। उसके बाद कुछ और पूछताछ करने के बाद रितू कमरे से बाहर आ गई।
रितू को डाक्टर ने बताया कि वो लड़की दो महीने की प्रैग्नेन्ट है। ये सुन कर रितू बुरी तरह चौंकी थी। हलाॅकि मिस्टर चौहान ने डाक्टर को मना किया था कि ये बात वह किसी को न बताए। किन्तु डाक्टर ने अपना फर्ज़ समझ कर पुलिस के रूप में रितू को बता दिया था।
रितू ने मिस्टर चौहान को एक बार थाने में आने का कह कर हास्पिटल से निकल गई थी। उसके मस्तिष्क में एक ही ख़याल उछल कूद मचा रहा था कि 'क्या ये वही विधी है जिसे विराज प्यार करता था'???? रितू ने कभी विधी को देखा नहीं था, और नाही उसके बारे में उसके भाई विराज ने कभी बताया था। उसे तो बस कहीं से ये पता चला था कि उसका भाई विराज किसी विधी नाम की लड़की से प्यार करता है। इस लिए आज जब उसने उस लड़की के मुख से उसका नाम विधी सुना तो उसके दिमाग़ में तुरंत ही उस विधी का ख़याल आ गया जिस विधी नाम की लड़की से उसका भाई प्यार करता है। रितु के मन में पहले ये विचार ज़रूर आया कि वह एक बार उससे ये जानने की कोशिश करे कि क्या वह विराज को जानती है? लेकिन फिर उसने तुरंत ही अपने मन में आए इस विचार के तहत उससे इस बारे में पूछने का ख़याल निकाल दिया। उसे लगा ये वक्त अभी इसके लिए सही नहीं है।
-------------------
रात में डिनर करने के बाद एक बार फिर से सब ड्राइंग रूम में एकत्रित हुए। अभय किसी सोच में डूबा हुआ था। गौरी ने उसे सोच में डूबा देख कर कहा__"करुणा और बच्चे कैसे हैं अभय?"
"आं..हाॅ सब ठीक हैं भाभी।" अभय ने चौंकते हुए कहा था।
"शगुन कैसा है?" गौरी ने पूछा__"क्या अभी भी वैसी ही शरारतें करता है वह? करुणा तो उसकी शरारतों से परेशान हो जाती होगी न? और...और मेरी बेटी दिव्या कैसी है...उसकी पढ़ाई कैसी चल रही है?"
"सब अच्छे हैं भाभी।" अभय ने नज़रें चुराते हुए कहा__"दिव्या की पढ़ाई भी अच्छी चल रही है।"
"क्या बात है?" गौरी उसे नज़रें चुराते देख चौंकी__"तुम मुझसे क्या छुपा रहे हो अभय? घर में सब ठीक तो हैं ना? मुझे बताओ अभय....मेरा दिल घबराने लगा है।"
"कोई ठीक नहीं है भाभी कोई भी।" अभय के अंदर से मानो गुबार फट पड़ा__"हवेली में कोई भी ठीक नहीं हैं। करुणा और बच्चों को मैं करुणा के मायके भेज कर ही यहाॅ आया हूॅ। इस समय घर के हालात बहुत ख़राब हैं भाभी।
किसी पर भरोसा करने लायक नहीं रहा अब।"
"आख़िर हुआ क्या है अभय?" गौरी के चेहरे पर चिन्ता के भाव उभर आए__"साफ साफ बताते क्यों नहीं?"
सामने सोफे पर बैठे विराज और निधि भी परेशान हो उठे थे। दिल किसी अंजानी आशंकाओं से धड़कने लगा था उनका।
"क्या बताऊॅ भाभी?" अभय ने असहज भाव से कहा__"मुझे तो बताने में भी आपसे शरम आती है।"
"क्या मतलब?" गौरी ही नहीं बल्कि अभय की इस बात से विराज और निधि भी बुरी तरह चौंके थे।
"एक दिन की बात है।" फिर अभय कहता चला गया। उसने वो सारी बातें बताई जो शिवा ने किया था। उसने बताया कि कैसे शिवा उसके न रहने पर उसके घर आया था और अपनी चाची को बाथरूम में नहाते देखने की कोशिश कर रहा था। इस सबके बाद कैसे करुणा ने आत्म हत्या करने की कोशिश की थी। अभय ये सब बताए जा रहा था और बाॅकी सब आश्चर्य से मुह फाड़े सुनते जा रहे थे।
"हे भगवान।" गौरी ने रोते हुए कहा__"ये सब क्या हो गया? मेरी फूल सी बहन को भी नहीं बक्शा उस नासपीटे ने।"
"ये तो कुछ भी नहीं है भाभी।" अभय ने भारी स्वर में कहा__"उस हरामज़ादे ने तो आपकी बेटी दिव्या पर भी अपनी गंदी नज़रें डालने में कोई संकोच नहीं किया।"
"क्या?????" गौरी उछल पड़ी।
"हाॅ भाभी।" अभय ने कहा__"ये बात खुद दिव्या ने मुझे बताई थी।"
"जैसे माॅ बाप हैं वैसा ही तो बेटा होगा।" गौरी ने कहा__"माॅ बाप खुद ही अपने बेटे को इस राह पर चलने की शह दे रहे हैं अभय।"
"क्या मतलब?" इस बार बुरी तरह उछलने की बारी अभय की थी, बोला__"ये आप क्या कह रही हैं?"
"यही सच है अभय।" गौरी ने गंभीरता से कहा__"आपके बड़े भाई साहब और भाभी बहुत ही शातिर और घटिया किस्म के हैं। तुम उनके बारे में कुछ नहीं जानते। लेकिन मैं और माॅ बाबू जी उनके बारे में अच्छी तरह जानते हैं। तुम्हें तो वही बताया और दिखाया गया जो उन्होंने गढ़ कर तुम्हें दिखाना था। ताकि तुम उनके खिलाफ न जा सको।"
"उस हादसे के बाद से मुझे भी ऐसा ही कुछ लगने लगा है भाभी।" अभय ने बुझे स्वर में कहा__"उस हादसे ने मेरी आॅखें खोल दी। तथा मुझे इस सबके बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। इसी लिए तो मैं सारी बातों को जानने के लिए आप सबके पास आया हूॅ। मुझे दुख है कि मैंने सारी बातें पहले ही आप सबसे जानने की कोशिश क्यों नहीं की? अगर ये सब मैने पहले ही पता कर लिया होता तो आप सबको इतनी तक़लीफ़ें नहीं सहनी पड़ती। मैं आप सबके लिए बड़े भइया भाभी से लड़ता और उन्हें उनके इस कृत्य की सज़ा भी देता।"
"तुम उनका कुछ भी न कर पाते अभय।" गौरी ने कहा__"बल्कि अगर तुम उनके रास्ते का काॅटा बनने की कोशिश करते तो वो तुम्हें भी उसी तरह अपने रास्ते से हमेशा हमेशा के लिए हटा देते जैसे उन्होंने राज के पिता को हटा दिया था।"
"क्या???????" अभय बुरी तरह उछला था, बोला__"मॅझले भइया को.....???"
"हाॅ अभय।
" गौरी की आॅखें छलक पड़ी__"तुम सब यही समझते हो कि तुम्हारे मॅझले भइया की मौत खेतों में सर्प के काटने से हुई थी। ये सच है लेकिन ये सब सोच समझ कर किया गया था। वरना ये बताओ कि खेत पर बने मकान के कमरे में कोई सर्प कहाॅ से आ जाता और उन्हें डस कर मौत दे देता? सच तो ये है कि कमरे में लेटे तुम्हारे भइया को सर्प से कटाया गया और जब वो मृत्यु को प्राप्त हो गए तो उन्हें कमरे से उठा कर खेतों के बीच उस जगह डाल दिया गया जिस जगह खेत में पानी लगाया जा रहा था। ये सब इस लिए किया गया ताकि सबको यही लगे कि खेतों में पानी लगाते समय ही तुम्हारे भइया को किसी ज़हरीले सर्प ने काटा और वहीं पर उनकी मृत्यु हो गई।"
"हे भगवान।" अभय अपने दोनो हाथों को सिर पर रख कर रो पड़ा__"मेरे देवता जैसे भाई को इन अधर्मियों ने इस तरह मार दिया था। नहीं छोंड़ूॅगा....ज़िंदा नहीं छोड़ूॅगा उन लोगों को मैं।"
"नहीं अभय।" गौरी ने कहा__"उन्हें उनके कुकर्मों की सज़ा ज़रूर मिलेगी।"
"पर ये सब आपको कैसे पता भाभी कि मॅझले भइया को इन लोगों ने ही सर्प से कटवा कर मारा था?" अभय ने पूछा__"और वो सब भी बताइए भाभी जो इन लोगों ने आपके साथ किया है? मैं जानना चाहता हूॅ कि इन लोगों ने मेरे देवी देवता जैसे भइया भाभी पर क्या क्या अनाचार किये हैं? मैं जानना चाहता हूॅ कि शेर की खाल ओढ़े इन भेड़ियों का सच क्या है?"
"मैं जानती हूॅ कि तुम जाने बग़ैर रहोगे नहीं अभय।" गौरी ने गहरी साॅस ली__"और तुम्हें जानना भी चाहिए। आख़िर हक़ है तुम्हारा।"
"तो फिर बताइए भाभी।" अभय ने उत्सुकता से कहा__"मुझे इन लोगों का घिनौना सच सुनना है।"
अभय की बात सुन कर गौरी ने एक गहरी साॅस ली। उसके चेहरे पर अनायास ही ऐसे भाव उभर आए थे जैसे अपने आपको इस परिस्थिति के लिए तैयार कर रही हो।
--------------------
प्रतिमा हवेली में ऊपरी हिस्से पर बने उस कमरे में पहुॅची जिस कमरे के बेड पर इस वक्त नैना औंधी पड़ी सिसकियाॅ ले लेकर रोये जा रही थी। प्रतिमा उसे इस तरह रोते देख उसके पास पहुॅची और बेड के एक साइड बैठ कर उसे उसके कंधों से पकड़ अपनी तरफ खींच कर पलटाया। नैना ने पलटने के बाद जैसे ही अपनी भाभी को देखा तो झटके से उठ कर उससे लिपट कर रोने लगी। प्रतिमा ने किसी तरह उसे चुप कराया।
"शान्त हो जाओ नैना।" प्रतिमा ने गंभीरता से कहा__"और मुझे बताओ कि आख़िर ऐसा क्या हुआ है जिसकी वजह से तुमने दामाद जी को तलाक दे दिया है? देखो पति पत्नी के बीच थोड़ी बहुत अनबन तो होती ही रहती है। इस लिए इसमें तलाक दे देना कोई समझदारी नहीं है। बल्कि हर बात को तसल्ली से और समझदारी से सुलझाना चाहिए।"
"भाभी इसमे मेरी कहीं भी कोई ग़लती नहीं है।" नैना ने दुखी भाव से कहा__"मैं तो हमेशा ही आदित्य को दिलो जान से प्यार करती रही थी।
सब कुछ ठीक ठाक ही था लेकिन पिछले छः महीने से हमारे बीच संबंध ठीक नहीं थे। इसकी वजह ये थी आदित्य किसी दूसरी लड़की से संबंध रखने लगे थे। जब मुझे इस बात का पता चला और मैंने उनसे इस बारे में बात की तो वो मुझ पर भड़क गए। कहने लगे कि मैं बाॅझ हूॅ इस लिए अब वो मुझसे कोई मतलब नहीं रखना चाहते हैं। मैने उनसे हज़ारो बार कहा कि अगर मैं बाॅझ हूॅ तो मुझे एक बार डाक्टर को दिखा दीजिए। पर वो मेरी सुनने को तैयार ही नहीं थे। तब मैने खुद एक दिन डाक्टर से चेक अप करवाया। बाद में डाक्टर ने कहा कि मैं बिलकुल ठीक हूॅ यानी बाॅझ नहीं हूॅ। मैंने डाक्टर की वो रिपोर्ट लाकर उन्हें दिखाया और कहा कि मैं बाॅझ नहीं हूॅ। बल्कि बच्चे पैदा कर सकती हूॅ। इस लिए एक बार आप भी अपना चेक अप करवा लीजिए। मेरी इस बात से वो गुस्सा हो गए और मुझे गालियाॅ देने लगे। कहने लगे कि तू क्या कहना चाहती है कि मैं ही नामर्द हूॅ? बस भाभी इसके बाद तो पिछले छः महीने से यही झगड़ा चलता रहा हमारे बीच। इस सबका पता जब मेरे सास ससुर को चला तो वो भी अपने बेटे के पक्ष में ही बोलने लगे और मुझे उल्टा सीधा बोलने लगे। अब आप ही बताइए भाभी मैं क्या करती? ऐसे पति और ससुराल वालों के पास मैं कैसे रह सकती थी? इस लिए जब मुझमें ज़ुल्म सहने की सहन शक्ति न रही तो तंग आकर एक दिन मैने उन्हें तलाक दे दिया।"
नैना की सारी बातें सुनने के बाद प्रतिमा भौचक्की सी उसे देखती रह गई। काफी देर तक कोई कुछ न बोला।
"ये तो सच में बहुत ही गंभीर बात हो गई नैना।" फिर प्रतिमा ने गहरी साॅस लेकर कहा__"तो क्या आदित्य ने तलाक के पेपर्स पर अपने साइन कर दिये?"
"पहले तो नहीं कर रहा था।" नैना ने अधीरता से कहा__"फिर जब मैंने ये कहा कि मेरे भइया भाभी खुद भी एक वकील हैं और वो जब आपको कोर्ट में घसीट कर ले जाएॅगे तब पता चलेगा उन्हें। कोर्ट में सबके सामने मैं चीख चीख कर बताऊॅगी कि आदित्य सिंह नामर्द है और बच्चा पैदा नहीं कर सकता तब तुम्हारी इज्जत दो कौड़ी की भी नहीं रह जाएगी। बस मेरे इस तरह धमकाने से उसने फिर तलाक के पेपर्स पर अपने साइन किये थे।"
"लेकिन मुझे ये समझ में नहीं आ रहा कि तुम्हें इस बात का पता पहले क्यों नहीं चला कि आदित्य नामर्द है?" प्रतिमा ने उलझन में कहा__"बल्कि ये सब अब क्यों हुआ? क्या आदित्य का पेनिस बहुत छोटा है या फिर उसके पेनिस में इरेक्शन नहीं होता? आख़िर प्राब्लेम क्या है उसमें?"
"और सबकुछ ठीक है भाभी।" नैना ने सिर झुकाते हुए कहा__"लेकिन मुझे लगता है कि उसके स्पर्म में कमी है। जिसकी वजह से बच्चा नहीं हो पा रहा है। मैंने बहुत कहा कि एक बार वो डाक्टर से चेक अप करवा लें लेकिन वो इस बात को मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं।"
"ओह, चलो कोई बात नहीं।
" प्रतिमा ने उसके चेहरे को सहलाते हुए कहा__"अब तुम फ्रेश हो जाओ तब तक मैं तुम्हारे लिए गरमा गरम खाना तैयार कर देती हूॅ।"
नैना ने सिर को हिला कर हामी भरी। जबकि प्रतिमा उठ कर कमरे से बाहर निकल गई। बाहर आते ही वह चौंकी क्योंकि अजय सिंह दरवाजे की बाहरी साइड दीवार से चिपका हुआ खड़ा था। प्रतिमा को देख कर वह अजीब ढंग से मुस्कुराया और फिर प्रतिमा के साथ ही नीचे चला गया।
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट..........《 28 》
अब तक,,,,,,,
"पहले तो नहीं कर रहा था।" नैना ने अधीरता से कहा__"फिर जब मैंने ये कहा कि मेरे भइया भाभी खुद भी एक वकील हैं और वो जब आपको कोर्ट में घसीट कर ले जाएॅगे तब पता चलेगा उन्हें। कोर्ट में सबके सामने मैं चीख चीख कर बताऊॅगी कि आदित्य सिंह नामर्द है और बच्चा पैदा नहीं कर सकता तब तुम्हारी इज्जत दो कौड़ी की भी नहीं रह जाएगी। बस मेरे इस तरह धमकाने से उसने फिर तलाक के पेपर्स पर अपने साइन किये थे।"
"लेकिन मुझे ये समझ में नहीं आ रहा कि तुम्हें इस बात का पता पहले क्यों नहीं चला कि आदित्य नामर्द है?" प्रतिमा ने उलझन में कहा__"बल्कि ये सब अब क्यों हुआ? क्या आदित्य का पेनिस बहुत छोटा है या फिर उसके पेनिस में इरेक्शन नहीं होता? आख़िर प्राब्लेम क्या है उसमें?"
"और सबकुछ ठीक है भाभी।" नैना ने सिर झुकाते हुए कहा__"लेकिन मुझे लगता है कि उसके स्पर्म में कमी है। जिसकी वजह से बच्चा नहीं हो पा रहा है। मैंने बहुत कहा कि एक बार वो डाक्टर से चेक अप करवा लें लेकिन वो इस बात को मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं।"
"ओह, चलो कोई बात नहीं।" प्रतिमा ने उसके चेहरे को सहलाते हुए कहा__"अब तुम फ्रेश हो जाओ तब तक मैं तुम्हारे लिए गरमा गरम खाना तैयार कर देती हूॅ।"
नैना ने सिर को हिला कर हामी भरी। जबकि प्रतिमा उठ कर कमरे से बाहर निकल गई। बाहर आते ही वह चौंकी क्योंकि अजय सिंह दरवाजे की बाहरी साइड दीवार से चिपका हुआ खड़ा था। प्रतिमा को देख कर वह अजीब ढंग से मुस्कुराया और फिर प्रतिमा के साथ ही नीचे चला गया।
-------------------
अब आगे,,,,,,,
गौरी को एक दम से चुप और कुछ सोचते हुए देख अभय सिंह से रहा न गया। उसके चेहरे पर बेचैनी और उत्सुकता प्रतिपल बढ़ती ही चली जा रही।
"आप चुप क्यों हो गईं भाभी?" अभय ने अधीरता से कहा__"बताइये न, मेरे मन में वो सब कुछ जानने की तीब्र उत्सुकता जाग उठी है। मैं जल्द से जल्द सब कुछ आपसे जानना चाहता हूॅ।"
अभय की उत्सुकता और बेचैनी देख गौरी के चेहरे पर अजीब से भाव उभरे तथा गुलाब की कोमल कोमल पंखुड़ियों जैसे होठों पर फीकी सी मुस्कान उभर आई। उसने अभय की तरफ देखने के बाद अपने सामने कहीं शून्य में देखने लगी।
"तुम मेरे बच्चों की तरह ही हो।
" गौरी शून्य में घूरते हुए ही बोली__"और कोई भी माॅ अपने बच्चों के सामने या फिर खुद बच्चों से ऐसी बातें नहीं कर सकती जिन्हें कहने के लिए रिश्ते और मर्यादा इसकी इज़ाज़त ही न दे। लेकिन फिर भी कहूॅगी अभय। वक्त और हालात हमारे सामने कभी कभी ऐसा रूप लेकर आ जाते हैं कि हम फक़त बेबस से हो जाते हैं। हमें वो सब कुछ करना पड़ जाता है जिसे करने के बारे में हम कभी कल्पना भी नहीं करते। ख़ैर, अब जो कुछ भी मैं कहने जा रही हूॅ उसमें कई सारी बातें ऐसी भी हैं जिन्हें मैं स्पष्ट रूप से तुम लोगों के सामने नहीं कह सकती, किन्तु हाॅ तुम लोग उन बातों का अर्थ ज़रूर समझ सकते हो।"
इतना कह कर गौरी ने एक गहरी साॅस ली और फिर से उसी तरह शून्य में घूरते हुए कहने लगी__"ये सब तब से शुरू हुआ था जब मैं ब्याह कर अपने पति यानी विजय सिंह जी के घर आई थी। उस समय हमारा घर घर जैसा ही था आज की तरह हवेली में तब्दील नहीं था। मैं एक ग़रीब घर की लड़की थी। मेरे माॅ बाप ग़रीब थे, खेती किसानी करते थे। अपने माता पिता की मैं अकेली ही संतान थी। मेरा ना तो कोई भाई था और ना ही कोई बहन। ईश्वर ने मेरे सिवा मेरे माॅ बाप को दूसरी कोई औलाद दी ही नहीं थी। इसके बाद भी मेरे माॅ बाप को भगवान से कोई शिकायत नहीं थी। वो मुझे दिलो जान से प्यार व स्नेह करते थे। जब मैं बड़ी हुई तो सभी बच्चों की तरह मुझे भी मेरे माॅ बाप ने गाॅव के स्कूल में पढ़ने के लिए मेरा दाखिला करा दिया। मैं खुशी खुशी स्कूल जाने लगी थी। किन्तु एक हप्ते बाद ही मेरा स्कूल में पढ़ना लिखना बंद हो गया। दरअसल मैं छोटी सी बच्ची ही तो थी। एक दिन मास्टर जी ने मुझसे क ख ग घ सुनाने को कहा तो मैं सुनाने लगी। लेकिन मुझे आता नहीं था इस लिए जैसे आता वैसे ही सुनाने लगी तो मास्टर जी मुझे ज़ोर से डाॅट दिया। उनकी डाॅट से मैं डर कर रोने लगी। मैं अपने माॅ बाप इकलौती लाडली बेटी थी। मेरे माॅ बाप ने कभी मुझे डाॅटा नहीं था शायद यही वजह थी कि जब मास्टर जी ने मुझे ज़ोर से डाॅटा तो मुझे बेहद दुख व अपमान सा महसूस हुआ और मैं रोने लगी थी। मुझे रोते देख मास्टर जी ने मुझे चुप कराने के लिए फिर से ज़ोर से डाॅटा। उनके द्वारा फिर से डाॅटे जाने से मैं और भी तेज़ तेज़ रोने लगी थी। मास्टर जी ने देखा कि मैं चुप नहीं हो रही हूॅ तो उन्होंने मुझ पर छड़ी उठा दी। दो तीन छड़ी लगते ही मेरा रोना जैसे चीखों में बदल गया। पूरे स्कूल में मेरा रोना चिल्लाना गूॅजने लगा। मेरे इस तरह रोने और चिल्लाने से मास्टर जी बहुत ज्यादा गुस्से में आ गए। उसी वक्त एक दूसरे मास्टर जी मेरा रोना और चिल्लाना सुन कर आ गए। दूसरे मास्टर जी को देख कर पहले वाले मास्टर जी रुक गए और इस बीच मैं रोते हुए ही स्कूल से भाग कर अपने घर आ गई। घर में उस वक्त मेरे पिता जी भोजन कर रहे थे।
मुझे इस तरह रोता बिलखता देख वो चौंके। मैं रोते हुए आई और अपने पिता जी से लिपट गई। मेरे पिता मुझसे पूछने लगे कि किसने मुझे रुलाया है तो मैंने रोते रोते सब कुछ बता दिया। सारी बात सुन कर मेरे पिता जी बड़ा गुस्सा हुए लेकिन माॅ के समझाने पर शान्त हो गए। लेकिन इस सबसे हुआ ये कि मेरे पिता जी ने दूसरे दिन से मुझे स्कूल नहीं भेजा। उन्होंने साफ कह दिया था कि जिस स्कूल में मेरी बेटी मार कर रुलाया गया है उस स्कूल में मेरी बेटी अब कभी नहीं पढ़ेगी। बस इसके बाद मैं घर में ही पलती बढ़ती रही। उस समय मेरी उमर पन्द्रह साल थी जब एक दिन बाबू जी(गजेन्द्र सिंह बघेल) हमारे घर आए। बाबू जी को आस पास के सभी गाॅव वाले जानते थे। उन्हें कहीं से पता चला था कि इस गाॅव में हेमराज सिंह(पिता जी) की बेटी है जो बहुत ही सुंदर व सुशील है। बाबू जी अपने मॅझले बेटे विजय सिंह जी के लिए लड़की देखने आए थे। मेरे पिता जी ने बाबू जी को बड़े आदर व सम्मान के साथ बैठाया। घर में जो भी रुखे सूखे जल पान की ब्यवस्था उन्होंने वो सब बाबू जी के लिए किया। बाबू जी ने मेरे पिता जी का मान रखने के लिए थोड़ा बहुत जल पान किया उसके बाद उन्होने अपनी बात रखी। मेरे पिता ये जान कर बड़ा खुश हुए कि ठाकुर साहब अपने बेटे के लिए उनकी लड़की का हाॅथ खुद ही माॅगने आए हैं। भला कौन बाप नहीं चाहेगा कि उसकी बेटी इतने बड़े घर में न ब्याही जाए? और फिर रिश्ता जब खुद ही चलकर उनके द्वार पर आया था तो इंकार का सवाल ही नहीं था। किन्तु पिता जी की आर्थिक स्थित अच्छी नहीं थी इस लिए लेने देने वाली बात से घबरा रहे थे। बाबू जी जानते थे इस बात को इस लिए उन्होंने साफ कह दिया था कि हेमराज हमें सिर्फ तुम्हारी लड़की चाहिए जिसे हम अपनी बेटी और बहू बना सकें। बस फिर क्या था। सब कुछ तय हो गया और एक अच्छे व शुभ मुहूर्त को मेरी शादी हो गई। मुझे नहीं पता था कि मैं किस तरह के घर में और किस तरह के लोगों के बीच आ गई हूॅ? माॅ बाप ने बस यही सीख दी थी कि अपने पति को परमेश्वर मानना। अपने सास ससुर की मन से सेवा करना। बड़ों का आदर व सम्मान करना तथा छोटों को प्यार व स्नेह देना।
एक लड़की का नसीब कितना अजीब होता है कि बचपन से जवानी तक अपने माॅ बाप के पास हॅसी खुशी से रहती है और फिर शादी हो जाने के बाद वह एक नये घर में अपने पति के साथ एक नया संसार बनाने के लिए चली जाती है। अपने माॅ बाप के घर में उनका निश्छल प्यार और स्नेह पा कर पली बढ़ी वो लड़की एक दिन उन सबसे दूर चली जाती है।
शादी के बाद जब मैं इस घर में आई तो मेरे मन में डर व भय के सिवा कुछ न था। अपने माॅ बाप से यूॅ अचानक ही दूर हो जाने से हर पल बस रोना ही आ रहा था। पर ये सब तो हर लड़की की नियति होती है। हर लड़की के साथ एक दिन यही होता है।
ख़ैर, रात हुई तो एक ऐसे इंसान से मिलना हुआ जो किसी फरिश्ते से कम न था। उन्होंने मुझे प्यार दिया इज्जत दी और इस क़ाबिल बनाया कि जब सुबह हुई तो मुझे लगा जैसे ये घर शदियों से मेरा ही था। मुझे लग ही नहीं रहा था कि मैं किसी दूसरे के घर में किसी अजनबी के पास आ गई हूॅ। राज के पिता ऐसे थे कि उन्होने मुझे इतना बदल दिया था। मुझे उनसे प्रेम हो गया और मैं जानती थी कि उन्हें भी मुझसे उतना ही प्रेम हो गया था।
मेरी दोनो ननदें यानी सौम्या और नैना दिन भर मेरे पास ही जमी रहती थी। उन्होने ये एहसास ही नहीं होने दिया कि वो दोनो मेरे लिए अजनबी हैं। माॅ बाबू बड़ा खुश थे। आख़िर उनकी पसंद की लड़की उनकी बहू बन कर उस घर में आई थी। ऐसे ही एक हप्ता गुज़र गया। इन एक हप्तों में मेरे मन से पूरी तरह डर व झिझक जा चुकी थी। मुझे घर के सभी लोग अच्छे लगने लगे थे। विजय जी से इतना प्रेम हो गया था कि उनके बिना एक पल भी नहीं रहा जाता था। वो दिन भर खेतों पर काम में ब्यस्त रहते और शाम को ही घर आते। जब वो कमरे में मेरे पास आते तो मुझे रूठी हुई पाते। फिर वो मुझे मनाते। हर दिन मेरे लिए छुपा कर फूलों का गजरा खुद बना कर लाते और मेरे बालों में खुद ही लगाते। आईने के सामने ले जाकर मुझे खड़ा कर देते और मेरे पीछे खड़े होकर तथा आईने में देखते हुए मुझसे कहते "मैं सारे संसार के सामने चीख चीख कर ये कह सकता हूॅ कि इस संसार में तुमसे खूबसूरत दूसरा कोई नहीं। मैं तो बेकार व निकम्मा था जाने किन पुन्य प्रतापों का ये फल था जो तुम मुझे मिली हो" उनकी इन बातों से मैं गदगद हो जाती। मुझे ध्यान ही न रहता कि मैं उनसे रूठी हुई थी। सब कुछ जैसे भूल जाती मैं।
इस बीच मैंने महसूस किया था कि बड़े भइया और बड़ी दीदी इन दोनो का ब्यौहार सबसे अलग था। बड़े भइया विजय जी से ज्यादा बात नहीं करते थे। उसी तरह प्रतिमा दीदी मुझसे ज्यादा बात नहीं करती थी। हलाॅकि वो उस समय शहर में ही रहते थे। पर जब भी वो दोनो आते तो उनका ब्यौहार ऐसा ही होता हम दोनो से।
ऐसे ही चलता रहा। हम सब खुश थे किन्तु ये सच था कि बड़े भइया और दीदी विजय जी और मुझसे हमेशा से ही उखड़े से रहते। मैने अक्सर देखा था कि बड़े भइया किसी न किसी बात पर विजय जी को उल्टा सीधा बोलते रहते थे। ये अलग बात थी कि विजय जी उनकी किसी भी बात का बुरा नहीं मानते थे और ना ही पलट कर कोई जवाब देते थे।
एक दिन की बात है मैं अपने कमरे में नहाने के बाद कपड़े पहन रही थी, मुझे ऐसा लगा जैसे छिप कर कोई मुझे कपड़े पहनते हुए देख रहा है। मैंने पलट कर देखा तो कहीं कोई नहीं था। मैंने इसे अपना वहम समझ कर फिर से कपड़े पहनने लगी। तभी कमरे के बाहर से मेरी बड़ी ननद सौम्या की आवाज़ आई।
वो कह रही थी "बड़े भइया आप यहाॅ, भाभी के कमरे के दरवाजे के पास छिप कर क्यों खड़े हैं?" सौम्या की इस बात को सुन कर मैं सन्न रह गई। ये जान कर मेरे पैरों तले से ज़मीन निकल गई कि जेठ जी छिप कर मुझे कपड़े पहनते हुए देख रहे थे। मुझे ध्यान ही नहीं था कि मेरे कमरे का दरवाजा खुला हुआ है। मेरी हालत ऐसी हो गई जैसे काटो तो एक बूद भी खून न निकले। फिर जब मुझे होश आया तो अनायास ही जाने किस भावना के तहत मुझे रोना आ गया। सौम्या जब मेरे कमरे में आई तो उसने मुझे रोता पाया। वह मुझे रोते देख हैरान रह गई। उसे किसी अनिष्ट की आशंका हुई। उसने तो देखा ही था कि उसका बड़ा भाई मेरे कमरे के बाहर दरवाजे के पास छिप कर खड़ा था। उसे समझते देर न लगी कि कुछ तो हुआ है। उसने तुरंत ही मुझे शान्त करने की कोशिश की और पूछने लगी क्या हुआ है? मैंने रोते हुए यही कहा कि मुझे तो कुछ पता ही नहीं था कि कौन दरवाजे के पास छिपकर मुझे कपड़े पहनते देख रहा है, वो तो तब पता चला जब तुमने बाहर जेठ जी से वो सब कहा था। मेरी बातें सुन कर सौम्या भी स्तब्ध रह गई। फिर उसने कहा कि ये बात मैं किसी से न कहूॅ क्यों कि घर में हंगामा हो जाएगा। इस लिए इस बात को भूल जाऊॅ लेकिन आइंदा से ये ख़याल ज़रूर रखूॅ कि दरवाजा खुला न रहे।
उस दिन के बाद जेठ जी का मुझे देखने का नज़रिया बदल चुका था। वो किसी न किसी बहाने मुझे देख ही लेते। मैं पन्द्रह साल की नासमझ ही थी। मुझे सिर पर साड़ी द्वारा घूॅघट करने का भूल जाता था। जेठ जी मुझे देखते और जब मेरी नज़र उन पर पड़ती तो वो बस मुस्कुरा देते। मुझे ये सब बड़ा अजीब लगता और मैं इस सबसे डर भी जाती।
उधर विजय जी खेतों में दिन रात मेहनत करते और ज्यादा से ज्यादा मात्रा में फसल उगाते। शहर में बेंच कर जो भी मुनाफा होता वो उस सारे पैसों को बाबू जी के हाॅथ में पकड़ा देते। उन पर तो जैसे पागलपन सवार था खेतों में दिन रात मेहनत करने का। उनकी मेहनत व लगन से अच्छा खासा मुनाफा भी होता। मैं अक्सर उनके पास खेतों में उन्हें खाना देने के बहाने चली जाती। मुझे उनके साथ रहना अच्छा लगता था फिर चाहे वो किसी भी जगह हों। हम दोनो खेतों में नये नये पौधे लगाते और खूब सारी बातें करते।
समय गुज़रता रहा। समय के साथ साथ उनका स्वभाव जो पहले से ही बदला हुआ था वो और ज्यादा बदल गया था। जेठ जी जब भी बड़ी दीदी के साथ शहर से आते तो उनका बस एक ही काम होता था...मुझे ज्यादा से ज्यादा देखना। घर में अगर कोई न होता तो वो मुझसे बातें करने की कोशिश भी करते। किन्तु मैं उनकी किसी बात को कोई जवाब न देती बल्कि अपने कमरे में आकर दरवाजा अंदर से लगा लेती। जैसा की गाॅवों में होता है कि जेठ व ससुर के सामने घूॅघट करके ही जाना है और उनके सामने कोई आवाज़ नहीं निकालना है, बात करने की तो बात दूर।
इस लिए जेठ जी जब खुद ही मुझसे बातें करने और करवाने की कोशिश करते तो मैं डर जाती और भाग कर अपने कमरे में जाकर अंदर से दरवाजा बंद कर लेती। इतना तो मैं समझ गई थी कि जेठ जी की नीयत मेरे प्रति सही नहीं है। मगर किसी से कह भी नहीं सकती थी। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से घर में कोई कलह शुरू हो जाए।
उधर विजय जी की मेहनत से घर में ढेर सारा पैसा आने लगा था। बाबू जी अपने इस बेटे से बड़ा खुश थे। मुझसे भी खुश थे क्योंकि मैं उनकी नज़र में एक आदर्श बहू थी। एक बार जेठ जी फिर आए शहर से। किन्तु इस बार वो पैसों के लिए आए थे क्योंकि उन्हें शहर में खुद का कारोबार करना था। उन्होने बाबू जी से इस बारे में बात की और उनसे पैसे मागे। इस बाबूजी नाराज़ भी हुए। पैसों के बारे में उन्होने यही कहा कि ये सब पैसे विजय की मेहनत का नतीजा है इस लिए उससे पूछना पड़ेगा। बाबू जी की इस बात ने जेठ जी के मन में विजय जी के लिए और भी ज़हर भर गया। मुझे आज भी नहीं पता कि ऐसी क्या वजह थी जिसकी वजह से जेठ जी के मन में अपने इस भाई के लिए इतना ज़हर भरा हुआ था? जबकि सब जानते थे कि विजय जी हमेशा उनका आदर व सम्मान करते थे। उनकी किसी भी बात का बुरा नहीं मानते थे। ख़ैर, पैसा लेकर जेठ जी शहर चले गए। इस बार जब वो आए थे तो किसी भी दिन उन्होंने वो हरकतें नहीं की जो इसके पहले करते थे मुझे देखने की। शहर में जेठ जी ने खुद का कारोबार शुरू कर लिया। इधर विजय जी के ज़ेहन में ये भूत सवार हो गया था कि घर को तुड़वा कर इसे नये सिरे से बनवा कर हवेली का रूप दिया जाए। उन्होने बाबू की सहमति से हवेली की बुनियाद रखी। हवेली को तैयार करने में भारी पैसा खर्च हुआ। यहाॅ तक की बाद में हवेली का बाॅकी काम कर्ज लेकर करना पड़ा। जेठ जी ने पैसा देने से इंकार कर दिया।
इस बीच बड़ी दीदी को एक बेटी हुई। इसका पता भी हम सबको बाद में चला था। ख़ैर, जब वो शहर से आए तो बाबू जी इस खबर से नाराज़ तो हुए किन्तु फिर हमेशा की तरह ही चुप रह गए।
मैं इस बात से खुश थी कि जेठ जी अब चोरी छिपे मुझे देखने वाली हरकतें करना बंद कर दिये थे। इस बीच अभय ने भी अपनी पसंद की लड़की से शादी कर ली। बाबू जी इस बात से नाराज़ हुए लेकिन कर भी क्या सकते थे? लेकिन करुणा का आचरण बहुत अच्छा था, वो पढ़ी लिखी थी लेकिन उसमें संस्कार भी थे। मैं उसे अपनी छोटी बहन बना कर खुश थी। हम दोनों का आपस में बड़ा प्रेम था। कोई कह ही नहीं सकता था कि वो मेरी देवरानी है। अभय गुस्सैल स्वाभाव के ज़रूर थे किन्तु उनके अंदर अपने से बड़ों का आदर सम्मान करने की भावना थी। प्रेम के चक्कर में छोटी ऊम्र ही उन्होने शादी कर ली थी। लेकिन बाबू जी शायद इस लिए चुप रह गए थे क्योंकि वो अपने पैरों पर खड़े थे। गाॅव के ही सरकारी स्कूल में अध्यापक थे वो।
इधर हवेली बन कर तैयार हो चुकी थी।
कर्ज़ भी काफी हो गया था लेकिन विजय जी के लिए तो जैसे ये कर्ज़ कोई मायने ही नहीं रखता था। बाबू जी ने हवेली के तैयार होने पर बड़े धूमधाम से गृह प्रवेश का उत्सव मनाया। शहर से बड़े भइया और दीदी भी आईं। हवेली देख कर वो दोनो ही हैरान थे किन्तु प्रत्यक्ष में हमेशा की तरह ही ग़लतियाॅ बता रहे थे। बाबू जी सब जानते भी थे और समझते भी थे किन्तु हमेशा चुप रहते।
ऐसे ही चार साल गुज़र गए और मुझे एक बेटा हुआ। मेरे बेटे के जन्म के चार दिन बाद बड़े भइया और दीदी को फिर से एक बेटी हुई। बाबू जी ने अपने पोते के जन्म पर बड़े धूमधाम से उत्सव मनाया। बड़े भइया और दीदी इससे नाराज़ हुए। उनका कहना था कि उनकी बेटियों के जन्म उत्सव नहीं मनाया जबकि विजय के बेटे के जन्म पर बड़ा उत्सव मना रहे हैं आप। उनकी इन बातों से बाबू जी का गुस्सा उस दिन जैसे फट पड़ा था। उन्होंने गुस्से में बहुत कुछ सुना दिया उन दोनो को। बात भी सही थी। दरअसल वो दोनो खुद को हम सबसे अलग कर लिए थे। शहर में खुद का कारोबार और बड़ा सा एक घर था उनके पास। शायद इसी का घमंड होने लगा था उन्हें। वो सोचते थे कि कहीं हम लोग उनके कारोबार और शहर के मकान में हिस्सा न मागने लगें इस लिए वो हमेशा हम सबसे कटे कटे से रहते। जबकि यहा हवेली और ज़मीन जायदाद में अपना हक़ समझते थे।
गौरी कुछ पल के लिए रुकी और गहरी साॅसें लेने लगी। सब लोग साॅस बाधे उसकी बातें सुन रहे थे।
"मैं जानती हूॅ अभय कि मैने अभी जो कुछ कहा उस सबको तुम जानते हो।" गौरी ने कहा__"तुम सोच रहे होगे कि मैं ये सब तुम्हें क्यों बता रही हूॅ जबकि मुझे तो सिर्फ वो सब बताना चाहिए जो इन लोगों ने मेरे और मेरे पति के साथ किया था। ख़ैर, ये सब बताने का मतलब यही था कि जो कुछ हुआ उसकी बुनियाद उसकी शुरूआत यहीं से हुई थी। ज़हर के बीज यहीं से बोना शुरू हुए थे।
राज जब दो साल का हुआ तो मेरी बड़ी ननद सौम्या की शादी की बात चली। बाबू जी ने बड़े भइया को संदेश भेजवाया और कहा कि वो अपनी बहन की शादी के लिए अपनी तरफ से क्या खर्चा कर सकते हैं? बाबू जी बात से बड़े भइया ने पैसा देने से साफ इंकार कर दिया था। उनका कहना था कि उनका कारोबार आजकल बहुत घाटे में चल रहा है इस लिए वो पैसे नहीं पाएॅगे। बाबू जी उनकी इस बात से बेहद दुख हुआ। बाबू जी के दुख का जब विजय जी को पता चला तो वो खेतों से आकर हवेली में बाबू जी से मिले। उन्होने बाबू जी से कहा कि आप किसी बात की फिक्र न करें, सौम्या की शादी बड़े धूमधाम से ही होगी। बाबू जी जानते थे कि हवेली बनाने में जो कर्जा हुआ था उसे विजय जी ने कितनी मेहनत करके चुकाया था। इसके बाद कहीं फिर से न कर्ज़ा हो जाए। खैर, सौम्या की शादी हुई और वैसे ही धूमधाम से हुई जैसा कि विजय जी ने बाबू जी से कहा था।
शहर से बड़े भइया और दीदी भी थे, वो दोनो हैरान थे किन्तु सामने पर यही कहते फिलते बाबू जी से कि इतना खर्च करने की क्या ज़रूरत थी? इससे जो कर्ज़ हुआ है उसे मेरे सिर पर मत मढ़ दीजिएगा। बाबू जी इस बात से बेहद गुस्सा हुए। कहने लगे कि तुम तो वैसे ही खुद को सबसे अलग समझते हो, तुम्हें किसी बात की चिन्ता करने की कोई ज़रूरत नहीं है। मेरे दो दो सपूत अभी बाॅकी हैं जो मेरा हर तरह से साथ देंगे और दे भी रहे हैं। सौम्या की शादी के तीसरे दिन बड़े भइया ने बाबू जी से कहा कि अगर आप ये समझते हैं कि मैं आप सबसे खुद को अलग समझता हूॅ तो आप मुझे सचमुच ही अलग कर दीजिए। ये रोज रोज की बेज्जती मुझसे नहीं सुनी जाती। बाबू जी ने कहा कि तुम तो अलग ही हो अब किस तरह अलग करें तुम्हें? तो बड़े भइया ने कहा कि मेरे हिस्से में जो भी आता हो उसे मुझे दे दीजिए। हवेली में और ज़मीनों में जो भी मेरा हिस्सा हो। बाबू जी उनकी इस बात पर गुस्सा हो गए। कहने लगे कि तुम्हारा हवेली में तभी हिस्सा हो सकता है जब तुम अपने हिस्से की कीमत दोगे। क्योंकि हवेली में तुमने अपनी तरफ से एक रुपया भी नहीं लगाया। हवेली में जो भी रुपया पैसा लगा और जो भी कर्ज़ा हुआ उस सबको अकेले विजय ने चुकता किया है। हाॅ अगर विजय चाहे तो अपनी मर्ज़ी से तुम्हें बिना कीमत चुकाए हवेली में हिस्सा दे सकता है।
बाबू जी की बात से बड़े भइया नाराज़ हो गए। कहने लगे कि विजय होता कौन है मुझे हिस्सा देने वाला। उस मजदूर के सामने मैं हाॅथ फैलाने नहीं जाऊॅगा। मुझे आपसे हिस्सा चाहिए। उनकी इन बातों से बाबू जी भी गुस्सा हो गए। कहने लगे कि अगर ऐसी बात है तो तुम्हें भी अपने कारोबार और शहर के मकान में दोनो भाइयों को हिस्सा देना होगा। तुम्हारा कारोबार तो वैसे भी विजय के ही पैसों की बुनियाद पर खड़ा हुआ है। बाबू जी इस बात से बड़े भइया ने साफ कह दिया कि मेरे कारोबार और शहर के मकान में किसी का कोई हिस्सा नहीं है। तो बाबू जी ने भी कह दिया कि फिर तुम भी ये भूल जाओ कि तुम्हारा इस हवेली में और ज़मीनों में कोई हिस्सा है।
बाबू जी की इस बात से बड़े भइया गुस्सा हो गए। कहने लगे कि ये आप ठीक नहीं कर रहे हैं। आप बाप होकर भी अपने बेटों के बीच पक्षपात कर रहे हैं। बाबू जी ने कहा कि तुम अपने आपको होशियार समझते हो कि तुम सबके हिस्सा ले लो और तुमसे कोई न ले। ये कहाॅ का न्याय कर रहे हो तुम? अरे तुम तो बड़े भाई हो, तुम्हें तो खुद सोचना चाहिए कि तुम अपने छोटे भाइयों का भला करो और भला ही सोचो।
बाबू जी की इन बातों से बड़े भइया कुछ न बोले और पैर पटकते हुए वापस शहर चले गए। उधर ये सारी बातें जब विजय जी को पता चलीं तो वो बाबू जी से बोले कि आपको बड़े भइया से ऐसा नहीं कहना चाहिए था।
भला क्या ज़रूरत थी उनसे ये कहने की कि हवेली में हिस्सा तभी मिलेगा जब वो अपने हिस्से की कीमत चुकाएॅगे? मैने ये सोच कर ये सब नहीं किया था कि बाद में मैं अपने ही भाइयों से हवेली की कीमत वसूल करूॅ। बाबू जी बोले इतना महान मत बनो बेटे। ये दुनिया बहुत बुरी है, यहाॅ बड़े खुदगर्ज़ लोग रहते हैं। समय के साथ खुद को भी बदलो बेटा। वरना ये दुनिया तुम जैसे नेक और सच्चे ब्यकित को जीने नहीं देगी। बाबू जी की इस बात पर विजय जी बोले जैसे सूरज अपना रोशनी फैलाने वाला स्वभाव नहीं बदल सकता वैसे ही मेरा स्वभाव भी नहीं बदल सकता। आप और माॅ की सेवा करूॅ छोटे भाई के लिए खुद की सारी खुशियाॅ निसार कर दूॅ। भला क्या लेकर जाऊॅगा इस दुनियाॅ से? सब यहीं तो रह जाएगा न बाबू जी। इंसान की सबसे बड़ी दौलत व पूॅजी तो वो है जिसे पुन्य कहते हैं। एक यही तो लेकर जाता है वह भगवान के पास।
विजय जी की इन बातों से बाबू जी अवाक् रह गए। कुछ देर बाद बोले तू तो कोई फरिश्ता है बेटे। मन से बैरागी है तू। तुझे किसी धन दौलत का मोह नहीं है। जब तू पढ़ता लिखता नहीं था न तो दिन रात कोसता था तुझे। सोचता था कि कैसा निकम्मा बेटा दिया था मुझे भगवान ने लेकिन भला मुझे क्या पता था कि वही निकम्मा बेटा एक दिन इतना महान निकलेगा। मुझे तुझपे गर्व है बेटे। लेकिन मेरी एक बात हमेशा याद रखना कि दूसरों खुश रखने के लिए खुद का बने रहना भी ज़रूरी होता है।
बाबू जी की इस बात को सुन कर विजय जी मुस्कुराए और फिर से अपनी कर्मभूमि यानी खेतों पर चले गए। बाबू जी की बातों में छुपे किसी अर्थ को शायद विजय जी समझ नहीं पाए थे। लेकिन बाबू जी को शायद भविष्य दिख गया था।
उधर शहर में बड़े भइया और दीदी इस बार कुछ और ही खिचड़ी पका रहे थे। सौम्या की शादी को एक महीना हो गया था जब बड़े भइया और दीदी को तीसरी औलाद के रूप में एक बेटा हुआ था। वो दोनो शहर से आए थे घर। इस बार बाबू जी ने उनके बेटे के जन्म पर राज के जन्मोत्सव से भी ज्यादा उत्सव मनाया कारण यही था कि बड़े भइया और दीदी को ये न लगे कि हमें कोई खुशी नही हुई है उनके बेटे के जन्म पर। बड़े भइया खुद भी उत्सव में खूब पैसा बहा रहे थे। वो दिखाना चाहते थे कि वो किसी से कम नहीं हैं। ख़ैर, इस बार एक नई चीज़ देखने को मिली। वो ये थी कि बड़े भइया और दीदी हम सब से बड़े अच्छे तरीके से मिल जुल रहे थे। विजय जी से भी उन्होने अच्छे तरीके से बातें की। एक दिन बड़े भइया खेतों पर घूमने गए। वहाॅ पर उन्होने देखा कि ज़मीनों पर काफी अच्छी फसल उगी हुई थी। बगल से जो बंज़र सा पहले बड़ा सा मैदान हुआ करता था अब वहाॅ पर अच्छे खासे पेढ़ लगाए जा चुके थे। खेतों पर एक तरफ बड़ा सा मकान भी बन रहा था। खेतों पर बहुत से मजदूर काम कर रहे थे।
विजय जी ने बड़े भइया को वहाॅ पर देखा तो वो भाग कर उनके पास आए और बड़े आदर व सम्मान से उन्हें खेतों के बारें में तथा फसलों से होने वाली आमदनी के के बारे में बताने लगे। उन्होंने ये भी बताया कि दूसरी तरफ जो बीस एकड़ की खाली ज़मीन पड़ी थी उसमें मौसमी फलों के बाग़ लगाने की तैयारी हो रही है। उससे काफी ज्यादा आमदनी होगी।
ऐसे ही बातें चलती रही फिर बातों ही बातों में जब हवेली का ज़िक्र आया तो विजय जी ने खुद कहा कि हवेली में सबका बराबर का हिस्सा है वो जब चाहें ले सकते हैं। उन्हें कोई कीमत नहीं चाहिए। ये सब अपनो के लिए ही तो बनाया गया है। विजय जी की इन बातों से बड़े भइया खुश हो गए। किन्तु उनके मन में शायद कुछ और ही था जो उस वक्त समझ नहीं आया था।
ऐसे ही वक्त गुज़रता रहा। इसी बीच मुझे एक बेटी हुई और दस दिन बाद करुणा ने भी एक सुंदर सी बच्ची को जन्म दिया। राज उस वक्त चार साल का हो गया था। वो दिन भर अपनी उन दोनो बहनों के साथ ही रहता, और उनके साथ ही हॅसता खेलता। शहर से बड़े भइया और दीदी भी आए थे। सबके लिए कपड़े भी लाए थे। हम सब बेहद खुश थे इस सबसे।
इस बीच एक परिवर्तन ये हुआ कि बड़े भइया शहर से हप्ते में एक दो दिन के लिए हवेली आने लगे थे। माॅ बाबू जी से वो बड़े सम्मान से बातें करते और खेतों पर भी जाते। वहाॅ देखते सुनते सब। मैं और करुणा घर के सारे काम करती। उसके बाद मैं खेत चली जाती विजय जी के पास। खेतों में जो मकान बन रहा था वो बन गया था।
इस बीच बच्चे भी बड़े हो रहे थे। राज पाॅच साल का हुआ तो उसका स्कूल में दाखिला करा दिया अभय ने। गर्मियों में जब स्कूल की छुट्टियाॅ होती तो बड़े भइया और दीदी के बच्चे भी शहर से गाॅव हवेली में आ जाते। सब बच्चे एक साथ खेलते और खेतों में जाते। बड़े भइया की बड़ी बेटी रितू अपनी माॅ पर गई थी। वो ज्यादा हम लोगों से घुलती मिलती नहीं थी। शिवा अपने बाप पर ही गया था। वह अपनी चीज़ें किसी को नहीं देता था और दूसरों की चीज़ें लड़ झगड़ कर ले लेता था। राज से अक्सर उसकी लड़ाई हो जाती थी। बच्चे तो नासमझ होते हैं उन्हें अच्छे बुरे का ज्ञान कहाॅ होता है। इस लिए अगर इनकी आपस में कभी लड़ाई होती तो जेठानी जी अक्सर नाराज़ हो जाती थीं। बड़ी मुश्किल से गर्मियों की छुट्टियाॅ कटती और जेठानी जी अपने बच्चों को लेकर शहर चली जातीं।
दोस्तो, अपडेट हाज़िर है,,,,,,
अगले अपडेट से फ्लैशबैक को शार्ट करके लिखूॅगा,
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट..........《 29 》
अब तक,,,,,,,,,,
ऐसे ही वक्त गुज़रता रहा। इसी बीच मुझे एक बेटी हुई और दस दिन बाद करुणा ने भी एक सुंदर सी बच्ची को जन्म दिया। राज उस वक्त चार साल का हो गया था। वो दिन भर अपनी उन दोनो बहनों के साथ ही रहता, और उनके साथ ही हॅसता खेलता। शहर से बड़े भइया और दीदी भी आए थे। सबके लिए कपड़े भी लाए थे।
हम सब बेहद खुश थे इस सबसे।
इस बीच एक परिवर्तन ये हुआ कि बड़े भइया शहर से हप्ते में एक दो दिन के लिए हवेली आने लगे थे। माॅ बाबू जी से वो बड़े सम्मान से बातें करते और खेतों पर भी जाते। वहाॅ देखते सुनते सब। मैं और करुणा घर के सारे काम करती। उसके बाद मैं खेत चली जाती विजय जी के पास। खेतों में जो मकान बन रहा था वो बन गया था।
इस बीच बच्चे भी बड़े हो रहे थे। राज पाॅच साल का हुआ तो उसका स्कूल में दाखिला करा दिया अभय ने। गर्मियों में जब स्कूल की छुट्टियाॅ होती तो बड़े भइया और दीदी के बच्चे भी शहर से गाॅव हवेली में आ जाते। सब बच्चे एक साथ खेलते और खेतों में जाते। बड़े भइया की बड़ी बेटी रितू अपनी माॅ पर गई थी। वो ज्यादा हम लोगों से घुलती मिलती नहीं थी। शिवा अपने बाप पर ही गया था। वह अपनी चीज़ें किसी को नहीं देता था और दूसरों की चीज़ें लड़ झगड़ कर ले लेता था। राज से अक्सर उसकी लड़ाई हो जाती थी। बच्चे तो नासमझ होते हैं उन्हें अच्छे बुरे का ज्ञान कहाॅ होता है। इस लिए अगर इनकी आपस में कभी लड़ाई होती तो जेठानी जी अक्सर नाराज़ हो जाती थीं। बड़ी मुश्किल से गर्मियों की छुट्टियाॅ कटती और जेठानी जी अपने बच्चों को लेकर शहर चली जातीं।
___________________________
अब आगे,,,,,,,,,,,,
प्रतिमा अपने पति के साथ जब अपने कमरे में पहुॅची तो अचानक ही पीछे से अजय ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया साथ ही अपने होठों को उसकी गर्दन पर लगा कर करते हुए अपने दोनो हाथों से प्रतिमा के बड़े बड़े चूॅचों को बुरी तरह मसलने लगा।
"आऽऽऽह धीरे से प्लीज़।" प्रतिमा की दर्द और मज़े में डूबी आह निकल गई थी, बोली___"ज़रा धीरे से आहहहहह मसलो न अजय। मुझे दर्द हो रहा है।"
"ये धीरे से मसलने वाली चीज़ नहीं है मेरी जान।" अजय सिंह ने उसी तरह प्रतिमा के चूॅचों को मसलते हुए कहा__"इन्हें तो आटे की तरह गूॅथा और मसला जाता है। देख लो मैं वही कर रहा हूॅ।"
"वो तो मैं देख ही रही हूॅ।" प्रतिमा ने आहें भरते हुए कहा___"पर मुझे ये नहीं समझ आ रहा कि इस समय तुम ये सब इतने उतावलेपन से क्यों कर रहे हो? आख़िर किस बात का जोश चढ़ गया है तुम्हें?"
"मत पूछो डियर।" अजय सिंह ने खुद आह सी भरते हुए कहा___"इस हवेली में आज एक और चूॅत आ गई है। मेरी छोटी बहन की प्यारी प्यारी सी चूॅत। हाय काश! उसकी उस चूॅत को पेलने का मौका मिल जाए तो कसम से मज़ा आ जाए प्रतिमा।"
"हे भगवान।" प्रतिमा उछल पड़ी__"तो इस वजह से जोश चढ़ा हुआ है तुम्हें? कसम से अजय तुम न कभी नहीं सुधर सकते। तुम्हारे ही नक्शे कदम पर हमारा बेटा भी चल रहा है। मैने हज़ार बार देखा है उसे, उसकी नज़रें अपनी बहनों पर ही नहीं खुद मुझ पर भी गड़ जाती हैं। उसे ये भी ख़याल नहीं कि मैं उसकी माॅ हूॅ। ये सब तुम्हारी वजह से है अजय। तुम खुद उसकी ग़लतियों को नज़रअंदाज़ करते रहते हो।
"
"अरे तो क्या हो गया मेरी जान?" अजय ने प्रतिमा को उठाकर बेड पर लेटा दिया और फिर उसके ऊपर आकर बोला___"नज़रें तो होती ही हैं नज़ारा करने के लिए। तुम तीनो माॅ बेटियाॅ हो ही इतनी हाॅट एण्ड सेक्सी कि हमारे बेटे का भी इमानडोल गया।"
"तुम्हारे बेटे का बस चले तो अपनी माॅ बहनों को भी अपने नीचे लेटा कर पेल दे।" प्रतिमा ने हॅस कर कहा था।
"तो इसमें दिक्कत क्या है डियर?" अजय ने बेशर्मी से हॅसते हुए कहा__"उसे भी अपनी कुण्ड का अमृत पिला दो। शायद उसकी प्यास और तड़प मिट ही जाए।"
"ओह अजय कुछ तो शर्म करो।" प्रतिमा ने हैरानी से देखा__"भला ऐसा मैं कैसे कर सकती हूॅ? वो मेरा बेटा है, मैने उसे पैदा किया है।"
"तो क्या हुआ मेरी जान?" अजय ने अपना एक हाॅथ सरका कर प्रतिमा की साड़ी को ऊपर कर उसकी नंगी चूॅत को मसलते हुए कहा___"इसी रास्ते से ही पैदा किया ना अपने बेटे को? अब इसी रास्ते का स्वाद भी चखा दो उसे। यकीन मानो मेरी जान उसके बाद तुम्हारा बेटा तुम्हारा गुलाम ना हो जाए तो कहना।"
"उफफफफ अजय तम्हें ज़रा भी एहसास नहीं है कि तुम क्या बकवास किये जा रहे हो?" प्रतिमा ने नाराज़गी भरे लहजे से कहा__"तुम मुझे ऐसा करने के लिए कैसे कह सकते हो? क्या तुम्हें ज़रा सी भी इस बात से तक़लीफ़ नहीं होगी कि हमारा बेटा तुम्हारी चीज़ों का भोग करे? किस मिट्टी के बने हो तुम यार?"
"यार तो कौन सा घिस जाएगी तुम्हारी ये रस से भरी हुई चूत?" अजय ने अपने हाॅथ की दो उॅगलियाॅ प्रतिमा की रिस रही चूत में अंदर तक डाल कर कहा___"एक बार अपने बेटे का हथियार भी तो डलवा कर मज़ा लो। सक्सेना के साथ तो बड़ा मज़ा करती थी तुम। दो दो हथियारों से आगे पीछे से पेलवाती थी तुम। कसम से डियर, अगर ऐसा हो जाए तो मज़ा ही आ जाए। हम दोनो बाप बेटे एक साथ मिल कर तुम्हारी आगे पीछे से ठुकाई करेंगे।"
"आआआहहहहह अजय।" प्रतिमा ने मदहोशी में कहा___"मत करो ऐसी बातें। मुझे कुछ हो रहा है।"
"हाहाहाहा जब ऐसी बातों से ही तुम्हें कुछ होने लगा है तो ज़रा सोचो डार्लिंग।" अजय ने हॅसते हुए कहा___"सोचो डियर तब क्या होगा जब हम दोनो बाप बेटों के हथियार तुम्हारी पेलाई करेंगे?"
"शशशशशशश कुछ करो अजय।" प्रतिमा की हालत ख़राब___"जल्दी से कुछ करो। मेरी चूत में आग जलने लगी है। इसे बुझाओ जल्दी। वरना मैं इस आग में जल जाऊॅगी।"
"क्या करूॅ डियर?" अजय मुस्कुराया था।
"कुछ भी करो।" प्रतिमा ने बेड सीट को दोनो हाथों की मुट्ठियों में भींचते हुए कहा___"पर मेरी इस आग को शान्त करो जल्दी। उफफफ ये आज क्या हो रहा है मुझे??"
"आज बेटे के हथियार की बात चली है ना इस लिए शायद ऐसा हो रहा है तुम्हें।" अजय ने कहा__"पर बेटे का हथियार तो इस वक्त यहाॅ नहीं है मेरी जान। कहो तो फोन करके शहर से बुला लूॅ उसे?"
"उसे तो आने में समय लगेगा अजय।
" प्रतिमा ने आहें भरते हुए कहा___"तुम्हें ही इस आग को शान्त करना पड़ेगा। शशश जल्दी मुझे पेलो ना अजय।"
"इसका मतलब तुम्हें अपने बेटे से पेलवाने में अब कोई ऐतराज़ नहीं है।" अजय मुस्कुराया।
"मुझे तुम्हारी किसी बात से कभी कोई ऐतराज हुआ है क्या?" प्रतिमा ने झटके से उठ कर अजय के कपड़े उतारना शुरू कर दिया था, बोली___"मैं तो तुम्हारी हर जायज़ नाजायज़ बात को अब तक मानती ही आ रही हूॅ। अब जल्दी से मुझे आगे पीछे पेलो। बहुत आग लगी हुई है।"
"ठीक है फिर कल हम दोनो शहर चलेंगे और वहीं पर अपने बेटे के साथ थ्रीसम करेंगे।" अजय ने कहा।
"जो तुम्हारी मर्ज़ी लेकिन अभी तो मुझे शान्त करो।" प्रतिमा ने अजय को नंगा कर दिया था।
अजय ने प्रतिमा की दोनो टाॅगों को अपने दोनों कंधों पर रखा और पोजीशन बना कर प्रतिमा पर छाता चला गया। कमरे के अंदर जैसे एकाएक कोई भारी तूफान आ गया था।
_______________________
फ्लैशबैक________
उधर मुम्बई में,
कुछ पल रुकने के बाद गौरी ने गहरी साॅस ली उसके बाद फिर से कहा___"ऐसे ही कुछ साल गुज़र गए। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था। राज़ अब बड़ा हो गया था। उस समय वह दस जमात में पढ़ रहा था। पढ़ने लिखने में वह शुरू से ही तेज़ था क्योंकि उसकी पढ़ाई की सारी जिम्मेदारी अभय और करुणा पर थी। विजय जी ने बाबू जी के लिए एक बढ़िया सी कार खरीद दी थी तथा अभय के लिए एक बुलेट मोटर साइकिल।
अब की बार जब गर्मियों की छुट्टियाॅ हुईं तो फिर से जेठ जेठानी अपने बच्चों के साथ शहर से गाव आए। किन्तु इस बार हालातों में बहुत बड़ा बदलाव हो चुका था।
गौरी की नज़रें सामने एक बड़े से टेबल पर रखे काॅच के एक बड़े से जार में टिकी थी। जिस जार में भरे हुए पानी पर रंग बिरंगी मछलियाॅ तैर रही थी। उसी काॅच के जार में गौरी एकटक देखे जा रही थी। जैसे वहाॅ कोई फिल्म चल रही हो। एक ऐसी फिल्म जो गुज़रे हुए कल का एक हिस्सा थी।
"कल से ही तुम अपने काम में लग जाओ मेरी जान।" अपने कमरे में बेड के एक तरफ बैठे अजय ने प्रतिमा से कहा___"हमें किसी भी कीमत पर उस मजदूर को अपने काबू में करना है।"
"और अगर उसने कोई हंगामा खड़ा कर दिया तो?" प्रतिमा ने तर्क दिया___"तब तो मैं इस घर में किसी को मुह दिखाने के काबिल भी न रह जाऊॅगी।"
"ऐसा कुछ नहीं होगा।" अजय ने पुरज़ोर लहजे में कहा___"मुझे पता है वो साला इस बारे में किसी को कुछ नहीं बताएगा। और अगर उसने इस सबमें ज्यादा चूॅ चाॅ की तो उसके इलाज़ के लिए भी फिर प्लान बी अपनाया जाएगा।"
"और प्लान बी क्या है?" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए पूछा था।
"प्लान बी ये है कि तुम्हारी उन हरकतों से अगर वह घर में किसी से कुछ कहता है और अगर सारी बात तुम पर ही आती है तो तुम उल्टा उस पर ही इल्ज़ाम लगाना।
" अजय सिंह उसे समझा रहा था___"चीख चीख कर सबसे यही कहना कि विजय खुद कई दिन से तुम्हारी इज्जत लूटने के चक्कर में था। बाद में फिर मैं हूॅ ही इन हालातों को अंजाम तक ले जाने के लिए।"
"तुम क्या करोगे उस सूरत में?" प्रतिमा ने पूछा।
"वो सब तुम मुझ पर छोंड़ दो।" अजय ने कहा___"अभी उतना ही करो जितना कहा है। इधर मैं भी अपने काम में लग जाता हूॅ।"
"ठीक है।" प्रतिमा ने कहा___"लेकिन अभय और करुणा से सावधान रहना। अभय की तरह करुणा भी ज़रा तेज़ तर्रार है।"
"चिन्ता मत करो।" अजय ने कहा___"सबको देख लूॅगा एक एक करके। पहले इन दोनो से तो निपट लूॅ।"
"ठीक है।" प्रतिमा ने कहा___"आज विजय का खाना लेकर मैं जाऊॅगी। गौरी की तबियत बुखार के चलते परसो से कुछ खराब है। कल तो नैना गई थी विजय को खाना देने। आज मैं जाऊॅगी।"
"ठीक है।" अजय ने कहा__"और हाॅ ब्लाउज बिलकुल बड़े गले वाला पहन कर जाना। बाॅकी तो तुम समझदार ही हो।"
प्रतिमा मुस्कुरा कर बेड से उठी और कमरे से बाहर निकल गई। जबकि अजय के होठों पर एक ज़हरीली मुस्कान तैर उठी। वह उसी बेड पर आराम से लेट कर ऊपर छत में कुंडे पर तेज़ रफ्तार से घूम रहे पंखे की तरफ घूरने लगा था।
प्रतिमा जब किचेन में पहुॅची तो उसकी छोटी ननद नैना विजय के लिए टिफिन तैयार कर रही थी। नैना उस वक्त बाइस तेइस साल की थी। उसने अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी और बीएस सी करने बाद अब घर में ही रहती थी। उसकी शादी के लिए बाबू जी लड़का तलाश कर रहे थे।
"क्या कर रही हो नैना?" प्रतिमा ने बड़े प्यार से नैना से पूछा था।
"मॅझले भइया के लिए खाने का टिफिन तैयार कर रही हूॅ भाभी।" नैना ने कहा__"मॅझली भाभी की तबियत ठीक नहीं है न इस लिए ये टिफिन मैं ही ले जा रही हूॅ कल से। ख़ैर छोड़िये आप बताइये आप किस काम से किचेन में आई हैं?"
"मैं भी इसी लिए यहाॅ आई थी कि अपने देवर के लिए खाना पहुॅचा दूॅ।" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा___"बेचारी रात दिन जी तोड़ मेहनत करते हैं।"
"हीहीहीही आप तो शहर वाली हैं भाभी आप खेतों पर टिफिन लेकर जाएॅगी तो लोग क्या कहेंगे?" नैना ने हॅसते हुए कहा___"जाने दीजिए भाभी ये आपको शोभा नहीं देगा। टिफिन तैयार हो गया है अब चलती हूॅ मैं। आज तो वैसे भी देर हो गई है। मॅझले भइया के पेट में तो अब तक चेहे भी कूदने लगे होंगे।"
"तो तुम भी मुझे ताना मारने लगी हो?" प्रतिमा ने अपने चेहरे पर दुख के भाव प्रकट करते हुए कहा___"क्या मेरा इतना भी हक़ नहीं बनता कि मैं अपनी इच्छा से इस घर में कुछ कर सकूॅ?"
"ये आप क्या कह रही हैं भाभी?" नैना ने हड़बड़ाते हुए कहा___"भला मैं क्यों आपको ताना मारूॅगी। और बाकी सब भी कहाॅ आपको ताना मारते हैं?"
"सब समझती हूॅ मैं।" प्रतिमा ने कहा___"लोग मेरे सामने मेरे मुख पर नहीं बोलते लेकिन मेरे पीठ पीछे तो सब यही बोलते हैं न।
एक मैं हूॅ जो हर बार यहीं सोच कर आती हूॅ कि घर में इस बार सबका हाॅथ बटाऊॅगी और सबसे खूब हॅसूॅगी बोलूॅगी। लेकिन हर बार यहाॅ आने पर मेरी इन सभी इच्छाओं पर ग्रहण लग जाता है।"
"ओह भाभी प्लीज़।" नैना कह उठी__"आप ये सब बेकार ही सोचती हैं। आपके बारे कोई कुछ नहीं बोलता है और ना ही सोचता है ऐसा वैसा।"
"तो फिर क्यों मुझे इन सब कामों को करने से मना कर रही हो तुम?" प्रतिमा ने कहा__"मुझे करने दो ना जिसे करने का मेरा बहुत मन करता है। मैं भी सबकी तरह ये सब काम खशी खुशी करना चाहती हूॅ।"
"पर भाभी आप ये।" नैना का वाक्य अधूरा रह गया।
"देखा, फिर से वही शुरू कर दिया।" प्रतिमा ने कहा__"तुम अभी भी यही समझती हो कि मैं ये सब करूॅगी तो लोग क्या सोचेंगे। अरे हर काम की शुरूआत पर लोग ऐसा ही सोचते हैं। तो क्या हम लोगों की सोच को लेकर कोई काम ही ना करें? दूसरे लोग सोचें या न सोचें किन्तु इस घर के लोग सबसे पहले सोच लेते हैं।"
नैना हैरान परेशान देखती रह गई प्रतिमा को। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अपनी भाभी को क्या कहे।
"मैं तो ये सब इसी लिए कह रही थी भाभी क्योंकि आपको इन सब कामों की आदत नहीं है।" नैना ने कहा__"बाहर जिस्म को जला देने वाली धूप है और गर्मी इतनी कि पूछो ही मत। आप बेवजह इस धूप और गरमी में परेशान हो जाएॅगी।"
"कुछ नहीं होगा मुझे।" प्रतिमा ने कहा__"और क्या अपने देवर के लिए इतना भी नहीं कर सकती मैं?"
"अच्छा ठीक है भाभी।" नैना ने कहा__"पर मैं भी आपके साथ चलूॅगी। आप अकेले इस धूप में परेशान हो जाएॅगी।"
"नहीं नैना।" प्रतिमा ने कहा__"मुझे अकेले ही जाने दो। अकेली जाऊॅगी तो देवर जी को भी लगेगा कि उनकी भाभी को उनकी फिकर है। वरना अगर तुम्हारे साथ जाऊॅगी तो वो यही सोचेंगे कि मैं वहाॅ कोई एहसान जताने आई थी।"
"विजय भइया ऐसे नहीं हैं भाभी।" नैना ने हॅस कर कहा__"वो किसी के भी बारे में कुछ भी बुरा नहीं सोचते। बल्कि वो तो हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ मनमोहन सिंह की तरह एकदम चुप व शान्त रहने वाले हैं।"
"चलो छोड़ो ये सब।" प्रतिमा ने कहने के साथ ही नैना के हाॅथ से टिफिन ले लिया__"जब तक गौरी अच्छी तरह से ठीक नहीं हो जाती तब तक खेतों में विजय को खाना पहुॅचाने की जिम्मेदारी मेरी है। और तुम्हारी जिम्मेदारी ये है कि तुम रितू और नीलम यहाॅ हैं तब तक उनको पढ़ाओ।"
"ठीक है भाभी जैसा आप कहें।" नैना ने हॅसते हुए कहा__"आप सच में बहुत स्वीट हैं। आई लव यू माई स्वीट ऐण्ड ब्यूटीफुल भाभी।"
"ओह लव यू टू माई स्वीट ननद रानी।" प्रतिमा ने भी मुस्कुराकर कहा__"चलो अब मैं चलती हूॅ।"
इतना कह कर प्रतिमा किचेन से बाहर आ कर अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। जबकि नैना अपने कमरे की तरफ मुस्कुराते हुए चली गई। इधर कमरे में आकर प्रतिमा ने टिफिन को बेड के पास दीवार तरफ सटे एक टेबल पर रखा और फिर आलमारी की तरफ बढ़ गई।
"क्या हुआ तुम यहीं हो?" अजय सिंह ने चौंकते हुए कहा था___"अभी तक खेतों पर गई नहीं???"
"तुम तो इस सबको इतना आसान समझते हो जबकि तुम्हें पता होना चाहिए कि कहने और करने में ज़मीन आसमान का फर्क होता है।" प्रतिमा ने आलमारी से एक झीनी सी साड़ी निकालते हुए कहा था।
"वो तो मुझे भी पता है।" अजय सिंह ने कहा___"लेकिन मेरे कहने का मतलब ये था कि टिफिन तैयार करने में बेवजह इतना समय क्यों लगा दिया तुमने?"
"यार जब मैं किचेन में गई तो वहाॅ पर नैना आलरेडी टिफिन तैयार कर चुकी थी।" प्रतिमा ने कहा___"और वह टिफिन लेकर खेतों पर जाने ही वाली थी। इस लिए मुझे उसे इमोशनली ब्लैकमेल करना पड़ा।"
"क्या मतलब??" अजय सिंह चौंका।
प्रतिमा ने उसे किचेन में नैना और खुद के बीच हुई सारी बातें बता दी। सारी बातें सुनने के बाद अजय सिंह बोला___"ये बिलकुल सही किया तुमने। और अब इसके आगे का भी ऐसा ही परफेक्ट हो तो मज़ा ही आ जाए।"
"ऐसा ही होगा डियर।" प्रतिमा ने अपने जिस्म से पहले वाले कपड़े उतार दिये। अब वह ऊपर मात्र ब्रा में थी जबकि नीचे पेटीकोट था।
"इस ब्रा को भी उतार दो ना डियर।" अजय सिंह मुस्कुराया__"अपने बड़े बड़े तरबूजों के ऊपर सिर्फ ये लोकट वाला ब्लाउज ही पहन कर जाओ। ताकि उस साले मजदूर को नज़ारा करने में आसानी हो।"
"बड़े बेशर्म हो सच में।" प्रतिमा ने हॅसते हुए कहा और अपने हाॅथों को पीछे अपनी पीठ पर ले जाकर ब्रा का हुक खोल कर उसे अपने शरीर से अलग कर दिया।
"हाय, इन भारी भरकम तरबूजों पर जब उस मजदूर की दृष्टि पड़ेगी तो यकीनन उस साले की आॅखें फटी की फटी रह जाॅएॅगी।" अजय ने आह सी भरते हुए कहा था___"सारा इमान पल भर में चकनाचूर हो जाएगा उसका।"
"काश! ऐसा ही हो।" प्रतिमा ने ब्लाऊज को पहनते हुए कहा___"अगर बात बन गई तो मुझे भी एक नई चीज़ मिल जाएगी।"
"बिलकुल बात बनेगी डियर।" अजय सिंह ने ज़ोर देकर कहा___"तुम तो उर्वशी या मेनका से भी सुंदर व मालदार हो। भला तुम्हारे सामने वो मजदूर कब तक टिका रहेगा?"
"तुम हर बात पर उसे मजदूर क्यों बोल रहे हो अजय?" प्रतिमा ने कहा___"जबकि वह भी तुम्हारी तरह ठाकुर गजेन्द्र सिंह बघेल की औलाद है और तुम्हारा सगा भाई है।"
"जो भी हो।" अजय सिंह बोला__"है तो एक मजदूर ही ना? अब मजदूर को मजदूर ना कहूॅ तो और क्या कहूॅ?"
"चलो अब मैं जा रहीं हूॅ।" प्रतिमा ने आदमकद आईने में खुद को देखने के बाद कहा__"अब मेरा ड्रेस ठीक है ना?"
"एकदम झक्कास है मेरी जान।" अजय सिंह ने कहा___"इस ड्रेस में तुम्हें देख कर अब तो मुझे ऐसा लग रहा है कि अभी एक बार तुम्हें इसी बेड पर पटक कर पेल दूॅ पर जाने दो।"
प्रतिमा उसकी इस बात पर हॅस पड़ी और फिर टेबल से टिफिन उठा कर कमरे से बाहर जली गई।
________________________
वर्तमान_______
हल्दीपुर पुलिस स्टेशन !
"तो क्या जानकारी मिली तुम्हें?" अपनी कुर्सी पर बैठी रितू ने सामने खड़े हवलदार से पूछा था।
"मैडम जिन लड़के लड़कियों की लिस्ट आपने दी थी।" वह हवलदार कह रहा था जिसकी वर्दी की नेम प्लेट पर उसका नाम राम सिंह लिखा हुआ था, बोला___"उनमें से कुछ तो उसी काॅलेज के हैं जिस काॅलेज में वो पीड़िता यानी विधी चौहान पढ़ती है जबकि बाॅकी के सब बाहरी हैं। मेरा मतलब कि उस काॅलेज के नहीं हैं।"
"बाहर से कौन से लड़के लड़कियाॅ हैं?" रितू ने पूछा था।
"बाहर के तो सब लड़के ही हैं मैडम।" हवलदार रामसिंह ने कहा___"वो भी दो ही हैं। एक तो वही संपत है जो इसी इलाके का एक छोटा मोटा ग़ुडा मवाली है जबकि दूसरा संदीप अग्निहोत्री है, ये दूसरे काॅलेज में बीए लास्ट इयर का छात्र है।"
"ओके बाकी के सब लोगों के बारे में क्या पता चला?" रितू ने पूछा।
"विधी के साथ काॅलेज में पढ़ने वाली जिस लड़की की बर्थडे पार्टी थी उस रात, उसका नाम खुशी जिन्दल है। बड़े बाप की औलाद है। माॅ बाप पूणे में रहते हैं। यहाॅ पर वह अपनी एक आया के साथ रहती है और वो मकान भी उसके बाप ने ही उसे खरीद कर दिया था। ताकि वह अपनी आया के साथ रह कर काॅलेज में पढ़ाई कर सके। पार्टी में दोस्तों के रूप में चार लड़के थे और पाॅच लड़कियाॅ, जिनमे से एक लड़की खुशी जिन्दल की आया की थी। दो लड़के बाहरी थे। सभी लड़कों की डिटेल इस प्रकार है____
1, सूरज चौधरी, 22 साल का विधी के ही कालेज में एम ए का छात्र है। इसके बाप का नाम दिवाकर चौधरी है। ये शहर का पोलिटीसियन है। इसके बारे में सारा शहर जानता है कि ये कैसा आदमी है। इसके कई गैर कानूनी धंधे भी कानून के नाक के नीचे से चलते हैं। सूरज चौधरी अपने बाप की बिगड़ी हुई औलाद है। पता चला है कि इसने कई लड़कियों की ज़िंदिगियाॅ बरबाद की हैं। अपनी सुंदर पर्शनालिटी और पैसों की वजह से कोई भी लड़की इसकी तरफ आकर्षित हो जाती है। ये लड़कियों को प्यार के जाल में फॅसा कर उनकी अश्लील वीडियो बना कर उन्हें हर तरह के काम करने के लिए ब्लैकमेल करता है। विधी चौहान इससे प्यार करती है।
2, अलोक वर्मा, ये भी सूरज के साथ ही पढ़ता है। सूरज का पक्का यार है ये। बाप बहुत साल पहले गंभीर बीमारी से चल बसा था तब से यह अपनी विधवा माॅ के साथ ही रहता है। इसकी माॅ किसी प्राइवेट कंपनी में काम करती है।
3, किशन श्रीवास्तव, ये भी सूरज के साथ ही कालेज में पढ़ता है। इसके बाप का नाम अवधेश श्रीवास्तव है। ये इसी शहर का एक क्रिमिनल लायर है। इसके दिवाकर चौधरी से बड़े गहरे संबंध हैं। दिवाकर चौधरी के हर ग़ैरकानूनी काम में ये उसकी हर तरह से मदद करता है।
4, रोहित मेहरा, ये भी सूरज के साथ ही उस कालेज में पढ़ता है। इसके बाप ईआ नाम अशोक मेहरा है। ये शहर का बिल्डर है।
पैसों की कोई कमी नहीं है इसके पास। सुना है कई ज़मीनों पर इसने अवैध कब्जा किया हुआ है। इसके भी दिवाकर चौधरी और वकील अवधेश श्रीवास्तव से बड़े गहरे संबंध हैं।
5, नीता ब्यास, ये 20 साल की है और विधी के साथ ही उस कालेज में पढ़ती है। ये इन्दौर की रहने वाली है। यहाॅ पर ये अपने मामा जी के यहाॅ रह कर ही पढ़ाई कर रही है।
6, अनीता ब्यास, ये नीता की जुड़वा बहन है तथा ये भी अपनी बहन के साथ ही मामा जी के यहाॅ रहकर पढ़ाई कर रही है।
7, स्नेहा शर्मा, ये 20 साल की है, ये भी विधी के साथ ही कालेज में पढ़ती है। इसका बाप सरकारी बैंक में मैनेजर है।
8, संजना सिंह, ये 20 साल की है, और विधी के साथ ही कालेज में पढ़ती है। इसके बाप का इसी शहर में एक बड़ा सा माॅल है। ये दो भाई बहन है। इसका भाई संजय सिंह इससे छोटा है और अभी इस साल हाई स्कूल में है।
"मैडम ये थे उस कालेज में विधी के साथ एक ग्रुप में रहने वाले लड़के लड़कियाॅ।" रामदीन ने कहा___"मैने अपने तरीके से पता किया है कि विधी के साथ जो घटना घटित हुई उसमें सूरज चौधरी मुख्य आरोपी है। सूरज के साथ ही इस हादसे को अंजाम देने में उसके ये चारों दोस्त और उस बर्थडे गर्ल यानी खुशी जिन्दल का भी बराबर का हाॅथ है। बात दरअसल ये थी कि विधी एक अच्छे घर की और अच्छे संस्कारों वाली लड़की थी। वह खूबसूरत थी। कभी किसी लड़के को भाव नहीं देती थी। आज से दो तीन साल पहले वह किसी विराज सिंह नाम के लड़के से प्यार करती थी जो उसके साथ ही स्कूल में पढ़ता था। वो स्कूल और ये कालेज लगभग पास में ही थे इस लिए सूरज की नज़र इस पर बहुत पहले से ही थी। उसने बड़ी मुश्किल से किसी तरह इससे दोस्ती कर ली थी। उसके बाद ऐसे ही एक दिन इसने अपने जन्मदिन पर अपने सभी दोस्तों को फार्महाउस पर इन्वाइट किया था। विधी को भी उसने खासतौर पर इन्वाइट किया था। विधी जब इसके फार्महाउस पर उस शाम गई तो पार्टी में सब काफी एंज्वाय कर रहे थे। इस बीच सूरज ने विधी को अपनी दोस्ती का वास्ता देकर इसे कोल्ड ड्रिंक पिला दिया। उस कोल्ड ड्रिंक में हल्का ड्रग्स भी मिला हुआ था। विधी ने जब उस कोल्ड ड्रिंक को पिया तो उसे कुछ देर बाद चक्कर से आने लगे। सूरज अपनी चाल में कामयाब हो चुका था, उसने अपनी एक दोस्त जिसका नाम रिया सचदेवा था उससे कह कर विधी को कमरे में ले गई और उसे बेड पर लिटा दिया। विधी को कुछ होश नहीं था। इधर सूरज कमरे में आया और विधी के जिस्म से सारे कपड़े उतार कर और खुद भी पूरी तरह निर्वस्त्र होकर विधी के साथ गंदा काम किया। इस सबकी वीडियो सूरज का ही एक दोस्त अलोक वर्मा बना रहा था। ख़ैर जब विधी को होश आया तो वह अपने घर में अपने ही बेडरूम थी। उसे पिछली शाम का सब कुछ याद आया।
उसे इस बात की हैरानी हुई कि वह अपने घर कैसे आई? तब उसकी माॅ ने बताया कि उसकी एक दोस्त जिसका नाम रिया था वह उसे छोंड़ कर गई थी। विधी की माॅ ने उसे इस बात के लिए डाॅटा भी था कि उसने शराब क्यों पी थी? विधी ने कहा वो शराब नहीं बस कोल्ड ड्रिंक ही था शायद किसी ने ग़लती से उसमें कुछशराब मिला दी होगी। ख़ैर ये बात तो चली गई। लेकिन माॅ के जाने के बाद जब विधी बेड से उठकर बाथरूम की तरफ जाने के लिए बेड से नीचे उतरी तो उसकी चीख़ निकलते निकलते रह गई। अपने पैरों पर उससे खड़े ही ना हुआ गया। उसे समझते देर न लगी कि उसके साथ क्या हुआ है। किन्तु अब समझने से भला क्या हो सकता था? वह तो लुट चुकी थी। बरबाद हो चुकी थी। वह इस बात को अपने माॅ बाप से बता भी नहीं सकती थी। अकेले में वह खूब रोती। इस बात कई दिन गुज़र गए। वह स्कूल नहीं गई थी कई दिन से। माॅ से उसने बता दिया था कि उसकी तबियत ठीक नहीं है। फिर एक दिन उसके मोबाइल पर एक अंजान नंबर से एम एम एस आया। जिसे देख कर उसके पैरों तले से ज़मीन निकल गई। उसे सारा संसार अंधकारमय दिखने लगा था। तभी उसी नंबर से काल भी आया। उसने जब उस काल को रिसीव किया तो सामने से सूरज की आवाज़ को सुन कर चौंक गई। वह उसे बड़ी बेशर्मी से कह रहा था कि कैसी लगी हम दोनो की फिल्म? विधी रोती गिड़गिड़ाती रही और पूछती रही कि उसने उसके साथ उसकी दोस्ती के साथ इतना बड़ा छल क्यों किया? आख़िर क्यों उसने उसे इस तरह बरबाद कर दिया? मगर वो तो शिकारी था। खूबसूरत लड़कियों का शिकारी। सूरज ने धमकी देते हुए कहा कि अगले दिन स्कूल आए और उसके साथ उसके फार्महाउस पर चले वरना वह ये एम एम एस उसके बाप के मोबाइल पर भेज देगा। विधी मरती क्या न करती वाली स्थित में आ चुकी थी। बस यहीं से उसकी बरबादी की दास्तां शुरू हो गई। वह हर बार सूरज के द्वारा ब्लैकमेल होती रही। विधी जिस विराज नाम के लड़के से प्यार करती थी उससे उसने संबंध तोड़ लिया था। ऐसे ही दिन महीने साल गुजर गए। विधी पढ़ने में होशियार थी। कालेज में हमेशा वह अपनी ग्रुप की लड़कियों से टाप करती थी। खुशी जिन्दल इस बात से उससे बेहद जलती थी। इस लिए उसने सूरज के साथ मिलकर पिछली रात इस गंभीर हादसे को अंजाम दिया था।"
"मामला तो पूरी तरफ पहले ही साफ था रामदीन।" रितू ने कहा___"मैने दूसरी मुलाक़ात में विधी से इस सबकी सारी सच्चाई जानने की बहुत कोशिश की लेकिन उसने कुछ नहीं बताया। इस लिए मुझे तुम्हें इस काम में लगाना पड़ा। ख़ैर, यकीनन तुमने शानदार जानकारी हासिल की है।"
"शुक्रिया मैडम।" रामदीन खुश हो गया, बोला___"पर मुझे ये समझ में नहीं आ रहा कि विधी ने आपको इस सबकी सारी बातें क्यों नहीं बताई? जबकि होना तो ये चाहिए था कि उसे अब ऐसे हरामियों के खिलाफ सारा सच उगल कर उन्हें कानून के लेपेटे में डलवा देना चाहिए था।
"
"सबकी अपनी कुछ न कुछ मजबूरियाॅ होती हैं रामदीन।" रितू ने गंभीरता से कुछ सोचते हुए कहा___"कुछ ऐसी भी बातें होती हैं जिन्हें किसी भी हाल में कह पाना संभव नहीं हो पाता। या फिर ये सोच कर उसने मुझे कुछ नहीं बताया कि कानून भी भला उन लोगों का क्या कर लेगा? वह जानती है कि जिन लोगों ने उसके साथ ये कुकर्म किया वो बड़े बड़े लोगों की बिगड़ी हुई औलादें हैं। कानून उन तक पहुॅच ही नहीं सकता।"
"तो क्या इस केस की फाइल ऐसे ही बंद कर दी जाएगी मैडम?" रामदीन चौंका___"क्या उस बेचारी लड़की के साथ इंसाफ नहीं हो पाएगा?"
"मैने ऐसा तो नहीं कहा रामदीन।" रितू कुर्सी से उठ कर तथा वहीं पर चहल कदमी करते हुए बोली___"लड़की के साथ इंसाफ ज़रूर होगा। फिर भले ही उसके लिए कोई दूसरा रास्ता ही क्यों ना चुनना पड़े।"
"मैं कुछ समझा नहीं मैडम?" रामदीन ने उलझनपूर्ण भाव से कहा।
"सब समझ जाओगे रामदीन।" रितू के चेहरे पर कठोरता आ गई थी___"बस समय का इंतज़ार करो।"
रामदीन को बिलकुल भी समझ ना आया कि उसकी ये आला अफसर क्या कहे जा रही है? जबकि रितू ने टेबल पर रखी पीकैप को उठा कर उसे सिर पाया ब्यवस्थित किया और फिर लम्बे लम्बे डग भरती हुई थाने से बाहर निकल गई।
________________________
फ्लैशबैक अब आगे______
नैना ने सच ही कहा था कि बाहर तेज़ धूप और भयानक गर्मी में वह परेशान हो जाएगी। प्रतिमा की हालत ख़राब हो चली थी। सिर पर पड़ी तेज़ धूप और गर्मी ने उसका बुरा हाल कर दिया था। आसमान में सफेद बादल छाए थे और हवा भी न के बराबर ही चल रही थी। जिसकी वजह से वह पसीना पसीना हो चली थी।
पतली सी पिंक कलर की साड़ी तथा उसी से मैच करता बड़े गले का ब्लाउज। जिसमें कैद उसकी भारी भरकम चूचियाॅ उसके चलने पर एक लय से ऊपर नीचे थिरक रही थी। ब्लाउज के ऊपरी हिस्से से उसकी सुडौल चूचियों का एक चौथाई हिस्सा स्पष्ट दिख रहा था। गोरे सफ्फाक बदन पर ये लिबास उसकी खूबसूरती और मादकता पर जैसे चार चाॅद लगाए हुए था। प्रतिमा तीन बच्चों की माॅ थी लेकिन मजाल है कि कोई ये ताड़ सके कि ये खूबसूरत बला तीन तीन बच्चों की माॅ है।
ऐसा नहीं था कि वह कभी खेतों पर नहीं गई थी। एक दो बार वह पहले ही कभी गई थी। इस लिए उसे खेतों के रास्ते का पता था। हवेली से एक किलो मीटर की दूरी पर खेत थे। इधर का हिस्सा गाॅव के उत्तर दिशा की तरफ तथा गाॅव से हट कर था।
प्रतिमा जब खेतों पर पहुॅची तो उसने देखा कि हर तरफ सुन्नाटा फैला हुआ है। बहुत से खेतों पर गेहूॅ की फसल पक कर तैयार खड़ी थी और एक तरफ से उसकी कटाई भी चालू थी। हलाॅकि इस वक्त वहाॅ पर कहीं भी कोई मजदूर फसल काटते हुए दिख नहीं रहा था। शायद तेज़ धूप के कारण काम बंद था या फिर सभी मजदूर दोपहर में खाना खाने के लिए खए होंगे।
प्रतिमा की हालत भले ही खराब हो चुकी थी किन्तु जब उसने खेतों पर हर जगह सुनापन देखा तो वह इससे खुश भी हो गई। उसे लगा चलो जिस मकसद से वह यहाॅ आई है वह बेझिझक हो जाएगा। कोई देखने सुनने वाला भी नहीं है यहाॅ। उसने देखा एक तरफ खेतों पर ही बड़ा सा पक्का मकान बना था। मकान के बाहर दो स्वराज कंपनी के ट्रैक्टर व थ्रेशर मशीन खड़ी थी। मकान का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।
प्रतिमा ने धड़कते दिल से मुख्य दरवाजे के अंदर कदम रखा ही था कि किसी से बड़े ज़ोर से टकराई। उसकी भारी भरकम छातियों में किसी पुरूष का फौलाद जैसा सीना टकराया था। प्रतिमा इस अचानक हुई घटना से बुरी तरह घबरा गई। टक्कर लगते ही वह पीछे की तरफ बड़ी तेज़ी से गिरने ही लगी थी कि सामने नजर आए पुरूस ने बड़ी सीघ्रता से उसका हाॅथ पकड़ कर उसे पीछे गिरने से बचा लिया।
प्रतिमा का दिल बुरी तरह धड़के जा रहा था। ख़ैर सम्हलने के बाद उसकी नज़र सामने खड़े शख्स पड़ी तो चौंक गई। सामने उसका देवर विजय सिंह सिर झुकाए खड़ा था। उसे इस तरह सिर झुकाए देख प्रतिमा को समझ न आया कि ये सिर झुकाए क्यों खड़ा है?
"क्या बात है देवर जी?" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा___"ज़रा देख कर तो चला कीजिए। भला कोई इतनी भी ज़ोर से टक्कर मारता है क्या??"
"माफ़ कर दीजिए भाभी।" विजय सिंह ने सिर झुकाए हुए ही शर्मिंदगी से बोला__"मुझे उम्मीद ही नहीं थी कोई इस तरह सामने से आ जाएगा।"
"चलो कोई बात नहीं विजय।" प्रतिमा ने माहौल को समान्य बनाने की गरज से कहा___"ग़लती सिर्फ तुम्हारी ही बस नहीं है, मेरी भी है क्योंकि मैने भी तो ये आशा नहीं की थी कोई मेरे सामने से इस तरह आ टकराएगा।"
"पर मुझे देख कर बाहर आना चाहिए था न भाभी।" विजय सिंह ने खेद भरे भाव से कहा।
"ओहो विजय।" प्रतिमा ने कहा___"इसमें इतना खेद प्रकट करने की कोई ज़रूरत नहीं है। लेकिन हाॅ एक बात तो कहूॅगी मैं।"
"जी कहिए भाभी।" विजय ने कहा__"अगर आप कोई सज़ा देना चाहती हैं तो ज़रूर दीजिए। ऐसी धृष्ठता के लिए मुझे सज़ा तो मिलनी ही चाहिए।"
"ओफ्फो विजय फिर वही बात।" प्रतिमा हैरान थी कि विजय किस टाइप का इंसान है। क्या दुनियाॅ में कोई इतना भी शरीफ़ हो सकता है? फिर बोली___"मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है विजय। मैं तो बस ये कहने वाली थी कि क्या फौलाद का सीना है तुम्हारा जो मेरी कोमल छातियों का कचूमर बना दिया था?"
"ज जी क्या मतलब?" विजय बुरी तरह चौंका था। सिर उठाकर हैरानी से अपनी भाभी की तरफ देखने लगा था वह।
"इतने भोले ना बनो विजय।
" प्रतिमा ने हॅसते हुए कहा___"तुम भी अच्छी तरह समझ गए हो कि मेरे कहने का क्या मतलब था?"
"अरे ये सब बेकार की बातें छोंड़िए भाभी और ये बताइये कि आप यहाॅ इतनी धूप व गर्मी में क्यों आई हैं?" विजय ने बेचैनी से पहलू बदला था___"नैना क्यों नहीं आई? और आपको भी इतना तकल्लुफ करने की क्या ज़रूरत थी भला?"
"क्या तुम्हें मेरा यहाॅ आना अच्छा नहीं लगा विजय?" प्रतिमा ने दुखी भाव का नाटक करके कहा___"क्या मैं यहाॅ नहीं आ सकती?"
"न नहीं भाभी ऐसी कोई बात नहीं है।" विजय ने हड़बड़ाकर कहा___"मैं बस इस लिए ऐसा कह रहा हूॅ क्योंकि तेज़ धूप और गर्मी बहुत है। ऐसे माहौल की आपको आदत नहीं है ना?"
"देखो विजय तुम भी नैना की तरह मुझे ताना मत मारने लग जाना।" प्रतिमा ने कहा__"तुम सब मुझे ऐसा कह कर दुखी क्यों करते हो? मेरा भी दिल करता है कि मैं भी तुम सबकी तरह ये सब करूॅ। लेकिन तुम सब अपनी इन बातों से मुझे ये सब करने ही नहीं देते। मैं ही पागल हूॅ जो बेकार में इस हवेली के लोगों को अपना मानती हूॅ और चाहती हूॅ कि सब मुझे भी अपना समझें।"
"ये आप क्या कह रही हैं भाभी?" विजय हैरान परेशान सा बोला___"भला हम सब आपके लिए ऐसा क्यों सोचेंगे? माॅ बाबूजी के बाद आप दोनो ही तो हम सबसे बड़ी हैं इस लिए हम सब यही चाहते हैं आप कुछ ना करें बल्कि आराम से बैठ कर खाइये और हम छोटों को सेवा करने का भाग्य प्रदान करें।"
"बस बस सब समझती हूॅ मैं।" प्रतिमा ने तुनकते हुए कहा__"अब क्या यहीं पर खड़े रहेंगे या अंदर भी चलेंगे? चलिए अंदर और हाॅ हाॅथ मुह धोकर जल्दी से आइये। तब तक मैं थाली लगाती हूॅ।"
"जी ठीक है भाभी।" विजय ने कहा और बाहर की तरफ बढ़ गया। जबकि प्रतिमा अंदर की तरफ बढ़ गई।
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,
दोस्तो आप ये बताइये कि फ्लैशबैक को इसी तरह वर्तमान के साथ लेकर चलूॅ या खाली फ्लैशबैक ही रहने दूॅ???
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट...........《 30 》
अब तक,,,,,,,,,
"क्या तुम्हें मेरा यहाॅ आना अच्छा नहीं लगा विजय?" प्रतिमा ने दुखी भाव का नाटक करके कहा___"क्या मैं यहाॅ नहीं आ सकती?"
"न नहीं भाभी ऐसी कोई बात नहीं है।" विजय ने हड़बड़ाकर कहा___"मैं बस इस लिए ऐसा कह रहा हूॅ क्योंकि तेज़ धूप और गर्मी बहुत है। ऐसे माहौल की आपको आदत नहीं है ना?"
"देखो विजय तुम भी नैना की तरह मुझे ताना मत मारने लग जाना।" प्रतिमा ने कहा__"तुम सब मुझे ऐसा कह कर दुखी क्यों करते हो? मेरा भी दिल करता है कि मैं भी तुम सबकी तरह ये सब करूॅ। लेकिन तुम सब अपनी इन बातों से मुझे ये सब करने ही नहीं देते। मैं ही पागल हूॅ जो बेकार में इस हवेली के लोगों को अपना मानती हूॅ और चाहती हूॅ कि सब मुझे भी अपना समझें।
"
"ये आप क्या कह रही हैं भाभी?" विजय हैरान परेशान सा बोला___"भला हम सब आपके लिए ऐसा क्यों सोचेंगे? माॅ बाबूजी के बाद आप दोनो ही तो हम सबसे बड़ी हैं इस लिए हम सब यही चाहते हैं आप कुछ ना करें बल्कि आराम से बैठ कर खाइये और हम छोटों को सेवा करने का भाग्य प्रदान करें।"
"बस बस सब समझती हूॅ मैं।" प्रतिमा ने तुनकते हुए कहा__"अब क्या यहीं पर खड़े रहेंगे या अंदर भी चलेंगे? चलिए अंदर और हाॅ हाॅथ मुह धोकर जल्दी से आइये। तब तक मैं थाली लगाती हूॅ।"
"जी ठीक है भाभी।" विजय ने कहा और बाहर की तरफ बढ़ गया। जबकि प्रतिमा अंदर की तरफ बढ़ गई।
___________________________
अब आगे,,,,,,,,,,,
फ्लैशबैक आगे_______
थोड़ी ही देर में विजय सिंह हाॅथ मुह धोकर आया और जैसे ही वह अंदर एक बड़े हाल से होते हुए एक कमरे में दाखिल हुआ तो बुरी तरह चौंका। कारण कमरे के अंदर प्रतिमा लकड़ी की एक बेन्च पर झुक कर टिफिन से खाना निकाल निकाल कर उसे अलग अलग करके रख रही थी। किन्तु झुकने की वजह से उसकी साड़ी का आॅचल कंधे से खिसक कर ज़मीन पर गिरा हुआ था। उसने आॅचल को आलपिन के सहारे ब्लाउज पर फसाया हुआ नहीं था। ऐसा उसने जानबूझ कर ही किया था। ताकि वह जब चाहे बड़ी आसानी से झुक कर अपना आॅचल गिरा कर विजय को अपनी खरबूजे जैसी बड़ी बड़ी किन्तु ठोस चूचियाॅ दिखा सके। उसने जो ब्लाउज पहना था वह बड़े गले का था, पीठ पर भी काफी ज्यादा खुला हुआ था। अंदर ब्रा ना होने के कारण उसकी आधे से ज्यादा चूचियाॅ दिख रही थी। वह जानती थी कि विजय हाथ मुह धोकर आ चुका है और अब वह कमरे के दरवाजे के पास उसके द्वारा दिखाए जाने वाले हाहाकारी नज़ारे को देख एकदम से बुत बन गया है।
प्रतिमा बिलकुल भी ज़हिर नहीं कर रही थी कि वो ये सब जानबूझ कर रही है। बल्कि वह यही दर्शा रही थी कि उसे अपनी हालत का पता ही नहीं है। उसने एक बार भी सिर उठा कर दरवाजे पर खड़े विजय की तरफ नहीं देखा था। बल्कि वह उसी तरह झुकी हुई टिफिन से खाना निकाल कर अलग अलग रख रही थी।
विजय सिंह मुकम्मल मर्द था किन्तु उसमें शिष्टाचार और संस्कार कूट कूट कर भरे हुए थे। उसे अपने से बड़ों का आदर सम्मान करना ही आता था। अपनी पत्नी के अलावा वह किसी भी औरत पर ऐसी नज़र नहीं डालता था। खेतों पर काम करने वाली हर ऊम्र की औरतें भी थी मगर मजाल है जो विजय सिंह ने कभी उन पर गंदी नज़र डाली हो। ये तो फिर भी उसकी सगी भाभी थी। कहते हैं बड़ी भाभी माॅ समान होती है, उस पर गंदी दृष्टि डालना पाप है।
विजय सिंह को तुरंत ही होश आया। वह एकदम से हड़बड़ा गया और साथ ही उसके अंदर अपराध बोझ सा बैठता चला गया। उसका मन भारी हो गया। अपने ज़हन से इस दृष्य को तुरंत ही झटक दिया उसने। मन ही मन भगवान से हज़ारों बार तौबा की उसने। उसके बाद वह बेवजह ही खाॅसते हुए कमरे के अंदर दाखिल हुआ।
उसका खाॅसने का तात्पर्य यही था कि उसकी भाभी उसके खाॅसने की आवाज़ से अपनी स्थिति को सम्हाल ले। मगर विजय की हालत उस वक्त ख़राब हो गई जब उसके खाॅसने का प्रतिमा पर कोई असर ही न हुआ। बल्कि वह तो अभी भी यही ज़ाहिर कर रही थी कि उसे अपनी हालत का पता ही नहीं है। उसने तो जब विजय को देखा तो बस यही कहा___"लो विजय मैने तुम्हारा स्वादिष्ट भोजन अलग अलग करके लगा दिया है। चलो शुरू हो जाओ, देख लो अभी गरमा गरम है।"
विजय को सिर झुका चुपचाप बेन्च के इस तरफ ही रखी कुर्सी पर बैठ गया और चुपचाप खाना खाने लगा।
"उफ्फ विजय यहाॅ खेतों में इस गर्मी में भी कितनी मेहनत करते हो तुम।" प्रतिमा ने आह सी भरते हुए कहा___"पर शायद तुम्हारी इस सबकी आदत हो गई है। इस लिए तुम पर जैसे कुछ फर्क ही नहीं पड़ता। मेरा तो गर्मी के मारे बुरा हाल हुआ जा रहा है। ऐसा लगता है जैसे सारे कपड़े उतार कर फेंक दूॅ अभी।"
प्रतिमा की इस बात से विजय सिंह को ठसका लग गया। वह ज़ोर ज़ोर से खाॅसने लगा।
"अरे क्या हुआ आराम से खाओ विजय।" प्रतिमा मन ही मन मुस्कुराई थी।
उसे खाॅसता देख प्रतिमा तुरंत ही एक तरफ मटके में रखे पानी को ग्लास में भर कर ग्लास विजय के मुह से लगा दिया। विजय की नज़र एक बार फिर से प्रतिमा के खरबूजों पर पड़ गई। इस बार तो वह उसके बहुत ही पास थी। उसके खरबूजे विजय की आॅखों से बस एक फुट ही दूर थे। इतने पास से वह उन्हें स्पष्ट देख रहा था। गोरे गोरे खरबूजों पर एक एक किन्तु छोटा सा तिल जो उन्हें और भी ज्यादा रसदार व हालत को खराब करने वाला बना रहा था। प्रतिमा इस सारी क्रिया में यही दर्शा रही थी कि उसे अभी भी अपनी हालत का कुछ पता नहीं है। और इस बार तो जैसे वह फिक्रवश ऐसा कर रही थी।
बड़ी मुश्किल से विजय के गले से पानी नीचे उतरा। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? आज पहली बार वह ऐसी सेचुएशन के बीच फॅसा था। विजय जब पानी पी चुका तो प्रतिमा ने भी उसके मुख से ग्लास हटा लिया, हलाॅकि ये उसकी मजबूरी ही थी। क्योकि अगर वो ऐसा न करती तो विजय को शक भी हो सकता था कि वह इस तरह उसके इतने पास झुकी क्यों है?
किन्तु विजय सिंह पर रहम तो उसने अभी भी नहीं किया। वह अभी भी अपना आॅचल गिराए हुए ही थी। अंदाज़ वहीं था जैसे उसे इसका पता ही न हो। वह जानती थी कि विजय उसे इस तरह देख कर बहुत ज्यादा असहज महसूस कर रहा है।
उसके मन में आया कि कहीं विजय ये न सोच बैठे कि मुझे अपनी हालत का इतने देर से पता क्यों नहीं हो रहा? या फिर ऐसा मैं जानबूझ कर उसे दिखा रही हूॅ। अगर विजय को ये शक हो गया या उसने ऐसा महसूस कर लिया तो काम पहले ही ख़राब हो जाएगा। जबकि मुझे ये सब बहुत आगे तक करना है। शुरुआत में इतना ज्यादा दिखावा ठीक नहीं होगा। ये सोच कर ही वह सम्हल गई।
"हाय दैया।
" उसने चौंकने और सकपकाने की बड़ी शानदार ऐक्टिंग की___"मेरा आॅचल कैसे गिर गया।"
इतना कह कर उसने जल्दी से अपने आॅचल को पकड़ कर उसे अपने खरबूजों ढॅकते हुए कंधे पर डाल लिया। फिर जैसे उसने माहौल को बदलने की गरज से विजय से कहा___"कल से मैं तुम्हारे लिए दूध भी ले आया करूॅगी विजय।"
"ज जी,,,,।" विजय बुरी तरह चौंका था___"दू दूध...मगर किस लिए भाभी?"
"तुम भी हद करते हो विजय।" प्रतिमा ने कहा___"खेतों में रात दिन इतनी मेहनत करते हो और रूका सूखा खाओगे तो कमज़ोर नहीं पड़ जाओगे? इस लिए मेहनत के हिसाब से उस तरह का आहार भी लेना चाहिए।"
"भाभी, इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।" विजय ने झिझकते हुए कहा___"और वैसे भी मुझे दू दूध पसंद नहीं है।"
"क्याऽऽ????" प्रतिमा ने चौंकने का नाटक किया___"हे भगवान! कैसे आदमी हो तुम विजय? तुम्हें दूध नहीं पसंद?? अरे दूध के लिए सारी दुनियाॅ पागल है।"
"क्या मतलब???" विजय गड़बड़ा गया, बोला___"भला इसके लिए सारी दुनियाॅ कैसे पागल हो सकती है???"
"तुम भी ना बुद्धू के बुद्धू ही रहोगे।" प्रतिमा ने बुरा सा मुह बनाया___"ये बताओ कि आज कल दूध के बिना किसी का गुज़ारा है क्या? नहीं ना? सुबह उठते ही सबसे पहले दूध की ही बनी चाय चाहिए होती है। और इतना ही नहीं बल्कि एक दिन में कम से कम चार बार आदमी चाय पीता है। बाॅकी बहुत सी चीज़ें जो दूध से ही बनती हैं उनका तो हिसाब ही अलग है। अब जब यही दूध किसी को न मिलो तो सोचो दुनिया पागल हो जाएगी कि नहीं?"
"हाॅ ये तो है।" विजय ने कहा।
"इसी लिए कहती हूॅ।" प्रतिमा ने कहा__"कल से तुम्हारे लिए दूध लाया करूॅगी और फिर मैं खुद ही तुम्हें दूध पिलाऊॅगी। देखूॅगी कैसे नहीं पियोगे तुम?"
विजय सिंह की हवा शंट। वह हैरान परेशान सा प्रतिमा को देखने लगा। जबकि उसकी इस हालत को देख कर प्रतिमा मन ही मन हॅस रही थी। किन्तु प्रत्यक्ष में यही दिखा रही थी वो ये सब उसकी सेहत का ध्यान में रख कर कह रही थी। पर चूॅकि इन बातों में उसके दो अर्थ निकल रहे थे जो विजय सिंह को असमंजस में डाल कर असहज कर रहे थे।
"क्या हुआ चुप क्यों हो गए विजय?" प्रतिमा ने कहा___"दूध की बातों से तो नहीं घबरा गए तुम?"
"न न नहीं तो।" विजय सकपका गया।
"देखो विजय।" प्रतिमा ने कहा___"तुम जो मेहनत करते हो उसके लिए दूध घी का सेवन करना बहुत ज़रूरी है। वरना बुढ़ापे में किसी काम के नहीं रह जाओगे तुम। आज गौरी को भी बोलूॅगी कि तुम्हारे खाने पीने का अच्छी तरह से ख़याल रखा करे। अभी जब तक बच्चों की छुट्टियाॅ हैं तब तक मैं रोज़ाना तुम्हें खुद अपने हाथ से टिफिन तैयार करके लाऊॅगी।"
"आ आप तो बेवजह परेशान हो रही हैं भाभी।" विजय ने बेचैनी से कहा___"मैं रोज़ाना स्वादिष्ट और फायदेमंद भोजन ही करता हूॅ।"
"वो तो मुझे दिख ही रहा है।
" प्रतिमा ने घूर कर देखा विजय सिंह को, बोली___"अगर वैसा ही भोजन करते तो अपने शरीर की ऐसी हालत नहीं बना लेते तुम।"
"ऐसी हालत????" विजय ने चौंकते हुए कहा___"क्या हुआ भला मेरी हालत को?? अच्छा भला तो हूॅ भाभी।"
"बस बस रहने दो तुम।" प्रतिमा ने कहा__"पोज तो ऐसे दे रहे हो जैसे दारा सिंह तुम्हीं हो।"
विजय सिंह को समझ न आया कि वो क्या कहे? दरअसल उसे अपनी भाभी से ऐसी बात करने का ये पहला अवसर था। शादी के बाद कभी ऐसे मधुर संबंध ही नहीं रहे थे कि वो अपनी प्रतिमा भाभी से कभी बात करता या घुलता मिलता। ख़ैर विजय सिंह ने किसी तरह खाना खाया और सीघ्र ही उठ कर कमरे से बाहर चला गया। कमरे से बाहर जब वह आया तब उसने जैसे राहत की साॅस ली। वह बाहर भी रुका नहीं बल्कि खेतों की तरफ तेज़ तेज़ करमों से बढ़ता चला गया। जबकि कमरे से भागते हुए बाहर आई प्रतिमा ने जब विजय को दूर खेतों पर जाते देखा तो उसके होठों पर कमीनी मुस्कान रेंग गई।
"आज तो इतना ही काफी था विजय।" प्रतिमा ने अजीब भाव से कहा___"मगर इतने से डोज में ही तुम्हारी ये हालत बता रही है कि तुम ज्यादा दिनों तक मेरे सामने टिक नहीं पाओगे। मेरे इस हुस्न के जाल में जल्द ही फॅस जाओगे। हाय विजय, थोड़ा जल्दी फॅस जाना मेरी जान क्योंकि ज्यादा देर तक बर्दास्त नहीं कर पाऊॅगी मैं।"
यही सब बड़बड़ाती हुई प्रतिमा वापस कमरे में गई। और बेन्च से टिफिन वाले सब बर्तन इकट्ठा करके वह कमरे से बाहर आ गई। कमरे के दरवाजों को ढुलका कर वह मकान से बाहर आ गई और फिर हवेली की तरफ बढ़ चली। मन में कई तरह के ख़याल बुने जा रही थी वह।
__________________________
इधर हवेली में दोपहर को हर कोई अपने अपने कमरे में होता था। बच्चों को भी दोपहर की धूप में कहीं बाहर नहीं जाने दिया छाता था। माॅ बाबूजी हमेशा की तरह नीचे वाले हिस्से पर बने अपने कमरे में ही रहते थे। बाबू जी को महाभारत पढ़ने का बड़ा शौक था। वो खाली समय में महाभारत की मोटी सी किताब लेकर आरामदायी कुर्सी पर बैठ जाते थे अपने कमरे में। जबकि माॅ जी बिस्तर पड़ी रहती। उनके घुटनों में बात की शिकायत थी इस लिए वो ज्यादा चलती फिरती नहीं थी।
राज और गुड़िया ज्यादातर अपने चाचा चाची के पास ही रहते थे। करुणा उन दोनो को पढ़ाती थी। राज से उसे बड़ा प्यार था। हवेली में सबका अपना अपना हिस्सा था। हलाॅकि उस वक्त बटवारा नहीं हुआ था लेकिन तीनो रहते उसी तरह थे अलग अलग। जबकि खाना पीना सबका साथ में ही होता था। उस समय हवेली में ऐसा था कि अंदर से ही सबके हिस्से में जाया जा सकता था। उसके लिए हर पार्टिशन में एक बड़ा सा दरवाजे थे जो ज्यादातर खुले ही रहते थे। विजय सिंह जिस हिस्से पर रहता था उसी हिस्से में माॅ बाबूजी भी नीचे रहते थे। विजय और गौरी का कमरा ऊपर वाले फ्लोर पर था। सबका खाना भी यहीं पर बनता था।
नैना अजय सिंह वाले हिस्से पर रहती थी। क्योंकि वो स्कूल के समय पर खाली ही रहता था इस लिए वह उस हिस्से में ही अकेली रहती थी। हलाॅकि उसके साथ बच्चों में से कोई भी रोज़ सोने के लिए चला जाता था।
विजय सिंह दिन में खेतों पर ही रहता था और फिर रात में ही हवेली आता था। दोपहर का खाना उसे पहुॅचा दिया जाता था। हप्ते में एक दो दिन वह खेतों पर भी रात में रुक जाता था। पर ये तभी होता था जब रुकने की ज़रूरत हो अन्यथा नहीं।
प्रतिमा के जाने के कुछ देर बाद ही अजय सिंह बेड से उठा और कमरे से बाहर आ गया। इस वक्त वह अपने हिस्से की तरफ ही था। उसे पता था कि उसकी छोटी बहन नैना उसके हिस्से पर ही ऊपर अपने कमरे में है। वह कमरे से निकल कर ऊपर जाने के लिए सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया। सीढ़ियाॅ चढ़ते हुए वह ऊपर नैना के कमरे के पास पहुॅचा। उसने बंद दरवाजे पर आहिस्ता से हाॅथ रखा और उसे कमरे की तरफ पुश किया। किन्तु कमरा अंदर से बंद था। अजय सिंह ने झुक कर दरवाजे के की-होल सें अपनी दाहिनी आॅख सटा दी। कमरे के अंदर नैना बेड पर लेटी हुई दिखी उसे। उसके हाॅथ में कोई मोटी सी किताब थी जिसे वह मन ही मन पढ़ रही थी। ये देख अजय सिंह ने राहत की साॅस ली और फिर दबे पाॅव वह नीचे उतर आया।
नीचे आकर उसने पार्टीशन वाले दरवाजे के पास पहुॅचा। किन्तु उससे पहले वह बाएॅ साइड के पार्टीशन वाले दरवाजे की तरफ भी देखा। उसने ये दरवाजा बंद कर दिया था ताकि उधर से कोई इधर का देख न सके। बाएॅ साइड वाला हिस्सा अभय सिंह व करुणा का था, तथा दाएॅ साइड विजय सिंह का जबकि बीच का हिस्सा अजय सिंह का था।
दाएॅ तरफ वाले हिस्से के पार्टीशन पर लगे दरवाजे को पार कर वह दबे पाॅव ऊपर की तरफ जाने के लिए सीढ़ियों की तरफ बढ़ा। उसे पता था कि सीढ़ियों के पास जाने के लिए उसे माॅ बाबूजी के कमरे के सामने से होकर ही गुज़रना पड़ेगा। उसका दिल अनायास ही धड़कने लगा था। माॅ बाबूजी के कमरे के पास से होकर वह दबे पाॅव ही सीढ़ियों के पास पहुॅचा। उसके बाद आहिस्ता से सीढ़ियाॅ चढ़ता चला गया वह।
ऊपर आकर वह दाहिने साइड चौड़ी बालकनी से होते हुए गौरी के कमरे के पास पहुॅचा। धाड़ धाड़ बजती धड़कनों को काबू में रखने की असफल कोशिश भी कर रहा था वह। किन्तु कहते हैं ना कि चोर का दिल बेहद कमज़ोर होता है, वही हाल अजय सिंह का था। कमरे के पास पहुॅच कर उसने दरवाजे पर हाॅथ रख कर उसे कमरे की तरफ धकेला। कमरा बेआवाज़ अंदर की तरफ पुश हो गया।
ये देख कर अजय सिंह की आॅखें चमक उठीं। उसने दरवाजे बहुत ही आहिस्ता से थोड़ा और अंदर की तरफ धकेला ताकि वह थोड़ी सी झिरी से ही पहले कमरे के अंदर की वस्तुस्थिति का पता लगा सके। ख़ैर, झिरी के बनते ही अजय सिंह ने कमरे के अंदर उस थोड़ी सी झिरी से देखा।
अंदर एक कोने की तरफ रखे बेड पर गौरी दूसरी तरफ को करवट लिए पड़ी थी। ऊपर छत पर पंखा मध्यम स्पीड से घूम रहा था जिसकी हवा से उसकी साड़ी का एक सिरा हिल रहा था। गर्मी के दिन थे इस लिए गौरी ने साड़ी को अपने बदन के ऊपरी हिस्से से हटाया हुआ था। ऊपर सिर्फ ब्लाउज ही था। गर्दन के नीचे पीठ की तरफ वाला एक तिहाई भाग दिख रहा था तथा नीचे कमर दिख रही थी। कमर के नीचे उसका पिछवाड़ा था जो कि साड़ी से ढॅका हुआ ही था। उसके नीचे उसकी साड़ी पेटीकोट सहित उटनों तक ऊपर खिसकी हुई थी जिसके कारण उसकी दूध सी गोरी पिंडिलियाॅ स्पष्ट दिख रही थी। पैरों में मोटी सी किन्तु घुंघुरूदार पायल थी।
अजय सिंह दरवाजे पर खड़ा न रह सका। वह आहिस्ता से दरवाजे को खोला और अंदर दबे पाॅव कमरे के अंदर दाखिल हो गया। अंदर आकर वह दबे पाॅव ही बेड की तरफ बढ़ा। उसके दिल की धड़कनें पूरी गति से दौड़ रही थी जिसकी धमक किसी हॅथौड़े की तरह उसे अपनी कनपटियों पर स्पष्ट बजती सुनाई पड़ रही थी।
बेड के बेहद करीब पहुॅच कर अजय सिंह रुक गया। कमरे में खिड़की से आता हुआ प्रकाश फैला हुआ था जिसकी वजह से कमरे में मौजूद हर चीज़ स्पष्ट दिखाई दे रही थी। बेड के करीब पहुॅच कर अजय सिंह ने देखा कि गौरी दूसरी तरफ करवट लिए पड़ी थी। उसने अपना बायाॅ हाॅथ मोड़ कर अपनी बाॅई कनपटी के नीचे रखा हुआ था जबकि दाहिना हाॅथ उसके पेट के आगे बेड पर टिका हुआ था। अजय सिंह धड़कते दिल के साथ झुक कर गौरी के चेहरे की तरफ देखा तो उसे पता चला कि गौरी की आॅखें बंद हैं। अजय सिंह को यकीन करना मुश्किल था कि गौरी सो रही है या फिर उसने यूॅ ही अपनी आॅखें बंद की हुई हैं।
गौरी के चाॅद जैसे चेहरे पर इस वक्त ज़माने भर की मासूमियत थी। आज कल उसकी तबीयत ज़रा नाशाद थी इस लिए उसके चेहरे पर वो नूर नहीं दिख रहा था जो हमेशा रहता था। किन्तु अजय सिंह को तो जैसे ऐसा चेहरा भी किसी नूर से कम न था। वह ये मान चुका था कि गौरी दुनियाॅ की सबसे खूबसूरत औरत है। उसकी खुद की बीवी भी खूबसूरती में कम न थी लेकिन गौरी के सामने उसकी खूबसूरती जैसे फीकी पड़ जाती थी। परिवार की हर औरत खूबसूरती में एक दूसरे को मात दे रही थी। लेकिन अजय सिंह का दिल गौरी के लिए धड़कता था। वह समझ नहीं पा रहा था कि ये वह गौरी की खूबसूरती पर हवस की वजह से आकर्शित था या फिर उसे गौरी से प्रेम था।
अजय सिंह ने थोड़ा और आगे की तरफ झुक कर देखा तो एकाएक ही उसके मन में संगीत सा बज उठा। गौरी के सीने के दोनो बड़े बड़े उभार आपस में दबे होने की वजह से उसकी ब्लाउज से बाहर झाॅक रहे थे। अजय सिंह जैसे उनमें ही खो गया। तभी वह बुरी तरह डर भी गया। क्योंकि उसी वक्त गौरी ने एक गहरी साॅस लेते हुए पहले तो हल्की सी अॅगड़ाई ली और फिर सीधी लेट गई।
अजय सिंह की धड़कन जो बुरी तरह बढ़ गई थी वो अब इस दृश्य को देख कर जैसे रुक ही गई। गौरी सीधी लेट गई थी। जैसा कि बताया जा चुका है कि गौरी ने गर्मी के चलते अपनी साड़ी को अपने ऊपरी भाग से हटाया हुआ था। इस लिए उसके सीधा लेटते ही ब्लाउज में कैद उसकी भारी छातियाॅ एकदम से तन गई थी। नीचे दूध सा गोरा नंगा पेट और उस पर उसकी गहरी नाभी। अजय सिंह की हालत एक पल में खराब हो गई। उसका जी चाहा कि वह तुरंत झुक कर गौरी के पेट और नाभी को अपनी जीभ से चूसना चाटना शुरू कर दे किन्तु वह ऐसा कुछ चाह कर भी नहीं कर सकता था।
गौरी की छातियाॅ बिना ब्रा के किसी कुतुब मीनार की तरह तनी हुई थी। अजय सिंह की नापाक नज़रें गौरी के पूरे जिस्म को जैसे स्कैन सा कर रही थीं। उसका खूबसूरत चेहरा और बिना लिपिस्टिक के ही लाल सुर्ख होंठ थे उसके। जिन्हें अपने होंठो में भर लेने के लिए जैसे उसे आमंत्रित कर रहे थे। और अजय सिंह ने उस निमंत्रण को स्वीकार भी कर लिया। वह मानो सम्मोहित सा हो गया था। वह सम्मोहित सा होकर ही आहिस्ता आहिस्ता गौरी के चेहरे की तरफ झुकने लगा। उसके हृदय की गति प्रतिपल रुकती हुई महसूस हो रही थी। वह गौरी के चेहरे के बेहद करीब झुक गया। उसके नथुनों में गौरी की गर्म साॅसें पड़ी। उसकी साॅसों की महक से जैसे वह मदहोश सा होने लगा। उसकी साॅस भारी हो गई। उसने गहरी साॅस खींचकर उसे तेज़ी से ही बाहर छोंड़ा और जैसे यहीं पर उससे बड़ी भारी ग़लती हो गई। एक तो गहरी साॅस लेने की आवाज़ और दूसरी तेज़ी से ही उस लम्बी साॅस को नाक के रास्ते बाहर निकालने से गौरी के चेहरे पर गर्म साॅस का तीब्र वेग से स्पर्श हुआ। जिससे गौरी की नींद टूट गई। उसने पलकें झपकाते हुए अपनी आॅखें खोल दी और....और अपने चेहरे के इतने करीब किसी को झुके देख वह बुरी तरह डर गई साथ ही हड़बड़ा भी गई। इधर अजय सिंह को भी जैसे साॅप सा सूॅघ गया। वह बड़ी तेज़ी से सीधा खड़ा हो गया। किन्तु तब तक देर हो चुकी थी।
गौरी ने जब देखा कि उसके चेहरे पर झुका हुआ शख्स कोई और नहीं बल्कि उसका जेठ है तो उसकी हालत खराब हो गई। मारे घबराहट के उसे समझ ही न आया कि क्या करे वह। फिर जैसे ही दिमाग़ ने काम किया तो उसने हड़बड़ा कर सीघ्रता से अपनी साड़ी को अपने बदन पर डाला।
"माफ़ करना गौरी।" अजय सिंह मानो तब तक खुद को सम्हाल चुका था, इस लिए बड़ी शालीनता बोला___"वो मैं दरअसल देखने आया था कि क्या हुआ है तुम्हें? मैने सुना कि कई दिन से तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है इस लिए देखने चला आया था।"
गौरी बोली तो कुछ न। बोलने वाली हालत में ही नहीं थी वह। अपने सिर पर साड़ी का घूॅघट डाल कर वह तेज़ी से ही बेड से नीचे उतर आई थी और अजय सिंह से दूर जाकर खड़ी हो गई थी। उसका दिल धाड़ धाड़ करके सरपट दौड़े जा रहा था। अपनी जगह पर खड़ी वह थरथर काॅप रही थी।
उसे लग रहा था कि उसकी काॅपती हुई टाॅगें उसका भार ज्यादा देर तक सह नहीं पाएॅगी। वह बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हाले खड़ी थी।
"अरे घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है गौरी।" उधर अजय सिंह उसकी हालत का बखूबी अंदाज़ा लगाते हुए बोला___"तुम मेरी छोटी बहन के समान हो। मैंने कहा न कि तुम्हें बस देखने आया था यहाॅ। तुम आराम से सो रही थी तो मैने तुम्हें जगाना उचित नहीं समझा। मैं देख रहा था कि कैसे सारे संसार भर की मासूमियत अपने चेहरे पर लिए तुम सो रही हो। अगर तुम्हें मेरा इस तरह देखना अच्छा नहीं लगा तो माफ़ कर देना अपने इस बड़े भइया को।"
गौरी ने इस बार भी कुछ नहीं कहा। बल्कि वह पूर्व की भाॅति ही खड़ी रही। अजय सिंह उसका जेठ था और यहाॅ का ये रिवाज़ था कि जेठ और ससुर के सामने घूॅघट में ही रहना है और उनसे बोलना नहीं है। यही एक भारतीय बहू के लिए नियम था यहाॅ गाॅवों में।
"पता नहीं किस शदी में जी रहे हैं ये सब लोग?" अजय सिंह कह रहा था___"आज भी वही पुरानी परंपराएॅ और फिज़ूल के नियम कानून व रीति रिवाज़ों में बॅधे हुए हैं सब। शहरों में ये सब रूढ़िवादिता नहीं है और ना ही वहाॅ पर इस सबको उचित मानता है कोई। शहर में सब लोग एक दूसरे से बोलते हैं। किसी के ऊपर किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं रहती। भारतीय कानून ने भी हर मर्द व औरत को समानता का अधिकार दिया हुआ है। इस लिए ये सब बेकार की परंपराएॅ छोड़ो तुम सब। इज्जत सम्मान देने के लिए ये ज़रूरी नहीं होता कि कोई बहू अपने जेठ या ससुर के सामने चार हाथ का घूॅघट करे और उनसे बात न करे। बल्कि इज्जत सम्मान ये सब किये बग़ैर भी दिया जा सकता है।"
अजय सिंह की इन सब बातों का भला गौरी क्या जवाब देती? हलाॅकि उसे भी पता था कि शहर में वही सब नियम चलते हैं जिसके बारे में उसका जेठ उससे कह रहा है। किन्तु ये सब नियम कानून गाॅव देहातों में लागू नहीं हो सकते थे। ये सब यहाॅ इतना आसान नहीं था बल्कि ऐसा करने वाली बहू को समाज के ये लोग चरित्रहीन की संज्ञा दे देते हैं।
"ख़ैर छोंड़ो ये सब।" अजय सिंह ने कहा___"गाॅव देहात में तो ये सब चल ही नहीं सकता। पता नहीं कब समझेंगे ये लोग? देश समाज की उन्नति में बाधा ऐसी सोच ही डालती है। ख़ैर, मैं अभय को बोल दूॅगा कि तुम्हें शहर ले जाए और वहाॅ किसी अच्छे डाक्टर से तुम्हारा इलाज़ करवा दे। चलो जाओ अब तुम आराम करो।"
इतना सब कह कर अजय सिंह कमरे से बाहर की तरफ निकल गया। जबकि गौरी उसके जाने के बाद भी काफी देर तक बुत बनी खड़ी रही।
मन में यही ख़याल बार बार डंक मार रहा था कि जेठ जी यहाॅ किस लिए आए थे? क्या फिर से पहले की तरह बुरी नीयत से या सच में वो उसकी तबीयत के बारे में ही जानने आए थे? वो इस तरह मेरे इतने करीब कैसे आ सकते थे? क्या मतलब हुआ इस सबका?
____________________
गौरी के पास से आकर अजय सिंह पुनः अपने कमरे में बेड पर लेट गया था। उसका दिल अभी तक सामान्य नहीं हुआ था। अंदर अभी भी घबराहट के निसां शेष थे। बेड पर पड़े पड़े वह इन्हीं सब बातों के बारे में सोचे जा रहा था। बार बार वह इस ख़याल से डर जाता था कि अच्छा हुआ समय रहते उसने वस्तुस्थिति को सम्हाल लिया था वरना कुछ भी हो सकता था। अपनी बातों से उसने गौरी को जता दिया था कि वो सिर्फ उसकी तबीयत के बारे में ही जानने के लिए आया था उसके कमरे में। किन्तु उसके मन में बार बार ये सवाल भी उठ जाता था कि क्या वह अपनी बातों से गौरी को संतुष्ट कर पाया था? कहीं ऐसा तो नहीं कि गौरी को उस पर अभी भी कोई संदेह है? वह किसी निष्कर्श पर न पहुॅचा था।
अपने कमरे में वह जाने कितनी ही देर तक इस सबके बारे में सोचता रहा। उसे होश तब आया जब उसके कमरे का दरवाजा खोल कर उसकी पत्नी प्रतिमा अंदर दाखिल हुई। धूप और गर्मी से आने के कारण उसकी हालत खराब थी। पसीने से उसका जिस्म चमक रहा था। पतली सी साड़ी उसके शरापा बदन से चिपकी हुई थी। कमरे में आते ही प्रतिमा ने पहले कमरे का दरवाजा बंद किया उसके बाद सीधा बेड पर आकर चारो खाने चित्त होकर पसर गई। लेटते ही गहरी गहरी साॅसें लेने लगी वह। बड़े गले के ब्लाउज से उसकी भारी चूचियाॅ आधे से ज्यादा दिख रही थी।
अजय सिंह ने जब उसे इस हालत में देखा तो उससे रहा न गया। गौरी को देखकर ही उसके अंदर आग सी लग गई थी और अब अपनी पत्नी को इस तरह देखा तो होश खो बैठा वह। प्रतिमा आॅखें कर गहरी साॅसें ले रही थी जबकि अजय सिंह ने उसे पल भर में दबोच लिया। वह इतना उतावला हो चुका था कि वह प्रतिमा के ब्लाउज को उसके ऊपरी गले के भाग वाले सिरों को पकड़ कर एक झटके से फाड़ दिया। नाज़ुक सा ब्लाउज था बेचारा वह अजय सिंह झटका नहीं सह सका। ब्लाउज के सारे बटन एक साथ टूटते चले गए। अजय सिंह पागल सा हो गया था। ब्लाउज के अलग होते ही प्रतिमा की भारी भरकम चूचियाॅ उछल कर बाहर आ गईं। अजय ने उन दोनो फुटबालों को दोनो हाथों से शख्ती से दबोच कर उनके निप्पल को अपना मुह खोल कर भर लिया और बुरी तरह से उन्हें चुभलाने लगा।
प्रतिमा एकाएक ही हुए इस हमले से हतप्रभ सी रह गई। किन्तु अजय की रॅग रॅग से वाकिफ थी इस लिए बस मुस्कुरा कर रह गई। अजय सिंह उसकी चूचियों को बुरी तरह मसल रहा था और साथ ही साथ उनको अपने दाॅतों से काटता भी जा रहा था। वह पल भर में जानवर नज़र आने लगा था।
"आहहहहह धीरे से अजय।" प्रतिमा की दर्द में डूबी कराह निकल गई___"दर्द हो रहा है मुझे।
ये कैसा पागलपन है? क्या हो गया है तुम्हें?"
"चुपचाप लेटी रह मेरी राॅड।" अजय सिंह मानो गुर्राया___"वरना ब्लाउज की तरह तेरा सब कुछ फाड़ कर रख दूॅगा।"
"अरे तो फाड़ ना भड़वे।" प्रतिमा भी उसी लहजे में बोली___"लगता है गौरी का भूत फिर से सवार हो गया तुझे। चल अच्छा हुआ, जब जब ये भूत सवार होता है तुझ पर तब तब तू मेरी मस्त पेलाई करता है। आहहहह हाय फाड़ दे रे....मुझ पर भी बड़ी आग लगी हुई है। शशशश आहहहह रंडे के जने नीचे का भी कुछ ख़याल कर। क्या चूचियों पर ही लगा रहेगा?"
"हरामज़ादी साली।" अजय सिंह उठ कर प्रतिमा की साड़ी को पेटीकोट सहित एक झटके में उलट दिया। साड़ी और पेटीकोट के हटते ही प्रतिमा नीचे से पूरी तरह नंगी हो गई।
"साली पेन्टी भी पहन कर नहीं गई थी उस मजदूर के पास।" अजय सिंह ने ज़ोर से प्रतिमा की चूत को अपने एक हाॅथ से दबोच लिया। प्रतिमा की सिसकारी गूॅज उठी कमरे में।
"आहहहह दबोचता क्या है रंडी के जने उसे मुह लगा कर चाट ना।" प्रतिमा अपने होशो हवाश में नहीं थी___"उस हरामी विजय ने तो कुछ न किया। हाय अगर एक बार कहता तो क्या मैं उसे खोल कर दे न देती? आहहह ऐसे ही चाट.....शशशशश अंदर तक जीभ डाल भड़वे की औलाद।"
अजय सिंह पागल सा हो गया। उसे इस तरह की गाली गलौज वाला सेक्स बहुत पसंद था। प्रतिमा को भी इससे बड़ा आता था। और आज तो दोनो पर आग जैसे भड़की हुई थी। अजय सिंह प्रतिमा की चूत में मानो घुसा जा रहा था। उसका एक हाॅथ ऊपर प्रतिमा की एक चूची पर जिसे वह बेदर्दी से मसले जा रहा था जबकि दूसरा हाथ प्रतिमा की चूत की फाॅकों पर था जिन्हें वह ज़रूरत के हिसाब से फैला रहा था।
कमरे में हवस व वासना का तूफान चालू था। प्रतिमा की सिसकारियाॅ कमरे में गूॅजती हुई अजीब सी मदहोशी का आलम पैदा कर रही थी। अजय सिंह उसकी चूत पर काफी देर तक अपनी जीभ से चुहलबाजी करता रहा।
"आहहहह ऐसे ही रे बड़ा मज़ा आ रहा है मुझे।" प्रतिमा बड़बड़ा रही थी। उसकी आॅखें मज़े में बेद थी। बेड पर पड़ी वह बिन पानी के मछली की तरह छटपटा रही थी।
"शशशश आहहह अब उसे छोंड़ और जल्दी से पेल मुझे भड़वे हरामी।" प्रतिमा ने हाॅथ बढ़ा कर अजय सिंह के सिर के बालों को पकड़ कर ऊपर उठाया। अजय सिंह उसके उठाने पर उठा। उसका पूरा चेहरा प्रतिमा के चूत रस से भींगा हुआ था। ऊपर उठते ही वह प्रतिमा के होठों पर टूट पड़ा। प्रतिमा अपने ही चूत रस का स्वाद लेने लगी इस क्रिया से।
प्रतिमा ने खुद को अलग कर बड़ी तेज़ी से अजय सिंह के कपड़ों उतारना शुरू कर दिया। कुछ ही पल में अजय सिंह मादरजाद नंगा हो गया। उसका हथियार फनफना कर बाहर आ गया। प्रतिमा उकड़ू लेट कर तुरंत ही उसे एक हाथ से पकड़ कर मुह में भर लिया।
अजय सिंह की मज़े से आॅखें बंद हो गई तथा मुह से आह निकल गई।
वह प्रतिमा के बालों को मजबूती से पकड़ कर उसके मुह में अपनी कमर हिलाते हुए अपना हथियार पेलने लगा। वह पूरी तरह जानवर नज़र आने लगा था। ज़ोर ज़ोर से वह प्रतिमा के गले तक अपना हथियार पेल रहा था। प्रतिमा की हालत खराब हो गई। उसका चेहरा लाल सुर्ख पड़ गया। आॅखें बाहर को आने लग जाती थी साथ ही आॅखों से आॅसू भी आने लगे। तभी अजय ने उसके सिर को पीछे की तरफ से पकड़ कर अपने हथियार की तरफ मजबूती से खींचा। नतीजा ये हुआ कि उसका हथियार पूरा का पूरा प्रतिमा के मुह मे गले तक चला गया। प्रतिमा की आॅखें बाहर को उबल पड़ी। आॅखों से आॅसू बहने लगे। साॅस लेना मुश्किल पड़ गया उसे। उसका जिस्म झटके खाने लगा। उसके मुह से लार टपकने लगी।
प्रतिमा को लगा कि उसकी साॅसें टूट जाएॅगी। अजय सिंह उसे मजबूती से पकड़े हुए था। वह अपने मुह से उसके हथियार को निकालने के लिए छटपटाने लगी। अजय को उसकी इस हालत का ज़रा भी ख़याल नहीं था, वह तो मज़े में आॅकें बंद किये ऊपर की तरफ सिर को उठाया हुआ था।
प्रतिमा के मुह से गूॅ गूॅ की अजीब सी आवाज़े निकल रही थी। जब उसने देखा कि अजय सिंह उसे मार ही डालेगा तो उसने अपने दोनो हाॅथों से अजय सिंह के पेट पर पूरी ताकत से चिकोटी काटी।
"आहहहहहहह।" अजय सिंह के मुह से चीख निकल गई। वह एक झटके से उसके सिर को छोंड़ कर तथा उसके मुह से अपने हथियार को निकाल कर अलग हट गया। मज़े की जिस दुनियाॅ में वह अभी तक परवाज़ कर रहा था उस दुनिया से गिर कर वह हकीकत की दुनियाॅ में आ गया था। बेड के दूसरी तरफ घुटनो पर खड़ा वह अपने पेट के उस हिस्से को सहलाए जा रहा था जहाॅ पर प्रतिमा ने चिकोटी काटी थी। उसे प्रतिमा की इस हरकत पर बेहद गुस्सा आया था किन्तु जब उसने प्रतिमा की हालत को देखा तो हैरान रह गया। प्रतिमा का चेहरा लाल सुर्ख तमतमाया हुआ था। वह बेड पर पड़ी अपनी साॅसें बहाल कर रही थी।
"तुमको ज़रा भी अंदाज़ा है कि तुमने क्या किया है मेरे साथ?" प्रतिमा ने गुस्से से फुंकारते हुए कहा___"तुम अपने मज़े में ये भी भूल गए कि मेरी जान भी जा सकती थी। तुम इंसान नहीं जानवर हो अजय। आज के बाद मेरे करीब भी मत आना वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"
अजय सिंह उसकी ये बातें सुनकर हैरान रह गया था। किन्तु जब उसे एहसास हुआ कि वास्तव में उसने क्या किया था तो वह शर्मिंदगी से भर गया। वह जानता था कि प्रतिमा वह औरत थी जो उसके कहने पर दुनिया का कोई भी काम कर सकती थी और करती भी थी। ये उसका अजय के प्रति प्यार था वरना कौन ऐसी औरत है जो पति के कहने पर इस हद तक भी गिरने लग जाए कि वह किसी भी ग़ैर मर्द के नीचे अपना सब कुछ खोल कर लेट जाए???? अजय सिंह को अपनी ग़लती का एहसास हुआ। वह तुरंत ही आगे बढ़ कर प्रतिमा से माफी माॅगने लगा तथा उसको पकड़ने के लिए जैसे ही उसने हाथ बढ़ाया तो प्रतिमा ने झटक दिया उसे।
"डोन्ट टच मी।" प्रतिमा गुर्राई और फिर उसी तरह गुस्से में तमतमाई हुई वह बेड से नीचे उतरी और बाथरूम के अंदर जाकर दरवाजा बंद कर लिया उसने। अजय सिंह शर्मिंदा सा उसे देखता रह गया। उसमें अपराध बोझ था इस लिए उसकी हिम्मत न हुई कि वह प्रतिमा को रोंक सके। उधर थोड़ी ही देर में प्रतिमा बाथरूम से मुह हाॅथ धोकर निकली। आलमारी से एक नया ब्लाउज निकाल कर पहना, तथा उसी साड़ी को दुरुस्त करने के बाद उसने आदमकद आईने में देख कर अपने हुलिये को सही किया। सब कुछ ठीक करने के बाद वह बिना अजय की तरफ देखे कमरे से बाहर निकल गई। अजय सिंह समझ गया था कि प्रतिमा उससे बेहद नाराज़ हो गई है। उसका नाराज़ होना जायज़ भी था। भला इस तरह कौन अपनी पत्नी की जान ले लेने वाला सेक्स करता है?? अजय सिंह असहाय सा नंगा ही बेड पर पसर गया था।
दोस्तो अपडेट हाज़िर है,,,,,,,,,,
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट...........《 31 》
अब तक,,,,,,,
"तुमको ज़रा भी अंदाज़ा है कि तुमने क्या किया है मेरे साथ?" प्रतिमा ने गुस्से से फुंकारते हुए कहा___"तुम अपने मज़े में ये भी भूल गए कि मेरी जान भी जा सकती थी। तुम इंसान नहीं जानवर हो अजय। आज के बाद मेरे करीब भी मत आना वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"
अजय सिंह उसकी ये बातें सुनकर हैरान रह गया था। किन्तु जब उसे एहसास हुआ कि वास्तव में उसने क्या किया था तो वह शर्मिंदगी से भर गया। वह जानता था कि प्रतिमा वह औरत थी जो उसके कहने पर दुनिया का कोई भी काम कर सकती थी और करती भी थी। ये उसका अजय के प्रति प्यार था वरना कौन ऐसी औरत है जो पति के कहने पर इस हद तक भी गिरने लग जाए कि वह किसी भी ग़ैर मर्द के नीचे अपना सब कुछ खोल कर लेट जाए???? अजय सिंह को अपनी ग़लती का एहसास हुआ। वह तुरंत ही आगे बढ़ कर प्रतिमा से माफी माॅगने लगा तथा उसको पकड़ने के लिए जैसे ही उसने हाथ बढ़ाया तो प्रतिमा ने झटक दिया उसे।
"डोन्ट टच मी।" प्रतिमा गुर्राई और फिर उसी तरह गुस्से में तमतमाई हुई वह बेड से नीचे उतरी और बाथरूम के अंदर जाकर दरवाजा बंद कर लिया उसने। अजय सिंह शर्मिंदा सा उसे देखता रह गया। उसमें अपराध बोझ था इस लिए उसकी हिम्मत न हुई कि वह प्रतिमा को रोंक सके। उधर थोड़ी ही देर में प्रतिमा बाथरूम से मुह हाॅथ धोकर निकली। आलमारी से एक नया ब्लाउज निकाल कर पहना, तथा उसी साड़ी को दुरुस्त करने के बाद उसने आदमकद आईने में देख कर अपने हुलिये को सही किया। सब कुछ ठीक करने के बाद वह बिना अजय की तरफ देखे कमरे से बाहर निकल गई। अजय सिंह समझ गया था कि प्रतिमा उससे बेहद नाराज़ हो गई है। उसका नाराज़ होना जायज़ भी था। भला इस तरह कौन अपनी पत्नी की जान ले लेने वाला सेक्स करता है?? अजय सिंह असहाय सा नंगा ही बेड पर पसर गया था।
अब आगे,,,,,,,,,,
फ्लैशबैक अब आगे______
उस दिन और उस रात प्रतिमा ने अजय सिंह की तरफ देखा तक नहीं बात करने की तो बात दूर। अजय सिंह अपनी पत्नी के इस रवैये बेहद परेशान हो गया था, वह अपने किये पर बेहद शर्मिंदा था। वह जानता था कि उसने ग़लती की थी किन्तु अब जो हो गया उसका क्या किया जा सकता था? उसने कई बार प्रतिमा से उस कृत्य के लिए माफ़ी माॅगी लेकिन प्रतिमा हर बार उसे गुस्से से देख कर उससे दूर चली गई थी।
ख़ैर दूसरा दिन शुरू हुआ। आज प्रतिमा का रवैया एकदम सामान्य था। कदाचित् रात के बाद अब उसका गुस्सा उतर गया था। पिछली रात वह दूसरे कमरे में अंदर से कुंडी लगा कर सोई थी। वह जानती थी अजय उसे मनाने उसके पास आएगा और हुआ भी वही लेकिन प्रतिमा कमरे का दरवाजा नहीं खोला था। अजय सिंह मुह लटकाए वापस चला गया था। रात में प्रतिमा ने इस बारे में बहुत सोचा और इस निष्कर्स पर पहुॅची कि अजय सिंह का इसमें भला क्या दोष हो सकता है? उस सूरत में कोई भी मर्द वही करता जो उसने किया। मज़े की चरम सीमा का एक रूप ऐसा भी हो सकता है कि वह उस सूरत में सब कुछ भूल बैठता है। अजय सिंह के साथ भी तो वही हुआ था। प्रतिमा उससे प्यार भी बहुत करती थी, वह उससे इस तरह बेरूखी अख्तियार नहीं कर सकती थी बहुत देर तक।
सुबह जब हुई तो सबसे पहले वह अजय सिंह से बड़े प्यार से मिली। अजय सिंह इस बात से बेहद खुश हुआ। ख़ैर, दोपहर में प्रतिमा फिर से विजय सिंह के लिए खाने का टिफिन तैयार कर तथा एक प्लास्टिक के बोतल में पका हुआ दूध लेकर खेतों की तरफ चल दी। आज भी उसने पिछले दिन की ही तरह लिबास पहना हुआ था। खूबसूरत गोरे बदन पर आज उसने पतली सी पीले रंग की साड़ी और उसी से मैच करता बड़े गले का ब्लाउज पहना था। ब्लाउज के अंदर आज भी उसने ब्रा नहीं पहना था।
प्रतिमा मदमस्त चाल से तथा मन में हज़ारों ख़याल बुनते हुए खेतों पर बने मकान में पहुॅची। पिछले दिन की ही तरह आज भी आस पास खेतों पर कोई मजदूर नज़र नहीं आया उसे,अलबत्ता विजय सिंह ज़रूर उसे दाईं तरफ लगे बोरबेल पर नज़र आया। वह बोर के पानी से हाॅथ मुह धो रहा था।
प्रतिमा ने ग़ौर से उसे देखा फिर मुस्कुरा कर मकान के अंदर की तरफ बढ़ गई। कमरे में पहुॅच कर उसने पिछले दिन की ही तरह बेन्च पर टिफिन से निकाल कर खाना लगाने लगी। आज उसने अपना आॅचल ढुलकाया नहीं था। शायद ये सोच कर कि विजय कहीं ये न सोच बैठे कि रोज़ रोज़ मैं अपना आॅचल क्यों गिरा देती हूॅ?
कुछ ही देर में विजय सिंह कमरे में आ गया। कमरे में अपनी भाभी को देख कर वह चौंका फिर सामान्य होकर वहीं बेन्च के पास कुर्सी पर बैठ गया।
"आज भी आपको ही कस्ट उठाना पड़ा भाभी।" विजय सिंह ने कहा___"कितनी तेज़ धूप और गर्मी होती है, कहीं आपको लू लग गई और आप बीमार हो गई तो??"
"अरे कुछ नहीं होगा मुझे।
" प्रतिमा ने कहा___"इतनी भी नाज़ुक नहीं हूॅ जो इतने से ही बीमार हो जाऊॅगी। और अगर हो भी जाऊॅगी तो क्या हुआ? मेरी दवाई करवाने तुमको ही जाना पड़ेगा। जाओगे न मुझे लेकर?"
"अरे क्या बात करती हैं आप?" विजय सिंह गड़बड़ाया___"भगवान करे आपको कभी कुछ न हो भाभी।"
"हमारे चाहने से क्या होता है?" प्रतिमा ने कहा___"जिसको जब जो होना होता है वो हो ही जाता है। इस लिए कह रही हूॅ कि अगर मैं बीमार पड़ जाऊॅ तो तुम मुझे ले चलोगे न डाक्टर के पास??"
"इसमें भला पूछने की क्या बात है?" विजय सिंह ने कहा___"और हाॅ आपको डाक्टर के पास ले जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी बल्कि डाक्टर को मैं खुद आपके पास ले आऊॅगा।"
"ऐसा शायद तुम इस लिए कह रहे हो कि तुम मुझे अपने साथ ले जाना ही नहीं चाहते।" प्रतिमा ने बुरा सा मुह बनाया___"सोचते होगे कि मुझ बुढ़िया को कौन ढोता फिरेगा?"
"बु बुढ़िया???" विजय सिंह को फिर से ठसका लग गया। वह ज़ोर ज़ोर से खाॅसने लगा। प्रतिमा ने सीघ्रता से उठ कर मटके से ग्लास में पानी लिये उसके मुह से लगा दिया। इस बीच उसे सच में ध्यान न आया कि उसका आॅचल नीचे गिर गया है।
"क्या हुआ आज भी ठसका लग गया तुम्हें?" प्रतिमा ने कहा___"क्या रोज़ ऐसे ही होता है खाते समय?"
विजय सिंह कुछ बोल न सका। उसकी आॅखों के बहुत पास प्रतिमा की बड़ी बड़ी चूचियाॅ आधे से ज्यादा ब्लाउज से झूलती दिख रही थी। विजय सिंह की हालत पल भर में खराब हो गई। वह पानी पीना भूल गया था।
"क्या हुआ पानी पियो न?" प्रतिमा ने कहा फिर अनायास ही उसका ध्यान इस तरफ गया कि विजय उसके सीने की तरफ एकटक देखे जा रहा है। ये देख वह मुस्कुराई।
"आज दूध लेकर आई हूॅ तुम्हारे लिए।" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा___"और हाॅ जहाॅ देख रहे हो न वहाॅ सूखा पड़ा है। इस लिए तो अलग से लाई हूॅ।"
विजय सिंह को जबरदस्त झटका लगा। प्रतिमा को लगा कहीं उसने ज्यादा तो नहीं बोल दिया। अंदर ही अंदर घबरा गई थी वह किन्तु चेहरे से ज़ाहिर न होने दिया उसने। बल्कि सीधी खड़ी होकर उसने अपने आॅचल को सही कर लिया था।
"अरे ऐसे आॅखें फाड़ फाड़ कर क्या देख रहे हो मुझे?" प्रतिमा हॅसी___"मैं तो मज़ाक कर रही थी तुमसे। देवर भाभी के बीच इतना तो चलता है न? चलो अब जल्दी से खाना खाओ।"
विजय सिंह चुपचाप खाना खाने लगा। इस बार वह बड़ा जल्दी जल्दी खा रहा था। ऐसा लगता था जैसे उसे कहीं जाने की बड़ी जल्दी थी।
"तुम खाना खाओ तब तक मैं बाहर घूम लेती हूॅ।" प्रतिमा ने कहा___"और हाॅ दूध ज़रूर पी लेना।"
"जी भाभी।" विजय ने नीचे को सिर किये ही कहा था।
उधर प्रतिमा मुस्कुराती हुई कमरे से बाहर निकल गई।
पता नहीं क्या चल रहा था उसके दिमाग़ में?"
_______________________
वर्तमान________
"अरे नैना बुआ आप??" रितू जैसे ही हवेली के अंदर ड्राइंग रूम में दाखिल हुई तो सोफे पर नैना बैठी दिखी___"ओह बुआ मैं बता नहीं सकती कि आपको यहाॅ देख कर मैं कितना खुश हुई हूॅ।"
"ओह माई गाड।" नैना सोफे से उठते हुए किन्तु हैरानी से बोली___"तू तो पुलिस वाली बन गई। कितनी सुन्दर लग रही है तेरे बदन पर ये पुलिस की वर्दी। आई एम सो प्राउड आफ यू। आ मेरे गले लग जा रितू।"
दोनो एक दूसरे के गले मिली। फिर दोनो एक साथ ही सोफे पर बैठ गई।
"मुझे डैड ने बताया ही नहीं कि आप आईं हैं यहाॅ।" रितू ने खेद भरे भाव से कहा___"वरना मैं पुलिस थाने से भाग कर आपके पास आ जाती। ख़ैर, आब बताइये कैसी हैं आप और फूफा जी कैसे हैं?"
"मैं तो ठीक ही हूॅ रितू।" नैना ने सहसा गंभीर होकर कहा___"लेकिन तेरे फूफा जी का पूछो ही मत।"
"अरे ऐसा क्यों कह रही हैं आप?" रितू ने चौंकते हुए कहा____"फूफा जी के बारे में क्यों न पूछूॅ भला?"
"क्यों कि अब वो तेरे फूफा जी नहीं रहे।" नैना ने कहा___"मैने उस नामर्द को तलाक़ दे दिया है और अब यहीं रहूॅगी अपने घर में।"
"त...ला...क़????" रितू बुरी तरह उछल पड़ी थी___"लेकिन क्यों बुआ? ऐसी भी भला क्या बात हो गई कि आपने उन्हें तलाक़ दे दिया?"
नैना ने कुछ पल सोचा और फिर सारी बात बता दी उसे जो उसने प्रतिमा को बताई थी। सारी बातें सुनने के बाद रितू सन्न रह गई।
"ठीक किया आपने।" फिर रितू ने कहा___"ऐसे आदमी के पास रहने का कोई मतलब ही नहीं है जो ऐसी सोच रखता हो।"
"रितू मैं सोच रही हूॅ कि मैं कोई ज्वाब कर लूॅ।" नैना ने हिचकिचाते हुए कहा___"अगर तेरी नज़र में मेरे लिए कोई ज्वाब हो तो दिलवा दे मुझे।"
"आपको ज्वाब करने की क्या ज़रूरत है बुआ?" रितू ने हैरानी से कहा___"क्या आप ये समझती हैं कि आप हमारे लिए बोझ बन जाएॅगी?"
"ऐसी बात नहीं है रितू।" नैना ने कहा__"बस मेरा मन बहलता रहेगा। सारा दिन बेड पर पड़े पड़े इस सबके बारे में सोच सोच कर कुढ़ती रहूॅगी। इस लिए अगर कोई ज्वाब करने लगूॅगी तो मेरा दिन आराम से कट जाया करेगा।"
"क्या इस बारे में आपने डैड से बात की है?" रितू ने कहा।
"भइया और भाभी से मैने अभी इस बारे में कोई बात नहीं की है।" नैना ने कहा___"पर मैं जानती हूॅ कि भइया मुझे ज्वाब करने की इजाज़त कभी नहीं देंगे। वो भी यही समझेंगे कि मैं उनके लिए बोझ बन जाऊॅगी ऐसा मैं सोच रही हूॅ।"
"हाॅ ये बात है ही।" रितू ने कहा___"हम में से कोई नहीं चाहेगा कि आप कोई ज्वाब करें।"
"नहीं रितू प्लीज़।" नैना ने रितू के हाॅथ को अपने हाथ में लेकर कहा___"समझने की कोशिश कर मेरी बच्ची। क्या तू चाहती है कि तेरी बुआ उस सबके बारे में सोच सोच कर दुखी हो?"
"नहीं बुआ हर्गिज़ नहीं।" रितू ने मजबूती से इंकार में सिर हिलाया___"मैं तो चाहती हूॅ कि मेरी प्यारी बुआ हमेशा खुश रहें।
"
"तो फिर कोई ज्वाब दिलवा दे मुझे।" नैना ने कहा___"मैं कोई भी काम करने को तैयार हूॅ। बस काम ऐसा हो कि मुझे एक सेकण्ड के लिए भी कुछ सोचने का समय न मिले।"
"ज्वाब तो मैं आपको दिलवा दूॅगी।" रितू ने कहा____"लेकिन उससे पहले एक बार डैड से भी इसके लिए पूछना पड़ेगा।"
"ठीक है मैं बात करूॅगी भइया से।" नैना ने कहा___"अब जा तू भी चेन्ज कर ले तब तक मैं तेरे कुछ खाने का बंदोबस्त करती हूॅ।"
"आप परेशान मत होइये बुआ।" रितू ने कहा____"माॅम हैं ना इस सबके लिए।"
"इसमें परेशानी की क्या बात है?" नैना ने कहा___"शादी से पहले भी तो मैं यही करती थी तेरे लिए भूल गई क्या?"
"कैसे भूल सकती हूॅ बुआ?" रितू ने मुस्कुरा कर कहा___"मुझे सब याद है। आप हम तीनो बहन भाई को पढ़ाया करती थी और पिटाई भी करती थी।"
"अरे वो तो मैं प्यार से मारती थी।" नैना हॅस पड़ी___"और वो ज़रूरी भी तो था न?"
"सही कह रही हैं आप।" रितू ने कहा__"जब तक हम बच्चे रहते हैं तब तक हमें ये सब बुरा लगता है और जब बड़े हो जाते हैं तो लगता है कि बचपन में पढ़ाई के लिए जो पिटाई होती थी वो हमारे भले के लिए ही होती थी।"
"मैने घर के सभी बच्चों को पढ़ाया था।" नैना ने कुछ सोचते हुए कहा___"किन्तु उन सभी बच्चों में एक ही ऐसा बच्चा था जो मेरे हाॅथों मार नहीं खाया और वो था हमारा राज। मैं सोचा करती थी कि ऐसा कौन सा सवाल उससे करूॅ जो उससे न बने और फिर मैं उसकी पिटाई करूॅ मगर हाय रे कितना तेज़ था राज। हर विषय उसका कम्प्लीट रहता था। छोटे भइया भाभी ने उसे बचपन से ही पढ़ाई में जीनियस बना रखा था। वैसी ही निधी भी थी। जाने कहाॅ होंगे वो सब?"
कहते कहते नैना की आॅखों में आॅसू आ गए। रितू के चेहरे पर बेहद ही गंभीर भाव आ गए थे। उसके मुख से कोई शब्द नहीं निकला बल्कि शख्ती से उसने मानो लब सी लिए थे।
"क्या हो गया है इस घर की खुशियों को?" नैना ने गंभीरता से कहा___"न जाने किसकी नज़र लग गई इस घर के हॅसते मुस्कुराते हुए लोगो पर? सब कुछ बिखर गया। विजय भइया क्या गए जैसे इस घर की रूह ही चली गई। माॅ बाबू जी उनके सदमें में कोमा में चले गए। गौरी भाभी और उनके बच्चे जाने दुनियाॅ के किस कोने में जी रहे होंगे? बड़ी भाभी ने बताया कि करुणा भाभी भी अपने बच्चों के साथ अपने मायके चली गईं हैं जबकि अभय भइया किसी काम से कहीं बाहर गए हैं। इतनी बड़ी हवेली में गिनती के चार लोग हैं। ये भाग्य की कैसी विडम्बना है रितू???"
"ये सवाल ऐसा है बुआ जो हर शख्स की ज़ुबां पर रक्श करता है।" रितू ने कहा___"लेकिन उसका कोई जवाब नहीं है।"
"जबाव तो हर सवाल का होता है रितू।" नैना ने कहा___"संसार में ऐसा कुछ है ही नहीं जिसका जवाब न हो।"
"आप कहना क्या चाहती हैं बुआ?" रितू ने हैरानी से देखा था।
"कहने को तो बहुत कुछ है रितू।" नैना ने गहरी साॅस ली___"लेकिन कहने का कोई मतलब नहीं है।"
"प्लीज कहिए न बुआ।
" रितू ने कहा__"अगर कोई बात है मन में तो बेझिझक कहिये।"
"जाने दे रितू।" नैना ने पहलू बदला___"तू सुना कैसी चल रही है तेरी पुलिस की नौकरी??"
"बस ठीक ही है बुआ।" रितू की आॅखों के सामने विधी का चेहरा नाच गया___"आप तो जानती ही हैं इस नौकरी में दिन रात भागा दौड़ी ही होती रहती है। कभी इस मुजरिम के पीछे तो कभी किसी क़ातिल के पीछे।"
"हाॅ ये तो है।" नैना ने कहा___"लेकिन पुलिस आफीसर बनने का सपना तो तूने ही देखा था न बचपन से।"
"बचपन में तो बस ये सब एक बचपना टाइप का था बुआ।" रितू ने कहा___"लेकिन जब बड़े होने पर हर चीज़ की समझ आई तो लगा कि सचमुच मुझे पुलिस आफीसर बनना चाहिए। मेरी ख्वाहिश थी कि पुलिस आफीसर बन कर मैं दादा दादी जी के एक्सीडेन्ट वाला केस फिर से रिओपेन करके उसकी तहकीक़ात करूॅगी। मगर सब कुछ जैसे एक ख्वाहिश मात्र ही रह गया।"
"क्या मतलब???" नैना चौंकी।
"मतलब ये बुआ कि मैं दादा जी के एक्सीडेन्ट वाले केस में कुछ नहीं कर सकती।" रितू ने असहाय भाव से कहा___"क्योंकि मैने उस केस की फाइल को बहुत बारीकी से पढ़ा है, उसमें कहीं पर भी ये नहीं दिखाया गया कि वो एक्सीडेन्ट एक सोची समझी साजिश का नतीजा था बल्कि ये रिपोर्ट बना कर फाइल बंद कर दी गई कि वो एक्सीडेन्ट महज एक हादसा या दुर्घटना थी जो कि सामने से आ रहे ट्रक से टकराने से हो गई थी। ट्रक का ड्राइवर नशे में था जिसकी वजह से उसने ध्यान ही नहीं दिया और साइड होने बजाय उसने दादा जी की कार से टकरा गया था।"
"लेकिन सवाल ये है कि तुझे ऐसा क्यों लगता है कि वो एक्सीडेन्ट महज दुर्घटना नहीं बल्कि किसी की सोची समझी साजिश थी?" नैना ने हैरानी से कहा___"यानी कोई बाबूजी को जान से मार देना चाहता था।"
"मुझे शुरू में इस बात का सिर्फ अंदेशा था बुआ।" रितू कह रही थी___"वो भी इस लिए क्योंकि ऐसा शहरों में होता है। दादा जी की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी। फिर भी उनके साथ ये हादसा हुआ। उस समय इसके बारे में इस एंगल से मेरा सिर्फ सोचना था। मैं नहीं जानती थी मैं ऐसा क्यों सोचती थी? शायद इस लिए कि शुरू से ही मेरे ज़हन में क्राइम के प्रति सोचने का ऐसा नज़रिया था। किन्तु पुलिस की नौकरी ज्वाइन करने बाद जब मैने उस केस की फाइल को बारीकी से अध्ययन किया तो मुझे यकीन हो गया कि वो एक्सीडेन्ट महज कोई दुर्घटना नहीं थी बल्कि जान बूझ कर दादाजी की कार में टक्कर मारी गई थी।"
"ऐसा क्या था उस फाइल में?" नैना की आॅखें हैरत से फटी पड़ी थी____"जिससे तुझे यकीन हो गया कि ये सब सोच समझ कर किया गया था?"
"फाइल में जिस जगह पर एक्सीडेन्ट यानी कि दादा जी की कार का एक्सीडेन्ट हुआ था उस जगह पर जाकर मैने खुद निरीक्षण किया है।" रितू ने कहा___"मेन हाइवे पर उस जगह भले ही ज्यादातर वाहनों का आना जाना नहीं है लेकिन फिर भी इक्का दुक्का वाहन तो आते जाते ही रहते हैं वहाॅ पर।
इतनी चौड़ी सड़क पर कोई ट्रक वाला अपनी लेन से आकर कैसे किसी कार को टक्कर मार सकता है? ये ठीक है कि वो टू-लेन सड़क नहीं थी बल्कि टू-इन-वन थी। फिर भी इतनी चौड़ी सड़क पर कोई ट्रक वाला अपनी लेन से हट कर कैसे टक्कर मार देगा। फाइल में लिखा है कि ट्रक का ड्राइवर नशे में था तो सवाल है कि नशे की उस हालत में उसने एक ही एक्सीडेन्ट क्यों कियों किया? बल्कि एक से ज्यादा एक्सीडेन्ट हो सकते थे उससे मगर ऐसा नहीं था। अब चूॅकि फाइल में ना तो उस ट्रक वाले का कोई अता पता है और ना ही कोई ऐसा सबूत जिसके तहत आगे की कोई कार्यवाही की जा सके इस लिए मैं कुछ नहीं कर सकती।"
"क्या सिर्फ यही एक वजह है जिससे तुझे लगता है कि बाबू जी का एक्सीडेन्ट महज दुर्घटना नहीं थी?" नैना ने कहा___"या फिर कोई और भी वजह है तेरे पास??"
अभी रितू कुछ बोलने ही वाली थी कि उसकी पैन्ट की जेब में पड़ा मोबाइल बज उठा। उसने पाॅकेट से मोबाइल निकाल कर स्क्रीन में फ्लैश कर रहें नंबर को देखा फिर काल रिसीव कर उसे कान से लगा कर कहा___"हाॅ रामदीन बोलो क्या बात है?"
"....................." उधर से पता नहीं क्या कहा गया।
"ओह चलो ठीक है।" रितू ने कहा___"मैं फौरन पहुॅच रही हूॅ।"
फोन काटने के बाद रितू एक झटके से सोफे से खड़ी हो गई और फिर नैना से कहा__"माफ़ करना बुआ मुझे तत्काल पुलिस स्टेशन जाना होगा।"
"ठीक रितू आराम से जाना।" नैना ने कहा___"शाम को जल्दी आना।"
"जी बिलकुल बुआ।" रितू ने मुस्कुरा कर कहा___"रात में हम दोनो खूब सारी बातें करेंगे।"
इसके बाद रितू वहाॅ से चली गई। जबकि नैना वहीं सोफे पर बैठी उसे बाहर की तरफ जाते देखती रही। इस बात से अंजान कि पीछे दीवार के उस तरफ खड़ा अजय सिंह इन दोनो की बातें सुन रहा था। उसके पीछे प्रतिमा भी खड़ी थी।
___________________
फ्लैशबैक अब आगे_______
विजय सिंह खाना खाने के बाद तथा दूध पीने के बाद थोड़ी देर वहीं एक तरफ रखे बिस्तर पर आराम करना चाहता था। किन्तु उसने सोचा कि उसकी भाभी बाहर धूप में जाने कहाॅ घूम रही होंगी? इस लिए उसे देखने के लिए तथा ये कहने के लिए कि वो अब घर जाएॅ बहुत धूप व गर्मी है, वह कमरे से निकल कर बाहर आ गया।
बाहर आकर उसने आस पास देखा लेकिन प्रतिमा उसे कहीं नज़र न आई। ये देख कर वह चिन्तित हो उठा। वह तुरंत ही आगे बढ़ते हुए आस पास देखने लगा। चलते चलते वह आमों के बाग़ की तरफ बढ़ गया। यहाॅ लगभग दस एकड़ में आमों के पेड़ लगाए गए थे। आधुनिक प्रक्रिया के तहत बहुत कम समय में ही ये बड़े हो कर फल देने लगे थे। ये मौसम भी आमों का ही था।
विजय सिंह जब बाग़ के पास पहुॅचा तो देखा कि प्रितिमा एक आम के पेड़ के पास खड़ी ऊपर की तरफ देख रही थी। उसने अपने पल्लू को कमर में घुमा कर खोंसा हुआ था। उसके दोनो हाॅथ ऊपर थे। विजय सिंह के देखते ही देखते वह ऊपर की तरफ उछली और फिर नीचे आ गई।
विजय सिंह उसे ये हरकत करते देख मुस्कुरा उठा। उसे देख कर कोई नहीं कह सकता था कि ये तीन तीन बच्चों की माॅ है बल्कि इस वक्त वह जिस तरह से उछल उछल कर ऊपर लगे आम को तोड़ने का प्रयास कर रही थी उससे यही लगता था कि वो अभी भी कोई अल्हड़ सी लड़की ही थी। वह बार बार पहले से ज्यादा ज़ोर लगा कर ऊपर उछलती लेकिन वह नाकाम होकर नीचे आ जाती। आम उसकी पहुच से दूर था किन्तु फिर भी वो मान नहीं थी। उछल कूद के चक्कर में वह पसीना पसीना हो गई थी। उसकी दोनो काख पसीने से भीगी हुई थी तथा ब्लाउज भी भीग गया था। चेहरे और कनपटियों पर भी पसीना रिसा हुआ था।
विजय सिंह उसके पास जाकर बोला___"तो आप यहाॅ आम तोडने का प्रयास कर रही हैं। मैं ढूॅढ रहा था कि जाने आप कहाॅ गायब हो गई हैं?"
"अरे भला मैं अब कहाॅ गायब हो जाऊॅगी विजय?" प्रतिमा ने मुस्कुरा कर कहा__"इस ऊम्र में तुम्हारे भइया को छोंड़ कर भला कहाॅ जा सकती हूॅ?"
"चलिये मैं आपको आम तोड़ कर दे देता हूॅ फिर आप आराम से बैठ कर खाइयेगा।" उसकी बात पर ज़रा भी ध्यान दिये बग़ैर विजय ने कहा था।
"नहीं विजय।" प्रतिमा ऊपर थोड़ी ही दूरी पर लगे आम को देखती हुई बोली___"इसे तो मैं ही तोड़ूॅगी।"
"पर वो तो आपकी पहुॅच से दूर है भाभी।" विजय भी आम की तरफ देखते हुए बोला___"भला आप उस तक कैसे पहुॅच पाएॅगी? और जब पहुॅचेंगी ही नहीं तो उसे तोड़ेंगी कैसे?"
"कह तो तुम भी ठीक ही रहे हो।" प्रतिमा ने बड़ी मासूमियत से दोनो हाथ कमर पर रख कर कहा___"सचमुच मैं काफी देर से प्रयास कर रही हूॅ इस मुए को तोड़ने का लेकिन ये मेरे हाॅथ ही नहीं लग रहा।"
"इसी लिए तो कहता हूॅ कि मैं तोड़ देता हूॅ भाभी।" विजय ने कहा___"आप फालतू में ही इस गर्मी में परेशान हो रही हैं।"
"लेकिन मैं इसे अपने हाॅथ से ही तोड़ना चाहती हूॅ विजय।" प्रतिमा ने कहा___"मुझे बहुत खुशी होगी अगर मैं इसे अपने से तोड़ कर खाऊॅगी तो।"
"फिर तो ये संभव नहीं है भाभी।" विजय ने कहा___"या फिर ऐसा कीजिए कि नीचे से एक पत्थर उठाइये और उस आम को निशाना लगा कर पत्थर मार कर तोड़ लीजिए।"
"उफ्फ विजय ये तो मुझसे और भी नहीं होगा।" प्रतिमा ने आहत भाव से कहा___"क्या तुम मेरी मदद नहीं कर सकते?"
"म मैं...????" विजय चौंका___"भला मैं कैसे आपकी मदद कर सकता हूॅ?"
"बिलकुल कर सकते हो विजय।" प्रतिमा ने खुश होकर कहा___"तुम मुझे अपनी बाहों से ऊपर उठा सकते हो। उसके बाद मैं बड़े आराम से उस आम को तोड़ लूॅगी।"
"क क्या????" विजय सिंह बुरी तरह उछल पड़ा, हैरत से उसकी आॅखें फैलती चली गई थी, बोला___"ये आप क्या कह रही हैं भाभी? नहीं नहीं ये मैं नहीं कर सकता। आप कोई दूसरा आम देख लीजिए जो आपकी पहुॅच पर हो उसे तोड़ लीजिए।"
"अरे तो इसमें क्या है विजय?" प्रतिमा ने लापरवाही से कहा___"थोड़ी देर की तो बात है। तुम मुझे बड़े आराम से उठा सकते हो, मैं इतनी भी भारी नहीं हूॅ।
तुम्हारी गौरी से तो कम ही हूॅ।"
"पर भाभी मैं आपको कैसे उठा सकता हूॅ?" विजय की हालत खराब___"नहीं भाभी ये मुझसे हर्गिज़ भी नहीं हो सकता।"
"क्यों नहीं हो सकता विजय?" प्रतिमा उसके पास आकर बोली___"बल्कि मुझे तो बड़ी खुशी होगी विजय कि तुम्हारे द्वारा ही सही किन्तु मैं अपने हाॅथों से उस आम को तोड़ूॅगी। प्लीज़ विजय....मेरे लिए...मेरी खुशी के लिए ये कर दो न?"
विजय सिंह को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? वह तो खुद को कोसे जा रहा था कि वह यहाॅ आया ही क्यों था?
"उफ्फ विजय पता नहीं क्या सोच रहे हो तुम?" प्रतिमा ने कहा___"भला इसमें इतना सोचने की ज़रूरत है? तुम कोई ग़ैर तो नहीं हो न और ना ही मैं तुम्हारे लिए कोई ग़ैर हूॅ। हम दोनो देवर भाभी हैं और इतना तो बड़े आराम से चलता है। मैं तो कुछ नहीं सोच रही हूॅ ऐसा वैसा। फिर तुम क्यों सोच रहे हो?"
"पर भाभी किसी को पता चलेगा तो लोग क्या सोचेंगे हमारे बारे में?" विजय सिंह ने हिचकिचाते हुए कहा।
"सबसे पहली बात तो यहाॅ पर हम दोनो के अलावा कोई तीसरा है ही नहीं।" प्रतिमा कह रही थी___"और अगर होता भी तो मुझे उसकी कोई परवाह नहीं होती क्योंकि हम कुछ ग़लत तो कर नहीं रहे होंगे फिर किसी से डरने की या किसी के कुछ सोचने से डरने की क्या ज़रूरत है? देवर भाभी के बीच इतना प्यारवश चलता है। अब छोड़ों इस बात को और जल्दी से आओ मेरे पास।"
विजय सिंह का दिल धाड़ धाड़ करके बज रहा था। उसे लग रहा था कि वह यहाॅ से भाग जाए किन्तु फिर उसने भी सोचा कि इसमें इतना सोचने की भला क्या ज़रूरत है? उसकी भाभी ठीक ही तो कह रही है कि इतना तो देवर भाभी के बीच चलता है। फिर वो कौन सा कुछ ग़लत करने जा रहे हैं।
"ओफ्फो विजय कितना सोचते हो तुम?" प्रतिमा ने खीझते हुए कहा____"तुम्हारी जगह अगर मैं होती तो एक पल भी न लगाती इसके लिए।"
"अच्छा ठीक है भाभी।" विजय उसके पास जाते हुए बोला___"लेकिन इसके बारे आप किसी से कुछ मत कहियेगा। बड़े भइया से तो बिलकुल भी नहीं।"
"अरे मैं किसी से कुछ नहीं कहूॅगी विजय।" प्रतिमा हॅस कर बोली___"ये तो हमारी आपस की बात है न। अब चलो जल्दी से मुझे उठाओ। सम्हाल कर उठाना, गिरा मत देना मुझे। पता चले कि लॅगड़ाते हुए हवेली जाना पड़े।"
विजय सिंह कुछ न बोला बल्कि झिझकते हुए वह प्रतिमा के पास पहुॅचा। प्रतिमा की हालत ये सोच सोच कर रोमाॅच से भरी जा रही थी कि विजय उसे अपनी बाहों में उठाने वाला है। अंदर से थराथरा तो वह भी रही थी किन्तु दोनो की मानसिक अवस्था में अलग अलग हलचल थी।
विजय सिंह झुक कर प्रतिमा को उसकी दोनो टाॅगों को अपने दोनो बाजुओं से पकड़ कर ऊपर की तरफ खड़े होते हुए उठाना शुरू किया। प्रतिमा ने झट से अपने दोनो हाॅथों को विजय सिंह के दोनो कंधो पर रख दिया। वह एकटक विजय को देखे जा रही थी।
उस विजय को जिसके चेहरे पर इस बात की ज़रा भी शिकन नहीं थी कि उसने कोई बोझ उठाया हुआ है। ये अलग बात थी कि दिल में बढ़ी घबराहट की वजह से उसके चहरे पर पसीना छलछला आया था।
प्रतिमा बड़ी शातिर औरत चालाक औरत थी। उसने विजय को उसके कंधो पर से पकड़ा हुआ था। जैसे ही विजय ने उसे ऊपर उठाना शुरू किया तो वह झट से खुद को सम्हालने के लिए अपने सीने के भार को विजय के सिर पर टिका दिया। उसकी भारी भारी चूचियाॅ जो अब तक पसीने से भींग गई थी वो विजय के माथे से जा टकराई। विजय के नथुनों में प्रतिमा के जिस्म की तथा उसके पसीने की महक समाती चली गई। विजय को किसी नशे के जैसा आभास हुआ।
"वाह विजय तुमने तो मुझे किसी रुई की बोरी की तरह उठा लिया।" प्रतिमा ने हॅ कर कहा___"अब और ऊपर उठाओ ताकि मैं उस आम को तोड़ सकूॅ।"
विजय ने उसे पूरा ऊपर उठा दिया। प्रतिमा का नंगा पेट विजय के चेहरे के पास था। उसकी गोरी सी किन्तु गहरी नाभी विजय की ऑखों के बिलकुल पास थी। उसका पेट एकदम गोरा और बेदाग़ था। विजय इस सबको देखना नहीं चाहता था मगर क्या करे मजबूरी थी। उसे अपने अंदर अजीब सी मदहोशी का एहसास हो रहा था। उधर प्रतिमा मन ही मन मुस्कुराए जा रही थी। आम का वो फल तो उसके हाॅथ में ही छू रहा था जिसे वह बड़े आराम से तोड़ सकती थी किन्तु वह चाहती थी इस परिस्थिति में विजय उसके साथ कुछ तो करे ही। ये सच था कि अगर विजय उसे वहीं पर लेटा कर उसका भोग भी करने लग जाता तो उसे कोई ऐतराज़ न होता मगर ये संभव नहीं था।
विजय प्रतिमा के पेट पर अपने चेहरे को छूने नहीं देना चाहता था। वह जानता था कि गर्मी किसी के सम्हाले नहीं सम्हलती। गर्मी जब सिर चढ़ने लगती है तो सबसे पहले विवेक का नास होता है। उसके बाद सब कुछ तहस नहस हो जाता है। उधर प्रतिमा बखूबी समझती थी कि विजय कलियुग का हरिश्चन्द्र है, यानी वो किसी भी कीमत वो नहीं करेगा जो वह चाहती है। मतलब जो कुछ करना था उसे स्वयं ही करना था।
प्रतिमा ने महसूस किया कि विजय उसके नंगे पेट से अपने चेहरे को दूर हटाने की कामयाब कोशिश कर रहा है। ये देख कर प्रतिमा ने अपने जिस्म को अजीब से अंदाज़ में इस तरह हिलाया कि विजय को यही लगे कि वह अपना संतुलन बनाए रखने के लिए ही ऐसा किया है। प्रतिमा ने जैसे ही अपने जिस्म को हिलाया वैसे ही उसका पेट विजय के चेहरे से जा लगा। उसका मुह और नाॅक बिलकुल उसकी गहरी नाभी में मानो दब सा गया था। विजय सिंह इससे बुरी तरह विचलित हो गया। उसने पुनः अपने चेहरे को दूर हटाने की कोशिश की किन्तु इस बार वह कामयाब न हुआ। क्योंकि प्रतिमा ऊपर से उससे चिपक सी गई थी। विजय सिंह की हाॅथ की पकड़ ढीली पड़ गई। परिणामस्वरूप प्रतिमा का जिस्म नीचे खिसकने लगा।
"क्या कर रहे हो विजय?" प्रतिमा ने सीघ्रता से कहा___"ठीक से पकड़ो न मुझे।
"
"आपने आम तोड़ लिया कि नहीं?" विजय ने उसे फिर सै ऊपर उठाते हुए कहा___"जल्दी तोड़िये न भाभी।"
"क्या हुआ विजय?" प्रतिमा हॅस कर बोली___"मेरा भार नहीं सम्हाला जा रहा क्या तुमसे?"
"ऐसी बात नहीं है भाभी।" विजय ने झिझकते हुए कहा___"पर एक आम तोड़ने में कितना समय लगेगा आपको?"
"अरे मैं एक आम थोड़ी न तोड़ रही हूॅ विजय।" प्रतिमा ने कहा___"कई सारे तोड़ रही हूॅ ताकि तुम्हें बार बार उठाना ना पड़े मुझे।"
"ठीक है भाभी।" विजय ने कहा___"पर ज़रा जल्दी कीजिए न क्योंकि खेतों में काम करने वाले मजदूरों के आने का समय हो गया है।"
"अच्छा ठीक है।" प्रतिमा ने कहा___"अब और आम नहीं तोड़ूॅगी। अब आहिस्ता से नीचे उतारो मुझे।"
विजय सिंह तो जैसे यही चाहता था। उसने अपनी पकड़ ढीली कर दी जिससे प्रतिमा नीचे खिसकने लगी। उसने दोनो हाॅथों में आम लिया हुआ था इस लिए सहारे के लिए उसने कोहनी टिकाया हुआ था विजय पर। प्रतिमा का भारी छातियाॅ विजय के चेहरे पर से रगड़ खाती हुई घप्प से उसके सीने में जा लगी। प्रतिमा के मुह से मादक सिसकारी निकल गई। विजय ने उसकी इस सिसकारी को स्पष्ट सुना था।
"उफ्फ विजय बड़े चालू हो तुम तो।" प्रतिमा ने हॅस कर कहा___"मेरे दोनो हाॅथों में आम हैं इस लिए ठीक से संतुलन नहीं बना पाई और तुम इसी का फायदा उठा रहे हो। चलो कोई बात नहीं। कम से कम आम तो मिल ही गए मुझे। चलो दोनो बैठ कर खाते हैं यहीं पेड़ की ठंडी छाॅव के नीचे बैठ कर।"
"आप खा लीजिए भाभी।" विजय ने असहज भाव से कहा___"मैं तो रोज़ ही खाता हूॅ। अभी ठीक से पके नहीं हैं। एक हप्ते बाद इनमें मीठापन आ जाएगा।"
"देखो न विजय यहाॅ कितना अच्छा लग रहा है।" प्रतिमा ने कहा___"पेड़ों की छाॅव और मदमस्त करने वाली ठंडी ठंडी हवा। इस हवा के सामने तो एसी भी फेल है। मन करता है यहीं पर सारा दिन बैठी रहूॅ। घर में पंखा और कुलर में भी गर्मी शान्त नहीं होती और ऊपर से बीच बीच में लाइट चली जाती हो तो फिर समझो कि प्राण ही निकलने लगते हैं।"
"हाॅ गाॅवों में तो लाइट का आना जाना लगा ही रहता है।" विजय ने कहा___"मैं सोच रहा हूॅ कि हवेली में एक दो जनरेटर रखवा देता हूॅ ताकि अगर लाइन न रहे तो उसके द्वारा बिजली मिल सके और किसी को इस गर्मी में परेशान न होना पड़े।"
"ये तो तमने बहुत अच्छा सोचा है।" प्रतिमा ने कहने के साथ ही वहीं पेड़ के नीचे साफ करने के बाद साड़ी के पल्लू को बिछा कर बैठ गई। उसे इस तरह पल्लू को बिछाकर बैठते देख विजय हैरान रह गया। उसकी भारी छातियाॅ उसके बड़े गले वाले ब्लाउज से स्पष्ट नुमायाॅ हो रही थी।
"आओ न विजय तुम भी मेरे पास ही बैठ जाओ।" प्रतिमा ने एक आम को उठाकर कहा__"ऐसा लगता है कि इन्हें पहले पानी से धोना पड़ेगा।"
"जी बिलकुल भाभी।
" विजय ने कहा__"इन्हें धोना ही पड़ेगा वरना इनका जो रस होता है वो अखर बदन में लग जाएगा तो वहाॅ इनफेक्शन होने की संभावना होती है।"
"तो अब क्या करें विजय?" प्रतिमा ने कहा__"मेरा मतलब पानी तो यहाॅ पर है नहीं।"
"दीजिए मैं इन्हें धोकर लाता हूॅ।" विजय ने कहा और उन सारे आमो को उठा कर बाग़ से बाहर चला गया।
"कितने भोले हो विजय।" विजय के जाने के बाद प्रतिमा बड़बड़ाई___"किन्तु समझते सब कुछ हो। और शायद ये भी समझ ही गए होगे कि तुम्हारी भाभी एक नंबर की छिनाल या राॅड है। उफ्फ विजय क्या करूॅ तुम्हारा? तुम्हारी जगह कोई और होता तो अब तक मुझे मेरे आगे पीछे से पेल चुका होता था। तुम भी मुझे पेलोगे विजय....बस थोड़ा और मेहनत करनी पड़ेगी तुम्हें पटाने में। और अगर उससे भी न पटे तो फिर आख़िर में एक ही चारा रह जाएगा। हाय विजय आ जाओ न....समझ क्यों नहीं रहे हो कि तुम्हारी ये राॅड भाभी यहाॅ बाग़ में अकेले तुम्हारे साथ मज़े करना चाहती है। मुझे अपनी मजबूत बाहों में कस लो न विजय....मेरे जिस्म से ये कपड़े चीर फाड़ कर निकाल दो और टूट पड़ो मुझ पर। आहहहहहह शशशशश विजय मुझे तब तक पेलो जब तक की मेरा दम न निकल जाए। देख लो विजय....तुम्हारी ये राॅड भाभी सिर्फ तुम्हारे लिए यहाॅ आई है। मुझे मसल डालो.....मुझे रगड़ डालो.....हाय मेरे अंदर की इस आग को शान्त कर दो विजय।"
पेड़ के नीचे बैठी प्रतिमा हवश व वासना के हाथों अंधी होकर जाने क्या क्या बड़बड़ाए जा रही थी। कुछ ही देर में विजय सिंह आ गया और उसने धुले हुए आमों को एक बाॅस की टोकरी में रख कर लाया था। उसने प्रतिमा की तरफ देखा तो चौंक पड़ा।
"आपको क्या हुआ भाभी?" विजय ने हैरानी से कहा___"आपका चेहरा इतना लाल सुर्ख क्यों हो रखा है? कहीं आपको लू तो नहीं लग गई। हे भगवान आपकी तबीयत तो ठीक है न भाभी।"
"मैं एकदम ठीक हूॅ विजय।" विजय को अपने लिए फिक्र करते देख प्रतिमा को पल भर के लिए अपनी सोच पर ग्लानी हुई उसके बाद उसने कहा___"और मेरे लिए तुम्हारी ये फिक्र देख कर मुझे बेहद खुशी भी हुई। मैं जानती हूॅ तुम सब हमें अपना समझते हो तथा हमारे लिए तुम्हारे अंदर कोई मैल नहीं है। एक हम थे कि अपनो से ही बेगाने बन गए थे। मुझे माफ़ कर दो विजय.... ।" कहने के साथ ही प्रतिमा की आॅखों में आॅसू आ गए और वह एक झटके से उठ कर विजय से लिपट गई।
विजय उसकी इस हरकत से हैरान रह गया था। किन्तु प्रतिमा की सिसकियों का सुन कर वह यही समझा कि ये सब उसने भावना में बह कर किया है। लेकिन भला वह क्या जानता था कि औरत उस बला का नाम है जिसका रहस्य देवता तो क्या भगवान भी नहीं समझ सकते।
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,,
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.........《 32 》
अब तक,,,,,,,,,
पेड़ के नीचे बैठी प्रतिमा हवश व वासना के हाथों अंधी होकर जाने क्या क्या बड़बड़ाए जा रही थी।
कुछ ही देर में विजय सिंह आ गया और उसने धुले हुए आमों को एक बाॅस की टोकरी में रख कर लाया था। उसने प्रतिमा की तरफ देखा तो चौंक पड़ा।
"आपको क्या हुआ भाभी?" विजय ने हैरानी से कहा___"आपका चेहरा इतना लाल सुर्ख क्यों हो रखा है? कहीं आपको लू तो नहीं लग गई। हे भगवान आपकी तबीयत तो ठीक है न भाभी।"
"मैं एकदम ठीक हूॅ विजय।" विजय को अपने लिए फिक्र करते देख प्रतिमा को पल भर के लिए अपनी सोच पर ग्लानी हुई उसके बाद उसने कहा___"और मेरे लिए तुम्हारी ये फिक्र देख कर मुझे बेहद खुशी भी हुई। मैं जानती हूॅ तुम सब हमें अपना समझते हो तथा हमारे लिए तुम्हारे अंदर कोई मैल नहीं है। एक हम थे कि अपनो से ही बेगाने बन गए थे। मुझे माफ़ कर दो विजय.... ।" कहने के साथ ही प्रतिमा की आॅखों में आॅसू आ गए और वह एक झटके से उठ कर विजय से लिपट गई।
विजय उसकी इस हरकत से हैरान रह गया था। किन्तु प्रतिमा की सिसकियों का सुन कर वह यही समझा कि ये सब उसने भावना में बह कर किया है। लेकिन भला वह क्या जानता था कि औरत उस बला का नाम है जिसका रहस्य देवता तो क्या भगवान भी नहीं समझ सकते।
__________________________
अब आगे,,,,,,,,,,,
फ्लैशबैक अब आगे_______
उस दिन के बाद से तो जैसे प्रतिमा का यह रोज़ का काम हो गया था। वह हर रोज़ विजय सिंह के लिए खाने का टिफिन और दूध लेकर खेतों पर जाती और वहाॅ पर विजय को अपना अधनंगा जिस्म दिखा कर उसे अपने रूपजाल में फाॅसने की कोशिश करती। किन्तु विजय सिंह उसके जाल में फॅस नहीं रहा था। ये बात प्रतिमा को भी समझ में आ गई थी कि विजय सिंह उसके जाल में फॅसने वाला नहीं है। उधर गौरी की तबीयत अब ठीक हो चुकी थी इस लिए खाने का टिफिन वह खुद ही लेकर जाने लगी थी। प्रतिमा अपना मन मसोस कर रह गई थी। अजय सिंह खुद भी परेशान था इस बात से कि विजय सिंह कैसे उसके जाल में फॅसे?
अजय सिंह ये भी जानता था कि उसके भाई के जैसी ही उसकी मॅझली बहू यानी गौरी थी। वह भी उसके जाल में फॅसने वाली नहीं थी। ऐसे ही दिन गुज़र रहे थे। गौरी की तबीयत सही होने के बाद प्रतिमा को फिर खेतों में जाने का कोई अच्छा सा अवसर ही नहीं मिल पाता था। इधर गौरी भी अपने पति विजय सिंह को खाना लेकर हवेली से खेतों पर चली जाती और फिर वह वहीं रहती। शाम को ही वह वापस हवेली में आती थी। इस लिए अजय सिंह भी कोई मौका नहीं मिल पाता था उसे फॅसाने के लिए।
पिछले एक महीने से प्रतिमा विजय सिंह को अपने रूप जाल में फसाने की कोशिश कर रही थी। शुरू शुरू में तो उसने अपने मन की बातों को उससे उजागर नहीं किया था। बल्कि हर दिन वह विजय सिंह से ऐसी बाते करती जैसे वह उसकी कितनी फिक्र करती है। भोला भाला विजय सिंह यही समझता कि उसकी भाभी कितनी अच्छी है जो उसकी फिक्र करती है और हर रोज़ समय पर उसके लिए इतनी भीषण धूप व गर्मी में खाना लेकर आती है।
इन बीस दिनों में विजय सिंह भी कुछ हद तक सहज फील करने लगा था अपनी भाभी से। प्रतिमा उससे खूब हॅसती बोलती और बात बात पर उसके गले लग जाती। विजय सिंह को उसका इस तरह अपने गले लग जाना अच्छा तो नहीं लगता था किन्तु ये सोच कर वह चुप रह जाता कि प्रतिमा शहर वाली औरत है और इस तरह अपनो के गले लग जाना शायद उसके लिए आम बात है। ऐसे ही एक दिन बातों बातों में प्रतिमा ने विजय सिंह से कहा__"हम दोनो देवर भाभी इतने दिनों से खुशी खुशी हॅसते बोलते रहे और फिर एक दिन मैं चली जाऊॅगी शहर। वहाॅ मुझे ये सब बहुत याद आएगा। मुझे तुम्हारे साथ यहाॅ इस तरह हॅसना बोलना और मज़ाक करना बहुत अच्छा लग रहा है। रात में भी मैं तुम्हारे बारे में ही सोचती रहती हूॅ। ऐसा लगा करता है विजय कि कितनी जल्दी सुबह हो और फिर कितनी जल्दी मैं दोपहर में तुम्हारे लिए खाना लेकर जाऊॅ? हाय ये क्या हो गया है मुझे? क्यों मैं तुम्हारी तरफ इस तरह खिंची चली आती हूॅ विजय? क्या तुमने मुझ पर कोई जादू कर दिया है?"
प्रतिमा की ये बातें सुन कर विजय सिंह को ज़बरदस्त झटका लगा। उसकी तरफ देखते हुए इस तरह खड़ा रह गया था जैसे किसी ने उसे पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया हो। मनो मस्तिष्क में धमाके से हो रहे थे उसके। जबकि उसकी हालत से बेख़बर प्रतिमा कहे जा रही थी___"इन चंद दिनों में ये कैसा रिश्ता बन गया है हमारे बीच? तुम्हारा तो पता नहीं विजय लेकिन मुझे अपने अंदर का समझ आ रहा है। मुझे लगता है कि मुझे तुमसे प्रेम हो गया है। हे भगवान! कोई और सुने तो क्या कहे? प्लीज़ विजय मुझे ग़लत मत समझना। ऐसा हो जाता है कि कोई हमें अच्छा लगने लगता है और उससे प्यार हो जाता है। कसम से विजय मुझे इसका पता ही नहीं चला।"
विजय सिंह के दिलो दिमाग़ होने वाले धमाके अब और भी तेज़ हो गए थे। प्रतिमा का एक एक शब्द पिघले हुए शीशे की तरह उसके हृदय पर पड़ रहा था। उसकी हालत देखने लायक हो गई थी। चेहरे पर बारह क्या पूरे के पूरे चौबीस बजे हुए थे। पसीने से तर चेहरा जिसमें हल्दी सी पुती हुई थी।
सहसा प्रतिमा ने उसे ध्यान से देखा तो बुरी तरह चौंकी। उसे पहले तो समझ न आया कि विजय सिंह की ये अचानक ही क्या हो गया है फिर तुरंत ही जैसे उसके दिमाग़ की बत्ती जल उठी। उसे समझते देर न लगी कि उसकी इस हालत का कारण क्या है? एक ऐसा इंसान जिसे रिश्तों की क़दर व उसकी मान मर्यादाओं का बखूबी ख़याल हो तथा जो कभी भी किसी कीमत पर किसी पराई औरत के बारे में ग़लत ख़याल तक न लाता हो उसकी हालत ये जान कर तो ख़राब हो ही जाएगी कि उसकी अपनी भाभी उससे प्रेम करती है। ये बात उससे कैसे पच सकती थी भला? अभी तक जितना कुछ हो रहा था वही उससे नहीं पच रहा था तो फिर इतनी संगीन बात भला कैसे पच जाती?
"वि विजय।
" प्रतिमा ने उसे उसके कंधों से पकड़ कर ज़ोर से झकझोरा___"ये ये क्या हो क्या हो गया है तुम्हें?"
प्रतिमा के झकझोरने पर विजय सिंह बुरी तरह चौंका। उसके मनो मस्तिष्क ने तेज़ी से काम करना शुरू कर दिया। अपने नज़दीक प्रतिमा को अपने दोनो कंधे पकड़े देख वह तेज़ी से पीछे हट गया। इस वक्त उसके चेहरे पर बहुत ही अजीब से भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे थे।
"विजय क्या हुआ तुम्हें?" प्रतिमा ने चकित भाव से कहा___"देखो विजय मुझे ख़लत मत समझना। इसमे मेरी कोई ग़लती नहीं है।"
"ये ये अच्छा नहीं हुआ भाभी।" विजय सिंह ने आहत भाव से कहा___"आप ऐसा कैसे सोच सकती हैं? जबकि आपको पता है कि ऐसा सोचना भी पाप है?"
"मैं जानती हूॅ विजय।" प्रतिमा ने दुखी होने की ऐक्टिंग की, बोली___"मुझे पता है कि ऐसा सोचना भी ग़लत है। लेकिन ये कैसे हुआ मुझे नहीं पता विजय। शायद इतने दिनों से एक साथ हॅसने बोलने से ऐसा हुआ है। तुम्हारी मासूमियत, तुम्हारा भोलापन तथा तुम्हारी अच्छाईयाॅ मेरे दिलो दिमाग़ में उतरती चली गईं हैं। किसी के लिए दिल में भावनाएॅ जाग जाना भला किसके अख्तियार में होता है? ये तो दिल का दखल होता है। उसे जो अच्छा लगता उसके लिए धड़कने लगता है। इसका पता इंसान को तब चलता है जब उसका दिल अंदर से अपने महबूब के लिए बेचैन होने लगता है। वही मेरे साथ हुआ है विजय। कदाचित तुम मेरे इस नादान व नासमझ दिल को भा गए इस लिए ये सब हो गया।"
"आप जाइये भाभी यहाॅ से।" विजय सिंह ने कहा___"इस बात को यहीं पर खत्म कर दीजिए। अगर आपको अपने अंदर का पता चल गया है तो अब आप वहीं पर रुक जाइए। अपने क़दमों को रोंक लीजिए। मैं आपके विनती करता हूॅ भाभी। कृपया आप जाइये यहाॅ से।"
"इतनी कठोरता से मुझे जाने के लिए मत कहो विजय।" प्रतिमा ने मगरमच्छ के आॅसू छलका दिये, बोली___"तुम भी समझ सकते हो इसमें मेरा कोई दोष नहीं है। और अपने क़दमों को रोंकना इतना आसान नहीं होता। ये प्रेम बड़ा अजीब होता है विजय। ये किसी की नहीं सुनता, खुद अपनी भी।"
"मैं कुछ सुनना नहीं चाहता भाभी।" विजय सिंह ने कहा___"मैं सिर्फ इतना जानता हूॅ कि ये ग़लत है और मैं ग़लत चीज़ों के पक्ष में कभी नहीं हो सकता। आप भी इस सबको अपने ज़हन से निकाल दीजिए और हो सके तो कभी भी मेरे सामने मत आइयेगा।"
"ऐसा तुम कैसे कह सकते हो विजय?" प्रतिमा ने रोने का नाटक किया__"मैने इतना बड़ा गुनाह तो नहीं किया है जिसकी सज़ा तुम इस तरह दे रहे हो? प्रेम तो हर इंसान से होता है। क्या देवर भाभी के बीच प्रेम नहीं हो सकता? बिलकुल हो सकता है विजय...प्रेम तो वैसे भी सबसे पाक होता है।"
"ये सब किताबी बातें हैं भाभी।" विजय सिंह ने कहा___"आज के युग में प्रेम की परिभाषा कुछ और ही हो गई है। अगर नहीं होती तो आपको अपने पति के अलावा किसी और से प्रेम नहीं होता।
प्रेम तो वही है जो किसी एक से ही एक बार होता है और फिर ताऊम्र तक वह सिर्फ उसी का होकर रहता है। किसी दूसरे के बारे में उसके दिल में विचार ही नहीं उठता कभी।"
"ये सबके सोचने का नज़रिया है विजय कि वो प्रेम के बारे में कैसी परिभाषा को मानता है और समझता है?" प्रतिमा ने कहा___"मेरा तो मानना ये है कि प्रेम बार बार होता है। दिल भले ही हज़ारों बार टूट कर बिखर जाए मगर वह प्रेम करना नहीं छोंड़ता। वह प्रेम करता ही रहता है।"
"सबकी अपनी सोच होती है भाभी।" विजय सिंह ने कहा___"लोग अपने मतलब के लिए ग़लत को भी सही ठहरा देते हैं और उसे साबित भी कर देते हैं। मगर मेरी सोच ऐसी नहीं है। मेरे दिल में मेरी पत्नी के अलावा कोई दूसरा आ ही नहीं सकता। मैं उससे बेइंतहां प्रेम करता हूॅ, उसे से मरते दम वफ़ा करूॅगा। किसी और से मुझे वैसा प्रेम हो ही नहीं सकता। प्रेम में सिर्फ दिल का ही नहीं दिमाग़ का भी दखल होना ज़रूरी है। मन में दृढ़ संकल्पों का होना भी ज़रूरी है। अगर ये सब है तो आपको किसी दूसरे प्रेम हो ही नहीं सकता।"
"हो सकता किसी और के पास तुम्हारे जैसी इच्छा शक्ति या दृढ़ संकल्प न हो।" प्रतिमा ने कहा___"और वह मेरे जैसे ही किसी दूसरे से भी प्रेम कर बैठे।"
"तो मैं यही कहूॅगा कि उसका वो प्रेम निम्न दृष्टि का है।" विजय सिंह ने कहा___"जो अपने पहले प्रेमी के लिए वफ़ा नहीं कर सका वह अपने दूसरे प्रेमी के साथ भी वफ़ा नहीं कर सकेगा। क्योंकि संभव है कि कभी ऐसा भी समय आ जाए कि उसे किसी तीसरे इंसान से भी प्रेम हो जाए। तब उसके बारे में क्या कहा जाएगा? सच्चा प्रेम और सच्ची वफ़ा तो वही है भाभी जो सिर्फ अपने पहले प्रेमी से ही की जाए। उसी हो कर रह जाए।"
प्रतिमा को समझ ना आया कि अब वह विजय से क्या कहे? ये बात तो वह खुद भी समझती थी कि विजय ठीक ही कह रहा है। किन्तु उसे तो विजय को फाॅसना था इस लिए भला कैसे वह हार मान लेती? ये दाॅव बेकार चला गया तो कोई दूसरा दाॅव सही।
"तो तुम ये कहना चाहते हो कि मैं तुम्हारे बड़े भइया और अपने पति के लिए वफ़ादार नहीं हूॅ? प्रतिमा ने कहा___"क्योंकि मुझे उनके अलावा तुमसे प्रेम हुआ?"
"मैं किसी एक के लिए नहीं कह रहा भाभी बल्कि हर किसी के लिए कह रहा हूॅ।" विजय सिंह ने कहा___"क्योंकि मेरी सोच यही है। मैं इस जीवन में सिर्फ एक का ही होकर रहना चाहता हूॅ और भगवान से ये प्रार्थना भी करता हूॅ वो अगले जन्मों में भी मुझे मेरी गौरी का ही रहने दे।"
"ठीक है विजय।" प्रतिमा ने सहसा पहलू बदला___"मैं तुमसे ये नहीं कह रही कि तुम गौरी को छोंड़ कर मुझसे प्रेम करो। किन्तु इतना ज़रूर चाहती हूॅ कि मुझे खुद से इस तरह दूर रहने की सज़ा न दो। मैं तुमसे कभी कुछ नहीं मागूॅगी बस दिल के किसी कोने में मेरे लिए भी थोड़ी जगह बनाए रखना।"
"ऐसा कभी नहीं हो सकता भाभी।
" विजय सिंह दृढ़ता से कहा___"क्योंकि ये रिश्ता ही मेरी नज़र में ग़लत है और ग़लत मैं कर नहीं सकता। हाॅ आप मेरी भाभी हैं और मेरे लिए पूज्यनीय हैं इस लिए इस रिश्ते के लिए हमेशा मेरे अंदर सम्मान की भावना रहेगी। देवर भाभी के बीच जिस तरह का स्नेह होता है वो भी रहेगा। मगर वो नहीं जिसकी आप बात कर रही हैं।"
"ऐसा क्यों कह रहे हो विजय?" प्रतिमा ने रुआॅसे भाव की ऐक्टिंग की___"क्या मैं इतनी बुरी लगती हूॅ तुम्हें? क्या मैं इस काबिल भी नहीं कि तुम्हारा प्रेम पा सकूॅ?"
"ऐसी बातें आपको करनी ही नहीं चाहिए भाभी।" विजय सिंह ने बेचैनी से पहलू बदला___"आप मुझसे बड़ी हैं हर तरह से। आपको खुद समझना चाहिए कि ये ग़लत है। जानते बूझते हुए भी आप ग़लत राह पर चलने की बात कर रही हैं। जबकि आपको करना ये चाहिए कि आप खुद को समझाएॅ और इससे पहले कि हालात बिगड़ जाएॅ आप उस माहौल से जल्द से जल्द निकल जाइये।"
प्रतिमा की सारी कोशिशें बेकार रहीं। विजय सिंह को तो जैसे उसकी कोई बात ना माननी थी और ना ही माना उसने। थक हार कर प्रतिमा वहाॅ से हवेली लौट आई थी। हवेली में उसने अपने पति से आज की सारी महाभारत बताई। उसकी सारी बातें सुन कर अजय सिंह हैरान रह गया। उसे समझ न आया कि उसका भाई आख़िर किस मिट्टी का बना हुआ है? किन्तु आज की बातों से कहीं न कहीं उसे ये उम्मीद ज़रूर जगी कि आज नहीं तो कल विजय सिंह प्रतिमा के सामने अपने हथियार डाल ही देगा। अगले दिन जब प्रतिमा फिर से विजय के लिए टिफिन तैयार करने किचेन में गई तो गौरी को उसने किचेन में टिफिन तैयार करते देखा।
"अब कैसी तबीयत है गौरी?" प्रतिमा ने किचेन में दाखिल होते हुए पूछा था।
"अब ठीक हूॅ दीदी।" गौरी ने पलट कर देखते हुए कहा___"इस लिए मैने सोचा कि उनके लिए टिफिन तैयार करके खेतों पर चली जाऊॅ।"
"अरे तुम अभी थोड़े दिन और आराम करो गौरी।" प्रतिमा ने कहा___"अभी अभी तो ठीक हुई हो। बाहर बहुत तेज़ धूप और गर्मी है। ऐसे में फिर से बीमार हो जाओगी तुम। मैं तो रोज़ ही विजय को खाना दे आती हूॅ। लाओ मुझे मैं देकर आती खाना विजय को।"
"अरे अब मैं बिलकुल ठीक हूॅ दीदी।" गौरी ने कहा___"आप चिन्ता मत कीजिए। दो चार दिन से आराम ही तो कर रही थी मैं।"
"अरे तो अभी और कुछ दिन आराम कर लो गौरी।" प्रतिमा ने कहा___"और वैसे भी मैं कुछ दिनों बाद चली जाऊॅगी क्योंकि बच्चों के स्कूल खुलने वाले हैं। मुझे अच्छा लगता है खेतों में। वहाॅ पर आम के बाग़ों में कितनी मस्त हवा लगती है। कितना सुकून मिलता है वहाॅ। मैं तो विजय को खाना देने के बाद वहीं चली जाती हूॅ और वहीं पर पेड़ों की घनी छाॅव में बैठी रहती हूॅ। यहाॅ से तो लाख गुना अच्छा है वहाॅ।"
"हाॅ ये तो आपने सही कहा दीदी।" गौरी ने मुस्कुरा कर कहा___"वहाॅ की बात ही अलग है। इसी लिए तो मैं दिन भर वहीं उनके पास ही रहती हूॅ।
"
"तुम तो हमेशा ही रहती हो गौरी।" प्रतिमा ने मुस्कुरा कर कहा__"और वहीं पर तुम दोनो मज़ा भी करते हो। है ना??"
"क्या दीदी आप भी कैसी बातें करती हैं?" गौरी ने शरमा कर कहा___"ये सब खेतों में थोड़ी न अच्छा लगता है।"
"ख़ैर छोड़ो।" प्रतिमा ने कहा___"दो चार दिन बचे हैं तो मुझे वहाॅ की ठंडी छाॅव का आनन्द ले लेने दो। उसके बाद तुम जाती रहना।"
"हाॅ तो ठीक है न दीदी।" गौरी ने कहा__"हम दोनो चलते हैं और वहाॅ की ठंडी छाॅव का आनंद लेंगे।"
"तुम अभी अभी बीमारी से बाहर आई हो गौरी।" प्रतिमा ने कहा___"इस लिए तुम्हें अभी इतनी धूप में बाहर नहीं निकलना चाहिए। मैं तुम्हारे स्वास्थ के भले के लिए ही कह रही हूॅ और तुम हो ज़िद किये जा रही हो? अपनी दीदी का बिलकुल भी कहा नहीं मान रही हो तुम। या फिर तुम्हारी नज़र में मेरी कोई अहमियत ही नहीं है। ठीक है गौरी करो जो तुम्हें अच्छा लगे।"
"अरे नहीं दीदी।" गौरी ने जल्दी से कहा___"आपकी अहमियत तो बहुत ज्यादा है हम सबकी नज़र में। मैं तो बस इस लिए कह रही थी कि आप इतने दिनों से धूप और गर्मी में परेशान हो रही हैं। और भला मैं कैसे आपकी बात टाल सकती हूॅ दीदी? मुझे तो बेहद खुश हूॅ कि आप मेरे हित की बारे में सोच रहीं हैं।"
"तो फिर लाओ वो टिफिन मुझे दो।" प्रतिमा ने जो इमोशनली उसे ब्लैकमेल किया था उसमें वह सफल हो गई थी, बोली___"मैं विजय को खाना देने जा रही हूॅ और तुम अभी आराम करो अपने कमरे में।"
"जी ठीक है दीदी।" गौरी ने मुस्कुरा कहा और टिफिन प्रतिमा को पकड़ा दिया। प्रतिमा टिफिन लेकर किचेन से बाहर निकल गई। जबकि गौरी खुशी खुशी ऊपर अपने कमरे की तरफ बढ़ गई।
प्रतिमा जब खेतों पर पहुॅची तो वहाॅ का माहौल देख कर उसके सारे अरमानों पर पानी फिर गया। दरअसल आज पिछले दिनों के विपरीत विजय सिंह खेतों पर अकेला नहीं था। बल्कि उसके साथ कई मजदूर भी खेतों पर आज नज़र आ रहे थे। कदाचित विजय सिंह को अंदेशा था कि प्रतिमा आज भी उसके लिए टिफिन लेकर आएगी और फिर यहाॅ पर वह फिर से अपने प्रेम का बेकार ही राग अलापने लगेगी। इस लिए विजय सिंह ने कुछ मजदूरों को कल ही बोल दिया था कि वो अपने लिए दोपहर का खाना घर से ही ले आएॅगे और यहीं पर खाएॅगे। विजय सिंह के कहे अनुसार कई मजदूर आज यहीं पर थे।
प्रतिमा ये सब देख कर अंदर ही अंदर जल भुन गई थी। उसे विजय सिंह से ऐसी उम्मीद हर्गिज़ नहीं थी। वह तो उसे निहायत ही शान्त और भोला समझती थी। किन्तु आज उसे भोले भाले विजय ने अपना दिमाग़ चला दिया था जिसका असर ये हुआ था कि प्रतिमा अब कुछ नहीं कर सकती थी।
प्रतिमा जैसे ही मकान के पास पहुॅची तो एक मजदूर उसके पास आया और बड़े अदब से बोला___"मालकिन, मॅझले मालिक हमका बोले कि आपसे उनके खाने का टिफिनवा ले आऊॅ। काह है ना मालकिन आज मॅझले मालिक हम मजदूरों के साथ ही खाना खाय चाहत हैं।
ई हमरे लिए बहुतै सौभाग्य की बात है। दीजिए मालकिन या टिफिनवा हम ले जात हैं।"
प्रतिमा भला क्या कह सकती थी। वह तो अंदर ही अंदर जल कर खाक़ हुई जा रही थी। उसने आए हुए मजदूर को टिफिन पकड़ाया और पैर पटकते हुए मकान के अंदर चली गई और कमरे में जाकर चारपाई पर पसर गई। गुस्से से उसका चेहरा लाल सुर्ख पड़ गया था।
"ये तुमने अच्छा नहीं किया विजय।" प्रतिमा खुद से ही बड़बड़ा रही थी___"तुम जिस चीज़ को अपनी समझदारी या होशियारी समझ रहे हो वो दरअसल मेरा अपमान है। तुम दिखाना चाहते हो कि तुम्हारी नज़र में मेरी कोई अहमियत ही नहीं है। कितना अपने प्रेम का मैने तुमसे कल रोना रोया था किन्तु तुमने उसे ठुकरा दिया ये कह कर कि ये ग़लत है। अरे सही ग़लत आज के युग में कौन देखता है विजय? चार दिन का जीवन है उसे हॅस खुशी और आनंद के साथ जियो। मगर तुम तो सच्चे प्रेम का राग अलापे जा रहे हो। क्या है इस सच्चे प्रेम में? बताओ विजय क्या हासिल कर लोगे इस सच्चे प्रेम में? अरे एक ही औरत के पल्लू में बॅधे हो तुम। ये कैसा प्रेम है जिसने तुम्हें बाॅध कर रखा हुआ है?"
जाने कितनी ही देर तक प्रतिमा यूॅ ही बड़बड़ाती रही और ऐसे ही सो गई वह। फिर जब उसकी नीद खुली तो हड़बड़ा कर चारपाई से उठी वह। अभी वह उठ कर कमरे से बाहर ही जाने वाली थी कि तभी विजय किसी काम से कमरे में आ गया।
कमरे में अपनी भाभी को देख कर विजय सिंह हैरान रह गया। उसने तो सोचा था कि प्रतिमा उसी समय वापस चली गई होगी किन्तु यहाॅ तो वह अभी भी है। प्रतिमा को देखकर विजय हैरान हुआ फिर जल्द बाहर जाने के लिए पलटा।
"रुक जाओ विजय।" प्रतिमा ने सहसा ठंडे स्वर में कहा___"क्या समझते हो तुम अपने आपको? क्या सोच कर तुमने यहाॅ मजदूरों को बुलाया हुआ था बताओ?"
"क कुछ भी तो नहीं भाभी।" विजय सिंह हड़बड़ा गया था___"मैंने उन्हें नये फलों की फसल के बुलाया था। ताकि खेतों को उनके लिए तैयार किया जा सके।"
"झूठ मत बोलो विजय।" प्रतिमा ने आवेश मेः कहा___"मुझे अच्छी तरह पता है कि तुमने मजदूरों को यहाॅ दोपहर में क्यों बुलाया था? तुम समझते थे कि तुम्हें हर दिन की तरह यहाॅ अकेले देख कर मैं फिर से अपने प्रेम की बातें तुमसे करूॅगी। इसी सबसे बचने के लिए तुमने ये सब किया है ना?"
"आप बेवजह बातें बना रही हैं भाभी।" विजय सिंह ने कहा___"जबकि सच्चाई यही है कि मैने फलों की फसल के लिए ही मजदूरों को यहाॅ बुलाया है।"
"झूठ, सरासर झूठ है ये।" प्रतिमा एक झटके से चारपाई से उठ कर विजय के पास आ गई, फिर बोली___"जो इंसान हमेशा सच बोलता है वो अगर कभी किसी वजह से झूठ बोले तो उसका वह झूठ तुरंत ही पकड़ में आ जाता है विजय। मैं कोई अनपढ़ गवार नहीं हूॅ बल्कि कानून की पढ़ाई की है मैने। मनोविज्ञान का बारीकी से अध्ययन किया है मैने।
मैं पल में बता सकती हूॅ कि कौन ब्यक्ति कब झूठ बोल रहा है?"
"चलिये मान लिया कि यही सच है।" विजय सिंह ने कहा___"यानी मैने आपसे बचने के लिए ही मजदूरों को यहाॅ बुलाया था। तब भी क्या ग़लत किया मैने? मैने तो वही किया जो ऐसी परिस्थिति में किसी समझदार आदमी को करना चाहिए। मैं वो नहीं सुनना चाहता और ना ही होने देना चाहता जो आप कहना या करना चाहती हैं। मैने कल भी आपसे कहा था कि ये ग़लत है और हमेशा यही कहता भी रहूॅगा। मैं ख़ैर अनपढ़ ही हूॅ लेकिन आप तो पढ़ी लिखी हैं न? आपको तो रिश्तों के बीच के संबंधों का अच्छी तरह पता होगा कि किन रिश्तों के बीच किन रिश्तों को देश समाज सही ग़लत अथवा जायज़ नाजायज़ ठहराता है? अगर पता है तो फिर ये सब सोचने व करने का क्या मतलब हो सकता है? आपको तो पता है कि आपके दिल में मेरे प्रति क्या है तो क्यों नहीं उसे निकाल देती आप? क्यों रिश्तों के बीच इस पाप को थोपना चाहती हैं आप?"
"किस युग में तुम जी रहे हो विजय किस युग में?" प्रतिमा ने कहा___"आज के युग के अनुसार जीना सीखो। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। तुम भी प्रकृति के नियमों के अनुसार खुद को बदलो। जो समय के साथ नहीं बदलता उसे वक्त बहुत पीचे छोंड़ देता है।"
"अगर परिवर्तन इसी चीज़ के लिए होता है तो माफ़ करना भाभी।" विजय ने कहा__"मुझे आज के इस युग के अनुसार खुद को बदलना गवारा नहीं है। वक्त मुझे पीछे छोंड़ कर कहाॅ चला जाएगा मुझे इसकी कोई चिन्ता नहीं है। मेरी आत्मा तथा मेरा ज़मीर जिस चीज़ को स्वीकार नहीं कर रहा उस चीज़ को मैं किसी भी कीमत पर अपना नहीं सकता। अब आप जा सकती हैं, क्योंकि इससे ज्यादा मैं इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहता।"
इतना कह कर विजय बाहर की तरफ जाने ही लगा था कि प्रतिमा झट से उसके पीछे से चिपक गई और फिर दुखी होने का नाटक करते हुए बोली___"ऐसे मुझे छोंड़ कर मत जाओ विजय। मैं खुद को समझाऊॅगी इसके लिए। शायद मेरे दिल से तुम्हारा प्रेम मिट जाए। लेकिन तब तक तो हम कम से कम पहले जैसे हॅस बोल सकते है ना?"
"अब ये संभव नहीं है भाभी।" विजय ने तुरंत ही खुद को उससे अलग करके कहा__"अब हालात बदल चुके हैं। आप मुझे किसी बात के लिए मुजबूर मत कीजिए। मैं नहीं चाहता कि ये बात हमारे बीच से निकल कर घर वालों तक पहुॅच जाए।"
विजय सिंह के अंतिम वाक्यों में धमकी साफ तौर पर महसूस की जा सकती थी। प्रतिमा जैसी शातिर औरत को समझते देर न लगी कि अब इससे आगे कुछ भी करना उसके हित में नहीं होगा। इस लिए वह बिना कुछ बोले कमरे से टिफिन उठा कर हवेली के लिए निकल गई।
गर्मी में बच्चों के स्कूल की छुट्टियाॅ खत्म होने में कुछ ही दिन शेष रह गए थे। विजय सिंह शाम को हवेली आ जाता था। एक दिन ऐसे ही प्रतिमा विजय के कमरे में पहुॅच गई। उस वक्त गौरी किचेन में करुणा के साथ खाना बना रही थी।
जबकि नैना सभी बच्चों को अजय सिंह वाले हिस्से में ऊपर अपने कमरें में पढ़ा रही थी। माॅ जी हमेशा की तरह अपने कमरे में थी और बाबू जी गाॅव तरफ कहीं गए हुए थे। अभय सिंह भी हवेली में नहीं था।
अपने कमरे में विजय सिंह लुंगी बनियान पहने हुए ऑख बंद किये लेटा था। तभी उसने किसी की आहट से अपने ऑखें खोली। नज़र प्रतिमा पर पड़ी तो वह बुरी तरह चौंका। एक झटके से वह बेड पर उठ कर बैठ गया। ये पहली बार था कि उसके कमरे में प्रतिमा आई थी वो भी इस तरह जबकि कमरे में वह अकेला ही था। उसे समझ न आया कि प्रतिमा यहाॅ किस लिए आई है? उसके दिल की धड़कन रेल के इंजन की तरह दौड़ रही थी। उसे डर था कि कहीं उसकी पत्नी गौरी न आ जाए। हलाॅकि इसमें इतना डरने या घबराने की बात नहीं किन्तु उनके बीच हालात ऐसे थे कि हर बात से डर लग रहा था उसे।
"क्या कर रहे हो विजय?" प्रतिमा ने मुस्कुरा कर कहा___"मैने सोचा एक बार तुम्हारा दीदार कर लूॅ तो दिल को सुकून मिल जाए थोड़ा। कई दिन से देखा नहीं था तुम्हें तो दिल बड़ा बेचैन था। अब तो तुम्हारे लिए गौरी ही टिफिन लेकर जाती है। पता नहीं क्यों तुम मुझसे कटे कटे से रहते हो। अपनी एक झलक भी देखने नहीं देते मुझे। सच कहती हूॅ विजय, तुमको तो ज़रा भी मेरी चिन्ता नहीं है।"
"ऐसी बातें करते हुए आपको शर्म नहीं आती भाभी?" विजय सिंह को जाने क्यों आज पहली बार उस पर गुस्सा आया था, उसी गुस्से वाले लहजे में बोला___"अपनी ऊम्र का कुछ तो लिहाज कीजिए। तीन तीन बच्चों की माॅ हैं आप और इसके बाद भी मन में ऐसी फालतू बातें लिए फिरती हैं आप।"
"इश्क़ की न कोई जात होती है विजय और ना ही कोई ऊम्र होती है।" प्रतिमा ने दार्शनिकों वाले अंदाज़ में कहा___"इश्क़ तो कभी भी किसी से भी किसी भी ऊम्र में हो सकता है। मुझे एक बार फिर से इस ऊम्र में तुमसे हो गया तो क्या करूॅ मैं? ये तो मेरे दिल की ख़ता है विजय, इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है।"
"देखिये भाभी।" विजय ने कहा___"मैं आपकी बहुत इज़्ज़त करता हूॅ। और मैं चाहता हूॅ कि मेरे दिल में आपके लिए ये इज़्ज़त ऐसी ही बनी रहे। इस लिए बेहतर होगा कि आप खुद भी अपने मान सम्मान की बात सोचें। अब आप जाइये यहाॅ से।"
"इतने कठोर तो नहीं थे विजय तुम?" प्रतिमा ने उदास भाव से कहा__"हमारे बीच कितना हॅसी मज़ाक होता था पहले। कितना खुश रहते थे न हम दोनो वहाॅ खेतों पर? वो भी तो एक प्रेम ही था विजय। अगर नहीं होता तो क्या हमारे बीच वैसा हॅसना बोलना होता?"
"वो सब देवर भाभी के पाक रिश्तों का प्रेम था भाभी।" विजय ने कहा___"जबकि आज का आपका ये प्रेम उस पाक प्रेम से बहुत जुदा है।"
"कैसे जुदा है विजय?" प्रतिमा ने कहा__"वैसा ही तो है आज भी। तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि वो प्रेम इस प्रेम से बहुत जुदा है?"
"मैं इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहता भाभी।
" विजय ने बेचैनी से कहा__"और अब आप जाइये यहाॅ से। मैं आपके पैर पड़ता हूॅ, कृपया जाइये यहाॅ से।"
प्रतिमा देखती रह गई विजय सिंह को। उस विजय सिंह को जिसके इरादे तथा जिसके संकल्प किसी फौलाद से भी ज्यादा ठोस व मजबूत थे। कुछ देर एकटक विजय को देखने के बाद प्रतिमा वहाॅ से अंदर ही अंदर जलती भुनती चली आई।
________________________
वर्तमान______
हल्दीपुर पुलिस स्टेशन!!
रितू अपनी पुलिस जिप्सी से नीचे उतरी और थाने के अंदर लम्बे लम्बे कदमों के साथ बढ़ गई। आस पास मौजूद पुलिस के सिपाहियों ने उसे सैल्यूट किया जिसका जबाव वह अपनी गर्दन को हल्का सा खम करते हुए दे रही थी। कुछ ही पल में वह अपने केबिन में पहुॅची और टेबल के उस पार रखी कुर्सी पर बैठ गई। तभी उसके केबिन में हवलदार रामदीन दाखिल हुआ।
"कहो रामदीन क्या रिपोर्ट है लोकेशन की?" रितू ने पूछा उससे।
"मैडम पक्की ख़बर है।" रामदीन ने कहा__"उस नेता का वो हरामी कपूत अपने फार्महाउस पर अपने कुछ लफंगे दोस्तों के साथ ऐश फरमा रहा है।"
"ख़बर पक्की है ना?" रितू ने गहरी नज़र से रामदीन की तरफ देखा।
"सौ टका पक्की है मैडम।" रामदीन ने खींसें निपोरते हुए कहा__"अपनी बेवफा बीवी की कसम।"
"बेवफ़ा बीवी???" रितू ने हैरानी से रामदीन की तरफ देखा___"ये क्या बोल रहे हो तुम रामदीन?"
"अब बेवफा को बेवफा न बोलूॅ तो और क्या बोलूॅ मैडम?" रामदीन ने सहसा दुखी भाव से कहा___"मेरा एक पड़ोसी है...नाम है चालूराम। जैसा नाम वैसा ही है वो मैडम। चालूराम बड़ी चालाकी से मेरी बीवी को फॅसा लेता है और फिर उसके साथ चालू हो जाता है। इतना ही नहीं मेरी बीवी भी उसके साथ चालू हो जाती है। इन दोनो के चालूपन ने मेरा जीना हराम कर रखा है मैडम।"
"ओफ्फो रामदीन।" रितू का दिमाग़ मानो चकरा सा गया___"ये क्या बकवास कर रहे हो तुम? कौन चालूराम और कैसा चालूपन?"
"जाने दीजिए मैडम।" रामदीन ने गहरी साॅस ली___"मेरी तो बड़ी दुखभरी दास्तां है।"
"अच्छा छोड़ो ये सब।" रितू ने कहा___"दो चार हवलदार को लो हाथ में और मेरे साथ चलो जल्दी।"
"जी मैडम।" रामदीन ने नाटकीय अंदाज़ में सैल्यूट बजाया और केबिन से बाहर निकल गया। उसके पीछे रितू भी बाहर आ गई।
बाहर चलते हुए रितू ने पाॅकेट से मोबाइल फोन निकाला और उसमें कोई नंबर डायल कर उसे कान से लगा लिया।
"जय हिन्द सर।" रितू ने कहा___"मुझे इमेडिएटली एक सर्च वारंट चाहिए।"
"............"
"आप फिक्र मत कीजिए सर।" रितू कह रही थी____"मैं सब सम्हाल लूॅगी। आप बस दो मिनट के अंदर मुझे वारंट का काग़ज फैक्स कर दीजिए।"
"..............."
"डोन्ट वरी सर।" रितू ने कहा___"आई विल हैण्डल इट।"
"............"
"जय हिन्द सर।" रितू ने कहा और काल डिस्कनेक्ट करके मोबाइल पुनः पाॅकेट में डाल लिया।
ठीक दो मिनट बाद ही फैक्स मशीन से एक कागज़ निकला।
रितू के इशारे पर वहीं खड़े रामदीन ने उस कागज़ को फैक्स मशीन से लेकर रितू को पकड़ा दिया। रितू ने ध्यान से कागज़ में लिखे मजमून को देखा और फिर उसे फोल्ड करके पाॅकेट में डाल लिया।
"रामदीन सबको लेकर मेरे साथ चलो।" रितू ने कहा थाने के बाहर खड़ी जिप्सी के पास आ गई। ड्राईविंग सीट पर खुद बैठी वह। चार हवलदारों के बैठते ही उसने जिप्सी को स्टार्ट कर मेन रोड की तरफ दौड़ा दिया।
लगभग आधे घंटे बाद वह हल्दीपुर की आबादी से बाहर दूर बने एक फार्महाउस के पास पहुॅची। यहाॅ पर रोड के दोनो साइड कई सारे फार्महाउस बने हुए थे। किन्तु रितू की जिप्सी जिस फार्महाउस के गेट के पास रुकी उस पर चौधरी फार्महाउस लिखा हुआ था तथा नाम के नीचे फार्महाउस का नंबर पड़ा था।
फार्महाउस के गेट पर दो बंदूखधारी गार्ड तैनात थे। पुलिस जिप्सी को देखते ही वो दोनो चौंके साथ ही दोनो के चेहरे सफेद फक्क भी पड़ गए। रितू जिप्सी से उतर कर तुरंत उन दोनो के करीब पहुॅची। तब तक चारो हवलदार भी आ चौके थे।
एकाएक ही जैसे बिजली सी चमकी। पलक झपकते ही दोनो बंदूखधारियों के कंठ से घुटी घुटी सी चीख निकली और वो लहरा कर वहीं ज़मीन पर गिर पड़े। वो दोनो बेहोश हो चुके थे। ये सब इतनी तेज़ी से हुआ था कि कोई कुछ समझ भी न पाया था कि ये सब कब और कैसे हो गया। हुआ यूॅ था कि रितू उनके पास पहुॅची और बिना कोई बात किये बिजली की सी तेज़ी से उसने अपने दोनो हाॅथों को कराटे की शक्ल देकर दोनो बंदूखधारियों की कनपटी पर बिजली की स्पीड से प्रहार किया था। वो दोनो कुछ समझ ही नहीं पाए थे और ना ही उन्हें इस सबकी कोई उम्मीद थी।
"इन दोनो की बंदूखों को अपने कब्जे में ले लो।" रितू ने आदेश दिया___"और उसके बाद इन दोनो को उठा कर जिप्सी में डाल दो।"
रितू के आदेश का फौरन ही पालन हुआ। चारो हवलदार अभी तक हैरान थे कि उनकी मैडम ने पलक झपकते ही दो दो बंदूखधारियों को अचेत कर दिया। बेचारे क्या जानते थे कि बला की खूबसूरत ये लड़की कितनी खतरनाक भी है।
सब कुछ होने के बाद चारो हवलदार तेज़ी से गेट के अंदर की तरफ दौड़े क्योंकि रितू तब तक गेट के अंदर जा चुकी थी। फार्महाउस काफी बड़ा था और काफी खूबसूरत भी। हर तरफ रंग बिरंगे फूलों की क्यारियाॅ लगी हुई थी तथा एक से बढ़ एक देशी विदेशी पेड़ पौधे लगे हुए थे। लम्बे चौड़े लान में विदेशी घास लगी हुई थी। कुल मिलाकर ये कह सकते हैं कि चौधरी ने अपनी काली कमाई का अच्छा खासा उपयोग किया हुआ था।
गेट से लेकर फार्महाउस की इमारत के मुख्य द्वार तक लगभग आठ फुट चौड़ी सफेद मारबल की सड़क बनी हुई थी तथा इमारत के पास से ही लगभग बीस फुट की ही चौड़ाई पर भी इमारत के चारो तरफ मारबल लगा हुआ था। बाॅकी हर जगह लान में हरी घास, पेड़ पौधे व फूलों की क्यारियाॅ थी।
मुख्य द्वार के बगल से जो कि पोर्च का ही एक हिस्सा था वहाॅ पर दो कारें खड़ी थी इस वक्त। एक ब्लैक कलर की इनोवा थी तथा दूसरी स्विफ्ट डिजायर थी। मुख्य द्वार बंद था। रितू को कहीं पर बेल लगी हुई न दिखी। इस लिए उसने दरवाजे पर हाथ से ही दस्तक दी। किन्तु अंदर से कोई दरवाजा खोलने नहीं आया। रितू ने कई बार दस्तक दी। परंतु परिणाम वही। ऐसा तो हो ही नहीं सकता था कि अंदर कोई है ही नहीं क्योंकि बाहर खड़ी दो कारें इस बात का सबूत थी कि इनसे कोई आया है जो इस वक्त इमारत के अंदर है।
जब रितू की दस्तक का कोई पराणाम सामने नहीं आया तो उसने इमारत से थोड़ा दूर आकर इमारत की तरफ ध्यान से देखा। इमारत दो मंजिला थी। मुख्य द्वार के कुछ ही फासले पर दोनो साइड काच की बड़ी सी किन्तु ब्लैक कलर की खिड़कियाॅ थी। जिनके ऊपर साइड बरसात के मौसम में पानी की बौछार से बचने के लिए रैक बनाया गया था। मुख्य द्वार पर एक लम्बा चौड़ा पोर्च था जो दोनो तरफ की उन कान की खिड़कियों तक था। पोर्च के ऊपर का भाग खाली था उसके बाद स्टील की रेलिंग लगी हुई थी।
अभी रितू ये सब देख ही रही थी कि मुख्य द्वार खुलने की आहट हुई। रितू ने बड़ी तेज़ी से चारो हवलदारों को इमारत के बगल साईड की दीवार के पीछे छुप जाने का इशारा किया जबकि खुद मुख्य द्वार के पास पहुॅच गई।
तभी दरवाजा खुला और सबसे पहले रोहित मेहरा बाहर निकला। उसके चेहरे पर अजीब से भाव थे, वह पीछे की तरफ ही देख कर हॅसते हुए बाहर आ रहा था। उसके पीछे अलोक वर्मा व किशन श्रीवास्तव था और अंत में सूरज चौधरी था। इसका बाप दिवाकर चौधरी शहर का एम एल ए था।
"भाई तुम सब यहीं रुको मैं अपनी वाली उस राॅड को भी लेकर आता हूॅ।" रोहित मेहरा ने कहा___"साली का फोन स्विच ऑफ बता रहा है। अब तो उसे लेने ही जाना पड़ेगा। आज तो इसकी अच्छे से बजाएॅगे हम सब।"
"ठीक है जल्दी आना।" अलोक ने कहा___"तब तक हम इनके होश में लाने का प्रयास करते हैं। और हाॅ सुन........।" आगे बोलते बोलते वह रुक गया क्योंकि दरवाजे के पार खड़ी पुलिस की वर्दी पहने रितू पर उसकी नज़र पड़ गई।
"क्या हुआ बे बोलते बोलते रुक क्यों गया तू?" रोहित मेहरा हॅसा___"कोई भूत देख लिया क्या?"
"ऐसा ही समझ ले।" अलोक ने ऑखों से बाहर की तरफ इशारा किया।
उसके इशारे से सबने देखा बाहर की तरफ और पुलिस इंस्पेक्टर रितू पर नज़र पड़ते ही उन सबकी नानी मर गई। शराब और शबाब का सारा नशा हिरन हो गया उनका। किन्तु ये कुछ देर के लिए ही था अगले पल वो सब मुस्कुराने लगे।
"ले भाई तू अपनी वाली को लेने जा रहा था यहाॅ तो एक ज़बरदस्त माल खुद ही पुलिस की वर्दी में चल कर आ गया।" किशन ने हॅसते हुए कहा___"अब तुझे कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है। हम सब इसके साथ ही अब मज़ा करेंगे।"
"सही कह रहा है यार।
" रोहित मेहरा ने रितू को ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा__"क्या फाड़ू फिगर है इसका। कसम से मज़ा आ जाएगा आज तो।"
"तो फिर देर किस बात की भाई?" अलोक ने कहा___"उठा ले चल इसे अंदर।"
"ओये एक मिनट।" किशन ने कहा___"मत भूलो कि ये पुलिस वाली है। इस वक्त अकेली दिख रही है मगर संभव है इसके साथ कोई और भी पुलिस वाले हों। ऐसे में बड़ी प्रोब्लेम हो जाएगी।"
"अबे साले तू कब अपने वकील बाप की तरह सोचना बंद करेगा?" अलोक घुड़का___"ये हमारा बाल भी बाॅका नहीं कर सकती। अब चल उठा इसे और ले चल अंदर।"
रितू चुपचाप खड़ी इन सबकी बातें सुन रही थी। ये अलग बात थी कि अंदर ही अंदर वह गुस्से भभक रही थी। इधर सबसे आगे रोहित मेहरा ही था सो वही बढ़ा पहले। उसके बाद सभी दरवाजे के बाहर आ गए।
वो चारो रितू के चारो तरफ फैल गए और उसके चारो तरफ गोल गोल चक्कर लगाने लगे।
"भाई हर तरफ से पटाखा है ये तो।" अलोक ने कहा___"सूरज भाई पहले कौन इसकी ले....आहहहहहह।"
अलोक के हलक से दर्द भरी चीख गूॅज गई थी। रितु ने बिजली की सी फुर्ती से पलट कर बैक किक अलोक के सीने पर जड़ा था। किक पड़ते ही वह चीखते हुए तथा हवा में लहराते हुए पोर्च से बाहर जाकर गिरा था। रितूके सब्र का बाॅध जैसे टूट गया था। वह इतने पर ही नहीं रुकी बल्कि पलक झपकते ही बाॅकी तीनों भी पोर्च के अलग अलग हिस्सों पर पड़े कराह रहे थे।
"तुम जैसे हिजड़ों की औलादों को सुधारने के लिए मैं आ गई हूॅ।" रितू ने भभकते हुए कहा___"तुम चारों की ऐसी हालत करूॅगी कि दोबारा जन्म लेने से इंकार कर दोगे।"
"भाई ये क्या था?" किशन ने उठते हुए कहा__"ये तो लगता है करेंट मारती है। हमें इसे अलग तरीके से काबू में करना होगा।"
"सही कह रहा है तू।" अलोक ने कहा__"अब तो शिकार करने में मज़ा आएगा भाई लोग।"
"आ जाओ तुम चारो एक साथ।" रितू ने कहा___"मैंने तुम चारों का हुलिया न बिगाड़ दिया तो मेरा भी नाम रितू सिह बघेल नहीं।"
"चलो देख लेते हैं डियर।" सूरज ने पोजीशन में आते हुए कहा___"कि तुममें कोई बात है या हममें।"
चारों ने रितू को फिर से घेर लिया। किन्तु इस बार वो पूरी तरह सतर्क थे। उनकी पोजीशन से ही लग रहा था कि वो चारो जूड़ो कराटे जानते थे। रितू खुद भी पूरी तरह सतर्क थी।
चारो उसे घेरे हुए थे तथा उनके चेहरों पर कमीनेपन की मुस्कान थी। चारो ने ऑखों ही ऑखों में कोई इशारा किया और अगले ही पल चारो एक साथ रितू की तरफ झपटे किन्तु ये क्या??? वो जैसे ही एक साथ चारो तरफ से रितू पर झपटे वैसे ही रितू ने ऊपर की तरफ जम्प मारी और हवा में ही कलाबाज़ी खाते हुए उन चारों के घरे से बाहर आ गई। उसके बाहर आते ही चारो आपस में ही बुरी तरह टकरा गए। उधर रितू ने मानों उन्हें सम्हलने का मौका ही नहीं दिया बल्कि बिजली की सी स्पीड से उसने लात घूसों और कराटों की बरसात कर दी उन पर। वातावरण में चारों की चीखें गूॅजने लगी।
कुछ दूरी पर खड़े वो चारो पुलिस हवलदार भी ये हैरतअंगेज कारनामा देख रहे थे।
ऐसा नहीं था कि चारो लड़के कुछ कर नहीं रहे थे किन्तु उनका हर वार खाली जा रहा था जबकि रितू तो मानो रणचंडी बनी हुई थी। जूड़ो कराटे व मार्शल आर्ट के हैरतअंगेज दाॅव आजमाए थे उसने। परिणाम ये हुआ कि थोड़ी ही देर में उन चारो की हालत ख़राब हो गई। ज़मीन में पड़े वो बुरी तरह कराह रहे थे।
"क्यों सारी हेकड़ी निकल गई क्या?" रितू ने अलोक के पेट में पुलिसिये बूट की तेज़ ठोकर मारते हुए कहा___"उठ सुअर की औलाद। दिखा न अपनी मर्दानगी। साला एक पल में ही पेशाब निकल गया तेरा।"
रितू सच कह रही थी, अलोक की पैन्ट गीली हो गई थी। बूट की ठोकर लगते ही वह हलाल होते बकरे की तरह चिल्लाया था। साथ ही अपने दोनो हाॅथ जोड़कर बोला___"मुझे माफ़ कर दो प्लीज़। आज के बाद मैं ऐसा वैसा कुछ नहीं कहूॅगा।"
"कहेगा तो तब जब कहने लायक तू बचेगा भड़वे की औलाद।" रितू ने एक और ठोकर उसके पेट में जमा दी। वह फिर से चिल्ला उठा था। तभी रितू के हलक से चीख निकल गई। दरअसल उसका सारा ध्यान अलोक की तरफ था इस लिए वह देख ही नहीं पाई कि पीछे से किशन ने उसकी पीठ पर चाकू का वार कर दिया था। पुलिस की वर्दी को चीरता हुआ चाकू उसकी पीठ को भी चीर दिया था। पलक झपकते ही उसकी वर्दी उसके खून से नहाने लगाने थी।
"साली हमसे पंगा ले रही है तू।" किशन ने गुर्राते हुए कहा___"अब देख तेरी क्या हालत बनाते हैं हम?"
बड़ी हैरानी की बात थी कि कुछ ही दूरी पर खड़े चारो हवलदार तमाशा देख रहे थे। उनकी हालत ऐसी थी जैसे जूड़ी के मरीज़ हों। हाॅथों में पुलिस की लाठी लिए वो चारो डरे सहमें से खड़े थे। और उस वक्त तो उनकी हालत और भी खराब हो गई जब किशन ने पीछे से रितू की पीठ पर चाकू से वार किया था। चाकू का वार चीरा सा लगाते हुए निकल गया था, अगर किशन उसे पीठ पर ही पेवस्त कर देता तो मामला बेहद ही गंभीर हो जाता।
"रुक क्यों गया किशन?" सूरज ने उठते हुए कहा___"चीर कर रख दे इस साली की वर्दी को। यहीं पर इसे नंगा करेंगे हम और यहीं पर इसकी इज्जत लूटेंगे।"
"सूरज सही कह रहा है किशन।" रोहित भी उठ चुका था___"इसे सम्हलने का मौका मत दे और चाकू से चीर दे इसकी वर्दी को।"
किशन ने फिर से अपना दाहिना हाथ हवा में उठाया रितू पर वार करने के लिए। उधर रितू की पीठ में तेज़ी से पीड़ा उठ रही थी। खून बुरी तरह रिस रहा था। जैसे ही किशन ने उस पर वार किया उसने एक हाथ से उसके वार को रोंका और दूसरे हाॅथ से एक ज़बरदस्त मुक्का उसकी नाॅक में जड़ दिया। किशन के नाॅक की हड्डी टूटने की आवाज़ आई साथ ही उसकी भयंकर चीख वातावरण में फैल गई। उसकी नाक से भल्ल भल्ल करके खून बहने लगा था। चाकू उसके हाॅथ से छूट गया और वह ज़मीन पर धड़ाम से गिरा। उधर किशन की ये हालत देख कर बाॅकी तीनो हरकत में आ गए।
रितू ने तेज़ी से झुक कर ज़मीन से चाकू उठाया और जैसे ही वो तीनो उसके पास आए उसने चाकू वाला हाॅथ तेज़ी से चला दिया उन पर। सबकी चीखें निकल गई।
हालात बदल चुके थे। रितू जानती थी कि उसकी हालत खुद भी अच्छी नहीं है और अगर वह कमज़ोर पड़ गई तो ये चारो किसी कुत्ते की तरह नोच कर खा जाएॅगे। इस लिए उसने अपने दर्द की परवाह न करते हुए एक बार से उन पर टूट पड़ी और तब तक उन्हें लात घूॅसों पर रखा जब तक कि वो चारो अधमरे न हो गए।
रितू बुरी तरह हाॅफ रही थी। उसकी वर्दी पीक की तरफ से खून में नहा चुकी थी। उसे कमज़ोरी का एहसास होने लगा था।उसने दूर खड़े अपने हवलदारों की तरफ देखा जो किसी पुतलों की तरह खड़े थे। रितू को उन्हें देख कर बेहद क्रोध आया। वह तेज़ी से उनके पास पहुॅची और फिर दे दना दन थप्पड़ों की बरसात कर दी न पर। उन चारों के हलक से चीखें निकल गई।
"मैं तुमको यहाॅ पर क्या तमाशा देखने के लिए लेकर आई थी नामर्दो?" रितू किसी शेरनी की भाॅती गरजी थी, बोली___"तुम चारो यहाॅ पर खड़े बस तमाशा देख रहे थे। तुम दोनो को पुलिस में रहने का कोई हक़ नहीं है। आज और अभी से तुम चारो को ढिसमिस किया जाता है। अब दफा हो जाओ यहाॅ से और कभी अपनी शकल मत दिखाना।"
रितू की गुस्से भरी ये फातें सुनकर चारो की हालत खराब हो गई। वो चारो रितू के पैरों पर गिर कर माफ़ी मागने लगे। किन्तु रितू को उन पर इतना ज्यादा गुस्सा आया हुआ था कि उसने अपने पैरों पर गिरे उन चारों को लात की ठोकरों पर रख दिया।
"हट जाओ मेरे सामने से।" रितू ने गुर्राते हुए कहा___"तुम जैसे निकम्मों और नामर्दों की मेरे पुलिस थाने में कोई जगह नहीं है। अब दफा हो जाओ वरना तुम चारो को गोली मार दूॅगी।"
रितू का रौद्र रूप देख कर वो चारो बुरी तरह ठर गए और फिर वहाॅ से नौ दो ग्यारह हो गए। उनके जाते ही रितू ने उन चारो लड़कों को एक एक करके किसी तरह अपनी पुलिस जिप्सी पर पटका और फिर वह वापस उस जगह आई जहाॅ पर अभी कुछ देर पहले ये संग्राम हुआ था। उसने देखा कि पोर्च के फर्स पर कई जगह खून फैला हुआ था। उसने इधर उधर दृष्टि घुमा कर देखा किन्तु उसे ऐसा कुछ भी न दिखा जो उसके काम का हो। वह मुख्य द्वार से अंदर की तरफ चली गई। अंदर सामने ही एक कमरा दिखा उसे। वह उस कमरे की तरफ बढ़ गई। कमरे का दरवाजा हल्का खुला हुआ था। रितू ने अपने पैरों से दरवाजे को अंदर की तरफ धकेला। दरवाजा बेआवाज़ खुलता चला गया।
अंदर दाखिल होकर उसने देखा कि कमरा काफी बड़ा था तथा काफी शानदार तरीके से सजा हुआ था। एक कोने में बड़ा सा बेड था जिसमें तीन लड़कियाॅ मादरजाद नंगी पड़ी हुई थी। ऐसा लगता था जैसे गहरी नीद में हों। रितू ने नफ़रत से उन्हें देखा और फिर कमरे में उसने अपनी नज़रें दौड़ाईं। बगल की दीवार पर एक तस्वीर टॅगी हुई थी। तस्वीर कोई खास नहीं थी बस साधारण ही थी।
रितू के मन में सवाल उभरा कि इतने अलीशान फार्महाउस पर इतनी मामूली तस्वीर कैसे रखी जा सकती है?
रितू ने आगे बढ़ कर तस्वीर को ध्यान से देखा। तस्वीर सच में कोई खास नहीं थी। रितू को जाने क्या सूझा कि उसने हाॅथ बढ़ा कर दीवार से तस्वीर को निकाल लिया। तस्वीर के निकलते ही दीवार पर एक स्विच नज़र आया। रितू ये देख कर चकरा गई। भला दीवार पर लगे स्विच के ऊपर तस्वीर को इस तरह क्यों लगाया गया होगा? क्या स्विच को तस्वीर द्वारा छुपाने के लिए??? रितू को अपना ये विचार कहीं से भी ग़लत नहीं लगा। उसने तस्वीर को एक हाॅथ से पकड़ कर दूसरे हाॅथ को दीवार पर लगे स्विच बटन को ऊपर की तरफ पुश किया। बटन को ऊपर की तरफ पुश करते ही कमरे में अजीब सी घरघराहट की आवाज़ हुई। रितू ये देख कर बुरी तरह चौंकी कि उसके सामने ही दीवार पर एक दरवाजा नज़र आने लगा था।
उसे समझते देर न लगी कि ये दिवाकर चौधरी का गुप्त कमरा है। वह धड़कते दिल के साथ कमरे में दाखिल हो गई। अंदर पहुॅच कर उसने देखा बहुत सारा कबाड़ भरा हुआ था यहाॅ। ये सब देख कर रितू हैरान रह गई। उसे समझ में न आया कि कोई कबाड़ को ऐसे गुप्त रूप से क्यों रखेगा?? रितू ने हर चीज़ को बारीकी से देखा। उसके पास समय नहीं था। क्योंकि उसकी खुद की हालत ख़राब थी। काफी देर तक खोजबीन करने के बाद भी उसे कोई खास चीज़ नज़र न आई। इस लिए वह बाहर आ गई मखर तभी जैसे उसे कुछ याद आया। वह फिर से अंदर गई। इस बार उसने तेज़ी से इधर उधर देखा। जल्द ही उसे एक तरफ की दीवार से सटा हुआ एक टेबल दिखा। टेबल के आस पास तथा ऊपर भी काफी सारा कबाड़ सा पड़ा हुआ था। किन्तु रितू की नज़र कबाड़ के बीच रखे एक छोटे से रिमोट पर पड़ी। उसने तुरंत ही उसे उठा लिया। वो रिमोट टीवी के रिमोट जैसा ही था।
रितू ने हरा बटन दबाया तो उसके दाएॅ तरफ हल्की सी आवाज़ हुई। रितू ने उस तरफ देखा तो उछल पड़ी। ये एक दीवार पर बनी गुप्त आलमारी थी जो आम सूरत में नज़र नहीं आ रही थी। रितू ने आगे बढ़ कर आलमारी की तलाशी लेनी शुरू कर दी। उसमें उसे काफी मसाला मिला। जिन्हें उसने कमरे में ही पड़े एक गंदे से बैग में भर लिया। उसके बाद उसने रिमोट से ही उस आलमारी को बंद कर दिया।
रितू उस बैग को लेकर वापस बाहर आ गई और ड्राइविंग सीट पर बैठ कर जिप्सी को फार्महाउस से मेन सड़क की तरफ दौड़ा दिया। इस वक्त उसके चेहरे पर पत्थर जैसी कठोरता तथा नफ़रत विद्यमान थी। दिलो दिमाग़ में भयंकर चक्रवात सा चल रहा था। उसकी जिप्सी ऑधी तूफान बनी दौड़ी चली जा रही थी।
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,,,,,,
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट..........《 33 》
अब तक,,,,,,,
उसे समझते देर न लगी कि ये दिवाकर चौधरी का गुप्त कमरा है। वह धड़कते दिल के साथ कमरे में दाखिल हो गई। अंदर पहुॅच कर उसने देखा बहुत सारा कबाड़ भरा हुआ था यहाॅ। ये सब देख कर रितू हैरान रह गई।
उसे समझ में न आया कि कोई कबाड़ को ऐसे गुप्त रूप से क्यों रखेगा?? रितू ने हर चीज़ को बारीकी से देखा। उसके पास समय नहीं था। क्योंकि उसकी खुद की हालत ख़राब थी। काफी देर तक खोजबीन करने के बाद भी उसे कोई खास चीज़ नज़र न आई। इस लिए वह बाहर आ गई मखर तभी जैसे उसे कुछ याद आया। वह फिर से अंदर गई। इस बार उसने तेज़ी से इधर उधर देखा। जल्द ही उसे एक तरफ की दीवार से सटा हुआ एक टेबल दिखा। टेबल के आस पास तथा ऊपर भी काफी सारा कबाड़ सा पड़ा हुआ था। किन्तु रितू की नज़र कबाड़ के बीच रखे एक छोटे से रिमोट पर पड़ी। उसने तुरंत ही उसे उठा लिया। वो रिमोट टीवी के रिमोट जैसा ही था।
रितू ने हरा बटन दबाया तो उसके दाएॅ तरफ हल्की सी आवाज़ हुई। रितू ने उस तरफ देखा तो उछल पड़ी। ये एक दीवार पर बनी गुप्त आलमारी थी जो आम सूरत में नज़र नहीं आ रही थी। रितू ने आगे बढ़ कर आलमारी की तलाशी लेनी शुरू कर दी। उसमें उसे काफी मसाला मिला। जिन्हें उसने कमरे में ही पड़े एक गंदे से बैग में भर लिया। उसके बाद उसने रिमोट से ही उस आलमारी को बंद कर दिया।
रितू उस बैग को लेकर वापस बाहर आ गई और ड्राइविंग सीट पर बैठ कर जिप्सी को फार्महाउस से मेन सड़क की तरफ दौड़ा दिया। इस वक्त उसके चेहरे पर पत्थर जैसी कठोरता तथा नफ़रत विद्यमान थी। दिलो दिमाग़ में भयंकर चक्रवात सा चल रहा था। उसकी जिप्सी ऑधी तूफान बनी दौड़ी चली जा रही थी।
_____________________________
अब आगे,,,,,,,,,,
वर्तमान अब आगे_______
रितू की पुलिस जिप्सी जिस जगह रुकी वह एक बहुत ही कम आबादी वाला एरिया था। सड़क के दोनो तरफ यदा कदा ही मकान दिख रहे थे। इस वक्त रितू जिस जगह पर आकर रुकी थी वह कोई फार्महाउस था। जिप्सी की आवाज़ से थोड़ी ही देर में फार्महाउस का बड़ी सी बाउंड्री पर लगा लोहे का भारी गेट खुला। गेट के खुलते ही रितू ने जिप्सी को आगे बढ़ा दिया, उसके पीछे गेट पुनः बंद हो गया। जिप्सी को बड़े से मकान के पास लाकर रितू ने रोंक दिया और फिर उससे नीचे उतर गई।
रितू की हालत बहुत ख़राब हो चुकी थी। बदन में जान नहीं रह गई थी। गेट को बंद करने के बाद दो लोग भागते हुए उसके पास आए।
"अरे क्या हुआ बिटिया तुम्हें?" एक लम्बी मूॅछों वाले ब्यक्ति ने घबराकर कहा___"ये क्या हालत बना ली है तुमने? किसने की तुम्हारी ये हालत? मैं उसे ज़िन्दा नहीं छोंड़ूॅगा बिटिया।"
"काका इन सबको अंदर तहखाने में बंद कर दो।" रितू ने उखड़ी हुई साॅसों से कहा__"और ध्यान रखना किसी को इन लोगों का पता न चल सके। ये तुम्हारी जिम्मेदारी है काका।"
"वो सब तो मैं कर लूॅगा बिटिया।" काका की ऑखों में ऑसू तैरते दिखे___"लेकिन तुम्हारी हालत ठीक नहीं है। तुम्हें जल्द से जल्द हास्पिटल लेकर जाना पड़ेगा। मैं बड़े ठाकुर साहब को फोन लगाता हूॅ बिटिया।"
"नहीं काका प्लीज़।" रितू ने कहा___"जितना कहा है पहले उतना करो।
मैं ठीक हूॅ..बस काकी को फस्ट एड बाक्स के साथ मेरे कमरे में भेज दीजिए जल्दी। लेकिन उससे पहले इन्हें तहखाने में बंद कीजिए।"
"ये सब कौन हैं बेटी?" एक अन्य आदमी ने पूछा___"इन सबकी हालत भी बहुत खराब लग रही है।"
"ये सब के सब एक नंबर के मुजरिम हैं शंभू काका।" रितू ने कहा___"इन लोगों बड़े से बड़ा संगीन गुनाह किया है।"
"फिर तो इनको जान से मार देना चाहिए बिटिया।" काका ने जिप्सी में बेहोश पड़े सूरज और उसके दोस्तों को देख कर कहा।
"इन्हें मौत ही मिलेगी काका।" रितू ने भभकते हुए कहा___"लेकिन थोड़ा थोड़ा करके।"
उसके बाद रितू के कहने पर उन दोनो ने उन सभी लड़को को उठा उठा कर अंदर तहखाने में ले जाकर बंद कर दिया। जबकि रितू अंदर अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। थोड़ी ही देर में काकी फर्स्ट एड बाक्स लेकर आ गई। रितू के कहने पर काकी ने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया।
रितू ने वर्दी की शर्ट किसी तरह अपने बदन से उतारा। काकी हैरत से देखे जा रही थी।उसके चेहरे पर चिन्ता और दुख साफ दिख रहे थे।
"ये सब कैसे हुआ बिटिया?" काकी ने आगे बढ़ कर शर्ट उतारने में रितू की मदद करते हुए कहा___"देखो तो कितना खून बह गया है, पूरी शरट भींग गई है।"
"अरे काकी ये सब तो चलता रहता है।" रितू ने बदन से शर्ट को अलग करते हुए कहा__"इस नौकरी में कई तरह के मुजरिमों से पाला पड़ता रहता है।"
"अरे तो ऐसी नौकरी करती ही क्यों हो बिटिया?" काकी ने कहा___"भला का कमी है तुम्हें? सब कुछ तो है।"
"बात कमी की नहीं है काकी।" रितू ने कहा___"बात है शौक की। ये नौकरी मैं अपने शौक के लिए कर रही हूॅ। ख़ैर ये सब छोड़िये और मैं जैसा कहूॅ वैसा करते जाइये।"
कहने के साथ ही रितू बेड पर उल्टा होकर लेट गई। इस वक्त वह ऊपर से सिर्फ एक पिंक कलर की ब्रा में थी। दूध जैसी गोरी पीठ पर हर तरफ खून ही खून दिख रहा था। ब्रा के हुक के ऊपरी हिस्से पर दाएॅ से बाएं चाकू का चीरा लगा था। जो कि दाहिने कंधे के थोड़ा नीचे से टेंढ़ा बाएॅ तरफ लगभग दस इंच का था। काकी ने जब उस चीरे को देखा तो उसके शरीर में सिहरन सी दौड़ गई।
"हाय दइया ये तो बहुत खराब कटा है।" काकी ने मुह फाड़ते हुए कहा___"ये सब कैसे हो गया बिटिया? पूरी पीठ पर चीरा लगा है।"
"ये सब छोड़ो आप।" रितू ने गर्दन घुमा कर पीछे काकी की तरफ देख कर कहा___"आप उस बाक्स से रुई लीजिए और उसमे डेटाॅल डाल कर मेरी ठीठ पर फैले इस खून को साफ कीजिए।"
"पर बिटिया तुम्हें दर्द होगा।" काकी ने चिन्तित भाव से कहा___"मैं ये कैसे कर पाऊॅगी?"
"मुझे कुछ नहीं होगा काकी।" रितू ने कहा__"बल्कि अगर आप ऐसा नहीं करेंगी तो ज़रूर मुझे कुछ हो जाएगा। क्या आप चाहती हैं कि आपकी बिटिया को कुछ हो जाए?"
"नहीं नहीं बिटिया।" काकी की ऑखों में ऑसू आ गए___"ये क्या कह रही हो तुम? तुम्हें कभी कुछ न हो बिटिया। मेरी सारी उमर भी तुम्हें लग जाए।
रुको मैं करती हूॅ।"
रितू काकी की बातों से मुस्कुरा कर रह गई और अपनी गर्दन वापस सीधा कर तकिये में रख लिया। काकी ने बाक्स से रुई निकाला और उसमे डेटाॅल डाल कर रितू की पीठ पर डरते डरते हाॅथ बढ़ाया। वह बहुत ही धीरे धीरे रितू की पीठ पर फैले खून को साफ कर रही थी। कदाचित वह नहीं चाहती थी कि रितू को ज़रा भी दर्द हो।
"आप डर क्यों रही हैं काकी?" सहसा रितू ने कहा___"अच्छे से हाॅथ गड़ा कर साफ कीजिये न। मुझे बिलकुल भी दर्द नहीं होगा। आप फिक्र मत कीजिए।"
रितू के कहने पर काकी पहले की अपेक्षा अब थोड़ा ठीक से साफ कर रही थी। मगर बड़े एहतियात से ही। कुछ समय बाद ही काकी ने रितू की पीठ को साफ कर दिया। किन्तु चीरा वाला हिस्सा उसने साफ नहीं किया। रितू ने उससे कहा कि वो चीरे वाले हिस्से को भी अच्छी तरह साफ करें। क्योंकि जब तक वो अच्छी तरह साफ नहीं होगा तब तक उस पर दवा नहीं लगाई जा सकती। काकी ने बड़ी सावधानी से उसे भी साफ किया। फिर रितू के बताने पर उसने बाक्स से निकाल कर एक मल्हम चीरे पर लगाया और फिर उसकी पट्टी की। चीरे वाले स्थान से जितना खून बहना था वह बह चुका था किन्तु बहुत ही हल्का हल्का अभी भी रिस रहा था। हलाॅकि अब पट्टी हो चुकी थी इस लिए रितू को आराम मिल रहा था। उसने दर्द की एक टेबलेट खा ली थी।
"अब तुम आराम करो बिटिया।" काकी ने कहा___"तब तक मैं तुम्हारे लिए गरमा गरम खाना बना देती हूॅ।
"नहीं काकी।" रितू ने कहा___"आप खाना बनाने का कस्ट न करें। बस एक कप काफी पिला दीजिए।"
"ठीक है जैसी तुम्हारी मर्ज़ी।" काकी ने कहा और रितू के ऊपर एक चद्दर डाल कर कमरे से बाहर निकल गई। जबकि रितू ने अपनी आॅखें बंद कर ली। कुछ देर ऑखें बंद कर जाने वह क्या सोचती रही फिर उसने अपनी ऑखें खोली और बेड के बगल से ही एक छोटे से स्टूल पर रखे लैण्डलाइन फोन की तरफ अपना हाथ बढ़ाया।
रिसीवर कान से लगा कर उसने कोई नंबर डायल किया। कुछ ही पल में उधर बेल जाने की आवाज़ सुनाई देने लगी।
"हैलो कमिश्नर जगमोहन देसाई हेयर।" उधर से कहा गया।
"जय हिन्द सर मैं इंस्पेक्टर रितू बोल रही हूॅ।" रितू ने उधर की आवाज़ सुनने के बाद कहा।
"ओह यस ऑफिसर।" उधर से कमिश्नर ने कहा___"क्या रिपोर्ट है?"
"सर एक फेवर चाहिए आपसे।" रितू ने कहा।
"फेवर???" कमिश्नर चकराया__"कैसा फेवर हम कुछ समझे नहीं।"
"सर सारी डिटेल मैं आपको आपसे मिल कर ही बताऊॅगी।" रितू ने कहा___"फोन पर बताना उचित नहीं है।"
"ओकेनो प्राब्लेम।" कमिश्नर ने कहा__"अब बताओ कैसे फेवर की बात कर रही थी तुम?"
"सर मैं चाहती हूॅ कि इस केस की सारी जानकारी सिर्फ आप तक ही रहे।" रितू कह रही थी___"आप जानते हैं कि मैंने विधी के रेप केस की अभी तक कोई फाइल नहीं बनाई है। बस आपको इस बारे में इन्फार्म किया था।"
"हाॅ ये हम जानते हैं।
" कमिश्नर ने कहा__"पर तुम करना क्या चाहती हो ये हम जानना चाहते हैं?"
"कल आपसे मिल कर सारी बातें बताऊॅगी सर।" रितू ने कहा___"इस वक्त मैं आपसे बस ये फेवर चाहती हूॅ कि दिवाकर चौधरी के बेटे और उसके दोस्तों के बारे में अगर आपके पास कोई बात आए तो आप यही कहिएगा कि पुलिस का इस बात से कोई संबंध नहीं है।"
"क्या मतलब??" कमिश्नर बुरी तरह चौंका था__"आख़िर तुम क्या कर रही हो ऑफिसर? उस समय भी तुमने हमसे इमेडिएटली सर्च वारंट के लिए कहा था और हमने उसका तुरंत इंतजाम भी किया। लेकिन अब तुम ये सब बोल रही हो आख़िर हुआ क्या है?"
"सर मैं आपको सारी बातें मिल कर ही बताऊॅगी।" रितूने कहा___"प्लीज़ सर ट्राई टू अंडरस्टैण्ड।"
"ओके फाइन।" कमिश्नर ने कहा__"हम कल तुम्हारा वेट करेंगे आफिसर।"
"जय हिन्द सर।" रितू ने कहा और रिसीवर वापस केड्रिल पर रख दिया।
रितू ने फिर से आॅखें बंद कर ली। तभी कमरे में काकी दाखिल हुई। उसके हाथ में एक ट्रे था जिसमें एक बड़ा सा कप रखा था। आहट सुन कर रितू ने ऑखें खोल कर देखा। काकी को देखते ही वह बड़ी सावधानी से उठ कर बेड पर बैठ गई। उसके बैठते ही काकी ने रितू को काफी का कप पकड़ाया।
काफी पीने के बाद रितू को थोड़ा बेहतर फील हुआ और वह बेड से उतर आई। आलमारी से उसने एक ब्लू कलर का जीन्स का पैन्ट और एक रेड कलर की टी-शर्ट निकाल कर उसे पहना तथा ऊपर से एक लेदर की जाॅकेट पहन कर उसने आईने में खुद को देखा। फिर पुलिस की वर्दी वाले पैन्ट से होलेस्टर सहित सर्विस रिवाल्वर निकाल कर उसे जीन्स के बेल्ट पर फॅसाया तथा आलमारी से एक रेड एण्ड ब्लैक मिक्स गाॅगल्स निकाल कर उसे ऑखों पर लगाया और फिर बाहर निकल गई।
बाहर उसे काकी दिखी। उसने काकी से कहा कि वह जा रही है। काकी उसे यूॅ देख कर हैरान रह गई। उसे समझ में न आया कि ये लड़की तो अभी थोड़ी देर पहले गंभीर हालत में थी और अब एकदम से टीम टाम होकर चल भी दी।
मकान के बाहर आकर रितू पुलिस जिप्सी की तरफ बढ़ी। वह ये देख कर खुश हो गई कि काका ने जिप्सी को अच्छे से धोकर साफ सुथरा कर दिया था। रितू को काका की समझदारी पर कायल होना पड़ा। जिप्सी को स्टार्ट कर रितू मेन गेट की तरफ बढ़ चली।
"काका उन लोगों का ध्यान रखना।" रितू ने गेट के पास खड़े काका और शंभू काका दोनो की तरफ देख कर कहा___"आज रात का खाना उन्हें नहीं देना। कल मैं दोपहर को आऊॅगी।"
"ठीक है बिटिया।" काका ने कहा__"तुम बिलकुल भी चिन्ता न करो। वो अब यहाॅ से कहीं नहीं जा पाएॅगे।"
"चलो फिर कल मिलती हूॅ आपसे।" रितू ने कहने के साथ ही जिप्सी को गेट के बाहर की तरफ निकाल दिया और मेन रोड पर आते ही जिप्सी हवा से बातें करने लगी।
_____________________
फ्लैशबैक अब आगे_______
कमरे से प्रतिमा के जाने के बाद विजय सिंह वापस अपने बिस्तर पर लेट गया।
उसके ज़हन में यही ख़याल बार बार उभर रहा था कि वह अपनी भाभी का क्या करे? वह स्पष्टरूप से उससे कह चुकी थी कि वो उससे प्रेम करती है और वह अपने दिल में उसके लिए भी थोड़ी सी जगह दे। भला ऐसा कैसे हो सकता था? विजय सिंह इस बारे में सोचना भी ग़लत व पाप समझता था। उधर प्रतिमा उसकी कोई बात सुनने या मानने को तैयार ही नहीं थी। वह प्रतिमा से बहुत ज्यादा परेशान हो गया था। उसे डर था कि कहीं किसी दिन ये सब बातें उसके माॅ बाबूजी को न पता चल जाएॅ वरना अनर्थ हो जाएगा। आज वो जो मुझे सबसे अच्छा और अपना सबसे लायक बेटा समझते हैं , तो इस सबका पता चलते ही मेरे बारे में उनकी सोच बदल जाएगी। वो यही समझेंगे कि वासना और हवस के लिए मैने ही अपनी माॅ समान भाभी को बरगलाया है या फिर ज़बरदस्ती की है उनसे। कोई मेरी बात का यकीन नहीं करेगा। बड़े भइया को तो और भी मौका मिल जाएगा मेरे खिलाफ ज़हर उगलने का।
विजय सिंह ये सब सोच सोच कर बुरी तरह परेशान व दुखी भी हो रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? वह अब किसी भी सूरत में प्रतिमा के सामने नहीं आना चाहता था। उसने तय कर लिया था कि अब वह देर रात में ही खेतों से हवेली आया करेगा और अपने कमरे में ही खाना मॅगवा कर खाया करेगा।
अगले दिन से विजय की दिनचर्या यही हो गई। वह सुबह जल्दी हवेली से निकल जाता, दोपहर में गौरी उसके लिए खाना ले जाती। गौरी उसके साथ खेतों पर दिन ढले तक रहती फिर वह हवेली आ जाती जबकि विजय सिंह देर रात को ही हवेली लौटत। गौरी कई दिन से गौर कर रही थी कि विजय सिंह कुछ दिनों से कुछ परेशान सा रहने लगा है। उसने उसकी परेशानी का पूछा भी किन्तु विजय सिंह हर बार इस बात को टाल जाता। भला वह क्या बताता उसे कि वह किस वजह से परेशान रहता है आजकल?
विजय सिंह की इस दिनचर्या से प्रतिमा को अब उसके पास जाने की तो बात ही दूर बल्कि उसे देख पाने तक को नहीं मिलता था। इस सबसे प्रतिमा बेहद परेशान व नाखुश हो गई थी। अजय सिंह भी परेशान था इस सबसे। उसकी भी कोई दाल नहीं गल रही थी। गौरी के चलते प्रतिमा को खेतों पर जाने का मौका ही नहीं मिलता था। ऐसा नहीं था कि वह जा नहीं सकती थी लेकिन वह चाहती थी कि वह जब भी खेतों पर जाए तो खेतों पर गौरी न हो बल्कि वह और विजय सिंह बस ही हों वहाॅ। ताकि वह बड़े आराम से विजय पर प्रेम बाॅण चलाए।
एक दिन प्रतिमा को मौका मिल ही गया। दरअसल सुबह सुबह जब गौरी अपने कमरे के बाथरूम में नहा रही तो फर्स पर उसका पैर फिसल गया और वह बड़ा ज़ोर से गिरी थी। जिससे उसकी कमर में असह पीड़ा होने लगी थी। इस सबका परिणाम ये हुआ कि गौरी खेतों पर विजय के लिए खाना लेकर न जा सकी बल्कि प्रतिमा को जाने का सुनहरा मौका मिल गया। प्रतिमा पहले की भाॅति ही पतली साड़ी और बिना ब्रा का ब्लाउज पहना और विजय के लिए टिफिन लेकर खेतों पर चली गई।
प्रतिमा को पता था कि ये मौका उसे बड़े संजोग से मिला है इस लिए वह इस मौके को खोना नहीं चाहती थी। उसने सोच लिया था कि आज वह विजय से अपने प्रेम के लिए कुछ न कुछ तो करेगी ही। उसके पास समय भी नहीं बचा था। बच्चों के स्कूल की छुट्टियाॅ दो दिन बाद खत्म हो रही थी।
नियति को जो मंजूर होता है वही होता है। ये संजोग था कि गौरी का पैर फिसला और उसने बिस्तर पकड़ लिया जिसके कारण प्रतिमा को खेतों में जाने का अवसर मिल गया और एक ये भी संजोग ही था कि आज खेतों पर फिर कोई मजदूर नहीं था। सारी रात जुती हुई ज़मीन पर पानी लगाया और लगवाया था उसने। सुबह नौ बजे सारे मजदूर गए थे। आज के लिए सारा काम हो गया था।
प्रतिमा जब खेतों पर पहुॅची तो हर तरफ सन्नाटा फैला हुआ पाया। आस पास कोई न दिखा उसे। वह मकान के अंदर नहीं गई बल्कि आस पास घूम घूम कर देखा उसने हर तरफ। न कोई मजदूर और ना ही विजय सिंह उसे कहीं नज़र न आए। प्रतिमा को खुशी हुई कि खेतों पर कोई मजदूर नहीं है और अब वह बेफिक्र होकर कुछ भी कर सकती है।
मकान के अंदर जाकर जब वह कमरे में पहुॅची तो विजय को बिस्तर पर सोया हुआ पाया। उसके मुख से हल्के खर्राटों की आवाज़ भी आ रही थी। इस वक्त उसके शरीर पर नीचे एक सफेद धोती थी और ऊपर एक बनियान। वह पक्का किसान था। पढ़ाई छोंड़ने के बाद उसने खेतों पर ही अपना सारा समय गुज़ारा था। ये उसकी कर्मभूमि थी। यहाॅ पर उसने खून पसीना बहाया था। जिसका परिणाम ये था कि उसका शरीर पत्थर की तरह शख्त था। छः फिट लम्बा था वह तथा हट्टा कट्टा शरीर था। किन्तु चेहरे पर हमेशा सादगी विद्यमान रहती थी उसके। उसका ब्यक्तित्व ऐसा था कि गाॅव का हर कोई उसे प्रेम व सम्मान देता था।
प्रतिमा सम्मोहित सी देखे जा रही थी उसे। फिर सहसा जैसे उसे होश आया और एकाएक ही उसके दिमाग़ की बत्ती जल उठी। जाने क्या चलने लगा था उसके मन में जिसे सोच कर वह मस्कुराई। उसने टिफिन को बड़ी सावधानी से वहीं पर रखे एक बेन्च पर रख दिया और सावधानी से विजय की चारपाई के पास पहुॅची।
विजय चारपाई पर चूॅकि गहरी नींद में सोया हुआ था इस लिए उसे ये पता नहीं चला कि उसके कमरे में कौन आया है? प्रतिमा उसके हट्टे कट्टे शरीर को इतने करीब से देख कर आहें भरने लगी। उसने नज़र भर कर विजय को ऊपर से नीचे तक देखा। उसके अंदर काम वासना की अगन सुलग उठी। कुछ देर यूॅ ही ऑखों में वासना के लाल लाल डोरे लिए वह उसे देखती रही फिर सहसा वह वहीं फर्स पर घुटनों के बल बैठती चली गई। उसके हृदय की गति अनायास ही बढ़ गई थी। उसने विजय के चेहरे पर गौर से देखा। विजय किसी कुम्भकर्ण की तरह सो रहा था।
प्रतिमा को जब यकीन हो गया कि विजय किसी हल्की आहट पर इतना जल्दी जगने वाला नहीं है तो उसने उसके चेहरे से नज़र हटा कर विजय की धोती यानी लुंगी के उस हिस्से पर नज़र डाली जहाॅ पर विजय का लिंग उसकी लुंगी के अंदर छिपा था। लिंग का उभार लुंगी पर भी स्पष्ट नज़र आ रहा था।
प्रतिमा ने धड़कते दिल के साथ अपने हाॅथों को बढ़ा कर विजय की लुंगी को उसके छोरों से पकड़ कर आहिस्ता से इधर और उधर किया। जिससे विजय के नीचे वाला हिस्सा नग्न हो गया। लुंगी के अंदर उसने कुछ नहीं पहन रखा था। प्रतिमा ने देखा गहरी नींद में उसका घोंड़े जैसा लंड भी गहरी नींद में सोया पड़ा था। लेकिन उस हालत में भी वह लम्बा चौड़ा नज़र आ रहा था। उसका लंड काला या साॅवला बिलकुल नहीं था बल्कि गोरा था बिलकुल अंग्रेजों के लंड जैसा गोरा। उसे देख कर प्रतिमा के मुॅह में पानी आ गया था। उसने बड़ी सावधानी से उसे अपने दाहिने हाॅथ से पकड़ा। उसको इधर उधर से अच्छी तरह देखा। वो बिलकुल किसी मासूम से छोटे बच्चे जैसा सुंदर और प्यारा लगा उसे। उसने उसे मुट्ठी में पकड़ कर ऊपर नीचे किया तो उसका बड़ा सा सुपाड़ा जो हल्का सिंदूरी रंग का था चमकने लगा और साथ ही उसमें कुछ हलचल सी महसूस हुई उसे। उसने ये महसूस करते ही नज़र ऊपर की तरफ करके गहरी नींद में सोये पड़े विजय की तरफ देखा। वो पहले की तरह ही गहरी नींद में सोया हुआ लगा। प्रतिमा ने चैन की साॅस ली और फिर से अपनी नज़रें उसके लंड पर केंद्रित कर दी। उसके हाॅथ के स्पर्श से तथा लंड को मुट्ठी में लिए ऊपर नीचे करने से लंड का आकार धीरे धीरे बढ़ने लगा था। ये देख कर प्रतिमा को अजीब सा नशा भी चढ़ता जा रहा था उसकी साॅसें तेज़ होने लगी थी। उसने देखा कि कुछ ही पलों में विजय का लंड किसी घोड़े के लंड जैसा बड़ा होकर हिनहिनाने लगा था। प्रतिमा को लगा कहीं ऐसा तो नहीं कि विजय जाग रहा हो और ये देखने की कोशिश कर रहा हो कि उसके साथ आगे क्या क्या होता है? मगर उसे ये भी पता था कि अगर विजय जाग रहा होता तो इतना कुछ होने ही न पाता क्योंकि वह उच्च विचारों तथा मान मर्यादा का पालन करने वाला इंसान था। वो कभी किसी को ग़लत नज़र से नहीं देखता था, ऐसा सोचना भी वो पाप समझता था। उसके बारे में वो जान चुका था कि वह क्या चाहती है उससे इस लिए वो हवेली में अब कम ही रहता था। दिन भर खेत में ही मजदूरों के साथ वक्त गुज़ार देता था और देर रात हवेली में आता तथा खाना पीना खा कर अपने कमरे में गौरी के साथ सो जाता था। वह उससे दूर ही रहता था। इस लिए ये सोचना ही ग़लत था कि इस वक्त वह जाग रहा होगा। प्रतिमा ने देखा कि उसका लंड उसकी मुट्ठी में नहीं आ रहा था तथा गरम लोहे जैसा प्रतीत हो रहा था। अब तक प्रतिमा की हालत उसे देख कर खराब हो चुकी थी।
उसे लग रहा था कि जल्दी से उछल कर इसको अपनी चूत के अंदर पूरा का पूरा घुसेड़ ले। किन्तु जल्दबाजी में सारा खेल बिगड़ जाता इस लिए अपने पर नियंत्रण रखा उसने और उसके सुंदर मगर बिकराल लंड को मुट्ठी में लिए आहिस्ता आहिस्ता सहलाती रही।
प्रतिमा को जाने क्या सूझी कि वह धीरे से उठी और अपने जिस्म से साड़ी निकाल कर एक तरफ फेंक दी। इतना हीं नहीं उसने अपने ब्लाउज के हुक खोल कर उसे भी अपने जिस्म से निकाल दिया। ब्लाउज के हटते ही उसकी खरबूजे जैसी भारी चूचियाॅ उछल पड़ीं। इसके बाद उसने पेटीकोट को भी उतार दिया। अब प्रतिमा बिलकुल मादरजाद नंगी थी। उसका चेहरा हवस तथा वासना से लाल पड़ गया था।
अपने सारे कपड़े उतारने के बाद प्रतिमा फिर से चारपाई के पास घुटनों के बल बैठ गई। उसकी नज़र लुंगी से बाहर उसके ही द्वारा निकाले गए विजय सिंह के हलब्बी लंड पर पड़ी। अपना दाहिना हाॅथ बढ़ा कर उसने उसे आहिस्ता से पकड़ा और फिर आहिस्ता आहिस्ता ही सहलाने लगी। प्रतिमा उसको अपने मुह में भर कर चूसने के लिए पागल हुई जा रही थी, जिसका सबूत ये था कि प्रतिमा अपने एक हाथ से कभी अपनी बड़ी बड़ी चूचियों को मसलने लगती तो कभी अपनी चूॅत को। उसके अंदर वासना अपने चरम पर पहुॅच चुकी थी। उससे बरदास्त न हुआ और उसने एक झटके से नीचे झुक कर विजय के लंड को अपने मुह में भर लिया....और जैसे यहीं पर उससे बड़ी भारी ग़लती हो गई। उसने ये सब अपने आपे से बाहर होकर किया था। विजय का लंड जितना बड़ा था उतना ही मोटा भी था। प्रतिमा ने जैसे ही उसे झटके से अपने मुह में लिया तो उसके ऊपर के दाॅत तेज़ी से लंड में गड़ते चले गए और विजय के मुख से चीख निकल गई साथ ही वह हड़बड़ा कर तेज़ी से चारपाई पर उठ कर बैठ गया। अपने लंड को इस तरह प्रतिमा के मुख में देख वह भौचक्का सा रह गया किन्तु फिर तुरंत ही वह उसके मुह से अपना लंड निकाल कर तथा चारपाई से उतर कर दूर खड़ा हो गया। उसका चेहरा एक दम गुस्से और घ्रणा से भर गया। ये सब इतना जल्दी हुआ कि कुछ देर तक तो प्रतिमा को कुछ समझ ही न आया कि ये सब क्या और कैसे हो गया? होश तो तब आया जब विजय की गुस्से से भरी आवाज़ उसके कानों से टकराई।
"ये क्या बेहूदगी है?" विजय लुंगी को सही करके तथा गुस्से से दहाड़ते हुए कह रहा था__"अपनी हवस में तुम इतनी अंधी हो चुकी हो कि तुम्हें ये भी ख़याल नहीं रहा कि तुम किसके साथ ये नीच काम कर रही हो? अपने ही देवर से मुह काला कर रही हो तुम। अरे देवर तो बेटे के समान होता है ये ख़याल नहीं आया तुम्हें?"
प्रतिमा चूॅकि रॅगे हाॅथों ऐसा करते हुए पकड़ी गई थी उस दिन, इस लिए उसकी ज़ुबान में जैसे ताला सा लग गया था। उस दिन विजय का गुस्से से भरा वह खतरनाक रूप उसने पहली बार देखा था।
वह गुस्से में जाने क्या क्या कहे जा रहा था मगर प्रतिमा सिर झुकाए वहीं चारपाई के नीचे बैठी रही उसी तरह मादरजात नंगी हालत में। उसे ख़याल ही नहीं रह गया था कि वह नंगी ही बैठी है। जबकि,,,
"आज तुमने ये सब करके बहुत बड़ा पाप किया है।" विजय कहे जा रहा था__"और मुझे भी पाप का भागीदार बना दिया। क्या समझता था मैं तुम्हें और तुम क्या निकली? एक ऐसी नीच और कुलटा औरत जो अपनी हवस में अंधी होकर अपने ही देवर से मुह काला करने लगी। तुम्हारी नीयत का तो पहले से ही आभास हो गया था मुझे इसी लिए तुमसे दूर रहा। मगर ये नहीं सोचा था कि तुम अपनी नीचता और हवस में इस हद तक भी गिर जाओगी। तुममें और बाज़ार की रंडियों में कोई फर्क नहीं रह गया अब। चली जाओ यहाॅ से...और दुबारा मुझे अपनी ये गंदी शकल मत दिखाना वर्ना मैं भूल जाऊॅगा कि तुम मेरे बड़े भाई की बीवी हो। आज से मेरा और तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं...अब जा यहाॅ से कुलटा औरत...देखो तो कैसे बेशर्मों की तरह नंगी बैठी है?"
विजय की बातों से ही प्रतिमा को ख़याल आया कि वह तो अभी नंगी ही बैठी हुई है तब से। उसने सीघ्रता से अपनी नग्नता को ढॅकने के लिए अपने कपड़ों की तरफ नज़रें घुमाई। पास में ही उसके कपड़े पड़े थे। उसने जल्दी से अपनी साड़ी ब्लाउज पेटीकोट को समेटा किन्तु फिर उसके मन में जाने क्या आया कि वह वहीं पर रुक गई।
विजय की बातों ने प्रतिमा के अंदर मानो ज़हर सा घोल दिया था। जो हमेशा उसे इज्ज़त और सम्मान देता था आज वही उसे आप की जगह तुम और तुम के बाद तू कहते हुए उसकी इज्ज़त की धज्जियाॅ उड़ाए जा रहा था। उसे बाजार की रंडी तक कह रहा था। प्रतिमा के दिल में आग सी धधकने लगी थी। उसे ये डर नहीं था कि विजय ये सब किसी से बता देगा तो उसका क्या होगा। बल्कि अब तो सब कुछ खुल ही गया था इस लिए उसने भी अब पीछे हटने का ख़याल छोंड़ दिया था।
उसने उसी हालत में खिसक कर विजय के पैर पकड़ लिए और फिर बोली__"तुम्हारे लिए मैं कुछ भी बनने को तैयार हूॅ विजय। मुझे इस तरह अब मत दुत्कारो। मैं तुम्हारी शरण में हूॅ, मुझे अपना लो विजय। मुझे अपनी दासी बना लो, मैं वही करूॅगी जो तुम कहोगे। मगर इस तरह मुझे मत दुत्कारो...देख लो मैंने ये सब तुम्हारा प्रेम पाने के लिए किया है। माना कि मैंने ग़लत तरीके से तुम्हारे प्रेम को पाने की कोशिश की लेकिन मैं क्या करती विजय? मुझे और कुछ सूझ ही नहीं रहा था। पहले भी मैंने तुम्हें ये सब जताने की कोशिश की थी लेकिन तुमने समझा ही नहीं इस लिए मैंने वही किया जो मुझे समझ में आया। अब तो सब कुछ जाहिर ही हो गया है,अब तो मुझे अपना लो विजय...मुझे तुम्हारा प्यार चाहिए।"
"बंद करो अपनी ये बकवास।" विजय ने अपने पैरों को उसके चंगुल से एक झटके में छुड़ा कर तथा दहाड़ते हुए कहा__"तुझ जैसी गिरी हुई औरत के मैं मुह नहीं लगना चाहता।
मुझे हैरत है कि बड़े भइया ने तुझ जैसी नीच और हवस की अंधी औरत से शादी कैसे की? ज़रूर तूने ही मेरे भाई को अपने जाल में फसाया होगा।"
"जो मर्ज़ी कह लो विजय।" प्रतिमा ने सहसा आखों में आॅसू लाते हुए कहा__"मगर मुझे अपने से दूर न करो। दिन रात तुम्हारी सेवा करूॅगी। मैं तुम्हें उस गौरी से भी ज्यादा प्यार करूॅगी विजय।"
"ख़ामोशशशश।" विजय इस तरह दहाड़ा था कि कमरे की दीवारें तक हिल गईं__"अपनी गंदी ज़ुबान से मेरी गौरी का नाम भी मत लेना वर्ना हलक से ज़ुबान खींचकर हाॅथ में दे दूॅगा। तू है क्या बदजात औरत...तेरी औकात आज पता चल गई है मुझे। तेरे जैसी रंडियाॅ कौड़ी के भाव में ऐरों गैरों को अपना जिस्म बेंचती हैं गली चौराहे में। और तू गौरी की बात करती है...अरे वो देवी है देवी...जिसकी मैं इबादत करता हूॅ। तू उसके पैरों की धूल भी नहीं है समझी?? अब जा यहाॅ से वर्ना धक्के मार कर इसी हालत में तुझे यहाॅ से बाहर फेंक दूॅगा।"
प्रतिमा समझ चुकी थी कि उसकी किसी भी बात का विजय पर अब कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं था। उल्टा उसकी बातों ने उसे और उसके अंतर्मन को बुरी तरह शोलों के हवाले कर दिया था। उसने जिस तरीके से उसे दुत्कार कर उसका अपमान किया था उससे प्रतिमा के अंदर भीषण आग लग चुकी थी और उसने मन ही मन एक फैंसला कर लिया था उसके और उसके परिवार के लिए।
"ठीक है विजय सिंह।" फिर उसने अपने कपड़े समेटते हुए ठण्डे स्वर में कहा था__"मैं तो जा रही हूं यहाॅ से मगर जिस तरह से तुमने मुझे दुत्कार कर मेरा अपमान किया है उसका परिणाम तुम्हारे लिए कतई अच्छा नहीं होगा। ईश्वर देखेगा कि एक औरत जब इस तरह अपमानित होकर रुष्ट होती है तो भविष्य में उसका क्या परिणाम निकलता है??"
प्रतिमा की बात का विजय सिंह ने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि गुस्से से उबलती हुई ऑखों से उसे देख गर वहीं मानो हिकारत से थूॅका और फिर बाहर निकल गया। जबकि बुरी तरह ज़लील व अपमानित प्रतिमा ने अपने कपड़े पहने और हवेली जाने के लिए कमरे से बाहर निकल गई। उसके अंदर प्रतिशोध की ज्वाला धधक हुई उठी थी।
हवेली पहुॅच कर प्रतिमा ने अपने पति अजय सिंह से आज विजय सिंह से हुए कारनामे का सारा व्रत्तान्त मिर्च मशाला लगा कर सुनाया। उसकी सारी बातें सुन कर अजय सिंह सन्न रह गया था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि आज इतना बड़ा काण्ड हो गया है।
"मुझे उस हरामज़ादे से अपने अपमान का प्रतिशोध लेना है अजय।" प्रतिमा ने किसी ज़हरीली नागिन की भाॅति फुंकारते हुए कहा___"जब तक मैं उससे अपमान का बदला नहीं लूॅगी तब तक मेरी आत्मा को शान्ति नहीं मिलेगी।"
"ज़रूर डियर।" अजय सिंह ने सहसा कठोरता से कहा___"तुम्हारे इस अपमान का बदला ज़रूर उससे लिया जाएगा। आज के इस हादसे से ये तो साबित हो ही गया कि वो मजदूर हमारे झाॅसे में आने वाला नहीं है।
सोचा था कि सब मिल बाॅट कर खाएॅगे और मज़ा करेंगे लेकिन नहीं उस मजदूर को तो कलियुग का हरिश्चन्द्र बनना है। इस लिए ऐसे इंसान का जीवित रहना हमारे लिए अच्छी बात नहीं है। उसके रहते हम अपनी हसरतों को पूरा नहीं कर पाएॅगे प्रतिमा। वो मजदूर हमारे रास्ते का सबसे बड़ा काॅटा है। इस काॅटे को अब जड़ से उखाड़ कर फेंकना ही पड़ेगा।"
"जो भी करना हो जल्दी करो अजय।" प्रतिमा ने कहा___"मैं उस कमीने की अब शकल भी नहीं देखना चाहती कभी। साला कुत्ता मुझे दुत्कारता है। कहता था कि मैं उसकी गौरी की पैरों की धूल भी नहीं हूॅ। मुझे रंडी बोलता है। मैं दिखाऊॅगी उसे कि मेरे सामने उसकी वो राॅड गौरी कुछ भी नहीं है। उसे सबके नीचे न लेटाया तो मेरा भी नाम प्रतिमा सिंह बघेल नहीं। उसे कोठे की नहीं बल्कि बीच चौराहे की रंडी बनाऊॅगी मैं।"
"शान्त हो जाओ प्रतिमा।" अजय सिंह ने उसे खुद से लगा लिया___"सब कुछ वैसा ही होगा जैसा तुम चाहती हो। लेकिन ज़रा तसल्ली से और सोच समझ कर बनाए गए प्लान के अनुसार। ताकि किसी को किसी बात का कोई शक न हो पाए।"
"ठीक है अजय।" प्रतिमा ने कहा___"लेकिन मैं ज्यादा दिनों तक उसे जीवित नहीं देखना चाहती। तुम जल्दी ही कुछ करो।"
"फिक्र मत करो मेरी जान।" अजय ने कुछ सोचते हुए कहा___"आज से और अभी से प्लान बी शुरू। अब चलो गुस्सा थूॅको और मेरे साथ प्यार की वादियों में खो जाओ।"
ये दोनो तो अपने प्यार और वासना में खो गए थे लेकिन उधर खेतों में विजय सिंह बोर बेल के पास बने एक बड़े से गड्ढे में था। उस गड्ढे में हमेशा बोर का पानी भरा रहता था। विजय सिंह उसी पानी से भरे गड्ढे में था। उसके ऊपर बोर का पानी गिर रहा था। वह एकदम किसी पुतले की भाॅति खड़ा था। उसका ज़हन उसके पास नहीं था। बोर का पानी निरंतर उसके सिर पर गिर रहा था।
विजय सिंह के की ऑखों के सामने बार बार वही मंज़र घूम रहा था। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे अभी भी उसका लंड प्रतिमा के मुह मे हो। इस मंज़र को देखते ही उसके जिस्म को झटका सा लगता और वह ख़यालों की दुनियाॅ से बाहर आ जाता। उसका मन आज बहुत ज्यादा दुखी हो गया था। उसे यकीन नहीं आ रहा था कि उसकी सगी भाभी उसके साथ ऐसा घटिया काम कर सकती है। विजय सिंह के मन में सवाल उभरता कि क्या यहीं प्रेम था उसका?
विजय सिंह ये तो समझ गया था कि उसकी भाभी ज़रा खुले विचारों वाली औरत थी। शहर वाली थी इस लिए शहरों जैसा ही रहन सहन था उसका। कुछ दिन से उसकी हरकतें ऐसी थी जिससे साफ पता चलता था कि वह विजय से वास्तव में कैसा प्रेम करती है। किन्तु विजय सिंह को उससे इस हद तक गिर जाने की उम्मीद नहीं थी। विजय सिंह को सोच सोच कर ही उस पर घिन आ रही थी कि कितना घटिया काम कर रही थी वह।
उस दिन विजय सिंह सारा दिन उदास व दुखी रहा। उसका दिल कर रहा था कि वह कहीं बहुत दूर चला जाए।
किसी को अपना मुह न दिखाए किन्तु हर बार गौरी और बच्चों का ख़याल आ जाता और फिर जैसे उसके पैरों पर ज़ंजीरें पड़ जातीं।किसी ने सच ही कहा है कि बीवी बच्चे किसी भी इंसान की सबसे बड़ी कमज़ोरी होते हैं। जब आप उनके बारे में दिल से सोचते हैं तो बस यही लगता है कि चाहे कुछ भी हो जाए पर इन पर किसी तरह की कोई पराशानी न हो।
विजय सिंह हमेशा की तरह ही देर से हवेली पहुॅचा। अन्य दिनों की अपेक्षा आज उसका मन किसी भी चीज़ में नहीं लग रहा था। उसने खुद को सामान्य रखने बड़ी कीशिश कर रहा था वो। अपने कमरे में जाकरवह फ्रेश हुआ और बेड पर आकर बैठ गया।
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,,
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.........《 34 》
अब तक,,,,,,,,,,
विजय सिंह के की ऑखों के सामने बार बार वही मंज़र घूम रहा था। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे अभी भी उसका लंड प्रतिमा के मुह मे हो। इस मंज़र को देखते ही उसके जिस्म को झटका सा लगता और वह ख़यालों की दुनियाॅ से बाहर आ जाता। उसका मन आज बहुत ज्यादा दुखी हो गया था। उसे यकीन नहीं आ रहा था कि उसकी सगी भाभी उसके साथ ऐसा घटिया काम कर सकती है। विजय सिंह के मन में सवाल उभरता कि क्या यहीं प्रेम था उसका?
विजय सिंह ये तो समझ गया था कि उसकी भाभी ज़रा खुले विचारों वाली औरत थी। शहर वाली थी इस लिए शहरों जैसा ही रहन सहन था उसका। कुछ दिन से उसकी हरकतें ऐसी थी जिससे साफ पता चलता था कि वह विजय से वास्तव में कैसा प्रेम करती है। किन्तु विजय सिंह को उससे इस हद तक गिर जाने की उम्मीद नहीं थी। विजय सिंह को सोच सोच कर ही उस पर घिन आ रही थी कि कितना घटिया काम कर रही थी वह।
उस दिन विजय सिंह सारा दिन उदास व दुखी रहा। उसका दिल कर रहा था कि वह कहीं बहुत दूर चला जाए। किसी को अपना मुह न दिखाए किन्तु हर बार गौरी और बच्चों का ख़याल आ जाता और फिर जैसे उसके पैरों पर ज़ंजीरें पड़ जातीं।किसी ने सच ही कहा है कि बीवी बच्चे किसी भी इंसान की सबसे बड़ी कमज़ोरी होते हैं। जब आप उनके बारे में दिल से सोचते हैं तो बस यही लगता है कि चाहे कुछ भी हो जाए पर इन पर किसी तरह की कोई पराशानी न हो।
विजय सिंह हमेशा की तरह ही देर से हवेली पहुॅचा। अन्य दिनों की अपेक्षा आज उसका मन किसी भी चीज़ में नहीं लग रहा था। उसने खुद को सामान्य रखने बड़ी कीशिश कर रहा था वो। अपने कमरे में जाकरवह फ्रेश हुआ और बेड पर आकर बैठ गया।
___________________
अब आगे,,,,,,,,,,,
वर्तमान अब आगे________
इंस्पेक्टर रितू उस हास्पिटल में पहुॅची जहाॅ पर रेप पीड़िता विधी को एडमिट किया गया था। विधी की हालत पहले से काफी ठीक थी। रितू के पहुॅचने के पहले ही विधी के परिवार वाले उससे मिल कर गए थे। इस वक्त विधी के पास उसकी माॅ गायत्री थी। गायत्री अपनी बेटी की इस हालत से बेहद दुखी थी।
रितू जब उस कमरे में पहुॅची तो उसने विधी के पास ही एक कुर्सी पर गायत्री को बैठै पाया। रितू ने औपचारिक तौर पर उससे नमस्ते किया और उसे अपने बारे में बताया। रितू के बारे में जानकर गायत्री पहले तो चौंकी फिर सहसा उसके चेहरे पर अजीब से भाव आ गए।
"मेरी बेटी के साथ जो कुछ हुआ है वो तो वापस नहीं लौट सकता बेटी।" गायत्री ने अधीरता से कहा___"ऊपर से इस सबका केस बन जाने से हमारी समाज में बदनामी ही होगी। इस लिए मैं चाहती हूॅ कि तुम ये केस वेस का चक्कर बंद कर दो। मैं जानती हूॅ कि इस केस में आगे क्या क्या होगा? वो सब बड़े लोग हैं बेटी। वो बड़े से बड़ा वकील अपनी तरफ से खड़ा करेंगे और बड़ी आसानी से केस जीत जाएॅगे। वो कुछ भी कर सकते हैं, वो तो जज को भी खरीद सकते हैं। अदालत के कटघरे में खड़ी मेरी फूल जैसी बेटी से उनका वकील ऐसे ऐसे सवाल करेगा जिसका जवाब देना इसके बस का नहीं होगा। वो सबके सामने मेरी बेटी की इज्ज़त की धज्जियाॅ उड़ाएंगे। ये केस मेरी बेटी के साथ ही एक मज़ाक सा बन कर रह जाएगा। इस लिए मैं तुमसे विनती करती हूॅ बेटी कि ये केस वेस वाला चक्कर छोड़ दो। हमें कोई केस वेस नहीं करना।"
"आप जिस चीज़ की कल्पना कर रही हैं आॅटी जी।" रितू ने विनम्रता से कहा__"मैं उस सबके बारे में पहले ही सोच चुकी हूॅ। मैं जानती हूॅ कि आप जो कह रही हैं वो सोलह आने सच है। यकीनन ऐसा ही होगा मगर, आप चिन्ता मत कीजिए आॅटी। विधी अगर आपकी बेटी है तो ये मेरी भी दोस्त है अब। इसके साथ जो कुछ भी उन लोगों ने घिनौना कर्म किया है उसकी उन्हें ऐसी सज़ा मिलेगी कि हर जन्म में उन्हें ये सज़ा याद रहेगी और वो अपने किसी भी जन्म में किसी की बहन बेटियों के साथ ऐसा करने का सोचेंगे भी नहीं।"
"बात तो वही हुई बेटी।" गायत्री ने कहा__"तुम उन्हें कानूनन इसकी सज़ा दिलवाओगी जबकि मैं जानती हूॅ कि उन लोगों के बाप लोगों के हाॅथ तुम्हारे कानून से भी ज्यादा लम्बे हैं। तुम उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाओगी बेटी। उल्टा होगा ये कि इस सबके चक्कर में खुद तुम्हारी ही जान का खतरा पैदा हो जाएगा।"
"मुझे अपनी जान की कोई परवाह नहीं है आॅटी।" रितू ने सहसा मुस्कुराकर कहा__"और मेरी जान इतनी सस्ती भी नहीं है जो यूॅ ही किसी ऐरे गैरे के हाॅथों शिकार हो जाएगी। खैर, मै ये कहना चाहती हूॅ कि उन लोगों को कानूनन सज़ा दिलवाने का फैसला मैने बदल दिया है।"
"क्या मतलब??" गायत्री के साथ साथ बेड पर लेटी विधी भी चौंक पड़ी थी।
"ये तो मुझे भी पता है ऑटी कि वो लोग कितने बड़े खेत की पैदाइस हैं।" रितू ने अजीब भाव से कहा___"कहने का मतलब ये कि कानूनी तौर पर यकीनन मैं उन्हें वैसी सज़ा नहीं दिला सकती जैसी सज़ा के वो लोग हक़दार हैं। इस लिए अब सज़ा अलग तरीके से दी जाएगी उन्हें। बिलकुल वैसी ही सज़ा जैसी सज़ा ऐसे नीच लोगों को देनी चाहिये।
"
"तुम क्या कह रही हो बेटी मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा।" गायत्री का दिमाग़ मानो जाम सा हो गया था।
"ये सब छोंड़िये ऑटी।" रितू ने कहा__"मैं बस आपसे ये कहना चाहती हूॅ कि अगर आपसे कोई इस बारे में कुछ भी पूछे तो आप यही कहियेगा कि हमने कोई केस वगैरा नहीं किया है। ये मत कहियेगा कि मैं आपसे या विधी से मिली थी। यही बात आप विधी के डैड को भी बता दीजिएगा। मेरी तरफ से उनसे कहना कि दिल पर कोई बोझ या मलाल रखने की कोई ज़रूरत नहीं है। बहुत जल्द कुछ ऐसा उन्हें सुनने को मिलेगा जिससे उनकी आत्मा को असीम तृप्ति का एहसास होगा।"
"तुम क्या करने वाली हो बेटी?" गायत्री का दिल अनायास ही ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था, बोली___"देखो कुछ भी ऐसा वैसा न करना जिससे पुनः मेरी बेटी पर कोई संकट आ जाए।"
"आप बेफिक्र रहिए ऑटी।" रितू ने गायत्री का हाथ पकड़ कर उसे हल्का सा दबाते हुए कहा___"मैं विधी पर अब किसी भी तरह का कोई संकट नहीं आने दूॅगी। मुझे भी उसकी फिक्र है।"
गायत्री कुछ बोल न सकी बस अजीब भाव से रितू को देखती रही। बेड पर लेटी विधी का भी वही हाल था। तभी कमरे में एक नर्स आई। उसने रितू से कहा कि डाक्टर साहब उसे अपने केबिन में बुला रहे हैं। रितू नर्स की बात सुनकर गायत्री से ये कह कर बाहर निकल गई कि वह डाक्टर से मिल कर आती है अभी। कुछ ही देर में रितू डाक्टर के केबिन में उसके सामने टेबल के इस पार रखी कुर्सी पर बैठी थी।
"कहिए डाक्टर साहब।" रितू ने कहा__"किस लिए आपने बुलाया है मुझे?"
"देखो बेटा।" डाक्टर ने गंभीरता से कहा__"तुम मेरी बेटी के समान हो। मैं तुमको तुम्हारे बचपन से जानता हूॅ। ठाकुर साहब से मेरे बहुत अच्छे संबंध हैं आज भी। मुझे ये जान कर बेहद खुशी हुई है कि तुम आज पुलिस आफिसर बन गई हो। लेकिन, इस केस में जिन लोखों पर तुमने हाॅथ डालने का सोचा है या सोच कर अपना कदम बढ़ा लिया है वो निहायत ही बहुत खतरनाक लोग हैं। इस लिए मैं चाहता हूॅ कि तुम इस केस को यहीं पर छोंड़ दो। क्योंकि मैं नहीं चाहता कि तुम पर कोई ऑच आए। तुम हमारे ठाकुर साहब की बेटी हो।"
"मैं आपके जज़्बातों की कद्र करती हूॅ डाक्टर अंकल।" रितू ने कहा___"लेकिन आप बेफिक्र रहिए मैने विधी के केस की कोई फाइल बनाई ही नहीं है अब तक। क्योंकि मुझे भी पता है कि जिनके खिलाफ केस बनाना है वो कैसे लोग हैं। इस लिए आप बेफिक्र रहिए।"
"ये तो अच्छी बात है बेटी।" डाक्टर ने खुश होकर कहा__"लेकिन तुम यहाॅ पर फिर आई किस लिए हो? अगर केस नहीं बनाया है तो तुम्हारे यहाॅ पर आने का क्या मतलब है? जबकि होना तो ये चाहिये कि तुम्हें इस सबसे दूर ही रहना चाहिए था।"
"इंसानियत नाम की कोई चीज़ भी होती है डाक्टर अंकल।" रितू ने कहा___"इसी लिए आई हूॅ यहाॅ। वरना यूॅ फारमल ड्रेस में न आती बल्कि पुलिस की वर्दी में आती।"
"चलो ठीक है।
" डाक्टर ने कहा__"पर ड्रेस बदल देने से तुम्हारा काम तो नहीं बदल जाएगा न। आख़िर हर रूप में तो तुम पुलिस वाली ही कहलाओगी। अब अगर आरोपी के के आकाओं को पता चल जाए कि तुम यहाॅ हो तो वो तो यही समझेंगे कि तुम केस के सिलसिले में ही यहाॅ आई हो।"
"देखिए अंकल।" रितू ने कहा___"फारमेलिटी तो करनी ही पड़ती है। वरना पुलिस की नौकरी के साथ इंसाफ नहीं हो पाएगा। और इसी फाॅरमेलिटी के तहत अभी मुझे दिवाकर चौधरी से भी मिलने जाना है। मुझे पता है कि वो पुलिस को बहुत तुच्छ ही समझेगा। इस लिए उससे मिल कर मैं भी फौरी तौर पर यही कहूॅगी कि फाॅरमेलिटी तो करनी ही पड़ती है न सर। बाॅकी आप इस बात से बेफिक्र रहें कि आपके बेटे और उसके दोस्तों का कोई केस बनेगा। और केस भी तो तभी बनेगा न जब पीड़िता या उसके घरवाले चाहेंगे। अगर वो लोग ही केस नहीं करना चाहेंगे तो भला कैसे कोई केस बन जाएगा? मेरी इन सब बातों से वो खुश हो जाएगा अंकल। वो यही समझेगा कि उसके रुतबे और डर से पीड़िता या उसके घर वालों ने उसके खिलाफ़ केस करने की हिम्मत ही नहीं कर सके।"
"ओह आई सी।" डाक्टर ने कहा___"मगर मुझे ऐसा क्यों लगता है कि असल चक्कर कुछ और ही है जिसे तुम चलाने वाली हो या फिर चलाना शुरू भी कर दिया है।"
"ये सब छोड़िये आप ये बताइये कि आपने और किस लिए बुलाया था मुझे?" रितू ने पहलू बदल दिया।
"पुलिस की नौकरी में आते ही काफी शार्प दिमाग़ हो जाता है न?" डाक्टर मुस्कुराया फिर सहसा गंभीर होकर बोला___"बात ज़रा सीरियस है बेटी।"
"क्या मतलब?" रितू चौंकी।
"विधी की रिपोर्ट आ चुकी है।" डाक्टर ने कहा___"और रिपोर्ट ऐसी है जिसके बारे में जानकर शायद तुम्हें यकीन न आए।"
"ऐसी क्या बात है रिपोर्ट में?" रितू की पेशानी पर बल पड़े___"ज़रा बताइये तो सही।"
"विधी को ब्लड कैंसर है बेटी।" डाक्टर ने जैसे धमाका किया___"वो भी लास्ट स्टेज में है।"
"क्याऽऽऽ????" रितू बुरी तरह उछल पड़ी___"ये आप क्या कह रहे हैं अंकल?"
"यही सच है बेटी।" डाक्टर ने कहा___"वो बस कुछ ही दिनों की मेहमान है। मुझे समझ नहीं आ रहा कि ये बात मैं उसके पैरेन्ट्स को कैसे बताऊॅ? एक तो वैसे भी वो अपनी बेटी की इस हालत से बेहद दुखी हैं दूसरे अगर उन्हें ये पता चल गया कि उनकी बेटी को कैंसर है और वो बस कुछ ही दिनों की मेहमान है तो जाने उन पर इसका क्या असर हो?"
रितू के दिलो दिमाग़ में अभी भी धमाके हो रहे थे। अनायास ही उसकी ऑखें नम हो गई थी। हलाॅकि विधी से उसका कोई रिश्ता नहीं था। उसने तो बस उसे दोस्त कह दिया था ताकि वह आसानी से कुछ बता सके। बाद में उसे ये भी पता चल गया कि ये वही विधी है जिससे विराज प्यार करता था। लेकिन फिर वो दोनो अलग हो गए थे। रितू के मन में एकाएक ही हज़ारों सवाल उभर कर ताण्डव करने लगे थे।
"इसके साथ ही विधी जो दो महीने की प्रेग्नेन्ट है तो उसके पेट में पनप रहे शिशु का भी पतन हो जाएगा।" डाक्टर ने कहा___"यानी एक साथ दो लोगों की जान चली जाएगी।"
"ये तो सचमुच बहुत बड़ी बात है डाक्टर अंकल।" रितू गंभीरता से बोली___"पर सोचने वाली बात है कि इतनी कम उमर में उसे ब्लड कैंसर हो गया।"
"आज कल ऐसा ऐसा सुनने को मिलता बेटा जिसकी आम इंसान तो क्या हम डाक्टर लोग भी कल्पना नहीं कर सकते।" डाक्टर ने कहा___"ख़ैर, मैंने यही बताने के लिए तुम्हें बुलाया था। अभी मुझे मिस्टर चौहान को भी इस बात की सूचना देनी होगी। वो बेचारे तो सुन कर ही गहरे सदमे में आ जाएॅगे।"
"आप सही कह रहे हैं।" रितू ने कहा___"वैसे क्या ये कैंसर वाली बात विधी को पता है??"
"पता नहीं।" डाक्टर ने कहा___"हो भी सकता है और नहीं भी।"
"अच्छा मैं चलती हूॅ अंकल।" रितू ने कुर्सी से उठते हुए कहा___"मुझे विधी से अकेले में कुछ बातें करनी है।"
"ओके बेटा।" डाक्टर ने कहा।
रितू भारी मन से डाक्टर के केबिन से बाहर निकल गई। उसे ये बात हजम ही नहीं हो रही थी कि विधी को लास्ट स्टेज का कैंसर है। उसे विधी के लिए इस सबसे बड़ा दुख सा हो रहा था। उसके मन में कई तरह की बातें चल रही थी। जिनके बारे में उसे विधी ही बता सकती थी। इस लिए वह तेज़ी से उस कमरे की तरफ बढ़ गई।
विधी के कमरे में पहुॅच कर रितू ने गायत्री से बड़े ही विनम्र भाव से कहा कि उसे विधी से अकेले में कुछ बातें करनी है। इस लिए अगर आपको ऐतराज़ न हो तो आप बाहर थोड़ी देर के लिए चले जाइये। गायत्री उसकी ये बात सुन कर कुछ पल तो उसे देखती रही फिर कुर्सी से उठ कर कमरे से बाहर चली गई। रितू ने दरवाजे की कुंडी लगा दी और फिर आ कर वह गायत्री वाली कुर्सी पर ही विधी के बेड के पास ही बैठ गई। विधी उसे बड़े ग़ौर से देख रही थी। रितू भी उसके चेहरे की तरफ देखने लगी।
"तो डाक्टर ने आपको बता दिया कि मुझे लास्ट स्टेज का कैंसर है?" विधी ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा था।
"तुम्हें कैसे पता कि डाक्टर ने मुझे किस लिए बुलाया था?" रितू मन ही मन बुरी तरह चौंकी थी उसकी बात से।
"बड़ी सीधी सी बात है।" विधी ने कहा__"जब कोई ब्यक्ति मरीज़ बन कर हास्पिटल में आता है तो उसकी हर तरह की जाॅच होती है। उसके बाद ये जान जाना कौन सी बड़ी बात है कि मुझे असल में क्या है? ये तो मैं जानती थी कि यहाॅ पर मेरी जाॅच हुई होगी और जब उसकी रिपोर्ट आएगी तो डाक्टर को पता चल ही जाएगा कि मुझे लास्ट स्टेज का कैंसर है। इस लिए जब नर्स आपको बुलाने आई तो मुझे अंदाज़ा हो गया कि डाक्टर यकीनन आपको उस रिपोर्ट के बारे में ही बताएगा। इस कमरे में आते वक्त आपके चेहरे पर जो भाव थे वो दर्शा रहे थे कि आप अंदर से कितनी गंभीर हैं मेरे बारे में जान कर। इस लिए आपसे कहा ऐसा।"
"यकीनन काबिले तारीफ़ दिमाग़ है।
" रितू ने कहा___"थोड़े से सबूतों पर कैसे कड़ियों को जोड़ना है ये तुमने दिखा दिया। पुलिस विभाग में होती तो जटिल से जटिल केस बड़ी आसानी से सुलझा लेती तुम।"
"आपने तो बेवजह ही तारीफ़ कर दी।" विधी ने कहा___"जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है।"
"तो इस लिए ही तुमने मेरे भाई विराज से बेवफाई की थी?" रितू के मन में सबसे ज्यादा यही सवाल उछल रहा था___"तुमको पहले से पता था कि तुम्हें कैंसर है इस लिए तुमने ये रास्ता अपनाया। है न?"
"वि विरा...ज??" विधी का चेहरा फक्क पड़ गया। लाख कोशिशों के बाद भी उसकी ज़ुबान लड़खड़ा गई____"क कौन वि..रा..ज? आप किसकी बात कर रही हैं?"
"अब भला झूॅठ बोलने की क्या ज़रूरत है विधी।" रितू ने कहा___"मुझे बहुत अच्छी तरह पता है कि तुम मेरे भाई विराज से आज भी बेपनाह मोहब्बत करती हो। बेवफाई तो तुमने जान बूझ कर की उससे। ताकि वो तुम्हारी उस ज़िंदगी से चला जाए जो बस कुछ ही समय की मेहमान थी। उसे अपने से दूर करने का यही तरीका अपनाया तुमने। जब मेरे डैड ने उसे और उसके परिवार को हवेली से निकाल दिया तब तुम्हें भी मौका मिल गया और तुमने उसी मौके में उससे ऐसी बातें कही कि उसे तुमसे नफरत हो जाए।"
"तो और क्या करती मैं?" विधी के अंदर का बाॅध मानो ज्वारभाॅटा बन कर फूट पड़ा। वह फूट फूट कर रो पड़ी। रोते हुए ही उसने कहा___"मैं उसकी ज़िंदगी में चंद महीनों की मेहमान थी। वो मुझे इतना चाहता था कि वह मेरे बिना जीवन की कल्पना भी नहीं करता था। प्यार तो मैं भी उससे उतना ही करती थी और आज भी करती हूॅ मगर, उस प्यार से क्या हो सकता था भला? हम हमेशा साथ तो नहीं रह सकते थे न। मेरी मौत पर वह टूट जाता। मैने सोचा कि उसके अंदर से अपने प्रति चाहत निकाल दूॅ किसी तरह ताकि वो किसी और के साथ अपने जीवन में आगे बढ़ने का सोच सके। मुझे जो सही लगा वो मैने किया। मैने अपने आपको पत्थर बना लिया और उससे उस तरह की दो टूक बातें की। उसके अंदर अपने प्रति नफरत पैदा करने के लिए मैने सूरज नाम के लड़के से दोस्ती भी कर ली। मैं जानती थी कि सूरज कैसा लड़का है मगर अब मेरे पास जीवन ही कहाॅ बचा था और ना ही मुझमें जीने की चाह रह गई थी। मुझे ये भी पता है कि मेरे पेट में सूरज का ही पाप है लेकिन मुझे इसकी कोई परवाह नहीं है क्योंकि इस पाप का भी मेरे साथ ही अंत हो जाएगा। सूरज ने मेरे शरीर को भोगा मगर मेरे दिल में मेरे मन में तो हर जन्म में सिर्फ विराज ही रहेगा।"
"ये सब तो ठीक है।" रितू ने कहा___"लेकिन क्या तुमने ये नहीं सोचा कि तुम्हारे ऐसा करने से विराज किस हद तक टूट कर बिखर जाएगा? तुमने तो ये सोच कर उससे बेवफाई की कि वह किसी और के साथ जीवन में आगे बढ़ जाएगा, लेकिन ये क्यों नहीं सोचा कि अगर उसने ऐसा नहीं किया तो???"
"मैने बहुत कुछ सोचा था रितू दीदी।" विधी ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"ये दिल बड़ा ही अजीब होता है।
कोई हज़ारों बार चाहे इसके साथ खिलौने की तरह खेल कर इसे टुकड़ों में बिखेर दे फिर भी ये मोहब्बत करना बंद नहीं करता। इसके अंदर हर रूप में मोहब्बत विद्यमान रहती है फिर चाहे वो नफरत के रूप में ही क्यों न हो। नफरत से पत्थर बन जाओ फिर भी मोहब्बत से पिघल जाओगे। विराज वो कोहिनूर है जिसे हर लड़की मोहब्बत करना चाहेगी और करती भी थी। मोहब्बत एक एहसास है दीदी, पत्थर भी इस एहसास से पिघल जाते हैं। आपको फिर से कब किसी से मोहब्बत हो जाए ये आपको भी पता नहीं चलेगा। मोहब्बत करने वाला पत्थर दिल में भी मोहब्बत का एहसास जगा देता है। बस यही सोच कर मैने ये सब किया था। मुझे पता था उसके जीवन में कोई न कोई ऐसी लड़की ज़रूर आ जाएगी जो अपनी मोहब्बत से उसकी नफरत को मिटा देगी और फिर से उसके टूटे हुए दिल को जोड़ कर उसे मोहब्बत करना सिखा देगी।"
"क्या पता ऐसा हुआ भी है कि नहीं?" रितू ने कहा___"क्या तुमने कभी पता करने की कोशिश की कि विराज किस हाल में है?"
"कोशिश करने का सवाल ही कहाॅ रह गया दीदी?" विधी ने कहा___"मैंने तो ये सब किया ही उससे दूर होने के लिए था। दुबारा उसके पास जाने का या ये पता करने का कि वो किस हाल में है ये सवाल ही नहीं था। क्योंकि मैने बड़ी मुश्किल से वो सब किया था, मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं अपने महबूब के उदास चेहरे को दुबारा देख पाती।"
"ख़ैर, ये बताओ कि जब तुमको पता चल गया था कि तुमको कैंसर है तो तुमने अपने माता पिता को क्यों नहीं बताया?" रितू ने पहलू बदलते हुए पूछा___"अगर बता देती तो संभव था कि तुम्हारा इलाज होता और तुम ठीक हो जाती?"
"ऐसा कुछ न होता दीदी।" विधी ने कहा__"क्योंकि मेरे पिता उस हालत में ही नहीं थे कि वो मेरा कैंसर का इलाज करवा पाते। आप तो बस यही जानती हैं कि वो बड़े आदमी हैं मगर ये नहीं जानती हैं कि उस बड़े आदमी के साथ उसके बड़े भाईयों ने कितना बड़ा अत्याचार किया है? दादा जी के मरते वक्त बड़े ताऊ ने धोखे से सारी प्रापर्टी पर उनके हस्ताक्षर करवा लिया। उसके बाद दादा जी की तेरवीं होने के बाद ही अगले दिन ताऊ और उनके दोगले भाई ने मेरे माता पिता को सारी प्रापर्टी से बेदखल कर दिया। अब आप ही बताइये कि कैसे मेरे पापा मेरा इलाज करवा सकते थे?"
रितू को समझ ही न आया कि वह क्या बोले? विधी की कहानी ही ऐसी थी कि वह बेचारी हर तरह से मजबूर थी। उसके ठीक होने का कहीं कोई चाॅस ही नहीं था।
"अगर मैं अपने कैंसर की बात पापा से बताती तो वो बेचारे बेवजह ही परेशान हो जाते।" विधी कह रही थी___"जिसकी कंपनी में लोग काम करते थे और जो खुद कभी किसी का मालिक हुआ करता था वो आज खुद किसी दूसरे की कंपनी में बीस हजार की नौकरी करता है।
बीस हज़ार में अपने तीन बच्चों और खुद दोनो प्राणियों का खर्चा चला लेना सोचिये कितना मुश्किल होगा? ऐसे में वो कैसे मेरा इलाज करवा पाते? इससे अच्छा तो यही था दीदी कि मैं मर ही जाऊॅ। दो चार दिन मेरे लिए रो लेंगे उसके बाद फिर से उनका जीवन आगे चल पड़ेगा।"
"इतनी छोटी सी उमर में इतनी बड़ी सोच और इतना बड़ा त्याग किया तुमने।" रितू की ऑखों में ऑसू आ गए___"ये सब कैसे कर लिया तुमने?"
रितू ने झपट कर उसे अपने सीने से छुपका लिया। विधी को उसके गले लगते ही असीम सुख मिला। भावना में बह गई वह। वर्षों से अपने अंदर कैद वेदना को वह रोंक न पाई बाहर निकलने से। वह हिचकियाॅ ले लेकर रोने लगी थी।
"मेरी आपसे एक विनती है दीदी।" फिर विधी ने अलग होकर तथा ऑसू भरी ऑखों से कहा।
"विनती क्यों करती है पागल?" रितू का गला भर आया___"तू बस बोल। क्या कहना है तुझे?"
"मु मुझे एक बार।" विधी की रुलाई फूट गई, लड़खड़ाती आवाज़ में कहा___"मुझे बस ए एक बार वि..विरा...ज से मिलवा दीजिए। मुझे मेरे महबूब से मिलवा दीजिए दीदी। मैं उसकी गुनहगार हूॅ। मुझे उससे अपने किये की माफ़ी माॅगनी है। मैं उसे बताना चाहती हूॅ कि मैं बेवफा नहीं हूॅ। मैं तो आज भी उससे टूट टूट कर प्यार करती हूॅ। उसे बुलवा दीजिए दीदी। मेरी ख़्वाहिश है कि मेरा अगर दम निकले तो उसकी ही बाहों में निकले। मेरे महबूब की बाॅहों में दीदी। आप बुलवाएॅगी न दीदी? मुझे एक बार देखना है उसे। अपनी ऑखों में उसकी तस्वीर बसा कर मरना चाहती हूॅ मैं। अपने महबूब की सुंदर व मासूम सी तस्वीर।"
"बस कर रे।" रितू का हृदय हाहाकार कर उठा___"मुझमें इतनी हिम्मत नहीं है कि मैं तेरी ऐसी करुण बातें सुन सकूॅ। मैं तुझसे वादा करती हूॅ कि तेरे महबूब को मैं तेरे पास ज़रूर लाऊॅगी। मैं धरती आसमान एक कर दूॅगी विधि और उसे ढूॅढ़ कर तेरे सामने हाज़िर कर दूॅगी। मैं अभी से उसका पता लगाती हूॅ। तू बस मेरे आने का इंतज़ार करना।"
रितू ने कर्सी से उठ कर बेड पर लेटी विधी के माॅथे को झुक कर चूॅमा और अपने ऑसू पोंछते हुए बाहर निकल गई।
__________________
फ्लैशबैक अब आगे_______
विजय सिंह खाना पीना खा कर अपने कमरे में लेटा हुआ था। उसके दिलो दिमाग़ से आज की घटना हट ही नहीं रही थी। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसकी माॅ समान भाभी उसके साथ इतनी गिरी हुई तथा नीचतापूर्ण हरकत कर सकती है। उसकी ऑखों के सामने वो दृश्य बार बार आ रहा था जब प्रतिमा ने उसके लंड को अपने मुह में लिया हुआ था। विजय सिंह अपनी ऑखों के सामने इस दृश्य के चकराते ही बहुत अजीब सा महसूस करने लग जाता था। उसके मन में अपनी भाभी के प्रति तीब्र घृणा और नफ़रत भरती जा रही थी।
उधर अजय सिंह और प्रतिमा को ये डर भी सता रहा था कि विजय सिंह आज की इस घटना का ज़िक्र कहीं किसी से कर न बैठे।
हलाॅकि उसकी फितरत के हिसाब से उन दोनो को यही लग रहा था कि वो इस बारे में किसी से कुछ कहेगा नहीं। पर कहते हैं न कि अपराध का बोध अगर स्वयं को हो तो उसका दिमाग़ एक जगह स्थिर नहीं रह सकता। वही हाल प्रतिमा व अजय सिंह का था। दोनो ने फैसला कर लिया था कि कल ही अपने बच्चों को लेकर शहर चले जाएॅगे। जब ये घटना पुरानी हो जाएगी तो फिर उस हिसाब से देखा जाएगा।
रात को सारे कामों से फुरसत हो कर गौरी ऊपर अपने कमरे में पहुॅची। बच्चे क्योंकि अब बड़े हो गए थे इस लिए वो सब अब अलग कमरों में सोते थे। निधि हमेशा की तरह अपने भइया विराज के साथ ही सोती थी।
गौरी जब कमरे में पहुॅची तो विजय सिंह को बेड पर पड़े हुए किसी गहरी सोच में डूबा हुआ पाया। वो खद भी पिछले काफी दिनों से महसूस कर रही थी कि विजय सिंह काफी उदास व परेशान सा रहने लगा है। उसके द्वारा पूछने पर भी उसने कुछ न बताया था।
"पिछले कुछ दिनो की अपेक्षा आज कुछ ज्यादा ही परेशान नज़र आ रहे हैं आप।" गौरी ने बेड के किनारे पर बैठते हुए किन्तु विजय के चेहरे पर देखते हुए कहा___"मैं जब भी आपसे इस परेशानी की वजह पूछती हूॅ तो आप टाल जाते हैं विजय जी। क्या आप पर मेरा इतना भी हक़ नहीं कि मैं आपके मन की बातें जान सकूॅ?"
"ऐसा क्यों कहती हो गौरी?" विजय ने चौंक कर कहा था___"तुम्हारा तो मुझ पर सारा हक़ है। मेरे दिल में और मेरे मन में भी। लेकिन, कुछ बातें ऐसी भी होती हैं जिन्हें अगर ज़ुबान से बाहर निकाल दी जाएॅ तो कयामत आ जाती है। तुम्हारे पूछने पर हर बार मैं टाल देता हूॅ, यकीन मानो मुझे तुम्हारी बातों का जवाब न दे पाने पर बेहद दुख होता है। पर मैं क्या करूॅ गौरी? मैं चाह कर भी वो सब तुम्हें बता नहीं सकता।"
"अगर आप बताना नहीं चाहते हैं विजय जी तो कोई बात नहीं।" गौरी ने गंभीरता से कहा___"मैं तो बस इस लिए जानना चाहती थी कि मैं आपको इस तरह उदास और परेशान नहीं देख सकती। हर वक्त सोचती रहती हूॅ कि आख़िर ऐसा क्या हो गया है जिसकी वजह से आपके चेहरे का वो नूर खो गया है जो इसके पहले दमकता था।"
"समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता।" विजय ने गहरी साॅस ली___"ये तो बदलता ही रहता है और बदलते हुए इस समय के साथ ही इंसान से जुड़ी हर चीज़ भी बदलने लगती है।"
"आपने कहा कि कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें अगर ज़ुबान से बाहर निकाल दी जाएॅ तो कयामत आ जाती है।" गौरी ने कुछ सोचते हुए कहा___"मेरे मन में ये जानने की तीब्र उत्सुकता जाग गई है कि ऐसी भला कौन सी बातें हैं जिनके बाहर आ जाने से कयामत आ सकती है? मैं तो आपकी धर्म पत्नी हूॅ, हमारे बीच आज तक किसी का कोई राज़ राज़ नहीं रहा फिर क्या बात है कि आज कोई बात मेरे सामने राज़ ही रख रहे हैं?"
"मैं जानता हूॅ गौरी कि जब तक तुम उस बात को जान नहीं लोगी तब तक तुम्हारे मन को शान्ति नहीं मिलेगी।
" विजय सिंह ने गंभीरता से कहा___"इस लिए मैं तुम्हें वो सब बता ही देता हूॅ लेकिन उससे पहले तुम्हें मुझे एक वचन देना होगा।"
"वचन??" गौरी के माॅथे पर बल पड़ा___"कैसा वचन चाहते हैं आप मुझसे?"
"यही कि जो कुछ मैं तुम्हें बताने वाला हूॅ उस बात को कभी किसी से कहोगी नहीं।" विजय सिंह ने कहा___"वो सारी बात हम दोनो के बीच ही रहेगी। यही वचन चाहिए तुमसे।"
"ठीक है विजय जी।" गौरी ने कहा__"मैं आपको वचन देती हूॅ कि आपके द्वारा कही गई किसी भी बात का ज़िक्र मैं कभी किसी से नहीं करूॅगी।"
गौरी के वचन देने पर विजय सिंह कुछ पल तक उसे देखता रहा फिर एक लम्बी व गहरी साॅस लेकर उसने वो सब कुछ गौरी को बताना शुरू कर दिया। उसने गौरी से कुछ भी नहीं छुपाया। शुरू से लेकर आज तक की सारी राम कहानी उसने गौरी को विस्तार से बता दी। उसके मुख से ये सब बातें सुन कर गौरी की हालत किसी निर्जीव पुतले की मानिन्द हो गई। उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे उसे इन सारी बातों पर ज़रा सा भी यकीन न हो रहा हो।
"आज की इस घटना ने तो मुझे अंदर से बुरी तरह हिला कर रख दिया है गौरी।" विजय सिंह ने कहा___"समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूॅ मैं? मैं सोच भी नहीं सकता था कि वो कुलटा औरत मेरे साथ इतनी नीच और घटिया हरकत भी कर सकती थी।"
"ये सब मेरी वजह से हुआ है विजय जी।" गौरी ने नम ऑखों से कहा___"अगर मैं बीमार ना होती तो कभी भी वो औरत खेतों में आपको खाने का टिफिन देने न जा पाती। आज तो मैं खुद ही आपको खाना लेकर आने वाली थी लेकिन उसने ही मुझे जाने नहीं दिया। कहने लगी कि अभी मुझे और आराम करना चाहिये। भला मैं क्या जानती थी कि उसके मन में क्या खिचड़ी पक रही थी?"
"इसका चरित्र तो निहायत ही घटिया है गौरी।" विजय सिंह ने कहा__"ये बहुत शातिर औरत है। इसी ने मेरे भाई को अपने रूप जाल में फॅसाया रहा होगा। मेरे भइया तो ऐसे नहीं हैं। वो बस इसकी बातों में ही आ जाते हैं।"
"आपके बड़े भाई का चरित्र भी कुछ ठीक नहीं है विजय जी।" गौरी ने कहा___"हो सकता है कि आपको मेरी इस बात से बुरा लगे मगर सच्चाई तो यही है कि आपके बड़े भाई साहब खुद भी आपकी भाभी की तरह ही चरित्रहीन हैं।"
"ये क्या कह रही हो तुम गौरी?" विजय सिंह ने हैरतअंगेज लहजे में कहा___"बड़े भइया के बारे में तुम ऐसा कैसे कह सकती हो?"
"मैने आज तक आपसे उनके बारे में यही सोच कर नहीं बताया था कि आपको बुरा लगेगा।" गौरी ने कहा___"पर आज जब आपने अपनी भाभी के चरित्र का वर्णन किया तो मैंने भी आपको आपके भाई के चरित्र के बारे में बताने का सोच लिया।"
"आख़िर ऐसा क्या किया है बड़े भइया ने तुम्हारे साथ?" विजय सिंह का लहजा एकाएक ही कठोर हो गया, बोला__"मुझे सबकुछ साफ साफ बताओ गौरी।"
गौरी ने विजय सिंह को शुरू से लेकर अब तक की बात बता दी। सुन कर विजय सिंह ठगा सा बैठा रह गया बेड पर।
ऑखों में आश्चर्य के साथ साथ दुख के भाव भी नुमायां हो गए थे।
"पहले मुझे लगा करता था कि ये सब शायद मेरा वहम है।" गौरी धीर गंभीर भाव से कह रही थी___"पर धीरे धीरे मुझे समझ आ गया कि ये वहम नहीं बल्कि सच्चाई है। जेठ जी की नीयत में ही खोट है। वो अपने छोटे भाई की बीवी पर ग़लत नीयत से हाॅथ डालना चाहते हैं।"
"ये सब तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया गौरी?" विजय सिंह ने कहा___"भगवान जानता है कि मैंने कभी भूल से भी अपने बड़े भाई व भाभी का कभी बुरा नहीं सोचा। बल्कि हमेशा उन्हें राम और सीता समझ कर उनका मान सम्मान किया है। मगर मुझे क्या पता है कि ये दोनो राम व सीता जैसे कभी थे ही नहीं। मैं कल ही बाबू जी से इस बारे में बात करूॅगा। ये कोई मामूली बात नहीं है जिसे चुपचाप सहन करते रहें। हमारे आदर सम्मान देने को वो लोग हमारी कमज़ोरी समझते हैं। मगर अब ऐसा नहीं होगा। माॅ बाबू जी को इस बात का पता तो चलना ही चाहिए कि उनका बड़ा बेटा और बड़ी बहू कैसी सोच रखते हैं?"
"नहीं विजय जी।" गौरी बुरी तरह घबरा गई थी, बोली___"भगवान के लिए शान्त हो जाइये। आप ये सब माॅ बाबू जी से बिलकुल भी नहीं बताएॅगे। बड़ी मुश्किल से तो उन्हें ऐसा दिन देखने को मिला है जब उनके बड़े बेटे और बहू खुशी खुशी हम सबसे मिल जुल रहे हैं। इस लिए आप ये सब उनसे बताकर उन्हें फिर से दुखी नहीं करेंगे।"
"क्यों न बताऊॅ गौरी?" विजय सिंह ने आवेश में कहा___"ये ऐसी बात नहीं है जो अगले दिन खत्म हो जाएगी बल्कि ऐसी है कि ये आगे चलती ही रहेगी। जब किसी का मन इन बुरी चीज़ों से भर जाता है तो वो ब्यक्ति किसी के लिए फिर अच्छा नहीं सोच सकता। अभी तो ये शुरूआत है गौरी। जब आज ये हाल है तो सोचो आगे कैसे हालात होंगे?"
"सब ठीक हो जाएगा विजय जी।" गौरी ने समझाने वाले भाव से कहा___"आप बस उनसे दूर रहियेगा। माॅ बाबूजी से आप इस सबका ज़िक्र नहीं करेंगे।"
"ज़िक्र तो होगा गौरी।" विजय सिंह ने निर्णायक भाव से कहा___"अब तो रात काफी हो गई है वरना अभी इस बात का ज़िक्र होता। मगर सुबह सबसे पहले इसी बात का ज़िक्र होगा।"
"आप ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे।" गौरी ने कहा___"आपको हमारे राज की कसम है विजय जी आप माॅ बाबू जी से उनके बारे में कुछ भी नहीं कहेंगे।"
"मेरे बेटे की कसम देकर तुमने ये ठीक नहीं किया गौरी।" विजय सिंह असहाय भाव से कहा था।
"मुझे माफ कर दीजिए विजय जी।" गौरी ने नम ऑखों से कहा___"पर आपको भी तो सोचना चाहिए था न। सोचना चाहिये था कि इस सबसे माॅ बाबू जी पर क्या गुज़रेगी जब उन्हें ये पता चलेगा कि उनका बड़ा बेटा और बड़ी बहू क्या करतूत कर रहे हैं?"
विजय सिंह कुछ न बोला बल्कि बेड पर एक तरफ करवॅट लेकर लेट गया। गौरी को समझते देर न लगी कि विजय सिंह उससे नाराज़ हो गया है। आज जीवन में पहली बार ऐसा हुआ था कि विजय सिंह गौरी से नाराज़ हो गया था।
कुछ देर गौरी उसे एकटक देखती रही फिर वह भी उसके बगल में लेट गई। ऑखों में ऑसू थे और मन में बस एक ही बात कि मुझे माफ कर दीजिए विजय जी।
सुबह जब गौरी की नीद खुली तो बगल में विजय सिंह को न पाया उसने। वह समझ गई कि हर दिन की तरह विजय सिंह खेतों पर चले गए हैं। मगर तुरंत ही उसे रात की बायों का ख़याल आया। वह एकदम से हड़बड़ा गई। उसे आशंका हुई कि विजय सिंह कहीं अपनी कसम तोड़ कर माॅ बाबू जी से वो सब बताने तो नहीं चले गए? ये सोच कर गौरी झट से बेड से उठी। अपनी सारी को दुरुस्त करके वह बिना हाॅथ मुॅह धोए ही कमरे से बाहर निकल गई।
नीचे आकर देखा तो सब कुछ सामान्य था। उसे कहीं पर भी कुछ महसूस न हुआ कि जैसे कुछ बात हुई हो। ये देख कर उसने राहत की साॅस ली। मन में खुशी के भाव भी जागृत हो गए, ये सोच कर कि विजय जी ने बेटे की कसम नहीं तोड़ी।
हवेली के मुख्य द्वार की तरफ जाकर उसने बाहर लान में देखा तो चौंक पड़ी। बाहर अजय सिंह प्रतिमा व उसके बच्चे सब कार में बैठ रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे वो लोग शहर जा रहे हों। गौरी को समझते देर न लगी कि वो लोग इतना जल्दी क्यों यहाॅ से शहर जा रहे हैं। हर बार तो ऐसा होता था कि जब भी उसके जेठ व जेठानी शहर जाते थे तब वह उनके पाॅव छूकर आशीर्वाद लेती थी। मगर आज उसने ऐसा नहीं किया। बल्कि दरवाजे से तुरंत ही पलट गई वह, ताकि किसी की नज़र न पड़े उस पर। जेठ जेठानी के लिए उसके मन में नफरत व घृणा सी भर गई थी अचानक। वह पलटी और वापस अपने कमरे की तरफ बढ़ गई।
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,,,,
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.........《 35 》
अब तक,,,,,,,,,,,,
सुबह जब गौरी की नीद खुली तो बगल में विजय सिंह को न पाया उसने। वह समझ गई कि हर दिन की तरह विजय सिंह खेतों पर चले गए हैं। मगर तुरंत ही उसे रात की बायों का ख़याल आया। वह एकदम से हड़बड़ा गई। उसे आशंका हुई कि विजय सिंह कहीं अपनी कसम तोड़ कर माॅ बाबू जी से वो सब बताने तो नहीं चले गए? ये सोच कर गौरी झट से बेड से उठी। अपनी सारी को दुरुस्त करके वह बिना हाॅथ मुॅह धोए ही कमरे से बाहर निकल गई।
नीचे आकर देखा तो सब कुछ सामान्य था। उसे कहीं पर भी कुछ महसूस न हुआ कि जैसे कुछ बात हुई हो। ये देख कर उसने राहत की साॅस ली। मन में खुशी के भाव भी जागृत हो गए, ये सोच कर कि विजय जी ने बेटे की कसम नहीं तोड़ी।
हवेली के मुख्य द्वार की तरफ जाकर उसने बाहर लान में देखा तो चौंक पड़ी। बाहर अजय सिंह प्रतिमा व उसके बच्चे सब कार में बैठ रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे वो लोग शहर जा रहे हों। गौरी को समझते देर न लगी कि वो लोग इतना जल्दी क्यों यहाॅ से शहर जा रहे हैं। हर बार तो ऐसा होता था कि जब भी उसके जेठ व जेठानी शहर जाते थे तब वह उनके पाॅव छूकर आशीर्वाद लेती थी। मगर आज उसने ऐसा नहीं किया। बल्कि दरवाजे से तुरंत ही पलट गई वह, ताकि किसी की नज़र न पड़े उस पर।
जेठ जेठानी के लिए उसके मन में नफरत व घृणा सी भर गई थी अचानक। वह पलटी और वापस अपने कमरे की तरफ बढ़ गई।
_______________________
अब आगे,,,,,,,,,,,
वर्तमान अब आगे________
रितू विधी से मिलने के बाद शाम को अपने घर हवेली पहुॅची। विधी की कहानी और उसकी बातों ने उसे सच में अंदर तक हिला दिया था। वह प्यार मोहब्बत जैसी चीज़ों को बकवास ही मानती थी। किन्तु विधी से मिलने के बाद उसे इस प्यार मोहब्बत की अहमियत समझ आई थी। उसे समझ आया कि कैसे लोग किसी के प्यार में इस क़दर पागल से हो जाते हैं कि अपने महबूब की खुशी के लिए वो कोई भी काम किस हद से बाहर तक कर सकते हैं। विधी से मिलकर और उसके प्यार की सच्चाई व गहराई को जानकर उसे एहसास हुआ कि आज के युग में भी अभी ऐसे लोग हैं जो प्यार के लिए क्या नहीं कर डालते?
विधी की हालत और उसके प्यार की दास्तां ने रितू के अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया था। एक तेज़ तर्रार लड़की जो खुद को किसी भी मामले में लड़कों से कम नहीं समझती थी आज विधी की असलियत ने उसके दिल को छू लिया था। उसके हृदय में विधी के प्रति पीड़ा जाग गई थी और जिस पीड़ा ने उसकी ऑखों से ऑसू छलका दिये थे।
वह आज तक नहीं समझ पाई और ना ही कभी समझने की कोशिश की कि क्यों वह अपने चाचा चाची के लड़के विराज से नफ़रत करती थी? क्यों उसने कभी उससे बात करना ज़रूरी नहीं समझा? क्यों उसने हमेशा विराज को अपना भाई नहीं समझा? आख़िर क्या अपराध किया था उसने उसके साथ? जहाॅ तक उसे याद था जब कभी भी विराज उससे बात किया था तो बड़ी इज्ज़त से किया था। हमेशा उसे दीदी और आप कह कर संबोधित करता था।
विधी से मिलने के बाद रितू हवेली में जाकर सीधा अपने कमरे में बेड पर लेट गई थी। उसकी माॅ ने तथा उसकी छोटी बुआ नैना ने उससे बात करना चाहा था मगर उसने सबको ये कह कर अपने पास से वापस लौटा दिया था कि वह कुछ देर अकेले रहना चाहती है।
बेड पर पड़ी हुई रितू ऊपर छत के कुंडे पर लगे हुए पंखे को घूर रही थी अपलक। उसकी ऑखों के सामने विधी का वो रोता बिलखता हुआ चेहरा और उसकी वो करुण बातें घूम रही थी।
"मेरी आपसे एक विनती है दीदी।" फिर विधी ने अलग होकर तथा ऑसू भरी ऑखों से कहा।
"विनती क्यों करती है पागल?" रितू का गला भर आया___"तू बस बोल। क्या कहना है तुझे?"
"मु मुझे एक बार।" विधी की रुलाई फूट गई, लड़खड़ाती आवाज़ में कहा___"मुझे बस ए एक बार वि..विरा...ज से मिलवा दीजिए। मुझे मेरे महबूब से मिलवा दीजिए दीदी। मैं उसकी गुनहगार हूॅ। मुझे उससे अपने किये की माफ़ी माॅगनी है। मैं उसे बताना चाहती हूॅ कि मैं बेवफा नहीं हूॅ। मैं तो आज भी उससे टूट टूट कर प्यार करती हूॅ। उसे बुलवा दीजिए दीदी। मेरी ख़्वाहिश है कि मेरा अगर दम निकले तो उसकी ही बाहों में निकले। मेरे महबूब की बाॅहों में दीदी। आप बुलवाएॅगी न दीदी? मुझे एक बार देखना है उसे।
अपनी ऑखों में उसकी तस्वीर बसा कर मरना चाहती हूॅ मैं। अपने महबूब की सुंदर व मासूम सी तस्वीर।"
"बस कर रे।" रितू का हृदय हाहाकार कर उठा___"मुझमें इतनी हिम्मत नहीं है कि मैं तेरी ऐसी करुण बातें सुन सकूॅ। मैं तुझसे वादा करती हूॅ कि तेरे महबूब को मैं तेरे पास ज़रूर लाऊॅगी। मैं धरती आसमान एक कर दूॅगी विधि और उसे ढूॅढ़ कर तेरे सामने हाज़िर कर दूॅगी। मैं अभी से उसका पता लगाती हूॅ। तू बस मेरे आने का इंतज़ार करना।"
ये सब बातें रितू की ऑखों के सामने मानो किसी चलचित्र की तरह बार बार चलने लगती थी। जितनी बार ये दृष्य उसकी ऑखों के सामने से गुज़रता उतनी बार रितू के अंदर एक हूक सी उठती और उसके समूचे अस्तित्व को हिला कर रख देती।
"क्या सचमुच प्यार ऐसा होता है विधी?" रितू ने सहसा करवॅट बदल कर मन ही मन में कहा___"क्या सचमुच प्यार में लोग अपने महबूब की खुशी के लिए इस हद से बाहर तक गुज़र जाते हैं? तुम्हें देख कर और तुम्हारी बातें सुन कर तो ऐसा ही लगता है विधी। तुम सच में बहुत महान हो विधी। मेरे उस भाई से तुमने इस हद तक प्यार किया जिस भाई से मैं बात तक करना अपनी शान के खिलाफ़ समझती थी। और एक वो था कि हमेशा मुझे इज्ज़त देता था, मुझे दीदी कहते हुए उसका मुह नहीं थकता था। जब भी वो मुझसे बात करने की कोशिश करता तो हर बार मैं उसे दुत्कार देती थी। मुझे याद है विधी, जब मैं उसे दुत्कार कर भगा देती थी तब उसकी ऑखों में ऑसू होते थे। जिन्हें वह ऑखों से छलकते नहीं देता था बल्कि उन्हें ऑखों में ही जज़्ब कर लेता था। मैने तेरे विराज को बहुत दुख दिये हैं विधी। हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।"
एकाएक ही रितू की ऑखों से ऑसू छलक कर उसके कपोलों को भिगोने लगे। सहसा जैसे उसे कुछ याद आया। वह तुरंत ही बेड से उठी और तेज़ी से बगल में दीवार से सटी हुई आलमारी के पास पहुॅची। उसने आलमारी का हैण्डल घुमाया लेकिन वो न घूमा। मतलब साफ था कि आलमारी लाॅक थी।
रितू दूसरी साइड रखे एक टेबल की तरफ बढ़ी और उसकी कबड को खोल कर उसमें से एक चाभी का गुच्छा निकाला। गुच्छा लेकर वह तुरंत आलमारी के पास वापस पहुॅची और गुच्छे से एक चाभी को चुन कर उसने आलमारी के की-होल पर डाल कर घुमाया। आलमारी एकदम से अनलाॅक हो गई। रितू ने हैण्डल पकड़ कर घुमाया और फिर आलमारी के दोनो फटकों को दोनो साइड खोल दिया।
आलमारी के अंदर कई सारे पार्ट्स थे जिनमें कुछ पर कपड़े व कुछ पर कुछ किताबें व फाइलें रखी हुई थी। किन्तु रितू की नज़र उन सब पर नहीं बल्कि आलमारी के अंदर मौजूद एक और लाॅकर पर थी। उसने एक दूसरी चाभी से उस लाकर को खोला। उसके अंदर भी कुछ काग़जात जैसे ही थे। एक प्लास्टिक का डिब्बा था। रितू ने उन काग़जातों को एक ही बार में सारा का सारा बाहर निकाल लिया।
उन सबको निकाल कर वह पलटी और बेड पर उन सभी काग़जातों को फैला दिया। उनमें कुछ रसीदें थी, कुछ एग्रीमेंट जैसे काग़जात थे और कुछ लिफाफे थे। रितू ने झट से एक लिफाफा उठा लिया। उसे खोल कर देखा तो उसमें कुछ फोटोग्राफ्स थे। रितू ने लिफाफे से सारे फोटोग्राफ्स निकाल लिये और फिर एक एक कर देखने लगी। पाॅच छः फोटोग्राफ्स को देखने के बाद रितू एक दम से रुक गई। एक फोटोग्राफ्स पर उसकी नज़र जैसे गड़ सी गई थी। कुछ देर देखने के बाद उसने बाॅकी सारे फोटोग्राफ्स को बेड पर गिरा दिया और बस एक फोटोग्राफ्स को लिए वह बेड पर एक साइड बैठ गई।
फोटोग्राफ्स में उसके माॅम डैड, नीलम, शिवा एवं वह खुद भी थी। किन्तु रितू की नज़र उन सबके पीछे कुछ दूरी पर खड़े विराज पर टिकी हुई थी। ये फोटोग्राफ्स कुछ साल पहले का था। हवेली में कोई कार्यक्रम था तब ही शहर से किसी फोटोग्राफर को बुलवाया गया था और ये तस्वीरें खींची गई थी। अन्य तस्वीरों में बाॅकी सबकी तस्वीरें थी लेकिन विजय सिंह गौरी व उनके बच्चों की कोई तस्वीरें नहीं थी। इस तस्वीर में भी ग़लती से ही विराज की फोटो आ गई थी। रितू को याद आया कि शिवा बार बार विराज से इस बात पर लड़ पड़ता था कि वो उसके साथ फोटो न खिंचवाए। मगर उत्सुकतावश वो आ ही जाता था।
"वि..राज मेरे भाई।" रितू ने अपने एक हाॅथ से तस्वीर में विराज के चेहरे पर हाॅथ फेरा। उसकी ऑखों से ऑसू बह चले, बोली__"मैं जानती हूॅ कि तुझे भाई कहने का भी मुझे कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। मगर बस एक बार मुझे मिल जा भाई। अपनी इस दीदी के लिए नहीं बल्कि अपनी उस विधी के लिए जिसे तू आज भी उतना ही प्यार करता होगा मैं जानती हूॅ। मुझे पता है कि आज भी अगर तू मुझे मिल जाए तो तू मुझे उतनी ही इज्ज़त से के साथ दीदी कहेगा जैसे पहले कहा करता था। और सच कहूॅ तो मुझे नाज़ है तुझ पर कि मेरा भाई है। एक मेरा है जिसने मुझे इज्ज़त तो दी लेकिन उसकी उस इज्ज़त में भी कितनी इज्ज़त होती है ये मुझसे बेहतर भला और कौन जानता होगा भाई। पर ये तो मेरी सोच और मेरे नसीब की बात है मेरे भाई कि जिसने मुझे सच में इज्ज़त दी उसे मैने हमेशा दुत्कारा और जिसकी इज्ज़त में भी गंदगी भरी थी उसे अपने सीने से लगा कर भाई कहा। ख़ैर, ये सब छोड़ भाई। ये बता कि कहाॅ है तू? मुम्बई में ऐसी कौन सी जगह पर है जहाॅ से मुझे तेरा पता मिल जाए? मैने तेरी विधी से वादा किया है भाई कि मैं उसके सामने तुझे ले आऊॅगी। इस लिए भाई मुझे किसी तरह से मिल जा।
"
रितू उस तस्वीर से जाने क्या क्या कहे जा रही थी मगर भला वो तस्वीर उसको विराज का पता कैसे बताती?
"मैने कभी इस बात पर ग़ौर नहीं किया भाई कि क्यों मेरे अंदर तेरे लिए ये नफ़रत थी? क्यों मैं तुझसे हमेशा मुह मोड़ लेती थी?" रितू करुण भाव से कह रही थी___"इसकी वजह शायद ये हो सकती है कि बचपन से ही मेरे माॅम डैड ने मुझे और मेरे भाई बहनों को तुझसे और तेरे माता पिता व बहन से दूर ही रहने की शिक्षा दी। वो हमेशा हमें यही बताते थे कि तुम लोग अच्छे लोग नहीं हो। बचपन से हमें यही सब सिखाया पढ़ाया गया था भाई, इस लिए हम भी उनके कहे अनुसार तुम लोगो से दूर ही रहे। और जब चाची पर वो सब इल्जाम लगा और उन्हें हवेली से निकाल दिया गया तो हम बच्चों के मन में और भी ये बात बैठ गई कि तुम लोग वाकई में अच्छे लोग नहीं हो। मगर आज जब मैंने विधी से उसके और तुम्हारे प्यार के बारे में जाना तो जाने क्यों ऐसा लगा कि तुम उतने बुरे तो नहीं हो सकते मेरे भाई जितना कि आज तक हम तुम्हें समझते आ रहे थे। अगर होते तो कोई भी लड़की तुम्हारे लिए प्यार में इस हद तक अपनी कुर्बानी नहीं देती। इंसान की बुराई कभी किसी से नहीं छिपती भाई। अगर तुम वास्तव में बुरे होते तो क्या ये बात विधी को कभी पता न चलती? ज़रूर चलती भाई, मगर ऐसा नहीं था। वो पागल तो कह रही है कि वो तुम्हारी ही बाॅहों में अपनी आख़िरी साॅस लेना चाहती है। आख़िर कुछ तो खूबी होगी ही न तुझमें भाई। मैने कभी तुझे समझा ही नहीं भाई...मुझे माफ़ कर दे विराज।"
रितू उस तस्वीर को अपने सीने से लगा कर रोए जा रही थी। इस वक्त उसे इस हालत में देख कर कोई नहीं कह सकता था कि ये वही तेज़ तर्रार रितू है जो अकेले चार चार हट्टे कट्टे लड़कों धूल चटा देती है। हौंसले ऐसे बुलंद कि आसमान की बुलंदी भी क्या चीज़ है।
तभी उसका मोबाइल बजा। उसने देखा बेड के एक साइड पर रखे आईफोन की स्क्रीन पर कोई नम्बर फ्लैश कर रहा था। रितू ने फोन उठाया और काल रिसीव कर उसे कनपटी से सटा कर कहा___"हैलो।"
"..............." उधर से कुछ कहा गया।
"ये क्या कह रहे हो तुम?" रितू के चेहरे पर चेहरे पर चौंकने वाले भाव थे।
"..............." उधर से फिर कुछ कहा गया।
"पूरी बात बताओ साफ साफ।" रितू ने कहा।
".............." उधर से कुछ देर तक बताया गया।
"ओह चलो ठीक है।" रितू ने कहा__"तुमने बहुत अच्छा काम किया है। अब एक काम और तुम्हें दे रही हूॅ। और वो काम क्या है ये तुम्हें तुम्हारे फोन पर मेरे द्वारा भेजे गए मैसेज से पता चल जाएगा। सारे काम छोंड़ कर तुम्हें ये काम करना है। तुम्हारे पास सिर्फ और सिर्फ आज रात बस का समय है। कल मार्निंग में मेरी ऑख तुम्हारे फोन करने पर ही खुले। ये बात भूलना मत।"
रितू ने कहा और फोन काट दिया। उसने बेड पर बिखरे हुए काग़जातों की तरफ देखा और फिर उसकी नज़र विराज वाली तस्वीर पर पड़ी।
उस तस्वीर को एक तरफ रख कर बाॅकी सारी चीज़ें उसने उठा कर वापस उसी लाॅकर के अंदर रख दी और आलमारी बंद कर दी। विराज वाली तस्वीर को तकिये के नीचे सरका वह बेड से नीचे उतरी और अपने कपड़े उतारने लगी। कुछ ही देर में वह सिर्फ पैन्टी और ब्रा में थी। कपड़े उतारने में उसे थोड़ी तक़लीफ हुई थी। क्योंकि पीठ पर चाकू का लछा चीरा आज ही का तो था। वह ब्रा पैन्टी में किसी हालीवुड की सुपर माॅडल से कम नहीं लग रही थी। उसने तुरंत ही बाथरूम की तरफ रुख़ किया। बाथरूम से फ्रेश होने के बाद वह पुनः कमरे में आई और दूसरे कपड़े पहन कर वह कमरे से बाहर निकल गई। बेड से मोबाइल फोन उठाना नहीं भूली थी वह। पीछे साइड कमर में सर्विस रिवाल्वर छुपा हुआ था उसके।
कुछ ही देर में वह डायनिंग हाल में पहुॅच कर एक कुर्सी पर बैठ गई।
"माॅम अगर खाना रेडी हो तो जल्दी से दे दीजिए मुझे।" उसने किचेन की तरफ मुह करके ज़रा ऊॅची आवाज़ में कहा था।
"बस दो मिनट बेटी।" किचेन से प्रतिमा की आवाज़ आई।
ठीक दो मिनट बाद ही रितू के सामने बड़ी सी टेबल पर एक थाली रख दी गई। थाली लाने वाली नैना थी।
"तो अकेले रहने से उकता गई हमारी पुलिस वाली रितू बेटी?" नैना ने ज़रा मुस्कुराते हुए कहा था।
"कुछ चीज़ों के लिए तन्हाॅई सबसे अच्छी होती है बुआ।" रितू ने रोटी का एक निवाला तोड़ते हुए कहा___"अगर यही तन्हाई हमें काटती है तो यही तन्हाई कभी कभी हमें बड़ा सुकून भी देती है।"
"ओहो क्या बात कही है तुमने।" नैना ने हैरानी से कहा___"इतनी गहरी बात यूॅ ही तो तुम्हारे दिमाग़ में नहीं आई होगी? आई नो कुछ तो वजह है इसकी। इस लिए अगर उचित समझो तो अपनी इस बुआ को बताओ फिर।"
"ज़रूर बताऊॅगी बुआ।" रितू ने अजीब भाव से कहा___"पर आज नहीं। पहले मैं खुद भी तो इसकी वजह समझ लूॅ। आख़िर मुझे भी तो समझ आए कि इतनी गहरी बात मेरे दिमाग़ में आई कैसे? क्योंकि ये सब बातें तो उनके ही दिमाग़ में आती हैं जो ज़रा गंभीर तबीयत का होता है फिर सबसे अलग रहना पसंद करता है।"
"ओहो अनादर वन।" नैना मुस्कुराई___"सच सच बता किसी लड़के से कोई चक्कर वक्कर तो नहीं चल गया? वैसे जहाॅ तक मैं तुझे समझती हूॅ तो ऐसा प्वासिबल है नहीं। कोई पागल ही होगा जो तुमसे प्यार का राग अलापेगा। वरना अपने हाॅथ पैर की हड्डियाॅ तो सबको प्यारी ही होती हैं।"
"व्हाट डू यू मीन बुआ?" रितू की ऑखें फैल गई___"मतलब आप ये समझती हैं कि मैं कोई बैंडिड क्वीन हूॅ जो किसी की भी हड्डियाॅ तोड़ दूॅगी?"
"अरे तुम तो नाराज़ हो गई मेरी डाल।" नैना ने हॅस कर कहा___"मेरा वो मतलब नहीं था रे। आई वाज जस्ट किडिंग डियर।"
"कोई बात बेवजह ही मुख से नहीं निकला करती बुआ।" रितू सहसा गंभीर हो गई__"हर बात के पीछे उसका कोई न कोई मतलब भी छिपा होता है। और ये बात भी आपने मेरे कैरेक्टर को देख कर ही कही है।
मैं मानती हूॅ बुआ कि मुझे लड़के लड़कियों के बीच की ये चोंचलेबाज़ी शुरू से ही पसंद नहीं थी मगर ये भी सच है बुआ कि मेरे सीने में भी एक दिल है। जो धड़कना जानता है। उसको भी ये एहसास होता है कि प्यार क्या है और नफ़रत क्या है?"
नैना कुछ बोल न सकी बल्कि आश्चर्य से रितू को देखती रह गई। उसे अहसास हुआ कि उसकी बड़ी भतीजी आज गंभीर है। और शायद बहुत ज्यादा गंभीर है। पर किस लिए ये उसे समझ न आया।
"क्या बातें हो रही हैं बुआ भतीजी के बीच ज़रा मुझे भी बताओ?" प्रतिमा ने किचेन से आते हुए कहा था।
"कुछ नहीं माॅम।" रितू ने सहसा सामान्य होकर कहा___"बुआ पूछ रही थी कि अब रात में मैं कहाॅ जा रही हूॅ?"
"क्या???" प्रतिमा तो चौंकी ही लेकिन नैना उससे ज्यादा चौंकी थी, जबकि प्रतिमा ने कहा___"तुम इस वक्त अब कहाॅ जा रही हो?"
"कुछ ज़रूरी काम है माॅम।" रितू ने सामान्य भाव से कहा___"आप तो जानती हैं कि पुलिस की नौकरी में किसी भी वक्त कहीं भी जाना पड़ जाता है।"
"मुझे तो तुम्हारा ये पुलिस की नौकरी करना शुरू से ही नापसंद था बेटी।" प्रतिमा ने बुरा सा मुह बना कर कहा__"मगर मेरी बात मानता ही कौन है यहाॅ? जिसे जो करना है करे।"
"शुरू से आपकी और डैड की बात मानते ही तो आ रहे हैं माॅम।" रितू के मुह से जाने ये कैसे निकल गया__"अब अगर एक काम मैने अपनी खुशी से कर लिया तो क्यों ऐतराज़ हो गया आपको?"
"क्या मतलब है तुम्हारा?" प्रतिमा ने हैरानी से ऑखें फैला कर कहा___"और ये किस लहजे में बात कर रही हो तुम? दिमाग़ तो सही है ना तुम्हारा?"
"पता नहीं माॅम।" रितू ने हाॅथ धोते हुए अजीब भाव से कहा___"कभी कभी सोचती हूॅ कि इसी हवेली के अंदर कभी परिवार के सारे लोग कितना हॅसी खुशी से रहा करते थे। मगर जाने ऐसा क्या हो गया कि आज इस हवेली में सिर्फ हम रह गए। बाॅकियों को ये ज़मीन खा गई या फिर आसमान निगल गया कुछ समझ ही नहीं आया आजतक?"
"आज ये क्या हो गया है तुझे?" प्रतिमा की हवा निकल गई थी अंदर ही अंदर, बोली__"ये कैसी फालतू की बातें कर रही है तू?"
"कमाल है न माॅम?" रितू ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"आज आपको अपनी ही बेटी की बात फालतू लग रही है। सुना है कि कोई अगर ग़लती कर दे तो उसे आख़िर में माफ़ ही कर दिया जाता है। मगर कुछ ऐसे भी बेचारे बदनसीब होते हैं जिनको कोई माफ़ भी नहीं करता। सुना तो ये भी है माॅम कि परिवार अगर किसी कारण से एक दूसरे से अलग हो जाता है या बिखर जाता है तो परिवार के मुखिया हर संभव यही प्रयास करता है कि उसका बिखरा हुआ परिवार फिर से जुड़ जाए। कदाचित तभी एक सच्चे मुखिया के दिल को सुकून मिलता है। कहते हैं कि हर परिवार के बीच कभी न कभी कोई न कोई अनबन हो ही जाती है मगर उसका मतलब ये तो नहीं होता न कि फिर उनसे हर रिश्ता ही तोड़ लिया जाए? या फिर उस अनबन को दूर ही न किया जाए।
"
"तू आख़िर कहना क्या चाहती है?" प्रतिमा ने तीखे भाव से कहा___"क्या चल रहा है तेरे मन में? अगर कोई बात है तो उसे साफ साफ कह। यूॅ घुमा फिरा कर कहने का क्या मतलब है तेरा?"
"जाने दीजिए माॅम।" रितू कुर्सी से उठते हुए बोली___"मैं क्या कह रही हूॅ वो आप समझ तो गई ही हैं न? फिर साफ साफ कहने की क्या ज़रूरत है? ख़ैर चलती हूॅ माॅम। बाय डियर बुआ जी।"
"बाय बेटा।" नैना ने रुॅधे हुए गले से कहा। उसकी ऑखों में ऑसू तैर रहे थे।
"पुलिस की नौकरी क्या करने लगी इसका सारा दिमाग़ ही ख़राब हो गया है।" प्रतिमा भुनभुनाते हुए टेबल से थाली उठाते हुए कहा___"पता नहीं कहाॅ से ऐसी बेकार की बातें सीख कर आती है ये?"
"सच ही तो कह रही थी वो।" नैना ने गंभीरता से कहा___"भला ऐसा किस परिवार में होता है भाभी कि अगर परिवार में किसी से कोई ग़लती हो जाए तो उसे कभी माफ़ ही न किया जाए? कितनी खुशियाॅ थी इस घर में। हम सब कितना हॅसी खुशी से रहते थे सबके साथ। परिवार में सबकी एकता को देख कर माॅ बाबूजी कितना खुश थे। मगर आज इस घर में न वो खुशियाॅ हैं और न ही खुशियाॅ फैलाने वाला परिवार का कोई बाॅकी सदस्य। विजय भइया की मौत क्या हुई मानो इस घर से खुशियाॅ ही चली गई। माॅ बाबू जी आज भी कोमा से बाहर नहीं आए। अगर कोई पूछे कि इस सबका जिम्मेदार कौन है तो किसका नाम लिया जाए?"
"अभी एक यही राग अलाप कर गई है और अब तुम भी यही राग अलापने लगी नैना?" प्रतिमा की भृकुटी तन गई__"और ये क्या कह रही हो तुम कि इस सबका जिम्मेदार कौन है और किसका नाम लिया जाए? इस बात का क्या मतलब हुआ? क्या तुम ये कहना चाहती हो कि इस सबके जिम्मेदार हम हैं?"
"मैने ऐसा तो नहीं कहा भाभी।" नैना ने अधीरता से कहा___"पर एक बात तो सही है न कि जो परिवार का बड़ा सदस्य होता है उसे सबको एक साथ में लेकर चलना चाहिए? घर के मुखिया तो अजय भइया और आप ही हैं। गाॅव समाज के लोग तो यही कहेंगे न कि छोटे अगर नासमझ थे या कोई ग़लती कर रहे थे तो ये बड़े का फर्ज़ था कि छोटे को उसकी ग़लती पर एक बार माफ़ ही कर देना चाहिये था। लोग तो कहेंगे न भाभी कि किसी ग़लती की इतनी बड़ी सज़ा नहीं देना चाहिए कि छोटे से हर रिश्ता तोड़ कर उसे घर से बेदखल ही कर दिया जाए।"
"कुछ ग़लतियाॅ ऐसी होती हैं नैना जिनके लिए कोई मुआफ़ी नहीं होती।" प्रतिमा ने ठोस लहजे में कहा___"बल्कि अगर उन ग़लतियों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए तो उससे सब कुछ बरबाद हो जाता है। तुम्हारे भइया ने क्या नहीं किया इस परिवार के लोगों को एक करने के लिए मगर हुआ क्या? नैना, हमारी अच्छाईयाॅ और कुर्बानियाॅ कोई नहीं देखेगा बल्कि सिर्फ यही देखेगा कि हम परिवार को एक नहीं कर पाए।"
"कल पड़ोस की वो कमला भाभी मुझे मिली थी आते वक्त।" नैना ने कहा___"मुझे देख कर उसने आवाज़ दी मुझे। उससे थोड़ी देर बातें हुई।
उसकी बातों का असल मुद्दा हमारे परिवार से ही था।"
"क्या कह रही थी वो?" प्रतिमा के कान खड़े हो गए।
"कह रही थी कि मझली ठकुराईन(गौरी) तो ऐसी थी ही नहीं।" नैना ने कहा___"वो दोनो मियां बीवी तो बड़े धर्मात्मा इंसान थे। दूर दूर तक उनकी अच्छाई और उनके उच्च आचरण की चर्चा होती थी। आज भी कोई यकीन नहीं करता कि मझली ठकुराइन ने ऐसा कोई नीच काम अपने जेठ के साथ किया होगा।"
"उस कलमुही को क्या पता?" प्रतिमा ने सहसा गुस्से में कहा___"वो क्या यहाॅ देखने आई थी कुतिया? जबकि मैने अपनी ऑखों से देखा है। पहले भी कई बार मैने गौरी को ऐसे ही चोरी चोरी अजय के कमरे में जाते देखा था। मैने इस बारे में अजय से भी बताया था और अजय से ये भी कहा था कि उससे दूर रहना। पति मर गया है तो अब उससे अपने जिस्म की गरमी बर्दास्त ही नहीं हो रही है। इसी लिए अब वो मेरे पति पर डोरे डाल रही है। एक दिन तो मैने अपने कमरे ही उसे सारी उतारे हुए अपने भोसड़े में उॅगली करते हुए पकड़ लिया था। वो तो अच्छा था कि मैं कमरे में पहुॅच गई थी वरना अगर कहीं तुम्हारे भइया पहुॅच गए होते तो क्लेश ही हो जाना था उस दिन। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि गौरी को उसकी इस नीच हरकत करने से कैसे रोंकूॅ? किसी से कह भी नहीं सकती थी। क्योंकि कोई मेरी बातों का यकीन ही नहीं करता। उल्टा मुझ पर ही दोषारोपण लग जाता। इस लिए मैने सोचा कि इस बार जब गौरी ऐसी कोई हरकत करेगी तो मैं उसकी इस नीचता का सबूत तैयार करूॅगी। अजय शिवा के लिए एक कैमरा लाए थे। कुछ दिन बाद ही मुझे फिर से गौरी की हरकत का पता चल गया। मैं जब कमरे में गई तो अंदर से आवाजें आ रही थी। मैने कमरे को हल्का अंदर की तरफ धकेल कर देखा तो गौरी अजय के ऊपर चढ़ी हुई थी। जबकि अजय उसे डाॅटे जा रहे थे और उसे अपने से दूर कर रहे थे। मैने सोचा इससे बड़ा सबूत और क्या होगा। मैं तुरंत शिवा के कमरे में गई और उसका कैमरा उठा लाई। अपने कमरे के दरवाजे के पास पहुॅच कर मैने अंदर चल रहे काण्ड की फोटो खींची। मैं और भी फोटो खींचना चाहती थी। मगर कैमरे में रील खत्म हो चुकी थी। शायद शिवा ने पहले ही सारी रील खत्म कर दी थी। शुकर था लास्ट की एक बची थी। उसमें एक ही फोटो खींची मैने। उसके बाद फिर मैं अंदर गई और उस गौरी की चुटिया पकड़ कर उसे अजय के ऊपर से खींच कर नीचे लाई। मैं बहुत गुस्से में थी इस लिए पहले मैने उसे वहीं पर पीटा फिर बाहर लेकर आई। साली कितनी कमीनी और निर्लज्ज थी कि वैसा नीच काम करने के बाद भी उल्टा यही बोले जा रही थी कि मैने कुछ नहीं किया मुझे फॅसा रहे हैं ये सब मिलकर। तो ये थी उस जलील और कुलटा औरत की करतूत।"
नैना प्रतिमा की ये लम्बी चौड़ी बात सुन कर हैरान नहीं हुई क्योंकि ये बात प्रतिमा पहले भी सबसे बता चुकी थी। पर उसे न पहले उसकी बात पर यकीन था और ना ही आज यकीन हो रहा था।
मगर वो इसके खिलाफ़ कुछ कह नहीं सकती थी। क्योंकि उसके खिलाफ़ कुछ बोलने के लिए भी कोई न कोई आधार के रूप में सबूत चाहिए था जो कि उसके पास भला कैसे हो सकता था। नैना और सौम्या दोनो बहनों को तो ये सब बाद में बताया गया था।
"ये बात तो वो कमला भाभी भी कह रही थी कि मझली ठकुराईन को जान बूझ कर फॅसाया गया था।" नैना ने कहा___"वो कह रही थी गाॅव का हर ब्यक्ति यही कहता है कि उन्हें फॅसाया गया था।"
"भला उसे कोई क्यों फॅसाएगा नैना?" प्रतिमा ने झुॅझला कर कहा___"वो हमारी कोई दुश्मन तो नहीं थी और ना ही हमारा उससे कोई बैर था। फिर भला उसे क्यों कोई जान बूझ कर फॅसाएगा? गाॅव के लोगों को तो बस बातें बनाना आता है नैना। ये किसी के भी बारे में अच्छा नहीं सोच सकते।"
"ख़ैर जाने दीजिए भाभी।" नैना भला अब क्या कहती___"सब कुछ समय पर छोड़ दीजिए। जो जैसा करेगा वो उसका फल तो पाएगा ही।"
"ये अजय अब तक नहीं आए।" प्रतिमा ने पहलू बदला___"वो भी आ जाते तो हम सब मिल कर डिनर कर लेते।"
"आते ही होंगे भाभी।" नैना ने कहा___"फैक्टरी को रिन्यू कराने में काफी ब्यस्त हैं वो आजकल।"
इनके बीच बस ऐसी ही थोड़ी देर बातें होती रही। कुछ देर बाद ही अजय सिंह आ गया था।
______________________
उस वक्त रात के नौ बजे थे जब रितू पुनः अपने फार्महाउस पर पहुॅची थी। लोहे वाले गेट पर दो बंदूखधारी ब्यक्ति खड़े। रितू की कार को देखते ही दोनो ने गेट को खोल दिया। गेट के खुलते ही रितू ने कार को गेट के अंदर की तरफ बढ़ा दिया और फिर वो सीधा पोर्च में ही रुकी। कार से बाहर आ कर रितू ने कार को लाॅक किया। तब तक वो दोनो बंदूखधारी भी आ गए।
"क्या समाचार है काका?" रितू ने एक से पूछा।
"समाचार बढ़िया है बिटिया।" काका ने कहा___"जैसा तुमने कहा था वैसा ही कर दिया है हमने। वो सब वहीं तहखाने मा रस्सी से बॅधे हुए हैं। कुछ देर पहले ही हम जाकर देखे थे तो सब होश में आ गए थे। सबने जब खुद को अजनबी जगह पर इस तरह रस्सियों से बॅधा हुआ पाया तो सब के सब रोने लगे बिटिया। हमका देख के पूछन लगे कि ये हमें कहाॅ ले आया गवा है और ई तरह रस्सी से काहे बाॅथा गवा है?"
"अच्छा, चलो फिर उनको जवाब भी दे देते हैं न काका।" रितू ने ज़हरीली मुस्कान के साथ कहा___"क्या विचार है आपका?"
"हम तो एक ही बात जानत हैं बिटिया कि ऐसे ससुर के नातियों को बीच चौराहे पर नंगा करके गोली मार दैं।" काका ने गर्मजोशी से कहा___"ऐसे लोगन का जीयै का कौनव अधिकार नहीं है।"
"बात तो आपकी बिलकुल दुरुस्त है काका।" रितू ने कहा___"लेकिन ये तो बहुत आसान मौत होगी न उन सबके लिए?"
"हाॅ ई बात तो है बिटिया।" शंकर काका ने कहा___"तो फिर ऐसा करत हैं कि ससुरों को तड़पा तड़पा के मारते हैं।"
"शंकर काका ये तो आपने बिलकुल ठीक कहा।" रितू मुस्कुराई___"हरिया काका तो एक ही बार में गोली मार देने को कह रहे थे।
"
"अरे ऊ ता हम जल्दबाज़ी मा अउर एकदम से गुस्से मा कह दिये रहे बिटिया।" हरिया काका ने झेंपते हुए कहा___"वरना ई बात ता हम ई सरवा शंकर से पहले ही कह देते।"
"चलो कोई बात नहीं काका।" रितू ने कहा__"अब तो कह दिये न आप? अब चलो उनको देखे ज़रा।"
"अउर कुछू साथ मा लेके चलैं का है का बिटिया?" हरिया काका झट बोल पड़ा था।
"और क्या ले चलना है भला?" रितू चकराई।
"अरे बाल्टी मा पानी ले चलत हैं ना बिटिया।" हरिया ने कहा__"ऊ का है ना, हमका अइसन लागत है कि उहाॅ जाइके तुम उन सबको बहुतै धुनाई करोगी। ता थुनाई मा कउनौ सारे बेहोश होई गै तो? उनका होश मा लाने की खातिर पानी ता चाहिए ना बिटिया।"
"क्या बात है काका।" रितू हॅस पड़ी___"क्या दिमाग़ लगाया है आपने। मानना पड़ेगा आपको। दिमाग़ बहुत तेज़ है आपका।"
रितू की प्रसंसा पाने से हरिया काका तन कर चलने लगा। वह शंकर को इस तरह देखने लगा था जैसे अब उसके सामने उसकी कोई औकात ही नहीं है। शंकर उसे इस तरह अकड़ते हुए चलते देख बुरा सा मुह बना कर रह गया।
"पर काका।" रितू ने कहा___"मुझे लगता है कि आपका ये दिमाग़ काकी की वजह से तेज़ हुआ है।"
"अरे का बात करती हो बिटिया?" हरिया काका ने नागवारी भरे भाव से कहा___"ऊ ससुरी तो शुरू से ही दिमाग़ से पैदल है। हमरे साथ रह रह के ही तो थोड़ा बहुत दिमाग़ आ गवा है उसमे।"
"ओए तूने भाभी जी को ससुरी बोला?" शंकर ने झड़प कर कहा हरिया से___"रुक अभी जा के बताता हूॅ उनसे।"
"अबे रुक जा बे खबीस।" हरिया काका की सारी अकड़ तेल लेने चली गई___"सरवा मरवाएगा का हमका?"
"हाॅ तो भाभी जी को ससुरी क्यों बोला?" शंकर अभी भी उसे घुड़कता बोला__"और क्या बोला कि तेरे साथ रह रह कर ही उनमें थोड़ा बहुत अकल आई है। साला झूॅठा कहीं का।"
"तू ना अब मुह बंद ही कर ले समझा।" हरिया भी ताव खा गया___"वरना उल्टा तुझे ही पिटवा दूॅगा मैं उस ससुरी से।"
"वो कैसे भला?" शंकर बुरी तरह हैरान।
"अरे हम कह देंगे कि ये शंकरवा तुझे कहत रहा कि अब भौजी ससुरी बुड्ढी होई गई है।" हरिया ने कहा___"अउर ये भी कह देंगे कि मोटी भैस जइसन होई गई है।"
"ओये ये मैने कब कहा?" शंकर परेशान।
"नहीं कहा ता का हुआ?" हरिया बोला__"हम ता कह देंगे न कि ई शंकरवा अइसनै कहत रहा।"
"देखा रितू बिटिया।" शंकर ने मानो रितू से गुहार लगाई___"ये जबरदस्ती मुझे अपनी जोरू से पिटवाना चाहता है।"
"चिन्ता मत कीजिए काका।" रितू ने कहा___"सिर्फ आप ही बस नहीं पिटेंगे बल्कि आपके साथ साथ हरिया काका भी काकी से पिटेंगे।"
"अरे ई का कहत हो बिटिया?" हरिया काका ने हड़बड़ा कर कहा___"हम भला काहे पिटेंगे ऊ ससुरी से?"
"वो इस लिए कि मैं काकी से बताऊॅगी कि काका आपको जब देखो तब दिमाग़ से पैदल और ससुरी ससुरी कहते रहते हैं।" रितू ने कहा___"आपकी तो कोई इज्ज़त ही नहीं करते ये दोनो। फिर देखना काका, कैसे आप दोनो का हाल बनाएॅगी काकी।
"
"अरे हमका माफ़ कर दो बिटिया।" काका ने दोनो हाॅथ जोड़ लिए बोला___"ई सब ना ई शंकरवा की कारण होई जात है। वरना हम ता बिंदिया की बहुत इज्जत करत हैं। ऊ ता हमरी जान है, प्राण प्यारी है बिटिया।"
"अच्छा छोड़ो ये सब।" रितू ने कहा__"अब चलिये उन सबका हाल चाल भी तो देखना है।"
"ठीक है बिटिया चलो।" हरिया ने कहा और फिर वो रितू के पीछे चल दिया। जबकि शंकर लोहे वाले गेट की तरफ बढ़ गया।
कुछ ही देर में रितू और हरिया काका तहखाने में पहुॅचे। तहखाना काफी बड़ा था। वहाॅ पर सामान तो कुछ नहीं था बस ज़मीन पर सीलन जैसा प्रतीत होता था। दीवार के चारो तरफ बल्ब लगे हुए थे। एक तरफ की दीवार से सटे वो चारो रस्सी में बॅधे खड़े थे। सभी के हाॅथों को ऊपर करके बाॅधा गया था और पैरों को नीचे विश्राम की पोजीशन में चारों लड़कों के पैरों से जोड़ते हुए बाॅधा गया था। लेकिन उनमें से कोई भी अपने पैरों को हिला नहीं सकता था। दोनो तरफ की दीवारों पर एक एक तरफ से पैरों में बॅधी रस्सी को खींच कर बाॅधा गया था।
उन चारों की हालत बहुत ही अजीब हो गई थी। डर और दहशत से उन सभी का बुरा हाल था। पहले से ही रितू की मार से लहू लुहान थे वो चारो और अब इस डर व भय ने उनकी हालत खराब कर दी थी जाने वो यहाॅ कैसे और क्यों लाए गए हैं। ये तो वो भी समझ चुके थे कि उनके साथ कुछ बहुत ही बुरा होने वाला है।
तहखाने में दो तरफ के बल्ब जल रहे थे। इस लिए तहखाने में काफी रोशनी थी। पसीने तथपथ उन चारों के चेहरों को बखूबी देखा जा सकता था। रितू और हरिया काका जैसे ही तहखाने में पहुॅचे तो उन चारो ने उनकी आहट से अपनी अपनी गर्दन उठा कर सामने देखा। रितू पर नज़र पड़ते ही सबकी घिग्घी बॅध गई। चेहरे पर डर के मारे हल्दी सी पुत गई। जूड़ी के मरीज़ की तरफ एकदम से काॅपने लगे थे वो चारो।
"काका इन लोगों की खातिरदारी नहीं की क्या आपने?" रितू ने उन चारों को एक एक नज़र देखने के बाद हरिया से कहा था।
"अरे हमरा मन ता बहुत रहा बिटिया।" हरिया ने कहा___"लेकिन ऊ का है न हमका परमीशॅनवा ही मिला था। वरना हम ता इन ससुरन की अइसन पेलाई करते कि ई ससुरे यहीं पषर टट्टी कर देते।"
"चलो अच्छा हुआ काका जो मैने आपको परमीशन नहीं दी थी।" रितू ने कहा___"वर्ना अगर ये टट्टी कर देते तो साफ भी तो आपको ही करना पड़ता न?"
"अरे हाॅ बिटिया।" हरिया ने हैरानी से कहा___"ई ता हम सोचे ही नहीं। पर कउनव बात नहीं बिटिया। हम ता साफ न करते लेकिन ई सब ससुरे लोग जरूर साफ करते। अउर ना करते तो हम ई ससुरन का अउर अच्छे से पेलते।"
रितू ने हरिया की बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया बल्कि वह ऑखों में आग लिए उन चारो की तरफ बढ़ी। उन सबकी हालत बड़ी ही दयनीय हो गई। उन सबकी टाॅगें इस तरह काॅपने लगी थी जैसे उन पर अब उनका कोई ज़ोर ही न रह गया हो।
"क्या सोचा था तुम सबने? रितू के मुख से शेरनी की सी गुर्राहट निकली___"इतने सारे गुनाह करके तुम सब बड़े मज़े में रहोगे?? कोई तुम्हारा बाल बाॅका कर ही नहीं सकता?"
"ह हमें माफ़ कर दो।" सूरज चौधरी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा___"हम किसी के साथ कोई भी ग़लत काम नहीं करेंगे अब।"
"करोगे तो तब जब करने के लिए ज़िंदा बचोगे।" रितू ने बर्फ की मानिन्द ठंडे स्वर में कहा___"अब तो तुम चारों का रिज़र्वेशन हो गया है नरक में जाने का। लेकिन चिन्ता मत करो क्योंकि नरक में यहाॅ से ज्यादा तुम लोगों को यातनाएॅ नहीं सहनी पड़ेगी।"
"नहीं नहीं।" रोहित बुरी तरह रो पड़ा__"हमें कुछ मत करो प्लीज़। हम मरना नहीं चाहते। आ आख़िर किस वजह से तुम हमारे साथ ये सब कर रही हो? हमें यहाॅ से जाने दो इंस्पेक्टर वरना तुम नहीं जानती कि हमें इस तरह यहाॅ बंधक बना कर रखने से तुम्हारा क्या अंजाम हो सकता है?"
"और तुम्हें भी ये अंदाज़ा नहीं है लड़के कि मैं तुम सबके बापों के साथ क्या कर सकती हूॅ?" रितू ने सहसा रोहित के सिर के बाल को मुट्ठी मे पकड़ कर खींचते हुए कहा___"अगर मैं चाहूॅ तो इसी वक्त तुम्हारे बापों बीच चौराहे पर नंगा करके दौड़ाऊॅ। मगर फिलहाल ये बाद में अभी तो तुम सबके साथ ही हिसाब किताब करना है।"
"हरामज़ादी कुतिया साली हमारे बाप को बीच चौराहे पर नंगा दौड़ाएगी तू।" सहसा सूरज चौधरी गुर्रा उठा___"एक बार मेरे हाॅथ पैर खोल दे फिर देख तेरा क्या हस्र करता हूॅ मैं?"
"देखा था सुअर की औलाद।" रितू नोंकदार बूट की ठोकर ज़ोर से सूरज के पेट में मारते हुए कहा। सूरज के मुख से हलाल होते बकरे की सी चीखें निकली जबकि रितू बोली__"उस दिन तेरी मर्दानगी भी देखी थी। तुम सबकी देखी थी। उसी का नतीजा है कि आज यहाॅ बॅधे पड़े हो।"
"हमें छोड़ दो इंस्पेक्टर।" किशन ने गुहार लगाते हुए कहा___"आख़िर हमने किया क्या है? किस लिए हमें यहाॅ लाकर हमारे साथ ये सब कर रही हो तुम?"
"काका, इसे पता ही नहीं है कि इसने किया क्या है?" रितू ने कहा___"ये साला ऐसा शरीफ बन रहा है बहनचोद जैसे इसने कभी किसी चींटी तक को चोंट न पहुॅचाई हो।"
"ज़ुबान सम्हाल कर बात करो इंस्पेक्टर।" सहसा सूरज कह उठा___"और याद रखो कि अगर हममें से किसी को भी कुछ हुआ तो उसका खामियाजा तुम्हें और तुम्हारे पूरे खानदान को भुगतना होगा।"
"मेरे खानदान की तू फिक्र मत कर।" रितू ने कहा___"मेरे खानदान तक जाने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि तेरे और तेरे बाप को कुत्ते की मौत मार देने के लिए मैं ही काफी हूॅ। तुम चारों को ऐसा तड़पा तड़पा कर मारूॅगी कि मौत की भीख माॅगोगे मगर मौत दूॅगी नहीं आसानी से।"
"पर ये तो बताओ इंस्पेक्टर।
" अलोक वर्मा के तिरपन काॅप गए, बोला___"हमने ऐसा किया क्या है जिसके कारण तुम हमारे साथ ऐसा ब्यौहार कर रही हो?"
"हाॅ हाॅ बताती क्यों नहीं हमें?" किशन ने अलोक की बात में कहा___"हमें भी तो पता चले कि हमने ऐसा किया क्या है?"
"विधी चौहान याद है???" रितू ने अलोक का गिरहबान पकड़ कर झिंझोड़ा___"वही विधी चौहान जो तुम लोगों के साथ ही काॅलेज में पढ़ती थी, और जिसके साथ तुम चारों ने मिल कर गैंग रेप किया था? कुछ याद आया या फिर इतना जल्दी भूल गए सब?"
चारों के दिलो दिमाग़ में जैसे विष्फोट हुआ। दिमाग़ की बत्ती एक साथ सबकी जल उठी। अब समझ आया था उन्हें कि ये सब उनके साथ क्यों हो रहा था। सब कुछ समझ में आते ही चारों के चेहरे पीले पड़ गए। किसी के भी मुख से बोल न फूटा।
"किसी की बहन बेटियों की इज्ज़त से इस तरह खेलने का बहुत शौक है न?" रितू ने गुर्राते हुए कहा___"कितनी लड़कियों की ज़िंदगियाॅ बरबाद कर दी है तुम सब हराम के पिल्लों ने। उन सब लड़कियों की बरबादी का हिसाब देना होगा तुम लोगों को।"
"ये सब झूठ है।" सूरज पूरी शक्ति से चीखा था, बोला___"सरासर झूॅठ है इंस्पेक्टर। हम में से किसी ने भी उसके साथ कुछ नहीं किया। तुम बेवजह ही हमें इस तरह यहाॅ पकड़ कर ले आई हो। हमने कुछ नहीं किया। हमें छोड़ वरना बहुत पछताओगी तुम देख लेना।"
"तू साले रंडी की औलाद मुझे पछताने का बोल रहा है बहनचोद।" रितू ने सूरज के पेट में दो चार घूॅसे एक साथ ही जड़ दिये। सूरज बुरी तरह दर्द से बिलबिलाया था, जबकि रितू ने कहा___"तेरी भी एक बहन है न। मुझे सब पता है। तेरी बहन का नाम रचना चौधरी है न। सुना है वो बहुत ही जवान है। तू चिन्ता मत कर बहुत जल्द वो तेरे सामने यहीं पर होगी और तुम चारो खुद एक एक करके उसका रेप करोगे।"
"इंस्पेक्टर।" सूरज गीदड़ की तरह चीखा___"अगर तूने मेरी बहन को हाॅथ भी लगाया तो देख लेना।"
"क्यों पिछवाड़े में आग लगी क्या तेरे?" रितू ने एक झन्नाटेदार थप्पड़ सूरज के गाल पर रसीद करते हुए कहा___"और जब तू दूसरों की बहन बेटियों को बरबाद करता तब क्या मज़ा आता है मादरचोद?"
"बिटिया हम का कहत हैं कि ये बाल्टी का पानी जो हम लेके आए हैं।" सहसा हरिया काका ने कहा___"ऊ का बेकार मा लेके आए हैं? हम ता सोचत रहे कि तुम इन ससुरों को मार मार कर बेहोश करती जाओगी अउर हम इन ससुरन का ई पानी से होश मा ले आते रहेंगे।"
"चिन्ता मत करो काका।" रितू गुर्राई__"बहुत जल्द ऐसा भी होने वाला है।
"फेर ता ठीक है बिटिया।" काका ने कहा___"अगर कहौ ता हमहू इन ससुरन का जी भर कै धुन देई? ऊ का है ना हमरा हाॅथ मा बहुतै खुजली होई रही है।"
"तो ठीक है काका आप ही अपने हाॅथ की खुजली मिटा लो।" रितू ने कहा___"मैं इन कुत्तों से कल मिलूॅगी। तब तक आप इनकी अच्छे से खातिरदारी करना। बस इतना याद रहे कि इनमें कोई भी मरने न पाए।"
"अइसनै होई बिटिया।
" काका ने खुश होते हुए कहा___"हम ई ससुरन केर अम्मा चोद देब। तुम फिकर ना करो बिटिया। अब जाओ तुम इहाॅ से। अब ई.....डि...अरे बिटिया ऊ का कहत हैं एखा...? अरे हाॅ याद आई गा। अब ई डिपारटमेंट हमरा है। हाॅ डिपारटमेंट।"
"डिपारटमेंट नहीं काका उसे डिपार्टमेन्ट कहते हैं।" रितू ने मुस्कुराकर कहा।
"अरे हाॅ बिटिया उहै।" काका ने कहा___"तुम समझ गई हौ ना। ई है बहुत है।"
"अच्छा काका मैं चलती हूॅ।" रितू ने कहा__"आप सम्हाल लेना ओके?"
"अरे तुम कउनव चिन्ता न करा बिटिया ई ता हमरे बाएं हाथ का चीज है।" काका ने गर्व से कहा___"ई ससुरन का मार मार के हम इनकर टट्टी निकाल देब। अउर का।"
रितू हरिया काका की बात पर मुस्कुराती हुई तहखाने से बाहर निकल गई। जबकि रितू के जाते ही काका ने तहखाने का गेट बंद किया और फिर अपने दोनो हाॅथ मलते हुए रोहित मेहरा के पास पहुॅचा।
"का रे मादरचोद।" काका ने कहा___"तोरे केतनी अम्मा है अउर केतने बाप हैं?"
"तमीज़ से बात करो ओके।" रोहित डर तो गया था लेकिन फितरत के चलते बोल ही गया था।
"तोरी माॅ की चूत मारूॅ ससुरे के।" काका के हाॅथ में जो मोटा सा लट्ठ था उसने घुमा कर रोहित की टाॅग में ज़ोर से धमक दिया। रोहित दर्द से बुरी तरह चीखने चिल्लाने लगा। काका तो बहुत देर से सब्र किये बैठा था। उसे इस बात का बेहद गुस्सा भी था कि इन लोगों ने रितू उल्टा सीधा भी बोला था।
हरिया काका उन चारों पर पिल पड़ा। फिर तो तहखाने में बस रोने और चीखने की आवाज़ें ही आ रही थी। हरिया काका तब तक उन सबकी धुनाई करता रहा जब तक कि उसका पेट न भर गया था। धुनाई करने के बाद वह उन चारों को अधमरी हालत में छोंड़ कर तहखाने से बाहर चला गया और बाहर से तहखाने को लाॅक कर दिया।
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,,,,
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.........《 36 》
अब तक,,,,,,,,,
रितू हरिया काका की बात पर मुस्कुराती हुई तहखाने से बाहर निकल गई। जबकि रितू के जाते ही काका ने तहखाने का गेट बंद किया और फिर अपने दोनो हाॅथ मलते हुए रोहित मेहरा के पास पहुॅचा।
"का रे मादरचोद।" काका ने कहा___"तोरे केतनी अम्मा है अउर केतने बाप हैं?"
"तमीज़ से बात करो ओके।" रोहित डर तो गया था लेकिन फितरत के चलते बोल ही गया था।
"तोरी माॅ की चूत मारूॅ ससुरे के।" काका के हाॅथ में जो मोटा सा लट्ठ था उसने घुमा कर रोहित की टाॅग में ज़ोर से धमक दिया। रोहित दर्द से बुरी तरह चीखने चिल्लाने लगा। काका तो बहुत देर से सब्र किये बैठा था। उसे इस बात का बेहद गुस्सा भी था कि इन लोगों ने रितू उल्टा सीधा भी बोला था।
हरिया काका उन चारों पर पिल पड़ा। फिर तो तहखाने में बस रोने और चीखने की आवाज़ें ही आ रही थी। हरिया काका तब तक उन सबकी धुनाई करता रहा जब तक कि उसका पेट न भर गया था।
धुनाई करने के बाद वह उन चारों को अधमरी हालत में छोंड़ कर तहखाने से बाहर चला गया और बाहर से तहखाने को लाॅक कर दिया।
________________________
अब आगे,,,,,,,,,
फ्लैशबैक अब आगे______
गौरी अभी ये सब बता ही रही थी कि सहसा डोर बेल की आवाज़ से सबका ध्यान भंग हो गया। डोर बेल की आवाज़ से ही उन सबको ये एहसास हुआ कि समय कितना हो चुका था। वरना ड्राइंगरूम में रखे सोफों पर बैठे हुए उन्हें समय का आभास ही न हुआ था। वो सब तो गौरी के द्वारा सुनाए जा रहे अतीत के किस्सों में ही डूबे हुए थे।
"लगता है कि जगदीश भाई साहब आ गए हैं।" गौरी ने गहरी साॅस लेते हुए कहा__"जा गुड़िया दरवाज़ा खोल दे।"
"जी माॅ।" निधी ने भी गहरी साॅस लेकर कहा और सोफे से उठ कर मुख्य द्वार की तरफ बढ़ गई।
"रात के नौ बज गए हैं।" गौरी ने सामने दीवार पर लगी घड़ी पर देखते हुए कहा___"इस कहानी के चक्कर में रात का खाना बनाना भी रह गया अभय। चलो ये कहानी अब कल बताऊॅगी। अभी खाना बना लूॅ फटाफट। जगदीश भाई साहब को दस बजे तक खाना खाकर सो जाने की आदत है।"
"ठीक है भाभी आप जाइए।" अभय ने गंभीर भाव से कहा था। वो अभी भी उन अतीत के दृष्यों में खोया हुआ लगा। उसके ऐसा कहने पर गौरी उठ कर किचेन की तरफ बढ़ गई।
तभी ड्राइंगरूम में जगदीश ओबराय दाखिल हुआ। उसके पीछे पीछे ही निधी भी आ गई। जगदीश ओबराय की नज़र अभय सिंह पर पड़ी तो उसने बगल से रखे सोफे पर बैठे विराज की तरफ देखा।
"ये मेरे अभय चाचा जी हैं अंकल।" विराज ने जगदीश का आशय समझ कर कहा___"आज सुबह करीब ग्यारह बजे के आस पास आए हैं।"
"ओह ये तो बहुत अच्छी बात है।" जगदीश ओबराय के चेहरे पर खुशी के भाव नुमायां हुए, फिर उसने अभय की तरफ देखते हुए कहा___"कैसे हैं भाई साहब?"
अभय ने हल्की मुस्कान के साथ पहले उसे नमस्ते किया फिर बोला___"जी मैं ठीक हूॅ आप सुनाइये।"
"मैं तो बहुत ज्यादा ठीक हूॅ भाई साहब।" जगदीश ने हॅस कर कहा___"जब से ये बच्चे और गौरी बहन यहाॅ आए हैं तब से ज़िंदगी खुशहाल लगने लगी है। वर्ना इतने बड़े बॅगले में नौकर चाकर रहने के बाद भी अकेलापन ही महसूस होता था।"
"ऐसा क्यों कहते हैं आप?" अभय सिंह चौंका था___"इसके पहले अकेलापन क्यों महसूस होता था आपको?"
"अरे भाई अब मेरे सिवा मेरा कोई था ही नहीं तो अकेलापन महसूस तो होगा ही।" जगदीश ने कहा___"नसीब और भाग्य बहुत अजीब होते हैं। अच्छा खासा परिवार हुआ करता था मेरा। मगर फिर सब कुछ खत्म हो गया। धन दौलत तो नसीब से बहुत मिली हमें लेकिन उस दौलत को भोगने वालों को नसीब ने छीन लिया हमसे। जी जान से प्यार करने वाली बीवी थी, वो भी हमें छोंड़ कर इस फानी दुनियाॅ को अलविदा कह दिया। एक बेटा और बहू थे तो वो भी चले गए हमें छोंड़ कर। बस तब से अकेले ही थे।
मगर फिर शायद भगवान को हमारे अकेलेपन पर तरस आ गया और उसने हमारे उजड़े हुए गुलशन में फिर से बहार लाने के लिए इन सबको भेज दिया। अब लगता है कि अपना भी कोई है।"
अभय सिंह जगदीश ओबराय की बातें सुन कर हैरान था। उसे याद आया कि विराज ने उससे कहा था कि ये सब अब अपना ही है। तो इसका मतलब वो सही कह रहा था। यानी मेरा भतीजा अब करोड़ों की सम्पत्ति का मालिक है? अभय सिंह को यकीन नहीं हो रहा था मगर हक़ीक़त तो उसके सामने ही थी इस लिए यकीन करना ही पड़ा उसे। वह सोचने लगा कि उसका बड़ा भाई यानी अजय सिंह तो अक्सर यही कहता था कि विराज किसी होटल या ढाबे में कप प्लेट धोता होगा। मगर भला वो भी कैसे ये कल्पना कर सकता था कि विराज आज के समय में कितना बड़ा आदमी बन चुका था। वह चाहे तो चुटकियों में उसे और उसकी पूरी प्रापर्टी को खरीद सकता था।
"ये सब भगवान की अजब लीला ही है भाई साहब।" फिर अभय सिंह ने गहरी साॅस लेकर कहा___"वो जो कुछ भी करता है बहुत सोच समझ कर करता है। किस इंसान कब कहाॅ और किस चीज़ की ज़रूरत होती है वो उसे उस जगह पहुॅचा ही देता है। हम नासमझ होते हैं जो ये समझ बैठते हैं कि भगवान ने हमें दिया ही क्या है?"
"हाॅ ये बात तो है।" जगदीश ने कहा___"और सच पूछो तो भगवान की इस लीला से मैं खुश हूॅ भाई साहब। पहले ज़रूर उससे शिकायतें थी कि उसने मेरा सब कुछ छीन लिया मगर आज कोई शिकायत नहीं है। ये सब मुझे अपना समझते हैं। मुझे वैसे ही चाहते हैं जैसे कोई सगा अपनों को चाहता है। यूॅ तो इस दुनियाॅ में अपने भी अपनों के लिए नहीं होते। मगर कोई अजनबी भी ऐसा मिल जाता है जो अपनों से कम नहीं होता। चार दिन का जीवन है, इसे सबके साथ खुशी खुशी जी लो तो आत्मा तृप्त हो जाती है। क्या लेकर हम इस दुनियाॅ में थे और क्या लेकर जाएॅगे? ये धन दौलत तो सब यहीं रह जाएगी मगर हमारे कर्म ज़रूर हमारे साथ जाएॅगे।"
"आप ठीक कहते हैं भाई साहब।" अभय ने कहा___"आप तो वैसे भी किसी फरिश्ते से कम नहीं हैं वरना कौन ऐसा है जो किसी ग़ैर को अपना सब कुछ दे दे?"
"अगर मैने अपना सब कुछ विराज बेटे को दे दिया है तो उससे मुझे मिला भी तो बहुत कुछ है भाई साहब।" जगदीश ने कहा___"मुझे वो मिला है जिसके लिए मैं वर्षों से तड़प रहा था। मैं किसी अपने के लिए तड़प रहा था, तथा अपनों के बीच रह कर जो खुशी मिलती है मैं उसके लिए तरस रहा था। आज मेरे पास ये सब खुशियाॅ है भाई साहब और ये सब मुझे किसी रिश्वत के चलते नहीं मिला है। बल्कि मेरे नसीब से मिला है। मैं तो विराज को बहुत पहले से अपनी सारी प्रापर्टी का वारिस बनाना चाहता था मगर ये ही मना कर रहा था। एक अच्छे व खुद्दार इंसान का बेटा जो था। किसी की ऐसी मेहरबानी को कबूल कैसे कर सकता था ये? मगर मैं चाहता था कि विराज ही मेरा वारिस बने। क्योंकि इसके चेहरे पर ही मुझे अपने बेटे की झलक दिखती थी।
अगर ये मेरी बात नहीं मानता तो मैं इसके सामने अपनी झोली फैला कर भीख भी माॅग लेता भाई साहब।"
अभय सिंह जगदीश की ये सब बातें सुन कर चकित रह गया। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि दुनियाॅ कोई इंसान ऐसा भी हो सकता है। ख़ैर इन दोनों के बीच ऐसी ही बातें होती रहीं। कुछ समय बाद ही गौरी ने सबको खाने का कहा। सब डायनिंग हाल में आ गए और कुर्सियों में बैठ गए। गौरी ने सबको खाना सर्व किया। सबके खाने के बाद गौरी ने भी खाना खाया और फिर सब अपने अपने कमरे में सोने के लिए चल दिये। रास्ते में चलते समय विराज से गौरी ने पूछा___"तेरा काॅलेज कब से शुरू हो रहा है??"
"कल से माॅ।" विराज ने कहा___"कल सुबह मुझे थोड़ा जल्दी उठा दीजिएगा। ऐसा न हो कि पहले दिन ही मैं लेट हो जाऊॅ।"
"चल ठीक है।" गौरी ने कहा___"मैं तुझे भोर के समय पर ही उठा दूॅगी। अब जा आराम से सो जाना।"
गौरी के कहने पर विराज अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। उधर गौरी भी पलट कर अपने कमरे की तरफ चली गई।
_______________________
वर्तमान अब आगे______
हरिया काका को उन चारों की खातिरदारी करने का कह कर रितू तहखाने से बाहर आकर सीधा अपने कमरे में चली गई थी। थोड़ी ही देर में हरिया काका की बीवी बिंदिया रितू के कमरे में खाना खाने को पूछने आई तो रितू ने मना कर दिया। बिंदिया के जाने के बाद रितू ने दरवाजा बंद किया और बेड पर जाकर लेट गई। काफी देर तक वह इस सबके बारे में सोचती रही। फिर जाने कब उसकी ऑख लग गई।
सुबह उसकी ऑख उसके मोबाइल फोन के बजने पर खुली। उसने अलसाए हुए से मोबाइल की स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नम्बर को देखा तो उसका सारा आलस पल भर में ही दूर हो गया। साथ ही उसके होठों पर एक मुस्कान तैर गई।
"हैलो।" फिर उसने काल रिसीव करते ही कहा।
"................." उधर से कुछ कहा गया।
"वैरी गुड।" रितू ने कहा___"सारी डिटेल मुझे सेन्ड कर दो। एण्ड थैंक्स।"
रितू ने इतना कह कर काल कट कर दी। उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी। वह तुरंत ही बेड से उठ कर बाथरूम की तरफ चली गई। करीब आधे घंटे बाद रितू ड्राइंगरूम में सोफे पर बैठी काॅफी पी रही थी। बिंदिया ने हल्का फुल्का नास्ता बना दिया था उसके लिए। रितू नास्ता और काफी पीकर कर के बाहर निकल गई। लोहे वाले गूट के पास शंकर और हरिया काका बंदूख लिए मिल गए उसे।
"क्या हाल समाचार है काका?" रितू ने हरिया काका की तरफ देख कर कहा___"उन लोगों की खातिरदारी में कोई कमी तो नहीं की न आपने?"
"अइसन होई सकत है का बिटिया?" हरिया काका ने मुस्कुरा कर कहा___"हम ता ऊ ससुरन अइसन पेलेन है कि उन सबकी अम्मा चुद गई है।"
"काका कभी कभी आप बहुत गंदा बोल जाते हैं।" रितू ने बुरा सा मुह बनाया___"आप ये भी नहीं देखते हैं कि मैं आपकी बेटी जैसी हूॅ और आप भी तो मुझे अपनी बेटी जैसी ही मानते हैं न? फिर भला आप कैसे मेरे सामने ऐसे गंदे शब्द बोल सकते हैं?"
"हमका माफ कर दो बिटिया।
" हरिया ने तुरंत ही दोनो हाॅथ जोड़ लिये___"ई ससुरी जबान हमरे काबू न रह पावत है। अउर हमहु सरवा जोश जोश मा बोल ही जात हैं। बस अबकी बारी माफ कर दो बिटिया। अगली बारी से अइसन गलती ना होई। हमार कसम।"
"कोई बात नहीं काका।" रितू ने कहा__"अब बताओ उन लोगों का हाल कैसा है अब?"
"कल रात ता खातिरदारी करे रहे हम उनकी ऊके बाद हम अभी तक ना गए हैं।" हरिया ने कहा___"पर ई ता पक्का है बिटिया कि ऊ ससुरन के हाल बेहाल होईगा होई अब तक।"
"चलिए चल कर देखते हैं एक बार।" रितू ने कहा और पलट वापस अंदर की तरफ जाने लगी। हरिया भी उसके पीछे पीछे चल दिया। थोड़ी देर बाद ही वो दोनो तहखाने का दरवाजा खोल कर अंदर पहुॅचे। अंदर पहुॅचते ही रितू और हरिया की नाॅक में बदबू भरती चली गई।
दोनो ने जल्दी से अपने मुह पर रुमाल लगा ली। अंदर का दृश्य बड़ा ही अजीब था। एक तरफ की दीवार पर चारो लड़के बॅधे हुए बेहोशी की हालत में सिर नीचे झुलाए खुद भी झूल से रहे थे। दूसरी तरफ की दीवार में दो बंदूखधारी थे जो सूरज के फार्महाउस पर गार्ड थे।
"काका इन लोगो ने तो यहाॅ गंध फैला रखी है?" रितू ने कहा___"क्या इतनी ज्यादा खातिरदारी की है आपने इन सबकी?"
"अरे ना बिटिया।" हरिया कह उठा__"इनकी खातिरदारी ता हिसाबै से भई रही।"
"तो फिर ये गंध क्यों है यहाॅ?" रितू ने कहा___"ऐसा लगता है जैसे इन लोगों का टट्टी पेशाब सब छूट गया है।"
"वा ता छुटबै करी बिटिया।" हरिया ने कहा___"खुद सोचौ ई ससुरे कल से ईहाॅ बॅधे हैं। अब जब ई ससुरन का टट्टी पेशाब लागी ता का करिहैं ई लोग? कब तक ई सारे ऊ का दबा के रखिहैं? ई चीज़ ता अइसन है बिटिया जे सरकार भी ना रोक पाइहैं, ई ससुरे ता अभी नवा नवा लौंडा हैं।"
"ओह ये तो बिलकुल सही कहा आपने काका।" रितू ने कहा___"लेकिन इन लोगों की इस गंदगी को भी तो दूर करना पड़ेगा वरना ये सब इसी से मर जाएॅगे और मैं इन्हें इतना जल्दी मरने नहीं दे सकती। इस लिए आप यहाॅ की इस गंदगी को हटाने का तुरंत काम शुरू करो।"
"ठीक है बिटिया।" हरिया ने कहा___"पाईप ता लगा ही है। बस मोटरवा का चालू करै का है। ई ता दुई मिनट मा होई जाई बिटिया।"
"ठीक है काका।" रितू ने कहा___"आप ये सब साफ करवा दीजिए मैं पाॅच मिनट में आती हूॅ।"
रितू ये कह कर बाहर निकल गई। उन लोगों की ये दुर्दशा देख कर उसके मन को बड़ी खुशी मिल रही थी। उसने सोचा कि ऐसे हरामियों के साथ ऐसा ही होना चाहिए। पर अभी तो ये शुरूआत है। कुछ देर बाद ही हरिया काका रितू को बुलाने आया। रितू उसके साथ पुनः तहखाने में पहुॅची। इस बार का दृश्य काफी अलग था। तहखाने में जो गंध फैली हुई थी वो अब नहीं थी। काका ने मोटे पाइप से जो पानी का प्रेसर निकलता था उससे तहखाने का पूरा फर्स और दीवारें साफ कर दिया था। फर्स की दीवारों के चारो तरफ किनारे किनारे बड़े बड़े छेंद बने हुए थे।
उसमें ही पानी के साथ सारी गंदगी को निकाल दिया था काका ने। उसके बाद तहखाने में रूम फ्रशनर कर दिया था ताकि गंध दूर हो जाए या समझ में न आए।
दीवारों पर रस्सी से बॅधे चारो लड़के और वो दोनो गार्ड्स अब होश में आ चुके थे। रितू ये देख कर चौंकी थी कि उन सभी के जिस्मों पर नीचे कमर से एक लॅगोट टाइप का कपड़ा बाॅध दिया था काका ने बाॅकी पूरा जिस्म नंगा था। ऐसा शायद इस लिए था क्यों कि उन सभी के कपड़े गंदे हो चुके थे और बदबू फैला रहे थे।
इस वक्त वो सभी होश में थे। पाइप के पानी से वो सब नहाए हुए थे। मगर कल से न कुछ खाया था न ही कुछ पिया था उन लोगों ने इस लिए उन सबकी हालत खराब थी।
"हमें छोंड़ दो इंस्पेक्टर।" रोहित ने रोते हुए कहा___"हम तुम्हारे पैर पकड़ते हैं। हमें जाने दो यहाॅ से। हम कसम खाते हैं कि कभी भी किसी लड़की के साथ ऐसा वैसा कुछ नहीं करेंगे।"
"हाॅ हाॅ हम कुछ नहीं करेंगे।" अलोक ने बुरी तरह गिड़गिड़ाते हुए कहा___"हमें इस नर्क से निकाल दो इंस्पेक्टर। यहाॅ हमारा दम घुटा जा रहा है। कल से हम यहाॅ वैसे के वैसे ही बॅधे हुए हैं। न हमारे पैरों में जान है ना ही हाॅथों में ताकत। हमसे अब और नहीं खड़ा हुआ जा रहा इंस्पेक्टर। प्लीज हमें छोंड़ दो।"
"अभी तो ये शुरूआत है।" रितू ने कठोर भाव से कहा___"मैं तुम लोगों का वो हाल करूॅगी जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं होगा आज तक। तुम लोगों ने जो कुकर्म किया है उसके लिए कानून तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि तुम लोगों के हरामी बाप बड़ी आसानी से तुम लोगों को कानून की गिरफ्त से निकाल लेते। इस लिए मैंने सोचा कि तुम लोगों को कानूनन सज़ा दिलाने से कोई फायदा नहीं होगा बल्कि तुम लोगों को कानून के बाहर आकर ही सज़ा दी जा सकती है। वही मैने किया है। तुम्हारे बाप दादाओं को पता ही नहीं चलेगा कभी कि उनके बच्चे कहाॅ गए हैं?"
"नहीं नहीं ऐसा मत करो।" किशन रो पड़ा___"हम मानते हैं कि हमने अपराध किया है मगर एक बार माफ़ कर दो। एक बार तो सब कोई माफ़ कर देता है इंस्पेक्टर।"
"अगर तम लोगों ने अपने जीवन में सिर्फ एक ही अपराध किया होता तो ज़रूर तुम लोगों को माफ़ कर देती।" रितू ने कहा___"मगर तुम लोगों ने तो एक के बाद एक संगीन अपराध किये हैं। दूसरों की बहन बेटियों की इज्जत खराब कर उनकी ज़िदगी बरबाद की है तुम लोगों ने। मेरे पास तुम सबका काला चिट्ठा मौजूद है। इतना ही नहीं तुम लोगों के बाप का भी। मेरे पास ऐसे ऐसे सबूत हैं कि तुम लोगों के बापों को मैं सबके सामने नंगा दौड़ा सकती हूॅ।"
रितू की ये बातें सुन कर उन सबकी रूह काॅप गई। उन्हें अपनी स्थित और अपने बापों की स्थित का अंदाज़ा अब हुआ था। उनके बाप तो जानते भी नहीं थे कि उनके बच्चे उनकी ही अश्लील वीडियो बनाए हुए हैं।
खुफिया कैमरे से वीडियो बनाई गई थी और इन सबका मास्टर माइंड सूरज चौधरी था।
"काका इन सबको आज का भोजन दे दो।" रितू ने हरिया से कहा___"मगर भोजन भी वही देना जो हम कुत्तों को देते हैं। छलनी में आटा छालने से जो छलनी में बचता है ना उसी की मोटी रोटिया बनवाना और इन चारों को सिर्फ एक एक सूखी रोटी देना। जबकि इन दोनों गार्ड्स को ठीक ठाक भोजन दे देना। क्योंकि इन लोगों इन हरामियों के जैसा कोई अपराध नहीं किया है। ये तो बस गेहूॅ के साथ घुन की तरह यहाॅ पिसने आ गए हैं। इन्हें छोंड़ा नहीं जा सकता वरना ये दोनो उस चौधरी को यहाॅ की सारी बातें बता देंगे।"
"हम किसी से कुछ नहीं कहेंगे बेटी।" एक गार्ड शालीनता से बोला___"हम इन सबके बारे में सबकुछ जानते हैं। ये लोग सचमुच बहुत ही गंदे लोग हैं। हम तो ग़रीब आदमी हैं। दो पैसों के लिए इनके यहाॅ गार्ड की नौकरी कर रहे थे। ये लोग और इन लोगों के बाप जब भी फार्महाउस आते थे तो उन लोगों के साथ हर बार कोई दूसरी लड़कियाॅ होती थी। रात भर ये लोग अंदर अय्याशियाॅ करते। कुछ लड़कियों को ये लोग जबरदस्ती उठा लाते थे और उनकी इज्जत को तार तार करते थे। ये सब बड़े लोग हैं बेटी। पैसों की गरमी ने इन्हें शैतान बना दिया है।"
"साले हरामजादे हमारा नमक खाता है और हमारे ही बारे में ऐसी बातें करता है?" सूरज गुस्से में चीखा था।
"मेरे हाॅथ बॅधे हैं छोरे।" गार्ड ने कहा___"वरना तुझे बताता कि मुझे हरामजादा कहने का क्या अंजाम होता। नमक खाता था तो मुफ्त का नहीं खाता था समझे। बीस बीस घंटे चौकीदारी करता था तब तेरे बाप का नमक खाता था मैं। बात करता है साला रंडी की औलाद।"
"अपनी जुबान को लगाम दे कुत्ते।" सूरज पूरी शक्ति से चीखा था।
"कुत्ता तो तू है साले गस्ती की औलाद।" गार्ड ने भी ताव खाते हुए बोला___"इसी लिए तेरे लिए ऐसी रोटी बनने वाली है।"
सूरज खून के ऑसू पीकर रह गया। उसकी ऑखों में ज्वाला धधकने लगी थी। रितू उन दोनो की बाते सुन रही थी और सोच भी रही थी कि गार्ड तो बेचारे बेकसूर ही हैं। पर वो उन्हें छोंड़ कर कोई रिश्क नहीं लेना चाहती थी। क्योंकि ये भी हो सकता था कि वो दोनो अच्छा बनने का नाटक कर रहे हों। यानी सूरज ने उन लोगों को सिखाया पढ़ाया हो कि उसके आते ही हमें आपस में कैसी बातें करनी है। ताकि रितू यही समझे कि गार्ड्स बेकसूर हैं और वो उन्हें छोंड़ देने का विचार करे। और अगर वो छोंड़ देगी तो फिर वो यहाॅ से जाकर सीधा चौधरी को सारी बात बता देंगे। उसके बाद चौधरी रितू का हिसाब किताब कर लेता।
"काका, अभी भी इसमें गरमी बाॅकी है " रितू ने कहा___"इस लिए खिला पिला कर ज़रा अच्छे से फिर खातिरदारी करना। भोजन में कुत्ते वाली सिर्फ एक रोटी ही देना इन्हें। इसके बाद कल ही इन्हें खाना देना। अब चलती हूॅ मैं।"
"ठीक बिटिया।
" हरिया खातिरदारी का सुन कर खुश हो गया था।
रितू पलट कर तहखाने के दरवाजे से बाहर निकल गई। उसके जाते ही हरिया ने तहखाने का दरवाजा बंद किया। एक कोने में रखे मोटे डंडे को उठाया और उन चारों की तरफ बढ़ा। हरिया को अपने करीब आते देख उन चारों की रूह काॅप गई।
"का रे मादरचोद।" हरिया ने सूरज की टाॅग में मोटा डंडा घुमा कर जड़ दिया___"बहुतै गरमी चढ़ रखी है न तोही। हम लोगन की गरमी को बहुतै अच्छे से उतारता हूॅ।"
"माफ कर दो काका।" सूरज ने सहसा हरिया से रिश्तेदारी जोड़ते हुए कह उठा___"ग़लती हो गई। अब कुछ नहीं कहूॅगा। प्लीज़ माफ़ कर दो न।"
"माफ़ी ता हम दे दूॅगा बछुवा।" हरिया ने डंडे को सूरज के पिछवाड़े पर हौले हौले सहलाते हुए कहा___"पर एखर कीमत दे का पड़ी। बोल दे सकत है तू कीमत?"
"कैसे कीमत काका?" सूरज ने नासमझने वाले भाव से कहा।
"ऊ का है ना बछुवा।" हरिया ने कहा___"हमका अपने जीवन मा एक बार ता जरूर केहू के गाॅड मारै का मन रहा। जब हमरी तोहरे काकी से शादी हुई ता हम बड़ा खुश हुए। सुहागरात मा हम तोहरे काकी से बोल दिये कि हमका तोर गाॅड मारै का है। पर ऊ ससुरी हमरी ई बात पर बिगड़ गै। फेर ता अइसनै चलत रहा बछुवा अउर हम आज तक केहू केर गाॅड मारै का ना पायन। एसे हम कहत हैं कि कीमत मा तोही आपन गाॅड हमसे मरावै का पड़ी।"
"नहीं नहीं।" सूरज हरिया की ये बात सुन कर अंदर तक काॅप गया।
"देख बछुवा ई ता तोही करै का पड़ी।" हरिया ने कठोरता से कहा__"ई हमरे खुशी का बात है। सरवा आज तक केहू केर गाॅड मारै का ना पायन हम। पर आज ता हम तोर गाॅड मार के रहब बछुवा। अब ई तै सोच ले कि तू ई सब खुशी मा करिहे या रोई रोई के। हीहीहीहीही।"
हरिया ज़ोर ज़ोर से हॅसे जा रहा था। उसकी हॅसी ने तहखाने में बड़ा ही भयानक वातावरण पैदा कर दिया था। उन चारी की अंतरआत्मा तक काॅप गई। सूरज तो हरिया को इस तरह देखने लगा था जैसे वह उसका काल हो।
"हमरे बिटिया केर बात ता तू लोग सुन ही लिये हो ना।" हरिया कह रहा था___"तू सब अब इहैं रहने वाले हो। अउर हम अब तू ससुरन के रोज बारी बारी से गाॅड मारब।"
"ऐसा मत करो काका हम तुम्हारे हाथ जोड़ते हैं प्लीज।" रोहित सहमे हुए से बोला।
"हाॅथ जोड़ै का कौनव फायदा ना होई बछुवा।" हरिया ने कहा___"काहे से के ई हमरे ख्वा....अरे ऊ का कहत हैं...ख्वाहिश...हाॅ ईहैं...हाॅ ता ई हमरे ख्वाहिश का बात है। गाॅड मारै का हमरा बहुतै ख्वाहिश है बछुवा। अब ई बात मा हम कौनव केर बात ना मानब। चल रे पहिले तोरै गाॅड का उद्घाटन हम करब हीहीही।"
सूरज की गाॅड में हरिया ने ज़ोर से मोटा डंडा जड़ दिया। सूरज दर्द के मारे पूरी शक्ति से चीखने लगा था। जबकि हरिया ने सूरज की कमर में बॅधे कपड़े को खोल कर एक तरफ उछाल दिया। सूरज बुरी तरह इधर उधर हो रहा था। मगर दोनो हाथ ऊपर बॅधे थे और दोनो पैर फैलाए हुए चारों के पैरों से बॅधे हुए थे।
"ई का रे रंडी केर दुम।" हरिया सूरज की लुल्ली को देख कर कहा___"ई ता बच्चन जइसन है रे। मादरचोद नामरद है का रे?"
"आहहहहह।" अपनी लुल्ली पर डंडे की हल्की मार पड़ते ही सूरज बिलबिला उठा था।
इधर हरिया ने ऊपर खूॅटी से रस्सी की गाॅठ खोल कर सूरज के ऊपर उठे हुए हाॅथों को नीचे की तरफ कर दिया। सूरज का बाजू बुरी तरह अकड़ गया था। कल से एक ही पोजीशन में बॅधा था वह। इस वक्त वह जन्मजात नंगा था। वह बुरी तरह हिल रहा था और हरिया से अपनी गाॅड न मारने के लिए विनती कर रहा था। मगर हरिया मानने वालों में से नहीं था।
"हमने कहा ना बछुवा।" हरिया ने सूरज की मुंडी पकड़ कर आगे की तरफ झुका दिया, फिर बोला___"हम कौनव बात ना मानब। ई हमरे ख्वाहिश केर बात है। एसे हम तोर गाॅड ता मरबै करब।"
हरिया ने अपनी सफेद धोती की गाॅठ छोरी और धोती को खोल कर ऊपर खूॅटी पर टाॅग दिया। सूरज थर थर काॅप रहा था। उसके हाॅथ आपस में अभी भी बॅधे हुए थे इस लिए वह ज्यादा कुछ कर नहीं सकता था। इस वक्त वह हरिया से ये सब न करने के लिए गिड़गिड़ाए जा रहा था।
"काहे बछुवा।" हरिया ने सूरज की नंगी गाॅड में ज़ोर से एक थप्पड़ लगाया, बोला___"अब काहे गिड़गिड़ाय रहा है। कछू याद है? अइसनै ऊ लड़कियन लोग भी तोहरे सामने गिड़गिड़ाती रही होंगी। मगर तू उन मा से केहू केर बात न माने रहे होई है ना? ता मादरजोद फेर हमसे कइसन या उम्मीद करत है कि हम तोर बात मान जाब रे वैश्या के जने सारे?"
सूरज के बगल से बॅधे बाॅकी तीनों ये सब डरे सहमे से देख रहे थे। उनकी हालत बहुत खराब थी। वो ये सोच सोच कर मरे जा रहे थे कि सूरज के बाद उनके साथ भी यही सब होगा। कभी स्वप्न में भी उन लोगों ने ये नहीं सोचा था कभी ऐसा भी वक्त उनके जीवन में आएगा।
"आआआहहहहह।" सूरज के मुख से दर्द भरी कराह निकल गई। हरिया उसके सामने आकर सूरज के सिर के बाल पकड़ कर उठाया था, बोला___"ले देख मादरचोद कि लौड़ा केही कहत हैं। देख न रंडी के पूत। हम चाहू ता अपने ई लौड़े से तुम सबकी एकै बार मा गाॅड फाड़ दूॅ मगर फाड़ूॅगा नहीं। हम ता एक एक करके अउर तसल्ली से तुम चारोन की गाॅड मारब ससुरे लोग।"
हरिया नीचे से नंगा हो चुका था और इस वक्त अपने मोटे तगड़े लौड़े को सूरज के चेहरे के बेहद पास सहला रहा था। सूरज झुका हुआ था क्योकि हरिया ने एक हाॅ से उसके सिर के बाल पकड़ कर उसे नीचे झुकाया हुआ था।
देखते ही देखते हरिया का लौड़ा अकड़ कर खड़ा हो गया। बाॅकी तीनों आश्चर्य से हरिया के लौड़े की तरफ देखे जा रहे थे। उन लोगों की ये सोच कर नानी मर गई कि यही लौड़ा उन लोगों की भी गाॅड मारेगा। हरिया सूरज के पीछे आ गया। अपने पीछे जाते देख सूरज फिर से बुरी तरह हिलने लगा। वह बार बार हरिया से मिन्नतें करने लगता था।
"चिन्ता ना कर बछुवा।
" हरिया ने सूरज की गाॅड को फैलाते हुए कहा___"बस एकै बार तीनौ लोकन के दर्शन होई हैं ऊखे बाद ता मजा मिली। अउर हाॅ गाॅड का अपने ढीलै रखिहे नाहीं ता ससुरे फाट जाई ता हमरा दोष ना दीहे।"
सूरज बुरी तरह छटपटाए जा रहा था। मगर हट्टे कट्टे हरिया का एक हाॅथ सूरज के सिर पर था जिसे वह सूरज को नीचे झुके रहने के लिए मजबूर किये हुए था। जबकि दूसरे हाॅथ से वह ढेर सारा थूॅक लेकर उसे अपने लौड़े पर लगाया और फिर लौड़े पकड़ कर सूरज की गाॅड में सेट किया।
तहखाने में मौजूद बाॅकी तीनो वो लड़के और वो दोनो गार्ड्स फटी ऑखों से ये दृश्य देखे जा रहे थे। हरिया ने लौड़ा सेट कर गाॅड की तरब दबाव बढ़ाया।
"आआआहहहहह।" सूरज को दर्द होने लगा। उसकी गाॅड बेहद टाइट थी। जबकि हरिया का लौड़ा मोटा तगड़ा था। हर पल के साथ सूरज की हालत हलाल होते बकरे जैसी होती जा रही थी। वह बुरी तरह छटपटा रहा मगर हरिया की मजबूत पकड़ से वह छूट नहीं पा रहा था। बड़ी मुश्किल से हरिया के लौड़े का टोपा सूरज की गाॅड में घुसा। इतने में ही सूरज गला फाड़े चिल्लाने लगा था।
"सबर कर बछुवा।" हरिया ने कहा___"गला फाड़ने से का होई? ऊ ता हिम्मत रखै से होई। अउर ई ता अबे शुरूआतै हुआ है। अबे ता मंजिल बहुत बाॅकी है बछुवा।"
"आआहहहहहह मममममम्मी रेरेएएएएएए।" हरिया ने ज़ोर का झटका दिया। सूरज की गाॅड को चीरता हुआ हरिया का लौड़ा लगभग आधा घुस गया था। सूरज के मुख से बड़ी भयंकर चीख निकली थी। उसकी ऑखों के सामने अॅधेरा छा गया। सूरज बेहोश हो चुका था। उसकी हालत देख कर बाकी सब के होश उड़ गए। सूरज के दोस्त थर थर काॅपने लगे। वो अनायास ही ज़ोर ज़ोर से पागलों की तरह रोने चिल्लाने लगे।
"अबे चुप करा मादरचोदो वरना ई लौड़ा इसकी गाॅड से निकाल के तुम्हरी गाॅड में घुसेड़ दूॅगा हम।" हरिया गुर्राया तो वो डर के मारे एक दम से चुप हो गए। उनके चुप हो जाने के बाद हरिया ने सूरज की गाॅड में थप्पड़ मारते हुए बोला___"का बे मादरचोद। ससुरे इतने से ही टाॅय बोल गया रे। अभी ता हम पूरा लौड़ा डाला भी नहीं हूॅ।"
हरिया सूरज की गाॅड में धक्के लगाना शुरू कर दिया। हर धक्के के साथ वह थोड़ा बहुत लौड़े को सूरज की गाॅड में घुसेड़ता ही रहा था। सूरज बेहोशी की हालत में भी कराह रहा था। हरिया एक बार तेज़े से धक्का लगाया तो एच ज़ोरदार चीख के साथ सूरज होश में आ गया। होश में आते ही वह बुरी तरह रोने बिलखने लगा। रहम की भीख माॅगने लगा वह। मगर हरिया को तो अब जैसे न रुकना था और नाही रुका वह। तहखाने में सूरज का रोना और चिल्लाना ज़ारी रहा।
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,,,
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट........《 37 》
अब तक,,,,,,,,
"सबर कर बछुवा।" हरिया ने कहा___"गला फाड़ने से का होई? ऊ ता हिम्मत रखै से होई। अउर ई ता अबे शुरूआतै हुआ है। अबे ता मंजिल बहुत बाॅकी है बछुवा।
"
"आआहहहहहह मममममम्मी रेरेएएएएएए।" हरिया ने ज़ोर का झटका दिया। सूरज की गाॅड को चीरता हुआ हरिया का लौड़ा लगभग आधा घुस गया था। सूरज के मुख से बड़ी भयंकर चीख निकली थी। उसकी ऑखों के सामने अॅधेरा छा गया। सूरज बेहोश हो चुका था। उसकी हालत देख कर बाकी सब के होश उड़ गए। सूरज के दोस्त थर थर काॅपने लगे। वो अनायास ही ज़ोर ज़ोर से पागलों की तरह रोने चिल्लाने लगे।
"अबे चुप करा मादरचोदो वरना ई लौड़ा इसकी गाॅड से निकाल के तुम्हरी गाॅड में घुसेड़ दूॅगा हम।" हरिया गुर्राया तो वो डर के मारे एक दम से चुप हो गए। उनके चुप हो जाने के बाद हरिया ने सूरज की गाॅड में थप्पड़ मारते हुए बोला___"का बे मादरचोद। ससुरे इतने से ही टाॅय बोल गया रे। अभी ता हम पूरा लौड़ा डाला भी नहीं हूॅ।"
हरिया सूरज की गाॅड में धक्के लगाना शुरू कर दिया। हर धक्के के साथ वह थोड़ा बहुत लौड़े को सूरज की गाॅड में घुसेड़ता ही रहा था। सूरज बेहोशी की हालत में भी कराह रहा था। हरिया एक बार तेज़े से धक्का लगाया तो एच ज़ोरदार चीख के साथ सूरज होश में आ गया। होश में आते ही वह बुरी तरह रोने बिलखने लगा। रहम की भीख माॅगने लगा वह। मगर हरिया को तो अब जैसे न रुकना था और नाही रुका वह। तहखाने में सूरज का रोना और चिल्लाना ज़ारी रहा।
_____________________________
अब आगे,,,,,,,,,
उधर मुम्बई में भी सुुुुबह हुई।
गौरी ने सुबह पाॅच बजे ही विराज को उठा दिया था। सुबह उठ कर उसने थोड़ी बहुत एक्सरसाइज की और फिर बाथरूम में फ्रेश होने के लिए चला गया। फ्रेश होने के बाद वह कमरे में आया तो देखा कि उसकी बहन निधि बेड पर बैठी हुई है।
"अरे तुझे स्कूल नहीं जाना क्या?" मैने तौलिये से अपने सिर के बालों को पोंछते हुए कहा।
"जाना है।" निधि ने गौर से मेरे शरीर को देखते हुए कहा___"मैं तो बस आपको बेस्ट ऑफ लक कहने आई थी।"
"अच्छा तो ये बात है।" मैने मुस्कुरा कर कहा___"मेरी गुड़िया मेरी जान मुझे बेस्ट ऑफ लक कहने रूम में आई है?"
"हाॅ लेकिन अपने तरीके से।" निधि ने मुस्कुरा कर कहा।
"अपने तरीके से?" मैं उसकी बात से नासमझने वाले अंदाज़ से बोला___"किस तरीके की बात कर रही है तू?"
"वो मैं कर के बताऊॅगी भइया।" निधि ने कहा___"बस आपको अपनी दोनो ऑखें बंद करना पड़ेगा। और खबरदार ग़लती से भी अपनी ऑखें मत खोलियेगा। वरना मैं आपसे बात नहीं करूॅगी। हाॅ नहीं तो।"
"अरे ये क्या कह रही है गुड़िया?" मैं उसकी बात से हैरान हुआ___"आख़िर क्या चल रहा है तेरे मन में?"
"कुछ नहीं चल रहा भइया।" निधि एकाएक ही हड़बड़ा गई थी, बोली___"बस आप अपनी ऑखें बंद कीजिए न।"
मैं उसे ग़ौर से देखता रहा। उसके चेहरे पर इस वक्त संसार भर की मासूमियत विद्यमान थी। खूबसूरती में वह बिलकुल मेरी माॅ की कार्बन काॅपी ही थी। हलाॅकि उसका चेहरा और उसका पूरा रंगरूप मेरी माॅ गौरी की तरह ही था।
वो माॅ की हमशक्ल टाइप की थी।
"क्या हुआ भइया?" निधि कह उठी___"क्या सोचने लगे आप? बंद कीजिए न अपनी ऑखें।"
"अच्छा ठीक है बंद करता हूॅ।" मैने कहा__"पर कोई उटपटाॅग हरकत मत करना।"
"मैं ऐसा वैसा कुछ नहीं करूॅगी भइया।" निधि ने कहा___"और अगर कर भी दूॅ तो मेरी भूल समझ कर मुझे माफ़ कर देना। हाॅ नहीं तो।"
मैं उसकी नटखट बातों पर मुस्कुरा उठा और अपनी ऑखें बंद कर ली। कुछ पल बाद ही मुझे अपने होठों पर कोई बहुत ही कोमल चीज़ महसूस हुई। अभी मैं कुछ समझ भी न पाया था कि उस कोमल चीज़ ने मेरे होठों को जोर से दबोच कर दो सेकण्ड तक अपने अंदर रख कर उस पर कुछ किया उसके बाद छोंड़ दिया। मेरे दिमाग़ में विस्फोट सा हुआ। एकाएक ही मेरे दिमाग़ की बत्ती जली। मैने झट से अपनी ऑखें खोल दी। सामने देखा तो निधि भागते हुए कमरे के दरवाजे पर नज़र आई मुझे। दरवाजे के पास पहुॅच कर वह रुकी और फिर पलटी। उसके बाद मुस्कुराते हुए कहा__"बेस्ट ऑफ लक भइया।" इतना कह कर वह दरवाछे के बाहर की तरफ हवा की तरह निकल गई। जबकि मैं बुत बना खड़ा रह गया।
मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि मेरी बहन ने इन कुछ पलों के भीतर मेरे साथ क्या कर दिया था। वह मेरे होठों को बड़ी चतुराई से चूम कर मुझे बेस्ट ऑफ लक कहा और भाग भी गई। मुझे उससे इस सबकी उम्मीद नहीं थी। फिर मुझे ध्यान आया कि वो मुझसे प्यार करती है जिसका उसने इज़हार भी किया था।
मैं काफी देर तक बुत बना खड़ा रहा। मेरी तंद्रा तब टूटी जब माॅ कमरे में आकर बोली___"तू अभी तक तैयार नहीं हुआ काॅलेज जाने के लिए? चल तैयार होकर आ जल्दी। मैने नास्ता तैयार करके लगा दिया है।"
मैं माॅ की आवाज़ सुन कर चौंक पड़ा था। उसके बाद मैंने माॅ से कहा कि आप चलिए मैं आता हूॅ। मेरे दिमाग़ में अभी तक यही चल रहा था कि गुड़िया ने ऐसा क्यों किया? मुझे अपने होठों पर अभी भी उसके नाज़ुक होठों का एहसास हो रहा था। मैने अपने होठों पर जीभ फिराई तो मुझे मीठा सा लगा। उफ्फ ये क्या है? मेरी गुड़िया के मुख और होठों का लार इतना मीठा था। मुझे अपने अंदर बड़ा अजीब सा रोमाॅच होता महसूस हुआ। मेरा रोम रोम गनगना उठा था।
ख़ैर मैं काॅलेज की यूनीफार्म पहन कर कमरे से बाहर आया और फिर नीचे डायनिंग हाल की तरफ बढ़ गया। डायनिंग टेबल पर इस वक्त सब लोग बैठे हुए थे। जगदीश अंकल, अभय चाचा, गुड़िया और माॅ। मैं भी एक कुर्सी खींचकर बैठ गया। मेरी नज़र निधि पर पड़ी तो उसने जल्दी से अपना चेहरा झुका लिया। उसके गोरे गोरे और फूले हुए गाल कश्मीरी सेब की तरह सुर्ख हो गए थे लाज और शर्म की वजह से।
"ये बहुत अच्छा किया राज जो तुमने अपनी पढ़ाई जारी कर दी।" सहसा सामने कुर्सी पर बैठे अभय चाचा ने कहा___"मुझे खुशी है कि इतना कुछ होने के बाद भी तुम अपने रास्ते से नहीं भटके।
मुझे तुम पर फक्र है राज और मेरा आशीर्वाद है कि तुम हमेशा कामयाबी और सफलता के नये और ऊॅची बुलंदियों को प्राप्त करो।"
"शुक्रिया चाचा जी।" मैने कहा___"भले ही चाहे जो हुआ हो लेकिन मैं जानता था कि आपके दिल में हमारे लिए इतनी भी नफ़रत नहीं होगी जितनी कि बड़े पापा और बड़ी माॅ के दिलों में है हमारे लिए।"
"समय बहुत बलवान होता है राज।" अभय चाचा ने कहा___"और बहुत बेरहम भी। वो हमसे वो सब भी करवा लेता है जिसे करने की हम कभी कल्पना भी नहीं करते। पर कोई बात नहीं बेटे, इंसान वही श्रेष्ठ और महान होता है जो हर तरह के कस्टों को पार करके आगे बढ़ता है।"
"राज बेटा मैने तुम्हारे लिए काॅलेज जाने के लिए एक नई और शानदार कार मगवा दी है जो कि बाहर ही खड़ी है।" जगदीश अंकल ने मुस्कुराते हुए कहा___"हम चाहते हैं कि तुम अपने नये सफर की शुरूआत उसी से करो।"
"इसकी क्या ज़रूरत थी अंकल?" मैने कहा___"मैं वहाॅ पर पढ़ने जा रहा हूॅ ना कि किसी को अपनी अमीरी दिखाने। माफ़ करना अंकल लेकिन मैं चाहता हूॅ कि मैं भी उसी तरह कालेज जाऊॅ जैसे सभी आम लड़के जाते हैं। बाॅकि ऑफिस के कामों के लिए मैं ये सब यूज करूॅगा। मुझे खुशी है कि आपने मेरे लिए एक नई कार लाकर दी।"
"ठीक है बेटे जैसी तुम्हारी इच्छा।" जगदीश अंकल ने कहा___"मुझे ये जान कर अच्छा लगा कि तुम ऐसी सोच रखते हो।"
"वैसे राज किस काॅलेज में एडमीशन लिया है तुमने?" अभय चाचा ने कुछ सोचते हुए पूछा।
"..............में चाचा जी।" मैने बताया।
"अरे इस काॅलेज में तो नीलम ने भी एडमीशन लिया हुआ है।" अभय चाचा चौंके थे___"और निश्चय ही तुम्हारी मुलाक़ात उससे होगी ही वहाॅ। वो जब तुम्हें वहाॅ पर देखेगी तो जरूर बड़े भइया को बताएगी कि तुम भी उसी काॅलेज में पढ़ रहे हो जहाॅ पर वो पढ़ रही है। उसके बाद तुम पर ख़तरा भी हो सकता है बेटे। इस लिए ज़रा सम्हल कर रहना।"
"चिन्ता मत कीजिए चाचा जी।" मैने अजीब भाव से कहा___"मैं तो चाहता ही हूॅ कि अब धीरे धीरे बड़े पापा को ये पता लगे कि मैं किस जगह पर हूॅ। उन्होने तो मेरी तलाश में जाने कब से अपने आदमियों को लगाया हुआ है। उनके आदमी आज महीने भर से मेरी खोज में मुम्बई की खाक़ छान रहे हैं।"
"तुम्हें ये सब कैसे पता?" अभय चाचा बुरी तरह चौंके थे।
"मैं उनकी हर गतिविधि पर नज़र रखता हूॅ चाचा जी।" मैने कहा___"आप अभी कुछ नहीं जानते हैं कि मैंने यहाॅ पर बैठे बैठे ही उनकी कैसी कैसी खातिरदारी की है।"
"क्या मतलब?" अभय चाचा के माथे पर बल पड़ता चला गया, बोले___"किस खातिरदारी की बात कर रहे हो तुम?"
"ये सब आपको जगदीश अंकल बता देंगे चाचा जी।" मैने कहा___"फिलहाल तो मैं अभी काॅलेज जा रहा हूॅ। आज मेरा पहला दिन है। इस लिए मुझे आशीर्वाद दीजिए कि मैं अपने इस सफर पर कामयाब होऊॅ।"
"मेरा आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ ही रहेगा राज।" अभय चाचा ने कहा।
उसके बाद हम सबने नास्ता किया और फिर नास्ता करके मैंने अपना बैग लिया। सबसे आशीर्वाद लेकर मैं निधि को लेकर बाहर आ गया।
मैने गैराज से अपनी बाइक निकाली और निधि को पीछे बैठा कर लान से होते हुए मेन गेट से बाहर निकल गया। निधि मेरे साथ इस लिए थी क्योंकि उसे भी स्कूल जाना था। जोकि मेरे काॅलेज के रास्ते पर ही था। निधि मेरे पीछे चुपचाप बैठी हुई थी। वो कुछ बोल नहीं रही थी। ये बड़ी आश्चर्य की बात थी वरना वह चुप रहने वालों में से न थी।
"तो मैडम आज चुप चुप सी क्यों है भई?" मैने बाइक चलाते हुए कहा___"वैसे आज तो मैडम ने ग़जब ही कर दिया है।"
"आप किससे बात कर रहे हैं भइया?" निधि ने कहा।
"किससे का क्या मतलब है मैडम?" मैने कहा___"आप ही से बात कर रहा हूॅ।"
"अच्छा।" निधि ने कहा___"तो मैं मैडम हूॅ?"
"और नहीं तो क्या।" मैने कहा___"मेरी गुड़िया किसी मैडम से कम है क्या?"
"ओहो ऐसा क्या?" निधि एकदम से सरक कर मुझसे चिपक गई, बोली___"लेकिन आपकी टोन बदली हुई क्यों लग रही है मुझे?"
"क्या बताऊॅ गुड़िया?" मैने कहा___"आज सुबह सुबह एक बिल्ली ने मेरे होठों को काट लिया था।"
"क्या?????" निधि चीख पड़ी___"आपने मुझे बिल्ली कहा? अपनी जान को बिल्ली कहा? जाइए नहीं बात करना आपसे। हाॅ नहीं तो।"
"अरे तो तुम क्यों नाराज़ हो रही हो?" मैने कहा___"मैं तो उस बिल्ली की बात कर रहा हूॅ जिसने आज मेरे होठों को काटा था।"
"फाॅर काइण्ड योर इन्फोरमेशन।" निधि ने कहा___"आप जिसे बिल्ली कह रहे हैं वो मैं ही थी। और आपने मुझे बिल्ली कहा। बहुत गंदे हैं आप। हाॅ नहीं तो।"
"ओह माई गाॅड।" मैने कहा___"तो वो तुम थी?"
"ज्यादा ड्रामें मत कीजिए।" निधि एकाएक मुझसे अलग होकर बाइक में पीछे सरक गई, बोली___"मुझे आपसे बात नहीं करनी बस। आपने अपनी जान को बिल्ली कहा है। ये तो मेरी इनसल्ट है, हाॅ नहीं तो।"
"लेकिन मुझे ये सब अच्छा नहीं लगा गुड़िया।" मैने सहसा गंभीर होकर कहा___"तुझे वैसा नहीं करना चाहिए था मेरे साथ। ये ग़लत है।"
मेरी इस बात पर निधि की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न हुई। वो एकदम से चुप थी।
"तू जानती है न कि भाई बहन के बीच ये सब ग़लत होता है।" मैने कहा___"मैने उस दिन भी तुझसे कहा था। फिर आज तूने ऐसा क्यों किया गुड़िया? तुझे पता है अगर ये सब माॅ को पता चल गया तो उन पर क्या गुज़रेगी?"
इस बार भी निधी कुछ न बोली। मैं उसकी चुप्पी देख कर बेचैन व परेशान सा हो गया। मैंने तुरंत ही सड़क के किनारे पर बाइक को रोंक दी और पीछे पलट कर देखा तो चौंक गया। निधि का चेहरा ऑसुओं से तर था। उसकी ऑखें लाल हो गई थी। मैं उसकी इस हालत को देख कर हिल सा गया। वो मेरी बहन थी, मेरी जान थी। उसकी ऑखों में ऑसूॅ किसी सूरत में नहीं देख सकता था मैं। मैं तुरंत बाइक से नीचे उतरा और झपट कर उसे अपने सीने से लगा लिया।
"ये क्या है गुड़िया?" मैने दुखी भाव से कहा___"तू जानती है न कि मैं तेरी ऑखों में ऑसू नहीं देख सकता। फिर क्यों तूने अपनी ऑखों को रुलाया? क्या मुझसे कोई ग़लती हो गई है? बता न गुड़िया।"
"ये ऑसू तो अब मेरी तक़दीर में लिखने वाले हैं भइया।" निधि ने भर्राए गले से कहा__"जब से होश सम्हाला था तब से आप ही को देखा था, आपको ही अपना आदर्श माना था। फिर हमारे साथ वो सब कुछ हो गया। आप हमसे दूर यहाॅ नौकरी करने आ गए। मगर दो दिल तो हमेशा रोते रहे। एक अपने बेटे के लिए तो एक अपने भाई की मोहब्बत के लिए। मैं नहीं जानती भइया कि कब मेरे दिल में आपके लिए उस तरह का प्रेम पैदा हो गया। फिर मैने आपकी वो डायरी पढ़ी। जिसमें आपने अपनी मोहब्बत की दुखभरी दास्तां लिखी थी। विधी की बेवफाई से आप अंदर ही अंदर कितना दुखी थे ये मुझे उस डायरी को पढ़ कर ही पता चला था। उस दिन जब हम दोनो घूमने समंदर गए थे। तब आपने वहाॅ शराब पी और अपनी हालत खराब कर ली थी। आपको मेरे चेहरे में विधी नज़र आई और आपने अपने दिल का सारा गुबार निकाल दिया। मैं आपकी उस दशा को देख कर बहुत दुखी हो गई थी। आप तो शुरू से ही मेरी जान थे। मुझे उस दिन लगा कि आपको सहारे की ज़रूरत है। मैंने जो अब तक अपने दिल में उस प्रेम को छुपाया हुआ था उसे बाहर लाने का फैसला कर लिया। मुझे किसी की परवाह नहीं थी कि लोग मेरे बारे में क्या कहेंगे या क्या सोचेंगे? मुझे तो बस इस बात की फिक्र थी कि मेरे भइया दुखी न रहें। मैं अपकी खुशी के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो गई थी। इसी लिए उस दिन मैने आपसे अपने प्रेम का इज़हार कर दिया था। मुझे पता है कि भाई बहन के बीच ये सब नहीं हो सकता इसके बावजूद मैंने ये अनैतिक कदम उठा लिया। आपने भी तो बाद में मुझसे यही कहा था न कि ठीक है तुझे जो करना है कर। मोहब्बत तो किसी से भी हो सकती है। लेकिन आज फिर आपने कह दिया कि ये सब ग़लत है। अब तो ऐसा हाल हो चुका है कि मेरे दिल से आपके लिए वो चाहत जा ही नहीं सकती। मुझे इस बात पर रोना आया भइया कि आप कभी मेरे नहीं हो सकते। ये देश ये समाज कभी मेरी झोली में आपको जायज बना कर नहीं डाल सकता। तो फिर ये ऑसूॅ तो अब मेरी तक़दीर ही बन गए न भइया। इन ऑसुओं पर आज तक भला किसी का ज़ोर चला है जो मेरा चल जाएगा।"
मैं निधि की बातें सुन कर चकित रह गया था। मुझे उसकी हालत का एहसास था। क्योंकि इश्क़ के अज़ाब तो मुझे पहले से ही हासिल थे। जिनका असर आज भी ऐसा है कि दिल हर पल तड़प उठता है। लेकिन मैं अपनी बहन की मोहब्बत को कैसे स्वीकार कर लेता? मेरी माॅ एक आदर्शवादी और उच्च विचारों वाली है। उसे अगर ये पता चल गया कि उसकी अपनी औलादें ऐसा अनैतिक कर्म कर रही हैं तो वो तो जीते जी मर जाएगी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं किसे चुनूॅ? अपनी बहन की मोहब्बत को या फिर माॅ को?
"सब कुछ समय पर छोड़ दो गुड़िया।
" मैने कहा___"और हर पल यही कोशिश करो कि ये सब तुम्हारे दिल से निकल जाए।"
"नहीं निकलेगा भइया।" निधि ने रोते हुए कहा___"मैने बहुत कोशिश की मगर नहीं निकाल सकी मैं अपने दिल से आपको। ख़ैर जाने दीजिए भइया। आप परेशान न होईये। आज के बाद आपको शिकायत का मौका नहीं दूॅगी।"
मैने निधि को ध्यान से देखा। उसके चेहरे पर दृढ़ता के भाव दिखाई देने लगे थे। जैसे उसने कोई फैंसला कर लिया हो। मैने उसकी ऑखों से ऑसू पोछे और फिर वापस बाइक पर आ गया। बाइक स्टार्ट कर मैं आगे बढ़ गया। सारे रास्ते निधि चुप रही। मुझे भी समझ न आया कि मैं क्या बातें करूॅ उससे। थोड़ी ही देर में उसका स्कूल आ गया। मैने उसे स्कूल के गेट पर उतारा और प्यार से उसके सिर पर हाॅथ फेर कर आगे बढ़ गया। निधि के बारे में सोचते सोचते ही मैं काॅलेज पहुॅच गया।
____________________________
पुलिस हेडक्वार्टर गुनगुन।
लम्बी चौड़ी मेज के उस पार पुलिस कमिश्नर बैठा हुआ था। जिसकी वर्दी पर लगी नेम प्लेट में उसका नाम कुलभूषण घोरपड़े लिखा हुआ था। पचास से पचपन के बीच की ऊम्र का वह एक प्रभावशाली ब्यक्तित्व वाला इंसान था। उसके बाएॅ साइड की एक कुर्सी पर इंस्पेक्टर रितू बैठी हुई थी। बाॅकी पूरा ऑफिस खाली था।
रितू ने कमिश्नर से गुज़ारिश की थी कि वो अपनी बात सिर्फ उनसे ही करेगी। उन दोनो के बीच कोई तीसरा नहीं होना चाहिए। कमिश्नर चूॅकि अच्छी तरह जानता था कि रितू हल्दीपुर के बघेल परिवार की ठाकुर अजय सिंह की बेटी है। इस लिए उसकी इस गुज़ारिश को उसने स्वीकार कर लिया था वरना पुलिस की एक मामूली सी इंस्पेक्टर रैंक की ऑफिसर की इस डिमाण्ड को स्वीकार करना कदाचित कमिश्नर की शान में गुस्ताख़ी करने जैसा होता।
"सो ऑफिसर, अब बताओ कि ऐसी क्या खास बात करनी थी तुम्हें जिसके लिए तुमने हमसे ऐसी गुज़ारिश की थी?" पुलिस कमिश्नर ने कहा___"ये तो हम समझ गए हैं कि मामला यहाॅ के मंत्री और उसके बेटे का है। लेकिन ये समझ नहीं आया कि अचानक से तुम्हारा प्लान कैसे बदल गया?"
"आप तो जानते हैं सर कि हमारा कानून आज के समय में बड़े बड़े लोगों के हाथ की कठपुतली बन कर रह गया है।" रितू ने कहना शुरू किया___"मंत्री के जिस बेटे ने अपने दोस्तों के साथ उस मासूम लड़की के साथ वो घिनौना कुकर्म किया था उसके लिए उसे कानूनन कोई सज़ा मिल ही नहीं पाती। क्योंकि उन सभी लड़कों के बाप इस शहर की नामचीज़ हस्तियाॅ हैं। उनके एक इशारे पर हमें पुलिस के लाॅकअप का ताला खोल कर उन लड़कों को छोंड़ देना पड़ता। हमारे पास भले ही चाहे जितने सबूत व गवाह होते मगर हम उन सबूतों और गवाहों के बाद भी उन्हें कानूनी तौर कोई सज़ा नहीं दिला पाते। उल्टा होता ये कि उन पर हाॅथ डालने वालों के साथ ही कुछ बुरा हो जाता। वो लड़की बग़ैर इंसाफ पाए ही इस दुनियाॅ से अलविदा हो जाती।
आप नहीं जानते सर, उस लड़की को ब्लड कैंसर है। वह बस कुछ ही दिनों की मेहमान है। उन दरिंदों को उस पर ज़रा सी भी दया नहीं आई। आप उस लड़की की कहानी सुनेंगे तो हिल कर रह जाएॅगे सर। इस छोटी सी ऊम्र में उसने कितना बड़ा त्याग किया है इसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। ऐसे कुकर्मियों का एक ही इलाज़ है सर___सज़ा ए मौत। ऐसे लोगों को हज़ार बार ज़िंदा करके हज़ारों बार तड़पा तड़पा कर मारा जाए तब भी कम ही होगा। इस लिए सर मैने उन सबको ऐसी ही सज़ा देने का फैंसला किया है।"
"देखो ऑफिसर भावनाएॅ और जज़्बात रखना बहुत अच्छी बात है।" कमिश्नर ने कहा___"लेकिन हमारे कानून में भावनाओं और जज़्बातों के आधार पर किसी का फैंसला नहीं हुआ करता। बल्कि ठोस सबूतों और गवाहों के आधार पर ही फैंसला होता है। तुम कानून की एक रक्षक हो तुम्हें इस तरह का गैरकानूनी फैसला लेने का कोई हक़ नहीं है। किसे सज़ा देनी है और कैसे देनी है ये फैसला अदालत करेगी। तुमने अपनी मर्ज़ी से ये जो क़दम उठाया है इसके लिए तुम्हें सस्पेण्ड भी किया जा सकता है। इस लिए बेहतर होगा कि तुम ये सब करने का विचार छोंड़ दो।"
"ये सब मैं आपको बताए बग़ैर भी कर सकती थी सर।" रितू ने कहा___"मगर मैने ऐसा किया नहीं। आपको इस बारे में बताना अपना कानूनी फर्ज़ समझा था मैने। वरना उन लड़कों के साथ कब क्या हो जाता ये कभी कोई जान ही नहीं पाता। ये बात आप भी जानते हैं सर कि मंत्री खुद भी ग़ैर कानूनी काम धड़ल्ले के साथ करता है और हमारा पुलिस डिपार्टमेंट उसके खिलाफ कोई कार्यवाही करने की तो बात दूर बल्कि ऐसा सोचता तक नहीं। ऐसा कौन सा अपराध नहीं है सर जिसे वो चौधरी अंजाम नहीं देता? मगर आज तक उस पर कानून ने हाथ नहीं डाला। सिर्फ इस डर से कि कहीं उसका क़हर हमारे डिपार्टमेंट पर न बरस पड़े। वाह सर वाह, क्या कहने हैं इस पुलिस डिपार्टमेंट के। अरे इतना ही डरते हैं उससे तो पुलिस की नौकरी ही न करनी थी सर।"
"सब तुम्हारे जैसा नहीं सोचते हैं ऑफिसर।" कमिश्नर ने कहा___"और अगर सोचते भी हैं तो बहुत जल्द उनकी वो सोच बदल भी जाती है। क्योंकि डिपार्टमेंट में ऐसे कुछ लोग भी होते हैं जो वर्दी तो पुलिस की पहनते हैं मगर नौकरी उस चौधरी के यहाॅ करते हैं। उसकी जी हुज़ूरी करते हैं। क्योंकि इसी में वो अपना भला समझते हैं। हमें सब पता है ऑफिसर लेकिन कुछ कर नहीं सकते। अगर करना भी चाहेंगे तो दूसरे दिन ही हमारे सामने ट्राॅसफर ऑर्डर आ जाएगा। ये सब तो आम बात हो गई है ऑफिसर।"
"कमाल की बात है सर।" रितू ने कहा___"इस तरह में तो कोई काम ही नहीं हो सकता। पुलिस की अकर्मण्ड्यता से नुकसान किसका होगा? उन मासूम लोगों का जो दिन रात अपने बीवी बच्चों के लिए खून पसीना बहाते हैं, इसके बाद भी भर पेट वो अपने परिवार को खाना नहीं खिला पाते।
चरस और अफीम जैसे ज़हर का हर दिन वो इसी तरह शिकार होते रहेंगे। ऐसे ही न जाने कितनी लड़कियों का रेप होता रहेगा। और ये सब कुकर्म करने वाले अपनी हर जीत का जश्न मनाते रहेंगे।"
"कानून ने अपनी ऑखों पर पट्टी बाॅधी हुई है तुम भी ऑखों पर पट्टी बाॅध लो।" कमिश्नर ने कहा___"इसी में इस डिपार्टमेंट का भला है ऑफिसर।"
"हर्गिज़ नहीं सर।" रितू के मुख से शैरनी की भाॅति गुर्राहट निकली। एक झटके से वह कुर्सी से खड़ी हो गई थी, बोली___"मैं इतनी कमज़ोर नहीं हूॅ जो ऐसे गीदड़ों से डर जाऊॅगी। आपको अपनी चिंता है और इस डिपार्टमेंट की तो करते रहिए चिंता। मगर मैं चुप नहीं बैठूॅगी सर। मैं उन हराम के पिल्लों को ऐसी सज़ा दूॅगी की फरिश्तों का भी कलेजा हिल जाएगा।"
"बिहैव योरसेल्फ ऑफिसर।" कमिश्नर ने शख्त भाव से कहा___"तुम कानून को अपने हाथों में नहीं ले सकती।"
"आपने मजबूर कर दिया है सर।" रितू ने आहत भाव से कहा___"बड़ी उम्मीद के साथ आई थी आपके पास। सोचा था कि आप मेरी मदद करेंगे। मगर आप तो.....ख़ैर जाने दीजिए सर। मुझे बस एक सवाल का जवाब चाहिए आपसे। क्या आप नहीं चाहते हैं कि ऐसे लोगों को सज़ा मिले?"
"बिलकुल चाहते हैं ऑफिसर।" कमिश्नर ने कहा___"मगर हमारे चाहने से क्या होता है? हम तो बस मजबूर कर दिये जाते हैं कुछ न करने के लिए।"
"अगर आप सच में चाहते हैं सर।" रितू ने कहा___"तो फिर मेरा साथ दीजिए। आपको करना कुछ नहीं है। बस इतना करना है कि अगर ऊपर से कोई बात आए तो आप यही कहेंगे कि विधी रेप केस पर कोई कार्यवाही नहीं की गई है। सबूत के तौर पर आप उन्हें फाइलें भी दिखा सकते हैं। मैं आपको यकीन दिलाती हूॅ सर कि आप पर और आपके इस डिपार्टमेंट पर किसी भी तरह की कोई बात नहीं आएगी। क्योंकि मेरे पास उस मंत्री के ऐसे ऐसे सबूत हैं कि वो चाह कर भी हमारा कुछ बुरा नहीं कर सकता। आप बस वो करते जाइये जो मैं कहूॅ। फिर आप देखिए कि कैसे मैं शहर से इस गंदगी और इस अपराध का नामो निशान मिटाती हूॅ।"
"कैसे सबूत हैं तुम्हारे पास?" पुलिस कमिश्नर चौंका था।
"बस आप ये समझिए सर कि उस मंत्री की और उस जैसे लोगों की जान अब मेरी मुट्ठी में है।" रितू ने कहा___"वो सब अपने हाथ पैर चलाना तो चाहेंगे मगर चला नहीं पाएॅगे।"
"अगर ऐसी बात है ऑफिसर तो हम यकीनन तुम्हारे साथ हैं।" कमिश्नर ने एकाएक गर्मजोशी से कहा___"तुमने हमें पहले क्यों नहीं बताया कि तुम्हारे पास इन लोगों के खिलाफ़ इतने पुख़्ता सबूत हैं?"
"आप मेरी बात ही कहाॅ सुन रहे थे सर।" रितू ने सहसा मुस्कुरा कर कहा__"बस जाने क्या क्या कहे जा रहे थे।"
"ओह साॅरी ऑफिसर।" कमिश्नर हॅसा__"तो अब बताओ क्या करना है आगे?"
"मैंने तो पहले ही करना शुरू कर दिया था सर।" रितू ने कहा___"बस आपको इस बात की जानकारी देना चाहती थी। अब तो आप बस आराम से यहीं पर बैठ कर न्यूज आने का इंतज़ार कीजिए।
"
"ओके ऐज योर विश।" कमिश्नर ने कंधे उचकाए___"एण्ड हमें बेहद खुशी हुई कि तुम एक ईमानदार और बहादुर ऑफिसर हो। बेस्ट ऑफ लक।"
"थैंक्यू सर।" रितू ने कहा और फिर कमिश्नर को सैल्यूट कर वह ऑफिस से बाहर निकल गई।
बाहर आकर वह अपनी पुलिस जिप्सी में बैठ कर हैडक्वार्टर से बाहर निकल गई। उसके चेहरे पर इस वक्त खुशी और जोश दोनो ही भाव गर्दिश कर रहे थे। सड़क पर उसकी जिप्सी हवा से बातें करते हुए एक मोबाइल स्टोर की दुकान पर रुकी। लेकिन फिर जाने क्या सोच कर उसने फिर से जिप्सी को आगे बढ़ा दिया।
आधे घंटे से कम समय में ही वह एक मकान के सामने आकर रुकी। उसने अपनी पाॅकेट से अपना आईफोन निकाला और उसमें कोई नंबर डायल किया।
"बाहर आओ।" उसने काल कनेक्ट होते ही कहा, और फिर बिना उधर का जवाब सुने काल कट कर दिया। थोड़ी देर बाद ही उसके पास एक आदमी आकर खड़ा हो गया। वो आदमी यही कोई पच्चीस या तीस की उमर के आस पास का रहा होगा।
"जी मैडम कहिए क्या आदेश है?" उस आदमी ने बड़ी शालीनता से कहा।
"एक काम करो अगर यहाॅ पास में कहीं कोई मोबाइल स्टोर हो तो एक मोबाइल फोन खरीद कर ले आओ।" रितू ने जेब से दो हज़ार के पाॅच नोट निकाल कर उसे देते हुए कहा__"और एक नई सिम भी। कोशिश करना कि सिम ऐसे ही मिल जाए और तुरंत एक्टिवेट भी हो जाए। तुम समझ रहे हो न?"
"जी मैं समझ गया मैडम।" आदमी ने सिर हिलाते हुए कहा___"आप फिक्र मत कीजिए। यहीं पास में ही एक मोबाइल स्टोर है। मैं अभी दोनो चीज़ें लेकर आता हूॅ।"
"ठीक है।" रितू ने दो नोट और उसकी तरफ बढ़ाए___"इन्हें भी ले लो। अगर कम पड़ें तो लगा देना नहीं तो खुद रख लेना।"
"ठीक है मैडम।" आदमी ने खुश होकर कहा___"मैं अभी लेकर आता हूॅ। आप यहीं पर इंतज़ार कीजिए।"
"ओके ठीक है।" रितू ने कहा।
वो आदमी हवा की तरह वहाॅ से गायब हो गया। रितू उसे यूॅ तेजी से जाते देख बरबस ही मुस्कुरा पड़ी। सड़क के किनारे जिप्सी को खड़े कर वह जाने किन ख़यालों में खो गई। चौंकी तब जब उस आदमी ने वापस आकर उसे आवाज़ दी।
"ये लीजिए मैडम।" आदमी ने एक छोटा सा थैला पकड़ाते हुए कहा___"इसमें सैमसंग का एक मोबाइल है और एक सिम भी। दुकानदार ने कहा है कि आधे घंटे में सिम चालू हो जाएगी"
"ओह वैरी गुड।" रितू ने कहा___"एण्ड थैक्स। अब जाओ तुम।"
"अच्छा मैडम।" आदमी ने सलाम बजा कर कहा और चला गया।
रितू थैले को अपने बगल से रख कर जिप्सी को यू टर्न दिया और आगे बढ़ गई। अब उसकी जिप्सी का रुख शहर से बाहर की तरफ था।
___________________________
मैं काॅलेज की पार्किंग में अपनी बाइक को खड़ी कर काॅलेज के अंदर की तरफ बढ़ गया। ये मुम्बई का सबसे बड़ा और टाप क्लास का काॅलेज था। मुझे पता था काॅलेजों में रैगिंग होना आम बात है। इस लिए मैं खुद भी इसके लिए तैयार था। काॅलेज के अंदर काफी सारे स्टूडेंट्स थे।
लेकिन मैं ये देख कर थोड़ा हैरान हुआ कि एक जगह काफी भीड़ सी थी।
मैं समझ तो गया कि वो भीड़ किस बात के लिए थी। मुमकिन था कि वहाॅ पर सीनियर लोग किसी जूनियर की रैगिंग ले रहे होंगे। लेकिन हैरानी की बात ये थी कि इतनी भीड़ क्यों थी वहाॅ पर। उत्सुकतावश मैं उसी तरफ बढ़ता चला गया।
थोड़ी ही देर में मैं उस भीड़ के पास पहुॅच गया। लेकिन भीड़ की वजह से समझ नहीं आया कि भीड़ के अंदर क्या चल रहा है? तभी मेरे कानों में ज़ोरदार चीख सुनाई पड़ी। ये किसी लड़की की चीख़ थी। ऐसा लग रहा था जैसे उसके साथ कोई ज़ोर ज़बरदस्ती की जा रही थी। मेरा रोम रोम खड़ा हो गया। किसी कमज़ोर लड़की पर ज़ोर ज़बरदस्ती? मुझसे ये सहा न गया। मैं एकदम से उस भीड़ का हिस्सा बने लोगों को खींच कर दूर हटाने लगा। बड़ी मुश्किल से मैं उन लोगों के बीच से निकलते हुए अंदर की तरफ पहुॅचा। अंदर का दृष्य ऐसा था कि मेरा दिमाग़ खराब हो गया।
अंदर कोई लड़का किसी लड़की के ऊपर चढ़ा हुआ था। नीचे पड़ी लड़की बुरी तरह रोते हुए छटपटा रही थी और चीख रही थी। वो लड़का उस लड़की के कपड़े फाड़ने पर तुला हुआ था। उसके चारो तरफ खड़े कुछ लड़के हॅस रहे थे। मुझे लड़की का चेहरा नज़र नहीं आ रहा था। मगर ये दृष्य देख कर मेरे अंदर गुस्से की आग धधक उठी।
मैने ज़ोर से एक लात उस लड़के के पेट के बगल में मारी। वो उस लड़की से हट कर तथा लहराते हुए भीड़ के पास गिरा। चारो तरफ फैली हुई भीड़ एकदम से छितर बितर हो गई। मैने जिसे लात मारी थी उसके मुख से ज़ोरदार चीख निकल गई थी। मगर वह जल्दी से उठ कर मेरी तरफ पलटा।
"किसकी मौत आई है?" वो लड़का गरजते हुए बोला___"किसकी इतनी हिम्मत हुई कि मुझे मारा? आशू राना पर हाथ उठाया?"
"उस भीड़ की तरफ क्या देख रहा है?" मैने कहा___"ये सब तो नामर्द हैं। नपुंषक लोंग हैं ये। सिर्फ तमाशा देखना जानते हैं। तुझे कुत्ते की तरह मारने वाला मर्द तो इधर खड़ा है।"
"तूने मुझे मारा?" आशू राना ने अजीब भाव से ऑखें नचाते हुए कहा___"तुझे पता है मैं कौन हूॅ? अबे मेरे बारे में जान जाएगा न तो मूत निकल जाएगा तेरा, समझा क्या?"
"चल बता फिर।" मैं उसकी तरफ बढ़ने लगा___"बता कौन है तू? मैं भी तो देखूॅ कि तेरे बारे में जान कर मेरा मूत निकलता है कि नहीं। चल बता जल्दी।"
"ये समझा रे इसे।" आशू राना ने इधर उधर देखते हुए कहा___"इसे समझाओ रे कोई। ये साला आशू राना को नहीं जानता। ओ रहमान समझा बे इसे कि मैं कौन हूॅ? इसे बता कि मेरा बाप कौन है?"
"क्यों तेरे क्या बहुत सारे बाप हैं जो ये बोल रहा है कि तेरा बाप कौन है?" मैं उसके करीब पहुॅच गया था। झपट कर उसकी गर्दन दबोच ली मैने। अपनी गर्दन दबोचे जाने पर वह छटपटाने लगा। मुझ पर अपने दोनो हाॅथों से वार करने लगा।
"ओए खड़े क्या हो सालो।" उसने तिरछी नज़र से अपने साथियों की तरफ देखते हुए कहा___"मारो इसे।
इसने मुझ पर हाथ उठाया है। इसका काम तमाम करना ही पड़ेगा अब।"
चारो तरफ खड़े उसके साथी एक साथ मेरी तरफ दौड़ पड़े। मैंने आशू राना की गर्दन को छोंड़ कर एक पंच उसकी नाॅक पर ठोंक दिया। वह बुरी तरह चीखते हुए जमीन पर गिर गया। इधर चारो तरफ से जैसे ही उसके साथी मेरे पास आए तो मैं एकदम से पोजीशन में आ गया। जैसे ही एक मेरी तरफ बढ़ा मैने घूम कर बैक किक उसके चेहरे पर रसीद कर दी। वह उलट कर धड़ाम से गिरा। दूसरे के हाॅथ में मुझे चाकू नजर आया। उसने चाकू वाला हाॅथ घुमा दिया मुझ पर। मैने बाएॅ हाथ से उसके उस वार को रोंका और दहिने हाथ से एक मुक्का उसकी नाॅक में जड़ दिया। उसके नाक से भल्ल भल्ल करके खून बहने लगा। बुरी तरह चीखते हुए वह भी लहराते हुए गिर गया। मैं तुरंत पलटा और जल्दी से नीचे झुक भी गया। अगर नहीं झुकता तो तीसरे वाले का हाॅकी का डंडा सीधा मेरे सिर पर लगता। मगर मैं ऐन वक्त पर झुक गया था। हाॅकी का वार जैसे ही मेरे सिर के ऊपर से निकल चुका तो मैं सीधा होकर उछलते हुए उसकी पीठ पर एक किक जमा दी। वह मुह के बल जमीन चाटने लगा। फिर तो जैसे वहाॅ पर उन सबकी चीखों का शोर गूॅजने लगा। कुछ ही देर में आशू राना के सभी साथी जमीन पर पड़े बुरी तरह कराह रहे थे। मैं चलते हुए आशू राना के पास गया और झुक कर उसका कालर पकड़ कर उठा लिया।
"अब एक बात मेरी भी सुन तू।" मैने ठंडे स्वर में कहा___"तू चाहे यमराज का भी बेटा होगा न तब भी मैं तुझे ऐसे ही धोऊॅगा। इस लिए आज के बाद किसी लड़की के साथ कुछ बुरा करने की सोचना भी मत। अब दफा हो जा यहाॅ से। आज के लिए इतना काफी है मगर दूसरी बार तू सोच भी नहीं सकता कि मैं तेरा और तेरे इन साथियों का क्या हाल करूॅगा।"
आशू राना के चेहरे पर डर दिखाई दिया मुझे। वो मेरे छोंड़ते ही वहाॅ से भाग लिया। उसके पीछे उसके सभी साथी भी भाग लिए। कुछ दूर जाकर आशू राना रुका और फिर पलट कर बोला___"ये तूने ठीक नहीं किया। इसका अंजाम तो तुझे भुगतना ही पड़ेगा।"
"अबे जा।" मैं दौड़ा उसकी तरफ तो वो सरपट भागा बाहर की तरफ।
उन लोगों के जाने के बाद मैं वापस पलटा। मैने उस लड़की की तरफ देखा। वो दूसरी तरफ सिर झुकाए खड़ी थी। उसका दुपट्टा मेरे सामने कुछ ही दूरी पर जमीन में पड़ा हुआ था। मैं आगे बढ़ कर उसका पीले रंग का दुपट्टा उठाया और उस लड़की की तरफ बढ़ गया।
"ये लीजिए मिस।" मैने पीछे से उसे उसका दुपट्टा देते हुए बोला___"आपका दुपट्टा।"
"जी धन्यवाद आपका।" उसने मेरे हाॅथ से दुपट्टा लिया, और फिर मेरी तरफ पलटते हुए बोली____"अगर आप नहीं आते तो वो न जाने मेरे सा...........।"
उसका वाक्य अधूरा रह गया। मुझ पर नज़र पड़ते ही उसकी ऑखे फैल गई। वह आश्चर्यचकित भाव से मुझे देखने लगी। मेरा भी हाल कुछ वैसा ही था। जैसे ही वह मेरी तरफ पलटी तो मेरी नज़र उसके चेहरे पर पड़ी।
और मैं उसका चेहरा देख कर उछल ही पड़ा था।
"नी..लम???" मेरे मुख से लरजता हुआ स्वर निकला।
"रा......ज।" उसके मुख से अविश्वसनीय भाव से निकला।
"ओह साॅरी।" मैने एकदम से खुद को सम्हालते हुए कहा___"आपका दुपट्टा।"
मैने उसे उसका दुपट्टा पकड़ाया और तुरंत पलट गया। मैं उसके पास रुकना नहीं चाहता था। मैं तेज तेज चलते हुए उस जगह से दूर चला गया। जबकि नीलम बुत बनी वहीं पर खड़ी रह गई।
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,,,,
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट........《 38 》
अब तक,,,,,,,,,
उन लोगों के जाने के बाद मैं वापस पलटा। मैने उस लड़की की तरफ देखा। वो दूसरी तरफ सिर झुकाए खड़ी थी। उसका दुपट्टा मेरे सामने कुछ ही दूरी पर जमीन में पड़ा हुआ था। मैं आगे बढ़ कर उसका पीले रंग का दुपट्टा उठाया और उस लड़की की तरफ बढ़ गया।
"ये लीजिए मिस।" मैने पीछे से उसे उसका दुपट्टा देते हुए बोला___"आपका दुपट्टा।"
"जी धन्यवाद आपका।" उसने मेरे हाॅथ से दुपट्टा लिया, और फिर मेरी तरफ पलटते हुए बोली____"अगर आप नहीं आते तो वो न जाने मेरे सा...........।"
उसका वाक्य अधूरा रह गया। मुझ पर नज़र पड़ते ही उसकी ऑखे फैल गई। वह आश्चर्यचकित भाव से मुझे देखने लगी। मेरा भी हाल कुछ वैसा ही था। जैसे ही वह मेरी तरफ पलटी तो मेरी नज़र उसके चेहरे पर पड़ी। और मैं उसका चेहरा देख कर उछल ही पड़ा था।
"नी..लम???" मेरे मुख से लरजता हुआ स्वर निकला।
"रा......ज।" उसके मुख से अविश्वसनीय भाव से निकला।
"ओह साॅरी।" मैने एकदम से खुद को सम्हालते हुए कहा___"आपका दुपट्टा।"
मैने उसे उसका दुपट्टा पकड़ाया और तुरंत पलट गया। मैं उसके पास रुकना नहीं चाहता था। मैं तेज तेज चलते हुए उस जगह से दूर चला गया। जबकि नीलम बुत बनी वहीं पर खड़ी रह गई।
_____________________________
अब आगे,,,,,,,,,,
उधर रितू अपने फार्महाउस पर पहुॅची। हरिया काका से उसने उन चारों का हाल चाल पूछा और फिर अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। कमरे में पहुॅच कर उसने दरवाजा बंद किया और कमरे में एक तरफ रखी आलमारी की तरफ बढ़ी। आलमारी को खोल कर उसने उस बैग को निकाला जिसे वह चौधरी के फार्महाउस से लेकर आई थी। बैग को बेड पर रख कर उसने उसमें से कई सारी चीज़ें निकाल कर बेड पर रखा।
कुछ फोटोग्राफ्स थे उसमें, कुछ लेटर्स और कई सारी पेनड्राइव्स। रितू ने उठ कर आलमारी से अपना लेपटाॅप निकाला। उसे ऑन किया। कुछ देर बाद जब वह ऑन हो गया दिया तो रितू ने उसमें एक पेनड्राइव लगाया। कुछ ही पल में लेपटाॅप की स्क्रीन पर पेनड्राइव को ओपेन करने का ऑप्शन आया। रितू ने उस पर क्लिक किया। पर भर में ही स्क्रीन पर उसे बहुत सारी फोटोज और वीडियोज दिखने लगी।
फोटोज देख कर रितू का दिमाग़ खराब होने लगा। वो सारी फोटो न्यूड रूप में कई सारी लड़कियों की थी।
रितू उन लड़कियों को पहचानती तो नहीं थी लेकिन फोटो में उन लड़कियों के पोज से उसे पता चल रहा था कि इन लड़कियों की मर्ज़ी से ही ये फोटोज खींचे गए थे। रितू के चेहरे पर उन लड़कियों के प्रति नफ़रत और घ्रणा के भाव उभर आए।
उसके बाद उसने एक वीडियो पर क्लिक किया। क्लिक करते ही वो वीडियो चालू हो गई। इस वीडियो में जो लड़का था वह रोहित था। वो किसी लड़की के साथ सेक्स कर रहा था। लड़की अपनी दोनो टाॅगों को कैंची शक्ल देकर रोहित की कमर पर जकड़ा हुआ था। रितू ने फौरन ही वीडियो को बंद कर दिया और दूसरी वीडियो को ओपेन किया। इस वीडियो में अलोक लड़की की चूॅत चाट रहा था। रितू ने तुरंत ही वीडियो बंद कर दिया। उसके अंदर गुस्सा बढ़ने लगा था।
एक एक करके रितू ने सारे वीडियो देख लिए। वो सारे वीडियो इन चारो लड़कों के ही थे जो अलग अलग लड़कियों के साथ बनाए गए थे। रितू ने लेपटाॅप से पेनड्राइव निकाल कर अलग साइड पर रखा और दूसरा पेनड्राइव लेपटाॅप पर लगा दिया। कुछ ही देर में उसने देखा कि इस पेनड्राइव में भी यही चारो लड़के किसी न किसी लड़की के साथ सेक्स कर रहे थे। रितू ने उस पेनड्राइव को भी अलग रख दिया। इसी तरह रितू एक एक पेनड्राइव को लेपटाॅप पर लगा कर देखती रही। कुछ पेनड्राइव्स में उसने देखा कि इन चारों लड़कों ने लड़कियों को उनकी बेहोशी में उनके सारे कपड़े उतारे और फिर उनके साथ अलग अलग पोजीशन में सेक्स किया था। रितू समझ सकती थी कि इन लड़कियों के साथ इन लोगों ने धोखे से ये सब किया था। ज्यादातर पेनड्राइव्स में इन लड़कों के ही वीडियोज थे।
रितू ने एक और पेनड्राइव लेपटाॅप पर लगाया। इस पेनड्राइव में कई फोल्डर बने हुए थे। जिन पर नाम डाला हुआ था। एक फोल्डर पर लिखा था "डैडी"। रितू ने तुरंत ही इस फोल्डर को ओपेन किया। स्क्रीन पर कई सारे वीडियोज आ गए। एक वीडियो पर क्लिक किया रितू ने। क्लिक करते ही वीडियो चालू हो गई। वीडियो में सूरज का बाप दिवाकर चौधरी किसी लड़की के साथ सेक्स कर रहा था। ये वीडियो सिर्फ एक ही एंगल से लिया गया था। मतलब साफ था कि कहीं पर वीडियो कैमरा छुपाया गया था और दिवाकर चौधरी को इस बात का पता ही नहीं था। वरना वो अपनी ऐसी वीडियो बनाने की सोचता भी नहीं।
रितू ने फौरन ही वो वीडियो काॅपी कर एक अलग से फोल्डर बना कर उसमें डाल दिया। उसके बाद रितू ने एक एक करके सभी वीडियो देखे। सभी वीडियों में दिवाकर चौधरी लड़की के साथ सेक्स कर रहा था। रितू ने दूसरा फोल्डर खोला। उसमें भी वीडियोज थे। रितू समझ गई कि ये उन लोगों के काले कारनामों के वीडियोज हैं जिनका संबंध दिवाकर चौधरी से है।
उन चारो लड़कों बापों के वीडियोज भी इसमें थे। रितू के लिए ये काफी मसाला था दिवाकर चौधरी को काबू में करने के लिए।
उसने उन चारो लड़कों के बापों का एक एक वीडियो अपने लैपटाॅप में बनाए गए उस फोल्डर में डाल लिया।
सारे सामान को वापस बैग में भर कर उसने उस बैग को वापस आलमारी में रख कर आलमारी को लाॅक कर दिया। इसके बाद वह पलटी और एक तरफ रखे उस छोटे से थैले को उठाया जिसमें आज का खरीदा हुआ मोबाइल फोन और सिम था। उसने थैले से फोन कि डिब्बा निकाला और उसे खोलने लगी। मोबाइल निकाल कर उसने मोबाइल के चार्जर को भी निकाला। चार्जर में एक अलग से केबल थी। उसने उस केबल को मोबाइल में लगाया और दूसरा सिरा लैपटाॅप में। तुरंत ही लैपटाॅप की स्क्रीन पर एक ऑप्शन आया। मोबाइल की स्क्रीन पर भी शो हुआ। रितू ने सेटिंग सही की और फिर उन वीडियोज को काॅपी कर मोबाइल के स्टोरेज पर पेस्ट कर दिया। चारो वीडियोज कुछ ही देर में मोबाइल में अपलोड हो गई।
इसके बाद रितू ने केबल निकाल कर वापस मोबाइल के डिब्बे पर रख दिया। एक नज़र उसने मोबाइल की बैटरी पर डाली तो पता चला कि मोबाइल पर अभी 27% बैटरी है। रितू ने फौरन ही चार्जर निकाल कर मोबाइल फोन को चार्जिंग पर लगा दिया। इसके बाद वह कमरे का दरवाजा खोल कर बाहर निकल गई।
बाहर आकर उसने काकी से काका को बुलवाया। थोड़ी ही देर में हरिया काका रितू के पास आ गया।
"का बात है बिटिया?" काका ने कहा__"ऊ बिंदिया ने हमसे कहा कि तुम हमका बुलाई हो।"
"हाॅ काका।" रितू ने कहा___"मैने सोचा कि एक नज़र मैं भी देख लूॅ उन चारो पिल्लों को। वैसे उन सबकी खातिरदारी में कोई कमी तो नहीं की न आपने?"
"अइसन होई सकत है का बिटिया?" हरिया काका ने अपनी बड़ी बड़ी मूॅछों पर ताव देते हुए कहा___"तुम्हरे हर आदेश का हम बहुतै अच्छी तरह से पालन किया हूॅ। ऊ ससुरन केर अइसन खातिरदारी किया हूॅ कि ससुरन केर नानी का नानी केर नानी भी याद आ गई रहे।"
"अगर ऐसी बात है तो बहुत अच्छा किया है आपने।" रितू ने कहा___"उनकी खातिरदारी करने की जिम्मेदारी आपकी है। उनकी खातिरदारी के लिए आप शंकर काका को भी बुला लीजिएगा।"
"अरे ना बिटिया।" हरिया काका ने झट से कहा___"ऊ ससुरे शंकरवा केर कौनव जरूरत ना है। हम खुदै काफी हूॅ ऊ ससुरन केर खातिरदारी करैं केर खातिर। ऊ का है ना बिटिया ऊ शंकरवा से ई काम होई नहीं सकत है। ई ता हम हूॅ जो यतनी अच्छी तरह से खातिरदारी कर सकत हूॅ।"
"ओह ऐसी बात है क्या?" रितू मुस्कुराई।
"अउर नहीं ता का।" काका ने सीना तान कर कहा___"हम ता ई काम मा बहुतै एकसपरट हूॅ बिटिया।"
"काका वो एकसपरट नहीं बल्कि एक्सपर्ट होता है।" रितू ने हॅसते हुए कहा।
"हाॅ हाॅ ऊहै बिटिया।" हरिया काका ने झेंपते हुए कहा___"ऊहै एक्सपरट हूॅ।"
"अच्छा चलिए अब।" रितू ने कहा___"मैं भी तो देखूॅ कि आपने कैसी खातिरदारी की है उन लोगों की?"
"बिलकुल चला बिटिया।
" काका ने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कहा___"ऊ लोगन का देख के तुम्हरे समझ मा जरूर आ जई कि हम खातिरदारी करैं मा केतना एकसपरट हूॅ हाॅ।"
रितू, काका की बात पर मुस्कुराती हुई तहखाने में पहुॅची। तहखाने का नज़ारा पहले की अपेक्षा ज़रा अलग था इस वक्त। उन चारों की हालत बहुत ख़राब थी। उन लोगों से ठीक से खड़े नहीं हुआ जा रहा था। सबसे ज्यादा सूरज चौधरी की हालत खराब थी। वह बिलकुल बेजान सा जान पड़ता था। बाॅकी तीनों उससे कुछ बेहतर थे। उन सभी की गर्दनें नीचे झुकी हुई थी। जबकि उनके सामने वाली दीवार पर बॅधे दोनो गार्ड्स की हालत खराब तो थी पर उन चारो जैसी दयनीय नहीं थी। इसकी वजह ये थी कि हरिया या रितू ने उन पर किसी भी तरह से हाॅथ नहीं उठाया था। वो तो बस बॅधे हुए थे।
"काका एक बात समझ में नहीं आई।" रितू ने उन चारों को ध्यान से देखते हुए कहा__"इन चारों में से सबसे ज्यादा इस मंत्री के हरामी बेटे की हालत खराब क्यों हैं जबकि बाॅकी ये तीनों इससे तो ठीक ठाक ही नज़र आ रहे हैं।"
रितू की ये बात सुन कर हरिया काका बुरी तरह हड़बड़ा गया। उससे तुरंत कुछ कहते न बना। भला वह कैसे बताता रितू को कि उसने सूरज चौधरी की गाॅड मार कर ऐसी बुरी हालत की थी जबकि बाॅकी वो तीनो तो उसे देख देख कर ही अपनी हालत ख़राब कर बैठे थे। हरिया ने उन तीनों की अभी गाॅड नहीं मारी थी। उसने सोचा था कि एक दिन में एक की ही तबीयत से गाॅड मारेगा।
"ऊ का है न बिटिया।" हरिया काका ने झट से कहा___"हम ई सोचत रहे कि ई ससुरन केर एक एक करके खातिरदारी करूॅगा। कल ता हम ई ससुरे की खातिरदारी किया हूॅ अउर आज दुसरे केर नम्बर हाय।"
"ओह तो ये बात है।" रितू ने कहा__"चलो ठीक है जैसे आपको ठीक लगे वैसा खातिरदारी करिये। बस इतना ज़रूर ध्यान दीजिएगा कि इनमें से कोई मर न जाए।"
"चिन्ता ना करा बिटिया।" काका ने कहा__"ई ससुरे बिना हमरी इजाजत के मर नाहीं सकत। जब तक हम इन सब केर पेल न लूॅगा तब तक ई कउनव ससुरे मर नाहीं सकत हैं।"
"क्या मतलब?" रितू को समझ न आया।
"अरे हम ई कह रहा हूॅ बिटिया कि जब तक हम ई ससुरन केर अच्छे से खातिरदारी न कर लूगाॅ।" काका ने बात को सम्हालते हुए कहा___"तब तक ई ससुरे कउनव नाहीं मर सकत। काहे से के ई हमरी ख्वाईश केर बात है हाॅ।"
"ख्वाहिश के बात?" रितू चौंकी___"इसमें आपकी कौन सी ख्वाहिश की बात है काका?"
"अरे हमरा मतबल है बिटिया कि खातिरदारी करैं केर ख्वाईश वाली बात।" काका मन ही मन खुद पर गुस्साते हुए और खिसियाते हुए बोला___"ई ता तुमको भी पता है बिटिया कि हमका केहू केर खातिरदारी करैं का केतना शौक है। उहै बात हम करथैं।"
तहखाने में इन लोगों की आवाज़ गूॅजते ही उन चारों को होश आया। दरअसल वो उस हालत में ही ऊॅघ रहे थे। इन लोगों की आवाज़ काॅनों में टकराने से उन लोगों को होश सा आया था।
उन चारों ने सिर उठा कर रितू और काका की तरफ देखा। काका को देख कर वो चारो बुरी तरह घबरा गए। लेकिन जैसे ही उनकी नज़र रितू पर पड़ी तो उनमें उम्मीद की कोई आसा नज़र आई।
"इ इंस्पेक्टर इंस्पेक्टर।" अलोक ने मरी मरी सी आवाज़ में चिल्लाते हुए कहा___"हमें यहाॅ से निकालो प्लीज़। हमें छोंड़ दो इंस्पेक्टर, हमे यहाॅ जाने दो वरना ये आदमी हमारी जान ले लेगा।"
"हाॅ हाॅ इंस्पेक्टर हमे जल्दी से यहाॅ से निकालो। ये आदमी बहुत खतरनाॅक है।" रोहित मेहरा गिड़गिड़ा उठा___"इसने सूरज की बहुत बुरी हालत कर दी है। प्लीज़ इंस्पेक्टर हमें इस आदमी से बचा लो। हम तुम्हारे आगे हाॅथ जोड़ते हैं। तुम्हारे पैर पड़ते हैं। हमें छोड़ दो प्लीज़।"
"अबे चुप।" हरिया काका इस तरह उन चारों की तरफ देख कर गरजा था जैसे कोई शेर दहाड़ा हो___"हम कहता हूॅ चुप कर ससुरे वरना हमका ता जान गए हो न। ससुरे टेंटुआ दबा दूगा हम तुम सबकेर।"
हरिया की दहाड़ का तुरंत असर हुआ। उन चारों की बोलती इस तरह बंद हो गई जैसे बिजली के स्विच से बटन बंद कर देने पर बजते हुए टेपरिकार्डर का बजना बंद हो जाता है। मगर वो चुप ज़रूर हो गए थे मगर उन सबकी ऑखों में करुण याचना और विनती करने जैसे भाव स्पष्टरूप से दिख रहे थे।
"तुम लोगों के लिए अब कोई रहम नहीं हो सकता समझे?" रितू ने कठोरता से कहा___"तुम लोगों ने जो पाप किया है और जो भी अपराध किया उसके लिए तुम सबको अब यहीं पल पल मरना है।"
"हमें मारना ही है तो एक ही बार में हमारी जान ले लो इंस्पेक्टर।" निखिल ने कहा__"पर इस आदमी के हवाले मत करो हमे। ये आदमी बहुत बेरहम है। इसने सूरज के साथ बहुत बुरा किया है।"
"चिन्ता मत करो।" रितू ने कहा___"अभी इससे भी बुरा होगा तुम सबके साथ। दूसरों की बहन बेटियों की इज्ज़त लूटने का बहुत शौक है न तुम लोगों को तो अब खुद भी भुगतो। तुम सबका वो हाल होगा जिसकी कभी किसी ने कल्पना भी न की होगी।"
"ई लोगन का का करना है बिटिया?" काका ने उन दो गार्डों की तरफ देखते हुए कहा__"हमका लागत है ई ससुरे फालतू मा ईहाॅ कस्ट उठाय रहे हैं।"
"इन दोनो को छोंड़ नहीं सकते हैं।" रितू ने कहा___"क्योंकि ये दोनो हमारा काम खराब कर देंगे। इस लिए इन लोगों को यहीं पर रहने दो। बस इन पर हाॅथ नहीं उठाना। इन्होने कोई अपराध नहीं किया है।"
"हम किसी से कुछ नहीं कहेंगे बेटी।" एक गार्ड ने कहा___"हम अपने बाल बच्चों की कसम खाकर कहते हैं कि हम किसी से भी आपके और इन लोगों के बारे में कुछ नहीं बताएॅगे। हम इस शहर से ही बहुत दूर चले जाएॅगे। ताकि इन लोगों के बाप हमें ढूॅढ़ ही न पाएॅ।"
"हम आप दोनो पर कैसे यकीन करें?" रितू ने कहा___"आप खुद सोचिए कि अगर आप हमारी जगह होते तो क्या करते?"
"हम सब समझते हैं बिटिया।" दूसरे गार्ड ने कहा___"मगर यकीन तो करना ही पड़ेगा न बिटिया।
क्योंकि हम अगर चाहें भी तो यकीन नहीं दिला सकते। हमारे पास कोई सबूत भी नहीं है जिसकी वजह से हम आपको यकीन दिला सकें। पर आपको सोचना चाहिए बेटी कि कोई बाप अपने बाल बच्चों की झूॅठी क़सम नहीं खाया करता। अधर्मी से अधर्मी आदमी भी अपनी औलाद की झूठी कसम नहीं खाता। हम तो गरीब आदमी है बेटी। दो पैसे के लिए इनके यहाॅ काम करते थे। मंत्री ने हमारे हाॅथ में बंदूखें पकड़ा दी। हम तो उन बंदूखों को चलाना भी नहीं जानते थे।"
दोनो गार्डों की बातें सुन कर रितू और हरिया सोच में पड़ गए। वो दोनो ही इन्हें सच्चे लग रहे थे। उनकी बातों में सच्चाई की झलक थी। मगर हालात ऐसे थे कि उन्हें छोंड़ना भी नीति के खिलाफ़ था। मगर फिर भी रितू ने ये सोच कर उनको छोंड़ देने का फैसला लिया कि जिनसे ये लोग बताएॅगे वो लोग तो खुद ही बहुत जल्द इसी तहखाने में आने वाले हैं।
ठीक है।" रितू ने कहा___"हम तुम दोनो को छोंड़ रहे हैं। सिर्फ इस लिए कि तुम दोनों ने अपने बच्चों की कसम खा कर कहा हैं तुम लोग यहाॅ के बारे में या इन चारों के बारे में किसी से कुछ नहीं कहोगे।"
"ओह धन्यवाद बेटी।" गार्ड ने खुश होते हुए कहा___"हम सच कह रहे हैं हम किसी से कुछ नहीं कहेंगे। हम आज ही अपने गाव अपने प्रदेश चले जाएॅगे। काम ही तो करना है कहीं भी कर लेंगे।"
"काका इन दोनो को छोंड दो।" रितू ने हरिया से कहा___"और यहाॅ से इन्हें ले जाकर शंकर काका के पास ले जाओ। काका से कहना कि इन्हें नहला धुला कर तथा अच्छे से खाना खिलाकर रेलवे स्टेशन ले जाएॅ और इनके राज्य की तरफ जाने वाली ट्रेन में बैठा आएॅ।"
"ठीक है बिटिया।" हरिया ने कहा___"हम अभी इनका छोंड़ देता हूॅ।" कहने के साथ ही हरिया आगे बढ़ा और फिर कुछ ही देर में उन दोनो को रस्सियों के बंधन से मुक्त कर दिया। उन दोनो के हाॅथ अकड़ से गए थे। नीचे लाने में थोड़ी तक़लीफ़ हुई।
"बेटी एक चीज़ की इजाज़त चाहते हम।" एक गार्ड ने रितू से कहा था।
"कहो क्या चाहते हो?" रितू ने कहा।
"इन चारों को एक एक थप्पड़ लगाना चाहते हैं हम।" उस गार्ड के लहजे में एकाएक ही आक्रोश दिखा___"ये अधर्मी व दुराचारी लोग हैं। इन लोगों की वजह से सच में कितनी ही मासूम लड़कियों की जिदगी बरबाद हो गई।"
रितू ने उन्हें इजाज़त दे दी। इजाज़त मिलते ही दोनो उन चारों की तरफ बढ़े और फिर खींच कर एक थप्पड़ उन चारों के गालों पर रसीद कर दिया। चारों के हलक से चीखें निकल गई। ऑखों से पानी छलक पड़ा।
"धन्यवाद बेटी।" दूसरे गार्ड ने कहा__"इन लोगों के साथ बदतर से बदतर सुलूक करना। हरिया भाई, आप बिलकुल ठीक कर रहे हैं।"
इसके बाद हरिया उन दोनो को लेकर तहखाने से बाहर निकल गया। रितू खुद भी तहखाने से बाहर आ गई थी। तहखाने का गेट बंद कर वो अपने कमरे की तरफ बढ़ गई।
______________________________
नीलम को उसका दुपट्टा पकड़ा कर मैं एक झटके से पलट कर कालेज की कंटीन की तरफ बढ़ता चला गया था। इस वक्त मेरे मन में तूफान चालू था। मैं सोच भी नहीं सकता था कि आज कालेज में नीलम से मेरी इस तरह से मुलाक़ात होगी। नीलम को देख कर मेरी ऑखों के सामने फिर से पिछली ज़िंदगी की ढेर सारी बातें किसी चलचित्र की मानिन्द दिखती चली गई थी। जिनमें प्यार था, घ्रणा थी, धोखा था। मेरा दिलो दिमाग़ एकदम से किसी भवॅर में फसता हुआ महसूस हुआ मुझे।
कंटीन में पहुॅच कर मैं एक कुर्सी पर चुपचाप बैठ गया और अपनी ऑखें बंद कर ली। मुझे अपने अंदर बहुत बेचैनी महसूस हो रही थी। मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। मेरा दिल रह रह कर दुखी होता जा रहा था। मेरी ऑखों में ऑसुओं का सैलाब सा उमड़ता हुआ लगा मुझे। मैने अपने अंदर के जज़्बात रूपी तूफान को बड़ी मुश्किल से रोंका हुआ था। मैं नहीं जानता कि मेरे वहाॅ से चले आने के बाद नीलम पर क्या प्रतिक्रिया हुई।
मुझे नहीं पता कि मैं उस हालत में कंटीन पर कितनी देर तक बैठा रहा। होश तब आया जब किसी ने पीछे से मेरी पीठ पर ज़बरदस्त तरीके से वार किया। उस वार से मैं कुर्सी समेत जमीन पर मुह के बल पछाड़ गया। अभी मैं उठ भी न पाया था कि मेरे पेट पर किसी के जूतों की ज़ोरदार ठोकर लगी। मैं उछलते हुए दूर जाकर गिरा।
मगर गिरते ही उछल कर खड़ा हो गया मैं। मेरी नज़र मेरे सामने से आते एक हट्टे कट्टे आदमी पर पड़ी। उसकी ब्वाडी किसी भी मामले में किसी रेसलर से कम न थी। मुझे समझ न आया कि ये कौन है, कहाॅ से आया है और मुझ पर इस तरह अटैक क्यों किये जा रहा है।
"हीरो बनने का बहुत शौक है न तुझे?" उस आदमी ने अजीब भाव से कहा___"साले मेरे छोटे भाई पर हाॅथ उठाया तूने। तुझे इसका अंजाम भुगतना ही पड़ेगा। ऐसी ऐसी जगह से तेरी हड्डियाॅ तोड़ूॅगा कि दुनियाॅ का कोई डाॅक्टर तेरी हड्डियों को जोड़ नहीं पाएगा।"
"ओह तो तुम उस हराम के पिल्ले के बड़े भाई हो।" मैने कहा___"और मुझसे अपने छोटे भाई का बदला लेने आए हो। अच्छी बात है, लेना भी चाहिए। मगर, मेरी एक फरमाइश है भाई।"
"क्या बक रहा है तू?" वो आदमी शख्ती से गुर्राया___"कैसी फरमाइश?"
"मेरी फरमाइश ये है कि एक एक करके आने का कोई मतलब नहीं है।" मैने कहा__"ऐसे में सिर्फ वक्त की बर्बादी होगी। इस लिए एक काम करो। तुम्हारे पास जितने भी आदमी हों उन सबको यहीं पर बुला लो। उसके बाद मुकाबला करें तो थोड़ा मज़ा भी आए।"
"साले बहुत बोलता है तू।" वो आदमी मेरी तरफ बढ़ते हुए बोला___"तेरे लिए मैं ही काफी हूॅ। अभी तेरी हड्डियों का चूरमा बनाता हूॅ रुक।"
वो मेरे पास आते ही मुझ पर अपनी बलिस्ट भुजा का वार कर दिया। मैं तो पहले से ही चौकन्ना हो गया था और जानता भी था कि अगर इसका एक वार भी मुझे लग गया तो मेरी हालत खराब हो जानी थी।
ख़ैर, जैसे ही उसने तेजी से अपना दाहिना हाथ घुमाया, मैं फौरन ही नीचे झुक गया। उसका हाथ मेरे ऊपर से निकल गया। उसके सम्हलने से पहले ही मैने उछल कर एक फ्लाइंग किक उसकी कनपटी पर जड़ दी। वो धड़ाम से जमीन पर गिरा। मुझे हैरानी हुई मगर मुझे उसके गिरने का कारण समझ आ गया। गुस्से में यही होता है। मुझे मारने के लिए जब उसने गुस्से से अपना हाथ घुमाया था तो मैं झुक गया था। उसका हाथ जैसे ही मेरे सिर से निकला वैसे ही उछल कर मैने ज़ोरदार फ्लाइंग किक उसकी कनपटी पर जड़ी थी। वो सम्हल नहीं पाया था। अपने ही प्रहार के वेग में वह मेरे प्रहार के लगते ही धड़ाम से गिरा था।
उसके गिरते ही मैंने उछल कर उसके ऊपर जंप मारी मगर वह पलट गया। जैसे ही मेरे दोनो पैर जमीन पर आए उसकी एक टाॅग घूम गई और मेरी एक टाॅग पर लगी। नतीजा ये हुआ कि मैं पिछवाड़े के बल गिर गया मगर पल भर में ही उछल कर खड़ा भी हो गया। और सच कहूॅ तो ये मेरा भाग्य ही अच्छा था कि मैं उछल कर खड़ा हो गया था। क्योंकि जैसे ही मैं गिरा था वैसे ही उसने तेज़ी अपनी दाहिनी कोहनी का वार मेरी छाती की तरफ किया था। मगर मेरे उछल कर खड़े हो जाने पर उसका वो वार जमीन पर तेजी से लगा। कोहनी का तीब्र वार जब पक्की ज़मीन से टकराया तो उसके हलक से चीख निकल गई। अपनी कोहनी को दूसरे हाथ से जल्दी जल्दी सहलाने लगा था वह। ऐसा अवसर छोंड़ना निहायत ही बेवकूफी थी। मैने अपनी दाहिनी टाॅग पूरी शक्ति से घुमा दी। जो कि उसकी कनपटी पर लगी। वो दूसरी कनपटी के बल ज़मीर पर गिर गया। उसका सिर ज़ोर से ज़मीन से टकराया था। उसके मुख से घुटी घुटी सी चीख़ निकल गई। निश्चित ही उसकी ऑखों के सामने कुछ पल के लिए अॅधेरा छा गया होगा।
अब मैने रुकना मुनासिब न समझा। मैं एकदम से पिल पड़ा उस पर। लात घूॅसों से उसकी जमकर ठोकाई की मैने। वो बचने के लिए इधर उधर हाॅथ पैर मार रहा था। जबकि मैं बिजली की स्पीड से उस पर वार किये जा रहा था। अचानक ही उसके हाथ में मेरी टाॅग आ गई। उसने मेरी उस टाॅग को पकड़ कर पूरी शक्ति से उछाल दिया। मैं हवा में लहराते हुए एक टेबल पर गिरा। मेरी पीठ पर टेबल का किनारा बड़ी तेज़ी से लगा। मैं चाह कर भी उस दर्द से निकलने वाली चीख को रोंक न सका। तभी मेरी नज़र सामने पड़ी और मैं पलक झपकते ही दर्द को बरदास्त करके टेबल से हट गया। नतीजा ये हुआ कि मेरे हटते ही टेबल पर कुर्सी का तेज़ प्रहार पड़ा और टेबल व कुर्सी दोनो ही टूटती चली गई।
इधर प्रहार करने के बाद वो आदमी सम्हल भी न पाया था कि एक कुर्सी उठा कर मैने बड़ी तेज़ी से उसके सिर पर वार कर दिया। वार ज़बरदस्त था। हाॅथ में टूटी हुई कुर्सी लिए वह सामने टूटी हुई ही टेबल पर मुह के बल गिर गया। सिर से भल्ल भल्ल करके खून बहने लगा था उसके। मुझे समझते देर न लगी कि उसका सिर फट गया है। वह बुरी तरह चीखा था।
कंटीन में उसकी चीख गूॅज गई थी। लेकिन मैं रुका नहीं। मैंने वही कुर्सी एक बार फिर से अपने सिर से ऊपर तक उठा कर उस पर पटक दी। इस बार उसकी पीठ पर कुर्सी लगी थी। लकड़ी की कुर्सी थी वो। उसके दो पाए चटाक से टूट गए। वो आदमी धड़ाम से वहीं पर पसर गया।
अभी मैं उस पर फिर से वार करने ही वाला था कि मैंने देखा कि वो आदमी एकदम से सिथिल पड़ गया था। मैने अपने हाॅथ में ली हुई कुर्सी फेंक दी। झपट कर मैं उसके पर पहुॅचा। वो बुरी तरह खून में नहाये जा रहा था। उसके मुख से कराहटें निकल रही थी। मुझे लगा साला कहीं मर ही न जाए। वरना पंगा हो जाएगा।
मैने देखा उसकी ऑखें बंद होती जा रही थी। मैं ये देख कर बुरी तरह घबरा गया। इधर उधर देखा तो चौंक गया। पूरी कंटीन में लड़के लड़कियों की भीड़ जमा थी। सब लोग फटी फटी ऑखों से देखे जा रहे थे।
"भाईऽऽऽ।" तभी उस भीड़ से आशू राना चीखते हुए आया, बुरी तरह रोने लगा था वह___"ये क्या हो गया भाई तुम्हें? उठो भाई, मेरी तरफ देखो ना भाई।"
"देखो इस तरह रोने से कुछ नहीं होगा समझे।" मैने कहा___"इसे जल्दी से हास्पिटल ले जाना पड़ेगा वरना ये मर जाएगा।"
"तुमने मारा है मेरे भाई को तुमने।" आशू राना ने बिफरे हुए लहजे में कहा___"अगर मेरे भाई को कुछ भी हुआ तो आग लगा दूॅगा मैं इस पूरे काॅलेज में।"
"देखो ये सब बातें तुम बाद में भी कर लेना भाई।" मैने उसके भाई की हालत को देखते हुए कहा___"पहले एम्बूलेंस को बुलाओ।"
"एम्बूलेंस की ज़रूरत नहीं है।" आशू राना ने रोते हुए कहा___"मेरा भाई अपनी गाड़ी से आया था। बाहर खड़ी है।"
"ओह ठीक है फिर।" मैने कहा___"इसे गाड़ी तक ले चलने में मेरी मदद करो। ये बहुत भारी है मैं अकेले इसे कैसे ले जाऊॅगा?"
मेरे कहने पर आशू राना ने अपने भाई को एक तरफ से पकड़ा, दूसरी तरफ से मैंने उसे पकड़ा। काफी मेहनत के बाद आखिर मैं और आशू राना उसके भाई को गाड़ी तक ले आकर उसे कार की पिछली सीट पर लेटा दिया।
"कार की चाभी दो मुझे।" मैने आशू राना से कहा___"तुम अपने भाई को लेकर पीछे बैठ जाओ। मैं कार को जल्दी से हास्पिटल ले चलता हूॅ।"
"पहले तो मेरे भाई को मार कर इस हालत में पहुॅचा दिया और अब उसे हास्पिटल भी ले जा रहे हो।" आशू राना ने गुस्से मे कहा__"ये बहुत अच्छा कर रहे हो तुम, है न? मगर याद रखना कि इसका हिसाब तुम्हें देना होगा।"
"हाॅ ठीक है यार ले लेना हिसाब।" मैने उसके हाथ से चाभी खींचते हुए कहा___"पहले जो ज़रूरी है वो तो करने दो।"
मैं कार की ड्राइविंग सीट पर बैठ कर कार के इग्नीशन में चाभी लगाया और घुमाकर उसे स्टार्ट किया। मैने देखा कि काॅलेज के काफी सारे लड़के लड़कियाॅ बाहर आ गए थे। उनमें एक चेहरा नीलम का भी था। वह मुझे देखकर हैरान थी। मैने उससे नज़र हटाई और कार को एक झटके से आगे बढ़ा दिया।
ऑधी तूफान बनी कार बहुत जल्द हास्पिटल के सामने आकर खड़ी हो गई।
मैं झट से गेट खोल कर बाहर आया। पिछला गेट खोल कर मैने आशू राना को बाहर आने को कहा। मैने नज़र घुमा कर देखा तो दो लोग एक खाली स्ट्रेचर को लिए जा रहे थे। मैंने झट से उनको आवाज़ दी। वो मुड़ कर मेरी तरफ देखने लगे।
"अरे जल्दी स्ट्रेचर ले आओ।" मैने चिल्लाते हुए कहा___"इट्स अर्जेन्ट।"
मेरी बात सुनकर वो तुरंत ही हमारी तरफ दौड़ते हुए आए। हम चारों ने आशू राना के भाई को सीट से निकाल कर स्ट्रेचर पर लिटाया। हास्पिटल वाले आदमी उसे उठा कर ले जाने लगे। मैं और आशू राना भी उनके पीछे हो लिए।
कुछ ही देर में वो लोग आशू के भाई को ओटी में ले गए। इधर आशू राना ऑखों में ऑसू लिए हास्पिटल की गैलरी में इधर से उधर बेचैनी और परेशानी में टहलने लगा।
"उम्मीद है कि बहुत जल्द तुम्हारा भाई पहले के जैसा हो जाएगा।" मैने आशू राना की तरफ देख कर कहा था।
"बात मत करो तुम मुझसे।" आशू राना अजीब भाव से गुर्राया___"मेरे भाई की इस हालत के तुम ही जिम्मेदार हो।"
"देख भाई, ये जो कुछ भी हुआ है न उसका जिम्मेदार सिर्फ तू है समझा?" मैने भी शख्त भाव से कहा___"तूने कालेज में उस लड़की की इज्ज़त पर हाथ डाला। इस लिए मैने उस लड़की की इज्ज़त बचाने के लिए तुझ पर हाथ उठाया। और तूने क्या किया? तू गया तो अपने बड़े भाई को बुला लाया अपनी हार और अपनी मार का बदला लेने के लिए। इस लिए ये तो होना ही था। हम दोनो में से किसी एक के साथ तो ये होना ही था। वक्त और हालात की बात है। मेरा दाॅव चल गया और मैने तेरे भाई की ये हालत बना दी। वरना कोई नहीं सोच सकता था कि तेरे उस मुस्टंडे भाई से मैं बचूॅगा।"
अभी आशू राना कुछ बोलने ही वाला था कि सहसा हमारे पास डाॅक्टर आ गया।
"देखिये सिर पर गहरी चोंट लगी है।" डाक्टर कह रहा था___"सिर फट गया है जिसकी वजह से खून काफी मात्रा में निकल गया है। हमने ब्लड टेस्ट किया तो उनके ग्रुप का ब्लड हमारे हास्पिटल में इस वक्त अवायलेवल नहीं है। जबकि उनको बल्ड चढ़ाना बहुत ज़रूरी है। वरना उनकी जान भी जा सकती है।"
"डाक्टर आप मेरा खून ले लीजिए।" आशू राना ने कहा___"मगर मेरे भाई को बचा लीजिए प्लीज़।"
"ठीक है आइये।" डाक्टर ने कहा___"मैं पहले आपके ब्लड का टेस्ट लूॅगा अगर उनके ब्लड से मैच हो गया तो आपका ही ब्लड उनको चढ़ा देंगे।"
डाक्टर आशू राना को लेकर चला गया। जबकि मैं परेशानी की हालत में आ गया था। मैं भगवान से दुआ करने लगा कि राना के भाई को कुछ न हो। थोड़ी देर में ही डाक्टर के साथ आशू राना बाहर आ गया।
"क्या हुआ डाक्टर साहब?" मैंने हैरानी से देखते हुए कहा___"आप इसे बाहर क्यों ले आए?"
"इनका ब्लड ग्रुप उनके ब्लड ग्रुप से मैच नहीं कर रहा है।" डाक्टर ने कहा___"हमने फोन द्वारा दूसरे हास्पिटलों में भी पता कर लिया है मगर इस वक्त यहाॅ आस पास के किसी भी हास्पिटल में उस ग्रुप का ब्लड उपलब्ध नहीं है।
"
"डाक्टर साहब मेरा ब्लड भी चेक कर लीजिए न।" मैने कहा___"शायद मैच हो जाए।"
"ठीक है चलिए।" डाक्टर ने कहा___"आपका भी देख लेते हैं।"
मैं डाक्टर के साथ चला गया। अंदर डाक्टर ने मेरा ब्लड टेस्ट किया और आश्चर्यजनक रूप से मेरा ब्लड मैच कर गया। डाक्टर और मैं दोनो ही खुश हो गए।
"ओह वैरी गुड यंगमैन।" डाक्टर ने कहा__"ये तो कमाल हो गया। आपका ब्लड इनके ब्लड से मैच कर रहा है।"
"तो फिर देर किस बात की है डाक्टर?" मैने कहा___"जल्दी से इसको मेरा खून चढ़ा दीजिए।"
"ओह यस यंगमैन।" डाक्टर ने कहा__"आइये मेरे साथ।"
मैं उस कमरे से निकल कर डाक्टर के साथ उस कमरे में गया जहाॅ पर राना के भाई को बेड पर लिटाया गया था। वहाॅ दो नर्सें मौजूद थी।
"अंकिता।" डाक्टर ने एक नर्स से कहा___"इस यंगमैन का ब्लड ग्रुप इनके ग्रुप से मैच कर रहा है इस लिए फौरन प्रोसेस शुरू करो।"
उसके बाद मुझे भी राना के भाई के बगल वाले बेड पर लेटा दिया गया। मैंने भगवान का शुक्रिया अदा किया और अपनी ऑखें बंद कर ली। कुछ ही देर में मुझे अपने हाॅथ में सुई चुभती महसूस हुई।
लगभग दो घंटे बाद !
डाक्टर ने आकर बताया कि आशू का भाई अब ठीक है। मेरे शरीर से खून की उचित मात्रा लेने के बाद मुझे डाक्टर ने बाहर भेज दिया था। मुझे कमज़ोरी का एहसास हो रहा था। मगर दिल में ये खुशी थी कि मेरे खून से आशू के भाई की जान बच गई थी।
आशू राना जो अब तक मुझसे चिढ़ा चिढ़ा सा था अब वह मुझसे बड़े सलीके से बात कर रहा था। उसने ये स्वीकार किया कि इस सबके लिए सच में वही जिम्मेदार था। डाक्टर ने आशू राना के भाई के सिर पर टाॅके लगा कर उस पर पट्टी कर दी थी।
मैं आशू राना के साथ उस हास्पिटल में तब तक रहा जब तक कि उसके भाई को होश नहीं आ गया था। डाक्टर ने आकर बताया कि राना के भाई को होश आ चुका है तो हम दोनो खुशी खुशी उससे मिलने गए।
कमरे में पहुॅच कर आशू राना अपने भाई को ठीक ठाक देख कर बेहद खुश हुआ। मैं आगे बढ़ कर उसके भाई से बोला___"कैसे हो भाई?"
"अब तो ठीक हूॅ।" उसने कहा___"मुझे डाक्टर ने बताया कि तुमने मुझे बचाने के लिए अपना खून मुझे दिया। ऐसा क्यों किया तुमने भाई? भला क्या लगता था मैं तुम्हारा जो तुमने अपना खून देकर मुझे मरने से बचाया?"
"कोई न कोई रिश्ता तो बन ही गया था हम दोनो के बीच में।" मैने कहा___"फिर चाहे वो दुश्मनी का रिश्ता ही क्यों न हो। सब जानते थे कि मैं तुम्हारे सामने एक पल के लिए भी टिक नहीं पाऊॅगा मगर ये मेरी किस्मत थी कि मुझे कुछ नहीं हुआ बल्कि मैने खुद को कुछ होने से बचा लिया। मगर तुम्हारी किस्मत में ये सब होना था सो हो गया और मजे की बात देखो कि मेरे ही खून से तुम्हें जीवित भी बच जाना था।"
"सच कहा तुमने।" राना के बड़े भाई ने कहा___"ये किस्मत ही तो थी।
मैने भी तो यही उम्मीद की थी कि दो मिनट के अंदर तुम्हारी हड्डियाॅ तोड़ कर कालेज से चला जाऊॅगा। मगर क्या पता था कि उल्टा मुझे ही इस हाल में पहुॅच जाना होगा। मैं हैरान था कि एक मामूली सा लड़का मुझे इस तरह कैसे मात दे रहा था। मतलब साफ है कि तुम भी कम नहीं थे।"
"चलो छोड़ो उस बात को।" मैने कहा___"सबसे अच्छी बात ये है कि तुम सही सलामत हो भाई।"
"भाई इस सबका जिम्मेदार मैं हूॅ।" आशू राना ने दुखी भाव से कहा___"सारे फसाद की शुरुआत तो मैने ही की थी। मैं उस लड़की की रैगिंग कर रहा था। मेरी कुछ बातों से उस लड़की को गुस्सा आया और उसने मुझे सबके सामने थप्पड़ मार दिया था। उसके थप्पड़ मारने की वजह से ही मुझे गुस्सा आया हुआ था जिसकी वजह से मैं उसके साथ वो सब कर रहा था। तभी ये भाई आया और मुझे मारने लगा था। इससे मार और मात खा कर ही मैं तुम्हारे पास आया था कि तुम इसे सबक सिखा कर मेरा बदला लो। मगर कुछ और ही हो गया भाई।"
"तुमने ग़लत किया और उस ग़लती में मुझे भी शामिल करवा लिया।" राना के भाई ने कहा__"इसका नतीजा ये तो होना ही था छोटे। कितनी बार तुझे समझाया है कि ऐसे काम मत किया कर बल्कि पढ़ाई किया कर। मगर तू तो पापा पर गया है न। कहाॅ किसी की सुनोगे?"
"अब से सिर्फ तुम्हारी ही बात सुनूॅगा भाई कसम से।" आशू ने कहा___"मैं वो सब ग़लत काम छोड़ दूॅगा।"
"ये सब तो तुमने पहले भी जाने कितनी बार मुझसे कहा था छोटे।" आशू के भाई ने कहा___"मगर क्या तुम कभी अपने फैसले पर अटल रहे? नहीं न? रह भी नहीं सकते छोटे। तुम बिलकुल पापा की तरह हो जैसे उन्हें अपने गुरूर में किसी की परवाह नहीं थी। उसी का नतीजा था कि आज हम बिना माॅ के हैं। तुम भी उनकी तरह ही हो छोटे। आज अगर मैं मर भी जाता तो तुम पर और पापा पर कोई असर नहीं होता।"
"नहीं भाई ऐसा मत कहो प्लीज।" आशू रो पड़ा था, बोला___"मुझे याद है भाई कि आज तक तुमने कैसे मेरी माॅ बन कर मुझे पाला पोषा है। पापा ने तो कभी ध्यान भी नहीं दिया कि उनके बेटे किस हालें हैं। मैं आपकी कसम खा कर कहता हूॅ भाई कि मैं अब से आपका एक अच्छा भाई बन कर दिखाऊॅगा।"
"चल मान ली तेरी ये बात भी।" आशू के भाई ने कहा___"और अगर सचमुच ऐसा हो गया तो मैं तहे दिल से तुम्हारा शुक्रगुजार हूॅ दोस्त कि तुमने मेरी आज ये हालत कर दी। वरना भला कैसे मेरा भाई सही रास्ते पर चलने की बात करता।"
"बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि जो कुछ भी होता है अच्छे के लिए ही होता है।" मैने मुस्कुराते हुए कहा___"हो सकता है ये जो कुछ भी हुआ आज वो इसी अच्छे के लिए हुआ हो।"
"हाॅ दोस्त।" आशू के भाई ने कहा___"आज से तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो और मेरे इस नालायक भाई के भी। इसे अपने साथ ही रखना। और अगर कहीं ग़लती करे तो वहीं पर इसकी धुनाई भी कर देना। मैं कुछ नहीं बोलूॅगा।
"
"भाई ये आप क्या कह रहे हैं?" आशू राना की ऑखें फैल गईं___"मुझे इसके साथ रहने को कह रहे हैं? ये हर रोज़ मेरी कुटाई करेगा भाई। प्लीज ऐसा मत कीजिए।"
"यार तुम ऐसा क्यों सोचते हो कि मैं तुम्हारी कुटाई करूॅगा?" मैने कहा___"तुम आज से मेरे दोस्त हो। हम सब साथ में ही पढ़ेंगे। लेकिन एक बात ज़रूर याद रखना कि भूल से भी किसी के साथ कोई बुरा बर्ताव नहीं करोगे। वरना सुन ही लिया है न कि भूषण भाई ने क्या कहा है। ख़ैर, मैं तुमसे ये कहना चाहता हूॅ कि एक ऐसा इंसान बनो आशू जिससे हर ब्यक्ति के दिल में तुम्हारे लिए इज्ज़त हो, प्यार हो और सम्मान हो। किसी का बुरा करने से या सोचने से कभी भी तुम लोगों की नज़र में अच्छे नहीं बन सकते। तुम खुद सोचो कि तुमने अपने ग़लत दोस्तों की शोहबत में अपनी क्या इमेज बना ली है सबके बीच? सब लोग तुमसे दूर भागते हैं। कोई भी अच्छा ब्यक्ति तुमसे किसी तरह का ताल्लुक नहीं रखना चाहता। लोग तुमसे तुम्हारे ग़लत ब्यौहार की वजह से कतराते हैं। किसी को डरा धमका कर तुम ये समझते हो कि लोगों के बीच तुम्हारा दबदबा है। जबकि ऐसी सोच सिरे से ही ग़लत है। क्योंकि वो लोग तुमसे डरते नहीं हैं बल्कि तुम जैसे बुरे इंसान के मुह नहीं लगना चाहते। इस लिए वो सब तुमसे दूर भागते हैं। इस लिए दोस्त ऐसा इंसान बनो जिसमें हर कोई तुम्हारे पास खुद आने के लिए रात दिन सोचे। और ये सब तभी होगा जब तुम सबके लिए अच्छा सोचोगे। किसी को अपने से कमज़ोर नहीं समझोगे।"
"वाह दोस्त।" भूषण राना प्रसंसा के भाव से कह उठा___"कितनी गहरी बातें कही है तुमने। काश तुम्हारी ये बातें मेरे इस छोटे को समझ आ जाएॅ और ये उसी राह पर चल पड़े जिस राह पर चलने से ये एक अच्छा इंसान बन जाए।"
"मैं चलूॅगा भाई।" आशू राना कह उठा__"अब से आपको कोई शिकायत का मौका नहीं दूॅगा। इस भाई की बात मेरी समझ में आ गई है। मुझे एहसास हो रहा है भाई कि इसने जो कुछ भी मेरे बारे में कहा वो एक कड़वा सच है। सच ही तो कहा है भाई ने कि सब लोग मेरे बुरे आचरण की वजह से मुझसे दूर भागते हैं। मगर अब ऐसा नहीं होगा भाई। मैं इसके साथ रह कर एक अच्छा इंसान बनूॅगा और ज़रूर बनूॅगा।"
"ये हुई न बात।" मैने कहा___"चल आजा इसी बात पर गले लग जा मेरे। कितनी बड़ी बात है कि आज काॅलेज के पहले ही दिन में पहले दुश्मनी हुई और फिर दोस्ती भी हो गई।"
आशू मेरे गले लग गया। मैने देखा बेड पर पड़े भूषण राना की ऑखों में खुशी के ऑसूॅ थे। कुछ देर और वहाॅ पर रुकने के बाद मैने भूषण राना से जाने की इजाज़त माॅगी तो उसने पहले मुझसे मेरा फोन नंबर लिया और मैने भी उसका लिया। फिर भूषण के कहने पर आशू मुझे भूषण की कार से काॅलेज तक छोंड़ा। पूरे रास्ते आशू राना का चेहरा खिला खिला नज़र आया मुझे। मैं समझ गया कि ये अब ज़रूर सुधर जाएगा।
काॅलेज के गेट के पास उतार कर आशू वापस लौट गया जबकि मैं पार्किंग की तरफ बढ़ गया अपनी बाइक को लेने के लिए। पार्किंग से अपनी बाइक पर सवार होकर अभी मैने बाइक को स्टार्ट करने के लिए सेल्फ पर अॅगूठा रखा ही था कि मेरा मोबाइल फोन बज उठा। मैने पैंट की जेब से मोबाइल निकाल कर स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नंबर को देखा तो मेरे चेहरे पर सोचने वाले भाव उजागर हो गए।
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,,,,
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.......《 39 》
अब तक,,,,,,,,
"मैं चलूॅगा भाई।" आशू राना कह उठा__"अब से आपको कोई शिकायत का मौका नहीं दूॅगा। इस भाई की बात मेरी समझ में आ गई है। मुझे एहसास हो रहा है भाई कि इसने जो कुछ भी मेरे बारे में कहा वो एक कड़वा सच है। सच ही तो कहा है भाई ने कि सब लोग मेरे बुरे आचरण की वजह से मुझसे दूर भागते हैं। मगर अब ऐसा नहीं होगा भाई। मैं इसके साथ रह कर एक अच्छा इंसान बनूॅगा और ज़रूर बनूॅगा।"
"ये हुई न बात।" मैने कहा___"चल आजा इसी बात पर गले लग जा मेरे। कितनी बड़ी बात है कि आज काॅलेज के पहले ही दिन में पहले दुश्मनी हुई और फिर दोस्ती भी हो गई।"
आशू मेरे गले लग गया। मैने देखा बेड पर पड़े भूषण राना की ऑखों में खुशी के ऑसूॅ थे। कुछ देर और वहाॅ पर रुकने के बाद मैने भूषण राना से जाने की इजाज़त माॅगी तो उसने पहले मुझसे मेरा फोन नंबर लिया और मैने भी उसका लिया। फिर भूषण के कहने पर आशू मुझे भूषण की कार से काॅलेज तक छोंड़ा। पूरे रास्ते आशू राना का चेहरा खिला खिला नज़र आया मुझे। मैं समझ गया कि ये अब ज़रूर सुधर जाएगा।
काॅलेज के गेट के पास उतार कर आशू वापस लौट गया जबकि मैं पार्किंग की तरफ बढ़ गया अपनी बाइक को लेने के लिए। पार्किंग से अपनी बाइक पर सवार होकर अभी मैने बाइक को स्टार्ट करने के लिए सेल्फ पर अॅगूठा रखा ही था कि मेरा मोबाइल फोन बज उठा। मैने पैंट की जेब से मोबाइल निकाल कर स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नंबर को देखा तो मेरे चेहरे पर सोचने वाले भाव उजागर हो गए।
____________________________
अब आगे,,,,,,,,
"हम कुछ भी नहीं सुनना जानते कमिश्नर हमारे बच्चे जहाॅ भी हों उन्हें ढूॅढ़ कर हमारे सामने तुरंत हाज़िर करो।" दिवाकर चौधरी फोन पर गुस्से में कह रहा था___"वरना तुम सोच भी नहीं सकते कि हम क्या कर सकते हैं? हमें पता चला है कि बच्चों ने किसी लड़की के साथ रेप किया है। मगर ये सब तो चलता ही रहता है इस उमर में। अगर हमें पता चला कि इस रेप की वजह से ही हमारे बच्चे गायब हैं तो समझ लेना कमिश्नर इस शहर में कोई इंसान ज़िदा नहीं बचेगा।"
".................."उधर से कुछ कहा गया।
"तो अगर पुलिस ने उस लड़की के रेप पर कोई केस नहीं बनाया तो कहाॅ गए हमारे बच्चे?" दिवाकर चौधरी गर्जा___"आज दो दिन हो गए कमिश्नर। अभी तक बच्चों का कहीं कोई अता पता नहीं है।"
"............." उधर से फिर कुछ कहा गया।
"तुम्हारे पास चौबीस घंटे का टाइम है कमिश्नर।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"अगर चौबीस घंटे के अंदर हमारे बच्चे हमारी ऑखों के सामने न दिखे तो समझ लेना कि हम क्या करते हैं फिर।"
कहने के साथ ही दिवाकर चौधरी ने फोन के रिसीवर को केड्रिल पर पटक दिया। गुस्से से तमतमाया हुआ आया और वहीं सोफे पर बैठ गया। इस वक्त वहाॅ रखे बाॅकी सोफों पर उसके सभी मित्र यार बैठे हुए थे। सबके चेहरों पर चिंता व परेशानी साफ दिखाई दे रही थी।
"क्या कहा कमिश्नर ने?" अशोक मेहरा ने उत्सुकता से पूछा था।
"क्या उस रेप की वजह से हमारे बच्चे गायब हैं?" सुनीता वर्मा ने कहा___"ज़रूर पुलिस वालों ने ही उन सबको गिरफ्तार किया होगा।"
"पुलिस की इतनी हिम्मत नहीं है सुनीता कि वो हमारे बच्चों को छू भी सके।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"मुझे लगता है कि हमारे बच्चे खुद ही अंडरग्राउण्ड हो गए हैं। उन्होंने सोचा होगा कि इस हादसे से कहीं उनको पुलिस न पकड़ ले। इस लिए वो कहीं छुप गए होंगे। उन बेवकूफों का इतना भी दिमाग़ नहीं चला कि उनको किसी से डरने की कोई ज़रूरत ही नहीं थी। ख़ैर, तुम लोग चिन्ता मत करो। हमारे बच्चे जहाॅ भी होंगे सही सलामत ही होंगे।"
"पर चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"उन लोगों को हमें एक बार फोन तो कर ही देना चाहिये था। मगर दो दिन से फोन ही बंद हैं उन सबका। समझ में नहीं आ रहा कि कहाॅ गए होंगे वो। आपके फार्महाउस पर भी नहीं हैं। हमारे आदमी देख आए हैं वहाॅ। लेकिन हैरानी की बात है कि आपके फार्महाउस के वो दोनो गार्ड्स भी वहाॅ नहीं हैं। इसका क्या मतलब हो सकता है?"
"भाग गए होंगे साले कामचोर।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"उस समय जब उनके हाॅथ में बंदूखें थमाई थी तभी समझ आ गया था कि ये इस काम के लिए बेहद कमज़ोर हैं। ख़ैर छोड़ो। कमिश्नर को हमने डोज दे दी है। वो ज़रूर पता करेगा बच्चों का।"
"आप तो ऐसे बेफिक्र हैं चौधरी साहब जैसे आपको अपने बच्चों की कोई चिंता ही नहीं है।" सुनीता वर्मा ने कहा___"पर मुझे चिंता है। क्योंकि मुझ विधवा का एक वही तो सहारा है। अगर उसे कुछ हो गया तो किसके लिए जियूॅगी मैं?"
"ओफ्फो सुनीता।" दिवाकर चौधरी ने सहसा उसे अपनी तरफ खींच लिया। एक हाॅथ से उसकी ठुड्डी पकड़ कर बोला___"वैसे तो उसे कुछ नहीं होगा। और अगर थोड़े पल के लिए मान भी लिया जाए तो चिंता क्यों करती हो? हम हैं न तुम्हारे सहारे के लिए। अब तक भी तो सहारा ही बने हुए थे हम और आगे भी बने ही रहेंगे।"
"आपको तो बस हर वक्त मस्ती ही सूझती रहती है चौधरी साहब।" सुनीता ने कहा__"जबकि इस वक्त हालात किस क़दर गंभीर हैं इसका आपको अंदाज़ा भी नहीं है।"
"तुम भूल रही हो सुनीता डार्लिंग कि हम कौन हैं?" दिवाकर चौधरी ने कहा__"हम इस शहर की वो हस्ती हैं जिसकी इजाज़त के बिना एक पत्त भी नहीं हिल सकता।
इस लिए तुम इस बात की चिंता करना छोंड़ दो कि बच्चों के साथ कोई बुरा करेगा।"
"चौधरी साहब बिलकुल ठीक कह रहे हैं सुनीता।" अशोक मेहरा ने कहा___"हमारे बच्चे ज़रूर किसी दूसरे शहर में मौज मस्ती कर रहे होंगे।"
"मौज मस्ती हमें भी तो करनी चाहिए न अशोक?" दिवाकर ने कहा___"बहुत दिन हो गए सुनीता के साथ भरपूर मस्ती नहीं की हमने।"
"आपने तो मेरे मन की बात कह दी चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने मुस्कुराते हुए कहा___"आज हो ही जाए मस्ती।"
"क्या कहती हो डार्लिंग?" दिवाकर चौधरी ने सुनीता के एक भारी बोबे को ज़ोर से मसलते हुए कहा___"हो जाए वन टू का फोर?"
"अरे मैं तो चाहती ही हूॅ कि आप सब मुझे मसल कर रख दो।" सुनीता ने अपने होठों को दाॅतों तले दबाते हुए कहा___"मेरे जिस्म में तो हर वक्त आग लगी रहती है। अलोक का बाप तो कमीना मुझे भरी जवानी में छोंड़ कर मर गया। वो तो भगवान का शुकर था कि आप लोग मेरे जीवन में आ गए वरना जाने क्या होता मेरा?"
"भगवान सब अच्छे के लिए ही करता है मेरी राॅड सुनीता।" दिवाकर चौधरी ने सुनीता के ब्लाउज के बटन खोलते हुए कहा___"और आज तो हम सब तेरी आगे पीछे दोनो साइड से अच्छे से लेंगे।"
"हाॅ तो ठीक है न।" सुनीता ने अपना हाथ बढ़ा कर दिवाकर के पजामें के ऊपर से ही उसके लौड़े को पकड़ लिया___"मेरा कोई भी छेंद खाली न रखना।"
"आज तो साली तेरी चीखें निकालेंगे हम तीनों।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"चलो भाई लोग अंदर कमरे में चलो। आज इस राॅड को तबीयत से पेलते हैं।"
दिवाकर चौधरी की बात सुन कर बाॅकी तीनो भी मुस्कुराते हुए सोफों से उठ खड़े हुए।
"चौधरी साहब आपकी बेटी तो नहीं है न बॅगले में?" अशोक मेहरा ने पूछा__"वरना उसे पता चल जाएगा कि हम सब क्या कर रहे हैं।"
"नहीं है यार।" दिवाकर ने कहा___"शायद कहीं बाहर गई हुई है।"
अभी वे सब कमरे की तरफ बढ़े ही थे कि सहसा पीछे से दिवाकर के पीए ने आवाज़ दी।
"चौधरी साहब, चौधरी साहब।" पीए ने बदहवास से लहजे में कहा था।
"क्या बात है मनोहर लाल?" दिवाकर चौधरी के लहजे में कठोरता थी__"क्यों गला फाड़ रहे तुम? देख नहीं रहे, हम ज़रूरी काम से कमरे में जा रहे हैं?"
"ज़रूर जाइये चौधरी साहब।" मनोहर लाल ने अजीब भाव से कहा___"लेकिन उससे पहले इसे तो देख लीजिए।"
"क्या है ये?" दिवाकर चौधरी की भृकुटी तन गई, बोला___"तुम हमें मोबाइल देखने का कह रहे हो इस वक्त? दिमाग़ तो ठीक है न तुम्हारा?"
"आप एक बार देख लीजिए न चौधरी साहब।" मनोहर लाल ने विनती भरे भाव से कहा___"उसके बाद आपको जो करना है करते रहिएगा।"
"दिखाओ क्या है ये?" दिवाकर चौधरी ने मनोहर लाल के हाथ से मोबाइल छींन लिया था। मोबाइल की स्क्रीन पर कोई वीडियो पुश मोड पर नज़र आ रहा था।
"तुमने हमें ये दिखाने के लिए रोंका है मनोहर लाल?" दिवाकर चौधरी ने गुस्से से कहा।
"गुस्सा मत कीजिए चौधरी साहब।
" मनोहर लाल ने कहा___"एक बार उस वीडिओ को प्ले तो कीजिए।"
दिवाकर चौधरी ने पहले तो खा जाने वाली नज़रों से मनोहर लाल को देखा फिर मोबाइल की स्क्रीन पर देखते हुए उस वीडिओ को प्ले कर दिया। बड़े से स्क्रीन टच मोबाइल में वीडिओ के प्ले होते ही जो कुछ नज़र आया उसे देख कर दिवाकर चौधरी के होश उड़ गए। दिलो दिमाग़ सुन्न सा पड़ता चला गया। ये सच है कि उसके हाॅथ से मोबाइल छूटते छूटते बचा था। सिर पर एकाएक ही जैसे पूरा आसमान ही भरभरा कर गिर पड़ा था उसके।
चौधरी की हालत एक पल में ऐसी हो गई जैसे उसका सब कुछ लुट गया हो। चेहरा फक्क पड़ गया था उसका। बाॅकी दोनो और सुनीता भी चौधरी की ये दशा देख कर बुरी तरह चौंके। उन्हें समझ न आया कि अचानक चौधरी साहब को क्या हो गया है।
"क्या हुआ चौधरी साहब?" अवधेश श्रीवास्तव ने हैरानी से कहा__"आप इस तरह बुत से क्यों बन गए? क्या है उस मोबाइल में?"
"आं हा, लो तुम भी देख लो।" दिवाकर चौधरी ने मोबाइल पकड़ा दिया उसे।
अवधेश के साथ साथ अशोक व सुनीता ने भी मोबाइल में चालू वीडियो को देखा। और अगले ही पल उनकी भी हालत खराब हो गई।
"ये सब क्या है मनोहर लाल?" अशोक वर्मा ने गुस्से से कहा___"चौधरी साहब का ऐसा वीडियो इस मोबाइल में कहा से आया?"
"ये वीडियो किसी अंजान नंबर से भेजा गया है सर।" मनोहर ने कहा___"अभी पाॅच मिनट पहले ही आया है। इतना ही नहीं अलग अलग चार वीडियो और भी हैं। बाॅकियों को भी प्ले करके देख लीजिए।"
अशोक ने वैसा ही किया। कहने का मतलब ये कि चारो वीडियो अलग अलग ब्यक्तियों के थे। पहला दिवाकर चौधरी का, दूसरा अशोक मेहरा का, तीसरा सुनीता वर्मा का और चौथा अवधेश श्रीवास्तव का।
चारो वीडियो देखने के बाद उन चारों की हालत बेहद खराब हो गई। सबके पैरों तले से ज़मीन कोसों दूर निकल गई थी।
"चौधरी साहब ये सब वीडियो हम लोगों के कैसे बन गए?" अशोक मेहरा ने कहा__"और इन वीडियोज में जो जगह है वो तो आपके फार्महाउस की ही है। मतलब साफ है कि वहीं पर हमारे ऐसे वीडियो बनाए गए। मगर सवाल है कि किसने बनाए ऐसे वीडियो? क्या हमारे बच्चों ने? यकीनन चौधरी साहब, ये उन लोगों ने ही बनाया है।"
"अशोक सही कह रहे हैं चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"हमारे बच्चों ने ही ये वीडियो बनाया। क्योंकि बाहरी कोई वहाॅ जा ही नहीं सकता।"
"ये सब छोंड़ो और ये सोचो कि ये वीडियो किसने भेजा हमारे फोन पर?" दिवाकर चौधरी ने कहा___"हमारे बच्चे तो ऐसा करेंगे नहीं। क्योंकि ऐसा करने की उनके पास कोई वजह ही नहीं है। उन्होंने ये सोच कर वीडियो बनाया कि हम अपने बाप वोगों की मौज मस्ती अपनी ऑखों से देखेंगे। उनके दिमाग़ में ऐसे वीडियोज हमारे पास भेजने का कोई सवाल ही नहीं है क्योंकि उनकी हर इच्छाओं की पूर्ति हम बखूबी करते हैं। ये किसी और का ही काम है अवधेश।
हमारे फोन में वीडियो भेजने का मतलब है कि सामने वाला हमें बताना चाहता है कि उसके पास हमारी इस करतूत का सबूत है और वो हमें जब चाहे एक्सपोज कर सकता है। अब सवाल ये है कि वो कौन है जिसने ये वीडियो भेजा और किस मकसद के तहत भेजा?"
"मामला बेहद गंभीर हो गया है चौधरी साहब।" सुनीता ने कहा___"हमारे बच्चों ने तो हमें बड़ी भारी मुसीबत में डाल दिया है।"
"मुसीबत तो अब हो ही गई है मगर इससे निपटने का रास्ता तो अब ढूढ़ना ही पड़ेगा न?" दिवाकर चौधरी ने कहा__"सबसे पहले ये पता करना होगा कि ये वीडियो उसके पास कैसे आए और उसने हमें किस मकसद से भेजा है?
"वीडियो आपके फार्महाउस के उसी कमरे में बनाया गया है चौधरी साहब जिस कमरे में हम लोग अक्सर शबाब का मज़ा लूटा करते हैं।" अशोक ने कहा___"मतलब साफ है वीडियो भेजने वाले को ये वीडियो वहीं से मिले होंगे। अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि आपके फार्महाउस पर ऐसा कौन ब्यक्ति गया और ये सब वीडियोज वहाॅ से उठा कर चंपत हो गया? आपके फार्महाउस के वो गार्ड्स कहाॅ थे उस वक्त जब कोई बाहरी वहाॅ आकर ये सब काण्ड कर गया?"
अशोक मेहरा की इन बातों से सन्नाटा छा गया हाल में। सबका दिमाग़ मानो चकरघिन्नी बन कय रह गया था। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि ये सब अचानक कौन सी आफत आ गई थी। जिसने उन सब महारथियों को अपंग सा बना दिया था।
"मनोहर लाल पता करो किसने ये हिमाकत की है?" दिवाकर चौधरी ने कहा___"जिस नंबर से ये वीडियोज आईं हैं उस नंबर पर फोन करो।"
"मैने बहुतों बार फोन लगाया चौधरी साहब लेकिन नंबर बंद बता रहा है।" मनोहर लाल ने कहा___"आप कहें तो पुलिस को ये नंबर दे दूॅ वो जल्द ही पता कर लेंगे कि ये नंबर किसका है और किस जगह से इस नंबर के द्वारा ये वीडियोज भेजी गई हैं?"
"तुम्हारा दिमाग़ तो नहीं ख़राब हो गया मनोहर लाल।" दिवाकर गुस्से से बोला__"ये घटिया ख़याल आया कैसे तुम्हारे ज़हन में? सोचो अगर हमने पुलिस को नंबर दिया तो उसका अंजाम क्या हो सकता है? जिसने भी ये दुस्साहस किया है वो कोई मामूली ब्यक्ति नहीं हो सकता। उसे भी ये पता होगा कि हम उसका पता लगाने के लिए उसका नंबर पुलिस को दे सकते हैं। उसने पुलिस को नंबर न देने की कोई चेतावनी भले ही हमें नहीं दी है मगर हमें तो सोचना समझना चाहिए न? अगर हमने ऐसा किया तो संभव है कि वो हमारे ये वीडियो पुलिस को दे दे या सार्वजनिक कर दे। उस सूरत में हमारा सारा किस्सा ही खत्म हो जाएगा। शहर की जनता और ये पुलिस प्रशासन सब हमारे खिलाफ़ हो जाएॅगे। इस लिए हमें ठंडे दिमाग़ से इसके बारे में सोचना होगा। बिना मतलब के या बिना मकसद के कोई किसी के साथ ऐसा नहीं करता। उसने ऐसा किया है तो देर सवेर ज़रूर उसका कोई मैसेज या फोन भी आएगा।
तब हम उससे पूछेंगे कि वह क्या चाहता है हमसे?"
"इसका मतलब अब हम उस ब्यक्ति के किसी फोन या मैसेज का इंतज़ार करें जिसने ये वीडियोज हमें भेजा है?" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा।
"इसके अलावा हमारे पास दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं है।" दिवाकर ने कहा___"हमें एक बार उससे बात तो करनी पड़ेगी। आख़िर पता तो चले कि उसने ऐसा किस मकसद से किया है? उसके बाद ही हम कोई अगला क़दम उठा सकते हैं।"
"ठीक है चौधरी साहब।" अशोक मेहरा ने कहा___"जैसा आप उचित समझें वैसा कीजिए। मगर ये मैटर ऐसा है कि हम सबके होश उड़ा देगा। सब कुछ बरबाद कर देगा।"
"बस एक बार उसका कोई फोन या मैसेज तो आने दो।" दिवाकर ने कहा___"उसके बाद हम बताएॅगे उसे कि हमारे साथ ऐसी हरकत करने का अंजाम कितना भयावह होता है।"
दिवाकर चौधरी की इस बात से एक बार फिर हाल में सन्नाटा छा गया। किन्तु सबके मन में जो तूफान उठ चुका था उसे रोंकना उनके बस में न था।
___________________________
"चौधरी आज से तेरे बुरे दिन शुरू हो गए हैं। मासूम और मजलूमों पर तूने, तेरे साथियों ने और तेरे हराम के पिल्लों ने जो भी ज़ुल्म ढाए हैं उनका हिसाब देने का समय आ गया है।" रितू की कार ऑधी तूफान बनी फार्महाउस की तरफ दौड़ी जा रही थी। साथ ही मन ही मन वह ये सब कहती भी जा रही थी।
रितू ने ऐसी जगह से अपने नये मोबाइल फोन द्वारा वो वीडियोज चौधरी के मोबाइल पर भेजे थे जिस जगह पर एक नई बिल्डिंग का निर्माण कार्य चल रहा था। किन्तु इस वक्त वहाॅ पर कोई न था। यहीं से उसने चौधरी को वोडियोज भेजे थे। वीडियो भेजने के बाद उसने फोन को स्विचऑफ कर दिया था। उसका खुद का जो आईफोन था वो पहले से ही स्विचऑफ था। उसके दिमाग़ में हर चीज़ से बचने की भी सोच थी।
ऑधी तूफान बनी उसकी जिप्सी उसके फार्महाउस पर रुकी। जिप्सी से उतर कर वह तेज़ी से अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। बाहर मेन गेट पर शंकर काका नज़र आया था उसे किन्तु हरिया काका नज़र नहीं आया था। कमरे में जाकर उसने नया वाला फोन आलमारी में रखा और उसे लाॅक कर तुरंत पलटी।
जिप्सी में बैठी रितू का रुख अब अपने हवेली की तरफ था। उसके दिमाग़ में बड़ी तेज़ी से कई सारी चीज़ें चल रही थी। उसके ज़हन में ये बात हर पल बनी हुई थी कि उसने विधी से वादा किया था कि विराज को उसके पास ज़रूर लाएगी।
रितू के पास विराज का कोई काॅन्टैक्ट करने का ज़रिया न था। इस लिए उसने ये पता लगाने के लिए किसी आदमी को लगाया हुआ था कि उसके किसी दोस्तों के पास विराज का कोई अता पता हो। दूसरे दिन सुबह ही उसके आदमी ने उसे बताया था कि विराज के दो ही लड़के खास दोस्त हुआ करते थे। एक का नाम दिनेश सिंह था जो कि आजकल देश के किसी दूसरे राज्य में नौकरी कर रहा है। दूसरे दोस्त का नाम है पवन सिंह चंदेल। ये विराज का स्कूल के समय से ही दोस्त था।
ग़रीब है, आज कल हल्दीपुर में ही बस स्टैण्ड के पास पान की दुकान खोल रखा है। घर में विधवा माॅ के अलावा एक बहन है जो ऊम्र में उससे बड़ी है। मगर आर्थिक परेशानी की वजह से वह अपनी बड़ी बहन की शादी नहीं करा पा रहा है।
रितू के खबरी ने उसे पवन सिंह का नंबर लाकर दिया था। रितू ने पवन को फोन लगा कर उसे अपना परिचय दिया और मिलने का कहा था। खैर, रातू जब पवन से मिली तो उससे विराज के बारे में पूछा तो पवन ने बड़ा अजीब सा जवाब दिया था उसे।
"आप मेरे दोस्त राज की बड़ी बहन हैं इस लिए आप मेरी भी बड़ी बहन के समान ही हैं।" पवन ने कहा था___"आप मेरे घर पर आई हैं, आपका तहे दिल से स्वागत है। लेकिन अगर आप मुझसे मेरे जिगरी यार का पता या फोन नंबर पूछने आई हैं तो माफ़ कीजिएगा दीदी। मैं आपको ना तो उसका पता बताऊॅगा और ना ही उसका फोन नंबर दूॅगा।"
"लेकिन क्यों पवन क्यों?" रितू ने चकित भाव से कहा था___"तुम एक बहन को उसके भाई का अता पता क्यों नहीं बताओगे?"
"बहन.....भाई???" पवन सिंह बड़े अजीब भाव से हॅसा था, उसकी उस हॅसी में रितू ने साफ साफ दर्द महसूस किया____"कौन बहन भाई दीदी? अरे मेरे यार ने तो सबको हमेशा अपना ही माना था मगर उसके खुद के माॅ बाप और बहन के अलावा किसी भी परिवार वाले ने उसे अपना नहीं माना। और और आप???? आप भी बताइये दीदी, आप ने राज को कब अपना भाई माना था? अरे उसे तो आपने बचपन से लेकर आज तक सिर्फ दुत्कारा है दीदी। ख़ैर, जाने दीजिए। आपसे ये सब कहने का मुझे कोई हक़ नहीं है। माफ़ करना दीदी, आपको देख कर जाने कैसे गुस्सा सा आ गया था और दिल का गुबार मुख से निकल गया। मगर, जिस काम के लिए आप यहाॅ आई हैं वो हर्गिज़ नहीं होगा। मुझे सब पता है दीदी, मेरे दोस्त राज और उसकी माॅ बहन को खोजने के लिए आपके डैड ने अपने आदमियों को जाने कब से लगाया हुआ है। मगर कोई भी उनका आदमी उसे ढूॅढ़ नहीं पाएगा।"
"तुम ग़लत समझ रहे हो पवन।" रितू ने बेचैनी भरे भाव से कहा था___"मैं ये मानती हूॅ कि मैने अपने उस भाई को कभी अपना नहीं माना था लेकिन आज ऐसा नहीं है भाई। आज तुम्हारी ये दीदी बहुत प्यार करने लगी है अपने उस भाई से। इस वक्त अगर राज मेरे सामने आ जाए तो मैं उसके पैरों में पड़ कर उससे अपने किये की मुआफ़ी माॅग लूॅगी। ये सब समय समय की बातें हैं पवन। हम जब बच्चे होते हैं तो बिलकुल कुम्हार के पास रखी हुई उस गीली और कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं। हमारे माता पिता कुम्हार की तरह ही होते हैं। वो जैसे चाहें अपने बच्चों को किसी मिट्टी के घड़े की तरह ढाल देते हैं। कहने का मतलब ये कि, मेरे माॅम डैड ने हम बहन भाइयों को बचपन से जो सिखाया पढ़ाया हम उसी को करते चले गए। लेकिन वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता पवन। हर सच्चाई को एक दिन पर्दे से निकल कर बाहर आना ही पड़ता है। यही उसकी नियति होती है।
और सच्चाई क्या है क्या नहीं ये मुझे समझ आ गया है। मुझे पता है पवन कि मेरा भाई राज वो कोहिनूर है जिसका कोई मोल हो ही नहीं सकता।"
"वाह दीदी वाह।" पवन कह उठा___"आज आपके मुख से ये अमृत वाणी कैसे निकल रही है? हैरत की बात है, खैर मुझे क्या है। मगर इतना जान लीजिए कि मैं आपकी इन मीठी बातों के जाल में फॅसने वाला नहीं हूॅ। मेरी वजह से मेरे दोस्त को कोई नुकसान नहीं पहुॅचा सकता। अब आप जाइये दीदी। मुझे आपसे और कोई बात नहीं करनी है।"
"कैसे यकीन दिलाऊॅ पवन?" रितू की ऑखों में ऑसू आ गए___"आखिर कैसे तुम्हें यकीन दिलाऊॅ कि मैं अब वैसी नहीं रही? मैं हनुमान जी की तरह अपना सीना चीर कर नहीं दिखा सकती मगर भगवान जानता है कि मेरे सीने में मेरा भाई ज़रूर मौजूद हो गया है। तुम मुझे उसका गुनहगार समझते हो तो चलो ठीक है पवन। तुम मुझे राज का अता पता भी न दो मगर इतना तो उसे बता ही सकते हो न वो कुछ देर के लिए अपनी उस विधी के पास आ जाए जिससे वह आज भी उतना ही प्यार करता होगा जितना पहले करता था।"
"नाम मत लीजिए उस बेवफ़ा का।" पवन ने सहसा आवेशयुक्त लहजे में कहा___"उसी की बेवफ़ाई की वजह से मेरा दोस्त रात रात भर मेरे पास रोता रहता था। कितना चाहता था वो उसे। मगर उस दिन पता चला कि दुनियाॅ भर की कसमें और दलीलें देने वाली वो लड़की कितनी झूठी और मक्कार थी जिस दिन आप लोगों ने मेरे दोस्त को और उसके माॅ बहन को हवेली से बाहर धकेल दिया था। उधर आप लोगों ने हवेली से धकेला और इधर उस कम्बख्त ने मेरे दोस्त को अपने दिल से धकेल दिया। एक पल में गिरगिट की तरह रंग बदल लिया था उस लड़की ने। रुपये पैसे से मोहब्बत थी उसे ना कि मेरे दोस्त से।"
"सच्चाई क्या है इसका तुम्हें पता नहीं है पवन।" रितू ने दुखी भाव से कहा__"तुम और विराज ही क्या बल्कि नहीं समझ सकता कि उसने ऐसा क्यों किया था?"
"अरे दौलत के लिए दीदी दौलत के लिए।" पवन ने झट से कहा___"उसने मेरे दोस्त की सच्ची मोहब्बत को अपने पैरों तले रौंदा था।"
"ये सच नहीं है पवन।" रितू ने कहा__"अगर सच्चाई जान लोगे न तो पैरों तले से ज़मीन गायब हो जाएगी तुम्हारे। उसने ये सब इस लिए किया था ताकि विराज उससे नफ़रत करने लगे और किसी दूसरी लड़की के साथ प्यार मोहब्बत करने का सोचे। माना कि ये आसान नहीं था मगर वक्त और हालात हर ज़ख्म भर देता और एक नया मोड़ भी जीवन में ले आता है।"
"आप कहना क्या चाहती हैं दीदी?" पवन ने कहा___"और इन सब बातों का आज कहने का क्या मतलब है?"
"विधी को ब्लड कैंसर था पवन।" रितू ने मानो धमाका किया___"और वो भी लास्ट स्टेज का। इसी लिए उसने ये सब किया था राज के साथ। ताकि वह उसे भूल जाए और दूर हो जाए उससे।"
"क क्या?????" पवन बुरी तरह चौंका था___"ये ये आप क्या कह रही हैं दीदी? विधी को कैंसर?? नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता। ये सब झूठ है।
"
"अगर तुम्हें मेरी बात का यकीन नहीं है तो मेरे साथ चल कर खुद अपनी ऑखों से देख लो तुम।" रितू ने कहा___"इस वक्त भी वह हास्पिटल में ही है। तुमने शायद सुना नहीं होगा उस रेप के बारे में जो अभी कुछ दिनों पहले ही हुआ था। विधी के साथ ये हादसा हुआ था जिससे उसकी हालत बहुत खराब हो गई थी। हास्पिटल में जब उसे भर्ती किया गया तभी उसके चेकअप से डाक्टर को ये पता चला कि विधी को लास्ट स्टेज का ब्लड कैंसर है। जबकि कैंसर वाली बात विधी को पहले से ही पता थी।"
पवन सिंह रितू को अजीब भाव से इस तरह देखने लगा था जैसे रितू का सिर धड़ से अलग होकर ऊपर हवा में अचानक ही कत्थक करने लग गया हो। अविश्वास से फटी हुई उसकी ऑखों में एकाएक ही ऑसू आ गए।
"हे भगवान! ये क्या हो गया?" पवन ने ऊपर की तरफ देख कर दुखी भाव से कहा__"एक और सच्चे प्रेम की ये दशा कर दी तूने। बहुत बेरहम और बेदर्द है तू। दीदी, मुझे उस महान लड़की को देखना है। उससे मुआफ़ी माॅगना है। हे भगवान कितना बुरा भला कहा मैने उसे और आज तक बुरा भला सोचता भी रहा हूॅ।"
रितू पवन को लेकर हास्पिटल पहुॅची तो पवन ने देखा विधी को। विधी की कुरुण हालत देख कर पवन का कलेजा मुह को आ गया। वह विधी के पैरों में अपना सिर रख दिया और माफ़ी माॅगने लगा। पवन बहुत ही भावुक किस्म का लड़का था, इस लिए ज्यादा देर तक वह विधी के पास न रह सका था। उसे रह रह कर रोना आने लगता था।
हास्पिटल से बाहर आकर उसने खुद को और अपने अंदर के जज़्बातों को शान्त किया। तभी पीछे से रितू ने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसने पलट कर देखा उसे।
"क्या अब भी तुम्हें लगता है पवन कि मैं तुमसे झूॅठ बोल रही हूॅ?" रितू ने कहा था।
"नहीं दीदी, प्लीज माफ़ कर दीजिए।" पवन ने अपने हाथ जोड़ कर कहा था।
"इसी विधी ने मुझे एहसास कराया कि मैं कितना ग़लत सोचती थी अब तक अपने भाई विराज के लिए।" रितू ने कहा___"विधी की कहानी ने मुझे ये एहसास कराया भाई कि मेरा अपने भाई के लिए आज तक अनुचित ब्यौहार करना कितना ग़लत था। इसको मैने वचन दिया है पवन कि इसके महबूब को इसके पास ज़रूर लाऊॅगी। मैं इसी लिए तुम्हारे पास आई थी पवन। मैंने अपने भाई के साथ क्या किया है अबतक उसका फल मुझे ज़रूर मिलेगा और मिलना भी चाहिए।"
"ऐसा मत कहिए दीदी।" पवन ने कहा__"ये सब समय समय की बातें हैं। जो बीत गया उसे भूल जाइये और एक नया संसार बनाने की सोचिये। मैं अभी विराज को फोन करता हूॅ और उसे विधी के बारे में सब बताता हूॅ।"
"नहीं नहीं पवन।" रितू ने झट से कहा__"उसे ये मत बताना कि विधी को क्या हुआ है। बल्कि कुछ और बोलो। कुछ ऐसा कि वो दूसरे दिन मुंबई से यहाॅ आने के लिए चल दे।"
"ठीक है दीदी।" पवन ने कहा था__"मैं ऐसा ही करता हूॅ।"
कहने के साथ ही पवन ने विराज को फोन को फोन लगा दिया था। उसका दिल बुरी तरह धड़के जा रहा था।
रिंग जाने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। और तभी,
"हाॅ भाई बोल कैसे याद किया?" उधर से विराज ने कहा था।
"भाई अगर तेरे पास टाइम हो तो तू जल्दी से गाॅव आ जा।" पवन ने कहा था।
"अरे क्या हुआ भाई?" विराज के चौंकने जैसी आवाज़ आई___"सब ठीक तो है ना?"
"बस भाई तू कल ही आजा यहाॅ।" पवन ने गंभीरता से कहा___"तुझे मेरी क़सम है भाई। तू कल यहाॅ आएगा।"
"पर बात क्या है पवन?" विराज का चिंतित स्वर उभरा___"देख तू मुझसे कुछ भी मत छुपा ओके। चाची(पवन की माॅ) की तबीयत तो ठीक है ना? पूजा दीदी ठीक तो हैं ना मेरे भाई? सच सच बता न क्या बात है?"
"भाई परेशान न हो।" पवन ने कहा__"बस तू कल आजा भाई। बाॅकी सब कुछ तुझे यहाॅ आने पर ही पता चलेगा। तू आएगा न कल?"
"मैं आज ही रात की ट्रेन से निकल लूॅगा यहाॅ से।" विराज ने कहा___"कल दोपहर तक पहुॅच जाऊॅगा।"
"ठीक है भाई मैं तुझे बस स्टैण्ड पर ही मिलूॅगा।" पवन ने कहा___"मुझे पहुॅचते ही फोन कर देना।"
"आखिर बात क्या है यार?" विराज की आवाज़ आई___"तू बता क्यों नहीं रहा है?"
"तू आजा बस।" पवन ने कहा___"चल रखता हूॅ फोन।"
पवन ने फोन काट दिया। एक गहरी साॅस ली उसने और फिर रितू की तरफ देखते हुए कहा___"लीजिए दीदी। मेरा यार कल दोपहर को आ जाएगा यहाॅ।"
"तुमने मेरे वचन को झूठा होने से बचा लिया मेरे भाई।" रितू ने की ऑखें भर आई। उसने झपट कर पवन को अपने गले से लगा लिया।
"आपने भी तो मुझे पाप करने से बचाया दीदी।" पवन ने कहा___"आज तक मैं अपने मन में उस विधी को जाने कितना बुरा भला कहता था जिस विधी को मुझे प्रणाम करना चाहिए था।"
"ऐसी बातें मेरे भाई विराज का एक अच्छा दोस्त ही कह सकता है।" रितू ने पवन से अलग होकर कहा___"इतने ऊॅचे संस्कार उसके ही दोस्तों में हो सकते हैं। मुझे अपने भाई और उसके ऐसे दोस्तों पर नाज़ है। चलो अब मैं चलती हूॅ भाई। लेकिन एक विनती है तुमसे, विराज से ये मत कहना कि ये सब मैने कहा था तुमसे।"
"अरे मगर क्यों दीदी?" पवन चौंका था__"आप ऐसा क्यों चाहती हैं? अब तो आप उसे अपने गले से लगा लीजिए दीदी। क्यों अपनी बेरुखी और बेदर्दी से उसका दिल दुखाना चाहती हैं? या फिर मैं ये समझूॅ कि आपने वो सब जो कहा था वो सब एक झूठ था?"
"नहीं मेरे भाई।" रितू ने कहा___"मैं तो चाहती हूॅ कि अपने भाई को मैं अपने कलेजे से लगा लूॅ मगर मुझे ये भी पता है कि उसकी जान को खतरा भी है। अगर मेरे डैड को पता चल जाए कि विराज गाॅव आया हुआ है तो सोचो क्या होगा? इस लिए मैं सबसे पहले उसकी सेफ्टी का ख़याल रखूॅगी।"
"ओह दीदी सचमुच।" पवन ने कहा__"ये तो मैं भूल ही गया था। तो आप उसकी सेफ्टी के लिए क्या करेंगी दीदी?"
"वो तुम मुझ पर छोंड़ दो भाई।" रितू ने कहा___"मेरे रहते मेरे भाई को कोई छू भी नहीं सकेगा।"
रितू के चेहरे पर एकाएक ही कठोरता आ गई थी। पलक झपकते ही शेरनी की भाॅति ज़लज़ला नज़र आने लगा था उसके चेहरे पर।
पवन सिंह एक बार को तो काॅप ही गया था उसे इस रूप में देख कर।
रितू के मन में यही सब फिल्म की तरह चल रहा था। उसकी जिप्सी ऑधी तूफान बनी हवेली की तरफ दौड़ी जा रही थी। उसे पता था कि उसका बाप विराज को खोजने के लिए अपने आदमियों को लगाया हुआ है। संभव है कि अजय सिंह ने अपने आदमियों को गाॅव हल्दीपुर और शहर गुनगुन में भी फैला रखा हो। रितू के मन में सिर्फ एक ही विचार था कि विराज को किसी भी हालत में अपने बाप और उसके आदमियों की नज़र में नहीं आने देना है। ये उसकी जिम्मेदारी थी कि विराज पर किसी तरह का कोई संकट न आ पाए। क्योंकि वास्तविकता तो यही थी न कि विराज को उसने ही पवन सिंह के द्वारा बुलवाया है।
रितू की जिप्सी हवेली के गेट से अंदर दाखिल होते हुए पोर्च में जाकर रुकी। जिप्सी से उतर कर वह अंदर की तरफ बढ़ गई।
दोस्तो अपडेट हाज़िर है,,,,,,,,
मैने आप लोगों को अपनी दूसरी कहानी के अपडेट में बताया था कि मेरे रिलेटिव में शादी है इस लिए मुझे वापस घर जाना है। मैं उसी दिन घर के लिए निकल गया था दोस्तो। इसी लिए अपडेट नहीं दे पाया। आप लोग तो जानते हैं इस समय शादियों का सीजन चल रहा है। तो दोस्तो उसी के लिए वापस छुट्टी लेकर आया हूॅ घर।
ये अपडेट मैने जल्दी जल्दी में लिखा है ताकि आप लोगों को इरिटेट न होना पड़े। लेकिन इसके बाद अपडेट आने में देर हो सकती है दोस्तो इस लिए नाराज़ न होना।
धन्यवाद,,,,,
एक नया संसार ♡
अपडेट........《 40 》
अब तक,,,,,,,,
"ओह दीदी सचमुच।" पवन ने कहा__"ये तो मैं भूल ही गया था। तो आप उसकी सेफ्टी के लिए क्या करेंगी दीदी?"
"वो तुम मुझ पर छोंड़ दो भाई।" रितू ने कहा___"मेरे रहते मेरे भाई को कोई छू भी नहीं सकेगा।"
रितू के चेहरे पर एकाएक ही कठोरता आ गई थी। पलक झपकते ही शेरनी की भाॅति ज़लज़ला नज़र आने लगा था उसके चेहरे पर। पवन सिंह एक बार को तो काॅप ही गया था उसे इस रूप में देख कर।
रितू के मन में यही सब फिल्म की तरह चल रहा था। उसकी जिप्सी ऑधी तूफान बनी हवेली की तरफ दौड़ी जा रही थी। उसे पता था कि उसका बाप विराज को खोजने के लिए अपने आदमियों को लगाया हुआ है। संभव है कि अजय सिंह ने अपने आदमियों को गाॅव हल्दीपुर और शहर गुनगुन में भी फैला रखा हो। रितू के मन में सिर्फ एक ही विचार था कि विराज को किसी भी हालत में अपने बाप और उसके आदमियों की नज़र में नहीं आने देना है। ये उसकी जिम्मेदारी थी कि विराज पर किसी तरह का कोई संकट न आ पाए। क्योंकि वास्तविकता तो यही थी न कि विराज को उसने ही पवन सिंह के द्वारा बुलवाया है।
रितू की जिप्सी हवेली के गेट से अंदर दाखिल होते हुए पोर्च में जाकर रुकी। जिप्सी से उतर कर वह अंदर की तरफ बढ़ गई।
___________________________
अब आगे,,,,,,,,
पवन से फोन पर बात करने के बाद मैं थोड़ी देर के लिए गहरी सोच में डूब गया था।
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि पवन ने आख़िर किस वजह से मुझे गाॅव आने के लिए कहा था? पूछने पर भी उसने कुछ नहीं बताया था। काफी देर तक इस बारे में सोचने के बाद भी जब मुझे कुछ समझ न आया तो मैने अपने दिमाग़ से इस बात को झटक कर बाइक स्टार्ट की और घर की तरफ चल दिया।
रास्ते में मैं ये सोच रहा था कि गाॅव जाने के लिए माॅ से कैसे अनुमति मिलेगी मुझे? क्योंकि मेरे गाॅव जाने का सुन कर ही उनके होश उड़ जाना है और ये भी निश्चित था कि वो मुझे गाॅव जाने की इजाज़त किसी भी हाल में नहीं देंगी। लेकिन मेरा गाॅव जाना तो अब ज़रूरी हो गया था।
घर पहुॅच कर मैने बाइक को गैराज में लगाया और मुख्य दरवाजे के पास आ गया। डोर बेल पर उॅगली से पुश किया। अंदर बेल की आवाज़ गई। कुछ ही पलों में दरवाजा खुला। मेरी माॅ मेरे सामने दरवाजा खोल कर खड़ी थी। मुझ पर नज़र पड़ते ही उनके गुलाबी होंठो पर मुस्कान फैल गई।
"आ गया मेरा बेटा।" माॅ ने मेरे सिर से लेकर चेहरे तक अपना हाॅथ फेरते हुए कहा__"चल आजा हम सब तेरे आने का ही इन्तज़ार कर रहे थे।"
मैं के साथ चलते हुए ड्राइंग रूम में पहुॅचा। वहाॅ पर रखे सोफों पर जगदीश अंकल और अभय चाचा बैठे हुए थे। निधि शायद अपने कमरे में थी।
"तो कैसा रहा हमारे राज का काॅलेज में पहला दिन?" जगदीश अंकल ने मुस्कुरा कर कहा___"आई होप, बहुत ही बेहतर रहा होगा।"
"आपने सही कहा अंकल।" मैने एक सोफे पर बैठते हुए कहा___"और आपको पता है आज पहले ही दिन मेरी दोस्ती कुछ खास लोगों से हो गई है।"
"ओह ये तो बहुत अच्छी बात है बेटे।" अंईल ने कहा___"वैसे मैने सुना है कि काॅलेजों में रैगिंग वगैरा होती है। जिसमें सीनियर स्टूडेन्ट्स अपने जूनियर्स को कई तरह से परेशान करते हैं। सो तुम्हें तो किसी सीनियर ने परेशान नहीं किया न?"
"नहीं अंकल ऐसा कुछ नहीं था और थोड़ा बहुत तो चलता है।" मैने कहा।
"वैसे राज क्या नीलम से भी तुम्हारी मुलाक़ात हुई क्या?" अभय चाचा ने पूछा।
"हाॅ चाचा जी।" मैने कहा___"लेकिन बस हमने एक दूसरे को देखा ही है। कोई बात चीत न मैने की उससे और ना ही उसने।"
"तुम्हें वहाॅ पर देख कर हैरान तो बहुत हुई होगी वो।" चाचा ने कहा___"और अब वो ज़रूर फोन करके बड़े भइया को बताएगी कि तुम भी उसी काॅलेज में पढ़ रहे हो। उसके बाद भगवान ही जाने कि क्या होगा?"
"कुछ नहीं होगा भाई साहब।" सहसा जगदीश अंकल ने कहा___"ये मुम्बई है मुम्बई। यहाॅ पर आपके बड़े भाई साहब का राज नहीं चलेगा। यहाॅ अगर उन्होंने राज को छूने की भी कोशिश की तो पल भर में उनको नेस्तनाबूत कर दिया जाएगा।"
जगदीश अंकल की बात सुन कर अभय चाचा कुछ न बोले। कदाचित वो समझ गए थे कि जगदीश अंकल सच कह रहे थे। आज के वक्त में मैं कोई मामूली इंसान नहीं था। बल्कि मुम्बई शहर के टाॅप धन कुबेरों में मेरा नाम दर्ज़ हो चुका था।
ख़ैर, इन सब बातों के बीच मैं ये सोच रहा था कि गाॅव जाने की बात माॅ से कैसे कहूॅ? मेरे पास वैसे भी ज्यादा समय नहीं रह गया था। मैं अपनी जगह से उठ कर माॅ के पास उनके सोफे पर बैठ गया। मुझे अपने पास बैठते देख माॅ ने प्यार से एक बार फिर मेरे सिर पर हाॅथ फेरा। मेरे चेहरे की तरफ कुछ पल देखने के बाद कहा___"क्या बात है राज? कुछ कहना है क्या तुझे?"
"वो माॅ वो...मुझे न..वो मुझे।" मेरी आवाज़ अटक सी रही थी___"मुझे न आज और इसी समय गाॅव जाना होगा। बहुत ज़रूरी है।"
"क्या?????" माॅ मेरी बात सुन कर उछल ही पड़ी थी, बोली__"ये तू क्या कह रहा है? नहीं हर्गिज़ नहीं। तू गाॅव नहीं जाएगा। तेरे मन में गाॅव जाने का ख़याल आया कैसे?"
मेरी बात से माॅ तो उछली ही थी किन्तु उनके साथ ही साथ जगदीश अंकल और अभय चाचा भी बुरी तरह चौंके थे।
"ये तुम क्या कह रहे हो राज?" जगदीश अंकल ने हैरानी से कहा___"तुम्हें गाॅव किस लिए जाना है? आख़िर ऐसा क्या ज़रूरी काम आ गया?"
"वो पवन का फोन आया था मुझे काॅलेज से आते समय।" मैने कहा___"पवन मेरा बचपन का बहुत ही गहरा दोस्त है। उसी का फोन आया था। उसने मुझे अर्जेटली गाॅव बुलाया है। मैने उससे वजह पूछी मगर उसने बस इयना ही कहा कि तू बस आजा।"
मैने उन सबको पवन से हुई सारी बात बता दी। मेरी बातें सुनने के बाद ड्राइंगरूम में सन्नाटा सा छा गया।
"किसी का भी फोन हो और चाहे जितना भी ज़रूरी हो।" माॅ ने सन्नाटे को चीरते हुए कहा___"तू गाॅव नहीं जाएगा बस। मैं तुझे मौत के मुह में जाने की हर्गिज़ भी इजाज़त नहीं दूॅगी।"
"लेकिन तुम्हारे दोस्त को कोई वजह तो बताना ही चाहिये था राज।" जगदीश अंकल ने कहा___"भला ये क्या बात हुई कि फोन घुमा दिया और कह दिया कि तुम्हें यहाॅ आना है बस?"
"कहीं ऐसा तो नहीं भाई साहब कि राज का दोस्त अजय भइया के हाथ लग गया हो और ये सब बातें उसने उनके ही कहने पर की हों?" अभय चाचा ने कुछ सोचते हुए कहा___"यकीनन ऐसा हो सकता है। उन्होंने कहीं से पता कर लिया होगा कि गाॅव में राज का कोई दोस्त है जो अक्सर राज से फोन पर बातें करता रहता है। इस लिए उन्होंने उसे पकड़ लिया होगा और डरा धमका कर फोन करवाया होगा।"
"आपकी बातों में यकीनन वजन है भाई साहब।" जगदीश अंकल ने कहा___"यकीनन ऐसा हुआ होगा। उन्होंने राज के दोस्त को मजबूर किया होगा इस सबके लिए।"
"उसने जब मुझसे फोन पर बात की थी तब ऐसा बिलकुल भी नहीं लग रहा था कि वो किसी के द्वारा मजबूर किया गया है।" मैने कहा___"वो बिलकुल नार्मली ही बातें कर रहा था। हाॅ थोड़ा थोड़ा दुखी और उदास सा ज़रूर समझ में आ रहा था।"
"ये सब बातें छोंड़िये आप लोग।" सहसा माॅ ने कहा___"राज कहीं नहीं जाएगा बस। ये मेरा आख़िरी फ़ैसला है।"
"लेकिन बहन।
" जगदीश अंकल ने कहा___"पता तो चलना ही चाहिए कि बात क्या है? मान लो कि सचमुच कोई ऐसी बात हो जिससे राज का वहाॅ पर जाना बहुत ज़रूरी ही हो तब क्या? ये सब संभावनाएॅ हैं। हमें सच्चाई जानना ज़रूरी है। एक काम करो राज तुम अभी अपने दोस्त को फोन लगाओ और उससे बात करो। हम सब सुनेंगे कि बात क्या है।"
मुझे जगदीश अंकल की बात सही लगी इस लिए मैने फोन निकाल कर तुरंत पवन को फोन लगा कर स्पीकल ऑन कर दिया। कुछ देर फोन की रिंग जाने की आवाज़ आती रही।
"हाॅ भाई चल दिया क्या वहाॅ से?" उधर से पवन का स्वर उभरा।
"यार मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि आख़िर ऐसा क्या ज़रूरी काम है जिसकी वजह से तूने मुझे वहाॅ अर्जेंट बुलाया है?" मैने कहा।
"मेरे भाई मैं तुझे फोन पर नहीं बता सकता। तू बस आजा और खुद अपनी ऑखों से देख सुन ले।" उधर से पवन अधीर भाव से कह रहा था___"मुझे पता है भाई कि तेरा यहाॅ पर आना खतरे से खाली नहीं है। मैं खुद भी तुझे किसी ऐसे खतरे में डालने का सोच भी नहीं सकता। लेकिन भाई बात ही ऐसी है कि तुझे बुलाना पड़ रहा है यहाॅ। भाई तुझे हमारी दोस्ती की कसम है, तू आजा भाई। चाहे दो पल के लिए ही आजा लेकन आजा भाई। मैं तेरे हाॅथ जोड़ता हूॅ, तू आजा मेरे यार।"
"अच्छा ये बता कि तू किसी के दबाव में या किसी के द्वारा मजबूर हो कर तो नहीं बुला रहा न मुझे?" मैने बाॅकी सबकी तरफ नज़रें घुमा कर देखते हुए कहा था।
"ये तू क्या कह रहा है राज?" पवन के स्वर में हैरानी थी, बोला___"भाई तू सोच भी कैसे सकता है कि मैं किसी के द्वारा मजबूर होकर तुझे खतरे में डाल दूॅगा? मैं मर जाऊॅगा भाई लेकिन ऐसा कभी नहीं कर सकता।"
"चल ठीक है भाई मैं आने की कोशिश करूॅगा।" मैने कहा।
"कोशिश नहीं भाई।" पवन ने कहा__"तुझे ज़रूर आना है। कल मैं तुझे बस स्टैण्ड पर ही मिलूॅगा। तेरे बड़े पापा के आदमी काफी समय से यहाॅ आस पास नहीं दिखे हैं। शायद उन्हें यकीन हो गया है कि अब तू गाॅव नहीं आएगा। किसी को कानो कान खबर नहीं होगी तेरे आने की। तू फिक्र मत ईर भाई। तू बस आजा।"
"चल ठीक है।" मैने कहा और फोन काट दिया।
"तुम्हारे दोस्त की बातचीत से तो साफ पता चलता है कि वो ये सब किसी के द्वारा मजबूर होकर नहीं बल्कि अपनी स्वेच्छा से कह रहा है।" जगदीश अंकल ने कहा___"लेकिन अब सवाल यही है कि आख़िर किस अर्जेन्ट काम के लिए उसने तुम्हें गाॅव आने के लिए कहा हो सकता है? उसने इस बारे में कुछ भी नहीं बताया। बस यही कहा कि तुम खुद अपनी ऑखों से देख सुन लो। भला ऐसी क्या बात हो सकती है जिसे अपनी ऑखों और कानों से देखने सुनने की बात की उसने?"
"ये तो वहाॅ जाकर ही पता चलेगा अंकल।" मैने कहा___"मेरा ये दोस्त ऐसा है कि मेरे बारे में कभी भी अहित नहीं सोच सकता। यही वो दोस्त है जिसने अब तक मुझे हवेली में रहने वाले लोगों की पल पल की ख़बर दी।
चाचा जी जब आप यहाॅ आ रहे थे तब भी इसी ने फोन करके मुझे बताया था कि आप यहाॅ आ रहे हैं। हवेली में कुछ बात हो गई थी जिसकी वजह से हवेली में उस समय तनाव हो गया था।"
"कोई भी वजह हो तू गाॅव नहीं जाएगा मेरे बच्चे।" माॅ की ऑखों में ऑसू आ गए__"मैं तुझे नहीं जाने दूॅगी। तू यहीं मेरी नज़रों के सामने ही रहेगा।"
"आपकी इजाज़त के बिना तो मैं वैसे भी कहीं नहीं जाऊॅगा माॅ।" मैने माॅ की ऑखों से ऑसू पोंछते हुए कहा___"लेकिन ये तो आपको भी पता है न कि जो खेल शुरू हो चुका है उसको अंजाम तक ले जाना मेरा संकल्प है और फर्ज़ भी। आपका बेटा न पहले कायर और बुजदिल था और ना ही अब है। उन्होंने धोखे से हम पर वार किया था जबकि मैं सामने से उनके सीने पर वार करूॅगा।"
"ऐसा ही होगा राज बेटे।" अभय चाचा ने कहा___"मुझे सारी सच्चाई का भाभी से पता चल चुका है। इस लिए अब इस लड़ाई में मैं भी तुम्हारे साथ हूॅ। बस चिंता एक ही बात की है कि तेरी चाची और तेरे भाई बहन भले ही तेरे मामा जी के यहाॅ हैं लेकिन वो सुरक्षित नहीं हैं वहाॅ। काश! मुझे पता होता तो उन्हें भी अपने साथ ही ले आता यहाॅ।"
"अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है भाई साहब।" जगदीश अंकल ने कहा___"करूणा बहन और उसके बच्चों को सुरक्षित यहाॅ बुलाया जा सकता है।"
"वो कैसे भाई साहब?" चाचा जी के माथे पर बल पड़ता चला गया।
"गौरी बहन।" जगदीश अंकल ने माॅ की तरफ देखते हुए कहा___"तुम राज की ज़रा भी फिक्र मत करो। राज यहाॅ से गाॅव ज़रूर जाएगा लेकिन अकेला नहीं। मैं राज के साथ एक ऐसे शख्स को भेजूॅगा जो हर पल राज के साथ उसका सुरक्षा कवच बन कर रहेगा। अभय भाई साहब अपने ससुराल में फोन कर देंगे, और समझा देंगे कि कैसे उन लोगों को वहाॅ से यहाॅ आना है।"
"भइया आप भी??" माॅ ने फिक्रमंदी से कहा___"आप भी इसे भेजने की ही बात कर रहे हैं?"
"मेरी बहन मैने कहा न तुम राज की बिलकुल भी चिंता न करो।" जगदीश अंकल ने कहा___"राज अगर तुम्हारा बेटा है और तुम्हारे प्राण उस पर बसते हैं तो ये समझ लो कि मेरे प्राण भी राज पर ही बसते हैं। मैं राज के ऊपर लेश मात्र का भी खतरा नहीं चाह सकता। मगर मैं ये भी जानता हूॅ कि राज के सामने प्यार और ममता की दीवार खड़ी करके उसे उसके कर्तब्य पथ पर जाने से रोंकना भी उचित नहीं है। खतरा तो इंसान के जीवन का एक हिस्सा है बहन। इंसान का हर दिन एक नया जन्म होता है और हर दिन एक मृत्यु होती है। सुबह की पहली किरण के साथ ही इंसान के नये जीवन की शुरूआत हो जाती है और फिर जब इंसान रात में सो जाता है तो वह एक तरह से मृत समान ही हो जाता है। ख़ैर, मैं ये कह रहा हूॅ कि तुम अपने इस भाई पर यकीन रखो। मैं राज पर किसी भी तरह का संकट नहीं आने दूॅगा।"
जगदीश अंकल की बात सुन कर माॅ कुछ न बोली। बस ऑखों में नीर भरे देखती रही उन्हें।
"राज तुम जाने की तैयारी करो।
" जगदीश अंकल ने कहा___"तब तक मैं भी उस शख्स को फोन कर के बुला लेता हूॅ और तुम दोनो के लिए ट्रेन की टिकट का भी इंतजाम कर देता हूॅ।"
जगदीश अंकल की बात सुन कर मैने माॅ की तरफ देखा। माॅ ने अपने सिर को हल्का सा हिला कर मुझे जाने की इजाज़त दे दी। मैं तुरंत ही उठ कर अपने कमरे की तरफ तेज़ी से बढ़ गया। लगभग पन्द्रह मिनट बाद मैं तैयार होकर तथा एक छोटे से पिट्ठू बैग में कुछ कपड़े व कुछ ज़रूरी चीज़ें डाल कर कमरे से बाहर आ गया।
कमरे से बाहर आकर मुझे निधि का ख़याल आया। मैं उसके कमरे की तरफ बढ़ गया। दरवाजे को बाहर से नाॅक कर उसे आवाज़ दी मगर अंदर से कोई प्रतिक्रिया न हुई। मैंने दरवाजे को अंदर की तरफ धकेला तो वो खुलता चला गया। कमरे के अंदर दाखिल होकर मैने देखा कि निधि बेड पर करवॅट लिए सो रही थी। सोते हुए वो बिलकुल मासूम सी बच्ची लग रही थी। मुझे उस पर बड़ा प्यार आया। मैने झुक कर उसके माथे पर हल्के से चूॅमा और फिर झुके हुए ही कहा___"अपना ख़याल रखना गुड़िया। मैं गाॅव जा रहा हूॅ अभी। जल्द ही वापस आऊॅगा।"
इतना कह कर मैंने एक बार फिर से उसके माथे को चूमा फिर पलट कर कमरे से बाहर आ गया। इस बात से अंजान कि मेरे बाहर आते ही निधि ने अपनी ऑखें खोल दी थी। उन समंदर सी गहरी ऑखों में ऑसू तैर रहे थे।
ड्राइंगरूम में जब मैं पहुॅचा तो देखा एक अंजान ब्यक्ति एक तरफ सोफे पर बैठा था। दिखने में हट्टा कट्टा था। ऊम्र यही कोई तीस या पैंतीस के बीच रही होगी उसकी। चेहरे पर पत्थर जैसी कठोरता विद्यमान थी। जबड़े कसे हुए लग रहे थे।
"राज बेटा इनसे मिलो।" मुझे देखते ही जगदीश अंकल ने उस ब्यक्ति की तरफ इशारा करते हुए कहा___"ये हैं आदित्य चोपड़ा। ये काफी अच्छे मार्शल आर्टिस्ट हैं। ये सबको सिक्योरिटी प्रोवाइड करते हैं। मैने इन्हें सबकुछ समझा दिया है। अब से ये हर पल तुम्हारे साथ तुम्हारा साया बन कर रहेंगे।"
"ओह हैलो।" मैने कहने के साथ ही उसकी तरफ हैण्ड शेक करने के लिए हाथ बढ़ाया। उसने भी हैलो करते हुए मुझसे हाथ मिलाया। उसके हाॅथ मिलाने से ही मुझे महसूस हो गया कि ये बंदा काफी ठोस व मजबूत है।
ख़ैर सबसे आशीर्वाद लेकर मैं बाहर की तरफ चल दिया। मेरे साथ ही बाॅकी सब भी बाहर आ गए। कार की तरफ जाने से पहले माॅ ने मुझे अपने सीने से लगा कर प्यार दिया। आदित्य ने कार की ड्राइविंग शीट सम्हाली। जबकि मैं और जगदीश अंकल कार की पिछली शीट पर बैठ गए। उसके बाद कार रेलवे स्टेशन की तरफ तेज़ी से बढ़ चली। जगदीश अंकल मेरे साथ इस लिए थे ताकि वापसी में वो स्टेशन से कार वापस ला सकें।
रेलवे स्टेशन पहुॅच कर मैने जगदीश अंकल को वापस घर जाने का कह दिया। उन्होंने मुझे कुछ हिदायतें दी और शुभकामनाएॅ भी। उनके जाने के बाद मैं और आदित्य प्लेटफार्म की तरफ बढ़ गए।
प्लेटफार्म में जब हम पहुॅचे तो ट्रेन जाने ही वाली थी। इस लिए हम दोनो एसी फर्स्ट क्लास की तरफ दौड़ चले। कुछ ही देर में हम दोनो अपनी अपनी शीटों पर आ गए थे।
_____________________________
काॅलेज में हुई घटना से नीलम मानसिक रूप से काफी दुखी हो गई थी और जिस तरह से विराज ने वहाॅ पर आकर उसकी इज्ज़त को तार तार होने से बचाया था वो उसके लिए निहायत ही अविश्वसनीय था। उसने तो कल्पना भी न की थी कि उसके चाचा का लड़का यानी कि उसका भाई जो उमर में उससे मात्र दस दिन बड़ा था वो यहाॅ पर आएगा और इस तरह से उसकी इज्ज़त को मिट्टी में मिल जाने से बचाएगा।
उसने तो माॅम डैड के मुख से अक्सर यही सुना था कि विराज मुम्बई में किसी होटेल या ढाबे में कप प्लेट धोता होगा। मगर मुम्बई के इतने बड़े काॅलेज में जहाॅ पर एडमीशन लेने के लिए हाई पर्शेन्टेज मार्क्स का होना और अच्छे खासे पैसे का होना अनिवार्य था उस काॅलेज में विराज को एक स्टूडेंट के रूप में देख कर नीलम के आश्चर्य की कोई सीमा न रही थी।
विराज को अपने इस काॅलेज में देख कर नीलम को ये तो समझ में आ गया था कि उसके माॅम डैड विराज के बारे में जो सोच और विचार रखे हुए हैं वो सिरे से ही ग़लत है। आज काॅलेज में हुई घटना के बाद नीलम जैसे पत्थर की मूर्ति में परिवर्तित हो गई थी। उसने देखा था कि कैसे विराज ने उन लड़कों को दो मिनट में धूल चटाया था उसके बाद उसने उसका दुपट्टा उसे लौटाया था। किन्तु जब उसने देखा कि जिसे वह दुपट्टा दे रहा था वो उसी की चचेरी बहन थी तो उसने तुरंत उससे मुह फेर लिया था और उसके पास से चला गया था।
नीलम को तो काफी देर तक कुछ समझ न आया था कि वह क्या करे? वो तो बुत बन गई थी। अपने भाई के सामने उसकी स्थित दो कौड़ी की न रह गई थी। उस भाई के सामने जिसे उसके माॅम डैड दो कौड़ी का भी नहीं समझते थे और वो खुद भी कभी उसे अपने भाई का दर्जा नहीं देती थी।
काफी देर बाद जब नीलम की तंद्रा टूटी तो वह बदहवास सी होकर कंटीन की तरफ खिंची चली गई थी। मगर कंटीन में जो नज़ारा उसे देखने को मिला उसने उसे और भी ज्यादा हैरान कर दिया। जिस विराज को वो आज तक एक सीधा सादा और दो कौड़ी का भी नहीं समझती थी वो आज इतना खतरनाक दिख रहा था कि आशू राना के हट्टे कट्टे भाई को अधमरा कर दिया था। उसकी ऑखों के सामने उसने भूषण को पहले तो अधमरा किया और फिर उसे खुद ही आशू के साथ हास्पिटल भी ले गया।
काॅलेज में पहले दिन ही इस तरह की घटना से सनसनी सी फैल गई थी। वो खुद भी मानसिक रूप से ब्यथित थी इस लिए वह काॅलेज से सीधा अपनी बड़ी मौसी पूनम के घर चली गई थी। इस वक्त वह अपने कमरे में बेड पर पड़ी हुई थी। उसकी ऑखें ऊपर छत पर घूम रहे पंखे को अपलक देखे जा रही थी।
नीलम की ऑखों के सामने बार बार वही मंज़र आ रहा था। उसे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि वो विराज ही था।
उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसने खुली ऑखों से कोई ख्वाब देखा था। मगर हकीक़त उसे अच्छी तरह पता थी। काॅलेज से जल्दी आ जाने पर उसकी मौसी ने पूछा था कि इतना जल्दी काॅलेज से कैसे आ गई वह? मगर उसने गोल मोल जवाब दे दिया था और सीधा अपने कमरे में बेड पर लेट गई थी।
वह विराज से नफ़रत तो नहीं करती थी किन्तु हाॅ उसे वह अपना भाई भी नहीं मानती थी और ना ही उसकी नज़र में उसकी कोई अहमियत थी। उसके माॅम डैड बचपन से ही ये हिदायत देते थे कि विराज, निधि और उसके माॅ बाप अच्छे लोग नहीं हैं। इनसे न कभी बात करना और ना ही कभी इनके पास जाना। ये हमारे कुछ नहीं लगते हैं। बचपन से एक ही पाठ पढ़ाया गया था इन्हें। समय के साथ साथ उसी तरह की सोच भी बन गई थी इनकी। हालात ऐसे बनाए गए थे कि इन लोगों ने कभी ये सोचा ही नहीं कि हम जिनके बारे में ऐसी धारणा बनाए बैठे हैं वो वास्तव में वैसे हैं भी या नहीं? समय गुज़रा और फिर वो सब हादसे हुए जिनसे इनकी सोच में और भी ज्यादा वो सब बातें बैठ गईं।
मगर आज के हादसे ने नीलम के अस्तित्व को हिला कर रख दिया था। उसे उस सोच और धारणा के महासागर से बाहर निकाल दिया जिस महासागर में आज तक वो डूबी हुई गोते लगा रही थी। कहते हैं कि समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। समय बदलता रहता है और बदलते हुए समय के साथ ही साथ इंसान की सोच भी बदलती रहती है। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो एक ही बात को गाॅठ बाॅध कर जीवन भर ढोते रहते हैं। उन्हें किसी की बात सही नहीं लगती। वो हमेशा अपनी ही सोच को यथार्थ और हकीक़त मान कर जीते हैं। उन्हें अपनी सोच और धारणा के ग़लत होने का तब पता चलता है जब वक्त खुद उन्हें आईना दिखाता है या एहसास कराता है।
नीलम के पास आज वही वक्त आईना दिखाने आया था और आईना दिखा कर उसने उसे एहसास करा दिया था कि अब तक वो कितना ग़लत थी जो अपने माता पिता के द्वारा मिली सीख और निर्देशों पर चल रही थी। वक्त ने आकर उसे आईना दिखाया, एहसास कराया और उससे एक सवाल भी कर गया कि 'अगर ये इतना ही बुरा होता तो आज किसी काॅलेज में किसी लड़की की इज्ज़त बचाने के लिए इतनी भीड़ में से अकेला नहीं आता। ये तो उसे बाद में पता चला कि वो लड़की कोई और नहीं बल्कि उसकी बहन ही थी। अपनी जान को खतरे में डाल कर आज के युग में कौन किसी के लिए ऐसा करता है? ये तो वही कर सकता है जो सच्चा होता है और जो किसी बेकसूर व मजलूम पर अत्याचार होते नहीं देख सकता। बल्कि अत्याचार करने वाले से भिड़ जाता है फिर चाहे भले ही खुद उसकी जान ही क्यों न चली जाए।
नीलम की ऑखों के सामने बचपन से लेकर अब तक की सारी यादें किसी फिल्म की तरह चलने लगी। उसे याद आया कि एक बार हवेली में उससे एक कीमती मूर्ति गिर कर टूट गई थी, उस वक्त नीलम और शिवा ही थे। आवाज़ सुन कर विराज भी आ गया था। वो मूर्ति के टुकड़ों को पास से जाकर देखने लगा था।
उसी वक्त विजय चाचा और नैना बुआ भी आ गई थी। विजय चाचा ने मूर्ति को टूट कर बिखरी हुई देख कर पूछा था कि ये किसने तोड़ा तो शिवा जो कि छोटा ही था उस वक्त उसने भोलेपन में डर की वजह से तुरंत नीलम की तरफ उॅगली कर दिया था। मगर तभी विराज ने कहा था कि उससे ही गिर कर टूट गई थी वो मूर्ति। उसकी बात सुनकर विजय चाचा ने विराज की काफी ज्यादा पिटाई कर दी थी। विराज पिटता रहा मगर मुख से ये न बताया था कि मूर्ति असल में नीलम से टूटी थी।
ज़ोरदार पिटाई के चलते विराज की हालत ख़राब हो गई थी, जबकि वो और उसके भाई बहन उसके पिट जाने पर बहुत खुश थे। एक बार अजय सिंह की जेब से शिवा ने पैसे चुरा लिए थे और चुराकर शिवा ने कमरे में सो रहे विराज की शर्ट की जेब में वो पैसा डाल दिया था। ये सब सिर्फ इस लिए मिली भगत द्वारा किया गया था ताकि विराज की फिर से पिटाई हो और वही हुआ भी। शिवा नीलम को लेकर अपने बाप के पास गया और उससे बोला कि डैड विराज ने आपकी जेब से पैसा चुराया है जिसे उसने अपनी ऑखों से देखा है। बस फिर क्या था अजय सिंह को तो बहाना चाहिए होता था विजय सिंह और उसके बच्चों को उल्टा सीधा बोलने के लिए। तलाशी में वो पैसा विराज की शर्ट की जेब में मिल ही गया। उसके बाद विजय सिंह ने सोते हुए विराज की पिटाई शुरू कर दी। बेचारे को समझ ही न आया था कि वो किस बात पर मार खा रहा था। जबकि उसकी पिटाई से नीलम शिवा और रितू ये तीनों बड़ा खुश हो रहे थे।
ऐसी बहुत सी बातें थी जो इस वक्त नीलम की ऑखों के सामने घूम रही थी। विराज में एक खासियत ये थी कि वो अपनी सफाई में कभी कुछ नहीं बोलता था। मार खाने के बाद और इतना ज्यादा जलील होने के बाद भी वह इन लोगों के साथ खेलने के लिए आ जाता था। ये अलग बात थी कि ये लोग उसे दुत्कार कर भगा देते थे।
नीलम को पता ही नहीं चला कि कब उसकी ऑखों में ऑसू भर आए थे। पता तो तब चला जब वो ऑसू दोनो ऑखों की कोरों से बहते हुए कानों गिरे। एक हूक सी उठी दिलो दिमाग़ में उसके। मनो मस्तिष्क झनझना कर रह गया। भावनाओ और जज़्बातों का एकाएक ही तीब्र तूफान उठ खड़ा हुआ। हृदय का जब परिवर्तन होता है तो एक नये युग का प्रारंभ हो जाता है। परिवर्तन अगर नफ़रत के लिए होता है तो बहुत जल्द एक बड़े अनिष्ट की नियति बन जाती है और अगर प्रेम के लिए होता है तो एक नया संसार बनने लगता है।
"मुझे माफ़ कर दे भाई।" भावना या जज़्बात जब प्रबल हो जाते हैं तो कोई धैर्य कोई संयम नहीं हो सकता। बल्कि हर दरो दीवार को तोड़ते हुए हृदय में ताण्डव करते हुए जज़्बात ऑखों के रास्ते से ऑसू बन कर बहने लग जाते हैं_____"माफ़ कर दे मुझे। कितना ग़लत सोचती थी आज तक मैं तेरे बारे में। मगर तू तो पहले भी हीरा था भाई और आज भी हीरा है।
बचपन से लेकर आज तक हमेशा तुझे जलील किया अपमानित किया और न जाने कैसे कैसे इल्ज़ाम लगा कर तुझे तेरे ही पिता जी से पिटवाया। कोई इतना बुरा कैसे हो सकता है भाई? और तू इतना अच्छा कैसे हो सकता है? आज जिस तरह से तूने मुझे अनदेखा कर के अजनबीपन दिखाया उसने मुझे समझा दिया है भाई कि मेरी औकात तेरे सामने कुछ भी नहीं है।"
नीलम खुद से ही बड़बड़ाये जा रही थी और ऑसू बहाए जा रही थी। अभी वह रो ही रही थी कि सहसा किसी ने उसके कंधे पर हाॅथ रखा। वह बुरी तरह उछल पड़ी। पलट कर देखा तो बगल से ही उसकी मौसी की दूसरी बेटी सोनम उसकी तरफ झुकी हुई खड़ी थी।
दोस्तो यहाॅ पर मैं नीलम की मौसी और उसके परिवार का संक्षिप्त परिचय देना चाहूॅगा,,,,,,,,,
●पूनम सिंह, ये नीलम की माॅ यानी प्रतिमा की बड़ी बहन है। इस नाते ये नीलम की मौसी लगती है। ऊम्र पचास के आसपास। प्रतिमा की तरह ही दिखने में बेहद सुंदर है।
●महेश सिंह, ये नीलम के मौसा और पूनम के पति हैं। ऊम्र पचपन के आसपास। पेशे से डाॅक्टर हैं।
● अंजली सिंह, ये नीलम की मौसी की बड़ी बेटी है। ऊम्र पच्चीस के आसपास। दिखने में बहुत ही खूबसूरत है। पेशे से ये भी डाॅक्टर है। अभी शादी नहीं हुई है इसकी।
●सोनम सिंह, ये नीलम के मौसी की दूसरी बेटी है। ऊम्र बाईस साल है। अपनी बहन की ही तरह खूबसूरत है। ये काॅलेज में साइंस से एम एस सी कर रही है।
● विकास सिंह, ये नीलम की मौसी का इकलौता व सबसे छोटा बेटा है। ऊम्र उन्नीस के आसपास। अपने बाप महेश की तरह ही ये भी डाॅक्टर बनना चाहता है।
दोस्तो ये था नीलम की मौसी का संक्षिप्त परिचय। अब कहानी की तरफ चलते हैं,,,,,,,
"दीदी आप।" सोनम पर नज़र पड़ते ही नीलम लगभग हड़बड़ा गई थी।
"हूॅ तो मैं ही।" सोनम ने मुस्कुराते हुए कहा___"मगर तू चाहे तो कुछ और भी समझ सकती है। ख़ैर, ये बता कि कौन है वो?"
"क क्या मतलब??" नीलम बुरी तरह चौंकी थी।
"मतलब कि वो कौन है जिसकी याद में तू ऑसू बहा रही है?" सोनम कहने के साथ ही बेड पर बैठ गई____"तू मुझे बता सकती है नीलम। मैं तेरी बड़ी बहन से कहीं ज्यादा तेरी दोस्त की तरह हूॅ। अब चल बता कि कौन है वो जिसने मेरी प्यारी सी दोस्त की ऑखों को रुलाया है?"
"ऐसा कुछ नहीं है दीदी।" नीलम ने कहा__"ये ऑसू तो पश्चाताप के हैं। आज तक जिसे अजनबी समझकर उसे जलील और दुत्कारती रही थी उसी ने आज मेरी इज्ज़त बचाई दीदी।"
"क्या???" सोनम उछल पड़ी___"ये तू क्या कह रही है नीलम? क्या हुआ था आज काॅलेज में तेरे साथ? सच सच बता मुझे।"
नीलम ने उसे सब कुछ बता दिया कि कैसे आशू राना नाम का लड़का अपने कुछ दोस्तों के साथ उसकी रैगिंग कर रहा था। उसने उसे कहा था कि वो उसके साथ साथ उसके दोस्तों के होठों को भी चूमे। उसकी इस बात पर उसने आशू राना को थप्पड़ मार दिया था। जिससे आशू राना ने सबके सामने उसकी इज्ज़त लूटने की कोशिश की।
तभी उस भीड़ से निकल कर कोई आया और उसने आशू राना के साथ साथ उसके सभी दोस्तों की खूब पिटाई कर उसकी इज्ज़त को लटने से बचाया था। नीलम ने सारी बात सोनम को बता दी। नीलम की सारी बातें सुनकर सोनम हैरान रह गई थी।
"तो वो लड़का तेरा चचेरा भाई है?" सोनम ने कहा___"जिसे आज तक तू भाई नहीं मानती थी। बात कुछ समझ में नहीं आई नीलम। भला ऐसा तू कैसे कर सकती है?"
"वही तो दीदी।" नीलम की ऑखें छलक पड़ीं___"अपने फरिश्ता जैसे भाई के साथ मैने आज तक वो सब कैसे किया? आज की उस घटना ने मुझे एहसास करा दिया दीदी कि कितनी बुरी हूॅ मैं। जिसकी ऑखों में अपने लिए हमेशा प्यार और सम्मान देखा था आज उसी ऑखों में अपने लिए हिकारत के भाव देखा है मैने। वो ऐसे मुह फेर कर चला गया था जैसे उससे मेरा कोई दूर दूर नाता नहीं है। उस वक्त मुझे पहली बार लगा दीदी कि मैं उसकी नज़र में क्या रह गई हूॅ। सच ही तो है, आख़िर उसकी नज़र में मेरी कोई औकात हो भी कैसे सकती है? मैने और मेरे माॅ बाप ने हमेशा उसे और उसके माॅ बाप को तुच्छ समझा था।"
"ये तू क्या कह रही है नीलम?" सोनम बुरी तरह हैरान थी, बोली___"ये तू कैसी बातें कर रही है? आख़िर बात क्या है?"
"सारी बातें तो मुझे भी नहीं पता दीदी लेकिन इतना समझ गई हूॅ कि बचपन से मेरे माॅम डैड ने जिनके बारे में ऐसा करने की सीख दी थी वो ग़लत था।" नीलम ने कहा___"किसी के बारे में खुद भी तो जाॅचा परखा जाता है न? ऐसा तो नहीं होना चाहिए न कि हमें किसी ने जो कुछ बता दिया उसे ही सच मान लें और फिर सारी ऊम्र उसी को लिए बैठे रहें। कीचड़ अगर इतना ही गंदा होता तो उसमें कमल जैसा फूल कभी नहीं खिलता। गंदगी तो वहाॅ भी होती है दीदी जिस जगह को लोग पाक़ समझते हैं।"
"मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा नीलम कि तू ये सब क्या कहे जा रही है?" सोनम ने उलझनपूर्ण भाव से कहा था।
"बताऊॅगी दीदी।" नीलम ने कहा___"सब कुछ बताऊॅगी आपको। लेकिन इस वक्त नहीं। इस वक्त मुझे अकेला छोंड़ दीजिए। मुझे अकेला छोंड़ दीजिए दीदी।"
कहने के साथ ही नीलम फूट फूट कर रोने लगी थी। सोनम ने उसे खींच कर अपने से छुपका लिया था।
___________________________
उथर हवेली में।
रितू जब हवेली पहुॅची तो शाम हो चुकी थी। अजय सिंह हवेली में नहीं था बल्कि फैक्टरी में था। फैक्टरी का काम लगभग पूरा ही हो गया था। बस कुछ ही दिनों में फैक्टरी चालू हो जानी थी। रितू अंदर आते ही अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। किचेन में प्रतिमा और नैना डिनर तैयार कर रही थी।
कमरे में पहुॅच कर रितू ने अपने कपड़े बदले और फिर बाथरूम की तरफ बढ़ गई। बीस मिनट बाद जब वह बाथरूम से बाहर आई तो उसकी नज़र बेड पर पड़े आई फोन पर पड़ी। आई फोन पर किसी का काॅल आ रहा था। फोन साइलेन्ट मोड पर था।
रितू टाॅवेल को अपने संगमरमरी बदन पर लपेट कर तेज़ी से बेड के पास पहुॅची और फोन को उठा कर स्क्रीन पर फ्लैश कर रहा नंबर को देखा। नंबर को देख कर उसके होठों पर हल्की सी मुस्कान उभ आई।
"हैलो।" फिर उसने काॅल रिसीव करते ही कहा।
".............. ।" उधर से कुछ कहा गया।
"क्या सच कह रहे हो तुम?" रितू के चेहरे पर खुशी के भाव उभर आए थे।
".............।" उधर से फिर कुछ कहा गया।
"ठीक है भाई।" रितू ने धीमे स्वर में कहा___"तुम उसे रिसीव कर लेना और अपने साथ ही पहले घर ले जाना। उसके बाद मैं तुम्हें फोन करूॅगी और बताऊॅगी कि अब तुम उसे अपने साथ वहाॅ पर ले आओ।"
"..............।" उधर से फिर कुछ कहा गया।
"डोन्ट वरी भाई।" रितू ने कहा___"मैं सब देख लूॅगी। चलो अब रखती हूॅ फोन।"
रितू ने कहा और फोन कट कर दिया। फिर मन ही मन कहा___"आजा मेरे भाई। तेरी विधी तुझे बस एक बार देखने के लिए ही ज़िदा है। अपने आपको सम्हालना मेरे भाई। मैं जानती हूॅ कि वो लम्हाॅ तेरे लिए बेहद दर्दनाक होगा। मगर खुद को सम्हालना भाई। काश! ये सब न हुआ होता। हे भगवान ये तूने मेरे भाई के साथ क्या कर दिया है। कितना दुख दर्द देगा तू उसे? नहीं नहीं, मैं अपने भाई को कोई दुख दर्द सहने नहीं दूॅगी। उसको अपने सीने से लगा कर खूब प्यार दूॅगी मैं। अब तक तो मैने उसे नफ़रत ही दी थी लेकिन अब बेइंतेहां प्यार दूॅगी उसे। हाॅ हाॅ खूब प्यार दूॅगी उसे।"
ऑखों से छलक आए ऑसुओं को पोंछा रितू ने और फिर आलमारी की तरफ बढ़ गई। आलमारी से रात में पहनने वाले कपड़े निकाल कर उसने उन्हें पहना और फिर कमरे से बाहर आ गई।
रात में सबने एक साथ डिनर किया। रितू ने देखा कि उसका भाई शिवा भी आ गया था। वह उससे बड़े प्यार व चापलूसी के से अंदाज़ में मिला था। रितू को उसे और उसके इस अंदाज़ पर आज पहली बार नफ़रत सी हुई थी। हलाॅकि वो जैसा भी था उसका सगा भाई ही था। अजय सिंह भी फैक्ट्री से आ गया था। सबने डिनर किया और इसी बीच थोड़ी बहुत बातें भी हुईं। उसके बाद सब अपने अपने कमरों में सोने के लिए चले गए।
उस वक्त रात के बारह बजे के आस पास का वक्त था। हवेली में हर तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। हवेली के अंदर अॅधेरा तो था मगर पूरी तरह नहीं क्योंकि खिड़कियों से चाॅद की रोशनी और अंदर लगे नाइट बल्ब की धीमी रोशनी थी। विराज के आने की खुशी में रितू को नींद नहीं आ रही थी। उसके मन में तरह तरह के ख़याल बन रहे थे। कभी उसका चेहरा खुशी से चमकने लगता तो कभी एकदम से उदास सा हो जाता। बेड पर इधर से उधर करवॅट बदलते हुए पल पल गुज़रता जा रहा था। मगर उसे ऐसा प्रतीत हो रहा जैसे रात का ये वक्त तो जैसे एक जगह ठहर ही गया था। रितू को लग रहा था कि ये रात कितना जल्दी गुज़र जाए और सुबह हो जाए। ऐसे ही बारह बज गए थे।
उसे प्यास लगी तो वह बेड से उठ कर दरवाजे की तरफ बढ़ी। दरवाजे को खोल कर वह बाहर आ गई।
गैलरी से चलते हुए उसे नैना बुआ का कमरा दिखा। उसके बाद नीचे जाने के लिए सीड़ियाॅ। सीढ़ियों से उतरते हुए वह किचेन की तरफ बढ़ गई। किचेन में रखे फ्रिज़ को खोलकर उसने ठंडे पानी का एक बाॅटल निकाला और उसका ढक्कन खोल कर उसे मुख से लगा लिया।
पानी पीकर वह वापस किचेन से बाहर आ गई। बाएॅ साइड पर ड्राइंगरूम था। उसने सोचा कि नींद तो आ नहीं रही इस लिए थोड़ी देर ड्राइंगरूम में ही बैठ जाती हूॅ, मगर फिर जाने क्या सोच कर उसने अपना ये इरादा बदल दिया। वह वापस दाहिने साइड सीढ़ियों की तरफ बढ़ी ही थी कि सहसा रुक गई। सीढ़ियों की तरफ से बाएं साइड पर पार्टीशन की दीवार पर लगे दरवाजे की तरफ देखा उसने। दरवाजा पूरी तरह तो नहीं मगर खुला हुआ स्पष्ट नज़र आया उसे।
पार्टीशन की दीवार पर लगे दरवाजे को इस तरह खुला देख कर रितू के पुलिसिया मन में सवाल उभरा कि आज ये दरवाजा इस वक्त खुला क्यों है? आम तौर पर वह बंद ही रहता था। उस तरफ का हिस्सा विजय चाचा का था। पुलिसिया दिमाग़ में जब कोई सवाल उभरता है तो वह उस सवाल का जवाब तुरंत ही खोजने लग जाता है।
रिते सीढ़ियों की तरफ से पलट कर पार्टीशन के उस खुले हुए दरवाजे की तरफ बढ़ चली। कुछ ही पल में वह दरवाजे के पास पहुॅच गई। कुछ पल दरवाजे के पास खड़े होकर उसने उस जगह का मुआयना किया फिर अपना हाॅथ बढ़ा कर उसने दरवाजे का दाहिने साइड वाला पल्ला पकड़ कर आगे की तरफ पुश किया। दरवाजे का वो पल्ला बेआवाज़ खुलता चला गया। अब एक पल्ले में ही इतना स्पेस बन गया था कि एक आदमी आराम से इधर से उस तरफ जा सकता था। रितू ने वही किया। वो उस स्पेस से उस तरफ दाखिल हो गई।
उस तरफ जाकर उसने बारीकी से हर तरफ का मुआयना किया और फिर आगे की तरफ बढ़ गई। मेरे पाठकों को पता है कि ये हवेली किस तरह बनाई गई थी। दो मंजिला इमारत के अलग अलग तीन हिस्सों को आपस में जोड़ दिया गया था। तीनों हिस्सों में एक जैसा ही डिजाइन था।
आगे बढ़ते हुए रितू ड्राइंगरूम की तरफ आ गई। यहाॅ पर भी नाइट बल्ब का प्रकाश था। यहाॅ पर भी सन्नाटा फैला हुआ था। ड्राइंगरूम में आकर रितू खड़ी हो गई। उसे समझ नहीं आ रहा था यहाॅ पर कौन आया होगा इस वक्त और किस लिए? जबकि इस तरफ आने का कोई सवाल ही नहीं था। ड्राइंगरूम के उस तरफ ऊपर जाने के लिए वैसी ही सीढ़ियाॅ बनी हुई थी जैसी इस तरफ बनी हुई थी। ड्राइंगरूम के के पीछे साइड एक तरफ किचेन था और एक साइड की तरफ वो कमरा था जिसमें दादा दादी रहते थे। रितू की निगाह जब किचेन से होते हुए जब दूसरी साइड दादा दादी के कमरे की तरफ गई तो वह चौंक गई।
दादा दादी के कमरे में इस वक्त बल्ब की पर्याप्त रोशनी हो रखी थी जोकि ऊपर छत के पास ही बने रोशनदान से समझ में आ रही थी। कमरे के दरवाजा बंद था।
रितू ये देख कर हैरान थी कि इतनी रात को वहाॅ उस कमरे के अंदर कौन हो सकता है? जबकि उसे जहाॅ तक पता था इस तरफ के हिस्से पर कोई नहीं आता था। विजय सिंह के बीवी बच्चों को हवेली से निकालने के बाद ये हिस्सा पूरी तरह बंद ही रहता था। फिर आज इस वक्त यहाॅ पर कौन हो सकता है? ये सवाल ऐसा था जो रितू के मस्तिष्क में कत्थक सा करने लगा था।
अपने मन उठे इस सवाल और खुद की उत्सुकता को मिटाने के लिए रितू उस कमरे की तरफ बहुत ही संतुलित कदमों से बढ़ गई। कुछ ही पलों में वह उस कमरे के दरवाजे के पास पहुॅच गई। उसका दिल अनायास ही ज़ोरों से धड़कने लगा था। तभी उसके कानों में कमरे के अंदर मौजूद ब्यक्ति की आवाज़ पड़ी। उस आवाज़ को सुन कर रितू बुरी तरह चौंकी। ये आवाज़ उसकी अपनी माॅ प्रतिमा की थी। रितू ने दरवाजे से अपने कान लगा दिये।
"आहहहहह ऐसे ही मेरे बेटे।" अंदर से प्रतिमा की मादकता से भरी हुई आवाज़ उभरी____"ऐसे ही आहहहह हचक हचक के चोद मुझे। आज बहुत दिनों बाद दो दो लंड का मज़ा मिला है मुझे। ओहे भड़वे हरामी साले नीचे से पेल न मेरी गाॅड में अपना लौड़ा। आहहहहह हाय बड़ा मज़ा आ रहा है रे।"
"ये लो माॅम आज डैड के साथ साथ अपने इस बेटे का भी लंड लो अपनी चूत में।" शिवा की आवाज़ आई___"आज मेरी वर्षों की वो ख्वाहिश पूरी हो रही है। थैंक्स डैड जो आपने मुझे शहर से बुला लिया और आज मुझे अपनी माॅम को चोदने का सौभाग्य दिया।"
"थैंक्स की कोई बात नहीं है बेटे।" अजय सिंह की आवाज़ उभरी___"ये तो तेरे माॅम की ही इच्छा थी कि तू भी इसे रगड़ कर चोदे।"
"अब बातें मत करो तुम दोनो।" प्रतिमा की आवाज़ आई___"मुझे रगड़ रगड़ कर चोदना शुरू करो वरना तुम दोनो के लंड को काट कर फैंक दूॅगी।"
"ओके माॅम।" शिवा ने कहा___"तो फिर ये लो।"
"आहहहहहह शशशशशश हाय ऐसे ही चोदो मुझे।" प्रतिमा की आहें और सिसकारियाॅ गूजने लगी अंदर___"पूरी रात मुझे आगे पीछे से चोदो। फाड़ कर रख दो मेरी चूत और गाॅड को। हाय रे कितना मज़ा आ रहा है। काश! एक और लंड होता तो उसे अपने मुह में भर लेती मैं।"
दरवाजे पर कान लगाए खड़ी रितू के पैरों तले दूर दूर तक ज़मीन का नामो निशान न था। दिलो दिमाग़ में जैसे सारा आसमान भर भरा कर गिर पड़ा था। मनो मस्तिष्क सुन्न सा पड़ता चला गया। उसे लगा कि उसके पैरों में कोई जान ही न बची हो। उसे चक्कर सा आने लगा था। बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला। ऑखों ने ऑसुओं की बाढ़ सी कर दी। कमरे के अंदर इतना बड़ा पाप हो रहा था। एक माॅ अपने ही बेटे से नाजायज संबंध बना रही थी वो भी अपने पति की सहमति से। रितू को यकीन नहीं हो रहा था कि ये उसके माॅ बाप और भाई थे।
अंदर से आती मादक सिसकारियों की आवाज़ें उसके कानों को छलनी करती जा रही थीं। हवस और वासना का इतना भयावह चेहरा उसने आज अपने ही पैदा करने वालों के द्वारा देखा था।
सहसा उसके मन में ये विचार उठा कि नहीं नहीं ये मेरे माॅम डैड और भाई नहीं हो सकते बल्कि ये कोई और ही हैं। कोई छलावा है या फिर कोई ख्वाब है।
पल भर में पगलाई सी रितू ने अपने हाथ से बहुत ही धीमे और संतुलित अंदाज़ से दरवाजे को अंदर की तरफ धकेला। दरवाजा बेआवाज़ कुलता चला गया। दरवाजे पर बस थोड़ी सी ही झिरी बनाकर रितू ने अंदर की तरफ देखा। मगर उस झिरी में उसे कुछ नज़र न आया बल्कि ये ज़रूर हुआ कि अंदर से आती हुई आवाजें ज़रा तेज़ हो गई थी।
रितू ने दरवाजे को थोड़ा और अंदर की तरफ धकेला। अपने सिर को दरवाजे के अंदर की तरफ ले जाकर उसने अंदर आवाज़ की दिशा में देखा तो उसके होश उड़ गए। आश्चर्य और अविश्वास से उसकी ऑखें फटी की फटी रह गई थी। अंदर बेड पर उसके माॅम डैड व भाई पूरी तरह नंगी हालत में थे। सबसे नीचे उसके डैड थे फिर उसकी माॅम उनके ऊपर पीठ के बल लेटी हुई थी। उसकी दोनो टाॅगें शिवा के दोनो हाॅथों के सहारे ऊपर उठी हुई थी। शिवा उसके ऊपर था जो कि माॅम की दोनो टाॅगों को पकड़े तेज़ तेज़ धक्के लगा रहा था। नीचे से उसके डैड अपने दोनो हाथों से प्रतिमा की कमर को थामे धक्का लगे रहे थे। ये हैरतअंगेज नज़ारा देख कर रितू पत्थर बन गई थी। होश तब आया जब उसकी माॅम की ज़ोरदार आह की आवाज़ उसके कानों में पड़ी। रितू ने तुरंत ही अपना सिर अंदर से बाहर कर लिया। दरवाजे को उसी तरह बंद कर वह पलटी और ऑसुओं से तर चेहरा लिए वह दरवाजे से हट गई।
कुछ ही देर में वह अपने कमरे मे पहुॅच गई। वह यहाॅ तक कैसे आई थी ये वही जानती थी। उसके पैर इतने भारी हो गए थे कि उससे उठाए नहीं जा रहे थे। बेड पर औंधे मुह गिर कर वह ज़ार ज़ार रोये जा रही थी। उसे लग रहा था कि वो क्या कर डाले। उसके दिलो दिमाग़ में अपने माता पिता और भाई के लिए नफ़रत व घृणा भर गई थी। वह एक बहादुर लड़की थी। उसने अपने आपको सम्हाला और तुरंत बेड से उठ बैठी। चेहरा पत्थर की तरह कठोर हो गया उसका। बेड से उतर कर वह आलमारी की तरफ बढ़ी। आलमारी खोल कर उसने अपना सर्विस रिवाल्वर निकाला। लाॅक खोल कर उसने चैम्बर को देखा तो खाली था। उसने तुरंत ही अंदर लाॅकर से गोलियाॅ निकाली और उसमें पूरी छहो गोलियाॅ भर दी। उसके बाद वह चेहरे पर ज़लज़ला लिए दरवाजे की तरफ बढ़ी ही थी कि किसी की आवाज़ सुन कर चौंक पड़ी।
दोस्तो समय निकाल कर इतना ही अपडेट तैयार कर पाया हूॅ। परिवार में मेरी बहन की शादी है इस लिए उसमें उलझा हुआ हूॅ। आशा करता हूॅ कि आप मेरी मजबूरियों को समझेंगे।
इस सबसे फुर्सत होकर जब वापस लौटूॅगा तो दोनो कहानियों के अपडेट कान्टीन्यू करूॅगा। तब तक के लिए मुझे क्षमा करें दोस्तो। अपना प्यार और सहयोग बनाए रखियेगा।
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.........《 41 》
अब तक,,,,,,,,,
रितू ने दरवाजे को थोड़ा और अंदर की तरफ धकेला।
अपने सिर को दरवाजे के अंदर की तरफ ले जाकर उसने अंदर आवाज़ की दिशा में देखा तो उसके होश उड़ गए। आश्चर्य और अविश्वास से उसकी ऑखें फटी की फटी रह गई थी। अंदर बेड पर उसके माॅम डैड व भाई पूरी तरह नंगी हालत में थे। सबसे नीचे उसके डैड थे फिर उसकी माॅम उनके ऊपर पीठ के बल लेटी हुई थी। उसकी दोनो टाॅगें शिवा के दोनो हाॅथों के सहारे ऊपर उठी हुई थी। शिवा उसके ऊपर था जो कि माॅम की दोनो टाॅगों को पकड़े तेज़ तेज़ धक्के लगा रहा था। नीचे से उसके डैड अपने दोनो हाथों से प्रतिमा की कमर को थामे धक्का लगे रहे थे। ये हैरतअंगेज नज़ारा देख कर रितू पत्थर बन गई थी। होश तब आया जब उसकी माॅम की ज़ोरदार आह की आवाज़ उसके कानों में पड़ी। रितू ने तुरंत ही अपना सिर अंदर से बाहर कर लिया। दरवाजे को उसी तरह बंद कर वह पलटी और ऑसुओं से तर चेहरा लिए वह दरवाजे से हट गई।
कुछ ही देर में वह अपने कमरे मे पहुॅच गई। वह यहाॅ तक कैसे आई थी ये वही जानती थी। उसके पैर इतने भारी हो गए थे कि उससे उठाए नहीं जा रहे थे। बेड पर औंधे मुह गिर कर वह ज़ार ज़ार रोये जा रही थी। उसे लग रहा था कि वो क्या कर डाले। उसके दिलो दिमाग़ में अपने माता पिता और भाई के लिए नफ़रत व घृणा भर गई थी। वह एक बहादुर लड़की थी। उसने अपने आपको सम्हाला और तुरंत बेड से उठ बैठी। चेहरा पत्थर की तरह कठोर हो गया उसका। बेड से उतर कर वह आलमारी की तरफ बढ़ी। आलमारी खोल कर उसने अपना सर्विस रिवाल्वर निकाला। लाॅक खोल कर उसने चैम्बर को देखा तो खाली था। उसने तुरंत ही अंदर लाॅकर से गोलियाॅ निकाली और उसमें पूरी छहो गोलियाॅ भर दी। उसके बाद वह चेहरे पर ज़लज़ला लिए दरवाजे की तरफ बढ़ी ही थी कि किसी की आवाज़ सुन कर चौंक पड़ी।
____________________________
अब आगे,,,,,,,,
आवाज़ की दिशा में रितू ने पलट कर देखा तो बगल से दीवार से सट कर रखे ड्रेसिंग टेबल के आदमकद आईने में खुद को एक अलग ही रूप में खड़े पाया। ये देख कर रितू के चेहरे पर हैरत व अविश्वास के मिले जुले भाव उभरे। आदमकद आईने में रितू का अक्श एक अलग ही रूप और अंदाज़ में खड़ा था।
"ये तुम क्या करने जा रही हो रितू?" आदम कद आईने में दिख रहे रितू के अक्श ने रितू से कहा___"क्या तुम इस रिवाल्वर से अपने माॅ बाप और भाई का खून करने जा रही हो?"
"हाॅ हाॅ मैं उन हवस के पुजारियों का खून करने ही जा रही हूॅ।" रितू के मुख से मानो दहकते अंगारे निकले___"ऐसे नीच और घृणित कर्म करने वालों को जीने का कोई अधिकार नहीं है। आज मैं उन सबको अपने हाॅथों से मौत के घाट उतारूॅगी। मगर तुम कौन हो? और मुझे रोंका क्यों?"
"मैं तुम्हारा अक्श हूॅ। मुझे तुम अपना ज़मीर भी समझ सकती हो। और हाॅ, मौत के घाट उतरना तो अब उन सबकी नियति बन चुकी है रितू।" अक्श ने कहा___"मगर ये नेक काम तुम्हारे हाॅथों नहीं होगा।
"
"क्यों नहीं होगा?" रितू गुर्राई___"मैं अभी जाकर उन तीनों को गोलियों से भून कर रख दूॅगी। आज मेरे हाॅथों उन्हें मरने से कोई नहीं बचा सकता। खुद भगवान भी नहीं।"
"क्या तुम भी अपने बाप की तरह दूसरों का हक़ छीनोगी रितू?" अक्श ने कहा___"अगर ऐसा है तो तुममें और तुम्हारे बाप में क्या अंतर रह गया?"
"ये तुम क्या बकवास कर रही हो?" रितू के गले से गुस्से मे डूबा स्वर निकला___"मैं कहाॅ किसी का हक़ छीन रही हूॅ?"
"तुम जिन्हें जान से मारने जा रही हो न उन सबको जान से मारने का अधिकार तुम्हारा नहीं है रितू।" अक्श ने कहा___"बल्कि उसका है जिसके साथ तुम्हारे बाप ने हद से कहीं ज्यादा अत्याचार किया है। हाॅ रितू, ये सब विराज और उसकी माॅ बहन के दोषी हैं। इस लिए इन लोगों सज़ा या मौत देने का अधिकार उनको ही है तुम्हें नहीं। अब ये तुम पर है कि तुम उनका ये हक़ छीनती हो या फिर उनका अधिकार उन्हें देती हो।"
आदमकद आईने में दिख रहे अपने अक्श की बातें सुन कर रितू के मनो मस्तिष्क में झनाका सा हुआ। उसे अपने अक्श की कही हर बात समझ में आ गई और समझ में आते ही उसका क्रोध और गुस्सा साबुन के झाग की तरह बैठता चला गया।
"तुम यकीनन सच कह रही हो।" रितू ने गहरी साॅसे लेते हुए कहा___"ऐसे पापियों को सज़ा या मौत देने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ मेरे भाई विराज को है। मैं दुवा करती हूॅ कि बहुत जल्द इन पापियों को इनके पापों की सज़ा दे मेरा भाई। जिन माॅ बाप को मैं इतना अच्छा समझती थी आज उन लोगों का इतना गंदा चेहरा देख कर मुझे नफ़रत हो गई है उनसे। मुझे शर्म आती है कि मैं ऐसे पाप कर्म करने वाले माॅ बाप की औलाद हूॅ। लेकिन अब मैं क्या करूॅ?"
"समय का इन्तज़ार करो रितू।" अक्श ने कहा___"और इस वक्त तुम फिर से उन लोगों के पास जाओ। दरवाजे के पास कान लगा कर सुनो। हो सकता है कि कुछ ऐसा जानने को मिल जाए तुम्हें जिन चीज़ों से आज भी बेख़बर होगी तुम।"
"हर्गिज़ नहीं।" रितू के जबड़े शख्ती से कस गए___"मैं उन लोगों के पास उनकी गंदी रासलीला देखने सुनने नहीं जाऊॅगी।"
"मैं तुम्हें उनकी रासलीला देखने सुनने को नहीं कह रही रितू।" अक्श ने कहा__"मैं तो बस ये कह रही हूॅ कि ऐसे माहौल में इंसान के मुख से कभी कभी ऐसा कुछ निकल जाता है जिससे उसका कोई रहस्य या राज़ पता चल जाता है। ऐसा राज़ जिसे आम हालत में कोई भी इंसान अपने मुख से नहीं निकालता।"
"यकीनन, तुम्हारी बात में सच्चाई है।" रितू ने कहा___"ऐसा हो भी सकता है। इस लिए मैं जा रही हूॅ फिर से उन लोगों के पास।"
"ये हुई न बात।" अक्श ने मुस्कुराते हुए कहा___"चलो अब मैं भी वापस तुम्हारे अंदर चली जाती हूॅ। तुम्हें सही रास्ता दिखा रही थी सो दिखा दिया और अब तुम भी ज़रा सतर्क रहना।"
रितू के देखते ही देखते आदमकद आईने में दिख रहा उसका अक्श आईने पर से गायब हो गया।
अक्श के गायब होते ही रितू ने पहले एक गहरी साॅस ली फिर पलट करवापस आलमारी की तरफ बढ़ी। रिवाल्बर से गोलियाॅ निकाल कर उसने रिवाल्वर और रिवाल्वर की गोलियाॅ अंदर लाॅकर में रख कर आलमारी बंद कर दी।
इसके बाद पलट कर वह कमरे से बाहर निकल कर थोड़ी देर में फिर वहीं पहुॅच गई जहाॅ पर उसके माॅ बाप और भाई तीनो एक साथ संभोग क्रिया कर रहे थे। रितू दबे पाॅव कमरे के दरवाजे के पास पहुॅच गई थी। अंदर से अभी भी सिसकारियों की आवाज़ें आ रही थी। रितू ने दरवाजे को हल्का सा खोल दिया था ताकि उसके कानों में उन लोगों के बोलने की आवाज़ स्पष्ट सुनाई दे सके।
"एक बात तो है डैड कि न आप और ना ही मैं परिवार की किसी भी औरत या लड़की को अपने नीचे लिटा नहीं सके अब तक।" शिवा की आवाज़ आई____"इसे हमारा दुर्भाग्य कहें या उन लोगों की अच्छी किस्मत?"
"ये उन रंडियों की किस्मत ही है बेटे।" अजय सिंह ने कहा___"जो अब तक हम बाप बेटों के लंड की सवारी न कर सकी हैं। दूसरी बात तुम्हारी इस रंडी माॅ ने भी अपना काम सही से नहीं किया। वरना हम दोनो बाप बेटे गौरी और करुणा की जवानी का मज़ा ज़रूर लूटते।"
"ओये भड़वे की औलाद साले कुत्ते।" प्रतिमा बीच में सैण्डविच बनी बोल उठी___"मैने क्या नहीं किया इन सबको जाल में फाॅसने के लिए। आआआहहहह मादरचोद धीरे से मसल न मेरी चूची को दर्द भी होता है मुझे। हाॅ तो मैं ये कह रही थी कि क्या नहीं किया मैने। तुम्हारे ही कहने पर उस रंडी के जने विजय को अपने हुस्न के जाल में फाॅसने की कोशिश की, यहाॅ तक कि एक दिन सोते समय उसके घोड़े जैसे लंड को अपने मुह में भी भर लिया था। मगर वो कुत्ता तो हरिश्चन्द्र था। कलियुग का हरिश्चन्द्र। उसने मुझे उस सबके लिए कितना बुरा भला कहा और जलील किया था ये मैं ही जानती हूॅ। उसने मुझ जैसी हूर की परी औरत को उस कुलमुही गौरी के लिए ठुकरा दिया था। तभी तो अपने उस अपमान का बदला लेने के लिए मैने तुमसे कहा था कि अब इसको जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है।"
"ओह माई गाड ये तुम क्या कह रही हो माॅम?" धक्के लगाता हुआ शिवा हैरान होकर बोल पड़ा था____"इसका मतलब विजय चाचा की वो मौत नेचुरल नहीं थी?"
"हाॅ बेटे ये सच है।" नीचे से ज़ोर का शाॅट मारते हुए अजय ने कहा___"उस हादसे के बाद हम डर गए थे कि विजय वो सब कही माॅ बाबूजी से न बता दे। इस लिए दूसरे दिन ही हम सब शहर चले गए थे। शहर आ तो गए थे मगर एक पल के लिए सुकून की साॅस नहीं ले पा रहे थे। हर पल यही डर सता रहा था कि विजय वो सब माॅ बाबूजी से बता देगा। उस सूरत में हमारी इज्ज़त का कचरा हो जाता। माॅ बाबूजी के सामने खड़ा होने की भी हम में हिम्मत न रहती। इस लिए हमने तय किया कि इस मुसीबत से जल्द से जल्द छुटकारा पा लेना चाहिए। ये सोच कर मैं दूसरे दिन ही गुप्त तरीके से शहर से वापस गाॅव आ गया।
प्रतिमा को तुम बच्चे लोगों के पास ही रहने दिया। लेकिन अपने साथ में यहाॅ से एक ज़हरीला सर्प भी ले गया मैं। मुझे पता था कि आजकल खेतों में फलों का सीजन था इस लिए मंडी ले जाने के लिए फलों की तुड़ाई चालू थी। विजय सिंह रात में वहीं रुकता था। मैं जब गाॅव पहुॅचा तो हवेली न जाकर सीधा खेतों पर ही पहुॅच गया। खेतों पर विजय के साथ एक दो मजदूर रह रहे थे उस समय। उस रात जब मैं वहाॅ पहुॅचा तो रात काफी हो चुकी थी। विजय और दोनो मजदूर सो रहे थे। मैं सीधा विजय के कमरे में गया और उसे पहले बेहोशी की दवा सुॅघाई। वो सोते हुए ही बेहोश हो गया। उसके बाद मैने अपने थैले से वो बंद पुॅगड़ी निकाली जिसमें मैं शहर से ज़हरीले सर्प को भर कर लाया था। विजय के पैरों के पास जाकर मैने पुॅगड़ी का ढक्कन खोल दिया। ढक्कन खुलते ही उसमे से जीभ लपलपाता हुआ उस ज़हरीले सर्प ने अपना सिर निकाला फिर वो विजय के पैरों और टाॅगों की तरफ देखने लगा। मैने पुॅगड़ी को विजय के पैरों के और पास कर दी। मगर हैरानी की बात थी कि वो ज़हरीला विजय के पैरों को देखने के सिवा कुछ कर ही नहीं रहा था। ये देख कर मैने पुॅगड़ी को हल्का झटका दिया तो वो सर्प डर गया और डर की वजह से ही उसने विजय के घुटने के नीचे दाहिनी टाॅग पर काट लिया। सर्प के काटते ही मैने जल्दी से पुॅगड़ी का ढक्कन बंद कर दिया। उधर विजय की टाॅग में जिस जगह सर्प ने काटा था उस जगह दो बिंदू बन गए थे जो कि विजय के लाल सुर्ख खून में डूबे नज़र आने लगे थे। देखते ही देखते विजय का बेहोश जिस्म हिलने लगा। उसका पूरा जिस्म नीला पड़ने लगा। मुझ से सफेद झाग निकलना शुरू हो गया और कुछ ही देर में विजय का जिस्म शान्त पड़ गया। मैं समझ गया कि मेरे छोटे भाई की जीवन लीला समाप्त हो चुकी है। उसके बाद मैने मृत विजय के जिस्म को किसी तरह उठाया और कमरे से बाहर ले आया। बाहर आकर मैं विछय को उठाये उस तरफ बढ़ता चला गया जिस जगह पर खेतों पर उस समय पानी लगाया जा रहा था। मैं विजय को लिए उस पानी लगे खेत के अंदर दाखिल हो गया और एक जगह विजय के मृत जिस्म को उतार कर उसी पानी लगे खेत में ऐसी पोजीशन में चित्त लेटाया कि उसके मुख पर दिख रहा झाग साफ नज़र आए। खेत के कीचड़ में लेटाने के बाद मैने विजय के दोनो हाॅथों और पैरों में खेत का वही कीचड़ लगा दिया। ताकि लोगों को यही लगे कि विजय खेत में पानी लगा रहा था और उसी दौरान किसी ज़हरीले सर्प ने उसे काट लिया था जिसकी वजह से उसकी मौत हो गई है। ये सब करने के बाद मैं जिस तरह गुप्त तरीके से शहर से आया था उसी तरह वापस शहर लौट भी गया। किसी को इस सबकी भनक तक नहीं लगी थी।"
दरवाजे से कान लगाए खड़ी रितू का चेहरा ऑसुओं से तर था। उसके चेहरे पर दुख और पीड़ा के बहुत ही गहरे भाव थे। आज उसे पता चला कि उसके माॅ बाप कितने बड़े पापी हैं।
अपनी खुशी और अपने पाप को छुपाने के लिए उसके बाप ने अपने सीधे सादे और देवता समान भाई को सर्प से कटवा कर उसकी जान ले ली थी। इतना बड़ा कुकर्म और इतना बड़ा घृणित काम किया था उसके माॅ बाप ने। रितू को लग रहा था कि वो क्या कर डाले अपने माॅ बाप के साथ। उसे लग रहा था कि ये ज़मीन फटे और वह उसमे समा जाए। आज अपने माॅ बाप की वजह से वो अपने भाई विराज और उसकी माॅ बहन की नज़रों में बहुत ही छोटा और तुच्छ समझ रही थी। अभी वो ये सोच ही रही थी कि उसके कानों में फिर से आवाज़ पड़ी।
"ओह तो ये बात है डैड।" शिवा के चकित भाव से कहा___"उसके बाद क्या हुआ?"
"होना क्या था?" अजय सिंह ने कहा__"वही हुआ जिसकी मुझे उम्मीद थी। अपने इतने प्यारे और इतने अच्छे बेटे की मौत पर माॅ बाबू जी की हालत बहुत ही ज्यादा खराब हो गई थी। अभय ने शहर में हमे भी विजय की मौत की सूचना भेजवाई। उसकी सूचना पाकर हम सब तुरंत ही गाव आ गए और फिर वैसा ही आचरण और ब्यौहार करने लगे जैसा उस सिचुएशन पर होना चाहिए था। ख़ैर, जाने वाला चला गया था। किसी के जाने के दुख में जीवन भर भला कौन शोग़ मनाता है? कहने का मतलब ये कि धीरे धीरे ये हादसा भी पुराना हो गया और सबका जीवन फिर से सामान्य हो गया। मगर माॅ बाबूॅ जी सामान्य नहीं थे। बेटे की मौत ने उन दोनो को गहरे सदमें डाल दिया था।"
"तुम लोगों की ये महाभारत अगर खत्म हो गई हो तो आगे का काम भी करें अब?" तभी प्रतिमा ने खीझते हुए कहा___"सारे मज़े का सत्यानाश कर दिया तुम दोनो बाप बेटों ने।"
"अरे मेरी जान सारी रात अपनी है।" अजय सिंह ने नीचे से अपने दोनो हाथ बढ़ा कर प्रतिमा की भारी चूचियों को धर दबोचा था, फिर बोला___"बेटे को सच्चाई जानना है तो जान लेने दो न। आख़िर हर चीज़ जानने का हक़ है उसे। मेरे बाद इस हवेली का अकेला वही तो वारिश है। इस घर की सभी औरतों और लड़कियों को हमारा बेटा भोगेगा प्यार से या फिर ज़बरदस्ती।"
"डैड मुझे सबसे पहले उस रंडी करुणा को पेलना है।" शिवा ने कहा___"उसकी वजह से ही उस मादरचोद अभय ने मुझे कुत्ते की तरह मारा था। इस लिए जब तक मैं उसकी उस राॅड बीवी और बेटी को आगे पीछे से ठोंक नहीं लेता तब तक मुझे चैन नहीं आएगा।"
"तेरी ये ख्वाहिश ज़रूर पूरी होगी मेरे जिगर के टुकड़े।" अजय सिंह ने कहा___"और तेरे साथ साथ मेरी भी ख्वाहिश पूरी होगी। तेरी माॅ ने तो कोई जुगाड़ नहीं किया लेकिन अब मैं खुद अपने तरीके से वो सब करूॅगा। हाय मेरी बड़ी बेटी रितू की वो फूली हुई मदमस्त गाॅड और उसकी बड़ी बड़ी चूचियाॅ। कसम से बेटे जब भी उसे देखता हूॅ तो ऐसा लगता है कि साली को वहीं पर पटक कर उसे उसके आगे पीछे से पेलाई शुरू कर दूॅ।"
"यस डैड यू आर राइट।" शिवा ने मुस्कुराते हुए कहा___"रितू दीदी को पेलने में बहुत मज़ा आएगा। आप जल्दी से कुछ कीजिए न डैड।"
"करूॅगा बेटे।
" अजय सिंह ने कहा___"मगर सोच रहा हूॅ कि उससे पहले अपनी बहन नैना को पेल दूॅ। बेचारी लंड के लिए तड़प रही होगी। उसके पति और उसके ससुराल वालों ने उसे बाॅझ समझकर घर से निकाल दिया है। इस लिए मैं सोच रहा हूॅ कि उसे अपने बच्चे की माॅ बना दूॅ और फिर से उसे उसके ससुराल भिजवा दूॅ।"
"ये तो आपने बहुत अच्छा सोचा है डैड। लेकिन आप अपने इस बेटे को भूल मत जाइयेगा।" शिवा ने कहा___"बुआ को पेलने का सुख मुझे भी मिलना चाहिए।"
"अरे तेरे लिए तो इस घर की हर लड़की और औरत हैं बेटे।" अजय सिंह ने कहा___"सबकी चूतों पर सिर्फ तेरे ही लंड की मुहर लगेगी।"
"ओह डैड थैक्यू सो मच।" शिवा खुशी से झूम उठा___"यू आर रियली दि ग्रेट पर्सन।"
"उफ्फ अब बस भी करो तुम लोग।" प्रतिमा ने कुढ़ते हुए कहा___"इस तरह बीच में लटके लटके मेरा बदन दुखने लगा है अब।"
"चल बेटा अब ज़रा इस राॅड का भी ख़याल कर लिया जाए।" अजय सिंह ने कहा__"तू ऊपर से हट तो ज़रा मुझे भी पोजीशन चेंज करना है।"
अजय सिंह से कहने पर शिवा प्रतिमा के ऊपर से हट गया। अजय सिंह ने प्रतिमा को पलट कर अपनी तरफ मुह करके अपने ऊपर ही लेटने को कहा। प्रतिमा ने वैसा ही किया। नीचे से अजय ने अपने लंड को पकड़ कर प्रतिमा की चूत में डाल दिया।
"बेटे अब तू भी आजा और अपनी राॅड माॅ की गाॅड में लंड डाल दे।" अजय सिंह ने कहा तो शिवा फौरन अपना लंड पकड़ कर अपनी माॅ की गोरी चिट्टी गाॅड के गुलाबी छेंद पर डाल दिया। शिवा ने हाॅथ बढ़ा कर अपनी माॅ के बालों को मुट्ठी में पकड़ लिया था। अब दोनो बाप बेटे ऊपर नीचे से प्रतिमा की पेलाई शुरू कर दिये थे। कमरे में प्रतिमा की आहें और मदमस्त करने वाली सिसकारियाॅ फिर से गूॅजने लगी थी।
दरवाजे से अंदर सिर करके रितू ने एक नज़र उन तीनों को देखा फिर अपना चेहरा वापस बाहर खींच लिया। उसकी ऑखों में आग थी और आग के शोले थे जो धधकने लगे थे। चेहरे पर गुस्सा और नफ़रत के भाव ताण्डव सा करने लगे थे।
"तुम लोग अपने मंसूबों पर कभी कामयाब नहीं होगे कुत्तो।" रितू ने मन ही मन उन लोगों को गालियाॅ देते हुए कहा___"बल्कि अब मैं दिखाऊॅगी कि प्यार और नफ़रत का अंजाम किस तरह से होता है?"
रितू मन ही मन कहते हुए उस जगह से पलट कर वापस चल दी। कुछ ही देर में वह अपने कमरे में पहुॅच चुकी थी। दरवाजे की कुण्डी लगा कर वह बेड पर लेट गई। दिलो दिमाग़ में एक ऐसा तूफान उठ चुका था जो हर चीज़ उड़ा कर ले जाने वाला था।
काफी देर तक रितू बेड पर पड़ी इस सबके बारे में सोच सोच कर कभी रो पड़ती तो कभी उसका चेहरा गुस्से से भभकने लगता। फिर सहसा उसके अंदर से आवाज़ आई कि इस सबसे बाहर निकलो और शान्ती से किसी चीज़ के बारे में सोच कर फैंसला लो।
रितू ने ऑखें बंद करके दो तीन बार गहरी गहरी साॅसें ली तब कहीं जाकर उसे कुछ सुकून मिला और उसका मन शान्त हुआ।
उसे ख़याल आया कि कल उसका सबसे अच्छा भाई विराज आ रहा है। विराज का ख़याल ज़हन में आते ही रितू का मन एक बार फिर दुखी हो गया।
"मेरे भाई, जितने भी दुख मैने तुझे दिये हैं न उससे कहीं ज्यादा अब प्यार दूॅगी तुझे।" रितू ने छलक आए ऑसुओं के साथ कहा__"मैं जानती हूॅ कि तू इतने बड़े दिल का है कि तू एक पल में अपनी इस दीदी को माफ़ कर देगा और मेरी सारी ख़ताएॅ भुला देगा। तेरे हिस्से के दुख दर्द बहुत जल्द तुझसे दूर चले जाएॅगे भाई। बस विधि को देख कर तू अपना आपा मत खो बैठना। अपने आपको सम्हाल लेना मेरे भाई। वैसे मैं तुझे फिर से बिखरने नहीं दूॅगी। तेरा हर तरह से ख़याल रखूॅगी मैं।"
बेड पर पड़ी रितू अपने मन में ये सब कहे जा रही थी। उसकी ऑखों के सामने बार बार विराज का वो मासूम और सुंदर चेहरा घूम जाता था। जिसकी वजह से पता नहीं क्यों मगर रितू के होठों पर हल्की सी मुस्कान उभर आती थी।
"तू जल्दी से आजा मेरे भाई।" रितू ने मन में ही कहा___"तुझे देखने के लिए मेरी ये ऑखें तरस रही हैं। वैसे कैसा होगा तू? मेरा मतलब कि आज भी वैसा ही मासूम व सुंदर है या फिर बेरहम वक्त ने तुझे इसके विपरीत कठोर व बेरहम बना दिया है? नहीं नहीं मेरे भाई, तू ऐसा मत होना। तू पहले की तरह ही मासूम व सुंदर रहना। तू वैसा ही अच्छा लगता है मेरे भाई। मैं तुझे उसी रूप में देखना चाहती हूॅ। तुझे अपने सीने से लगा कर फूट फूट कर रोना चाहती हूॅ। अब मुझे इन पापियों के साथ नहीं रहना है भाई। ये तो अपनी ही बहन बेटी को लूटना चाहते हैं। मुझे इनके पास नहीं रहना अब। मुझे भी अपने साथ ले चल मुम्बई। मैं ये नौकरी छोंड़ दूॅगी और तेरे साथ ही हर वक्त रहूॅगी। अपने प्यारे से भाई के साथ। बस तू जल्दी से आजा यहाॅ।"
जाने क्या क्या मन में कहती हुई रितू आख़िर कुछ देर में अपने आप ही सो गई। वक्त और हालात बड़ी तेज़ी से बदल रहे थे। आने वाला समय किसकी झोली में कौन सी सौगात डालने वाला था ये भला किसे पता हो सकता था।
ख़ैर, रात गुज़र गई और सुबह का आगाज़ हुआ। बेड पर गहरी नींद में सोई हुई रितू को ऐसा लगा जैसे कुछ बज रहा है। नींद के साथ ही स्थिर और सोया हुआ मन मस्तिष्क फौरन ही सक्रिय अवस्था में आ गया। जिसकी वजह से रितू की ऑख खुल गई। ऑख खुलते ही उसके कानों में उसके आई फोन की रिंग टोन उसे स्पष्ट सुनाई दी। रितू ने बाई तरफ करवॅट लेकर मोबाईल को उठाया और जब तक उस पर आ रही किसी की काल को पिक करने के लिए अपने अॅगूठे को हरकत दी तब तक काल अपने निश्चित समय सीमा के चलते कट गई।
रितू ने रिसीव काल की लिस्ट को ओपेन किया तो उसमें उसे पवन सिंह लिखा नज़र आया। ये देख कर रितू के दिमाग़ की बत्ती जली। उसे ध्यान आया कि आज उसका भाई विराज मुम्बई से यहाॅ आ रहा है। ये बात दिमाग़ मे आते ही रितू ने फौरन पवन सिंह को फोन लगा दिया।
पहली ही घंटी पर पवन ने काल पिक कर ली।
"ओफ्फो दी, आप फोन क्यों नहीं उठा रही थी?" उधर से पवन ने कहा___"चार बार आपको काल कर चुका हूॅ मैं।"
"ओह आई एम सो स्वारी भाई।" रितू ने खेद भरे भाव से कहा___"वो मैं गहरी नींद में सो रही थी न। कल रात नीद ही नहीं आ रही थी। इस लिए देर से सोई थी मैं। ख़ैर छोड़ो, तुम बताओ किस लिए फोन कर रहे थे मुझे?"
"वो मेरी विराज से फोन पर बात हुई है वो बता रहा था कि वो सही समय पर गुनगुन रेलवेस्टेशन पहुॅच जाएगा।" उधर से पवन कह रहा था___"मैने सोचा आपको इस बारे में बता दूॅ। मगर,....।"
"मगर क्या भाई?" रितू के माथे पर बल पड़ा।
"मगर यही कि मैने आपके कहने पर अपने जां से भी ज्यादा अज़ीज़ दोस्त को यहाॅ बुला तो लिया है।" पवन की आवाज़ में गंभीरता और अधीरता दोनो थी, बोला____"मगर, यदि उसकी जान को या उस पर लेश मात्र का भी संकट आया तो सोच लीजिएगा। उस सूरत में मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। आप मेरी बात समझ रही हैं न?"
"मुझे बेहद खुशी है कि मेरे भाई को तुम जैसा चाहने वाला दोस्त मिला है।" रितू की ऑखों में ऑसू आ गए, बोली___"मैं तुम्हारी बातों का मतलब समझ गई हूॅ भाई। तुमको कदाचित अभी भी अपनी इस बहन पर यकीन नहीं है, और सच कहूॅ तो होना भी नहीं चाहिए। आख़िर यकीन करने लायक मैने अब तक कीई काम किया ही कहाॅ है? मगर इतना ज़रूर कहूॅगी मेरे भाई कि तेरी ये बहन पहले से बहुत ज्यादा बदल गई है। तेरी इस बहन को समझ आ गया है कि कौन सही है और कौन ग़लत? आज मेरे दिल में अगर किसी के लिए बेपनाह प्यार है तो सिर्फ और सिर्फ अपने उस भाई के लिए जिसको मैने कभी अपना भाई नहीं माना था।"
"अगर ऐसी बात है तो मुझे खुशी है दीदी कि अब मेरे यार को आप के रहते कोई ख़तरा नहीं हो सकता।" पवन ने उधर से खुश हो कर कहा___"अच्छा अब फोन रखता हूॅ दीदी। विराज जब हल्दीपुर पहुॅचेगा तो मैं उसे लेने बस स्टैण्ड पर पहुॅच जाऊॅगा। आप तो जानती ही हैं कि मेरी दुकान बस स्टैण्ड पर ही है। विराज को लेकर मैं अपने घर चला जाऊॅगा। फिर जब आपका फोन आएगा तब मैं उसे लेकर विधी के पास हास्पिटल आ जाऊॅगा।"
"ठीक है भाई।" रितू ने कहा___"तब तक मैं भी उसकी सुरक्षा के लिए कोई इंतजाम करती हूॅ।" ये कहने के बाद रितू ने काल कट कर दी। इस वक्त उसके चेहरे पर बहुत ही ज्यादा खुशी झलक रही थी। उसके गोरे और खूबसूरत से चेहरे पर ग़जब का नूर उतर आया था। कुछ देर बेड पर वह जाने क्या क्या सोच कर मुस्कुराती रही फिर बेड से उठ कर बाथरूम की तरफ बढ़ गई।
_____________________________
उधर मुम्बई से ट्रेन में बैठने के बाद मैं और मेरे साथ जगदीश अंकल के द्वारा भेजे हुए बाॅडीगार्ड आदित्य चोपड़ा दोनो चल दिये थे। कुछ दूर तक का सफ़र तो हम दोनो के बीच की ख़ामोशी के साथ ही कटता रहा। उसके बाद हम दोनो के बीच बातें शुरू हो गई थी। ये अलग बात है कि बात करने की पहल मैने ही की थी।
आदित्य चोपड़ा कुछ ख़ामोश तबीयत का इंसान था। वो ज्यादा किसी से बोलता नहीं था। अब ये ख़ामोशी उसकी फितरत का हिस्सा थी या फिर उसके ख़ामोश रहने की कोई ऐसी वजह जिसके बारे में फिलहाल मुझे कुछ पता नहीं था।
लेकिन जब हमारे बीच कान्टीन्यू बातें होती रही तो आदित्य का स्वभाव थोड़ा बदल गया था। हलाॅकि शुरू शुरू में वह मेरी किसी भी बात का जवाब हाॅ या ना में संक्षिप्त रूप से ही देता था। किसी किसी पल वह मेरी बातों से परेशान भी नज़र आया मगर मैने उसे बड़े प्यार व इज्ज़त से समझाया कि ख़ामोश रहने से किसी भी समस्या से छुटकारा नहीं मिलता। फिर मैने उसे संक्षेप में अपनी और अपने परिवार की कहानी सुनाई। मेरी कहानी सुन कर आदित्य चोपड़ा बेहद संजीदा सा हो गया था। उसने मुझसे कहा कि अभी तक तो वो मेरे बाॅडीगार्ड की हैंसियत से साथ था लेकिन अब वो मेरे साथ मेरा सच्चा दोस्त बन कर रहेगा और मुझे हर संकट से बचाएगा।
उसके बाद हम दोनो हॅसी खुशी ट्रेन में बातें करते रहे। मेरे पूछने पर ही उसने अपने बारे में बताया। आदित्य चौपड़ा के पास किसी चीज़ की कोई कमीं नहीं थी। जब वो पच्चीस साल का था तब उसे किसी लड़की से प्यार हो गया था। लेकिन बाद में पता चला कि वो लड़की हर पल सिर्फ उसका स्तेमाल कर रही थी। दरअसल उस लड़की का पहले से ही किसी विदेशी लड़के से चक्कर था। लड़की का बाप अपनी बेटी को बग़ैर किसी सिक्योरिटी के कहीं जाने नहीं देता था। आदित्य चोपड़ा उस लड़की का ब्वाडीगार्ड था। उस चक्कर में वो लड़की अपने उस विदेशी ब्वायफ्रैण्ड से मिल नहीं पाती थी। लड़की ने किसी योजना के तहत आदित्य को अपने प्यार के जाल में फॅसाया। और फिर उस लड़की ने आदित्य को अपने प्यार में इस हद तक पागल कर दिया कि उसके कहने पर आदित्य उसे लेकर विदेश तक जाने को तैयार हो गया। विदेश जाने के लिए सारी तैयारियाॅ करने के बाद एक दिन आदित्य और वो लड़की जिसका नाम कोमल सिंहानिया था दोनो ही सिंहानिया विला से फुर्र हो गए। एयरपोर्ट के रास्ते पर ही एक जगह कोमल ने टैक्सी रुकवाई। आदित्य को समझ न या कि कोमल ने टैक्सी क्यों रुकवाई थी। टैक्सी के उतरते ही कोमल टैक्सी से उतर गई और टैक्सी ड्राइवर से अपना सामान भी टेक्सी से निकालने को कह दिया। हैरान परेशान आदित्य ने उससे पूछा कि ये सब क्या है? हम बीच रास्ते में टैक्सी से इस तरह क्यों उतर रहे हैं?
आदित्य के सवाल का जवाब देने से पहले ही उस जगह पर एक और टैक्सी आकर रुकी। उस टैक्सी का दरवाजा खोल कर कोमल का विदेशी ब्वायफ्रैण्ड बाहर आ गया। कोमल के पास आकर उस विदेशी ने कोमल को अपने गले से लगाया और फिर आदित्य के सामने ही उसने कोमल के रस भरे होठों को ज़ोर से चूॅमा। ये देख कर आदित्य के पैरों तले से ज़मीन गायब हो गई। उसके दिलो दिमाग़ को ज़बरदस्त झटका लगा था।
उसकी हालत गहरे सदमे में डूब जाने जैसी हो गई थी।
"ओह रिलैक्स आदित्य।" कोमल ने खनकती हुई आवाज़ से कहा___"इस तरह रिऐक्ट करने की कोई ज़रूरत नहीं है। एण्ड साॅरी फार आल दिस। बट यू नो व्हाट, इसमें मेरी कोई ग़लती नहीं है। मुझे उस कैदखाने से हमेशा के लिए आज़ाद होना था और अपने इस ब्वायफ्रैण्ड के साथ विदेश में अपनी सेटल हो कर लाइफ एंज्वाय करना था। मगर ये तभी हो सकता था जब मैं उस कैदखाने से और इस सिक्योरिटी से बाहर निकलती। इस लिए मैने मजबूरी में तुम्हें अपने प्यार में पागल किया और इस हद तक किया कि तुम मेरे एक इशारे पर मुझे कहीं भी ले चलने को तैयार हो जाओ। वही तुमने किया, लेकिन जो मैने किया वो सिर्फ अपने प्यार और अपनी खुशी को पाने के लिए किया है। इस लिए प्लीज आदित्य इस सबके लिए मुझे माफ़ कर देना।"
कोमल की बातें आदित्य के कानों में ज़हर सा घोल रही थी और उसके दिल को चकनाचूर कर रही थी। मगर आदित्य मजबूत तबीयत का मार्शल आर्टिस्ट था। उसने खुद को सम्हाला और फिर मुस्कुरा कर कोमल से सिर्फ इतना ही कहा कि जहाॅ भी रहना खुश रहना।
उसके बाद आदित्य अपने ऑसुओं को छुपाते हुए पुनः उसी टैक्सी में बैठ गया और टैक्सी ड्राइवर से वापस चलने को कहा। सिंहानियाॅ को आदित्य ने सब कुछ सच सच बता दिया और उससे ये भी कहा कि अगर वो ये समझते हैं कि उसने कोई अपराध किया है तो वो उसे जो चाहे सज़ा दे सकते हैं। आदित्य की बातें सुन कर सिंहानियाॅ को गुस्सा तो बहुत आया मगर फिर उसने खुद को शान्त किया और आदित्य से कहा कि तुम ईमानदार हो, सच्चे हो। कोमल की खुशी के लिए तुमने उसे उसके उस विदेशी ब्वायफ्रैण्ड के साथ जाने दिया। ये भी नहीं सोचा कि इस काम के लिए तुम्हारे साथ क्या सुलूक हो सकता है। ख़ैर, हम तुम्हें कोई सज़ा नहीं देंगे। क्योंकि जब अपना ही खून इस तरह का धोखेबाज़ था तो दूसरों को क्या कहें? हम समझ सकते हैं कि तुम्हारे दिल पर इस सबसे क्या गुज़र रही है। मगर यंगमैन, तुम हमारी उस लड़की के पीछे अपनी ज़िंदगी बरबाद मत करना। बल्कि खुशी खुशी किसी अच्छी लड़की से शादी कर लेना।
बस उसके बाद आदित्य कभी सिंहानिया के घर नहीं गया और कोमल के द्वारा मिले झटके ने उसे हमेशा के लिए ख़ामोश कर दिया था। तो ये थी आदित्य चोपड़ा के ख़ामोश रहने की वजह मगर अब वो ख़ामोश नहीं था। बल्कि मेरा दोस्त बन चुका था और हम दोनो हॅसी खुशी बातें करते हुए आ रहे थे। रात में हम दोनो ने थोड़ा बहुत खाना खाया और आराम से लेट कर सो गए थे।
सुबह आदित्य ने ही मुझे उठाया। उसके दोनो हाथों में गरमा गरम चाय के दो छोटे छोटे ग्लास देख कर मैं भी उठ बैठा।
"गुड मार्निंग डियर फ्रैण्ड।" आदित्य ने मुस्कुराते हुए अपने एक हाथ में पकड़े हुए चाय के उस छोटे से ग्लास को मेरी तरफ बढ़ा दिया,___"हाज़िर हैं गरमा गरम चाय।
"
"एक मिनट भाई मैं ज़रा हाथ मुह धोकर आता हूॅ।" मैने कहा और उठ कर बाथरूम की तरफ चला गया।
थोड़ी देर बाद मैं बाथरूम से वापस आया और आदित्य के सामने वाली सीट पर बैठ गया। आदित्य ने मुझे चाय पकड़ाई तो मैं उसके हाॅथ से चाय लेकर पीने लगा।
"वैसे कितने बजे तक हम तुम्हारे गाव पहुॅचेंगे?" आदित्य ने कहा अपने बाएॅ हाथ पर बॅधी रिस्टवाच पर टाइम देखते हुए कहा___"अभी तो सुबह के सात ही बजे हैं।"
"अगर ट्रेन अपने राइट समय पर चल रही है तो हम लगभग ग्यारह बजे गुनगुन स्टेशन पहुॅच जाएॅगे।" मैने बताया उसे।
"ओह इसका मतलब अभी काफी समय बाॅकी है पहुॅचने में।" आदित्य ने ठंडी साॅस ली।
"हाॅ, मेरा दोस्त पवन हल्दीपुर के बस स्टैण्ड पर मिलेगा।" मैने कहा___"ट्रेन से हम गुनगुन स्टेशन पर उतरेंगे उसके बाद वहाॅ से ऑटो करके हम बस स्टैण्ड जाएॅगे। बस से हम हल्दीपुर पहुॅचेंगे। जहाॅ पर हमें पवन मिलेगा।"
"ओह यार ये तो काफी लम्बा चक्कर लग रहा है।" आदित्य बोला___"वैसे गुनगुन स्टेशन से क्या हम किसी टैक्सी द्वारा तुम्हारे गाॅव तक नहीं जा सकते?"
आदित्य की बात सुनकर मेरे दिमाग़ की बत्ती जली। टैक्सी से जाने में काफी सुरक्षा वाली बात रहेगी। क्योंकि एक पल के लिए अगर ये मान लिया जाए कि मेरे बड़े पापा अपने आदमियों की यहाॅ लगा रखा होगा तो वो सब मुझे बस में ही खोजेंगे और टैक्सी में मेरे मौजूद होने की वो कल्पना भी न करेंगे। मुझे आदित्य की ये बात बहुत जॅची।
"क्या हुआ यार?" मुझे सोचों में गुम देख कर आदित्य कह उठा___"कहाॅ खो गए तुम?"
"मैं ये सोच रहा हूॅ कि हम गुनगुन स्टेशन पर ट्रेन से उतर कर किसी टैक्सी के द्वारा ही हल्दीपुर चलें।" मैने कहा___"तुम्हारी इस बात से मुझे यही लग रहा है कि टैक्सी में हम ज्यादा सेफ रहेंगे।"
"अगर ऐसा है तो हम टैक्सी में ही चलेंगे तुम्हारे गाॅव।" आदित्य ने कहा___"हर जगह वाहन बदलने का चक्कर भी नहीं रहेगा।"
"सही कहा तुमने।" मैने कहा___"मैं पवन को भी बता देता हूॅ कि मैं टैक्सी से डायरेक्ट हल्दीपुर आऊॅगा।"
मैने अपना फोन निकाल कर पवन को सब बता दिया। उसके बाद मैं और आदित्य समय गुज़ारने के लिए फिर से किसी न किसी चीज़ के बारे में बातें करने लगे। उधर ट्रेन अपनी रफ्तार से दोड़ी जा रही थी। मुझे नहीं पता था कि आने वाला समय मुझे क्या दिखाने वाला था या फिर किस तरह का झटका देने वाला था?
दोस्तो, आख़िर समय निकाल कर अपडेट तैयार कर ही लिया। तो हाज़िर है आपकी अदालत में मेरा प्रयोग,,,,,,,,,,,,,,
दोस्तो, मुझे पता है कि हिन्दी फोन्ट में हो या अंग्रेजी फोन्ट में टाइपिंग करते समय शब्द इधर उधर हो जाते हैं। मेरी आदत है कि मैं अपडेट को एडिट भी नहीं करता।
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.........《 42 》
अब तक,,,,,,,,
"ओह यार ये तो काफी लम्बा चक्कर लग रहा है।
" आदित्य बोला___"वैसे गुनगुन स्टेशन से क्या हम किसी टैक्सी द्वारा तुम्हारे गाॅव तक नहीं जा सकते?"
आदित्य की बात सुनकर मेरे दिमाग़ की बत्ती जली। टैक्सी से जाने में काफी सुरक्षा वाली बात रहेगी। क्योंकि एक पल के लिए अगर ये मान लिया जाए कि मेरे बड़े पापा अपने आदमियों को यहाॅ लगा रखा होगा तो वो सब मुझे बस में ही खोजेंगे और टैक्सी में मेरे मौजूद होने की वो कल्पना भी न करेंगे। मुझे आदित्य की ये बात बहुत जॅची।
"क्या हुआ यार?" मुझे सोचों में गुम देख कर आदित्य कह उठा___"कहाॅ खो गए तुम?"
"मैं ये सोच रहा हूॅ कि हम गुनगुन स्टेशन पर ट्रेन से उतर कर किसी टैक्सी के द्वारा ही हल्दीपुर चलें।" मैने कहा___"तुम्हारी इस बात से मुझे भी यही लग रहा है कि टैक्सी में हम ज्यादा सेफ रहेंगे।"
"अगर ऐसा है तो हम टैक्सी में ही चलेंगे तुम्हारे गाॅव।" आदित्य ने कहा___"हर जगह वाहन बदलने का चक्कर भी नहीं रहेगा।"
"सही कहा तुमने।" मैने कहा___"मैं पवन को भी बता देता हूॅ कि मैं टैक्सी से डायरेक्ट हल्दीपुर आऊॅगा।"
मैने अपना फोन निकाल कर पवन को सब बता दिया। उसके बाद मैं और आदित्य समय गुज़ारने के लिए फिर से किसी न किसी चीज़ के बारे में बातें करने लगे। उधर ट्रेन अपनी रफ्तार से दौड़ी जा रही थी। मुझे नहीं पता था कि आने वाला समय मुझे क्या दिखाने वाला था या फिर किस तरह का झटका देने वाला था?
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,,
"आप एक बार फिर से इस बारे में अच्छी तरह सोच लीजिए चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने समझाने वाले अंदाज़ में कह रहा था___"आपका इस मामले में पुलिस को सूचित करना कतई ठीक नहीं रहेगा। संभव है कि आपके द्वारा इस मामले को पुलिस को सूचित कर देने से वो ब्लैकमेलर हमारे लिए कोई गंभीर मुसीबत खड़ी कर दे। ये बात तो वो भी अच्छी तरह जानता और समझता ही होगा कि आप पुलिस को उसके बारे में बताने की सोचेंगे जो कि निहायत ही ग़लत होगा। उस सूरत में वो हमारे खिलाफ़ कुछ भी कर सकता है और हम उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएॅगे। क्योंकि अभी तक हम यही नहीं जानते हैं कि हमें ऐसी वीडियोज़ भेजने वाला वो शख्स आख़िर है कौन? उसने अब तक कोई फोन या मैसेज नहीं किया लेकिन उसके न करने से भी वो हमें यही समझा रहा है कि इस मामले में पुलिस को सूचित करने की मूर्खता हम लोग हर्गिज़ भी न करें।"
"तो आख़िर हम क्या करें अवधेश?" चौधरी ने खीझते हुए कहा___"आज दो दिन हो गए मगर उसकी तरफ से हमारे पास कोई मैसेज तक नहीं आया। हम तो चाहते हैं कि वो हमसे संबंध बनाए और बताए कि आख़िर वो ये सब करके हमसे चाहता क्या है? साला दो दिन से हमारे सुख चैन की माॅ बहन करके रखा हुआ है।"
"आप ज़रा धीरज से काम लीजिए चौधरी साहब।" अशोक मेहरा ने कहा___"आपकी तरह हम सब भी इस बात से बहुत परेशान और बेचैन हैं। हमारी जान भी हलक में अटक पड़ी है।
मगर जैसा कि अवधेश भाई ने कहा कि इस बारे में पुलिस को सूचित करना ठीक नहीं है तो बात हमारे हित में ही है। आप तो जानते हैं कि साले पुलिस वाले बाल की खाल निकालने वाले होते हैं। संभव है कि वो हमसे ऐसे सवाल करने लगें जिन सवालों के जवाब देना हमारे लिए ख़तरे से खाली नहीं होगा। ऐसे में हम खुद ही उल्टा फॅस जाएॅगे। रही बात उस ब्लैकमेलर की कि उसने अब तक हमसे कांटैक्ट नहीं किया तो ये कोई समस्या नहीं है। कहने का मतलब ये कि वो देर सवेर ही सही मगर हमसे कांटैक्ट ज़रूर करेगा, क्योंकि इन वीडियोज़ को हमारे पास भेजने का कोई न कोई मकसद उसका ज़रूर होगा। अपने उस मकसद को पूरा करने के लिए वो हमसे कांटैक्ट ज़रूर करेगा। बस आप धैर्य रखें चौधरी साहब।"
"बस एक बार।" दिवाकर चौधरी गुस्से से दाॅत किटकिटाते हुए बोला___"सिर्फ एक वो हरामज़ादा हमारे हाॅथ लग जाए उसके बाद हम बताएॅगे उसे कि हमारे साथ ऐसी वाहियात हरकत करने का क्या अंजाम होता है। उस हराम के पिल्ले को ऐसी मौत मारेंगे कि उसे अपने पैदा होने पर अफसोस होगा।"
"इसका उल्टा भी तो हो सकता है चौधरी साहब।" सहसा इस बीच सहमी सी बैठी सुनीता ने अजीब भाव से कहा___"आप ये क्यों नहीं सोचते हैं कि जिसने भी आपके या हमारे साथ ऐसे दुस्साहस से भरे काम को अंजाम दिया है वो कोई ऐरा गैरा ब्यक्ति नहीं हो सकता? ये बात तो वो भी जानता होगा कि आप क्या चीज़ हैं, इसके बावजूद उसने ऐसा किया। इसका मतलब साफ है कि वो हमसे ज़रा भी ख़ौफ नहीं खाता है बल्कि अपने किसी मकसद को पूरा करने के लिए वो मौत के मुह में ही आ पहुॅचा है। दूसरी बात उसे हमसे डरने की ज़रूरत भी कहाॅ है जबकि उसके पास हमारे ख़िलाफ ऐसा सामान मौजूद है जिसके बल पर वो जब चाहे हमें बीच चौराहे पर नंगा दौड़ा सकता है। इस लिए ये बात तो आप भूल ही जाइये कि आप उसे ऐसी कोई मौत देंगे जिससे उसे अपने पैदा होने पर अफसोस होगा।"
"साली रंडी की दुम हमें डरा रही है?" चौधरी खिसियानी बिल्ली की तरह सुनीता पर चढ़ दौड़ा था, बोला___"तुझे पता नहीं है कि हम क्या चीज़ हैं। हम चाहें तो यहाॅ बैठे बैठे दिल्ली तक को हिला कर रख दें। वो हराम का जना साला तभी तक सलामत है जब तक वो हमसे दूर कहीं छुपा बैठा है। जिस दिन हमारे हाथ लग गया न उस दिन हम बताएॅगे कि दिवाकर चौधरी के साथ ऐसी हिमाकत करने का हस्र क्या होता है?"
दिवाकर चौधरी का तमतमाया हुआ चेहरा देख कर और उसकी खतरनाक बातें सुनकर सुनीता की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई। ड्राइंगरूम पिन ड्राप सन्नाटा छा गया था। किसी की बोलने की हिम्मत न पड़ी। मगर तभी इस सन्नाटे को तोड़ने की हिमाकत खुद दिवाकर चौधरी के मोबाइल फोन की घंटी ने कर दी। दो पल के लिए तो दिवाकर चौधरी हड़बड़ाहट में ही रहा।
फिर जल्दी से खादी के कुर्ते की जेब से मोबाइल फोन निकाल कर उसने स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नंबर को देखा। स्क्रीन पर वही नंबर फ्लैश हो रहा था जिस नंबर से चौधरी के इसी फोन पर वो वीडियोज़ भेजा था उस ब्लैकमेलर ने।
"क्या हुआ चौधरी साहब?" अवधेश श्रीवास्तव ने शशंक भाव से कहा___"क्या देख रहे हैं? काल को रिसीव कीजिए।"
"ये तो वही नंबर है अवधेश।" चौधरी ने बड़े उत्साहित भाव से कहा___"जिस नंबर से हमारे फोन पर वो वीडियो भेजे गए थे।"
"तो फिर जल्दी से काल को रिसीव कीजिए चौधरी साहब।" अशोह मेहरा कह उठा__"और फोन का स्पीकर भी ऑन कर दीजिए। हम सब भी सुनेंगे कि वो क्या कहता है?"
चौधरी ने काल रिसीव करके मोबाइल का स्पीकर ऑन कर दिया।
"कहो चौधरी कैसे हो?" उधर से मर्दाना स्वर में आवाज़ उभरी___"काल रिसीव करने में इतना टाइम कैसे लगा दिया तुमने? ओह शायद मेरा काल देख कर तुम्हें समझ में ही न आया होगा कि क्या करें और क्या न करें? होता है चौधरी, ऐसा तो यकीनन होता है। और हाॅ ये बहुत अच्छा किया जो अपने फोन का स्पीकर ऑन कर दिया तुमने। आख़िर तुम्हारे उन साथियों को भी तो मेरी मधुर आवाज़ सुनने का हक़ है।"
"हमसे ऐसे लहजे में बात करने का अंजाम नहीं जानते हो तुम।" चौधरी ने दाॅत पीसते हुए कठोर भाव से कहा___"अगर जानते तो ऐसी हिमाकत नहीं करते। और अब हमारी बात कान खोल कर सुनो तुम। ये जो कुछ तुमने किया है न उसकी सज़ा तो तुम्हें ज़रूर मिलेगी। ये मत समझना कि वोडियो भेज कर तुमने हमे चूहा बना दिया होगा।"
"ये गीदड़ भभकियाॅ किसी और को देना चौधरी।" उधर से ठंडे लहजे में कहा गया___"मैं तुम्हारी किसी बात से बाल बराबर भी डरने वाला नहीं हूॅ। मैं चाहूॅ तो पल भर में तुम्हारी ताकत और तुम्हारी शान को मिट्टी में मिला दूॅ। इस लिए बेहतर होगा कि मुझसे ज्यादा उड़ने की कोशिश मत करना और ना ही मुझ पर अपना रौब झाड़ना।"
"क्या चाहते हो तुम?" चौधरी को समझ आ गया था कि सामने वाला उससे डरने वाला नहीं है इस लिए मुद्दे की बात करना ही चित समझा उसने, बोला___"अगर तुमने ये सब हमसे रुपया पैसा ऐंठने के लिए किया है तो मुह फाड़ो अपना और बताओ कि कितना रुपया चाहिए तुम्हें? मगर ख़बरदार, डील सिर्फ एक ही बार होगी। तुम्हें जितना भी रुपया चाहिए वो बोल दो, हम तुम्हें मुहमागा रुपया दे देंगे मगर बदले में तुम हमें वो सारे वीडियोज़ लौटा दोगे।"
"ये तुमने कैसे सोच लिया चौधरी कि ये सब मैने तुमसे पैसे ऐंठने के लिए किया है?" उधर से हॅस कर कहा गया___"अरे बुड़बक, पैसा तो मेरे पास इतना है कि मैं खड़े खड़े तुम्हें और तुम्हारे पूरे खानदान को ख़रीद लूॅ। ख़ैर, तुम जैसे दो कौड़ी के भड़वों को खरीदेगा भी कौन? मैने तो ये सब सिर्फ इस लिए किया कि तुम्हें बता सकूॅ अब तुम्हारा और तुम्हारे साथियों का खेल खत्म हो चुका है।
अब यहाॅ से तुम लोगों के बुरे कर्मों का हिसाब शुरू होगा।"
"हरामज़ादे तू है कौन साले?" चौधरी बुरी तरह गुस्से में चीख पड़ा था___"एक बार हमारे सामने आ फिर हम बताएॅगे कि हमसे ऐसी ज़ुर्रत करने का क्या अंजाम होता है?"
"हरामज़ादा किसे बोलता है रे मादरचोद साले रंडी की औलाद।" उधर से मानो शेर की गुर्राहट उभरी___"चिंता मत कर साले बहुत जल्द तेरी हेकड़ी निकालूॅगा मैं। साले बकरे की तरह मिमियाएगा मेरे सामने।"
"ज़ुबान सम्हाल कर बात कर हमसे।" चौधरी चीखा तो ज़रूर मगर उसने खुद महसूस किया कि उसके स्वर में कोई दम नहीं था, फिर भी बोला___"हम तुम्हारे इस अपराध को माफ़ कर देंगे। बस तुम हमें वो सब वीडियोज़ लौटा दो।"
"भीख माॅगता है क्या रे चौधरी?" उधर से ठहाके की आवाज़ आई___"अच्छा है माॅगना शुरू ही कर दे अब। ख़ैर जाने दे, मैं ये कह रहा हूॅ कि बहुत जल्द तुझे ऐसा मंज़र देखने को मिलेगा कि तू उसे देख नहीं पाएगा और तेरे ही साथ बस क्यों तेरे सभी साथियों के साथ भी वही सब होगा। अपनी बरबादी को रोंक सकता है तो रोंक ले तू।"
अभी चौधरी कुछ कहना ही चाहता था कि उधर से फोन कट गया। चौधरी ने जल्दी से उसी नंबर पर काल किया मगर नंबर स्विच ऑफ बताने लगा था। पल भर में चौधरी की हालत किसी लुटे हुए जुआॅरी जैसी नज़र आने लगी थी। चौधरी जैसा हाल बाॅकी उन सबका भी था जो वहाॅ पर बैठे फोन की हर बात सुन रहे थे। सुनीता की हालत तो ऐसी हो गई थी जैसे उसे लकवा मार गया हो। बड़े से ड्राइंगरूम में गहन सन्नाटे के सिवा कुछ न रह गया था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर हवेली में।
गहरी सोच में डूबी हुई नैना रितू के कमरे में पहुॅची। कमरे में पहुॅच कर उसने देखा कि रितू पुलिस की वर्दी पहने आईने के सामने खड़ी होकर सिर पर पीकैप को ठीक से लगाते हुए खुद को देख रही थी।
"क्या बात है रितू तूने मुझे इस तरह रहस्यमय तरीके से किस लिए बुलाया है?" नैना ने रितू की तरफ देखते हुए कहा था। उसकी बात सुन कर रितू आईने की तरफ से पलट कर अपनी नैना बुआ की तरफ देखा।
"क्या आपने अपना सब सामान ले लिया है बुआ जी?" रितू ने पूछा।
"आख़िर बात क्या है मेरी बच्ची?" नैना हैरान परेशान सी बोली___"मुझे अपना सारा सामान लेने के लिए क्यों कह रही है तू? क्या तू मुझे कहीं लेकर जा रही है?"
"हाॅ बुआ।" रितू ने तनिक गंभीरता से कहा___"लेकिन इस वक्त आप मुझसे ये न पूछिए कि ऐसा मैं क्यों कह रही हूॅ। बस आप वो कीजिए जो मैं कह रही हूॅ। यकीन मानिये बुआ मैं आपको आपके सभी सवालों का जवाब दूॅगी मगर अभी नहीं। अभी आप वही कीजिए जो मैने कहा है प्लीज़।"
"ठीक है रितू।" नैना ने बेचैनी से कहा__"पर मैं भइया भाभी से क्या कहूॅगी कि अपना सामान लेकर मैं कहा जा रही हूॅ?"
"उनको बता दीजिएगा कि आप वापस अपने ससुराल जा रही हैं क्योंकि आपके पास आपके ससुराल से फोन आया था जो आपको आने के लिए कह रहे थे।।
" रितू ने जैसे तरीका बताया।
"वो तो ठीक है।" नैना ने कहा___"लेकिन अगर भइया ने मेरी ससुराल में फोन करके इस बारे में पूछा तो क्या होगा? उन्हें तो पता चल ही जाएगा कि मैं उनसे झूॅठ बोल रही हूॅ।"
"वो ऐसा कुछ नहीं करेंगे बुआ।" रितू ने कहा___"आप बस जल्दी से सामान लेकर हवेली से बाहर आइये। मैं आपको बाहर ही मिलूॅगी।"
"अरे नास्ता तो कर ले।" नैना ने कहा___"भाभी डायनिंग टेबल में तेरा इन्तज़ार कर रही हैं।"
"नहीं बुआ मुझे ज़रा भी भूॅख नहीं है।" रितू ने कहा___"और आप भी मत खाइयेगा। क्योंकि उससे हमें जाने में देर हो जाएगी।"
"बड़ी हैरानी की बात है रितू।" नैना ने चकित भाव से कहा___"ख़ैर, तू चल मैं आती हूॅ।"
"ठीक है बुआ।" रितू दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए बोली___"जल्दी आइयेगा।"
कहने के साथ ही रितू लम्बे लम्बे डग भरते हुए दरवाजे के बाहर निकल गई। उसके पीछे पीछे ही नैना भी चल दी। ये अलग बात है कि इस वक्त उसके मन में गहन विचारों का आवागमन शुरू था।
"रितू बेटा, बड़ी देर कर दी आने में।" प्रतिमा ने रितू को देखते ही कहा__"चल आजा, नास्ता ठंडा हो रहा है।"
"नहीं माॅम, मुझे अर्जेंट थाने पहुॅचना है।" रितू ने एक एक नज़र वहीं कुर्सियों पर बैठे अपने भाई शिवा और अपने पिता अजय सिंह पर डालते हुए कहा___"मैं बाहर ही नास्ता कर लूॅगी।"
"उफ्फ तेरी ये नौकरी भी न।" प्रतिमा ने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा___"चैन से तुझे नास्ता भी नहीं करने देती है। छोंड़ दे न ये नौकरी बेटा। आख़िर क्या कमी है हमारे पास और क्या कमी की है हमने तेरी इच्छाओं को पूरा करने में?"
"बात किसी भी चीज़ की कमी की नहीं है माॅम।" रितू ने कहा___"बात है शौक की और ये पुलिस की नौकरी मेरा शौक ही है। पाप और ज़ुर्म को खत्म करना मेरा शुरू से सिद्धांत रहा है। ख़ैर, आप नहीं समझेंगी मेरी भावनाओं को।"
"माॅम ठीक ही तो कह रही हैं दीदी।" सहसा शिवा ने कहा___"आपको पुलिस की नौकरी करने की क्या ज़रूरत है? इस तरह का शौक रखना निहायत ही बेकार की बात है।"
"तू अपना मुह बंद ही रख समझे।" रितू ने कठोर भाव से कहा___"मेरा शौक तेरे शौक से कहीं ज्यादा ऊॅचा और पाक़ है। पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो गई हूॅ और खुद कमा कर खा सकती हूॅ। तेरी तरह डैड के पैसों पर ऐश करना मुझे हर्गिज़ पसंद नहीं है।"
"आप ज़रूरत से ज्यादा ही भाषण दे रही हैं दीदी।" शिवा ने कहा___"बेहतर होगा कि आप अपना ये भाषण किसी और को सुनाएॅ।"
"सच कहा तूने।" रितू ने कड़वा ज़हर मानो खुद ही निगलते हुए कहा___"ये भाषण तुझे रास नहीं आ सकता। ये भाषण तो उसे ही रास आएगा जो इसके लायक होगा।"
"ये क्या बेहूदा बातें कर रही हो बेटी?" सहसा अजय सिंह कह उठा___"अपने इकलौते भाई से इस तरह रुखाई से कौन बहन बात करती है? तुमने अपनी मर्ज़ी से पुलिस की नौकरी कर ली हमें कोई प्राब्लेम नहीं हुई।
मगर इस बात का भी ख़याल रखना बच्चों का फर्ज़ है कि वो अपने माता पिता के अरमानों के बारे में सोचें।"
"वाह डैड।" रितू की ऑखों में ऑसू आ गए___"इस वक्त कौन सही है कौन ग़लत ये तो आपने बिलकुल ही नज़रअंदाज़ कर दिया। मुझे याद नहीं कि मैने कब अपने माॅम डैड की इज्ज़त या सम्मान को चोंट पहुॅचाई है। बल्कि बचपन से लेकर अब तक वहीं किया जो आपने कहा। आज की दुनियाॅ में अगर बेटियाॅ अपने पैरों पर खड़े होकर कामयाबी का कोई आसमान छूती हैं तो माॅ बाप को अपनी उस बेटी पर गर्व होता है मगर मेरे माॅम डैड को मेरी पुलिस की नौकरी करना ज़रा भी पसंद नहीं आया। ख़ैर, जाने दीजिए डैड। अगर आप नहीं चाहते हैं कि मैं ये पुलिस की नौकरी करूॅ तो ठीक है छोंड़ दूॅगी इसे।"
"तुम बेवजह बातों का पतंगड़ बना रही हो रितू बेटा।" प्रतिमा ने कहा___"अपने डैड से इस लहजे में बात करना तुम्हें ज़रा भी शोभा नहीं देता।"
"साॅरी माॅम।" रितू ने अपने अंदर के जज़्बातों को बड़ी मुश्किल से दबाते हुए कहा___"साॅरी डैड, एण्ड साॅरी भाई।"
रितू ने कहा और झटके से बाहर की तरफ निकल गई। दिल एकदम से छलनी सा हो गया था उसका। कहना तो बहुत कुछ चाहती थी वो मगर ये समय सही नहीं था। अपने अंदर के सुलगते हुए जज़्बातों को शख्ती से दबा लिया था उसने। दिल में अपने माॅ बाप और भाई के लिए उसकी नफ़रत में जैसे और भी इज़ाफा हो गया था।
हवेली के बाहर आकर वह एक तरफ खड़ी अपनी पुलिस जिप्सी की तरफ बढ़ती चली गई। जिप्सी में बैठ कर उसने उसे स्टार्ट किया और आगे बढ़ा कर मुख्य दरवाजे तक आ कर रुक गई। कदाचित नैना बुआ के आने का इन्तज़ार करने लगी थी वह। लगभग पन्द्रह मिनट के इन्तज़ार के बाद नैना बाहर आती दिखी उसे। नैना के बाएॅ हाथ में उसका बैग देख कर रितू ने मन ही मन राहत की मीलों लम्बी साॅस ली। जिप्सी के पास आकर नैना ने पिछली सीट पर बैग रखा और फिर घूम कर रितू के बगल वाली सीट पर आकर बैठ गई। नैना के बैठते ही रितू ने जिप्सी को झटके से आगे बढ़ा दिया।
"हवेली से बाहर आने में काफी देर लगा दी आपने।" मेन सड़क पर पहुॅचते ही रितू ने कहा नैना से।
"हाॅ वो भइया भाभी पूछने लगे थे न कि मैं अपना ये सामान लेकर कहाॅ जा रही हूॅ?" नैना ने बताया___"बड़ी मुश्किल से उन्हें कन्विंस किया तब जाकर बाहर आ पाई मैं। लेकिन मुझे ये समझ में नहीं आ रहा कि तुम मुझे इस तरह कहाॅ लेकर जा रही हो?"
"बस ये समझ लीजिए बुआ कि मैं आपको ऐसी जगह लेकर जा रही हूॅ।" रितू ने अजीब भाव से कहा___"जहाॅ पर आप पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी।"
"क्या मतलब??" नैना बुरी तरह चौंकी थी।
"मतलब किसी स्वीमिंग पुल में भरे पानी की तरह साफ है बुआ।" रितू ने कहा___"बस समझने की बात है।"
"देख तू मुझसे ऐसे पुलिसिये लहजे में बात मत किया कर।" नैना ने कहा___"मुझे बिलकुल समझ में नहीं आता कि तू क्या बोल रही है?"
"अच्छा ये बताइये।
" रितू ने कहा__"कि डैड ने आपके ससुराल वालों को फोन तो नहीं किया न वो सब पूछने के लिए?"
"नहीं फोन तो नहीं किया।" नैना ने कहा__"बस यही कहा कि ये अच्छी बात है अगर मेरी ससुराल वाले मुझे फिर से बुला रहे हैं तो। मगर, ऐसा भी तो हो सकता है रितू कि वो मेरे यहाॅ आने के बाद मेरी ससुराल में फोन लगाएॅ। ये जानने के लिए कि मैं वहाॅ पर समय पर और ठीक से पहुॅच गई हूॅ कि नहीं और जब उन्हें ये पता चलेगा कि मैं वहाॅ गई ही नहीं तो क्या सोचेंगे वो मेरे बारे में?"
"अब उनके कुछ भी सोचने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला बुआ।" रितू ने कहा__"क्यों कि अब आप हवेली से बाहर आ चुकी हैं। मैं तो बस आपको उस हवेली से बाहर निकालना चाहती थी।"
"क्या मतलब है तेरा?" नैना बुरी तरह उछल पड़ी। हैरत से उसकी ऑखें फैल गईं थी।
"अभी नहीं बुआ।" रितू ने कहा___"बाद में आपको सब कुछ बताऊॅगी और तसल्ली से बताऊॅगी।"
"पता नहीं क्या अनाप शनाप बोले जा रही है तू?" नैना का दिमाग़ मानो चकरघिन्नी बन गया था, बोली___"मुझे तो कुछ पल्ले ही नहीं पड़ रही तेरी बातें।"
नैना की इस बात पर रितू कुछ न बोली। बल्कि जिप्सी को टाॅप गियर में डाल कर उसे तूफान की तरह भगाती हुई वह नियत समय से बहुत कम समय में अपने फार्महाउस पहुॅच गई। फार्महाउस के अंदर दाखिल होकर रितू ने पोर्च के नीचे जाकर जिप्सी को रोंक दिया।
"ये कौन सी जगह है रितू?" नैना ने हैरानी से इधर उधर देखते हुए कहा___"ये तू कहाॅ ले आई है मुझे?"
"अपने एक अलग घर में बुआ।" रितू ने कहा___"जहाॅ पर अपना अलग एक नया संसार बसता है।"
"एक नया संसार?" नैना चकरा सी गई, बोली___"इसका क्या मतलब हुआ भला?"
"आईये अंदर चलते हैं।" जिप्सी से उतरते हुए रितू ने कहा___"अब से आप यहीं रहेंगी।"
"ये तुम क्या कह रही हो बेटा?" नैना चकित स्वर में बोली___"मैं यहीं रहूॅगी? मगर क्यों रितू? ऐसा क्या हो गया है जिसकी वजह से तुम मुझे यहाॅ लेकर आई हो। आख़िर बात क्या है? क्या छुपा रही है तू मुझसे? देख रितू मुझे सारी बात सच सच बता, मेरा दिल बहुत घबरा रहा है।"
"अब आपको किसी भी बात के लिए घबराने की ज़रूरत नहीं है बुआ।" रितू ने पिछली सीट से नैना का बैग निकालते हुए कहा__"ये अपना ही घर है। यहाॅ पर आपको किसी बात का कोई ख़तरा नहीं है।"
"खतरा???" नैना का दिमाग़ मानो कुंद सा पड़ता चला गया, बोली___"आख़िर तू किस खतरे की बात कर रही है रितू? मुझे भला किससे खतरा है और किस बात का खतरा है? मुझे बता बेटा, वरना तेरी इन बातों से मैं पागल हो जाऊॅगी।"
"सब बताऊॅगी बुआ।" रितू ने कहा__"अंदर तो चलिए।"
रितू की इस बात से हैरान परेशान नैना किसी यंत्र चालित सी होकर रितू के पीछे पीछे अंदर की तरफ चल पड़ी।
अंदर पहुॅचते ही उन्हें हरिया काका की बीवी बिंदिया मिल गई।
"अरे बिटिया आ गई तुम?" बिंदिया ने बड़े प्यार और सम्मान से कहा___"और ये तुम्हारे साथ में बीवी जी कौन हैं?"
"काकी ये मेरी छोटी बुआ हैं।" रितू ने कहा___"और आज से ये यहीं रहेंगी। इनका हर तरह से ख़याल रखना।"
"इसमें कहने वाली कौन सी बात है बिटिया?" बिंदिया ने कहा___"मेरे लिए तो ये भी तुम्हारी तरह ही हैं।"
"इनके लिए मेरे बगल वाले कमरे को अच्छी तरह साफ कर दीजिए।" रितू ने कहा__"तब तक मैं इन्हें अपने कमरे में लिये जा रही हूॅ। और हाॅ जल्दी से गरमा गरम नास्ता भी तैयार कर दीजिए।"
"सब हो जाएगा बिटिया।" बिंदिया ने कहा___"तुम बस कुछ देर का समय दो मुझे।"
"ठीक है काकी।" रितू ने कहने के साथ ही नैना की तरफ देख कर कहा___"आइये बुआ ऊपर कमरे में चलते हैं।"
रितू ने कहा तो नैना उसके पीछे चुपचाप चल दी। उसके मन में हज़ारों सवाल और हज़ारों ख़याल पैदा हो चुके थे। कमरे में पहुॅच कर रितू ने नैना को बेड पर बैठाया और खुद भी उसके बगल में बैठ गई।
"अब तो बता बेटा कि बात क्या है?" नैना ने ब्याकुलता से पूछा___"इस तरह तू मुझे यहाॅ लेकर क्यों आई है?"
"मुझे समझ नहीं आ रहा बुआ।" रितू ने सहसा गंभीर होकर कहा___"कि आपको वो सब बातें कैसे बताऊॅ और कहाॅ से बताऊॅ?"
"देख रितू तू अब कोई बच्ची नहीं रही।" नैना ने कहा___"बल्कि तू अब बड़ी हो गई है। जो भी बात है तू मुझे बेझिझक बता सकती है। मुझे तू अपनी दोस्त या राज़दार समझ सकती है। मैं जातनी हूॅ कि तू कभी कोई ग़लत काम नहीं कर सकती है। मुझे तुझ पर हमेशा से गर्व रहा है। ख़ैर, तू बेझिझक बता कि ऐसी क्या बात है जिसकी वजह से तू मुझे इस तरह यहाॅ लेकर आई है?"
"मुझे किसी बात की भूमिका बनाना नहीं आता बुआ।" रितू ने गंभीरता से कहा__"मैं तो साफ साफ कहना जानती हूॅ। आप जानना चाहती हैं न कि मैं आपको इस तरह यहाॅ क्यों लेकर आई हूॅ यो सुनिए___हवेली में रहने वाले आपके भइया भाभी और आपका भतीजा ये तीनो ही वासना और हवस के चलते इस क़दर अंधे हो चुके हैं कि इन्हें अब ये भी नहीं दिखता कि ये लोग जिनके साथ कुकर्म करने का मंसूबा बनाए हुए हैं वो रिश्ते में इनके क्या लगते हैं।"
"ये तू क्या कह रही है रितू?" नैना की ऑखें हैरत से फैल गईं, बोली___"तुझे कुछ होश भी है कि तू किनके बारे में क्या बोल रही है?"
"होश तो अब आया है बुआ।" रितू ने भारी लहजे में कहा___"बचपन से लेकर अब तक तो मैं बेहोश ही थी। अपने उन माता पिता को देवता समझती रही जिनके हाॅथ अपने ही घर के लोगों के खून से सने हुए हैं। आपको नहीं पता बुआ, आपका भाई और मेरा बाप अपने ही भाई विजय सिंह का क़ातिल है। आज तक हम सब यही जानते रहे हैं कि विजय चाचा की मौत सर्प के काटने से हुई थी जब वो खेत में पानी लगा रहे थे। जबकि ये बात सरासर झूॅठ है बुआ। सच्चाई ये है कि मेरे बाप ने उनकी जानबूझ कर जान ली थी।
"
"ये ये क्या कह रही है तू?" नैना के पैरों तले से ज़मीन गायब हो गई___"नहीं नहीं अजय भइया ऐसा नहीं कर सकते हैं। ये सब झूठ है रितू, कह दे कि ये सब झूठ है।"
"कैसे कह दूॅ बुआ?" रितू की ऑखें छलक पड़ी____"मैंने अपनी ऑखों से देखा है और कानों से सुना है।"
"कब देखा सुना तुमने?" नैना कह उठी।
"कल रात को।" रितू ने कहा___"और ये अच्छा ही हुआ बुआ कि मुझे अपने माता पिता की ये सच्चाई खुद उनके ही मुख से सुनने को मिल गई। कल रात मुझे नींद नहीं आ रही थी। अपने बेड पर पड़ी मैं करवॅटें बदल रही थी। फिर मुझे प्यास लगी तो मैं अपने कमरे से निकल कर नीचे किचेन में पानी पीने के लिए आई। पानी पीकर जब मैं वापस अपने कमरे की तरफ जाने लगी तो देखा कि गौरी चाची की तरफ जाने वाला पार्टीशन का दरवाजा खुला हुआ था। मैने सोचा ये खुला हुआ क्यों है आज। बस यही पता करने के लिए मैं उस तरफ चली गई। मगर मुझे क्या पता था कि उस तरफ मुझे कुछ ऐसा देखने सुनने को मिलेगा जिसे देख सुन कर मेरे पैरों तले से धरती गायब हो जाएगी।"
"ऐसा क्या देखा सुना तुमने?" नैना बेयकीनी भरे भाव से पूछा था। उसकी बात सुन कर रितू उसे वो सब कुछ बताती चली गई जो कुछ उसने उस तरफ कमरे के अंदर देखा और सुना था। उसने एक एक बात नैना को बताई। सारी बातें सुनने के बाद नैना की हालत काटो तो खून नहीं जैसी हो गई थी। फिर जैसे उसे खुद ही होश आया। उसका चेहरा पलक झपकते ही दुख और पीड़ा में डूबता चला गया। ऑखों से झर झर करके ऑसू बहने लगे।
"इतना बड़ा पाप।" फिर वह बिलखते हुए बोली___"और इतना बड़ा गुनाह किया इन लोगों ने मेरे देवता जैसे भाई के साथ। अरे उसके साथ ही क्यों रे, इन लोगों ने तो किसी को भी नहीं बक्शा। अपने पाप और गुनाह को छुपाने के लिए मेरे भाई की सर्प से कटवा कर जान ले ली। मेरी देवी समान भाभी गौरी पर इतने संगीन इल्ज़ाम लगाए और उन्हें हवेली से निकाल दिया। इन लोगों ने तो हवेली को नर्क बना कर रख दिया है रितू। अच्छा हुआ तू मुझे यहाॅ ले आई। वरना इन लोगों का कोई भरोसा नहीं था कि ये लोग कब मेरी या तुम्हारी इज्ज़त के साथ अपनी हवस की भूख को शान्त करते।"
"मुझे नफ़रत हो गई है बुआ अपने माॅ बाप और भाई से।" रितू ने कहा___"मैं तो कल ही अपने रिवाल्वर से इन तीनो को जान से मार देना चाहती थी मगर मेरे ज़मीर ने रोंक दिया मुझे। ये कह कर कि इनको जान से मारने का अधिकार मुझको नहीं बल्कि उसे है जिनके साथ इन लोगों ने ग़लत किया है। कसम से बुआ, मुझे ऐसे माॅ बाप और भाई के मर जाने का लेश मात्र भी दुख नहीं होगा।"
"मुझे तो अभी भी यकीन नहीं हो रहा रितू कि ये सब इन लोगों ने किया है।" नैना ने दुखी भाव से कहा___"पता नहीं मेरी देवी समान गौरी भाभी और उनके दोनो बच्चे किस हाल में होंगे? जिस तरह से इन लोगों उन पर अत्याचार किया है न उसकी इन्हें सज़ा ज़रूर मिलेगी।
ईश्वर के पास सबका हिसाब है। उसका क़हर जब इन पर बरपेगा न तो इनके जिस्मों पर कीड़े पड़ जाएॅगे।"
"वो लोग मुम्बई में जहाॅ भी होंगे यहाॅ से बहुत अच्छे होंगे बुआ।" रितू ने कहा___"और आपको पता है आज मेरा वो भाई आ रहा है जिसे मैने कभी अपना भाई नहीं समझा था। लेकिन वो पगला हमेशा मुझे इज्ज़त से दीदी ही कहा करता था। मेरा सच्चा भाई आ रहा है बुआ। मेरा राज आ रहा है मुम्बई से।"
"क्या?????" नैना उछल पड़ी___"मगर तुझे कैसे पता?"
"पता तो होगा ही बुआ।" रितू ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"आख़िर बुलवाया तो मैने ही है उसे।"
"ये क्या कह रही है तू?" नैना ने बुरी तरह चौंकते हुए कहा___"तूने उसे बुलवाया है? ये जानते हुए भी कि तुम्हारे बाप से उसकी जान को खतरा है?"
"उसे कुछ नहीं होगा बुआ।" रितू ने दृढ़ता से कहा___"उसकी तरफ आने वाली हर बाधा हर मौत को सबसे पहले मुझसे मिलना होगा। कसम से बुआ अगर खुद मेरा बाप उसकी मौत बन उसके पास आया तो मौत रूपी उस बाप को भी मैं जीवित नहीं छोंड़ूॅगी।"
"लेकिन तूने उसे बुलवाया किस लिए है रितू?" नैना ने कहा___"आख़िर बात क्या है?"
"उसकी भी अजब कहानी है बुआ।" रितू ने अजीब भाव से कहा___"पगले का नसीब तो देखो। कहीं पर भी उसे प्यार और खुशियाॅ नसीब नहीं हुईं। दुख दर्द ने तो जैसे उसका दामन ही थाम रखा है।"
"क्या कह रही तू?" नैना ने ना समझने वाले भाव से कहा___"साफ साफ बता कि बात क्या है?"
"बुआ, मेरा भाई विराज एक खूबसूरत लड़की से प्यार करता था।" रितू दुखी लहजे में बोली___"मगर बाद में उस लड़की ने उसे छोंड़ दिया। और अब वहीं लड़की उसे अंतिम बार देखना चाहती है।"
"अंतिम बार???" नैना का दिमाग़ चकरा गया___"इसका क्या मतलब हुआ?"
रितू ने नैना को सारी बातें बताई। ये भी बताया कि उस लड़की का कुछ दिनों पहले गैंग रेप हो चुका है। रितू ने बताया कि कैसे उस लड़की ने विराज को छोंड़ा था और अब लास्ट स्टेज के कैंसर से अंतिम साॅसें ले रही है। वो चाहती है कि अंत समय में वो अपने महबूब को देख ले और उसी की बाहों में उसका दम निकले। सारी बातें सुनने के बाद नैना एकदम अवाक् रह गई। उसकी ऑखों में फिर से ऑसुओं का सैलाब सा आ गया।
"हे भगवान ये सब क्या कर रहा है तू?" नैना ने ऊपर की तरफ देख कर दुखी भाव से कहा___"मेरे बच्चे को कितना दुख संताप देगा तू। रितू, वो विधी को उस हाल में देख नहीं पाएगा। भगवान ही जाने क्या गुज़रेगी उस वक्त उसके दिल पर। ये प्यार मोहब्बत होती ही ऐसी चीज़ है बेटा कि इंसान को कमज़ोर दिल का बना देती है। खुद पर चाहे हज़ार चोंट खा ले इंसान मगर अपने प्रियतम के लिए वो छोटी से छोटी चोंट भी बरदास्त नहीं कर पाता। तू उसके पास ही रहना बेटा। नहीं तो तू मुझे ले चल उसके पास। मैं अपने भतीजे को उस वक्त सम्हालूॅगी। मैं उसे किसी भी कीमत पर बिखरने नहीं दूॅगी रे।
"
"बस ईश्वर से दुवा कीजिए बुआ कि सब ठीक ही रहे।" रितू ने भारी स्वर में कहा__"मैं अपने भाई के पास ही रहूॅगी। मैं उसे अपने सीने से लगा लूॅगी बुआ लेकिन उसे बिखरने नहीं दूॅगी।"
"मुझे तुझ पर पूरा भरोसा है रितू।" नैना ने रितू के चेहरे को अपनी दोनो हथेलियों के बीच लेकर कहा____"आज तुझे अपने उस भाई के लिए इतना प्यार और इतनी तड़प देख कर मुझे खुशी हुई, जिस भाई को तूने कभी अपना नहीं समझा था।"
"वो मेरी सबसे बड़ी भूल थी और नादानी थी बुआ।" रितू की ऑखों में ऑसू भर आए, बोली___"जो मैने अपने पारस जैसे भाई को कभी अपना नहीं समझा था। लेकिन इसमें भी मेरा कोई कसूर नहीं है बुआ। ये सब तो मेरे उन्हीं माॅ बाप की वजह से हुआ है जिन्होंने बचपन से हम बहन भाई को यही सिखाते रहे कि ये हमारे अपने नहीं हैं बल्कि ये बुरे लोग हैं। मगर कहते हैं न बुआ कि सच्चाई हमेशा के लिए पर्दे के पीछे छुपी नहीं रह सकती। वो एक दिन उस पर्दे से निकल कर हमारे सामने आ ही जाती है। आज मुझे पता चल चुका है कि अच्छा कौन है और बुरा कौन है? जीवन भर दूसरों को बुरा बताने वाला आज खुद मेरे सामने कितना बुरा और पापी निकला जिसकी कोई सीमा नहीं है। जो बाप अपनी ही बेटी बहू और बहन को अपने नीचे सुलाने की बात करे वो अच्छा कैसे हो सकता है बुआ। वो तो सबसे ऊॅचे दर्ज़े का पापी है, कुकर्मी है। ऐसे लोगों को इस धरती पर जीने का कोई अधिकार नहीं है।"
"बड़े बड़े पापी और कुकर्मियों का इस धरती से सर्वनाश हुआ है बेटी।" नैना ने कहा__"फिर ये कैसे जीवित बच जाएॅगे। इनका भी वही हस्र होगा जो कंस और रावण का हुआ था। ख़ैर, तू ये बता कि विराज कब पहुॅच रहा है यहाॅ? और तूने उसकी सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम किया है?"
"मैने उसकी सुरक्षा के लिए इंतजाम कर दिया है बुआ।" रितू ने कहा___"रेलवे स्टेशन पर सिविल वेश में पुलिस के आदमी मौजूद हैं। मुझे पवन ने फोन पर बताया था कि वो ट्रेन से उतरने के बाद किसी टैक्सी में हल्दीपुर आएगा।उसने ऐसा शायद इस लिए किया है कि डैड के आदमी अगर वहाॅ कहीं हों भी तो वो सब उसे बस में ढूॅढ़ेंगे, जबकि उसके टैक्सी से आने की वो लोग उम्मीद भी न करेंगे।"
"मेरा भतीजा होशियार है।" नैना ने खुश होकर कहा___"बहुत अच्छा सोचा है उसने। ख़ैर, अब तू क्या करने वाली है?"
"मैं पवन के फोन का इन्तज़ार करूॅगी।" रितू ने कहा___"क्योंकि विराज सीधा पवन के घर ही जाएगा। इधर मैं हास्पिटल विधी के पास जाऊॅगी। उधर से सब कुछ ठीक करने बाद मैं पवन को फोन कर दूॅगी कि अब वो विराज को लेकर हास्पिटल आ जाए। मैने हास्पिटल के चारो तरफ भी सिविल ड्रेस में पुलिस वालों को मौजूद रहने के लिए कह दिया है।"
"ये बहुत अच्छा किया तुमने।" नैना ने कहा___"और मुझे यकीन है कि तेरे रहते विराज को कुछ नहीं होगा।"
"मैं अपनी जान दे दूॅगी बुआ।
" रितू ने दृढ़ता से कहा___"मगर अपने भाई को खरोंच तक आने नहीं दूॅगी।"
"क्या इतना प्यार करती है तू अपने उस भाई से?" नैना की ऑखें भर आईं थी।
"ऐसे भाई को तो सिर्फ प्यार ही किया जाता है न बुआ?" रितू के जज़्बात बेकाबू से हो गए, खुद को बड़ी मुश्किल से सम्हाल कर कहा उसने___"अगर कहीं भगवान मिले मुझे तो उससे यही कहूॅगी कि मुझे हर जन्म में विराज जैसा ही भाई दे और शिवा के जैसा भाई किसी बैरी को भी न दे।"
नैना ने तड़प कर रितू को अपने सीने से लगा लिया। दोनो की ऑखों से ऑसुओं के वो बाॅध फूट पड़े जो भावनाओं और जज़्बातों के मचल उठने से बेकाबू से हो गए थे। अभी ये दोनो एक दूसरे के गले ही लगे थे कि तभी कमरे में बिंदिया ने प्रवेश किया।
"बिटिया, नास्ता तैयार कर दिया है मैने चलो नास्ता कर लो।" बिंदिया ने कहा___"और हाॅ इनका कमरा भी साफ कर दिया है मैने।"
बिंदिया की बात सुन कर दोनो अलग हुईं और बड़ी सफाई से अपनी अपनी ऑखों से दोनो ने ऑसुओं को साफ कर लिया।
"आप चलिए काकी।" रितू ने कहा___"हम बस दो मिनट में आते हैं।"
"ठीक है बिटिया।" बिंदिया ने कहा और दरवाजे से वापस पलट गई।
बिंदिया के जाने के बाद नैना और रितू दोनो ही बाथरूम की तरफ बढ़ गईं। बाथरूम में पानी से अपने अपने चेहरों को धोने के बाद वो दोनो वापस कमरे में आईं और हुलिया सही करने के बाद नास्ते के लिए कमरे से बाहर चली गईं।
"काकी, आज काका कहीं दिखाई नहीं दिये अब तक।" नास्ते की टेबल पर बैठी रितू ने बिंदिया से कहा___"बाहर गेट पर सिर्फ शंकर काका ही दिखे थे।"
"अरे बिटिया अब क्या बताऊॅ तुमसे।" बिंदिया ने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा__"वो तो जब देखो उन चारों की खातिरदारी में ही लगा रहता है। तुमने काम जो सौंपा हुआ है उसे।"
"कौन चारो?" नैना को समझ न आया था इस लिए पूछ बैठी थी, बोली___"और किनकी खातिरदारी?"
"उन्हीं चारों की बुआ जिन्होंने विधी के साथ कुकर्म किया था।" रितू ने कहा___"वो सब बड़े बाप की बिगड़ी हुई औलादें हैं। जैसे कुकर्मी बाप वैसे ही कुकर्मी बेटे हैं। विधी के साथ इन लोगों जो कुकर्म किया उसके लिए उन चारों को कानूनी तौर पर मैं कोई सज़ा नहीं दिला सकती थी, क्योंकि वो सब अपने बाप की ऊॅची पहुॅच और ताकत के बल पर बड़ी आसानी से कानून की गिरफ्त से निकल जाते। ऐसे में विधी के साथ इंसाफ नहीं हो पाता बुआ इस लिए कानून की रखवाली करने वाली आपकी इस बेटी ने कानून को अपने हाॅथ में लेकर खुद उन चारों को सज़ा देने का फैंसला किया। ये इसी फैंसले का नतीजा है कि वो चारो आज यहाॅ पिछले कई दिनों से रोज़ाना सज़ा के रूप में यातनाएॅ झेल रहे हैं। और मज़े की बात ये है बुआ कि किसी को इस बात की भनक तक नहीं है कि यहाॅ पर किसी को ऐसी सज़ा दी जा रही है। इनके बाप लोगों को यही लगता है कि उनके बेटे कहीं बाहर गए हुए हैं और मज़े में होंगे।
"
"ये तो तुमने बहुत अच्छा काम किया है रितू।" नैना ने कहा___"लेकिन अगर इन लोगों के बापों को पता चल गया कि उनके बेटों के साथ तुम यहाॅ क्या कर रही हो तब क्या होगा?"
"उसका भी पुख्ता इंतजाम कर रखा है मैने।" रितू ने कहा___"बहुत जल्द इन लोगों के बापों को भी ऐसी ही सज़ा देने वाली हूॅ मैं। किसी को पता भी नहीं चलेगा कि इन नामों के लोगों के साथ किसने क्या किया है।"
नैना, रितू के चेहरे को देखती रह गई अचरज भरी नज़रों से। से यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसकी फूल जैसी नाज़ुक सी भतीजी ऐसे खतरनाक काम भी करती है। ख़ैर, नास्ता करने के बाद रितू ने नैना से जाने की इजाज़त ली और बाहर की तरफ निकल गई जबकि नैना मन ही मन ईश्वर को याद कर रितू और विराज की सलामती की दुवाएं करने लगी थी।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर ट्रेन अपने निर्धारित समय पर ही गुनगुन स्टेशन पर पहुॅची थी। ट्रेन से उतरने से पहले मैने अपने चेहरे को रुमाल से ढॅक लिया था। मेरे साथ मेरा नया दोस्त आदित्य था। उसको अपना चेहरा ढॅकने की कोई ज़रूरत नहीं थी। क्योंकि उसे यहाॅ पर कोई पहचानता ही नहीं था। हम दोनो ट्रेन से उतर कर स्टेशन से बाहर की तरफ बढ़ चले।
प्लेटफार्म पर इधर उधर मैने सरसरी तौर पर अपनी नज़रें दौड़ाई तो सहसा एक ऐसे चेहरे पर मेरी नज़र पड़ी जो यकीनन बड़े पापा का आदमी था। वो एग्जिट गेट के दाएॅ तरफ खड़ा हर आने वालों को बड़े ध्यान से देख रहा था। मैने उसकी तरफ से अपनी निगाह हटा ली और बेफिक्र होकर एग्जिट गेट की तरफ बढ़ चला। एग्जिट गेट के पास जब मैं और आदित्य पहुॅचे तो सहसा टीटी ने हमें रोंक लिया और हमसे टिकट दिखाने को कहने लगा। मैने जल्दी से अपने पाॅकेट से अपना पर्स निकाला और उससे टिकट निकाल कर टीटी को पकड़ा दिया। मैने पल भर के लिए दाएॅ तरफ कुछ ही दूरी पर खड़े बड़े पापा के उस आदमी की तरफ देखा। वो आने वाले आदमियों की तरफ बड़े ध्यान से देख रहा था। मैं ये नहीं जानता कि उसने मेरी तरफ देखा था या नहीं मगर इस वक्त उसकी नज़र सामने से आने वाले अन्य यात्रियों की तरफ ही थी। इधर टीटी ने मेरी टिकट चेक करने बाद मुझे वापस लौटा दी तो मेरे पीछे आदित्य ने भी टीटी को अपनी टिकट थमा दी। टीटी आदित्य की टिकट देखने बाद आदित्य को वापस कर दिया। मैने इशारे से आदित्य को चलने का इशारा किया। तभी उस ब्यक्ति की नज़र मुझ पर पड़ी। वो मुझे ध्यान से देखने लगा। मैं उसके देखने पर एकदम से घबरा सा गया मगर फिर जल्द ही मैने खुद को सम्हाला और आदित्य को लेकर बाहर की तरफ बढ़ गया। मैं पीछे नहीं देखना चाहता क्योंकि मुझे अंदेशा था कि वो शायद मुझे ही देख रहा होगा और गर मैने पलट कर उसकी तरफ देखा तो उसे ज़रूर मुझ पर शक हो सकता है।
बाहर आकर मैं और आदित्य टैक्सी की तरफ तेज़ी से बढ़ चले।
हलाॅकि वहाॅ पर बहुत से लोगों की भीड़ थी इस लिए मुझे यकीन था कि वो आदमी इतना जल्दी मुझे ढूॅढ़ नहीं पाएगा। टैक्सी के पास पहुॅचा ही था एक आदमी हमारे पास आया और हमसे टैक्सी का पूॅछा तो हमने तुरंत उस आदमी को हाॅ कह दिया। आदमी हमारी हाॅ सुनते ही हमे लेकर अपनी टैक्सी के पास पहुॅचा और टैक्सी का गेट खोल कर हमें अंदर बैठने का इशारा किया। हम दोनो उसमे बैठ गए तो वो टैक्सी ड्राइवर भी स्टेयरिंग सीट पर बैठ गया।
"कहाॅ चलना है साहब?" ड्राइवर ने टैक्सी को स्टार्ट करते हुए पूछा।
"हल्दीपुर।" मैने कहा तो ड्राइवर ने टैक्सी को आगे बढ़ा दिया। मैने पलट कर स्टेशन की तरफ देखा तो मुझे बड़े पापा का वो आदमी कहीं नज़र न आया। अभी मैं ये सब देख ही रहा था कि तभी मेरा मोबाइल फोन बज उठा। मैने हड़बड़ा कर मोबाइल को निकाल कर स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नाम को देखा। पवन का फोन था। मैने काल रिसीव की तो वो मुझसे पूछने लगा कि मैं इस वक्त कहाॅ हूॅ तो मैने उसे बता दिया कि टैक्सी में बैठ कर हल्दीपुर के लिए निकल लिया हूॅ। मेरी बात सुन कर उसने कहा कि ठीक है वो मुझे हल्दीपुर के बस स्टैण्ड पर मिलेगा जहाॅ पर उसकी दुकान है। उसके बाद मैने काल कट कर दी।
"यहाॅ से कितना समय लगेगा तुम्हारे गाॅव पहुॅचने में?" आदित्य ने मुझसे पूछा।
"ज्यादा से ज्यादा आधे घंटे का समय लगेगा।" मैने कहा___"हल्दीपुर के बस स्टैण्ड से पवन को साथ में लेकर ही उसके घर चलेंगे।"
मेरी बात सुन कर आदित्य कुछ न बोला। मैने एक बार पीछे मुड़ कर टैक्सी के पिछले शीशे के उस पार देखा। एक जीप हमारी इस टैक्सी के पीछे आ रही थी। मैने सोचा होगा कोई। मगर मुझे कोई उम्मीद नहीं थी कि इस तरह कोई जीप वाला एक रिदम पर टैक्सी के पीछे चल रहा था। मैने कई बार नोट की वो जीप हमादे पीछे उतनी ही रफ्तार से चलती हुई आ रही थी। मुझे समझ न आया कि ऐसा कौन हो सकता है उस जीप में जो हमारे पीछे पीछे उतनी ही गति से आ रहा था जितनी गति से हमारी टेक्सी सड़क पर दौड़ी जा रही थी। मेरा माथा ठनका कि कौन हो सकता है उस जीप में?????
दोस्तो, आपके सामने अपडेट हाज़िर कर दिया हूॅ,,,,,,,
ये दो दिन से थोड़ा थोड़ा लिख रहा था मैं। आज मैं तिलक में हूॅ अभी। बाॅकी का थोड़ा अपडेट यहीं बैठे बैठे लिखा है। मुझे लगता है कि इतना काफी है।
अगले अपडेट में आगे का विवरण होगा, जो शायद कुछ ज्यादा इमोशनल होगा
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट........《 43 》
अब तक,,,,,,,
"कहाॅ चलना है साहब?" ड्राइवर ने टैक्सी को स्टार्ट करते हुए पूछा।
"हल्दीपुर।" मैने कहा तो ड्राइवर ने टैक्सी को आगे बढ़ा दिया। मैने पलट कर स्टेशन की तरफ देखा तो मुझे बड़े पापा का वो आदमी कहीं नज़र न आया। अभी मैं ये सब देख ही रहा था कि तभी मेरा मोबाइल फोन बज उठा। मैने हड़बड़ा कर मोबाइल को निकाल कर स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नाम को देखा।
पवन का फोन था। मैने काल रिसीव की तो वो मुझसे पूछने लगा कि मैं इस वक्त कहाॅ हूॅ तो मैने उसे बता दिया कि टैक्सी में बैठ कर हल्दीपुर के लिए निकल लिया हूॅ। मेरी बात सुन कर उसने कहा कि ठीक है वो मुझे हल्दीपुर के बस स्टैण्ड पर मिलेगा जहाॅ पर उसकी दुकान है। उसके बाद मैने काल कट कर दी।
"यहाॅ से कितना समय लगेगा तुम्हारे गाॅव पहुॅचने में?" आदित्य ने मुझसे पूछा।
"ज्यादा से ज्यादा आधे घंटे का समय लगेगा।" मैने कहा___"हल्दीपुर के बस स्टैण्ड से पवन को साथ में लेकर ही उसके घर चलेंगे।"
मेरी बात सुन कर आदित्य कुछ न बोला। मैने एक बार पीछे मुड़ कर टैक्सी के पिछले शीशे के उस पार देखा। एक जीप हमारी इस टैक्सी के पीछे आ रही थी। मैने सोचा होगा कोई। मगर मुझे कोई उम्मीद नहीं थी कि इस तरह कोई जीप वाला एक रिदम पर टैक्सी के पीछे चल रहा था। मैने कई बार नोट की वो जीप हमादे पीछे उतनी ही रफ्तार से चलती हुई आ रही थी। मुझे समझ न आया कि ऐसा कौन हो सकता है उस जीप में जो हमारे पीछे पीछे उतनी ही गति से आ रहा था जितनी गति से हमारी टेक्सी सड़क पर दौड़ी जा रही थी। मेरा माथा ठनका कि कौन हो सकता है उस जीप में?????
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,,,
उधर अजय सिंह हवेली से फैक्ट्री जाने के लिए निकल ही रहा था कि तभी उसका मोबाइल फोन बज उठा। अजय सिंह ने कोट की पाॅकेट से मोबाइल निकाल कर स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे भीमा नाम को देख कर तनिक चौंका। उसने तुरंत ही काल को रिसीव कर मोबाइल को कानों से लगा लिया।
"हाॅ भीमा बोलो क्या ख़बर है?" कान से लगाते ही अजय सिंह ने ज़रा उत्सुक भाव से बोला था।
"............. ।" उधर से कुछ कहा भीमा ने।
"ये तुम क्या कह रहे हो भीमा?" अजय सिंह ने तनिक चौंकते हुए कहा था___"वो भला यहाॅ क्यों आएगा अब? तुमने अच्छी तरह से उसे देखा है न?"
".............।" उधर से भीमा ने कुछ कहा।
"तो ख़ाक़ देखा तुमने।" अजय सिंह का लहजा एकाएक कठोर हो गया___"तुमको खुद ठीक तरह से यकीन नहीं है उसका। पहले तुम उसे अच्छी तरह से देखो और जब तुम उसे पहचान जाओ तब हमे बताओ।"
".............।" उधर से भीमा ने फिर कुछ कहा।
"ऐसे नहीं भीमा।" अजय सिंह परेशान से लहजे में बोला___"हमें पक्के तौर पर ख़बर चाहिए। हवा में लाठियाॅ मत घुमाओ समझे। तुम्हें उसके आने का सिर्फ अंदेशा है। जबकि हम ये अच्छी तरह जानते हैं कि उस कायर और डरपोंक में अब इतनी हिम्मत नहीं है कि वो इस गाॅव में क़दम भी रख सके। उसे भी पता है कि यहाॅ क़दम रखते ही उसकी जान उसके जिस्म से जुदा हो जाएगी। दूसरी बात ये है कि यहाॅ वो आएगा ही क्यों? अपनी माॅ और बहन की वजह से आता था वो, मगर अब तो वो दोनो उसके पास ही हैं। इस लिए अब उसके यहाॅ आने का कोई सवाल ही नहीं उठता।"
"..........।" उधर से भीमा ने फिर कुछ कहा।
"सिर्फ शक के आधार पर तुम हमें ये बता रहे हो भीमा।
" अजय सिंह ने कुछ सोचते हुए कहा___"पर अगर तुम्हें लगता है कि वो वही था तो ठीक है तुम उसका पीछा करो। पता करो वो कहाॅ जाता है और किससे मिलता है?"
"...........।" भीमा ने कुछ कहा।
"तुम सब के सब निकम्मे हो।" अजय सिंह एकाएक बेहद गुस्से में बोला___"जब तुम्हें उस पर शक हो ही गया था तो उसका पीछा करते तुम।"
"...........।" उधर से भीमा ने फिर कुछ कहा।
"अरे तो कैसे गायब हो गया वो?" अजय सिंह चीखा___"वो ज़रूर किसी बस में या ऑटो में बैठ कर वहाॅ से निकल गया होगा। इतना जल्दी कोई गायब नहीं होता भीमा। वो यकीनन वही था। उसने तुम्हें पहचान लिया होगा और इसी लिए वो तुम्हारी नज़रों से इतना जल्दी ओझल हुआ है। मगर उसके साथ दूसरा वो आदमी कौन हो सकता है?"
"..............।" भीमा ने कुछ कहा।
"हाॅ शायद यही बात है।" अजय सिंह ने थोड़ा नरमी से कहा___"तुमने उसके साथ किसी अजनबी को देखा इसी लिए तुम्हारे मन में दो तरह के विचार पैदा हुए। तुमने सोचा होगा कि किसी अजनबी के साथ उसका क्या काम? इसी में तुम चूक गए भीमा। ख़ैर, कोई बात नहीं। अगर वो मुम्बई से यहाॅ आया है तो यकीनन वो गाॅव की ही तरफ आएगा। इस लिए अपने आदमियों से कहो कि फटाफट सारे रास्तों पर फैल जाएॅ और गाॅव के रास्तों पर भी घेराबंदी कर लें। वो ज़रूर किसी बस या ऑटो में ही होगा। हर वाहन की अच्छी तरह से तलाशी लो। साला जाएगा कहाॅ हमसे बच कर?"
"..........।" भीमा ने कुछ कहा।
"चलो अच्छी बात है।" अजय सिंह ने कहा___"जैसे ही वो मिले हमें ख़बर कर देना और हाॅ उसे पकड़ कर सीधा हमारे पास हवेली लेकर आना। हम भी फैक्ट्री ही जा रहे थे मगर अब नहीं जाएॅगे। यहीं तुम लोगों का इन्तज़ार करेंगे हम।"
ये कह कर अजय सिंह ने मोबाइल से काल कट कर दी और फिर अपने नथुने फुलाते हुए खुद ही बड़बड़ाया___"आ बेटा आ। तेरा स्वागत हम ऐसा करेंगे कि सारी दुनियाॅ हमारे स्वागत कार्यक्रम की कायल हो जाएगी। हाहाहाहाहा आ सपोले जल्दी आ।"
अभी अजय सिंह अपनी ही बातों से हॅस ही रहा था कि तभी वहाॅ पर प्रतिमा आ गई। उसके साथ में शिवा भी था।
"क्या बात है अजय?" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा___"अकेले अकेले ही मज़े ले रहे हो। मगर किस बात पर? हमे भी तो बताओ आख़िर माज़रा क्या है?"
"अभी हमारे एक आदमी का फोन आया था डार्लिंग।" अजय सिंह ने शिवा की मौजूदगी में भी उसे डार्लिंग कहा___"उसने हमें बताया कि विराज यहाॅ आ रहा है।"
"क्याऽऽऽ???" प्रतिमा सोफे पर बैठी इस तरह उछल पड़ी थी जैसे अचानक ही उसके पिछवाड़े पर किसी ने गर्म तवा रख दिया हो, बोली___"ये क्या कह रहे हो तुम? वो रंडी का जना यहाॅ किस लिए आ रहा है?"
"उसे उसकी मौत यहाॅ ला रही है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा___"किसी ने सच ही कहा है कि जब गीदड़ की मौत आती है तो वो शहर की तरफ भागता है। वही हाल उस हरामज़ादे का है। उसकी भी मौत आई हुई है इसी लिए वो भागता हुआ यहाॅ आ रहा है।"
"अच्छा ही तो है डैड।
" सहसा शिवा भी गर्मजोशी से कह उठा___"आने दीजिए उस हराम के पिल्ले को। उससे गिन गिन के हिसाब लूॅगा मैं। उस दिन उसने मुझे बहुत मारा था न, आज उस सबका हिसाब मैं लूॅगा। वो मेरा शिकार है डैड, आप उसे मेरे हवाले करेंगे। मुझसे प्राॅमिस कीजिए डैड।"
"तुम्हारे हवाले उसे ज़रूर करूॅगा बेटे लेकिन उसे अधमरा करने के बाद।" अजय सिंह ने कहा___"क्योंकि अधमरी हालत में वो तुमसे जीत नहीं पाएगा। वरना बेहतर हालत में तो तुम उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे।"
"डैड आप मुझे उससे कमज़ोर समझते हैं क्या?" शिवा की भृकुटी तन गई___"वो तो उस दिन मेरा दिन ही ख़राब था डैड इस लिए वो मुझे मार सका था। वरना तो वो मेरे सामने कुछ भी नहीं है।"
"दिन ख़राब नहीं होते बेटे।" अजय सिंह ने खिसियाते हुए कहा___"वो तो सब एक जैसे ही होते हैं। रही बात उसकी कि तुम्हारे सामने वो कुछ भी नहीं है तो ये बात तुम खुद को उससे ऊॅचा दर्शाने के लिए कह रहे हो। जबकि सच्चाई तुम भी जानते हो कि अकेले तुम उसका बाल भी बाॅका नहीं कर पाओगे। ख़ैर जाने दो।"
अजय सिंह की इन बातों पर शिवा बगले झाॅकने लगा था। कदाचित उसे समझ आ गया था कि उसकी डींगें महज बकवास के सिवा कुछ भी नहीं है। सच्चाई यही है कि विराज का अकेले वो बाल भी बाॅका नहीं कर सकता था। ये बात उसका बाप भी बखूबी समझ चुका था।
"लेकिन अजय वो यहाॅ आ किस लिए रहा है?" प्रतिमा ने कहा___"उसके यहाॅ आने की कोई ठोस वजह मुझे तो दूर दूर तक समझ में नहीं आ रही।"
"कोई तो वजह होगी ही प्रतिमा।" अजय सिंह ने सोचते हुए कहा___"मत भूलो कि अभय भी मुम्बई गया हुआ है। हम ये नहीं जानते कि इतने दिनों से वो वहाॅ क्या कर रहा है? उसे विराज मिला भी है कि नहीं। पर आज की सिचुएशन को देखा जाए तो यही लगता है कि अभय को विराज और विराज की माॅ बहन मिल चुकी हैं। उन लोगों ने अभय को और अभय ने उन लोगों को आपस में सारी बातें बताई होंगी।"
"पर उनकी उन बातों से विराज के यहाॅ आने का क्या कनेक्शन हो सकता है?" प्रतिमा ने तर्क दिया।
"ये तो अभय को भी पता चल चुका होगा कि हमारी असलियत क्या है?" अजय सिंह ने समझाने वाले अंदाज़ में कहा___"गौरी से सारी बातें जानने के बाद अभय को लगा होगा कि वो तो यहाॅ से मुम्बई चला आया है लेकिन उसके बीवी बच्चे तो अभी भी गाॅव में ही हैं। अभय समझता होगा कि उसके बीवी बच्चों को मुझसे बड़ा भारी खतरा है, इस लिए उसका पहला काम यही होगा कि वो अपने बीवी बच्चों को या तो भरपूर तरीके से सुरक्षित करे या फिर किसी तरह वो उन्हें भी अपने पास मुम्बई बुला ले। लेकिन सवाल ये पैदा हुआ होगा कि उसके बीवी बच्चों को यहाॅ से लेकर कौन जाएगा वहाॅ? इस लिए उसने विचार विमर्ष करके विराज को उन्हें लाने के लिए भेजा होगा।"
"तुम्हारी बातें और तुम्हारी सोच अपनी जगह यकीनन सही हैं अजय।
" प्रतिमा ने गंभीरता से कहा___"मगर, अगर तुम्हारी बातों के अनुसार सोचा जाए तो इन बातों में भी एक पेंच है। वो ये कि उस सूरत में अभय ये कभी नहीं चाहेगा कि विराज की जान को कोई खतरा हो जाए। ये तो वो भी समझ ही गया होगा कि विराज की जान को हमसे खतरा है। इस लिए अपने बीवी बच्चों को यहाॅ से ले जाने के लिए वो विराज को वहाॅ से हर्गिज़ नहीं भेजेगा, और अगर भेजना चाहेगा भी तो गौरी विराज को यहाॅ आने ही नहीं देगी। इस सिचुएशन में जान को खतरे में डालने का काम खुद अभय ही करेगा। वो खुद यहाॅ आकर अपने बीवी बच्चों को यहाॅ से ले जाना उचित समझेगा ना कि विराज को भेजना।"
"ये बात भी सही है।" अजय सिंह को मानना पड़ा कि प्रतिमा का तर्क भी अपनी जगह बेहद पुख्ता है, बोला___"लेकिन ये भी सच है कि विराज के यहाॅ आने की कोई न कोई ठोस वजह तो ज़रूर है। बेवजह अपनी जान को जोखिम में डालने की मूर्खता ना तो वो खुद करेगा और ना ही उसकी माॅ या उसका चाचा उसे करने की इजाज़त देंगे।"
"बिलकुल सही कहा।" प्रतिमा ने कहा__"तो सवाल ये है कि वो आख़िर यहाॅ आ किस वजह से रहा है?"
"वजह कोई भी हो उसके आने की।" अजय सिंह ने कहा___"हमारे लिए अच्छी बात यही है कि जिसे हम महीनों से खोज रहे थे वो खुद ही चल कर हमारे पास आ रहा है। वो हमारे हाॅथ लग जाएगा तो बाॅकी के उसके चाहने वाले भी हमारे पास सिर के बल दौड़ते हुए आ जाएॅगे। अब तो मज़ा आएगा प्रतिमा। हर कोई हमारे हाथ में खुद ही चला आएगा। फिर हम अपने तरीके से उनके साथ कुछ भी कर सकेंगे। बस एक ही बात की चिंता है कि रितू इन सबके बीच टपक न पड़े। वो पुलिस वाली है और ईमानदार पुलिस अफसर भी है वो। इस लिए उसके रहते हमारे लिए समस्या भी हो सकती है।"
"अब कोई भी समस्या आए डैड।" शिवा कह उठा___"ऐसा सुनहरा मौका अपने हाॅथ से जाने नहीं देंगे हम। अगर हमारे इस अच्छे काम के बीच समस्या बन कर रितू दीदी आएॅगी तो उनका भी हिसाब किताब कर दिया जाएगा।"
"पहली बार अकल वाली बात की है तुमने बेटे।" अजय सिंह ने कहा___"ये यकीनन हमारे लिए सुनहरा मौका ही है। अगर विराज हमारे हाॅथ लग जाएगा तो उसके सभी चाहने वाले अपने आप ही चल कर हमारे पास आ जाएॅगे। इस लिए इस सुनहरे मौके पर हम किसी भी समस्या को तुरंत खत्म कर देने से पीछे नहीं हटेंगे।"
"तो क्या तुम अपनी बेटी को जान से मार दोगे अजय?" प्रतिमा अंदर ही अंदर काॅप गई थी।
"ऐसा तो सिर्फ तब होगा डियर।" अजय सिंह ने अजीब भाव से कहा___"जब हमारे पास ऐसा करने के सिवा दूसरा कोई रास्ता ही न बचेगा।"
प्रतिमा देखती रह गई अजय सिंह को। उसकी बातों से उसके जिस्म का रोयाॅ रोयाॅ खड़ा हो गया था। उसकी ऑखों के सामने उसकी सुंदर सी बेटी रितू का खूबसूरत चेहरा कई बार फ्लैश कर उठा। इस एहसास ने ही उसे अंदर तक हिला कर रख दिया कि उसकी बेटी को उसका ही बाप जान से मार भी सकता है।
एक पल के लिए उसकी ऑखों के सामने रितू का मृत शरीर खून से लथपथ ज़मीन में पड़ा हुआ दिख गया उसे। ये दृष्य ऑखों के सामने चकराते ही प्रतिमा का जिस्म एकदम से ठंडा पड़ता चला गया।
"अब आगे का क्या प्रोग्राम है डैड?" तभी शिवा की आवाज़ प्रतिमा के कानों से टकराई तो जैसे उसे होश आया।
"हमने अपने आदमियों को निर्देश दे दिया है बेटे।" अजय सिंह ने कहा___"वो हर रास्तों पर घेराबंदी कर देंगे। विराज उनसे बच कर किसी भी हालत में कहीं जा नहीं सकेगा और उनके पकड़ में आ ही जाएगा। उसके बाद हमारे आदमी उसे लेकर सीधा हवेली हमारे पास आएॅगे।"
"दैट्स ग्रेट डैड।" शिवा ने खुश होकर कहा___"अब आएगा मज़ा। लेकिन डैड विराज के आने की ख़बर रितू दीदी को नहीं लगनी चाहिए। हम उसे कहीं छुपा कर रखेंगे। इस हवेली में उसे रखना मेरे ख़याल से ठीक नहीं है।"
"ये भी सही कहा तुमने बेटे।" अजय सिंह ने कहा__"आज तुम्हारा दिमाग़ भी सही तरह से काम कर रहा है। मुझे इस बात से बेहद खुशी महसूस हो रही है। ख़ैर, तुम फिकर मत करो बेटे, रितू के आने से पहले ही हम विराज को ऐसी जगह छुपा देंगे जहाॅ से किसी को कभी कुछ पता ही नहीं चल पाएगा। एक काम करते हैं, हम अपने आदमियों को बोल देते हैं कि वो विराज को लेकर हवेली न आएॅ बल्कि हमारे नये फार्महाउस पर लेकर पहुॅचें। ऐसा इस लिए बेटे कि रितू का कोई भरोसा नहीं है कि वो कब हवेली में टपक पड़े। उस सूरत में उसे अंदेशा भी हो सकता है इन सब बातों का। पुलिस वाली है न इस लिए अगर एक बार उसके मन में शक का कीड़ा आ गया तो वो उस शक के कीड़े की कुलबुलाहट हो ज़रूर शान्त करने की कोशिश करेगी। इस लिए बेहतर यही रहेगा कि हम विराज को अपने नये फार्महाउस पर ही रखें।"
"हाॅ ये ठीक रहेगा डैड।" शिवा ने कहा__"तो फिर हमें भी अब सीधा फार्महाउस ही चलना चाहिए।"
"यस ऑफकोर्स माई डियर सन।" अजय सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा, फिर उसने प्रतिमा की तरफ देखते हुए कहा___"चलो डियर तैयार हो जाओ। हमें जल्द ही अपने नये फार्महाउस के लिए निकलना है।"
अजय सिंह की बात पर प्रतिमा ने हाॅ में सिर हिलाया और अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। जबकि अजय सिंह और शिवा वहीं ड्राइंगरूम में रखे सोफों पर बैठ कर प्रतिमा के आने का इन्तज़ार करने लगे। दोनो के चेहरे इस वक्त हज़ार वाॅट के बल्ब की तरह चमक रहे थे।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर टैक्सी में बैठे हुए मैं और आदित्य आराम से बस स्टैण्ड की तरफ आए, जहाॅ पर मैने पवन को भी अपने साथ टैक्सी में बैठा लिया। पवन मेरे साथ आदित्य को देख कर थोड़ा परेशान सा दिखा तो मैने उसे आदित्य के बारे में बता दिया। मेरी बात सुन कर पवन के ज़हन से परेशानी व चिंता चली गई।
मैने पवन से बहुत पूछा कि उसने मुझे इतना अर्जेन्टली क्यों बुलाया था मगर पवन ने यही कहा कि मैं खुद अपनी ऑखों से ही देख लूॅगा।
बस स्टैण्ड से पवन को लेने के बाद हम अपने गाॅव हल्दीपुर के लिए निकल चुके थे। इधर का रास्ता ऐसा था कि दूर दूर तक खाली ही रहता था। यहाॅ रास्ते के दोनो तरफ पहाड़ थे। ऐसे पहाड़ जिनमें पेड़ पौधे या झाड़ झंखाड़ नाम मात्र के ही थे। बस स्टैण्ड से जब गाॅव की तरफ आओ तो लगभग दस किलोमीटर के बाद बीच रास्ते में एक बड़ी सी नहर पड़ती थी। जिसके बीच में एक पक्का पुल बना हुआ था जो कि काफी पुराना था।
आस पास का सारा इलाका पथरीला था। बड़ी बड़ी चट्टाने थी। सड़क के दोनो तरफ की सारी ज़मीनें पथरीली और बंजर थी। एक तरफ के पहाड़ पर बाक्साइड था जिसमें पहले के समय में यहाॅ से काफी सारा बाक्साइड ट्रकों में जाता था। एक बार कुछ मजदूर पहाड़ के धसने से उसी में दब कर मर गए थे जिससे बड़ा बवाल हो गया था। ठेकेदार तो अपनी जान बचा कर वहाॅ से चंपत हो गया था। इसके बाद से वहाॅ पर से बाक्साइड ले जाने का काम बंद करवा दिया गया था।
पहाड़ की दूसरी साइड पर एक अन्य सड़क थी जो दूसरे गाॅव के लिए जाती थी। उस पुल को पार करने के बाद एक चौराहा मिलता था जिसमे से अलग अलग दिशा में अलग अलग गाॅव की तरफ जाने के लिए कच्ची सड़क बनी हुई थी। हल्दीपुर जाने के लिए सीधा ही जाना होता था। किसी भी मोड़ से मुड़ने की ज़रूरत नहीं थी। लेकिन अगर आप मुड़ भी गए हैं तो दूसरे गाॅव से भी आप एक अन्य कच्चे रास्ते से हल्दीपुर जा सकते हैं। हल्दीपुर गाॅव आस पास के सभी गावों की मुख्य पंचायत था। अन्य गाॅवों की अपेक्षा हल्दीपुर गाॅव में सुख सुविधा ज्यादा थी और इस सब में सबसे बड़ी बात ये थी कि आस पास के सभी गाॅवों का पुलिस थाना हल्दीपुर में ही था। हल्दीपुर कहने के लिए गाॅव था वरना तो वो किसी कस्बे जैसा ही था। बस कस्बे की तरह थोड़ा शहरी ढाॅचे में ढला हुआ नहीं था।
बस स्टैण्ड से लगभग बीस किलोमीटर चलने के बाद टैक्सी से हम जैसे ही पुल के पास पहुॅचने वाले थे कि दूर से ही हमें सामने की तरफ धूल उड़ाती हुई कुछ जीपें हमारी तरफ ही आती हुई दिखीं। वो सब सीधे वाले रास्ते से ही आ रही थीं। मुझे समझते देर न लगी कि ये सब जीपें असल में किसकी हो सकती हैं। मेरी नज़र पवन पर पड़ी तो वो भी सामने ही देख रहा था। उसकी हालत डर और भय से ख़राब होने लगी थी।
"राज ये ये तो।" पवन ने सहमे हुए लहजे में कहा___"ये तो तेरे बड़े पापा की ही जीपें लगती हैं। लगता है उन्हें तेरे आने का पता चल गया है। मगर मगर कैसे? कैसे पता चल गया उन्हें?"
"अब जो हो गया उसे छोड़ भाई।" मैने सामने की तरफ देख कर कहा___"मुझे पता है कि मेरे आने का कैसे पता चल गया होगा उस अजय सिंह को? पर कोई बात नहीं पवन। घबराने की कोई बात नहीं है। आने दे उन सबको।
मैं भी तो देखूॅ कि अजय सिंह और उसके आदमियों में कितना दम है?"
"क्या हुआ भाई?" आदित्य जो कि टैक्सी की खिड़की से उस तरफ के पहाड़ों को देख रहा था, वो मेरी तरफ पलट कर बोल पड़ा था___"किसमे कितना दम है?"
"सामने देखो दोस्त।" मैने आदित्य से कहा___"जिसका मुझे अंदेशा था वही हुआ।"
"क्या मतलब?" आदित्य ने चौंकते हुए पूछा।
"ये जो सामने से कई सारी जीपें हमारी तरफ आती हुई नज़र आ रही हैं न।" मैने कठोर भाव से कहा___"ये सब मेरे बड़े पापा की ही हैं। इन सब में उनके आदमी हैं और वो खुद भी हो सकते हैं। ये सब मुझे पकड़ने के लिए आ रहे हैं।"
"ओह इसका मतलब कि ऐक्शन का समय आ गया है।" आदित्य एकदम से सतर्क भाव से कह उठा__"चिन्ता मत करना दोस्त। मेरे रहते इनमें से कोई तुम्हें छू भी नहीं सकेगा।"
"मैं जानता हूॅ दोस्त।" मैने कहा__"मगर मैं ये भी नहीं चाहता कि तुम्हें ज़रा सी खरोंच भी आए। आख़िर तुम मेरे दोस्त हो अब।"
"मैं तुम जैसा दोस्त पा कर खुश हूॅ मेरे दोस्त।" आदित्य ने सहसा भावपूर्ण लहजे में कहा___"इस लिए मुझे अब किसी भी चीज़ के लिए रोंकना मत। बहुत दिनों बाद किसी अपने के लिए दिल से कुछ करने का मौका मिला है।"
"फिर भी दोस्त।" मैने आदित्य के कंधे पर हाॅथ रखते हुए कहा___"मैं तुम्हें अकेले कुछ नहीं करने दूॅगा। बल्कि मैं भी तुम्हारे साथ ही इन सबका मुकाबला करूॅगा।"
"नहीं विराज।" आदित्य बोला___"ये सब तुम्हारे बस का काम नहीं है। अगर तुम्हें मेरे रहते कुछ हो गया तो मैं कभी भी अपने आपको मुआफ़ नहीं कर पाऊॅगा।"
"अपने इस दोस्त को इतना कमज़ोर भी मत समझो भाई।" मैने मुस्कुरा कर कहा__"अगर तुमसे ज्यादा नहीं हूॅ तो कम भी नहीं हूॅ।"
"क्या मतलब??" आदित्य ने नासमझने वाले भाव से पूछा था।
"यही कि थोड़ा बहुत मार्शल आर्ट्स मैं भी जानता हूॅ।" मैने कहा__"और मुझे खुद पर यकीन है कि मैं तुम्हारे साथ इन लोगों का डॅट कर मुकाबला कर सकता हूॅ।"
"अगर ऐसी बात है तो ठीक है दोस्त।" मेरी बात सुन कर आदित्य ने कहा।
हम दोनो बात कर रहे थे जबकि मेरे बगल में बैठा पवन सामने की तरफ एकटक देखे जा रहा था। आदित्य टैक्सी ड्राइवर के बगल वाली शीट पर बैठा हुआ था। तभी वो मेरे पीछे की तरफ देख कर चौंका।
"अरे हमारे पीछे भी दो गाड़ियाॅ लगी हुई हैं विराज।" आदित्य ने कहा___"क्या ये भी तुम्हारे ही बड़े पापा के आदमी हैं?"
"क्याऽऽ???" मैने बुरी तरह चौंकते हुए पीछे पलट कर देखा, और पीछे आ रही दोनो गाड़ियों को ध्यान से देखते हुए कहा__"ये तो कोई और ही हैं यार। पर हो सकता है कि इसमे भी बड़े पापा के ही आदमी हों।"
मेरे साथ साथ पवन ने भी पीछे मुड़ कर देखा था। पीछे देखने के बाद उसके चेहरे पर तनिक राहत के भाव उभरे। ये बात मैने भी नोट की। मेरा माथा ठनका। इसका मतलब पवन जानता है कि हमारे पीछे आ रही दोनो गाड़ियाॅ किसकी हैं।
मेरे मन में पवन से ये बात पूछने का ख़याल तो आया मगर फिर मैने तुरंत ही उससे पूछने का अपना ख़याल ज़हन से निकाल दिया। मुझे पवन पर भरोसा था। वो मेरा बचपन का सच्चा दोस्त था। मगर इस वक्त वो हमारे पीछे आ रही गाड़ियों के बारे में जानते हुए भी मुझे कुछ न बताया था। बल्कि राहत की साॅस लेकर वह आराम से बैठ गया था। मुझे समझ न आया कि एकदम से उसमें ऐसा बदलाव कैसे आ गया?
उधर पुल को पार कर वो जीपें हमारे काफी नज़दीक पहुॅच चुकी थी। मेरी नज़र अचानक ही सामने बैठे आदित्य पर पड़ी। उसने अपने बैग से एक रिवाल्वर निकाला था। मतलब साफ था कि आदित्य हर तरह से चौकन्ना और चाकचौबंद ही था। देखते ही देखते सामने से आ रही वो जीपें टैक्सी के बीस मीटर के फाॅसले पर आकर रुक गईं। बीच सड़क पर और सड़क की पूरी चौड़ाई पर दो जीपे इस तरह आकर खड़ी हो गई थी कि अब सामने से टैक्सी निकल नहीं सकती थी। उसके लिए ड्राइवर को सड़क के नीचे हल्के से ढलान पर टैक्सी को उतारना पड़ता।
हमारे पीछे आ रही दोनो गाड़ियाॅ भी टैक्सी के पीछे दस मीटर के फाॅसले पर खड़ी हो गई थी। इधर सामने खड़ी जीपों के दरवाजे एक साथ एक झटके से खुले और उसमें से मेरे बड़े पापा के चिरपरिचित आदमी बाहर निकले। सबके हाॅथों में लट्ठ थे। जीपों से उतर कर वो सब टैक्सी की तरफ आने लगे। मैने देखा कि बड़े पापा वहाॅ कहीं नज़र नहीं आए मुझे। इसका मतलब उन्होंने इन लोगों को मुझे लाने के लिए भेजा था।
"पवन, तुम इस टैक्सी में आराम से बैठे रहना।" मैने पवन से कहा__"और हाॅ चिन्ता की कोई बात नहीं है। मैं और आदित्य अभी इन लोगों से निपट कर आते हैं। चलो दोस्त।"
"चलो मैं तो एकदम से तैयार ही हूॅ।" आदित्य ने कहा___"लेकिन एक समस्या है यार।"
"समस्या?" मैने पूछा__"कैसी समस्या?"
"हमारे पीछे खड़ी गाड़ियों में कौन हो सकता है?" आदित्य ने कहा__"क्या उसमें भी दुश्मन ही हैं? ये जानना ज़रूरी है भाई। क्योंकि वो पीछे से हम पर हमला करके हमें नुकसान भी पहुॅचा सकते हैं।"
"वो हम पर हमला नहीं करेंगे दोस्त।" मैने एक नज़र पवन पर डालने के बाद कहा__"बल्कि मुझे लगता है कि वो लोग हमारी सुरक्षा के लिए हैं।"
"हमारी सुरक्षा के लिए?" आदित्य के साथ साथ पवन भी चौंका था मेरी बात से।
"हाॅ भाई।" मैने कहा___"पवन ने तो यही बोला है मुझसे।"
"क्या????" पवन बुरी तरह हड़बड़ा गया, बोला___"मैने ऐसा कब कहा तुझसे?"
"यही तो ग़लत बात है न भाई।" मैने अजीब भाव से कहा___"कि तुमने कुछ कहा ही नहीं। मगर मैं तेरे चेहरे से सब समझ गया हूॅ। तू बताना नहीं चाहता तो कोई बात नहीं। चलो आदित्य, वो टैक्सी के करीब ही आ गए हैं।"
मेरे कहते ही आदित्य अपनी तरफ का दरवाजा खोल कर टैक्सी से बाहर आ गया और इधर मैं भी। पवन मूर्खों की तरह मुझे देखता रह गया था।
जब मैं उतरने लगा तो उसने मुझे पकड़ने के लिए हाॅथ बढ़ाया ज़रूर मगर मैं उसे बेफिक्र रहने का कह कर टैक्सी से बाहर आ गया। टैक्सी से उतर कर मैं और आदित्य सामने की तरफ बढ़ चले।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर हास्पिटल में!
रितू समय से पहले ही हास्पिटल पहुॅच गई थी। हास्पिटल के बाहर हर तरफ सादे कपड़ों में पुलिस के आदमी तैनात कर दिये थे उसने। सबको शख्त आदेश था कि कोई भी संदिग्ध आदमी विराज को किसी भी तरह का नुकसान न पहुॅचा सके। सब कुछ ब्यवस्थित करने के बाद ही वह हास्पिटल के अंदर विधी के पास आ गई थी। उसने विधी के माता पिता को भी फोन करके बुला लिया था।
रितू के कहने पर हास्पिटल की नर्सों ने विधी को एकदम से साफ सुथरा करके नये कपड़े पहना दिये थे। विधी के बार बार पूछने पर ही रितू ने उसे बताया कि उसका महबूब उसका प्यार आज उसके पास आ रहा है। रितू के मुख से ये बात सुन कर विधी का मुरझाया हुआ चेहरा ताजे गुलाम की मानिंद खिल उठा था मगर फिर जाने क्या सोच कर उसकी ऑखें छलक पड़ीं। रितू उसकी भावनाओं और जज़्बातों को बखूबी समझ सकती थी, कदाचित यही वजह थी कि जैसे ही विधी की ऑखें छलकीं वैसे ही रितू ने उसे अपने सीने से लगा लिया था।
"हाय दीदी ये मेरे साथ क्यों हो गया?" विधी ने रोते हुए कहा___"मैने उस भगवान का क्या बिगाड़ा था जो उसने मेरी ज़िदगी और मेरी साॅसे कम कर दी? उसको ज़रा भी मेरी खुशियाॅ रास नहीं आईं। उसने मुझसे अपराध करवाया। मुझसे अपराध करवाया कि मैने अपने प्यार को दुख दिया और उसे खुद से दूर कर दिया। आज इस हालत में मैं कैसे उसके सामने खुद को पेश करूॅगी? मैं जानती हूॅ कि वो मुझे इस हाल में देखेगा तो उसे मेरी इस हालत पर बहुत दुख होगा। मैं उसे दुखी होते हुए नहीं देख सकती दीदी। मुझसे ग़लती हो गई जो मैने आपसे उसे बुलाने के लिए कहा। मैं मर जाती तो उसे इसका पता ही नहीं चलता और ना ही उसे इस सबसे दुख होता। क्या ऐसा नहीं हो सकता दीदी कि वो यहाॅ आए ही न? वापस वहीं लौट जाए जहाॅ से वह आ रहा है।"
"ऐसी बातें मत कर पागल।" रितू का हृदय ये सोच कर हाहाकार कर उठा कि इस हाल में भी वो लड़की अपने महबूब को खुश देखना चाहती है, बोली___"कुछ मत बोल तू। सब कुछ अच्छा ही होगा विधी और ये तो अच्छा ही हुआ जो तूने मुझसे विराज को बुलाने का कह दिया। तू नहीं जानती विधी कि तेरे मिलने से मुझे क्या मिल गया है। तेरा प्यार और तेरे प्यार की इस तड़प ने मेरा समूचा अस्तित्व ही बदल दिया है। इसके लिए मैं ताऊम्र तक तेरी आभारी रहूॅगी। मुझे दुख है कि तेरे जैसी पाक़ दिल वाली लड़की को मैं किसी भी तरह से बचा नहीं सकती। काश मेरे पास कोई जादू की छड़ी होती जिससे मैं तुझे पल भर में ठीक कर देती और तेरे हाॅथों में तेरे महबूब का प्यार सौंप देती।"
"दीदी मेरे बाद आप मेरे राज का ख़याल रखिएगा।
" विधी ने बिलखते हुए कहा__"उसे खूब प्यार दीजिएगा। उसने अपने जीवन में कभी सुख नहीं देखा। उसके अपनों ने उसे हर पल सिर्फ दर्द दिया है। यहाॅ तक कि मैने भी उसे सबसे ज्यादा दर्द दिया है।"
"ऐसा मत कह विधी।" रितू के अंदर हूक सी उठी थी, बोली__"तेरा हर शब्द मुझे बेहद पीड़ा देता है। मैं चाहती हूॅ कि जितना भी तेरे पास जीवन शेष है उसे तू हॅसी खुशी अपने महबूब के साथ जिये। इस संसार में जो भी आया है उसे एक दिन इस दुनियाॅ से सबको छोंड़ कर चले ही जाना है। यही संसार का सबसे बड़ा सत्य है। इस लिए विधी ये दुख ये संताप अपने अंदर से निकालने की कोशिश करो। तुमने किसी को कोई दर्द नहीं दिया। ये सब तो इंसान के अपने भाग्य से मिलते हैं। कोई किसी को कुछ दे नहीं सकता। देने वाला सिर्फ ईश्वर है और लेने वाला भी। ख़ैर छोंड़ ये सब बातें और चल मेरे साथ। उस कमरे में तेरे माॅम डैड भी बैठे हुए हैं।"
"आपने उन्हें क्यों बुला लिया दीदी?" विधी ने रितू के साथ चलते हुए कहा__"वो इस सबके बारे में क्या सोचेंगे?"
"कुछ नहीं सोचेंगे वो।" रितू ने विधी को अपने एक हाथ से पकड़े हुए कहा__"तुमने कोई पाप नहीं किया है। प्यार ही किया है न, ये तो कुदरत की सबसे खास नियामत है। जब उन्हें तेरे प्यार की दास्तां पता चलेगी तो यकीन मान वो भी तेरे इस पाक़ प्रेम के सामने नतमस्तक हो जाएॅगे।"
"मुझे उनके सामने अपने महबूब से मिलने में बहुत शर्म आएगी दीदी।" विधी का मुर्झाया हुआ चेहरा एकाएक ही शर्म की लाली से सुर्ख हो उठा था, बोली___"आप प्लीज़ उन्हें उस वक्त किसी दूसरे कमरे में या फिर बाहर भेज दीजिएगा।"
"तू भी न बिलकुल पागल है।" रितू ने उसे रोंक कर उसके माॅथे पर प्यार से मगर हल्के से चूमते हुए कहा___"ख़ैर, जैसा तुझे अच्छा लगे मैं वैसा ही करूॅगी। अब खुश?"
रितू की इस बात से विधी के मुर्झाए चेहरे पर हल्की सी रंगत नज़र आई और होठों पर फीकी सी मुस्कान तैरती हुई दिखी। कुछ ही देर में रितू उसे हास्पिटल के एक स्पेशल कमरे में ले आई और उसे बेड पर आहिस्ता से लेटा दिया। कमरे में एक तरफ रखे सोफों पर विधी के माॅम डैड बैठे हुए थे। उनका चेहरा देख कर ही समझ आ रहा था कि वो अकेले में खूब रोए थे अपनी बेटी की इस हालत के लिए।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
"कैसे हैं भीमा काका?" मैंने बड़े पापा के एक आदमी को देखते हुए कहा___"मुझे ढूढ़ने में कोई परेशानी तो नहीं हुई न आपको?"
"ज्यादा शेखी मत झाड़ छोकरे।" भीमा काका ने गुस्से से कहा___"वरना यहीं पर ज़िंदा गाड़ दूॅगा समझे। शुकर कर कि मेरे मालिक का मुझे आदेश नहीं है वरना पलक झपकते ही तू इस वक्त लाश में तब्दील हुआ यहीं पड़ा होता।"
"लगता है आपको अपने बाहुबल पर ज़रूरत से ज्यादा ही घमंड है।" मैने कहा___"तभी तो आप अपने सामने किसी को कुछ समझ ही नहीं रहे हैं।"
"सही कहा छोकरे।
" भीमा ने कहा__"मुझे अपने बाहुबल पर घमंड तो होगा ही। आख़िर मालिक का मैं सबसे खास आदमी हूॅ।"
"तो क्या आदेश दिया है आपके मालिक ने आपको?" मैने पूछा।
"यही कि तुझे घसीटते हुए यहाॅ से लेकर जाऊॅ।" भीमा कह रहा था___"और ले जाकर उनके पैरों पर पटक दूॅ।"
"बहुत खूब।" मैं हॅसा___"तो फिर खड़े क्यों हो काका? मुझे घसीटते हुए यहाॅ से ले चलो अपने मालिक के पास।"
"लगता है इस लड़के को मरने की बड़ी जल्दी है भीमा।" भीमा के बगल से लट्ठ लिए खड़े एक अन्य आदमी ने हॅसते हुए कहा___"और शायद इसका भेजा भी फिर गया है। तभी तो ये अनाप शनाप बके जा रहा है। मैं तो कहता हूॅ ले चल इसे घसीटते हुए।"
"सही कह रहा है तू मंगल।" भीमा काका ने उससे कहा___"जब किसी की मौत निकट होती है न तो वो आदमी ऐसी ही मूर्खतापूर्ण बातें करता है। ख़ैर, पकड़ इसे। मैं इसके साथ आए इसके इस साथी को पकड़ता हूॅ।"
भीमा के कहने के साथ ही मंगल मेरी तरफ बढ़ा और भीमा आदित्य की तरफ। मंगल ने जैसे ही मुझे पकड़ने के लिए अपना हाॅथ आगे बढ़ाया वैसे ही मैने बिजली की सी स्पीड से उसका वो हाॅथ पकड़ा और उसकी तरफ पीठ कर उसके हाथ को अपने कंधे पर रख कर ज़ोर का झटका दिया। कड़कड़ की आवाज़ के साथ ही मंगल का हाॅथ बीच से टूट गया। हाॅथ टूटते ही मंगल हलाल होते बकरे की तरह चीखा। जबकि उसका हाॅथ तोड़ने के बाद मैं पलटा और उसी स्पीड से उसके गंजे सिर को दोनो हाॅथों से पकड़ कर शख्ती से एक तरफ को झटक दिया। परिणामस्वरूप मंगल की गर्दन टूट गई और उसकी जान उसके जिस्म से जुदा हो गई। उसका बेजान हो चुका जिस्म लहराते हुए वहीं ज़मीन पर गिर गया। ये सब इतना जल्दी हुआ कि किसी को कुछ समझ में ही नहीं आया कि पल भर में ये क्या हो गया।
मेरी इस हरकत से आदित्य जो भीमा की गर्दन को अपने बाजुओं में कसे झटके दे रहा था वो चकित रह गया। उसने भी भीमा की गर्दन को झटके देकर तोड़ दिया था। पलक झपकते ही दो हट्टे कट्टे आदमियों को इस तरह मौत के मुह में जाते देख बाॅकी सब लोग पहले तो भौचक्के से रह गए फिर जैसे उन्हें वस्तुस्थित का एहसास हुआ। सब के सब एक साथ हमारी तरफ लट्ठ लिए दौड़ पड़े।
आदित्य ने मेरी तरफ देखा, मैने भी उसकी तरफ देखा। ऑखों ऑखों में ही हमारी बात हो गई। जैसे ही सामने से लट्ठ लिए वो लोग हमारे पास पहुॅचे वैसे ही आगे के दो आदमी लट्ठ को पूरी शक्ति से घुमा कर हम दोनो पर वार किया। हम दोनो ही झुक गए जिससे उनके लट्ठ का वार हमारे सिर से निकल गया।
इससे पहले कि वो दोनो सम्हल पाते उनकी पीठ पर हम दोनो की फ्लाइंग किक पड़ी। वो दोनो आदमी लट्ठ समेत ज़मीन की धूल चाटने लगे। मैने एक आदमी के गिरते ही उसके लट्ठ वाले हाथ में ज़ोर से लात मारी। उसके हलक से चीख़ निकल गई। उसने लट्ठ छोंड़ दिया तो मैने जल्दी से उसका लट्ठ उठा लिया। यही क्रिया आदित्य ने भी की थी।
हम दोनो के हाॅथ में अब लट्ठ थी। उन दोनो के गिरते ही उनके पीछे आए बाॅकी के आदमी भी हमारी तरफ एक साथ दौड़ पड़े। देखते ही देखते उन सब ने हम दोनो को चारों तरफ से घेर लिया। मैं और आदित्य आपस में पीठ के बल जुड़ गए थे और घूम रहे थे अपने स्थान पर। उधर चारों तरफ घूमते हुए उन सभी आदमियों ने एक साथ हम पर लट्ठ का वार किया। मैने और आदित्य ने तुरंत ही उनके वार को अपने अपने लट्ठ से रोंका और पूरी शक्ति से ऊपर की तरफ झटका दिया। नतीजा ये हुआ कि सब के सब इधर उधर लड़खड़ा कर गिर पड़े। उन लोगों के गिरते ही मैने और आदित्य ने उन्हें उठने का मौका नहीं दिया। हम दोनो ही उन सब पर पिल पड़े। लट्ठ के ज़ोरदार वार उन सबके जिस्मों पर पड़ने लगे थे। वातावरण में उन सबकी दर्द में डूबी हुई चीखें निकलने लगी थी।
थोड़ी ही देर में वो सब वहीं सड़क पर पड़े बुरी तरह कराहे जा रहे थे। किसी का सिर फूटा, किसी के हाॅथ टूटे तो किसी के पैर। कहने का मतलब ये कि वो सब कुछ ही देर में अधमरी सी हालत में पहुॅच गए थे। तभी वातावरण में हमे सामने की तरफ किसी जीप के स्टार्ट होने की आवाज़ सुनाई दी। हम दोनो ने सामने की तरफ देखा तो सबसे पीछे की कतार में खड़ी जीप अपनी जगह से पीछे की तरफ जाने लगी थी।
"लगता है उसमें कोई आदमी बचा हुआ है दोस्त।" आदित्य ने सामने उस जीप की तरफ देखते हुए कहा____"और वो इन सबका हाल देख कर यहाॅ से भागने की सोच रहा है, बल्कि भाग ही रहा है वो।"
"वो यहाॅ से भागने न पाए दोस्त।" मैने कठोर भाव से कहा___"वर्ना वो अजय सिंह को यहाॅ का सारा हाल बताएगा और अजय सिंह फिर से अपने कुछ आदमियों को भेजेगा या फिर वो खुद हमें पकड़ने के लिए आ सकता है। मैं इस सबसे डर तो नहीं रहा मगर इस वक्त मैं यहाॅ किसी से लड़ने के उद्देश्य से नहीं आया हूॅ बल्कि पवन के बुलाने पर आया हूॅ। तुम समझ रहे हो न मेरी बात?"
"मैं समझ गया विराज।" आदित्य ने अपनी कमर में जीन्स पर खोंसी हुई रिवाल्वर को निकालते हुए कहा___"तुम फिकर मत करो। वो साला यहाॅ से ज़िंदा वापस नहीं जा सकेगा।"
इतना कहने के साथ ही आदित्य ने रिवाल्वर वाला हाॅथ ऊपर उठाया और निशाना साध कर सामने यू टर्न ले चुकी जीप के अगले वाले दाहिने टायर पर फायर कर दिया। अचूक निशाना था आदित्य का। नतीजा ये हुआ कि टायर के फटते ही जीप अनबैलेंस हो गई और वो सड़क के किनारे ढलान की तरफ तेज़ी से बढ़ी। ढलान में उतरते ही कदाचित ड्राइवर ने उसे जल्दी से मोड़ कर वापस सड़क पर लाने की कोशिश की थी, मगर ढलान पर बाएॅ साइड से अगले पहिये के उतर जाने से जीप ढलान पर उलटती चली गई।
जीप को उलटती देख आदित्य उस तरफ को बढ़ा ही था कि फिर जाने क्या सोच कर वो रुक गया। मेरी तरफ देख कर बोला__"तुम उसे देखो, मैं इन लोगों का किस्सा खत्म करता हूॅ।
"
मैं समझ गया कि आदित्य मुझे इन लोगों के पास अकेला नहीं छोंड़ना चाहता था। हलाॅकि अजय सिंह के सभी आदमी इस वक्त सड़क पर लहूलुहान हुए पड़े कराह रहे थे। उनमें से किसी में अब उठने की शक्ति नहीं थी। मगर फिर भी आदित्य मुझे उन सबके पास अकेला नहीं रहने देना चाहता था। इसी लिए उसने मुझे उस उलट चुकी जीप की तरफ जाने का कहा था। वहाॅ पर तो वो सिर्फ एक ड्राइवर ही था। मुझे आदित्य की इस बात पर अंदर ही अंदर उसकी दोस्ती पर नाज़ हुआ। मैं उसकी बात सुन कर उस तरफ बढ़ गया जिस तरफ वो जीप ढलान पर उलटती चली गई थी।
उलटी हुई जीप के पास जब मैं पहुॅचा तो देखा ड्राइवर वाले डोर पर नीचे की तरफ ढेर सारा खून बहते हुए वहीं ज़मीन पर फैलता जा रहा था। मैने झुक कर देखा ड्राइवर मर चुका था। जीप के ऊपर लगे लोहे का एक सरिया टूट कर उसके सिर के आर पार हो चुका था। उसी से खून बहता हुआ नीचे ज़मीन पर फैलता जा रहा था। जीप पूरी की पूरी उलट गई थी। उसके पहिये ऊपर की तरफ थे और ऊपर का भाग नीचे की तरफ हो गया था।
ड्राइवर का ये हाल देख कर मैं वापस आदित्य के पास आ गया। मैने आदित्य को ड्राइवर का हाल बता दिया। इधर आदित्य ने ज़मीन पर कराह रहे सभी आदमियों की गर्दनें तोड़ कर उन सबको यमलोक पहुॅचा चुका था।
"यार मज़ा तो नहीं आया मगर ख़ैर कोई बात नहीं।" मैने आदित्य की तरफ देखते हुए किन्तु मुस्कुराते हुए कहा___"अब इन लाशों का क्या करें?"
"इन्हें यहाॅ खुली जगह पर और सड़क पर इस तरह छोंड़ कर जाना भी ठीक नहीं है मेरे दोस्त।" आदित्य ने कहा___"इससे मामला बहुत गंभीर हो सकता है। पुलिस इन सबके क़ातिलों को ढूॅढ़ने के लिए एड़ी से चोंटी तक का ज़ोर लगा देगी।"
"तो अब क्या करें यार?" मैं एकाएक ही चिंता में पड़ गया था, बोला___"इन लोगों को कहाॅ ले जाएॅगे हम? दूसरी बात वो टैक्सी ड्राइवर भी इस सबका चश्मदीद गवाह बन चुका है। ऐसे में यकीनन हम बहुत जल्द कानून की गिरफ्त में आ सकते हैं।"
"वो सब हम लोग सम्हाल लेंगे।" तभी ये वाक्य पीछे से किसी ने कहा था। मैं और आदित्य ये सुन कर चौंकते हुए पीछे की तरफ पलटे। हमारे पीछे कुछ लोग खड़े हुए थे। मुझे समझते देर न लगी कि ये सब वही लोग हैं जो हमारे पीछे आ रही गाड़ियों पर थे।
"आप लोग कौन हैं?" मैने तनिक घबराते हुए एक से पूछा___"और ये आपने कैसे कहा कि हम सब इन लोगों को सम्हाल लेंगे? बात कुछ समझ में नहीं आई।"
मेरी बात सुन कर उस आदमी ने अपने शर्ट की ऊपरी जेब से एक आई कार्ड जैसा कुछ निकाला और हमारी तरफ उसे दिखाते हुए बोला___"हम सब पुलिस वाले हैं और आपके पीछे पीछे आपकी सुरक्षा के लिए ही लगे हुए थे।"
मैं और आदित्य उसकी ये बात सुन बुरी तरह चौंक पड़े थे। ये सच है कि उसकी ये बात ऐसी थी कि काफी देर तक हमारे पल्ले ही न पड़ सकी थी।
मैं तो ये सोच कर हैरान था कि ये सब पुलिस वाले हैं और इन लोगों ने हम दोनो को अजय सिंह के सभी आदमियों का बेदर्दी से कत्ल करते हुए अपनी ऑखों से देखा था। इसके बावजूद ये लोग ये कह रहे हैं कि ये हमारी सुरक्षा के लिए ही हमारे पीछे लगे हुए थे। मेरे दिमाग़ की नशें तक दर्द करने लगीं ये सोचते हुए कि ये लोग हमारी सुरक्षा क्यों कर रहे थे? इनकी नज़र में तो अब हम दोनो मुजरिम ही बन चुके थे। इनकी ऑखों के सामने ही तो हमने अजय सिंह के सभी आदमियों को जान से मारा था। उस सूरत में तो इन लोगों हमें गिरफ्तार कर लेना चाहिए। मगर नहीं, ये लोग तो ये कह रहे हैं कि इन लाशों को ये सम्हाल लेंगे। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि पुलिस वाले भला ऐसा कैसे कह और कर सकते हैं? मैने आदित्य की तरफ देखा तो उसका हाल भी मुझसे जुदा न था। वो भी मेरी तरह हैरान परेशान सा उन सभी पुलिस वालों की तरफ इस तरह देख रहा था जैसे उन सबके सिर उनके धड़ों से निकल कर ऊपर हवा में कत्थक कर रहे हों।
"बात कुछ समझ में नहीं आई।" मैने खुद को सम्हालते हुए अपने सामने खड़े एक पुलिस वाले से कहा___"आप पुलिस वाले हमारी सुरक्षा किस वजह से कर रहे हैं और किसके कहने पर? इतना ही नहीं ये भी कह रहे हैं कि आप इन लाशों को सम्हाल लेंगे? जबकि आप लोगों को करना तो यही चाहिए कि ऐसे जघन्य हत्याकाण्ड के लिए हमें तुरंत गिरफ्तार कर हवालात में बंद कर दें।"
"वो सब छोंड़िये।" मेरे सामने खड़े एक पुलिस वाले ने कहा___"आप लोग यहाॅ से आगे बढ़िये, ये सोच कर कि यहाॅ कुछ हुआ ही नहीं है। हमने आपके टैक्सी ड्राइवर को भी समझा दिया है। वो इस मामले में अपना मुख किसी के सामने जीवन भर नहीं खोलेगा। आपके पीछे कुछ दूरी के फाॅसले पर हमारे कुछ आदमी आपकी सुरक्षा में उसी तरह लगे रहेंगे जैसे अब तक लगे हुए थे।"
"ये तो बड़ी ही हैरतअंगेज बात है।" मैं उसकी इस बात से चकित होकर बोला___"कैसे पुलिस वाले हैं आप लोग कि इतना कुछ होने के बाद भी आप हमें गिरफ्तार करने की बजाय यहाॅ से बड़े आराम से चले जाने का कह रहे हैं? ऊपर से हमारी सुरक्षा के लिए आप अपने पुलिस के कुछ आदमियों को भी हमारे पीछे लगा रहे हैं।"
"इस बारे में आप ज्यादा सोच विचार मत कीजिए।" पुलिस वाले ने कहा___"अब आप ज्यादा देर मत कीजिए और बेफिक्र होकर यहाॅ से गाॅव जाइये।"
इतना कह कर वो पुलिस वाला पलट गया। उसके साथ बाॅकी के पुलिस वाले भी पलट गए थे। जबकि हैरान परेशान हम दोनो उन्हें मूर्खों की तरह देखते रह गए। साला दिमाग़ का दही हो गया मगर पुलिस वालों का ये रवैया हमारी समझ में ज़रा भी न आ सका था।
"विराज भाई।" उन लोगों के जाते ही आदित्य कह उठा___"मैने अपनी इतनी बड़ी लाइफ में ऐसे विचित्र किस्म के पुलिस वाले आज तक नहीं देखे। मतलब कि____यार क्या कहूॅ अब? मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा।"
"सही कह रहे हो दोस्त।
" मैने कुछ सोचते हुए कहा___"ये तो हद से भी ज्यादा वाला अंधेर हो गया। ख़ैर जाने दो, हमारे तो हक़ में ही है न? अच्छा ही हुआ, वरना अगर ये लोग हमें इस सबके लिए गिरफ्तार कर जेल की सलाखों के पीछे डाल देते तो बड़ी गंभीर समस्या हो जाती हमारे लिए।"
"हाॅ यार।" आदित्य ने कहा___"लेकिन ये बात ऐसी है कि कुछ दिन तक ही क्या साला जीवन भर हमारे ज़हन में किसी सर्प की भाॅति कुण्डली मार कर बैठी रहेगी। हम जीवन भर इस सबके बारे में सोचते रहेंगे मगर इस सबका कारण हमें समझ में ही नहीं आएगा।"
"आएगा दोस्त।" मैने पूर्वत सोचते हुए ही कहा___"इस सबका कारण ज़रूर समझ में आएगा और बहुत जल्द आएगा। फिलहाल तो हमें यहाॅ से निकलना ही चाहिए।"
"बिलकुल।" आदित्य ने कहा___"चलो चलते हैं। लेकिन यार सामने जाने का रास्ता तो बंद है। हमें सबसे पहले ये सारी जीपें सामने के रास्ते से हटानी पड़ेंगी।"
"हाॅ तो चलो हटा देते हैं।" मैने कहा__"उसमे क्या है।"
मेरे इतना कहते ही आदित्य मेरे साथ चल पड़ा। कुछ ही देर में हमने उन जीपों को रास्ते से हटा दिया। इस काम में एक दो पुलिस वाले भी हमारी मदद करने के लिए आ गए थे। सभी जीपों को रास्ते से हटाने के बाद मैने और आदित्य ने एक काम और किया। वो ये कि उन सभी जीपों के टायरों से हवा निकाल दी। उसके बाद हम दोनो आकर टैक्सी में बैठ गए।
टैक्सी में आकर मैने देखा कि पवन किसी और ही दुनियाॅ में खोया हुआ एकदम शान्त बैठा था। उसके चेहरे पर आश्चर्य का सागर विद्यमान था। मैने उसे उसके कंधों से पकड़ कर हिलाया, तब जाकर उसकी चेतना लौटी। चेतना लौटते ही वो मेरी तरफ अजीब भाव से देखने लगा। अभी भी उसके चेहरे पर गहन हैरत के भाव थे।
"ऐसे दीदें फाड़ कर क्या देख रहा है?" मैने मुस्कुराते हुए कहा उससे।
"ये ये सब क्या था?" उसके मुख से अजीब सी आवाज़ निकली___"ये तुम दोनो ने क्या और कैसे कर दिया? सबको मार दिया तुम दोनो ने। तुझे पता है ये बात जब तेरे बड़े पापा को पता चलेगी तो क्या होगा?"
"कुछ नहीं होगा भाई।" मैने कहा___"और अगर कुछ होगा भी तो वो ये होगा कि उस अजय सिंह की गाॅड फट के उसके हाॅथ में आ जाएगी समझा। खुद को बहुत बड़ा सूरमा समझने वाले अजय सिंह को जब अपने आदमियों के बारे में ऐसी ख़बर मिलेगी तो उस समय उसकी हालत क्या होगी इस बात का अंदाज़ा लगा कर देख भाई।"
"तू मेरा वही यार है या तेरी जगह तेरा चोला पहन कर कोई और आ गया है?" पवन ने चकित भाव से कहा था, बोला___"मेरा दोस्त इतना खतरनाक तो नहीं था। जिस तरह तूने एक ही झटके में अजय सिंह के मुस्टंडे आदमियों का क्रिया कर्म कर दिया है न उससे तो यही लगता है कि तू मेरा वो यार नहीं हो सकता।"
"मैं तेरा वही यार हूॅ भाई।" मैने कहा__"बस समय बदल गया है। इस लिए समय के साथ साथ मैने खुद की भी बदल लिया है।
मगर यकीन रख, मेरा ये बदलाव सिर्फ उनके लिए है जिन्होंने मुझ पर और मेरे माॅ बहन पर अत्याचार किया है। अपने अज़ीज़ों के लिए तो मैं आज भी वही हूॅ जैसा पहले हुआ करता था। ख़ैर छोंड़ ये सब, ये बता कि हमारे पीछे आ रहे ये पुलिस वालों का क्या चक्कर है? ये लोग मेरी सुरक्षा की बात क्यों कर रहे थे मुझसे? और तो और इन लोगों ने तो हमे गिरफ्तार भी नहीं किया जबकि मैंने और आदित्य ने अजय सिंह के सभी आदमियों को उनकी ऑखों के सामने उन सबको जान से मार दिया है? ये सब क्या चक्कर है भाई? देख मुझसे कोई बात मत छिपा तू। जो भी बात है उसे साफ साफ बता दे मुझे। आख़िर ऐसी क्या वजह थी जिसके लिए तूने मुझे इस तरह यहाॅ आने को कहा था?"
"अब जब तू यहाॅ आ ही गया है तो थोड़ा और इन्तज़ार कर ले मेरे यार।" पवन ने कहने के साथ ही अपना चेहरा अपनी तरफ के दरवाजे की खिड़की की तरफ फेर लिया, फिर बोला___"मैं अपने मुख से तुझे कुछ नहीं बता सकता और ना ही वो सब बताने की मुझमें हिम्मत है। कुछ समय तक और धीरज रख ले, उसके बाद सब कुछ पता चल जाएगा तुझे।"
पवन ये बातें सुन कर मैं उसे अजीब भाव से देखता रह गया था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसी क्या बात है जिसे मेरा दोस्त इस हद तक मुझसे छिपा रहा है? मेरे दिलो दिमाग़ में अनगिनत आशंकाएॅ उत्पन्न हो गई थी। पवन अभी भी खिड़की के उस पार देख रहा था। उस वक्त तो मैं चौंक ही पड़ा जब पवन ने बड़ी सफाई से अपनी ऑखों से ऑसू पोछने की क्रिया की थी। ये देख कर मेरे अंदर बड़ी तेज़ी से चिंता और बेचैनी बढ़ती चली गई। सहसा मेरी ऑखों के सामने अभय चाचा के बीवी बच्चों का चेहरा नाच गया। मेरे मस्तिष्क में जैसे विष्फोट सा हुआ। मन में एक ही ख़याल उभरा कि छोटी चाची और उनके बच्चों के साथ कोई ऐसी बात तो नहीं हो गई जो कि नहीं होनी चाहिए थी। लेकिन फिर मेरे मन में सवाल भरा कि इस बात को बताने में भला पवन को क्या परेशानी हो सकती है? इसका मतलब मामला कुछ और ही है। मगर ऐसा क्या मामला हो सकता है?
मैंने इस बारे बहुत सोचा मगर मुझे कुछ समझ न आया। अंत में थक हार कर मैने अपने ज़हन से ये सब बातें झटक दी, ये सोच कर कि कुछ समय बाद सब कुछ पता तो चल ही जाएगा। पवन ने तो बार बार यही कहा था मुझसे। मैने एक बार पलट कर पीछे की तरफ देखा। हमारे पीछे पुलिस वालों की एक गाड़ी कुछ फाॅसले पर लगी हुई आ रही थी। उन लोगों को देख कर एक बार फिर से मेरे मन में उनके बारे में ढेरों सवाल चकरा उठे। आख़िर ये पुलिस वाले मेरी सुरक्षा में क्यों लगे हुए हैं और किसने कहा होगा इन्हें ऐसा करने के लिए? सोचते सोचते मेरा सिर दर्द करने लगा तो मैने उनके बारे में सोचने का काम भी बंद कर दिया।
अभी मैं रिलैक्स होकर बैठा ही था कि एकाएक मेरे मस्तिष्क में धमाका हुआ। धमाके का गुबार जब छॅटा तो एक चेहरा नज़र आया मुझे। वो चेहरा था रितू दीदी का।
वो भी तो पुलिस वाली थी। तो क्या उन्होंने इन लोगों को मेरी सुरक्षा के लिए भेजा है? नहीं नहीं हर्गिज़ नहीं, वो भला ऐसा कैसे कर सकती हैं? मैं भला उनका लगता ही क्या हूॅ? आज तक कभी जिसने मुझे अपना भाई नहीं माना और ना ही मुझसे कभी बात करना पसंद किया। वो भला मेरी सुरक्षा की चिंता क्यों करेंगी? ये तो सूर्य देवता के पश्चिम दिशा से उदय होने वाली बात है, जो कि निहायत ही असंभव बात है। तो फिर और क्या वजह हो सकती है? सहमा मुझे ध्यान आया कि मैं एक बार फिर से इन सब बातों पर अपना माथा पच्ची करने में लग गया हूॅ। इस ख़याल के आते ही मैने फिर से अपने ज़हन से इन सब बातों को झटक दिया और फिर आराम से रिलैक्स होकर बैठ गया। मगर मैने महसूस किया कि रिलैक्स होना इस वक्त मेरे बस में ही नहीं था। क्योंकि मेरे मन में फिर से तरह तरह के सोच विचार चलने लगे।
लगभग दस मिनट बाद ही हल्दीपुर गाॅव नज़र आने लगा था हमें और फिर कुछ ही देर में हम गाॅव में दाखिल हो गए। पवन के निर्देश पर टैक्सी ड्राइवर ने टैक्सी को पवन के घर की तरफ जाने वाली गली में मोड़ दिया था। जबकि हमारी हवेली उत्तर की तरफ थी।
कुछ ही देर में हम पवन के घर के पास पहुॅच गए। गर्मियों का समय तो नहीं था मगर इस वक्त आस पास किसी भी घर के पास कोई इंसानी जीव दिख नहीं रहा था। हलाॅकि गाॅव में जब हम दाखिल हुए थे तो दाएॅ तरफ एक चौपाल पर कुछ लोगों को बैठे देखा था हमने। मैने सबसे ज़रूरी काम ये किया था कि गाॅव में दाखिल होने से पहले ही अपने चेहरे को रुमाल से ढॅक लिया था। ताकि गाव का कोई ब्यक्ति मुझे किसी तरह से पहचान न सके।
पवन के घर के सामने टैक्सी रुकी तो ड्राइवर को छोंड़ कर हम तीनों जल्दी से टैक्सी से बाहर निकले और अपना अपना बैग लेकर पवन के घर के अंदर आ गए। टैक्सी ड्राइवर को मैने उसकी टैक्सी का भाड़ा पहले ही दे दिया था और उसे समझा भी दिया था कि हम लोगों के उतरते ही वो वापस बिजली की स्पीड से चला जाएगा। अगर यहाॅ कहीं कोई टैक्सी रुकवाए तो वो रोंके नहीं। वरना वो खुद बहुत बड़ी मुसीबत में फॅस जाएगा।
टैक्सी ड्राइवर हम लोगों से इतना डरा हुआ था कि वो हमसे पैसा भी नहीं ले रहा था। एक ही बात बोल रहा था कि हम उसे जाने दें। वो हमारी कोई भी बात कभी भी किसी से नहीं कहेगा। मगर मैने उसे समझाया कि डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। ख़ैर, हम लोगों को उतार कर उसने टैक्सी को वहीं पर किसी तरह बैक करके वापसी के लिए मोड़ा और वहाॅ से चंपत हो गया। मुझे यकीन था कि वो रास्ते में कहीं भी रुकने वाला नहीं था।
पवन के घर के अंदर जैसे ही हम तीनो आए तो पवन ने जल्दी से घर का मुख्य दरवाजा बंद कर उसमें कुण्डी लगा दी थी। पवन सिंह मेरे बचपन का दोस्त था। ग़रीब था और बिना बाप का था। उससे बड़ी उसकी एक बहन थी। जो मेरी भी मुहबोली बहन थी।
वो मुझे अपने सगे भाई से भी ज्यादा मानती थी। अभी तक उसकी शादी नहीं हो सकी थी। इसकी वजह ये थी कि पवन के पास रुपये पैसे की तंगी थी। आजकल लोग दहेज की माॅग बहुत ज्यादा करते हैं। पवन की माॅ बयालिस साल की विधवा औरत थी। किन्तु स्वभाव से बहुत अच्छी थी। वो मुझे अपने बेटे की तरह ही प्यार करती थी।
हम लोग चलते हुए बैठक में पहुॅचे और वहाॅ एक तरफ किनारे पर रखी एक चारपाई पर बैठ गए। जबकि पवन अंदर की तरफ चला गया था। आदित्य इधर उधर बड़े ग़ौर से देख रहा था। कदाचित ये देख रहा था कि यहाॅ गाॅव में कच्चे खपरैलों वाले मकान बने हुए थे। जबकि उसने आज तक ऐसे मकान सिर्फ फिल्मों में ही देखे होंगे कभी।
दोस्तो, निर्धारित समय से पहले अपडेट हाज़िर है,,,,,,,,,
ये अपडेट मैं कल से थोड़ा थोड़ा करके लिख रहा था। थोड़ा थोड़ा करके इस लिए क्योंकि तीन चार घण्टे का समय एकसाथ मिल ही नहीं रहा था मुझे। हिन्दी में लिखने पर समय भी बहुत ज्यादा लगता है। इतने अपडेट को अगर अंग्रेजी फाॅन्ट में लिखना होता तो कदाचित कल ही आपके सामने अपडेट हाज़िर हो जाता। ख़ैर,,,
एक बात कहना चाहता हूॅ और वो ये कि कुछ लोग कहते हैं कि फ्री होने के बाद मैं रेगुलर अपडेट दूॅ। जबकि मैने शुरू में ही आप सबसे कहा था कि रेगुलर अपडेट देना मेरे लिए बहुत मुश्किल है। ये बात मैंने आप सबसे बीच बीच में भी कही थी। सबको लगता है कि उन्हें किसी भी कहानी का अपडेट रोज़ाना पढ़ने को मिले और ये बात यकीनन अपनी जगह सही भी है। आपकी जगह अगर मैं होता तो मैं भी यही चाहता और यही डिमाण्ड भी करता। मगर दोस्तो, ये आप भी समझ सकते हैं कि ये सब इतना आसान नहीं होता। हर लेखक चाहता है कि उसके पाठक उससे खुश रहें मगर अक्सर ऐसा होता है कि वही नहीं हो पाता जो हम बड़ी शिद्दत से चाहते हैं। आप सब मेरी इस बात से अगर सहमत हैं तो ये मेरे लिए अच्छी बात होगी। मुझे खुशी होगी कि आप सब मेरी ही बस नहीं बल्कि हर लेखक की मजबूरियों को बेहतर तरीके से समझते हैं।
!! धन्यवाद !!
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट........《 44 》
अब तक,,,,,,,
टैक्सी ड्राइवर हम लोगों से इतना डरा हुआ था कि वो हमसे पैसा भी नहीं ले रहा था। एक ही बात बोल रहा था कि हम उसे जाने दें। वो हमारी कोई भी बात कभी भी किसी से नहीं कहेगा। मगर मैने उसे समझाया कि डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। ख़ैर, हम लोगों को उतार कर उसने टैक्सी को वहीं पर किसी तरह बैक करके वापसी के लिए मोड़ा और वहाॅ से चंपत हो गया। मुझे यकीन था कि वो रास्ते में कहीं भी रुकने वाला नहीं था।
पवन के घर के अंदर जैसे ही हम तीनो आए तो पवन ने जल्दी से घर का मुख्य दरवाजा बंद कर उसमें कुण्डी लगा दी थी। पवन सिंह मेरे बचपन का दोस्त था। ग़रीब था और बिना बाप का था। उससे बड़ी उसकी एक बहन थी। जो मेरी भी मुहबोली बहन थी। वो मुझे अपने सगे भाई से भी ज्यादा मानती थी।
अभी तक उसकी शादी नहीं हो सकी थी। इसकी वजह ये थी कि पवन के पास रुपये पैसे की तंगी थी। आजकल लोग दहेज की माॅग बहुत ज्यादा करते हैं। पवन की माॅ बयालिस साल की विधवा औरत थी। किन्तु स्वभाव से बहुत अच्छी थी। वो मुझे अपने बेटे की तरह ही प्यार करती थी।
हम लोग चलते हुए बैठक में पहुॅचे और वहाॅ एक तरफ किनारे पर रखी एक चारपाई पर बैठ गए। जबकि पवन अंदर की तरफ चला गया था। आदित्य इधर उधर बड़े ग़ौर से देख रहा था। कदाचित ये देख रहा था कि यहाॅ गाॅव में कच्चे खपरैलों वाले मकान बने हुए थे। जबकि उसने आज तक ऐसे मकान सिर्फ फिल्मों में ही देखे होंगे कभी।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,,,
उधर अजय सिंह, प्रतिमा और शिवा अपने नये फार्महाउस में पहुॅच चुके थे। तीनों के चेहरे खिले हुए थे। ये सोच कर कि बहुत दिनों बाद कुछ अच्छा सुनने को मिला था उन्हें। जिनकी तलाश में खुद अजय सिंह और उसके आदमी जाने कहाॅ कहाॅ भटक रहे थे वो खुद ही चल कर यहाॅ आया और उसके आदमियों के द्वारा बहुत जल्द उसे पकड़ कर उसके सामने उसे हाज़िर कर दिया जाएगा। उसके बाद वो जैसे चाहेगा वैसे विराज के साथ सुलूक कर सकेगा।
"डैड मैने तो सोच लिया है कि मैं क्या क्या करूॅगा?" फार्महाउस के अंदर ड्राइंगरूम में रखे सोफे पर बैठे शिवा ने कहा___"उस विराज के हाथ लगते ही बाॅकी के जब सब भी हमारे पास आ जाएॅगे तब मैं अपनी मनपसंद चीज़ों का जी भर के मज़ा लूटूॅगा। सबसे पहले तो उस हरामज़ादी करुणा को पेलूॅगा वो भी उसके पति के सामने। उसी की वजह से चाचा ने मुझे कुत्ते की तरह धोया था। इस फार्महाउस पर सब औरतों और उनकी लड़कियों को नंगा करूॅगा मैं।"
"चिंता मत करो बेटे।" अजय सिंह ने शिगार को सुलगाते हुए कहा___"जो कुछ तू सोचे बैठा है न वही सब मैने भी सोचा हुआ है। बहुत तरसाया है इन लोगों ने मुझे। सबसे ज्यादा उस कमीनी गौरी ने। पता नहीं क्यों पर उससे दिल लग गया था बेटा। मैं चाहता था कि वो अपने मन से अपना सब कुछ मुझे सौंप दे, इसी लिए तो कभी उसके साथ ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं की थी मैने। मगर अब नहीं। अब तो बलात्कार होगा बेटे। ऐसा बलात्कार कि दुनियाॅ में उसके बारे में किसी ने ना तो सोचा होगा और ना ही सुना होगा कहीं। इस फार्महाउस में उन दोनो औरतों को और उन दोनो लड़कियों को जन्मजात नंगी करके दौड़ाऊॅगा।"
"अभी दो लड़कियों को आप भूल रहे हैं डैड।" शिवा ने कमीनी मुस्कान के साथ कहा___"आपकी दोनो लड़कियाॅ और मेरी प्यारी प्यारी मगर मदमस्त बहनें।"
"उनका नंबर भी आएगा बेटे।" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली___"मगर इन लोगों के बाद। पहले इन लोगों के साथ तो मज़े कर लें। इन सबको इतना बजाएॅगे कि सब की सब साली पनाह माॅग जाएॅगी। उसके बाद इन सबको रंडियों के बाज़ार में ले जाकर मुफ़्त में बेंच देंगे।"
"ये सही सोचा है डैड।
" शिवा ने ठहाका लगाते हुए कहा___"रंडियों के बाज़ार में बेंचने से ये सब जीवन भर लोगों को मज़ा देती रहेंगी। लेकिन डैड मेरी बहनों को मत बेंच देना। वो सिर्फ हमारी रंडियाॅ बन कर रहेंगी जीवन भर। हम दोनो ही उनके सब कुछ रहेंगे।"
"सही कहा बेटे।" अजय सिंह ने कहा__"हम अपनी बेटियों को नहीं बेचेंगे। वो तो हमारी ही रंडियाॅ बन कर रहेंगी अपनी माॅ के साथ। क्या कहती हो डार्लिंग?"
अंतिम वाक्य अजय सिंह ने चुपचाप बैठी प्रतिमा को देख कर कहा था। प्रतिमा जो इतनी देर से बाप बेटे की बातें सुन कर मन ही मन हैरान और चकित हो रही थी वो अचानक ही अजय सिंह के इस प्रकार कहने पर चौंक पड़ी थी। तुरंत उससे कुछ कहते न बन पड़ा था। बल्कि अजीब भाव से वो दोनो बाप बेटों को देखती रह गई थी। ये देख कर अजय सिंह और शिवा दोनो ही ठहाका लगा कर हॅस पड़े थे।
"क्या हुआ प्रतिमा?" अजय सिंह हॅसने के बाद बोला___"किन ख़यालों में गुम हो भई? हमारी बातों पर ध्यान नहीं है क्या तुम्हारा?"
"मैं तुम दोनो की तरह ख़याली पुलाव नहीं बनाती अजय।" प्रतिमा ने खुद को सम्हालते हुए कहा___"मुझे इस सबमें खुशी तब होगी जब ऐसा सचमुच में होता हुआ अपनी ऑखों से देखूॅगी।"
"अरे ज़रूर देखोगी मेरी जान।" अजय सिंह ने हॅसते हुए कहा___"और बहुत जल्द देखोगी। बस कुछ ही देर की बात है। मेरे आदमी उस हराम के पिल्ले को घसीटते हुए लाते ही होंगे। उसके आने के बाद उसके बाॅकी चाहने वालों को भी बहुत जल्द आना पड़ेगा मेरे पास।"
"इसी लिए तो चुपचाप उसके आने के इन्तज़ार में बैठी हूॅ मैं।" प्रतिमा ने कहा___"ज़रा फोन करके पता तो करो कि तुम्हारे आदमी उसे लिये कहाॅ तक पहुॅचे हैं अभी? अपने आदमियों से कहो कि ज़रा जल्दी आएॅ यहाॅ।"
"जो हुकुम डार्लिंग।" अजय सिंह ने शिगार को ऐश ट्रे में मसलते हुए कहा___"मैं अभी भीमा को फोन करता हूॅ और उसे बोलता हूॅ कि भाई जल्दी लेकर आ उस हरामज़ादे को।"
कहने के साथ ही अजय सिंह ने अपने कोट की जेब से मोबाइल निकाला और उस पर भीमा का नंबर डायल कर मोबाइल को कान से लगा लिया। मगर उसे अपने कान में ये वाक्य सुनाई दिया कि___"आपने जिस एयरटेल नंबर पर फोन लगाया है वो इस वक्त उपलब्ध नहीं है या अभी बंद है।"
ये वाक्य सुनते ही अजय सिंह का दिमाग़ घूम गया। उसने काल को कट करके फिर रिडायल कर दिया मगर फिर से उसे कानो में वही वाक्य सुनाई दिया। अजय सिंह कई बार भीमा के नंबर पर फोन लगाया मगर हर बार वही वाक्य सुनने को मिला उसे।
"क्या हुआ डैड?" शिवा जो अजय सिंह की ही तरफ देख रहा था बोल उठा___"क्या भीमा का नंबर नहीं लग रहा?"
"हाॅ बेटे।" अजय सिंह ने सहसा कठोर भाव से कहा___"इन सालों को कभी अकल नहीं आएगी। ऐसे समय में भी साले ने फोन बंद करके रखा हुआ है।"
"तो किसी दूसरे आदमी को फोन लगा कर पता कीजिए डैड।" शिवा ने मानो ज्ञान दिया।
"हाॅ वही कर रहा हूॅ।
" अजय सिंह ने नंबरों की लिस्ट में मंगल का नंबर खोज कर उसे डायल करते हुए कहा।
मंगल का नंबर डायल करने के बाद उसने मोबाइल को कान से लगा लिया। मगर इस नंबर पर भी वही वाक्य सुनने को मिला उसे। अब अजय सिंह का भेजा गरम हो गया। फिर जैसे उसने खुद के गुस्से को सम्हाला और अपने किसी अन्य आदमी का नंबर डायल किया। मगर परिणाम वही ढाक के तीन पात वाला। कहने का मतलब ये कि अजय सिंह ने एक एक करके अपने सभी आदमियों का नंबर डायल किया मगर सबक सब नंबर या तो उपलब्ध नहीं थे या फिर बंद थे।
अजय सिंह को इस बात ने हैरान कर दिया और वह सोचने पर मजबूर हो गया कि ऐसा कैसे हो सकता है? ये तो उसे भी पता था कि उसके आदमी इतने लापरवाह हो ही नहीं सकते क्योंकि सब उससे बेहद डरते भी थे। किन्तु इस वक्त सभी के नंबर बंद होने की वजह से उसका माथा ठनका। मन में एक ही विचार आया कि कुछ तो गड़बड़ है। किसी गड़बड़ी के अंदेशे ने अजय सिंह को एकाएक ही चिंता और परेशानी में डाल दिया।
"क्या बात है अजय?" सहसा प्रतिमा उसके चेहरे के बदलते भावों को देखते हुए बोल पड़ी___"ये अचानक तुम्हारे चेहरे पर चिन्ता व परेशानी के भाव कैसे उभर आए?"
"बड़ी हैरत की बात है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा___"मैने एक एक करके अपने सभी आदमियों को फोन लगा कर देख लिया, मगर उनमें से किसी का भी फोन नहीं लग रहा। सबके सब बंद बता रहे हैं। इसका क्या मतलब हो सकता है?"
"ऐसा कैसे हो सकता है डैड?" शिवा ने भी हैरानी से कहा___"एक साथ सबके फोन कैसे बंद हो सकते हैं? कुछ तो बात ज़रूर है। हमें जल्द से जल्द इस सबका पता लगाना चाहिए डैड।"
"शिवा सही कह रहा है अजय।" प्रतिमा ने कहा___"हमारे आदमी इतने लापरवाह नहीं हो सकते कि ऐसे माहौल में वो सब अपना फोन ही बंद कर लें। ज़रूर कोई बात हुई है। वरना अब तक तो उनमें से किसी ने तुम्हें फोन करके ये ज़रूर बताया होता कि उन लोगों ने विराज को अपने कब्जे में ले लिया है और अब वो सीधा यहीं आ रहे हैं। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ अब तक। इसका मतलब साफ है कि कोई गंभीर बात हो गई है।"
"मुझे भी ऐसा ही लगता है।" अजय सिंह ने चिंतित भाव से कहा___"कोई तो बात हुई है। मगर सवाल ये है कि ऐसी क्या बात हो सकती है भला? उन पर किसी प्रकार के संकट के आने का सवाल ही नहीं है क्योंकि वो खुद भी कई सारे एक साथ थे और खुद दूसरों के लिए संकट ही थे।"
"असलियत का पता तो तभी चलेगा अजय जब तुम इस सबका पता करने यहाॅ से जाओगे।" प्रतिमा ने कहा___"यहाॅ पर बातों में समय गवाॅने का कोई मतलब नहीं है।"
"माॅम ठीक कह रही हैं डैड।" शिवा ने कहा__"हमें तुरंत ही इस सबका पता लगाने के लिए यहाॅ से निकलना चाहिए। वरना कहीं ऐसा न हो कि हम जिस सुनहरे मौके की बात कर रहे थे वो हमारे हाॅथ से निकल जाए।"
"यू आर अब्सोल्यूटली राइट।
" अजय सिंह ने कहा__"चलो चल कर देखते हैं कि क्या बात हो गई है?"
"तुम दोनो जाओ।" प्रतिमा ने कहा__"मैं यहीं पर तुम दोनो का इंतज़ार करूॅगी।"
प्रतिमा की बात खत्म होते ही दोनो बाप बेटे सोफों से उठ कर बाहर की तरफ चल दिये। बाहर आकर अजय सिंह अपनी कार का ड्राइविंग डोर खोल कर उसमें बैठ गया, जबकि शिवा उसके बगल वाली शीट पर बैठ गया। कार को स्टार्ट कर अजय सिंह ने कार को झटके से आगे बढ़ा दिया। उसकी कार ऑधी तूफान बनी सड़कों पर घूमने लगी थी।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
इधर पवन के घर में मैं और आदित्य नहा धो कर फ्रेश हो गए थे और अब हम सब खाना खाने के लिए बैठे हुए थे। पवन ने अपनी माॅ और बहन दोनो की मेरे आने का पहले ही बता दिया था। बस ये नहीं बताया था कि उसने मुझे यहाॅ किस लिए बुलाया था? उनसे यही कहा था कि मैं बस घूमने आया हूॅ।
पवन की माॅ को मैं भी माॅ ही बोलता था शुरू से ही। मेरी नज़र में माॅ से बड़ा और पवित्र रिश्ता कोई नहीं हो सकता था। वो मुझे शुरू से ही बहुत चाहती थी और प्यार व स्नेह देती थीं। पवन की बहन आशा दीदी मुझसे और पवन से उमर में बड़ी थी। उनका स्वभाव पिछले कुछ सालों तक हॅस मुख और चंचल था किन्तु अब वो ज्यादा किसी से बात नहीं करती थी। उनके चेहरे पर हर वक्त गंभीरता विद्यमान रहती थी। इसकी वजह समझना कोई बड़ी बात नहीं थी। हर कोई समझ सकता था कि उनके स्वभाव में ये तब्दीली किस वजह से आई हुई थी।
खाना पीना से फुर्सत होकर हम सब बाहर बैठक में आ गए। मेरे मन में इस वक्त कुछ और ही चल रहा था। इस लिए मैं बैठक से उठ कर अंदर माॅ के पास चला गया। मैने देखा माॅ और आशा दीदी हम लोगों की खाई हुई थालियाॅ ऑगन में एक जगह रख रही थी।
मुझे ऑगन में आया देख माॅ के होठों पर मुस्कान आ गई। आशा दीदी भी मुझे देख कर हल्का सा मुस्कुराई। फिर वो वहीं पर बैठ कर थालियाॅ धोने लगी। जबकि माॅ मेरे पास आ गईं।
"चल आजा मेरे साथ।" माॅ एक तरफ को बढ़ती हुई बोली___"मुझे पता है तुझे मेरी गोंद में सिर रख कर सोना है। कितना समय हो गया मैने भी तुझे वैसा प्यार और स्नेह नहीं दिया। वक्त और हालात ऐसे बदल जाएॅगे ऐसा कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा था। बुरे लोगों का एक दिन ज़रूर नाश होता है बेटा। बस थोड़ा समय लग जाता है। अजय सिंह को उसके बुरे कर्मों की सज़ा ईश्वर ज़रूर देगा।"
माॅ ये सब बड़बड़ाती हुई अंदर कमरे मे आ गईं। मैं भी उनके पीछे पीछे आ गया था। कमरे में रखी चारपाई पर माॅ पालथी मार कर बैठ गईं और फिर मेरी तरफ देख कर मुझे अपने पास आने का इशारा किया। मैं खुशी से उनके पास गया और चारपाई के नीचे ही उकड़ू बैठ कर अपना सिर उनकी गोंद में रख दिया।
"अरे नीचे क्यों बैठ गया बेटे?" माॅ ने मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा___"ऊपर आजा और फिर ठीक से वैसे ही लेट जा जैसे पहले लेट जाया करता था मेरी गोंद में।"
"नहीं माॅ, मैं ऐसे ही ठीक हूॅ।
" मैने सिर उठाकर उनकी तरफ देखते हुए बोला__"मुझे आपसे कुछ बात करनी है माॅ।"
"हाॅ तो कह ना।" माॅ ने मेरे चेहरे को एक हाथ से सहलाया___"तुझे कोई भी बात करने के लिए मुझसे पूछने की क्या ज़रूरत है? ख़ैर, बता क्या बात करना है तुझे?"
"सबसे पहले ये बताइये कि मैं आपका बेटा हूॅ कि नहीं?" मैने माॅ के चेहरे की तरफ देखते हुए कहा।
"ये कैसा सवाल है बेटा?" माॅ के चेहरे पर ना समझने वाले भाव उभरे___"तू तो मेरा ही बेटा है। जैसे पवन मेरा बेटा है वैसे ही तू भी मेरा बेटा है।"
"अगर मैं आपका बेटा हूॅ तो मुझे भी आपका बेटा होने का हर फर्ज़ निभाना चाहिए न?" मैने भोलेपन से कहा था।
"ये तो बेटों की सोच और समझदारी पर निर्भर करता है बेटा।" माॅ ने हल्का सा मुस्कुराते हुए कहा___"कि वो अपने माता पिता व परिवार के लिए कैसा विचार रखते हैं? पर हाॅ नियम और संस्कार तो यही कहते हैं कि हर ब्यक्ति को अपना कर्तब्य व फर्ज़ सच्चे दिल से निभाना चाहिए। जैसे माता पिता अपने बच्चों के लिए हर फर्ज़ सच्चे दिल से निभाते हैं।"
"मैं और तो कुछ नहीं जानता माॅ।" मैने कहा___"लेकिन इतना ज़रूर समझता हूॅ कि एक बेटे को हमेशा ऐसा काम करना चाहिए जिससे कि उसके माता पिता को अपने उस बेटे पर गर्व हो। वो अपने बेटे के हर काम से खुश हो जाएॅ। इस लिए माॅ, मैं भी अब वो फर्ज़ निभाना चाहता हूॅ।"
"ये तो बहुत अच्छी बात है बेटा।" माॅ ने खुश होते हुए कहा___"तुम्हें ऐसा करना भी चाहिए। मुझे खुशी है कि तूने इतनी मुश्किलों और परेशानियों में भी अपने अच्छे संस्कारों का हनन नहीं होने दिया। तू अब बड़ा हो गया है, इस लिए तुझे अब अपने कर्तब्यों और फर्ज़ों की तरफ ध्यान देना चाहिए। तेरी माॅ और बहन ने बहुत दुख दर्द झेला है बेटा। मैं चाहती हूॅ कि तू उन्हें हमेशा खुश रखे।"
"वो दोनो अब खुश ही हैं माॅ।" मैने कहा__"लेकिन मैं अब अपनी दूसरी माॅ का बेटा होने का भी फर्ज़ निभाना चाहता हूॅ।"
"क्या मतलब?" माॅ ने मेरी इस बात से हैरान होकर मेरी तरफ देखा___"ये तू क्या कह रहा है बेटा?"
"हाॅ माॅ।" मैने कहा___"आप मेरी दूसरी माॅ ही तो हैं और मैं आपका बेटा हूॅ। इस लिए मैं आपका बेटा होने का फर्ज़ निभाना चाहता हूॅ। आशा दीदी की शादी बड़े धूमधाम से किसी बड़े घर में किसी अच्छे लड़के के साथ करना चाहता हूॅ। आज आशा दीदी के मुरझाए हुए चेहरे को देख कर मुझे कितनी तक़लीफ़ हुई ये मैं ही जानता हूॅ माॅ। कितनी बदल गई हैं वो, हर समय बिंदास और चंचल रहने वाली मेरी आशा दीदी ने आज खुद को गहन उदासी और गंभीरता की चादर में ढॅक कर रख लिया है। मैं उन्हें इस तरह नहीं देख सकता माॅ। वो मेरी सबसे प्यारी बहन हैं। मैं चाहता हूॅ कि उनके चेहरे पर फिर से पहले जैसी चंचलता और खुशियाॅ हों। इस लिए माॅ, मैने फैंसला कर लिया है कि अब मैं वही करूॅगा जो मुझे करना चाहिए।"
"पर बेटा ये सब....।
" माॅ ने कुछ कहना चाहा मगर मैने उनकी बात काट कर कहा__"मैं आपकी कोई भी बात नहीं सुनूॅगा माॅ। अगर आप मुझे सच में अपना बेटा मानती हैं तो मुझे मेरा फर्ज़ निभाने से नहीं रोकेंगी।"
मेरी इस बात से माॅ मुझे देखती रह गईं। उनकी ऑखों में ऑसूॅ भर आए थे। मैने उठ कर माॅ को अपने से छुपका लिया और फिर बोला___"आप खुद को दुखी मत कीजिए माॅ। देख लेना, आपका ये बेटा सब कुछ ठीक कर देगा।"
"मुझे खुशी है कि तू मेरा बेटा है।" माॅ ने मुझसे अलग होकर मेरे माथे पर हल्के से चूमते हुए कहा___"लेकिन बेटा तुझे अंदाज़ा नहीं है कि शादी ब्याह में कितना रूपया पैसा खर्च करना पड़ता है। तेरे पास भला इतना रुपया पैसा कहाॅ से आएगा कि तू अपनी दीदी की शादी कर सके?"
"आपके इस बेटे के पास इतना पैसा है माॅ कि वो चाहे तो पूरे हल्दीपुर को खड़े खड़े खरीद ले।" मैने मुस्कुराते हुए कहा___"जिस मिल्कियत को पाने के लिए मेरे बड़े पापा ने हमारे साथ ये सब किया है न उससे कहीं ज्यादा मेरे पास आज के समय में मिल्कियत है।"
"क्या????" माॅ की ऑखें आश्चर्य से फट पड़ी थी, फिर सहसा अविश्वास भरे भाव से बोली___"पर बेटा तेरे पास इतना पैसा कहाॅ से आ गया?"
"सब कुदरत के करिश्मे हैं माॅ।" मैने सहसा गंभीर होकर कहा___"भगवान अगर किसी को दुख तक़लीफ़ें देता है तो एक दिन उसे उस दुख तक़लीफ़ से मुक्त भी कर देता है। मेरे अपनों ने मेरे साथ क्या किया ये तो आप जानती हैं माॅ मगर किसी ग़ैर ने अपना बन कर मेरे लिए क्या किया ये आप नहीं जानती हैं। वो ग़ैर मेरे लिए फरिश्ता क्या बल्कि भगवान बन कर आया और आज मुझे हर दुख दर्द से मुक्त कर दिया।"
"ये तू क्या कह रहा है बेटा?" माॅ ने गहन आश्चर्य के साथ कहा___"मेरी समझ में तेरी ये बातें नहीं आ रही।"
मैने माॅ को संक्षेप में सारी कहानी बताई। उन्हें बताया कि मुम्बई में मैं जिस मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता था उस कंपनी के मालिक जगदीश ओबराय मुझसे प्रभावित होकर मुझे क्या क्या काम दिया और फिर कैसे उनके दिल में मेरे लिए प्यार और स्नेह जागा। कैसे उन्होंने मुझे अपना बेटा बना लिया और फिर कैसे उन्होंने अपनी सारी प्रापर्टी जो करोड़ों अरबों में थी उसे मेरे नाम कर दिया और आज मैं अपनी माॅ और बहन के साथ उनके ही अलीशान बॅगले में रहता हूॅ। मैने माॅ को ये भी बताया कि कुछ दिन पहले अभय चाचा भी मुझे ढूॅढ़ते हुए वहाॅ पहुॅचे थे। पवन के बताने पर मैं उनको रेलवे स्टेशन से अपने बॅगले में ले गया और अब वो भी मेरे साथ ही वहाॅ पर हैं। सारी बातें सुनने के बाद माॅ मुझे इस तरह देखने लगी थी जैसे मेरे सिर पर अचानक ही उन्हें दिल्ली का कुतुब मीनार खड़ा हुआ नज़र आने लगा हो।
"अब आपका ये बेटा करोड़ क्या बल्कि अरबपति है माॅ।
" मैने माॅ को उनके कंधों से पकड़ते हुए कहा___"इस लिए आप इस बात की बिलकुल भी चिंता मत कीजिए कि आशा दीदी की शादी मैं कैसे क पाऊॅगा?"
"भगवान का लाख लाख शुकर है बेटा कि उसने तुझ पर इतनी अनमोल कृपा की।" माॅ ने खुशी से छलक आई अपनी ऑखों को पोंछते हुए कहा___"दिन रात मैं यही सोचती रहती थी कि किस हाल में होगा तू वहाॅ पर और किस तरह तू अपनी माॅ बहन को अपने साथ रखा हुआ होगा? मगर तेरी ये बातें सुन कर मेरे मन का बोझ हल्का हो गया है। मेरा बेटा इतना बड़ा आदमी बन गया है इससे ज्यादा खुशी की बात एक माॅ के लिए क्या हो सकती है?"
"सब आपकी दुवाओं और आशीर्वाद का फल है माॅ।" मैने कहा___"माॅ की दुवाओं में बहुत असर होता है। भगवान माॅ की दुवाओं को कभी विफल नहीं होने दे सकता।"
मेरी ये बात सुनकर माॅ ने मुझे अपने गले से लगा लिया। मेरे सिर पर प्यार से हाॅथ फेरती रहीं वो। फिर मैं उनसे अलग हुआ और बोला___"माॅ मैं दीदी से भी मिल लूॅ। उनके चेहरे पर फिर से मुझे पहले वाली खुशियाॅ देखना देखना है।"
"ठीक है जा मिल ले उससे।" माॅ ने कहा__"तेरे समझाने से शायद वो खुश रहने लगे।"
"वो ज़रूर खुश रहेंगी माॅ।" मैने कहा__"मैं उनके चेहरे पर वही खुशी लाऊॅगा। उनका ये भाई उनकी दामन में हर तरह की खुशियाॅ लाकर डाल देगा।"
मेरी बात सुन कर माॅ की ऑखें भर आईं जिन्हें उन्होंने अपनी सफेद सारी के ऑचल से पोंछ लिया। मैं उनके पास से चल कर कमरे से बाहर आया और आशा दीदी के कमरे की तरफ बढ़ गया। दीदी के कमरे का दरवाजा हल्का सा खुला हुआ था। मैने दरवाजे पर लगी साॅकल को पकड़ कर बजाया। किन्तु अंदर से कोई प्रतिक्रिया न हुई। मैने बाहर से ही आवाज़ लगाई उन्हें तब जाकर अंदर से दीदी की आवाज़ आई। वो कह रही थी कि आजा राज दरवाजा तो खुला ही है।
मैं अंदर गया तो देखा दीदी चारपाई के किनारे पर बैठी हुई थी। उनका सिर नीचे झुका हुआ था। मैं उनके पास जाकर उनके बगल से बैठ गया और उनके कंधे पर हाॅथ रखा। दीदी ने सिर उठा कर मेरी तरफ देखा तो मैं चौंक गया। उनका चेहरा ऑसुओं से तर था। उनकी इस हालत को देख कर मेरा दिल तड़प उठा।
"ये क्या दीदी?" मैने कहा___"मेरी इतनी प्यारी दीदी की ऑखों में इतने सारे ऑसू?"
मेरी बात पूरी भी न हुई थी कि आशा दीदी झपट कर मुझसे लिपट गई और फूट फूट कर रोने लगी।
मुझे उनके इस तरह फूट फूट कर रोने से बड़ा दुख हुआ। लेकिन मैने उन्हें रोने दिया। शायद ये उनके अंदर का गुबार था। जिसका बाहर निकल जाना बेहद ज़रूरी था। मैं उनके सिर पर बड़े प्यार व स्नेह भाव से हाॅथ फेरता रहा।
सहसा मुझे उनके साथ बिताए हुए कुछ खुशियों भरे पल याद आ गए। मैं,पवन और आशा दीदी हमेशा ऊधम मचाते थे इस घर में। माॅ हमारी शैतानियाॅ देख कर खुस्सा करती, हलाॅकि हम तीनों जानते थे कि हम तीनों का ये प्यार देख कर माॅ खुद भी अंदर ही अंदर खुश हुआ करती थी।
मगर प्रत्यक्ष में माॅ हमेशा दीदी को डाॅटने लगती। कहती कि वो तो हम दोनो से बड़ी है फिर क्यों हमारे साथ बच्ची बन जाती है। माॅ के डाॅटने से दीदी मुह फुला कर बैठ जाती। उसके बाद मैं और पवन उन्हें मनाने लगते। हम दोनो के पास उन्हें मनाने का बड़ा ही साधारण और खूबसूरत सा तरीका होता था। इस वक्त वही तरीका मेरे ज़हन में आया तो बरबस ही मेरे होठों पर मुस्कान उभर आई।
"दुनियाॅ में सबसे सुंदर कौन?" मैने दीदी को अपने से छुपकाए हुए ही प्यार से कहा।
"सिर्फ मैं।" मेरी बात सुनते ही दीदी को पहले तो झटका सा लगा फिर उसी हालत में बोल पड़ी थी।
"दुनियाॅ में सबसे प्यारी कौन?" मैने फिर से कहा।
"सिर्फ मैं।" दीदी ने लरजते स्वर में कहा।
"दुनियाॅ में सबसे चंचल कौन?" मैने पूछा।
"सिर्फ मैं।" दीदी ने भारी स्वर में कहा।
"दुनियाॅ में सबसे नटखट कौन?" मैने पूछा।
"सिर्फ मैं?" दीदी की आवाज़ लड़खड़ा गई।
"और दुनियाॅ में सबसे शैतान कौन?" मैने सहसा मुस्कुरा कर पूछा।
"सिर्फ मैं।" दीदी ने कहा तो मैं चौंक पड़ा। उन्हें खुद से अलग कर उनके चेहरे की तरफ बड़े ध्यान से देखा मैने।
आशा दीदी का दूध सा गोरा चेहरा ऑसुओं से तर था। नज़रें झुकी हुई थी उनकी। मैं हैरान इस बात पर हुआ था कि मेरे पूछने पर कि "दुनियाॅ में सबसे शैतान कौन" का जवाब भी उन्होंने यही दिया कि "सिर्फ मैं"। जबकि अक्सर यही होता था कि इस सवाल पर वो यही कहती कि शैतना तुम दोनो ही हो। मैं तो मासूम हूॅ। लेकिन आज उन्होंने खुद को ही शैतान कह दिया था।
"ये तो कमाल हो गया दीदी।" मैने मुस्कुराते हुए कहा___"आज आपने खुद को ही कह दिया कि आप ही सबसे शैतान हो। आज आपने ये नहीं कहा कि मैं और पवन ही सबसे ज्यादा शैतान हैं। आप तो मासूम ही हैं।"
"हाॅ तो क्या हुआ?" दीदी ने सहसा तुनक कर कहा___"आज मैं शैतान बन जाती हूॅ। तुम दोनो मासूम बन जाओ।"
मैं उनकी इस बात को सुन कर मुस्कुराया। दीदी ने ये बात बिलकुल वैसे ही अंदाज़ में कही थी जैसा अंदाज़ उनका आज से पहले हुआ करता था। दीदी को भी इस बात का एहसास हुआ और फिर एकाएक ही उनकी रुलाई फूट गई।
"अरे अब क्या हुआ दीदी?" मैने उनको अपने से छुपका कर कहा___"देखो अब रोना नहीं। मुझे बिलकुल पसंद नहीं कि आप मेरी इतनी प्यारी सी दीदी को बात बात पर इस तरह रुला दो। चलो अब जल्दी से रोना बंद करो और अपनी वही मनमोहक मुस्कान और नटखटपना दिखाओ मुझे ताकि मेरे मन को सुकून मिल जाए।"
"अब तू आ गया है न तो अब मैं नहीं रोऊॅगी राज।" आशा दीदी ने कहा___"तुझे पता है मैं तुझे कितना मिस करती थी। हम तीनो का वो बचपन जाने कहाॅ गुम हो गया था? तुम दोनो मेरे खिलौने थे जिनके साथ मैं हॅसती खेलती रहती थी।"
"मैं जानता हूॅ दीदी।" मैने उन्हें खुद से अलग करते हुए कहा___"मगर आप तो जानती हैं कि समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। समय के साथ साथ सब कुछ बदल जाता है।
ख़ैर, छोंड़िये ये सब और मुझसे वादा कीजिए कि अब से आप हमेशा खुश रहेंगी। अपने चेहरे पर वो उदासी और किसी भी तरह के दुख के भाव नहीं आने देंगी।"
"हम्म।" दीदी ने हाॅ में सिर हिलाया।
"अब बताइये आपको अपने इस भाई से क्या तोहफ़ा चाहिए?" मैने मुस्कुराते हुए पूछा।
"तू आ गया है मेरे पास।" दीदी ने मेरे चेहरे को अपने हाथ से सहला कर कहा___"इससे बड़ा तोहफ़ा मेरे लिए और क्या होगा?"
"पर मैं तो आपके लिए आपकी मनपसंद चीज़ लेकर ही आया हूॅ।" मैने कहा__"अब अगर आपको नहीं चाहिए तो ठीक है मैं उसे किसी और को दे दूॅगा।"
"ख़बरदार अगर किसी और को दिया तो।" दीदी ने ऑखें दिखाते हुए कहा___"ला दे मेरी चीज़ मुझे। वैसे क्या लेकर आया है राज?"
"सोचिये।" मैने मुस्कुराते हुए कहा___"क्या हो सकती है वो चीज़?"
मेरी ये बात सुनकर आशा दीदी सोच में पड़ गईं। मैने देखा कि इस वक्त उनके चेहरे पर वही चंचलता और वही बिंदासपन आ गया था। उनका चेहरा एकदम से अब खिला खिला लग रहा था।
"सोच लिया मैने।" आशा दीदी एकदम से उछलते हुए बोली___"कि तू मेरे लिए कौन सी चीज़ लेकर आया है?"
"अच्छा तो बताइये।" मैने हॅस कर कहा__"ज़रा मैं भी तो जानूॅ कि आपने क्या सोच लिया है?"
"तू न मेरे लिए।" आशा दीदी ने धीरे धीरे और आराम आराम से कहना शुरू किया__"तू न मेरे लिए......एक प्यारी सी, सुंदर सी सोने की घड़ी लेकर आया है। जिसे मैं अपने इस हाॅथ में पहनूॅगी। अब बता बच्चू, मैंने सही कहा न? हाॅ...बोल बोल।"
मैं दीदी की इस बात पर और उनके इस अंदाज़ पर मुस्कुरा उठा। उन्होने जो कहा वो यकीनन सच ही तो था। मैं उनके लिए एक सोने की घड़ी लेकर ही आया था। मुझे याद है जब वो मेरे हाथ की कलाई में एक आम सी घड़ी देखती तो यही कहती कि__"अरे ये तो मामूली सी घड़ी है बेटा, आशा रानी तो अपने हाॅथ में सोने की घड़ी पहनेगी एक दिन। देख लेना। वरना सारी उमर घड़ी ही नहीं पहनेगी। मैं और पवन उनकी इस बात पर अक्सर हॅसने लगते। हमारे हॅसने पर उन्हें लगता कि हम दोनो उनका मज़ाक उड़ा रहे हैं। इस लिए वो मुह फुला कर एक तरफ बैठ जाती। उसके बाद हम दोनो फिर से उन्हें उसी तरीके से मनाने लगते और वो खुश हो जाती। ऐसी थी आशा दीदी। वो हम लोगों से उमर में तीन चार साल बड़ी थी मगर हमारे साथ वो हमसे भी छोटी बन जाती थी।
ये सब सोच कर सहसा मेरी ऑखों से ऑसू छलक पड़े। आशा दीदी ने मेरी ऑखों से छलके ऑसूॅ को देखा तो। उन्होंने मुझे खुद से छुपका लिया।
"ओये ये क्या है अब?" फिर उन्होंने कहा__"अभी तक तो बड़ा मुजसे कह रहा था कि अब से मैं खुद को न रुलाऊॅ और अब तू क्यों रोने लगा? चल रोना नहीं वरना मैं भी रो दूॅगी।"
"ये तो खुशी के ऑसू हैं दीदी।" मैं उनसे अलग होते हुए बोला___"कुछ यादें ऐसी होती हैं जिनके याद आने से बरबस ही ऑखें छलक पड़ती हैं। ख़ैर, ये लीजिए आपकी घड़ी।
देख लीजिए सोने की ही है न?"
"मुझे पता है कि मेरा भाई मेरी कलाई में सोने के अलावा कोई और घड़ी नहीं पहनाएगा।" दीदी ने कहा मुस्कुराकर कहा___"उसे पता है कि मैने क्या प्रण किया था?"
"आपने सही कहा दीदी।" मैने कहा__"मैं आपके प्रण को कैसे भुला सकता हूॅ? जब मैं वहाॅ से चलने वाला था तो मुझे आपकी याद आई और फिर सबकुछ याद आया। इस लिए मैं गया और ज्वैलरी की दुकान से आपके लिए ये घड़ी खरीद लाया।"
मेरी बात से दीदी मुस्कुरा दी और फिर उस पैकिट को खोलने लगी जिसमें मैं उनके लिए घड़ी लेकर आया था। कुछ ही देर में पैकेट खोल कर उन्होने उस घड़ी को निकाल कर देखा। वो सचमुच सोने की ही घड़ी थी। घड़ी देख कर दीदी की ऑखें फिर से भर आईं।
"राज, आज मैं बहुत खुश हूॅ।" फिर उन्होने कहा___"इस लिए नहीं कि तू घड़ी लेकर आया है बल्कि इस लिए कि तू यहाॅ आया और तुझे अपनी दीदी के प्रण का ख़याल था। मुझे खुशी है कि तेरे जैसा लड़का मेरा भाई है।"
"मुझे भी तो खुशी है दीदी।" मैने कहा__"कि आप मेरी सबसे प्यारी बहन हो। आपको मैं गुड़िया(निधी) की तरह ही प्यार करता हूॅ।"
"हाॅ ये मैं जानती हूॅ।" दीदी ने मुस्कुरा कर कहा___"अच्छा राज, इस घड़ी को तू ही पहना दे न मुझे।"
"ठीक है दीदी।" मैने कहा___"जैसी आपकी इच्छा।"
मैने उनके हाॅथ से घड़ी ल। दीदी ने अपने बाएॅ हाथ की कलाई मेरी तरफ बढ़ा दी। मैने उनकी खूबसूरत कलाई पर उस घड़ी को डाल कर पहना दी। ये देख कर आशा दीदी खुश हो गई और एकदम से मुझसे लिपट गई।
"कितनी अच्छी लग रही है न राज?" वो खुशी से मानो चहकती हुई बोली___"अच्छा ये बता कि इसके अंदर पानी तो नहीं जाएगा न?"
"नहीं जाएगा दीदी।" मैने मुस्कुरा कर कहा___"ये फुल वाटरप्रूफ है।"
"फिर ठीक है।" दीदी ने मुझसे अलग होकर कहा___"अब न मैं इसे कभी भी अपनी कलाई से नहीं उतारूॅगी।"
"ठीक है दीदी।" मैने कहा___"जैसी आपकी मर्ज़ी। अच्छा दीदी अब मैं चलता हूॅ और हाॅ याद है न....अब से आप खुद को उदास या दुखी नहीं रखेंगी।"
"हाॅ हाॅ याद है बाबा।" दीदी ने हॅस कर कहा___"और अब तो मेरे भाई ने मेरी पसंद की चीज़ भी दे दी। फिर किस लिए खुद को उदास या दुखी रखना?"
"ये हुई न बात।" मैने दीदी के माथे पर हल्के से चूमा और फिर पलट कर वापस दरवाजे की तरफ चल दिया। अभी मैं दो ही क़दम दरवाजे की तरफ बढ़ा था कि मेरी नज़र दरवाजे पर खड़े पवन और माॅ पर पड़ी। मैं उन्हें देख कर पहले तो चौंका फिर हौले से मुस्कुरा दिया। दरवाजे बाहर आकर मैने दरवाजे के दोनो पाटों को आपस में सटा कर चल दिया।
मेरे पीछे पीछे पवन और माॅ भी आने लगे। माॅ के कमरे में आकर मैं एक जगह बैठ गया।
"तो बहन को खुश कर दिया उसके भाई ने?" माॅ ने ऑखों से अपने ऑसू पोंछते हुए कहा___"आज काफी समय बाद उसे इतना खुश और चहकते हुए देखा है मैने।"
"अब से वो हमेशा खुश ही रहेंगी माॅ।
" मैने कहा___"और हाॅ बहुत जल्द मैं उनके लिए एक अच्छा सा रिश्ता तलाश करूॅगा। उनकी शादी एक ऐसे घर में और एक ऐसे लड़के से करूॅगा जो उन्हें दुनियाॅ की हर खुशी देगा।"
"अब मुझे उसकी शादी की चिंता नहीं है बेटे।" माॅ ने कहा___"उसका भाई आ गया है तो अब सब वहीं सम्हालेगा।"
मैने पवन की तरफ देखा वो अपनी ऑखों में ऑसू लिये एक तरफ खड़ा था। मैं उसके पास जाकर उससे बोला___"तूने मुझे बुला कर बहुत अच्छा किया है भाई। मगर आज जो कुछ भी रास्ते में हुआ है उस सबसे बहुत जल्द एक नई मुसीबत सामने आने वाली है। बड़े पापा को पता लगाने में ज्यादा समय नहीं लगेगा कि वो सब किसने किया उनके आदमियों के साथ? वो ये भी पता कर लेंगे कि मैं यहाॅ किसके यहाॅ रुका हुआ हूॅ। इस लिए अब तुम ये भी समझ लो कि इस घर में रहते हुए तुममें से कोई भी सुरक्षित नहीं है।"
"ये तुम क्या कह रहे हो बेटा?" माॅ ने चकित भाव से कहा___"क्या हुआ है आज रास्ते में?"
मैने माॅ को संक्षेप में सबकुछ बता दिया। मेरी बात सुन कर माॅ सकते में आ गई। उनके चेहरे पर एकदम से डर व भय के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे।
"ये तो बहुत बड़ा अनर्थ हो गया है बेटा।" माॅ ने सहमे हुए लहजे में कहा___"तुमने अजय सिंह के आदमियों को मार कर अच्छा नहीं किया। अजय सिंह इस सबका बदला ज़रूर लेगा।"
"ये तो होना ही था माॅ।" मैने कहा___"आप खुद सोचिए कि अगर मैं और आदित्य ये सब नहीं करते तो उनके आदमी हमें अपने साथ ले जाकर बड़े पापा के हवाले कर देते। उस सूरत में बड़े पापा हमारे साथ क्या करते इसका अंदाज़ा आप नहीं लगा सकती माॅ। वो मुझे बंधक बना कर मुझसे ज़बरदस्ती मेरी माॅ बहन और अभय चाचा को मुम्बई से यहाॅ बुलवा लेते। उसके बाद क्या होता ये आप सोच कर देखिये।"
"राज सही कह रहा है माॅ।" पवन ने कहा__"रास्ते में इसके बड़े पापा के आदमी इसे पकड़ने के लिए ही आए थे और अगर वो लोग इसे पकड़ कर ले जाते तो सचमुच बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता। इस लिए अजय चाचा के आदमियों को मारने के सिवा दूसरा कोई रास्ता ही नहीं था इसके पास।"
"पर इसने अजय सिंह के उतने सारे आदमियों को कैसे खत्म कर दिया?" माॅ के चेहरे पर हैरत के भाव थे।
"आपको नहीं पता माॅ।" पवन कह रहा था___"इसने और आदित्य ने पाॅच मिनट में उन सबका काम तमाम कर दिया था। मैने वो सब अपनी ऑखों से देखा था। मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि ये वही राज है जो इतना शान्त और भोला भाला हुआ करता था।"
"ये सब छोड़ो।" मैने कहा___"मैं ये कह रहा हूॅ कि बड़े पापा को इस बात का पता बहुत जल्द चल जाएगा कि मैं यहाॅ पवन के घर में रुका हुआ हूॅ। इस लिए वो आप सबको भी अपना दुश्मन समझ लेंगे और आप लोगों के साथ कुछ भी बुरा कर सकते हैं। अतः अब आप लोगों का यहाॅ रहना किसी भी तरह से ठीक नहीं है।"
"बात तो तुम्हारी ठीक ही है भाई।
" पवन ने कहा___"लेकिन हम तेरे बड़े पापा के डर से अपना ये घर छोंड़ कर भला कहाॅ जाएॅगे?"
"मुम्बई।" मैने कहा___"हाॅ पवन। अब आप लोगों का यहाॅ रहना खतरे से खाली नहीं है। इस लिए अब आप लोग मेरे साथ मुम्बई चलोगे। तुम्हें पता है, अभय चाचा ने भी मुझे कुरुणा चाची और उनके बच्चों को मुम्बई ले आने को कहा है। क्योंकि उन्हें भी पता है कि करुणा चाची और दिव्या व शगुन सुरक्षित नहीं हैं।"
"लेकिन बेटा।" माॅ ने झिझकते हुए कहा___"हम सब वहाॅ तेरे लिए बोझ बन जाएॅगे। इतने सारे लोग वहाॅ कैसे रह पाएॅगे?"
"ये कह कर आपने मुझे पराया कर दिया माॅ।" मैने दुखी भाव से कहा___"भला आप ऐसा कैसे सोच सकती हैं कि मेरे लिए आप लोग बोझ बन जाएॅगे?"
माॅ को अपनी ग़लती का एहसास हुआ इस लिए उन्होंने मुझे अपने गले से लगा कर कहा___"मेरा वो मतलब नहीं था बेटा। मैं तो बस ये कहना चाहती थी कि वहाॅ पर हम सब इतने सारे लोग कैसे रहेंगे?"
"आप इस बात की फिक्र मत कीजिए माॅ।" मैने कहा___"मुम्बई में जहाॅ मैं रहता हूॅ वो एक बहुत बड़ा बॅगला है। वहाॅ पर सौ आदमी भी रहेंगे न तब भी जगह बच जाएगी।"
"क्या????" माॅ ने हैरानी से कहा___"क्या इतना बड़ा गर है वहाॅ?"
"हाॅ माॅ।" मैने कहा__"इसी लिए तो कह रहा हूॅ कि आप रहने की चिंता मत कीजिए। बस यहाॅ से फौरन चलने की तैयारी कीजिए। आप सब अपना ज़रूरी सामान ले लीजिए, और चलने के लिए तैयार हो जाइये जल्दी।"
"क्या हम आज ही यहाॅ से चल देंगे?" सहसा पवन ने कुछ सोचते हुए कहा था।
"जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी हमें से निकल लेना चाहिए भाई।" मैने कहा__"यहाॅ ज्यादा समय तक रुकना ठीक नहीं है।"
"ठीक है भाई।" पवन ने कहा___"पर हम यहाॅ से इतने सारे सामान को लेकर जाएॅगे कैसे?"
"तू किसी भी तरह से किसी ऐसे वाहन का इंतजाम कर जिसमे सारा सामान भी आ जाए और हम सब उसमें आराम से बैठ भी जाएॅ।" मैने कहा___"और ये काम तुझे बहुत जल्द करना है।"
"ठीक है भाई।" पवन ने कहा___"मैं कोशिश करता हूॅ ऐसे किसी वाहन को लाने की।"
ये कह कर पवन कमरे से बाहर चला गया। उसके जाने के बाद मैने माॅ से कहा कि वो भी अपना सब ज़रूरी सामान इकट्ठा करके उसे पैक कर लें। मेरे कहने पर माॅ ने हाॅ में सिर हिलाया और कमरे से बाहर चली गईं। मैं भी बाहर आकर बैठक की तरफ बढ़ गया।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर हास्पिटल में एकाएक ही रितू का मोबाइल बजा। उसने मोबाइल को पाकेट से निकाल कर देखा। स्क्रीन पर पवन लिखा आ रहा था। ये देख कर रितू के होठों पर हल्की सी मुस्कान आ गई। वो मोबाइल को लिए विधी के पास से उठ कर बाहर की तरफ आ गई। फिर मोबाइल पर आ रही काल को रिसीव कर कानो से लगा लिया उसने।
"हाॅ भाई बोलो।" फिर उसने कहा__"सब रेडी है न?"
".............।" उधर से पवन ने कुछ कहा।
"ये तुम क्या कह रहे हो पवन?" रितू ने बुरी तरह चौंकते हुए कहा___"तुम सब लोग राज के साथ मुम्बई जाने वाले हो?"
"............।" उधर से पवन फिर कुछ कहा।
"हाॅ मुझे पता चल गया उस बारे में।" रितू ने कहा___"मेरे आदमियों ने फोन पर बताया है सब कुछ। ये भी बताया कि उन लोगों ने डैड के आदमियों को ठिकाने लगा दिया है। राज और उसके दोस्त ने सबको खत्म कर दिया था। अगर उन दोनो के बस का न होता तो मेरे वो पुलिस के आदमी उन सबको गोलियों से भून कर रख देते। मेरा उनके लिए यही आदेश था। ख़ैर, सबसे अच्छी बात यही हुई कि तुम लोग सकुशल घर गए। लेकिन खतरा अभी टला नहीं है पवन। डैड अपने आदमियों की खोज ख़बर लेने ज़रूर इधर उधर जाएॅगे। राज ने सही फैसला लिया है तुम लोगों को अपने साथ ले जाने का। मगर उसका क्या होगा जिसके लिए मैने राज की तुम्हारे द्वारा बुलवाया था?"
"............।" उधर से पवन ने कुछ कहा।
"अरे मैं तो चाहती ही हूॅ भाई।" रितू ने ज़ोर दे कर कहा___"तुम एक काम करो, राज की लेकर यहाॅ आ जाओ। मैं तुम लोगों को यहाॅ से सुरक्षित जाने का बंदोबस्त कर दूॅगी।"
"............।" उधर से पवन ने फिर कुछ कहा।
"हाॅ ठीक है।" रितू ने कहा___"तुम उसे लेकर आओ। मैं अभी किसी वाहन का इंतजाम करती हूॅ। तुम किसी भी प्रकार की चिंता मत करो। बस उसे लेकर आ जाओ। यहाॅ मैने उसकी सुरक्षा का सारा इंतजाम किया हुआ है। रास्तों पर भी पुलिस के आदमी सादे कपड़ों में मौजूद हैं।"
".........।" उधर से पवन ने कुछ कहा।
"तुम बेफिकर रहो भाई।" रितू ने कहा___"उसे कुछ नहीं होने दूॅगी मैं। अपनी जान पर खेलकर भी मैं उसकी हिफाज़त करूॅगी। यहाॅ आने के बाद जो कुछ भी होगा उसकी देखभाल भी मैं कर लूॅगी। तुम बस उसे लेकर आ जाओ। अब इंतज़ार नहीं होता मेरे भाई। जबसे तुमने बताया है कि राज आ गया है तब से उससे मिलने के पागल हुई जा रही हूॅ मैं। दिल तो करता है कि अभी भाग कर तुम्हारे घर आ जाऊॅ और अपने भाई को अपने सीने से लगा कर खूब रोऊॅ। मगर, उससे मिलने का सबसे पहला हक़ विधी का है मेरे भाई। मैने उसे वचन दिया है कि मैं उसके महबूब से उसे मिलाऊॅगी। इस लिए भाई, जल्दी से उसे लेकर आजा। मेरे वचन की लाज रख ले। विधी को उसके महबूब से मिला दे जल्दी।"
".........।" उधर से पवन ने कुच कहा।
"ठीक है भाई जल्दी आना।" रितू ने कहा और फिर फोन कट कर दिया। उसकी ऑखों में ऑसू भर आए थे। फोन को पाॅकेट में डालने के बाद वह वापस गैलरी की तरफ चल पड़ी। रास्ते मे एक तरफ उसे श्री कृष्ण का छोटा सा मंदिर दिखा तो वह उसी तरफ बढ़ गई। मंदिर के पास पहुॅच कर वह घुटनों के बल बैठ गई।
"हे कृष्णा अब सब कुछ आपके ही हवाले है।" रितू ने ऑखों में ऑसू लिए तथा दोनो हाॅथ जोड़े कहा___"सब कुछ ठीक कर देना कान्हा। मेरा भाई जब विधी से मिले तो उसकी हालत को देख कर वो खुद को सम्हाल सके। उसके दिल को मजबूत बनाए रखना कन्हैया। वो अपनी प्रेयसी से मिलने आ रहा है। उसे हर दुख दर्द सहने की शक्ति देना कृष्णा। मेरा भाई भी इस वक्त कृष्ण ही है जो अपनी राधा से मिलने आ रहा है।
"
इतना कहने के बाद रितू उठी और कृष्ण की मूर्ती के पास थाली में रखे फूलों से कुछ फूल उठा कर कृष्ण के चरणों में अर्पण कर दिया।
"सब कुछ तुम ही तो करते हो कन्हैया। इस संसार में सब कुछ तुम्हारे ही इशारे से हो रहा है।" रितू ने कहा___"ये भी कि मेरा भाई जिसे टूट कर प्रेम करता है उस लड़की को ब्लड कैंसर के लास्ट स्टेज पर पहुॅचा दिया आपने। ये कैसी लीला है कृष्णा? लोग कहते हैं कि जो कुछ भी तुम करते हो वो सब अच्छे के लिए ही करते हो, तो बताओ मुझे कि ऐसा करके कौन सा अच्छा कर रहे हो तुम? लेकिन ख़ैर कोई बात नहीं। मैं तुमसे यहाॅ इस सबकी शिकायत नहीं कर रही हूॅ। हाॅ इतनी विनती ज़रूर कर रही हूॅ कि मेरे भाई को कभी कुछ न हो। वो यहाॅ आए तो विधी की हालत देख कर वो खुद को सम्हाल सके। बस यही प्रार्थना करती हूॅ तुमसे।"
इतना कहने के बाद रितू अपने ऑसू पोंछते हुए कृष्णा को प्रणाम कर विधी के कमरे की तरफ बढ़ गई। उसका मन बहुत भारी हो गया था। रह रह कर उसके मन में आने वाले वक्त के प्रति घबराहट सी बढ़ती जा रही थी।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर घर में पवन मुझे लिए बाहर आया। मैने देखा कि बाहर एक मोटर साइकिल खड़ी थी। पवन ने मुझसे कहा कि मैं अपने चेहरे को रुमाल से ढॅक लूॅ। मैं उसकी बात सुन कर चौंका। उससे पूछा कि कहाॅ जा रहे हैं हम मगर उसने मुझे कुछ न बताया। बल्कि मोटर साइकिल में बैठ कर से स्टार्ट किया और मुझे पीछे बैठने को कहा। मैं उसकी इस आनन फानन वाली क्रिया से हैरान था। बड़ा अजीब सा ब्यौहार कर रहा था वो।
ख़ैर, उसके बार बार ज़ोर देने पर मैं उसके पीछे मोटर साइकिल पर बैठ गया। आदित्य दरवाजे पर खड़ा हैरानी से ये सब देख रहा था। उसने भी कई बार पवन से पूछा कि वो मुझे लेकर कहाॅ जा रहा है मगर पवन ने कुछ न बताया। बल्कि उससे यही कहा कि वो यहीं रहे, हम थोड़ी देर में आते हैं। आदित्य बेचारा हैरानी से देखता रह गया था उसे। माॅ और आशा दीदी अंदर सामान पैक करने में लगी हुईं थी। उन्हें इस सबका कुछ पता ही नहीं था। आशा दीदी को जब पता चला कि वो सब लोग मेरे साथ मुम्बई चल रहे हैं तो वो बड़ा खुश हुई थी।
इधर मेरे बैठते ही पवन ने मोटर साइकिल को आगे बढ़ा दिया। जहाॅ तक मुझे पता था पवन के पास कोई साइकिल तक नहीं थी, इसका मतलब वो ये मोटर साइकिल किसी जान पहचान वाले से माॅग कर ही लाया था।
"अब तो बता दे मेरे बाप कि हम कहाॅ जा रहे हैं?" रास्ते में मैने ये बात पवन से खीझते हुए कही थी, बोला___"साले तूने इस सवाल पर ऐसे अपना मुह बंद कर रखा है जैसे अगर तू बता देगा तो क़यामत आ जाएगी।"
"ऐसा ही समझ ले तू।" पवन ने कहा__"अब चुपचाप बैठा रह। कितना बोलने लगा है तू आजकल?"
"क्या कहा तूने?" मैने हैरत से देखते हुए उसे पीछे से उसकी पीठ पर हल्के से मुक्का मारा, फिर बोला___"मैं बहुत बोलने लगा हूॅ। हाॅ, और तू जैसे मौनी बाबा ही बन गया है न।
"
पवन मेरी इस बात पर मुस्कुरा कर रह गया। मगर सिर्फ एक पल के लिए। अगले ही पल उसके चेहरे पर संजीदगी के भाव नुमायाॅ हो गए। जैसे उसे कोई बात याद आ गई हो। मैने एक बात नोट की थी कि वो जब से मुझे मिला था तब से मैने उसे संजीदा ही देखा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इसकी क्या वजह थी। मुझे याद आया कि उसने मुझे सीघ्र मुम्बई से आने के लिए कहा था। इसका मतलब ये मुझे उसी काम से लिए जा रहा है। लेकिन आख़िर किस काम से? साला दिमाग़ का दही हो गया मगर मुझे कोई वजह समझ में नहीं आई।
लगभग दस मिनट बाद पवन ने जिस जगह पर मोटर साइकिल रोंकी उस जगह को देख कर मैं चौंका तो ज़रूर मगर मुझे समझ में न आया कि पवन मुझे हास्पिटल लेकर क्यों आया है? सहसा मेरे ज़हन में एक बार फिर करुणा चाची और उनके बच्चों का चेहरा नाच गया। मन में सवाल उभरा कि क्या करुणा चाची या उनके बच्चों में से किसी को कुछ हो गया था जो वो यहाॅ हास्पिटल में शायद एडमिट हैं? मगर इस बात को मुझसे छिपाने की भला क्या ज़रूरत थी?
मोटर साइकिल के खड़े होते ही मैं उतर गया। मेरे बाद पवन भी उतर गया और मोटर साइकिल को स्टैण्ड पर खड़ा कर वो मेरी तरफ देखा और बोला____"तू यहीं रुक मैं आता हूॅ दो मिनट में।"
"अरे अब कहाॅ जा रहा है तू मुझे यहाॅ पर अकेला छोंड़ कर?" मैंने हैरानी से पूछा।
"मैने कहा न यहीं रुक।" पवन ने शख्ती से कहा___"मैं आता हूॅ अभी।"
ये तो हद ही हो गई। पवन ने मुझे शख्ती से रुकने को कहा था। मेरा दिमाग़ घूम गया। ये साला हो क्या रहा है? मैने देखा कि पवन हास्पिटल की सीढ़ियाॅ चढ़ कर ऊपर वाली सीढ़ी के पास जाकर रुक गया। उसके बाद उसने अपने पैन्ट की जेब से मोबाइल निकाल कर उससे किसी को फोन किया। मोबाइल को कान से लगा कर उसने सामने वाले से जाने क्या बात की। एक मिनट भी नहीं लगे उसे बात खत्म करने में। मोबाइल को पुनः जेब के हवाले कर उसने मेरी तरफ देखा और मुझे अपनी तरफ आने का हाथ से इशारा किया।
उसके इस इशारे पर मैं फिर चौंका। मगर कर भी क्या सकता था? मैं अपने मन में हज़ारों तरह के विचार लिए उसकी तरफ बढ़ने लगा। कुछ ही देर में सीढ़ियाॅ चढ़ कर उसके पास पहुॅच गया।
"साला इतना ज्यादा सस्पेन्स तो किसी जासूसी उपन्यास में भी मैने नहीं देखा जितना तू क्रियेट कर रखा है।" ऊपर उसके पास पहुॅचते ही मैने कहा उससे___"मेरे दिमाग़ का कचूमर निकाल दिया तूने कसम से। अच्छा है तू किसी जासूसी उपन्यास का राइटर नहीं बन गया। वरना पाठकों के दिमाग़ की नसें ही फट जाती।"
"ज्यादा बकवास न कर।" मेरी बात पर पवन ने भावहीन स्वर में कहा___"और अब चल मेरे साथ।"
"जो हुकुम माई बाप।" मैने अदब से सिर को झुकाते हुए कहा और चल दिया उसके पीछे।
पवन के पीछे चलते हुए मैं हास्पिटल के अंदर की तरफ आ गया। मेरा मन अंजानी आशंका के चलते ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था।
पता नहीं क्यों पर मैं मन ही मन भगवान से दुवा कर रहा था कि यहा हर कोई ठीक ही हो। ख़ैर, पवन के साथ चलते हुए मैने देखा कि पवन एक कमरे के सामने आकर रुक गया।
कमरे के दरवाजे के पास रुक कर पवन ने कुछ पल कुछ सोचा फिर मेरी तरफ पलट कर कहा___"तू जानना चाहता था न कि मैने तुझे इतना जल्दी यहाॅ आने के लिए क्यों कहा था?"
"वो तो मैं तुझसे कब से पूछ रहा हूॅ?" मैने उससे कहा___"मगर तू बता ही नहीं रहा था।"
"बताने की ज़रूरत नहीं है मेरे यार।" सहसा पवन की आवाज़ भर्रा गई, बोला___"तू इस कमरे में जा और सब कुछ अपनी ऑखों से देख सुन ले। लेकिन उससे पहले तू मुझसे वादा कर कि अंदर सब कुछ देखने सुनने के बाद तू खुद को सम्हाल कर रखेगा।"
"इस बात का क्या मतलब हुआ?" मैंने सहसा चौंकते हुए कहा___"ऐसा क्या है अंदर कि मुझे उसे देख कर खुद को सम्हालना पड़ेगा?"
"अब जा तू।" पवन ने कहने के साथ ही मुह फेर लिया मुझसे, दो चार क़दम चलने के बाद मेरी तरफ पलट कर बोला___"मैं बाहर ही तेरा इन्तज़ार करूॅगा।"
बस इसके बाद वो एक पल के लिए भी नहीं रुका। बल्कि तेज़ तेज़ क़दम बढ़ाते हुए बाहर की तरफ चला गया। मुझे कुछ समझ न आया कि ये सब क्या चल रहा है यहाॅ? पवन जब मेरी नज़रों से ओझल हो गया तो मैं उस कमरे के दरवाजे की तरफ पलटा जिस कमरे के अंदर जाने के लिए पवन ने मुझसे कहा था।
कुछ पल तक मैं उस दरवाजे को घूरता रहा। मेरा दिल अनायास ही बड़ी तेज़ी से धड़कने लगा था। मन में तरह तरह के ख़याल उछल कूद मचाने लगे थे। मैने अपने हाॅथों को दरवाजे की तरफ बढ़ाया। मैने देखा मेरे वो हाॅथ काॅप रहे थे। पता नहीं मगर, इन कुछ ही पलों में मेरी अजीब सी हालत हो गई थी। ख़ैर, मैने दरवाजे पर हाॅथ रख कर उसे अंदर की तरफ आहिस्ता से धकेला तो दरवाजा बेआवाज़ खुलता चला गया।
खुल चुके दरवाजे अंदर की तरफ मेरी नज़र पड़ी तो सामने दीवार के पास एक टेबल रखा दिखा मुझे जिस पर कुछ दवाइयाॅ और कुछ पेपर जैसे रखे हुए थे। बाॅकी कुछ न दिखा मुझे। मेरे मन में सवाल उभरा कि इस कमरे में ऐसा क्या है जिसे देखने के लिए कदाचित पवन ने मुझे अंदर जाने को कहा था?
अपने मन में उठे सवाल की खोज के लिए मैंने दरवाजे के अंदर की तरफ अपने क़दम बढ़ाए। दो ही क़दमों में मैं कमरे के अंदर दाखिल हो गया। अंदर आकर मैने इधर उधर देखा तो दाहिनी तरफ एक बेड दिखा जिस पर कोई पड़ा हुआ था। बेड के बगल से ही दो सोफा सेट रखे हुए थे किन्तु उन पर कोई बैठा हुआ नज़र न आया मुझे। बाॅकी पूरा कमरा खाली था। ये देख कर मेरा दिमाग़ हैंग सा हो गया। कुछ समझ न आया कि यहाॅ मुझे क्या दिखाने के लिए पवन ने भेजा है?
बेड पर पड़े हुए ब्यक्ति पर मेरी नज़र पुनः पड़ी।
उसका चेहरा दूसरी तरफ था इस लिए मैं जान न सका बेड पर कौन पड़ा हुआ है? किन्तु इतना ज़रूर अब समझ आ गया था कि शायद बेड पर पड़े हुए इंसान को देखने के लिए ही मुझे पवन ने यहाॅ भेजा है। अतः मैं धड़कते हुए दिल के साथ बेड की तरफ बढ़ा।
कुछ ही क़दमों में मैं बेड के समीप पहुॅच गया। किन्तु बेड पर पड़े हुए ब्यक्ति का चेहरा दूसरी तरफ था इस लिए मैं इस तरफ से चलते हुए उस तरफ उस ब्यक्ति के चेहरे की तरफ बढ़ गया। मैने महसूस किया कि कमरे हीं नहीं बल्कि पूरे हास्पिटल में सन्नाटा छाया हुआ था। ऐसा सन्नाटा कि अगर कहीं सुई भी गिरे तो उसके गिरने की आवाज़ किसी बम के धमाके से कम न सुनाई दे।
बेड पर पड़े ब्यक्ति के चेहरे की तरफ आकर मेरी नज़र जिस चेहरे पर पड़ी उसे देख कर मैं बुरी तरह उछल पड़ा। हैरत और आश्चर्य से मेरी ऑखें फट पड़ीं। किन्तु फिर जैसे एकदम से मुझे होश आया और मेरी ऑखों के सामने मेरा गुज़रा हुआ वो कल घूमने लगा जिसमें मैं था एक विधी नाम की लड़की थी और उस लड़की के साथ शामिल मेरा प्यार था। फिर एकाएक ही तस्वीर बदली और उस तस्वीर में उसी विधी नाम की लड़की का धोखा था, उसकी बेवफाई थी। उसी तस्वीर में मेरा वो रोना था वो चीखना चिल्लाना था और नफ़रत मेरी थी। ये सब चीज़ें मेरी ऑखों के सामने कई बार तेज़ी से घूमती चली गई।
मेरे चेहरे के भाव बड़ी तेज़ी से बदले। दुख दर्द और नफ़रत के भाव एक साथ आकर ठहर गए। ऑखों में ऑसूॅ भर आए मगर मैने उन्हें शख्ती से ऑखों में ही जज़्ब कर लिया। दिल में एक तेज़ गुबार सा उठा और उस गुबार के साथ ही मेरी ऑखों में चिंगारियाॅ सी जलने बुझने लगीं।
मेरे दिल की धड़कने और मेरी साॅसें तेज़ तेज़ चलने लगी थी। मेरे मुख से कोई अल्फाज़ नहीं निकल रहे थे। किन्तु ये सच है कि कुछ कहने के लिए मेरे होंठ फड़फड़ा रहे थे। मुझे ऐसा लग रहा था कि या तो मैं खुद को कुछ कर लूॅ या फिर बेड पर ऑखें बंद किये आराम से पड़ी इस लड़की को खत्म कर दूॅ। किन्तु जाने कैसे मैं कुछ कर नहीं पा रहा था।
अभी मैं अपनी इस हालत से जूझ ही रहा था कि सहसा बेड पर आराम से करवॅट लिए पड़ी उस बला ने अपनी ऑखें खोली जिस बला को मैने टूट टूट कर चाहा था।
दोस्तो, अपडेट हाज़िर है,,,,,,,,,
आज के लिए इतना ही। मैं जानता हूॅ कि आप इस आख़िरी सीन से आगे भी पढ़ना चाहेंगे और इस चैप्टर को खत्म हो जाने की आशा करते हैं। किन्तु दोस्तो, यकीन मानिए आज मैने इस अपडेट को तैयार करने में सारा दिन लगा दिया। बीच बीच में मुझे काम की वजह से रुकना भी पड़ा। लेकिन चूॅकि मैने आपसे कहा था कि आज अपडेट ज़रूर दूॅगा इस लिए इतना ही लिख कर आपके सामने हाज़िर कर देना चाहता हूॅ।
अपने अंदर की एक बात आपसे शेयर कर रहा हूॅ, वो ये कि ऐसे सीन लिखने में दिलो दिमाग़ की हालत ख़राब हो जाती है। आज तो इतने में ही हालत ख़राब हो गई मेरी।
अभी इसके आगे का आप खुद अंदाज़ा लगाइये कि क्या होगा????
हर बात को और हर चीज़ को बारीकी से लिखना मुझे अच्छा लगता है। अपडेट लिखने से पहले मुझे ये ज़रूर लगा करता है कि यार अब इससे आगे कैसे लिखूॅ?? लेकिन जब लिखना शुरू करता हूॅ तो हर चीज़ खुद ही आसान होती चली जाती है। कदाचित इसका कारण ये हो सकता है कि राइटर उस माहौल में डूब जाता है। उसे लगने लगता है कि ये सब उसके साथ ही हो रहा है।
मुझे ये बात समझ आ गई है दोस्तो कि कोई भी चीज़ नामुमकिन नहीं होती। मेरे लिए हर अपडेट को लिखना किसी चैलेंज से कम नहीं होता मगर आप सबके प्यार और सहयोग से हर चैलेंज को मैंने कबूल किया है और उस पर फतह हाॅसिल की है।
अगले अपडेट में इस चैप्टर को खत्म कर दूॅगा दोस्तो।
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट........《 45 》
अब तक,,,,,,,,,
बेड पर पड़े ब्यक्ति के चेहरे की तरफ आकर मेरी नज़र जिस चेहरे पर पड़ी उसे देख कर मैं बुरी तरह उछल पड़ा। हैरत और आश्चर्य से मेरी ऑखें फट पड़ीं। किन्तु फिर जैसे एकदम से मुझे होश आया और मेरी ऑखों के सामने मेरा गुज़रा हुआ वो कल घूमने लगा जिसमें मैं था एक विधी नाम की लड़की थी और उस लड़की के साथ शामिल मेरा प्यार था। फिर एकाएक ही तस्वीर बदली और उस तस्वीर में उसी विधी नाम की लड़की का धोखा था, उसकी बेवफाई थी। उसी तस्वीर में मेरा वो रोना था वो चीखना चिल्लाना था और नफ़रत मेरी थी। ये सब चीज़ें मेरी ऑखों के सामने कई बार तेज़ी से घूमती चली गई।
मेरे चेहरे के भाव बड़ी तेज़ी से बदले। दुख दर्द और नफ़रत के भाव एक साथ आकर ठहर गए। ऑखों में ऑसूॅ भर आए मगर मैने उन्हें शख्ती से ऑखों में ही जज़्ब कर लिया। दिल में एक तेज़ गुबार सा उठा और उस गुबार के साथ ही मेरी ऑखों में चिंगारियाॅ सी जलने बुझने लगीं।
मेरे दिल की धड़कने और मेरी साॅसें तेज़ तेज़ चलने लगी थी। मेरे मुख से कोई अल्फाज़ नहीं निकल रहे थे। किन्तु ये सच है कि कुछ कहने के लिए मेरे होंठ फड़फड़ा रहे थे। मुझे ऐसा लग रहा था कि या तो मैं खुद को कुछ कर लूॅ या फिर बेड पर ऑखें बंद किये आराम से पड़ी इस लड़की को खत्म कर दूॅ। किन्तु जाने कैसे मैं कुछ कर नहीं पा रहा था।
अभी मैं अपनी इस हालत से जूझ ही रहा था कि सहसा बेड पर आराम से करवॅट लिए पड़ी उस बला ने अपनी ऑखें खोली जिस बला को मैने टूट टूट कर चाहा था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,,,
उथर, अभय चाचा की ससुराल में।
करुणा चाची इस वक्त अपने कमरे में आराम कर रही थी। दोपहर हो चुकी थी। सब लोगों के खाना खा लेने के बाद उन्होंने भी खाया और फिर आराम करने के लिए अपने कमरे में चली गईं। करुणा चाची के मायके वालों का परिचय देने की यहाॅ पर कदाचित कोई ज़रूरत तो नहीं है पर फिर भी पाठकों की जानकारी के लिए दे ही देता हूॅ।
चन्द्रकान्त सिंह राजपूत, ये करुणा चाची के दादा जी हैं।
इनकी उमर इस समय पैंसठ के ऊपर है। ये एक फौजी आदमी हैं। फौज में मेजर थे ये। अब तो ख़ैर सरकारी पेंशन ही मिलती है इन्हें किन्तु खुद भी घर परिवार और ज़मीन जायदाद से सम्पन्न हैं ये।
हेमलता सिंह राजपूत, ये करुणा चाची की दादी हैं। ये बाॅसठ साल की हैं। चन्द्रकाॅत सिंह और हेमलता सिंह के तीन लड़के और एक लड़की थी।
उदयराज सिंह राजपूत, ये चन्द्रकाॅत सिंह के बड़े बेटे थे जो कुछ साल पहले गंभीर बीमारी के चलते भगवान को प्यारे हो चुके हैं।
सुभद्रा सिंह राजपूत, ये करुणा चाची की माॅ हैं। उमर यही कोई पचास के आस पास। विधवा हैं ये। इनके दो ही बच्चे हैं। सबसे पहले करुणा चाची उसके बाद हेमराज सिंह राजपूत। हेमराज सिंह की भी शादी हो चुकी है और उसके दो बच्चे हैं।
मेघराज सिंह राजपूत, ये करुणा चाची के चाचा हैं। इनकी उमर पचास के आस पास है। पढ़े लिखे हैं ये। मगर अपनी सारी ज़मीनों पर खेती बाड़ी का काम करवाते हैं। इनकी पत्नी का नाम सरोज है जो कि पैंतालीस साल की हैं। इनके दो बेटे हैं जो शहर में रह कर पढ़ाई करते हैं।
गिरिराज सिंह राजपूत, ये करुणा चाची के छोटे चाचा हैं। ये पैंतालीस साल के हैं और शहर में ही रहते हैं। शहर में ये एक बड़ी सी प्राइवेट कंपनी में बड़ी पोस्ट पर कार्यरत हैं। इनकी पत्नी का नाम शैलजा है। इनके दो बच्चे हैं जो शहर में ही रहते हैं अपने माॅ बाप के साथ।
पुष्पा सिंह, ये करुणा चाची की इकलौती बुआ हैं। उमर यही कोई चालीस के आस पास। इनके पति का नाम भरत सिंह है। ये पेशे से सरकारी डाक्टर हैं। पुष्पा बुआ के दो बच्चे हैं। एक बच्चा पढ़ाई करके एक बड़ी कंपनी में नौकरी कर रहा है जबकि दूसरा बेटा अपने बाप की तरह डाक्टर बनना चाहता है इस लिए डाक्टरी की पढ़ाई कर रहा है।
तो ये था करुणा चाची के मायके वालों का संक्षिप्त परिचय। अब कहानी की तरफ चलते हैं।
करुणा चाची अपने कमरे में बेड पर पड़ी किसी गहरे ख़यालों में गुम थी। कल उनके पास उनके पति अभय का फोन आया था। उन्होंने बताया था कि विराज किसी काम से गाव आया है, इस लिए वो बच्चों को लेकर उसके साथ ही मुम्बई आ जाए। अभय ने करुणा को पहले ही बता दिया था कि वो मुम्बई में विराज के साथ ही रह रहा है। उसने सारी राम कहानी करुणा को बता दिया था।
करुणा अपने पति से असलियत जान कर बहुत हैरान हुई थी और बेहद दुखी भी। उसने स्वप्न में भी उम्मीद न की थी कि एक भाई अपने भाई को इस तरह जान से मार सकता है। अपनी जेठानी प्रतिमा के चरित्र का सुन कर उसे लकवा सा मार गया था। उसके मन में प्रतिमा के प्रति घृणा व नफ़रत पैदा हो गई थी। उसे याद आता कि कैसे प्रतिमा उसके पास आकर उससे अश्लील बातें किया करती थी।
करुणा को अब समझ में आया था कि उसकी जेठानी उससे ऐसी अश्लील बातें क्यों किया करती थी।
उसका एक ही मकसद होता था कि वो करुणा से ऐसी बातें करके उसके अंदर वासना की आग को भड़का दे ताकि करुणा उस आग में जलते हुए कुछ भी करने को तैयार हो जाए। करुणा ये सब सोच सोच कर हैरान थी कि उसकी जेठानी उसके साथ क्या करना चाहती थी।
करुणा ने भगवान का लाख लाख शुक्रिया अदा किया कि अच्छा हुआ कि वो अपनी जेठानी की उन बातों से खुद को सम्हाले रखा था। वरना जाने कैसा अनर्थ हो जाता। अभय ने उसे सब कुछ बता दिया था। उसने करुणा को बता दिया था कि उसका भतीजा विराज अब बहुत बड़ा आदमी बन गया है। उसने बताया कि कैसे एक ग़ैर इंसान ने उसे अपना बेटा बना लिया और उसके नाम अपनी अरबों की संपत्ति कर दी। करुणा ये सब जान कर बहुत खुश हुई थी। उसकी ऑखों से ऑसू छलक पड़े थे ये सब जान कर।
अभय ने जब उससे कहा कि वो बच्चों को लेकर विराज के साथ मुम्बई आ जाए तो वो इस बात से बड़ा खुश हुई थी। उसे लग रहा था कि कितना जल्दी वो मुम्बई पहुॅच जाए और बड़ी बहन के समान अपनी जेठानी गौरी से मिले। उससे मिल कर वो अपने बर्ताव के लिए माफ़ी मागना चाहती थी और उससे लिपट कर खूब रोना चाहती थी। जब से उसे अभय के द्वारा सारी सच्चाई का पता चला था तब से वह अकेले में अक्सर ऑसू बहाती रहती थी। उसे अपनी जेठानी गौरी के साथ बिताए हर पल याद आते। उसे याद आता कि कैसे गौरी उसे अपनी छोटी बहन की तरह मानती थी और उससे प्यार करती थी। उसे कोई काम नहीं करने दिया करती थी। वो हमेशा यही कहती कि तुम पढ़ी लिखी हो इस लिए तुम्हारा काम सिर्फ बच्चों को पढ़ाना है। घर के सारे काम वो खुद कर लेगी।
बेड पर पड़ी करुणा ये सब सोच सोच कर ऑसू बहा ही रही थी कि सहसा उसका मोबाइल बज उठा। वो ख़यालों के अथाह सागर से बाहर आई और सिरहाने रखे मोबाइल को उठाकर उसकी स्क्रीन में फ्लैश कर रहे 'अभय जी' नाम को देखा तो तुरंत ही उसने काल को रिसीव कर मोबाइल को कान से लगा लिया।
"...........।" उधर से अभय ने कुछ कहा।
"क्या???" करुणा हल्के से चौंकी____"आज ही निकलना होगा मुझे? मगर बात क्या है जी? आप तो कह रहे थे कि कल जाना है।"
"........।" उधर से अभय ने फिर कुछ कहा।
"ये क्या कह रहे हैं आप?" करुणा के चेहरे पर एकाएक ही चिंता के भाव आ गए___"ऐसा कैसे हो सकता है?"
".......।" उधर से अभय कुछ देर तक उससे कुछ कहता रहा।
"ठीक है आप चिंता मत कीजिए।" करुणा ने कहा__"मैं हेमराज के साथ ही बच्चों को लेकर यहाॅ से निकलूॅगी। उसके बाद मैं रेलवे स्टेशन पर विराज से मिल लूॅगी।"
"..........।" उधर से अभय ने फिर कुछ कहा।
"जी ठीक है।" करुणा ने कहा___"मैं अभी माॅ और दादा जी से बात करती हूॅ। सामान कुछ ज्यादा नहीं है। बस एक बैग ही है। बाॅकी जैसा आप कहें।"
"..........।" उधर से अभय ने कुछ कहा।
"हाॅ ठीक है।" करुणा ने सिर हिलाया___"मैं सामान ज्यादा नहीं लूॅगी। आप हेमराज को समझा दीजिएगा।
"
उधर से अभय ने कुछ और कहा जिस पर करुणा ने हाॅ कह कर सिर हिलाया उसके बाद काल कट हो गई। काल कट होने के बाद करुणा ने गहरी साॅस ली और फिर बेड से उतर कर कमरे से बाहर आ गई।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
इधर हास्पिटल में।
मेरे दिलो दिमाग़ में ऑधी तूफान चल रहा था। मुझ पर नज़र पड़ते ही बेड पर पड़ी विधी के चेहरे पर ऐसे भाव उभरे जैसे वह मुझे देख कर एकदम से स्टेचू में तब्दील हो गई हो। एकटक मेरी तरफ देखे जा रही थी वह। फिर सहसा उसके चेहरे के भाव एकाएक ही बदले। उस चेहरे पर दुख और पीड़ा के भाव उभर आए। पथराई हुई ऑखों ने अपने अंदर से किसी टूटे हुए बाॅध की तरह ऑसुओं को बाहर की तरफ तेज़ प्रवाह से बहाना शुरू कर दिया।
उसके चेहरे के बदले हुए उन भावों को देख कर भी मेरे अंदर की नफ़रत और आक्रोश में कोई कमी नहीं आई। मेरी ऑखों के सामने कोई और ही मंज़र घूम रहा था। गुज़रे हुए कल की तस्वीरें बार बार ऑखों के सामने घूम रही थीं। अभी मैं इन सब तस्वीरों को देख ही रहा था कि तभी बेजान हो चुके विधी के जिस्म में हल्का सा कंपन हुआ और उसके थरथराते हुए होठों से जो लड़खड़ाता हुआ शब्द निकला उसने मुझे दूसरी दुनियाॅ से लाकर इस हकीक़त की दुनियाॅ में पटक दिया।
"र..राऽऽऽज।" बहुत ही करुण भाव से मगर लरज़ता हुआ विधी का ये स्वर मेरे कानो से टकराया। हकीक़त की दुनियाॅ में आते ही मेरी नज़र विधी के चेहरे पर फिर से पड़ी तो इस बार मेरा समूचा अस्तित्व हिल गया। विधी की ऑखों से ऑसू बह रहे थे, उसके चेहरे पर अथाह पीड़ा के भाव थे। ये सब देख कर मेरा हृदय हाहाकार कर उठा। पल भर में मेरे अंदर मौजूद उसके प्रति मेरी नफ़रत घृणा और गुस्सा सब कुछ साबुन के झाग की तरह बैठता चला गया। मेरे टूटे हुए दिल के किसी टुकड़े में दबा उसके लिए बेपनाह प्यार चीख उठा।
मैने देखा कि करवॅट के बल लेटी विधी का एक हाॅथ धीरे से ऊपर की तरफ ऐसे अंदाज़ में उठा जैसे वो मुझे अपने पास बुला रही हो। मेरा समूचा जिस्म ही नहीं बल्कि अंदर की आत्मा तक में एक झंझावात सा हुआ। मैं किसी सम्मोहन के वशीभूत होकर उसकी तरफ बढ़ चला। इस वक्त जैसे मैं खुद को भूल ही चुका था। कुछ ही पल में मैं विधी के पास उसके उस उठे हुए हाॅथ के पास पहुॅच गया।
"त तुम आ गए राज।" मुझे अपने करीब देखते ही उसने अपने उस उठे हुए हाथ से मेरी बाॅई कलाई को पकड़ते हुए कहा___"मैं तुम्हारे ही आने का यहाॅ इन्तज़ार कर रही थी। मेरी साॅसें सिर्फ तुम्हें ही देखने के लिए बची हुई हैं।"
मेरे मुख से उसकी इन बातों पर कोई लफ्ज़ न निकला। किन्तु मैं उसकी आख़िरी बात सुन कर बुरी तरह चौंका ज़रूर। हैरानी से उसकी तरफ देखा मैने। मगर फिर अचानक ही जाने क्या हुआ मुझे कि मेरे चेहरे पर फिर से वही नफ़रत और गुस्सा उभर आया। मैने एक झटके से उसके हाॅथ से अपनी कलाई को छुड़ा लिया।
"अब ये कौन सा नया नाटक शुरू किया है तुमने?" मेरे मुख से सहसा गुर्राहट निकली___"और क्या कहा तुमने कि तुम मेरा ही इन्तज़ार कर थी? भला क्यों कर रही थी मेरा इन्तज़ार? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हें पता चल गया हो कि इस समय मैं फिर से रुपये पैसे वाला हो गया हूॅ? इस लिए पैसों के लिए फिर से मुझे बुला लिया तुमने। वाह क्या बात है जवाब नहीं है तेरा। अब समझ में आई सारी बात मुझे। मुझे मुम्बई से बुलाने के लिए मेरे ही दोस्त का इस्तेमाल किया तूने। क्या दिमाग़ लगाया है तूने लड़की क्या दिमाग़ लगाया है। मगर तेरे इस दिमाग़ लगाने से अब कुछ नहीं होने वाला। मैं तेरे इस नाटक में फॅसने वाला नहीं हूॅ अब। इतना तो सबक सीख ही लिया है मैने कि तुझ जैसी लड़की से कैसे दूर रहा जाता है। मुश्किल तो था मगर सह लिया है मैने, और अब उस सबसे बहुत दूर निकल गया हूॅ। अब कोई लड़की मुझे अपने रूप जाल में या अपने झूठे प्यार के जाल में नहीं फॅसा सकती। इस लिए लड़की, ये जो तूने नाटक रचा है न उसे यहीं खत्म कर दे। अब कुछ नहीं मिलने वाला यहाॅ। मेरा यार भोला था नासमझ था इस लिए तेरी बातों के जाल में फॅस गया और मुझे यहाॅ बुला लिया। मगर चिंता मत कर मैं अपने यार को सम्हाल लूॅगा।"
मैने ये सब बिना रुके मानो एक ही साॅस में कह दिया था और कहने के बाद उसके पास एक पल भी रुकना गवाॅरा न किया। पलट कर वापस चल दिया, दो क़दम चलने के बाद सहसा मैं रुका और पलट कर बोला___"एक बात कहूॅ। आज भी तुझे उतना ही प्यार करता हूॅ जितना पहले किया करता था मगर बेपनाह प्यार करने के बावजूद अब तुझे पाने की मेरे दिल में ज़रा सी भी हसरत बाॅकी नहीं है।"
ये कह कर मैं तेज़ी से पलट गया। पलट इस लिए गया क्योंकि मैं उस बेवफा को अपनी ऑखों में भर आए ऑसुओं को दिखाना नहीं चाहता था। मेरा दिल अंदर ही अंदर बुरी तरह तड़पने लगा था। मुझे लग रहा था कि मैं हास्पिटल के बाहर दौड़ते हुए जाऊॅ और बीच सड़क पर घुटनों के बल बैठ कर तथा आसमान की तरफ चेहरा करके ज़ोर ज़ोर से चीखूॅ चिल्लाऊॅ और दहाड़ें मार मार कर रोऊॅ। सारी दुनियाॅ मेरा वो रुदन देखे मगर वो न देखे सुने जिसे मैं आज भी टूट कर प्यार करता हूॅ।
"तुम्हारी इन बातों से पता चलता है राज कि तुम आज के समय में मुझसे कितनी नफ़रत करते हो।" सहसा विधी की करुण आवाज़ मेरे कानों पर पड़ी____"और सच कहूॅ तो ऐसा तुम्हें करना भी चाहिए। मुझे इसके लिए तुमसे कोई शिकायत नहीं है। मैने जो कुछ भी तुम्हारे साथ किया था उसके लिए कोई भी यही करता। मगर, मेरा यकीन करो राज मेरे मन में ना तो पहले ये बात थी और ना ही आज है कि मैने पैसों के लिए ये सब किया।"
"बंद करो अपनी ये बकवास।" मैने पलट कर चीखते हुए कहा था, बोला___"तेरी फितरत को अच्छी तरह जानता हूॅ मैं।
आज भी तूने मुझे इसी लिए बुलवाया है क्योंकि तुझे पता चल चुका है कि अब मैं फिर से पैसे वाला हो गया हूॅ। पैसों से प्यार है तुझे, पैसों के लिए तू किसी भी लड़के के दिल के साथ खिलवाड़ कर सकती है। मगर, अब तेरी कोई भी चाल मुझ पर चलने वाली नहीं है समझी? मेरा दिल तो करता है कि इसी वक्त तुझे तेरे किये की सज़ा दूॅ मगर नहीं कर सकता मैं ऐसा। क्योंकि मुझसे तेरी तरह किसी को चोंट पहुॅचाना नहीं आता और ना ही मैं अपने मतलब के लिए तेरे साथ कुछ करना चाहता हूॅ। तुझे अगर मैं कोई दुवा नहीं दे सकता तो बद्दुवा भी नहीं दूॅगा।"
मेरी बातें सुन कर विधी के दिल में कदाचित टीस सी उभरी। उसकी ऑखें बंद हो गई और बंद ऑखों से ऑसुओं की धार बह चली। मगर फिर जैसे उसने खुद को सम्हाला और मेरी तरफ कातर भाव से देखने लगी। उसे इस तरह अपनी तरफ देखता पाकर एक बार मैं फिर से हिल गया। मेरे दिल में बड़ी ज़ोर की पीड़ा हुई मगर मैने खुद को सम्हाला। आज भी उसके चेहरे की उदासी और ऑखों में ऑसू देख कर मैं तड़प जाता था किन्तु अंदर से कोई चीख कर मुझसे कहने लगता इसने तेरे प्यार की कदर नहीं की। इसने तुझे धोखा दिया था। तेरी सच्ची चाहत को मज़ाक बना कर रख दिया था। बस इस एहसास के साथ ही उसके लिए मेरे अंदर जो तड़प उठ जाती थी वो कहीं गुम सी हो जाती थी।
"तुमने तो मुझे कोई सज़ा नहीं दी राज।" सहसा विधी ने पुनः करुण भाव से कहा___"मगर मेरी ज़िदगी ने मुझे खुद सज़ी दी है। ऐसी सज़ा कि मेरी साॅसें बस चंद दिनों की या फिर चंद पलों की ही मेहमान हैं। किस्मत बड़ी ख़राब चीज़ भी होती है, एक पल में हमसे वो सब कुछ छीन लेती है जिसे हम किसी भी कीमत पर किसी को देना नहीं चाहते। किस्मत पर किसी का ज़ोर नहीं चलता राज। ये मेरी बदकिस्मती ही तो थी कि मैने तुम्हारे साथ वो सब किया। मगर यकीन मानो उस समय जो मुझे समझ में आया मैने वही किया। क्योंकि मुझे कुछ और सूझ ही नहीं रहा था। भला मैं ये कैसे सह सकती थी कि मेरी छोटी सी ज़िदगी के साथ तुम इस हद तक मुझे प्यार करने लगो कि मेरे मरने के बाद तुम खुद को सम्हाल ही न पाओ? उस समय मैने तुम्हें धोखा दिया मगर उस समय के मेरे धोखे ने तुम्हें इतना भी टूट कर बिखरने नहीं दिया कि बाद में तुम सम्हल ही न पाते। मैं मानती हूॅ कि दिल जब किसी के द्वारा टूटता है तो उसका दर्द हमेशा के लिए दिल के किसी कोने में दबा बैठा रहता है। मगर, उस समय के हालात में तुम टूटे तो ज़रूर मगर इस हद तक नहीं बिखरे। वरना आज मेरे सामने इस तरह खड़े नहीं रहते। आज तुम जिस मुकाम पर हो वहाॅ नहीं पहुॅच पाते।"
विधी की बातें सुन कर मुझे कुछ समझ न आया कि ये क्या अनाप शनाप बके जा रही है? मगर उसके लहजे में और उसके भाव में कुछ तो ऐसा था जिसने मुझे कुछ हद तक शान्त सा कर दिया था।
"तो तुम क्या चाहती थी कि मैं टूट कर बिखर जाता और फिर कभी सम्हलता ही नहीं?" मैने तीके भाव से कहा___"अरे मैं तो आज भी उसी हालत में हूॅ। मगर कहते हैं न कि इंसान के जीवन में सिर्फ उसी बस का हक़ नहीं होता बल्कि उसके परिवार वालों का भी होता है। मेरी माॅ मेरी बहन ने मुझे प्यार ही इतना दिया है कि मैं बिखर कर भी नहीं बिखरा। मैने भी सोच लिया कि ऐसी लड़की के लिए क्या रोना जिसने प्यार को कभी समझा ही नहीं? रोना है तो उनके लिए रोओ जो सच में मुझसे प्यार करते हैं।"
"ये तो खुशी की बात है कि तुमने ऐसा सोचा और खुद को सम्हाल लिया।" विधी ने फीकी मुस्कान के साथ कहा__"मैं भी यही चाहती थी कि तुम उस सबसे खुद को सम्हाल लो और जीवन में आगे बढ़ जाओ। किसी एक के चले जाने से किसी का जीवन रुक नहीं जाता। समझदार इंसान को सबकुछ भूल कर आगे बढ़ जाना चाहिए। वही तुमने किया, इस बात से मैं खुश हूॅ राज। यही तो चाहती थी मैं। यकीन मानो तुम्हें आज इस तरह देख कर मेरे मन का बोझ उतर गया है। मैं तुमसे ये नहीं कहूॅगी कि तुम मुझे उस सबके लिए माफ़ कर दो जो कुछ मैने तुम्हारे साथ किया था। अगर तुम ऐसे ही खुश हो तो भला मैं माफ़ी माॅग कर तुम्हारी उस खुशी को कैसे मिटा सकती हूॅ? अब तुम जाओ राज, जीवन में खूब तरक्की करो और अपनों के साथ साथ खुद को भी खुश रखो। और हाॅ, जीवन में मुझे कभी याद मत करना, क्योंकि मैं याद करने लायक नहीं हूॅ।"
विधी की इन विचित्र बातों ने मुझे उलझा कर रख दिया था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आज इसे हो क्या गया है? ये तो ऐसी बातें कह रही थी जैसे कोई उपदेशक हो। मेरे दिलो दिमाग़ में तरह तरह की बातें चलने लगी थीं।
"जाते जाते मेरी एक आरज़ू भी पूरी करते जाओ राज।" विधी का वाक्य मेरे कानों से टकराया___"हलाॅकि तुमसे कोई आरज़ू रखने का मुझे कोई हक़ तो नहीं है मगर मैं जानती हूॅ कि तुम मेरी आरज़ू ज़रूर पूरी करोगे।" कहने के बाद विधी कुछ पल के लिए रुकी फिर बोली___"मेरे पास आओ न राज। मैं तुम्हें और तुम्हारे चेहरे को जी भर के देखना चाहती हूॅ। तुम्हारे चेहरे की इस सुंदर तस्वीर को अपनी ऑखों में फिर से बसा लेना चाहती हूॅ। मेरी ये आरज़ू पूरी कर दो राज। इतना तो कर ही सकते हो न तुम?"
विधी की बात सुन कर मेरे दिलो दिमाग़ में धमाका सा हुआ। मेरे पूरे जिस्म में झुरझुरी सी हुई। पेट में बड़ी तेजी से जैसे कोई गैस का गोला घूमने लगा था। दिमाग़ एकदम सुन्ना सा पड़ता चला गया। कानों में कहीं दूर से सीटियों की अनवरत आवाज़ गूॅजती महसूस हुई मुझे। पल भर में मेरे ज़हन में जाने कितने ही प्रकार के ख़याल आए और जाने कहाॅ गुम हो गए। बस एक ही ख़याल गुम न हुआ और वो ये था कि विधी ऐसा क्यों चाह रही है?
किसी गहरे ख़यालों में खोया हुआ मैं इस तरह विधी की तरफ बढ़ चला जैसे मुझ पर किसी तरह का सम्मोहन हो गया हो।
कुछ ही पल में मैं विधी के करीब उसके चेहरे के पास जा कर खड़ा हो गया। मेरे खड़े होते ही विधी ने किसी तरह खुद को उठाया और बेड की पिछली पुश्त से पीठ टिका लिया। अब वो अधलेटी सी अवस्था में थी। चेहरा ऊपर करके उसने मेरे चेहरे की तरफ देखा। उसकी ऑखों में ऑसुओं का गरम जल तैरता हुआ नज़र आया मुझे। मैने पहली बार उसके चेहरे को बड़े ध्यान से देखा और अगले ही पल बुरी तरह चौंक पड़ा मैं। मुझे विधी के चेहरे पर मुकम्मल खिज़ा दिखाई दी। जो चेहरा हर पल ताजे खिले गुलाब की मानिन्द खिला हुआ रहा करता था आज उस चेहरे पर वीरानियों के सिवा कुछ न था। ऐसा लगता था जैसे वो शदियों से बीमार हो।
उसे इस हालत में देख कर एक बार फिर से मेरा दिल तड़प उठा। जी चाहा कि अभी झपट कर उसे अपने सीने से लगा लूॅ मगर ऐन वक्त पर मुझे उसका धोखा याद आ गया। उसका वो दो टूक जवाब देना याद आ गया। मुझे भिखारी कहना याद आ गया। इन सबके याद आते ही मेरे चेहरे पर कठोरता छाती चली गई। एक बार फिर से मेरे अंदर से नफ़रत और गुस्सा उभर कर आया और मेरे चेहरे तथा ऑखों में आकर ठहर गया।
"मैं तुम्हें दुवा में ये भी नहीं कह सकती कि तुम्हें मेरी उमर लग जाए।" तभी विधी ने छलक आए ऑसुओं के साथ कहा___"बस यही दुवा करती हूॅ कि तुम हमेशा खुश रहो। जीवन में हर कोई तुम्हें दिलो जान से प्यार करे। कभी किसी के द्वारा तुम्हारा दिल न दुखे। खुदा मिलेगा तो उससे पूछूॅगी कि मैने ऐसा क्या गुनाह किया था जो उसने मुझे ऐसी ज़िंदगी बक्शी थी? ख़ैर, अब तुम जाओ राज, मैने तुम्हारी तस्वीर को इस तरह अपनी ऑखों में बसा लिया है कि अब हर जन्म में मुझे सिर्फ तुम ही नज़र आओगे।"
विधी की इस बात से एक बार फिर से मेरे चेहरे पर उभर आए नफ़रत व गुस्से में कमी आ गई। मैंने उसे अजीब भाव से देखा। मेरे अंदर कोई ज़ोर ज़ोर से चीखे जा रहा था कि इसे एक बार अपने सीने से लगा ले राज। मगर मैने अपने अंदर के उस शोर को शख्ती से दबा दिया और पलट कर कमरे के बाहर की तरफ चल दिया। मैने महसूस किया कि मेरी कोई अनमोल चीज़ मुझसे हमेशा के लिए दूर हुई जा रही है। मेरे दिल की धड़कने अनायास ही ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगी। मनो मस्तिष्क में बड़ी तेज़ी से कोई तूफान चलने लगा था। अभी मैं दरवाजे के पास ही पहुॅचा था कि.....
"रुक जाओऽऽ।" ये वाक्य एक नई आवाज़ के साथ मेरे कानों से टकराया था। दरवाजे के करीब बढ़ते हुए मेरे क़दम एकाएक ही रुक गए। मैं बिजली की सी तेज़ी से पलटा। कमरे में ही बेड के पास खड़ी जिस शख्सियत पर मेरी नज़र पड़ी उसे देख कर मैं हक्का बक्का रह गया। आश्चर्य और अविश्वास से मेरी ऑखें फटी की फटी रह गईं। मुझे अपनी ऑखों पर यकीन नहीं हुआ कि जिस शख्सियत को मेरी ऑखें देख रही हैं वो सच में वही हैं या फिर ये मेरी ऑखों का कोई भ्रम है।
"मुझे तुमसे ये उम्मीद नहीं थी राज।
" सहसा ये नई आवाज़ फिर से मेरे कानों से टकराई___"तुम इस तरह कैसे यहाॅ से जा सकते हो? इतनी बेरुख़ी तो कोई अपने किसी दुश्मन से भी नहीं जाहिर करता जितनी तुम विधी को देख कर ज़ाहिर कर रहे हो।"
इस बार मैं बुरी तरह चौंका। ये तो सच में वही हैं। यानी रितू दीदी। जी हाॅ दोस्तो, ये वही रितू दीदी हैं जिन्होंने अपने जीवन में कभी भी मुझे भाई नहीं माना और ना ही मुझसे बात करना ज़रूरी समझा। मगर मैं इस बात से हैरान था कि वो यहाॅ कैसे मौजूद हो सकती हैं? जब मैं आया था इस कमरे में तब तो ये यहाॅ नहीं थी, फिर अचानक ये कहाॅ से यहाॅ पर प्रकट हो गईं?
"प्लीज़ दीदी।" तभी बेड पर अधलेटी अवस्था में बैठी विधी ने रितू दीदी से कहा___"कुछ मत कहिए उसे।"
"नहीं विधी।" रितू दीदी ने आवेशयुक्त भाव से कहा__"मुझे बोलने दे अब। माना कि तूने जो किया वो उस समय के हिसाब से ग़लत था मगर इसका मतलब ये नहीं कि बिना किसी बात को जाने समझे ये तुझे इस तरह बोल कर यहाॅ से चला जाए।"
"नहीं दीदी प्लीज़।" विधी ने विनती करते हुए कहा___"ऐसा मत कहिए उसे। मुझे किसी बात की सफाई नहीं देना है उससे। आप जानती हैं कि मैं उसे किसी भी तरह का दुख नहीं देना चाहती अब।"
"क्यों करती है रे ऐसा तू?" रितू दीदी की आवाज़ सहसा भारी हो गई, ऑखों में ऑसू आ गए, बोली___"ऐसा मत कर विधी। वरना ये ज़मीन और वो आसमान फट जाएगा। तू चाहती थी न कि तू अपने आख़िरी समय में अपने इस महबूब की बाहों में ही दम तोड़े? फिर क्यों अब इस सबसे मुकर रही हो तू? अब तक तो तड़प ही रही थी न तो अब अपने अंतिम समय में क्यों इस तड़प को लेकर जाना चाहती है? नहीं नहीं, मैं ऐसा हर्गिज़ नहीं होने दूॅगी।"
रितू दीदी की बातें सुन कर मेरे दिलो दिमाग़ में भयंकर विष्फोट हुआ। ऐसा लगा जैसे आसमान से कोई बिजली सीधा मेरे दिल पर गिर पड़ी हो। पलक झपकते ही मेरी हालत ख़राब हो गई। दिमाग़ में हर बात बड़ी तेज़ी से घूमने लगी। एक एक बात, एक एक दृष्य मेरे ज़हन से टकराने लगे। पवन का मुझे फोन करके यहाॅ अर्जेन्ट बुलाना, मेरे द्वारा वजह पूछने पर उसका अब तक चुप रहना। हास्पिटल के इस कमरे के बाहर से ये कह कर चले जाना कि मैं यहाॅ जो कुछ भी देखूॅ सुनूॅ उसे देख सुन कर खुद को सम्हाले रखूॅ। हास्पिटल के इस कमरे के अंदर विधी का मुझसे मिलना, उसकी वो सब विचित्र बातें और अब रितू दीदी का यहाॅ मौजूद होकर ये सब कहना। ये सब चीज़ें मेरे दिलो दिमाग़ में बड़ी तेज़ी घूमने लगी थी।
मुझे अब समझ आया कि असल माज़रा क्या है। मेरे दिमाग़ ने काम करना शुरू कर दिया और अब मुझे सब कुछ समझ में आने लगा था। दरअसल विधी को कुछ हुआ है जिसके लिए पवन ने मुझे यहाॅ बुलाया था।
मगर विधी को ऐसा क्या हो गया है? रितू दीदी ने ये क्या कहा कि____ "तू चाहती थी न कि तू अपने आख़िरी समय में अपने इस महबूब की बाहों में ही दम तोड़े?" हे भगवान! ये क्या कहा रितू दीदी ने?
"नननहींऽऽऽऽ।" अपने ही सोचों में डूबा मैं पूरी शक्ति से चीख पड़ा था, पल भर में मेरी ऑखों से ऑसुओं का जैसे कोई बाॅध टूट पड़ा। मैं भागते हुए विधी के पास आया। इधर मेरी चीख से रितू दीदी और विधी भी चौंक पड़ी थी।
मैं भागते हुए विधी के पास आया था, बेड के किनारे पर बैठ कर मैने विधी को उसके दोनो कंधों से पकड़ कर खुद से छुपका लिया और बुरी तरह रो पड़ा। मैं विधी को अपने सीने से बुरी तरह भींचे हुए था। मेरे मुख से कोई बोल नहीं फूट रहा था। मैं बस रोये जा रहा था। मुझे समझ में आ चुका था कि विधी को कुछ ऐसा हो गया है जिससे वो मरने वाली है। ये बात मेरे लिए मेरी जान ले लेने से कम नहीं थी।
"नहीं राज।" विधी मुझसे छुपकी खुद भी रो रही थी, किन्तु उसने खुद को सम्हालते हुए कहा___"इस तरह मत रोओ। मैं अपनी ऑखों के सामने तुम्हें रोते हुए नहीं देख सकती। प्लीज़ चुप हो जाओ न।"
"नहीं नहीं नहीं।" मैंने तड़पते हुए कहा___"तुम मुझे छोंड़ कर कहीं नहीं जाओगी। तुम नहीं जानती कि तुम्हारे लिए कितना तड़पा हूॅ मैं। पर अब और नहीं विधी। मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूॅगा।"
"पागल मत बनो राज।" विधी ने मेरे सिर को सहलाते हुए कहा___"खुद को सम्हालो और जीवन में आगे बढ़ो।"
"मैं कुछ नहीं जानता विधी।" मैने सिसकते हुए कहा___"मैं फिर से तुम्हें खोना नहीं चाहता। मुझे बताओ कि क्या हुआ है तुम्हें? मैं तुम्हारा इलाज़ करवाऊॅगा। दुनियाॅ भर के डाक्टरों को तुम्हारे इलाज़ के लिए पल भर में ले आऊॅगा।"
"अब कुछ नहीं हो सकता राज।" विधी ने सहसा मुझसे अलग होकर मेरे चेहरे को अपनी दोनो हॅथेलियों में लेते हुए कहा___"मैने कहा न कि मेरा सफर खत्म हो चुका है। मुझे ब्लड कैंसर है वो भी लास्ट स्टेज का। मेरी साॅसें किसी भी पल रुक सकती हैं और मैं भगवान के पास चली जाऊॅगी।"
"ननहींऽऽऽ।" विधी की ये बात सुनकर मुझे ज़बरदस्त झटका लगा। ऑखों के सामने अॅधेरा सा छा गया। हर चीज़ जैसे किसी शून्य में डूबती महसूस हुई मुझे। कानों में कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था मुझे। दिल की धड़कने रुक सी गई और मैं एकदम से अचेत सी अवस्था में आ गया।
"राऽऽऽज।" विधी के हलक से चीख निकल गई, वो मेरे चेहरे को थपथपाते हुए बुरी तरह रोने लगी। पास में ही खड़ी रितू दीदी भी दौड़ कर मेरे पास आ गईं। मुझे पीछे से पकड़ते हुए मुझे ज़ोर ज़ोर से आवाज़ें लगाने लगीं। सब कुछ एकदम से ग़मगीन सा हो गया था। वक्त को एक जगह ठहर जाने में एक पल का भी समय नहीं लगा।
वो दोनो बुरी तरह रोये जा रही थी। रितू दीदी के दिमाग़ ने काम किया।
पास ही टेबल पर रखे पानी के ग्लास को उठा कर उससे मेरे चेहरे पर पानी छिड़का उन्होंने। थोड़ी ही देर में मुझे होश आ गया। होश में आते ही मैं विधी से लिपट कर ज़ार ज़ार रोने लगा।
"क्यों विधी क्यों?" मैने बिलखते हुए उससे कहा___"क्यों छुपाया तुमने मुझसे? क्या इसी लिए तुमने मेरे साथ वो सब किया था, ताकि मैं तुमसे दूर चला जाऊॅ? और मैं मूरख ये समझता रहा कि तुमने मेरे साथ कितना ग़लत किया था। कितना बुरा हूॅ मैं, आज तक मैं तुम्हें भला बुरा कहता रहा। तुम्हारे बारे में कितना कुछ बुरा सोचता रहा। मैने कितना बड़ा अपराध किया है विधी। हाय कितना बड़ा पाप किया मैने। मुझे तो भगवान भी कभी माफ़ नहीं करेगा।"
"नहीं राज नहीं।" विधी ने तड़प कर मुझे अपने से छुपका लिया, बोली___"तुमने कोई अपराध नहीं किया, कोई पाप नहीं किया। तुमने तो बस प्यार ही किया है मुझे, हर रूप में तुमने मुझे प्यार किया है राज। मुझे तुम पर नाज़ है। ईश्वर से यही दुवा करूॅगी कि हर जन्म में मुझे तुम्हारा ही प्यार मिले।"
"अपने आपको सम्हालो राज।" सहसा रितू दीदी ने मुझे पीछे से पकड़े हुए कहा___"ईश्वर इस बात का गवाह है कि तुम दोनो ने कोई पाप नहीं किया है। विधी ने उस समय जो किया उसमें भी उसके मन में सिर्फ यही था कि तुम उससे दूर हो जाओ और एक नये सिरे से जीवन में आगे बढ़ो। तुम खुद सोचो राज कि जो विधी तुम्हें दिलो जान से प्यार करती थी उसने तुम्हें अपने से दूर करने के लिए खुद को कैसे पत्थर दिल बनाया होगा? उसका दिल कितना तड़पा होगा? मगर इसके बाद भी उसने तुम्हें खुद से दूर किया। उस समय का वो दुख आज के इस दुख से भारी नहीं था।"
"लेकिन दीदी इसने मुझसे ये बात छुपाई ही क्यों थी?" मैने रोते हुए कहा___"क्या इसे मेरे प्यार पर भरोसा नहीं था? मैं इसके इलाज़ के लिए धरती आसमान एक कर देता और इसको इस गंभीर बिमारी से बचा लेता।"
"नहीं राज।" दीदी ने कहा___"तुम उस समय भी कुछ न कर पाते क्योंकि तब तक कैंसर इसके खून में पूरी तरह फैल चुका था। पहले इस बात का इसे पता ही नहीं था और जब पता चला तो डाक्टर ने बताया कि इसके इलाज में ढेर सारा पैसा लगेगा और इसका इलाज हमारे देश में हो पाना भी मुश्किल था। उस समय ना तो तुम इतने सक्षम थे और ना ही इसके माता पिता जो इसका इलाज करवा पाते। इस लिए विधी ने फैंसला किया कि वो तुमसे जितना जल्दी हो सके दूर हो जाए। क्योंकि तब तुम्हें इस बात का भी दुख होता कि तुम इसका इलाज नहीं करवा पाए। सब कुछ हमारे हाॅथ में नहीं होता राज। कुछ ईश्वर का भी दखल होता है।"
"कुछ भी कहिये दीदी।" मैने कहा___"कम से कम मैं अपनी विधी के साथ तो रहता। उसे खुद से अलग करके उसे दुखों के सागर में डूबने तो न देता।"
"नहीं राज तुम इस सबसे दुखी मत हो।" विधी ने कहा___"सब कुछ भूल जाओ।
मैं बस ये चाहती हूॅ कि तुम मुझे खुशी खुशी इस दुनियाॅ से अलविदा करो। आज तुम्हारी बाहों में हूॅ तो मेरे सारे दुख दर्द दूर हो गए हैं। मेरी ख्वाहिश थी कि मेरा दम निकले तो सिर्फ मेरे महबूब की बाहों में। तुम्हारी सुंदर छवि को अपनी ऑखों में बसा कर यहाॅ से जाना चाहती थी। इस लिए दीदी से मैने अपनी ये इच्छा बताई और दीदी ने मुझसे वादा किया कि ये तुमको मेरे पास लेकर ज़रूर आएॅगी।"
मैं विधी की इस बात से चौंका। पलट कर रितू दीदी की तरफ देखा तो रितू दीदी की नज़रें झुक गईं। उनके चेहरे पर एकाएक ही ग्लानि और अपराध बोझ जैसे भाव उभर आए।
"राज, तुम्हारी रितू दीदी अब पहले जैसे नहीं रहीं।" सहसा विधी ने मुझसे कहा___"ये तुमसे बहुत प्यार करती हैं। इन्हें कभी खुद से दूर न करना। इन्होंने जो कुछ किया उसमे इनका कोई दोष नहीं था। इन्होंने तो वही किया था जो इन्हें बचपन से सिखाया गया था। आज हर सच्चाई इनको पता चल चुकी है इस लिए अब ये तुम्हें ही अपना भाई मानती हैं। तुम इन्हें माफ़ कर देना। इनका मुझ पर बहुत बड़ा उपकार है राज। ये मुझे अपनी छोटी बहन जैसा प्यार देती हैं। जब से ये मुझे मिली हैं तब से मुझे यही एहसास होता रहा है जैसे कि तुम मेरे पास ही हो।"
विधी की इन बातों से मुझे झटका सा लगा। मैने एक बार फिर से पलट कर रितू दीदी की तरफ देखा। उनका सिर पूर्व की भाॅति ही झुका हुआ था। मैने अपने दोनो हाॅथों से उनके चेहरे को लेकर उनके चेहरे को ऊपर उठाया। जैसे ही उनका चेहरा ऊपर हुआ तो मुझे उनका ऑसुओं से तर चेहरा दिखा। मेरा कलेजा हिल गया उनका ये हाल देख कर। मैने उन्हें अपने सीने से लगा लिया। मेरे सीने से लगते ही रितू दीदी की रुलाई फूट गई। वो फूट फूट कर रोने लगी थी। जाने कब से उनके अंदर ये गुबार दबा हुआ था और अब वो इस रूप में निकल रहा था।
"ये क्या दीदी?" मैने उनके सिर को प्यार से सहलाते हुए कहा___"चुप हो जाइये दीदी। अरे आप तो मेरी सबसे प्यारी और बहादुर दीदी हैं। चलिये अब चुप हो जाइये।"
"तू इतना अच्छा क्यों है राज?" रितू दीदी का रोना बंद ही नहीं हो रहा था____"तुझे मुझ पर गुस्सा क्यों नहीं आता? मैने तुझे कभी अपना भाई नहीं माना। हमेशा तेरा दिल दुखाया मैने। मुझे वो सब याद है मेरे भाई जो कुछ मैने तेरे साथ किया है। जब जब मुझे वो सब याद आता है तब तब मुझे खुद से घृणा होने लगती है। मुझे ऐसा लगने लगता है कि मैं अपने आपको क्या कर डालूॅ।"
"नहीं दीदी।" मैने उन्हें खुद से अलग करके उनके ऑसुओं को पोंछते हुए कहा___"ऐसा कभी सोचना भी मत। मेरे मन में कभी भी आपके प्रति कोई बुरा ख़याल नहीं आया। कहीं न कहीं मुझे भी इस बात का एहसास था कि आप वही कर रही हैं जो आपको सिखाया जाता था।
"
"ये सब तू मेरा दिल रखने के लिए कह रहा है न?" रितू दीदी ने कहा___"जबकि मुझे पता है कि तुझे मेरे उस बर्ताव से कितनी तक़लीफ़ होती थी।"
"हाॅ बुरा तो लगता था दीदी।" मैने कहा___"मगर उस सबके लिए आप पर कभी गुस्सा नहीं आता था। हर बार यही सोचता था कि इस बार आप मुझसे ज़रूर बात करेंगी।"
"और मैं इतनी बुरी थी कि हर बार तेरी उन मासूम सी उम्मीदों को तोड़ देती थी।" रितू ने सिर झुका लिया, बोली___"तू उस सबके लिए मुझे सज़ा दे मेरे भाई। तेरी हर सज़ा को मैं हॅसते हुए कुबूल कर लूॅगी।"
"ठीक है दीदी।" मैने कहा___"आपकी सज़ा यही है कि अब से आप ये सब बिलकुल भी नहीं सोचेंगी और ना ही ये सब सोच कर खुद को रुलाओगी। यही आपकी सज़ा है।"
मेरी ये सज़ा सुन कर रितू दीदी देखती रह गईं मुझे और सहसा फिर से उनकी ऑखों से ऑसू बह चले। वो मुझसे लिपट गईं। वो इस तरह मुझसे लिपटी हुई थी जैसे वो मुझे अपने अंदर समा लेना चाहती हों।
विधी अपना ऑसुओं से तर चेहरा लिए हम दोनो बहन भाई को देख रही थी। उसके होठों पर मुस्कान थी। सहसा तभी उसे ज़ोर का धचका लगा। हम दोनो बहन भाई का ध्यान विधी की तरफ गया। विधी को आए उस ज़ोर के धचके से अचानक ही खाॅसी आने लगी। मैं बुरी तरह चौंका। उधर विधी को लगातार खाॅसी आने लगी थी। मैं ये देख कर बुरी तरह घबरा गया। मेरे साथ साथ रितू दीदी भी घबरा गई। मैने विधी को अपनी बाहों में ले लिया।
"विधी, क्या हुआ तुम्हें?" मैं बदहवाश सा कहता चला गया___"तुम ठीक तो हो न? ये खाॅसी कैसे आने लगी तुम्हें। डाक्टरऽऽऽ.....डा डाक्टर को बुलाओ कोई।"
मैं पागलों की तरह इधर उधर देखने लगा। मेरी नज़र रितू दीदी पर पड़ी तो मैं उन्हें देख कर एकाएक ही रो पड़ा___"दीदी, देखो न विधी को अचानक ये क्या होने लगा है? प्लीज़ दीदी जल्दी से डाक्टर को बुलाइये। जाइये जल्दी.....डाक्टर बुलाइये। मेरी विधी को ये खाॅसी कैसे आने लगी है अचानक?"
मेरी बात सुन कर रितू दीदी को जैसे होश आया। वो बदहवाश सी होकर पहले इधर उधर देखी फिर भागते हुए कमरे से बाहर की तरफ लपकी। इधर मैं लगातार विधी को अपनी बाहों में लिए उसे फुसला रहा था। मेरा दिलो दिमाग़ एकदम से जैसे कुंद सा पड़ गया था। उधर विधी को रह रह कर खाॅसी आ रही थी। सहसा तभी उसके मुख से खून निकला। ये देख कर मैं और भी घबरा गया। मैं ज़ोर ज़ोर से डाक्टर डाक्टर चिल्लाने लगा। विधी की हालत प्रतिपल ख़राब होती जा रही थी। उसकी हालत देख कर मेरी जान हलक में आकर फॅस गई थी।
तभी कमरे में भागते हुए डाक्टर नर्सें और रितू दीदी आ गई। उनके पीछे ही विधी के माॅम डैड भी आ गए। उनके चेहरे से ही लग रहा था कि उनकी हालत बहुत ख़राब है। डाक्टर ने आते ही विधी को देखा।
"देखिये इनकी हालत बहुत ख़राब है।" डाक्टर ने विधी को चेक करने के बाद कहा___"ऐसा लगता है कि आज इनका बचना बहुत मुश्किल है।"
"डाऽऽऽऽक्टर।
" मैं पूरी शक्ति से चीख पड़ा था___"ज़ुबान सम्हाल कर बात कर वरना हलक से ज़ुबान खींच कर तेरे हाॅथ में दे दूॅगा समझे? मेरी विधी को कुछ नहीं होगा। इसे कुछ नहीं होने दूॅगा मैं। मैं इसे ठीक कर दूॅगा।"
"बेटीऽऽऽ।" विधी की माॅ भाग कर विधी के पास आई और रोते हुए बोली___"मैं कैसे जी पाऊॅगी अगर तुझे कुछ हो गया तो?"
"ममाॅ।" खाॅसते हुए विधी के मुख से लरजते हुए शब्द निकले___"आज मैं बहुत खुश हूॅ। अपने महबूब की बाहों में हूॅ। कितने अच्छे वक्त पर मेरा दम निकलने वाला है। उस भगवान से शिकायत तो थी मगर अब कोई शिकायत भी नहीं रह गई। उसने मेरी आख़िरी ख्वाहिश को जो पूरी कर दी माॅम। मेरे जाने के बाद डैड का ख़याल रखियेगा।"
"नहीं नहीं।" मैं ज़ार ज़ार रो पड़ा___"तुम्हें कुछ नहीं होगा विधी और अगर कुछ हो गया न तो सारी दुनियाॅ को आग लगा दूॅगा मैं। सबको जीवन मृत्यु देने वाले उस ईश्वर से नफ़रत करने लगूॅगा मैं।"
"ऐसा मत कहो राज।" विधी ने थरथराते लबों से कहा___"मरना तो एक दिन सबको ही होता है, फर्क सिर्फ इतना है कि कोई जल्दी मर जाता है तो कोई ज़रा देर से। मगर हर कोई मरता ज़रूर है। मेरे लिए इससे बड़ी भला और क्या बात हो सकती है कि मैं अपने जन्म देने वाले माता पिता के सामने और अपने महबूब की बाहों में मरने जा रही हूॅ। मुझे हॅसते हुए विदा करो मेरे साजन। तुम्हारी ये दासी तुम्हारे इन खूबसूरत अधरों की मुस्कान देख कर मरना चाहती है। मुझसे वादा करों मेरे महबूब कि मेरे जाने के बाद तुम खुद को कभी तक़लीफ़ नहीं दोगे। किसी ऐसी लड़की के साथ अपनी दुनियाॅ बसा लोगे जो तुमसे इस विधी से भी ज्यादा प्यार करे।"
"नहीं विधी नहीं।" मैंने रोते हुए झुक कर उसके माथे से अपना माथा सटा लिया___"मत करो ऐसी बातें। तुम मुझे छोंड़ कहीं नहीं जाओगी। मैं तुम्हारे बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता।"
"क्या यही प्यार करते हो मुझसे?" विधी ने अटकते हुए स्वर में कहा___"बोलो मेरे देवता। ये कैसा प्यार है तुम्हारा कि तुम अपनी इस दासी की अंतिम इच्छा भी पूरी नहीं कर रहे?"
"मैं कुछ नहीं जानता विधी।" मैने मजबूती से सिर हिलाते हुए कहा___"मुझे प्यार व्यार कुछ नहीं दिख रहा। मैं सिर्फ इतना जानता हूॅ कि तुम मुझे अकेला छोंड़ कर कहीं नहीं जाओगी बस।"
"अरे मैं तुम्हें छोंड़ कर कहाॅ जा रही हूॅ राज?" विधी ने मेरे चेहरे को सहला कर कहा___"मेरा दिल मेरी आत्मा तो तुममें ही बसी है। तुम मुझे हर वक्त अपने क़रीब ही महसूस करोगे। ये तो जिस्मों की जुदाई है राज, और इस जिस्म का जुदा होना भी तो ज़रूरी है। क्योंकि मेरा ये जिस्म तुम्हारे लायक नहीं रहा। ये बहुत मैला हो चुका है मेरे महबूब। इसका खाक़ में मिल जाना बहुत ज़रूरी हो गया है।"
"दीदी इसे समझाओ न।" मैने पलट कर दीदी की तरफ देखते हुए कहा___"देखिये कैसी बेकार की बातें कर रही है ये।
इससे कहिये न दीदी कि ये मुझे छोंड़ कहीं न जाए। इससे कहिये न कि मैं इसके बिना जी नहीं पाऊॅगा।"
मेरी बात सुन कर दीदी कुछ बोलने ही वाली थी कि सहसा इधर विधी को फिर से खाॅसी का धचका लगा। मैने पलट कर विधी को देखा। उसके मुख से खून निकल कर बाहर आ गया था।
"रराऽऽज।" विधी ने उखड़ती हुई साॅसों के साथ कहा___"अब मुझे जाना होगा। मुझे वचन दो मेरे हमदम कि तुम मेरे बाद कभी भी खुद को दुखी नहीं रखोगे। अपनी इस दासी को वचन दो मेरे देवता। मुझे हॅसते हुए विदा करो। और....और एक बार अपनी वो मनमोहक मुस्कान दिखा दो न मुझे। मेरे पास समय नहीं है, मेरे प्राण लेने के लिए देवदूत आ रहे हैं। मैं उन्हें अपनी तरफ आते हुए स्पष्ट देख रही हूॅ।"
"नहींऽऽऽ।" मैं बुरी तरह रो पड़ा___"ऐसा मत कहो। मुझे यूॅ छोंड़ कर मत जाओ प्लीऽऽऽज़। मैं मर जाऊॅगा विधी।"
"हठ न करो मेरे महबूब।" विधी को हिचकियाॅ आने लगी थीं, बोली___"मुझे वचन दो राज। मेरी अंतिम यात्रा को आसान बना दो मेरे देवता।"
मेरे दिलो दिमाग़ ने काम करना मानों बंद कर दिया था। मगर विधी की करुण पुकार ने मुझे बिवश कर दिया। मैंने देखा कि उसका एक हाथ मुझसे वचन लेने के लिए हवा में उठा हुआ था। मैने उसके हाॅथ में अपना हाॅथ रख दिया। मेरे हाॅथ को पकड़ कर उसने हल्के से दबाया। उसके निस्तेज पड़ चुके चेहरे पर हल्का सा नूर दिखा।
"अब अपने अधरों की वो खूबसूरत मुस्कान भी दिखा दो राज।" विधी ने बंद होती पलकों के साथ साथ मगर टूटती हुई साॅसों के साथ कहा___"एक मुद्दत हो गई मैने इन अधरों की उस मनमोहक मुस्कान को नहीं देखा। देर न करो मेरे देवता, जल्दी से दिखा दो वो मुस्कान मुझे।"
ये कैसा सितम था मुझ पर कि इस हाल में भी मुझे वो मुस्कुराने को कह रही थी। भला ये कैसे कर सकता था मैं और भला ये कैसे हो सकता था मुझसे? मगर मेरी जान ने ये रज़ा की थी मुझसे। उसकी आख़िरी ख्वाहिश को पूरा करना मेरा फर्ज़ था, भले ही ये मेरे लिए नामुमकिन था। मैने खुद को बड़ी मुश्किल से सम्हाला। रितू दीदी मेरे पीछे ही मुझे पकड़े बैठी हुई थी। सिरहाने की तरफ विधी के माॅम डैड ऑसुओं से तर चेहरा लिए खड़े थे। कुछ दूरी पर वो डाक्टर और नर्स खड़ी थी। जिनके चेहरों पर इस वक्त दुख के भाव गर्दिश कर रहे थे।
मैने देखा कि मेरी बाहों में पड़ी विधी बड़ी मुश्किल से अपनी ऑखें खोले मुझे ही देखने की कोशिश में लगी थी। मेरे ऑखों से रह रह कर ऑसूॅ बह जाते थे। दिलो दिमाग़ के जज़्बात मेरे बस में नहीं थे। मैने खुद को सम्हालने के लिए और अपने अधरों पर मुस्कान लाने के लिए अपनी ऑखें बंद कर बेकाबूॅ हो चुके जज़्बातों पर काबू पाने की नाकाम सी कोशिश की। उसके बाद ऑखें खोल कर मैने विधी की तरफ देखा, मेरे होठों पर बड़ी मुश्किल से हल्की सी मुस्कान उभरी।
मेरी उस मुस्कान को देख कर विधी के सूखे हुए अधरों पर भी हल्की सी मुस्कान उभर आई। और फिर तभी.......
मैने महसूस किया कि उसका जिस्म एकदम से ढीला पड़ गया है। हलाॅकि वो मुझे उसी तरह एकटक देखती हुई हल्का सा मुस्कुरा रही थी। उसके जिस्म में कोई हरकत नहीं हो रही थी। अभी मैं ये सब महसूस ही कर रहा था कि तभी मेरे कानों में विधी की माॅ की ज़ोरदार चीख सुनाई दी। उनकी इस चीख़ से जैसे सबको होश आया और फिर तो जैसे चीखों का और रोने का बाज़ार गर्म हो गया। मुझे मेरे कानों में सबका रुदन स्पष्ट सुनाई दे रहा था मगर मेरी निगाहें अपलक विधी के चेहरे पर गड़ी हुई थी। मैं एकदम से शून्य में खोया हुआ था।
हास्पिटल के उस कमरे में मौजूद विधी के माॅम डैड और रितू दीदी बुरी तरह विधी से लिपटे रोये जा रहे थे। सबसे ज्यादा हालत ख़राब विधी की माॅम की थी। उसके डैड मानो सदमें में जा चुके थे। मेरे कानों में सबका रोना चिल्लाना ऐसे सुनाई दे रहा था जैसे किसी अंधकूप में ये सब मौजूद हों।
सहसा रितू दीदी का ध्यान मुझ पर गया। मैं एकटक विधी की खुली हुई ऑखों को और उसके अधरों पर उभरी हल्की सी उस मुस्कान को देखे जा रहा था। मेरा दिलो दिमाग़ एकदम से सुन्न पड़ा हुआ था। रितू दीदी ने मुझे पकड़ कर ज़ोर से हिलाया। किन्तु मुझ पर कुछ भी असर न हुआ। मेरे चेहरे पर कोई भाव नहीं थे, ऐसा लग रहा था जैसे मैं ज़िंदा तो हूॅ मगर मेरे अंदर किसी प्रकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही है।
"राऽऽऽऽज।" रितू दीदी मुझे पकड़ कर झकझोरते हुए चीखी___"होश में आ मेरे भाई। देख विधी हमे छोंड़ कर चली गई रे। तू सुन रहा है न मेरी बात?"
"शान्त हो जाओ दीदी।" मैने धीरे से उनसे कहा___"मेरी विधी मुझे सुकून से देख रही है। उसे देखने दो दीदी। देखिये न दीदी, मेरी विधी के होंठो पर कितनी सुंदर मुस्कान फैली हुई है। इसे ऐसे ही मुस्कुराने दीजिए। अरे....आप सब इतना शोर क्यों कर रहे हैं? प्लीज़ चुप हो जाइये। वरना मेरी विधी को अच्छा नहीं लगेगा। उसे सुकून से मुस्कुराने दीजिए।"
रितू दीदी ही नहीं बल्कि विधी के माॅम डैड भी मेरी इस बात से सन्न रह गए। जबकि मैं बड़े प्यार से विधी के चेहरे पर आ गई उसके बालों की लट को एक तरफ हटाते हुए उसे देखे जा रहा था। मैं उसकी उस मुस्कान को देख कर खुद भी मुस्कुरा रहा था।
सहसा पीछे से रितू दीदी मुझसे लिपट गई और बुरी तरह सिसकने लगीं। विधी की माॅ ने मेरे सिर पर प्यार से अपना हाॅथ रखा। वो खुद भी सिसक रही थी।
"बेटा, अपने आपको सम्हालो।" वो बराबर मेरे सिर पर हाॅथ फेरते हुए सिसक रही थी___"जाने वाली तो अब चली गई है। वो लौट कर वापस नहीं आएगी। कब तक तुम अपनी इस विधी को इस तरह देखते रहोगे?"
"चुप हो जाइये माॅ।" मैने सिर उठाकर बड़ी मासूमियत से कहा___"कुछ मत बोलिए। देखिए न विधी सुकून से कैसे मुझे देख कर मुस्कुरा रही है।
इसे ऐसे ही मुस्कुराने दीजिए माॅ। इसे डिस्टर्ब मत कीजिए।"
मेरी बातों से सब समझ गए थे कि मुझ पर पागलपन सवार हो चुका है। मैं इस बात को स्वीकार नहीं कर रहा हूॅ कि विधी अब इस दुनियाॅ में नहीं रही। ये देख कर सबकी ऑखों से ऑसू छलकने लगे। विधी के डैड मेरे पास आए और मुझे उन्होंने अपने से छुपका लिया।
"ये कैसा प्यार है बेटा?" फिर वो रुॅधे हुए गले से बोल पड़े___"तुम दोनो का ये प्रेम हमें पहले क्यों नहीं पता चल पाया? तुम्हारे जैसा दामाद मुझे मिलता तो जैसे मुझे सारी दुनियाॅ की दौलत मिल जाती। हे भगवान कितना बेरहम है तू। मेरे मासूम से बच्चों के साथ इतना बड़ा घात किया तुमने? तेरा कलेजा ज़रा भी नहीं काॅपा?"
विधी के डैड खुद को सम्हाल न सके और वो मुझे अपने से छुपकाए बुरी तरह रो पड़े। पास ही में खड़े डाक्टर और नर्स भी हम सबकी हालत देख कर बेहद दुखी नज़र आ रहे थे। ख़ैर, काफी देर तक यही माहौल कायम रहा। हर कोई मुझे समझा रहा था, बहला रहा था मगर मैं बस यही कहता जा रहा था कि___"आप सब शान्त रहिए, मेरी विधी को यूॅ शोर करके डिस्टर्ब मत कीजिए।"
उस वक्त तो मेरा दिमाग़ ही ख़राब हो गया जब सब लोग मुझे विधी से अलग करने लगे। डाक्टर ने एम्बूलेन्स का इंतजाम कर दिया था। इस लिए विधी के डैड अब अपनी बेटी के मृत शरीर को हास्पिटल से ले जाने के लिए मुझे विधी से अलग करने लगे। मैं विधी से अलग नहीं हो रहा था। सब मुझे समझा रहे थे। विधी की माॅ मेरे इस पागलपन से बुरी तरह रोते हुए मुझे अपने से छुपकाये हुए थी। रितू दीदी मुझे छोंड़ ही नहीं रही थी।
आख़िर, सबके समझाने बुझाने के बाद और काफी मसक्कत करने के बाद मैं विधी से अलग हुआ। मगर मैने विधी को हाथ नहीं लगाने दिया किसी को। मैने खुद ही उसे अपनी बाहों में उठा लिया और फिर सबके ज़ोर देने पर कमरे से बाहर की तरफ बढ़ चला। मेरे चेहरे पर दुख दर्द के कोई भाव नहीं थे। मैं अपनी बाहों में विधी को लिए बाहर की तरफ आ गया। विधी की जो ऑखें पहले खुली हुई थी उन ऑखों को उनकी पलकों के साथ विधी के डैड ने अपनी हॅथेली से बंद कर दिया था। किन्तु उसके अधरों पर फैली हुई वो मुस्कान अभी भी वैसी ही कायम थी।
थोड़ी ही देर में हम सब हास्पिटल के बाहर आ गए। हास्पिटल के बाहर एम्बूलेन्स खड़ी थी। बाएॅ साइड मोटर साइकिल खड़ी थी जिसके पास ही खड़ा पवन किसी गहरे ख़यालों में खोया हुआ खड़ा था। हास्पिटल के बाहर आते ही जब कुछ शोर शराबा हुआ तो बरबस ही पवन का ध्यान हमारी तरफ गया। उसने पलट कर देखा हमारी तरफ। मेरी बाहों में विधी को इस हालत में देख कर वह सकते में आ गया। पलक झपकते ही उसकी हालत ख़राब हो गई। अपनी जगह पर खड़ा वो पत्थर की मूर्ति में तब्दील हो गया।
इधर थोड़ी ही देर में मैं विधी को लिए एम्बूलेन्स में सवार हो गया।
मेरे साथ ही रितू दीदी, विधी की माॅ और उसके डैड बैठ गए। हम लोगों के बैठते ही एम्बूलेन्स का पिछला दरवाजा बंद ही किया जा रहा था कि सहसा भागते हुए पवन हमारे पास आया। एम्बूलेन्स के अंदर का दृष्य देखते ही उसके होश फाख्ता हो गए। एक स्ट्रेचर की तरह दिखने वाली लम्बी सी पाटरी पर विधी को सफेद कफन में गले तक ढॅका देखते ही पवन की ऑखें छलछला आईं। वो बुरी तरह मुझे देखते हुए रोने लगा। जबकि मैं एकदम शान्त अवस्था में विधी के होठों पर उभरी उस मुस्कान को देखे जा रहा था।
पवन के रोने की आवाज़ जैसे ही मेरे कानों में पड़ी मैने तुरंत पवन की तरफ देखा और उॅगली को अपने होठों पर रख कर उसे चुप रहने का इशारा किया। मेरे चेहरे के आव भाव देख कर पवन का कलेजा फटने को आ गया। वो बिना एक पल गवाॅए एम्बूलेन्स में चढ़ कर मेरे पास आ गया और मुझे शख्ती से पकड़ कर खुद से छुपका लिया। उसकी ऑखों से ऑसू रुक ही नहीं रहे थे।
रितू दीदी ने पवन को समझा बुझा कर चुप कराया और उसे घर जाने को कहा। किन्तु पवन मुझे छोंड़ कर जाने को तैयार ही नहीं हो रहा था। इस लिए रितू दीदी ने उसे समझाया कि उसका घर में रहना बहुत ज़रूरी है। क्योंकि उसके डैड यानी अजय सिंह का कोई भरोसा नहीं था कि वो क्या कर बैठे। ये तो उसे पता चल ही जाएगा कि राज यहाॅ पर किसके यहाॅ आया है? अगर उसे पता चल गया कि वो पवन के यहाॅ आया है तो उसके घर वालों के लिए ख़तरा हो जाएगा। रितू दीदी के बार बार समझाने पर पवन दुखी मन से एम्बूलेन्स से उतर गया।
पवन के उतरते ही एम्बूलेन्स चल पड़ी। विधी की माॅ अभी भी धीमी आवाज़ में सिसक रही थी। सामने की शीट पर विधी के माॅम डैड बैठे थे और इधर की शीट पर मैं व रितू दीदी। हमारे बीच का पोर्शन जो खाली था उसमें विधी को बड़ी सी स्ट्रेचर रूपी पाटरी पर लिटाया गया था। मैं एकटक उसकी मुस्कान को घूरे जा रहा था। मेरे लिए दुनियाॅ जहान से जैसे कोई मतलब नहीं था।
रितू दीदी को जैसे कुछ याद आया तो उन्होंने पाॅकेट से मोबाइल निकाल कर किसी से कुछ देर कुछ बात की और फिर काल कट करके मोबाइल पुनः अपनी पाॅकेट में डाल लिया। कुछ समय बाद ही एम्बूलेन्स रुकी और थोड़ी ही देर में पिछला गेट खुला तो विधी के माॅम डैड बाहर आ गए। उनके साथ ही रितू दीदी भी एम्बूलेन्स से बाहर आ गई। रितू दीदी ने मेरा हाॅथ पकड़ कर बाहर आने का इशारा किया। मैं बाहर की तरफ अजीब भाव से देखने लगा। सब मुझे ही दुखी भाव से देख रहे थे।
ख़ैर, हास्पिटल से आए दो कर्मचारियों ने उस स्ट्रेचर को बाहर निकाला जिस पर विधी लेटी हुई थी। स्ट्रेचर को बाहर निकाल कर उन्होंने उसे ज़मीन पर रखना ही चाहा था कि मैंने उन्हें पकड़ लिया। जिससे हवा में ही उन लोगों ने स्ट्रेचर को उठाये रखा। मैने विधी को अपनी बाहों में उठा लिया।
विधी के माॅम डैड ये देख कर एक बार फिर से रो पड़े।
विधी को लेकर मैं विधी के घर की तरफ बढ़ा तो विधी के माॅम डैड भी आगे आ गए। आस पास के लोगों ने देखा तो कुछ ही समय में वहाॅ भीड़ जमा हो गई। आस पास के जिन लोगों से इनके अच्छे संबंध थे उन लोगों ने ये सब देख कर भारी दुख जताया। लगभग एक घण्टे बाद फिर से विधी को एक लकड़ी की स्ट्रेचर बना कर उसमे लिटाया गया। इन सब कामों के बीच मैं बराबर विधी के पास ही था और मेरे पास रितू दीदी मौजूद रहीं।
उस वक्त दिन के चार बज रहे थे जब मैं विधी के जनाजे को तीन और आदमियों के साथ लिए मरघट में पहुॅचा था। आगे की तरफ मैं और विधी के डैडी अपने अपने कंधे पर जनाजे का एक एक छोर रखा हुआ था। काफी सारे लोग हमारे साथ थे। मेरे चेहरे पर कोई भाव नहीं था। इतना कुछ होने के बाद भी मैं आश्चर्यजनक रूप से एकदम शान्त चित्त था। मरघट में पहुॅच कर हमने विधी के जनाजे को वहीं ज़मीन पर रखा। कुछ औरतें साथ आई हुई थी। उन लोगों ने वहाॅ पर कपड़ों के द्वारा चारो तरफ से पर्दा करके विधी को नहलाया धुलाया और फिर उसे कपड़े पहनाए। इसके बाद उसे लकड़ी की चिता पर लेटा दिया गया।
विधी को चिता में लेटे देख सहसा मुझे ज़ोर का झटका लगा। मेरी ऑखों के सामने पिछली सारी बातें बड़ी तेज़ी से घूमने लगीं। चिता के चारो तरफ सफेद कपड़ों में खड़े लोगों पर मेरी दृष्टि पड़ी। उन सबको देखने के बाद मेरी नज़र चिता पर सफेद कपड़ों में लिपटी विधी पर पड़ी। उसे उस हालत में देखते ही सहसा मेरे अंदर ज़ोर का चक्रवात सा उठा।
"विधीऽऽऽऽऽ।" मैं पूरी शक्ति से चीख पड़ा और भागते हुए चिता के पास पहुॅच गया। सफेद कपड़ों में ऑखें बंद किये लेटी विधी के चेहरे को देख कर मैं उससे लिपट गया और फूट फूट कर रोने लगा। पल भर में मेरी हालत ख़राब हो गई। विधी के चेहरे को दोनो हाॅथों से पकड़े मैं दहाड़ें मार मार कर रोये जा रहा था।
मुझे इस तरह विधी से लिपट कर रोते देख कुछ लोग भागते हुए मेरे पास आए और मुझे विधी के पास से खींच कर दूर ले जाने लगे। मैने उन सबको झटक दिया, वो सब दूर जाकर गिरे। खुद को उनके चंगुल से छुड़ाते ही मैं फिर से भागते हुए विधी के पास आया और फिर से उससे लिपट कर रोने लगा। मुझे इस हालत में ये सब करते देख विधी के डैड और रितू दीदी दौड़ कर मेरे पास आईं और मुझे विधी के पास से दूर ले जाने लगीं।
"खुद को सम्हालो राज।" रितू दीदी बुरी तरह रोते हुए बोली___"ये क्या पागलपन है? तुम ऐसा कैसे कर सकते हो? तुम अपनी विधी को दिये हुए वचन को कैसे तोड़ सकते हो? क्या तुम भूल गए कि अंतिम समय में विधी ने तुमसे क्या वचन लिया था?"
"दीदी विधी मुझे छोंड़ कर कैसे जा सकती है?" मैं उनसे लिपट कर रोते हुए बोला___"उससे कहो कि वो उठ कर मेरे पास आए।"
"अपने आपको सम्हालो बेटा।
" सहसा विधी के डैड ने दुखी भाव से कहा___"इस तरह विलाप करने से तुम अपनी विधी की आत्मा को ही दुख दे रहे हो। ज़रा सोचो, वो तुम्हें इस तरह दुखी होकर रोते हुए देख रही होगी तो उस पर क्या गुज़र रही होगी? क्या तुम अपनी विधी को उसके मरने के बाद भी दुखी करना चाहते हो?"
"नहीं हर्गिज़ नहीं पापा जी।" मैंने पूरी ताकत से इंकान में सिर हिलाया___"मैं उसे ज़रा सा भी दुख नहीं दे सकता और ना ही उसे दुखी देख सकता हूॅ।"
"तो फिर ये पागलपन छोंड़ दो बेटे।" विधी के डैड मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बोले___"अगर तुम इस तरह दुखी होगे और रोओगे तो विधी को बिलकुल अच्छा नहीं लगेगा बल्कि उसे बहुत ज्यादा दुख होगा इस सबसे। इस लिए बेटा, अपने अंदर के जज़्बातों को शान्त करने की कोशिश करो और खुशी खुशी अपनी विधी को चिताग्नि दो। हाॅ बेटे, अब तुम्हें ही उसे चिताग्नि देनी है। तुम दोनो का रिश्ता आत्माओं से जुड़ा हुआ है इस लिए उसे चिताग्नि देने का हक़ सिर्फ तुम्हारा ही है। मेरी बेटी भले ही अब इस दुनियाॅ में नहीं है, मगर मेरे लिए तुम ही मेरे दामाद व बेटे रहोगे हमेशा। अब चलो बेटा और अपनी विधी को चिताग्नि दो।"
"अगर आप खुद इस बात को इस तरह कुबूल करके कहते हैं तो ठीक है पापा जी।" मैने दुखी भाव से कहा___"मगर मैं भी उसे यूॅ ही चिताग्नि नहीं दूॅगा। बल्कि उसे पहले सुहागन बना कर अपनी पत्नी बनाऊॅगा। फिर उसे चिताग्नि दूॅगा।"
मेरी ये बातें सुन कर विधी के डैड की ही नहीं बल्कि हर किसी की ऑखों से ऑसू छलक पड़े। विधी के डैड ने मुझे अपने सीने से लगा लिया। पंडित वहाॅ पर मौजूद था ही इस लिए सबकी सहमति से मैं विधी के पास गया और एक औरत के हाॅथ में मौजूद सिंदूर की डिबिया से अपनी दो चुटकियों में सिंदूर लिया और फिर उसे विधी की सूनी माॅग में भर दिया। मैंने अपने अंदर के जज़्बातों को लाख रोंका मगर मेरे ऑसुओं ने जैसे ऑखों से बगावत कर दी।
रितू दीदी और विधी के डैड दोनो ने मुझे कंधों से पकड़ा। मैने विधी की माॅग में सिंदूर भर कर उसे सुहागन बनाया, फिर उसके माथे को चूम कर पीछे हट गया। शान्त पड़े मरघट में एकाएक ही तेज़ हवा चली और फिर दो मिनट में ही शान्त हो गई। ये कदाचित इशारा था विधी का कि मेरी इस क्रिया से वह कितना खुश हो गई है।
पंडित ने कुछ देर कुछ पूजा करवाई और फिर उसने मुझसे अंतिम संस्कार की सारी विधि करवाई। तत्पश्चात मेरे हाथ में एक मोटा सा डण्डा पकड़ाया जिसके ऊपरी छोर पर मशाल की तरह आग जल रही थी। पंडित के ही निर्देश पर मैने उस मशाल से विधी को चिताग्नि दी।
देखते ही देखते लकड़ी की उस चिता पर आग ने अपना प्रभाव दिखाया और वह उग्र से उग्र होती चली गई। मैं भारी मन से विधी की जलती हुई चिता को देखे जा रहा था। मेरे पास रितू दीदी और विधी के माॅम डैड खड़े थे।
कुछ समय बाद वहाॅ पर मौजूद लोग वहाॅ से धीरे धीरे जाने लगे। अंत में सिर्फ हम चार लोग ही रह गए।
विधी के डैड के ज़ोर देने पर ही मैं उनके साथ घर की तरफ वापस चला। मेरे अंदर भयंकर तूफान चल रहा था। मगर मैने शख्ती से उसे दबाया हुआ था। मुझे लग रहा था कि मैं दहाड़ें मार मार कर खूब रोऊॅ। उस ऊपर वाले से चीख चीख कर कहूॅ कि वो मेरी विधी को सही सलामत वापस कर दे मुझे। मगर कदाचित ऐसा होना अब संभव नहीं था। ख़ैर भारी मन के साथ ही हम सब घर आ गए।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
इस सब में शाम हो चुकी थी। रितू दीदी के फोन पर पवन का बार बार काल आ रहा था। इस वक्त मैं और रितू दीदी विधी के घर पर ही थे। घर में कोई न कोई बाहरी आदमी आता और शोग प्रकट करके चला जाता। धीरे धीरे शाम का अॅधेरा भी छाने लगा था। विधी के माॅम डैड ने मुझे और रितू दीदी को भी घर जाने को कहा। हम लोगों का वहाॅ से आने का मन तो नहीं था पर मजबूरी थी। इस लिए रितू दीदी मुझे लेकर वहाॅ से चल दी।
रास्ते में रितू दीदी के मोबाइल पर किसी का काल आया तो उन्होने देखा उसे और काल को पिक कर मोबाइल कान से लगा लिया। कुछ देर तक उन्होंने जाने क्या बात की फिर उन्होंने काल कट कर दी।
हास्पिटल के पास आते ही मैने देखा कि उनके सामने एक पुलिस जिप्सी आकर रुकी। रितू दीदी ने मुझे उस पर बैठने को कहा तो मैं चुपचाप बैठ गया। पुलिस जिप्सी से एक आदमी बाहर निकला। उसने दीदी को सैल्यूट किया।
"अब तुम जाओ रामसिंह।" रितू दीदी ने उससे कहा___"बाॅकी लोगों को भी सूचित कर देना कि सावधान रहेंगे और उन पर नज़र रखे रहेंगे।"
"यह मैडम।" उस आदमी ने कहने के साथ ही पुनः सैल्यूट किया और एक तरफ बढ़ गया।
उस आदमी के जाते ही दीदी जिप्सी की ड्राइविंग शीट पर बैठीं और उसे यूटर्न देकर एक तरफ को बढ़ा दिया। दीदी के बगल वाली शीट पर मैं चुपचाप बैठा था। मेरी ऑखें शून्य में डूबी हुई थी। मुझे पता ही नहीं चला कि जिप्सी कहाॅ कहाॅ से चलते हुए कब रुक गई थी। चौंका तब जब दीदी की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी। मैने इधर उधर देखा तो पता चला कि ये तो पवन के घर के सामने जिप्सी पर बैठा हुआ हूॅ मैं।
ये देख कर मैं जिप्सी से बिना कुछ बोले उतर गया और पवन के घर के अंदर की तरफ बढ़ा ही था कि सहसा दीदी ने कहा___"मेरी बात सुनो राज।"
दीदी की इस बात से मैने पलट कर उन्हें देखा। वो जिप्सी से उतर कर मेरे पास ही आ गई। तब तक जिप्सी की आवाज़ सुन कर अंदर से पवन और आदित्य भी आ गए थे। पवन और आदित्य मुझे देखते ही मुझसे लिपट कर रोने लगे। शायद पवन ने आदित्य को सारी कहानी बता दी थी। कुछ देर वो दोनो मुझसे लिपटे रोते रहे। उसके बाद रितू दीदी के कहने पर वो दोनो अलग हुए।
"मैं जानती हूॅ कि इस वक्त तुम लोग कहीं भी जाने की हालत में नहीं हो।" दीदी ने गंभीरता से कहा___"खास कर राज तो बिलकुल भी नहीं।
मगर मैं ये भी जानती हूॅ कि तुम लोगों का यहाॅ पर रुकना भी सही नहीं है। इस लिए तुम सब मेरे साथ ऐसी जगह चलो जहाॅ पर तुम लोगों के होने की उम्मीद मेरे डैड कर ही नहीं सकते। हाॅ पवन, तुम सब मेरे फार्महाउस पर चल रहे हो अभी के अभी।"
"शायद आप ठीक कह रही हैं दीदी।" पवन ने बुझे मन से कहा___"मगर इतने सारे सामान के साथ हम सब एकसाथ कैसे वहाॅ जा सकेंगे? और कैसे जा सकेंगे? क्योंकि संभव है कि रास्ते में ही कहीं हमे अजय चाचा या उनके आदमी मिल जाएॅ।"
"उसकी चिंता तुम मत करो भाई।" दीदी ने कहा___"मैने वाहन का इंतजाम कर दिया है। लो वो आ भी गया।"
दीदी के कहने पर पवन ने पलट कर देखा तो सच में एक ऐसा वाहन उसे दिखा जिसे देख कर वो चौंक गया। दरअसल वो वाहन एक एम्बूलेन्स था। मेरी नज़र भी एम्बूलेन्स पर पड़ी तो उसे देख कर अनायास ही मेरा मन भारी हो गया। लाख रोंकने के बावजूद मेरी ऑखों से ऑसू छलक गए। ये देख कर रितू दीदी ने मुझे अपने सीने से लगा लिया।
"नहीं मेरे भाई।" रितू दीदी ने तड़प कर कहा__"ऐसे मत रो। तू नहीं जानता कि तेरी ऑखों से अगर ऑसू का एक कतरा भी गिरता है तो मेरे दिल में नस्तर सा चल जाता है। मैं जानती हूॅ कि इस सबको भूलना या इससे बाहर निकलना इतना आसान नहीं है तेरे लिए मगर खुद को सम्हालना तो पड़ेगा ही भाई। किसी और के लिए न सही मगर अपनी उस विधी के लिए जिसको तुमने वचन दिया है।"
"कैसे दीदी कैसे?" मेरी रुलाई फूट गई___"कैसे मैं उस सबको भुला दूॅ? मुझे तो अभी भी यकीन नहीं हो रहा है कि ऐसा कुछ हो गया है।"
"बस कुछ मत बोल मेरे भाई।" रितू दीदी ने मेरी ऑखों से ऑसू पोंछते हुए कहा___"शान्त हो जा। सब कुछ ठीक हो जाएगा। भगवान जब दुख देता है तो उसे सहने की शक्ति भी देता है। तू अपने अंदर उस शक्ति को महसूस कर भाई।"
मैं कुछ न बोला। मेरी इस हालत से पवन और आदित्य की ऑखों से भी ऑसू बहने लगे थे।
"पवन तुमने ये बात चाची और आशा को तो नहीं बताई न?" दीदी ने पवन से पूछा था।
दीदी के पूछने पर पवन ने अपना सिर झुका लिया। दीदी को समझते देर न लगी कि उसने ये बातें सबको बता दी है। अभी दीदी कुछ कहने ही वाली थी कि अंदर से रोने की आवाज़ें आने लगीं जो प्रतिपल तीब्र होती जा रही थी। रितू दीदी तेज़ी से मुझे लिये अंदर की तरफ बढ़ी। उनके पीछे पवन और आदित्य भी बढ़ चले।
अंदर बैठक तक भी न पहुॅचे थे कि रास्ते में ही पवन की माॅ और बहन रोते हुए मिल गईं। शायद उनको पता चल गया था कि मैं आ गया हूॅ। इस लिए दोनो ही रोते हुए बाहर की तरफ भागी चली आ रही थी। मुझ पर नज़र पड़ते ही वो दोनो मुझसे लिपट कर बुरी तरह रोने लगीं। आशा दीदी की हालत तो बहुत ख़राब थी। वो मुझसे लिपटी बहुत ज्यादा रो रही थी। उन दोनो को देख कर मेरी भी रुलाई फूट पड़ी थी। रितू दीदी ने बड़ी मुश्किल से हम तीनों को चुप कराया। मगर आशा दीदी सिसकती रहीं।
"चाची आप तो समझदार हैं न।" रितू दीदी कह रही थी___"आपको तो समझना चाहिए न कि इस तरह रोने से राज को और भी ज्यादा तक़लीफ़ होगी। ये तो वैसे भी इसी सदमें में डूबा हुआ है। आपको तो इसे सम्हालना चाहिए पर आप दोनो तो खुद रो रो कर इसके दुख को बढ़ा रही हैं।"
रितू दीदी की बात माॅ के समझ में आ गई थी इस लिए उन्होंने जल्दी से अपने ऑसू पोंछ लिए और मुझे अपने से छुपका कर मुझे प्यार दुलार करने लगीं।
"पवन तुम दोनो सामान को जल्दी से उस वाहन पर रखो और जल्द से जल्द यहाॅ से चलने की तैयारी करो।" रितू दीदी ने पवन की तरफ देखते हुए कहा। दीदी के कहने पर पवन और आदित्य दोनो अंदर की तरफ बढ़ गए। कुछ ही देर में जो कुछ भी ज़रूरी सामान पैक कर दिया गया था उसे लाकर बाहर खड़ी एम्बूलेन्स में रख दिया उन दोनो ने।
सामान रख जाने के बाद रितू दीदी ने हम सबको उस एम्बूलेन्स में बैठने को कहा और खुद अकेले जिप्सी में बैठ गईं। घर से बाहर आकर माॅ ने दरवाजे पर ताला लगा दिया और मुझे साथ में लिये एम्बूलेन्स में बैठ गईं। पवन आदित्य और आशा दीदी पहले ही उसमें बैठ चुके थे। हम लोगों के बैठते ही रितू दीदी ने एम्बूलेन्स के ड्राइवर को अपने पीछे आने का इशारा कर दिया।
रितू दीदी के दिमाग़ की दाद देनी होगी, क्योंकि उन्होंने बहुत कुछ सोच कर वाहन के रूप में एम्बूलेन्स को चुना था। उनकी सोच थी कि एम्बूलेन्स में हम लोगों के बैठे होने की उनके डैड कल्पना भी न कर सकेंगे। और ऐसा हुआ भी। रास्ते में कहीं पर भी हमें अजय सिंह या उसका कोई आदमी नहीं मिला। एक जगह मिला भी पर उन लोगों ने एम्बूलेन्स पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। एम्बूलेन्स के सौ मीटर की दूरी पर रितू दीदी की जिप्सी आगे आगे चल रही थी। इतनी दूरी इस लिए ताकि कोई ये भी शक न करे कि एम्बूलेन्स रितू दीदी के साथ ही है।
ऐसे ही हम हल्दीपुर गाॅव से बाहर आ गए और उस नहर के पुल के पास से हम लोग पूर्व दिशा की तरफ मुड़ गए। लगभग बीस मिनट बाद हम सब दीदी के फार्महाउस पर पहुॅच गए। दीदी को ये भी पता चल चुका था कि मेरे साथ करुणा चाची और उनके बच्चों को भी मुम्बई जाना था मगर इस सबके हो जाने से उन्होंने मेरे फोन से करुणा चाची को फोन कर कह दिया था कि मैं आज नहीं जा रहा बल्कि वो अपने भाई के साथ यहीं पर आ जाएॅ कल।
फार्महाउस पर पहुॅच कर दीदी ने एम्बूलेन्स से सारा सामान उतरवा कर अंदर रखवा दिया। एम्बूलेन्स के जाने के बाद हम सब अंदर की तरफ बढ़ चले। अंदर ड्राइंगरूम में ही सोफे पर बैठी नैना बुआ पर मेरी नज़र पड़ी तो मैं हल्के से चौंका। नैना बुआ मुझे देखते ही सोफे से उठ कर भागते हुए मेरे पास आईं और झटके से मुझे अपने सीने से लगा लिया। उनकी ऑखों में ढेर सारे ऑसू आ गए थे मगर उन्होने उन्हें छलकने नहीं दिया। अपने जज़्बातों को बड़ी मुश्किल से दबाया हुआ था उन्होंने।
शायद दीदी ने उन्हें सबकुछ बता दिया था और समझा भी दिया था कि मुझसे मिल कर वो ज्यादा रोयें नहीं।
ख़ैर, ऐसे माहौल में हम सब बेहद दुखी थे इस लिए उस रात किसी ने अन्न का एक दाना तक अपने मुख में नहीं डाला। रात में मेरे साथ बेड पर मेरे एक तरफ रितू दीदी थीं तो दूसरी तरफ आशा दीदी। सारी रात किसी भी ब्यक्ति को नींद नहीं आई। सबने मुझे अपने अपने तरीके से बहुत समझाया था। तब जाकर मुझे कुछ होश आया था। बेड पर मैं अपनी दोनो बहनों के बीच लेटा ऊपर घूम रहे पंखे को देखता रहा। सारी रात ऐसे ही गुज़र गई। मेरी दोनो बहनें अपने हृदय में मेरे प्रति दुख छुपाए मुझे अपनी अपनी तरफ से छुपकाए यूॅ ही लेटी रह गईं थी। आने वाली सुबह मेरे जीवन में और कैसे दुख दर्द की भूमिका बनाएगी इसके बारे में वक्त के सिवा कोई नहीं जानता था।
दोस्तो, अपडेट हाज़िर है,,,,,,,,
मैं नहीं जानता दोस्तो कि इस अपडेट में मैं वो सब डाल पाया हूॅ या नहीं जिन चीज़ों ने आप सबके दिलो दिमाग़ को हिला कर रख दिया हो। इतना ज़रूर कहूॅगा कि पिछले सभी एक से लेकर 44 अपडेट तक लिखना मेरे लिए इतना मुश्किल काम नहीं लगा था जितना कि इस अपडेट को लिखने में लगा है।
ख़ैर, आप सबकी खूबसूरत प्रतिक्रियाएॅ और शानदार फीडबैक का इन्तज़ार रहेगा।
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.......《 46 》
अब तक,,,,,,,,
ऐसे ही हम हल्दीपुर गाॅव से बाहर आ गए और उस नहर के पुल के पास से हम लोग पूर्व दिशा की तरफ मुड़ गए। लगभग बीस मिनट बाद हम सब दीदी के फार्महाउस पर पहुॅच गए। दीदी को ये भी पता चल चुका था कि मेरे साथ करुणा चाची और उनके बच्चों को भी मुम्बई जाना था मगर इस सबके हो जाने से उन्होंने मेरे फोन से करुणा चाची को फोन कर कह दिया था कि मैं आज नहीं जा रहा बल्कि वो अपने भाई के साथ यहीं पर आ जाएॅ कल।
फार्महाउस पर पहुॅच कर दीदी ने एम्बूलेन्स से सारा सामान उतरवा कर अंदर रखवा दिया। एम्बूलेन्स के जाने के बाद हम सब अंदर की तरफ बढ़ चले। अंदर ड्राइंगरूम में ही सोफे पर बैठी नैना बुआ पर मेरी नज़र पड़ी तो मैं हल्के से चौंका। नैना बुआ मुझे देखते ही सोफे से उठ कर भागते हुए मेरे पास आईं और झटके से मुझे अपने सीने से लगा लिया। उनकी ऑखों में ढेर सारे ऑसू आ गए थे मगर उन्होने उन्हें छलकने नहीं दिया। अपने जज़्बातों को बड़ी मुश्किल से दबाया हुआ था उन्होंने। शायद दीदी ने उन्हें सबकुछ बता दिया था और समझा भी दिया था कि मुझसे मिल कर वो ज्यादा रोयें नहीं।
ख़ैर, ऐसे माहौल में हम सब बेहद दुखी थे इस लिए उस रात किसी ने अन्न का एक दाना तक अपने मुख में नहीं डाला। रात में मेरे साथ बेड पर मेरे एक तरफ रितू दीदी थीं तो दूसरी तरफ आशा दीदी। सारी रात किसी भी ब्यक्ति को नींद नहीं आई। सबने मुझे अपने अपने तरीके से बहुत समझाया था। तब जाकर मुझे कुछ होश आया था।
बेड पर मैं अपनी दोनो बहनों के बीच लेटा ऊपर घूम रहे पंखे को देखता रहा। सारी रात ऐसे ही गुज़र गई। मेरी दोनो बहनें अपने हृदय में मेरे प्रति दुख छुपाए मुझे अपनी अपनी तरफ से छुपकाए यूॅ ही लेटी रह गईं थी। आने वाली सुबह मेरे जीवन में और कैसे दुख दर्द की भूमिका बनाएगी इसके बारे में वक्त के सिवा कोई नहीं जानता था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,,
उधर, दोपहर से शाम और शाम से रात हो गई मगर अजय सिंह और शिवा को अपने उन आदमियों का कहीं कोई सुराग़ तक न मिल सका जिन आदमियों ने उन्हें विराज के आने की ख़बर दी थी। कहने का मतलब ये कि भीमा और मंगल आदि में से कोई भी अजय सिंह का भरोसेमंद आदमी अजय सिंह को न मिला। इस बात से दोनो बाप बेटे बेहद परेशान हो चुके थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि उसके आदमी एक साथ सारे के सारे कैसे गायब हो गए?
अजय सिंह के बाॅकी के आदमी तो उसे मिले लेकिन उन लोगों को ना तो विराज का कोई सुराग़ मिला था और ना ही उन्हें ये पता था कि भीमा और मंगल के साथ साथ रहे बाॅकी आदमी कहाॅ और कैसे गायब हो गए? हैरान परेशान दोनो बाप बेटे वापस अपने नये वाले फार्म हाउस पर लौट आए थे। अपने बाॅकी बचे आदमियों को शख्त आदेश भी दे आए थे कि विराज के साथ साथ अपने उन गायब हुए आदमियों की भी खोज ख़बर करते रहें।
इस वक्त अजय सिंह और शिवा अपने फार्महाउस के ड्राइंगरूम में रखे सोफों पर चिंतित व परेशान हालत में बैठे थे। उन दोनो के सामने वाले सोफे पर प्रतिमा भी बैठी हुई थी। उसकी नज़रें दोनो बाप बेटों के चेहरों पर उभरे हुए भावों पर थी। उसे समझते ज़रा भी देर न लगी थी कि दोनो बाप बेटे शिकस्त खाकर आए हैं। पर जाने क्यों प्रतिमा को इस बात का पहले से ही अंदेशा था कि ऐसा ही कुछ होगा।
"ये तो कमाल ही हो गया न अजय।" प्रतिमा ने अजीब भाव से कहा___"तुम्हारे इतने सारे हट्टे कट्टे आदमियों ने एक बार फिर से तुम्हें नीचा दिखा दिया। तुम्हारी बड़ी बड़ी वो बातें महज कोरी बकवास के सिवा कुछ न थी। तुमने और तुम्हारे आदमियों ने आज तक वो काम किया ही नहीं जिस काम को 'फतह' के नाम से जाना जाता है। हर बार तुम अपने मंसूबों पर नाकामयाब ही हुए हो अजय। तुम्हारे पास पिछला ऐसा कोई काम नहीं है जिसका हवाला देकर तुम ये कह सको कि तुमने उस काम को सफलतापूर्वक किया था।"
प्रतिमा की इन बातों पर दोनो बाप बेटों के चेहरे झुक से गए थे। ऐसा लग रहा था जैसे उन दोनो में से किसी में भी बोलने की हिम्मत शेष न हो। ये अलग बात थी कि अजय सिंह के चेहरे पर भूकंप के से भाव अनायास ही गर्दिश करते नज़र आते और फिर वो लुप्त हो जाते।
"एक अदने से लड़के को पकड़ने गए थे तुम्हारे आदमी और खुद ही सारे के सारे गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो गए।
" प्रतिमा ने फिर कहना शुरू किया___"इस बात को कौन हजम कर पाएगा अजय? क्या तुम खुद हजम कर पा रहे हो कि तुम्हारे इतने सारे आदमियों के रहते हुए भी वो विराज को पकड़ने की तो बात दूर बल्कि खुद अपना ही ख़याल नहीं रख सके? क्या तुम ये कल्पना कर सकते हो कि अकेले विराज ने तुम्हारे इतने सारे आदमियों को इस तरह से गायब कर दिया कि तुम दोनो बाप बेटे उनका पता भी नहीं लगा सके?"
"यकीनन प्रतिमा।" सहसा अजय सिंह ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"ये सच है कि इस सबकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। ये सब जो कुछ भी हुआ है और जैसे भी हुआ है उसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। मगर, इस सब में अकेले विराज बस का हाॅथ नहीं हो सकता।"
"क्या मतलब है तुम्हारा?" प्रतिमा हल्के से चौंकी थी।
"मतलब साफ है प्रतिमा।" अजय सिंह ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा___"मेरे इतने सारे आदमियों को एक साथ गायब कर देना कोई आसान बात नहीं है। मगर ये भी सच है कि ऐसा ही हुआ है। इस लिए इस काम को विराज खुद अकेले नहीं कर सकता। इस काम में ज़रूर उसकी किसी ने मदद की है। तुम खुद सोचो प्रतिमा कि मेरे बारह मुस्टंडे जैसे आदमियों को परास्त करना या उन्हें उस हालत पर ले आना कि वो अधमरे ही हों जाएॅ ये काम कितना मुश्किल हो सकता है? नहीं प्रतिमा नहीं, मैं किसी सूरत में नहीं मान सकता कि ये सब अकेले विराज ने किया है।"
"चलो मान लिया कि ये सब अकेले विराज नहीं कर सकता।" प्रतिमा ने कहा___"बल्कि इस काम में किसी ने उसकी मदद की, मगर सवाल ये है कि किसने की उसकी मदद? यहाॅ पर ऐसा कौन है जो इस तरीके से विराज की मदद कर सकता है?"
"मुझे लगता है कि इस बारे में हमें शुरू से सोच विचार करना चाहिए।" अजय सिंह ने कहने के साथ ही शिगार सुलगा लिया___"हाॅ प्रतिमा, हमें इस बारे में शुरू से विचार विमर्ष करना होगा, वो भी बड़ी बारीकी से। ग़लती तो यकीनन हुई है हमसे। हमने शुरू से ही विराज को बहुत छोटा समझा था। हमारे मन में ये बात बैठी हुई थी कि वो ये सब कर ही नहीं सकता। हमने हमेशा उसकी औकात पर सवाल उठाया, शायद इसी का ये परिणाम है कि हम शुरू से हर बात में नाकामी का स्वाद चख रहे हैं। मगर अब हमें समझ आ चुका है डियर। हमें समझ आ चुका है कि हमारे साथ ये सब एक खेल ही हो रहा है शुरू से। एक अच्छा खिलाड़ी वही होता है जो अपने प्रतिद्वंदी को कभी भी कम करके न ऑके, बल्कि उसे भी अपनी तरह ही उच्च कोटि का खिलाड़ी समझे। तभी हमें समझ आता है कि अब हमें किस तरह की अब हमें किस तरह की चाल चलना चाहिए? मगर ये सब बातें मैने कभी भी सोचने की जहमत नहीं की।"
"शुकर है अजय।" प्रतिमा ने कहा___"कि तुम्हें ये बात समझ में आ गई कि तुम्हारा हमेशा से विराज को तुच्छ समझना सरासर ग़लत और नासमझी थी। हलाॅकि इस बारे में मैने तुम्हें पहले भी कहा था कि विराज को तुच्छ समझना निहायत ही ग़लत बात है।
क्योंकि मौजूदा हालात में अगर तुम्हारा कोई दुश्मन हो सकता था तो सिर्फ विराज। ख़ैर, अब जब ये बात तुम्हारी समझ में आ ही गई है तो अब क्या सोच विचार करना चाहोगे इस बारे में तुम?"
"सोच विचार करने के लिए बहुत सारी बातें हैं।" अजय सिंह ने शिगार का गहरा कश लेकर उसका धुऑ ऊपर हवा में छोंड़ते हुए कहा___"पर बात चूॅकि शुरू से सोच विचार करने की है इस लिए शुरू से ही शुरू करते हैं। मैं सवाल खड़ा करूॅगा और तुम उस पर अपनी राय ब्यक्त करना।"
"ओके आई एम रेडी।" प्रतिमा ने सम्हल कर बैठते हुए कहा___"यू मे प्रोसीड।"
"हमारे साथ ये खेल फैक्ट्री में आग लगने से शुरू हुआ था।" अजय सिंह ने सोचते हुए कहा___"इसमें कई सवाल हैं, पहला ये कि फैक्ट्री में आग कैसे लगी या किसने लगाई थी? दूसरा सवाल ये कि फैक्ट्री में बने उस गुप्त तहखाने के अंदर मौजूद मेरा वो ग़ैर कानूनी सामान रितू द्वारा छानबीन करने पर क्यों नहीं मिला? वो सारा सामान उस गुप्त तहखाने से किसने गायब किया? यहाॅ ये सवाल नहीं पैदा हो सकता कि वो सब चीज़ें बमों के धमाके से लगी भीषण आग में जल गई होंगी, क्योंकि जली हुई चीज़ के अवशेष ज़रूर मिलते हैं और फाॅरेंसिक जाॅच से ये बात भी पता चल जाती है कि जो चीज़ जली थी वो असल में क्या थी? ख़ैर, मैं ये कह रहा हूॅ फैक्ट्री में लगी आग के बारे में और तहखाने से उन सारी चीज़ों के गायब हो जाने के बारे में तुम्हारी क्या राय है?"
"सबसे पहली बात तो ये है कि फैक्ट्री में लगी आग का मामला ज़रा पेंचीदा था।" प्रतिमा ने बेचैनी से पहलू बदलते हुए कहा___"पेंचीदा इस लिए क्योंकि उसमें किसी के भी बारे में कोई ठोस निष्कर्श नहीं निकल सकता था। घुमा फिरा कर बात सिर्फ विराज पर ही आकर रुकती थी। हलाॅकि ये बात ग़लत हो ऐसा कम ही लगता था। लेकिन मेरे ज़हन में एक बात ये भी है कि जिस समय फैक्ट्री में आग लगने का मामला आया था उसी समय तुम्हारे पार्टनर सक्सेना ने भी पार्टनरशिप तोड़ने की बात की ही नहीं बल्कि तोड़ ही दी थी। सक्सेना ने पार्टनरशिप तोड़ने की वजह ये बताई थी कि वो विदेश में सेटल होना चाहता है और वहीं पर अपना कोई बिजनेस करना चाहता है। इस बात पर कितना इत्तेफाक़ रखा जा सकता है?"
"तुम आख़िर कहना क्या चाहती हो?" अजय सिंह का दिमाग़ मानो चकरा सा गया था।
"मैं ये कहना चाहती हूॅ कि सक्सेना ने पार्टनरशिप तोड़ने की जो वजह बताई थी उसमें कितनी सच्चाई थी?" फिर प्रतिमा ने कहा___"तुम्हारे अनुसार उसे ये पता नहीं था कि फैक्टरी में कोई गुप्त तहखाना है जहाॅ पर तुम अपना गैर कानूनी सामान छुपा कर रखते थे। जबकि ऐसा भी तो हो सकता है कि ये सब उसे किसी तरह से पता चल ही गया रहा हो। उस सूरत में वो डर गया हो कि ऐसे काम में वह किसी दिन तुम्हारे साथ साथ खुद भी न कानून की गिरफ्त में आ जाए।
इस लिए उसने तुमसे पार्टनरशिप तोड़ लेने में ही अपनी भलाई समझी हो, किन्तु उसे लगा होगा कि पार्टनरशिप तोड़ने की कोई माकूल वजह भी होनी चाहिए तभी उसे अपना सारा पैसा तुमसे मिल सकता था।"
"लेकिन इसमें ऐसा तो नहीं हो सकता था न कि सारा हिसाब किताब चुकता होने के बाद सक्सेना मेरी फैक्ट्री में आग लगा देता।" अजय सिंह ने कहा___"सीधी सी बात है डियर, तुम्हारे अनुसार सक्सेना को कानून का डर सताया इस लिए उसने मुझसे पार्टनरशिप तोड़ी और अपना हिसाब किताब चुकता कर लिया। लेकिन इस सबके बाद वो भला मेरी फैक्ट्री में आग क्यों लगाएगा? उसे जिस चीज़ का डर था वो तो पार्टनरशिप टूटते ही दूर हो गया था। अगर तुम ये समझती हो कि फैक्ट्री में आग सक्सेना ने लगाई थी तो मैं इस बात से सहमत नहीं हूॅ।"
"इसका मतलब तुम इस मामले में सक्सेना को क्लीन चिट दे रहे हो?" प्रतिमा ने गहरी नज़र से देखा उसे।
"बेशक।" अजय सिंह ने पूरे आतमविश्वास के साथ कहा।
"और कोई दूसरा ऐसा कर ही नहीं सकता?" प्रतिमा ने कहा___"मेरा मतलब तुम्हारे किसी बिजनेस कम्पटीटर से है।"
"यस आफकोर्स।" अजय सिंह ने कहा___"मेरा ऐसा कोई बिजनेस कम्पटीटर ही नहीं है जो मेरी फैक्ट्री में आग लगा कर मेरा इतना बड़ा नुकसान कर दे।"
"तो फिर बचा कौन?" प्रतिमा ने कहा।
"क्या मतलब??" अजय सिंह एकाएक ही चौंक पड़ा।
"अरे डियर, हम हर चीज़ के बारे में विचार विमर्ष कर रहे हैं न?" प्रतिमा मुस्कुराई।
"ओह हाॅ।" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली___"ख़ैर, तो फिर बचा कौन का क्या मतलब है तुम्हारा?"
"तुम्हारी लाइफ में तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन कौन है?" प्रतिमा ने पूछा था।
"विराज और उसकी माॅ बहन।" अजय सिंह के भाव बड़ी तेज़ी से कठोर हो गए थे।
"बिलकुल सही।" प्रतिमा ने कहा___"विराज एक ऐसा शख्स है जो मौजूदा वक्त में तुम्हारे साथ कुछ भी कर सकता है। इस लिए अगर फैक्ट्री में लगी आग में सिर्फ और सिर्फ विराज का ही हाॅथ है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है।"
"लेकिन सवाल ये है कि उसने इतना बड़ा अविश्वसनीय काम किया कैसे होगा?" अजय सिंह के माथे पर सोच के भाव उभर आए___"दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि उसे कैसे पता कि फैक्ट्री में कोई गुप्त तहखाना है और उस तहखाने के अंदर मैने एक अलग ही जुर्म की दुनियाॅ बना रखी है?"
"किसी तरह उसने इस सबका पता तो कर ही लिया होगा माई डियर हस्बैण्ड।" प्रतिमा ने कहा___"काम जब ऐसे बड़े बड़े करने होते हैं न तो उसके बारे में अपने पास हर चीज़ की जानकारी का होना भी ज़रूरी होता है।"
"यही तो सवाल है डियर।" अजय सिंह ने कहा__"भला उसे इस बात की जानकारी कैसे हो गई कि फैक्ट्री के अंदर मैने क्या क्या चीज़ें छुपाई हुईं हैं? जबकि ये भी सच है कि वह कभी मेरी फैक्ट्री में गया ही नहीं था।
फिर कैसे ये सब पता हो सकता है उसे? दूसरी बात, वो तो मुम्बई में है फिर वो वहाॅ से ये काम कैसे कर सकता है?"
"संभव है कि विराज उस समय मुम्बई से यहाॅ आया रहा हो।" प्रतिमा ने तर्क दिया।
"अगर वो मुम्बई से यहाॅ आता तो क्या वो मेरे आदमियों की नज़र में नहीं आ जाता?" अजय सिंह बोला__"आज भी तो वो मेरे आदमी भीमा की नज़र में आ ही गया था।"
"ऐसा भी तो हो सकता है कि उसने तुम्हारे आदमियों को चकमा दे दिया रहा हो उस समय।" प्रतिमा ने पुनः तर्क दिया___"क्योंकि बिना उसके यहाॅ आए वह हमारी फैक्ट्री में कैसे आग लगा देता? या फिर ऐसा हो सकता है कि उसके इशारे पर ये काम उसके ही किसी साथी ने किया होगा।"
"हाॅ ऐसा हो सकता है।" अजय सिंह के मस्तिष्क में जैसे झनाका सा हुआ, बोला___"ये यकीनन हो सकता है प्रतिमा। बचपन से जवानी तक वो इस गाॅव में रहा है, इस लिए ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि यहाॅ पर उसका कोई घनिष्ठ दोस्त या मित्र न बना हो, बल्कि ज़रूर बना होगा। सबका कोई न कोई घनिष्ठ मित्र ज़रूर होता है, उसका भी कोई ऐसा ही खास मित्र होगा यहाॅ। इस लिए ये संभव है कि विराज ने ये काम अपने किसी ऐसे ही मित्र द्वारा करवाया हो सकता है। इस बारे में तो हमें पहले ही सोचना चाहिए था डियर। वो भले ही मुम्बई में है लेकिन अपने किसी खास दोस्त के द्वारा वो ज़रूर हमारी पल पल की ख़बर लेता रहा होगा। अब भी ले रहा होगा।"
"आपने बिलकुल सही कहा डैड।" सहसा इतनी देर से चुप बैठा शिवा कह उठा___"उस कमीने के कई दोस्त हैं यहाॅ। लेकिन एक दोस्त तो उसका बहुत ही खास है। मैं उसे अच्छी तरह जानता हूॅ। कई बार मैने उसके दोस्त को उसके साथ देखा भी था। उसके उस दोस्त का नाम शायद पवन है, यस डैड...पवन सिंह। यही नाम है उसके दोस्त का।"
"वैरी गुड।" अजय सिंह के चेहरे पर बड़ी मुद्दत के बाद राहत के भाव उभरे, बोला___"इसका मतलब वो हरामज़ादा अपने उस दोस्त पवन के ज़रिये ये सब करवा रहा था। नहीं छोंड़ूॅगा उस मादरचोद को। उसके सारे खानदान का नामो निशान मिटा दूॅगा मैं।"
"तुम्हें क्या लगता है अजय?" प्रतिमा ने सहसा अजीब भाव से कहा___"ये कि विराज महामूर्ख है?"
"व्हाट डू यू मीन?" अजय सिंह की ऑखें फैली।
"जिस विराज ने अपने दोस्त को इतने बड़े काम को करने के लिए कहा होगा उसने क्या अपने दोस्त और उसके परिवार की सुरक्षा का ख़याल नहीं रखा होगा?" प्रतिमा एक ही साॅस में कहती चली गई___"ये तो विराज को भी पता है कि अगर वो किसी के द्वारा अपना कोई काम करवाएगा तो देर सवेर तुम्हें इसका पता चल ही जाएगा। उस सूरत में तुम उसके साथ क्या सुलूक करोगे इसका अंदाज़ा उसने पहले ही लगा लिया होगा। हाॅ अजय, विराज ये कभी नहीं चाहेगा कि उसके काम की वजह से उसके दोस्त के साथ साथ उसके दोस्त के परिवार वालों की ज़िंदगी भी ख़तरे में पड़ जाए।
इस लिए मेरा ख़याल यही है कि विराज ने अपने दोस्त और उसके परिवार की सुरक्षा के बारे में सोचते हुए कुछ तो ऐसा ज़रूर किया होगा जिससे तुम्हारा क़हर उन पर न टूटने पाए।"
"तुम्हारी इस बात में यकीनन सच्चाई की झलक दिख रही है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा___"मगर एक बार पता तो करना ही चाहिए हमें। क्योंकि अगर एक पल के लिए ये मान लें कि वैसा कुछ किया ही नहीं होगा विराज ने जैसे की तुम बात कर रही हो तो इस वक्त ज़रूर उसका दोस्त इसी गाॅव में अपने घर पर होगा। मैं एक बार इस बात की पक्के तौर पर जाॅच करवा लेना चाहता हूॅ।"
"ज़रूर जाॅच करवाओ अजय।" प्रतिमा ने अजीब भाव से कहा___"मगर मेरा अनुमान यही है कि तुम्हारे हाथ कुछ नहीं लगने वाला।"
"माॅम ये आप क्या कह रही हैं?" शिवा के स्वर में नाराज़गी थी, बोला___"क्या आप चाहती हैं कि हमारे हाॅथ कुछ न लगे?"
"बात ये नहीं है बेटे कि मैं चाहती नहीं हूॅ।" प्रतिमा ने शख्त भाव से कहा___"बात ये है कि अब तक हाॅसिल भी क्या हुआ है? हर बार तो नाकामी ही हाॅथ लगी है हमें और अब तो ये आलम हो गया है कि किसी भी चीज़ के हाॅसिल होने की उम्मीद ही नहीं होती।"
"मैं तुम्हारे जज़्बातों को समझ सकता हूॅ माई स्वीट डार्लिंग।" अजय सिंह ने कहा___"मैं जानता हूॅ कि हर बार मिली नाकामी से तुम निराश हो गई हो। मगर यकीन मानो डियर, हमेशा ऐसा नहीं होता है। एक दिन ऐसा ज़रूर आता है जब हमें कामयाबी भी मिलती है। तुम देखना कि जिस दिन हमें कामयाबी मिली उस दिन हम अपनी उस कामयाबी को किस किस तरीके से सेलीब्रेट करेंगे?"
अजय सिंह की बात का प्रतिमा ने कोई जवाब न दिया। वो बस अजय सिंह को अजीब भाव से देखती रही। जबकि अजय सिंह ने उसके चेहरे से नज़र हटा कर शिवा से पवन सिंह के घर के बारे में पहले पूॅछा फिर अपनी कोट की पाॅकेट से मोबाइल निकाला। मोबाइल पर उसने किसी को फोन लगाया। दूसरी तरफ से काल रिवीव किये जाने के बाद अजय सिंह ने उसे पवन सिंह के घर का पता बताया और उससे जल्द से जल्द पवन सिंह का पता लगाने का हुक्म दिया। उसके बार उसने काल कट करके मोबाइल को अपने सामने रखी टेबल पर रख दिया।
"तो डिबेट को आगे बढ़ाएॅ डियर?" अजय सिंह ने प्रतिमा की तरफ देख कर कहा___"मैने अपने एक आदमी को पवन सिंह का पता करने के लिए बोल दिया है। वो जल्द ही इस बारे में हमें सूचित करेगा। तब तक हम अपनी डिबेट को आगे बढ़ते हैं।"
"ठीक है जैसी तुम्हारी मर्ज़ी।" प्रतिमा ने भावहीन स्वर में कहा___"शुरू करो।"
"यहाॅ पर इन सब बातों को संक्षेप में ये निर्णय निकालते हैं कि बाहरी कोई भी ब्यक्ति मेरे साथ ये सब नहीं कर रहा है।" अजय सिंह ने गहरी साॅस लेकर कहा__"बल्कि ये सब करने वाला सिर्फ एक ही शख्स है और वो है विराज।
पवन सिंह का नाम जुड़ने से जो बात सामने आई वो ये है कि मुम्बई में रहते हुए विराज ने अपने दोस्त के द्वारा ये सब करवाया। किन्तु यहाॅ सवाल ये है कि विराज के इस काम में उसके और कितने दोस्त शामिल थे? क्योंकि ये काम सिर्फ एक आदमी से तो हो नहीं सकता। इस लिए ये जानना ज़रूरी है उसने किस किस को अपने इस काम पर लगाया हुआ है?"
"तुम एक बात भूल रहे हो अजय।" प्रतिमा ने कहा__"वो ये कि फैक्ट्री में आग लगने से पहले भी एक खेल तुम्हारे साथ खेला गया था। याद है, वो विदेशी ब्यापारी। जो अपनी बीवी के साथ आया था और उसने तुम्हें भारी मात्रा में कपड़ा तैयार करने को कहा था। डील पक्की होने के बाद जब डिलीवरी का समय आया तो उस विदेशी ब्यापारी का कहीं कोई पता ही नहीं था। अगले दिन अख़बार में ख़बर छपी कि शहर के मशहूर बिजनेस मैन अजय सिंह को किसी विदेशी ब्यक्ति ने करोड़ों का चूना लगाया।"
"ओह हाॅ यार।" अजय सिंह की ऑखों के सामने दो विदेशी पति पत्नी की शक्ल घूम उठी___"उसका तो मुझे ख़याल ही नहीं रहा था।"
"होना चाहिए अजय।" प्रतिमा ने कहा___"क्योंकि तुम्हारे साथ खेल खेलने का आग़ाज़ तो वहीं से शुरू हुआ था न? ख़ैर, मेरा ख़याल ये है कि वो विदेशी ब्यक्ति कोई और नहीं खुद विराज ही था और उसकी पत्नी के रूप में खुद उसकी ही बहन निधी थी।"
"व्हाऽऽऽट???" अजय सिंह उछल पड़ा___"ऐसा तुम यकीन से कैसे कह सकती हो?"
"नायकीनी की भी कोई वजह बता दो मुझे?" प्रतिमा ने बड़े आत्मविश्वास से कहा___"तुम यकीन इस लिए नहीं कर पा रहे क्योंकि तुम अब भी यही समझते हो कि विराज किसी ढाबे या होटल में कप प्लेट धो रहा होगा और उसकी औकात नहीं कि वो ये सब अफोर्ड कर सके। लेकिन मैं इस बात को अलग तरह से सोचती हूॅ अजय। मैं ये सोचती हूॅ कि विराज एक पढ़ा लिखा लड़का है। वो बचपन से ही पढ़ने लिखने में सभी बच्चों से आगे था। उसका माइंड बड़ा शार्प था। कहने का मतलब ये कि जितना वो पढ़ा लिखा था उससे उसे कोई नौकरी मिल जाना कोई मुश्किल काम नहीं था। संभव है कि उसे कोई ऐसी नौकरी मिल गई हो जिसके तहत वो इतना तो अफोर्ड कर ही सके कि वो तुम्हारे साथ ऐसा खेल खेल सके। अगर तुम इस एंगल से सोचोगे अजय तो तुम्हें भी लगने लगेगा कि हाॅ वो लड़का ऐसा कर सकता है।"
प्रतिमा की इन सब बातों से अजय सिंह को भी एहसास हुआ कि प्रतिमा की बात में सच्चाई है। इस बात को उसे भी स्वीकार करना ही पड़ा कि विराज सभी बच्चों में सबसे ज्यादा पढ़ने में तेज़ था। उसे ये भी मानना पड़ा कि उसे कोई ऐसी नौकरी ज़रूर मिल गई रही होगी जिससे वो ये सब कर सके। अजय सिंह की ऑखों के सामने शिवा का वो अधमरी हालत मिलना घूम गया। इस बात से ये साफ ज़ाहिर होता है कि विराज़ के मन में इन लोगों के प्रति आक्रोश और बदले की भावना है।
इस लिए उसका तो ये हमेशा प्रयास रहेगा कि वो अपने साथ हुए अत्याचार का बदला ले सके।
अजय सिंह के मनो मस्तिष्क में ये सब बातें बड़ी तेज़ी से चलने लगी थी, जिसका असर ये हुआ कि उसने इस सब को स्वीकार कर लिया कि ये सब कुछ विराज ने ही किया हो सकता है। फिर चाहे उसका वो विदेशी बनना हो या फिर फैक्ट्री में आग लगाना। अभी अजय सिंह ये सब सोच ही रहा था कि सामने टेबल पर रखा उसका मोबाइल बजने लगा। उन तीनों ध्यान एक साथ मोबाइल पर गया।
अजय सिंह ने हाॅथ बढ़ा कर मोबाइल उठाया और उस पर आ रही काल को रिसीव कर उसे कान से लगा लिया। उस तरफ से कुछ देर तक वो कुछ सुनता रहा उसके बाद उसने ये कह कर काल कट कर दिया कि___"अपने सब आदमियों से कहो कि वो सब उन लोगों का पता लगाएॅ। मुझे हर हाल में उन सबका पता चाहिए।"
"क्या बात हुई तुम्हारी अपने उस आदमी से?" प्रतिमा ने पूछा।
"तुम्हारा कहना बिलकुल सही था प्रतिमा।" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली___"विराज ने सच में अपने उस दोस्त और उसके परिवार की सुरक्षा का ख़याल रखा हुआ था।"
"आख़िर क्या बताया तुम्हारे आदमी ने?" प्रतिमा ने कहा___"पूरी बात साफ साफ मुझे भी बताओ।"
"मेरा आदमी पवन सिंह के घर पर गया था।" अजय सिंह ने बताना शुरू किया___"किन्तु जब वो पवन ने घर के दरवाजे पर पहुॅचा तो देखा कि वहाॅ बड़ा सा ताला लगा हुआ था। उसके बाद मेरे उस आदमी ने आस पास वालों से पवन और उसके घर वालों के बारे में पूछा तो कुछ लोगों ने उसे बताया कि शाम को पवन के घर के सामने एक एम्बूलेन्स आई थी। उस एम्बूलेन्स में घर के अंदर से कुछ सामान लाकर रखा गया था और फिर उस एम्बूलेन्स में पवन, पवन की विधवा माॅ और उसकी एक बेटी बैठ गईं थी। इन लोगों के साथ दो आदमी और थे। वो दोनो भी उस एम्बूलेन्स में बैठ गए थे। एम्बूलेन्स के आगे ही एक जीप खड़ी थी। उस जीप के चलते ही वो एम्बूलेन्स भी चल पड़ी थी। इसके बाद वो लोग कहाॅ गए इसका किसी को कोई पता नहीं।"
"ओह इसका मतलब उन लोगों को पता था कि तुम्हें देर सवेर ये पता चल ही जाएगा कि विराज मुम्बई से आने के बाद पवन के घर पर ही ठहरा था।" प्रतिमा ने सोचने वाले भाव से कहा___"इस लिए, इससे पहले कि उन लोगों तक तुम्हारे आदमी पहुॅचें वो पहले ही वहाॅ से कूच कर गए। ख़ैर, अब तो तुम्हें यकीन आ गया न कि विराज ने ही ये सब किया है?"
"वो सब तो ठीक है डियर।" अजय सिंह के चेहरे पर गहन सोच के भाव थे, बोला___"मैंने मान लिया कि ये सब विराज ने ही किया होगा। मगर सोचने वाली बात है कि ये सब उसने कितना शातिराना ढंग से किया है। पवन और उसकी माॅ बहन को वो वहाॅ से एम्बूलेन्स जैसे वाहन से ले गया। कोई सोच भी नहीं सकता कि एम्बूलेन्स के अंदर कोई मरीज़ नहीं बल्कि ये सब मौजूद हो सकते हैं। मगर यहाॅ पर दो चीज़ें हैं जो समझ में नहीं आ रहीं।"
"कौन सी दो चीज़ें डैड?" शिवा ने चकित भाव से पूॅछा था।
"पहली चीज़ ये कि विराज के पास एम्बूलेन्स कहाॅ से आई?" अजय सिंह ने कहा___"साधारणरूप से यहाॅ पर उसके लिए एम्बूलेन्स का मिलना असंभव नहीं तो नामुमकिन बात तो है ही। दूसरी चीज़ ये कि एम्बूलेन्स के आगे जो जीप थी वो किसकी थी और उसमें कौन बैठा था? ये बात मेरे आदमी को पूछने पर भी किसी ने नहीं बताई कि उस जीप पर कौन कौन बैठा हुआ था? इसका मतलब तो यही हुआ कि पवन सिंह के अलावा भी कोई और है जो विराज की मदद कर रहा है।"
"विराज को एम्बूलेन्स कैसे मिल गई ये तो चलो साधारण बात हो सकती है।" प्रतिमा ने भी मानो अपने दिमाग़ के घोड़े दौड़ाए___"हो सकता है कि उसने ज्यादा पैसे देकर एम्बूलेन्स का जुगाड़ कर लिया होगा। मगर सोचने वाली बात तो उस जीप की है। यकीनन ये एक नया प्वाइंट है अजय। तुमने सही पकड़ा। पवन के अलावा भी कोई है जो इस समय विराज की मदद कर रहा है। पर कौन हो सकता है ऐसा ब्यक्ति? इस गाॅव में ऐसा कौन है जिसके पास खुद की जीप हो सकती है?"
"तुम्हारा मतलब है कि इस गाॅव में जिसके पास खुद की जीप होगी।" अजय सिंह ने चौंकते हुए कहा___"वही विराज की मदद कर रहा है?"
"हाॅ बिलकुल।" प्रतिमा ने झट से कहा___"क्या ऐसा नहीं हो सकता?"
"हो तो सकता है डियर।" अजय सिंह ने कहा___"मगर ये भी तो हो सकता है कि विराज ने वो जीप किराये पर हायर की हुई हो।"
"अगर विराज को अलग से कोई जीप हायर ही करना था तो पवन और उसकी माॅ बहन के साथ खुद भी एम्बूलेन्स से इस गाॅव से निकलने की क्या ज़रूरत थी?" प्रतिमा एक ही साॅस में कहती चली गई___"या तो वो किराये पर ली गई जीप से ही सबको साथ ले जाता या फिर सिर्फ एम्बूलेन्स के द्वारा ही सबको यहाॅ से ले जाता। दो अलग अलग वाहन साथ में रखने का क्या मतलब हो सकता है?"
"बात तो तुम्हारी सही है डियर।" अजय सिंह ने कहा___"मेरे आदमी ने बताया कि विराज सबको लेकर एम्बूलेन्स में ही बैठ गया था, ऐसा मेरे आदमी के पूछने पर कुछ लोगों ने उसे बताया है। जबकि दूसरी जीप में कौन बैठा था ये पता नहीं चला। इसका मतलब शायद ये भी हो सकता है कि पवन के अलावा जो दूसरा ब्यक्ति विराज की मदद कर रहा है वही उस जीप में था। एम्बूलेन्स के आगे आगे चलने का भी यही मतलब हो सकता है कि वो विराज एण्ड पार्टी को सुरक्षापूर्वक गाॅव से बाहर निकाल देना चाहता था। अब सवाल ये है कि वो जीप वाला दूसरा ब्यक्ति विराज एण्ड पार्टी को लेकर कहाॅ गया हो सकता है? शहर या फिर अपनी ही किसी सुरक्षित जगह पर?"
"सवाल तो ये भी है अजय कि विराज मुम्बई से यहाॅ आया किस लिए था?" प्रतिमा ने कहा___"यहाॅ पर उसका ऐसा क्या ज़रूरी काम था जिसके लिए उसने अपनी जान को भी ख़तरे में डाल दिया? विराज की माॅ गौरी ने उसे यहाॅ आने की इजाज़त कैसे दे दी होगी उसको?"
"संभव है कि वो अभय के बीवी बच्चों को लेने यहाॅ आया हो।" अजय सिंह ने संभावना ब्यक्त की थी।
"अगर उसके आने की यही वजह थी तो वो यहाॅ नहीं बल्कि सीधा अभय की ससुराल जाता।" प्रतिमा ने कहा___"करुणा तो अपने बच्चों के साथ अपने मायके में ही है। विराज सीधा वहीं जाता, और हमें उसके आने का पता भी नहीं चल पाता। मगर ऐसा हुआ नहीं बल्कि वो यहीं आया है। इसका मतलब यही हुआ कि वो जिस किसी भी काम से यहाॅ आया था वो कोई दूसरा ही काम था।"
"अब इसका पता तो खुद विराज ही बता सकता था या फिर उसका दोस्त पवन।" अजय सिंह ने एक नया शिगार सुलगाते हुए कहा___"मेरे आदमी उनकी खोज में लगे हैं। देखते हैं क्या नतीजा सामने आता है? ख़ैर, तब तक हम डिबेट को आगे बढ़ाते हैं।"
"अब कैसी डिबेट अजय?" प्रतिमा के माथे पर बल पड़ता चला गया___"ये बात तो क्लियर हो ही गई न उस सबमें विराज का ही हाॅथ था। उसने ही अपने दोस्त की मदद से वो सब किया था। फिर अब किस बात की डिबेट?"
"अभी तो बहुत कुछ बाॅकी है माई डियर।" अजय सिंह ने शिगार का गहरा कश लिया, बोला___"विचार विमर्ष के लिए और भी कई बातें शेष हैं।"
"अब और क्या बातें शेष हैं?" प्रतिमा ने पूछा।
"अभी तो एक सवाल ऐसा भी है डियर जिसे हम इग्नोर नहीं कर सकते।" अजय सिंह बोला___"जैसा कि हमारी डिबेट पर ये नतीजा निकला कि फैक्ट्री में आग विराज ने ही लगाई या लगवाई हो सकती है। इसमें भी दो बातें हैं, पहली ये कि क्या विराज को ये भी पता था कि फैक्ट्री में कोई गुप्त तहखाना है जिसके अंदर ग़ैर कानूनी चीज़ों का ज़खीरा मौजूद है? अगर हाॅ तो, क्या उसी ने उस ग़ैर कानूनी ज़खीरे को गायब किया या करवाया? या फिर दूसरी बात ये कि इस सबमें किसी और का भी हाॅथ था? क्योंकि सवाल इसी से निकल रहा है कि विराज को ये बात कैसे पता चली कि फैक्ट्री के अंदर कोई गुप्त तहखाना है जिसके अंदर मेरी ग़ैर कानूनी चीज़ें मौजूद हैं?"
"तुम कहना क्या चाहते हो अजय?" प्रतिमा ने उलझनपूर्ण भाव से पूछा था।
"बहुत साफ बात है डियर।" अजय सिंह ने कहा__"अगर ये मान कर चलें कि विराज मुझसे बदला लेना चाहता है तो उस सूरत में वो मेरी फैक्ट्री में यकीनन आग लगा सकता है और उस आग में फैक्ट्री के अंदर का सब कुछ जल कर ख़ाक़ में मिल जाएगा। उसे इस बात से कोई मतलब नहीं होगा कि इस सबमें मेरा क्या क्या और कितना नुकसान हो जाएगा? बदला लेने के रूप में ये एक नेचुरल बात हो गई। मगर, तहखाने से उन सब चीज़ों के गायब हो जाने से एक नई और सोचपूर्ण बात सामने आती है कि विराज ने उस सबको क्यों गायब किया और उस सबके बारे में उसे पता कैसे चला? मतलब साफ है डियर कि विराज को इस बात का अच्छी तरह से पता था कि फैक्ट्री के अंदर एक गुप्त तहखाना है और उस तहखाने के अंदर मेरी एक ग़ैर कानूनी दुनियाॅ मौजूद है।
अब सवाल ये उठता है कि विराज को इस सबका कैसे पता था? क्योंकि वो तो कभी फैक्ट्री गया ही नहीं था, दूसरी बात वो मौजूदा वक्त में यहाॅ था भी नहीं तो कैसे उसे इतनी गुप्त बात का पता चल गया? इसका मतलब तो यही हुआ कि कोई ऐसा ब्यक्ति उसे मिला जिसने उसे फैक्ट्री के अंदर की इतनी बड़ी गुप्त बात बताई। वरना क्या उसे कोई ख़्वाब चमका था जिसमें उसने ये सब देख लिया होगा?"
"यकीनन तुम्हारी इस बात में प्वाइंट है।" प्रतिमा ने प्रभावित होने वाले भाव से कहा___"ये एक ज़बरदस्त प्वाइंट है अजय। फैक्ट्री में आग लगने वाले हादसे की कड़ियाॅ ऐसी हो सकती हैं____ विराज को सब कुछ पहले से ही किसी के द्वारा पता चल चुका था कि फैक्ट्री के अंदर मौजूद तहखाने में तुम्हारे द्वारा ग़ैर कानूनी धंधा भी किया जाता है। इस लिए उसने उस हिसाब से ही प्लान बनाया। मतलब ये कि फैक्ट्री में आग लगाने से पहले ही उसने तहखाने से वो सब चीज़ें निकाल कर अपने कब्जे में की, उसके बाद उसने तहखाने में टाइम बम फिट किया। कुछ टाइम बम उसने फैक्ट्री के अंदर उन जगहों पर भी फिट किये जहाॅ पर कपड़ों का स्टाॅक था और मशीनें थी। सारे टाइम बमों के फटने का टाइम एक ही था। सारी क्रिया करने के बाद वो फैक्ट्री के अंदर से बड़ी ही आसानी से बाहर निकल गया। उसके बाद क्या हुआ ये सबको पता ही है।"
"बिलकुल यही हुआ था।" अजय सिंह ने कहा___"अब सवाल यही है कि ऐसा वो कौन शख्स था जिसने विराज को तहखाने से संबंधित जानकारी दी? तहखाने के बारे में मेरे अलावा किसी को भी पता नहीं था। इस बात के पता होने का तो सवाल ही नहीं उठता कि उसके अंदर क्या मौजूद है।"
"कोई तो ऐसा ब्यक्ति ज़रूर था अजय।" प्रतिमा ने सोचने वाले भाव से कहा___"जिसने विराज को इतनी बड़ी गुप्त जानकारी दी। एक मिनट अजय.......जिस दिन फैक्ट्री में वो हादसा हुआ था उसी दिन या रात को तुम्हारा भूतपूर्व पार्टनर विदेश जाने के लिए प्लेन में बैठा था। एक बार इस बारे में फिर से सोचो डियर, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सक्सेना को पता चल गया हो कि फैक्ट्री के अंदर तहखाना भी है और उस तहखाने में तुम क्या धंधा करते हो? ऐसा बिलकुल हो सकता है अजय, सक्सेना के पास दूसरी कोई ठोस वजह नहीं थी यहाॅ से रफूचक्कर हो जाने की। वो तो तुम्हारा जिगरी यार भी था, ऐसा जिगरी कि उससे हमारे बड़े गहरे संबंध थे। उसकी बीवी तौम्हारे नीचे और तुम्हारी ये बीवी यानी कि मैं उसके नीचे। हम सब एक साथ कितना इन सबमें एन्ज्वाय करते थे। ऐसे मज़ेदार रिश्तों को अनायास ही छोंड़ कर विदेश चले जाने का दूसरा और क्या मतलब हो सकता है भला?"
"तुम ये कहना चाहती हो कि सक्सेना को फैक्ट्री के अंदर मौजूद तहखाने से संबंधित सबकुछ पता था।" अजय सिंह बोला___"उसके बाद वो मुझसे पीछा छुड़ाने के लिए कोई जुगत लगाने लगा।
और फिर संयोग से उसकी मुलाक़ात विराज से हुई। उसने विराज को सब कुछ बता दिया और फिर वह मुझसे अपना हिसाब किताब करके यहाॅ से रफूचक्कर हो गया?"
"मेरा मतलब यकीनन यही है डियर हस्बैण्ड मगर इसमें बात इस तरह नहीं हुई जैसी कि तुमने सोच कर बयां की है।" प्रतिमा ने कहा___"बल्कि ऐसी हुई है, मेरी थ्योरी ये है ____विराज को तुमसे किसी भी तरह से बदला लेना था ये एक सच बात है। मगर उसने सोचा कि तुमसे अपना बदला लेने की उसमें क्षमता नहीं है। इस लिए उसने दिमाग़ लगाया। उसने तुमको अंदर से कमज़ोर करने का प्लान बनाया। सबसे पहले उसने अपनी बहन के साथ मिल कर विदेशी बिजनेस मैन का गेटअप बनाया और फिर तुमसे वो डील की। बाद में डिलीवरी के वक्त वो गायब हो गया। इसका नतीजा ये हुआ कि भारी मात्रा में तैयार किया गया कपड़ा बिक नहीं पाया और जो तुमने उसे तैयार करवाने में पैसा लगाया वो वसूल नहीं हो पाया। इससे तुम्हें काफी नुकसान हुआ। इसका एक नुकसान ये भी हुआ कि बिजनेस के क्षेत्र में इस तरह किसी विदेशी के हाॅथों धोखा खा जाने से तुम्हारी रेपुटेशन पर इसका बुरा असर पड़ गया। उसके बाद फैक्ट्री में आग लग जाने से जो भारी नुकसान हुआ उससे तुम पूरी तरह हिल गए। इतना कुछ होने के बाद भी तुम ये नहीं समझ पाए कि ये सब तुम्हारे क्यों और कौन कर रहा है? मगर विराज ने अपनी तरफ से तुम्हारे लिए एक क्लू भी छोंड़ा, वो क्लू ये था कि तहखाने के अंदर से उसने तुम्हारी सारी ग़ैर कानूनी चीज़ें गायब कर दी। यहाॅ उसने तुम्हें ये जता दिया कि ऐसा कैसे और कौन कर सकता है? ये अलग बात है कि ये बात तुम आज समझे हो। ख़ैर, इस बार तो वो खुद ही यहाॅ आया और तुम्हारे इतने सारे आदमियों को आश्चर्यजनक रूप से पता नहीं कहाॅ और कैसे गायब कर दिया?"
"ओह वैरी गुड।" अजय सिंह मुस्कुराया___"यकीनन इस थ्यौरी में दम है डियर। अब ये भी बता दो कि विराज ने तहखाने से मेरी वो सब ग़ैर कानूनी चीज़ें क्यों गायब की? उनसे उसे क्या फायदा हो सकता है भला?"
"कमाल करते हो अजय।" प्रतिमा चौंकी___"इतनी सी बात का मतलब पूछते हो मुझसे। खुद सोचो कि विराज ने वो सब क्यों गायब किया होगा? सीधी सी बात है अजय, वो सब चीज़ें तुम्हारे काले कारनामों का पुख्ता सबूत हैं। विराज अगर चाहे तो आज तुम्हें उन सब चीज़ों के आधार पर जेल पहुॅचवा सकता है। तुम्हें ये बताने की ज़रूरत नहीं है कि ग़ैर कानूनी धंधा करने के जुर्म में कानून तुम्हें कितनी बड़ी सज़ा सुना सकता है? कहने का मतलब ये कि तुम्हारी स्वतंत्रता विराज के हाॅथों में है। वो अगर चाहे तो तुम कानून की गिरफ्त से दूर रहोगे और अगर वो चाहे तो आज इसी वक्त तुम कानून के शिकंजे में फॅस जाओ। मगर चूॅकि अब तक उसने ऐसा कुछ नहीं किया है इस लिए अभी तुम कानून की पहुॅच से बाहर हो।
मगर इसका मतलब ये नहीं है भविष्य में भी ऐसा ही रहेगा। संभव है कि विराज किसी ऐसे वक्त पर ये सब करे जब उसे लगे कि यही सही वक्त है। दैट्स इट।"
प्रतिमा की ये बातें सुन कर अजय सिंह के समूचे जिस्म में झुरजुरी सी दौड़ गई। बगल से ही सोफे पर बैठे शिवा की ऑखों के सामने उसके बाप के दोनो हाॅथ कानून की हथकड़ी में बॅधे नज़र आए। इस दृष्य के घूमते ही शिवा की धड़कने एकाएक ही बढ़ चली थी। अभी ये सब ये लोग सोच ही रहे थे कि तभी एक बार फिर से अजय सिंह का मोबाइल बज उठा। हड़बड़ा कर अजय सिंह ने मोबाइल की काल को रिसीव कर मोबाइल को कान से लगा लिया।
".........।" उधर से कुछ देर तक कुछ कहा गया। जिसे सुन कर अजय सिंह के चेहरे पर चौंकने के भाव उभरे। उधर की बातें सुनने के बाद अजय सिंह ने ये कह कर फोन रख दिया कि____"ठीक है, तुम अपने कुछ आदमियों को गुनगुन रेलवे स्टेशन जाने को बोल दो और बाॅकी के लोग आस पास के क्षेत्र की अच्छे से छानबीन करते रहो।"
"क्या कहा तुम्हारे आदमी ने?" अजय सिंह के फोन रखते ही प्रतिमा ने पूछा था।
"उसने जो कुछ भी मुझे बताया है।" अजय सिंह ने अजीब भाव से कहा___"उसे जान कर मुझे यकीन नहीं हो रहा है प्रतिमा।"
"क्या मतलब??" प्रतिमा के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभरे___"किस बात का यकीन नहीं हो रहा तुम्हें?"
प्रतिमा के पूछने पर अजय सिंह ने तुरंत कोई जवाब नहीं दिया। बल्कि चेहरे पर गंभीरता लिए उसने एक नया शिगार सुलगाया और दो तीन जल्दी जल्दी कश लेने के बाद उसने नाॅक व मुह से ढेर सारा धुआॅ उगला। प्रतिमा और शिवा दोनो ही उसके मुख से जवाब सुनने के लिए बेचैन से होने लगे थे। किन्तु अजय सिंह ने शिगार पी लेने के बाद भी कोई जवाब नहीं दिया। वो किसी गहरी सोच में डूबा नज़र आया। प्रतिमा उसके चेहरे पर इस तरह सोच के भाव देख कर चौंकी। उसने अजय सिंह को आवाज़ देकर सोच के सागर से निकाला। हक़ीक़त की दुनियाॅ में आकर अजय सिंह ने गहरी साॅस ली और एक झटके से सोफे पर से उठ कर खड़ा हो गया। उसने शिवा और प्रतिमा दोनो को हवेली चलने को कहा और बाहर की तरफ बढ़ता चला गया। दोनो माॅ बेटा भौचक्के से देखते रह गए थे अजय सिंह को।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर रितू दीदी के फार्महाउस पर!
सुबह हुई और एक नये दिन तथा एक नये जीवन की शुरूआत हुई। सबके प्यार ने और सबके समझाने का असर ये हुआ था कि पिछले दिन की अपेक्षा आज मेरी हालत में काफी हद तक सुधार था। कल तो मैं सदमे में ही डूबा हुआ था। किसी से कोई मतलब ही नहीं था और ना ही किसी से कोई बात करने का दिल कर रहा था। मगर आज मैं काफी हद तक नार्मल था।
जब मेरी नींद खुली तो मैने देखा मेरे दोनो तरफ मुझसे छुपकी हुई मेरी दोनो बहनें सुकून से सो रही थी। उन दोनो के खूबसूरत तथा मासूम से चेहरों को देख कर ही मेरा मन खुश सा हो गया।
वो दोनो मुझसे ऐसे छुपकी हुई थी मानो उन्हें डर हो कि मैं उन्हें छोंड़ कर कहीं दूर चला जाऊॅगा। मैं काफी देर तक उन दोनो को एकटक देखता रहा। आशा दीदी की तो ख़ैर बात ही अलग थी किन्तु रितू दीदी की बात सबसे जुदा थी। वो इस लिए क्योंकि बचपन से लेकर अब तक मैं उनके मुख से राज या भाई सुनने को तरस गया था। वो मुझे देखना तक गवाॅरा नहीं करती थी बात करने की तो बहुत दूर की बात है। मगर आज मेरी वही रितू दीदी मुझसे छुपकी हुई सो रही थी। उनके दिल में मेरे लिए बेपनाह प्यार व स्नेह था।
उन्हें इस तरह सुकून से सोते देख जाने क्यों मेरी ऑखों में ऑसू भर आए। मेरे दिल में दर्द की एक तेज़ लहर सी दौड़ गई। अभी मैं इस लहर से ब्यथित हुआ ही था कि सहसा रितू दीदी के सम्पूर्ण जिस्म में हरकत हुई और देखते ही देखते उनकी ऑखें खुल गईं। उनकी नज़र सबसे पहले मुझ पर ही पड़ी। मेरी ऑखों में ऑसू देखते ही वो बेचैन सी नज़र आने लगीं। उन्होंने अपना हाॅथ बढ़ा कर मेरे चेहरे को सहलाया और सिर को ना में हिलाते हुए मुझे इशारा किया कि मैं दुखी न होऊॅ।
इधर आशा दीदी की भी ऑखें खुल गई थी। सिर को ऊपर की तरफ उठा कर उन्होंने मुझे देखा और मेरी ऑखों में ऑसू देखते ही उन पर भी वही प्रतिक्रिया हुई जो रितू दीदी पर हुई थी। दोनो ने एक साथ ऊपर की तरफ खिसक कर मेरे माथे पर हल्के से चूमा। मैं अपनी दोनो बहनों का ये प्यार देख कर अंदर ही अंदर गदगद सा हो गया। मुझे एक अलग ही तरह का एहसास हुआ। ऐसा लगा कि अब मैं यहाॅ पर अकेला नहीं हूॅ बल्कि यहाॅ भी मेरे अपने हैं, जो मुझे इस हद तक प्यार करते हैं।
"तू इस तरह अब कभी दुखी मत होना राज।" रितू दीदी ने गंभीरता से कहा___"मैं मानती हूॅ कि अभी जो कुछ भी हुआ उससे तुझे गहरा सदमा लगा है। मगर तुझे खुद को सम्हालना होगा मेरे भाई। तू मुझे भाई के रूप में मिल गया है इस लिए मैं चाहती हूॅ कि मेरा भाई हमेशा खुश रहे। तेरे पास किसी भी प्रकार का दुख दर्द न आए। मैने भी ठान लिया है कि मैं तुझे कभी भी दुखी नहीं होने दूॅगी, और इसके लिए मैं किसी भी हद तक गुज़र जाऊॅगी।"
"रितू सही कह रही है राज।" आशा दीदी ने कहा__"अब से हम दोनो बहनें तुझे कभी भी दुखी नहीं होने देंगे। उसके लिए चाहे हमें जो भी करना पड़े हम करेंगे।"
"इसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी दीदी।" मैने हल्के से मुस्कुरा कर कहा___"क्योंकि जिसके पास आप जैसी इतना प्यार करने वाली दो दो बहनें हों उसको कोई दुख तक़लीफ कैसे हो जाएगी? आप चिन्ता मत कीजिए धीरे धीरे सब ठी हो जाएगा।"
"ये हुई न बात।" रितू दीदी ने मुस्कुरा कर कहा__"मुझे पता है कि मेरा स्वीट सा भाई कितना समझदार है। ख़ैर, चल अब तू फ्रेश हो ले। हम दोनो भी फ्रेश हो जाते हैं, उसके बाद नास्ता करेंगे साथ में। मुझे भी थाने जाना पड़ेगा न।"
"मुबारक हो दीदी।" मैने कहा___"आप पुलिस ऑफीसर बन गई हैं।
मुझे पता है आपका शुरू से ही ये सपना था कि आप एक दिन पुलिस ऑफिसर बनो। इस लिए इसके लिए आपको ढेर सारी बॅधाईयाॅ दीदी।"
"थैंक्स राज।" दीदी ने कहा___"लेकिन मेरे माॅम डैड को मेरा पुलिस ऑफीसर बनना बिलकुल पसंद नहीं आ रहा है। आए दिन इस बारे में कोई न कोई बात होती रहती है घर में। मैने भी फैंसला कर लिया है कि अब ये पुलिस की नौकरी छोंड़ दूॅगी।"
"अरे ऐसा क्यों दीदी?" मैने चौंकते हुए कहा___"नहीं नहीं आप ऐसा बिलकुल नहीं करेंगी। पुलिस ऑफीसर बनना आपका ख़्वाब था और जब ये ख़्वाब पूरा हो ही गया है तो इसे इस तरह छोड़ कर अंदर ही अंदर हमेशा के लिए दुखी रहने वाला काम मत कीजिए। रही बात बड़े पापा और बड़ी माॅ की तो मुझे पता है वो ऐसा क्यों चाह रहे हैं?"
"अच्छा क्या पता है तुझे?" रितू दीदी ने मुस्कुरा कर पूछा___"ज़रा मैं भी तो सुनूॅ।"
"जिनके हाॅथ खून से रॅगे हों।" मैने कहा___"और जो जुर्म की दुनियाॅ से ताल्लुक रखता हो, वो तो पुलिस और कानून से डरेगा ही। आप तो वैसे भी एक तेज़ तर्रार पुलिस ऑफीसर हैं। उन्हें भी पता है कि आपको अगर ये पता चल जाए उनके डैड जुर्म की दुनियाॅ से ताल्लुक रखते हैं तो आप सेकण्ड भर का भी समय नहीं लगाएॅगी उन्हें कानून की गिरफ्त में लेने में। इस लिए वो नहीं चाहते हैं कि आप पुलिस की नौकरी करें।"
मेरी ये बातें सुन कर रितू दीदी ही नहीं बल्कि आशा दीदी भी बुरी तरह उछल पड़ी थी। रितू दीदी मुझे इस तरह देख रही थीं जैसे मैं कोई अजूबा हूॅ।
"तू ये बात इतने यकीन से कैसे कह सकता है कि मेरे डैड जुर्म की दुनियाॅ से ताल्लुक रखते हैं?" रितू दीदी ने चकित भाव से पूछा था।
"मुझे उनके बारे में हर चीज़ पता है दीदी।" मैने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"और मैं ये भी जानता हूॅ कि आप भी अपने डैड के बारे में बहुत कुछ जान चुकी हैं।"
"क्या मतलब????" रितू दीदी की ऑखें आश्चर्य से फैल गईं___"मैं बहुत कुछ क्या जान चुकी हूॅ?"
"जाने दीजिए दीदी।" मैने पहलू बदलने की गरज़ से कहा___"उन सब बातों को ज़ुबाॅ पर लाने का कोई मतलब नहीं है। आप ये पूछिये कि मुझे कैसे पता कि आप भी हुत कुछ जानती हैं?"
"हाॅ हाॅ बता न राज।" रितू दीदी के आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं था, बोली___"मैं जानना चाहती हूॅ कि ये सब तुझे कैसे पता है?"
"बड़ी सीधी सी बात है दीदी।" मैने कहा___"सबसे पहले तो यही कि आपका मेरे प्रति इतना प्यार ही ये ज़ाहिर कर देता है कि आपको उनकी असलियत के बारें में कुछ तो ऐसा पता चला ही जिसके तहत आपके दिल में मेरे प्रति प्यार जाग गया। दूसरी बात ये कि आप इस फार्महाउस में नैना बुआ के साथ रह रही हैं। इससे साबित हो जाता है कि आपको अपने माॅम डैड के बारे में कुछ तो ऐसा पता चल ही चुका है। वरना नैना बुआ को साथ लिए यहाॅ रहने का क्या कारण हो सकता है? तीसरी बात, मेरे दोस्त पवन से कह कर मुझे विधी से मिलाने के लिए मुम्बई से बुलाना।
पवन और विधि के द्वारा भी आपको कुछ तो ऐसा पता चल ही चुका होगा जिससे आपको ये लगने लगा कि मैं और मेरी माॅ बहन इतने बुरे नहीं हो सकते जितना आपको बताया गया था बचपन से।"
रितू दीदी मेरी ये बातें सुन कर हैरान रह गईं। फिर सहसा उनके चेहरे पर प्रशंसा के भाव उभर आए। होठों पर हल्की सी मुस्कान भी फैल गई।
"यकीनन तूने बड़ी खूबसूरती से इन सब बातों का अंदाज़ा लगाया है राज।" फिर उन्होंने कहा___"और ये सच है कि मुझे अपने माॅम डैड की असलियत के बारे में पता चल चुका है। किन्तु अभी भी कुछ बातें हैं जिनका मुझे शायद पता नहीं है।"
"डोन्ट वरी दीदी।" मैने कहा___"जब इतना कुछ पता चल गया है तो बाॅकी का भी आपको पता चल ही जाएगा।"
"चल ठीक है मेरे प्यारे भाई।" रितू दीदी ने मेरे चेहरे को प्यार से सहलाया___"मैं तो बस इस बात से ही खुश हूॅ कि मुझे मेरा वो भाई मिल गया है जो सच में मुझे अपनी दीदी मानता है और मेरी इज्ज़त करता है। आने वाले समय में क्या होने वाला है ये तो वक्त ही बताएगा। मैं बस ये चाहती हूॅ कि जितने दिन तू यहाॅ है उतने दिन तक तुझ पर किही भी तरह के ख़तरे को न आने दूॅ।"
"आप फिक्र मत कीजिए दीदी।" मैने मुस्कुरा कर कहा___"आपका ये भाई कोई दूध पीता बच्चा नहीं है जिसे कोई भी चोंट पहुॅचा देगा। इतना तो अब मुझमें सामर्थ है कि मैं अपनी सुरक्षा खुद कर सकूॅ।"
"हाॅ मुझे पता है।" रितू दीदी हॅस कर बोली___"मुझे पता है कि मेरे भाई ने दो मिनट के अंदर मेरे डैड के उतने सारे आदमियों का खात्मा कर दिया था।"
"वो तो बस हो गया दीदी।" मैने कहा___"पर आपके सामने तो कुछ भी नहीं हूॅ मैं। आपने भी तो मेरी सुरक्षा के लिए क्या कुछ नहीं किया है। मैं सोच भी नहीं सकता था कि आप मेरे लिए इतना कुछ कर सकती है।"
"तेरे लिए तो अब कुछ भी कर सकती हूॅ मेरे भाई।" दीदी की आवाज़ भारी हो गई___"बचपन से लेकर अब तक मैने तेरे साथ क्या किया है ये सोच कर ही मुझे खुद से घृणा होने लगती है। इस लिए अब मैं तेरे लिए और अपने भाई के लिए कुछ भी करूॅगी।"
मैने देखा कि ये सब कहते हुए दीदी की ऑखों में ऑसू आ गए थे इस लिए मैने उन्हें खुद से छुपका लिया। वो खुद भी मुझसे किसी जोंक की तरह चिपक गई थी।
"तुम दोनो का हो गया हो तो मेरा भी कुछ ख़याल कर लो।" सहसा आशा दीदी ने कहा___"मुझे तो भुला ही दिया तुम दोनो ने।"
"क्या आप सोच सकती हैं दीदी कि हम आपको भुला देंगे?" मैने आशा दीदी को खुद से छुपकाते हुए कहा था।
ऐसे ही कुछ देर तक हम तीनो भाई बहन एक दूसरे से छुपके रहे फिर हम तीनो अलग हुए। रितू दीदी ने मुझे फ्रेश हो जाने का कहा और खुद भी फ्रेश होने के लिए आशा दीदी को लेकर कमरे से बाहर निकल गईं। उन दोनो के जाने के बाद मैं कुछ देर यूॅ ही बेड पर लेटा किसी सोच में डूबा रहा फिर मैं उठ कर बाथरूम में चला गया।
नास्ते की टेबल पर सब कोई साथ में ही बैठ कर नास्ता कर रहा था।
किचेन में हरिया काका की बीवी बिंदिया और पवन की माॅ ने नास्ता तैयार किया था। मैं अपनी नैना बुआ से ठीक तरह से मिला। उन्होंने मुझे अपने सीने से लगा कर बहुत प्यार दिया और हमेशा खुश रहने की दुवाएॅ दी।
रितू दीदी ने बताया कि आज करुणा चाची भी बच्चों के साथ यहीं आ रही हैं। उनको सुरक्षा पूर्वक यहाॅ पर लाने की जिम्मेदारी खुद रितू दीदी ने ही ली। हलाॅकि मैने उन्हें समझाया भी कि आप आराम से ड्यूटी जाइये, मैं और आदित्य करुणा चाची को उनके बच्चों के साथ सुरक्षित यहाॅ ले आएॅगे, मगर दीदी नहीं मानी। इस लिए मैने भी ज्यादा ज़ोर नहीं दिया। दीदी ने मुझे यहीं पर आराम करने की सलाह दी थी। हलाॅकि मैं चाहता था कि मैं एक बार विधी के घर जाऊॅ और उसके माॅम डैड का हाल चाल देख लूॅ मगर रितू दीदी ने कहा कि वो सब देख सुन लेंगी।
नास्ता करने के बाद रितू दीदी अपनी पुलिस जिप्सी में बैठ कर थाने चली गईं। नैना बुआ, आशा दीदी और पवन की माॅ ये तीनो एक साथ ही बातें करने में लग गईं। जबकि मैं पवन और आदित्य फार्महाउस के बाहर की तरफ आ गए। मैने देखा कि फार्महाउस काफी लंबा चौड़ा था। बाहर फ्रंट गेट पर दो बंदूखधारी खड़े थे। गेट के बगल से ही एक छोटी सी चौकी बनी हुई थी। जो शायद उन दोनो बंदूखधारियों के आराम करने के लिए थी।
हम तीनो एक साथ बाॅई तरफ बढ़ गये। उस तरफ एक सुंदर सा पेड़ था जिसके नीचे हरी हरी घास उगी हुई थी तथा पेड़ के पास ही स्टील की बड़ी बड़ी दो तीन बेंच रखी हुई थी बैठने के लिए। हम तीनो जाकर उन बेंचों पर बैठ गए। कल विधी वाले मैटर के बाद से हम तीनो कुछ बुझे बुझे से थे। मुझे रह रह कर विधी के बारे में वो सब याद आ जाता था जिसकी वजह से मेरा दिल दुखने लगता था।
"वैसे विराज।" सहसा आदित्य ने कहा___"हम यहाॅ से कब निकलने वाले हैं? ये जो कुछ भी हुआ वो यकीनन बहुत दुखद हुआ है मगर ये भी सच है दोस्त कि हमें जीवन में आगे बढ़ना ही होता है। ये सब तुम्हीं ने मुझसे कहा था न? इस लिए दोस्त विधी की खूबसूरत यादों को दिल में ही दबा के रखो और आगे बढ़ो।"
"मैं जानता हूॅ आदित्य।" मैने भारी मन से कहा___"मुझे पता है कि इस सबको लेकर बैठ जाने का कोई मतलब नहीं निकलने वाला है। मगर एक दो दिन मैं यहीं रह कर खुद को और अपने दिल को शान्त कर लेना चाहता हूॅ। मैं नहीं चाहता कि मेरे चेहरे पर छाई उदासी या किसी दुख के भाव को देख कर मुम्बई में मेरी माॅ और बहन को कुछ पता चल जाए। वो मुझे किसी भी कीमत पर दुखी नहीं देख सकती हैं।"
"बात तो तुम्हारी ठीक है दोस्त।" आदित्य ने कहा__"पर ये भी तो सोचो कि यहाॅ पर ज्यादा दिन तुम्हारा रुकना ठीक नहीं है। तुम्हारी जान को हर वक्त ख़तरा बना रहेगा।"
"मैं किसी ख़तरे से नहीं डरता आदित्य।
" सहसा मेरे चेहरे पर कठोरता आ गई___"पहले मुझे कुछ पता नहीं था और मैं किसी दूसरे उद्देश्य से यहाॅ आया था इस लिए मैं अजय सिंह या उसके आदमियों से उलझना नहीं चाहता था। मगर अब मुझे किसी की कोई परवाह नहीं है। मैं भी तो देखूॅ कि अजय सिंह कैसे मेरा बाल बाॅका करता है?"
"ये सब तुम आवेश में कह रहे हो दोस्त।" आदित्य ने कहा___"जबकि तुम भूल रहे हो कि इस वक्त तुम्हारी कई कमज़ोरियाॅ तुम्हारे साथ साथ हैं। अगर तुम अकेले होते तो मान सकता था कि तुम धड़ल्ले के साथ उन सबका मुकाबला कर लेते मगर इस वक्त तुम अकेले नहीं हो। पवन और उसकी माॅ बहन भी तुम्हारे साथ हैं और तुम्हारे अभय चाचा के बीवी बच्चे भी तुम्हारे साथ तुम्हारी कमज़ोरी के रूप में जुड़ जाएॅगे। उस सूरत में तुम खुद की सुरक्षा करोगे या उन लोगों की जो इस वक्त तुम्हारे साथ जुड़ गए हैं?"
"आदित्य सही कह रहा है राज।" पवन ने भी हस्ताक्षेप किया___"इस वक्त तुम किसी से उलझने की पोजीशन में नहीं हो। दूसरी बात ये भी है कि मान लो अगर तुम्हारे बड़े पापा को ये पता चल गया कि तुम्हारे हर काम में तुम्हारी मदद रितू दीदी भी कर रही हैं तो सोचो क्या होगा? अरे रितू दीदी के लिए भी उनका ख़तरा हो जाएगा। भला अजय चाचा ये कैसे बरदास्त कर पाएॅगे कि उनकी बेटी उनके सबसे बड़े दुश्मन का साथ दे रही है? जिस तरह का कैरेक्टर तुम्हारे बड़े पापा का है उससे यही बात सामने आती है कि वो ये सब जानने के बाद अपनी बेटी को किसी भी सूरत में माफ़ नहीं करेंगे।"
"मैं पवन की इस बात से पूरी तरह सहमत हूॅ।" आदित्य ने कहा___"तुम अपनी वजह से भला अपनी रितू दीदी की जान को भी संकट में कैसे डाल सकते हो? उनके हित के बारे में सोचना तुम्हारा सबसे बड़ा फर्ज़ होना चाहिए दोस्त। उन्होंने तुम्हारी सुरक्षा के लिए क्या कुछ नहीं किया है?"
"कभी कभी वक्त और हालात के हिसाब से भी कोई फैंसला लेना चाहिए राज।" पवन ने कहा___"विधी के जाने का दुख हम सबको है मगर खुद विधी भी ये नहीं चाहेगी कि तुम पर या तुम्हारी वजह से किसी और पर कोई ऐसा संकट आए। इस लिए मैं यही कहूॅगा कि जितना जल्दी हो सके हमें यहाॅ से निकल जाना चाहिए। मैं तुम्हें जंग के लिए नहीं रोंक रहा भाई, वो तो तसल्ली से और सबको सुरक्षित करने के बाद भी की जा सकती है।"
"ठीक है यार।" मैने उन दोनो की बातों पर विचार करते हुए कहा___"जैसा तुम दोनो कहोगे मैं वैसा ही करूॅगा। हम सब कल ही यहाॅ से मुम्बई के लिए निकलेंगे। सबकी टिकटों का इंतजाम करवाता हूॅ मैं।"
"उसकी ज़रूरत नहीं है दोस्त।" आदित्य ने कहा__"सबकी टिकटों का इंतजाम हो गया है। मैने कल ही सर(जगदीश ओबराय) से बात की थी। उन्हें मैने यहाॅ कुछ बातें संक्षेप में बताई थी, और ये भी कहा था कि वो हम सबकी टिकटों का इंतजाम करवा दें।
आज सुबह मेरे मोबाइल पर उन्होंने सबकी टिकट की पिक व्हाट्सएप पर भेज दी हैं।"
"चलो ये अच्छा हुआ।" मैने कहा___"लेकिन एक बात अभी भी सोचने वाली है। वो ये कि देर सवेर अजय सिंह को ये पता चल भी सकता है कि रितू दीदी मेरी हर तरह से मदद कर रही थी। इस लिए अगर ऐसा हुआ तो रिते दीदी के लिए भी ख़तरा हो सकता है।"
"तो तुम अब क्या चाहते हो?" आदित्य ने पूछा।
"मैं तो यही चाहूॅगा यार कि रितू दीदी पर कोई संकट न आए।" मैने कहा___"हलाॅकि वो एक पुलिस ऑफिसर हैं और किसी भी ख़तरे से निपटने के लिए वो खुद ही सक्षम हैं मगर फिर भी उन्हें यहाॅ अकेला छोंड़ देने का मेरा दिल नहीं करता है। दूसरी बात उनके साथ नैना बुआ भी तो हैं। रितू दीदी के साथ वो भी तो अजय सिंह के लपेटे में आ सकती हैं।"
"मेरे ख़याल से इस में इतना सोच विचार करने की ज़रूरत नहीं है राज।" पवन ने कहा___"रितू दीदी के रहते ये सब हो जाने का चान्स बहुत ही कम है। फिर भी अगर उन्हें लगेगा कि उन दोनो पर ख़तरा है तो वो अपनी सुरक्षा के लिए अपने आला अधिकारियों से पुलिस प्रोटेक्शन भी ले सकती हैं। मुझे यकीन है कि अजय चाचा उस सूरत में उनका और नैना बुआ का कुछ नहीं बिगाड़ सकेंगे।"
"यस पवन इज राइट।" आदित्य ने कहा___"इस लिए तुम्हें रितू दीदी और नैना बुआ की फिक्र नहीं करनी चाहिए।"
"ठीक है भाई।" मैने गहरी साॅस ली___"तो फाइनल हो गया कि हम सब कल यहाॅ से मुम्बई के लिए निकल लेंगे।"
मेरी इस बात से पवन और आदित्य मुस्कुरा कर रह गए। मैंने इधर उधर नज़रें घुमाई तो मेरी नज़र फार्महाउस के गेट पर खड़े दोनो बंदूखधारियों पर पड़ी। वो दोनो हॅस हॅस के कुछ बातें कर रहे थे। एक ब्यक्ति दूसरे वाले की पीठ भी ठोंक रहा था। मुझे समझ न आया कि ये दोनो ऐसी कौन सी बात पर हॅस रहे हैं और दूसरा उसकी पीठ ठोंक रहा है।
ख़ैर, कुछ देर तक हम वहीं बेंच पर बैठे रहे। उसके बाद हम तीनो उठे और वापस अंदर की तरफ बढ़ने लगे। अभी मैं दो चार क़दम ही आगे बढ़ा था कि उन दो बंदूखधारियों में से एक उससे कुछ बोला और फिर एक बार हम तीनों की तरफ सरसरी नज़र से देखा। उसके बाद वो मुस्कुराते हुए ही फार्महाउस के बाएॅ साइड बने एक अलग दरवाजे की तरफ बढ़ गया। मेरी नज़र बराबर उसी पर थी, वो आदमी उस दरवाजे के पास पहुॅच कर एक बार पहले वाले आदमी की तरफ मुस्कुरा कर देखा उसके बाद दरवाजे के अंदर दाखिल हो गया। मेरे मन में उसकी इन सब क्रियाओं से संदेह पैदा हो गया।
मुख्य द्वार के पास पहुॅचते ही मैने पवन और आदित्य को अंदर जाने का कह दिया और खुद बाहर ही थोड़ी देर बैठने का बोल कर वहीं खड़ा रह गया। मेरे कहने पर पवन और आदित्य दोनो ने मुझे अजीब भाव से देखा तो मैने अपनी पलकें झपका कर उन्हें तसल्ली रखने का इशारा किया। मेरे इस इशारे से वो दोनो अंदर की तरफ बढ़ गए।
उनके जाने के कुछ देर बाद ही मैंने पहले वाले की तरफ देखा तो वो मुझे गेट के पास बनी चौकी की तरफ मुड़ कर हाॅथों में खैनी मलता नज़र आया। मैं बड़ी तेज़ी से उस दरवाजे की तरफ बढ़ गया जिस तरफ वो दूसरा आदमी गया था।
दरवाजे के पास पहुॅच कर मैने आहिस्ता से दरवाजे को अंदर की तरफ धकेला तो वो हल्की सी आवाज़ के साथ खुल गया। दरवाजे के खुलते ही मैं उसके अंदर दाखिल हो गया। अंदर आते ही मैने इधर उधर देखा तो मुझे दाईं तरफ एक गैलरी दिखी तो मैं उस गैलरी में आगे की तरफ बढ़ चला। कुछ ही दूरी पर मुझे एक कमरा नज़र आया जिसका दरवाजा हल्का सा खुला हुआ था। मैं उस खुले हुए दरवाजे के पास पहुॅच कर उसके खुले हुए भाग से अंदर की तरफ का मुआयना किया और फिर दरवाजे को खोल कर अंदर की तरफ दाखिल हो गया।
इस कमरे में मध्यम सी रोशनी थी। बाईं तरफ एक ऐसा दरवाजा नज़र आया जैसा कि वो किसी ऐसे वोल्ट का हो जिसके अंदर सरकार का बहुत सारा गोल्ड रखा गया हो। ये देख कर मेरे चेहरे पर नासमझने वाले भाव उभरे। उत्सुकतावश मैं उस दरवाजे की तरफ बढ़ गया। दरवाजे के पास पहुॅच कर मैने ध्यान से उस दरवाजे को देखा तो पता चला कि ये दरवाजा किसी मोटे लोहे से बना बहुत ही मजबूत दरवाजा है। किन्तु मैने देखा कि एक ही तरफ खुलने वाले उस दरवाजे पर भी हल्की सी झिरी थी। इसका मतलब वो आदमी जो अंदर आया था वो इसके अंदर ही गया है।
मेरा दिल ने अनायास ही किसी अंजानी आशंकावश ज़रा तेज़ी से धड़कना शुरू कर दिया था। मैने उस झिरी पर अपने कान सटा दिये। मैं अंदर की आवाज़ सुनने की कोशिश कर रहा था मगर मैं उस वक्त चौंका जब अंदर से किसी के ज़ोर से चीखने की आवाज़ आई। अंदर की तरफ किसी चीख़ की आवाज़ से मेरा दिमाग़ घूम गया। मैंने बिना कुछ सोचे समझे दरवाजे को हाथ बढ़ा कर खोल दिया और अंदर की तरफ बढ़ा ही था कि अचानक ही मैं एकदम से रुक गया। कारण दरवाजे के अंदर तीन फुट की दूरी पर ही सीढ़ियाॅ बनी हुई थी जो कि नीचे की तरफ जा रही थी। इसका मतलब ये कोई तहखाना था।
इस फार्महाउस पर किसी तहखाने के मौजूद होने का देख कर ही मैं सोच में पड़ गया। ख़ैर, मैने खुद को सम्हाला और नीचे की तरफ जा रही सीढ़ियों पर उतरता चला गया। नीचे तहखाने में एक अलग ही नज़ारा दिखा मुझे। जिसे देख कर मैं भौचक्का सा रह गया था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उस वक्त दोपहर के एक बज रहे थे जब रितू अपनी पुलिस जिप्सी में बैठी हवेली पहुॅची थी। यहाॅ पर वो आना तो नहीं चाहती थी किन्तु वो ये नहीं चाहती थी कि उसके न आने से उसके माॅम डैड उसके बारे में कोई अलग धारणा बना बैठें। वो इस बात को बखूबी समझती थी कि बहुत जल्द ऐसा कुछ होने वाला है जिससे हवेली का हर ब्यक्ति दहल जाएगा। वो आने वाले उस समय के लिए खुद को पूरी तरह तैयार कर चुकी थी।
जिप्सी से उतर कर रितू हाॅथ में पुलिसिया रुल लिए मुख्य द्वार की तरफ बढ़ चली। दरवाजे के पास पहुॅच कर उसने बंद दरवाजे को उसकी कुंडी से पकड़ कर बजाया। कुछ ही देर में दरवाजा खुला तो उसे अपने सामने शिवा खड़ा नज़र आया। शिवा पर नज़र पड़ते ही उसके चेहरे पर अप्रिय भाव उभरे मगर तुरंत ही उसने उन भावों को दबा कर दरवाजे के अंदर की तरफ बढ़ गई।
कुछ ही पलों में वो ड्राइंगरूम में पहुॅच गई। ड्राइंगरूम में इस वक्त अपने डैड अजय सिंह को बैठे देख वो मन ही मन चौंकी। बगल के सोफे पर प्रतिमा भी बैठी थी। रितू ने खुद को एकदम से नार्मल दर्शाते हुए एक अलग सोफे पर बैठ कर अजय सिंह की तरफ देखा, फिर बोली__"कैसे हैं डैड? आज आप फैक्ट्री नहीं गए?"
"हाॅ वो आज ज़रा थोड़ा लेट ही जाना था न।" अजय सिंह ने कहा___"इस लिए सुबह नहीं गया। ख़ैर, छोड़ो ये बताओ तुम्हें भी हमारी कुछ ख़ैर ख़बर रहती है कि नहीं?"
"आप ऐसा क्यों कह रहे हैं डैड?" रितू ने हैरानी ज़ाहिर करते हुए कहा___"भला आपकी ख़ैर ख़बर क्यों नहीं होगी मुझे?"
"अब ये तो तुम ही जानो बेटा।" अजय सिंह ने अजीब भाव से कहा___"क्योंकि पिछले कुछ समय से हर चीज़ बदली हुई नज़र आ रही है मुझे। पता नहीं पर जाने क्यों ऐसा लगता है मुझे कि मेरे जो अपने हैं वही मुझसे दूर जा रहे हैं।"
"क्या मतलब डैड??" रितू ने मन में एकाएक ही हैरत के भाव उभरे थे___"ये आज आप कैसी बाते कर रहे हैं? कहीं आप उस दिन की बात पर तो ऐसा नहीं कह रहे जब मैने शिवा को दो बातें सुना दी थी?"
"वो सब तो नार्मल बात है बेटा।" अजय सिंह ने बेचैनी से पहलू बदला___"तुमने अपने भाई से जो कुछ कहा वो बड़ी बहन होने के नाते तुम्हारा हक़ था।"
"तो फिर और क्या बात है डैड?" रितू ने कहा___"मुझे बताइये कि आपकी ऐसा क्यों लग रहा है कि आपके अपने आपसे दूर जा रहे हैं? अगर आपका इशारा मेरी तरफ है तो ये मेरे लिए शर्म की ही बात होगी कि मेरी वजह से आपको ऐसा लगा और आपके मन को ठेस पहुॅची है। प्लीज़ डैड बताइये न कि मुझसे ऐसा क्या हो गया है जिससे आपको मेरे बारे में ऐसा लग रहा है?"
"शायद तुम्हें इस बात का एहसास नहीं है बेटा कि मैं तुम सबसे कितना प्यार और दुलार करता हूॅ।" अजय सिंह ने सहसा भारी आवाज़ में कहा___"बचपन से लेकर अब तक हर वो चीज़ तुम सबके क़दमों में लाकर रखी जिन चीज़ों की तुम लोगों ने मुझसे फरमाईश की थी। इसके बावजूद मेरे प्यार में क्या कमी रह गई कि आज मेरी बेटी अपने ही माॅ बाप और भाई को बेगाना समझने लगी है?"
अजय सिंह की इस बात से रितू तो चौंकी ही मगर अलग अलग सोफों पर बैठे दोनो माॅ बेटा भी चौंक पड़े थे। दोनो कल से पूॅछ रहे थे कि क्या बताया था फोन पर उस आदमी ने मगर अजय सिंह ने उन दोनो के सवाल पर अब तक अपने होंठ सिले हुए थे। कदाचित वो ये सब रितू के आने के बाद ही उससे कहना चाहता था।
"ये आप क्या कह रहे हैं डैड?" रितू ने चकित भाव से कहा___"भला मैं ऐसा क्यों समझने लगूॅगी? मैं तो इस बारे में सोच भी नहीं सकती समझने की तो बात ही दूर है।"
"मुझे भी ऐसा ही लगता था बेटी।" अजय सिंह ने दुखी भाव से कहा___"मैं भी यही सोचा करता था कि मेरे बच्चे ऐसा कभी सोच भी नहीं सकते। मगर...मगर मेरी सारी सोच और सारी उम्मीदों को तोड़ दिया है तुमने।"
"नहीं डैड ऐसा मत कहिए प्लीज़।" रितू की ऑखें भर आईं____"अगर आपको मेरा पुलिस की नौकरी करना अच्छा नहीं लगता है तो मैं इस नौकरी को छोंड़ दूॅगी डैड। आपकी खुशी में ही मेरी खुशी है।"
"बात तुम्हारी नौकरी की नहीं है बैटा।" अजय सिंह ने कहा___"मुझे तुम्हारी पुलिस की नौकरी से कोई परेशानी नहीं है। यहाॅ पर बात हो रही है भरोसे की, विश्वास की। मुझे बहुत भरोसा था कि मेरे बच्चे कभी भी मेरे खिलाफ़ नहीं जा सकते। मगर मेरी ये भरोसा उसी तरह टूट कर बिखर गया जैसे कीई आईना टूट कर बिखर जाता है।"
"आख़िर आप कहना क्या चाहते हैं डैड?" रितू ने गंभीरता से कहा___"मैने ऐसा क्या कर दिया है जिससे आपका भरोसा टूट गया है? मुझे बताइये डैड, अगर मुझसे कहीं कोई ग़लती हुई है तो मैं उसे सुधार लूॅगी।"
"ये बात तो तुम्हें भी पता चल ही गई होगी।" अजय सिंह ने रितू के चेहरे की तरफ ज़रा गहरी नज़र से देखते हुए कहा___"कि हमारा सबसे बड़ा दुश्मन विराज यहाॅ हल्दीपुर आया हुआ था?"
"वि विराज??" रितू ने चौंकने की लाजवाब ऐक्टिंग की, बोली___"विराज यहाॅ आया? ये आप क्या कह रहे है डैड? भला वो कमीना यहाॅ किस लिए आएगा?"
"ओह, हैरत की बात है।" अजय सिंह ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"मतलब कि इस बारे में तुम्हें कुछ पता ही नहीं है। जबकि मेरे आदमी का स्पष्ट रूप से कहना है कि कल शाम जिस एम्बूलेन्स में बैठ कर विराज, उसका दोस्त, पवन और पवन की माॅ बहन अपने घर से निकले थे उस एम्बूलेन्स के आगे आगे एक जीप भी चल रही थी।"
"ये आप क्या कह रहे हैं डैड?" रितू अंदर ही अंदर बुरी तरह घबरा गई थी, किन्तु प्रत्यक्ष में खुद को सम्हालते हुए कहा___"मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा।"
"मैं जिस जीप की बात कर रहा हूॅ बेटा।" अजय सिंह ने सहसा शख्त भाव से कहा___"वो जीप असल में तुम्हारी पुलिस जिप्सी ही थी। इस गाॅव में हमारे अलावा किसी और के पास ऐसी कोई जीप है ही नहीं। हमारे आदमियों का अपनी जीप में बैठ कर विराज की उस एम्बूलेन्स के आगे आगे चलने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। फिर वो जीप किसकी हो सकती थी? हल्दीपुर में ऐसी कोई जीप पुलिस थाने में सिर्फ तुम्हें मिली हुई है। अब तुम सच सच बताओ कि तुम्हारा एम्बूलेन्स के आगे आगे चलने का क्या मतलब था?"
"ये तो हद हो गई डैड।" रितू की ऑखों से ऑसू छलक पड़े____"आप सरासर अपनी बेटी पर इल्ज़ाम लगा रहे हैं कि उस एम्बूलेन्स के आगे आगे चल रही जीप में मैं थी।
जबकि आप अच्छी तरह जानते हैं कि ऐसा कुछ करने के बारे में मैं सोच भी नहीं सकती हूॅ। सबसे पहली बात तो मुझे यही पता नहीं था कि वो कमीना विराज यहाॅ आया हुआ है जिसने कुछ समय पहले मेरे भाई शिवा को बुरी तरह मारा था। अगर पता होता तो मैं उसे खोज कर सबसे पहले अपने भाई की मार का बदला लेती उससे। उसके बाद उसे आपके हवाले कर देती। और आप कह रहे हैं कि मैं वो जीप मेरी थी जो उस एम्बूलेन्स के आगे आगे चल रही थी। इसका मतलब तो ये हुआ डैड कि आप ये समझ रहे हैं कि मैं उस विराज की पुलिस प्रोटेक्शन दे रही थी। ओह माई गाड....ऐसा कैसे सोच सकते हैं आप? आप मुझे अपने उस आदमी से मिलवाइये डैड जिसने आपको ये ख़बर दी है। मैं उससे पूछूॅगी कि उसने ये कैसे समझ लिया उस जीप में थी?"
रितू की इस बात से अजय सिंह का दिमाग़ चकरा गया। उसे समझ न आया कि वो किसकी बात पर यकीन करे? अपने उस आदमी की बात पर या अपनी बेटी की बातों पर? ये तो सच बात थी कि उसके आदमी को भी पक्के तौर पर ये पता नहीं चल पाया था कि उस जीप में कौन बैठा था। उसने भी यही सोच कर अनुमान में ही अजय से बताया था कि उस जीप में शायद उसकी बेटी रितू थी। क्योंकि यहाॅ पर अजय सिंह के अलावा अगर किही और के पास कोई जीप थी तो वो सिर्फ पुलिस इंस्पेक्टर रितू के पास। अजय सिंह के आदमी ने यही सोच कर उसे बताया था। पक्के तौर पर उसे भी पता नहीं था। दूसरी बात वो खुद जानता था कि रितू विराज को प्रोटेक्ट करने जैसा काम कर ही नहीं सकती थी क्योंकि वो विराज से कभी कोई मतलब ही नहीं रखती थी। विराज का ज़िक्र आते ही उसके अंदर गुस्सा भर जाता था।
रितू ने ये सब बातें जिस आत्मविश्वास और भावपूर्ण लहजे में कही थी उससे अजय सिंह को यही लगा कि रितू सच कह रही है। मगर उसके मन में अपने आदमी की भी बातें चल रही थी। इस लिए वो समझ नहीं पा रहा था कि कौन सच बोल रहा है?
"इस बात पर तो मैं भी यकीन नहीं कर सकती अजय कि रितू विराज को प्रटेक्ट करने वाला काम करेगी।" सहसा इस बीच प्रतिमा ने भी कहा___"मुझे समझ नहीं आ रहा कि तुम अपने आदमी की उस बात पर यकीन कैसे कर सकते हो? क्या उसने अपनी ऑखों से देखा था कि उस जीप पर रितू ही बैठी थी या फिर ये बात किसी ने पक्के तौर पर पूछने पर किसी ने उसे बताई थी?"
"माॅम, ऐसा संभव ही नहीं है।" रितू ने अपनी माॅ की तरफ देख कर कहा___"मैं सिर पटक कर मर जाना पसंद करूॅगी मगर उस कमीने को प्रोटेक्ट करने के बारे में सोचूॅगी भी नहीं। पता नहीं कैसे उस आदमी की उन फिज़ूल बातों पर यकीन कर लिया डैड ने? क्या आपने अपनी बेटी को इतना ही जाना समझा है डैड?"
"पर बेटा ग़लत वो भी तो नहीं है न।" अजय सिंह ने बात को सम्हालते हुए कहा___"उसने ये सब सिर्फ इसी लिए कहा क्योंकि इस गाॅव में हमारे अलावा सिर्फ तुम्हारे ही पास पुलिस की जीप है। इस लिए उसने सोचा कि शायद तुम ही थी उस एम्बूलेन्स के आगे।
"
"कमाल है डैड।" रितू ने मन ही मन राहत की साॅस लेते हुए कहा___"आप पढ़े लिखे और वकालत कर चुके होने के बावजूद भी इतना नहीं सोच सके कि अगर इस गाॅव में किसी के पास जीप नहीं तो क्या उसे कहीं भी जीप नहीं मिलती? ऐसा भी तो हो सकता है कि उस विराज ने शहर से ही किसी जीप को किराये पर हायर किया रहा होगा।"
"चलो मान लिया बेटा कि वो कमबख्त उस जीप को शहर से किराये पर ले आया होगा।" अजय सिंह ने कहने के साथ ही शिगार सुलगा लिया था, बोला___"मगर उसे लाने की भला क्या ज़रूरत थी? जबकि उसे इस बात का बखूबी अंदाज़ा था कि जीप में वो कहीं हमारे आदमियों द्वारा पकड़ा जा सकता है। एम्बूलेन्स तो उसके लिए सबसे बढ़िया और सुरक्षित वाहन था, जिसमें वो सबको बैठा कर बड़े आराम से हल्दीपुर से निकल जाता। तो फिर अलग से जीप हायर करने का क्या मतलब हो सकता है भला?"
"आपकी ये बात यकीनन काबिले ग़ौर है डैड।" रितू ने सोचने वाले भाव से कहा___"अलग से किसी जीप को हायर करना यकीनन बेवकूफी वाली बात है। मगर मौजूदा हालात में क्या वो ऐसी बेवकूफी कर सकता है?"
"यही तो सोचने वाली बात है बेटा।" अजय सिंह ने शिगार का कश लेने के बाद उसका धुऑ ऊपर छोंड़ते हुए कहा___"उससे ऐसी बेवकूफी की उम्मीद हर्गिज़ भी नहीं की जा सकती। मगर ये तो सच है न कि उसके आगे आगे जीप चल रही थी।"
"हो सकता है कि ऐसा उसने किसी विशेष प्लान के तहत किया हो डैड।" रितू ने अपने चेहरे पर गहन सोच के भाव दर्शाते हुए कहा___"ये तो आप भी जानते हैं डैड कि वो आपसे खुल कर टकराने की हिम्मत नहीं कर सकता। इस लिए उसने सोचा होगा कि वो हमारे बीच किसी प्रकार की दरार या अविश्वास पैदा कर देगा। उससे होगा ये कि हम आपस में ही एक दूसरे से उलझने लगेंगे। जबकि वो अपना काम करके निकल जाएगा।"
"बात कुछ समझ में नहीं आई बेटी।" प्रतिमा के माथे पर सिलवॅटें उभर आई___"हमारे बीच वो भला कैसे दरार या अविश्वास पैदा कर सकता है?"
"ठीक वैसे ही माॅम।" रितू ने कहा___"जैसे अभी कुछ देर पहले डैड के मन में अपनी बेटी के प्रति हो गया था। ज़रा सोचिए माॅम___ये तो उसे भी पता ही था कि अलग से जीप हायर करने का कोई मतलब नहीं है जबकि एम्बूलेन्स में वो सबको लेकर बड़ी आसानी से यहाॅ से निकल ही जाता। मगर इसके बाद भी उसने ऐसा किया। मतलब कि उसने अलग से एक जीप इस लिए हायर की ताकि जब आपको उसके यहाॅ से जाने का पता चले तो आपके आदमी उसका पता करके आपको उसके बारे में विस्तार से बताएॅ। यानी वो आपको बताएॅ कि एम्बूलेन्स में तो वो अपने साथ सबको लिए बैठा ही था किन्तु उसके आगे आगे अलग से एक जीप भी चल रही थी। जीप का सुन कर आप या आपके आदमी यही सोच बैठेंगे कि जीप तो आपके अलावा सिर्फ मेरे ही पास है, इस लिए उस जीप में मैं ही थी जो उस एम्बूलेन्स के आगे आगे चल रही थी।
आप ये जानते हुए भी कि आपकी बेटी ऐसा करने का सोच भी नहीं सकती है, ऐसा सोच बैठेंगे और बाद में आप मुझ पर शक़ करते हुए मुझसे इसके बारे में ऐसा सब कुछ कहने लगेंगे या पूछने लगेंगे। यही उसका प्लान हो सकता था डैड। अब आप ही बताइये क्या ऐसा नहीं हो सकता?"
रितू की बातें सुन कर अजय तो अजय बल्कि खुद को दिमाग़ की सूरमा समझने वाली प्रतिमा भी आश्चर्य चकित रह गई थी। दोनो ही मियाॅ बीवी अपनी इंस्पेक्टर बेटी की तरफ ऐसी नज़रों से देखने लगे थे जैसे रितू के सिर पर अचानक ही आगरा का ताजमहल आकर कत्थक करने लगा हो। काफी देर तक दोनो के मुख से कोई बोल न फूटा था। फिर जैसे उन दोनो को होश आया। वस्तुस्थित का एहसास होते ही दोनो के चेहरों पर अपनी बेटी की बुद्धि पर प्रशंसा के भाव उभर आए।
"अगर वो वैसा ही कर सकता है जैसा कि तुमने अभी बताया मुझे।" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली___"तो फिर यकीनन उसके दिमाग़ की दाद देनी पड़ेगी। हलाॅकि मुझे पहली बार में अभी भी यकीन नहीं हो रहा कि वो ऐसा सोच सकता है मगर वर्तमान में मैने उसके बारे में जितना विचार किया है उससे यही पता चला है कि यकीनन वो ऐसा सोच भी सकता है और कर भी सकता है।"
"लेकिन डैड वो कमीना यहाॅ आया किस लिए है?" रितू ने जानबूझ कर ऐसा सवाल किया___"और आपको कैसे पता चला कि वो यहाॅ आया है?"
"हमारी हज़ारों ऑखें हैं बेटी।" अजय सिंह ने बड़े गर्व से कहा___"हमें सबकी ख़बर होती है। ख़ैर छोंड़ो ये सब। जाओ तुम भी आराम कर लो। पता नहीं कहाॅ कहाॅ ड्यूटी के चक्कर में घूमती रहती हो तुम? बेटा कुछ अपना भी ख़याल रखा करो। हमे हर वक्त तुम्हारी फिक्र रहती है।"
"जी डैड।" रितू ने कहने के साथ ही सोफे से उठ कर खड़ी हो गई___"पर आप तो जानते हैं न कि पुलिस की नौकरी का कोई टाइम टेबल नहीं होता। इस लिए कहीं न कहीं तो भटकना ही पड़ता है।"
ये कहने के साथ ही रितू लम्बे लम्बे क़दम बढ़ाती हुई अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। जबकि वो तीनो उसे जाते हुए देखते रह गए। उसके जाने के बाद अजय सिंह ने एक नया शिगार सुलगा लिया और उसके दो तीन गहरे गहरे कश लेने के बाद उसका धुऑ ऊपर की तरफ उछाल दिया। चेहरे पर सोचो के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे थे उसके।
"तुम्हें क्या लगता है अजय?" सहसा प्रतिमा ने उसके चेहरे के भावों को रीड करते हुए कहा___"रितू की बातों में कितनी सच्चाई है?"
"मतलब तुम्हें भी इस बात का शक है कि हमारी बेटी हमसे झूॅठ बोल रही है?" अजय सिंह ने भावहीन स्वर में कहा___"ये भी कि उसने बड़ी सफाई से अपनी बात साबित भी कर दी।"
"ये बात तो मैं तुमसे पूछ रही हूॅ डियर।" प्रतिमा ने पहलू बदला___"तुमने ही तो उससे कहा था कि जीप में वही बैठी थी ऐसा तुम्हारे आदमी ने फोन पर तुमसे कहा था।
अब जबकि रितू ने अपनी सफाई दे दी है तो तुम्हें क्या लगता है अब?"
"मुझे यकीन तो नहीं हो रहा प्रतिमा कि रितू ने विराज को प्रोटेक्ट किया होगा।" अजय सिंह ने कहा___"मगर उसके बदले हुए बिहैवियर की वजह से ऐसा सोचने पर मजबूर भी हो गया हूॅ। उसकी बातों में कितनी सच्चाई है इसका पता लगाना भी ज़रूरी है। इस लिए मैने सोच लिया है कि उस पर नज़र रखने के लिए अपने किसी आदमी को उसके पीछे लगा दूॅगा। इससे कोई न कोई सच्चाई तो पता चल ही जाएगी हमे।"
"हाॅ ये सही सोचा है तुमने।" प्रतिमा ने कहा___"इससे दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। ख़ैर, छोंड़ो ये सब। मेरा तो इस सबसे बहुत सिर दर्द कर रहा है अब। इस लिए मैं जा रही हूॅ अपने कमरे में।"
"ठीक है डियर।" अजय सिंह ने सोफे से उठते हुए कहा___"मैं भी फैक्ट्री के लिए निकल रहा हूॅ।"
ये कह कर अजय सिंह बाहर की तरफ बढ़ गया। उसके जाते ही प्रतिमा ने शिवा की तरफ गहरी नज़रों से देखा और मुस्कुरा दी। शिवा उसकी मुस्कुराहट का मतलब समझ कर खुद भी मुस्कुरा उठा। प्रतिमा सोफे से उठ कर अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। उसके जाने के कुछ देर बाद शिवा भी उसी कमरे की तरफ बढ़ गया था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,
आशा करता हूॅ कि आज का ये अपडेट आप सबको पसंद आएगा और अगर न आए तो आप बेझिझक अपनी राय दे सकते हैं,,,,,,,,,,,,
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.........《 47 》
अब तक,,,,,,,,
"तुम्हें क्या लगता है अजय?" सहसा प्रतिमा ने उसके चेहरे के भावों को रीड करते हुए कहा___"रितू की बातों में कितनी सच्चाई है?"
"मतलब तुम्हें भी इस बात का शक है कि हमारी बेटी हमसे झूॅठ बोल रही है?" अजय सिंह ने भावहीन स्वर में कहा___"ये भी कि उसने बड़ी सफाई से अपनी बात साबित भी कर दी।"
"ये बात तो मैं तुमसे पूछ रही हूॅ डियर।" प्रतिमा ने पहलू बदला___"तुमने ही तो उससे कहा था कि जीप में वही बैठी थी ऐसा तुम्हारे आदमी ने फोन पर तुमसे कहा था। अब जबकि रितू ने अपनी सफाई दे दी है तो तुम्हें क्या लगता है अब?"
"मुझे यकीन तो नहीं हो रहा प्रतिमा कि रितू ने विराज को प्रोटेक्ट किया होगा।" अजय सिंह ने कहा___"मगर उसके बदले हुए बिहैवियर की वजह से ऐसा सोचने पर मजबूर भी हो गया हूॅ। उसकी बातों में कितनी सच्चाई है इसका पता लगाना भी ज़रूरी है। इस लिए मैने सोच लिया है कि उस पर नज़र रखने के लिए अपने किसी आदमी को उसके पीछे लगा दूॅगा। इससे कोई न कोई सच्चाई तो पता चल ही जाएगी हमे।"
"हाॅ ये सही सोचा है तुमने।" प्रतिमा ने कहा___"इससे दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। ख़ैर, छोंड़ो ये सब। मेरा तो इस सबसे बहुत सिर दर्द कर रहा है अब। इस लिए मैं जा रही हूॅ अपने कमरे में।"
"ठीक है डियर।" अजय सिंह ने सोफे से उठते हुए कहा___"मैं भी फैक्ट्री के लिए निकल रहा हूॅ।"
ये कह कर अजय सिंह बाहर की तरफ बढ़ गया।
उसके जाते ही प्रतिमा ने शिवा की तरफ गहरी नज़रों से देखा और मुस्कुरा दी। शिवा उसकी मुस्कुराहट का मतलब समझ कर खुद भी मुस्कुरा उठा। प्रतिमा सोफे से उठ कर अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। उसके जाने के कुछ देर बाद शिवा भी उसी कमरे की तरफ बढ़ गया था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,
तहखाने के अंदर का नज़ारा ही कुछ अलग था जिसे मैं ऑखें फाड़े अपलक देखे जा रहा था। कुछ देर के लिए तो जैसे मेरा दिमाग़ ही कुंद पड़ गया था। तहखाने के अंदर चारो तरफ छत पर लगे सफेद एल ई डी बल्बों की तीब्र रोशनी थी। अंदर मौजूद एक एक चीज़ स्पष्ट देखी जा सकती थी। किन्तु मेरी ऑखें जिस नज़ारे को देख कर हैरत से फट गई थी वो कुछ अलग ही किस्म का था। राइट साइड की दीवार से सटे हुए चार लड़के थे। उन चारों लड़कों के दोनो हाॅथ मजबूत रस्सी से बॅधे हुए जो कि ऊपर ही उठे हुए थे। चारों लड़कों जिस्म पर इस वक्त कपड़े का कोई रेसा तक न था बल्कि वो चारो जन्मजात नंगे थे। उन चारों की शक्ल सूरत से ही पता चल रहा था कि उन चारों ने यहाॅ कितनी दर्दनाक यातनाएॅ सही होंगी।
बाहर से तहखाने में आया हुआ वो आदमी भी इस वक्त पूरी तरह नंगा था और उन चारों में से एक लड़के को उसके सिर के बालों से मजबूती से पकड़ कर अपने लंड पर झुकाया हुआ था। मैं साफ देख रहा था कि वो आदमी उस लड़के के मुख में अपने लंड को ज़बरदस्ती डाले अपनी कमर को आगे पीछे कर रहा था। उसका सिर ऊपर की तरफ था और उसकी दोनो ऑखें मज़े में बंद थी।
ये सब देख कर मेरा दिमाग़ कुछ देर के लिए हैंग सा हो गया था। फिर जैसे मुझे होश आया। मेरे अंदर क्रोध और गुस्से की आग बिजली की सी तेज़ी से बढ़ती चली गई। मेरे जबड़े कस गए और मुट्ठिया भिंच गई। मैं तेज़ी से बढ़ते हुए उस आदमी के पास पहुॅचा और अपनी पूरी शक्ति से एक लात उसके बाजू में जड़ दी। परिणामस्वरूप वो आदमी उछलते हुए पीछे की दीवार से टकराया और फिर भरभरा कर नीचे तहखाने के पक्के फर्स पर गिरा। उसके हलक से दर्द में डूबी हुई चीख़ निकल गई थी।
फर्स पड़ा वो आदमी बुरी तरह कराहने लगा था। उसकी दोनो टाॅगें आपस में जुड़ कर मुड़ गई थी और उसके दोनो हाॅथ उसकी टाॅगों के बीच उसके प्राइवेट पार्ट पर थे। मुझे समझते देर नहीं लगी कि अचानक हुए इस हमले से उसका जो प्राइवेट पार्ट उस लड़के के मुख में था वो झटके से निकल गया था और झटके से निकलने से शायद उसके प्राइवेट पार्ट में उस लड़के के दाॅत गड़ गए होंगे या फिर दाॅतों से उसका लंड छिल गया होगा।
इधर अचानक हुए इस हमले से वो लड़का भी फर्स पर लुढ़क कर गिर गया था, और बाॅकी के तीन लड़के जो दीवार से सटे रस्सियों में बॅधे खड़े थे वो इस सबसे बुरी तरह घबरा गए थे।
मेरे अंदर गुस्से की आग धधक रही थी इस लिए उस आदमी को एक लात जड़ने के बाद मैं उसकी तरफ बढ़ा और झुक कर उसके सिर के बालों को पकड़ कर उसे झटके से उठा लिया। वो आदमी फिर से दर्द में कराह उठा। अभी वो सम्हला भी नहीं था कि मैने एक पंच उसके चेहरे पर जड़ दिया जिससे वो फिर से उछलते हुए दूर जाकर गिरा। मैने इतने पर ही बस नहीं किया बल्कि मैंने तो उसकी धुनाई में कोई कसर ही नहीं छोंड़ी। वो खुद भी अपने हाथ पैर चला रहा था मगर उसकी मेरे सामने एक नहीं चल रही थी। कुछ ही देर में वो अधमरी हालत में पहुॅच गया था। जब मैने देखा कि वो फर्स पर पड़ा अब हिल डुल भी नहीं रहा है तो मैने उसे मारना बंद कर दिया।
मुझे उस पर इस लिए इतना गुस्सा आया हुआ था कि वो उस लड़के के साथ ज़बरदस्ती इतना घिनौना काम कर रहा था। मैं ये भी समझ चुका था कि वो ये काम उस लड़के के अलावा बाॅकी उन तीनों के साथ भी करता होगा। बस इसी बात पर मुझे उसके ऊपर इतना गुस्सा आया था और मैने उसे मारते मारते अधमरा कर दिया था।
उस आदमी के शान्त पड़ने के बाद मैने अपने गुस्से को काबू करने की कोशिश की और फिर तेज़ी से पलटा। मेरी नज़र फर्श पर गिरे उस लड़के पर पड़ी जिसके साथ वो आदमी वो घिनौना काम कर रहा था। मैने देखा कि वो लड़का बुरी तरह डर से काॅप रहा था। मुझे उस पर बड़ा तरस आया और उसकी हालत देख कर उस आदमी पर फिर से गुस्सा आ गया। मगर मैने अपने गुस्से को काबू किया और उस लड़के के पास उकड़ू होकर बैठ गया।
"कौन है ये आदमी?" मैने उस लड़के से पूॅछा___"और वो तुम्हारे साथ इतना घिनौना काम क्यों कर रहा था? मुझे सब कुछ साफ साफ बताओ।"
वो लड़का मेरी ये बात सुन कर कुछ न बोला बल्कि डरी सहमी हुई ऑखों से देखते रहा मुझे। मैं समझ गया कि इन चारों को उस आदमी ने इतना डरा दिया है कि ये लोग अपनी ज़ुबान तक नहीं खोल पा रहे हैं। इस बात पर मुझे उस आदमी पर फिर से बड़ा तेज़ गुस्सा आ गया। मैने अपनी ऑखें बंद कर अपने गुस्से को शान्त किया।
"देखो अब तुम्हें किसी से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है समझे?" मैने उससे ज़रा अपनापन दिखाते हुए कहा__"तुम मुझे सब कुछ साफ साफ बताओ कि ये आदमी तुम लोगों के साथ ये सब क्यों कर रहा था और तुम लोग इस तहखाने में कब से कैद हो?"
"प् प्लीज़ हमें बचा लीजिए।" सहसा उस लड़के की ऑखों से ऑसू छलछला आए और वो बुरी तरह रोते हुए बोल पड़ा___"हमें इस नर्क से निकाल दीजिए। इस आदमी ने हम चारो को बहुत बुरी तरह से टार्चर किया है। ये हर रोज़ दिन में चार बार आता है और हमारे साथ यही सब घिनौना काम करके चला जाता है। हम चारो इससे अपने किये की लाखों दफा मुआफ़ी माॅग चुके हैं मगर फिर भी ये आदमी हमारे साथ ये सुलूक करता है। प्लीज़ हमे इस आदमी से बचा लीजिए। हमें यहाॅ से निकाल कर हमें हमारे घर जाने दीजिए। हम आपके पैर पकड़ते हैं, प्लीज़ प्लीज़।
"
उस लड़के का ये रुदन देख कर मैं अंदर तक काॅप गया। मैं इस बात की कल्पना कर सकता था कि इन चारों के साथ किस हद तक उस आदमी ने अत्याचार किया होगा। किन्तु सहसा मेरे मन में सवाल उभरा कि वो आदमी इन लोगों के साथ ये सब किस वजह से कर रहा है? जबकि ये फार्महाउस उसका नहीं बल्कि रितू दीदी का है? क्या रितू दीदी को इस सबका पता है? या फिर ये सब उनकी जानकारी में ही हो रहा है? नहीं नहीं, रितू दीदी ऐसे घिनौने काम का सोच भी नहीं सकती हैं। तो फिर उनके फार्महाउस के तहखाने में ये सब कैसे हो सकता है? मेरे मन में हज़ारों सवाल एक साथ आकर खड़े हो गए। मगर जवाब किसी का भी नहीं था मेरे पास।
"मैने तुमसे जो कुछ पूछा है उसका सही सही जवाब दो पहले।" मैने उस लड़के से कहा___"आख़िर किस वजह से ये सब तुम लोगों के साथ कर रहा है वो आदमी? तुम सब कुछ मुझे साफ साफ बताओ। और हाॅ किसी से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। तुमने देखा है न कि मैने कैसे उस आदमी का दो मिनट में काम तमाम कर दिया है? इस लिए तुम अब बेफिक्र रहो कि कोई तुम पर अब दुबारा ऐसा कर सकेगा। मैं तुम्हें यहाॅ से निकाल कर तुम लोगों को घर भी भेजवा दूॅगा। मगर उससे पहले तुम मुझे बताओ कि ये सब क्यों हो रहा है तुम लोगों साथ? ऐसा क्या अपराध किया है तुम लोगों ने? और अगर ये सब तुम लोगों के साथ बेवजह ही हो रहा है तो यकीन मानो मैं अपने हाॅथों से इस आदमी को मौत दूॅगा। चलो अब बताओ सारी बात।"
"ये सच है कि हम चारों ने एक साथ बराबर का अपराध किया था।" उस लड़के ने नज़रें झुका कर कहना शुरू किया___"मगर, उस अपराध के लिए हमें कानूनी तरीके से सज़ा भी तो दिलवाई जा सकती थी, मगर इन लोगों ने ऐसा कुछ नहीं किया। बल्कि हम चारों को पकड़ कर यहाॅ ले आए और फिर हर रोज़ हमारे साथ ये घिनौना काम करते रहे। हमने इन लोगों से अपने किये की लाखों दफा मुआफ़ी माॅगी। ये तक कहा कि आप हमें गोली मार कर खत्म कर दो उस अपराध के लिए मगर ये लोग हमारी कोई भी बात नहीं माने और हमारे साथ यही सब करते रहे।"
"ओह आई सी।" मैने कुछ सोचते हुए कहा___"लेकिन तुम लोगों ने आख़िर किस तरह का अपराध किया था जिसकी कीमत तुम लोगों को इस रूप में चुकानी पड़ रही है? और तुमने अभी ये कहा कि "इन लोगों ने" मतलब इस आदमी के अलावा भी कोई है जो तुम लोगों के साथ ये सब कर रहा है? कौन कौन हैं इस आदमी के साथ बताओ मुझे?"
"एक लड़की है।" उस लड़के ने कहा___"उसका नाम रितू है और वो पुलिस में इंस्पेक्टर है। वहीं हम चारों को पकड़ कर यहाॅ लाई थी। उसके बाद उसने इस आदमी को हमारी ख़ातिरदारी करने का काम दे दिया था। बस उसके बाद से ही ये आदमी हमारी ख़ातिरदारी के रूप में हमारे साथ ये सब कर रहा है।"
मैं उसके मुख से रितू दीदी का नाम सुन कर मन ही मन बुरी तरह उछल पड़ा था।
मुझे समझ न आया कि रितू दीदी ने इन लोगों को किस लिए पकड़ा होगा और फिर पकड़ कर यहाॅ लाया होगा? अपने आदमी को इन लोगों की ख़ातिरदारी करने का काम सौंप दिया। इसका मतलब रितू दीदी को भी ये पता नहीं होगा कि उनका ये आदमी इन लोगों की कैसी ख़ातिरदारी करता है? मुझे यकीन था कि मुजरिम को सज़ा देने के लिए रितू दीदी भले ही कानून की थर्ड डिग्री का स्तेमाल कर लेतीं मगर ऐसा घिनौना काम करने को अपने आदमी से किसी सूरत में न कहती। अरे कहने की तो बात ही दूर वो तो इस बारे में सोचती ही नहीं। मतलब साफ है कि ख़ातिरदारी की आड़ में ये घिनौना काम दीदी का ये आदमी अपनी मर्ज़ी से ही कर रहा है, जिसका दीदी को पता ही नहीं है। अब सवाल ये था कि इन लड़कों ने ऐसा कौन सा जघन्य अपराध किया था जिसकी वजह से रितू दीदी इन लोगों को कानूनन सज़ा दिलाने की बजाय यहाॅ अपने फार्महाउस के तहखाने में लाकर बंद कर दिया था?
"यकीनन तुम लोगों के साथ बहुत बुरा हुआ है।" फिर मैने उससे कहा___"उस इंस्पेक्टर को ऐसा नहीं करना चाहिये था। उसे तो तुम लोगो को कानून के सामने लेकर जाना चाहिए था। ख़ैर, अब तुम बेफिक्र हो जाओ। ये बताओ कि तुम लोगों एक साथ ऐसा कौन सा अपराध किया था?"
"वो वो हम चारों ने एक साथ एक लड़की की इज्ज़त लूटी थी।" उस लड़के ने नज़रें चुराते हुए कहा___"और फिर उसे शहर के बाहर ऐसे ही अधमरी हालत में फेंक आए थे।"
"क्या?????" उसकी ये बात सुन कर मैं बुरी तरह चौंका___"तुम लोगों ने किसी लड़की की इज्ज़त लूटी थी? वो भी इस तरीके से कि उसे बाद में अधमरी हालत में कहीं फेंक भी आए? ये तो सच में तुम लोगों ने बहुत बड़ा अपराध किया है। ख़ैर, उसके बाद क्या हुआ था? मेरा मतलब कि तुम लोग उस इंस्पेक्टर रितू के द्वारा पकड़े कैसे गए?"
"तीसरे दिन हम चारो दोस्त अपने फार्महाउस पर मौज मस्ती कर रहे थे।" उस लड़के ने कहा___"तभी वो इंस्पेक्टर हमारे उस फार्महाउस पर आ धमकी थी। उसने हम चारों को पहले वहीं पर खूब मारा उसके बाद हम चारों को अपनी जीप में डाल कर यहाॅ ले आई तब से हम यहीं हैं और इस आदमी के द्वारा यातनाएं झेल रहे हैं। प्लीज़ हमें यहाॅ से निकाल लो भाई, हम जीवन भर तुम्हारी गुलामी करेंगे।"
"उस लड़की का क्या हुआ?" मैने उसकी अंतिम बात पर ध्यान न दिया___"जिसकी तुम चारों ने इज्ज़त लूटी थी?"
"इस बारे में मुझे कुछ पता नहीं है।" उस लड़के ने असहाय भाव से कहा___"हमने उसे उस दिन से देखा ही नहीं है और ना ही किसी ने हमें उसके बारे में बताया।"
"क्या तुम्हें इस बात का एहसास है कि जिस लड़की की तुम लोगों ने इज्ज़त लूटी है?" मैने ज़रा शख्त भाव से कहा___"उस पर क्या गुज़र रही होगी? उसके माॅ बाप पर क्या गुज़र रही होगी? अपनी हवस के लिए तुम लोगों ने किसी की लड़की का जीवन बरबाद कर दिया। तुम लोगों को तो सीधा फाॅसी पर लटका देना चाहिए।
"
"हम सबको फाॅसी की सज़ा मंज़ूर है भाई।" उस लड़के ने कहा___"हमें इस बात का एहसास हो चुका है कि हमसे बहुत बड़ा गुनाह हुआ है। जब से जवानी की देहलीज़ पर हमने क़दम रखा था तब से किसी न किसी लड़की का जीवन हमने बरबाद ही तो किया है। इस लिए भाई फाॅसी से भी बढ़ कर अगर कोई सज़ा है तो हम चारों को वो सज़ा भी मंजूर है।"
"बहुत खूब।" मैने नाटकीय अंदाज़ से कहा___"ऐसी बातें अपराध करते वक्त मन में क्यों नहीं आती हैं? ये तब क्यों समझ में आती हैं जब मौत सिर पर आकर खड़ी हो जाती है या फिर जब वैसा ही कुकर्म खुद के साथ हुआ करता है? ख़ैर, ये बताओ कि ये एहसास अब क्या इस लिये हुआ है कि खुद पर जब वैसा ही गुज़रने लगा या फिर सच में लगता है कि हाॅ तुम लोगों ने ग़लत किया था उस लड़की के साथ?"
"ये तो सच बात है भाई कि इंसान को कोई बात तभी समझ में आती है जब उसे ठोकर लगती है।" उस लड़के ने कहा___"ये बात मुझ पर भी लागू होती है। मगर मुझे इस बात का अब गहरा दुख हो रहा है भाई कि मैने उस लड़की के साथ इतना बड़ा नीच काम किया था। प्यार मोहब्बत दोस्ती ये सब कितनी खूबसूरत चीज़ें हैं जिनके लिए और जिनके आधार पर इंसान कितना कुछ कर जाता है। अगर विश्वास हो तो कोई भी ब्यक्ति किसी के भी साथ कहीं भी आ जा सकता है या फिर वो आपके भरोसे आपके ऊपर कितनी ही बड़ी जिम्मेदारी सौंप देता है। मगर ये छल कपट और ये धोखा कितनी ख़राब चीज़ें हैं जो प्यार मोहब्बत दोस्ती, और भरोसा आदि सबको नस्ट कर देता है।"
"वाह तुम तो यार किसी बहुत बड़े उपदेशक की तरह बड़ी बड़ी बातें करने लगे।" मैने सहसा ब्यंगात्मक भाव से कहा___"काश! ये सब बड़ी बड़ी बातें तब भी तुम करते और समझते जब तुम किसी लड़की का जीवन नष्ट कर रहे थे। कम से कम इससे तुम दोनो का भला तो होता। वैसे प्यार मोहब्बत दोस्ती और भरोसा जैसी बातें तुम्हारे मन में कैसे आ गईं? क्या तुमने इन्हीं के आधार पर उस लड़की का जीवन बरबाद किया है?"
"बिलकुल सही कहा भाई।" उस लड़के ने बेचैनी से पहलू बदलते हुए कहा___"मेरे जीवन में लड़कियाॅ तो बहुत आईं थी जिनके साथ मैने अपने इन तीनों दोस्तों के साथ मौज मस्ती की थी। वो सब लड़कियाॅ मेरे पैसों के लालच में अपना सब कुछ खोल कर हमारे सामने बेड पर लेट जाती थीं मगर इस लड़की में बात ही कुछ खास थी। ये एक ऐसे लड़के से बेपनाह प्यार करती थी जिसका नाम विराज था, विराज सिंह बघेल। मैं भी इससे प्यार करता था पर कभी कह न सका था इससे। हलाॅकि दोस्ती के रिश्ते से हमारी हैलो हाय हो जाती थी। एक दिन जाने क्या हुआ इसे कि ये मुझे लेकर उस विराज के पास गई और उससे दो टूट भाव से कह दिया कि वो उससे प्यार नहीं करती थी बल्कि उसकी दौलत से प्यार करती थी। और अब जबकि वो कंगाल हो चुका है तो उसका उससे कोई रिश्ता नहीं।
मैं उसकी इस बात से मन ही मन हैरान तो था मगर खुश भी हुआ कि चलो अब तो ये मेरे पास ही आएगी। वही हुआ भी। वो अपने एक्स ब्वायफ्रैण्ड को छोंड़ कर मेरे साथ ही कालेज में रहने लगी। मगर मुझे जल्द ही पता चल गया कि ये मेरे साथ रहते हुए भी मेरे साथ नहीं है। मैं अक्सर देखता था कि वो अकेले में बेहद उदास और दुखी रहती थी। मुझे लगा कि ये कहीं फिर से न उस विराज के पास लौट जाए, इस लिए मैने इसे अपने साथ हमेशा के लिए रखने का सोच लिया। मेरे ये तीनो दोस्त बार बार मुझसे कहते कि प्यार व्यार का चक्कर छोंड़ बस मज़े ले और हमें भी मज़ा करवा। मैने भी सोचा कि यार ऐसे प्यार का क्या मतलब जो अपना है ही नहीं। बस उसके बाद मैने वही किया जो अब तक दूसरी अन्य लड़कियों के साथ किया था। अपनी बर्थडे वाली शाम मैने इसे भी इन्वाइट किया था। जब ये उस शाम मेरे फार्महाउस पर आई तो मैने इसको कोल्ड ड्रिंक का वो ग्लास प्यार हे दिया जिस ग्लास में मैने नींद की दवा मिलाई हुई थी। कोल्ड ड्रिंक पीने के कुछ देर बाद ही वो नीद के नशे में झूमने लगी। मैने सबकी नज़र बचा कर उसे अपने कमरे में ले गया और उस कमरे में मैने उसके सारे कपड़े उतार कर उसकी इज्ज़त से खूब खेला। मेरा एक दोस्त इस सबकी वीडियो भी बना रहा था। बस उसके बाद तो उसे अपनी ही बने रहना था, इस लिए वो बनी रही और हम जब भी उसे बुलाते तो उसे आना पड़ता और हम सबको खुश रखना पड़ता उसे। यही सब चलता रहा मगर कुछ दिन पहले की बात है। मैने उसे फिर से अपने बर्थडे पर इन्वाइट किया मगर उसने आने से इंकार कर दिया। कहने लगी कि उसकी तबीयत ख़राब है। मैं समझ गया कि वो बहाने बना रही है न आने का। इस लिए मैने उसे फिर से वीडियो को उसके डैड के पास भेज देने की धमकी दी। मेरी इस धमकी से उसे मेरे फार्महाउस पर आना पड़ा। उस दिन भी मैंने अपने इन तीनो दोस्तों के साथ मिल कर उसके साथ सेक्स किया और और उसी हालत में सो गए थे। रात के लगभग तीन या चार बजे के करीब मेरी ऑख खुली तो देखा कि विधी की हालत बहुत ख़राब थी। उसके प्राइवेट पार्ट से ब्लड निकला हुआ था और उसके मुख से भी। ये देख कर मैं बहुत ज्यादा घबरा गया। मुझे लगा कहीं ये मर न जाए। मगर उसे उस हालत में लेकर हम भला उतने समय कहाॅ जाते। इस लिए मैने अपने इन दोस्तो को जगाया और इन लोगों को भी विधी की हालत के बारे में बताया। ये तीनो भी विधी की वो हालत देख कर घबरा गए थे। फिर हम चारों ने सोच विचार करके फैंसला लिया कि इसे कहीं छोंड़ आते हैं। इस फैंसले के साथ ही हम चारों ने विधी को किसी तरह कपड़े पहनाए और उसे उसी हालत में उठा कर बाहर खड़ी अपनी कार की डिक्की में डाल दिया। उसके बाद हम चारो उस तरफ चल पड़े जिस तरफ पिछले कुछ साल पहले ही एक नये हाइवे का निर्माण हुआ था। रात के उस सन्नाटे में किसी के भी द्वारा देख लिए जाने का कोई ख़तरा नहीं था।
हाइवे में पहुॅच कर हमने कुछ दूरी पर सड़क के किनारे झाड़ियों के पास ही विधी को डिक्की से निकाल कर चुपचाप लिटा दिया और फिर हम चारों वहाॅ से वापस फार्महाउस आ गए। उसके बाद क्या हुआ इसका हमें आज तक कुछ भी पता नहीं है।"
"क्या तुम जानते हो कि मैं कौन हूॅ?" उसकी बात सुनने के बाद मैने सहसा कठोर भाव से उससे पूछा___"ठीक से देखो मुझे। मेरा दावा है कि तुम मुझे ज़रूर पहचान जाओगे कि मैं कौन हूॅ?"
मेरी इस बात को सुन कर वो लड़का जो कि वास्तव में सूरज चौधरी ही था मेरी तरफ बड़े ध्यान से देखने लगा। उसके चेहरे पर पहले तो उलझन के भाव उभरे थे किन्तु जल्द ही उसके चेहरे पर चौंकने के भाव उभरे और फिर एकाएक ही आश्चर्य से मेरी तरफ ऑखें फाड़े देखने लगा। पल भर में उसका चहेरा डर और दहशत से पीला ज़र्द पड़ता चला गया। वह एकदम से ही जूड़ी के मरीज़ की तरह काॅपने लगा था।
"क्या हुआ सूरज चौधरी?" मेरे मुख से एकाएक शेर की सी गुर्राहट निकली___"पहचाना मुझे या मैं खुद अपने तरीके से बताऊॅ तुझे कि मैं कौन हूॅ??"
"वि...वि...विराऽज।" सूरज चौधरी के मुख से दहशत में डूबा स्वर निकला___"तुम वि..विराज हो। वही विराज जिसे वो विधी बेपनाह मोहब्बत करती थी।"
"और जिसके साथ तूने इतना बड़ा वहशियाना कुकर्म किया है।" मैंने गुस्से में आग बबूला होते ही उसे उसके सिर के बालों से पकड़ कर उठा लिया और फिर पीछे से उसकी गर्दन में अपने दोनो हाॅथ जमाते हुए मैने पूरी ताकत से झटका दिया। सूरज चौधरी के हलक से हृदय विदारक चीख निकल गई। दीवार पर कुंडे में बॅधी रस्सी एक झटके में ही टूट गई थी और इधर झटका लगते ही सूरज के दोनो हाॅथों में वो रस्सी गड़ सी गई थी।
"हरामज़ादे।" मैंने कहने के साथ ही सूरज को अपने सिर के ऊपर तक उठा लिया और पूरी ताकत से सामने की दीवार की तरफ उछाल दिया, फिर बोला___"तूने मेरी विधी के साथ इतना घिनौना कुकर्म किया। नहीं छोंड़ूॅगा तुझे....तुम चारों को एक एक करके ऐसी भयावह मौत दूॅगा कि उसे देख कर ये ज़मीन और वो आसमां तक थर्रा जाएॅगे।"
उधर दीवार से टकरा कर सूरज नीचे फर्श पर मुह के बल गिरा। गिरते ही उसके मुख से दर्द भरी चीख निकल गई। उसके दोनो हाथ अभी भी रस्सी से बॅधे हुए थे इस लिए वो सहारे के लिए अपने हाॅथ आगे या इधर उधर नहीं कर सकता था। इधर सूरज का ये हाल देख कर बाॅकी तीनों लड़कों के देवता कूच कर गए। वो मेरी तरफ बुरी तरह घबराए हुए से देखने लगे थे।
आगे बढ़ कर मैने सूरज के सिर के बाल पकड़ कर उसे उठाया और कहा___"तेरी कहानी सुनने से पहले मुझे लग रहा था कि तेरे साथ वो आदमी बहुत ग़लत कर रहा था मगर अब समझ में आया कि वो कितना अच्छा कर रहा था। तू जिस इंस्पेक्टर रितू की बात कर रहा था न वो मेरी बड़ी बहन है।
मैं सब कुछ समझ गया अब कि तेरे यहाॅ होने का असल माज़रा क्या था?"
कहने के साथ ही मैने सूरज के पेट में अपने घुटने का ज़बरदस्त वार किया तो वो हलाल होते बकरे की तरह चिल्लाया। उसके झुकते ही मैने उसकी पीठ पर दुहत्थड़ जड़ दिया, जिससे वो फर्श पर मुह के बल गिरा। नीचे झुक कर मैने फिर उसे उसके बालों से पकड़ कर उठाया, फिर बोला___"अब सारी कहानी समझ गया हूॅ मैं। तू अपने इन कमीने दोस्तों के साथ विधी को उस दिन वहाॅ हाइवे के किनारे झाड़ियों के पास छोंड़ आया। सुबह हुई तो हाइवे से गुज़र रहे किसी वाहन में आ रहे ब्यक्ति की नज़र विधी पर पड़ी होगी तो उसने इसकी सूचना पुलिस को दी होगी। ये मामला चूॅकि हल्दीपुर का था इस लिए हल्दीपुर पुलिस थाने में मेरी बड़ी बहन रितू दीदी ही थी, उनको जब इस सबकी सूचना किसी अज्ञात ब्यक्ति द्वारा मिली तो वो उस जगह पर पहुॅच गईं। विधी की उस गंभीर हालत को देख कर दीदी ने विधी को तुरंत ही हल्दीपुर के सरकारी हास्पिटल में एडमिट कर दिया। दीदी को शायद कहीं से ये पता था कि मैं किसी विधी नाम की लड़की से प्यार करता था। इस लिए हास्पिटल में जब दीदी को डाक्टर द्वारा विधी के बारे में पता चला होगा तो उनके दिमाग़ में तुरंत ही ये बात आई होगी कि किसी विधी नाम की लड़की से ही उनका भाई विराज प्यार करता था। किन्तु उन्होंने विधी को देखा तो था नहीं पहले इस लिए उन्होंने इस बारे में कन्फर्म करने के लिए विधी से पूछताॅछ की होगी। दीदी के पूछने पर आख़िर विधी ने बता ही दिया होगा कि हाॅ वो ही वो विधी है जिसे उनका भाई विराज प्यार करता था। बस उसके बाद ही दीदी का मेरे प्रति भी हृदय परिवर्तन हुआ होगा या फिर खुद विधी ने बताया होगा उन्हें कि सच्चाई क्या है? ख़ैर, उसके बाद विधी ने दीदी से अपनी अंतिम इच्छा की बात कही और दीदी ने उससे वादा किया कि वो उसके महबूब को उसके पास ज़रूर लेकर आएॅगी। दीदी ने मेरी खोज करना शुरू किया और उन्हें मेरा दोस्त पवन मिला। पवन से दीदी ने सारी बातें बताईं होंगी। तभी तो पवन मुझसे वो सब बता नहीं रहा था बल्कि यही कहे जा रहा था कि मैं आ जाऊॅ। वाह रितू दीदी! आप ग्रेट हो दीदी। आपने मुझे मेरी विधी से मिलवाया वरना मैं तो उसे अंतिम समय में भी देख न पाता। आपने ये बहुत बड़ा उपकार किया है दीदी। आज आप मेरी नज़र में बहुत महान हो गईं हैं।"
मैं भावावेश में जाने क्या क्या कहे जा रहा था जबकि मेरे चंगुल में फॅसा सूरज बड़ी मुश्किल से अपनी पलकें उठा कर मेरी तरफ हैरत से देखे जा रहा था। शायद वो मेरी कुछ बातें समझने की कोशिश कर रहा था मगर समझ नहीं पा रहा था।
"इतना कुछ मेरी विधी के साथ हो गया और मुझे इसका आभास तक न था।" मेरी ऑखों से ऑसू छलक पड़े। मेरे दिल में हूक सी उठी।
विधी के साथ हुए इस घृणित कुकर्म का सोच कर ही मेरी आत्मा काॅप उठी, मेरा दिल तड़प उठा। एकाएक ही मेरे चेहरे पर गुस्से की आग धधक उठी। मैने सूरज को उसकी गर्दन से पकड़ कर एक ही हाॅथ से ऊपर उठा लिया, फिर बोला___"तेरा और तेरे साथियों का मैं वो हाल करूॅगा कि दुबारा इस धरती पर पैदा होने से मना कर दोगे।"
"मुझे माफ़ कर दो विराज।" सूरज की ऑखें बाहर को निकली आ रही थी, फिर भी किसी तरह बोला__"मैं मानता हूॅ कि मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया है जिसके लिए कोई मुआफ़ी हो ही नहीं सकती। मगर.....
"हरामज़ादे जब जानता है कि कोई मुआफ़ी नहीं हो सकती तो क्यों माॅग रहा है मुआफ़ी?" मैने ऊपर से ही उसे उछाल दिया। वो लहराते हुए उस जगह पर गिरा जिस जगह पर वो आदमी बेहश अवस्था में पड़ा था। सूरज जब फर्श से टकराया तो उसके हलक से चीख निकल गई और उसका बाजू ज़ोर से उस आदमी के जिस्म पर लगा।
उस आदमी के जिस्म में हरकत हुई और वो कुछ ही पलों में होश में आ गया। ऑख खुलते ही उसने अपनी तरफ बढ़ते हुए मुझे देखा तो एकाएक ही उसके चेहरे पर घबराहट के भाव उभर आए। जबकि मेरा ध्यान तो सूरज की तरफ था जो उस आदमी के ही पास पड़ा कराह रहा था। उसके पास पहुॅच कर मैने उसे फिर से उसके बालो से पकड़ कर उठाया।
"तूने मेरी विधी के साथ जो कुकर्म किया है उसके लिए मैं मुआफ़ी कैसे दे दूॅगा तुझे?" मैने गुर्रा कर उसे झकझोरते हुए कहा___"तू ये सोच भी कैसे सकता है कि तुझे मुआफ़ी मिल जाएगी। तुझे अगर कुछ मिलेगा तो सिर्फ वो जिसे तड़प तड़प कर और सड़ सड़ कर मरना कहते हैं।"
दीवार से सटे बाॅकी तीनों लड़कों की ये सब देख कर ही हालत ख़राब थी। मेरे चेहरे पर इस वक्त हिंसक दरिंदे जैसे भाव थे। उधर फर्श पर पड़ा वो आदमी मेरी बातें सुन कर हैरान रह गया था। फिर सहसा उसे खुद का ख़याल आया। वो सूरज की तरह ही जन्मजात नंगा था। ये देख कर वो किसी तरह उठा और एक तरफ रखे अपने कपड़ों की तरफ बढ़ गया। कपड़े उठा कर वो जल्दी जल्दी उन्हें पहनने लगा।
इधर मैने गुस्से में उबलते हुए सूरज के चेहरे पर ज़ोर का घूॅसा मारा तो वो पीछे की दीवार में ज़ोर से टकराया और फिर फर्श पर लुढ़कता चला गया। उसके नाॅक और मुख से भल्ल भल्ल करके खून बहने लगा था। फर्श पर गिरते ही उसकी ऑखें बंद होती चली गई। मैं समझ गया कि ये बेहोश हो चुका है।
बेहोश हो चुके सूरज के जिस्म पर मैने पैर की एक ठोकर जमाई और पलट कर बाएॅ साइड दीवार की तरफ देखा। दीवार से सटे वो तीनो लड़के रस्सियों में बॅधे ऊपर की तरफ हाॅथ किये खड़े थरथर काॅप रहे थे। ऑखों में आग और चेहरे पर ज़लज़ला लिए मैं उनकी तरफ बढ़ा।
मुझे अपनी तरफ आते देख उन तीनों की हालत ख़राब हो गई। किनारे साइड की तरफ जो बॅधा खड़ा हुआ था उसका डर के मारे पेशाब छूट गया। उनके क़रीब पहुॅच मैने पहले एक एक घूॅसा उन तीनों के जबड़ों पर रसीद किया।
तीनो ही दर्द में बिलबिला उठे। मुझसे रहम की भीख माॅगने लगे किन्तु मैं इन लोगों को भला कैसे माफ़ कर सकता था? ये मेरी विधी के रेपिस्ट थे, उसके हत्यारे थे ये। इनको तो अब ऐसी मौत मरना था जिसके बारे में आज तक किसी ने सुना तक न होगा।
"तुम सबको ऐसी मौत मारूॅगा किसके बारे में किसी कल्पना तक न की होगी।" मैने भभकते हुए कहा__"तुम सब ने मेरी मासूम विधी के साथ ऐसा घिनौना अपराध किया है जिसके लिए मैं तुम लोगों को अगर कुछ दूॅगा तो है सिर्फ दर्दनाक मौत। इसके सिवा और कुछ नहीं। रहम के बारे में तो सोचो ही मत। क्योंकि वो मैं ब्रम्हा के कहने पर भी नहीं करने वाला।"
मेरी ये बात सुन कर उन तीनों के चेहरे डर से पीले ज़र्द पड़ गए। पल भर में ऐसी सूरत नज़र आने लगी उन तीनो की जैसे लकवा मार गया हो। इधर मैं पलटा। मेरी नज़र उस आदमी पर पड़ी जो सूरज के मुख में अपना लंड डाले हुए था। वो मेरी तरफ सकते ही हालत में देखे जा रहा था। मैं उसकी तरफ बढ़ा तो वो एकदम से भयभीत सा हो गया।
"मुझे माफ़ कर दो काका।" उसके पास पहुॅचते ही मैने विनम्र भाव से कहा___"मैने बिना कुछ जाने समझे आप पर हाॅथ उठा दिया। उसके लिए आप चाहें तो मुझे सज़ा दे सकते हैं।"
"अ अरे ना ना बेटवा।" हरिया काका हड़बड़ाते हुए एकदम से बोल पड़ा___"ई का कहत हो तुम? तोहरे से कउनव ग़लती ना हुई है। एसे माफी मागे के कउनव जरूरत ना है। हमहू का कहाॅ पता रहे बेटवा कि तुम असल मा हमरे रितू बिटिया के छोट भाई हो।"
"आप बहुत अच्छे हैं काका।" मैने हरिया काका के दाएॅ कंधे पर हाथ रखते हुए कहा___"आपने इन लोगों की वैसी ही ख़ातिरदारी की है जैसी इन लोगों की करनी चाहिए थी।"
"अब का करें बेटवा हमरे मन मा एखे अलावा र कउनव बात आईये न रही।" काका ने कहा___"रितू बिटिया जब हमसे कहा कि ई ससुरन केर अच्छे से ख़ातिरदारी करै का है ता हमरे मन मा इहै बात आई। बस ऊखे बाद हम शुरू होई गयन। ई ससुरन के पिछवाड़े से बजावै मा बड़ी मज़ा आई बेटवा। लेकिन अब एकै बात केर चिन्ता है कि कहीं ई बात रितू बिटिया का पता न चल जाय। ऊ का है ना बेटवा, ई अइसन काम है कि केहू का पता चल जाय ता बहुतै शरम केर बात होई जाथै न। अउर हम ई नाहीं चाही कि ई बात रितू बिटिया का पता चलै। काहे से के ई बात पता चले मा सरवा हमरी इज्जत का बहुतै कचरा होई जाई।"
"चिन्ता मत करो काका।" मैं मन ही मन उसकी बात पर और उसकी भाषा पर मुस्कुराते हुए बोला___"इस बात का पता रितू दीदी को बिलकुल भी नहीं चलेगा। लेकिन एक बात अब आप भी सुन लीजिए। वो ये कि आपने अपना काम कर लिया अब बारी मेरी है। मैं इन्हें ऐसी मौत दूॅगा कि आपने उसके बारे में कभी सोचा भी नहीं होगा। इस लिए अब आप सिर्फ तमाशा देखेंगे।"
"ठीक है बेटवा।" काका ने सिर हिलाया___"हमहू ईहै चाहिथे कि ई ससुरन का कुत्तन जइसन मौत हो।
जितना बड़ा अपराध ई लोगन ने किया है न उसके लिए ई लोगन का कौनव परकार केर रियाइत ता मिलबै न करै।"
"ऐसा ही होगा काका।" मैने उन चारों पर एक एक नज़र डालते हुए कहा___"मुझे कुछ सामान चाहिए आपसे। और हाॅ बाॅकी किसी और को मत बताइयेगा कि मैं यहाॅ हूॅ।"
"ठीक है बेटवा।" काका ने कहा___"अउर सामान का चाहै का है तुमका?"
"एक रेज़र ब्लेड।" मैने कहा___"और एक प्लास चाहिए काका।"
"ठीक है बेटवा।" हरिया काका ने कहा___"हम अभी लावथैं दुई मिनट मा।"
कहने के साथ ही हरिया काका तहखाने के दरवाजे से बाहर चला गया। जबकि उनके जाते ही मैं सूरज के पास पहुॅचा और उसे उठा कर फिर से एक अलग रस्सी जोड़ कर उसे वैसे ही बाॅध दिया जैसे बाॅकी तीनो बॅधे हुए थे। सूरज को बाॅधने के बाद मैं पलटा और एक तरफ रखी पानी की बाल्टी से एक मग पानी लेकर सूरज के चेहरे पर ज़ोर से उलट दिया। पानी का तेज़ प्रहार पड़ते ही सूरज होश में आ गया। होश में आते ही वो दर्द से चीखने लगा।
"तुम हमारे साथ क्या करने वाले हो?" बाॅकी तीन मे से एक ने घबराते हुए पूछा___"देखो, हम मानते हैं कि हमने बहुत बड़ा गुनाह किया है और उसके लिए अगर तुम हमे गोली मार कर जान से मार भी दो तो हमें मंजूर है मगर ऐसे तड़पा तड़पा कर मत मारो भाई। प्लीज़ कुछ तो रहम करो। उस आदमी ने तो वैसे भी हम लोगों के वो सब करके हमें जान से ही मार दिया है। तुम क्या जानो कि उस हवशी ने हमारे पिछवाड़ों की क्या दुर्गत की है?"
"जब अपने पर बीतती है तभी एहसास होता है कि दर्द और तक़लीफ़ क्या होती है।" मैने उससे गुर्राते हुए कहा___"तुम लोगों को तब इस बात का एहसास नहीं हुआ था कि जिन जिन लड़कियों के साथ तुम सबने कुकर्म किया है उन पर उस वक्त क्या गुज़री रही होगी?"
"सच कहा भाई।" एक दूसरे लड़के ने कहा___"लेकिन अब जो हो गया उसे लौटाया तो नहीं जा सकता न। हमें हमारे गुनाहों की इतनी सज़ाएॅ तो मिल ही चुकी हैं। तुम हमें एक ही बार में जान से मार दो। मगर वो सब न करो भाई जो तुम अपने मन सोचे बैठे हो। प्लीज भाई हम पर रहम करो।"
"शट-अऽऽऽप।" मैं पूरी शक्ति से दहाड़ा___"यहाॅ तुम लोगों की मर्ज़ी से कुछ नहीं होगा, बल्कि वही होगा जो मैं चाहूॅगा। मैं क्या चाहता हूॅ इसका पता जल्द ही तुम चारो को चल जाएगा।"
मैने इतना कहा ही था कि हरिया काका तहखाने में पुनः दाखिल हुए। उनके हाॅथ में वो सामान था जो मैने उनसे मॅगवाया था। यानी कि रेज़र ब्लेड और प्लास। मेरे हाॅथ में सामान पकड़ाने के बाद हरिया काका ने तहखाने का दरवाज़ा बंद कर दिया और फिर एक तरफ खड़े हो गए। इधर सामान लिए मैं उस सामान को सरसरी तौर पर देख ही रहा था कि मेरा मोबाइल फोन बज उठा।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
हवेली पर!
अपने कमरे में रितू आराम कर रही थी। ऊपर छत के कुण्डे पर घूम रहे पंखे को एकटक घूर रही रितू के चेहरे पर इस वक्त गहन सोचो के भाव थे।
उसके मन में कई सारी बाॅतें चल रही थीं। आज जब वह हवेली में आई तो उसका सामना अपने डैड से उस हिसाब से हो ही गया था जिसका उसे अंदेशा था कि देर सवेर ऐसा होगा ही।
उसके डैड ने उससे जो कुछ कहा था उससे अब ये बात खुल ही चुकी थी उनकी बेटी उनके पक्ष में नहीं है। उनके आदमी ने जो ख़बर उसके बारे में उसके डैड को दी थी उसका उसके पास कोई पुख्ता सबूत तो नहीं था किन्तु ज़हन में ये बात तो पड़ ही गई थी कि रितू किस तरफ करवॅट ले सकती है? हलाॅकि उसने अपनी तरफ से अपनी सफाई में अपने डैड को समझा बुझा तो दिया था किन्तु उसे ये भी एहसास था कि मौजूदा हालात में इस वक्त भले ही उसका बाप कोई कठोर क़दम उसके साथ न उठाये मगर जिस वक्त उसे पक्के तुर पर पता चल जाएगा कि उसके आदमी की वो ख़बर यकीनन सच ही थी तो वक्त अजय सिंह कोई भी कठोर क़दम उठा सकता है।
रितू के ज़हन में ये सारी बातें चल रही थीं। उसे इस बात का भी अंदेशा हो चुका था कि अब उसका बाप सच्चाई का पता लगाने के लिए संभव है कि उसके पीछे अपने आदमी लगा दे। उस सूरत में रितू को क्या करना था ये उसने भली भाॅति सोच लिया था। रितू अभी ये सब सोच ही रही थी कि तभी उसका मोबाइल बज उठा। मोबाइल के बजने से वो सोच के गहरे सागर से हक़ीक़त की दुनियाॅ में आई और सिरहाने रखे मोबाइल को एक हाॅ से उठा कर उसने मोबाइल की स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे हरिया काका नाम को देखा तो उसके चेहरे पर सोच के भाव उभर आए।
"कहिए काका क्या बात है?" फिर उसने काल को रिसीव करते ही कहा।
"..........।" उधर से हरिया काका ने उसे जो कुछ बताया उसे सुन कर रितू बुरी तरह चौंक पड़ी थी। उसके चेहरे पर पल भर में चिंता व परेशानी के भाव उभर आए थे।
"ये आपने बहुत अच्छा किया काका।" रितू ने कहा___"जो मुझे फोन कर दिया आपने। ख़ैर, आप बाॅकी सबका ध्यान रखियेगा मैं बात करती हूॅ उससे।"
ये कह कर रितू ने काल कट कर दी। उसके चेहरे पर चिंता व परेशानी के भाव कम नहीं हो रहे थे। हरिया काका ने उसे फोन पर सारी बात बता दी थी कि विराज तहखाने में उन चारों लड़कों के साथ क्या करने वाला है। उसने ये भी बताया कि विराज इस वक्त गुस्से में आग बबूला हुआ पड़ा है और उससे रेज़र ब्लेड के साथ साथ एक प्लास भी मॅगवाया है। हरिया काका से बातें जानने के बाद रितू समझ गई कि विराज को अब सब कुछ पता चल गया है। इस लिए अब उसे डर था कि कहीं विराज उससे इस बात के लिए नाराज़ न हो जाए कि विधी के साथ इतना कुछ हुआ जिसे उसने विराज से नहीं बताया। इस परिस्थिति में वो क्या क़दम उठा लेगा इसका अंदाज़ लगाना मुश्किल था। यही बात थी कि रितू एकाएक चिन्तित व परेशान हो गई थी। काफी देर तक वो इन्हीं सब ख़यालों में खोई रही, उसके बाद उसने मोबाइल पर विराज का नंबर देख कर उसे काल लगा दिया। उसे अंदर से डर भी लग रहा था कि विराज जाने कैसा रियेक्ट करे उससे।
".........।
" उधर से काल रिसीव किये जाने पर ही रितू के कानो में विराज की आवाज़ पड़ी। उसने उधर से कुछ कहा।
"तुम्हें मेरी कसम है मेरे भाई।" रितू ने बहुत ही संतुलित लहजे में कहा___"तुम जहाॅ पर हो वहाॅ से किसी को भी कुछ किये बग़ैर वापस बाहर आ जाओ। मैं जब आऊॅगी तो तुम्हें सब कुछ समझा दूॅगी।"
".........।" उधर से विराज ने कुछ कहा।
"प्लीज़ भाई।" रितू ने विनती सी की___"अपनी इस बहन की बात मान जाओ। बस एक बार। उसके बाद मैं खुद तुम्हें उस सबके लिए इजाज़त दे दूॅगी। मगर अभी मेरी बात मान जाओ और वहाॅ से बाहर आ जाओ।"
"..........।" उधर से विराज ने फिर से कुछ कहा।
"अभी तुझे कुछ पता नहीं है मेरे भाई।" रितू ने सहसा गंभार होकर कहा___"तू मेरे आने का इंतज़ार कर मैं तुझे सारी बातें बताऊॅगी और ये भी कि उससे और क्या करना चाहती हूॅ मैं?"
".........।" उधर से विराज ने कुछ कहा।
"हाॅ भाई।" रितू ने कहा___"मैं जल्द ही तेरे पास आ रही हूॅ। मगर फिलहाल तू वहाॅ से बाहर आ जा।"
"...........।" उधर से विराज ने फिर से कुछ कहा।
"थैंक्स मेरे स्वीट भाई।" रितू के चेहरे पर राहत के भाव उभरे___"यू आर सो स्वीट। लव यू सो मच।"
ये कह कर रितू ने मुस्कुराते हौए काल कट कर दी। कुछ देर तक जाने क्या सोचती रही वो। उसके बार वह बेड से उठी और बाथरूम की तरफ बढ़ गई। लगभग दस मिनट बाद वह बाथरूम से बाहर निकली और फिर पुलिस की यूनीफार्म पहन कर तथा सिर पर पीकैप व हाथ में पुलिसिया रुल लिये वह कमरे से बाहर आ गई।
रितू जैसे ही अपनी जिप्सी में बैठ कर हवेली से बाहर गई वैसे ही इधर प्रतिमा के कमरे की खिड़की से बाहर देखते हुए शिवा ने होठों पर मुस्कान सजाते हुए अपनी जेब से मोबाइल निकाला और किसी को फोन लगाया। एक मिनट से भी कम समय तक उसने किसी से फोन पर बात की उसने बाद उसने काल कट कर दी।
इधर हवेली से बाहर निकलते ही रितू ने भी किसी को फोन लगाया और उससे कुछ देर बात की। उसकी जिप्सी गाॅव से बाहर की तरफ जा रही थी। गाव से बाहर जाने वाले रास्ते से कुछ दूर जाने पर ही रितू को अपनी जिप्सी के पीछे एकाएक ही एक ब्लैक जीप आती बैक मिरर में दिखी। ये देख कर रितू के होठों पर मुस्कान फैल गई।
सौ मीटर के फाॅसले पर पीछे से आ रही कार रितू को बराबर बैक मिरर में दिख रही थी। हलाॅकि रितू समझ गई थी कि पीछे आ रही जीप में यकीनन उसके बाप का ही कोई आदमी है, लेकिन फिर भी पक्के तौर पर जाॅचने के लिए रितू ने मन बनाया। नहर पर बने पुल के पास पहुॅचते ही रितू ने बाॅए साइड वाले रास्ते की तरफ अपनी जिप्सी की मोड़ लिया। जबकि दाएॅ साइड के रास्ते में आगे उसका फार्महाउस पड़ता था।
सौ मीटर आगे जाने पर ही रितू को मिरर में वो जीप उसी रास्ते की तरफ मुड़ती दिखी। आगे लगभग पाॅच किलो मीटर की दूरी पर मोड़ था और वहीं से दूसरे गाॅव की आबादी शुरू होती थी।
जिसकी वजह से मोड़ पर मुड़ने के बाद पीछे वाले को आगे वाला वाहन दिखाई नहीं देता था। आगे कुछ दूरी पर एक चौराहा पड़ता था। रितू ने जिप्सी को चौराहे पर एक साइड रोंका और उतर कर बगल में एक दुकान थी। वो दौकान तरफ बढ़ गई। दुकान से उसने एक पेप्सी की बाट ली और वहीं पर खड़े खड़े पीने लगी।
कुछ ही देर में उसे चौराहे की तरफ आती हुई वो जीप दिखी जिसमें उसके बाप का एक आदमी ड्राइविंग शीट पर बैठा था। चौराहे पर रितू की जिप्सी को देख उसके चेहरे पर चौंकने के भाव उभरे और फिर वो एकदम से जीप को तेज़ रफ्तार से दौड़ाते हुए चौराहे के पार निकल गया। उसकी इस हड़बड़ाहट को देख कर रितू के होठों पर मुस्कान उभर आई।
पेप्सी को पीकर रितू ने दुकान वाले को पैसे दिये और फिर सामने चौराहे के उस तरफ एक बार सरसरी तौर पर अपनी नज़र दौड़ाई जिस तरफ उसके बाप के आदमी की वो जीप गई थी। उसके बाद वो अपनी जिप्सी की तरफ बढ़ी तथा उसमें बैठ कर जिप्सी को यू टर्न दिया और फिर वापस उसी रास्ते की तरफ बढ़ चली जिस तरफ से वो आई थी। इस बार रितू की जिप्सी की रफ्तार ज्यादा थी।
पुल के बगल से सीधा जो रस्ता था उसी तरफ उसकी जिप्सी ऑधी तूफान बनी जा रही थी। बैक मिरर में उसकी नज़र बराबर थी। उसके पीछे लगी वो जीप उसे कहीं नज़र न आई। पुल से काफी दूर आकर रितू ने जिप्सी को एक ऐसी जगह पर सड़क से अलग करके खड़ी किया जिस जगह पर दाएॅ साइड काफी सारे पेड़ पौधे व झाड़ियाॅ थी। यहाॅ से सड़क पर से चल रहा कीई वाहन देखा तो जा सकता था किन्तु सड़क से इस तरफ का आसानी से देखा नहीं जा सकता था।
जिप्सी से उतर कर रितू ने सबसे पहले होलेस्टर में दबे अपने सर्विस रिवाल्वर को निकाला। रिवाल्वर का चेम्बर खोल कर उसने चेम्बर के सभी खानों को देखा। सभी खानों में गोलियाॅ मौजूद थीं। ये देख कर उसने चेम्बर को वापस बंद कर रिवाल्वर को होलेस्टर के हवाले किया और एक आगे बढ़ कर सड़क के कुछ पास ही एक पेड़ की ओट में खड़ी हो गई। इस वक्त उसके चहरे पर बेहद कठोरता के भाव थे। बहुत ही धीमी आवाज़ में उसके मुख से निकला____"साॅरी डैड, अब आपका कोई भी आदमी मेरी ख़बर आप तक नहीं पहुॅचा पाएगा। इतना ही नहीं आप वो सब हर्गिज़ भी नहीं कर पाएॅगे जिस किही भी चीज़ के करने का आपने मंसूबा बनाया हुआ है। मेरे भाई के पास पहुॅचने वाले हर शख्स को सबसे पहले मुझसे टकराना होगा।"
चेहरे पर कठोरता और ऑखों में आग लिए रितू चुपचाप पेड़ के ओट में खड़ी उस जीप के आने का इन्तज़ार करने लगी थी। इन्तज़ार करते करते लगभग पन्द्रह मिनट गुज़र गए मगर अभी तक वो जीप इस तरफ आती समझ न आई। रितू को लगा वो जीप में बैठा आदमी आएगा भी या नहीं। किन्तु ऐसा नहीं था, क्योंकि तभी रितू के कानों में किसी वाहन के आने की आवाज़ सुनाई देने लगी थी।
कुछ ही देर में मोड़ से इस तरफ मुड़ती हुई वो जीप दिखी।
रितू ने महसूस किया कि जीप की रफ़्तार कम थी। शायद वो आदमी धीमी रफ़्तार से इधर उधर का मुआयना करते हुए आ रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि जिसका वो पीछा कर रहा था वो इतना जल्दी कहाॅ गायब हो गई? इस तरफ मुड़ने के बाद आगे का रास्ता काफी दूर तक सीधा ही था। उस सीधे रास्ते पर दूर दूर तक उसे रितू दिखाई नहीं दे रही है। ये देखते देखते ही उसने जीप की रफ़्तार कम कर दी। रितू को लगा कि कहीं वो यहीं पर ही न रुक जाए और वही हुआ भी। उस आदमी ने सामने की तरफ देखते हुए ही जीप को एकदम से खड़ी कर दिया।
जीप खड़ी करने के बाद उसने इधर उधर देखा और फिर सहसा उसने अपनी शर्ट की जेब से मोबाइल निकाला। रितू को समझते न लगी कि वो शायद इस बात की सूचना उसके बाप को देना चाहता है कि रितू एकाएक ही उसकी नज़रों से ओझल हो गई है। रितू के मन में ख़याल आया कि उस आदमी को इस बात की सूचना नहीं दे पाना चाहिए। इस ख़याल के आते ही उसने बिजली की सी तेज़ी से ऐक्शन लिया।
जिस जगह पर रितू पेड़ के पीछे खड़ी थी वहाॅ से वो आदमी आगे की तरफ बाएॅ साइड से जीप में बैठा था। जीप ऊपर से पूरी तरह बेपर्दा टाइप की थी। ड्राइविंग शीट पर बैठा वो आदमी दाहिने हाॅथ पर मोबाइल लिए कुछ कर रहा था। रितू समझ गई कि वो उसके बाप को फोन लगाने ही वाला है। ये देख कर रितू ने होलेस्टर से रिवाल्वर निकाल कर निशाना लगाया और फिर.....धाॅयऽऽ।"
अचूक निशाना, रिवाल्वर से निकली गोली सीधा उस आदमी के दाहिने हाॅथ में मौजूद उसके मोबाइल की स्क्रीन के चिथड़े उड़ाती हुई पार होकर सामने जीप के शीशे से टकराई थी। अचानक हुए इस हमले से वो आदमी मानो सकते में आ गया था। दाहिने हाॅथ को अपने बाएॅ हाॅथ से थामे वह उसे सहलाने लगा था। ड्राइविंग शीट पर बैठा वो इधर उधर देखे जा रहा था।
इधर रितू फायर करते ही तेज़ी से जीप की तरफ बढ़ी। कुछ ही देर में वो जीप के पास पहुॅच गई। अपने इतने क़रीब इस तरह अचानक रितू के आ जाने से वो आदमी एकदम से हक्का बक्का रह गया था। चेहरे पर डर और घबराहट के भाव कत्थक करते नज़र आने लगे थे
रितू ने देर नहीं की बल्कि बिना किसी भूमिका के उसने दोनो हाॅथो से उस आदमी की शर्ट के कालर को पकड़ा और फिर एक झटके मे ही खींच कर ड्राइविंग शीट से बाहर खींच लिया। उस हट्टे कट्टे आदमी को बाहर खींच कर रितू ने उसे वहीं सड़क पर लगभग फटक दिया। आदमी के हलक से चीख़ निकल गई। रितू जानती थी कि उस आदमी ने अगर रितू को अपनी मजबूत बाहों में पकड़ लिया तो फिर उससे छूट पाना आसान नहीं होगा। इस लिए रितू ने उसे सम्हलने का मौका ही नहीं दिया। बल्कि लात घूॅसों पर रख दिया उसे।
सड़क पर गिरे हुए उस आदमी की सिर्फ चीखें निकल रही थी। सहसा उसके हाॅथ में रितू का पाॅव आ गया और उसने झटके से रितू का वो पाॅव पकड़ कर उछाल दिया।
नतीजा ये हुआ कि रितू लहराते हुए सड़क पर पीठ के बल गिरी। रितू के मुख दर्द में डूबी हल्की सी चीख निकली। उधर उस आदमी को जैसे मौका मिल गया था। इस लिए वो झट से उठा और सम्हल कर उठ रही रितू के सिर के बाल पकड़ कर उसे जीप की तरफ ही झटके से धकेल दिया। रितू का सिर जीप के किनारे पर लगे मोटे लोहे के पाइप से टकराया। रितू की ऑखों के सामने तारे नाचने लगे और सहसा उसे अपनी ऑखों के सामने अॅधेरा सा दिखने लगा।
लोहे का वो पाइप रितू के सिर पर ज़ोर से लगा था। जिसके कारण तुरंत ही रितू के सिर से खून रिसने लगा था। अभी रितू दर्द को सहते हुए खुद को सम्हाल ही रही थी कि उस आदमी ने एक बार से उसके सिर को उसी लोहे के पाइप पर झटक दिया। रितू की चीख निकल गई। चोंट पर चोंट लगने से खून का रिसाव तेज़ हो गया।
"मैने मालिक से झूॅठ नहीं बोला था लड़की।" उस आदमी ने दाॅत पीसते हुए गुस्से से कहा___"उस दिन तू ही थी उस जीप में जो उस एम्बूलेन्स के आगे आगे चल रही थी। मगर पक्के तौर पर चूॅकि किसी को पता नहीं था इस लिए मुझे भी लगा कि शायद उस जीप में तेरे सिवा कोई ही न रहा हो। दूसरी बात हम में से कोई ये सोच ही नहीं सकता था कि हमारे मालिक से गद्दारी करने वाली खुद मालिक की ही छोकरी होगी।"
ये सब कहने के साथ ही उस आदमी ने पीछे से एक मुक्का रितू के पेट के बगल पर रसीद कर दिया। हट्टे कट्टे आदमी का मुक्का लगते ही रितू को भयानक दर्द हुआ। उसकी घुटी घुटी सी चीख फिज़ा में फैल गई।
"तुझे पता है आज मालिक ने मुझे साफ साफ कहा है कि अगर गद्दार के रूप में तू ही निकले तो तुझे मैं खुद ही इस गद्दारी की सज़ा दूॅ।" उस आदमी ने कहा___"मालिक को इस बात से अब कोई मतलब नहीं रह गया है कि गद्दार कौन है। उनके लिए अपना और पराया सब बराबर हैं। इस लिए ऐ छोकरी, तू अब सज़ा पाने के लिए तैयार हो जा। मैं पहले तेरे इस खूबसूरत जिस्म का मज़ा लूटूॅगा और फिर तेरी इज्ज़त की धज्जियाॅ उड़ाऊॅगा। हाहाहाहाहा कसम से पहली बार लग रहा है कि मालिक की सेवा करने का कुछ अच्छा फल मिल रहा है।"
रितू के कानों से उस आदमी की ये सब बातें टकराई तो उसके अंदर गस्से की ज्वाला धधक उठी। उसने अपने दाहिने हाॅथ को पीछे ले जाकर उस आदमी के सिर को उसके बालों से पकड़ा और पूरी ताकत से ऊपर से आगे की तरफ खींचा। वो आदमी तो पीछे से आगे न आ पाया क्योंकि वो वजनदार और हट्टा कट्टा था किन्तु सिर के बाल इतनी तेज़ी से खींचे जाने पर उसके मुख से दर्द भरी सीत्कार गूॅज उठी। इसके साथ ही रितू के सिर के बालों पर से उसकी पकड़ ढीली पड़ गई।
रितू ने एक पल का भी समय नहीं गवाॅया। उसके हाॅथ के नीचे से निकल कर उसने बिजली की सी तेज़ी से उस आदमी के बगल से आकर अपने दाहिने हाॅथ की कराट ज़ोर से उसकी गर्दन के पिछले भाग पर लगाई।
नतीजा ये हुआ कि झोंक में उस आदमी का माॅथा उसी लोहे के पाइप से टकराया जिस पाइप पर अभी कुछ देर पहले रितू का सिर टकराया था। माॅथे पर लोहे का पाइप लगते ही वो आदमी दर्द से बिलबिलाया और दोनो हाॅथों से अपना माॅथा सहलाने लगा। पलक झपकते ही उसके माथे पर एक गोल सा गोला उभर आया जो हल्के नीले रंग का था।
रितू को तेज़ गुस्सा आया हुआ था। इस बार वो रुकी नहीं बल्कि जूड़ो कराटे और कुंगफू के ऐसे करतब दिखाए कि दो मिनट में ही उस आदमी को धरासाई कर दिया। एक बार पुनः वो हट्टा कट्टा आदमी सड़क पर पड़ा था, किन्तु इस बार वो दर्द से बुरी तरह कराह रहा था।
"तेरे जैसे पालतू कुत्तों का इलाज़ बहुत अच्छी तरह से करना आता है मुझे।" रितू किसी शेरनी की भाॅति गुर्राई___"चल आज तुझे इसका ट्रेलर भी और इसका अंजाम भी दिखाऊॅगी। तेरे जैसे कुत्तों का और अपने उस हरामी बाप का क्या हस्र होगा ये वक्त ही बताएगा।"
रितू की बात उस आदमी ने कोई जवाब न दिया, बल्कि वो जवाब देने की हालत में ही नहीं रह गया था। रितू ने नीचे झुक कर उस आदमी की कनपटी के पास मौजूद एक ऐसी खास जगह पर कराट मारी कि पल भर में वो आदमी बेहोश हो गया। उसके बेहोश होते ही रितू ने उस आदमी के एक हाॅथ को पकड़ कर खींचते हुए सड़क के किनारे पर लगाया और फिर पलट कर उस तरफ बढ़ चली जिस तरफ उसने अपनी जिप्सी को झाड़ियों और पेड़ों के पीछे छुपाया था।
थोड़ी ही देर में रितू जिप्सी को लेकर सड़क पर आ गई। जिप्सी को उस आदमी के पास खड़ी कर वो जिप्सी से नीचे उतरी और फिर उस आदमी के बेहोश जिस्म को किसी तरह उठा कर जिप्सी के पीछे डाल दिया। उसके बाद वो उस जीप के पास गई जिसमें बैठ कर वो आदमी यहाॅ आया था। उस जीप के इग्नीशन से चाभी निकाल कर रितू ने अपनी पैन्ट की पाॅकेट में डाला और वापस जिप्सी के पास आकर ड्राइविंग शीट पर बैठ गई।
उस आदमी को वहीं पर छोंड़ कर रितू ने अपनी जिप्सी को फार्महाउस की तरफ दौड़ा दिया। ऑधी तूफान बनी जिप्सी कुछ ही समय में फार्महाउस पहुॅच गई। फार्महाउस के मेन गेट पर ही हरिया और शंकर काका खड़े दिखे रितू को। रितू को आते देख शंकर ने लोहे वाला गेट खोल दिया। गेट खुलते ही रितू ने जिप्सी को गेट के अंदर की तरफ बढ़ा दिया। हरिया काका के पास जिप्सी को रोंक कर रितू ने अपनी पैन्ट की पाॅकेट से चाभी निकाली और शंकर की तरफ देखते हुए कहा___"शंकर काका मेरी गाड़ी से इस आदमी को बाहर निकाल कर वहीं तहखाने में डाल कर फटाफट आइये।"
"अच्छा बिटिया।" शंकर ने कहा और अपनी बंदूख को हरिया के हवाले कर जिप्सी के पास आया और उस आदमी को अपनी मजबूत बाहों से खींच कर बाहर निकाला। बाहर निकाल कर उसे उसने अपने कंधे पर लादा और अंदर तहखाने वाले हिस्से की तरफ बढ़ गया।
"काका आप ये चाभी लीजिए।
" रितू हरिया की तरफ चाभी उछालते हुए कहा___"और मेरी इस गाड़ी से शंकर काका को भी साथ ले जाइये। बीच रास्ते पर ही उस आदमी की जीप खड़ी मिलेगी आपको। उसे वहाॅ से यहाॅ लेकर आना है।"
"ठीक है बिटिया।" हरिया ने कहा___"हम अभी शंकरवा का लइके जाथैं। लेकिन बिटिया ऊ ससुरा आदमी कउन है? अउर कहाॅ से मिल गवा ऊ तुमका?"
"मेरे डैड का पालतू कुत्ता है काका।" रितू ने नफ़रत के भाव से कहा___"मेरे डैड ने उसे मेरे पीछे लगाया हुआ था मेरी निगरानी के लिए। मैने उस कमीने को बीच में ही धर लिया और यहाॅ ले आई। अब आप इसकी भी ख़ातिरदारी कीजिएगा।"
"अरे बिलकुल बिटिया।" हरिया के चेहरे पर एकाएक ही खुशी के भाव उभरे लेकिन फिर जैसे उसे कुछ याद आया तो उसने फिर नार्मल भाव से कहा___"ऊ ससुरे की ख़ातिरदारी हम बहुत अच्छे से करूॅगा।"
तभी शंकर काका आता हुआ दिखाई दिया। उसके पास आते ही रितू ने उसे भी समझा दिया और हरिया के साथ अपनी जिप्सी से भेज दिया। उन दोनो के जाते ही रितू अंदर मकान की तरफ बढ़ चली।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मैं रितू दीदी के कमरे में बड़ी बेचैनी से इधर से उधर टहल रहा था। रह रह कर सूरज की बातें मेरे ज़हन में ज़हर सा घोल रही थी। मुझे उन चारों पर भयानक गुस्सा आ रहा था। किन्तु दीदी ने फोन करके मुझे तहखाने से बाहर आ जाने के लिए कह दिया था। मुझे इस बात से बेहद तक़लीफ़ हो रही थी कि मेरी विधी के साथ कितना घिनौना कुकर्म किया गया था जिसके बारे में मुझे कुछ पता ही नहीं था और ना ही ये सब किसी ने मुझसे बताया था। मैं सोच रहा था की अगर इत्तेफाक़ से या संयोगवश मैं हरिया काका के पीछे उस तहखाने में न जाता तो मुझे पता भी न चलता कि मेरी विधी के साथ और क्या हुआ था।
मुझे इस सबके लिए पवन और दीदी दोनो पर गुस्सा भी आ रहा था मगर मैं इस बात से खुद को तसल्ली दिये हुए था कि इन्हीं की वजह से ही तो मैं अपनी विधी को अंतिम बार मिल सका था। उसके त्याग और बलिदान को जान सका था वरना सारी ज़िंदगी मैं उस मासूम व निर्दोष को कोसता रहता। इस लिए ये सब सोच कर मैं अपने गुस्से को शान्त किये हुए था। मैने खुद को बहुत समझाया था तब जाकर मुझे कुछ राहत मिली थी और सबसे ज्यादा रितू दीदी पर प्यार आया कि उन्होंने मेरे और विधी के ख़ातिर कितना कुछ किया था।
मुझे एहसास था कि रितू दीदी अब पहले जैसी नहीं रही थी बल्कि अब वो बदल गई थी। बचपन से लेकर अब तक मेरे प्रति जो उनके अंदर द्वेष या नफ़रत का भाव था वो अब बेपनाह प्यार व स्नेह में परिवर्तित हो गया था। जिस रितू दीदी से बात करने के लिए मैं अक्सर तरसता था आज वही दीदी मुझे अपनी जान से ज्यादा प्यार करने लगी हैं। इस बात से मैं बेहद खुश भी था। किन्तु हालात के मद्दे नज़र मैं अपनी इस खुशी को ज़ाहिर नहीं कर पा रहा था। इस वक्त मैं उनके कमरे में टहलते हुए उनके आने का बेसब्री से इन्तज़ार कर रहा था।
तभी कमरे का दरवाजा खुला और पुलिस इन्स्पेक्टर की वर्दी में रितू दीदी ने कमरे में प्रवेश किया। मैं उन्हें आज पुलिस की वर्दी में देख कर देखता ही रह गया। उनके खूबसूरत बदन पर ये पुलिस की वर्दी काफी जॅच रही थी। ऐसा लगता था कि पुलिस की ये वर्दी सिर्फ उन्हीं के लिए ही बनी थी। मुझे अपनी तरफ अपलक देखता देख दीदी के होठों पर मुस्कान उभर आई और फिर सहसा उनके चेहरे पर हया की सुर्खी भी नज़र आने लगी।
"ऐसे क्यों देख रहा है राज?" रितू दीदी ने मीठी सी आवाज़ में नज़रें झुकाते हुए कहा।
"देख रहा हूॅ कि मेरी रितू दीदी इस पुलिस की वर्दी में कितनी खूबसूरत लग रही हैं।" मैने सहसा मुस्कुराते हुए कहा___"ऐसा लगता है कि ये वर्दी दुनियाॅ में सिर्फ आपके लिए ही बनी है।"
"अच्छा जी।" रितू दीदी हॅस दी, बोली___"क्या सच कह रहा है भाई?"
"हाॅ दीदी।" मैने कहा___"आप तो मेरी वैसे भी दुनियाॅ की सबसे अच्छी और खूबसूरत दीदी हैं, ऊपर से इस पुलिस की यूनीफार्म पहने हुए। कसम से दीदी आप बहुत ही क्यूट और ब्यूटीफुल लग रही हैं। मेरी आपसे गुज़ारिश है कि आपने ये जो पुलिस की नौकरी छोंड़ का सोचा हुआ है उस सोच को आप अपने ज़हन से निकाल दें। मैं आपको हमेशा ऐसे ही पुलिस की इस वर्दी में देखना चाहता हूॅ।"
"अगर ऐसी बात है मेरे प्यारे भाई।" रितू दीदी ने आगे बढ़ कर मेरे गालों पर सहलाते हुए कहा___"तो फिर अब तेरी ये दीदी पुलिस की नौकरी मरते दम तक नहीं छोंड़ेगी। भले ही चाहे जैसी भी परिस्थिति आ जाए। तुझे पता है राज, मेरी इस नौकरी से मेरे माॅम डैड और वो कमीना शिवा कोई भी खुश नहीं हैं। आज तेरे मुख से ये बात सुन कर मुझे बहुत खुशी हो रही है। मैं खुश हूॅ कि तुझे मेरा नौकरी करना और पुलिस की इस वर्दी में देखना अच्छा लग रहा है। काश! ये सब मैने बहुत पहले सोचा होता। मैने सोचा होता कभी तेरे बारे में तो कभी भी मैं तुझसे दूर न रहती। भाई क्या होता है ये मुझे अब पता चला है राज। वरना तो भाई के नाम से ही नफ़रत हो गई थी मुझे। तुझसे एक ही विनती है अपनी इस दीदी को कभी खुद से दूर न करना। मैंने अपने उन रिश्तों से नाता तोड़ लिया है जिन रिश्तों के द्वारा मेरा ये वजूद दुनियाॅ में आया है। अब अगर मेरा कोई है तो सिर्फ तू है मेरे भाई। जो गुज़र गया उसे तो मैं लौटा नहीं सकती राज मगर आज जो है और जो आने वाला है उसे सवाॅरने की पूरी कोशिश करूॅगी मैं। बस तू और तेरा साथ बना रहे। बोल न भाई, तू मुझे अपने साथ रखेगा न?"
ये सब कहते हुए रितू दीदी की ऑखों से ऑसू बहने लगे थे। मैने तड़प कर उन्हें अपने सीने से लगा लिया। वो मुझसे कस के लिपट गईं और खुद को ज़ार ज़ार न रोने की नाकाम कोशिश करने लगीं। मैं उन्हें इस तरह रोते हुए नहीं देख सकता था।
उनका कैरेक्टर हमेशा से ही बहादुर लड़की का रहा था मगर इस वक्त कोई देखे तो किसी कीमत पर यकीन करे कि ये लड़की बहादुर भी सकती है। बाहर से पत्थर की तरह कठोर दिखने वाली इस लड़की के सीने में भी एक नन्हा सा दिल है जो धड़कना भी जानता है अपनों के लिए।
"मत रोइये दीदी।" मैने उनकी पीठ को सहलाते हुए कहा___"आप रोते हुए बिलकुल भी अच्छी नहीं लगती हैं। आप तो मेरी सबसे ज्यादा बहादुर दीदी हैं। चलिए अब चुप हो जाइये।"
"मुझे रो लेने दे राज।" दीदी मुझसे और भी कस के लिपट गईं, बोलीं____"तुझे नहीं पता कि जब से मुझे असलियत का पता चला है तब से मैं कितना अंदर ही अंदर इन वेदनाओं में झुलस रही हूॅ। वो कैसे लोग हैं मेरे भाई जो अपनी ही बहन बेटी के बारे में इतना गंदा सोच सकते हैं? वो कैसे लोग हैं राज जिनको रिश्तों की कोई क़दर ही नहीं है? सिर्फ अपनी हवस के लिए वो किसी भी हद तक जाने को तैयार बैठे हैं।"
"अब कुछ मत कहिए दीदी।" मैने दीदी को खुद से अलग कर उनके ऑसुओं से तर चेहरे को अपनी दोनो हॅथेलियों के बीच लेकर कहा___"पाप करने वालों की उमर बहुत लम्बी नहीं होती है उनकी नियति में बहुत जल्द सड़ सड़ के मर जाना लिखा होता है। जो गुनाह जो पाप उन्होने किया है उसकी उन्हें ज़रूर सज़ा मिलेगी दीदी। बस वक्त का इन्तज़ार कीजिए।"
"तू उन सबको अपने हाॅथों से मौत की सज़ा देगा।" रितू दीदी ने कहा___"मैंने उन सबको सिर्फ तेरे लिए ही छोंड़ दिया था। मैं चाहती थी कि इन्होंने जिनके साथ पाप किया वही इन्हें अपने हाॅथों से सज़ा दें। और हाॅ, तू अपने मन में पल भर के लिए भी ये ख़याल मत लाना कि तू ऐसा करेगा तो मैं तुझे कुछ कहूॅगी। मैं सच कहती हूॅ राज, मुझे इस बात का ज़रा सा भी दुख नहीं होगा कि तूने मेरे माॅम डैड और शिवा को मौत दी।"
"आप शायद दुनियाॅ की पहली ऐसी लड़की हैं दीदी जिसे इस सबसे कोई दुख नहीं होगा।" मैने दीदी की ऑखों में देखते हुए कहा___"किन्तु आप ऐसा कह रही हैं ये हैरत की बात है मेये लिए।"
"इसमें हैरत कैसी राज?" रितू दीदी ने कहा___"हर इंसान को अपने अच्छे बुरे कर्मों का फल मिलता है। मेरे घर वालों को भी मिलेगा। तक़लीफ़ तो तब होती है जब अच्छे कर्मों का फल बुरा मिलता है, लेकिन इन लोगों ने तो सिर्फ बुरा कर्म ही किया है अपनी ज़िंदगी में। इन लोगों के मर जाने से मुझे कोई दुख नहीं होगा मेरे भाई, बल्कि इस बात का मलाल ज़रूर रहेगा कि ईश्वर ने मुझे ऐसे माॅ बाप और ऐसा भाई क्यों दिया था?"
रितू दीदी की इन बातों को सुन कर मैं हैरानी से उनकी तरफ देखता रह गया था। मुझे उन पर बड़ा स्नेह आया। मैने झुक कर उनके माॅथे पर हल्के से चूॅम लिया। मेरे इस तरह चूमने पर वो हौले से मुस्कुराईं।
"तू सच में बड़ा हो गया है राज।
" रितू दीदी ने मेरे चेहरे को एक हाॅथ से सहलाते हुए कहा___"इस बात से मुझे खुशी है कि तू बड़ा हो गया है और समझदार भी। हलाॅकि ये बात तो मैं पहले भी जानती थी कि तू एक समझदार लड़का है। सबके प्रति तेरे दिल में प्यार इज्ज़त व सम्मान की भावना है। ख़ैर छोंड़ इन सब बातों को, ये बता कि तू तहखाने में कैसे पहुॅच गया था?"
"वो हरिका काका के बिहैवियर से मुझे उन पर संदेह हुआ।" मैने गहरी साॅस लेने के बाद कहा___"आप तो जानती ही हैं कि अगर किसी के मन में किसी तरह का संदेह हो जाता है तो वो हर पल यही प्रयास करता रहता है कि उसे जिस चीज़ पर संदेह हुआ है वो उसके सामने साफ तौर पर खुल जाए या उसकी हकीक़त पता चल जाए। बस हरिया काका के मामले में यही हुआ था। मुझे उन पर संदेह हुआ और जैसे ही वो तहखाने वाले रास्ते की तरफ गए तो मैं भी शंकर काका की नज़रों से खुद को छुपा कर हरिया काका के पीछे चला गया। उनके पीछे जाने से तहखाने में जो सच्चाई मुझे पता चली उसने मुझे मुकम्मल तौर पर हिला कर रख दिया। मुझे पता चला कि तहखाने में मौजूद उन चारो हरामज़ादो ने मेरी विधी के साथ क्या किया था? उसके बाद फिर मुझे वही करना था जो ऐसी परिस्थिति में कोई भी करता। मगर ऐन वक्त पर आपका फोन आ गया और मैं उन कमीनों के साथ वो न कर पाया जो करने का मैने फैंसला कर लिया था।"
"मुझे माफ़ कर दे राज।" दीदी ने गंभीरता से कहा___"पर तुझे नहीं पता कि उन लोगों के साथ साथ मैं और किन किन लोगों के साथ क्या क्या करने वाली हूॅ? इन चारों को आसान मौत मारने का कोई मतलब नहीं है मेरे भाई। मैंने ऐसा कुछ करने का सोचा हुआ है जिसके बारे किसी ने सोचा भी नहीं होगा।"
"क्या करने का सोचा है आपने?" मैने दीदी के चेहरे को ग़ौर से देखते हुए कहा___"क्या मुझे नहीं बताएॅगी आप?"
"बात कुछ ऐसी है मेरे भाई।" रितू दीदी ने सहसा पलट कर दूसरी तरफ अपना चेहरा करते हुए कहा___"कि मैं तुझे बता नहीं सकती। बस इतना समझ ले कि इन लोगों ने अगर नीचता की हद को पार किया था तो मैं इन्हें सज़ा देने में इनके साथ नीचता की इन्तेहां कर दूॅगी।"
"क्या मतलब???" मैं दीदी की बात सुन कर बुरी तरह चौंका था___"ऐसा क्या करने वाली हैं आप??"
"मैने कहा न राज।" रितू दीदी ने दूसरी तरफ मुॅह किये हुए ही कहा___"कि मैं तुझे इस बारे में कुछ बता नहीं सकती।"
"लेकिन दीदी।" मैं उनके पास जाते हुए बोला___"आपने तो सोच लिया है कि आपको उन चारों को क्या सज़ा देना है लेकिन बात जब नीचता की हो तो मैं ये कैसे सह सकता हूॅ कि मेरी बहन कोई नीचता वाला काम करे? नहीं दीदी आप ऐसा कुछ भी नहीं करेंगी। आप मुझे बताइये कि उन चारों के साथ साथ और कौन कौन ऐसे हैं जिनको उनके गुनाहों की सज़ा देनी है? मैं खुद अपने हाॅथों से उन्हें बद से बदतर सज़ा दूॅगा।"
"मुझे मजबूर मत कर मेरे भाई।
" रितू दीदी सहसा मेरी तरफ पलट कर मेरे चेहरे की तरफ देखते हुए कहा__"तू मेरा भाई है, इस लिए मैं तुझे वो बात कैसे बता सकूॅगी जिसे बताने में मुझे शर्म आए। दूसरी बात तू भी यही सोचेगा कि तेरी दीदी कैसे गंदे विचारों की है?"
"ऐसा कुछ नहीं है दीदी।" मैने उनके चेहरे को अपनी दोनो हॅथेलियों के बीच लेकर कहा___"मुझे पता है कि आपका मन और दिल गंगा मइया की तरह साफ और निर्मल है। आपने अपने जीवन कभी कोई ऐसा काम नहीं किया है जिसके लिए आपको किसी के सामने शर्मिंदा होना पड़े। सच कहूॅ तो मुझे इस सबसे आप पर नाज़ है। इस लिए आप मुझे बेझिझक होकर बताइये कि इन लोगों के साथ और कौन कौन हैं जिनको आप ऐसी सज़ा देने का मन बनाया हुआ है?"
"सूरज चौधरी को तो तू जानता ही है कि वो कौन है और किसका कपूत है?" रितू दीदी ने गहरी साॅस लेने के बाद कहा___"इस प्रदेश का मंत्री है वो। सूरज के साथ बाॅकी तीन जो लड़के और हैं वो सब भी किसी न किसी बड़े बाप की औलाद हैं। जब विधी वाला हादसा इन लोगों ने अंजाम दिया और मुझे उन सबके बारे में पता चला तो मुझे ये समझते देर न लगी कि इन लड़कों को कानूनन सज़ा दिलवाने से भी कुछ नहीं होने वाला। क्योंकि इनके सबके बाप बड़े बड़े लोग हैं। सारी कानून ब्यवस्था को इन लोगों ने अपने हाॅथों पर रखा हुआ है। अगर मैं इन लोगों को गिरफ्तार करके जेल की सलाखों के पीछे डाल भी देती तो पलक झपकते ही मुझे उन लोगों को छोंड़ना भी पड़ जाता। ऊपर से यही आर्डर आता कि मंत्री साहब का बेटा और उसके तीनो साथियों मैने बेवजह ही गिरफ़्तार कर जेल में बंद किया है। कहने का मतलब ये कि कानूनी तौर पर मैं इन्हें कोई सज़ा दिला ही नहीं पाती। इस लिए मैंने कानून की मुहाफिज़ होते हुए भी कानून को अपने हाॅथ में लेने का मन बना लिया। किन्तु मैं ये भी जानती थी कि ये सब इतना आसान नहीं था। तब मैने अपने आला अफसर से इस संबंध में बात की। उन्हें मैंने इस बात का भी हवाला दिया कि प्रदेश का मंत्री कहने को तो मंत्री है मगर ऐसा कोई गुनाह या अपराध नहीं है जिसे इसने अपने बाॅकी साथियों के साथ मिल कर अंजाम न दिया हो। मेरी बात सुन कर कमिश्नर साहब राज़ी तो हुए मगर मंत्री के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत न होने की वजह से उस पर हाॅथ डालने से मुझे मना भी करने लगे। तब मैने उन्हें बताया कि मेरे पास मंत्री के खिलाफ़ ऐसे ऐसे ठोस सबूत हैं जिनकी बिना पर मैं जब चाहूॅ तब उसे और उसके सभी साथियों को बीच चौराहे पर नंगा दौड़ा देने पर मजबूर कर दूॅ। मेरी बातें सुन कर कमिश्नर साहब ने मुझे खुली छूट दे दी और कह दिया कि मेरा जो दिल करे वो मैं कर सकती हूॅ।"
"ओह तो इसका मतलब बात सिर्फ इतनी ही नहीं है जितनी कि मुझे नज़र आ रही है।
" मैने चकित भाव से दीदी की तरफ देखते हुए कहा___"इस सब में प्रदेश का मंत्री और उसके कुछ साथी भी इनवाल्ब हैं?"
"इन्वाल्ब नहीं है राज।" रितू दीदी ने कहा___"बल्कि इस खेल में उन सबको भी लपेटना पड़ा मुझे। मैं चाहती थी कि एक ही काम में दोनो काम हो जाएॅ। सारा प्रदेश उस मंत्री के अत्याचार से भी दुखी है। इस लिए बाप बेटों को एक साथ लपेटने का मन बनाया मैने।"
"तो इसमें ऐसी क्या बात थी दीदी जिसे आप बताना नहीं चाहती थी?" मैने सोचने वाले भाव से कहा।
"ये तो मैने किरदारों के बारे में बताया है तुझे।" रितू दीदी ने कहा___"ये नहीं बताया कि इन सब किरदारों के साथ क्या करूॅगी मैं?"
"ओह आई सी।" मैने कहा___"आप बताना नहीं चाहती तो कोई बात नहीं दीदी। मैं सिर्फ ये चाहता हूॅ कि इस सब में आपको कुछ न हो। आपकी बातों से मैं ये बात समझ गया हूॅ कि जिन लोगों की आपने बात की है वो निहायत ही खतरनाक लोग हैं। इस लिए उन पर हाॅथ डालने से यकीनन बेहद ख़तरा है और मैं ये हर्गिज़ नहीं चाह सकता कि ऐसे ख़तरों के बीच मेरी दीदी अकेले फॅस जाएॅ। अच्छा हुआ कि आपने मुझे इस बारे में बता दिया। अब मैं खुद आपको इस ख़तरे के बीच अकेला नहीं रहने दूॅगा। ये लड़ाई अब हम दोनो बहन भाई मिल कर लड़ेंगे और जीत कर दिखाएॅगे दुनियाॅ को।"
"ये तू क्या कह रहा है मेरे भाई?" रितू दीदी एकाएक ही चौंक पड़ी थी, बोली___"नहीं नहीं, तू इस सबसे दूर ही रह। मैं तुझे ऐसे ख़तरे के बीच में आने की इजाज़त हर्गिज़ नहीं दूॅगी। बड़ी मुश्किल से तो मेरा भाई मुझे मिला है। सारी उमर मैने तुझे दुख तक़लीफ़ें दी थी अब और नहीं मेरे भाई। मैं तुझे किसी भी ख़तरे में नहीं डालूॅगी। तू इस सबसे दूर रहेगा और इन सबको साथ लेकर वापस मुम्बई चला जाएगा। तू मेरी फिक्र मत कर राज, तेरी दीदी इतनी कमज़ोर नहीं है कि कोई भी ऐरा गैरा उसे हाथ भी लगा सके।"
"मैं जानता हूॅ कि मेरी दीदी दुनियाॅ की सबसे बहादुर लड़की है।" मैने दीदी को उनके दोनो कंधों से पकड़ कर कहा___"मगर, एक भाई होने के नाते मेरा भी कुछ फर्ज़ बनता है। मैं सक्षम होते हुए भी आपको अकेले ऐसे ख़तरे में कैसे जाने दूॅ? मेरे दिल मेरा ज़मीर हमेशा इस बात के लिए मुझे धिक्कारेगा कि मैंने अकेले आपको इतने बड़े खतरे में जाने दिया और खुद अपनी जान बचा कर मुम्बई चला गया। नहीं दीदी, ऐसा कायर और बुजदिल नहीं है आपका भाई। आप भी तो मुझे मुद्दतों बाद मिली हैं। आप जानती हैं कि बचपन से अब तक मैं आपसे बात करने के लिए तरस रहा था और आज जब मुझे मेरी सबसे प्यारी दीदी मिल गई है तो मैं कैसे आपको यूॅ अकेला मौत के मुह में छोंड़ कर चला जाऊॅगा? कभी नहीं दीदी....कभी नहीं। मैं मर जाऊॅगा मखर आपको यूॅ अकेला छोंड़ कर यहाॅ से कहीं नहीं जाऊॅगा।"
"नहींऽऽऽ।" मेरे मुख से मरने की बात सुन कर तुरंत ही दीदी के मुख से चीख निकल गई।
झपट कर मुझे अपने गले से लगा लिया उन्होंने, फिर बोलीं___"ख़बरदार अगर ऐसी अशुभ बात दुबारा कही तो। मरेंगे तेरे दुश्मन। तुझे कुछ नहीं होने दूॅगी मैं।"
"तो फिर मुझे अपने पास रहने दीजिए दीदी।" मैने उनके गले लगे हुए ही कहा___"मुझे अपना फर्ज़ निभाने दीजिए। अपने इस भाई को कायर और बुजदिल मत बनाइये। वरना यकीन मानिये मैं कभी भी सुकून से जी नहीं पाऊॅगा। हम दोनो साथ मिल कर हर ख़तरे का मुकाबला करेंगे। सब कुछ ठीक होने के बाद हम सब साथ में ही रहेंगे। मुझे आपसे बहुत सारी बातें भी करनी हैं। प्लीज़ दीदी, मुझे अपने साथ रहने दीजिए न।"
"उफ्फ राज।" दीदी ने मुझे कस के पकड़ते हुए कहा___"तू इतना अच्छा क्यों है रे? इतना प्यार क्यों करता है तू अपनी इस दीदी से? क्या तू भूल गया कि ये वही दीदी है जिसने तुझे कभी अपना भाई नहीं माना और हमेशा तुझे जलील करके तेरा दिल दुखाया है। ऐसी दीदी से क्यों इतना प्यार करता है पगले?"
"मुझे आपसे कभी कोई दुख नहीं मिला दीदी।" मैं उनसे अलग होकर तथा उनके खूबसूरत चेहरे को अपनी हॅथेलियों पर लेकर कहा___"और ना ही आपने कभी मुझे कोई दुख दिया है। हर इंसान के जीवन में अच्छा बुरा समय आता है। इस लिए जो बीत गया मुझे उसका लेश मात्र भी रंज़ नहीं है, बल्कि आज इस बात की बेहद खुशी है कि मुझे वो दीदी मिल गई है जिसे मैं सबसे ज्यादा पसंद करता था।"
मेरी बात सुन कर रितू दीदी फफक कर रो पड़ी। उनकी ऑखों से झर झर करके ऑसूॅ बहने लगे। ये देख कर मैं तड़प उठा। मैने अपने दोनो हाॅथों से उनकी ऑखों से बहते हुए ऑसुओं को पोंछा।
"ऐसी बातें मत कर मेरे भाई।" दीदी ने सिसकते हुए कहा___"मैं अपने अंदर के जज़्बातों को सम्हाल नहीं पाऊॅगी। मेरा दिल धड़कना बंद कर देगा। आज मुझे एहसास हुआ कि सच्चा प्यार व स्नेह कैसा होता है? क्यों इस प्यार में लोग अपने किसी प्रिय के लिए खुद को कुर्बान कर देते हैं? तू प्यार मोहब्बत और प्रेम का जीता जागता प्रमाण है राज। मैं अपने भाई के इस सच्चे प्रेम में बह जाना चाहती हूॅ। मुझे अपने से दूर मत करना मेरे भाई।"
"शान्त हो जाइये दीदी।" मैने दीदी को अपने सीने से लगा लिया फिर बोला___"अब बिलकुल भी आप रोएॅगी नहीं। चलिए जाइये फ्रेश हो जाइये उसके बाद हम सब साथ में खाना खाएॅगे।"
"हम्म।" दीदी ने बस इतना ही कहा और मुझसे अलग हो गईं। उनकी ऑखें रोने से हल्का सूझ गई थी। मेरी खुद की ऑखें भी नम थी।
"वो दीदी, करुणा चाची और उनके बच्चे कब तक आएॅगे यहाॅ?" मैने पहलू बदलते हुए पूछा दीदी से।
"अरे हाॅ मैं तो भूल ही गई थी राज।" रितू दीदी सहसा चौंकते हुए बोलीं___"उन्होंने कल फोन पर बताया था कि वो बच्चों को लेकर मामा जी के साथ आज यहाॅ शाम से पहले लगभग तीन बजे तक हल्दीपुर के पहले जो नहर का पुल है वहाॅ पहुॅच जाएॅगी।"
"ओह ठीक है दीदी।
" मैने अपनी कलाई पर बॅधी घड़ी की तरफ देखते हुए कहा___"अभी तो ढाई बज रहे हैं। मतलब आधे घण्टे में वो लोग पुल के पास पहुॅच जाएॅगे। एक काम करता हूॅ मैं आपकी जिप्सी लेकर उन्हें लेने जा रहा हूॅ।"
"नहीं नहीं।" रितू दीदी झट से बोल पड़ीं___"तू कहीं नहीं जाएगा। मैं हरिया काका को बोल दूॅगी वो ले आएॅगे उनको।"
"आपको नहीं लगता दीदी कि उन्हें लेने हमें खुद जाना चाहिए?" मैने कहा___"आख़िर वो हमारी चाची हैं। हरिया काका के भरोसे कैसे रह सकते हैं हम?"
"तो ठीक है राज।" दीदी ने कहा___"मैं खुद जा रही हूॅ उन्हें लेने।"
"मैं ये कह रहा हूॅ दीदी कि हम दोनो साथ में उन्हें लेने चलते हैं।" मैने कहा___"प्लीज़ दीदी मान जाइये न।"
"अच्छा ठीक है चल।" दीदी के होठों पर उनकी खूबसूरत सी मुस्कान उभर आई___"अपनी ज़िद तो तुझे छोंड़ना है नहीं न।"
"हाॅ तो।" मैने भी इस बार इठलाते हुए कहा___"आपसे छोटा हूॅ तो इतनी ज़िद तो आपसे करूॅगा ही और आपको मेरी ज़िद माननी ही पड़ेगी। हाॅ नहीं तो।"
"अरे तू ये तकिया कलाम कब से करने लगा?" रितू दीदी ने एकाएक ही चौंकते हुए कहा___"ये तकिया कलाम तो गुड़िया(निधी) का है न?"
"हाॅ दीदी।" मेरी ऑखों के सामने एकाएक ही निधी का चेहरा घूम गया___"हर बात में ये बोलना उसकी आदत बन चुकी है और पता है बहुत लाडली हो गई है। अपनी हर बात मनवा लेती है वो।"
"हाॅ वो ऐसी ही थी।" रितू दीदी कहीं खोई हुई सी नज़र आईं, बोली___"कैसी है अब वो?"
"सब कोई अच्छे से हैं दीदी।" मैने कहा___"माॅ गुड़िया और अभय चाचा सब।"
"काश मैं उन्हें देख पाती राज।" दीदी के चेहरे पर पीड़ा के भाव भर आए___"गौरी चाची और गुड़िया से मुआफ़ी माॅग पाती मैं।"
"ओफ्फो दीदी।" मैने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा__"ये सब आप क्यों कह रही हैं? प्लीज़ ये सब आप अपने ज़हन से निकाल दीजिए। अब इस बारे में आप खुद को दुखी नहीं करेंगी। अब चलिए वरना हम लेट हो जाएॅगे जाने में।"
मेरी बाय सुन कर दीदी ने कुछ कहना चाहा मगर मैने उनके होठों पर अपनी उॅगली रख कर उन्हें चुप करा दिया और उन्हें फ्रेश होने के लिए कह कर मैं कमरे से बाहर आ गया। बाहर आया तो मेरी नज़र दरवाजे के एक साइड खड़ी नैना बुआ पर पड़ी। उनका चेहरा ऑसुओं से तर था। शायद उन्होंने हमारी सारी बातें सुन ली थी। मुझे देखते ही उन्होंने जल्दी से अपनी साड़ी का एक छोर पकड़ कर अपने ऑसुओं को पोंछा। मैं उन्हें ये करते देख वहीं पर खड़ा हो गया।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दोस्तो अपडेट हाज़िर है,,,,,,,,,
आप सबकी प्रतिक्रिया और रिव्यू का इन्तज़ार रहेगा,,,,,,,
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.........《 48 》
अब तक,,,,,,,,
"अच्छा ठीक है चल।" दीदी के होठों पर उनकी खूबसूरत सी मुस्कान उभर आई___"अपनी ज़िद तो तुझे छोंड़ना है नहीं न।"
"हाॅ तो।" मैने भी इस बार इठलाते हुए कहा___"आपसे छोटा हूॅ तो इतनी ज़िद तो आपसे करूॅगा ही और आपको मेरी ज़िद माननी ही पड़ेगी। हाॅ नहीं तो।
"
"अरे तू ये तकिया कलाम कब से करने लगा?" रितू दीदी ने एकाएक ही चौंकते हुए कहा___"ये तकिया कलाम तो गुड़िया(निधी) का है न?"
"हाॅ दीदी।" मेरी ऑखों के सामने एकाएक ही निधी का चेहरा घूम गया___"हर बात में ये बोलना उसकी आदत बन चुकी है और पता है बहुत लाडली हो गई है। अपनी हर बात मनवा लेती है वो।"
"हाॅ वो ऐसी ही थी।" रितू दीदी कहीं खोई हुई सी नज़र आईं, बोली___"कैसी है अब वो?"
"सब कोई अच्छे से हैं दीदी।" मैने कहा___"माॅ गुड़िया और अभय चाचा सब।"
"काश मैं उन्हें देख पाती राज।" दीदी के चेहरे पर पीड़ा के भाव भर आए___"गौरी चाची और गुड़िया से मुआफ़ी माॅग पाती मैं।"
"ओफ्फो दीदी।" मैने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा__"ये सब आप क्यों कह रही हैं? प्लीज़ ये सब आप अपने ज़हन से निकाल दीजिए। अब इस बारे में आप खुद को दुखी नहीं करेंगी। अब चलिए वरना हम लेट हो जाएॅगे जाने में।"
मेरी बाय सुन कर दीदी ने कुछ कहना चाहा मगर मैने उनके होठों पर अपनी उॅगली रख कर उन्हें चुप करा दिया और उन्हें फ्रेश होने के लिए कह कर मैं कमरे से बाहर आ गया। बाहर आया तो मेरी नज़र दरवाजे के एक साइड खड़ी नैना बुआ पर पड़ी। उनका चेहरा ऑसुओं से तर था। शायद उन्होंने हमारी सारी बातें सुन ली थी। मुझे देखते ही उन्होंने जल्दी से अपनी साड़ी का एक छोर पकड़ कर अपने ऑसुओं को पोंछा। मैं उन्हें ये करते देख वहीं पर खड़ा हो गया।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,
विराज के कमरे से जाते ही रितू ने अपने जिस्म से पुलिस की वर्दी निकाली और एक टाॅवेल लेकर बाॅथरूम में घुस गई। उसके सिर पर जो चोंट लगी थी वो बहुत ज्यादा दर्द कर रही थी। किन्तु उसने अपने उस दर्द को बड़ी मुश्किल से जज़्ब किया हुआ था। खून तो रिसा था किन्तु उसने पाॅकेट से रुमाल निकाल कर उसे पहले ही साफ कर लिया था। चोंट इतनी भी गहरी नहीं थी जिससे बात गंभीर होती। जीप के किनारे पर लगा लोहे का पाइप उसके सिर के किनारे वाले भाग के थोड़ा सा ऊपर लगा था। उस आदमी को जीप में डालने के बाद ही उसने सिर से रिस रहे खून को रुमाल से साफ किया था। उसके बाद उसने सिर पर वापस पीकैप पहन ली थी जिससे चोंट से रिसा हुआ खून और चोंट दिखनी बंद हो गई थी। वो नहीं चाहती थी कि उसको लगी किसी भी प्रकार की चोंट फार्महाउस में किसी को भी नज़र आए या पता चले।
बाथरूम में रितू ने खुद को फ्रेश किया और फिर बाहर आ गई। कमरे में उसने एक नई वर्दी पहनी और फिर पीकैप लगा कर खुद को पूरी तरह तैयार किया। आलमारी से उसने एक दर्द की टैबलेट ली और वहीं एक साइड रखे पानी के बाटल से उसने उस टैबलेट को खाया। उसके बाद वो कमरे से बाहर आ गई।
नीचे डायनिंग हाल में इस वक्त खाना खाने के लिए सिर्फ तीन ही लोग थे। विराज, आशा, और रितू। रितू के आने के बाद पवन की माॅ ने उन तीनों को खाना परोसा। तीनों ने बड़े आराम से खाना खाया।
बाॅकि सब अपने अपने कमरे में थे। कुछ ही देर में तीनों ने खाना खा लिया।
"तू क्या फिर से ड्यूटी पर जा रही है रितू?" आशा दीदी ने पूछा___"मैने तो सोचा था कि हम सब यहाॅ गप्पें लड़ाएंगे। मगर अब जबकि तू जा रही है तो फिर मैं क्या करूॅगी इसके सिवा कि कमरे में जाकर लम्बी तान कर सो जाऊॅगी।"
"लम्बी तान कर सोने की ज़रूरत नहीं है आशा।" रितू दीदी ने कहा___"शाम को तुम सबको राज के साथ मुम्बई के लिए निकलना है। इस लिए सामान की पैकिंग करके रेडी रहना।"
"क्याऽऽ???" आशा दीदी बुरी तरह चौंकी___"हम आज ही शाम को यहाॅ से जाएॅगे???"
रितू दीदी की बात सुनकर मैं भी बुरी तरह चौंक पड़ा था। मैं तो कुछ और ही सोचे हुए था। रितू दीदी के साथ जाकर रास्ते में उनसे गुनगुन जाने के लिए कहने वाला था ताकि अपनी सभी टिकटें कैंसिल करवा सकूॅ। मगर दीदी की इस बात ने मुझे हिला कर रख दिया था।
"हाॅ आशा।" उधर दीदी कह रही थीं___"तुम लोगों का यहाॅ से सुरक्षित मुम्बई निकलना ज़रूरी है। क्योंकि आने वाला हर पल एक नये ख़तरे को अपने साथ लेकर आ रहा है। तुम सबके यहाॅ रहते हुए किसी भी प्रकार की अनहोनी हो सकती है। इस लिए मैं चाहती हूॅ कि तुम सब यहाॅ से मुम्बई चले जाओ।"
"अच्छा ठीक है रितू।" आशा दीदी ने कहा___"मैं माॅ को भी बता देती हूॅ इस बारे में।"
"ठीक है ।" रितू दीदी ने कहा___"पवन और राज के उस दोस्त को भी बता देना। चल राज।"
अंतिम वाक्य मुझे देख कर कहने के साथ ही रितू दीदी कुर्सी से उठ कर बाहर की तरफ चल दी। उनके पीछे पीछे मैं भी बुझे मन से चल दिया। बाहर आकर दीदी अपनी जिप्सी की तरफ बढ़ गईं। जिप्सी की ड्राइविंग शीट पर बैठ कर दीदी ने मुझे भी साथ में बैठने को कहा तो मैं भी चुपचाप बैठ गया। मेरे बैठते ही दीदी ने जिप्सी मेन गेट की तरफ दौड़ा दिया।
"काका, यहाॅ सबका ख़याल रखना।" लोहे वाले गेट के पास रुक कर दीदी ने हरिया काका से कहा___"हम आते है कुछ देर में।"
"फिकर ना करो बिटिया।" हरिया काका ने कहा__"हमरे रहते यहाॅ काहू का कुछू न होई।"
हरिया काका की बात सुन कर दीदी मुस्कुराई और फिर जिप्सी को आगे बढ़ा दिया। मैं उतरा हुआ चेहरा लिये दूसरी तरफ देख रहा था। सच कहूॅ तो मुझे दीदी का आशा दीदी से ये कहना कि वो सब लोग मेरे साथ आज शाम ही मुम्बई जाएॅगी बिलकुल अच्छा नहीं लगा था।
"क्या हुआ मेरा भाई नाराज़ है मुझसे?" सहसा रितू दीदी ने मेरी तरफ देख कर कहा था। उनकी ये बात सुन कर मैने उनकी तरफ एक नज़र देखा और फिर बिना कुछ बोले फिर से दूसरी तरफ देखने लगा।
"अपने से दूर तो मैं भी तुझे नहीं जाने देना चाहती मेरे भाई।" दीदी ने गहरी साॅस ली___"मगर मौजूदा हालात कुछ ऐसे हैं कि मुझे ये सब करना पड़ रहा है। मगर मैं ये नहीं कह रही राज कि इस जंग में मैं या तू अकेले हैं...नहीं नहीं बल्कि हम दोनो साथ साथ ही हैं।
"
उनकी इस बात से मैने चौंक कर उनकी तरफ एक झटके से देखा। वो मुझे देख कर मुस्कुरा रही थी। उनकी इस मुस्कान को देख कर मेरी सारी नाराज़गी दूर हो गई।
"हाॅ राज।" उन्होंने फिर कहा___"हम दोनो साथ साथ ही इस खेल में काम करेंगे। मगर....
"मगर क्या दीदी???" मैं चकराया।
"मगर ये कि तू अभी इन सबको लेकर मुम्बई सुरक्षित पहुॅच जा।" दीदी ने कहा___"जब ये सब वहाॅ पहुॅच जाएॅगे तो इनकी सुरक्षा की चिंता से हम दोनो ही मुक्त हो जाएॅगे। उसके बाद तुम वहाॅ से वापस आ जाना यहाॅ। हम दोनो तसल्ली से फिर इस खेल को अंजाम तक पहुॅचाएॅगे।"
"आपने ठीक कहा दीदी।" मैने कहा___"हम स्वतंत्रतापूर्वक ये जंग तभी लड़ सकेंगे जब हमारी ये सारी कमज़ोरियाॅ हमारे दुश्मन की नज़र से या पहुॅच से बहुत दूर हो जाएॅगी। क्योंकि हमारे दुश्मन ने अगर हमारी एक भी कमज़ोरी को नुकसान पहुॅचा दिया तो वो नुकसान हम हर्गिज़ भी सह नहीं सकेंगे।"
"बिलकुल ठीक समझे मेरे भाई।" रितू दीदी ने मुस्कुरा कर कहा___"मैं यही कर रही हूॅ। मैं चाहती हूॅ कि तू हमारी इन सारी कमज़ोरियों को यहाॅ से मुम्बई ले जाकर उन्हें सुरक्षित कर दे। उसके बाद तू वापस यहाॅ आ जाना, उस सूरत में हम दोनो बहन भाई खुल कर और तसल्ली से अपनी जंग लड़ सकेंगे।"
"मैं समझता था कि ये जंग सिर्फ मेरी है दीदी।" मैने सहसा गंभीर होकर कहा___"और इस जंग को अकेले ही मुझे इसके अंजाम तक पहुॅचाना है। मगर आपसे मिल कर ये पता चला कि इस जंग में मैं अकेला नहीं हूॅ बल्कि मेरे साथ मेरे हर क़दम में मेरा साथ देने के लिए मेरी सबसे अज़ीज़ दीदी भी तैयार बैठी हैं। ये मेरे लिए ऐसी खुशी है दीदी जिसका मैं बयान नहीं कर सकता।"
"चल अब तू फिर से न मुझे इमोश्नल कर देना।" रितू दीदी ने हौले से हॅसते हुए कहा___"वरना मैं फिर रोने लग जाऊॅगी।"
"नहीं दीदी।" मैने तपाक से कहा___"आप रोना नहीं। आपकी ऑखों में ऑसू देखते ही मेरे अंदर कुछ टूटने सा लगता है। जिससे मुझे तक़लीफ़ होने लगती है।"
"अच्छा ये सब छोंड़ भाई।" रितू दीदी मेरी बात पर पहले तो मुस्कुराईं फिर सहसा बेचैनी से पहलू बदलते हुए कहा___"राज तुझसे कुछ पूछूॅ?"
"ये क्या बात हुई दीदी?" मैने दीदी की तरफ देखा__"कोई बात पूछने के लिए भला आपको मुझसे इजाज़त माॅगने की क्या ज़रूरत है?"
"अच्छा नहीं माॅगती इजाज़त।" दीदी फिर मुस्कुराई, बोली___"मैं तुझसे जो कुछ भी पूछना चाहती हूॅ उसका तू सच सच जवाब देगा न?"
"हाॅ बिलकुल दीदी।" मैने कहा___"मैं आपके हर सवाल का सच सच जवाब दूॅगा। पूछिए क्या पूछना चाहती हैं आप?"
"मेरे मन में कई सारी बातें है राज।" रितू दीदी ने सामने रास्ते की तरफ देखते हुए कहा___"और उन्हीं कई सारी बातों में कई सारे सवाल भी हैं जिनके बारे में मुझे जानना है।
तू तो जानता है कि मैं एक पुलिस ऑफिसर भी हूॅ इस लिए हर सवालों का सही सही जवाब पाना मेरी इस पुलिसिया फितरत में भी शामिल है।"
"कोई बात नहीं दीदी।" मैने मुस्कुरा कर कहा___"आपको जो कुछ भी जानना है मुझसे आप बेझिझक पूॅछ सकती हैं। अगर आपके सवालों के जवाब मेरे पास होंगे तो ज़रूर मैं आपके हर सवाल का जवाब दूॅगा।"
"सबसे पहला सवाल तो यही है कि तू मुम्बई में कहाॅ और किस हाल में गौरी चाची और गुड़िया को साथ लिए रहता है?" रितू दीदी ने कहा___"और अब तो तू इन सबको भी अपने साथ ही लिए जा रहा है तो मेरा ये सोचना जायज़ ही है कि इतने सारे लोगों को तू कहाॅ ठहराएगा और कैसे सुरक्षित रखेगा?"
"बड़े पापा तो मेरे बारे में यही सोचते हैं दीदी।" मैने सहसा मुस्कुरा कर कहा___"कि मैं मुम्बई में कहीं किसी होटल या ढाबे में कप प्लेट धोने वाला काम करता होऊॅगा। जबकि मेरी सच्चाई का अगर आज उन्हें पता चल जाए तो उनके पैरों तले से ये ज़मीन गायब हो जाएगी।"
"क्या मतलब???" रितू दीदी बुरी तरह चौंक कर मेरी तरफ देखने लगी थी।
"मतलब साफ है दीदी।" मैने गहरी साॅस ली___"ईश्वर से बड़ा कोई नहीं होता दुनियाॅ में। ये ईश्वर की ही रहमत है दीदी कि मैं चाहूॅ तो यहाॅ पर खड़े खड़े ही पूरा हल्दीपुर गाॅव ख़रीद लूॅ। जिस मामूली सी प्रापर्टी को पाने के लिए बड़े पापा ने ये सब किया था न उस प्रापर्टी की लाखों गुनी दौलत आज मेरे पास है।"
"ये तू क्या कह रहा है राज?" रितू दीदी बुरी तरह उछल पड़ी थी। ब्रेक पैडल पर लगभग वो खड़ी ही हो गई थी। जिसके चलते जिप्सी के टायर ज़ोर से चीखते हुए सड़क पर स्थिर हो गए थे। मेरी तरफ आश्चर्यचकित नज़रों से देखते हुए बोलीं___"तेरे पास इतनी सारी दौलत कहाॅ से आ गई? तू....तूने कहीं कोई ग़लत काम करके तो नहीं ये दौलत अर्जित की है??"
"हाहाहाहा अरे नहीं दीदी।" मैने हॅसते हुए कहा___"क्या आपको लगता है कि आपका ये भाई दौलत पाने के लिए कोई ग़लत काम करेगा?"
"लगता तो नहीं है राज।" दीदी की ऑखें अभी भी फैली हुई थी, बोली___"मगर सवाल तो खड़ा होता ही है कि इतनी सारी दौलत अचानक एक साथ मिल जाना कैसे संभव हो सकता है?"
"इस दुनियाॅ में सब कुछ संभव है दीदी।" मैने कहा___"और इसका जीता जागता प्रमाण मैं खुद हूॅ।"
"लेकिन कैसे मेरे भाई??" रितू दीदी चकित भाव से बोल पड़ीं____"ये असंभव संभव कैसे हो गया? और अगर ऐसा ही है तो यकीनन राज ये बहुत ख़ुशी की बात है।"
मैने दीदी को संक्षेप में सारी कहानी बता दी। उन्हें बताया कि कैसे एक अरबपति इंसान ने मुझे अपना बेटा बना लिया और अपनी सारी संपत्ति मेरे नाम कर दी। मैने उन्हें बताया कि मैं उसी अरबपति आदमी की मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करता था। मेरे काम और मेरे नेचर से प्रभावित होकर वो आदमी एक दिन मेरा मसीहा बन गया।
मैने उन्हें बताया कि आज मैं अपने पूरे परिवार के साथ उसी आदमी के अलीशान बॅगले में शान से रहता हूॅ। मेरी ये कहानी सुन कर दीदी आश्चर्यचकित रह गईं थी। काफी देर तक उनके मुख से कोई बोल न फूटा।
"ये...ये तो कमाल हो गया राज।" फिर दीदी ने खुशी से फूली न समाते हुए कहा___"मैं समझ सकती हूॅ मेरे भाई। हाॅ भाई, मैं सब समझ गई। ईश्वर ने तुझे तेरे अच्छे कर्मों का फल दिया है। उससे तेरी दुख तक़लीफ़ें नहीं देखी गई और इसी लिए उसने उस आदमी को तेरा मसीहा बना कर भेज दिया तेरे पास। हाॅ भाई, यही सच है। मैं बहुत खुश हूॅ तेरे लिए राज।"
"अब तो आप इस बात से बेफिक्र हैं न कि इन सबको मैं मुम्बई में कैसे रखूॅगा?" मैने मुस्कुरा कर कहा था।
"हाॅ राज।" दीदी ने जिप्सी को आगे बढ़ाते हुए कहा__"अब मुझे इन लोगों की कोई चिन्ता नहीं है।"
"हम्म, अब बताइये और क्या जानना है आपको?" मैने बात को आगे बढ़ाया।
"मैं नहीं जानती राज कि जो मैं तुझसे कहने वाली हूॅ या जानने वाली हूॅ उसका तुझे पता है भी या उसका तुझसे कोई ताल्लुक है भी कि नहीं।" दीदी ने कहा___"मगर फिर भी इस लिए कह रही हूॅ कि तू मेरा भाई है और तुझे भी जानने का हक़ है कि घर परिवार के बीच या तेरी बहन के साथ क्या क्या हुआ?"
"जी कहिए न दीदी।" मैने कहा___"आप बेझिझक अपनी बात मुझसे शेयर कर सकती हैं।"
"मैने पुलिस की नौकरी अपने शौक के लिए तो की ही थी राज।" रितू दीदी ने जैसे कहना शुरू किया___"मगर दिल में ये भी हसरत थी कि मैं ये नौकरी पूरी ईमानदारी के साथ करूॅगी। ख़ैर, ड्यूटी ज्वाइन करने से पहले ही मेरे मन में ये बात थी कि मैं चार्ज़ सम्हालते ही सबसे पहले दादा दादी के केस पर काम करूॅगी। यानी मैं पता लगाऊॅगी कि उनका एक्सीडेन्ट वास्तव में एक हादसा ही था या फिर किसी की सोची समझी चाल थी? चार्ज़ सम्हालते ही मैने ऐसा किया भी, मगर पुलिस रिकार्ड में मुझे कहीं कोई ऐसा सुराग़ या क्लू तक नहीं मिला जिससे मुझे संदेह भी हो सके कि उनका एक्सीडेन्ट सोची समझी चाल का नतीजा हो सकता है। कहने का मतलब ये कि मैने दादा दादी वाले केस में बहुत छानबीन की मगर कुछ भी हाॅथ न लगा। थक हार कर मैने उस केस से अपना ध्यान हटा लिया। ये अलग बात थी कि दिल में ये मलाल अब भी है कि मैं दादा दादी के केस में कुछ भी न कर सकी।"
इतना सब कहने के बाद रितू दीदी कुछ पल के लिए रुकी और एक नज़र मेरे चेहरे की तरफ देखने के बाद फिर से सामने की तरफ देखने लगीं।
"उसके बाद फिर डैड के साथ अजीब सी घटनाएॅ होने लगीं।" रितू दीदी ने गहरी साॅस लेने के बाद फिर से कहना शुरू किया___"सबसे पहले जो उनके साथ अजीब घटना हुई वो ये थी कि कोई विदेशी ब्यक्ति उन्हें करोंड़ो का चूना लगा कर कहीं गायब हो गया। अख़बार में इस बात की ख़बर भी छपी थी। जिसके चलते डैड की इज्ज़त पर भी असर हुआ।
मैं जानती हूॅ कि डैड ने उस विदेशी की खोज में धरती आसमान एक कर दिया होगा मगर उनके हाॅथ कुछ न लगा। ख़ैर, इस अजीब घटना के बाद डैड के साथ फिर से एक घटना घटी। उनकी फैक्ट्री में आग लग गई। फैक्ट्री में लगी आग की जाॅच उन्होंने अपने तरीके से करवाई थी और रिपोर्ट भी अपने तरीके से ही बनवाई थी। ऐसा शायद उन्होंने इस लिए किया था ताकि उनकी रेपुटेशन पर फिर से कोई धब्बा न लग जाए। हलाॅकि धब्बा लगने से वो तब भी नहीं रोंक पाए थे। मैने जब देखा कि कोई नतीजा ही नहीं निकला है तो मैने फैक्ट्री की जाॅच करने का खुद ही बीड़ा उठाने का सोचा। मेरे मन में ऐसा करने की सिर्फ दो ही वजहें थी। पहला ये जानना कि ऐसा कौन है जिसने डैड की फैक्ट्री में आग लगाई? दूसरा ये कि डैड के हुए उस भारी नुकसान की भरपाई करना। ज़ाहिर सी बात है कि अगर मुजरिम का पता चल जाता तो उससे इस नुकसान की भरपाई कर ली जाती। मगर ऐसा भी न हो पाया था। इसमें सबसे ज्यादा चौंकानी वाली बात ये हुई थी कि जब मैने खुद जाॅच करने के लिए केस रिओपन करवाया तब गुनगुन शहर का सारा पुलिस महकमा ही बदल दिया गया था। हर कोई इस बात से हैरान था। मगर समझ में किसी को कुछ न आया था। दूसरी हैरानी की बात ये कि लाख कोशिशों के बाद भी उस केस में ये नहीं पता चल सका कि फैक्ट्री में आग आख़िर किसने लगाई थी? हलाॅकि इसमें एक कमज़ोरी ये थी कि डैड ने पूरी ईमानदारी से कोऑपरेट नहीं किया था।"
इतना कुछ बोलने के बाद रितू दीदी चुप हो गईं। मैने सोचा शायद वो कुछ और बोलेंगी मगर ऐसा न हुआ। उनकी नज़रें सामने रास्ते पर ही लगी हुई थी।
"ये तो थी घटनाओं की बातें।" तभी उन्होंने फिर से कहना शुरू किया___"और ये सब मैने तुझसे इस लिए शेयर किया राज ताकि तू भी जान सके कि ये केस मेरी नाकामी का भी हिस्सा हैं। जिन्हें मैं सुलझा नहीं पाई। मगर जबसे ये सब हालात शुरू हुए तब से मैने हवेली के अंदर भी कान लगाना शुरू कर दिया था। उससे ज्यादा तो नहीं मगर इतना ज़रूर सुना मैने कि तेरा ज़िक्र बार बार हवेली के अंदर मेरे माॅम डैड के बीच हुआ। एक बार तो मैने ये भी सुना कि ये सब तुमने किया है। मैं ये सुन कर हैरान तो हुई मगर ज्यादा ध्यान नहीं दिया कभी। क्योंकि तब मेरे दिमाग़ में भी यही बातें थी कि तू ये सब कर ही नहीं सकता। मगर ज्यादा दिनों तक मैं तुझे भी नज़रअंदाज़ नहीं कर पाई। क्योंकि कहीं न कहीं मेरे भी दिमाग़ में ये बात आ ही गई थी कि मेरे डैड का अगर कोई सबसे ज्यादा बुरा करना चाहेगा तो वो सिर्फ तू ही था। इस लिए मैंने उन सभी घटनाओं में तुझे जोड़ना शुरू किया और फिर मुझे भी ये लगने लगा कि तेरा इन सभी घटनाओं में ताल्लुक यकीनन हो सकता है।"
ये सब कहने के बाद रितू दीदी एकदम से चुप हो गईं। जिप्सी पुल के पास पहुॅच चुकी थी।
इस लिए जिप्सी रोंक कर रितू दीदी मेरी तरफ अजीब भाव से देखने लगी थीं। जैसे मेरे चेहरे से ही समझ जाना चाहती हों कि सच्चाई क्या है।
"मेरा ही तो इन सभी घटनाओं में ताल्लुक था दीदी।" मैने गहरी साॅस लेते हुए जैसे उनके ऊपर बम फोड़ा__"हाॅ दीदी। आपने जिन घटनाओं का ज़िक्र किया उन सबका कर्ता धर्ता मैं ही तो था। वो विदेशी डीलर भी मैं ही था जिसने बड़े पापा से वो डील की और फिर बिना कुछ बताए गायब हो गया था। उसके बाद उनकी फैक्ट्री में आग भी मैने ही लगाई थी। कहने का मतलब ये कि बड़े पापा के साथ जो कुछ भी अभी तक बुरा हुआ है उसका जिम्मेदार सिर्फ मैं ही रहा हूॅ और आगे भी जो कुछ उनके साथ बुरा होगा उसका भी जिम्मेदार मैं ही होऊॅगा।"
"क्याऽऽऽ????" रितू दीदी मेरी बात सुन कर बुरी तरह उछल पड़ी थीं, बोली___"नहीं नहीं मैं नहीं मान सकती राज। भला तू ये सब कैसे कर सकता था? तू तो यहाॅ था ही नहीं।"
"आपके मानने या न मानने से सच्चाई बदल नहीं जाएगी दीदी।" मैने कहा___"और हाॅ, आपको तो अभी ये भी नहीं पता कि फैक्ट्री के तहखाने में कुछ था भी या नहीं?"
"क्या मतलब??" रितू दीदी की ऑखें फैली___"फैक्ट्री के तहखाने में भला क्या था जिसकी बात कर रहा है तू?"
"आपको क्या लगता है दीदी?" मैने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"आपके डैड इतने कम कमीने इंसान हैं? अरे नहीं दीदी, वो तो ऊॅचे दर्ज़े के पापी हैं। कपड़ा मील का ब्यापार व फैक्ट्री तो महज दिखावा मात्र थी जबकि उनका असल कारोबार तो ड्रग्स अफीम चरस आदि का था। किन्तु ये कारोबार चूॅकि कानून की नज़र में ग़ैर कानूनी होता है इस लिए बड़े पापा इस कारोबार को सबकी नज़रों से छुपा कर करते थे। फैक्ट्री के अंदर मौजूद उस तहखाने में उनकी वही काली दुनियाॅ का काला चिट्ठा मौजूद था जिसे मैने फैक्ट्री में टाइम बम लगाने से पहले ही गायब कर दिया था। मैं नहीं चाहता था कि उनका ये कारनामा कानून की नज़र में आए। मैं तो अपने हाॅथों से उन्हें हर सज़ा देना चाहता हूॅ। कानून की चपेट में आने से भला मैं कैसे उन्हें अपने तरीके से सज़ा दे सकता था? इस लिए मैने तहखाने से उनका वो सारा ज़खीरा गायब कर दिया जो ग़ैर कानूनी था।"
मेरी ये बातें सुन कर रितू दीदी की ऑखें हैरत से फटी की फटी रह गई थी। उनके चेहरे पर हैरत और अविश्वास का सागर मानो हिलोरें ले रहा था।
"क्या सच में इस सबमें तेरा ही हाॅथ था राज?" रितू दीदी ने अविश्वास भरे लहजे से कहा___"मगर ये सब कैसे मुमकिन हो सकता है मेरे भाई? ये सब कैसे कर लिया तूने? बंद फैक्ट्री के अंदर और वो भी तहखाने के अंदर पहुॅचना इतनी आसान बात तो न थी। उस सूरत में तो बिलकुल भी नहीं जबकि तू कभी फैक्ट्री गया ही नही था। फिर कैसे ये सब कर लिया तूने?"
"मन में सच्ची लगन हो तो सब कुछ मुमकिन हो जाता है दीदी।
" मैने कहा___"ऊपर वाला भी फिर आपके लिए राहें आसान कर देता है। ये तो मुझे पता ही था कि बड़े पापा की शहर में कहीं पर कपड़ा मील की फैक्ट्री है। पर चूॅकि मैं कभी फैक्ट्री गया नहीं था इस लिए मैने फैक्ट्री के संबंध में जानकारी हाॅसिल करने के लिए अपने दोस्त पवन को लगाया। उसने मुझे फैक्ट्री के संबंध में सारी बातें बताई। उसके बाद मैने प्लान बनाया और इस प्लान में गुड़िया(निधी) ने भी मेरा साथ देने के लिए ज़बरदस्ती मेरी वाइफ का रोल किया। उसके बाद मुझे पवन ने बताया कि बड़े पापा का एक बिजनेस पार्टनर है जिसका नाम अरविंद सक्सेना है, इतना ही नहीं इन दोनो पार्टनर्स के बीच बहुत ही गहरे संबंध हैं। पवन ने जब गहरे संबंधों की बात की तो मैं समझ न पाया था कि ये कैसे संबंधों की बात कर रहा है। मेरे पूछने पर उसने बताया कि बड़े पापा और सक्सेना आपस में एक दूसरे की बीवियों के साथ सब कुछ कर लेते हैं। ये बात जान कर मेरे पैरों तले से ज़मीन निकल गई। मैने सोचा कि बड़े पापा भला ऐसा कैसे कर सकते हैं?? मगर मैं जानता था कि ऐसे ब्यक्ति से भला अच्छे कर्म की उम्मीद कैसे की जा सकती है? ख़ैर, पवन से अरविंद सक्सेना के बारे में सुनकर मैने पवन से कहा कि सक्सेना के खिलाफ़ कोई ऐसा सबूत हाॅसिल करे जिसके आधार पर वो कुछ भी करने को तैयार हो जाए। मेरे कहने पर पवन ने वैसा ही किया और फिर एक दिन पवन ने मुझे बताया कि उसने सक्सेना के घर से कुछ फोटोग्राफ्स और वीडियोज़ हाॅसिल किये हैं। जिनमें सक्सेना बेहद आपत्तिजनक स्थित में है। मैने पवन से उन फोटुओं को कुरियर द्वारा मॅगवा लिया। इसके बाद मैने सक्सेना को तेल की धार पर लेने में ज़रा भी देरी न की। कहने का मतलब ये कि मैने उन फोटोग्राफ्स के आधार पर सक्सेना को इतना मजबूर कर दिया कि वो कुछ भी कर सकता था। सबसे पहले मैने उससे बड़े पापा के कारोबार की सारी जानकारी ली उसके बाद मैने उससे बड़े पापा की और भी बहुत सारी जानकारी हाॅसिल की। सक्सेना दरअसल थोड़ा फट्टू किस्म का आदमी था। उसे इस बात का पता चल गया था कि उसका पार्टनर उसकी ग़ैर जानकारी में ग़ैर कानूनी धंधा भी करता है और उसके कई ऐसे खतरनाॅक लोगों से भी संबंध हैं जिनका रिकार्ड कानून की फाइलों में वर्षों से दबा पड़ा है।"
मैं इतना कुछ कहने के बाद कुछ पल के लिए रुका और फिर कहना शुरू किया___"सक्सेना को डर था कि कहीं वो किसी दिन कानून की चपेट में न आ जाए। इस लिए वो बड़े पापा से पार्टनरशिप तोड़ना चाहता था मगर वो ऐसा कर नहीं पा रहा था। उसे ये भी डर था कि कहीं उसके पार्टनर को उस पर शक न हो जाए और उसे भी इस धंधे में न लपेट लें। ये बात मुझे तब पता चली थी जब मैं खुद सक्सेना से मिला था। सक्सेना से मैने एक सौदा किया।
वो सौदा यही था कि मैं उसे और उसकी फैमिली को सुरक्षित विदेश भेजने का बंदोबस्त कर दूॅगा, इसके बदले उसे वो करना पड़ेगा जो मैं कहूॅगा। मैने उसे अपना सारा प्लान समझाया। सारी बात सुन कर पहले तो वो मेरी बात मानने से इंकार करने लगा। उसे डर था कि कहीं इस सबमें उसकी जान पर न बन आए। पर मैने उसे अच्छी तरह समझाया और उसे इसके लिए राज़ी किया।"
"इसका मतलब फैक्ट्री में लगी आग तूने सक्सेना के द्वारा लगवाई थी?" सहसा रितू दीदी मेरी बात के बीच में ही बोल पड़ी___"मगर जैसा कि तूने बताया कि तहखाने में डैड का ग़ैर कानूनी ज़खीरा मौजूद था तो उसे कैसे गायब करवाया तूने? क्या उसे भी सक्सेना के द्वारा ही गायब किया?"
"सक्सेना के साथ पवन था।" मैने बताया___"सक्सेना को तहखाने के लाॅक का पासवर्ड पता था। उसका काम था तहखाने का लाॅक खोल कर तहखाने में टाइम बम लगाना। पवन का काम सिर्फ यही था कि तहखाने में मौजूद उस ग़ैर कानूनी ज़खीरे को तहखाने से निकाल कर अपने कब्जे में ले ले। प्लान के अनुसार पवन उस सारे सामान को पुलिस हेडक्वार्टर में कमिश्नर के हवाले कर देगा। पुलिस कमिश्नर को ऊपर से आदेश था कि उस सामान को ब्यक्तिगत तौर पर रखे और जब उस सामान की ज़रूरत पड़े तो उसे उसी तरह मेरे हवाले कर दें जैसे वो सामान पवन के द्वारा उन्हें सौंपा गया था।"
"ये तू क्या कह रहा है राज?" रितू ने बुरी तरह चौंकते हुए कहा___"भला पुलिस का कमिश्नर ऐसा कैसे कर सकता है? दूसरी बात ऊपर से उसे ऐसा करने का आदेश कैसे मिल सकता है? ये तो बड़ी ही अविश्वसनीय बात है?"
"यही तो मज़ेदार बात है दीदी।" मैने मुस्कुरा कर कहा___"जिस शख्स ने मुझे अपना बेटा मान कर अपनी अरबों की संपत्ति मेरे नाम की उसका नाम जगदीश ओबराय है। जगदीश ओबराय एक बहुत बड़ा बिजनेस टाइकून है और उसका संबंध ऐसे ऐसे लोगों से है जिसके बारे में आदमी सोच भी नहीं सकता। उसी के कहने पर ऊपर से यहाॅ कमिश्नर के पास वो आदेश आया था और इसके पहले भी सारा पुलिस महकमा भी बदला गया था। सारा पुलिस महकमा बदलने का सिर्फ यही मकसद था कि बड़े पापा इतनी आसानी से पुलिस महकमें में कोई सेंध न लगा सकें। पहले वाले उनके सारे पुलिस के कनेक्शन खत्म करना भी ज़रूरी था। इसी लिए ऐसा किया गया था। ये अलग बात है कि आज भी बड़े पापा और आपके लिए ये सारी बातें रहस्य बनी हुई थी।"
"ओह माई गाड।" रितू दीदी की ऑखें आश्चर्य से फटी पड़ी थी, बोली___"कोई सोच भी नहीं सकता कि तूने इतना बड़ा कारनामा अंजाम दिया होगा। मुझे तो अभी भी यकीन नहीं हो रहा है कि ये सब तूने किया है। ख़ैर, जैसा कि तूने बताया कि डैड का सारा ग़ैर कानूनी सामान आज भी पुलिस कमिश्नर के पास सुरक्षित मौजूद है, और वो उस सामान को तेरे हवाले तभी करेंगे जब तुझे उस सामान की ज़रूरत होगी।
मेरा सवाल ये है कि उस सामान के द्वारा आने वाले समय में क्या करने वाला है तू?"
"आपके इस सवाल का जवाब बहुत ही सीधा और साफ है दीदी।" मैने सपाट भाव से कहा___"मैं चाहूॅ तो आज यहीं पर खड़े खड़े बड़े पापा को कानून की ऐसी चपेट में ला सकता हूॅ जहाॅ से वो सात जन्मों में भी उबर नहीं पाएॅगे। मगर मैं ये काम इतना जल्दी करूॅगा नहीं। क्योंकि एक ही बार में मैं उन्हें ऐसा झटका नहीं देना चाहता कि वो उस झटके से एक ही बार में खाक़ में मिल जाएॅ। बल्कि मैं तो उन्हें थोड़ा थोड़ा करके झटका देना चाहता हूॅ और उन्हें ये मौका भी देना चाहता हूॅ कि वो अपनी तरफ से जितनी भी कोशिश करनी हो कर लें अपने बचाव के लिए।"
"ओह तो ये बात है।" रितू दीदी को जैसे सब कुछ समझ आ गया था, बोली___"डैड का वो सारा ग़ैर कानूनी सामान तेरे लिए किसी तुरुप के इक्के से कम नहीं है। ख़ैर, तो अब आगे का क्या प्लान है तेरा?"
"अभी का तो यही प्लान है दीदी कि पहले इन सब लोगों को मुम्बई पहुॅचा कर इन सबको सुरक्षित कर दूॅ।" मैने गहरी साॅस ली___"उसके बाद मैं यहाॅ वापस आऊॅगा और आपके साथ मिल कर कुछ अलग और अनोखा करने की कोशिश करूॅगा।"
अभी हम बात ही कर रहे थे कि तभी वहाॅ पर एक टैक्सी आकर रुकी। हम दोनो का ध्यान उस तरफ गया। कुछ ही पलों में टैक्सी से करुणा चाची, दिव्या, शगुन और हेमराज मामा उतरे। मैं और दीदी भी जिप्सी से उतर कर उनके पास गए। टैक्सी वाले को उसका पैसा देने के बाद वो सब हमारी तरफ मुड़े। करुणा चाची की नज़र जैसे ही मुझ पर पड़ी तो उनकी ऑखों में ऑसू तैरते दिखाई देने लगे। वो तेज़ी से मेरी तरफ बढ़ीं और फिर मुझे अपने सीने से लगा लिया। मैं भी अपनी चाची से मिल कर थोड़ा भावुक सा हो गया किन्तु फिर मैने अपने जज़्बातों को काबू किया और फिर उनसे अलग हो गया। मेरी नज़र दिव्या पर पड़ी तो वो मुझे ही देख रही थी। मैने अपनी बाहें फैला दी तो वो एकदम से मेरी तरफ दौड़ पड़ी और मुझसे लिपट गई। उससे मिलने के बाद मैने शगुन को प्यार दिया।
थोड़ी देर सबसे मिलने के बाद मैने उन्हें जिप्सी में बैठने को कहा तो वो सब जिप्सी में बैठ गए। सबके बैठते ही दीदी ने जिप्सी को वापस मोड़ कर आगे बढ़ा दिया। मैं दीदी के साथ आगे ही बैठा था बाॅकी सब पिछली शीट्स पर बैठे थे। कुछ ही समय में हम सब फार्महाउस पहुॅच गए। फार्महाउस के अंदर जाकर करुणा चाची नैना बुआ से मिली और पवन की माॅ बहन आदि से। उसके बाद नैना बुआ ने चाची और मामा जी से खाने का पूॅछा तो वो बोलीं कि वो घर से खा पी कर ही चले थे। ख़ैर, लेडीज पार्टी एक जगह बैठ कर बातों में लग गईं जबकि मैं अपने दोस्त पवन और आदित्य के पास आ गया। शाम को हमे मुम्बई के लिए निकलना भी था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
प्रतिमा अपने कमरे के अटैच बाथरूम से बाहर निकली।
सामने बेड पर पूरी तरह से निर्वस्त्र पड़े शिवा की नज़र जैसे ही अपनी माॅ पर पड़ी तो उसके मुझ से आह निकल गई। प्रतिमा के गोरे सफ्फाक बदन पर इस वक्त मात्र एक पिंक कलर का टावेल था। जिसे वह अपनी भारी भरकम छातियों को आधे से ढॅके थी तथा नीचे उसकी मोटी चिकनी और गोरी जाघों तक को ढॅका हुआ था। जब से रितू हवेली से गई थी तब से दोनो माॅ बेटा कमरे में वासना और हवस के खेल में डूबे हुए थे। प्रतिमा खुश थी कि उसे बेटे के रूप में एक जवान मर्द मिल गया था जो उसके जिस्म की गर्मी को शान्त करने में कोई कसर नहीं छोंड़ेगा। अजय सिंह अब जवानी के दौर से बाहर निकल चुका था। उसके साथ सेक्स करने में प्रतिमा को मज़ा तो आता था किन्तु पूर्ण संतुष्टि नहीं मिलती थी।
शिवा, जो कि अजय सिंह की ही कार्बन काॅपी था। गुण और शक्ल से वो अपने बाप पर ही गया था। जब से उसने जवानी की देहलीज़ पर क़दम रखा था तब से उसकी नज़रें घर की लड़कियों और औरतों पर ही जमी रहती थी। वो उन सभी के जिस्मों को भोगने की लालसा में रात दिन लगा रहता था। मगर डर व भय की वजह से वो कभी ज्यादा आगे बढ़ नहीं पाया था। अपनी माॅ पर उसका सबसे ज्यादा क्रश था। अक्सर वो अपने बाप को प्रतिमा को पेलते हुए देखा करता था। प्रतिमा के भारी भरकम बूब्स और गदराया हुआ जिस्म उसके अंदर बुरी तरह वासना की आग भड़का देता था।
किन्तु उसकी चाहत आज वर्षों बाद पूरी हो चुकी थी। जिस औरत पर उसका सबसे ज्यादा क्रश था उस औरत के जिस्म को वह भोग रहा था। वो अपने बाप का शुक्र गुज़ार था कि उसने उसे ये अनमोल तोहफा दिया था। रितू जैसे ही हवेली से निकली थी वैसे ही शिवा और प्रतिमा एक दूसरे की बाहों में समा गए थे। हवेली में उन दोनो के अलावा दूसरा कोई न था। नौकर चाकर दोपहर में अपने अपने कमरों में चले जाते थे। इस लिए इस तन्हाई का भरपूर फायदा उठाया था इन दोनो ने।
शिवा को याद नहीं कि पहले दिन से अब तक वो कितनी बार अपनी माॅ को भोग चुका था। उसे तो बस इतना समझ आ रहा था कि उसका अभी दिल नहीं भरा है। ये सोच कर वो फिर से अपनी माॅ पर चढ़ जाता और अलग अलग पोजीशन में अपनी माॅ को रौंदता रहता। प्रतिमा को भी जवान मर्द का ये जोश बहुत मज़ा दे रहा था। इस लिए वो खुद भी उसी जोश से अपने बेटे का पूरी तरह से साथ देती थी।
"ऐसे क्या देख रहे हो शिव?" अपने सामने प्रतिमा अपने बेटे को ऐसे ही संबोधित करने लगी थी, बोली___"क्या दिल नहीं भरा अभी?"
"हाॅ मेरी रंडी माॅ।" शिवा ने अपने लंड को ज़ोर से मसलते हुए कहा___"तुमको जितना भी पेलूॅ उतना ही लगता है कि अभी और पेलूॅ। कसम से आज तक जितनी लड़कियों को अपने नीचे सुलाया है उन सभी में से तुम सबसे ऊपर हो। तुम्हारे जैसा जिस्म और तुम्हारे जैसी अदा किसी और में नहीं देखी मैने।"
"कैसे देखते मेरे शिव।
" प्रतिमा ने बड़ी अदा से शिवा के पास आते हुए कहा___"वो सब लड़कियाॅ तुम्हारी माॅ तो नहीं थी न? वो सब तुम्हें एक माॅ जितना प्यार और समर्पण भाव कैसे कर सकती थीं?"
"हाॅ ये बात तो सच कही तुमने।" शिवा ने प्रतिमा के टावेल के छोर को पकड़ कर अपनी तरफ ज़ोर से खींचा तो टावेल प्रतिमा के बदन से अलग होता चला गया और प्रतिमा भी उसी झोंक में शिवा के ऊपर आ गई। जबकि अपने ऊपर प्रतिमा के आते ही शिवा ने कहा___"तुम एक औरत के साथ साथ मेरी माॅ भी तो हो। इसी लिए इतना प्यार और समर्पण है तुममें। तभी तो मेरा दिल बार बार यही कहता है कि एक बार और हो जाए।"
"तो करो न शिव।" प्रतिमा ने कहने के साथ ही झुक कर शिवा के होठों को चूम लिया___"रोंका किसने है तुम्हें? मैं तो खुद भी यही चाहती हूॅ कि तुम मुझे इस हवेली के हर ज़र्रे पर ले जाकर बुरी तरह से प्यार करो। मुझे ऐसे ऐसे तरीके से पेलो कि पूरी हवेली में मेरी चीखें गूॅजने लगें।"
"उफ्फ कितना विल्ड पसंद है तुम्हें?" शिवा ने प्रतिमा की एक छाती को बुरी तरह मसल दिया, बोला___"तुम तो वो चीज़ हो डियर मदर कि तुम्हें एक अकेला मर्द संतुष्ट नहीं कर सकता। तभी तो डैड तुम्हारे लिए अपने साथ साथ एक और मर्द को लेकर आते थे। क्या नाम था उसका? अरे हाॅ सक्सेना.... हाय रे वो साला कैसे कैसे मेरी इस राॅड माॅम को पेलता रहा होगा।"
"क्यों जलन हो रही है तुम्हें??" प्रतिमा ने सहसा मुस्कुरा कर पूछा।
"जलन किस बात की डियर मदर?" शिवा ने कहा__"ये तो तुम्हारी ख्वाहिशों की बात है। सबको अपनी ख्वाहिशें पूरा करना चाहिए। तुमने भी वही किया, सो मुझे इसमें जलने की क्या ज़रूरत है?"
"मतलब मुझे अगर बाहर का कोई भी आदमी पेले तो तुम्हें कोई परेशानी नहीं है??" प्रतिमा ने कहा।
"जब डैड को ही कोई परेशानी नहीं हुई तो मुझे क्यों होगी भला?" शिवा ने कहा___"ख़ैर छोंड़ो इन बातों को और आओ एक बार और घमासान पेलाई हो जाए।"
"क्यों नहीं शिव।" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा__"मुझे भी एक बार और करने की इच्छा है।"
कहने के साथ ही प्रतिमा ने अपने एक हाॅथ को सरका कर नीचे शिवा के मुरझाए हुए लंड को पकड़ लिया और उसे सहलाने लगी। इधर शिवा ने भी प्रतिमा की छातियों को हाथों से पकड़ कर मसलने लगा। अभी ये सब ये दोनो कर ही रहे थे कि बगल से एक स्टूल पर रखे फोन की घंटी बज उठी। फोन के बज उठने से दोनो के ही चेहरे पर अप्रिय भाव उभरे।
"हैलो।" फोन उठाते ही शिवा ने कहा।
".........।" उधर से कुछ कहा गया।
"क्याऽऽऽ???" शिवा अपने डैड की बात सुन कर बुरी तरह चौंका था।
".........।" उधर से फिर कुछ कहा गया।
"ऐसा कैसे हो सकता है डैड?" शिवा के चेहरे पर परेशानी के भाव उभर आए, बोला___"कहीं ऐसा तो नहीं कि दीदी को उसका पता चल गया हो और फिर उन्होंने उसे अपने रास्ते से हटा दिया हो? अगर ऐसा कर भी दिया होगा तो हम उन पर शक तो कर सकते हैं मगर उनके सामने उन पर इस बात का इल्ज़ाम नहीं लगा सकते।"
"..........।" उधर से कुछ देर तक कहा गया।
"ऐसा कब तक चलेगा डैड?" शिवा के चेहरे पर सहसा गुस्से के भाव आए___"हर बार हमारे हाथ नाकामी ही लगती है। हमें अब खुद मैदान में उतरना पड़ेगा। इस तरह तो हमारा एक एक आदमी लापता होता रहेगा और हम कुछ कर ही नहीं पाएॅगे। इस लिए हमें सीरियसली ये सब खुद ही करना पड़ेगा। रितू दीदी की गतिविधियाॅ स्पष्ट समझ में आ रही हैं कि वो हमारे खिलाफ़ हैं। अगर विराज से वो मिल चुकी हैं तो साफ है कि उन्हें हमारे बारे में सब कुछ पता चल गया होगा और अब वो उस कमीने विराज का साथ दे रही हैं। हाॅ डैड, दीदी भले ही आपकी बेटी हैं मगर बात जब अन्याय और जुर्म की आएगी तो वो हमारा साथ नहीं देंगी। ये उनके कैरेक्टर से साफ पता चलता है।"
"......।" उधर से फिर कुछ कहा गया।
"यस डैड।" शिवा कह उठा___"अब तो साफ साफ और खुल कर खेल होना चाहिए।"
".........।" उधर से अजय सिंह ने कुछ कहा।
"ओके डैड।" शिवा ने कहा___"आप आ जाइये। मैं और माॅम हवेली में ही हैं।"
इसके साथ ही संबंध विच्छेद हो गया। शिवा ने रिसीवर को केड्रिल पर रखा और धम्म से बेड पर चित्त लेट गया। प्रतिमा उसी को एकटक देखे जा रही थी।
"क्या बात हुई डैड से?" प्रतिमा ने पूछा।
"डैड बता रहे थे कि उन्होंने जिस आदमी को दीदी के पीछे लगाया था।" शिवा ने कहा___"उस आदमी का फोन काफी देर से बंद बता रहा है।"
"क्याऽऽ???" प्रतिमा हैरान____"इसका मतलब हमारा ये आदमी भी बली का बकरा साबित हो गया।"
"ये सब आपकी बेटी की वजह से हो रहा है माॅम।" शिवा ने कठोर भाव से कहा___"उसी ने हमारे उस आदमी का गेम बजाया होगा। उसे पता है कि अगर वो ऐसा करेगी तो हम उस पर बेवजह और बिना सबूत के कोई इल्ज़ाम नहीं लगा सकेंगे। मगर अब हम भी बताएॅगे उसे कि हमसे गद्दारी करने का क्या अंजाम होता है? डैड ने भी यही कहा है कि ये काम रितू दीदी का ही है और अब डैड ने भी फैंसला कर लिया है कि वो खुद इस सब का पता करेंगे और दीदी को उनके किये की सज़ा देंगे।"
"उफ्फ क्या करूॅ इस लड़की का?" प्रतिमा ने कसमसाते हुए अपने माॅथे पर हथेली मारी___"अपने ही माॅ बाप को गर्त में डुबाने पर तुली हुई है ये।"
"अब आपकी उस बेटी के साथ कोई रियायत नहीं होगी माॅम।" शिवा ने गुस्से से कहा___"अभी तक यही सोच कर हमने उस पर कोई कठोर क़दम नहीं उठाया था कि चलो कोई बात नहीं हमारी अपनी है वो, मगर अब नहीं। उसने हमसे बगावत की है माॅम। अपने ही माॅ बाप का सर्वनाश करने पर तुली हुई है वो। इस लिए अब उसे उसके इस जघन्य अपराध की शख्त सज़ा मिलेगी।"
प्रतिमा कुछ कह न सकी।
अंदर ही अंदर काॅप कर रह गई वो। उसे अपनी बेटी के लिए दुख तो हुआ था किन्तु उसे भी इस बात का एहसास था कि उसकी बेटी ने अपने पैरेंट्स के खिलाफ़ जा कर ग़लत किया है। वो अपने पति और बेटे को अच्छी तरह जानती थी। वो अब किसी भी सूरत में रितू को मुआफ़ करने वाले नहीं थे। उसे खुद भी रितू के इस कृत्य पर गुस्सा आया हुआ था। मगर वो कर भी क्या सकती थी? अब तो बस वो मन ही मन भगवान से प्रार्थना कर सकती थी कि सब कुछ ठीक हो जाए।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
इधर रितू के फार्महाउस पर!
मैं, आदित्य और पवन आपस में बातें ही कर रहे थे कि सहसा कमरे के दरवाजे पर बाहर से नाॅक हुई। पवन ने उठ कर दरवाजा खोला तो देखा बाहर रितू दीदी खड़ी थी। दीदी को देखते ही पवन एक तरफ हट गया तो दीदी अंदर आ गई। मैने दीदी के चेहरे पर हल्का परेशानी के भाव देखे तो चौंका।
"क्या बात है दीदी?" मैंने उनके पास आकर पूछा__"सब ठीक तो है ना?"
"हाॅ सब ठीक है राज।" रितू दीदी ने कहा___"मैं ये कहने आई हूॅ कि तुम सबको अभी यहाॅ से निकलना होगा गुनगुन के लिए। क्योंकि बाद में संभव है कि डैड अपने किसी अन्य आदमियों को यहाॅ रास्तों पर घेरा बंदी के लिए लगा दें। हलाॅकि उन्हें ये पता नहीं है कि तू अभी यहीं है या यहाॅ से जा चुका है। मगर हालात बदल चुके हैं।"
"ये आप क्या कह रही हैं दीदी?" मैने चौंकते हुए कहा__"हालात तो बदले हुए ही थे उसमें अब क्या हो गया है?"
"बहुत कुछ हुआ है मेरे भाई।" रितू दीदी ने कहा___"डैड को मुझ पर पहले से शक था इस लिए आज उन्होंने मेरे पीछे अपना एक आदमी लगाया हुआ था जिसे मैने बीच रास्ते पर ही धर लिया था और फिर उसे बेहोश करके यहाॅ ले आई थी। अब ज़ाहिर सी बात है कि डैड ने अपने आदमी से फोन पर जानकारी प्राप्त करनी चाही होगी मगर जब वो ये जानेंगे कि उनके आदमी का फोन ही बंद है तो उन्हें समझते देर नहीं लगेगी कि मैने उनके आदमी को गिरफ्तार कर लिया है या फिर उसे ठिकाने लगा दिया है। उस सूरत में वो मुझ पर बेहद गुस्सा होंगे और संभव है कि मेरी तलाश में घर से खुद ही निकल लें। अगर उन्होंने ऐसा किया तो समझ लो उनके साथ और भी आदमी होंगे जो यहाॅ के हर रास्तों पर फैल जाएॅगे। ऐसे में तुम लोगों का यहाॅ से गुनगुन के लिए निकलना मुश्किल हो जाएगा। इसी लिए कह रही हूॅ कि तुम सब जितना जल्दी हो सके यहाॅ से फौरन निकलने की तैयारी करो। बाहर मेरी जिप्सी को मिला कर दो गाड़ियाॅ हैं। उन दोनो गाड़ियों में तुम सब आराम से आ जाओगे। लेकिन सामान कुछ भी नहीं जा पाएगा। इस लिए सामान को यहीं छोंड़ देना। सारा सामान यहाॅ सुरक्षित ही रहेगा।"
"आपने तो कह दिया दीदी।" मैने सहसा दुखी भाव से कहा___"कि मैं इन सबको लेकर यहाॅ से चला जाऊॅ। मगर मैं जानता हूॅ कि आज के वक्त में आप कितने बड़े ख़तरे में हैं।
मैं आपको ऐसे अकेले छोंड़ कर कैसे यहाॅ से चला जाऊॅ दीदी? मेरे जाने के बाद अगर आपको कुछ हो गया तो सारी ज़िंदगी मैं अपने आपको माफ़ नहीं कर पाऊॅगा।"
"चुप कर तू।" दीदी ने मुझे ज़बरदस्ती झिड़क दिया, हलाॅकि मैं जानता था कि वो अपने अंदर के जज़्बातों को शख्ती से दबा रही थी, बोली___"जब देखो इमोशनल होता रहता है। अब ज्यादा बोलना नहीं और चुपचाप यहाॅ से सबको लेकर निकल।"
"मैं कहीं नहीं जाऊॅगा आपको अकेला छोंड़ कर।" मेरी ऑखों में ऑसू आ गए।
"तुझे मेरी क़सम है मेरे भाई।" रितू दीदी ने झटके से मेरा हाॅथ पकड़ कर अपने सिर पर रख लिया था___"तू यहाॅ से सबको लेकर अभी इसी वक्त जाएगा। मेरी चिन्ता मत कर। तेरी दीदी कोई इतनी भी गैर मामूली नहीं है जिसे कोई भी ऐरा ग़ैरा हजम कर जाएगा। अरे मैं तेरी बहन हूॅ राज। जिसका भाई इतना प्यार करता हो उसका भगवान भी कुछ न कर सकेंगे। और फिर बस दो दिन की ही तो बात है न मेरे भाई। फिर तो तू आ ही जाएगा न मेरे पास। तू चिन्ता मत कर, मैं खुद को ऐसी जगह छुपा लूॅगी कि तेरे आने से पहले मेरा बाप तो क्या कोई भी माई का लाल मुझे ढूॅढ़ नहीं पाएगा। चल अब तू बेफिक्र होकर जा।"
ये कह कर दीदी एक पल के लिए भी नहीं रुकीं। बल्कि कहने के साथ ही कमरे से बाहर चली गईं। उनके जाने के बाद भी कुछ देर तक मैं भौचक्का सा खड़ा रह गया था। होश तब आया जब आदित्य ने मेरे कंधे पर अपना हाॅथ रख कर हल्के से दबाया।
"चलो दोस्त।" आदित्य ने भारी स्वर में कहा___"यहाॅ से चलने की तैयारी करो। अपनी इस महान दीदी की बात मानो। मैं इतने दिनों से देख रहा हूॅ कि रितू सिर्फ अपने भाई के लिए ही जी रही है। हर वक्त उसे सिर्फ तुम्हारी ही फिक्र रहती है। आज भी वो सिर्फ तुम्हारी और इन सबकी फिक्र की वजह से ही तुम्हें यहाॅ से सीघ्र चलने को कह कर गई है। उसे अपने ऊपर मॅडरा रहे भीषण खतरे की कोई फिक्र नहीं है। मैं तुमसे सिर्फ एक ही बात कहूॅगा दोस्त____और वो ये कि इन सबको मुम्बई में सुरक्षित पहुॅचाने के बाद तुम एक पल के लिए भी वहाॅ नहीं रुकना। बल्कि उल्टे पैर वापस सीधा यहीं आओगे। मैं खुद भी तुम्हारे साथ ही आऊॅगा।"
"आदि मेरे दोस्त।" मैने भावना में बह कर आदित्य को गले से लगा लिया। उसने खुद भी मुझे ज़ोर से कस लिया था।
"कितना ग़लत सोचा करता था मैं रितू दीदी के बारे में।" तभी पवन कह उठा___"हर पल शक की नज़र से देखता था उनको। मगर यहाॅ आकर पता चला कि वो कितनी अच्छी हैं और उनके अंदर तेरे लिए कितना प्यार है। उन्होंने सच का साथ देने के लिए अपने ही माॅ बाप और भाई से हर रिश्ता तोड़ लिया। सच में राज, हमारी रितू दीदी बहुत महान हैं।"
मैने पवन को भी खुद से छुपका लिया। कुछ देर ऐसे ही एक दूसरे के गले लगे रहने के बाद हम तीनो अलग हुए और फ्रेश होने के लिए अपने अपने कमरों में चले गए।
अपने कमरे में पहुॅच कर मैने जगदीश अंकल को फोन लगाया और उनसे कुछ ज़रूरी बातें की। उनको यहाॅ के हालात के बारे में बताया और ये भी बताया कि मैं इन लोगों को मुम्बई पहुॅचा कर वापस आ जाऊॅगा। इस लिए मेरे और आदित्य दोनो के लौटने की टिकट का इंतजाम वो कर देंगें। जगदीश अंकल से मैने ये भी कहा कि इस सबके बारे में वो माॅ को ज़रूर मना लेंगे वरना वो मुझे वापस आने नहीं देंगी।
जगदीश अंकल से बात करने के बाद मैं बाथरूम में फ्रेश होने के लिए चला गया। कुछ ही देर में हम सब बाहर लान में खड़ी जिप्सी में थे। जिप्सी में रितू दीदी के साथ मैं, करुणा चाची, दिव्या और शगुन थे। जबकि दूसरी जीप में शंकर काका जो कि ड्राइविंग शीट पर थे उनके साथ आदित्य, पवन, आशा दीदी और माॅ आदि बैठे थे। सबसे मिल कर और हरिया काका को फार्महाउस की सुरक्षा का कह कर हम सब फार्म हाउस से बाहर निकल पड़े।
फार्महाउस में इस वक्त हरिया काका, बिंदिया, नैना बुआ और हेमराज मामा थे। हेमराज मामा को आज यहीं पर रुकने का कह दिया था करुणा चाची ने। रास्ते में रितू दीदी ने मोबाइल पर फोन लगा कर अपने महकमे में किसी से बात की और कुछ पुलिस के आदमी सादे कपड़ों में उनके आस पास ही रहने के लिए कहा।
दोनो गाड़िया ऑधी तूफान बनी गुनगुन के लिए उड़ी जा रही थी। आस पास हर तरफ हमारी नज़रें भी दौड़ रही थीं। ताकि अगर कहीं बड़े पापा या उनके आदमी हमें दिखें तो हम पहले से ही उनसे निपटने के लिए तैयार हो जाएॅ। लगभग दस मिनट बाद ही दो पुलिस की गाड़ियाॅ हमें नज़र आईं। एक हमारी गाड़ी को ओवरटेक करके हमारे आगे आगे चलने लगी और दूसरी गाड़ी हमारे पीछे पीछे चलने लगी।
आधे घंटे बाद हम सब गुनगुन के रेलवे स्टेशन पहुॅच गए। यहाॅ से मुम्बई जाने के लिए शाम को पाॅच बजे ट्रेन थी। इस वक्त साढ़े तीन बजे थे। रेलवे स्टेशन पहुॅच कर रितू दीदी ने हम सबको वेटिंग रूम में बैठाया और वहीं पर पुलिस के कुछ आदमियों को भी बैठाया। मैं दीदी के पास चुपचाप बैठा था। दीदी एकटक मुझे ही देख रही थी।
"नाराज़ है मुझसे???" दीदी ने मेरे सिर पर हाॅथ फेरते हुए कहा___"चल कोई बात नहीं मेरे भाई। तू कहीं भी रहे बस सलामत रहे तो तेरी हर नाराज़गी भी सह लूॅगी मैं। तू जब लौट के आएगा न तब तुझे मना लूॅगी मैं। फिर देखूॅगी कि तू मुझसे कितनी देर तक नाराज़ रह पाता है? बच्चूलाल मुझे ऐसे वैसे मत समझना तू। मुझे भी नाराज़ भाई को मनाना बहुत अच्छे से आता है। समझे न मेरे प्यारे भाई?"
रितू दीदी की बात पर मुझे अंदर ही अंदर हॅसी तो आई मगर मैने अपने चेहरे पर उन भावों को ज़ाहिर न होने दिया। ऐसे ही बैठे बैठे और इधर उधर की बातों से समय ब्यतीत हो गया और पाॅच बज गए। मुम्बई जाने वाली ट्रेन का एनाउंसमेन्ट होने लगा तो हम सब वेटिंगरूम से बाहर आ गए।
कुछ ही देर में ट्रेन प्लेटफार्म पर आकर खड़ी हो गई। हम सब एसी वाले डिब्बों की तरफ बढ़ चले और कुछ ही देर में हम सब एसी के फर्स्ट क्लास डिब्बे में आ गए। हम सब की शीटें पास पास ही थीं। सबके बैठ जाने के बाद मैं रितू दीदी के साथ बाहर आ गया।
"मैं परसों किसी भी हाल में यहाॅ आ जाऊॅगा दीदी।" बाहर आते ही मैने दीदी से कहा___"आप खुद का बहुत अच्छे से ख़याल रखेंगी। कुछ दिनों के लिए ड्यूटी पर जाना भी बंद कर दीजिएगा। हलाॅकि मैंने भी ऐसा कुछ इंतजाम कर दिया है कि बड़े पापा कुछ कर ही नहीं पाएॅगे।"
"क्या मतलब??" रितू दीदी ने चौंक कर मेरी तरफ देखा___"क्या कर दिया है तूने??"
"बहुत जल्द आपको भी पता चल जाएगा दीदी।" मैने अजीब भाव से कहा___"काफी दिन हो गए हैं बड़े पापा को झटका दिये हुए। इस लिए मैने सोचा कि इस मौके पर उन्हें एक झटका देना बिलकुल उचित और फायदेमंद है। आख़िर मुझे भी तो आपकी फिक्र है दीदी। ऐसे ख़तरे में अकेला छोंड़ कर जा रहा हूॅ, तो कुछ तो आपकी सुरक्षा का इंतजाम कर दूॅ।"
"अरे पर तूने किया क्या है राज?" रितू दीदी ने ना समझने वाले भाव से कहा___"क्या तू मुझे नहीं बता सकता?"
"बता तो सकता हूॅ दीदी।" मैने शरारत से उनकी सुर्ख हो चुकी नाॅक पर हल्के से उॅगली मारते हुए कहा___"मगर ये एक सरप्राइज़ है। इस लिए बता नहीं सकता। मगर डोन्ट वरी कल आपको भी पता चल जाएगा।"
"तू न बहुत बदमाश हो गया है।" रितू दीदी ने तो मेरी नाॅक ही पकड़ ली, बोली___"ख़ैर, देखती हूॅ कल कि तूने क्या शरारत की है मेरे डैड के साथ?"
"यस ऑफकोर्स।" मैं मुस्कुराया और फिर एकाएक ही मैने गंभीरता से कहा___"दीदी एक बार विधी के घर भी हो आइयेगा आप। उस दिन के बाद आज तक नहीं जा पाया हूॅ मैं। जबकि ये मेरा फर्ज़ था कि मैं अपनी पत्नी की हर क्रिया को खुद अपने हाॅथों से करता।"
"तू चिंता मत कर मेरे भाई।" रितू दीदी ने कहा___"मैने सब कुछ कर दिया है। बस ये सब एक बार ठीक हो जाए उसके बाद तू खुद अपने हाॅथों से विधी की अस्थियों को पावन गंगा में विसर्जित कर देना।"
"क्या कहा आपने?" मैं खुशी से चौंकते हुए बोला___"आप ने विधी की अस्थियाॅ एकत्रित कर रखी हैं?"
"हाॅ राज।" रितू दीदी ने कहा___"मैं भला कैसे भूल सकती थी उसे? तेरा बाहर निकलना ख़तरे से खाली नहीं था इस लिए तेरे नाम से मैं खुद ही विधी के घर गई थी और फिर विधी के डैड के साथ उसकी अस्थियाॅ लेने गई थी। विधी की अस्थियों को मैने फार्महाउस में सुरक्षित रखा हुआ है।मैने सोचा था कि जब ये सब फसाद खत्म हो जाएगा तब मैं तुझसे कहूॅगी कि जा राज अपनी विधी की अस्थियों को पवित्र गंगा में बहा दे।"
"ओह दीदी, आप सच में बहुत महान हैं।" कहते हुए मेरी ऑखों में ऑसू आ गए___"आपको मेरी हर चीज़ का कितना ख़याल है।"
"विधी अगर तेरी प्रेमिका या पत्नी थी तो वो मेरी भी तो कुछ लगती थी राज।
" दीदी ने गंभीर भाव से कहा__"मेरे जीवन में उसकी अहमियत बहुत ज्यादा है मेरे भाई। उसी की वजह से मेरा हृदय परिवर्तन हुआ। उसी की वजह से मुझे पता चला कि सच्चा प्यार क्या होता है। उसी ने मुझे बताया कि जिस भाई को मैने कभी देखना तक गवाॅरा नहीं किया था वो वास्तव में कितना अच्छा है। हाॅ राज, विधी ने सब बताया मुझे। उसके बाद जब उसने मुझसे कहा कि उसे एक बार अपने महबूब से मिलना है और उसी की बाहों में अपने जीवन की अंतिम साॅस लेनी है तो उस वक्त मेरा कलेजा दहल गया। मेरे अंदर से किसी ने चीख चीख कर कहा कि देख ले रितू, एक ये है कि अपने प्यार के लिए इसने कितने दुख सहे और खुद को खाक़ में भी मिला दिया और एक तू है कि एक ऐसे भाई को कभी देखना तक पसंद नहीं किया जिसका कहीं कोई दोष ही नहीं था। जिसने तेरे साथ कभी बुरा ही नहीं किया। बल्कि हमेशा इज्ज़त और सम्मान के साथ तुझे दीदी कहते हुए थकता नहीं था। कसम से भाई, उस वक्त मुझे अपनी ग़लतियों का बड़ी शिद्दत से एहसास हुआ और मैने इस सबके बारे में अलग तरह से सोचना शुरू किया। मैने विधी से वादा किया कि उसके महबूब को उसके पास ज़रूर लाऊॅगी। उसके बाद मैने तेरे दोस्तों के बारे में पता किया तो मुझे तेरे गहरे दोस्त के रूप में पवन का पता चला। मैं पवन से मिली और उससे तेरे बारे में पूछा। मगर वो मुझे तेरे बारे में कुछ भी बताने को तैयार ही नहीं हो रहा था। उसे लगता था कि मैं तेरे बारे में इस लिए पूछ रही हूॅ ताकि तेरा पता करके मैं अपने डैड को बता दूॅ कि तू फला स्थान पर है। जब पवन मुझे कुछ भी बताने से इंकार कर दिया तो मैने उसे सारी बातें बताई और खुद उसे विधी के पास ले आई। ये साबित करने के लिए कि मैं जो कुछ भी उससे कह रही थी वो सब सच है और इसके पीछे मेरे अंदर कोई भी बुरी भावना नहीं है। विधी को देखने बाद ही पवन को एहसास हुआ कि मैं सच कह रही हूॅ और तभी उसने तुझसे बात की थी।"
दीदी की बातें सुन कर मैं फिर से पिछली यादों में खो गया था। तभी दीदी की आवाज़ फिर से मेरे कानों में पड़ी___"इस सबकी वजह से ही मुझे लगा कि तू और गौरी चाची इतने भी ग़लत या बुरे नहीं हैं जितना कि बचपन से माॅम डैड ने हम तीनो भाई बहनों को बताया था या सिखाया था। उसके बाद मैने अपने माॅम डैड और भाई पर नज़र रखना शुरू किया तो जल्द ही मुझे सच्चाई का पता चल गया कि वास्तव में बुरा कौन है। बस उसके बाद तो तेरी ये दीदी सिर्फ तेरी ही बहन बन कर रह गई मेरे भाई। मैने अपने माॅम डैड व भाई सबसे रिश्ता तोड़ दिया। ऐसे रिश्तों से नाता जोड़े रखने का मतलब भी क्या था जिन रिश्तों में वासना और हवस के सिवा कुछ था ही नहीं।"
मैने रितू दीदी को अपने सीने से लगा लिया। वो बुरी तरह भावनाओं और जज़्बातों में बहने लगी थी जिसकी वजह से उनकी ऑखों से ऑसू बहने लगे थे।
एसी के उस डिब्बे के पास ही हम दोनो भाई बहन एक दूसरे से गले लगे हुए थे। आस पास से आते जाते लोग हमें अजीब भाव से देखने लगे थे। ये देख कर मैने दीदी को खुद से अलग अलग किया और उन्हें लेकर डिब्बे के अंदर आ गया।
रितू दीदी एक बार फिर सबसे मिली और फिर ट्रेन के चलते ही वो ट्रेन से उतरने के लिए बाहर की तरफ जाने लगीं। मैं भी उनके पीछे पीछे गेट तक आ गया। गेट के पास पहुॅच कर जब दीदी ट्रेन से उतरने लगी तो मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी कोई अनमोल चीज़ मुझसे छूटने वाली है। मैने हौले से दीदी को दीदी कह कर आवाज़ दी तो वो तुरंत मेरी तरफ पलटीं, जैसे उन्हें मेरे पुकारने का ही इन्तज़ार था। जब पलट कर उन्होंने मेरी तरफ देखा तो ये देख कर मेरा दिल बैठ गया कि उनका चेहरा ऑसुओं से तर था। मैने उन्हें खींच कर खुद से छुपका लिया, वो खुद भी मुझसे कस कर लिपट गई। लेकिन तुरंत ही वो मुझसे अलग भी हो गईं।
"अब तू जा राज।" फिर उन्होने खुद को सम्हालते हुए कहा___"सबका ख़याल रखना। मैं तेरे आने का इंतज़ार करूॅगी और हाॅ गुड़िया को मेरा प्यार देना।"
"आप भी अपना ख़याल रखियेगा।" मैने कहा___"और अब आप सीधा फार्महाउस जाएॅगी। दो दिन के लिए ड्यूटी से छुट्टी ले लीजिएगा। मैं जब आऊॅ तो आपको फार्महाउस पर ही हॅसते मुस्कुराते हुए पाऊॅ।"
"मेरी मुस्कुराहट तो तू ही है मेरे भाई।" रितू दीदी ने मेरे चेहरे को सहलाया___"जब तू आ जाएगा न तो मेरा ये चेहरा अपने आप ही खिल उठेगा।"
मैं उनकी इस बात पर हौले से मुस्कुराया और फिर झुक कर उनके माथे पर हल्के से चूम लिया। मेरी इस क्रिया से वो भी मुस्कुरा दी और फिर मेरे गाल पर हलके से चूम कर वो सावधानी से धीरे धीरे चल रही ट्रेन से उतर गईं। मैं गेट पर खड़ा उन्हें तब तक देखता रहा जब तक कि आगे मोड़ आ जाने की वजह से दीदी मेरी नज़रों से ओझल न हो गईं। उनके ओझल होते ही मैं दरवाजे से पीछे की तरफ हटकर वहीं पर ट्रेन के उस डिब्बे की पिछली पुश्त से टेक लगाये हुए ऑखें बंद कर खड़ा हो गया। कुछ देर यूॅ ही खड़े रहने के बाद मैंने एक गहरी साॅस ली और फिर मैं अंदर अपनी शीट की तरफ आ गया।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
विराज के ओझल होते ही रितू प्लेटफार्म से बाहर की तरफ तेज़ तेज़ क़दमों के साथ बढ़ती चली गई। दिलो दिमाग़ में ज़बरदस्त तूफान तारी हो गया था उसके। दिल में भड़कते हुए जज़्बात उसके काबू से बाहर होने लगे थे जिसकी वजह से उसकी रुलाई फूटने को आतुर थी। मगर बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला हुआ था। स्टेशन से बाहर आते ही वो अपनी जिप्सी की तरफ बढ़ गई। जिप्सी के पास ही एक और जीप थी जिसमें शंकर काका बैठे हुए थे। रितू ने शंकर काका को वापस लौटने का कह दिया।
पुलिस के जो आदमी आगे पीछे आए थे उनमें से एक जीप वाले पुलिस वालों को रितू ने शंकर के साथ जाने का कह दिया जबकि दूसरे जीप वालों को अपने आस पास ही रहने को कहा।
शंकर काका के जाने के बाद रितू ने भी जिप्सी को आगे बढ़ा दिया। किन्तु उसकी जिप्सी का रुख हल्दीपुर की तरफ न होकर किसी और ही तरफ था। उसके पीछे कुछ ही फाॅसले पर एक अलग गाड़ी में दूसरे पुलिस वाले भी थे जो सादे कपड़ों में थे। लगभग दस मिनट बाद रितू ने जिस जगह पर जिप्सी को रोंका उसके पास ही एक "जिम" था।
जिम के बाहर कुछ ही दूरी के फाॅसले पर उसने अपनी जिप्सी को खड़ी कर वो नीचे उतरी और पास ही एक दुकान के पास जाकर उसने दुकान से मिनरल वाटर का एक बाटल खरीदा और वापस आकर जिप्सी में बैठ गई। अपनी बाईं कलाई पर बॅधी रिस्टवाच पर उसने एक नज़र डाली। शाम के पाॅच बज कर बीस मिनट हो रहे थे।
जिप्सी में बैठी रितू थोड़ी थोड़ी देर के अंतराल में बाटल से पानी पीती रही। उसकी नज़र जिम के मुख्य दरवाजे पर थी। मतलब साफ था कि वो किसी ऐसे ब्यक्ति का इन्तज़ार कर रही थी जो उस जिम से बाहर आने वाला था। कुछ देर और गुज़रने के बाद एक बार फिर से रितू ने अपनी कलाई पर बॅधी रिस्टवाॅच में नज़र डाली। पाॅच बज कर तीस मिनट हो चुके थे। उसके पीछे कुछ ही दूरी पर दूसरी गाड़ी में बैठे दूसरे पुलिस वाले रितू की तरफ ना समझने वाले भाव से देखे जा रहे थे।
उस वक्त रितू के होठों पर अजीब सी मुस्कान उभरी जिस वक्त जिम के मुख्य द्वार से कुछ लड़के और लड़कियाॅ बाहर निकले। रितू की नज़र एक ऐसी लड़की पर स्थिर हो गई जिसके खूबसूरत बदन पर इस वक्त जिम वाले कपड़े थे। एकदम चुस्त दुरुस्त। उसको देख कर ही लग रहा था कि इसकी ऊम्र अट्ठारह या बीस से ज्यादा नहीं होगी।
रितू ने देखा कि वो लड़की जिम से निकलने के बाद पार्किंग एरिया की तरफ बढ़ गई है। कुछ ही देर में वो लड़की एक नई नवेली स्कूटी में पार्किंग से बाहर आती हुई दिखी और फिर रितू की ऑखों के सामने से ही वो दाहिने तरफ के रास्ते की तरफ सरपट जाती हुई नज़र आई। उसके जाते ही रितू ने जिप्सी को स्टार्ट किया और उस लड़की के पीछे चल पड़ी। उसके पीछे दूसरी गाड़ी में बैठे बाॅकी के पुलिस वाले भी बढ़ चले।
मेन मार्केट से निकलने के बाद रितू ने देखा कि सामने जा रही वो लड़की एक मोड़ पर मुड़ गई है। रितू ने भी जिप्सी को उस मोड़ पर मोड़ दिया। रितू की नज़र बराबर उस लड़की पर थी। सामने एक अधेड़ सा आदमी इस तरफ अचानक ही आता दिखा। शायद किसी दुकान या किसी घर से निकला था वो। उसके दोनो हाॅथों में एक एक ब्लैक कलर की प्वालिथिन थी। वो अधेड़ आदमी अपनी साइड की तरफ आने के लिए पहले पीछे की तरफ देखा और फिर रोड क्राॅस करने के लिए जैसे ही आगे बढ़ा वैसे ही वो उस लड़की की स्कूटी से टकरा गया।
रितू ने साफ तौर पर देखा था कि अधेड़ ब्यक्ति के पास पहुॅचते पहुॅचते उस लड़की ने स्कूटी की रफ्तार को काफी कम कर लिया था मगर कदाचित उसका ध्यान कहीं और था इस लिए हड़बड़ाहट में उसे समझ ही न आया कि वो अब क्या करे? जितना उससे हो सकता था उतना उसने किया था। किन्तु अब वो इसका क्या करती कि लाख कोशिशों के बाद भी उसकी स्कूटी उस अधेड़ ब्यक्ति के जिस्म से छू ही गई थी। जिसका परिणाम ये हुआ कि वो अधेड़ ब्यक्ति बीच सड़क पर भरभरा कर गिर गया था। उसके दोनो हाॅथों पर मौजूद प्वालीथिन छूट गई थी और पक्की सड़क पर गिरते ही प्वालीथिन के अंदर मौजूद सामान फूट गया था। प्वालीथिन में दवाई की बोतलें थी जो फूट गईं थी और अब सारी दवा सड़क पर फैलती जा रही थी।
अधेड़ के गिरते ही उस लड़की ने पहले स्कूटी को खड़ी किया उसके बाद वो एकदम से पैर पटकते हुए उस अधेड़ के सिर पर आ धमकी।
"देख कर नहीं चल सकते थे तुम?" फिर उसकी करकस आवाज़ वातावरण में गूॅजी___"अभी मर जाते तो क्या करते फिर? सड़क को क्या अपने बाप की जागीर समझ रखा है जो जहाॅ से चाहे चल सकते हो?"
लड़की अनाप शनाप बोलने में लगी ही थी कि आस पास से कई सारे लोग आकर वहाॅ पर इकट्ठा हो गए। सब एक दूसरे से पूछने लगे कि क्या हुआ??? सड़क पर गिरा हुआ वो अधेड़ आदमी किसी तरह उठा और कुछ ही दूरी पर अपनी दवाईयों का हाल देख कर उसके चेहरे पर बेहद पीड़ा के भाव उभर आए। उसने सिर उठा कर अपने चारों तरफ करुण भाव से देखा और फिर उसकी नज़र उस लड़की पर पड़ी जो उसके सिर पर आ धमकी थी।
"लगता है इस लड़की ने इस अधेड़ ब्यक्ति को अपनी स्कूटी से टक्कर मारी है।" आस पास खड़े लोगों के बीच से एक आदमी ने कहा___"देखो तो बेचारे की सारी दवाइयाॅ सड़क पर फूट कर फैल गई हैं।"
"आज कल तो सड़क पर चलना भी दूभर हो गया है भाई।" एक अन्य ब्यक्ति ने तंज कसा___"मोटर साइकिल और गाड़ी वाले आम आदमी को जब देखो तब टक्कर मार देते हैं और उल्टा उसी पर चढ़ दौड़ते हैं। देख रहे हो न इस लड़की को। इसने इस बेचारे बूढ़े आदमी को टक्कर मार दी और अब उल्टा इसे ही डाॅट रही है।"
"ऐ मिस्टर।" लड़की ये सुनते ही उस आदमी की तरफ पलटी___"इसमें मेरी कोई ग़लती नहीं है समझे। ये बुड्ढा खुद ही मरने के लिए मेरी स्कूटी के सामने आया था। वो तो अच्छा हुआ कि मैने टाइम पर ब्रेक मार दिया वरना इसका तो यहीं पर राम नाम सत्य हो जाना था आज।"
"अरे देखो तो कैसे बात कर रही है ये लड़की?" एक अन्य ने कहा___"एक तो खुद ही टक्कर मारी इसने और ऊपर से इस बूढ़े आदमी का दोष लगा रही है ये।"
"बड़े बाप की लगती है भाई।" एक दूसरे ने कहा__"बड़े बाप की बेटी है तभी इतना तीखा बोलती है। तमीज़ नाम की तो कोई बात ही नहीं है इसमें।
"
"हाऊ डेयर यू टाक टु मी लाइक दिस?" लड़की ने गुस्से से चिल्लाते हुए कहा___"तुम्हें पता है कि तुम किससे बात कर रहे हो? अगर जान जाओगे न तो यहीं पर खड़े खड़े पेशाब कर दोगे समझे। मैं इस शहर के मंत्री की बेटी हूॅ। इस शहर के मंत्री को तो तुम सब अच्छी तरह जानते ही होगे न?"
लड़की के इतना कहते ही आस पास खड़े लोगों को साॅप सा सूॅघ गया। पलक झपकते ही वो सब वहाॅ से इस तरह गायब हो गए जैसे गधे के सिर से सींग गायब हो जाते हैं। उन सबके जाते ही लड़की के होठों पर विजयी मुस्कान उभरी और फिर उसने हिकारत के से भाव से उस अधेड़ की तरफ देखा। सड़क पर बैठा वो अधेड़ अपनी उस दवा की तरफ देख रहा था जो सड़क पर फैल गई थी। उसकी तरफ देख कर लड़की ने "हुॅह" कहा और फिर पलट कर अपनी स्कूटी की तरफ आ गई। स्कूटी को स्टार्ट कर वो आगे बढ़ चली।
ये सब तमाशा देख रितू ने मोबाइल पर किसी से कुछ कहा और लड़की की तरफ तेज़ी से जिप्सी को दौड़ा दिया। उसके चेहरे पर बेहद गुस्से के भाव थे। सीघ्र ही उसकी जिप्सी उस लड़की की स्कूटी के पास आ गई और फिर रितू ने पीछे से टक्कर मार दी उसे। परिणामस्वरूप लड़की और उसकी स्कूटी उछलते हुए सड़क पर गिरे और कुछ दूर तक घिसटते हुए चले गए। फिज़ा में लड़की की चीख़ गूॅज गई थी। यहाॅ पर आस पास कोई दुकान या घर नहीं था। मार्केट एरिया पीछे ही था। हलाॅकि कुछ ही दूरी पर बड़ी बड़ी बिल्डिंग्स दिख रही थी। ज़ाहिर था उन्हीं बड़ी बड़ी बिल्डिंग्स में से किसी एक बिल्डिंग पर इस लड़की का अलीशान घर होगा।
रितू ने जिप्सी को आगे बढ़ा कर लड़की के पास रोंका और उतर कर लड़की के पास गई। लड़की सड़क के बाएॅ साइड उल्टी पड़ी दर्द से कराह रही थी। बड़ी मुश्किल से वो उठ कर बैठी और फिर अपने बदन पर लगी चोटों को देखने लगी।
"देख कर नहीं चल सकती थी क्या?" रितू ने उसी का वाक्य उसी के लहजे में दोहराया____"अभी मर जाती तो क्या करती तुम? सड़क को क्या अपने बाप की जागीर समझ रखा है जो जहाॅ से चाहे चल सकती हो?"
रितू की बात सुनकर उस लड़की ने दर्द से कराहते हुए रितू की तरफ देखा और फिर एकाएक ही उसके चेहरे पर गुस्सा उतर आया। इस हालत में भी वो सड़क पर से किसी स्प्रिंग लगे खिलौने की तरह उछल कर खड़ी हो गई और फिर बिना कुछ बोले ही घूम कर एक फ्लाइंग किक का वार रितू पर कर दिया। मगर उसका ये वार उसे खुद ही भारी पड़ गया। क्योंकि जैसे ही उसने फ्लाइंग किक चलाई वैसे ही झुक कर रितू ने उसकी उस टाॅग पर अपनी टाॅग चला दी थी जो नीचे सड़क पर जमी थी। नतीजा ये हुआ कि जमीन से लड़की का पैर हटते ही उस लड़की का बैलेंस बिगड़ा और वो गुड़ीमुड़ी होकर सड़क पर औंधे मुह गिरी। उसके मुख से दर्द में डूबी चीख़ निकल गई।
"तेरे जैसी दो कौड़ी की फाइटर लड़कियाॅ मेरे पास ट्यूशन लेने आती हैं मूर्ख लड़की।
" रितू ने उसके सिर के बाल अपनी मुट्ठियों में कस कर ऊपर उठाते हुए कहा___"तेरे अंदर अपने हरामी बाप का गंदा खून भरा है न। चल तुझे भी वहीं ले चलती हूॅ जहाॅ तेरा वो हरामी भाई और उसके हरामी दोस्त हैं।"
"मुझे छोंड़ दो वरना इसका अंजाम बहुत बुरा होगा तुम्हारे लिए।" लड़की ने छटपटाते हुए कहा___"तुम्हें पता नहीं है कि तुमने किसकी बेटी पर हाॅथ उठाने की ज़ुर्रत की है?"
"यही, बस यही अकड़ तो निकालनी है तेरी और तेरे बाप की भी।" रितू ने घुटने का वार ज़ोर से लड़की के पेट पर किया तो हिचक कर रह गई वो, जबकि रितू ने उसके बालों को और ज़ोर से खींचते हुए कहा___"बहुत जल्द तुम सबकी ऐसी हालत होने वाली है जिसकी तुम लोगों ने कभी कल्पना भी न की होगी।"
"बहुत पछताओगी तुम?" लड़की ने चीखते हुए कहा___"मेरा बाप तुम्हारा वो हाल करेगा कि तुम अपना चेहरा दुनियाॅ को दिखाने के काबिल नहीं रहोगी।"
"ये तो वक्त ही बताएगा मेरी जान।" रितू ने लड़की की कनपटी के एक खास हिस्से पर अचानक ही कराट मारी थी, जिसका नतीजा ये हुआ कि लड़की बेहोश होती चली गई। जबकि रितू ने कहा___"कि मुह दिखाने के काबिल कौन नहीं रहता।"
रितू ने लड़की के बेहोश जिस्म को उठा कर अपनी जिप्सी में डाला और पिछली शीट के नीचे से एक ब्लैक कलर की बड़ी सी प्लास्टिक की पन्नी निकाल कर उसके ऊपर ऐसे तरीके से डाल दिया कि कोई ये न सोच सके कि उसके नीचे कोई इंसानी जिस्म भी हो सकता है। ये सब करने के बाद रितू पलटी और आस पास का बारीकी से मुआयना किया तो कुछ ही दूरी पर उसे लड़की का मोबाइल पड़ा दिखा। सड़क पर गिरने से मोबाइल की स्क्रीन चटक गई थी। रितू ने किनारे साइड की एक बटन को दबाया तो तुरंत ही स्क्रीन फ्लैश कर उठी। इसका मतलब वो चालू हालत में था अभी। ये देख कर रितू ने मोबाईल का कवर निकाल कर मोबाइल के ढक्कन को खोला और बैटरी निकाल ली। उसके बाद सारी चीज़ें पाॅकेट में डालने के बाद उसने अपने दूसरे पाॅकेट से अपना आई फोन निकाला। उसे याद आया कि उसने आई फोन फार्महाउस पर ही स्विच ऑफ कर दिया था। ये ध्यान आते ही उसके होठों पर एक जानदार मुस्कान उभरी। उसने अपने आईफोन को वापस पाॅकेट में रखा और आकर जिप्सी में बैठ गई। जिप्सी को स्टार्ट कर उसने यूटर्न लिया और वापस चल दी।
मार्केट के पास आते ही उसे दूसरी गाड़ी पर वो पुलिस वाले दिखे। उनमें से एक पुलिस वाले ने रितू को बताया कि उसने उस अधेड़ आदमी को दूसरी दवाइयाॅ खरीद कर दे दी हैं। उसकी बात सुन कर रितू आगे बढ़ गई। उसके पीछे दूसरे पुलिस वाले भी अपनी गाड़ी में चल पड़े। उनकी नज़र रितू की जिप्सी पर थोड़ा सा फैली हुई उस ब्लैक कलर की प्लास्टिक की पन्नी पर पड़ी जिसके नीचे रितू ने उस लड़की को छुपा दिया था। किन्तु उन लोगों ने इस पर ज्यादा ध्यान न दिया।
उनको अपने आला अफसर का आदेश था कि इंस्पेक्टर रितू के आस पास ही रहना है और उसकी किसी भी गतिविधी पर कोई सवाल जवाब नहीं करना है।
रितू की जिप्सी ऑधी तूफान बनी हल्दीपुर की तरफ बढ़ी चली जा रही थी। उसके पीछे ही दूसरी गाड़ी पर वो पुलिस वाले भी थे। रितू को अंदेशा था कि हल्दीपुर के पास वाले रास्तों पर कहीं उसका बाप या उसके आदमी मिल न जाएॅ मगर हल्दीपुर के उस पुल तक तो कोई नहीं मिला था। पुल से दाहिने साइड जिप्सी को मोड़ कर रितू फार्महाउस की तरफ बढ़ चली। कुछ दूरी पर आकर रितू ने जिप्सी को रोंक दिया। कुछ ही पलों में उसके पीछे वाली गाड़ी भी उसके पास आकर रुक गई।
"अब आप सब यहाॅ से वापस लौट जाइये।" रितू ने एक पुलिस वाले की तरफ देख कर कहा___"आज का काम इतना ही था। अगर ज़रूरत पड़ी तो वायरलेस या फोन द्वारा सूचित कर दिया जाएगा।"
"ओके मैडम।" एक पुलिस वाले ने कहा___"जैसा आप कहें। जय हिन्द।"
उन सबने रितू को सैल्यूट किया और फिर अपनी गाड़ी को वापस मोड़ कर वहाॅ से चले गए। उनके जाते ही रितू ने भी अपनी जिप्सी को फार्महाउस की तरफ बढ़ा दिया। आने वाला समय अपनी आस्तीन में क्या छुपा कर लाने वाला था ये किसी को पता न था।"
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दोस्तों, अपडेट हाज़िर है,,,,,,,,
आशा करता हूॅ कि आप सबको ये अपडेट पसंद आएगा। आप सबकी प्रतिक्रिया और खूबसूरत से रिव्यू का इन्तज़ार रहेगा।
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.........《 49 》
अब तक,,,,,,,
मार्केट के पास आते ही उसे दूसरी गाड़ी पर वो पुलिस वाले दिखे। उनमें से एक पुलिस वाले ने रितू को बताया कि उसने उस अधेड़ आदमी को दूसरी दवाइयाॅ खरीद कर दे दी हैं। उसकी बात सुन कर रितू आगे बढ़ गई। उसके पीछे दूसरे पुलिस वाले भी अपनी गाड़ी में चल पड़े। उनकी नज़र रितू की जिप्सी पर थोड़ा सा फैली हुई उस ब्लैक कलर की प्लास्टिक की पन्नी पर पड़ी जिसके नीचे रितू ने उस लड़की को छुपा दिया था। किन्तु उन लोगों ने इस पर ज्यादा ध्यान न दिया। उनको अपने आला अफसर का आदेश था कि इंस्पेक्टर रितू के आस पास ही रहना है और उसकी किसी भी गतिविधी पर कोई सवाल जवाब नहीं करना है।
रितू की जिप्सी ऑधी तूफान बनी हल्दीपुर की तरफ बढ़ी चली जा रही थी। उसके पीछे ही दूसरी गाड़ी पर वो पुलिस वाले भी थे। रितू को अंदेशा था कि हल्दीपुर के पास वाले रास्तों पर कहीं उसका बाप या उसके आदमी मिल न जाएॅ मगर हल्दीपुर के उस पुल तक तो कोई नहीं मिला था। पुल से दाहिने साइड जिप्सी को मोड़ कर रितू फार्महाउस की तरफ बढ़ चली। कुछ दूरी पर आकर रितू ने जिप्सी को रोंक दिया। कुछ ही पलों में उसके पीछे वाली गाड़ी भी उसके पास आकर रुक गई।
"अब आप सब यहाॅ से वापस लौट जाइये।" रितू ने एक पुलिस वाले की तरफ देख कर कहा___"आज का काम इतना ही था। अगर ज़रूरत पड़ी तो वायरलेस या फोन द्वारा सूचित कर दिया जाएगा।"
"ओके मैडम।
" एक पुलिस वाले ने कहा___"जैसा आप कहें। जय हिन्द।"
उन सबने रितू को सैल्यूट किया और फिर अपनी गाड़ी को वापस मोड़ कर वहाॅ से चले गए। उनके जाते ही रितू ने भी अपनी जिप्सी को फार्महाउस की तरफ बढ़ा दिया। आने वाला समय अपनी आस्तीन में क्या छुपा कर लाने वाला था ये किसी को पता न था।"
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,
उधर एक तरफ!
एक लम्बे चौड़े हाल के बीचो बीच एक बड़ी सी टेबल के चारो तरफ कुर्सियाॅ लगी हुई थी। उन सभी कुर्सियों पर इस वक्त कई सारे अजनबी चेहरे बैठे दिख रहे थे। सामने फ्रंट की मुख्य कुर्सी खाली थी। हर शख्स के सामने मिनरल वाटर से भरे हुए काॅच के ग्लास रखे हुए थे। लम्बे चौड़े हाल में इस वक्त ब्लेड की धार की मानिन्द पैना सन्नाटा फैला हुआ था। वो सब अजनबी चेहरे ऐसे थे जिन्हें देख कर ही प्रतीत हो रहा था कि ये सब किसी न किसी अपराध की दुनियाॅ ताल्लुक ज़रूर रखते हैं। उन अजनबी चेहरों के बीच ही कुछ ऐसे भी चेहरे थे जो शक्ल सूरत से विदेशी नज़र आ रहे थे।
"और तो सब ठीक ही है।" उनमें से एक ने हाल में फैले हुए सन्नाटे को भेदते हुए कहा___"मगर ठाकुर साहब का हमसे इस तरह इन्तज़ार करवाना बिलकुल भी पसंद नहीं आता। हर बार यही होता है कि हम सब टाइम से कान्फ्रेन्स हाल में मीटिंग के लिए आ जाते हैं मगर ठाकुर साहब तो ठाकुर साहब हैं। हर बार निर्धारित समय से आधा घंटे लेट ही आते हैं।"
"अब इसमें हम क्या कर सकते हैं कमलनाथ जी?" एक अन्य ब्यक्ति ने मानो असहाय भाव से कहा___"वो ठाकुर साहब हैं। शायद हमसे इस तरह इन्तज़ार करवाने में वो अपनी शान समझते हैं। हलाॅकि ऐसा होना नहीं चाहिए, क्योंकि यहाॅ पर कोई भी किसी से कम नहीं है। हम सबको एक दूसरे का बराबर आदर व सम्मान करना चाहिए। मगर ये बात ठाकुर साहब से कौन कहे?"
"यस यू आर अब्सोल्यूटली राइट मिस्टर पाटिल।" सहसा एक विदेशी कह उठा___"हमको भी ठाकुर का इस तरह वेट करवाना पसंद नहीं आता हाय। वो क्या समझता हाय कि हम लोगों की कोई औकात नहीं हाय? अरे हम चाहूॅ तो अभी इसी वक्त ठाकुर को खरीद सकता हाय। बट हम भी इसी लिए चुप रहता हाय कि तुम सब भी चुप रहता हाय।"
"इट्स ओके मिस्टर लारेन।" पाटिल ने कहा___"ये आख़िरी बार है। आज ठाकुर से हम सब इस बारे में एक साथ चर्चा करेंगे और उनसे कहेंगे कि हम सबकी तरह वो भी टाइम पर मीटिंग हाल में आया करें। इस तरह हमसे वेट करवा कर हमारी तौहीन करने का उन्हें कोई हक़ नहीं है। अगर आप मेरी इस बात से सहमत हैं तो प्लीज जवाब दीजिए।"
पाटिल की इस बात पर सबने अपनी प्रतिक्रिया दी। जो कि पाटिल की बातों पर सहमति के रूप में ही थी। कुछ देर और समय बीतने के बाद तभी हाल में अजय सिंह दाखिल हुआ और मुख्य कुर्सी पर आकर बैठ गया। उसने सबकी तरफ देख कर बड़े रौबीले अंदाज़ से हैलो किया।
उसकी इस हैलो का जवाब सबने इस तरह दिया जैसे बग़ैर मन के रहे हों। इस बात को खुद अजय सिंह ने भी महसूस किया।
"साॅरी फ्रैण्ड्स हमें आने में ज़रा देर हो गई।" अजय सिंह ने बनावटी खेद प्रकट करते हुए कहा___"आई होप आप सब इस बात से डिस्टर्ब नहीं हुए होंगे। एनीवेज़....
"ठाकुर साहब दिस इज टू मच।" एक अन्य ब्यक्ति कह उठा___"आप हर बार ऐसा ही करते हैं और फिर बाद में ये कह देते हैं कि साॅरी फ्रैण्ड्स हमें आने में ज़रा देर हो गई। आप हर बार लेट आकर हम सबकी तौहीन करते हैं। हम सब आधा घंटे तक आपके आने का वेट करते रहते हैं। आपको क्या लगता है कि हम लोगों के पास दूसरा कोई काम ही नहीं है? हम सब भी अपने अपने कामों में ब्यस्त रहते हैं मगर टाइम से कहीं भी पहुॅचने के लिए समय पहले से ही निकाल लेते हैं। इस बिजनेस में हम सब बराबर हैं। यहाॅ कोई छोटा बड़ा नहीं है। हम सबने आपको मेन कुर्सी पर बैठने का अधिकार अपनी खुशी से दिया था। मगर इसका मतलब ये नहीं कि आप उसका नाजायज़ मतलब निकाल लें। हम सबने डिसाइड कर लिया है कि अगर आपका रवैया ऐसा ही रहा तो हम सब आपसे बिजनेस का अपना अपना हिस्सा वापस ले लेंगे। दैट्स आल।"
उस ब्यक्ति की ये सारी बातें सुन कर अजय सिंह अंदर ही अंदर बुरी तरह तिलमिला कर रह गया था। ये सच था कि हर बार वो इन सबसे इन्तज़ार करवा कर यही जताता था कि उसके सामने इन लोगों की कोई अहमियत नहीं है। बल्कि वो इन सबसे ज्यादा अहमियत रखता है। आज तक इस बिजनेस से जुड़े ये सब लोग उसकी इस आदत पर कोई सवाल नहीं खड़ा किये थे जिसकी वजह से उसे यही लगता रहा था कि यू सब उसे बहुत ज्यादा इज्ज़त व अहमियत देते हैं और इसी लिए वो ऐसा करता रहा था। मगर आज जैसे इन सबके धैर्य का बाॅध टूट गया था। जिसका नतीजा इस रूप में उसके सामने आया था। उस शख्स की बातों से उसके अहं को ज़बरदस्त चोंट पहुॅची लेकिन वो ये बात अच्छी तरह जानता था कि इस बारे में अगर उसने कुछ उल्टा सीधा बोला तो काम बिगड़ जाने में पल भर की भी देर नहीं लगेगी। इस लिए वो उस शख्स की उन सभी कड़वी बातों को जज़्ब कर गया था।
"आई नो मिस्टर तेवतिया।" अजय सिंह ने कहा__"बट इस सबसे हमारा ये मतलब हर्गिज़ भी नहीं है कि हम आप सबको अपने से छोटा समझते हैं। हम सब फ्रैण्ड्स हैं और हम में से कोई छोटा बड़ा नहीं है। हर बार हम मीटिंग में देर से पहुॅचते हैं इसका हमें यकीनन बेहद अफसोस होता है। मगर क्या करें हो जाता है। मगर हमें ये भी पता होता है कि आप सब हमारी इस ग़लती को नज़रअंदाज़ कर देंगे।"
"इट्स ओके ठाकुर साहब।" कमलनाथ ने कहा__"बट ध्यान रखियेगा कि अगली बार से ऐसा न हो। कभी कभार की बात हो तो समझ में आता है मगर हर बार ऐसा हो तो मूड ख़राब होना स्वाभाविक बात है।"
"यस ऑफकोर्स मिस्टर कमलनाथ।
" अजय सिंह एक बार फिर गुस्से और अपमान का घूॅट पीकर बोला__"अब अगर आप सबकी इजाज़त हो तो काम की बात करें?"
"जी बिलकुल।" पाटिल ने कहा___"
उसके पहले हम ये जानना चाहते हैं कि समय से पहले इस तरह अचानक मीटिंग रखने की क्या वजह थी?"
"आप सबको तो इस बात का पता ही है कि मौजूदा वक्त में हमारे हालात बिलकुल भी ठीक नहीं हैं।" अजय सिंह ने बेबस भाव से कहा___"पिछले कुछ समय से हमारे साथ बेहद गंभीर और बेहद नुकसानदाई घटनाएॅ घट रही हैं। उन घटनाओं के पीछे कौन है ये भी हम पता लगा चुके हैं। इस लिए अब हम चाहते हैं कि आप सब हमारे इस बुरे वक्त में हमारा साथ दें।"
"वैसे तो आप खुद ही सक्षम हैं ठाकुर साहब।" पाटिल ने कहा___"किन्तु इसके बाद भी आप हम सबसे मदद की आशा रखते हैं तो मैं तैयार हूॅ। आख़िर हम सब एक ही तो हैं। हर तरह की मसीबत व परेशानी का एक साथ मिल कर मुकाबला करेंगे तो हर जंग में हमारी फतह होगी।"
"हमें भी आपके इन मौजूदा हालातों का पता है ठाकुर साहब।" एक अन्य ब्यक्ति ने कहा___"इस लिए हम सब आपके साथ हैं। आप हुकुम दें कि हमें क्या करना होगा?"
"आप सब हमारा साथ देने के लिए तैयार हैं इससे बड़ी बात व खुशी और क्या होगी भला? रही बात आपके कुछ करने की तो आप बस हमारे साथ ही बने रहें कुछ समय के लिए या फिर अपने कुछ ऐसे आदमी हमें दीजिए जो हर तरह के फन में माहिर हों।"
"जैसी आपकी इच्छा ठाकुर साहब।" कमलनाथ ने कहा___"हम सब आपके साथ हैं और हमारे ऐसे आदमी भी आपके पास आ जाएॅगे जो हर तरह के फन में माहिर हैं। अब से आपकी परेशानी हमारी परेशानी है। क्यों फ्रैण्ड्स आप सब क्या कहते हैं??"
कमलनाथ के अंतिम वाक्य पर सबने अपनी प्रतिक्रिया सहमति के रूप में दी। ये सब देख कर अजय सिंह अंदर ही अंदर बेहद खुश हो गया था।
"मिस्टर सिंह।" सहसा इस बीच एक विदेशी ने कहा___"पिछली डील अभी तक कम्प्लीट नहीं हुआ। क्या हम जान सकता हाय कि इतना डिले करने का तुम्हारा क्या मतलब हाय? बात थोड़ी बहुत की होती तो हम उसको भूल भी सकता था बट एज यू नो वो सारी चीज़ें लाखों करोड़ों में हाय। सो हाउ कैन आई फारगेट?"
"हम जानते हैं मिस्टर लाॅरेन।" अजय सिंह ने बेचैनी से पहलू बदला___"कि वो सब करोड़ों का सामान है। लेकिन मौजूदा वक्त में हम ऐसी स्थित में नहीं हैं कि आपका पैसा आपको दे सकें। इसके लिए आपको तब तक रुकना पड़ेगा जब तक कि हमारे सिर पर से ये मुसीबत और ये परेशानी न हट जाए। प्लीज़ ट्राई टू अण्डरस्टैण्ड मिस्टर लाॅरेन।"
"ओखे।" लाॅरेन ने कहा___"नो प्राब्लेम हम तुम्हारी हर तरह से मदद करेगा। बट सारी प्राब्लेम फिनिश होने के बाद तुम हमारा पूरा पैसा देगा। इस बात का प्रामिस करना पड़ेगा तुमको।"
"मिस्टर लाॅरेन।
" सहसा कमलनाथ ने कहा___"ये आप कैसी बात कर रहे हैं? आप जानते हैं कि ठाकुर साहब के पास इस समय कितनी गंभीर समस्याएॅ हैं इसके बाद भी आप सिर्फ अपने मतलब की बात कर रहे हैं। जबकि आपको करना तो ये चाहिए था कि आप सब कुछ भूल कर सिर्फ ठाकुर साहब को उनकी समस्याओं से बाहर निकालें।"
"तो हमने कब मना किया इस बात से मिस्टर कमलनाथ?" लाॅरेन ने कहा___"हम कह ओ रहा है कि हम हर तरह से इनकी मदद करेगा।"
"हाॅ लेकिन यहाॅ पर आपको अपने पैसों की बात करना उचित नहीं है न।" कमलनाथ ने कहा___"आपको ये भी तो सोचना चाहिए कि पैसा सिर्फ आपका ही बस बकाया नहीं है ठाकुर साहब के पास, हम सबका भी है। लेकिन हमने तो इनसे पैसों के बारे में कोई बात नहीं की।"
"ओखे आयम साॅरी।" लाॅरेन ने बेचैनी से पहलू बदलते हुए कहा___"सो अब बताइये क्या करना है हम लोगो को?"
"ये तो ठाकुर साहब ही बताएॅगे।" कमलनाथ ने कहा__"कि हम सबको क्या करना होगा?"
"हमने आप सबको पहले ही बता दिया है कि आप सब अपने कुछ ऐसे आदमी हमें दीजिए जो हर तरह के काम में माहिर हों।" अजय सिंह ने कहा___"उसके बाद हम खुद ही तय करेंगे कि हमें उन आदमियों से क्या और कैसे काम लेना है?"
"ठीक है ठाकुर साहब।" पाटिल ने कहा___"हमारे पास जो भी ऐसे आदमी हैं। उन सबको आपके पास भेज देंगे।"
"ओह थैक्यू सो मच टू आल ऑफ यू डियर फ्रैण्ड्स।" अजय सिंह ने खुश होकर कहा___"और हाॅ, हम आप सबसे वादा करते हैं कि इस सबसे निपट लेने के बाद हम बहुत जल्द आप सबके पैसों का हिसाब किताब कर देंगे।"
अजय सिंह की इस बात के साथ ही मीटिंग खत्म हो गई। सबने अजय सिंह को अपने आदमी भेजने का कहा और फिर सब एक एक करके मीटिंग हाल से बाहर की तरफ चले गए। सबके जाने के बाद अजय सिंह भी बाहर की तरफ निकल गया। बाहर पार्किंग में खड़ी अपनी कार में बैठ कर अजय सिंह घर की तरफ निकल गया।
कुछ ही समय में अजय सिंह हवेली पहुॅच गया। अंदर ड्राइंगरूम में रखे सोफों पर प्रतिमा और शिवा बैठे थे। अजय सिंह भी वहीं रखे एक सोफे पर बैठ गया। उसने प्रतिमा को चाय बनाने का कहा तो प्रतिमा रसोई की तरफ बढ़ गई। जबकि अजय सिंह ने गले पर कसी टाई को ढीला कर आराम से सोफे की पिछली पुश्त से पीठ टिका कर लगभग लेट सा गया।
शिवा को समझ न आया कि अपने बाप से बातों का सिलसिला कैसे और कहाॅ से शुरू करे? ऐसा कदाचित इस लिए था क्योंकि आज सारा दिन उसने अपनी माॅ के साथ मौज मस्ती की थी। इस बात के कारण कहीं न कहीं हल्की सी झिझक उसके अंदर मौजूद थी।
"आप इतना लेट कैसे हो गए डैड?" आख़िर शिवा ने बात शुरू कर ही दी, बोला___"आपने तो कहा था कि जल्दी आ रहा हूॅ?"
"एक ज़रूरी मीटिंग में ब्यस्त हो गया था बेटे।" अजय सिंह ने उसी हालत में कहा___"कल से हमारे पास कुछ ऐसे आदमी होंगे जो हर तरह के काम में माहिर होंगे।
अब मैं भी देखूॅगा कि वो हरामज़ादा विराज और रितू कैसे उन आदमियों को ठिकाने लगाते हैं?"
"ऐसे वो कौन से आदमी हैं डैड?" शिवा ने ना समझने वाले भाव से कहा___"क्या आप अभी भी ऐसे किन्हीं आदमियों पर ही भरोसा करेंगे? जबकि पालतू आदमियों का क्या हस्र हुआ है ये आपको बताने की ज़रूरत नहीं है।"
"हमारे आदमी दिमाग़ से पूरी तरह पैदल थे बेटे।" अजय सिंह ने कहा___"वो सब अपने शारीरिक बल को महत्व देते थे तभी तो मात खा गए। उन्होंने ये कभी सोचा ही नहीं कि शरीरिक बल से कहीं ज्यादा दिमाग़ी बल कारगर होता है। ख़ैर, अब जो आदमी यहाॅ आएॅगे वो सब खलीफ़ा लोग होंगे। जो हर वक्त हर तरह के ख़तरे वाले कामों को ही अंजाम देते हैं। दूसरी बात ये है कि रितू एक आम लड़की नहीं है जिसे कोई भी ऐरा गैरा ब्यक्ति आसानी से पकड़ लेगा, बल्कि वो एक पुलिस वाली भी है। जिसके पास सारा पुलिस डिपार्टमेन्ट भी है। ऐसे में अगर हम खुद उस पर हाॅथ डालेंगे तो वो हमें कानून की चपेट में डाल सकती है। इस लिए हमने सोचा है कि हम पहले ऐसे आदमियों के द्वारा उसे पकड़ लें कि जिनसे वो आसानी से मुकाबला भी न कर सके। मुकाबले से मेरा मतलब ये है कि मेरे वो आदमी उसे ऐसा घेरा बना कर पकड़ेंगे जिसके बारे में उसे अंदेशा तक न हो पाएगा।"
"ओह आई सी।" शिवा को सारी बात जैसे समझ आ गई थी, बोला___"ये सही रणनीत है डैड। अगर वो सब आदमी वैसे ही हर काम में माहिर हैं जैसा कि आप बता रहे हैं तो फिर यकीनन ये सही क़दम है।"
अभी अजय सिंह कुछ बोलने ही वाला था कि तभी किचेन से आती हुई प्रतिमा हाॅथ में चाय का ट्रे लिए वहाॅ पर आ गई। उसने दोनो बाप बेटे को एक एक कप चाय पकड़ाई और एक कप खुद लेकर वहीं एक सोफे पर बैठ गई।
"कौन से आदमियों की बात चल रही है अजय?" प्रतिमा ने सोफे पर बैठने के साथ ही पूछा था। उसके पूछने पर अजय सिंह ने उसे भी वही सब बता दिया जो अभी उसने शिवा को बताया था। सारी बात सुनने के बाद प्रतिमा कुछ देर गंभीरता से सोचती रही।
"तो अब तुमने बाहर से आदमी मॅगवाए हैं।" फिर प्रतिमा ने तिरछी नज़र से देखते हुए कहा___"और उन पर भरोसा भी है तुम्हें कि वो तुम्हें इस बार नाकामी का नहीं बल्कि फतह का स्वाद चखाएॅगे?"
"बिलकुल।" अजय सिंह ने स्पष्ट भाव से कहा___"ये सब ऐसे आदमी हैं जिनका वास्ता अपराध की हक़ीक़त दुनियाॅ से है और ये सब उस अपराध की दुनियाॅ के सफल खिलाड़ी हैं।"
"चलो इनका कारनामा भी देख लेते हैं।" प्रतिमा ने सहसा गहरी साॅस ली___"वैसे इस बात पर भी ध्यान देना कि समय हर वक्त इसी बस के लिए नहीं रहता।"
"क्य मतलब??" अजय सिंह चकराया।
"मतलब ये कि हर बार एक जैसी ही चाल चलना एक सफल खिलाड़ी की पहचान नहीं होती।
" प्रतिमा ने समझाने वाले भाव से कहा__"ऐसे में सामने वाले खिलाड़ी के दिमाग़ में ये मैसेज जाता है कि उसका प्रतिद्वंदी कमज़ोर है जो सिर्फ एक ही तरह की चाल चलना जानता है और उसकी ये बेवकूफी भी कि उसी एक तरह की चाल से वह खेल को जीत लेने की उम्मीद भी करता है। इस लिए एक अच्छे खिलाड़ी को चाहिए कि बीच बीच में अपनी चाल को बदल भी लेना चाहिए।"
"बात तो तुम्हारी ठीक है डियर।" अजय सिंह ने चाय का खाली कप सामने काॅच की टेबल पर रखते हुए बोला___"लेकिन इसको इस एंगल से भी तो सोच कर देखो ज़रा। मतलब ये कि सामने वाले खिलाड़ी के दिमाग़ में हम जानबूझ कर ये मैसेज डाल रहे हैं कि हमारे पास सिर्फ एक ही तरह की चाल है। उसे ऐसा समझने दो। जबकि हम सही समय आने पर अपनी चाल को बदल कर उसे ऐसे मात देंगे कि उसे इसकी उम्मीद भी न होगी हमसे। जिसे वो हमारी कमज़ोरी समझेगा वो दरअसल हमारी चाल का ही एक हिस्सा होगा।"
"ओहो क्या बात है डियर हस्बैण्ड।" प्रतिमा ने सहसा मुस्कुराते हुए कहा___"क्या तर्क निकाला है। ये भी ठीक है। चल जाएगा। मगर सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात ये है कि हमारे पास समय नहीं है समय बर्बाद करने के लिए भी। सोचने वाली बात है कि हम अब भी वहीं हैं जहाॅ पर थे जबकि हमारा दुश्मन बहुत कुछ करके यहाॅ निकल भी चुका है। हाॅ अजय, वो रंडी का जना विराज अब यहाॅ नहीं होगा। बल्कि जिस काम से वो यहाॅ आया था उस काम को करके वो वापस मुम्बई चला गया होगा। आख़िर इस बात का एहसास तो उसे भी है कि उसने हमारे इतने सारे आदमियों का क्रियाकर्म करके गायब किया है जिसका अंजाम किसी भी सूरत में उसके हित में नहीं होगा। इस लिए अपना काम पूरा करने के बाद वो यहाॅ पर एक पल भी रुकना गवाॅरा नहीं करेगा।"
"माॅम ठीक कह रही हैं डैड।" सहसा इस बीच शिवा ने भी अपना पक्ष रखा___"वो यकीनन यहाॅ से चला गया होगा। भला ऐसे ख़तरे के बीच रुकने की कहाॅ की समझदारी ।होगी? अब ये भी स्पष्ट हो गया है कि उसके बाद यहाॅ सिर्फ रितू दीदी ही रह गई हैं।"
"रितू ही बस नहीं है बेटे।" अजय सिंह ने कहा___"बल्कि उसके साथ तुम्हारी नैना बुआ भी है।"
"क्याऽऽ???" अजय सिंह की इस बात से शिवा और प्रतिमा दोनो ही बुरी तरह चौंके थे, जबकि प्रतिमा ने कहा___"तुम ये कैसे कह सकते हो अजय? नैना तो वापस अपने ससुराल चली गई थी न उस दिन?"
"वो ससुराल नहीं।" अजय सिंह ने कहा___"बल्कि रितू के साथ कहीं और गई थी। नैना ने तो ससुराल जाने का सिर्फ बहाना बनाया था जबकि हक़ीक़त ये थी कि रितू उसे खुद यहाॅ से निकाल कर ले गई थी। ये सब रितू का ही किया धरा था।
"
"लेकिन ये सब तुम्हें कैसे पता अजय?" प्रतिमा ने चकित भाव से कहा___"और रितू ने भला ऐसा क्यों किया होगा?"
"उस दिन नैना जब रितू के साथ गई तो ये सच है कि एक भाई होने के नाते मुझे खुशी हुई थी कि चलो अच्छा हुआ कि नैना को उसके ससुराल वालों ने बुलाया है।" अजय सिंह कह रहा था___"मगर जब दो दिन बाद भी नैना का कोई फोन नहीं आया तो मैने सोचा कि मैं ही फोन करके पता कर लूॅ कि वहाॅ सब ठीक तो है न? इस लिए मैने नैना के ससुराल में नैना को फोन लगाया मगर नैना का फोन बंद बता रहा था। कई बार के लगाने पर भी जब नैना का फोन बंद ही बताता रहा तो मैने नैना के हस्बैण्ड को फोन लगाया और उनसे पूछा नैना के बारे में तो उसने साफ साफ कठोरता से मना कर दिया कि उसके यहाॅ नैना नहीं आई और ना ही उसका नैना से कोई लेना देना है अब। नैना के पति की ये बात सुन कर मेरा दिमाग़ घूम गया। मुझे समझते देर न लगी कि नैना को हवेली से निकाल कर रितू ही ले गई है। उसे शायद ये बात कहीं से पता चल गई होगी कि हम दोनो बाप बेटे की गंदी नज़र नैना पर है। इस लिए रितू ने उसे इस हवेली से बड़ी चालाकी से निकाल लिया और अपनी बुआ को किसी ऐसी जगह पर सुरक्षित रखने का सोचा होगा जहाॅ पर हम आसानी से पहुॅच भी न सकें।"
"हे भगवान! इतना बड़ा खेल खेल गई रितू।" प्रतिमा ने हैरानी से कहा___"अगर ये बात सच है तो यकीनन हमारी बेटी ने हमें उल्लू बना दिया है। उसने बड़ी सफाई और चतुराई से आपके मुह से आपका मन पसंद निवाला छीन लिया है जिसका हमें एहसास तक नहीं हो सका।"
"जब हमारी बेटी ने ही हमें धोखा दे दिया तो कोई क्या कर सकता है?" अजय सिंह ने कहा___"लेकिन अब जो हम उसके साथ करेंगे उसकी उसने कल्पना भी न की होगी। हम उसके माॅ बाप हैं, हमने उसे बचपन से लेकर अब तक क्या कुछ नहीं दिया। उसने जिस चीज़ की आरज़ू की हमने पल भर में उस चीज़ को लाकर उसके क़दमों में डाल दिया। मगर उसने हमारे लाड प्यार का ये सिला दिया हमें। इतने सालों का लाड प्यार उसके लिए कोई मायने नहीं रखता। देख लो प्रतिमा, ये है तुम्हारी बेटी का अपने माॅ बाप के प्रति प्रेम और लगाव। जो अपने बाप के दुश्मन के साथ मिल कर खुद अपने ही पैरेंट्स के लिए मौत का सामान जुटाने पर तुली हुई है। इस हाल में अगर तुम मुझसे ये कहो कि मैं उसकी इस धृष्टता को माफ़ कर दूॅ तो ऐसा हर्गिज़ नहीं हो सकता अब। तुम्हारी बेटी ने अपने ही बाप के हाथों अब ऐसी मौत को चुन लिया है जिसके दर्द का किसी को एहसास नहीं हो सकता।"
"पहले मुझे भी लगता था अजय कि वो आख़िर हमारी बेटी है।" प्रतिमा ने कठोरता से कहा___"मगर उसके इस कृत्य से मुझे भी उस पर अब बेहद गुस्सा आया हुआ है। मैं जानती हूॅ कि वो अब दूध पीती बच्ची नहीं रही है जिसके कारण उसे हर चीज़ का पाठ पढ़ाना पड़ेगा। बल्कि अब वो बड़ी हो गई है।
जिसे अपने और अपनों के अच्छे बुरे का बखूबी ख़याल है। इसके बाद भी वो अपने ही पैरेंट्स का बुरा चाहने वाला काम किया है तो अब मैं भी यही कहूॅगी कि उसे उसके इस अपराध की शख्त से शख्त सज़ा मिले। दैट्स आल।"
कुछ देर और तीनो के बीच बातें होती रहीं उसके बाद तीनों ने रात का खाना खाया और सोने के लिए कमरों में चले गए। इस बात से अंजान कि आने वाली सुबह उनके लिए क्या धमाका करने वाली है????
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
रितू की जिप्सी फार्महाउस पहुॅची।
लोहे वाले गेट के पास ही शंकर और हरिया काका बंदूख लिए खड़े थे। रितू की जिप्सी को देखते ही दोनो ने गेट खोल दिया। गेट खुलते ही रितू ने जिप्सी की गेट के अंदर बढ़ा दिया। कुछ ही पल में रितू की जिप्सी पोर्च में जाकर रुकी। जिप्सी से उतर कर रितू ने हरिया काका को आवाज़ देकर बुलाया। हरिया के आते ही रितू ने उससे जिप्सी के पीछे बड़ी सी प्वालीथिन के नीचे ढॅकी मंत्री की बेटी को उठा कर तहखाने में ले जाने को कहा। उससे ये भी कहा कि तहखाने में उसे अच्छी तरह बाॅध कर ही रखे।
रितू के कहने पर हरिया ने वैसा ही किया। आज एक लड़की को इस तरह तहखाने में ले आते देख हरिया काका अंदर ही अंदर बेहद खुश हो गया था। लड़की को देख कर उसके मन में ढेर सारे लड्डू फूट रहे थे। काफी दिन से लड़की गाॅड मार मार कर वो अब उकता सा गया था। अब उसे एक फ्रेश माल की ज़रूरत महसूस हो रही थी। बिंदिया को ज्यादा सेक्स करना पसंद नहीं था इस लिए हरिया को वह रोज रोज अपने पास नहीं आने देती थी। जिसकी वजह से हरिया उससे खूब नाराज़ हो जाया करता था। मगर कर भी क्या सकता था??
मन में ढेर सारे खुशी के लड्डू फोड़े वह लड़की को तहखाने में ले जाकर उसे वहीं तहखाने के फर्स पर लेटा दिया। लड़की अभी भी बेहोश ही थी। तहखाने में रस्सियों से बॅधे वो चारो असहाय अवस्था में लगभग झूल से रहे थे। उन चारों की हालत ऐसी हो गई थी कि पहचान में नहीं आ रहे थे। जिस्म पर एक एक कच्छा था उन चारों के और कुछ नहीं। इस वक्त चारो के सिर नीचे की तरफ झुके हुए थे। उनमें इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि सिर उठा कर सामने की तरफ देख भी सकें कि कौन किसे लेकर आया है? हरिया काका ने एक नज़र उन चारों पर डाली उसके बाद वो लड़की की तरफ एक बार देखने के बाद तहखाने से बाहर की तरफ चला गया। कुछ देर में जब वो आया तो उसके दोनो हाॅथ में एक लकड़ी की कुर्सी थी।
लकड़ी की कुर्सी को तहखाने में एक तरफ रख कर वो पलटा और फिर लड़की उठा कर उस कुर्सी पर बैठा दिया। उसने लड़की के दोनो हाथों को कुर्सी के दोनो साइड एक एक करके रस्सी से बाॅध दिया। उसके बाद उसके पैरों को भी नीचे कुर्सी के दोनो पावों पर एक एक कर बाॅध दिया। लड़की के झुके हुए सिर को ऊपर उठा कर उसने कुर्सी की पिछली पुश्त से टिका दिया।
कुछ देर तक हरिया काका उस लड़की को ललचाई नज़रों से देखता रहा उसके बाद वो तहखाने से बाहर आ गया। तहखाने का गेट बंद कर वो बाहर गेट के पास खड़े शंकर के करीब आ गया।
उधर, मंत्री की बेटी को हरिया के हवाले करने के बाद रितू अंदर अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। कमरे में आकर उसने अपनी वर्दी को उतारा और बाथरूम में घुस गई। जब वह फ्रेश होकर बाहर आई तो कमरे में नैना बुआ को देख कर वह चौंकी। दरअसल इस वक्त वह सिर्फ एक हल्के पिंक कलर के टाॅवेल में थी।
बाॅथरूम का दरवाजा खुलने की आवाज़ से बेड पर बैठी नैना का ध्यान उस तरफ गया तो रितू को मात्र टाॅवेल में देख कर वह हौले से मुस्कुराई। उसके यूॅ मुस्कुराने से रितू के चेहरे पर अनायास ही लाज और हया की सुर्खी फैल गई। होठों पर हल्की मुस्कान के साथ ही उसकी नज़रें झुकती चली गईं। रितू का इस तरह शरमाना नैना को काफी अच्छा लगा। उसे पता था कि उसकी ये भतीजी भले ही ऊपर से कितनी ही कठोर हो किन्तु अंदर से वह एक शुद्ध भारतीय लड़की है जो ऐसी परिस्थिति में शरमाना भी जानती है।
"चल मुझसे शरमाने की ज़रूरत नहीं है रितू।" नैना ने मुस्कुराते हुए कहा___"तू आराम से अपने कपड़े पहन ले। फिर हम बातें करेंगे।"
"शर्म तो आएगी ही बुआ।" रितू ने इजी फील करने के बाद ही हौले से मुस्कुराते हुए कहा___"मैं इस तरह पहले कभी भी किसी के सामने नहीं आई। भले ही वो मेरे घर का ही कोई सदस्य हो।"
"हाॅ जानती हूॅ मैं।" नैना ने कहा___"पर इतना तो आजकल आम बात है मेरी बच्ची। सो फील इजी एण्ड कम्फर्टेबल।"
नैना की इस बात से रितू बस मुस्कुराई और फिर पास ही एक साइड रखी आलमारी से उसने अपने कपड़े निकाले और फिर वापस बाथरूम में घुस गई। ये देख कर नैना एक बार पुनः मुस्कुरा उठी।
थोड़ी देर बाद रितू जब बाथरूम से बाहर आई तो इस बार उसके खूबसूरत से बदन पर भारतीय लड़कियों का शुद्ध सलवार सूट था और सीने पर दुपट्टा। वो इन कपड़ों में बहुत ही खूबसूरत लग रही थी। नैना ने उसे गहरी नज़र से एक बार ऊपर से नीचे तक देखा फिर बेड से उठ कर रितू के पास आई और रितू का सिर पकड़ कर अपनी तरफ किया और उसके माथे पर हल्के चूम लिया।
"बहुत खूबसूरत लग रही है मेरी बच्ची।" फिर नैना ने मुस्कुरा कर कहा___"किसी की नज़र न लगे। ईश्वर हर बला से दूर रखे तुझे।"
"आप भी न बुआ।" रितू ने हॅसते हुए कहा___"ख़ैर छोड़िये ये बताइये आपको यहाॅ अच्छा तो लगता है न? कहीं ऐसा तो नहीं कि आप यहाॅ पर इजी फील नहीं करती हैं और खुद को यहाॅ मजबूरीवश रहने का सोचती हैं?"
"अरे नहीं रितू।" नैना ने रितू का हाॅथ पकड़ कर उसे बेड पर बैठाने के बाद खुद भी बैठते हुए कहा___"यहाॅ मुझे बहुत अच्छा लगता है। हर मुसीबत हर परेशानी से दूर हूॅ यहाॅ। यहाॅ शान्त व साफ वातावरण मन को बेहद सुकून देता है।
यहाॅ बिंदिया भौजी हैं और तू है बस इससे ज्यादा और क्या चाहिए? पिछले कुछ दिनों में अपने कुछ अज़ीज़ों से भी मिल लिया, ऐसा लगा जैसे फिर से इस घर में वही पुराना वाला दौर लौट आया है।"
"चिन्ता मत कीजिए बुआ।" रितू ने कहा___"पुराना वाला समय फिर से आएगा। फिर से पहले जैसी ही खुशियाॅ हमारे बीच रक्श करेंगी। बस इन खुशियों को बरबाद करने वालों का एक बार किस्सा खत्म हो जाए। उसके बाद फिर से वही हमारा वही संसार होगा मगर एक नये संसार के रूप में। जिसमें सबके बीच सिर्फ बेपनाह प्यार होगा। जहाॅ किसी घृणा अथवा किसी प्रकार की नफ़रत के लिए कोई स्थान हीं नहीं होगा।"
"क्या सच में तूने अपने माता पिता के लिए उनका अंजाम बुरा ही सोचा हुआ है?" नैना ने पूछा___"क्या ऐसा नहीं हो सकता कि उन्हें उनके कर्मों की सज़ा भी मिल जाए और वो हमारे साथ भी रहें एक अच्छे इंसानों की तरह?"
"ये असंभव है बुआ।" रितू ने कठोरता से कहा__"जो इंसान इतना ज्यादा अपने सोच और विचार से गिर जाए कि वो अपनी ही औलाद के बारे में इतना गंदा करने का सोच डाले उससे भविष्य में अच्छाई की उम्मीद हर्गिज़ नहीं करनी चाहिए। दूसरी बात, भले ही ईश्वर उनके अपराधों के लिए उन्हें माफ़ कर दे मगर मैं किसी सूरत पर उन्हें माफ़ नहीं कर सकती। उन्होंने माफ़ी के लिए कहीं पर भी कोई रास्ता नहीं छोंड़ा है। उन्होंने हर रिश्ते के लिए सिर्फ गंदा सोचा है और गंदा किया है। उन्होने अपने स्वार्थ के लिए अपने देवता जैसे भाई की हत्या की। अपनी बहन सामान छोटे भाई की पत्नी पर बुरी नज़र डाली। सबसे बड़ी बात तो उन्होंने ये की कि अपने ही बेटे के साथ अपनी पत्नी को उस काम में शामिल किया जिस काम को किसी भी जाति धर्म में उचित नहीं माना जाता बल्कि सबसे ऊॅचे दर्ज़े का पाप माना जाता है। ऐसे इंसानों को माफ़ी कैसे मिल सकती है बुआ? नहीं हर्गिज़ नहीं। ना तो मैं माफ़ करने वाली हूॅ और ना ही मेरा भाई राज उन घटिया लोगों को माफ़ करेगा। एक पल के लिए अगर ऐसा हो जाए कि राज उन्हें माफ़ भी कर दे मगर मैं....मैं नहीं माफ़ कर सकती। हाॅ बुआ....मेरे अंदर उनके प्रति इतना ज़हर और इतनी नफ़रत भर चुकी है कि अब ये उनकी मौ से ही दूर होगी। मुझे दुख इस बात का नहीं होगा कि मेरे माॅ बाप दुनियाॅ से चले गए बल्कि मरते दम तक इस बात का मलाल रहेगा कि ऐसे गंदे इंसानों की औलाद बना कर ईश्वर ने मुझे इस धरती पर भेज दिया था।"
रितू की इन बातों से नैना चकित भाव से देखती रह गई उसे। उसे एहसास था कि रितू के अंदर इस वक्त किस तरह की भावनाओं का चक्रवात चालू था जिसके तहत वो इस तरह अपने ही माॅ बाप के लिए ऐसा बोल रही थी। नैना खुद भी यही समझती थी कि रितू अपनी जगह परी तरह सही है। ऐसे इंसान के मर जाने का कोई दुख या संताप नहीं हो सकता।
"माॅ बाप तो वो होते हैं बुआ जो अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देते हैं।" रितू दुखी भाव से कहे जा रही थी__"बाल्य अवस्था से ही अपने बच्चों के अंदर अच्छे संस्कार डालते हैं। सबके प्रति आदर व सम्मान करने की भावना के बीज बोते हैं। सबके लिए अच्छा सोचने की सीख देते हैं। कभी किसी के बारे में बुरा न सोचने का ज्ञान देते हैं। मगर मेरे माॅ बाप ने तो अपने तीनों बच्चों को बचपन से सिर्फ यही पाठ पढ़ाया था कि हवेली के अंदर रहने वाला हर ब्यक्ति बुरा है। इनसे ज्यादा बात मत करना और ना ही इन्हें अपने पास आने देना। कहते हैं इंसान वही देता है जो उसके पास होता है। सच ही तो है बुआ, मेरे माॅ बाप के पास यही सब तो था अपने बच्चों को देने के लिए। वो खुद ऊॅचे दर्ज़े के बुरे इंसान थे, उनके अंदर पाप और बुराईयों का भण्डार था। वही सब उन्होंने अपने बच्चों को भी दिया। ये तो समय की बात है बुआ कि वो हमेशा एक जैसा नहीं रहता। हर चीज़ की हकीक़त कैसी होती है ये बताने के लिए समय ज़रूर आपको ऐसे मोड़ पर ले आता है जहाॅ आपको हर चीज़ की असलियत का पता चल जाता है। इस लिए ये अच्छा ही हुआ कि समय मुझे ऐसे मोड़ पर ले आया। वरना मैं जीवन भर इस बात से बेख़बर रहती कि जिन लोगों के बारे में मुझे बचपन से ये पाठ पढ़ाया गया था कि ये सब बुरे लोग हैं वो वास्तव में कितने अच्छे थे और गंगा की तरह पवित्र थे।"
"हर इंसान की सोच अलग होती है रितू।" नैना ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"और हर इंसान की इच्छाएॅ भी अलग होती हैं। कुछ लोग अपनी इच्छा और खुशी के लिए अनैतिकता की सीमा लाॅघ जाते हैं और कुछ लोग दूसरों की खुशी और भलाई के लिए अपनी हर खुशी और इच्छाओं का गला घोंट देते हैं। अनैतिकता की राह पर चलने वाले ये सोचना गवाॅरा नहीं करते कि जो कर्म वो कर रहे हैं उससे जाति समाज और खुद के घर परिवार पर कितना बुरा प्रभाव पड़ेगा? उन्हें तो बस अपनी खुशियों से मतलब होता है। जबकि इसके विपरीत अच्छे इंसान अपने अच्छे कर्मों से आदर्श के नये नये कीर्तिमान स्थापित करते हैं। ख़ैर छोंड़ इन बातों को और ये बता कि आगे का क्या सोचा है?"
"सोचना क्या है बुआ?" रितू ने कहा___"मेरा भाई मुझसे कह गया है कि मैं उसके वापस आने का इन्तज़ार करूॅ। उसके बाद हम दोनो बहन भाई इस किस्से का खात्मा करेंगे।"
"पर ये सब होगा कैसे?" नैना ने कहा___"तुम दोनो इस काम को अकेले कैसे अंजाम तक पहुॅचाओगे?"
"मुझे खुद पर और अपने भाई राज पर पूरा भरोसा है बुआ।" रितू ने गर्व से कहा___"आप देखना हम दोनो कैसे इस सबको फिनिश करते हैं? अब तो रितू राज स्पेशल गेम होगा बुआ। मैं बस राज के आने का बेसब्री से इन्तज़ार कर रही हूॅ।"
"तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे ये सब बहुत सहज है।" नैना ने हैरानी से कहा___"जबकि मेरा तो सोच सोच कर ही दिल बुरी तरह से घबराया जा रहा है।
"
"इसमें घबराने वाली क्या बात है बुआ?" रितू ने स्पष्ट भाव से कहा___"सीधी और साफ बात है कि जो लोग सिर पर मौत का कफ़न बाॅध कर चलते हैं वो फिर किसी चीज़ से घबराते नहीं हैं। बल्कि मौत से भी डॅट कर मुकाबला करते हैं। जहाॅ तक मेरी बात है तो अब अगर मेरी जान भी मेरे भाई की सुरक्षा में चली जाए तो कोई ग़म नहीं है। बल्कि मुझे बेहद खुशी होगी कि मेरी जान मेरे ऐसे भाई की सलामती के लिए फना हो गई जिसने वास्तव में मुझे हमेशा अपनी दीदी माना और हमेशा मुझे इज्ज़त व सम्मान दिया।"
"ऐसा मत कह रितू।" नैना की ऑखों से ऑसू छलक पड़े, बोली____"तुझे कुछ नहीं होगा और ख़बरदार अगर दुबारा से ऐसी फालतू की बात की तो। तू मेरी जान है मेरी बच्ची। तुझे कुछ नहीं होगा क्योंकि तू सच्चाई की राह पर चल रही है, धर्म की राह पर मुकीम है तू। अगर किसी को कुछ होगा तो वो उन्हें होगा जो इस देश समाज और परिवार के लिए कलंक हैं।"
"ख़ैर जाने दीजिए बुआ।" रितू ने मानो पहलू बदला__"इन सब बातों में क्या रखा है? होना तो वही है जो हर किसी की नियति में लिखा हुआ है। आइये खाना खाने चलते हैं। बिंदिया काकी ने खाना तैयार कर दिया होगा।"
रितू की ये बात सुन कर नैना उसे कुछ देर अजीब भाव से देखती रही, फिर रितू के उठते ही वो भी बेड से उठ बैठी। कमरे से बाहर आकर दोनो डायनिंग हाल की तरफ बढ़ चलीं। जहाॅ पर करुणा का भाई और अभय सिंह का साला बैठा इन्हीं का इन्तज़ार कर रहा था। ये दोनो भी वहीं रखी एक एक कुर्सियों पर बैठ गई। कुछ ही देर में बिंदिया ने सबको खाना परोसा। खाना खाने के बाद सब अपने अपने कमरों की तरफ सोने के लिए चले गए।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
सुबह हुई!
उस वक्त सुबह के लगभग साढ़े आठ बज रहे थे जब रास्तों पर धूल उड़ाती हुई कई सारी गाड़ियाॅ आकर हवेली के बाहर एक एक करके रुकीं। वो तीन गाड़ियाॅ थी। एक सफारी, एक इनोवा, और एक आई20 थी। तीनों गाड़ियों के रुकते ही सभी गाड़ियों के दरवाजे एक साथ खुले और खुल चुके दरवाजे से एक एक दो दो करके कई सारे आदमी गाड़ियों से बाहर निकले।
बाहर आते ही वो सब एक साथ हवेली के उस हिस्से के मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़े जो हिस्सा अजय सिंह का था। इस वक्त दरवाजा बंद था। आस पास कुछ ऐसे आदमी भी बाहर मौजूद थे जिनके हाॅथों में बंदूख, रिवाल्वर आदि हथियार थे। गाड़ियों से आने वाले सभी लोग मुख्य दरवाजे की तरफ मुड़ चले। आस पास खड़े अजय सिंह के बंदूखधारी आदमियों के चेहरों पर अजीब से भाव उभरे। अजीब से इस लिए क्यों कि गाड़ियों से आने वाले सभी आदमी एकदम दनदनाते हुए मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ चले थे।
आस पास खड़े बंदूखधारी आदमी उन लोगों की इस धृष्टता को देख उन्हें रोंकने के लिए उन लोगों के सामने आ गए और उन्हें रोंक कर उनसे पूछने लगे कि वो कौन लोग हैं और इस तरह कैसे बिना कुछ पूछे अंदर की तरफ बढ़े चले जा रहे हैं? किन्तु बंदूखधारियों के पूछने पर उन लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि अपने अपने कोट की सामने वाली पाॅकेट से अपना अपना आई कार्ड निकाल कर बंदूखधारियों को दिखा दिया। बंदूखधारी ये देख कर बुरी तरह चौंके कि वो सब सी बी आई की स्पेशल ऑफीसर थे। बंदूखधारियों को बिलीउल भी समझ न आया कि वो लोग यहाॅ क्यों आए हैं और वो खुद अब क्या करें? उधर आई कार्ड दिखाने के बाद वो लोग मुख्य दरवाजे के पास पहुॅच गए और दरवाजे पर लगी कुण्डी को ज़ोर से बजा दिया।
कुछ ही देर में दरवाजा खुला। दरवाजे पर नाइट गाउन पहने प्रतिमा नज़र आई। अपने सामने इतने सारे अजनबी आदमियों को देख कर वो चौंकी। उसके चेहरे पर ना समझने वाले भाव उभरे।
"जी कहिए।" फिर उसने अजीब भाव से कहा___"आप लोग कौन हैं? और यहाॅ किस काम से आए हैं?"
"हमें अंदर तो आने दीजिए मैडम।" एक आदमी ने ज़रा शालीन भाव से कहा___"मिस्टर अजय सिंह से मिलना है।"
"पर आप लोग हैं कौन?" प्रतिमा ने दरवाजे पर खड़े खड़े ही पूछा___"ये तो बताया नहीं आपने।"
"सब पता चल जाएगा मैडम।" उस आदमी ने कहा__"हम सब मिस्टर अजय सिंह के गहरे दोस्त यार हैं। प्लीज, उन्हें कहिए कि हम उनसे मिलने आए हैं।"
प्रतिमा उस आदमी की बात सुन कर देखती रह गई उसे। उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे उसे यकीन न आ रहा हो कि ये लोग अछय सिंह के दोस्त हो सकते हैं। कुछ देर उस आदमी को देखते रहने के बाद जाने क्या सोच कर प्रतिमा दरवाजे से हट कर पलटी और अंदर की तरफ बढ़ती चली गई। उसके पीचे पीछे ये सब भी ओल दिये।
कुछ ही देर में प्रतिमा के पीछे पीछे ये सब ड्राइंग रूम में पहुॅच गए। प्रतिमा ने सोफों की तरफ हाॅथ का इशारा कर उन लोगों को बैठने के लिए कहा। प्रतिमा के इस प्रकार कहने पर वो सब लोग सोफों पर बैठ गए जबकि प्रतिमा अंदर कमरे की तरफ बढ़ गई।
थोड़ी ही देर में अजय सिंह ड्राइंग रूम में दाखिल हुआ। ड्राइंग रूम में सोफों पर बैठे इतने सारे लोगों पर नज़र पड़ते ही उसके चेहरे पर अजनबीयत के भाव उभरे। जैसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो कि ये सब लोग कौन हैं?
"माफ़ करना मगर हमने आप लोगों को पहचाना नहीं।" फिर उसने एक अलग सोफे पर बैठते हुए कहा।
"इसके पहले कभी हम लोग आपसे मिले ही कहाॅ थे जो आप हमें पहचान लेते।" एक कोटधारी ने अजीब भाव से कहा___"ख़ैर, आपकी जानकारी के लिए हम बता दें कि हम सब सी बी आई से हैं और यहाॅ आपको चरस, अफीम, और ड्रग्स का धंधा करने के जुर्म में गिरफ्तार करने आए हैं। हमारे पास आपके खिलाफ़ स्पेशल वारंट भी है। इस लिए आप बिना कुछ सवाल जवाब किये हमारे साथ चलने का कस्ट करें।
"
सी बी आई के उस आदमी के मुख से ये बात सुन कर अजय सिंह के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। बुत सा बन गय था वह। मुख से कोई बोल न फूटा। जिस्म के सभी मसामों ने पल भर में ढेर सारा पसीना उगल दिया। चेहरा इस तरह नज़र आने लगा था जैसे धमनियों में दौड़ते हुए लहू की एक बूॅद भी शेष न बची हो। एकदम फक्क पड़ गया था।
"ये...ये...क्...क्या बकवास कर रहे हैं आप?" फिर सहसा बदहवाश से अजय सिंह ने जैसे खुद को सम्हाला था और फिर वापस ठाकुरों वाले रौब में आते हुए बोला था। ये अलग बात है कि उसके उस रौब में रत्ती भर भी रौब दिखाई न दिया, बोला___"आप होश में तो हैं न? आप जानते हैं कि आप किसके सामने क्या बकवास कर रहे हैं?"
"हम तो पूरी तरह होशो हवाश में ही हैं मिस्टर अजय सिंह।" सीबीआई ऑफिसर ने कहा___"किन्तु आपके होशो हवाश ज़रूर कहीं खो गए से नज़र आने लगे हैं। रही बात आपकी कि आप कौन हैं और हम आपसे क्या कह रहे हैं तो इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता। क्योंकि हम कानून के नुमाइंदे हैं। हमारे लिए छोटे बड़े सब एक जैसे ही होते हैं। ख़ैर, हमने आपके शहर वाले मकान से भारी मात्रा में ग़ैर कानूनी ज़खीरा बरामद किया है। सारी जाॅच पड़ताल के बाद जब हमें ये पता चला कि वो सब आपकी संमत्ति है तो हम कोर्ट से स्पेशल वारंट लेकर आपको यहाॅ गिरफ्तार करने चले आए। इस लिए अब आपके पास हमारे साथ चलने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं है।"
ऑफीसर की ये बात सुन कर एक बार फिर से अजय सिंह की हालत ख़राब हो गई। वो सोच भी नहीं सकता था कि उसके साथ ऐसा भी कभी हो सकता है। उसे तुरंत ही फैक्ट्री में लगी आग का वाक्या याद आया जब तहखाने से उसका ग़ैर कानूनी सामान गायब होने का पता चला था उसे। वो ये भी समझ गया था कि ये सब विराज ने ही किया था। प्रतिमा ने इस बात का अंदेशा भी ब्यक्त किया था कि किसी ऐसे मौके पर वो ये सब कानून के हवाले कर सकता है जबकि हम कुछ भी करने की स्थिति में ही न रह जाएॅगे। मतलब साफ था कि प्रतिमा की कही बात आज सच हो गई थी। यानी विराज ने उस सारे सामान को उसके शहर वाले मकान में रखा और फिर इसकी सूचना सीबीआई को दे दी और अब सीबीआई वाले अजय सिंह के पास स्पेशल वारंट लेकर आ गए थे। अजय सिंह खुद भी सरकारी वकील रह चुका था इस लिए जानता था कि ऐसे मौके पर वह कुछ भी नहीं कर सकता था। कोई दूसरा जुर्म होता तो कदाचित वो कोई जुगाड़ लगा कर अपनी ज़मानत करवा भी लेता मगर यहाॅ तो जुर्म ही संगीन था।
"किस सोच में डूब गए मिस्टर अजय सिंह?" तभी उसे सोचो में गुम देख ऑफीसर ने कहा___"आप अपनी मर्ज़ी से हमारे साथ चलेंगे तो बेहतर होगा, वरना आप जानते है कि हमारे पास बहुत से तरीके हैं आपको यहाॅ से ले चलने के लिए।"
"ऑफीसर।" सहसा अजय सिंह ने अजीब भाव से कहा___"ये सब झूॅठ हैं। हम ऐसा कोई काम नहीं करते जिसे कानून की नज़र में जुर्म कहा जाए।
ये यकीनन किसी की साजिश है हमें फसाने की। हाॅ ऑफीसर, ये साजिश ही है। काफी समय से हमारा शहर वाला मकान खाली पड़ा है इसलिए संभव है कि किसी ने ये सब गैर कानूनी चीज़ें वहाॅ पर छुपा कर रखी रही होंगी। हमारा इस सबसे कीई लेना देना नहीं है।"
"सच और झूठ का फैसला तो अब अदालत ही करेगी मिस्टर अजय सिंह।" ऑफिसर ने कहा___"हमारा काम तो बस इतना है कि प्राप्त सबूतों के आधार पर आपको गिरफ्तार कर अदालत के समक्ष खड़ा कर दें। इस लिए अब आपकी कोई दलील हमारे सामने चलने वाली है।"
अभी अजय सिंह कुछ कहने ही वाला था कि तभी अंदर से प्रतिमा और शिवा आकर वहीं पर खड़े हो गए। दोनो के चेहरों पर हल्दी पुती हुई थी। मतलब साफ था कि यहाॅ की सारी वार्तालाप उन दोनो ने सुन ली थी।
"ये सब क्या है डैड?" शिवा ने अंजान बनते हुए पूछा___"ये कौन लोग हैं और यहाॅ किस लिए आए हैं?"
"ये सब सीबीआई से हैं बेटे।" अजय सिंह ने बुझे मन से कहा___"और ये हमे गिरफ्तार करने आए हैं। इनका कहना है कि हमारे शहर वाले मकान से इन्होंने भारी मात्रा में चरस अफीम ड्रग्स आदि चीज़ें बरामद की हैं।"
"व्हाऽऽट??" शिवा ने चौंकते हुए कहा___"ये आप क्या कह रहे हैं डैड? भला ऐसा कैसे हो सकता है? हमारे शहर वाले मकान में वो सब चीज़ें कहाॅ से आ गई?"
"मैं तो पहले ही कहती थी कि तुम शहर वाले उस मकान को बेंच दो।" प्रतिमा ने जाने क्या सोच कर ये बात कही थी, बोली___"मगर मेरी सुनते कहाॅ हो तुम? अब देख लो इसका अंजाम। जाने कब से खाली पड़ा था वह। आज कल किसी का क्या भरोसा कि वो मकान के अंदर आकर क्या क्या खुराफात करने लग जाएॅ।"
"अरे तो भला हमें क्या पता था प्रतिमा कि ऐसा भी कोई कर सकता है?" अजय सिंह ने प्रतिमा की चाल को बखूबी समझते हुए कहा___"अगर पता होता तो हम उस मकान की देख रेख के लिए कोई आदमी रख देते न।"
"किसने किया होगा ये सब?" प्रतिमा ने कहा___"भला हमसे किसी की ऐसी क्या दुश्मनी हो सकती है जिसके तहत उसने हमारे साथ इतना बड़ा काण्ड कर दिया?"
"मिस्टर अजय सिंह।" सहसा ऑफिसर ने हस्ताक्षेप करते हुए कहा___"ये सब बातें आप बाद में सोचिएगा। इस वक्त आप हमारे साथ चलने का कस्ट करें प्लीज़।"
"अरे ऐसे कैसे ले जाएॅगे आप डैड को?" सहसा शिवा आवेशयुक्त भाव से बोल पड़ा___"मेरे डैड बिलकुल बेगुनाह हैं। आप इन्हें ऐसे कहीं नहीं ले जा सकते। ये तो हद ही हो गई कि करे कोई और भरे कोई और।"
"तुम शान्त हो जाओ बेटे।" अजय सिंह ने अपने कूढ़मगज बेटे की बातों पर मन ही मन कुढ़ते हुए बोला___"बात चाहे जो भी हो लेकिन हमें इनके साथ जाना ही पड़ेगा। ये सब कानून के रखवाले हैं। दूसरी बात इन्हें हमारे मकान से वो सब चीज़ें मिली हैं इस लिए पहली नज़र में हर कोई यही समझेगा और कहेगा कि वो सब चीज़ें हमारी हैं। यानी हम ग़ैर कानूनी धंधा भी करते हैं।
दूसरा ब्यक्ति ये नहीं सोचेगा कि कोई अन्य ब्यक्ति ये सब चीज़ें हमारे मकान में रख कर हमें फॅसा भी सकता है। अतः मौजूदा हालात में हमें कानून का हर कहा मानना पड़ेगा और उसका साथ देना पड़ेगा। तुम फिक्र मत करो बेटे, ये हमें ले जाकर हमसे इस सबके बारे में पूॅछताछ करेंगे। इस सबके लिए हमें तभी सज़ा मिलेगी जब ये साबित हो जाएगा कि वो सब चीज़ें वास्तव में हमारी ही हैं या हम कोई ग़ैर कानूनी धंधा भी करते हैं।"
अजय सिंह की बात सुन कर शिवा कुछ बोल न सका। प्रतिमा ने भी कुछ न कहा। कदाचित वो खुद भी अजय सिंह की इस बात से सहमत थी। दूसरी बात, वो तो जानती ही थी कि वो सब चीज़ें सच में अजय सिंह की ही हैं। इस लिए ये सब सोच कर और इसके अंजाम का सोच कर वो अंदर ही अंदर बुरी तरह घबराए भी जा रही थी। वो अच्छी तरह जानती थी कि ऐसे मामले में कानून की गिरफ्त से बचना असंभव नहीं तो नामुमकिन ज़रूर था।
इधर अजय सिंह के मन में भी यही सब चल रहा था। उसे भी एहसास था कि इससे बचना बहुत मुश्किल काम है। इस लिए वो कोई न कोई जुगाड़ लगाने भी सोच रहा था। मगर चूॅकि उसके पुराने कानूनी कनेक्शन पहले ही खत्म हो चुके थे इस लिए वो कुछ कर पाने की हालत में नहीं था। दूसरी सबसे बड़ी बात ये थी कि उसे इस बात का एहसास हो चुका था कि अगर किसी तरह वो पुलिस कमिश्नर अथवा प्रदेश के मंत्री को अपने हक़ में कर भी ले तो तब भी बात अपने पक्ष में नहीं होनी थी। क्योंकि उसने देखा था कि उसके साथ घटी पिछली सभी घटनाओं में ऐसा हुआ था कि ऊपर से ही शख्त आदेश मिला था।
अजय सिंह के पसीने छूट रहे थे मगर उसके दिमाग़ में कोई बेहतर जुगाड़ आ नहीं रहा था। वक्त और हालात ने अचानक ही इस तरह से अपना रंग बदल लिया था कि उसको कुछ करने लायक छोंड़ा ही नहीं था। उसने कल्पना तक न की थी कि वो इतना बेबस व लाचार हो जाएगा और इतनी आसानी से कानून की चपेट में आ जाएगा।
"तो चलें मिस्टर अजय सिंह?" सहसा ड्राइंग रूम में छाए सन्नाटे को भेदते हुए उस ऑफिसर ने कहा__"अगर आपको ये लगता है कि ये सब किसी ने आपको फॅसाने के उद्देश्य से किया है और इस सबमें आपका कोई हाॅथ नहीं है तो फिक्र मत कीजिए। हम सच्चाई का पता लगा लेंगे। किन्तु उससे पहले आपको हमारे साथ चलना ही पड़ेगा और तहकीक़ात में हमारा सहयोग करना पड़ेगा।"
उस ऑफिसर के इतना कहते ही अजय सिंह ने गहरी साॅस ली और फिर सोफे से उठ खड़ा हुआ। इस वक्त उसके बदन पर नाइट ड्रेस ही था इस लिए उसने ऑफिसर से ड्रेस बदल लेने की परमीशन माॅगी। ऑफिसर ने परमीशन दे दी। परमीशन मिलते ही अजय सिंह कमरे की तरफ बढ़ गया। उसके जाते ही ऑफिसर ने एक अन्य ऑफिसर की तरफ देख कर ऑखों से कुछ इशारा किया। ऑफिसर का इशारा समझ कर दूसरा ऑफिसर तुरंत ही अजय सिंह के पीछे कमरे की तरफ बढ़ गया।
मतलब साफ था कि ऑफिसर को इस बात का अंदेशा था कि अंदर कमरे अजय सिंह कहीं फोन पर किसी से कोई बात वगैरा न करने लगे। जबकि मौजूदा हालात में ऐसा करना हर्गिज़ भी जायज़ बात न थी।
कुछ ही देर में ऑफिसर के साथ ही अजय सिंह कमरे से आता दिखाई दिया। उसके आते ही सभी लोग सोफों पर से उठे और अजय सिंह के साथ ही बाहर आ गए। जबकि पीछे बुत बने अजय सिंह की बीवी और बेटा खड़े रह गए थे। फिर जैसे प्रतिमा को होश आया। वो एकदम से तेज़ क़दमों के साथ बाहर की तरफ भागते हुए गई। जब वो बाहर आई तो उसने देखा कि सीबीआई के सभी ऑफिसर अपनी अपनी गाड़ियों में बैठ रहे थे। एक अन्य गाड़ी की पिछली शीट पर अजय सिंह को बिठाया जा रहा था, और उसके बाद उसके बगल से ही एक अन्य ऑफिसर बैठ गया था।
प्रतिमा के देखते ही देखते सीबीआई वालों का वो क़ाफिला अजय सिंह को साथ लिए हवेली से दूर चला गया। प्रतिमा को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसकी मुकम्मल दुनियाॅ ही नेस्तनाबूत हो गई हो। इस एहसास के साथ ही प्रतिमा की ऑखें छलक पड़ीं और फिर जैसे उसके जज़्बात उसके काबू में रह सके। वो दरवाजे पर खड़ी खड़ी ही फूट फूट कर रो पड़ी। तभी उसके पीछे शिवा नमूदार हुआ और अपनी रोती हुई माॅ को उसके कंधे से पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया और फिर उसे अपने सीने से लगा लिया।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर रितू के फार्महाउस पर भी सुबह हो गई थी। अपने कमरे के अटैच बाथरूम में नहाने के बाद रितू कपड़े पहन रही थी जब उसके कमरे का दरवाजा बाहर से कुण्डी के दवारा बजाया गया था। रितू ने पूछा कौन है तो बाहर से नैना की आवाज़ आई थी कि मैं हूॅ बेटा जल्दी से दरवाज़ा खोलो। बस, उसके बाद रितू ने आनन फानन में अपने कपड़े पहने और फिर जाकर कमरे का दरवाज़ा खोला। दरवाज़ा खुलते ही नैना बुवा पर नज़र पड़ी तो वह हल्के से चौंकी।
"क्या बात है बुआ?" रितू ने शशंक भाव से पूछा__"आप इस तरह? सब ठीक तो है न?"
"ये ले।" नैना ने जल्दी से अपना दाहिना हाथ रितू की तरफ बढ़ाया___"ये अख़बार पढ़। इसमें ऐसी ख़बर छपी है छिसे पढ़ कर तेरे होश न उड़ जाएॅ तो कहना।"
"अच्छा।" रितू ने अख़बार अपने हाॅथ में लेते हुए कहा___"भला ऐसी क्या ख़बर छपी है इस अख़बार में जिसे पढ़ने पर मेरे होश ही उड़ जाएॅगे?"
"तू पढ़ तो सही।" नैना कहने के साथ ही दरवाजे के अंदर रितू को खींचते हुए ले आई, बोली___"बताने में वो बात नहीं होगी जितना कि खुद ख़बर पढ़ने से होगी।"
नैना, रितू को खींचते हुए बेड के क़रीब आई और उसमें रितू को बैठा कर खुद भी बैठ गई और रितू के चेहरे के भावों को बारीकी से देखने लगी। रितू ने अख़बार की फ्रंट पेज़ पर छपी ख़बर पर अपनी दृष्टि डाली और ख़बर की हेड लाईन पढ़ते ही वो बुरी तरह उछल पड़ी। अख़बार में छपी ख़बर कुछ इस प्रकार थी।
*शहर के मशहूर कपड़ा ब्यापारी अजय सिंह के मकान से करोड़ों का ग़ैर कानूनी सामान बरामद*
(गुनगुन): हल्दीपुर के रहने वाले ठाकुर अजय सिंह बघेल वल्द गजेन्द्र सिंह बघेल जो कि एक मशहूर कपड़ा ब्यापारी हैं उनके गुनगुन स्थित मकान पर कल शाम को सीबीआई वालों ने छापा मारा। मकान के अंदर से भारी मात्रा में चरस अफीम ड्रग्स आदि जानलेवा चीज़ें सीबीआई के हाथ लगी। ग़ौरतलब बात ये है कि गुनगुन स्थित ठाकुर अजय सिंह का वो मकान कुछ समय से खाली पड़ा था, इस लिए ये स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता कि ग़ैर कानूनी चीज़ों का इतना बड़ा ज़खीरा उनके मकान में कहाॅ से आ गया? ऐसा इस लिए क्योंकि ठाकुर अजय सिंह जैसे मशहूर कारोबारी से ऐसे संगीन धंधे की बात सोची नहीं जा सकती जो कि जुर्म कहलाता है। इस लिए संभव है कि ये सब उनके किसी दुश्मन की सोची समझी साजिश का ही नतीजा हो। ख़ैर, अब देखना ये होगा कि सीबीआई वालों की जाॅच पड़ताड़ से क्या सच्चाई सामने आती है? अब ये तो निश्चित बात है कि ठाकुर अजय सिंह के मकान से मिले इतने सारे ग़र कानूनी सामान के तहत सीबीआई वाले बहुत जल्द ठाकुर अजय सिंह को अपनी हिरासत में लेकर इस बारे में पूछताॅछ करेंगे। किन्तु अगर सीबीआई की जाॅच में ये बात सामने आई कि वो सब ग़ैर कानूनी सामान ठाकुर अजय सिंह का ही है तो यकीनन ठाकुर अजय सिंह को इस संगीन जुर्म में कानून के द्वारा शख्तसे शख्त सज़ा मिलेगी।
अख़बार में छपी इस ख़बर को पढ़ कर यकीनन रितू के होश उड़ ही गए थे। उसके दिमाग़ की बत्ती बड़ी तेज़ी से जली थी और साथ ही उसे विराज की वो बात याद आई जब उसने गुनगुन रेलवे स्टेशन पर रितू से कहा था कि बहुत जल्द अजय सिंह को एक झटका लगने वाला है। ये भी कि उसकी सेफ्टी के लिए वह भी ऐसा करेगा कि अजय सिंह या उसका कोई आदमी उस तक पहुॅच ही नहीं पाएगा।
"इसका मतलब तो यही हुआ बुआ कि अब तक डैड को सीबीआई वाले गिरफ्तार कर लिए होंगे।" रितू ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"और अगर ऐसा हो गया होगा तो यकीनन डैड लम्बे से नप जाएॅगे। एक ही झटके में वो कानून की ऐसी चपेट में आ जाएॅगे जहाॅ से निकल पाना असंभव नहीं तो नामुमकिन ज़रूर है।"
"ये तो अच्छा ही हुआ न रितू।" नैना ने कहा___"बुरे काम करने का ये अंजाम तो होना ही था। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि ये सब हुआ कैसे?
"ये सब राज की वजह से हुआ है बुआ।" रितू ने बताया___"उसने कल रेलवे स्टेशन में मुझसे कहा था कि वो कुछ ऐसा करेगा जिससे डैड मुझ तक पहुॅच ही नहीं पाएॅगे। ये तो सच है बुआ कि डैड ग़ैर कानूनी धंधा करते थे और फैक्ट्री में मौजूद तहखाने में उनका ये सब ग़ैर कानूनी सामान भी था जिसे राज ने ही गायब किया था। ऐसा उसने इस लिए किया था ताकि वह उस सामान के आधार पर जब चाहे डैड को कानून की गिरफ्त में डलवा सके।
इस लिए उसने ऐसा ही किया है बुआ लेकिन मुझे लगता है कि ये सब महज डैड को डराने और मौजूदा हालात से निपटने के लिए राज ने किया है। क्योंकि राज उन्हें अपने हाॅथों से उनके अपराधों की सज़ा देगा, नाकि कानून द्वारा उन्हें किसी तरह की सज़ा दिलवाएगा।"
"लेकिन बेटा।" नैना ने तर्क सा दिया___"कानून की चपेट में आने के बाद बड़े भइया भला कानून की गिरफ्त से कैसे बाहर आएॅगे और फिर कैसे राज उन्हें अपने हाॅथों से सज़ा देगा?"
"उसका भी इंतजाम राज ने किया ही होगा बुआ।" रितू ने कहा___"आज के इस अख़बार में छपी ख़बर के अनुसार ग़ैर कानूनी सामान डैड के मकान से बरामद ज़रूर हुआ है लेकिन ये भी बताया गया है कि चूॅकि गुनगुन स्थित मकान काफी समय से खाली था इस लिए संभव है कि डैड को फॅसाने के लिए उनके किसी दुश्मन ने ऐसा किया होगा। इस लिए सीबीआई वाले इस बारे में सिर्फ पूॅछताछ करेंगे। अब आप खुद समझ सकती हैं बुआ कि राज ने केस को इतना कमज़ोर क्यों बनाया हुआ है कि डैड कानून की गिरफ्त से मामूली पूछताछ के बाद छूट जाएॅ?।"
"लेकिन ये सवाल तो अपनी जगह खड़ा ही रहेगा न रितू कि बड़े भइया के मकान में वो ग़ैर कानूनी सामान कैसे पाया गया?" नैना ने कहा___"इस लिए इस सवाल के साल्व हुए बिना बड़े भइया इस केस से कैसे छूट जाएॅगे भला?"
"बहुत आसान है बुआ।" रितू ने कहा___"पैसों के लिए आजकल लोग बहुत कुछ कर जाते हैं। कहने का मतलब ये कि वो किसी ऐसे ब्यक्ति को ढूॅढ़ लेंगे जो पैसों के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाए। वो ब्यक्ति इस बात को खुद स्वीकार करेगा कि वो सारा ग़ैर कानूनी सामान उसका खुद का है और उसने डैड के मकान में उसे इस लिये छुपाया हुआ था क्योंकि वो मकान काफी समय से खाली था तथा उसके लिए एक सुरक्षित जगह की तरह था।"
"चलो ये तो मान लिया कि ऐसा हो सकता है।" नैना ने मानो तर्क किया___"किन्तु सबसे बड़ा सवाल ये ये है कि तुम्हारे डैड ऐसे किसी ब्यक्ति को लाएॅगे कहाॅ से? जबकि वो खुद ही सीबीआई वालों की निगरानी में रहेंगे और उनके पास किसी से संपर्क स्थापित करने के लिए कीई ज़रिया ही नहीं होगा।"
"सवाल बहुत अच्छा है बुआ।" रितू ने कुछ सोचते हुए कहा__"किन्तु अगर हम ये सोच कर देखें कि ये सब राज का ही किया धरा है तो ये भी निश्चित बात है कि वो खुद ही ऐसा कुछ करेगा जिससे डैड सीबीआई या कानून के चंगुल से बाहर आ जाएॅ।"
"ऐसे मामलों में कानून के चंगुल से किसी का बाहर आ जाना नामुमकिन तो नहीं होता रितू।
" नैना ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"किन्तु अगर तू ये कह रही है कि राज तेरे डैड को किसी हैरतअंगेज कारनामे की वजह से बाहर निकाल ही लेगा तो सवाल ये उठता है कि ऐसा क्या करेगा राज? दूसरी बात, जब उसे कानून की गिरफ्त से निकाल ही लेना है तो फिर तेरे डैड की कानून की चपेट में लाने का मतलब ही क्या था?"
"खजूर पर चढ़े इंसान को ज़मीन पर पटकने का मकसद था उसका।" रितू ने कहा___"वो कहते हैं न कि जब तक ऊॅट पहाड़ के सामने नहीं आता तब तक उसे यही लगता है कि उससे ऊॅचा कोई है ही नहीं। यही हाल मेरे डैड का था बुआ। राज का मकसद कदाचित यही है कि वो डैड को एहसास दिलाना चाहता है कि इस दुनियाॅ में उनसे भी बड़े बड़े ख़लीफा मौजूद हैं। वो चाहे तो उन्हें एक पल में चुटकियों में मसल सकता है। आज के इस वाक्ये के बाद संभव है कि डैड की विचारधारा में कुछ तो परिवर्तन ज़रूर आया होगा।"
"ये तो सच कहा तूने।" नैना ने कहा___"अगर सीबीआई वाले बड़े भइया को अपने साथ ले गए होंगे तो ये सच है कि बड़े भइया को आज आटे दाल के भाव का पता चल जाएगा।"
"हाॅ बुआ।" रितू ने कहा___"राज को मौजूदा हालातों का बखूबी एहसास था। कदाचित उसे ये अंदेशा था कि इतनी नाकामियों के बाद डैड अब खुद मैदान में उतरेंगे और हमें खोज कर हमारा क्रिया कर्म करेंगे। इसी लिए राज ने ये क़दम उठाया कि जब डैड ही कानून की गिरफ़्त में रहेंगे तो भला हम पर किसी तरह का उनकी तरफ से कोई संकट आएगा ही कैसे?"
"तो इसका मतलब ये हुआ कि बड़े भइया को राज ने कानून की गिरफ्त में फॅसाया।" नैना को जैसे सारी बात समझ में आ गई थी, बोली___"सिर्फ इस लिए कि वो तेरे डैड को एहसास दिला सके कि वो जिसे पिद्दी का शोरबा समझते हैं वो दरअसल ऐसा है कि उनको छठी का दूध याद दिला सकता है। ख़ैर, इन बातों से ये भी एक बात समझ में आती है कि राज ने तुझको सेफ करने के लिए भी तेरे डैड को कुछ दिनों के लिए कानून की गिरफ्त में फॅसाया है। दो दिन बाद तो वो खुद ही यहाॅ आ जाएगा और संभव है ऐसा कुछ कर दे जिससे उसका शिकार कानून की चपेट से बाहर आ जाए।"
"यू आर अब्सोल्यूटली राइट बुआ।" रितू ने कहा___"राज का यकीनन यही प्लान हो सकता है। ख़ैर, अब तो इस बात की फिक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है कि डैड या उनके किसी आदमी से हमें कोई ख़तरा है।"
"लेकिन एक बात सोचने वाली है रितू।" नैना ने सोचने वाले भाव से चहा___"तेरे डैड की इस गिरफ्तारी से तेरी माॅ और तेरे भाई पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा होगा। प्रतिमा भाभी ने खुद भी वकालत की पढ़ाई की है इस लिए संभव है कि वो तेरे डैड को कानून की गिरफ्त से निकालने का कोई जुगाड़ लगाएॅ।"
"कोई फायदा नहीं होने वाला बुआ।" रितू ने कहा__"जिसे जितना ज़ोर लगाना है लगा ले मगर हाॅथ कुछ नहीं आएगा। क्योंकि एक तो मामला ही इतना संगीन है दूसरे इस सबमें राज का हाॅथ है।
उसकी पहुॅच काफी लम्बी है, इस लिए उसकी पहुॅच के आगे इन लोगों का कोई भी पैंतरा काम नहीं करने वाला। ये तो पक्की बात है कि होगा वहीं जो राज चाहेगा।"
"हाॅ ये तो है।" नैना ने कहा___"ख़ैर देखते हैं क्या होता है? वैसे इस बारे में क्या अभी तक तुमने राज से बात नहीं की??"
"अभी तो नहीं की बुआ।" रितू ने कहा___"पर अब जल्द ही उससे बात करूॅगी। वास्तव में उसने बड़ा हैरतअंगेज काम किया है। मुझे तो उससे ये उम्मीद ही नहीं थी।"
"वक्त और हालात एक इंसान को कहाॅ से कहाॅ पहुॅचा देते हैं और उससे क्या क्या करवा देते हैं ये सब उस तरह का समय आने पर ही पता चलता है।" नैना ने जाने क्या सोच कर कहा___"सोचने वाली बात है कि राज जो एक बेहद ही सीधा सादा लड़का हुआ करता था आज वो इतना जहीन तथा इतना शातिर दिमाग़ का भी हो गया है।"
"इसमें उसकी कोई ग़लती नहीं है बुआ।" रितू ने भारी मन से कहा___"उसे इस तरह का बनाने वाले भी मेरे ही पैरेंट्स हैं। इंसान अपनों का हर कहा मानता है और उसका जुल्म भी सह लेता है लेकिन उसकी भी एक समय सीमा होती है। इतना कुछ जिसके साथ हुआ हो वो ऐसा भी न बन सके तो फिर कैसा इंसान है वो?"
नैना, रितू की बात सुन कर उसे देखती रह गई। कुछ देर और ऐसी ही बातों के बाद वो दोनो ही कमरे से बाहर आ गईं और नीचे नास्ते की टेबल पर आकर बैठ गईं। जहाॅ पर करुणा का भाई हेमराज पहले से ही मौजूद था। रितू अपनी नैना बुआ के साथ अलग अलग कुर्सियों पर बैठी ही थी कि उसका आई फोन बज उठा। उसने मोबाइल की स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे "माॅम" नाम को देखा तो उसके होठों पर अनायास ही नफ़रत व घृणा से भरी मुस्कान फैल गई। कुछ सेकण्ड तक वो मोबाइल की स्क्रीन को देखती रही फिर उसने आ रही काल को कट कर दिया। काल कट करते वक्त उसके चेहरे पर बेहद कठोरता के भाव थे।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर मुम्बई में!
सुबह हुई!
अजय सिंह व प्रतिमा की दूसरी बेटी नीलम की ऑखें गहरी नींद से खुल तो गईं थी मगर वो खुद बेड से न उठी थी अभी तक। हॅसती मुस्कुराती हुई रहने वाली मासूम सी नीलम एकाएक ही जैसे बेहद गुमसुम सी रहने लगी थी। काॅलेज में हुई उस घटना को आज हप्ता से ज्यादा दिन गुज़र गया था किन्तु उस घटना की ताज़गी आज भी उसके ज़हन में बनी हुई थी। उसे अपनी इज्ज़त के तार तार हो जाने का इतना दुख न होता जितना आज उसे इस बात पर हो रहा था कि उसका चचेरा भाई उसे नफ़रत और घृणा की दृष्टि से देख कर इस तरह उसके सामने से मुह फेर कर चला गया था जैसे वो उसे पहचानता ही न था। नीलम और विराज दोनो ही हमउमर थे किन्तु नीलम का बिहैवियर भी रितू की तरह रहा था विराज के साथ।
उस दिन की घटना ने नीलम के मुकम्मल वजूद को हिला कर रख दिया था। उसने इस घटना के बारे में अपने खुद के पैरेंट्स को बिलकुल भी नहीं बताया था।
मौसी की लड़की को बस बताया था किन्तु उसने उससे भी वादा ले लिया था कि वो उसके घरवालों को ये बात न बताए कभी।
उस दिन की घटना के बाद पहले तो दो दिन नीलम काॅलेज नहीं गई थी किन्तु फिर तीसरे दिन से जाने लगी थी। काॅलेज में हर जगह उसकी नज़रें बस अपने चचेरे भाई विराज को ही ढूॅढ़तीं मगर पिछले कई दिनों से उसे अपना वो चचेरा भाई काॅलेज में कहीं न दिखा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर विराज काॅलेज क्यों नहीं आ रहा? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसकी वजह से उसने ये काॅलेज ही छोंड़ दिया हो। ये सोच कर ही नीलम की जान उसके हलक में आकर फॅस जाती। वो सोचती कि अगर विराज ने सच में उसकी ही वजह से काॅलेज छोंड़ दिया होगा तो ये कितनी बड़ी बात है। मतलब कि आज के समय में विराज उससे इतनी नफ़रत करता है कि वो उसे देखना तक गवाॅरा नहीं करता। ये सब बातें नीलम को रात दिन किसी ज़हरीले सर्प की भाॅति डसती रहती थी।
"बस एक बार।" नीलम के मुख से हर बार बस यही बात निकलती____"सिर्फ एक बार फिर से मुझे मिल जाओ मेरे भाई। तुमसे मिल कर मैं अपने किये की माफ़ी माॅगना चाहती हूॅ। मुझे एहसास है कि मेरे भाई कि मैने बचपन से लेकर अब तक तुम्हें सिर्फ दुख दिया है। तुम्हें तरह तरह की बातों से जलील किया था। मगर एक तुम थे कि मेरी उन कड़वी बातों का कभी भी बुरा नहीं मानते थे। जबकि कोई और होता तो जीवन भर मुझे देखना तक पसंद न करता। मुझे सब कुछ अच्छी तरह से याद है भाई। मेरे माॅम डैड ने हमेशा हम भाई बहनों को यही सिखाया था कि तुम सब बुरे लोग हो इस लिए हम तुमसे दूर रहें और कभी भी किसी तरह का कोई मेल मिलाप न रखें। हम बच्चे ही तो थे भाई, जैसा माॅ बाप सिखाते थे उसी को सच मान लेते थे और फिर इस सबकी आदत ही पड़ गई थी। मगर उस दिन तुमने मेरी इज्ज़त बचा कर ये जता दिया कि तुम बुरे नहीं हो सकते। जिस तरह से तुम मुझे देख कर नफ़रत व घृणा से अपना मुह मोड़ कर चले गए थे, उससे मुझे एहसास हो चुका था कि तुमने जो किया वो एक ऊॅचे दर्ज़े का कर्म था और जो मैंने अब तक किया था वो हद से भी ज्यादा निचले दर्ज़े का कर्म था। मुझे बस एक बार मिल जाओ राज। मैं तुमसे अपने गुनाहों की माफ़ी माॅगना चाहती हूॅ। तुम जो भी सज़ा दोगे उस सज़ा को मैं खुशी खुशी कुबूल कर लूॅगी। प्लीज़ राज, बस एक बार मुझे मिल जाओ। तुम काॅलेज क्यों नहीं आ रहे हो? क्या इतनी नफ़रत करते हो तुम अपनी इस बहन से कि जिस काॅलेज में मैं हूॅ वहाॅ तुम पढ़ ही नहीं सकते? ऐसा मत करना मेरे भाई। वरना मैं अपनी ही नज़रों में इस क़दर गिर जाऊॅगी कि फिर उठ पाना मेरे लिए असंभव हो जाएगा।"
ये सब बातें अपने आप से ही करना जैसे नीलम की दिनचर्या में शामिल हो गया था। उसके मौसी की लड़की उसे इस बारे में बहुत समझाती मगर नीलम पर उसकी बातों का कोई असर न होता।
काॅलेज में हुई घटना से नीलम थोड़ा गुमसुम सी रहने लगी थी। मगर इसका कारण यही था कि विराज काॅलेज नहीं आ रहा था। वो हर रोज़ समय पर काॅलेज पहुॅच जाती और सारा दिन काॅलेज में रुकती। उसकी नज़रें हर दिन अपने भाई को तलाश करती मगर अंत में उन ऑखों में मायूसी के साथ साथ ऑसू भर आते और फिर वो दुखी भाव से घर लौट जाती। कालेज के बाॅकी स्टूडेंट्स नार्मल ही थे। उस घटना के बाद किसी ने कभी कोई टीका टिप्पणी न की थी।
कुछ देर ऐसे ही सोचो में गुम वह बेड पर पड़ी रही उसके बाद वो उठी और बाथरूम की तरफ बढ़ गई। बाथरूम में फ्रेश होने के बाद वो वापस कमरे में आई और काॅलेज के यूनीफार्म पहन कर तथा कंधे पर एक मध्यम साइज़ का बैग लेकर वो कमरे से बाहर की तरफ बढ़ी ही थी कि उसका मोबाइल बज उठा। उसने बैग के ऊपरी हिस्से की चैन खोला और अपना मोबाइल निकाल कर स्क्रीन पर नज़र आ रहे "माॅम" नाम को देखा तो उसने काल रिसीव कर मोबाइल कानों से लगा लिया।
"............।" उधर से प्रतिमा ने कुछ कहा।
"क्याऽऽऽ????" नीलम के हाॅथ से मोबाइल छूटते छूटते बचा था। उसके हलक से जैसे चीख सी निकल गई थी, बोली___"ये ये आप क्या कह रही हैं माॅम? डैड को सीबीआई वाले ले गए? मगर क्यों??? आख़िर ऐसा क्या किया है डैड ने?"
"............।" उधर से प्रतिमा ने फिर कुछ कहा।
"ओह अब क्या होगा माॅम?" प्रतिमा की बात सुनने के बाद नीलम ने संजीदगी से कहा___"क्या रितू दीदी ने कुछ नहीं किया? वो भी तो एक पुलिस ऑफिसर हैं?"
"..............।" उधर से प्रतिमा ने कुछ देर तक कुछ बात की।
"क्याऽऽ???" नीलम बुरी तरह उछल पड़ी____"ये आप क्या कह रही हैं? दीदी भला ऐसा कैसे कर सकती हैं माॅम? नहीं नहीं, आपको और डैड को ज़रूर कोई ग़लतफहमी हुई है। रितू दीदी ये सब कर ही नहीं सकती हैं। आप तो जानती हैं कि दीदी ने कभी उसकी तरफ देखना तक पसंद नहीं किया था। फिर भला आज वो कैसे उसका साथ देने लगीं? ये तो इम्पाॅसिबल है माॅम।"
"...........।" उधर से प्रतिमा ने फिर कुछ कहा।
"मैं इस बारे में दीदी से बात करूॅगी माॅम।" नीलम ने गंभीरता से कहा___"उनसे पूछूॅगी कि आख़िर वो ये सब क्यों कर रही हैं?"
"............।" उधर से प्रतिमा ने झट से कुछ कहा।
"क्यों नहीं पूॅछ सकती माॅम?" नीलम ने ज़रा चौंकते हुए कहा___"आख़िर पता तो चलना ही चाहिए कि उनके मन में क्या है अपने पैरेंट्स के प्रति? इस लिए मैं उनसे फोन लगा कर ज़रूर इस बारे में बात करूॅगी।"
"..........।" उधर से प्रतिभा ने फिर कुछ कहा।
"मैं भी आ रही हूॅ माॅम।" नीलम ने कहा___"ऐसे समय में में मुझे अपने माॅ डैड के पास ही रहना है। दूसरी बात मैं देखना चाहती हूॅ कि रितू दीदी ये सब कैसे करती हैं अपने ही माॅ बाप और भाई के खिलाफ़?"
"...............।" उधर से प्रतिमा ने कुछ कहा।
"ओके माॅम।" नीलम ने कहा और काल कट कर दिया।
इस वक्त उसके दिलो दिमाग़ में एकाएक ही तूफान सा चालू हो गया था।
मन में तरह तरह के सवाल उभरने लगे थे। जिनका जवाब फिलहाल उसके पास न था किन्तु जानना आवश्यक था उसके लिए। दरवाजे की तरफ न जाकर वह वापस पलट कर बेड पर बैठ गई और गहन सोच में डूब गई।
"डैड को सीबीआई वाले अपने साथ ले गए।" नीलम मन ही मन सोच रही थी___"वजह ये कि उनके शहर वाले मकान से भारी मात्रा में चरस अफीम व ड्रग्स जैसी गैर कानूनी चीज़ें सीबीआई वालो को बरामद हुई। सवाल ये उठता है कि क्या सच में डैड इस तरह का कोई ग़ैर कानूनी धंधा करते हैं? वहीं दूसरी तरफ रितू दीदी आज कल अपने ही पैरेंट्स के खिलाफ़ जाकर राज का साथ दे रही हैं। भला ये असंभव काम संभव कैसे हो सकता है? आख़िर ऐसा क्या हुआ है कि दीदी माॅम डैड के सबसे बड़े दुश्मन का साथ देने लगी हैं? माॅम ने बताया कि राज गाॅव आया था, इसका मतलब इसी लिए वो काॅलेज नहीं आ रहा था। मगर वो गाॅव गया किस लिए था? और गाॅव में ऐसा क्या हुआ है कि दीदी अपने उस चचेरे भाई का साथ देने लगीं जिसे वो कभी देखना भी पसंद नहीं करती थीं?"
नीलम के ज़हन में हज़ारों तरह के सवाल इधर उधर घूमने लगे थे मगर नीलम को ये सब बातें हजम नहीं हो रही थी। सोचते सोचते सहसा नीलम के दिमाग़ की बत्ती जली। उसके मन में विचार आया कि वो खुद भी तो कभी राज को अपना भाई नहीं समझती थी जबकि आज हालात ये हैं कि वो अपने उसी भाई से मिल कर अपने उन गुनाहों की उससे माफ़ी माॅगना चाहती है। कहीं न कहीं उसका अपने इस भाई के प्रति हृदय परिवर्तन हुआ था तभी तो उसके दिल में ऐसे भावनात्मक भाव आए थे। दूसरी तरफ रितू दीदी भी राज का साथ दे रही हैं। इसका मतलब कुछ तो ऐसा हुआ है जिसके चलते दीदी का भी राज के प्रति हृदय परिवर्तन हुआ है और वो आज उसका साथ भी दे रही हैं। इतना ही नहीं अपने ही पैरेंट्स के खिलाफ़ राज के साथ लड़ाई लड़ रही हैं।
नीलम को अपना ये विचार जॅचा। उसको एहसास हुआ कि कुछ तो ऐसी बात हुई जिसका उसे इस वक्त कोई पता नहीं है। ये सब सोचने के बाद उसने मोबाइल पर रितू दीदी का नंबर ढूॅढ़ा और काल लगा कर मोबाइल कान से लगा लिया। काल जाने की रिंग बजती सुनाई दी उसे। कुछ ही देर में उधर से रितू ने काल रिसीव किया।
"............।" उधर से रितू ने कुछ कहा।
"मैं तो बिलकुल ठीक हूॅ दीदी।" नीलम ने कहा___"आप बताइये आप कैसी हैं?"
"...........।" उधर से रितू ने फिर कुछ कहा।
"हाॅ दीदी काॅलेज अच्छा चल रहा है और साथ में पढ़ाई भी अच्छी चल रही है।" नीलम ने कहने के साथ ही पहलू बदला___"दीदी, अभी अभी माॅम का फोन आया था मेरे पास। उन्होंने कुछ ऐसा बताया जिसे सुन कर मेरे होश ही उड़ गए हैं। वो कह रही थी कि डैड को सीबीआई वाले ग़ैर कानूनी सामान के चलते अपने साथ ले गए हैं। ये भी कि आप विराज का साथ दे रही हैं।
ये सब क्या चक्कर है दीदी? प्लीज़ बताइये न कि ऐसा क्या हो गया है कि आप अपने ही पैरेंट्स के खिलाफ़ हैं? माॅम कह रही थी कि आपने उनका काल भी रिसीव नहीं किया। वो आपको भी डैड के बारे में सूचित करना चाहती थी।"
".............।" उधर से रितू ने काफी देर तक कुछ कहा।
"बातों को गोल गोल मत घुमाइये दीदी।" नीलम ने बुरा सा मुह बनाया____"साफ साफ बताइये न कि आख़िर क्या बात हो गई है जिसकी वजह से आप माॅम डैड के खिलाफ़ हो कर उस विराज का साद दे रही हैं?"
"...........।" उधर से रितू ने फिर कुछ कहा।
"इसका मतलब आप खुद मुझे कुछ भी बताना नहीं चाहती हैं।" नीलम ने कहा___"और ये कह रही हैं कि सच्चाई का पता मैं खुद लगाऊॅ। ठीक है दीदी, मैं आ रही हूॅ। क्या आपसे मिल भी नहीं सकती मैं?"
"............।" उधर से रितू ने कुछ कहा।
"ठीक है दीदी।" नीलम ने कहा___"लेकिन मैं इतना ज़रूर जानती हूॅ कि बात भले ही चाहे जो कुछ भी हुई हो मगर ऐसा नहीं होना चाहिए कि बच्चे अपने माॅ बाप से इस तरह खिलाफ़ हो जाएॅ।"
इतना कहने के बाद नीलम ने काल कट कर दिया और फिर दुखी भाव से बेड पर कुछ देर बैठी जाने क्या सोचती रही। उसके बाद जैसे उसने कोई फैसला किया और फिर उठ कर काॅलेज की यूनिफार्म को उतारने लगी। कुछ ही देर में उसने दूसरे कपड़े पहन लिए और फिर कमरे से बाहर निकल गई।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
इधर विराज एण्ड पार्टी की ट्रेन अपने निर्धारित समय से कुछ ही समय की देरी से आख़िर मुम्बई पहुॅच ही गई थी। सब लोग ट्रेन से बाहर आए और फिर प्लेटफार्म से बाहर की तरफ निकल गए। विराज ने मुम्बई पहुॅचने से पहले ही जगदीश ओबराय को फोन कर दिया था। इस लिए जैसे ही ये लोग स्टेशन से बाहर आए वैसे ही जगदीश ओबराय बाहर मिल गया। उसके साथ एक कार और थी। सब लोग कार मे बैठ कर घर के लिए निकल गए।
रास्ते में जगदीश अंकल ने मुझे बताया कि उन्होंने माॅ से बात कर ली है। पहले तो माॅ मेरी वापसी की बात सुन कर नाराज़ हुईं। मगर जगदीश अंकल ने उन्हें सारी बात तरीके से बताई और ये यकीन दिलाया कि मुझे कुछ नहीं होगा तब जाकर वो राज़ी हुई थी। लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि वो एक बार मुझे देखना चाहती हैं। अतः अब मैं इन लोगों के साथ ही घर तक जा रहा था। वरना मेरा प्लान ये था कि मैं यहाॅ से वापस उसी ट्रेन से लौट जाता।
मुम्बई से वापसी के लिए इसी ट्रेन को लगभग कुछ घण्टे बाद जाना था इस लिए मैं बड़े आराम से गर जाकर माॅ से मिल सकता था। ख़ैर, कुछ ही समय बाद हम सब घर पहुॅच गए। घर पर सब एक दूसरे से मिले। करुणा चाची जब माॅ से मिली तो बहुत रो रही थी और बार बार माॅ से माफ़ियाॅ माॅग रही थी। माॅ ने उन्हें अपने सीने से लगा लिया था। करुणा चाची को वो हमेशा अपनी छोटी बहन की तरह मानती थी और प्यार करती थी। आशा दीदी और उनकी माॅ से भी मेल मिलाप हुआ। मिलने मिलाने में ही काफी समय ब्यतीत हो गया था।
मैं अपने कमरे में जाकर फ्रेश हो गया था। आदित्य भी फ्रेश हो गया था। उसे मेरे साथ ही वापस गाॅव जाना था। निधी भी सबसे मिली। करुणा चाची ने उसे ढेर सारा प्यार व स्नेह दिया था। दिव्या और शगुन को माॅ ने अपने सीने से ही छुपकाया हुआ था। अभय चाचा खुश थे कि उनके बीवी बच्चे सही सलामत यहाॅ आ गए थे। अब उन्हें उनके लिए कोई फिक्र नहीं थी। शायद यही वजह थी कि वो खुद भी मेरे साथ चलने की बात करने लगे थे। उनका कहना था कि वो खुद भी इस जंग में हिस्सा लेंगे और अपने बड़े भाई से इस सबका बदला लेंगे। मगर मैने और जगदीश अंकल ने उन्हें समझा बुझा कर मना कर दिया था।
मैने एक बात महसूस की थी कि निधी का बिहैवियर मेरे प्रति कुछ अलग ही था। इसके पहले वह हमेशा मेरे पषास में ही रहने की कोशिश करती थी जबकि अब वो मुझसे दूर दूर ही रह रही थी। यहाॅ तक कि मेरी तरफ देख भी नहीं थी वो। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वो ऐसा क्यों कर रही थी। मैने एक दो बार खुद उससे बात करने की कोशिश की मगर वो किसी न किसी बहाने से मेरे पास से चली ही जाती थी। मुझे उसके इस रूखे ब्यवहार से तक़लीफ़ भी हो रही थी। वो मेरी जान थी, मैं उसकी बेरुखी पल भर के लिए भी सह नहीं सकता था मगर सबके सामने भला मैं उससे इस बारे कैसे बात कर सकता था? मेरे पास वक्त नहीं था, इस लिए मैने मन में सोच लिया था कि सब कुछ ठीक करने के बाद मैं उससे बात करूॅगा और उसकी किसी भी प्रकार की नाराज़गी को दूर करूॅगा।
मैं माॅ से मिला तो माॅ मेरी वापसी की बात से भावुक हो गईं। उन्हें पता था कि मैं वापस किस लिए जा रहा हूॅ इस लिए वो मुझे बार बार अपना ख़याल रखने के लिए कह रही थी। ख़ैर मैने उन्हें आश्वस्त कराया कि मैं खुद का ख़याल करूॅगा और मुझे कुछ नहीं होगा।
चलने से पहले मैने सबसे आशीर्वाद लिया और फिर आदित्य के साथ वापसी के लिए चल दिया। मेरे साथ जगदीश अंकल भी थे। पवन और आशा दीदी मुझे अपना ख़याल रखने का कहा और खुशी खुशी मुझे विदा किया। हलाॅकि मैं जानता था कि वो अंदर से मेरे जाने से दुखी हैं। उन्हें मेरी फिक्र थी। अभय चाचा ने मुझे सम्हल कर रहने को कहा। करुणा चाची ने मुझे प्यार दिया और विजयी होने का आशीर्वाद दिया। मैं दिव्या और शगुन को प्यार व स्नेह देकर निधी की तरफ देखा तो वो कहीं नज़र न आई। मैं समझ गया कि वो मुझसे मिलना नहीं चाहती है। इस बात से मुझे तक़लीफ़ तो हुई किन्तु फिर मैंने उस तक़लीफ़ को जज़्ब किया और जगदीश अंकल के साथ कार में बैठ कर वापस रेलवे स्टेशन की तरफ चल दिया।
रेलवे स्टेशन पहुॅच कर मैं और आदित्य कार से उतरे। जगदीश अंकल ने मुझे एक पैकिट दिया और कहा कि मैं उसे अपने बैग में चुपचाप डाल लूॅ। मैने ऐसा ही किया। उसके बाद जगदीश अंकल से मेरी कुछ ज़रूरी बातें हुईं और फिर मैं और आदित्य प्लेटफार्म की तरफ बढ़ गए।
ट्रेन वापसी के लिए बस चलने ही वाली थी। हम दोनो ट्रेन में अपनी अपनी शीट पर बैठ गए। मैने मोबाइल से रितू दीदी को फोन किया और उन्हें बताया कि सब लोगों को मैने सुरक्षित पहुॅचा दिया है और अब मैं वापस आ रहा हूॅ। रितू दीदी इस बात से खुश हो गईं। फिर उन्होंने मुझे अख़बार में छपी ख़बर के बारे में बताया और पूॅछा कि ये सब क्या है तो मैने कहा कि मिल कर बताऊॅगा।
रितू दीदी से बात करने के बाद मैं आदित्य से बातें करने लगा। तभी मेरी नज़र एक ऐसे चेहरे पर पड़ी जिसे देख कर मैं चौंक पड़ा और हैरान भी हुआ। मेरे मन में सवाल उठा कि क्या उसने मुझे देख लिया होगा????? मैने अपनी पैंट की जेब से रुमाल निकाल कर अपने मुख पर बाॅध लिया और फिर आराम से आदित्य से बातें करने लगा। किन्तु मेरी नज़र बार बार उस चेहरे पर चली ही जाती थी। जिस चेहरे पर मैं एक अजीब सी उदासी देख रहा था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,
देरी के लिए मैं तहे दिल से माफ़ी चाहता हूॅ दोस्तो। बीच में मैं काम की वजह से बहुत ज्यादा ब्यस्त हो गया था। अपडेट कल ही तैयार हो गया था और मैं अपडेट को आप सबके सामने हाज़िर भी करना चाहता था, मगर इस फोरम की साइट मेरे मोबाइल पर खुल ही नहीं रही थी। अभी सुबह मैने फिर से ओपेन किया तो खुल गई, तो मैने आपके सामने अपडेट हाज़िर कर दिया।
आप सबकी खूबसूरत प्रतिक्रिया और शानदार रिव्यू का इन्तज़ार रहेगा,,,,,,,,
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट........《 50 》
अब तक,,,,,,,,
मैं माॅ से मिला तो माॅ मेरी वापसी की बात से भावुक हो गईं। उन्हें पता था कि मैं वापस किस लिए जा रहा हूॅ इस लिए वो मुझे बार बार अपना ख़याल रखने के लिए कह रही थी। ख़ैर मैने उन्हें आश्वस्त कराया कि मैं खुद का ख़याल करूॅगा और मुझे कुछ नहीं होगा।
चलने से पहले मैने सबसे आशीर्वाद लिया और फिर आदित्य के साथ वापसी के लिए चल दिया। मेरे साथ जगदीश अंकल भी थे। पवन और आशा दीदी मुझे अपना ख़याल रखने का कहा और खुशी खुशी मुझे विदा किया। हलाॅकि मैं जानता था कि वो अंदर से मेरे जाने से दुखी हैं। उन्हें मेरी फिक्र थी। अभय चाचा ने मुझे सम्हल कर रहने को कहा। करुणा चाची ने मुझे प्यार दिया और विजयी होने का आशीर्वाद दिया। मैं दिव्या और शगुन को प्यार व स्नेह देकर निधी की तरफ देखा तो वो कहीं नज़र न आई। मैं समझ गया कि वो मुझसे मिलना नहीं चाहती है। इस बात से मुझे तक़लीफ़ तो हुई किन्तु फिर मैंने उस तक़लीफ़ को जज़्ब किया और जगदीश अंकल के साथ कार में बैठ कर वापस रेलवे स्टेशन की तरफ चल दिया।
रेलवे स्टेशन पहुॅच कर मैं और आदित्य कार से उतरे। जगदीश अंकल ने मुझे एक पैकिट दिया और कहा कि मैं उसे अपने बैग में चुपचाप डाल लूॅ। मैने ऐसा ही किया। उसके बाद जगदीश अंकल से मेरी कुछ ज़रूरी बातें हुईं और फिर मैं और आदित्य प्लेटफार्म की तरफ बढ़ गए।
ट्रेन वापसी के लिए बस चलने ही वाली थी। हम दोनो ट्रेन में अपनी अपनी शीट पर बैठ गए। मैने मोबाइल से रितू दीदी को फोन किया और उन्हें बताया कि सब लोगों को मैने सुरक्षित पहुॅचा दिया है और अब मैं वापस आ रहा हूॅ। रितू दीदी इस बात से खुश हो गईं। फिर उन्होंने मुझे अख़बार में छपी ख़बर के बारे में बताया और पूॅछा कि ये सब क्या है तो मैने कहा कि मिल कर बताऊॅगा।
रितू दीदी से बात करने के बाद मैं आदित्य से बातें करने लगा। तभी मेरी नज़र एक ऐसे चेहरे पर पड़ी जिसे देख कर मैं चौंक पड़ा और हैरान भी हुआ। मेरे मन में सवाल उठा कि क्या उसने मुझे देख लिया होगा????? मैने अपनी पैंट की जेब से रुमाल निकाल कर अपने मुख पर बाॅध लिया और फिर आराम से आदित्य से बातें करने लगा। किन्तु मेरी नज़र बार बार उस चेहरे पर चली ही जाती थी। जिस चेहरे पर मैं एक अजीब सी उदासी देख रहा था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,,
उधर रितू के फार्महाउस पर!
सुबह का नास्ता पानी करने के बाद रितू बाहर की तरफ निकल गई। बाहर आकर उसने देखा कि सामने मेन गेट पर हरिया काका और शंकर काका आपस में कुछ बातें कर रहे थे। रितू उन दोनो को देखते ही उनकी तरफ बढ़ चली। कुछ ही समय में वो उन दोनो के पास पहुॅच गई। रितू को अपनी तरफ आता देख उन दोनों ने अपनी बात बंद कर दी और सम्हल कर खड़े हो गए।
"क्या हाल चाल हैं आप दोनो के काका?" रितू ने उन दोनों की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए कहा___"आप दोनों ने नास्ता पानी किया कि नहीं?"
"हम दोनों ने अभी थोड़ी देर पहले ही नास्ता पानी किया है बिटिया।" शंकर ने कहा___"बिंदिया भाभी हमारा काफी बेहतर तरीके से ख़याल रखती हैं।"
"ये तो बहुत अच्छी बात है काका।" रितू ने कहा___"काकी हैं ही इतनी अच्छी कि उन्हें सबकी फिक्र रहती है।"
"हाॅ ये बात तो सच है बिटिया।" शंकर ने कहा___"हरिया बहुत किस्मत वाला है जो इसे बिंदिया भाभी जैसी जोरू मिली हैं।"
"अरे ई का कहथो रे बुड़बक?" हरिया ने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा___"किस्मत वाली ता ऊ है ससुरी जो हमरे जइसन मरद मिल गवा है ऊखा। हम ता पहिले से ही किस्मत वाला हूॅ रे।"
"देखा बिटिया।" शंकर ने रितू से कहा___"ये अपने आपको जाने क्या समझता रहता है? जबकि सच्चाई तो यही है कि जबसे बिंदिया भाभी से इसका ब्याह हुआ है तब से इसके भाग्य खुल गए हैं।"
"खूब समझ रहा हूॅ रे तोहरी बातन का।" हरिया ने सिर हिलाते हुए कहा___"तू ससुरे ऊखर बहुतै बड़ाई करथै रे। तोहरे मन मा का है ई हम बहुतै अच्छी तरह से जानत हूॅ। इतना बुड़बक न हूॅ हम। पर तू ससुरे हमरी एक बात कान खोल के सुन ले, अउर ऊ या के कउनव दिन सारे हमरी मेहरारू का लइके भाग न जइहे समझा का?"
"ओए ये क्या बकवास कर रहा है तू?" शंकर ने एकदम से आवेश में आकर कहा__"ऐसा तू सोच भी कैसे सकता है मेरे बारे में? तू अच्छी तरह जानता है कि मेरे मन में ऐसी बदनीयती नहीं है।
मैं तो भाभी की बहुत इज्ज़त करता हूॅ और उन्हें भाभी माॅ जैसा ही मानता हूॅ।"
"ई ता ससुरे तू मुह से बोल रहा है न।" हरिया ने कहा__"केहू के मन मा का है ई कउन जानथै भला, हाॅ?"
"तू जैसा है वैसा ही दूसरे को भी समझता है।" शंकर ने कहा___"इस लिए मुझे अपने लिए सफाई देने की कोई ज़रूरत नहीं है। ईश्वर जानता है कि मेरे अंदर क्या है?"
"मैं जानती हूॅ काका कि आपके मन में किसी के लिए कोई मैल नहीं है।" रितू ने कहा___"हरिया काका तो आपको बस छेड़ रहे हैं लेकिन मैं ये कह रही हूॅ आप भी शादी कर लीजिए और मेरे लिए एक अच्छी सी काकी ले आइये।"
"ये क्या कह रही हो बिटिया?" शंकर हॅसा___"अब भला इस उमर में कौन लड़की मुझसे ब्याह करेगी? अब तो ये जीवन ऐसे ही कटेगा।"
"अरे अभी भी आप शादी कर सकते हैं काका।" रितू ने कहा___"और आपको करना ही पड़ेगा। जब आप शादी कर लेंगे तब हरिया काका आपको ये सब कह कर छेड़ेंगे नहीं।"
"हम ता ई ससुरे का समझाय समझाय के थक गयन बिटिया।" हरिया ने कहा___"पर ई ससुरा हमरी कउनव बात मानतै नाहीं है। कहैं का ता ई हमका आपन बहुतै बड़का पक्का यार मानथै पर ई बात भी सच हाय कि ई हमरी बात भी नाहीं सुनत है।"
"आप समझ नहीं रहे हैं काका।" रितू ने सहसा मुस्कुराते हुए कहा___"शंकर काका को दरअसल बिंदिया काकी जैसी बीवी चाहिए। बात भी सही है काका अगर बिंदिया काकी जैसी बीवी शंकर काका को भी मिल जाए तो इनका जीवन और भी ज्यादा सॅवर जाए।"
"कारे ईहै बात हा का?" हरिया काका ने तिरछी नज़र से शंकर की तरफ देखा___"अउर अगर ईहै बात हा ता ससुरे ई बात तै हमका पहिले काहे ना बताए रहे? सरवा बेकार मा अब तक ते रॅडवा घूमत रहे। चल अउनव बात ना हा। हम तोहरे खातिर ऊ ससुरी बिंदिया जइसनै जोरू ढूॅढ़ब। हमरे इहाॅ अइसन मेहरारू केर कउनव कमी ना हा।"
"ये तो अच्छी बात है काका।" रितू ने मुस्कुरा कर कहा__"आप जल्दी से वधू का इंतजाम कीजिए। उसके बाद चट मॅगनी पट ब्याह हो जाएगा। और हाॅ शंकर काका की शादी का सारा खर्चा मैं करूॅगी।"
"ये तुम क्या कह रही हो बिटिया?" शंकर काका एकदम से चौंक पड़ा__"भला मैं तुमसे कैसे खर्चा करवा सकता हूॅ? अरे तुमको तो मैं अपनी बेटी ही मानता हूॅ और बेटी से इस तरह अपने काम के लिए धन खर्चा करवाना अच्छी बात नहीं है। मुझे पाप लगेगा बिटिया।"
"आप भी कमाल करते हैं काका।" रितू ने कहा__"जीवन भर माॅ बाप अपने बच्चों के ऊपर अपनी पाई पाई खर्च करते रहते हैं तो क्या बच्चों का फर्ज़ नहीं बनता कि वो भी अपने माॅ बाप के ऊपर अपनी कमाई का पाई पाई खर्च कर दें? अगर आप मुझे अपनी बेटी मानते हैं तो मैं भी तो आपको अपने पिता जैसा ही मानती हूॅ। और ये मेरी इच्छा ही नहीं बल्कि खुशी की बात है कि मैं अपने शंकर काका की शादी में खूब पैसा खर्च करूॅ। मैने फैंसला कर लिया है, इस लिए अब आप इस बारे में कुछ भी नहीं कहेंगे? वरना कभी बात नहीं करूॅगी आपसे।
"
रितू की बातें सुन कर शंकर हैरत से देखता रह गया उसे। फिर सहसा जाने उसके अंदर कैसा भावनाओं का तूफान उठा कि उसकी ऑखों से झर झर करके ऑसू बह चले। उसके चेहरे पर एकाएक ही गहन पीड़ा और दुख के भाव उभर आए। ये देख कर रितू आगे बढ़ी और उसकी ऑखों से बह रहे ऑसुओं को अपने हाॅथ से पोंछा।
"ये क्या काका?" रितू ने कहा__"आप रों रहे हैं? क्या मुझसे कुछ ग़लती हो गई?"
"नहीं नहीं बिटिया।" शंकर एकदम से कह उठा___"तुमसे भला कोई ग़लती कैसे हो सकती है? तुम तो एक नेक दिल बच्ची हो बिटिया। आज वर्षों बाद इतनी खुशी महसूस हुई कि वो खुशी ऑसू बन कर इन ऑखों से छलक पड़ी। इस दुनियाॅ में इससे पहले बहुत दुख दर्द सहे थे मैने। मगर जबसे यहाॅ आया हूॅ तो ऐसा लगा जैसे मैं अकेला नहीं हूॅ बल्कि मेरा भी कोई अपना है। जिसे मेरी फिक्र है।"
"मैं तो शुरू से ही आपको अपना ही मानती आ रही हूॅ काका।" रितू ने कहा___"मगर आप आज भी मुझे अपना नहीं मानते हैं। अगर मानते तो मेरे और हरिया काका के पूछने पर अपने बारे में वो सब कुछ बताते जिसकी वजह से आप कभी अपने घर नहीं जाते हैं।"
"उस सबको बताने का कोई मतलब नहीं है बिटिया?" शंकर ने कहा___"अतीत किसी का भी हो वो जब भी याद आता है तो हमें दुख और उदासियाॅ ही देता है। मैं उस सबको याद नहीं करना चाहता। क्योंकि बड़ी मुश्किल से मैने खुद को इस हद तक सम्हाला है।"
"अपने अंदर के दर्द को बयाॅ कर देने से मन का बोझ काफी हल्का हो जाता है काका।" रितू ने कहा___"ये तो अच्छी बात है कि आप अपने उस दर्द से उबर कर आज सम्हल चुके हैं। लेकिन ये भी सच है कि अपने अंदर इतने सारे दुख दर्द को दबा के रखना भी अच्छी बात नहीं है। ऐसे में वो दर्द नासूर बन जाता है और हमें एक पल भी सुकून से जीने नहीं देता। इस लिए आप अपने के उस दुख दर्द को बाहर निकाल दीजिए और फिर नये सिरे से अपने जीवन की नई शुरूआत कीजिए।"
"रितू बिटिया बहतै भले की बात करथै शंकरवा।" हरिया ने कहा___"जो बीत गया हा उसे ता भूला दे मा ही भलाई हा। हम सरवा तोसे कब से रहा हूॅ के तू अपना ब्याह करके जीवन मा आगे बढ़। पर तू ससुरा हमरी सुनतै नाहीं है?"
"अब तो बिटिया ने अपना फैंसला सुना ही दिया है हरिया।" शंकर ने कहा___"और जिस अपनेपन से सुनाया है उसे अगर मैं ना मानूॅ तो फिर धिक्कार ही होगा मुझ पर। इस लिए अब मैं ज़रूर ब्याह करूॅगा यार।"
"हाॅ लेकिन उससे पहले।" रितू ने कहा___"मैं ये भी जानना चाहती हूॅ काका कि आपके साथ ऐसा क्या हो गया था जिसकी वजह से आप कभी अपने घर नहीं जाते और ना ही अपने घर वालों से कभी कोई मतलब रखते हैं? आप हमें वो सब कुछ अभी बताएॅगे काका।"
"ठीक है बिटिया।" शंकर ने गहरी साॅस ली___"तुम अगर इतना ही ज़ोर दे रही हो तो सब कुछ बताता हूॅ तुम्हें। मैं उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाॅव महोबा का निवासी हूॅ। मैं छोटी जाति का हूॅ।
मेरा बाप बल्ली रावत एक मिस्त्री था। जो मकानों में ईंटे की जोड़ाई का काम करता था। हम तीन भाई और दो बहन थे। मेरी माॅ बहुत शान्त स्वभाव की थी। अपने सभी बच्चों को वह बहुत प्यार करती थी। भाई बहनों में मैं सबसे बड़ा था। मैं माॅ पर गया था इस लिए मेरा स्वभाव भी सबके प्रति प्यार भरा ही था। उस वक्त मैं पच्चीस साल का हो गया था और अपने बापू के साथ रह कर मिस्त्रीगीरी पूरी तरह सीख चुका था। इस लिए जहाॅ भी काम मिलता मैं बापू के साथ ही रह कर उनके काम में हाॅथ बटाता था। मेरे सहयोग का असर ये हुआ की घर के आर्थिक हालात पहले की अपेक्षा काफी बेहतर हो गए। हमारी जात बिरादरी के कुछ लोग मेरे बापू से अक्सर मेरा ब्याह कर देने को कहते रहते थे। पर पता नहीं बापू उन सबकी बातों को क्यों अनसुना कर देता था? इधर पास के ही एक गाॅव में हमारी ही जात बिरादरी में एक लड़की थी चंदा। जिसे मैं काफी पसंद करता था। वो भी मुझे बहुत पसंद करती थी। हमें जब भी समय मिलता हम एक दूसरे से ज़रूर मिल लिया करते थे। कहते हैं कि इश्क़ मुश्क़ कभी छुपता नहीं इस लिए इस बात का पता मेरे बापू को भी हो गया था। जिससे बापू मुझे इसके लिए डाॅट भी देता था कभी कभी। ख़ैर सब कुछ ठीक ही चल रहा था कि एक दिन हर दिन की भाॅति मैं बापू के साथ काम पर गया हुआ था। गाॅव में ही काम चालू था तो दोपहर के समय सहसा मेरी बहन रीना भागते हुए आई और बताया कि अम्मा मर गई है। उसकी बात सुन कर हम दोनो बाप बेटा भौचक्के से रह गए। मुझे तो यकीन ही नहीं हुआ कि अम्मा मर गई है। रीना ने बताया कि अम्मा नहाने के लिए बाल्टी को रस्सी से बाॅध कर कुएॅ से पानी खींच रही थी। तभी जाने कैसे उसका पाॅव फिसल गया और वो कुएॅ में गिर गई। अम्मा को तैरना नहीं आता था इस लिए वो पानी में डूब गई और मर गई। रीना ने बताया कि जब काफी देर तक अम्मा नहा कर न आई तो वह घर के पिछवाड़े पर बने कुएॅ में ये देखने गई कि अम्मा अब तक आई क्यों नहीं? लेकिन कुएॅ में अम्मा को न पा कर रीना कुएॅ के आस पास देखने लगी। फिर सहसा उसकी नज़र कुएॅ के अंदर पड़ी तो अम्मा को पानी की सतह पर औधे मुॅह लेटी पाया। रीना को समझते देर न लगी कि अम्मा मर गई है, बस ये कहानी थी अम्मा के मर जाने की। रीना की सारी बातें सुन कर हम दोनो बाप बेटा काम छोंड़ कर घर आ गए। गाॅव के कुछ लोगों की मदद से मेरे भाईयों ने अम्मा को कुएॅ से निकाल लिया था।
अम्मा के मर जाने का दुख सबसे ज्यादा मुझे था। लेकिन अब हो भी क्या सकता था। अम्मा का क्रिया कर्म किया गया और कुछ दिन में फिर से हमारी दिन चर्या पहले जैसी चलने लगी। अब घर में रोटी पानी मेरी दोनो बहनें ही बनाती थी। मेरे सभी भाई बहन बड़े हो गए थे और जवान भी। अम्मा के मर जाने का दुख मेरे अंदर बना ही रहा पर मैं किसी के सामने उस दुख को दिखाता नहीं था।
कुछ दिन बाद एक बदलाव ये हुआ कि बापू अक्सर रात को देसी ठर्रा(शराब) लगा कर घर आने लगा और घर में सबको अनाप शनाप बकने लगा और गालियाॅ भी देने लगा। हम सब बापू के दारू पीने से परेशान से होने लगे। इधर एक बदलाव ये भी हुआ कि बापू मुझे काम पर लगा कर खुद चार चार घंटे के लिए गायब हो जाता। जबकि मैं सारा दिन काम में लगा रहता और फिर दिन ढले ही घर वापस आता। ऐसे ही दिन गुज़रते रहे।
ऐसे ही एक दिन मैं शाम को घर पहुॅचा। हाथ मुह धोकर खाया पिया और फिर घर के बाहर मैदान में चारपाई लगा कर उसमें लेट गया। दिन भर के काम से मैं काफी थक जाता था इस लिए लेटते ही मुझे नींद आ गई। अभी मुझे सोये हुए कुछ ही समय गुज़रा था कि सहसा किसी ने मेरी पीठ पर ज़ोर की लात मारी। जिससे मैं चारपाई के नीचें गिर गया। अचानक हुए इस हमले से पहले तो मुझे कुछ समझ न आया किन्तु फिर तुरंत ही मेरे अंदर गुस्से का उबाल आ गया। मेरी नज़र मुझे लात मारने वाले पर पड़ी। देखा तो चारपाई के उस पार नशे में झूमता बापू खड़ा था।
"बापू तुमने मुझे मारा क्यों?" मैं लगभर नाराज़गी भरे भाव से पूछा___"और ये क्या तुम हर रोज़ देसी दारू चढ़ा के आ जाते हो। ये अच्छी बात नहीं है बापू।"
"बकवास ना कर समझा।" बापू नशे में झूमता हुआ गरजा___"मैं कुछ भी करू तुझे इससे क्या मतलब? मैं अपने पैसों की दारू पीता हूॅ तेरे बाप की नहीं समझा।"
"मेरे बाप तो तुम ही हो बापू।" मैने कहा___"मैं ये नहीं कहता कि तुम दारू न पियों मगर रोज रोज पीना अच्छी बात नहीं है। इससे तुम्हारी तबियत ख़राब हो जाएगी।"
"अरे वो सब छोंड़।" बापू ने हाॅथ को ऊपर से नीचे की तरफ झटकते हुए कहा___"ये बता कि तू अपनी नई नवेली अम्मा से मिला कि नहीं?"
"नई नवेली अम्मा??" मैं एकदम से चकरा गया__"ये तुम क्या बोल रहे हो बापू?"
"ठीक ही तो बोल रहा हूॅ बुड़बक।" बापू लड़खड़ा सा गया___"अरे आज मैं तुम सबके लिए एक नई अम्मा ले आया हूॅ। मैं जानता हूॅ कि अपनी अम्मा के मर जाने से तुम सब बहुत दुखी थे इस लिए मैने फिर से ब्याह कर लिया और तुम सबके लिए एक अम्मा ले आया।"
मैं बापू की बात सुन कर उछल पड़ा था। हैरत से ऑखें फाड़े नशे में झूमते बापू को देखे जा रहा था। किन्तु तभी मुझे एहसास हुआ कि लगता है बापू को दारू ज्यादा चढ़ गई है इस लिए अनाप शनाप बके जा रहा है।
"अंदर जाओ बापू।" फिर मैने कहा___"तुम्हें दारू आज ज्यादा चढ़ गई है। इस लिए अंदर जाओ और जो थोड़ा बहुत खाना खाना हो खाओ और आराम से सो जाओ।"
"तू साले मुझे बता रहा है कि मुझे चढ़ गई है?" बापू एकदम से चीख पड़ा था, बोला___"अरे इतनी सी बार बराबर दारू मुझे नहीं चढ़ती मादरचोद। मैं जो कह रहा हूॅ उसे मानता क्यों नहीं? चल आ मेरे साथ तुझे दिखाता हूॅ कि अंदर तेरी नई अम्मा है कि नहीं।"
बापू मेरा हाॅथ पकड़ कर अंदर की तरफ खींच कर ले जाने लगा।
मैं चाहता तो अपना हाॅथ एक झटके में उससे छुड़ा लेता मगर मैं कोई बखेड़ा नहीं करना चाहता था इस लिए उसके खींचने पर उसके पीछे पीछे अंदर की तरफ खिंचता चला गया। अंदर बरामदे में मेरे सभी भाई बहन बैठे थे। घर कच्चे मकान का था। बाहर से आने पर पहले बड़ा सा बरामदा पड़ता था, उसके बाद दो कमरे थे। जिसमे एक कमरे में सामान वगैरा रखा रहता था। जबकि दूसरा कमरा बापू का था। कमरे में जो लकड़ी का दरवाजा था उसमें अंदर की तरफ कुण्डी नहीं थी।
बापू मुझे खींचते हुए उसी कमरे की तरफ बढ़ा और झटके से कमरे का दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हो गया। जबकि मैंने तुरंत ही अपना हाॅथ छुड़ा लिया था। अंदर दाखिल होते ही बापू ऊॅची आवाज़ में एक तरफ उॅगली का इशारा करते हुए बोला___"ये देख शंकर, ये है तेरी नई अम्मा। अरे देख न बेटीचोद तुझे यकीन नहीं हो रहा था न। देख ये बैठी है तेरी अम्मा चारपाई पर।"
मैंने अंदर की तरफ सिर करके चारपाई की तरफ देखा तो चौंक पड़ा। सच में अंदर रखी चारपाई पर कोई औरत बैठी थी। नई साड़ी में बड़ा सा घूॅघट किये थी वह। इस लिए मैं उसका चेहरा न देख सका। पर इतना काफी था मुझे हैरत में डालने के लिए। मैं उस औरत को देखने के बाद आश्चर्य से बापू की तरफ देखा। मुझे अपनी तरफ देखता देख बापू बड़े अजीब भाव से मुस्कुराया और फिर कमरे से बाहर बरामदे में आ गया।
"क्यों बापू?" मैने भारी आवाज़ में कहा__"क्यों किया ऐसा? हम कोई बच्चे तो नहीं थे जो हम अम्मा के बिरा जी नहीं सकते थे। तुम तो देख ही रहे हो बापू कि तुम्हारे बच्चे खुद अब ब्याह करने लायक हो गए हैं फिर खुद ब्याह करने की क्या ज़रूरत थी तुम्हें?"
"ज़रूरत थी बेटवा।" बापू ने कहा___"बल्कि बहुत ज़रूरत थी मुझे। तेरी अम्मा तो मर गई मगर मेरी जज्ञस्मानी ज़रूरतों को अब कौन पूरी करता? वैसे तेरी अम्मा के रहते हुए भी कुछ नहीं होता था। अच्छा हुआ साली मर गई। मुझ पर और मेरे लौड़े पर ज़रा सा भी तरस नहीं आता था उसे। जब भी उससे कहता कि आज बहुत दिल कर रहा है एक बार दे दो तो साली ऐसी बिदकती थी जैसे दुधारू गाय हो।"
"ये तुम क्या बकवास कर रहे हो बापू?" मैने पूरी शक्ति से चीखते हुए कहा___"शर्म आनी चाहिए तुम्हें अपने बेटे के सामने उसकी अम्मा के लिए ऐसा बोलने पर।"
"इसमें शर्म कैसी बछुवा?" बापू ढिठाई से मुस्कुराया___"जो सच बात है वही तो बोल रहा हूॅ मैं।"
"मुझे नहीं सुनना तुम्हारी ये बेहूदा बातें।" मैने गुस्से से कहा और पलट कर बाहर की तरफ अपनी चारपाई के पास आ गया। मेरा दिमाग़ बहुत ज्यादा ख़राब हो गया था। मगर ये भी सच था कि अब हो भी क्या सकता था?
मैं अपने अंदर हज़ारों तरह की बातें लिए चुपचाप चारपाई पर लेट गया। मुझे बापू पर बहुत गुस्सा आ रहा था। मगर मैं कुछ कर नहीं सकता था।
इस लिए अपने गुस्से को बड़ी मुश्किल से काबू किये हुए ऑखें बंद करके सोने की कोशिश करने लगा था। मगर कम्बख्त ऑखों में नींद का दूर दूर तक कोई आभास भी नहीं हो रहा था।
अभी मुझे लेटे हुए कुछ ही देर हुई थी कि तभी अंदर से किसी औरत की चीख सुनाई दी। मेरी ऑखें खुल गईं मगर मैं उठा नहीं। मैं समझ चुका था कि बापू अपनी नई नवेली जोरू के पास ही होगा और उसके साथ वही कर रहा होगा जो हर शादी शुदा मर्द औरत करते हैं शादी के बाद। इस लिए मैं चुपोआप लेटा रहा। मैं इस बात से हैरान ज़रूर हुआ कि बापू को ज़रा भी शर्म नहीं है कि घर में उसके पाॅ पाॅच जवान बच्चे मौजूद हैं और वो कमरे से क्या सुना रहा है उन्हें।
मैं ये सब सोच ही रहा था कि एक बार फिर से मेरे कानों में औरत की चीख़ सुनाई दी साथ ही बापू की गालियाॅ भी। किन्तु इस बार मैं चीख़ सुन कर बुरी तरह उछल पड़ा था। क्योंकि चीख़ में शामिल मेरा नाम था। उस आवाज़ को मैं लाखों में पहचान सकता था। ये चंदा की चीख़ थी। जी हाॅ, ये चंदा ही थी। मगर मैं चकित इस बात पर था कि वो यहाॅ कैसे? अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि एक बार फिर से ज़ोरदार चीख़ मेरे कानों पर पड़ी। इस बार मुझे स्पष्ट सुनाई दिया और मुझे बिलकुल भी संदेह न हुआ। ये यकीनन चंदा ही थी, मेरी चंदा। ये जान कर कि वो चीख़ मेरी चंदा की ही है मैं एकदम से पागल सा हो गया और चारपाई से उतर कर बिजली की सी तेज़ी से अंदर की तरफ भागा। पलक झपकते ही मैं बरामदे में पहुॅच गया।
मेरी नज़र कमरे के दरवाजे के पास खड़े मेरे मॅझले भाई जगन पर पड़ी। वो अधखुले दरवाजे से कमरे के अंदर की तरफ देख रहा था। ये देख कर मेरा खून खौल गया। मुझे लगा कि वो अंदर वो सब देख रहा है जो कदाचित मेरा बापू मेरी चंदा के साथ करने की कोशिश कर रहा होगा। मैं भला ये कैसे बर्दास्त कर सकता था? मैने देखा कि बरामदे के दाहिनी तरफ मेरी दोनो बहने यानी रीना तथा मीना ज़मीन पर ही एक पुराना चद्दर बिछा कर लेटी हुई थी और उनके बगल से ही मेरा छोटा भाई मदन लेटा हुआ था। बरामदे के बाईं तरफ कोने में रसोई थी।
जगन को इस तरह चोरी छुपे अंदर की तरफ देखते हुए देख कर मैं तेज़ी से उसकी तरफ बढ़ा और पीछे से ही उसकी शर्ट का कालर पकड़ कर अपनी तरफ खींचा और फिर उसे पलटा कर एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसके गाल पर रसीद कर दिया। उसको इस सबकी उम्मींद हर्गिज़ भी न थी। इधर मैं इतने पर ही न रुका था, बल्कि उसको पकड़ कर पूरी शक्ति से एक तरफ उछाल दिया। वो लड़खड़ाता हुआ दीवार से टकराया और नीचे गिर गया। तभी मेरे कानों में चंदा की चीख़ फिर से पड़ी। मेरा ध्यान उस तरफ गया तो मैं जगन की तरफ न जा कर पलटा और तेज़ी से कमरे के अंदर की तरफ दौड़ गया।
कमरे के अंदर का नज़ारा देख कर मैं गुस्से से पागल हो गया। मेरा बापू चंदा के ऊपर चढ़ा हुआ उसका ब्लाऊज फाड़ रहा था।
नशे की हालत में उसे ज़रा भी होश नहीं था कि वो क्या कर रहा है? बापू के नीचे दबी चंदा बुरी तरह छटपटाए जा रही थी और चीखे जा रही थी। ये सब देख कर मैं उस तरफ बिजली की सी तेज़ी से लपका और फिर मैने बापू को पीछे से पकड़ कर पूरी ताकत से अपनी तरफ खींचा और फिर कमरे के फर्श पर लगभग फेंक दिया। बापू नशे में लड़खड़ाता ज़मीन पर लुढ़कता चला गया था।
"तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरी चंदा को इस तरह हाॅथ लगाने की?" मैने गुस्से से चीखते हुए झुका और बापू को दोनो हाॅथों से पकड़ कर उठा लिया___"तू इतना गिर गया है कि तुझे ये भी होश नहीं आया कि तू किसके साथ ये नीचता कर रहा है?"
"अबे छोंड़ मादरचोद।" बापू नशे में ज़ोर से चिल्लाया__"मुझे अपनी नई नवेली मेहरिया के साथ सुहागरात मना लेने दे। साला कैसा बेटा है तू कि अपने बाप को उसकी मेहरारू के पास भी नहीं जाने देता?"
"ज़ुबान को लगाम दे बापू।" मैने बापू के कालर को पकड़ कर उसे झकझोरते हुए कहा___"वरना यहीं पर ज़िंदा गाड़ दूॅगा तुझे। तुझे पता था न कि मैं चंदा को पसंद करता हूॅ और उसी से शादी करना चाहता हूॅ इसके बावजूद तूने मेरी चंदा से ब्याह कर लिया। ऐसा क्यों किया बापू? चंदा तो तेरी अपनी बेटी के समान ही थी फिर क्यों उससे ब्याह किया तूने? तुझे अपने इस बेटे की खुशियों का ज़रा भी ख़याल नहीं आया?"
"बकवास ना कर हरामखोर।" बापू मुझसे छूटने की कोशिश करते हुए चीखा___"वो तेरी अम्मा है समझे। बार बार मेरी चंदा मेरी चंदा की रट क्यों लगा रहा है तू?"
"क्योंकि चंदा मेरी ही थी बापू।" मैने चीखा___"मैं उससे प्रेम करता था और करता रहूॅगा। तू भी तो जानता था ये सब। फिर क्यों उससे ब्याह रचाया तूने? क्यों अपने बेटे का गर बसने से पहले ही उजाड़ दिया तूने? अरे तुझे अपना ब्याह ही करना था तो किसी दूसरी लड़की से कर लेता बापू। चंदा से ब्याह करके तूने मेरी खुशियों का गला क्यों घोंट दिया?"
"अरे मुझे कुछ नहीं पता था इस बारे में।" बापू ने कहा__"और फिर अगर तू चंदा को पसंद ही करता था और उससे ब्याह ही करना चाहता था तो तुझे बताना चाहिये था न। पर तूने तो कभी बताया ही नहीं। अब अगर मैने उससे ब्याह कर लिया तो इसमे मेरी क्या ग़लती है?"
"सारी ग़लती है तेरी।" मैं पूरी शक्ति से चीखा___"तूने चंदा से उसकी मर्ज़ी के बिना ब्याह किया है। ये बात मैं अच्छी तरह जानता हूॅ। तूने चंदा के बाप को पैसों का लालच दिया होगा। तभी चंदा के बाप ने अपनी बेटी का ब्याह तुझसे किया होगा। उस कसाई को भी अपनी बेटी की खुशियों से कोई लेना देना नहीं था। तभी तो ऑख बंद करके उसने एक बूढ़े से अपनी कम उमर बेटी का ब्याह कर दिया। मुझे पता है कि चंदा इस ब्याह हे खुश नहीं है। अगर खुश होती तो वो इस तरह चीखती नहीं।"
"अरे शुरू शरु में हर औरत थोड़ा बहुत चीखती है उर घबराती है।
" बापू ने कहा___"मगर जब एक बार लौड़ा अंदर गया तो सारी घबराहट और सारा चीखना बंद हो जाता है। वही तो करने जा रहा था मैं। मगर ससुरी ज्यादा ही उछल रही थी। लेकिन कोई बात नहीं, सुहागरात तो मैं मना के ही रहूॅगा।"
मैं बापू की इस बात से बुरी तरह तिलमिला गया। मेरे अंदर गुस्से की ज्वाला धधक उठी। मैं बापू को खींच कर कमरे से बाहर लाया और बरामदे में लाकर ज़ोर का झटका दे कर ज़मीन पर पटक दिया। बापू के मुख से दर्द में डूबी चीख निकल गई। वो मुझे गंदी गंदी गालियाॅ बकने लगा। मेरा गुस्सा और बढ़ गया। मैंने उसे उठा कर दीवार से सटा दिया और उसकी गर्दन पर अपने दोनों हाॅथ ताकत से जमा दिये। नतीजा ये हुआ कि बापू बुरी तरह छटपटाने लगा। उसकी ऑखें बाहर को निकलने के लिए आतुर हो उठीं। मुझे गुस्से में अब कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। मैं मजबूती से बापू का गला दबाए जा रहा। तभी पीछे से किसी ने मेरे सिर पर किसी ठोस चीज़ का वार किया। मेरे हलक से चीख़ निकल गई। ऑखों के सामने पहले तो रंग बिरंगे तारे नाचे उसके बाद ऑखों के सामने अॅधेरा सा छाता चला गया। मैं दोनो हाॅथों से अपना सिर थामे लहरा कर वही बरामदे की ज़मीन पर धड़ाम से गिर पड़ा। उसके बाद मुझे याद नहीं कि आगे क्या हुआ?
जब मुझे होश आया और मेरी ऑखें खुलीं तो एकाएक ही तेज़ प्रकाश से मेरी ऑखें चुॅधिया गईं। मैने धीरे धीरे करके अपनी ऑखें खोलीं तो ऑखों के सामने खुला आसमान नज़र आया। पहले तो मुझे कुछ समझ न आया इसके बाद जब मैने ग़ौर से हर चीज़ को देखा तो थोड़ा थोड़ा समझ आया। मैने झटके से उठने की कोशिश की तो मेरे मुख से दर्द भरी कराह निकल गई। सिर के पिछले भाग में तेज़ पीड़ा हुई थी। मेरा एक हाॅथ स्वतः ही उस चोंट वाले हिस्से पर चला गया। मुझे मेरे हाॅथ में कुछ चिपचिपा सा महसूस हुआ। मैं धीरे धीरे करके उठा और वहीं पर बैठ गया।
बैठ कर मैने इधर उधर देखा तो पता चला कि मैं किसी खेत के बीच पर बैठा हुआ हूॅ। एक तरफ लगभग दो सौ गज की दूरी पर गाॅव की आबादी दिख रही थी। किनारे पर बने अपने घर को पहचानने में मुझ ज़रा भी देर न लगी। इसका मतलब मैं अपने घर के पिछवाड़े ही दो सौ गज की दूरी पर था। मेरे दिमाग़ ने काम करना शुरू किया तो मेरी ऑखों के सामने पिछली रात की सारी घटना किसी चलचित्र की भाॅति घूमने लगी।
सब कुछ याद आते ही मुझे सबसे पहले चंदा का ख़याल आया। मेरे मन में विचार उठा कि चंदा कैसी होगी अब? पिछली रात बापू ने क्या किया होगा उसके साथ? कहीं बापू ने चंदा की इज्ज़त तो तार तार तो नहीं कर दिया? हे भगवान, अब क्या होगा? मेरी चंदा लुट गई होगी और मैं अपनी चंदा की सुरक्षा भी न कर सका। ये सब विचार मन में आते ही मैं एकदम से दुखी हो गया और मेरी ऑखों से ऑसू बह चले। मुझे चंदा की बेहद फिक्र होने लगी।
इस लिए अपने दर्द की परवाह किये बिना मैं उठा और अपने घर की तरफ तेज़ी से बढ़ चला। मैने महसूस किया कि ये सुबह का वक्त था। आसमान में सूर्य का प्रकाश अभी ज्यादा तेज़ न हुआ था।
मैं अपने घर की तरफ तेज़ी से बढ़ता चला जा रहा था। मेरे मन में बस एक ही बात चल रही थी कि चंदा कैसी होगी अब? मैं भगवान से प्रार्थना भी करता जा रहा था कि चंदा को कुछ न हुआ हो। कुछ ही समय में मैं घर के पिछवाड़े की तरफ पहुॅच गया। एक तरफ वही कुआॅ था जिसमें गिर कर मेरी अम्मा मर गई थी। कुएॅ वाली जगह से कुछ ही दूरी के फाॅसले से चलते हुए मैं घर के पिछवाड़े पर आ गया। पीछे की दीवार से चलते हुए मैं उस हिस्से पर आया जहाॅ पर घर की दीवार खत्म हो जाती थी और फिर लकड़ी की बाउंड्री चारो तरफ से बनाई गई थी। मैं लकड़ी की उस बाउंड्री के शुरूआती हिस्से पर आया ही था कि मेरे कानों में मेरे मॅझले भाई जगन की आवाज़ पड़ी तो मैं रुक गया।
"रीना ने सही वक्त पर शंकर के सिर पर लट्ठ मारी थी बापू।" जगन की आवाज़___"वरना तुम्हारा तो कल्याण ही कर दिया था शंकर ने।"
"हाॅ ये तो सही कहा तूने।" बापू की आवाज़___"सब कुछ वैसा ही करना था जैसा कि हमने तरकीब बनाई थी। मगर तूने अपना काम सही से नहीं किया जगन। वरना शंकर को इतना गुस्सा नहीं आता और ना ही तुझे उससे मार खानी पड़ती।"
"ये दरवाजे से तुम्हारी और चंदा की फिल्म देख रहा था बापू।" मदन कह उठा___"जबकि मैने और रीना ने इसे मना भी किया था कि तरकीब के अनुसार हमें चुपचाप यहीं पर लेटे रहना है। मगर ये नहीं माना और अंदर की फिल्म देखने लगा। उधर जैसे ही चंदा की चीख़ शंकर के कानों में वैसी ही वो दौड़ते हुए यहाॅ आ गया और दरवाजे पर जगन को इस तरह अंदर की तरफ झाॅकते देख उसे क्रोध आ गया। बस फिर तो इसको पिटना ही था बापू।"
"हाॅथ तो मैं भी उठा सकता मदन।" जगन ने तीखे भाव से कहा___"मगर मैने सोचा कि उससे काम न बिगड़ जाए। इस लिए मैने उस कमीने शंकर पर हाॅथ नहीं उठाया। वरना गुस्सा तो मुझे भी भयंकर आ गया था उस पर।"
"अच्छा हुआ कि तुमने हाॅथ नहीं उठाया उस पर।" रीना ने कहा___"वरना कुछ और ही होने लगता और हमारा खेल बिगड़ जाता।"
"ये सब तो ठीक है बापू।" मीना की आवाज़___"मगर मुझे अब तक ये समझ नहीं आया कि ये सब चक्कर क्या है? मतलब ये कि अम्मा के रहने पर भी और उसके मरने के बाद भी तुम्हारी जिस्मानी ज़रूरत तो हम दोनो बहनें मिल कर पूरी कर ही देती थीं। फिर तुम्हें चंदा से ब्याह करने की क्या ज़रूरत पड़ गई? क्या इस लिए कि अब तुम्हारा हमसे दिल भर गया है? दूसरी बात शंकर भाई को इसमें लपेटने का क्या मतलब है?"
"ये सारा चक्कर तो इस जगन की वजह से ही चलाना पड़ा मेरी राॅड बेटी।" बापू की आवाज़___"असल बात ये थी कि इसे भी पता चल गया था कि शंकर चंदा से प्रेम करता है और उससे ब्याह करना चाहता है।
अब भला जगन ये कैसे बरदास्त कर लेता कि उसका बड़ा भाई जिसे वो बचपन से ही पसंद नहीं करता है वो किसी वजह से खुश हो जाए? इस लिए शंकर और चंदा के विषय में पता चलते ही ये मेरे पास आया और मुझसे बोला कि शंकर का ब्याह चंदा से किसी भी कीमत पर नहीं होना चाहिए। इसने एक दो बार चंदा को देखा था इस वजह से ये भी उसे पसंद करने लगा था। मगर इसे ये बात अच्छी तरह पता थी कि चंदा इसके प्रेम को स्वीकार नहीं करेगी। इस लिए इसने सोचा कि अगर चंदा इसकी नहीं तो शंकर की भी नहीं होगी। मैने इससे पूछा कि फिर ये चाहता क्या है तो इसने कहा कि कुछ ऐसा करो बापू कि चंदा इस घर में हमेशा के लिए आ जाए और हम सब मिल कर जीवन भर उसे भोगें। बात क्योंकि सबके भले की थी इस लिए मुझे भी इसकी बात पसंद आई। मगर सवाल ये था कि ऐसा होगा कैसे? क्योंकि चंदा तो शंकर से प्रेम करती थी और शंकर उससे ब्याह भी करना चाहता था। मैं भले ही उसे ब्याह से इंकार कर देता मगर उसकी वो सती सावित्री अम्मा उसकी खुशी ही देखती और नतीजा ये होता कि वो शंकर का ब्याह उस चंदा से ज़रूर करा देती। जबकि ऐसा हम चाहते ही नहीं थे। इस लिए हमने सोचा कि सबसे पहले हमें अपने रास्ते से शंकर की उस ससुरी अम्मा को ही हटाना पड़ेगा। वैसे भी वो साली किसी काम की तो थी नहीं। खुद तो मुझे कभी देती नहीं थी ऊपर से उसके डर से हम आपस में भी मज़ा नहीं कर पाते थे। इस लिए उसे अपने रास्ते से हटाने का सोच लिया हमने। ये बात तो तुम सबको पता ही है कि कैसे हम लोगों ने मिल शंकर की अम्मा को अपने रास्ते से हटाया था। वो शंकर साला आज भी यही समजता है कि उसके अम्मा की मौत महज एक हादसा था जो भगवान के विधान के हिसाब से हो गया था। मगर उसे क्या पता कि उसकी अम्मा को हमने कैसे सोच समझ कर अपने रास्ते से हटाया है? हर दिन की तरह उस दिन भी मैं शंकर को लेकर काम पर चला गया था और तुम सबको समझा दिया था कि कब क्या करना है। बस तुम लगों ने वैसा ही किया था। यानी कि जैसे ही शंकर की अम्मा नहाने के लिए कुएॅ में गई तो जगन और मदन भी छुप कर उस तरफ चल दिये। शंकर की अम्मा ने जब बाल्टी को रस्सी से बाॅध कर कुएॅ में डाला और पानी से भरी बाल्टी को खींचना शुरू किया तो तभी जगन और मदन दोनो ने मिल कर अम्मा को पीछे से धक्का दे दिया। जिससे अम्मा रस्सी बाल्टी सहित कुएॅ में जा गिरी। उसको तैरना तो आता नहीं था इस लिए थोड़ी ही देर में साली पानी में डूब गई। कुछ घंटे बाद जब वो वापस पानी की सतह पर आ गई तो जगन और मदन दोनो ही समझ गए कि अम्मा का राम नाम सत्य हो चुका है। इस लिए तुरंत ही अंदर आकर रीना को कह दिया कि अब वो आगे का काम करे। रीना भागती हुई हमारे पास आई और अम्मा के मरने की सूचना हमें दी। बस उसके बाद का तो सबको पता ही है कि क्या कैसे हुआ?"
"अम्मा के मरने का तो पता है बापू।
" मीना ने कहा___"मैं चंदा वाले चक्कर का पूछ रही हूॅ। उसके बारे में बताओ।"
"अम्मा के मर जाने से हमारा रास्ता साफ हो गया था।" बापू ने कहा___"मगर शंकर बेचारा ज़रूर अपनी अम्मा के मर जाने से ग़मज़दा हो गया था। जब कुछ दिन उसकी अम्मा को मरे हो गए तो हमने आगे का काम शुरू किया। मैं हर दिन शंकर को काम पर लगा कर चार चार घंटे के लिए गायब हो जाता और सीधा चंदा के गाॅव उसके घर पहुॅच जाता। चंदा का बाप मंगा साकेत थोड़ा लालची किस्म का था और गॅजेड़ी भी था। काम धाम करके जो भी कमाता उसे वह गाॅजा पीकर और देसी चढ़ा कर उड़ा देता था। मैने उसकी इसी आदत का फायदा उठाया और रोज़ उसे देसी दारू पिलाता और खुद भी पीता। कुछ ही दिन में मेरी उससे खूब बनने लगी। एक तरह से मैं उसका पक्का यार बन गया था। ख़ैर, इसी तरह कुछ दिन गुज़र गए। जब मुझे लगने लगा कि अब मुख्य बात आगे बढ़ाने से नुकसान नहीं है तो मैने उससे मुद्दे की बात छेंड़ दी। सबसे पहले तो मैने बस उसके मन और विचार का ही पता लिया। चंदा के ब्याह के बारे में पूछा उससे तो कहने लगा कि उसे चंदा के ब्याह की ही चिंता है। मगर आर्थिक हालत बहुत ज्यादा खराब होने की वजह से वो चंदा का ब्याह कर नहीं पा रहा है। मैंने उसे एक सुझाव दिया कि किसी ऐसे शख्स से वह चंदा का ब्याह कर दे जो उमर में चंदा से थोड़ा बहुत बड़ा हो। इससे उसे ज्यादा दहेज भी नहीं देना पड़ेगा। मेरी बात उसे जॅच गई। आख़िर उसे अपने हालात का तो पता ही था इस लिए बेबसी मे ही सही किन्तु उसे इस बारे में सोचना ही पड़ा। उसने मुझसे पूछा कि ऐसा कौन ब्यक्ति है जो चंदा से उमर में थोड़ा बहुत बड़ा हो और उसे दहेज न देना पड़े तो मैने यूॅ ही मज़ाक में उससे कह दिया कि मेरे साथ ही कर दे अपनी चंदा का ब्याह। मैं दहेज में उससे कुछ नहीं मागूॅगा बल्कि उल्टा उसे ही थोड़ा बहुत रुपया पैसा दे दूॅगा। मैने ये बात उससे बस उसका मन देखने के उद्देष्य से कही थी वो भी हॅसते हुए। वो मेरी ये बात सुन कर हैरान तो हुआ मगर फिर बोला कि यार अगर सच में तुम मेरी चंद से ब्याह कर लो तो मुझे कोई ऐतराज़ न होगा। हाॅ उमर ज़रूर तुम्हारी थोड़ी क्या बहुत ज्यादा है मगर कोई बात नहीं। लड़के बच्चे तो पहले से ही हैं तुम्हारे तो बच्चे के लिए कोई झंझट ही नहीं रहेगी। कहने का मतलब ये कि मज़ाक में कही हुई मेरी बात चल गई। बस फिर क्या था? मैने ज़रा भी देर नहीं की और फटाफट चंदा से ब्याह कर लिया मैने। इस ब्याह में मैने चंदा के बाप को पूरे पचास हज़ार रुपये दिये थे। कुछ ब्याह के खर्च के लिए और कुछ खुशी से। इतने सारे पैसे एक साथ पाकर चंदा का बाप भी खुश हो गया था। इस ब्याह में कोई ताम झाम करने का मैने पहले ही मना कर दिया था। इस लिए किसी को ज्यादा कुछ पता भी नहीं चला।
उस दिन भी मैं चंदा के बाप को देसी दारू पिलाकर और पीकर आया था जिस दिन मैने चंदा से ब्याह रचा कर उसे घर लाया था। मुझे पता था कि शंकर को जब ये सब पता चलेगा तो वो पागल सा हो जाएगा। मगर कुछ कर नहीं पाएगा। क्योंकि सबसे बड़ी सच्चाई तो यही बन जाएगी न कि चंदा अब उसकी प्रेमिका नहीं बल्कि अम्मा है। अगर उसमें ज़रा सी भी ग़ैरत होगी तो वो खुद ही इस गर की छोंड़ कर कहीं चला जाएगा या फिर जीवन भर अपनी चंदा को अम्मा के रूप में देख कर अंदर ही अंदर तड़पता रहेगा। जबकि हम सब हर दिन हर रात उसकी चंदा का भोग लगाएॅगे।"
बाहर दीवार की ओट में खड़ा मैं बापू की ये सब बातें सुन रहा था। मेरा चेहरा ऑसुओं से तर था। अपनी जगह पर मैं इस तरह खड़ा रह गया था जैसे किसी ऋषी ने मुझे पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया हो। इतना बड़ा छल, इतना बड़ा अपराध किया था इन लोगों ने मिल कर जिसकी कोई सीमा नहीं थी। एक बाप के अपनी ही बेटी के साथ नाजायज़ संबंध थे और मेरे दोनो भाइयों के अपनी बहनों के साथ। ये एक ऐसी सच्चाई थी जिसे मैं सब कुछ सुन लेने के बावजूद हजम नहीं कर पा रहा था। मेरे अंदर जज़्बातों का भयंकर तूफान चालू था। ऐसा लग रहा था जैसे सारी कायनात को एक झटके में शोलों के हवाले कर दूॅ। मगर ऐसा करना मुझसे संभव न था। जबकि उधर,,,,
"ये सब छोंड़ो बापू।" तभी जगन की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी___"अब तो जो होना था वो तो हो ही गया। हमने कल रात जी भर के चंदा के मज़े लिए। कसम से बापू बड़ा ही कड़क माल थी चंदा। साली ने ग़जब का मज़ा दिया।"
"मज़ा तो हमने ज़बरदस्ती लिया भाई।" मदन ने कहा___"वो तो हमें हाॅथ भी नहीं लगाने दे रही थी। बार बार हमसे रहम की भीख माॅग रही थी और अपनी इज्ज़त की दुहाई दे रही थी। मगर हमने तो मज़ा करना था सो किसी तरह कर ही लिया। बाद में तो उसके भी कस बल ढीले पड़ गए थे। साली ऐसे लेटी रह गई थी जैसे कह रही हो कि आओ और कर लो जो करना हो। हाहाहाहा।"
"नया माल मिल गया तो कल रात हम बहनों की तरफ देखा भी तुम लोगों ने।" रीना की आवाज़ में शिकायत थी, बोली___"सच कहती हैं औरतें कि सब मर्द एक जैसे ही होते हैं। नया और ताज़ा बिल मिल गया तो भोसड़े की तरफ फिर देखते भी नहीं मर्द।"
"अरे ऐसी कोई बात नहीं है मेरी रंडी बेटी।" बापू की आवाज़___"बस कल रात की ज़रा बात ही अलग थी न इस लिए। बाॅकी ये तो तू भी जानती है न कि नया नौ दिन तो पुराना सब दिन। इस लिए चिंता मत कर तुम दोनो हमारी असली माल ही हो।"
"बापू बड़ा दिल कर रहा है।" जगन की आवाज़___"ऐसा लगता है कि फिर से चंदा रानी के पास जाऊॅ और तबीयत से उसकी बजा कर आऊॅ।"
"भाई तूने तो मेरे मुह की बात कह दी।" मदन की आवाज़ सुनाई दी___"मेरा भी बहुत दिल कर रहा है चंदा को पेलने का। चल दोनो एक एक बार तबीयत से पेल कर आते हैं उसे। क्यों बापू तुम्हें भी चलना है???"
"अरे नहीं भई।
" बापू की हॅसी की आवाज़___"तुम दोनो ही जाओ। मुझमें अभी इतनी शक्ति नहीं है कि तुम लोगों का साथ दे सकूॅ। साला कल रात दारू के नशे में समझ में ही नहीं आया कितनी मेहनत हो गई मुझसे। अब जब दारू उतरी तो समझ आ रहा है कि टाॅगों में जान ही नहीं है।"
"हाहाहाहाहा ले भाई।" मदन के ठहाकों की आवाज़ गूॅजी___"बापू तो गया काम से। चल हम दोनो ही किला फतह करके आते हैं।"
"हाॅ हाॅ जाओ जाओ।" मीना की आवाज़___"कर लो किला फतह। मगर याद रखना लौट कर हमारे पास ही आओगे।"
"जाने दे मेरी राॅड बिटिया।" बापू बोला___"नया माल है न इस लिए उसकी चुलुक कुछ ज्यादा ही होती है। याद कर जब इन लोगों तुम दोनो के साथ जब किया था तो कैसे सारा दिन तुम दोनो के पीचे पीछे घूमते रहते थे?"
"अच्छी तरह याद है बापू।" मीना के हॅसने की आवाज़ आई___"ये दोनो हम दोनो बहनों के पीछे पीछे लगे ही रहते थे। इन लोगों को तो ये भी होश नहीं रहता था कि अम्मा को अगर पता चल गया तो क्या ग़जब हो जाएगा?"
बाहर खड़ा मैं ये सब सुन रहा था और अंदर ही अंदर गुस्से की आग में जला जा रहा था। मुझे लग रहा था कि अभी जाऊॅ और सबको एक साथ खत्म कर दूॅ। मेरे हाॅथों की दोनों मुट्ठियाॅ कस गईं थी। जबड़े शख्ती से भिंच गए थे। नथुने फूल कर गुब्बारा हुए जा रहे थे। तभी,,,,
"ओएऽऽ बाऽऽऽपू ग़जब हो गया रे।" जगन की लगभग बदहवाशी से भरी आवाज़ सुनाई दी___"सब गड़बड़ हो गया। अब क्या होगा बापू???"
"अरे क्या हुआ?" बापू ने घुड़की सी दी___"क्यों चिल्ला रहा है? क्या गड़बड़ हो गया???"
"बापू वो वो चंदा।" मदन की लड़खड़ाती हुआ आवाज़ सुनाई दी___"अंदर वो चंदा ऐसे पड़ी है जैसे मर गई है।"
"क्या बकता है मादरचोद??" बापू की जैसे चीख ही निकल गई थी, बोला___"बहनचोद साले शुभ शुभ बोल।"
"मदन सच कह रहा है बापू।" जगन की आवाज़__"हम दोनों जब अंदर गए तो देखा चंदा चारपाई पर आधी लटकी हुई पड़ी थी एकदम वैसी ही नंगी हालत में जैसे कल रात हम छोंड़ कर आए थे उसे। मैने उसकी नाॅक के पास उॅगली रखी और उसकी कलाई की नब्ज भी देखी। मगर ना ही उसके नाॅक से साॅस आ जा रही है और ना ही नब्ज चलती हुई महसूस हो रही है। इसी लिए हमें लग रहा है कि चंदा का राम नाम सत्य हो गया है। अब क्या होगा बापू? चंदा अगर सच में मर गई और ये बात गाॅव वालों को पता लग गई तो हम कहीं के न रह जाएॅगे बापू।"
जगन की इन बातों के बाद कुछ देर तक कोई आवाज़ न आई। जैसे उधर सबको साॅप सूॅघ गया हो। बाहर खड़ा मैं भी ये सुन कर जैसे बेजान लाश में तब्दील हो गया था। जिसका डर था वो तो हो ही चुका था किन्तु इस सबका परिणाम ये निकलेगा ये मैने स्वप्न में भी नहीं सोचा था। मुझे लगा कि मैं दहाड़ें मार कर रो पड़ूॅ मगर मैने अपने अंदर के मचलते हुए जज़्बातों को बड़ी मुश्किल से दबाया हुआ था। जबकि उधर,
"ये तो सच में बहुत ही बुरा हुआ।
" बापू की आवाज़ में डर व भय झलक रहा था___"ये सब हमारी वजह से ही हुआ है। हमने अपने मज़े के चक्कर में ये भी नहीं सोचा कि कच्ची उमर की उस चंदा के साथ इतना कुछ एक ही बार में नहीं करना चाहिए था। वरना उसका परिणाम यकीनन यही निकलेगा। दूसरी बात हमने शंकर को रात में खेतों पर फेंक आए थे। वो उस वक्त बेहोशी हालत में था। संभव है कि उसे अब तक होश भी गया होगा। अब अगर इस परिस्थिति में वो यहाॅ आ गया तो हम सोच भी नहीं सकते हैं कि वो क्या कर डालेगा? चंदा को इस हाल में देखेगा तो वो यकीनन हम सबके लिए काल बन जाएगा।"
"बापू शंकर की इस बात से मेरे दिमाग़ में एक ज़बरदस्त तरकीब आई है।" जगन की आवाज़___"अगर कहो तो उगलूॅ मुख से??"
"अरे तो उगल ना मादरचोद।" बापू चीखा__"क्या तब उगलेगा जब तेरी अम्मा चुद जाएगी साले??"
"मेरी दोनो अम्मा को तो तुमने ही चोद डाला है बापू।" जगन के हॅहने की आवाज़___"ये अलग बात है कि तुमने हमें हमारी पहली अम्मा को पेलने का मौका नहीं दिया जबकि उसको पेलने की हमारी हसरत साली धरी की धरी रह गई।"
"बकवास ना कर बहनचोद।" बापू गुर्राया___"पहले तरकीब उगल मुख से। साला सत्यानाश हो गया हमारा।"
"बापू तरकीब ये है" जगन की आवाज़___"कि चंदा की इस मौत में हम उस मादरचोद शंकर को फॅसा देते हैं।"
"वो कैसे?" बापू का चौंका हुआ स्वर उभरा__"मेरा मतलब कि हम शंकर को चंदा की मौत में कैसे फॅसा सकते हैं?"
"बड़ी सीधी सी बात है बापू।" जगन ने कहा___"हम सबको बताएॅगे कि ये सब शंकर ने ही किया है। हम गाॅव वालों को बताएॅगे कि तुमने जिस चंदा से ब्याह किया उसे शंकर पहले से ही पसंद करता था और उससे ब्याह भी करना चाहता था। जबकि चंदा तो शंकर को जानती भी नहीं थी। शंकर ने जब देखा कि वो जिसे पसंद करता था और जिससे ब्याह करना चाहता था वो तो खुद उसके ही बाप की जोरू बन गई तो शंकर ये सहन न कर सका। उससे ये सहन न हुआ कि जिसे वो खुद अपनी जोरू बनाना चाहता था वो खुद उसके बाप की ही जोरू बन कर उसकी अम्मा बन गई। इस लिए वो रात को देशी दारू पी कर आया और ज़बरदस्ती बापू के कमरे में घुस गया। कमरे में उसने जबरदस्ती चंदा की इज्जत को लूटा और फिर उसकी जान भी ले ली।"
"तरकीब तो अच्छी है बेटवा।" बापू की आवाज़___"पर गाॅव वाले यकीन कैसे करेंगे? वो तो पूछेंगे न कि शंकर ने ये सब हम सबकी मौजूदगी में कैसे कर लिया? तब क्या जवाब देगा तू?"
"हम उनसे कहेंगे कि शंकर ने कमरे के दरवाजे पर इस तरह मोटी सी लकड़ी से टेक लगा दिया था कि उस दरवाजे को लाख कोशिशों के बाद भी हम सब खोल नहीं पाए।" जगह कह रहा था___"कमरे का वो दरवाजा तभी खुला जब शंकर ने चंदा का काम तमाम कर दिया था। उसके बाद वो खुद ही बाहर आ गया था। उसके हाथ में मोटी सी वही लकड़ी थी जिससे उसने दरवाजे पर टेक लगाया हुआ था। हम सब ये डर से कुछ न बोल सके थे कि कहीं वो गुस्से में हम लोगों को मारना न शुरू कर दे।
बस इतनी बात काफी है गाॅव के लोगों को यकीन दिलाने के लिए।"
"ऐसा तुझे लग रहा है।" बापू की आवाज़___"जबकि कुछ लोग ये भी पूछ सकते हैं कि जब हमारे घर में ये सब हो रहा था तो हमने शोर शराबा करके गाॅव वालों को क्यों नहीं बुला लिया? तब क्या कहेंगे हम?"
"हम कह देंगे बापू कि हमें उस वक्त कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि क्या करें और क्या न करें?" जगन ने कहा__"बस गाॅव वालों को हमारी बात पर यकीन करना ही पड़ेगा। वैसे भी गाॅव के लोगों को ये उम्मीद भला कहाॅ होगी इस सबकी जो हम लोगों ने किया है। दूसरी महत्वपूर्ण बात ये भी हमारी बात को साबित करेगी जब शंकर यहाॅ पर मौजूद नहीं रहेगा। शंकर की ग़ैर मौजूदगी भी गाॅव वालों को यकीन दिलाने में पुख्ता वजह रहेगी।"
"लेकिन शंकर यहाॅ मौजूद क्यों नहीं होगा भला?" बापू की आवाज़___"वो भला कहाॅ चला जाएगा?"
"ग़ौर करने वाली बात है बापू।" जगन ने कहा__"शंकर की जानकारी में और उसके सामने इतना कुछ हो गया है उसकी प्रेमिका के साथ। तो भला वो अब यहाॅ किस वजह से लौट कर आएगा? दिल का मामला बड़ा विचित्र होता है बापू। उसका इस संसार में उसके प्रेमी के अलावा दूसरा कोई नहीं रह जाता और जब उसके रहते उसकी प्रेमिका का ये हाल हो जाए तो भला वो अपना मुह दिखाने के लिए यहाॅ क्यों रहेगा? बल्कि वो तो कहीं पर चुल्लू भर पानी की तलाश करेगा ताकि उसमें डूब कर वो मर सके।"
"वाह भाई वाह क्या लच्छेदार बात कही है मेरे मादरचोद बेटे ने।" बापू की प्रशंशा में डूबी हुई आवाज़__"ये तो कमाल ही हो गया। इतनी बड़ी और इतनी गहरी बात मेरे दिमाग़ में नहीं आई। जबकि तूने साबित कर दिया कि तू इस संसार का सबसे बड़ा वाला कमीना इंसान है।"
"बापू तारीफ़ करने का भला ये कौन सा तरीका है?" मदन ने हॅसते हुए कहा___"जगन ने ग़लत क्या कहा भला? सारी बातों को सोच कर उसने इस सबसे बचने की जो तरकीब बताई है वो यकीनन लाजवाब है। इस लिए अब हमें बिलकुल भी देर नहीं करना चाहिए। बल्कि तुरंत ही जगन की इस तरकीब पर अमल करना चाहिए।"
"सही कह रहा है तू।" बापू की आवाज़___"इसके सिवा दूसरा कोई चारा भी तो नहीं है हमारे पास। अतः अब हम जगन की इस तरकीब के अनुसार ही काम शुरू करते हैं। अब जो होगा देखा जाएगा।"
उधर वो सब तरकीब पर अमल करने की बातें कर रहे थे जबकि इधर मेरे गुस्से की जैसे इंतहां हो गई थी। इतनी घटिया सोच और ऐसे पापी लोगों का इस समाज में जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं रह गया था। मेरे दिलो दिमाग़ उन सबके लिए घृणा और नफ़रत में निरंतर इज़ाफा होता चला गया था। मैं तुरंत ही अपनी जगह से हिला और लकड़ी की उस बाउंड्री के इस पार से चलते हुए घर के सामने की तरफ आया और सामने से अंदर की तरफ बढ़ चला।
बरामदे के बाहरी तरफ दीवार पर टेक लगा कर रखी हुई कुल्हाड़ी पर मेरी नज़र पड़ी।
मेरे जिस्म में दौड़ते हुए लहूॅ में जैसे एकदम से उबाल आ गया। मैं तेज़ी से उस कुल्हाड़ी की तरफ बढ़ा और उसे दाहिने हाॅथ से उठा कर बरामदे की तरफ बढ़ा। अंदर दाखिल होते ही मुझे जगन और मदन मेरी तरफ पीठ किये खड़े नज़र आए। इससे पहले कि कोई कुछ महसूस कर पाता मेरा कुल्हाड़ी वाला हाॅथ बिजली की तरह चला और खचाऽऽक से जगन की गर्दन पर पड़ा। कुल्हाड़ी वार लगते ही जगन की गर्दन आगे की तरफ झूल गई। उसके कटे हुए धड़ से खून का मानो फब्बारा सा उठ गया। इधर मैं इतने पर ही नहीं रुका। बल्कि किसी के होश में आने से पहले ही एक बार पुनः मेरा कुल्हाड़ी वाला हाॅथ बिजली की सी तेज़ी से चला और इस बार मदन के सीने में गड़ता चला गया। सीने में इस लिए कि वो ऐन वक्त पर मेरी तरफ घूम गया था।
पल भर में इस सबको देखते ही मेरी दोनो बहनों के हलक से चींखें निकल गई। बापू के सामने ही उसके पैरों के पास जगन मृत अवस्था में खून से लथ पथ पड़ा था। ये देख कर बापू को जैसे लकवा सा मार गया था। उसकी घिग्घी बॅध गई थी। इधर मेरी एक बहन मीना बाहर की तरफ तेजी से भागी। मैने पलट कर तेज़ी से कुल्हाड़ी चला दी। कुल्हाड़ी उड़ते हुए मीना की पीठ पर गड़ती चली गई और वो प्रहार के वेग में मुह के बल ज़मीन पर गिरी। वो मछली की तरह कुछ देर तड़पी और फिर शान्त पड़ गई। मैने आगे बढ़ कर उसकी पीठ से एक ही झटके में कुल्हाड़ी को खींच लिया।
उधर रीना के चिल्लाने से जैहे बापू को होश आया। अतः वो तुरंत उठा और कमरे के अंदर की तरफ शोर मचाते हुए भागा। उसके पीछे ही रीना भी भागी। कमरे के अंदर जा कर दोनो ने दरवाजे को बंद कर अपने अपने हाॅथों से दरवाजे पर ताकत से दबाव बढ़ा दिया।
"दरवाजा खोल बापू।" मैं कुल्हाड़ी लिए शेर की तरह गरज उठा था___"आज मेरे हाॅथों तुम सबकी मौत निश्चित है।"
"ये तूने किया शंकर?" अंदर से बापू की भय से काॅपती हुई आवाज़ आई___"तूने अपने हाॅथों अपने ही भाई और बहन को काट कर मार डाला। आख़िर ऐसा क्या हो गया है तुझे कि तूने ये नरसंघार कर दिया?"
"मुझसे क्या पूछता है हरामज़ादे?" मैने दहाड़ते हुए कहा___"इस सबका कारण तो तू ही है। मैने तेरी और तेरे इन पिल्लों की सारी बातें सुन ली हैं। तूने अपने मतलब के लिए मेरी अम्मा को कुएॅ में गिरा कर मार डाला। उसके बाद तूने मेरी मासूम चंदा के भोले भाले बाप को फॅसा कर उसकी बेटी से ब्याह किया। सिर्फ इस लिए कि तू उस मासूम और निर्दोष के साथ मज़े कर सके और ये सब तूने उस मादरचोद जगन के कहने पर किया। ये बता कि तुझे एक बार भी नहीं लगा कि जो ते कहने जा रहा है वो सबसे बड़ा पाप है? अपनी ही बेटियों के साथ तू मुह काला करता है। तेरे दोनो बेटे अपनी ही बहन के साथ नाजायज़ संबंध बनाते हैं। इतना ही नहीं तू खुद भी उन के साथ ये सब करता है।
अरे तुझसे बड़ा इस संसार में कौन होगा बापू? तूने दो पल के मज़े के लिए रिश्तों को भी नहीं बक्शा। मेरी देवी जैही माॅ को मार डाला तूने और तेरे इन पिल्लों ने।"
"ये सब झूॅठ है शंकर भाई।" रीना रोते बिलखते हुए चिल्ला पड़ी___"तुम जो समझ रहे हो वैसे कुछ भी नहीं है।"
"तू चुप कर बदजात लड़की।" मैं पूरी शक्ति से चिल्लाया था, बोला___"तुझे तो अपनी बहन कहते हुए भी मुझे शर्म आती है ऐ बेहया। तुझमें इतनी ही हवश की आग भरी हुई थी तो कहीं भाग जाती किसी के साथ। कम से कम रिश्तों पर कलंक तो न लगता। मगर नहीं, तू अपने बाप और भाई की राॅड बन गई न। नहीं छोंड़ूॅगा, किसी को भी ज़िंदा नहीं छोंड़ूॅगा। दरवाजा खोल वरना इसी कुल्हाड़ी से इस दरवाजे को काट काट कर टुकड़े टुकड़े कर दूॅगा और फिर वैसे ही टुकड़े तुम दोनो नाली के कीड़ों के करूॅगा।"
"हमें माफ़ कर दे शंकर।" बापू ने रोते गिड़गिड़ाते हुए कहा___"हमसे सच में बहुत बड़ा पाप हो गया है। लेकिन आख़िरी बार माफ़ कर दे हमें। अब दुबारा ऐसा कभी नहीं करेंगे हम। देख तूने अपने ही दो भाई और एक बहन को मार डाला। अब कम से कम हमें तो छोंड़ दे।"
"तू बाहर निकल बेटीचोद।" मैने चिल्लाया___"उसके बाद बताता हूॅ कि कैसे माफ़ करता हूॅ मैं?"
"भगवान के लिए भाई।" रीना बुरी तरह रो रही थी__"बस एक बार माफ़ कर दे। सच कहती हूॅ जीवन भर तेरी टट्टी खाऊॅगी मैं।"
"मैं आख़िरी बार कह रहा हूॅ कि दरवाजा खोल।" मैं गुस्से में चीखा___"वरना दरवाजे को काटने में मुझे ज्यादा समय नहीं लगेगा। उसके बाद मैं तुम दोनो का क्या हस्र करूॅगा तुम सोच भी नहीं सकते।"
"बेटा माफ़ कर दे न।" बापू गिड़गिड़ाया___"अरे मैं तेरा बाप हूॅ रे। तुझे बचपन से पाल पोष कर बड़ा किया है।"
"तो कौन सा बड़ा काम किया है तूने?" मैने कहा__"तू मुजे बचपन में ही मार देता तो अच्छा होता। कम से कम आज ये सब देखने सुनने को तो न मिलता। मेरी मासूम सी चंदा को तुम लोगों ने रौंद रौंद कर मार डाला। मेरी देवी जैसी अम्मा को मार डाला तुम लोगों ने। अगर तुम लोग मेरी अम्मा और चंदा को वापस मुझे लाकर दे दो तो माफ़ कर दूॅगा। वरना भूल जाओ कि मैं माफ़ कर दूॅगा तुम दोनो को।"
अंदर से कोई वाक्य न फूटा उन दोनों के मुख से। बस दोनो के रोने की आवाज़ें गूॅजती रही। मेरा गुस्सा प्रतिपल बढ़ता ही जा रहा था। मुझसे बरदास्त न हुआ तो मैं कुल्हाड़ी का वार दरवाजे पर करने लगा। मेरे ऐसा करते ही रीना और बापू ज़ोर ज़ोर से चीखने लगे और रहम की भीख माॅगने लगे। मगर मैं न रुका बल्कि लगातार कुल्हाड़ी का वार दरवाजे पर करता चला गया। नतीजा ये हुआ कि कुछ ही देर में लकड़ी का वो दरवाजा कट कट कर टुकड़ों में निकलने लगा। थोड़ी ही देर में मुझे रीना का हाॅथ नज़र आया जो दरवाजे पर टिका हुआ था। मैने गुस्से में आव देखा न ताव, कुल्हाड़ी का वार सीधा उसके हाॅथ पर किया।
खचाऽऽऽच की आवाज़ के साथ ही रीना का हाॅथ उसकी कलाई से कट गया। खून का तेज़ फब्बारा उछल कर फैल गया। कलाई से हाॅथ कटते ही रीना की हृदय विदारक चीख गूॅज गई। वो दरवाजे से हट कर अपने दूसरे हाॅथ से कटे हुए हाॅथ को पकड़े पीछे हटती चली गई। उसका ये हाल देख कर बापू भी मारे डर के पीछे की तरफ भागा। दोनो के जाते ही दरवाजे पर से उन दोनो का दबाव हट गया।
मैने दरवाजे पर ज़ोर से एक लात मारी तो दरवाजा खुलता चला गया और इसके साथ ही उन दोनो की चीखना चिल्लाना भी बढ़ गया। मैं दरवाजे के अंदर दाखिल हुआ और उन दोनो की तरफ बढ़ने ही वाला था कि मेरी नज़र बगल से रखी चारपाई पर आधी लटकी हुई चंदा की नंगी लाश पर पड़ी। मेरे अंदर पीड़ा की तीब्र लहर दौड़ती चली गई। मेरी मोहब्बत का ये हाल किया था इन लोगों ने। ये देख कर ही मेरे अंदर भयंकर गुस्सा भर गया। मैं तेज़ी से उन दोनो की तरफ बढ़ा।
बापू और रीना रोने और चीखने की मशीन बन गए थे। उन दोनो के चेहरे मौत के डर से पीले ज़र्द पड़ गए थे। कमरे में हर तरफ रीना के कटे हुए हाॅथ का खून फैला हुआ था। मैं आखे बढ़ते हुए बापू के क़रीब गया यो बापू मेरे पैरों में गिर पड़ा। मैने अपने उस पैर को ज़ोर से झटक दिया जिस पैर पर बापू गिरा पड़ा था। झटका खाते ही बापू उछल कर पिछली दीवार से टकराया। मैं आगे बढ़ कर उसके पास गया और एक हाथ से उसके सिर के बालों को पकड़ कर उठा लिया। मैने देखा बापू के चेहरे पर मौत का भय साक्षात ताण्डव करता नज़र आ रहा था।
"अब बता मेरे हरामी बापू।" मैं गुर्राया___"इस कुल्हाड़ी से तेरे कितने टुकड़े करूॅ?"
"नहीं नहीं शंकर।" बुरी तरह काॅपते हुए कहा बापू बिलबिला उठा___"मुझे माफ़ कर दे बेटा। मैं तेरा बाप हूॅ। अपने आस पापी बाप को बस एक बार माफ़ कर दे।"
खचाऽऽऽक! कुल्हाड़ी का वार बिजली की सी तेज़ी से हुआ और कुल्हाड़ी का फल बापू की जाॅघ में घुस गया। बापू के हलक से हलाल होते बकरे जैसी आवाज़ निकली। जाॅघ से भल्ल भल्ल करके खून बहने लगा। तभी एक चीख मुझे अपने पीछे की तरफ सुनाई दी। मैं तेज़ी से पलटा तो देखा अपनी कलाई थामें रीना बाहर की तरफ भागी जा रही थी। उसके बाहर निकलते ही मैं भी पलट कर उसके पीछे भागा किन्तु तभी बाहर से कुछ लोग आ गए और मुझे पकड़ लिए। मैं उन लोगों की पकड़ से छूटने के लिए ज़ोर आजमाईश करने लगा। साथ ही चीखते हुए कहे भी जा रहा था कि___"मुझे छोंड़ दो वरना तुम सबको काट डालूॅगा इस कुल्हाड़ी से।"
मगर वो मुझे छोंड़ नहीं रहे थे। देखते ही देखते मेरे उस घर में लोगों का ताॅता लग गया। हर ब्यक्ति मेरे घर के इस भयानक दृष्य को देख कर आश्चर्यचकित था। उनकी ऑखें हैरत से फटी पड़ी थीं। मुझे पकड़े हुए लोग मुझसे पूछे जा रहे थे कि ये सब क्या है? मैने ये सब क्यों किया? मैने चीखते हुए उन सबको सारी बात संक्षेप में बताई।
जिसे सुन कर हर कोई हक्का बक्का रह गया। कुछ लोगों की नज़र कमरे के अंदर कराह रहे बापू पर पड़ी तो वो भागते हुए बापू के पास गए। लोगों को देखते ही बापू की जान में जान आई और वो डर व भय से एक ही बात रटने लगा। वो ये कि मुझे इस लड़के से दूर ले चलो। ये मुझे मार डालेगा, काट डालेगा।
कुछ लोगों ने मिल कर बापू को सहारा देकर उठा लिया और कमरे से बाहर ले गए। इधर मैं काफी देर तक उन लोगों के चंगुल से निकलने की कोशिश करता रहा मगर निकल न सका। थक हार कर मैंने ज़ोर आजमाईश करना बंद कर दिया। ऐसे ही वो दिन गुज़र गया।
उस दिन गाॅव में इतना बड़ा संगीन काण्ड हुआ मगर किसी ने भी इस सबकी सूचना पुलिस को न दी। मैं हैरान भी था कि ऐसा लोगों ने क्यों किया? कुछ लोग रीना के पीछे भी गए थे मगर वो लोग खाली हाॅथ वापस आ गए। उन्हें रीना कहीं भी न मिली थी। बापू को इलाज के लिए तुरंत अस्पताल ले गए थे कुछ लोग। मेरे दोनो भाई और एक बहन मीना की लाश को एक जगह लिटा कर उन्हें सफेद क़फन से ढॅक दिया गया था। कुछ औरतें कमरे के अंदर जाकर चंदा के नंगे जिस्म को किसी तरह ढॅक दिया था।
गाॅव वालों ने मुझसे सबकी चिता को आग देने के लिए कहा तो मैंने सिर्फ चंदा की चिता को आग लगाई जबकि अपने दोनो भाई व बहन को चिताग्नि देने से ये कह कर साफ मना कर दिया कि ये मेरे कोई नहीं थे। मेरे ऐसा कहने पर गाॅव के मेरी ही बिरादरी के एक आदमी ने आग दी थी। उस दिन पूरा दिन मेथे घर में लोगों की भीड़ रही। मैं एक जगह गुमसुम बैठा था। ख़ैर धीरे धीरे सब लोग अपने अपने घरों को चले गए।
उसी रात मैने वो गाॅव और वो घर हमेशा हमेशा के लिए त्याग दिया था। मुझे नहीं पता मैं कहाॅ कहाॅ बेवजह भटकता रहा? धीरे धीरे समय गुज़रा और इस घटना को घटे पाॅच साल गुज़र गए। मैं इन पाॅच सालों में कुछ हद तक सम्हल गया था। दो वक्त की रोटी के लिए जैसा भी काम मिलता तो करता और दो वक्त की रोटी खाकर दिन काटने लगा था।
ऐसे ही एक दिन एक ऐसे आदमी से मेरी मुलाक़ात हुई जो फौज में मेजर की पोस्ट से रिटायर होकर आया था। मुझमें अब तक काफी बदलाव आ गया था। सब कुछ भुला कर मैं अपने मन मर्ज़ी से जी खा रहा था। ख़ैर, उस मेज़र से मुलाक़ात हुई तो मैने उससे काम माॅगा। दरअसल मैं हर जगह भटकते भटकते उकता सा गया था इस लिए चाहता था कि कहीं ऐसी जगह कोई काम मिल जाए जिससे मुझे बार बार जगह न बदलना पड़े। मेरे काम माॅगने पर मेजर ने मेरी तरफ ग़ौर से देखा। मेरी कद काठी ठीक ठाक ही थी। वो मुझे देख कर मुस्कुराया और पूछा क्या काम कर सकते हो? मैने कहा कि मैं दुनियाॅ का हर काम कर लूॅगा लेकिन कोई ग़लत काम तो मैं हर्गिज़ भी न करूॅगा भले ही चाहे भूॅखा मर जाऊॅ।
मेरी इस बात से मेजर प्रभावित हुआ और मुझे अपने घर ले गया। मेजर का घर घर जैसा नहीं बल्कि कोई बॅगला दिख रहा था।
मेजर ने मुझसे कहा कि आज से तुम इस बॅगले की देख रेख करोगे। फिर क्या था मैं मेजर के कहे अनुसार बॅगले की देख रेख करने लगा। बॅगले से कुछ दूरी पर सर्वेन्ट क्वार्टर बना हुआ था जहाॅ पर मुझे रहने के लिए मेजर ने कह दिया था। मेजर के अपने परिवार में उसकी एक जवान बेटी बस ही थी। उसकी बीवी कुछ साल पहले भगवान को प्यारी हो गई थी। उसने दूसरी शादी नहीं की थी। उसके लिए उसकी बेटी ही सब कुछ थी। मेजर का और भी परिवार था जैसे कि उसके बड़े भाई वगैरा।
मेजर ने मुझे बंदूख चलाना सिखा दिया था और चूॅकि वो फौजी बंदा था इस लिए उसके नियम कानून भी शख्त और पक्के थे। हर सुबह चार बजे उठना और फिर उसके साथ एक्सरसाइज़ करना, उसके साथ दौड़ लगाना। ये सब जैसे एक रुटीन सा बन गया था। मुझे अपने आप में ऐसा महसूस होता जैसे मैं भी मेजर की तरह एक फौजी आदमी था। मेजर की बेटी बहुत ही प्यारी बच्ची थी। रुपये पैसे का ज़रा भी घमंड नहीं था उसे। मैं भले ही छोटी जाति का था मगर कोई भी मुझे कहीं आने जाने से रोंकता नहीं था। एक तरह से मैं भी उस घर का सदस्य बन गया था। मेजर की बेटी मुझे दिन भर चाचू चाचू कह कर पुकारती रहती थी। पता नहीं उसे मुझमें ऐसा क्या नज़र आता था जिसकी वजह से वो मुझे बहुत स्नेह देती थी। वो बिलकुल किसी गुड़िया की तरह थी। मैं शुरू शुरू में उससे ज्यादा बात नहीं करता था। इसकी वजह ये थी कि मुझे लड़की व औरत जात से नफ़रत सी हो गई थी।
धीरे धीरे ऐसे वक्त गुज़रने लगा और मेजर के यहाॅ रहते हुए मुझे चार साल गुज़र गए। इन चार सालों में मैं मेजर और उसकी बेटी से इतना घुल मिल गया था कि मुझे लगता ही नहीं था कि मैं इनके लिए कोई पराया हूॅ। मेजर की बेटी को मैं अपनी बेटी की तरह मानता था और हर पल उसे खुश रहने की भगवान हे दुवाएॅ करता रहता था। उसे देख कर हर दुख दूर हो जाता था। मैं तो जैसे अपने अतीत का हर किस्सा भूल गया था। मगर फिर से एक बार मेरे नसीब में बुरा दिन आ गया। मेजर के बड़े भाई का लड़का पढ़ाई के सिलसिले में आया और फिर मेजर के ही बॅगले पर रहने लगा। मुझे उसकी शक्ल देख कर अजीब सा एहसास होता। हलाॅकि वो देखने में सुंदर गबरू जवान था किन्तु उसकी ऑखों में जाने ऐसा क्या था कि मुझे वो खटकने लगा था। ख़ैर, कुछ ही दिनों में मुझे समझ आ गया कि मुझे ऐसा क्यों लगता था।
मेजर का भतीजा बड़ा ही शातिर किस्म का लड़का था। वो मेजर के सामने उससे बहुत ही सलीके से बातें करता और ऐसा दर्शाता कि उसके जैसा संस्कारी लड़का दुनियाॅ जहाॅन में कहीं ढूॅढ़ने पर भी नहीं मिलेगा। किन्तु मेजर के न रहने पर वो हमेशा मेजर की बेटी को जो कि खुद उसके सगे चाचा की ही बेटी थी यानी कि उसकी बहन थी तो वो उसे ताड़ता रहता था। उसकी ऑखों में हवस स्पष्ट दिखाई देती थी। मैं दिन में ज्यादातर बॅगले के बाहर मुख्य द्वार पर ही रहता था।
बीच बीच में मैं इधर उधर का चक्कर लगाता और कभी कभी बॅगले के अंदर भी घूम आता। यही मेरे काम का तरीका नियम बद्ध था।
मैं मेजर के उस भतीजे के चलते मेजर की बेटी कुमुद के लिए बेहद चिंतित व परेशान होने लगा था। मैं अच्छी तरह समझ चुका था कि उस नामुराद लड़के की नीयत कुमुद बेटिया पर ख़राब हो चुकी थी। मैने इस बारे में मेजर से इस लिए कुछ भी नहीं बताया था क्योंकि मेरे पास उस लड़के के खिलाफ़ कीई सबूत नहीं था। मेजर अपने भतीजे के प्रति मेरी वो सब बातें कभी न मानता बल्कि उल्टा मुझ पर ही गुस्सा करता और मुझे काम से भी निकाल देता। इस लिए मैं बस बेबस हो चुका था किन्तु मेरी पूरी कोशिश थी कि मेरे रहते वो लड़का अपने नापाक़ इरादों कभी कामयाब न हो सके। इस लिए वो जब भी अपने स्कूल या काॅलेज से वापस बॅगले में आता तो मैं कुछ देर के अंतराल में बॅगले के अंदर का चक्कर ज़रूर लगा आता और जाॅच परख लेता कि सब ठीक है कि नहीं।
ऐसे ही एक दिन की बात है कि वो लड़का अपने काॅलेज से जल्दी ही आ गया। मुझे उसके जल्दी आ जाने पर हैरानी तो हुई किन्तु मैं कर भी क्या सकता था। पर मुझे ऐसा आभास ज़रूर हुअ जैसे आज कुछ होने वाला है। ख़ैर, उसके अंदर जाने के कुछ देर बाद ही मैं भी अंदर चला गया। मैने बड़े एहतियात से हर जगह का मुआयना किया। मैं ये महसूस करके चौंका कि लड़का अपने कमरे में नहीं है। ये महसूस होते ही मैं सीधा कुमुद के कमरे की तरफ बढ़ गया। कुमुद के कमरे के पास आकर मैने देखा कि कमरे का दरवाजा हल्का खुला हुआ है। ये देख कर मैं चौंका। आमतौर पर कुमुद के कमरे का दरवाजा बंद ही रहता था। मैने हल्के खुले हुए दरवाजे से अंदर की तरफ झाॅका तो मेरी नज़र उस लड़के पर पड़ी। मैं ये देख कर बुरी तरह चौंका कि वो लड़का कुमुद के कमरे के अटैच बाथरूम के दरवाजे के पास खड़ा है। उसका एक हाॅथ दरवाजे के ऊपरी हिस्से पर था जबकि दूसरा हाथ नीचे की तरफ था। मुझे उसके दूसरे हाॅथ की कुहनी हिलती हुई प्रतीत हो रही थी। मेरे दिमाग़ ने काम किया। मैं समझ गया कि वो कमीना कुमुद बिटिया को नहाते हुए देख रहा है। बस इसके आगे मुझसे बरदास्त न हुआ। मुझे बेहद गुस्सा आ गया उस पर। मैं झटके से दरवाजा खोल कर अंदर की तरफ तेज़ी से बढ़ा।
कमरे के अंदर आहट महसूस होते ही वो लड़का बुरी तरह चौंक कर पलटा और मुझे देखते ही हक्का बक्का रह गया। मगर उसकी ये हालत सिर्फ कुछ पलों तक ही रही। उसके बाद उसने इस तरह से अपना रंग बदला कि भला गिरगिट क्या बदलता होगा। यहाॅ पर उसने इस कहावत को पूरी तरह सिद्ध कर दिया कि "उल्टा चोर कोतवाल को डाॅटे"। ऐसे माहौल में उसके साथ जो कुछ मुझे कहना चाहिए था वही सब वो मुझे ऊॅची आवाज़ में कहने लगा था। उसके मुख से अपने लिए ये सब सुन कर मैं भौचक्का सा रह गया। हैरत व अविश्वास से मेरा मुह तथा मेरी फट पड़ी थी।
जबकि वो बराबर मुझ गरजे जा रहा था। कुछ ही देर में बाथरूम से कुमुद बिटिया कपड़े पहन कर बाहर निकली। मैने उसकी तरफ देखा तो चौंक गया, उसका चेहरा ऑसुओं से तर था और वो मुझे इस तरह देखे जा रही थी जैसे बिना कुछ बोले ही ऑखों से कह रही हो कि___"क्यों चाचू, ऐसा क्यों किया तुमने? मैं तो आपकी बेटी जैसी ही हूॅ और आपको अपने पिता जैसा ही सम्मान देती हूॅ। फिर आपने मुझ पर गंदी नज़र डाली। क्यों चाचू क्यों? क्या आप हवस में इतने अंधे हो गए कि आपको मुझमें आपकी कुमुद बिटिया की जगह एक ऐसी लड़की दिखने लगी जिसके साथ अपनी हवस को मिटाया जाए?"
उसकी ऑखों ने जैसे सब कुछ कह दिया था मुझे। उसे अपने मुख से कहने की कीई ज़रूरत नहीं रह गई थी और मैं भी जैसे उसकी ऑखों के द्वारा कही हुई हर बात समझ गया था। उसके चेहरे पर तुरंत ही हिकारत के भाव उभरे तथा उसमें शामिल हो गई घृणा। जिसके तहत उसने तुरंत ही अपना मुह फेर लिया जैसे अब वो मुझे देखना भी न चाहती हो। सच कहूॅ तो इन कुछ ही पलों में मेरी सारी दुनियाॅ बरबाद हो गई। चार सालों का मेरा विश्वास मेरा प्यार व स्नेह एक पल में ही जैसे नेस्तनाबूत हो गया था।
ये एहसास होते ही मेरे अंदर तीब्र पीड़ा हुई। मेरी ऑखों से ऑसू छलक पड़े। मैने अपनी सफाई में कुछ भी कहना गवाॅरा न किया और मैं आगे भी कहना नहीं चाहता था। क्योंकि सबसे बड़ा होता है विश्वास। अगर विश्वास ही नहीं रहा तो सफाई देने का कोई मतलब ही नहीं रह गया था। मुझे तक़लीफ इसी बात पर हुई कि उस लड़की ने ये कैसे यकीन कर लिया कि मैंने उस पर गंदी नज़र डाली थी? उसे अपने भाई पर संदेह क्यों न हुआ जिसने सचमुच ही वो काम किया था। क्या सिर्फ इस लिए कि वो उसका भाई था और मैं कोई ग़ैर था?
वो लड़का मुझे ज़बरदस्ती घसीटते हुए कमरे से बाहर लाया और बॅगले से निकल जाने के लिए कह दिया। मैं भी दुखी मन से उठा और अपनी बंदूख सम्हाले बॅगले से बाहर निकल गया। किन्तु मैं बॅगले के मुख्य द्वार से बाहर न गया। मुझे मेजर साहब के आने का इन्तज़ार था। मुझे उनका सामना करना था। मैं ऐसे ही वहाॅ से जाकर ये साबित नहीं करा देना चाहता था कि मैं वास्तव में गुनहगार हूॅ बल्कि उनके सामने जाकर ये दर्शाना चाहता था कि मैं गुनहगार नहीं हूॅ।
शाम के लगभग आठ बजे मेजर साहब बॅगले पर लौट कर आए। मैं सारा दिन भूखों प्यासा मुख्य दरवाजे पर किसी गुलाम की तरह खड़ा रह गया था। रह रह कर मेरे मन में ख़याल आता कि यहाॅ से कहीं ऐसी जगह चला जाऊॅ जहाॅ से कोई इंसान दुबारा वापस नहीं आ पाता। मगर मैं ऐसा भी न कर सका था। मुझे मेजर साहब को अपना चेहरा दिखाना एक बार। मेरे अंदर औरत जात के प्रति जो नफ़रत कहीं खो सी गई थी वो फिर से उभर कर आ गई थी। ख़ैर, मेजर साहब आए और बॅगले के अंदर चले गए।
मुझे पता था कि वो लड़का और कुमुद मेजर साहब को मिर्च मशाला लगा कर आज की घटना के बारे में बताएॅगे। लेकिन मुझे परवाह नहीं थी अब। मुझे उम्मीद थी कि मेजर साहब मेरे बारे में ऐसा हर्गिज़ भी नहीं सोच सकते। आख़िर देश दुनियाॅ देखी थी उन्होंने। उनको इंसानों की पहचान थी।
मगर मेरी उम्मीदों पर बिजली उस वक्त गिरी जब मेजर साहब ने मुझे बुलाया और मुझे डाॅटना शुरू किया।
"हमें तुमसे ऐसे गंदे कर्म की ज़रा भी उम्मीद नहीं थी शंकर।" मेजर साहब ने कड़ी आवाज़ में कहा___"हमें तुम पर कितना भरोसा था। हम तुम्हें कभी ग़ैर नहीं समझते थे। मगर तुमने अपनी ज़ात दिखा दी। शुरू में जब तुमने कहा था कि तुम दुनियाॅ का हर काम कर सकते हो लेकिन कोई ग़लत काम नहीं करोगे भले ही चाहे भूॅखों मर जाओ तो हम तुम्हारी उस बात से बेहद प्रभावित हुए थे। मगर आज जो कुछ तुमने किया है उससे हमें बहुत दुख पहुॅचा है। हमारी बेटी तुम्हें हमारे जैसा ही पिता का सम्मान देती थी और तुमसे लाड प्यार करती मगर तुमने उस पर ही गंदी नज़र डाल दी। मन तो करता है कि तुमसे ये बंदूख छीन कर इसकी सारी गोलियाॅ तुम्हारे सीने में उतार दें मगर नहीं करेंगे ऐसा। इतने साल की वफ़ादारी का अगर यही इनाम लेना तो कोई बात नहीं। मगर अब तुम्हारे लिए यहाॅ कोई जगह नहीं है। निकल जाओ यहाॅ से और दुबारा कभी अपनी शक्ल मत दिखाना हमें वरना हमसे ये उम्मीद न करना कि हम तुम्हें ज़िंदा छोंड़ देंगे।"
बस, मेजर साहब की ये बातें सुन कर मैं बुरी तरह अंदर से टूट कर बिखर गया। मैं अब एक पल भी यहाॅ लुकना नहीं चाहता था। इस लिए घुटनों के बल बैठ कर मैने अपने कंधे से बंदूख निकाली और मेजर साहब के क़दमों में रख दी। उसके बाद मैने उन्हें अपने दोनों हाॅथ जोड़ कर नमस्कार किया और फिर धीरे धीरे खड़ा हो गया। मेरे अंदर ऑधी तूफान मचा हुआ था। मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं दहाड़ें मार कर रोऊॅ मगर मैने अपने मचलते हुए जज़्बातों को शख्ती से काबू किया हुआ था। खड़े होकर मैने एक बार कुमुद बिटिया की तरफ देखा तो उसने जल्दी से अपना मुह फेर लिया। मेरी ऑखों से ऑखू का कतरा टूट कर हाल के फर्श पर गिर गया।
उसके बाद मैं एक पल के लिए भी नहीं रुका। वहाॅ से बाहर आकर मैं सर्वेन्ट क्वार्टर की तरफ अपने कमरे में गया और वहाॅ से अपना सामान एक थैले में भर कर कमरे से बाहर आ गया। बॅगले के मुख्य द्वार से बाहर निकल कर मैं एक तरफ बढ़ता चला गया। उसके बाद बॅगले में क्या हुआ इसका मुझे कुछ पता नहीं। वहाॅ से आने के बाद मैं एक सुनसान जगह पर दिन भर यूॅ ही दुखी मन से बैठा रहा। ये संसार बहुत बड़ा था मगर इस संसार में ऐसा कोई भी नहीं था जिसे मैं अपना कहता। जो मुझे समझता और मेरे दुखों को महसूस करता। वर्षों पहले एक दुख से उबरा था, आज फिर एक दुख ने मुझे वहीं पर ले जाकर पटक दिया था।
ख़ैर, समय का काम है बदलना। इस लिए धीरे धीरे समय के साथ मैं भी उस सबको भूलने की कोशिशें करने लगा। ऐसे ही एक साल गुज़र गया। मैं कोई न कोई काम कर लेता जिससे मुजे दो वक्त की रोटी मिल सके और रातों को कहीं भी लेट कर सो जाता। यहीं मेरी ज़िंदगी बन गई थी। ऐसे ही एक दिन हरिया से मेरी मुलाक़ात हो गई। इसने जाने मुझमें ऐसा क्या देखा कि ये मुझे यहाॅ ले आया और फिर मैं तब से यहीं का रह गया। यहाॅ पर हरिया से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई। बिंदिया भाभी में मुझे एक माॅ की झलक दिखने लगी और रितू बिटिया के रूप में एक ऐसी नेक दिल लड़की मिल गई जो मुझे काका कहती है और मेरी आदर सम्मान करती है। मुझे उसमें अपनी बेटी ही नज़र आती है। एक तरह से यहाॅ पर मुझे एक भरपूर परिवार ही मिल गया है। लेकिन हमेशा इस बात का डर बना रहता है कि किसी दिन मेरी किस्मत और सबका वो भगवान फिर से न मुझसे रूठ जाए और मुझे फिर से उसी दुख दर्द में ले जाकर पटक दे जहाॅ से उबरने में मुझे एक युग लग जाता है।"
अपने गुज़रे हुए कल की दुख भरी कहानी बता कर शंकर ने गहरी साॅस ली और अपने गमछे से अपनी ऑखों से बह चले ऑसुओं को पोंछा। उसके सामने ही खड़े हरिया व रितू की ऑखों में भी ऑसू थे। शंकर की कहानी में वो इतना डूब गए थे कि उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सब कुछ उनकी ऑखों के सामने ही वो सब घट रहा था।
हरिया को जाने क्या सूझा कि वो झपट कर शंकर को अपने गले से लगा लिया और फूट फूट कर रो पड़ा। शंकर उसे इस तरह रोता देख मुस्कुराया। ये अलग बात थी कि उसकी ऑखें भी बह चली थी। रितू आगे बढ़ कर उन दोनो को एक दूसरे से अलग किया।
"काका आपने अपने अंदर इतना बड़ा दुख छुपा के रखा हुआ था।" रितू ने दुखी मन से कहा___"जिसका हमें एहसास तक न था। यकीनन आपके साथ जो कुछ हुआ वो बहुत ही दुखदायी था। मगर आप चिंता मत कीजिए। अब इसके आगे ऐसा कुछ भी नहीं होगा। आप हमेशा हमारे साथ ही रहेंगे। मैं कभी भी आपको ऐसे दुख में जाने नहीं दूॅगी जिससे आपको जीने में तक़लीफ हो।"
"भगवान करे ऐसा ही हो बिटिया।" शंकर ने कहा__"मैं भी तुम लोगों को छोंड़ कर कहीं नहीं जाना चाहता। तुम सबसे इतना लगाव हो गया है कि अब अगर ऐसा कुछ हुआ तो यकीनन ये दुख सहन नहीं कर पाऊॅगा मैं।"
"अरे तू फिकर काहे करथै ससुरे?" हरिया ने कहा__"हम अइसन अब कउनव सूरत मा न होंय देब। चल अब ई सब छोंड अउर आपन मन का खुश रख। अउर हाॅ ई हमरा वादा हा कि हम बहुत जल्द तोहरा ब्याह एको सुंदर लड़की से करब जउन तोहरी ऊ ससुरी बिंदिया भौजी जइसनै होई।"
हरिया की ये बात सुन कर शंकर और रितू दोनो ही मुस्कुरा कर रह गए। कुछ देर ऐसी ही कुछ और बातें हुईं उसके बाद सहसा रितू को कुछ याद आया।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
कहानी ज़ारी है अभी,,,,,,,,,,,,
कहानी अब आगे,,,,,,,,,
उधर हवेली में!
कई सारी गाड़ियाॅ हवेली के बाहर विसाल मैदान में आकर रुकीं।
सभी गाड़ियों के सभी दरवाज़े एक साथ खुले और उनमें से कई सारे अजनबी लोग बाहर निकले। सभी आदमियों में ज्यादातर आदमी हट्टे कट्टे व बाॅडी बिल्डथ टाइप के थे। जबकि कुछ आदमी साधारण कद काठी के थे। वो सब हट्टे कट्टे आदमियों से घिरे हुए थे।
हवेली के बाहर अजय सिंह के कुछ आदमी हाॅथों में बंदूख लिए खड़े थे। उन लोगों ने जब इतने सारे आदमियों को एक साथ हवेली की तरफ आते देखा तो उनके चेहरों का रंग सा उड़ने लगा। उन्हें लगने लगा अब ये कौन सी नई मुसीबत आ गई यहाॅ? सब एक दूसरे की तरफ देखने लगे थे। जैसे एक दूसरे से पूछ रहे हों कि ये सब क्या है? किन्तु जवाब किसी के पास नहीं था।
"ठाकुर साहब से कहो कि हम लोग उनके कहे अनुसार अपने आदमियों को यहाॅ लेकर आ गए हैं।" एक आदमी ने अजय सिंह के एक आदमी से कहा___"हमारे पास ज्यादा समय नहीं है। इस लिए अभी हमें जाना होगा किन्तु हमारे ये आदमी उनके किसी भी आदेश का पालन करने के लिए पूरी तरह तैयार रहेंगे।"
उस आदमी की ये बात कदाचित गार्ड की समझ में न आई थी। इसी लिए वह मूर्खों की तरह उस आदमी को देखता रह गया। उसके चेहरे पर उलझन के से भाव उभर आए थे।
"अरे भाई ऐसे क्यों देख रहे हो हमें?" आदमी ने चौंकते हुए कहा__"हम सब ठाकुर साहब के बिजनेस वाले फ्रैण्ड्स हैं। अतः जल्दी जाओ और उन्हें बताओ कि मिस्टर कमलनाथ और उनके साथ सभी उनके दोस्त यहाॅ आए हुए हैं।"
गार्ड के चेहरे पर फैले उलझन के भाव कम तो न हुए किन्तु उसने इतना अवश्य किया कि पाॅकिट से मोबाइल निकाल कर किसी को फोन लगाया। उधर से काल रिसीव करते ही उसने कहा___"मालकिन, कुछ लोग मालिक से मिलने आए हैं। कह रहे हैं कि उनके बिजनेस से संबंधित फ्रैण्ड्स हैं। मेरे लिए क्या आदेश है मालिकन?"
"............।" उधर से कुछ कहा गया और इसके साथ ही काल कट हो गई।
"आप कृपया एक मिनट रुकिये।" फिर उस गार्ड ने बड़ी विनम्रता से कहा___"मालकिन आ रही हैं बाहर।"
"ओके नो प्राब्लेम।" उस आदमी ने कहा और दूसरी तरफ पलट कर इधर उधर देखने लगा।
कुछ ही देर में हवेली का दरवाजा खुला और प्रतिमा उसमे से बाहर निकली। उसके पीछे ही उसका बेटा शिवा भी था। हवेली के बाहर इतनी सारी गाड़ियाॅ और इतने सारे लोगों को देख कर वो चौंकी। मनो मस्तिष्क में एक ही बात चकरघिन्नी की तरह नाचने लगी कि 'कहीं फिर से कोई सीबीआई वाले नहीं आ गए यहाॅ'।
प्रतिमा की देखते ही गार्ड ने उस आदमी के पास जाकर उसे बताया कि मालकिन आ गई हैं। वो आदमी पलट कर प्रतिमा के पास आया।
"नमस्कार भाभी जी।" उस आदमी ने खुशदिली से हाॅद जोड़ कर नमस्कार करते हुए बोला__"हम सब ठाकुर साहब के फ्रैण्ड सर्कल के लोग हैं। ठाकुर साहब से कल मीटिंग में हमारी कुछ बातें हुई थी। जिसके तहत उन्होंने हमसे हमारे कुछ बेहतरीन आदमियों की माॅग की थी। सो इस वक्त हम उसी सिलसिले में यहाॅ आए हैं।
हमारे पास ज्यादा समय नहीं है इस लिए हम ठाकुर साहब से मिल कर तुरंत ही यहाॅ से जाना चाहेंगे। उसके बाद ये उनका काम है कि वो हमारे इन आदमियों के द्वारा क्या काम लेते हैं?"
प्रतिमा उस आदमी की बातों से समझ गई कि कल अजय सिंह किसी ज़रूरी मीटिंग में था इसी लिए शाम को देर से आया था। तो इसका मतलब मीटिंग इस सबके लिए थी। किन्तु समस्या ये थी कि ये लोग जिससे मिलने आए थे उसे तो सीबीआई वाले सुबह ही अपने साथ ले गए थे। इस लिए अब वो इन्हें क्या जवाब दे यही उसकी समझ में नहीं आ रहा था। सच्चाई बताने पर संभव है कि बात बिगड़ जाती। अगर इन लोगों को अभी पता चल जाए कि अजय सिंह को सीबीआई वाले ले गए हैं तो ये लोग तुरंत ही यहाॅ से रफूचक्कर हो जाएॅगे।
"क्या बात है भाभी जी?" उस आदमी ने कहा___"आप किसी गहरी सोच मे डूबी हुई प्रतीत हो रही हैं। कहिए सब ठीक तो है न? ठाकुर साहब को बुलाइये हम उनसे मिलना चाहते हैं।"
"ठाकुर साहब तो इस वक्त हवेली के अंदर नहीं हैं।" फिर प्रतिमा को बहाना बनाना पड़ा___"सुबह ही कहीं चले गए थे। कहाॅ गए हैं इस बारे में कुछ बताया भी नहीं उन्होंने।"
"ओह आई सी।" उस आदमी ने कहा___"कोई बात नहीं भाभी जी। हम फोन पर बात कर लेंगे उनसे। अच्छा अब हम चलते हैं। हम अपने इन आदमियों कों यहीं पर छोंड़े जा रहे हैं।"
"अरे ऐसे कैसे चले जाएॅगे आप लोग?" प्रतिमा ने औपचारिकता के भाव से कहा___"अंदर आइये और कम से कम चाय या काॅफी तो पीकर ही जाइये। वरना आपके ठाकुर साहब मुझे ही डाॅटेंगे कि मैने आप लोगों को बिना चाय पानी करवाए ही जाने दिया।"
"इसकी ज़रूरत नहीं है भाभी जी।" आदमी ने हॅसते हुए कहा___"आपने कह दिया इतना ही बहुत है हमारे लिए। अच्छा अब हम चलते हैं, नमस्कार।"
"नमस्कार जी।" प्रतिमा ने भी प्रत्युत्तर में अभिवादन किया।
इसके बाद वो जितने भी साधारण कद काठी के आदमी सूट बूट पहने आए थे वो सब गाड़ियों में सवार होकर वहाॅ से चले गए। उनके जाने के बाद प्रतिमा ने बाॅकी बचे हट्टे कट्टे व बाॅडी बिल्डर आदमियों की तरफ देखा।
"बेटा इन सबको सर्वेंट क्वार्टर में ले जाओ।" फिर प्रतिमा ने शिवा से कहा___"और इनके रहने का इंतजाम करो। तब तक मैं सविता(नौकरानी) से कह कर इन लोगों के लिए चाय पानी का उचित बंदोबस्त कराती हूॅ।"
"ओके माॅम।" शिवा ने कहा और हवेली की सीढ़ियाॅ उतर कर नीचे आ गया उन लोगों के पास।
उन सबको लेकर शिवा हवेली के पूर्व दिशा की तरफ बने सर्वेंट क्वार्टर की तरफ बढ़ गया। ये सर्वेंट क्वार्टर अजय सिंह ने साल भर पहले ही बनवाया था। उन लोगों के जाने के बाद प्रतिमा भी अंदर की तरफ चली गई। उसके चेहरे पर सहसा गहन चिंता व परेशानी के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे थे। उसे पता था कि अजय सिंह के जो बिजनेस संबंधी दोस्त आए थे वो अजय सिंह से फोन पर ज़रूर बात करेंगे।
लेकिन जब अजय सिंह का फोन नहीं लगेगा तो वो सब परेशान भी हो जाएॅगे। उस सूरत में उनका क्या रिऐक्शन होगा इसका कुछ भी अंदाज़ा लगाना मुश्किल था।
प्रतिमा को समझ नहीं आ रहा था कि इस परिस्थिति में वो क्या करे? उसने मदद के उद्देश्य से ही अपनी इंस्पेक्टर बेटी रितू को फोन लगाया था किन्तु उसने काल को रिसीव न करके कट कर दिया था। ये प्रतिमा के लिए शायद आख़िरी सबूत था कि उसकी बेटी ने सचमुच ही अपने माॅ बाप के खिलाफ़ बगावत कर दी थी।
अंदर प्रतिमा ने सविता को उन आदमियों के लिए चाय का कह दिया और खुद आकर ड्राइंग रूम में रखे सोफे पर बैठ गई। उसके चेहरे से चिन्ता व परेशानी के भाव जा ही नहीं रहे थे। वो कुछ भी करके अजय सिंह को सीबीआई के चंगुल से बाहर निकालना चाहती थी। हलाॅकि उसे पता था कि ऐसे मामलों में अपराधी का कानून की गिरफ्त से बाहर आना बेहद मुश्किल काम होता है किन्तु इसके बावजूद प्रतिमा अजय सिंह को बाहर निकालना चाहती थी।
सहसा प्रतिमा को अपने पिता जगमोहन सिंह का ख़याल आया। प्रतिमा का बाप जगमोहन सिंह आज कल इलाहाबाद हाई कोर्ट में बतौर क्रिमिनल लायर था। ऊम्र से ज्यादा अधेड़ नहीं लगता था। कहा जाता है कि जगमोहन सिंह बहुत ही काबिल व तेज़ तर्रार वकील था। चाहे जैसा भी केस हो, मुहमाॅगी फीस मिलने पर वह अपने मुवक्किल को बाइज्ज़त बरी करा लेता था। मगर यहाॅ पर प्रतिमा के लिए सबसे बड़ी समस्या ये थी कि वो अपने बाप से मदद माॅगे तो माॅगे कैसे?
दरअसल, जब प्रतिमा ने अपने बाप को बताया कि वह अजय सिंह से प्यार करती है और उससे शादी करना चाहती है तो जगमोहन सिंह बुरी तरह भड़क गया। उसे प्यार शब्द से ही नफ़रत थी। पता नहीं ऐसा क्या था कि प्रेम प्रसंग होने पर वह आपे से बाहर हो जाता था। उसके घर में नियम कानून बड़े शख्त थे। उसकी दो ही बेटियाॅ थी। जिनमें से प्रतिमा छोटी वाली थी। जबकि पहली बेटी मुम्बई में रहती थी, जहाॅ आजकल अजय सिंह की बेटी नीलम रहती है। जगमोहन सिंह को कोई बेटा नहीं था। धन दौलत की शुरू से ही कोई कमी नहीं थी। ख़ैर, बाप के साफ इंकार कर देने पर प्रतिमा ने पहली बार अपने बाप से मुहज़ुबानी की थी और साफ शब्दों में कह दिया था कि वो शादी करेगी तो अजय सिंह से ही वरना वो कभी किसी से शादी नहीं करेगी। जगमोहन को अपनी इस बेटी की धृष्टता पर बेहद गुस्सा आया और उसने उसी वक्त कह दिया उससे कि आज के बाद वो उसके लिए मर गई है। बस प्रतिमा ने आव देखा न ताव, बाप का घर छोंड़ दिया और सीधा अजय सिंह के पास पहुॅच गई। अजय सिंह के साथ ही वह रहने लगी। इस बीच वो प्रग्नेन्ट हो गई तो आनन फानन में अजय सिंह और प्रतिमा ने आपस में कोर्ट मैरिज कर ली थी।
तब से लेकर अब तक प्रतिमा ने कभी भी अपने बाप से कोई मतलब नहीं रखा था और ना ही उसके बाप जगमोहन ने।
प्रतिमा की इस बगावत से उसकी बड़ी बहन को धक्का तो ज़रूर लगा था किन्तु वो कर भी क्या सकती थी? ऐसे ही समय गुज़रता गया। प्रतिमा अपनी बड़ी बहन से फोन पर ही हाल समाचार ले लिया करती थी। दोनो बहनें वर्षों से एक दूसरे से न मिली थी।
ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठी प्रतिमा इन्हीं सब यादों में खोई थी। उसकी ऑखों में ऑसू भर आए थे। माॅ का साया तो पहले ही उसके सिर से उठ गया था। दोनो बहनों में ये सबसे ज्यादा लाड प्यार में पली पढ़ी थी और शायद यही वजह थी कि जिद्दी हो गई थी। जिसका नतीजा ये हुआ था कि उसने अपने बाप के खिलाफ़ जाकर अजय सिंह से शादी कर ली थी। मगर आज के हालात बहुत और तब के हालात में बहुत फर्क़ हो गया था। आज के हालात में प्रतिमा किसी के भी सामने झुकने और किसी के भी नीचे लेटने को तैयार थी। बदले में उसे अजय सिंह सीबीआई की गिरफ्त से बाहर चाहिए था।
प्रतिमा की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो दुबारा अपने बाप से बात कर सके। शादी वाली बात को तो वर्षों हो गए थे। किन्तु इन वर्षों में उसने एक बार भी अपने बाप से बात करना ज़रूरी नहीं समझा था। और आज जब बुरा वक्त आया तो उसे अपने बाप का ख़याल आया और उससे मदद माॅगने का भी। प्रतिमा को पहली बार लगा कि उसे अपने बाप से इस तरह मुहज़ुबानी नहीं करनी चाहिए थी और ना ही तैश में आकर इस तरह बाप के घर की दहलीज़ को छोंड़ देना चाहिए था। मामले को प्यार से और समझा बुझा कर भी सुलझाया जा सकता था। आज अगर ग़ौर किया जाए तो दो दो बेटियाॅ होने के बाद भी उसका बाप घर में अकेला ही था। सोचने वाली बात है कि उतने बड़े घर में उसका बाप पिछले कितने ही वर्षों से अकेला रह रहा है। क्या उसे अपने उस अकेलेपन से दुख नहीं होता होगा? क्या उसे इस बात का दुख नहीं होगा कि उसकी बेटी ने आज तक उसकी सुधि तक न ली। अपनी खुशियों को गले लगा कर अपने बाप को अकेला छोंड़ दिया। तन्हाई इंसान को जीते जी मार डालती है। मगर उसने कभी अपनी इस बेटी को फोन करके उस सबका गिला न किया था।
प्रतिमा को बड़ी शिद्दत से एहसास हुआ कि उससे कितनी बड़ी भूल हुई है। कहते हैं कि माॅ बापप का गुस्सा या नाराज़गी जीवन भर के लिए नहीं होती। आख़िर बाप को औलाद के आगे हार जाना ही होता है। मगर यहाॅ तो जगमोहन दोनो तरफ से हारा हुआ बाप बन चुका था। प्रतिमा की ऑखों से पश्चाताप के ऑसू बह रहे थे। उसे इस बात का बखूबी एहसास था कि भले ही उसके बाप ने उसे त्याग दिया था मगर आज भी वो अपनी बेटियों के मंगलमय जीवन की कामना करता होगा। ये सब सोच सोच कर प्रतिमा को भारी दुख हो रहा था। उसे अपनी अज्ञानता और अपने छोटेपन का शिद्दत से एहसास हो रहा था मगर अब रोने से क्या हो सकता था? पच्चीस साल का वक्त थोड़ा सा नहीं होता अपने बाप से अनबन किये हुए।
प्रतिमा को लगने लगा कि ये जो कुछ भी आज उसके और उसके परिवार के साथ हो रहा है वो सब उसी का फल है जो उसने इतने वर्षों से बाप को दुखी किया हुआ है। ये सब सोच कर ही प्रतिमा को चक्कर सा आने लगा। उसने अपना सिर दोनो हाॅथों से पकड़ लिया। तभी ड्राइंग रूम में शिवा दाखिल हुआ। अपनी माॅम को इस तरह पीड़ा में देख वह घबरा सा गया। तुरंत ही प्रतिमा के पास पहुॅचा वह और उसे उसके कंधों से पकड़ कर झकझोरा।
"क्या हुआ माॅम?" शिवा ने घबरा कर कहा___"आप ठीक तो हैं न माॅम? प्लीज़ बताइये न क्या हुआ है आपको?"
"कुछ नहीं बेटा।" प्रतिमा ने खुद को सम्हालते हुए कहा___"बस थोड़ा चक्कर सा आ गया था।"
"आप इतना टेंशन क्यों लेती हैं माॅम?" शिवा ने प्रतिमा के चेहरे को दोनो हथेलियों में लेकर कहा___"सब कुछ ठीक हो जाएगा। डैड बहुत जल्द वापस आ जाएॅगे।"
"हाॅ बेटा।" प्रतिमा ने कहीं खोए हुए से कहा___"सब कुछ ठीक हो जाएगा। तेरे डैड जल्द ही हमारे पास वापस आ जाएॅगे।"
"आप चलिये माॅम।" शिवा ने प्रतिमा को उठाते हुए कहा___"अपने कमरे में आराम कीजिए आप और हाॅ ज्यादा सोच विचार मत किया कीजिए।"
शिवा की बात का प्रतिमा ने फीकी सी मुस्कान के साथ जवाब दिया और कमरे की तरफ शिवा के साथ बढ़ गई। कमरे में बेड पर प्रतिमा को लेटा कर शिवा रसोई की तरफ बढ़ गया। रसोई में सविता चाय बनाकर केतली में डाल रही थी। ये देख कर शिवा वापस बाहर की तरफ आया और हवेली से बाहर आ गया। बाहर उसने एक आदमी को बुलाया और अंदर ले गया उसे। अंदर आकर उसने सविता से कहा कि वो चाय नास्ता काका को पकड़ा दे। सविता ने वैसा ही किया। शिवा और वो आदमी दोनो ही चाय नास्ता का सामान लिये सर्वेंट क्वार्टर की तरफ बढ़ गए।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर फार्महाउस पर!
शंकर काका की कहानी से माहौल थोड़ा गंभीर सा हो गया था किन्तु हरिया काका की मज़ेदार बातों से फिर से खुशनुमा हो गया था। रितू को सहसा कुछ याद आया तो उसने हरिया काका की तरफ देखा।
"अरे काका।" फिर उसने कहा___"इन सब बातों के बीच हम ये तो भूल ही गए कि तहखाने में मंत्री की बेटी कैद है और वो कल से भूखी प्यासी भी होगी।"
"हाॅ बिटिया।" हरिया काका के चेहरे पर चौंकने वाले भाव उभरे___"ई ता सही मा हम भुलाय दीन्हें रहे। ऊ ससुरी मंत्रीवा की छोकरिया अबे तक ता ज़रूरै भूख पियास से मरत होई।"
"आप भी कमाल करते है काका।" रितू ने कहा___"ऐसा लगता है जैसे आप उस बेचारी को ऐसे ही मार देंगे। जबकि अभी तो मुझे उसके अंदर की गर्मी निकालनी है। चलिये देखें तो सही क्या हाल चाल हैं उसके?"
"हाॅ हाॅ चला बिटिया।" हरिया काका ने बंदूख को शंकर के हाथ में थमाते हुए कहा___"अब ता देखहिन का पड़ी कि ऊ ससुरी अबे ज़िंदा बा के मर गईल है।"
रितू हरिया की बात पर मुस्कुराती हुई तहखाने की तरब बढ़ गई। उसके पीछे पीछे हरिया भी चल रहा था।
कुछ ही देर में वो दोनो तहखाने के दरवाजे के पास खड़े थे। हरिया ने चाभी हे तहखाने का दरवाजा खोला और एक साइड हट गया। रितू दरवाजे के अंदर की तरफ दाखिल हो गई। अभी वो दो तीन सीढ़ियाॅ ही नीचे उतरी थी कि सहसा उसे रुक जाना पड़ा और जल्दी से पैन्ट की जेब से रुमाल निकाल कर अपने मुह व नाॅक पर रखना पड़ा।
तहखाने में तेज़ दुर्गंध फैली हुई थी। मतलब साफ था अंदर मौजूद सूरज और उसके दोस्त या फिर सूरज की बहन में से किसी का टट्टी पेशाब छूट गया था जिसकी वजह हे अंदर दुर्गंध फैली हुई थी। रितू से बर्दास्त न हुआ तो वो वापस तहखाने से बाहर आ गई।
"काका इन लोगों ने तो यहाॅ गंध फैला रखी है।" रितू ने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा___"ऐसे में अंदर जाया नहीं जाएगा। इस लिए सबसे पहले आप तहखाने का हाल सही करवाइये। उसके बाद ही आगे का कार्यक्रम होगा।"
"ठीक है बिटिया।" हरिया ने कहा___"हम इहाॅ की सफाई करवाता हूॅ तब तक तू बाहर रहा।"
"ठीक है काका।" रितू ने कहा___"मैं कुछ देर के लिए कमरे में जा रही हूॅ। जब यहाॅ का सब ठीक हो जाए तो आप मुझे बुला लीजिएगा।"
ये कह कर रितू वहाॅ से बाहर आकर इस तरफ से अंदर गई और अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। कमरे में आकर रितू बेड पर लेट गई। अभी वह लेटी ही थी कि नैना बुआ भी कमरे में आ गई और बेड के किनारे भाग में बैठ गई।
"आइये बुआ।" रितू ने अधलेटी अवस्था में कहा__"आप भी आराम से लेट जाइये।"
"चल ठीक है तू कहती है तो लेट जाती हूॅ।" नैना ने रितू के इस तरफ आते हुए कहा___"अच्छा ये बता कि तेरे इस फार्महाउस पर और क्या क्या होता है?"
"क्या मतलब??" रितू बुरी तरह चौंकी___"यहाॅ क्या क्या होता है से आपका क्या मतलब है?"
"इतनी नासमझ व बुद्धू नहीं हूॅ मैं जितना तू समझ रही है मुझे।" नैना ने कहा___"यहाॅ आए मुझे कुछ समय तो हो ही गया है। मैने महसूस किया है कि ये फार्महाउस असल में मुजरिम लोगों के लिए एक ऐसी जेल की तरह है जिसकी कैद से मुजरिम का निकल पाना नामुमकिन ही नहीं बल्कि असंभव है। कह दे भला कि मैं झूॅठ कह रही हूॅ?"
रितू चकित भाव से देखती रह गई अपनी बुआ को। किन्तु फिर तुरंत ही सम्हल भी गई। चेहरे पर शशंक भाव लाते हुए बोली___"ये सब आपने खुद महसूस किया है या ये सब बातें किसी के द्वारा पता चली है आपको?"
"बात अगर सच है तो इस बात से कोई मतलब ही नहीं रह जाता मेरी बच्ची कि मुझे ये सब कैसे पता चला?" नैना ने स्पष्ट भाव से कहा___"दूसरी बात मुझे इस बात से कोई ऐतराज़ नहीं है कि तू इस फार्महाउस पर क्या कर रही है। बल्कि खुशी है कि मुजरिमों को उचित सज़ा दे रही है तू। मगर मैं बस यही कहूॅगी कि ऐसे कामों में अपनी जान का ख़तरा भी बहुत होता है इस लिए अपना भी ख़याल रखना।"
"ख़तरा तो हर इंसान के जीवन में होता है बुआ।" रितू ने कहा___"चाहे वो कोई आम इंसान हो या फिर कोई ऐसा इंसान जो हर वक्त ख़तरों के बीच ही रहता है।
मैं इस फार्महाउस पर इसके पहले कभी भी किसी मुज़रिम को कानून अपने हाॅथ में लेकर नहीं आई बुआ और नाही ऐसा करने का मैने कभी सोचा था। मगर ये सब तो मैने तब किया जब विधी का मामला आया। हमारे देश में किसी मुजरिम को उसके संगीन से भी संगीन अपराध के लिए कोई शख्त सज़ा नहीं हो पाती। इसकी कई सारी वजहें हैं मगर मुख्य वजहें ये हैं कि हमारा कानूनी सिस्टम बहुत कमज़ोर व ढीला है। कोर्ट में आज भी लाखों ऐसे संगीन अपराधों के केस फाइलों के नीचे दबे हुए हैं जिनकी समयावधी का पता चलते ही हमारा कानून पर से विश्वास उठने लगता है। दूसरी बात हमारा यही कानूनी सिस्टम बड़े लोगों और मंत्री मिनिस्टरों के हाॅथ की कठपुतली बना हुआ है। जबकि सच्चाई ये है कि कानून की नज़र में कोई भी छोटा बड़ा नहीं होता। अगर अपराध देश के सबसे बड़े ब्यक्ति ने किया है तो उसे भी वैसी ही सज़ा मिलनी चाहिए जो किसी आम मुजरिम को मिलती है। मगर ये सब कहने की बातें हैं बुआ, हकीक़त में ऐसा होता नहीं है। कानून के इसी कमज़ोर सिस्टम की वजह से एक शरीफ आदमी मजबूरीवश जुर्म का दामन थाम बैठता है।"
"तुम जिन चीज़ों की बात कर रही हो बेटा।" नैना ने गहरी साॅस ली___"वो हमेशा ऐसी ही रहेंगी। बल्कि अगर ये कहूॅ तो ग़लत न होगा कि इससे भी बदतर बन जाएॅगी। इस लिए इस विषय पर बात करने का कोई मतलब नहीं है। तुमने कहा कि विधी का मामला जब सामने आया तब तुमने ऐसा क़दम उठाया। विधी के बारे में भी तुमने ही मुझे बताया था कि उसके साथ चार ऐसे लड़कों ने घिनौना कुकर्म किया था जो बड़े बाप की पैदाईश हैं। मैं ये कहना चाहती हूॅ कि ऐसे बड़े बाप की औलादों को यहाॅ लाकर और उनको सज़ा देने से कहीं तुम पर तो कोई ख़तरा नहीं आ जाएगा। आख़िर सवाल तो बड़े लोगों का है न। जिनके ये बच्चे हैं उन्हें अगर पता चल जाए कि उनके बच्चों को तुमने क्या और कैसे सज़ा दी है तो यकीनन वो बड़े लोग तुझ पर बिजली बन कर गिरेंगे।"
"फिक्र मत कीजिए बुआ।" रितू ने सहसा कठोर भाव से कहा___"मैंने उन सबका अच्छा खासा इंतजाम किया हुआ है। आप यूॅ समझिये कि उन बड़े बड़े खलीफाओं की जान मेरी मुट्ठी में कैद है। आज की डेट में वो सब ऐसी कठपुतलियाॅ बने हुए हैं जो सिर्फ मेरे ही इशारे पर नाचने के लिए मजबूर हैं। वो अपनी मर्ज़ी से ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जो मुझे पसंद ही न आए।"
"ऐसा तेरे पास उनके खिलाफ क्या है?" नैना ने चकित भाव से पूछा___"जिसकी वजह से वो सब बड़े बड़े सूरमा तेरे इशारों पर नाचने के लिए मजबूर बन गए हैं?"
नैना के पूछने पर रितू ने कुछ पल सोचा और फिर उसने वीडियो वाली सारी बात बता दी उसे। ये भी बताया कि उसने खुद मर्द की आवाज़ में फोन पर मंत्री से बात भी की थी और कल तो वो मंत्री की बिगड़ैल बेटी को भी पकड़ कर ले आई है जो इस वक्त तहखाने में बंद है।
सारी बातें जानने के बाद नैना का मुह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया।
"हे भगवान!।" फिर उसके मुख से निकला___"ये तू क्या कर रही है रितू? लड़कों की बात तक तो ठीक था और लड़कों के बापों तक भी ठीक था किन्तु लड़की को क्यों कैद कर किया तूने? ये ठीक नहीं है मेरी बच्ची। उन लोगों ने घृणित कर्म किया क्योंकि वो उनकी फितरत थी मगर तेरी फितरत तो ऐसी नहीं है न बेटा? इस लिए मेरी बात मान और मंत्री की बेटी को छोंड़ दे तू।"
"आपने बहुत दूर तक का सोच लिया बुआ।" रितू ने मुस्कुरा कर कहा___"जबकि मेरा ऐसा करने का कोई इरादा ही नहीं है। मेरा मकसद तो बस ये है कि मैं उन्हें भी उस चीज़ का एहसास कराऊॅ जिस चीज़ को करने में उन्हें सबसे ज्यादा मज़ा आता है। मैं उन्हें दिखाना चाहती हूॅ बुआ कि जब वैसा ही सब कुछ अपने साथ होता है तब कैसा प्रतीत होता है? जब अपने ऊपर वैसा जुल्म होता है तो कितनी तक़लीफ़ होती है? हाॅ बुआ यही, बस यही एहसास कराना चाहती हूॅ मैं उन सबको।"
"अगर ऐसी बात है तो फिर ठीक है।" नैना ने सहसा मुस्कुराते हुए कहा___"जो भी करना इस बात का ख़याल रखते हुए करना कि तुम एक अच्छे संस्कारों वाली लड़की हो जो किसी का भी बुरा नहीं कर सकती।"
"अच्छा अब आप आराम कीजिए बुआ।" रितू ने बेड से उतरते हुए कहा___"मैं ज़रा तहखाने में उन सबका हाल चाल देख लूॅ।"
"ठीक है जाओ।" नैना ने कहा और आराम से लेट गई।
रितू कमरे से निकल कर बाहर आ गई। उसने अपने आईफोन के बाईब्रेशन को महसूस किया था। वो समझ गई थी कि हरिया काका ने ही उसे मिस काल दिया था। मतलब साफ था कि उसने तहखाने की गंदगी को साफ कर दिया था। ख़ैर, कुछ ही देर में रितू तहखाने में पहुॅच गई। अब वहाॅ पर कोई गंध नहीं थी। बल्कि सबकुछ एकदम से साफ सुथरा हो गया था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर मंत्री दिवाकर चौधरी की तरफ!
इस वक्त मंत्री के सभी साथी ड्राइंगरूम में जमा हुए बैठे थे। सबके बीच ब्लेड की धार की मानिन्द पैना सन्नाटा फैला हुआ था। अभी थोड़ी देर पहले ही मंत्री दिवाकर चौधरी अपने आवास पर अपने साथियों के साथ आया था। दिवाकर चौधरी कल शाम से चिंतित व परेशान था। कल शाम को ही आया ने बताया था कि रचना बेटी जिम से नहीं लौटी है। चौधरी को पहले इस बात पर ज्यादा चिंता की बात नज़र नहीं आई थी। उसे लगा था कि रचना अपनी फ्रैण्ड्स के साथ होगी। किन्तु जब आधी रात गुज़र जाने पर भी रचना न आई तो चौधरी को चिंता सताने लगी। उसने रचना की जान पहचान वाली सभी लड़कियों को फोन लगा कर रचना के बारे में पूॅछा था। मगर सबने यही कहा कि रचना उनके पास नहीं है। एक लड़की ने बताया कि शाम को जिम से बाहर आते समय रचना उसके साथ ही थी किन्तु फिर वो अपनी स्कूटी लेकर घर के लिए निकल गई थी।
दिवाकर चौधरी को कल सारी रात नींद नहीं आई थी। अपनी बेटी के लौटने के इंतज़ार में वह जागता ही रहा था।
मगर रात गुज़र गई और अब ये दूसरा दिन शुरू होकर दोपहर भी हो रही थी। फिर भी रचना के बारे में कोई ख़बर न मिली थी उसे। चौधरी के लिए चिंता वाली सबसे ज्यादा बात ये थी कि रचना का मोबाइल फोन कल से लगातार बंद बता रहा था। दिवाकर चौधरी को अब अपनी बेटी की बहुत ज्यादा चिंता सता रही थी। उसने अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर ली थी मगर रचना को ढूॅढ़ पाने में वह नाकाम रहा था। दूसरी चिंता की बात ये थी कि उसका बेटा और बेटे के तीनों दोस्तों का भी कहीं कोई पता नहीं चल रहा था। ये सब बातें चौधरी की रातों की नींद उड़ाए हुई थी।
"बड़ी हैरत की बात है चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव कह उठा___"पहले हम अपने बच्चों के लिए चिंतित व परेशान थे। उसके बाद हम अपने लिए परेशान हो गए उन वीडियोज़ की वजह से और अब रचना बेटी के लिए परेशान हो गए हैं। पिछले कुछ समय से ये सब हमारे साथ क्या होने लगा है इसका अंदाज़ा भी है किसी को?"
"हमसे सबसे बड़ी ग़लती ये हुई कि हमने हर चीज़ को तुच्छ व ग़ैरमामूली समझा।" अशोक मेहरा ने कहा__"पर अब हमें गंभीरता से इस सबके बारे में सोचना पड़ेगा चौधरी साहब। हमें शुरू से हर घटना पर ग़ौर करना होगा। हमारे साथ राहू कुतू का ये चक्कर तब से शुरू हुआ जबसे हमारे बच्चों ने उस लड़की का रेप किया था। उस रेप के बाद से ही हमारे बच्चे गायब हुए हैं और अब तक हमें उनकी कोई खोज ख़बर नहीं लगी है। उसके बाद उस अंजान ब्यक्ति का हमें वो वीडियोज़ भेजना, साथ ही उसकी वो धमकी भरी बात। और अब रचना बेटी का अकस्मात गायब हो जाना। ये सारी घटनाएॅ इस बात की तरफ स्पष्ट रूप से इशारा करती हैं कि इन सभी घटनाओं का कर्ता धर्ता एक ही ब्यक्ति है। दूसरा कोई शख्स ऐसा करने का सोच भी नहीं सकता है।"
"मैं अशोक की इन बातों से पूरी तरह सहमत हूॅ चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"ये सच है कि सारी घटनाओं का केन्द्र बिन्दु उस लड़की के रेप वाली वो घटना ही है। ऐसे मामलों में आम तौर पर वही होता है जो ऐसे हर रेपिस्ट के साथ होता है। यानी रेप पीड़िता के घरवाले पुलिस में एफआईआर दर्ज़ करवाते हैं और अदालत से इंसाफ की गुहार लगाते हैं। हलाॅकि ऐसा कम ही होता है क्योंकि कोई भी शरीफ ब्यक्ति अपनी बदनामी नहीं कराना चाहता इस लिए केस को रफा दफा करवा लेता है किन्तु कुछ ऐसे भी होते हैं जो बदनामी से नहीं डरते और इंसाफ के लिए सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा पार कर जाते हैं। मगर हैरत की बात है कि जिस लड़की के साथ हमारे बच्चों ने रेप किया उस पर किसी ने कोई ऐक्शन ही नहीं लिया। जबकि कानून के ही डर से हमारे बच्चे शायद कहीं छुप गए और आज तक लौट कर घर नहीं आए। दूसरी बात ये कि हमने भी ये जानने की कोशिश नहीं की कि रेप के बाद उस लड़की का क्या हुआ? जबकि हमें ऐसे मामले की पल पल की ख़बर रखनी चाहिए थी।
आज उस घटना को घटे क़रीब क़रीब दो हप्ते हो गए होंगे।"
"ये सच है कि हमने हर चीज़ को मामूली ही नहीं समझा बल्कि उसे नज़रअंदाज़ भी किया।" दिवाकर चौधरी ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"जिसका नतीजा आज हमें इस रूप में देखने को मिल रहा है। मगर, अब भी शायद कुछ नहीं बिगड़ा है। हमें इस मामले में अपनी तरफ से जाॅच पड़ताल करनी चाहिए। सबसे ज्यादा उस लड़की के बारे में, क्योंकि घटनाओं का सिलहिला उस रेप से ही शुरू हुआ है। संभव है कि हमें कोई ऐसा सुराग़ मिल जाए जिससे हमें सारी बातों का पता चल जाए। हलाॅकि हमने उस दिन पुलिस कमिश्नर से फोन पर पूॅछा था कि हमारे बच्चों के लापता होने में अगर पुलिस का हाॅथ हुआ तो अच्छा नहीं होगा। इस पर कमिश्नर ने साफ साफ कहा था कि हमारे बच्चों पर कानून का हाॅथ तभी पड़ सकता था जबकि रेप पीड़िता के घरवालों ने थाने में एफआईआर दर्ज़ करवाया होता। इस लिए जब ऐसा कुछ हुआ ही नहीं है तो हमारे बच्चों पर कानून कोई कार्यवाही कैसे कर देगा? इस लिए ये तो साफ है कि हमारे बच्चों के गायब होने में नुलिस या कानून का कोई हाॅथ नहीं है। मगर बच्चे गायब हैं ये सच बात है। इस लिए अब इसका पता लगाना बेहद ज़रूरी है कि ये सब किसने किया है हमारे बच्चों के साथ? दूसरा मामला वो वीडियो भेजने वाला है। वीडियो भेजने वाले ने उस दिन फोन पर स्पष्ट कहा था कि उसके पास हमारे खिलाफ ऐसे ऐसे सबूत हैं जिनके बेस पर वो हमें जब चाहे बीच चौराहे पर नंगा दौड़ा सकता है। उसकी इस बात पर हमने ये निष्कर्श निकाला था कि संभव है कि उसी ने हमारे बच्चों को पकड़ा हो और फिर उन्हें टार्चर करके उनसे हमारे खिलाफ़ उन वीडियो के रूप में सबूत प्राप्त किया होगा।"
"फिर तो ये साबित हो गया चौधरी साहब कि इन सभी घटनाओं का कर्ता धर्ता एक ही ब्यक्ति है।" अशोक मेहरा बीच में बोल पड़ा___"आपकी बातों में यकीनन ठोस सच्चाई है। यकीनन हमारे बच्चे उस वीडियों भेजना वाले के पास ही हैं। इस बात से ये भी सोचा जा सकता है कि रचना बेटी को भी उसी ने किडनैप किया होगा।"
"बिलकुल ऐसा हो सकता है चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"अभी तक हमें वस्तुस्थित का ज़रा भी एहसास नहीं था किन्तु अब हो रहा है और समझ में भी आ रहा है कि वोडियो भेजने वाला हमसे चाहता क्या है?"
"क्या चाहता है वह??" दिवाकर चौधरी फिरकिनी की मानिंद अवधेश की तरफ घूम कर पूछा था।
"हो सकता है कि इन मामलों के तहत उस वीडियो भेजने वाले के संबंध में जो थ्यौरी मेरे दिमाग़ में बनी है वो ग़लत भी हो।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"किन्तु फिर भी प्रकट कर रहा हूॅ। बात उस लड़की के रेप से ही शुरू हुई। रेप पीड़िता के घरवालों को जब इस बात का पता चला होगा कि रेप करने वाले लड़के बड़े बाप की औलाद हैं तो वो समझ गए कि पुलिस में एफआईआर दर्ज़ कराने का कोई फायदा नहीं होगा।
क्योंकि बड़े लोगों के प्रभाव से सीघ्र ही इस केस को इतना कमज़ोर बना दिया जाएगा कि उसमें कोई दम नहीं रह जाएगा। बल्कि ऐसा भी हो सकता है कि उल्टा लड़की को ही कोर्ट में चरित्रहीन और बदचलन साबित कर दिया जाए। उस सूरत में इंसाफ तो मिलने से रहा ही ऊपर से समाज के बीच उनकी जो इज्ज़त खाक़ में मिलेगी उसकी भरपाई इस जन्म में तो संभव नहीं हो सकती थी। इस लिए लड़की के घरवालों ने अपनी बेटी के साथ हुए रेप का बदला लेने के लिए दूसरा तरीका अपनाया। दूसरा तरीका ये था कि किसी तरह वो हमारे बच्चों को पकड़ लें और फिर अपने तरीके से जो चाहे सज़ा दें उन्हें। अब तक वो इसी लिए अपने हर काम में सफल रहे क्योंकि हमने इन सब चीज़ों की तरफ ध्यान ही न दिया था। ध्यान तो तब आया जब मामला हमारे हाॅथ से निकल गया। हाॅ चौधरी साहब, मामला हमारे हाॅथ से निकल ही तो गया है। क्योंकि उस ब्यक्ति के पास हमारे खिलाफ जो सबूत है वो हमें किसी भी पल बीच चौराहे पर नंगा होकर दौड़ने पर मजबूर कर देगा।"
"तो तुम्हारे हिसाब से ये सब लड़की के घरवालों ने किया है?" चौधरी ने कहा___"मतलब कि उन लोगों ने हमारे बच्चों को पकड़ा और उनसे हमारे खिलाफ़ सबूत भी प्राप्त कर लिए?"
"जी बिलकुल।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"आप खुद सोचिए कि ऐसा करने की उनके सिवा भला किसके पास वजह थी? ये तो एक यथार्थ सच्चाई है न चौधरी साहब कि बेवजह कभी कुछ नहीं होता है। इस लिए ये सब करने की वजह सिर्फ और सिर्फ रेप पीड़िता के घरवालों के पास थी। दूसरा ब्यक्ति ऐसा करने का शौक तो नहीं रख सकता न?"
"चलो मान लिया कि ये सब उस रेप पीड़िता लड़की के घरवालों ने किया है।" चौधरी ने कहा___"किन्तु सवाल ये है कि उन्हें हमारी बेटी को भी किडनैप या पकड़ने की क्या ज़रूरत थी? हमारी बेटी ने तो कोई गुनाह नहीं किया था न? फिर क्यों उसे पकड़ा उन्होंने?"
"संभव है कि रचना बेटी के ज़रिये।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"वो हमें ये एहसास दिलाना चाहते हों कि जब वैसा ही रेप केस हमारे साथ हो तो हमें कैसा लगेगा? हमें उससे कितनी तक़लीफ़ होगी?"
अवधेश श्रीवास्तव के इस तर्क से दिवाकर चौधरी कुछ बोल न सका। जैसे निरुत्तर हो गया था वह या फिर कदाचित उसे बात समझ में आ गई थी कि अवधेश का तर्क बिलकुल सही था। ख़ैर, अवधेश श्रीवास्तव की उस बात से कुछ देर सन्नाटा छाया रहा।
"तो अब क्या किया जाए?" सहसा अशोक मेहरा ने उस सन्नाटे को चीरते हुए कहा___"अगर हम सही लाइन पर हैं तो हमारा अगला क़दम अब क्या होना चाहिए?"
"बड़ा सीधा व सरल जवाब है अशोक।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"हमारा अगला क़दम ये होना चाहिए कि हमें जल्द से जल्द उस रेप पीड़िता लड़की के घरवालों को धर लेना चाहिए। उसके बाद खुद ही हम अपने तरीके से उनका क्रिया कर्म करेंगे।
"
"तुम तो ऐसे कह रहे हो अवधेश जैसे कि ये सब वैसा ही आसान काम हो जैसे थाली से दाल चावल का निवाला बना कर उसे खा लेना आसान होता है।" अशोक ने कहा___"जबकि हमें इस बात पर भी ज़रा ग़ौर कर लेना चाहिए कि जिस ब्यक्ति को हम धर लेने के लिए अपने क़दम बढ़ाने जा रहे हैं उसने क्या इस सबके बारे में नहीं सोचा होगा? बल्कि ज़रूर सोचा होगा भाई, उसे भी इस बात का अच्छी तरह से पता है कि हम क्या चीज़ हैं। अगर वो हमारे बच्चों को धर लेगा तो सबसे पहले हमारा शक़ उसी पर ही जाएगा। उस सूरत में हम उसकी उस धृष्टता के लिए उसका क्या हस्र करेंगे ये बात भी उसने ज़रूर सोची होगी। अब सोचने वाली बात ये है कि जब उसने ये सब सोचा होगा तो अपने बचाव का कोई न कोई रास्ता भी सोचा होगा। ऐसे ही तो नहीं कोई साॅप के बिल में अपना हाॅथ डाल देता है।"
"यकीनन तुम्हारी बात में दम है।" अवधेश श्रीवास्तव ने जैसे स्वीकार किया__"और उसके जिस बचाव वाले रास्ते की तुम बात कर रहे हो वो यकीनन यही हो सकता है कि आज की डेट में उसके पास हमारे खिलाफ़ सबूत के रूप में वो वीडियो रूपी ब्रम्हास्र है।"
"बिलकुल ठीक समझे।" अशोक ने कहा__"इस लिए अब हम अगर कोई क़दम भी उठाएॅ तो ज़रा सोच समझ कर उठाएॅ। क्योंकि अगर उसे पता चल गया कि हम उसके खिलाफ़ कुछ करने जा रहे हैं तो संभव है कि अगले ही पल वो हम पर क़यामत बरपा दे।"
"इसका मतलब तो ये हुआ कि हम कुछ कर ही नहीं सकते।" सहसा चौधरी आवेश में कह उठा__"उस साले ने हमें पंगु बना कर रख दिया है। मगर ऐसा कब तक चलेगा यार? हमें कुछ तो करना ही पड़ेगा न? वरना वो दिन दूर नहीं जबकि हम चारों किसी चौराहे पर नंगे दौड़ लगा रहे होंगे।"
"कुछ तो करना ही पड़ेगा चौधरी साहब?" अशोक ने कहा___"साला नुकसान तो दोनो तरफ से होना ही है। इस लिए कुछ करके ही नुकसान झेलते हैं। शायद ऐसा भी हो जाए कि सारा खेल हमारे हक़ में हो जाए।"
"बात तो सच कही तुमने।" चौधरी ने कहा___"मगर सवाल ये है कि हम करेंगे क्या?"
"वही जो करने का सजेशन थोड़ी देर पहले अवधेश भाई ने दिया था।" अशोक ने कहा___"मगर उसमें थोड़ा चेंज करना पड़ेगा। वो ये कि लड़की के घरवालों को पहले हम दिलेरी से धरने जा रहे थे जबकि अब वही काम हम इस तरीके से करने की कोशिश करेंगे कि उस कम्बख्त को इसकी भनक तक न लग सके।"
"ओह आई सी।" अवधेश श्रीवास्तव बोला__"मगर मुझे लगता है कि हमें एक बार ये सब करने से पहले फिर से इस बारे में सोच लेना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि हम खुद ही धर लिए जाएॅ।"
"कायर व डरपोंक जैसी बातें मत करो अवधेश।" चौधरी ने कठोरता से कहा___"अब हम चुप भी नहीं बैटना चाहते हैं। साला हिंजड़ा बना कर रख दिया है उसने हमें। मगर अब और नहीं। अब जो होगा देखा जाएगा।"
बस चौधरी की इस बात ने जैसे फैंसला सुना दिया था। किसी में भी इस फैंसले के खिलाफ़ जाने की हिम्मत न थी।
इस लिए अब इस काम को अंजाम देने की समय सीमा पर विचार विमर्ष किया गया और उसके बाद अशोक और अवधेश अपने अपने घर चले गए। मगर आगे किसके साथ क्या होने वाला है ये किसी को कुछ पता न था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दोस्तो, आप सबके सामने अपडेट हाज़िर है,,,,,,,
आप सबकी प्रतिक्रिया और फीडबैक का इन्तज़ार रहेगा।
दोस्तो, अपडेट नंबर 50 एक ही ब्रैकेट में आ ही नहीं रहा था इस लिए ऐसा देना पड़ा। शब्द संख्या 72000 दिखा रहा था शायद।
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट........ 《 51 》
अब तक,,,,,,,,
"कुछ तो करना ही पड़ेगा चौधरी साहब?" अशोक ने कहा___"साला नुकसान तो दोनो तरफ से होना ही है। इस लिए कुछ करके ही नुकसान झेलते हैं। शायद ऐसा भी हो जाए कि सारा खेल हमारे हक़ में हो जाए।"
"बात तो सच कही तुमने।" चौधरी ने कहा___"मगर सवाल ये है कि हम करेंगे क्या?"
"वही जो करने का सजेशन थोड़ी देर पहले अवधेश भाई ने दिया था।" अशोक ने कहा___"मगर उसमें थोड़ा चेंज करना पड़ेगा। वो ये कि लड़की के घरवालों को पहले हम दिलेरी से धरने जा रहे थे जबकि अब वही काम हम इस तरीके से करने की कोशिश करेंगे कि उस कम्बख्त को इसकी भनक तक न लग सके।"
"ओह आई सी।" अवधेश श्रीवास्तव बोला__"मगर मुझे लगता है कि हमें एक बार ये सब करने से पहले फिर से इस बारे में सोच लेना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि हम खुद ही धर लिए जाएॅ।"
"कायर व डरपोंक जैसी बातें मत करो अवधेश।" चौधरी ने कठोरता से कहा___"अब हम चुप भी नहीं बैटना चाहते हैं। साला हिंजड़ा बना कर रख दिया है उसने हमें। मगर अब और नहीं। अब जो होगा देखा जाएगा।"
बस चौधरी की इस बात ने जैसे फैंसला सुना दिया था। किसी में भी इस फैंसले के खिलाफ़ जाने की हिम्मत न थी। इस लिए अब इस काम को अंजाम देने की समय सीमा पर विचार विमर्ष किया गया और उसके बाद अशोक और अवधेश अपने अपने घर चले गए। मगर आगे किसके साथ क्या होने वाला है ये किसी को कुछ पता न था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,
उधर तहखाने में रितू जब पहुॅची तो वहाॅ की साफ सफाई देख कर खुश हो गई। अब यहाॅ पर पहले जैसी गंद नहीं थी। एक तरफ सूरज और उसके तीनो दोस्त हाथ ऊपर किये रस्सी से बॅधे खड़े थे। रितू को तहखाने में आया देख कर उन चारों की निगाह स्वयमेव ही उस तरफ उठती चली गई थी। चेहरों पर घबराहट के भाव एकाएक ही उजागर हो गए थे। चारों की हालत काफी ख़राब हो चुकी थी। ठीक से भोजन न मिलने की वजह से उनके जिस्म कमज़ोर से दिखाई दे रहे थे। दाढ़ी मूॅछें बढ़ गई थी जिससे पहचान में नहीं आ रहे थे वो। वहीं दूसरी तरफ दीवार के पास ही लकड़ी की एक कुर्सी पर मंत्री की बेटी रचना बैठी हुई थी। उसके दोनो हाॅ तथा दोनो पैर कुर्सी से इस तरह बॅधे हुए थे कि वह हिल डुल भी नहीं सकती थी।
"वाह काका।" तहखाने के फर्श पर चलते हुए रितू ने हरिया की तरफ देख कर कहा___"आपने तो कमाल ही कर दिया है।
यहाॅ की साफ सफाई देख कर लगता ही नहीं है कि अभी थोड़ी देर पहले यहाॅ गंदगी का कितना बड़ा साम्राज्य कायम था।"
"ई सुसरे लोगन ने इहाॅ बड़का वाला गंदगी फेरे रहे बिटिया।" हरिया काका ने कहा___"यसे साफ तो करइन का परत ना। बस थोड़ी दिक्कत ता हुई पर हम सब बहुत अच्छे से कर लिया हूॅ।"
"हाॅ वो तो दिख ही रहा है काका।" रितू ने सहसा पहलू बदलते हुए कहा___"ख़ैर, इन लोगों की ख़ातिरदारी अच्छी चल रही है न?"
"अरे बिटिया।" हरिया ने अजीब भाव से कहा___"ई कइसन सवाल हा? ई बात ता ई ससुरा लोगन का देख के ही समझ मा आ जई कि हम कितना अच्छे से ई लोगन केर खातिरदारी किया हूॅ। बस ई ससुरी छोकरिया बहुतै उछलत रही।"
"ऐसा क्यों काका?" रितू चौंकी।
"अरे ऊ का है ना बिटिया।" हरिया ने ज़रा नज़रें झुकाते हुए कहा___"ई चारो लोगन के जइसन एखरौ टट्टी पेशाब छूट गइल रहे। एसे हमका एखर नीचे का कपड़ा उतारैं का परा। पर हम सच कहत हूॅ बिटिया। हम एखे बदनवा का कछू नाहीं देखेन। एखे बावजूदव ई ससुरी चिल्लात रही यसे हम भी गुस्सा मा एक लाफा दै दिये इसको। ससुरी बहुतै गंदा गरियावत रही हमका। पर हमहू तबहिनै माने जब एखर सब कुछ साफ कर के चकाचक कर दिहे।"
"ओह तो ये बात है।" रितू मन ही मन मुस्कुराते हुए बोली___"कोई बात नहीं काका। आपने अपना काम बहुत अच्छे से किया है। वरना तो ये सब गंद फैलाते ही रहते न?"
"एक बार मेरे हाॅथ पैर को इस रस्सी से आज़ाद कर के देख कुतिया।" सहसा रचना ने एकाएक बिफरे हुए अंदाज़ से चीखते हुए कहा___"तेरे हाथ पैर तोड़ कर तेरे हाॅथ में न दे दूॅ तो कहना।"
रचना की इस बात से जहाॅ हरिया का पारा गरम हो गया था वहीं रितू उसे देख कर बस मुस्कुरा कर रह गई। फिर उसने सूरज और उसके दोस्तों की तरफ इशारा करते हुए रचना से कहा___"इन चारों को ग़ौर से देखो और पहचानो कि ये चारो कौन हैं?"
"मुझे नहीं पहचानना किसी को।" रचना ने पूर्व की भाॅति ही तीखे भाव से कहा___"ये सब तेरे यार हैं तू ही पहचान इन्हें।"
"मैं चाहूॅ तो इसी वक्त तेरी इस गंदी ज़ुबान को काट कर तेरे पिछवाड़े में डाल दूॅ।" रितू के मुख से शेरनी की भाॅति गुर्राहट निकली___"मगर उससे पहले तुझे ये दिखाना चाहती हूॅ और बताना चाहती हूॅ कि तू जिनके दम पर इतना उछल रही है न उनकी औकात मेरे सामने कीड़े मकोड़ों से भी बदतर है। ग़ौर से देख इन चारों को। इनमें तेरा ही कोई अपना नज़र आएगा।"
रितू की ये भात सुन कर रचना ने पहले तो उसे आग्नेय नेत्रों से घूरा उसके बाद उसने उन चारों की तरफ अपनी निगाह डाली। सूरज अपनी बहन को ग़ौर से अपनी तरफ देखते देख बुरी तरह घबरा गया। वो नहीं चाहता था कि उसकी बहन उसे पहचाने। क्योंकि उसे पता था कि उस सूरत में उसकी बहन भयभीत हो जाएगी। उसने जब पहली बार ऑखें खोल कर रचना को देखा था तो बुरी तरह चौंका था साथ ही डर भी गया था। उसे रितू से इस सबकी उम्मीद नहीं थी।
हलाॅकि रितू ने उससे कहा ज्ररूर था कि वो उसकी बहन को भी यहाॅ ले आएगी और वो सब उसके साथ बलात्कार करेंगे। मगर उसे लगा था कि ये सब रितू महज गुस्से में कह रही थी। जबकि ऐसा वो करेगी नहीं। मगर अब उसे समझ आ गया था कि रितू ने उस समय कोई कोरी धमकी नहीं दी थी बल्कि सच ही कहा था। जिसका प्रमाण इस वक्त रचना के रूप में उसके सामने कुर्सी पर बॅधा हुआ मौजूद था। ख़ैर उधर,
रितू की ये बातें सुन कर रचना ने जब ग़ौर से उन चारों की तरफ देखा तो एकाएक ही उसके चेहरे पर चौंकने के भाव आए और फिर जैसे एकाएक ही जैसे उसके दिलो दिमाग़ में विष्फोट हुआ। उसने पलट कर रितू की तरफ देखा।
"तेरे चेहरे के ये भाव चीख़ चीख़ कर इस बात की गवाही दे रहे हैं कि तूने इन चारों को पहचान लिया है।" रचना के देखते ही रितू ने अजीब भाव से कहा___"और अब जब तूने पहचान ही लिया है तो पूछ इन चारों से कि ये सब यहाॅ कैसे और क्यों मौजूद हैं?"
रितू की इस बात का असर रचना पर तुरंत ही हुआ। उसके चेहरे पर एकाएक ही ऐसे भाव उभरे जैसे उसे उन चारों को इस हालत में देख कर बेहद दुख हुआ हो। ऑखों में पानी तैरता हुआ नज़र आने लगा था उसके।
"भ भाई।" फिर उसके मुख से लरज़ता हुआ स्वर निकला___"ये सब क्या है? आप चारो यहाॅ कैसे??"
रचना के इस सवाल पर सूरज चुप न रह सका। बल्कि ये कहना चाहिए कि अब उसके सामने कोई चारा ही नहीं रह गया था। इस लिए उसे अब अपनी बहन के सामने अपनी यहाॅ पर मौजूदगी का कारण बताना ही था। इस लिए चेहरे पर दुख के भाव लिए वह रचना को अपनी राम कहानी शुरू से लेकर अंत तक बताता चला गया। सारी बातें जानने के बाद रचना भौचक्की सी रह गई थी।
"और हम सब ये समझ रहे थे कि आप लोग उस घटना के चलते कहीं ऐसी जगह छुप गए हैं जहाॅ पर आप पुलिस व कानून की पहुॅच से दूर होंगे।" सारी बातें सुनने के बाद रचना ने आहत भाव से कहा___"मगर आप तो यहाॅ हैं भाई। ख़ैर, देख लिया न भाई बुरे का काम का बुरा अंजाम। कितना कहती थी आप लोगों को कि इस तरह किसी की ज़िंदगियों से मत खेलो। मगर आप लोग कभी मेरी बात नहीं सुनते थे। बल्कि हमेशा यही कहते थे कि लाइफ को एंज्वाय करो और मस्त रहो। मुझे भी ऐसा ही करने की नसीहत देते थे। मगर इससे हुआ क्या भाई? आज आप चारो यहाॅ इस हालत में मौजूद हैं। डैड को तो ख़्वाब में भी ये उम्मीद नहीं है कि उनके साहबज़ादे किस जगह किस हाल में हैं इस वक्त?"
"तूने सच कहा मेरी बहन।" सूरज ने रुॅधे हुए गले के साथ बोला___"ये सब मेरे पापों का ही प्रतिफल है। मैने कभी इस बारे में नहीं सोचा था कि जो कुछ मैं कर रहा था उसका अंजाम ऐसा भी होगा। हमेशा वही करता था जिसे करने में कदाचित मुझे दुनियाॅ का सबसे बड़ा और ज्यादा आनंद आता था। ख़ैर, मुझे अपने इस अंजाम का दुख नहीं है रचना क्योंकि ये मैने खुद ही कमाया है।
दुख तो इस बात का है कि मेरी वजह से आज तू भी यहाॅ आ गई है और मैं ये सोच कर ही अंदर से बुरी तरह भयभीत हुआ जा रहा हूॅ कि जाने तेरे साथ ये इंस्पेक्टरनी क्या करेगी?"
"ये कुछ नहीं करेगी भाई।" रचना ने सहसा पुनः तीखे भाव अख़्तियार कर लिए___"इसे पता नहीं है कि इसने किसके बच्चों पर हाॅथ डाला है? इसने अब तक जो कुछ भी आपके और मेरे साथ किया है उसका अंजाम इसे ज़रूर भुगतना पड़ेगा। इसे इस बात का ज़रा सा भी एहसास नहीं है कि इसके साथ क्या क्या होगा?"
"रस्सी जल गई पर बल नहीं गया अब तक।" रितू ने रचना के सिर के बालों को पकड़ कर झटका दिया__"मुझे पता है कि तू ये सब किसके दम पर बोल रही है। मगर तुझे पता ही नहीं है कि तू जिसके दम पर ये राग अलापे जा रही है वो खुद बहुत जल्द यहाॅ तेरे सामने हाज़िर होने वाला है। मैने तेरे बाप दिवाकर चौधरी और उसके उन सभी दोगले दोस्तों को वो वीडियोज़ भेज दिये हैं जिन वीडियोज़ पर उनकी काली करतूतों का सामान मौजूद है। कितनी मज़े की बात है कि एक बेटा अपने ही बाप की ऐसी अश्लील वीडियो बना कर रखे हुए था जो अगर किसी के हाॅथ लग जाएॅ तो वो बड़ी आसानी से इसके बाप को बीच चौराहे पर नंगा दौड़ा दे।"
रितू की ये बात सुन कर रचना तो चौंकी ही साथ ही साथ सूरज और उसके दोस्त भी बुरी तरह चौंक पड़े थे। पलक झपकते ही उनके चेहरों पर से रहा सहा रंग भी उड़ गया।
"कुछ समझ आया तुझे?" इधर रितू ने रचना के बालों को ज़ोर से खींचा___"सारे शहर को अपनी मुट्ठी में रखने वाला तेरा बाप और उसके दोस्त अब मेरी गुलामी करने पर मजबूर हैं। मैं अगर उसे कहूॅ कि टट्टी खा तो उसे खाना पड़ेगा। अब बता किसके दम पर इतना उछल रही है तू? जबकि मैने तो यहाॅ तक सोचा हुआ कि जिस दिन तेरा बाप और दोस्त यहाॅ आएॅगे तो उनके स्वागत में तुझे ही नंगी करके उनके सामने डाल दूॅगी। फिर देखूॅगी कि नंगी और गोरी चमड़ी को उस हालत में देख कर कैसे उनके खून में उबाल आता है?"
"नहींऽऽ।" रितू की बात को समझते ही तहखाने में रचना के साथ साथ सूरज और उसके दोस्तों का आर्तनाद गूॅज उठा, जबकि सूरज गिड़गिड़ाया___"प्लीज ऐसा मत करना इंस्पेक्टर। मैं तुम्हारे आगे हाॅथ जोड़ता हूॅ। हर चीज़ के अपराधी मैं और मेरा बाप है ये सच है मगर मेरो बहन बेकसूर है। उसे इस सबमें मत घसीटो प्लीज।"
"हाहाहाहाहा ई का?" सहसा वहीं पर खड़ा हरिया ज़ोर से हॅस पड़ा___"ई का बिटिया। ई सरवा ता एतने मा ही गला फाड़ै लाग। कउनव सच ही कहे रहा कि जब बात ससुरी अपने मा आवथै तबहिन समझ मा आवथै कि ओसे का मज़ा मिलथै? ई ससुरन के साथ ता इहै होय का चाही बिटिया। हम भी देखूॅगा कि ऊ सबसे ई लोगन केर का हाल होथै?"
"बिलकुल काका।" रितू ने कहा___"ये काम भी आपको ही करना है और कैसे करना है ये आप जानो।"
"अरे चिंता न करा बिटिया।
" हरिया अंदर ही अंदर खुशी से झूमता हुआ बोल पड़ा___"ई काम ता हम बहुतै अच्छे से करूॅगा। कउनव शिकायत ना होई तोहरा के, ई तोहरे हरिया काका के वादा बा। ऊ ससुरे मंत्रीवा केर ओखे ई छोकरिया के साथ बहुतै अच्छे से ख़ातिरदारी करूॅगा हम।"
"शाबाश काका।" रितू मुस्कुराई___"मुझे आपसे यही उम्मीद है। मुझे पता है आप अपना काम बहुत अच्छे से करते हैं।"
"हाॅ ई ता हा बिटिया।" हरिया काका गर्व से अकड़ते हुए बोला___"हम आपन काम बहुतै अच्छे से करता हूॅ। कउनव परकार केर शिकायत का मौका नाहीं देता हूॅ। समय आवैं ता पहिले फेर तू देख लीहा। हम ई ससुरन के नानी केर नानी ना याद दिलाई ता कहना।"
"नहीं नहीं।" रचना तो भयभीत होकर चीखी ही किन्तु सूरज बुरी तरह भयभीत होकर रो पड़ा था___"ये सब मत करो इंस्पेक्टर। ये आदमी बहुत ज़ालिम है। प्लीज मेरी बहन के साथ कुछ भी ऐसा वैसा मत करो। जो कुछ करना है हमारे साथ करो।"
"और चीखो।" रितू बिजली की तरह सूरज के पास पहुॅची थी, गरजते हुए बोली___"और तड़पो। मगर कोई फायदा नहीं होगा। मैं तुम सबका वो हाल करूॅगी कि किसी भी जन्म में ये सब करने के बारे में सोचोगे भी नहीं और अगर सोचोगे भी तो कर नहीं पाओगे। क्योंकि नामर्द कुछ कर नहीं सकते और तुम सब हर जन्म में नामर्द ही पैदा होगे।"
"अगर ये बात है।" सहसा सूरज ने अजीब भाव से कहा___"तो मुझमें और तुममें क्या फर्क़ रह गया इंस्पेक्टर? हर अपराध की तो यकीनन सज़ा होती है मगर उस सज़ा में वो सब तो नहीं होता न जिस सज़ा को पाप कहा जाए या उसे अनैतिक करार दिया जाए? तुमने जो कुछ करने का सोचा हुआ है वो तो हर तरह से अनैतिक है, पाप है।"
"तुम्हारे मुख से अनैतिक व पाप पुन्य की ये बातें अच्छी नहीं लगती मिस्टर।" रितू ने कहा___"मुझे तुमसे ज्यादा इन चीज़ों का ज्ञान है। मुझे पता है कि मैं क्या करने जा रही हूॅ। तुम्हें इस बात से कोई फर्क़ नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि तुम तो अनैतिक व पाप कर्म करने के आदी हो। इस लिए बस खुली ऑखों से उस सबको देखने के लिए तैयार हो जाओ जो बहुत जल्द यहाॅ दिखने वाला है।"
"इस कुतिया के सामने मत गिड़गिड़ाओ भाई।" सहसा रचना बोल पड़ी___"ये खुद भी वैसा ही कर्म करने वाली लगती है, वरना ऐसी बातें इसके दिमाग़ आती ही नहीं। पुलिस वाली है न, इस लिए हर किसी के नीचे लेट जाती होगी। ऐसी नौकरी में होता ही यही है आहहहहह।"
"तोहरी माॅ को चोदूॅ छिनाल।" रचना की बात सुनते ही हरिया आग बबूला होकर उसको धर दबोचा था___"तोहरी ई हिम्मत की हमरी बिटिया के बारे मा अइसन कहथो। रुक अबहिन हम तोहरा का बताथैं कि कउन केखर सामने लेटत है?" हरिया ने सहसा रितू की तरफ देखा__"बिटिया तू जा इहाॅ से। हम एखर ई ज़बान बोलैं का अंजाम दिखावथैं।"
"नहीं प्लीज उसे छोंड़ दो।" रितू के कुछ कहने से पहले ही सूरज चीख पड़ा था___"उसकी तरफ से मैं माफ़ी माॅगता हूॅ।
प्लीज इंस्पेक्टर इस आदमी को कहो कि मेरी बहन को कुछ न करे।"
"काका इसे बस थोड़ा सा डोज देना।" रितू ने सूरज की बात की तरफ ध्यान दिये बिना हरिया से कहा___"बाॅकी इसके साथ आग़ाज़ तो इसका बाप करेगा। आप समझ रहे हैं न मेरी बात?"
"हम सब समझ गया हूॅ बिटिया।" हरिया ने कहा__"अब तू जा इहाॅ से। हम ई ससुरी का बतावथैं कि तोहसे अइसन बोलैं का अंजाम का होथै?"
"मेरे साथ अगर कोई बद्दतमीजी की तो अंजाम अच्छा नहीं होगा तुम्हारे लिए।" रचना चीखी___"छोंड़ दो मुझे। वरना बहुत पछताओगे तुम सब।"
रितू ने उसकी तरफ हिकारत भरी दृष्टि से देखा और तहखाने के बाहर की तरफ चली गई। उसके इस तरह जाते ही सूरज गला फाड़ कर चिल्लाने लगा था। बार बार कह रहा था कि उसकी बहन को छोंड़ दो। मगर रितू न रुकी। जबकि रितू के जाते ही हरिया ने लपक कर तहखाने का दरवाजा अंदर से बंद किया और फिर वापस पलट कर सूरज की तरफ बढ़ा।
"का रे मादरचोद।" हरिया ने सूरज के पेट में एक लात जमाते हुए कहा___"काहे अइसन गला फाड़ रहा है? अब बता तोहरी ई राॅड बहन केर का खातिरदारी करूॅ हम? हमरा ता बहुतै मन करथै कि तोरी ई बहनिया केर मदमस्त जलानी केर मजा लूॅ मगर हमरी बिटिया ने ऊ सब केर इजाजत ना दिये रही। एसे अब हम तोरे साथै आपन ऊ पसंद वाला काम करूॅगा।"
"नहीं नहीं प्लीज काका।" हरिया की बात समझ कर सूरज बुरी तरह हिल गया, बोला___"वो सब मत करो। मैं अपनी बहन के सामने वो सब नहीं करना चाहता।"
"अबे बुड़बक।" हरिया ने सूरज के चेहरे पर अपनी हथेली फेरते हुए कहा___"हम ससुरे तोहरी इच्छा थोड़ी न पूछत हूॅ। हम ता अपनी पसंद केर बात करत हूॅ। अउर ऊ ता होबै करी बछुवा काहे से के ऊ हमरी ख्वाहिश केर बात हा। एसे चल अपना पिछवाड़ा खोल।"
सूरज नहीं नहीं करता ही रह गया मगर हरिया भला कहाॅ मानने वाला था। उसने सूरज की रस्सी को ऊपर से छोरा और मजबूती से पकड़ कर उसके कच्छे को एक हाॅथ से नीचे सरका दिया। रचना ये सब अपनी खुली ऑखों से देख रही थी। जैसे ही हरिया ने उसके भाई के कच्छे को नीचे किया वैसे ही उसे झटका लगा। आश्चर्य से उसकी ऑखें फटी रह गईं। फिर सहसा जैसे उसे होश आया उसने झट से अपनी ऑखें बंद कर ली। भला वो अपने भाई को नग्न हालत में कैसे देख सकती थी?
उधर हरिया ने सूरज को पकड़े ही उसे रचना के पास खींच कर लाया और उसके सामने लाकर रचना की तरफ देख कर बोला___"ई देख ससुरी हम तोहरे ई भाई के साथ का करथूॅ। हम चाहूॅ ता अबहिन दुई मिनट मा तोहरे भाई का ई दुई इन्च का लौड़ा तोहरी चूॅत मा पाल दूॅ मगर पेलूॅगा नाहीं। ऊ ता तोहरा बाप अपने लौड़ा से तोहरी चूत का पेलेगा। ई बखत ता हम तोहरे ई भाई की गाड पेलूॅगा। ई देख।"
हरिया की बातों ने रचना के होश उड़ा दिये थे। उसे पहली बार एहसास हुआ कि वो कितनी खतरनाक जगह पर आ गई है। यहाॅ पर उसकी उसके भाई की और उसके बाप की चलने वाली नहीं थी।
ये सोच सोच कर ही वह थरथर काॅपे जा रही थी। उसने शख्ती से अपनी ऑखें बंद की हुई थी। उधर सूरज शर्म की इंतेहां की हद से गुज़र रहा था। आत्मग्लानी और अपमान में डूबा था वह। वह बुरी तरह हरिया से छूटने की मसक्कत कर रहा था। किन्तु छूट नहीं पा रहा था। उसमें अब इतनी ताकत भी न बची थी कि वो कोई ज़ोर आजमाइश कर सके।
हरिया ने मजबूती से पकड़ कर उसे आगे की तरफ झुका दिया और अपनी धोती को एक साइड कर अपने हलब्बी लौड़े को बाहर निकाल लिया। एक हाथ से अपने लौड़े को पकड़ कर उसने सूरज की गाड में निशाना लगा दिया। इसके साथ ही सूरज की हृदय विदारक चीख तहखाने में गूॅज गई। सूरज के लाख प्रयासों के बावजूद उसके हलक से चीख निकल गई थी और वो हो गया जिसे वह किसी सूरत में होने नहीं देना चाहता था। इधर अपने भाई की इतनी भयानक चीख सुनकर रचना बुरी तरह डर गई। उसने पट्ट से अपनी ऑखें खोल कर अपने भाई की तरफ देखा और ये देख कर तो उसकी ऑखें ही बाहर की तरफ उबल पड़ी कि उसके भाई की गाड में हरिया का मोटा तगड़ा लौड़ा जड़ तक घुसा पड़ा था। जबकि सामने की तरफ झुका हुआ उसका भाई झटके खा रहा था। उसकी ऑखों से ऑसू बह रहे थे। रचना को अपने भाई की इस दसा पर बड़ा अजीब सा लगा। उसकी अंतर्आत्मा तक काॅप गई थी ये भयावह मंज़र देख कर। उसे एकाएक ही एहसास हुआ कि उसके भाई की ये दसा उसकी वजह से ही हुई है। अगर उसने रितू को वो सब न कहा होता तो शायद ये सब न होता। उसे खुद पर बेहद गुस्सा आया। मगर अब क्या हो सकता था। अपने भाई को इस दीनहीन दसा में देख कर उसकी ऑखों से ऑसू बहने लगे।
उधर हरिया थोड़ी देर रुकने के बाद अपनी कमर को झटका देना शुरू कर दिया था। सहसा उसने अपने सिर को ज़रा सा घुमा कर रचना की तरफ देखा। रचना और हरिया की ऑखें आपस में टकरा गईं। रचना ने घबरा कर तुरंत ही अपनी ऑखें बंद कर अपने सिर को झुका लिया। ये देख कर हरिया मुस्कुरा उठा। उसके बाद तो जैसे तहखाने में हरिया के झटकों से निकलती थाप थाप की आवाज़ें और सूरज की घुटी घुटी सी गूॅजती रहीं। जहाॅ एक तरफ अपने दोस्त की इस दसा पर उसके तीनो दोस्त बेहद दुखी थे वहीं दूसरी तरफ रचना अपने भाई की इस दसा पर थरथर काॅपे जा रही थी।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
तहखाने से बाहर आकर रितू तेज़ तेज़ क़दमों के साथ अपने कमरे की तरफ बढ़ गई थी। कमरे में आते ही उसने आलमारी से अपना वो मोबाइल निकाला जिसे उसने अपने एक मुखबिर से खरिदवाया था। उस फोन को अपनी पाॅकेट में डाल कर उसने अपने आईफोन को स्विच ऑफ किया और उसे भी अपनी जेब में डाल लिया। उसके बाद उसने आलमारी से अपना सर्विस रिवाल्वर निकाल कर उसे चेक किया तत्पश्चात उसे भी अपनी जीन्स की बेल्ट में खोंस लिया। टाप के ऊपर उसने एक लेदर की जाकेट पहना और टेबल से जिप्सी की चाभी लेकर वह कमरे से बाहर निकल गई।
बाहर लान में एक तरफ खड़ी जिप्सी में बैठ कर उसने जिप्सी को स्टार्ट किया और मेन गेट से बाहर आ गई। इस बार उसकी जिप्सी का रुख पुल की तरफ न होकर उस तरफ था जिस तरफ फार्महाउस के बगल से एक अन्य रास्ता किसी दूसरी जगह की तरफ जाता था। रितू ने इस रास्ते को जानबूझ कर चुना था क्योंकि उसे पता था कि नहर पर बने पुल की तरफ वाले रास्ते पर आगे ख़तरा था। उसके बाप के आदमी कहीं भी उसे मिल सकते थे। हलाॅकि रितू को पता था कि उसके बाप को सीबीआई वाले ले गए थे। किन्तु फिर भी उसे ये तो एहसाह था ही कि उसके बाप के आदमी खुले घूम रहे हैं।
लगभग दस मिनट बाद रितू ने जिप्सी को एक ऐसी जग। पर रोंका जहाॅ पर एक पवन चक्की लगी थी। दाहिने तरफ दूर एक पहाड़ था जो कि गेरुए रंग का था। बाॅकी दूर दूर तक सुनसान इलाका पड़ा हुआ था। पवन चक्की से लगभग पचास गज की दूरी पर ही रितू ने मेन सड़क हे उतार कर जिप्सी को रोंका हुआ था। कुछ देर आस पास का जायजा लेने के बाद उसने अपने जीन्स की पाॅकेट से नये मोबाइल को निकाला और उसे स्विच ऑन किया। स्विच ऑन होते ही उसने उस पर कोई नंबर डायल कर उसने मोबाइल को कान से लगा लिया।
"क्या हाल चाल हैं तेरे मंत्री?" उधर से फोन उठाते ही रितू ने मर्दाना आवाज़ में कहा था।
"मेरे हाल की छोंड़।" उधर से मंत्री का लगभग तीखा स्वर उभरा__"तू अपने हाल की चिन्ता कर।"
"ओहो ऐसा क्या?" रितू ने नाटकीय अंदाज़ से कहा___"मेरे हाल का क्या होने वाला है भला?"
"चिंता मत कर।" उधर से मंत्री ने कहा___"बहुत जल्द तेरा हाल बेहाल करने वाला हूॅ मैं। मुझे पता चल गया है कि मेरे साथ ऐसा दुस्साहस करने वाला तू कौन है। इस लिए अब मैं तेरा वो अंजाम करूॅगा जो आज तक किसी ने ना तो सोचा होगा और ना ही सुना होगा।"
मंत्री दिवाकर चौधरी की इस बात से रितू बुरी तरह चौंकी। उसके मन में सवाल उभरा कि मंत्री को भला उसके बारे में कैसे पता चल गया? क्या कमिश्नर साहब ने उसे उसके बारे में बताया? नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता। कमिश्नर साहब उसके बारे में उसको तो क्या बल्कि किसी को भी कुछ नहीं बता सकते। उन्हें पता है कि मंत्री इस प्रदेश के लिए कितना हानिहारक है। उन्होंने मंत्री के खिलाफ़ इस जंग को अंजाम तक पहुॅचाने का खुद हुक्म दिया था। फिर भला वो कैसे उसके बारे में उसे बता देंगे? नहीं नहीं ऐसा संभव नहीं है। तो फिर मंत्री को उसके बारे में कैसे पता चल गया? रितू का दिमाग़ तेज़ी से इधर उधर भाग दौड़ कर रहा था। मगर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। सहसा उसके मन में ख़याल आया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उसके ही पुलिस डिपार्टमेन्ट का कोई पुलिस वाला मंत्री को सब कुछ बताया हो। मगर ऐसा कैसे हो सकता है? क्योंकि ये केस बहुत ही गोपनीय था। इसके बारे में कमिश्नर के सिवा किसी को कुछ पता नहीं था।
सहसा रितू को उन पुलिस वालों की याद आई जिन्हें उसने सूरज के फार्महाउस में सूरज से लड़ाई करने के बाद सस्पेण्ड किया था। रितू की लगा कि यकीनन उन्हीं ने मंत्री को सब कुछ बताया होगा। क्योंकि उन्हें तो पता ही था कि उसने सूरज और उसके दोस्तों से फार्महाउस पर लड़ाई की थी और उन चारों को अधमरा कर दिया था। रितू को यकीन हो गया कि उन पुलिस वालों ने ही मंत्री को सब कुछ बताया है और अब मंत्री उसके लिए काल बन कर अपना क़हर बरसाने वाला है।
"क्या हुआ चौहान के बच्चे?" रितू को इतनी देर से ख़ामोश जान कर उधर से मंत्री ने चहकते हुए कहा___"हवा निकल गई क्या तेरी?"
मंत्री का ये वाक्य सुन कर रितू के ज़हन में जैसे विष्फोट सा हुआ। सारा मामला पल भर में उसकी समझ में आ गया। उसे समझ में आ गया कि मंत्री ने उस रेप पीड़िता लड़की यानी विधी के चलते ये पता लगाया है। उसने पता किया होगा कि उसके बच्चों ने जिस लड़की के साथ रेप को अंजाम दिया था वो लड़की विधी थी जो उसके ही बच्चों के काॅलेज में पढ़ती थी। मंत्री ने अपनी तरफ से छानबीन की होगी कि इस मामले में पुलिस ने तो अपना हाॅथ नहीं डाला और ना ही कोई केस वगैरह हुआ। मगर लड़की के साथ जो कुछ हुआ उसे उसके घर वाले सहन नहीं कर सके। इस लिए संभव है कि लड़की के बाप ने अपनी बेटी के साथ हुए इस अत्याचार का बदला लेने के लिए ये सब किया है। रितू ने स्वीकार किया कि मंत्री का सोचना एकदम जायज़ है। क्योंकि उसके साथ ये सब करने की वजह सिर्फ और सिर्फ विधी के बाप के पास ही थी और अब वह इस मामले को जान कर विधी के घर वालों के ऊपर क़हर बन कर टूटने वाला है।
रितू ने राहत की साॅस तो ली किन्तु उसे अब विधी के माॅ बाप की चिंता सताने लगी थी। वो जानती थी कि इस केस से विधी के घर वालों का कोई लेना देना नहीं है। वो बेचारे तो बेक़सूर हैं। रितू विधी के पैरेन्ट्स के लिए फिक्रमंद हो उठी थी। मगर फिर जैसे उसे ख़याल आया कि उसे इतना चिंता करने की क्या ज़रूरत है? उसके पास तो मंत्री और उसके साथियों के खिलाफ़ सबूत के रूप में ऐसा डायनामाइट है जो अगर पब्लिक के सामने आ जाए तो मंत्री और उसके साथी एक ही पल में उस डायनामाइट के विष्फोट से तहस नहस हो जाएॅगे। इस ख़याल के आते ही रितू के खूबसूरत होठों पर मुस्कान फैल गई। जबकि,
"लगता है तेरे सभी देवता कूच कर गए हैं चौहान।" उधर से मंत्री का ठहाका गूॅजा___"तुझे समझ आ गया होगा कि अब तेरे साथ क्या होने वाला है। मगर चिंता मत कर। मैं तुझे एक सुनहरा मौका देता हूॅ। सुना है कि तेरी बीवी बहुत सुंदर है, बिलकुल वैसी ही जैसी तेरी वो बेटी थी जिसे हमारे बच्चों ने रगड़ रगड़ कर पेला था। हो भी क्यों न, आख़िर खूबसूरत माॅ की कार्बन काॅपी जो थी।
ख़ैर, मैं ये कह रहा हूॅ कि अगर तुझे अपनी और अपने परिवार की ज़रा सी भी फिक्र है तो तू अपनी उस खूबसूरत बीवी को हमारे हरम में ले आ। अगर तेरी बीवी ने मुझे और मेरे सभी साथियों को खुश कर दिया तो सोचूॅगा कि तुझे तेरी इस हिमाक़त के लिए माफ़ कर दूॅ।"
"ज्यादा उड़ मत रंडी की औलाद।" रितू ने मर्दाना आवाज़ में गरजते हुए कहा___"तूने अगर मेरे बारे में ऐसा वैसा सोचने की कोशिश की तो सोच लेना कि तेरी बेटी मेरे कब्जे में ही है। उसके साथ मैं क्या क्या करूॅगा ये तू सोच भी नहीं सकता। मुझे अपनी ज़रा सी भी परवाह नहीं है क्योंकि मैं छोटा आदमी हूॅ और बेटी के मरने के बाद वैसे भी अब मुझमें जीने की कोई ख्वाहिश नहीं है। मगर तेरा क्या होगा नाली के कीड़े? तू तो इस प्रदेश की नाॅक और कान है न। तेरे वो रंगीन वीडियो अभी भी मेरे पास हैं। मैं चाहूॅ तो इसी वक्त उन्हें सोसल मीडिया पर डाल कर तेरी और तेरी इज्ज़त की धज्जियाॅ उड़ा दूॅ। उसके बाद तेरे पीछे प्रदेश की जनता और पुलिस इस तरह कुत्तों की तरह दौड़ पड़ेगी कि साले तुझे कहीं पर छुपने की जगह भी न मिलेगी।"
रितू की इन खतरनाक बातों से उधर सन्नाटा सा छा गया। ऐसा लगा जैसे मंत्री को साॅप सूॅघ गया हो। सच ही तो था। उसे कदाचित इस बात का ध्यान ही नहीं रह गया था कि उसके सबसे बड़े रक़ीब के पास उसके खिलाफ़ कितना बड़ा डायनामाइट मौजूद है।
"अब बोलता क्यों नहीं हरामज़ादे?" रितू ने पुनः दहाड़ते हुए कहा___"तेरी अम्मा मर गई क्या? एक बात कान खोल कर सुन ले। तू ये मत समझना कि मैं यहाॅ पर अकेला हूॅ और तेरे आदमी मुझे पल भर में हजम कर जाएॅगे। इतना कमज़ोर भी नहीं हूॅ मैं। मुझे तेरे क्रिया कलाप की पल पल की ख़बर है और मैने अपने चारो तरफ गुप्त रूप से ऐसे आदमी लगा रखे हैं जो मुझे सुरक्षा भी प्रदान करते हैं और ये भी बताते हैं कि तेरा अगला क़दम क्या होने वाला है। इस लिए तू कुछ भी करने या सोचने से पहले ये ज़रूर सोच लेना कि तेरी कोई भी छोटी बड़ी हरकत तेरा वो अंजाम कर देगी जिसके बारे में अभी मैने तुझे बताया था। तेरी बेटी और वो चारो लड़के मेरे कब्जे में हैं और मैं चाहूॅ तो तेरी बेटी के साथ तेरे ही बच्चों की वैसी वीडियो क्लिप बना कर तुझे भेज दूॅ जैसी वीडियो तेरे पास मैं पहले भी भेज चुका हूॅ। यकीन न हो तो बोल, मुझे तेरी बेटी की हाॅट वीडियो बनाने में ज़रा भी वक्त नहीं लगेगा।"
"नहीं नहीं प्लीज ऐसा ग़ज़ब मत करना।" उधर से मंत्री का गिड़गिड़ाहट से भरा स्वर उभरा___"मैं तुम्हारे आगे हाॅथ जोड़ता हूॅ। मुझसे ग़लती हो गई जो मैने तुम्हें वो सब कहा। मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूॅगा जिससे मुझे खुद ही गर्त में डूब जाना पड़े। मगर,,,,
"अटक क्यों गया हिजड़े?" रितू गुर्राई___"बोल न, मगर क्या?"
"मगर मैं ये जानना चाहता हूॅ।
" मंत्री ने कहा___"कि ये सब कब तक चलेगा? मेरा मतलब है कि तुम्हें जो चाहिए वो मैं बिना सोचे समझे देने को तैयार हूॅ। मगर तुम मेरे बच्चों को कुछ भी नहीं करोगे।"
"तू मेरे सामने कोई कंडीशन रखने की पोजीशन में कहाॅ है कुत्ते?" रितू ने कहा___"और तू भला मुझे देगा क्या? तेरी औकात क्या है मुझे कुछ देने की? तू तो साले खुद ही भिखारी है। हर पाॅच साल में भिखारी की तरह जनता के सामने हाॅथ फैलाए पहुॅच जाता है। ये अलग बात है कि जनता की भीख का तू गंदे तरीके से फल देता है। उसी का अंजाम तो भुगतना है तुझे। इस प्रदेश से तेरे जैसे लोगों की सल्तनत ही नहीं बल्कि नामो निशान तक मिटाने का सोच लिया है मैने। और हाॅ, किसी भी तरह की रियायत की उम्मीद मत करना। क्योंकि वो तेरे जैसों के लिए मेरी अदालत में है ही नहीं।"
"मैं मानता हूॅ कि मेरे बच्चों ने तुम्हारी बेटी के साथ बहुत बुरा सुलूक किया था।" उधर से मंत्री का धीर गंभीर स्वर उभरा___"और ये भी मानता हूॅ कि मैने अपने कार्यकाल में प्रदेश की जनता के साथ बहुत बुरा किया है। मगर जो गुज़र गया उसे तो लौटाया नहीं जा सकता न? हाॅ इतना वचन ज़रूर देता हूॅ कि आइंदा से प्रदेश की जनता के साथ कुछ भी बुरा नहीं करूॅगा बल्कि हर दम हर पल अच्छा करने की कोशिश करेगा। मैने जिसका जो भी बुरा किया है उसका नुकसान मैं दोगुने भाव से भरूॅगा।"
"तू क्या भरेगा दोगले इंसान।" रितू ने फटकार सी लगाते हुए कहा___"तू तो सिर्फ जनता का खून चूसना जानता है। आज ये सब इस लिए बक रहा है क्योंकि मैने तेरे पिछवाड़े में डंडा घुसाया हुआ है। वरना तू अपनी वही औकात दिखाता जो हमेशा से सबको दिखाता आया है। मैं तेरी किसी भी बातों पर आने वाला नहीं हूॅ। तेरा और तेरे साथियों का अंजाम मेरे द्वारा लिखा जा चुका है चौधरी। इस लिए मुझसे रहम की भीख मत माॅग। बल्कि मरने से पहले अगर कुछ अच्छा करना चाहता है तो उन मजलूम लोगों के कुछ कर जिनका तूने खाया है और जिन पर तूने अत्याचार किया है। संभव है कि तेरे ऐसा करने पर मैं तेरे अंजाम को बदतर न होने की सूरत पर विचार करूॅ।"
"मैं करूॅगा चौहान।" उधर से मंत्री के स्वर में राहत के भावों की झलक दिखी___"ज़रूर करूॅगा मैं। मैं हर उस ब्यक्ति का भला करूॅगा जो मेरे द्वारा किसी भी तरह से सताया गया है और ये काम मैं आज से ही नहीं बल्कि अभी से करना शुरू कर दूॅगा। बस तुम मेरे बच्चों के साथ कुछ बुरा मत करना।"
"पहले जो कह रहा है उसे करके तो दिखा चौधरी।" रितू ने कहा___"अगर मुझे नज़र आया कि तेरी वजह से प्रदेश की समूल जनता खुश हो गई है तो यकीन मान तेरे अंजाम की स्थित में ज़रूर कुछ कमी कर दूॅगा।"
"ओह बहुत बहुत शुक्रिया चौहान।" मंत्री ने खुश होकर कहा___"मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूॅ कि बहुत जल्द तुम प्रदेश की इस जनता को मेरी वजह हे खुश होते हुए देखोगे।
"
"ओके बेस्ट ऑफ लक।" रितू ने कहा और काल कट कर दी।
मंत्री दिवाकर चौधरी से बात करने के तुरंत बाद ही रितू ने उस मोबाइल फोन को स्विच ऑफ कर दिया था। इस वक्त उसके चेहरे पर असीम राहत के भाव थे। राहत के भाव इस लिए कि उसने विधी के माॅ बाप को चौधरी के क़हर से किसी तरह बचा लिया था। मगर उसे पता था कि चौधरी बहुत ही दोगला इंसान है। संभव है कि उसने उसे झूॅठा आश्वासन दिया हो। जबकि वो करे वही जो उसने उससे शुरू में कहा था। अतः रितू का अब पहला काम यही था कि किसी तरह से विधी के माॅ बाप को मंत्री के क़हर से सुरक्षित करे। मगर समस्या ये थी कि कैसे? क्योंकि विधी का गाॅव हल्दीपुर के बाद पड़ता था। जिसका रास्ता दो तरफ से था। एक हल्दीपुर से तो दूसरा नहर के पास से जो दूसरा रास्ता गया था। ये दोनो रास्ते ऐसे थे जिन पर मौजूदा हालात में जाना ख़तरे से खाली नहीं था। क्योंकि रितू को पता था कि उसका बाप भले ही इस वक्त सीबीआई के सिकंजे में था मगर उसके साथी और उसके आदमी तो आज़ाद ही थे जो हर तरफ फैले हुए होंगे।
रितू के लिए आज बस का दिन और रात किसी तरह गुज़ारनी थी। कल तो उसका भाई विराज आ ही जाएगा। हलाॅकि वो चाहती तो पुलिस प्रोटेक्शन ले सकती थी और धड़ल्ले से कहीं भी आ जा सकती थी किन्तु वह अपने प्यारे भाई राज की बात को टालना नहीं चाहती थी। उसने भी तो वादा किया था उससे कि वो ये जंग उसके साथ ही मिल कर लड़ेगी। मगर अब चूॅकि विधी के माॅ बाप की सुरक्षा का सवाल था तो उसे कुछ तो करना ही था। इस लिए अब वो यही सोच रही थी कि विधी के माॅ बाप को किस तरह से सुरक्षित करे?
पवन चक्की के पास जिप्सी में बैठी रितू कुछ देर तक इस समस्या के बारे में सोचती रही। उसके बाद उसने इस सबको अपने दिमाग़ से झटका और जिप्सी को स्टार्ट कर वापसी के लिए मुड़ गई।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर हवेली में!
सुबह से दोपहर और दोपहर से अब शाम होने वाली थी। प्रतिमा अपने कमरे में बेड पर पड़ी हुई थी। सारा दिन उसने इसी सोच विचार में गुज़ार दिया था कि वो अपने बाप से कैसे बात करे? हलाॅकि इस बीच उसने मुम्बई में अपनी बड़ी बहन से फोन पर अपने बाप जगमोहन सिंह का मोबाइल नंबर ले लिया था। उसकी बहन इस बात से हैरान भी हुई थी। उसके पूछने पर प्रतिमा ने उसे सारी बातें बता दी थी कुछ बातों को छोंड़ कर। किन्तु अपने बाप का मोबाइल नंबर लेने के बाद भी प्रतिमा की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो अपने पिता को फोन लगाए।
उसकी इस हालत से शिवा भी परेशान था। उसने उन आदमियों का गेस्ट हाउस में रहने का इंतजाम भी कर दिया था। चिंतित व परेशान तो वो खुद भी था अपने बाप के लिए मगर उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो खुद ऐसा क्या करे जिससे सारी समस्याएॅ खत्म हो जाएॅ।
इस वक्त भी वो अपनी माॅ के कमरे में ही आया हुआ था और कमरे में ही एक तरफ रखे सोफे पर बैठा हुआ था।
उसकी नज़रें अपनी माॅ के मुरझाए हुए चेहरे पर केन्द्रित थीं। उसे इस बात से तक़लीफ भी हो रही थी कि वो कुछ कर नहीं पा रहा था। उसे आज समझ आ रहा था कि खुद कोई काम करना कितना मुश्किल होता है। आज तक तो वह बनी बनाई जलेबी ही खा रहा था। मगर जब खुद ही जलेबी बनाने का नंबर आया तो उसका दिलो दिमाग़ जैसे कुंद सा पड़ गया था। उसे पहली बार लगा कि बेबसी क्या होती है? सब कुछ होते हुए भी कुछ न कर पाना किसे कहते हैं?
"ऐसे कब तक हताश बैठी रहेंगी माॅम?" फिर उसने प्रतिमा को देखते हुए ही कहा___"ये तो आपको भी पता है कि हम अगर कुछ करना भी चाहें तो नहीं कर सकते। इस लिए अगर नाना जी के द्वारा हमारी समस्या का समाधान हो सकता है तो क्यों नहीं बात करती आप उनसे? दोपहर से देख रहा हूॅ मैं आपको। आप इसी तरह गहरी सोच में डूबी बैठी हुई हैं। इस तरह भला कब तक बैठी रहेंगी आप? आप जानती हैं कि डैड को सीबीआई के चंगुल से निकालना कितना ज़रूरी है। डैड के बिजनेस से संबंधित साथियों ने अपने आदमी हमारी मदद के लिए भेज दिये हैं। अब उनको हम यूॅ ही तो चुपचाप यहाॅ नहीं बैठाए रह सकते न? इस लिए माॅम आप अपने दिमाग़ से सारी बातों को निकालिए और नाना जी को फोन लगा कर उनसे बात कीजिए।"
"कैसे फोन लगा दूॅ बेटा?" प्रतिमा ने सहसा हताश भाव से कहा___"और किस मुह से फोन लगाऊॅ अपने बाप को?"
"क्या मतलब माॅम??" शिवा चकराया।
"तुम इस सब को जितना आसान समझते हो न वो इतना आसान नहीं है बेटा।" प्रतिमा ने कहा___"ज़रा सोचो कि अपने बाप से संबंध तोड़े मुझे कितने साल हो गए। अपनी खुशी व अपने स्वार्थ के लिए मैने अपने उस पिता को त्याग दिया था जिनका इस दुनियाॅ में हम दोनो बहनों के सिवा दूसरा और कोई नहीं था। मैं ही सबसे ज्यादा अपने पिता की लाडली थी और मैने ही उन्हें सबसे ज्यादा दुख दिया और निराश भी किया। आज मुझे इस बात का बखूबी एहसास है बेटा कि अपनी औलाद की बेरुखी के चलते एक बाप ने आज तक कितनी तक़लीफ़ और कितना दुख सहा होगा। ये सवाल तो उठेगा ही बेटा कि इसके पहले मुझे अपने बाप की याद क्यों नहीं आई? इसके पहले मैने क्यों ये जानना भी ज़रूरी नहीं समझा कि जगमोहन सिंह नाम का कोई ब्यक्ति जो कि मेरा बाप है वो ज़िंदा भी है या कि मर गया है? आज अगर मुझ पर ये मुसीबत न आती तो ज़ाहिर है कि आइंदा भी मैं अपने बाप से बात करने के बारे में सोचती भी नहीं। ये ऐसी बात है बेटा जिसकी वजह से मेरी हिम्मत नहीं पड़ रही कि मैं अपने बाप को फोन लगा कर उससे बात कर सकूॅ। जबकि इस बात का मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरी समस्या के बारे में जानकर मेरा बाप मेरी मदद करने से हर्गिज़ भी इंकार नहीं करेगा।"
"ये सच है माॅम कि आपने अपने पिता जी से बात न करके अब तक बहुत बड़ी भूल ही की है।
" शिवा ने गंभीरता से कहा___"मगर ये भी सच है कि इस बारे में सोचते रहने से भी क्या होगा? वो सब अपनी जगह से गायब तो नहीं हो जाएगा। भूल इंसान से ही होती है, आपसे भी हुई है। भले ही आपकी वो भूल माफ़ी के लायक हो या ना हो। मगर किसी भी भूल या अपराध के चलते यूॅ चुप तो नहीं बैठे रहा जा सकता। उसके लिए सबसे पहले अपने अपराधों के लिए नाना जी से माफ़ी माॅगनी होगी आपको। वो जो भी इसके लिए सज़ा दें उसे आपको स्वीकार करना ही पड़ेगा। हलाॅकि मुझे ऐसा लगता है कि नाना जी आपको कोई सज़ा देंगे ही नहीं। मगर औपचारिकता तो करनी ही पड़ेगी आपको। उन्हें भी इस बात का बोध होगा कि चलो मुसीबत में ही सही किन्तु उनकी बेटी को उनका ख़याल तो आया। बस, उसके बाद तो सब कुछ आसान ही हो जाना है माॅम। इस लिए मैं तो यही कहूॅगा कि आप ये सब सोचना छोंड़िये और नाना जी को हिम्मत बाॅध कर फोन लगाइये।"
प्रतिमा अपने बेटे शिवा की इस सूझ बूझ भरी बातें सुन कर चकित रह गई थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसका बेटा ऐसी समझदारी भरी बातें भी कर सकता है। मगर चूॅकि शिवा की बातें न्यायपूर्ण व तर्कसंगत थी इस लिए उसे भी इस बात का एहसास हुआ कि इस तरह सोचते रहने से भला क्या होगा? आख़िर बिना फोन किये अथवा बिना बात किये किसी भी समस्या का समाधान तो होने वाला नहीं है। उसके लिए शारीरिक और मानसिक कर्म तो करना ही पड़ेगा।
"तुमने बिलकुल ठीक कहा बेटे।" फिर प्रतिमा ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"जो हो गया और जो कुछ मैने किया है उसका सामना तो मुझे करना ही पड़ेगा। अतः मैं अब ज़रूर अपने पिता जी को फोन लगाऊॅगी। उनसे अपने किये की माफ़ी भी मागूॅगी। उनसे कहूॅगी कि अपनी बेटी की इस संगीन भूल को हो सके तो माफ कर दें और अपनी कृपा मुझ पर बरसा दें।"
"ये हुई न बात।" शिवा ने सहसा मुस्कुरा कर कहा__"मुझे यकीन है माॅम कि नाना जी आपको कुछ नहीं कहेंगे। दुख तो होगा उन्हें मगर उससे भी ज्यादा खुशी भी होगी उन्हें कि उनकी लाडली बेटी ने आख़िर उन्हें याद करके फोन तो किया।"
"तेरे मुह में घी शक्कर हो बेटा।" प्रतिमा ने प्रसन्नतापूर्ण भाव से कहा___"ईश्वर करे तू जैसा कह रहा है वैसा ही हो।"
"ऐसा ही होगा माॅम।" शिवा ने जोशीले अंदाज़ के साथ कहा___"आप बिलकुल भी इस सबकी चिंता न करें। बस मोबाइल निकालिये और लगा दीजिए नाना जी को फोन।"
प्रतिमा ने अपने बेटे के उस चेहरे को कुछ देर तक देखा जो इस वक्त हज़ार हज़ार वाॅट के बल्बों की तरह रोशन था। फिर बेड के सिरहाने पर ही रखे अपने मोबाइल को एक हाथ से उठाया और अपने पिता का नंबर ढूॅढ़ कर काॅपते हाॅथों से उसे डायल कर दिया। काल लगाते ही प्रतिमा के हृदय की गति असाधारण रूप से तेज़ हो गई। दिलो दिमाग़ में एक अजीब सा एहसास मानो ताण्डव सा करने लगा। मन में एक अंजाना सा भय अपने पाॅव पसारने लगा।
उधर काल लगाते ही रिंग जाने की आवाज़ प्रतिमा के कानों में सुनाई देने लगी। उसकी नज़र जब शिवा पर पड़ी तो शिवा को मोबाइल का स्पीकर ऑन करने का इशारा करते हुए पाया। प्रतिमा ने हड़बड़ा कर जल्दी से मोबाइल का स्पीकर ऑन कर दिया। तभी,,,,
"यस जगमोहन सिंह स्पीकिंग हियर।" उधर से बहुत ही खुर्राटदार आवाज़ उभरी। प्रतिमा को उस आवाज़ से ही ऐसा लगा जैसे उसकी हवा शंट हो गई हो। प्रत्युत्तर में उसके मुख से कोई लफ्ज़ न फूट सका। जबकि,
"हैलो हू इज देयर?" जगमोहन की आवाज़ पुनः उभरी।
"पि..पिता...जी।" प्रतिमा ने बहुत हिम्मत करके आख़िर टूटे हुए शब्दों से कह ही दिया___"म..मैं आ..आपकी बेटी प्रतिमा बोल..रही हूॅ।"
प्रतिमा की इस बात से उस तरफ सन्नाटा सा छा गया। जबकि उधर के छा गए इस सन्नाटे ने प्रतिमा की हृदय गति को मानो रोंक सा दिया। उसके मनो मस्तिष्क में तरह तरह की आशंकाएॅ पल भर में उत्पन्न हो गईं।
"आ..आपने..सुना पिता जी??" प्रतिमा ने उस तरफ की ख़ामोशी से भयभीत होकर पुनः लरज़ते हुए स्वर में कहा___"मैं..आपकी बेटी प्रतिमा बोल रही हूॅ।"
"हाॅ सुन तो लिया है मैने।" उधर से जगमोहन का अजीब सा अंदाज़ झलका___"मगर सोच रहा हूॅ कि ऐसा कैसे हो सकता है और क्यों हो सकता है?"
"ज जी मैं कुछ समझी नहीं पिता जी।" प्रतिमा का मनो मस्तिष्क जैसे चकरा सा गया।
"समझने की ज़रूरत भी क्या है तुम्हें?" उधर से जगमोहन के लहजे में एकाएक ही जैसे शिकायत और नाराज़गी के भाव एक साथ घुल मिल गए थे___"जब समझने का वक्त था तो तुमने उस वक्त बेहतर तरीके समझ तो लिया ही था। अब और कुछ समझने की भला तुम्हें क्या ज़रूरत पड़ गई?"
"मु मुझे माफ़ कर दीजिए पिता जी।" प्रतिमा की ऑखों से सहसा ऑसू छलक पड़े, उसकी आवाज़ एकदम से भारी हो गई, बोली___"मैने आपका बहुत दिल दुखाया है। जबकि मुझे पता है कि बचपन से लेकर युवा अवस्था तक आपने मेरी हर इच्छा को ऑख बंद करके पूरी की थी। बदले में मैने आपको दुख तक़लीफ़ और रुसवाई के सिवा कुछ भी नहीं दिया।"
"अरे ये क्या???" जगमोहन का ऐसा स्वर उभरा जैसे उसे प्रतिमा की इस बात पर ज़रा भी यकीन न आया हो। अतः बोला___"ये मैं क्या सुन रहा हूॅ भई? आज मेरी बेटी के मुख से इस लहजे में ऐसी बातें निकल रही हैं जिन बातों का मेरी बेटी के मुख से निकलने का कोई सवाल ही पैदा नहीं हो सकता था। सबसे पहले मुझे ये बता कि तेरी तबीयत तो ठीक है न?"
प्रतिमा कुछ बोल न सकी। अपने पिता की इन बातों में चुपे तंज को समझ कर उसकी रुलाई फूट गई। उसे अपने पिता की इन तंजपूर्ण बातों का ज़रा भी बुरा नहीं लगा था। बल्कि रुलाई तो उसकी इस बात पर फूटी थी आज उसका वही बाप उससे इस लहजे में बात कर रहा था जो बाप इसके पहले उससे सिर्फ प्यार से बातें करता था। बिना माॅ की थी दोनों बहनें। मगर उस बाप नें माॅ बनकर भी अपनी बेटियों की परवरिश की थी।
उसने दूसरी शादी नहीं की, बल्कि पना सम्पूर्ण जीवन और अपनी सम्पूर्ण खुशियाॅ अपनी बेटियों पर कुर्बान कर दिया था। जगमोहन अपनी दोनो बेटियों को जी जान से चाहता था मगर उसकी जान तो जैसे उसकी छोटी बेटी प्रतिमा पर बसती थी। इसका कारण ये था कि प्रतिमा बिलकुल अपनी माॅ पर गई थी। मगर प्रतिमा पर जिसकी जान बसती थी आज वही बाप अपनी बेटी से तंजपूर्ण बातें कर रहा था। प्रतिमा को इस बात का एहसास था कि उसके बाप का ये तंज दरअसल उसके अंदर छुपे दर्द रूपी गुबार का महज एक मामूली सा हिस्सा है।
"ये क्या बेटा?" उधर से जगमोहन का स्वर एकदम से भारी सा हो गया___"अपने बाप के अंदर छिपे दर्द रूपी इस गुबार को क्या ज़रा सा भी नहीं निकलने देना चाहती तू? इसे निकल जाने देती तो कदाचित दिल का दर्द कुछ कम हो जाता। मगर ख़ैर, जाने दे। मैं तो ख्वाब में भी तुझे रुलाने का सोच नहीं सकता, ये तो फिर भी हक़ीक़त है।"
प्रतिमा का हृदय बुरी तरह काॅप कर रह गया। वो ये सोच कर बुरी तरह फफक फफक कर रो पड़ी कि उसके बाप का दिल कितना विसाल है। अपने अंदर छुपे असहनीय दर्द के बावजूद वह अपनी बेटी को रुलाना नहीं चाहता। बाप की इस महानता ने प्रतिमा को इतना छोटा और मामूली बना कर रख दिया कि उसे अपने आप से एकाएक घृणा सी होने लगी। उसकी ऑखों के सामने पल भर में वो सारे मंज़र घूम गए जो अब तक उसने किया था और उस मंज़र को देखते ही प्रतिमा को लगा जैसे दुनियाॅ में उससे बड़ा कोई पापी नहीं है। प्रतिमा का जी चाहा कि ये ज़मीन फटे और वो उसमें पाताल तक समाती चली जाए। मगर हाए रे किस्मय! ऐसा भी नहीं हो सकता था। उसके दिल में भावनाओं और जज़्बातों का इतना भयंकर ज्वारभाॅटा मचल उठा कि उसे लगा कि कहीं उसका दिल उसका सीना फाड़ कर बाहर न उछल पड़े। अगले ही पल उसे ज़ोर का चक्कर आया और वह बेड पर एक तरफ गिर गई।
"माॅऽऽऽम।" शिवा जो एकटक प्रतिमा को ही देख रहा था वो अपनी माॅ को इस तरह चक्कर खा कर गिरते देख बुरी तरह चीखते हुए सोफे से उठ कर प्रतिमा की तरफ लपका था, बदहवाश सा प्रतिमा के चेहरे को थपथपाते हुए बोला___"क्या हुआ माॅम? आप ठीक तो हैं न? प्लीज बताइये न माॅम...क्या हो गया आपको? प पानी..पानी स सविता ऑटी...कहाॅ हैं आप? प्लीज जल्दी से पानी लाइये। डाॅक्टर को बुलाईये।"
शिवा बुरी तरह घबरा गया था और उसी घबराहट में चीखे जा रहा था। वहीं बेड पर ही पड़े प्रतिमा के मोबाइल से भी जगमोहन की घबराई हुई आवाज़ गूॅज रही थी। वो उधर से पूछे जा रहा था___"क्या हुआ बेटी? तू ठीक तो है न? तू चिंता मत कर मेरी बेटी। मैं तुझसे ज़रा सा भी नाराज़ या गुस्सा नहीं हूॅ। अरे तू तो मेरी लाडली बेटी है न।"
उधर शिवा के चिल्लाने का असर जल्द ही हुआ था। सविता जो कि नौकरानी थी वो तुरंत ही हाॅथ में पानी का ग्लास लिए भागते हुए आई। वो खुद भी बुरी तरह घबराई हुई लग रही थी।
"शिवा बेटे क्या हुआ है मालकिन को?" सविता ने पानी का ख्लास शिवा को पकड़ाते हुए बोली थी।
"पता नहीं ऑटी।" शिवा ने दुखी भाव से कहा___"माॅम तो नाना जी से फोन पर बातें कर रही थी। फिर जाने क्या हुआ इन्हें कि चक्कर खा कर बेड पर गिर गई हैं। आप प्लीज जल्दी से डाक्टर को फोन कीजिए और उनसे कहिए कि वो दो मिनट के भीतर यहाॅ आ जाएॅ।"
"ठीह है बेटा।" सविता ने कहा___"मैं अभी डाक्टर साहब को फोन लगाती हूॅ।" ये कह कर सविता वहाॅ से चली गई। जबकि इधर कमरे में मोबाइल में से गूॅजती जगमोहन की आवाज़ पर सहसा शिवा का ध्यान गया। उसने लपक कर मोबाइल उठा लिया।
"नाना जी मैं शिवा बोल रहा हूॅ।" फिर शिवा ने सीघ्रता से कहा___"देखिए न माॅम को क्या हो गया है? कुछ बोल ही नहीं रही हैं। ऐसा क्या कह दिया है आपने जिसकी वजह से मेरी माॅम की ये हालत हो गई है?"
"ब बेटा मैने तो ऐसा वैसा कुछ नहीं कहा था।" उधर से जगमोहन का भारी स्वर उभरा___"मगर तुम चिंता मत करना बेटे। तुम्हारी माॅ को बस चक्कर आया हुआ है और कुछ नहीं। डाक्टर आएगा वो अच्छे से चेकअप कर लेगा। तुम मुझे बताओ कि कहाॅ से बोल रहे हो? मैं सारे काम धाम छोंड़ कर अभी यहाॅ से तुम लोगों के पास आ रहा हूॅ।"
"नाना जी मैं जिला गुनगुन के हल्दीपुर गाॅव से बोल रहा हूॅ।" शिवा ने मन ही मन खुश होते हुए कहा था___"आप जब यहाॅ पहुॅचेंगे तो किसी से भी पूछ लीजिएगा कि ठाकुर साहब की हवेली जाना है। बस कोई न कोई आपको हवेली तक छोंड़ने ज़रूर आ जाएगा आपके साथ।"
"ओह ठीक है बेटा।" उधर से जगमोहन ने कहा___"बस तुम अपनी माॅ का अच्छे से ख़याल रखना। मैं कल तक तुम्हारे पास हर हालत में पहुॅच जाऊॅगा।"
इसके साथ ही उधर से जगमोहन ने काल को कट कर दिया। जबकि शिवा के होठों पर मुस्कान उभर आई। उसने पलट कर प्रतिमा को देखा और ग्लास में भरे पानी को अपनी हथेली में लेकर प्रतिमा के चेहरे पर छिड़कना शुरू कर दिया। कुछ ही देर में प्रतिमा को होश आ गया। उसने पलकों को लपलपाते हुए अपनी ऑखें खोल दी। शिवा ने उसे बेड पर अच्छे से लिटाया और बेड के किनारे पर ही बैठ गये।
"पि पिता जी।" होश में आते ही प्रतिमा दुखी भाव से कह उठी थी।
"डोन्ट वरी माॅम।" शिवा ने प्रतिमा के हाथ को पकड़ कर हल्का सा दबाया___"इवरीथिंग इज अब्सोल्यूटली फाइन एण्ड फार काइण्ड योर इन्फाॅरमेशन आपके पिता जी कल यहाॅ आ जाएॅगे।"
"क्याऽऽ???" शिवा की बात सुन कर प्रतिमा बुरी तरह उछल पड़ी थी।
"यस माॅम।" शिवा ने मुस्कुराते हुए कहा___"एण्ड यू नो व्हाट आपके इस चक्कर ने कमाल कर दिया।"
"क्या मतलब???" प्रतिमा हैरान।
"मतलब ये कि जो चीज़ बातों में नहीं हो सकती थी वो चीज़ आपके इस चक्कर से हो गई।" शिवा ने उत्साहित भाव से कहा___"क्या सही समय पर आपको चक्कर आया माॅम।
"
"ये तू क्या बकवास कर रहा है??" प्रतिमा के चेहरे पर एकाएक शख्त भाव उभर आए___"ये सब तुझे मज़ाक लग रहा है? तुझे मेरे और मेरे पिता की भावनाओं का ज़रा सा भी एहसास नहीं हुआ? कैसा बेटा है तू मेरा? तुझे इस सब में भी एक चाल नज़र आई? मेरा यू चक्कर खाकर गिर जाना भी तुझे किसी कामयाबी का हिस्सा नज़र आया? वाह बेटा वाह...आज तूने साबित कर दिया कि तू सिर्फ और सिर्फ अपने बाप पर गया है। तेरे लिए किसी के जज़्बात किसी के दुख दर्द कोई मायने नहीं रखते। आज अगर मुझे चक्कर की वजह से दिल का दौरा पड़ जाता तब भी शायद तुझे और तेरे बाप को कोई फर्क़ नहीं पड़ता।"
"म माॅम।" शिवा बुरी तरह से झेंपते हुए बोला___"ये आप क्या कह रही हैं?"
"शटअप।" प्रतिमा ज़ोर से चीखी थी। उसकी ऑखों से एकाएक ऑसू बह चले___"क्या नहीं किया मैने और क्या नहीं दिया मैने तुम दोनो बाप बेटों को? मगर मेरे त्याग और बलिदान का कोई मोल नहीं है तुम दोनो की नज़र में। मैने वो काम भी किया जिसके लिए कोई भी भारतीय औरत किसी भी सूरत में तैयार नहीं हो सकती। मैने अपने साथ साथ अपनी आत्मा तक को जहन्नुम में झोंक दिया मगर उसका भी कोई मोल नहीं तुम लोगों की नज़र में। अभी तक तो नहीं मगर अब एहसास हो रहा है कि मेरे कर्मों की सज़ा मुझे मिलनी शुरू हो गई है।"
"आई एम स्वारी माॅम।" शिवा ने सिर झुकाते हुए कहा___"मेरा वो मतलब हरगिज़ भी नहीं था जो आप समझ बैठी हैं। मैं तो.....
"बस।" प्रतिमा ने अपना दाहिना हाथ उठा कर अपने पंजे से उसे रुकने का संकेत देते हुए कहा___"कुछ भी सफाई देने की ज़रूरत नहीं है। मैं कोई बच्ची नहीं हूॅ जिसे किसी भी तरह की बातों से बहला फुसला दिया जाए। मेरे सीने में भी एक दिल है जिसमें प्यार मोहब्बत और ममता का सागर उछाल मारता है। मगर तूने और तेरे बाप ने कभी उसकी कद्र नहीं की।"
"आप बेवजह बातों का पतंगड़ बना रही हैं माॅम।" शिवा ने कहा___"जबकि मैं क़सम खा कर कहता हूॅ कि मेरे कहने का वो मतलब नहीं था। हाॅ मैं ये मानता हूॅ कि मैंने वो सब उस समय कह दिया जबकि हालात वैसे नहीं थे। इसी लिए मैं आपसे उसके लिए माफ़ी भी माॅग रहा हूॅ। और दूसरी बात मुझे पहली नज़र में यही लगा कि आपने चक्कर खा कर गिरने का नाटक किया है। इस लिए आपके नाटक को ज़ारी रखने के लिए मैं भी ज़ोर से चीखते हुए आपके पास आकर वो सब आपसे कहने लगा था। क्योंकि ये तो मुझे पता ही था कि मोबाइल चालू हालत में है और नाना जी को वो सब कुछ साफ साफ सुनाई देगा जो कुछ हम यहाॅ करेंगे और ऐसा हुआ भी। तभी तो जब मैने देखा कि आपके चक्कर खाने से उधर नाना जी भी चिंतित व परेशान हो उठे हैं तो मैने जल्दी से मोबाइल उठा कर उनसे बात की थी और उन्हें आपके बारे में सब कुछ बताया था। उसके बाद उन्होंने यहाॅ आने के लिए कहा और यहाॅ का पता पूछा मुझसे तो मैने बता दिया। बस, यही हुआ था।
उसके बाद मुझे लगा कि नाटक खत्म हो गया है तो मैने आपके चेहरे पर पानी छिड़क कर आपको होश में ले आया और आपसे वो सब कहा। मगर आपने तो कुछ और ही मुझे सुना दिया।"
"तभी तो कहती हूॅ कि तुम दोनो बाप बेटों को किसी के दुख दर्द का एहसास नहीं है।" प्रतिमा ने दुखी भाव से कहा__"अगर होता तो उसी वक्त समझ जाते कि वो कोई नाटक नहीं बल्कि हक़ीक़त था। तुम्हें समझना चाहिए था कि वर्षों की बिछड़ी एक बेटी अपने बाप से बात कर रही थी। उस वक्त बाप बेटी के दिलों में भावनाओं का कैसा ज्वार भाॅटा ताण्डव कर रहा होगा? ये उन प्रबल भावनाओ का ही असर था कि मेरा दिल उन भीषण जज़्बातों को सहन न कर पाया और मैं चक्कर खा कर गिर गई थी। मगर, जैसा कि मैने कहा तुम दोनो बाप बेटों को किसी के दुख दर्द का एहसास नहीं है। तभी तो मेरी उस हालत को भी नाटक समझ लिया।"
"मुझे माफ़ कर दीजिए माॅम।" शिवा ने सहसा भारी लहजे में कहा___"मुझसे सच में बहुत बड़ी ग़लती हो गई है। मगर आइंदा ऐसा नहीं होगा माॅम, ये मेरा वादा है आपसे। आप तो जानती हैं कि आपकी अहमियत मेरी लाइफ में कितनी है। मैं ऐसा कोई काम कर ही नहीं सकता जिससे आपके दिल को ठेस पहुॅचे। बस एक बार माफ़ कर दीजिए न।"
प्रतिमा ने इस वक्त शिवा के चेहरे पर उभरे हुए मासूम से भावों को देखा तो सहसा उसकी ममता जाग गई। उसने तुरंत ही शिवा को पकड़ कर अपने ऊपर खींच लिया और कस कर अपने सीने से भींच लिया। तभी किसी के आने की आहट से दोनो ही अलग हुए। कुछ ही पलों में सविता ने कमरेएं प्रवेश किया। उसने बताया कि डाक्टर साहब आ गए हैं। सविता की बात सुन कर शिवा बेड से उठ कर कमरे से बाहर की तरफ चला गया। थोड़ी ही देर में अजय सिंह का फैमिली डाक्टर अनिल जैन शिवा के साथ कमरे में दाखिल हुआ। अनिल जैन चालीस की उमर का तथा मध्यम कद काठी का ब्यक्ति था। अजय सिंह जैसे इंसान से संबंध रखने वाला ये पहला ऐसा ब्यक्ति था जो शक्ल और सीरत से शरीफ़ था।
शिवा ने अनिल को प्राथमिक बातें बताईं कि क्या हुआ था उसकी माॅम को। उसके बाद अनिल ने चेकअप करना शुरू किया। थोड़ी देर तक प्रतिमा को चेक करने के बाद उसने कुछ दवाईयाॅ दी और उन्हें सेवन करने की विधि बताई। फिर उसने शिवा को अपने साथ बाहर आने का इशारा करते हुए कमरे से बाहर की तरफ चल दिया।
"क्या बात है डाक्टर अंकल?" शिवा ने बाहर आते ही सहसा गंभीरता से पूछा___"मेरी माॅम पूरी तरह ठीक तो हैं न?"
"चिंता की कोई बात नहीं है बेटा।" अनिल ने कहा__"बस थोड़ी कमज़ोरी थी इस वजह से उन्हें चक्कर आया था। ठाकुर साहब आएॅ तो उनसे कहना कि मैने उन्हें याद किया है। अगर उनके पास समय हो तो कुछ समय के लिए मेरे पास ज़रूर आएॅ वो।"
"जी बिलकुल डाक्टर अंकल।" शिवा ने विनम्रता से कहा___"मैं डैड को ज़रूर आपके पास जाने के लिए कहूॅगा।
"
उसके बाद डाक्टर अनिल जैन हवेली से अपना थैला लिये चला गया। शिवा भी वापस अपने माॅम के पास आ गया। सविता रात के लिए खाना बनाने चली गई थी। उसे प्रतिमा ने कह दिया था कि कुछ और लोगों को साथ में लेकर उन लोगों के लिए भी खाना बना लेना जो लोग आज गेस्टरूम में ठहरे हुए हैं। कुछ देर अपनी माॅ के पास बैठने के बाद शिवा प्रतिमा के ही कहने पर गेस्टरूम की तरफ चला गया। जबकि प्रतिमा अपने पिता के आने के बाद उससे मिलने के सुनहरे ख़याल बुनने लगी।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर विराज की तरफ!
रात हुई तो विराज और आदित्य ने थोड़ा बहुत खाना खाया। हलाॅकि खाना पीना वो लोग लेकर नहीं चले थे इस लिए एक स्टेशन पर जब ट्रेन रुकी तो वहीं इन दोनो ने अपने लिए खाने की कुछ चीज़ें ले लिये थे और फिर ट्रेन में ही दोनो ने बैठ कर खा लिया था।
नीलम की मौजूदगी में मैने इतना ज़रूर किया कि अपनी शीट पर आदित्य को बैठा दिया था और आदित्य की शीट पर मैं बैठ गया था। इससे हुआ ये कि अब नीलम की तरफ मेरी पीठ हो गई थी। हलाॅकि इस तरफ बैठने से मेरी पीठ भी उसे दिखाई नहीं देनी थी। ख़ैर खाना पीना करके हम दोनो ही आराम से लेट कर सो गए थे। नींद भी ज़बरदस्त लगी थी क्योंकि हम दोनो लगातार यात्रा ही कर रहे थे।
रात के किसी प्रहर हमें शोर सा सुनाई दिया। ऐसा लगा जैसे कुछ लोग आपस में झगड़ा कर रहे थे। ये एसी का डिब्बा नहीं था। मैने जानबूझ कर एसी में टिकट बनवाने को नहीं कहा था जगदीश अंकल से। रिजर्वेशन वाले डिब्बे में भी कुछ लोग जनरल डिब्बे की भीड़ देख कर घुस आते थे। ख़ैर, उस शोर शराबे की वजह से हमारी नींद टूट गई और हमारी ऑखें खुल गई।
शोर शराबा मेरे पीछे की तरफ से सुनाई दे रहा था। आदित्य जैसे ही उठ कर अपनी शीट पर बैठा वैसे ही उसकी नज़र मेरे पीछे उस तरफ पड़ी जिस तरफ शोर हो रहा था। आदित्य ने देखा कि चार पाॅच लड़के मेरे पीछे की तरफ वाली शीट के पास फर्श पर खड़े थे और शीट पर बैठे हुए यात्रियों को अनाप शनाप बके जा रहे थे। उन लड़कों की आवाज़ों के बीच कुछ औरतों व लड़कियों की भी आवाज़ें आ रही थी। इस बीच मैं भी उठ कर अपनी शीट पर बैठ गया था। मैने ये सोच कर अपने पीछे की तरफ नहीं देखा कि कहीं नीलम की नज़र मुझ पर न पड़ जाए। किन्तु उस वक्त मैं चौंका जब नीलम की तेज़ तेज़ आवाज़ मेरे कानों पर पड़ी। उसकी आवाज़ से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो बस रोने ही वाली हो।
ये जान कर मेरे मनो मस्तिष्क में झनाका सा हुआ। मुझे समझते देर न लगी कि उन लड़कों से नीलम तथा अन्य लोगों की कहा सुनी हो रही है। मुझे ये तो समझ न आया कि आख़िर बात क्या हुई है किन्तु इतना ज़रूर समझ गया कि नीलम इस तरह किसी से झगड़ा करने वाली लड़की नहीं है। उस हालत में तो बिलकुल भी नहीं जबकि वो ट्रेन में अकेली सफर कर रही हो। मुझे लगा नीलम इस वक्त बेहद परेशान हालत में है।
मेरे अंदर का भाई जाग गया। बात भले ही चाहे जो हो मगर मैं ये हर्गिज़ भी बरदास्त नहीं कर सकता था कि कोई ऐरा गैरा मेरी बहन को कुछ उल्टा सीधा कहे या उससे किसी तरह का झगड़ा करे।
मैने आदित्य को इशारा किया। आदित्य मेरा इशारा समझ गया। उसके बाद हम दोनो ही उस तरफ चल दिये। इस बीच मैने जल्दी से अपने मुख और नाक को रुमाल से ढॅक लिया था। कुछ ही पल में हम दोनो उन लड़कों के पास पहुॅच गए। मैने एक लड़के को हल्का सा दबाव देकर एक तरफ किया और शीट की तरफ देखने की कोशिश की। मैं देख कर चौंका कि नीलम अपनी शीट पर बैठी सिसक रही थी। उसके बगल से ही एक और लड़की बैठी हुई थी। उसकी हालत भी नीलम जैसी ही थी। मुझे समझ न आया कि नीलम और वो लड़की सिसक क्यों रही हैं? जबकि उन दोनो के बगल से एक औरत भी बैठी थी जिसके साथ एक दस बारह साल का लड़का था। नीलम की सामने की शीट पर दो आदमी व दो औरतें बैठी हुई थी। उनके चेहरों पर लगभग बारह बजे हुए थे।
"ओये कौन है बे तू?" सहसा उस लड़के ने मुझे धक्का देते हुए कहा जिसे दबाव देकर मैं अंदर शीट की तरफ देखने लगा था, बोला___"और तू मुझे एक तरफ करके अंदर कहाॅ घुसा आ रहा है? क्या तुझे भी ये दोनो लौंडियाॅ पसंद आ गई हैं?"
"पसंद तो आएॅगी ही दिनेश।" एक अन्य लड़के ने हॅस कर कहा___"आख़िर माल तो ज़बरदस्त ही है न।"
"अरे तो पहले हमें तो चखने दे भाई।" दिनेश नाम के उस लड़के ने कहा___"उसके बाद ये भी चख लेगा।"
"कैसे चख लेगा यार?" तीसरे लड़के ने कहा___"हम साले इतनी देर से इन मालों से कह रहे हैं कि बाथरूम चलो मगर ये हैं कि सुनती ही नहीं हैं हमारी बात।"
उन लड़कों की इन बातों से ही ज़ाहिर हो गया था कि माज़रा क्या है। मगर मैं हैरान इस बात पर था कि वहाॅ पर बैठे बाॅकी सब उन लड़कों की बददमीची सहन कैसे कर रहे थे? या फिर वो सब डर रहे थे कि ये लड़के कहीं उनकी औरतों या बेटियों को कुछ कहने न लगें। ये यो हद ही हो गई थी। सबको अपनी फिक्र थी, कोई ये नहीं सोच रहा था कि दूसरी लड़कियाॅ भी तो किसी की बहन बेटी होंगी। इस सबसे मेरा दिमाग़ बेहद ख़राब हो चुका था। मैने पलट कर आदित्य की तरफ देखा। वो मुझे देखते ही समझ गया कि क्या करना है।
"ओ भाई ज़रा बात तो सुन।" मैने अपनी आवाज़ बदलते हुए कहा दिनेश नाम के उस लड़के से कहा___"तेरे अगर और भी साथी इस ट्रेन में हों तो फोन करके बुला ले उन्हें। क्योंकि अब जो तुम लोगों के साथ होने वाला है उसके बाद तुम लोगों हास्पिटल पहुॅचाने वाला भी तो कोई होना चाहिए न।"
"ओये चिकने।" दिनेश से पहले ही उसका एक अन्य साथी बोल पड़ा___"ज्यादा हीरोपंती करने का शौक चढ़ा है क्या तेरे को? चल फूट ले इधर से वरना हम लोगों से पंगा लेने का अंजाम अच्छा नहीं होगा समझा? और हाॅ आपन के और भी छोकरे लोग इस ट्रेन में मौजूद हैं। इस लिए आपन एक ही बार तेरे से बोलेगा कि इधर से खिसक ले तू।
"
"किसी ने सच ही कहा है कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते।" मैने गुस्से से उबलते हुए उस लड़के का कालर पकड़ा और ज़ोर से अपनी तरफ खींच लिया___"तुम जैसे गटर के कीड़ों को मसलना ही बेहतर होता है।"
मैने जैसे ही उस लड़के को अपनी तरफ खींचा तो एक अन्य हरकत में आ गया। अभी वो हरकत में आया ही था कि आदित्य ने धर लिया उसे। इधर मैने उस लड़के के चेहरे पर ज़ोर का पंच जड़ दिया। उनमें से किसी को भी इस सबकी उम्मीद नहीं थी। चेहरे पर ज़ोरदार पंच पड़ते ही उस लड़के की नाक की हड्डी टूट गई और भल्ल करके खून बहने लगा। वो बुरी तरह बिलबिलाते हुए अपनी नाक को अपने दोनो हाॅथों से पकड़ लिया। अचानक हुए इस हमले से दो लड़के जो अभी खाली थे वो भी हरकत में आ गए। आस पास फर्श पर खड़े हुए लोग एकदम से उस जगह से दूर हटते चले गए।
आदित्य ने जिस लड़के को धरा था उसका एक हाॅथ पकड़ कर ज़ोर से उमेठ दिया। जिससे वो दर्द में चीखा। हाॅथ उमेठते ही आदित्य ने पीछे से अपने घुटने का वार उसके पिछवाड़े पर किया तो उसका सिर ऊपर की शीट पर लगे लोहे के पाइप से टकराया। उसके हलक से चीख निकल गई। इधर दो लड़को के हाथ में पलक झपकते ही जाने कहाॅ से चाकू प्रकट हो गया था। मतलब साफ था कि वो चारो पेशेवर अपराधी थे। मगर उन्हें क्या पता था कि आज उनका पाला उनसे भी बड़े खलीफा से पड़ गया था।
एक लड़के ने जैसे ही अपना चाकू वाला हाथ ऊपर हवा में उठा कर मुझ पर चलाया तो मैने उसके उस हाॅथ को एक हाॅथ से हवा में ही रोंका और दूसरे हाॅथ से उसकी कलाई पर कराट का वार किया जिससे उसके हाथ से चाकू छूट कर फर्श पर गिर गया। चाकू के गिरते ही मैने उसके पेट में ज़ोर की लात मारी तो वो झोंक में ही बाएॅ साइड के डंडे से टकरा कर फर्श पर चित्त गिर पड़ा। उधर ऐसा ही हाल आदित्य की तरफ भी था। कहने का मतलब ये कि दो मिनट के अंदर ही वो चारो लड़के ट्रेन के फर्श पर पड़े बुरी तरह कराह रहे थे और हम दोनो से रहम की भीख माॅगने लगे थे।
"जी तो करता है कि।" मैने खूंखार भाव से कहा__"जो घिनौना कर्म तुम लोगों ने किया है उसके लिए तुम सबके हाथ पैर तोड़ कर तुम सबके हाॅथों में दे दूॅ। मगर मैं यहाॅ पर ज्यादा बखेड़ा नहीं करना चाहता। इस लिए जितना जल्दी हो सके यहाॅ से दफा हो जाओ वरना ये भी सोच लेना कि जिस बखेड़े की अभी मैं बात कर रहा हूॅ उससे मैं डरता भी नहीं हूॅ।"
मेरी इस बात का असर फौरन ही हुआ। वो चारो बुरी तरह लड़खड़ाते हुए फर्श से उठे और नौ दो ग्यारह हो गए। उन चारों के जाते ही मैं वापस पलटा और नीलम की देखा तो चौंक गया। वो मुझे ही देखे जा रही थी। उसकी ऑखों में ढेर सारे ऑसू थे। अभी मैं उसे देख ही रहा था कि सहसा वह अपनी जगह से उठी और बिजली की तरह दौड़ कर मुझसे लिपट गई।
"राऽऽज मेरे भाई।" फिर वो मुझसे लिपटी फूट फूट कर रोने लगी थी।
उसकी इस क्रिया से जहाॅ मैं भौचक्का रह गया था वहीं शीट पर बैठी वो दूसरी लड़की भी हैरान रह गई थी। तभी मुझे ध्यान आया कि उन लड़कों से लड़ते वक्त जाने कब मेरे मुख से रुमाल निकल गया था। शायद यही वजह दी कि नीलम जान गई थी कि मैं वास्तव में कौन हूॅ।
"ओह राज।" मुझसे लिपटी नीलम रोते हुए कह रही थी___"तुम यहाॅ भी मेरी इज्ज़त बचाने के लिए पहुॅच गए। इतने अच्छे और इतने महान कैसे हो सकते हो तुम? ये सच है कि अगर तुम नहीं होते तो कदाचित वो लड़के मुझे और सोनम दीदी को अपनी उन अश्लील बातों से ही मार देते।"
"बस चुप हो जाओ।" मैने उसे खुद से अलग कर उसके चेहरे को अपने दोनो हाॅथ की हॅथेलियों में लेते हुए कहा___"कुछ नहीं होता। मैं जब तक ज़िंदा हूॅ तुम्हारा कीई भी बुरा नहीं कर सकता।"
मेरी ये बात सुन कर नीलम एकटक मेरी ऑखों में देखने लगी। कुछ इस तरह जैसे मेरी ऑखों में कुछ तलाश कर रही हो। आस पास मौजूद लोग हमारी तरफ ऑखें फाड़े देख रहे थे। मुझे ये सब बड़ा अजीब सा लगने लगा।
"जाओ अब अपनी शीट पर बैठ जाओ।" मैंने सहसा गंभीर भाव से कहा___"सब लोग अजीब तरह से इधर ही देख रहे हैं।"
"देखने दो राज।" कहने के साथ ही नीलम पुनः मुझसे छुपक गई, फिर बोली___"मुझे किसी की कोई परवाह नहीं। मैं बस इतना जानती हूॅ कि मैं ऐसे शख्स की पनाहों में हूॅ जिसना मेरी अस्मत की दो दो बार रक्षा की है। इस पनाह में आकर मुझे ऐसा एहसास हो रहा है मेरे भाई जैसे ये जगह मेरे लिए दुनियाॅ की सबसे महफूज़ और सबसे सुंदर जगह है। राज, मुझे अपनी इस पनाह से अब कभी जुदा न करना।"
"हाॅ बाबा नहीं करूॅगा।" मैने नीलम को खुद से अलग करके कहा___"अब जाओ अपनी शीट पर बैठ जाओ। और हाॅ मैं अगली शीट पर ही हूॅ। अगर किसी तरह की कोई परेशानी हो तो मुझे आवाज़ लगा देना।"
"तुम भी मेरे पास ही बैठ जाओ न राज।" नीलम ने किसी बच्ची की तरह ज़िद करते हुए कहा___"या फिर ऐसा करो कि मुझे भी अपने पास बैठा लो। मैं तुम्हारे पास ही रहना चाहती हूॅ। प्लीज मेरी इतनी सी बात मान जाओ न।"
नीलम की इस बात से मैं एकदम से उसकी तरफ देखता रह गया। फिर मैने चेहरा घुमा कर आदित्य की तरफ देखा और सामने शीट पर बैठी सोनम की तरफ भी। दोनो मुझे ही देख रहे थे। मुझे समझ न आया कि अब मैं क्या करूॅ?
"तुम अपनी सोनम दीदी को अकेला छोंड़ कर कैसे मेरे पास बैठ सकती हो?" मैने कहा___"और उधर मेरे साथ मेरा दोस्त आदित्य भी तो है। मैं उसे अकेला छोंड़ कर तुम्हारे पास भला कैसे बैठ जाऊॅगा? इस लिए ये बेकार की ज़िद छोंड़ो और अपनी शीट पर बैठ जाओ। मैं पास में ही तो हूॅ।"
"हाॅ लेकिन मुझे तब भी तुम्हारे पास ही बैठना है।" नीलम ने बुरा सा मुह बना लिया___"अपने दोस्त से कह दो कि यहाॅ मेरी शीट पर सोनम दीदी के साथ बैठ जाएॅ।
"
"ये कैसी ज़िद है नीलम?" मैने हैरान___"अगर सोनम दीदी को इस बात से ऐतराज़ हुआ तो?"
मेरी बात सुन कर नीलम ने झट से पलट कर सोनम की तरफ देखा और फिर कहा___"दीदी, क्या आपको इनके यहाॅ बैठने से ऐतराज़ है?"
"क क्या मतलब??" नीलम के द्वारा एकाएक ही इस तरह पूछने पर सोनम लगभग हड़बड़ा गई थी।
"मैं ये पूछ रही हूॅ आपसे।" नीलम ने मानो अपने वाक्य को दोहराया___"कि क्या आपको राज के दोस्त के यहाॅ पर बैठने से ऐतराज़ है?"
सोनम ने नीलम की इस बात पर बड़े अजीब भाव से उसकी तरफ देखा। नीलम को देखने के बाद मेरी तरफ और फिर आदित्य की तरफ। सबको देखने के बाद पुनः नीलम की तरफ देखते हुए कहा___"अगर तू यही चाहती है तो ठीक है। मुझे कीई ऐतराज़ नहीं है इनके यहाॅ बैठ जाने से।"
"ओह थैंक्यू सो मच दीदी।" नीलम ने खुश होकर कहा___"आप सच में बहुत अच्छी हैं।"
"चल चल अब मस्का मत लगा।" सोनम ने कहा___"जा बैठ जा राज के पास। मगर उसे परेशान मत करना ज्यादा।"
"ओ हैलो।" मैं एकदम से बोल पड़ा___"कोई मेरे दोस्त से भी जानना चाहेगा कि उसे यहाॅ बैठने से ऐतराज़ है कि नहीं?"
मेरी इस बात से नीलम व सोनम एकदम से चुप हो गई। मैने आदित्य की तरफ देखा तो उसे मुस्कुराते हुए पाया। तभी नीलम व सोनम की नज़रें एकदम से आदित्य की तरफ दौड़ गईं। जैसे उसे देख कर ही ऑखों से पूछ रही हों कि आपको ऐतराज़ है क्या यहाॅ बैठने से? आदित्य उनकी ऑखों में उभरे सवाल का आशय समझ कर बोला__"ठीक है मैं सोनम जी के पास ही बैठ जाता हूॅ।"
"लो राज।" आदित्य के मुख से ये सुनते ही नीलम ने मेरी तरफ देख कर कहा___"अब तो किसी को कोई ऐतराज़ नहीं है। सो अब मैं तुम्हारे साथ ही अगली वाली शीट पर बैठूॅगी। चलो अब हम जल्दी से अपनी शीट पर चलते हैं।"
मरता क्या न करता की तर्ज़ पर मैं हैरान परेशान होकर नीलम के साथ वापस अपनी शीट पर आ गया। जबकि आदित्य सोनम के पास ही नीलम वाली शीट पर बैठ गया। इधर मेरी शीट पर आते ही नीलम मेरे बगल से ही धम्म से बैठ गई। बैठते ही उसने अपना एक हाथ मेरी काख से डाल कर मेरा एक हाॅथ मानो अपने कब्जे में ले लिया था।
"अरे अब ये क्या है?" नीलम के ऐसा करते ही मैने हैरानी से कहा___"सोना नहीं है क्या? चलो जाओ ऊपर वाली शीट पर लेट कर सो जाओ।"
"मुझे नींद नहीं आ रही है राज।" नीलम ने एकदम से बच्चियों वाले अंदाज़ से कहा___"तुम भी मत सोना। हम सारी रात ढेर सारी बातें करेंगे। मुझे तुमसे बहुत सारी बातें करनी हैं।"
"वो सब तो ठीक है।" मैने एकाएक अजीब भाव से कहा___"मगर क्या तुम्हें ऐसा महसूस नहीं हो रहा कि आज सूरज पश्चिम दिशा से निकल रहा है? ये तो कमाल हो गया न कि जो नीलम मुझसे कभी बात करना तो दूर कभी मुझे देखना तक गवाॅरा नहीं करती थी आज वही नीलम मुझसे सारी रात ढेर सारी बातें करेंगी? यकीन नहीं हो रहा मुझे।
ये चमत्कार है या फिर खुली ऑखों का मेरा कोई ख़्वाब?"
मेरी इन बातों से नीलम को झटका सा लगा। अभी तक जो चेहरा एकदम से ताज़े गुलाब की मानिंद खिला हुआ दिख रहा था वो मेरी इन बातों से पलक झपकते ही मुरझा गया था। उसके चेहरे पर पल भर में गहन पीड़ा व दुख के भाव उभर आए और ऑखों में ऑसू रूपी समंदर मानों हिलोरें लेने लगा था। कुछ कहने के लिए उसके होंठ बस थरथरा कर रह गए थे।
"मुझे मेरे उन सभी बुरे कर्मों की सज़ा दो राज।" नीलम ने रुऑसे स्वर में कहा___"यकीन मानो, तुम्हारी हर सज़ा को मैं खुशी खुशी क़बूल कर लूॅगी। मगर अब तुम्हारी किसी भी तरह की बेरुखी सहन नहीं कर पाऊॅगी मैं। मुझे पता है कि मैने तुम्हारे साथ अब तक क्या किया था। किन्तु अगर ग़ौर से सोचोगे तो इस सबमें तुम्हें ज़रूर समझ आएगा कि उस सबमें मेरी कोई ग़लती नहीं थी। मैने तो वही किया था अब तक जो बचपन से हमें सिखाया गया था। सही ग़लत का पाठ तो हमें हमारे माॅ बाप ने ही बचपन से पढ़ाया था। जबकि वास्तव में सही ग़लत क्या है वो अब समझ आया है मुझे। मैं सच कहती हूॅ मेरे भाई कि मैं अपने उन सभी कर्मों के बारे में सोच सोच कर बेहद दुखी हूॅ। मुझे अपने आप से घृणा होती है।"
"इंसान जिन्हें दिल से चाहता है।" मैने कहा___"वही अगर ऐसा करें तो तक़लीफ़ तो यकीनन होती है नीलम। मैने कभी भी तुम सबके बारे में ग़लत नहीं सोचा था। बल्कि हमेशा यही चाहता था तुम सब मुझसे उसी तरह बातें करो हॅसो बोलो जैसे बाॅकी सब करते थे। मगर मुझे आज तक समझ न आया कि हमने ऐसा कौन सा गुनाह किया था हमें आप सबकी सिर्फ नफ़रत मिली। ख़ैर, ये सब तो कल की बातें है मगर मैं ये जानना चाहता हूॅ कि आज ऐसा क्या हो गया है कि तुम्हें वही राज अपना भाई लगने लगा और इतना ही नहीं बल्कि दुनियाॅ का सबसे अच्छा इंसान भी लगने लगा। क्या सिर्फ इस लिए कि मैने इत्तेफाक़ से दो बार तुम्हारी इज्ज़त की रक्षा की या फिर इसकी कोई दूसरी वजह है?"
"इंसान का चरित्र जैसा भी हो राज।" नीलम ने गंभीर भाव से कहा___"वो दूसरों के सामने उजागर हो ही जाता है। ये अलग बात है कि इसमें थोड़ा बहुत समय लग जाता है। तुम लोगों के जिस चरित्र का पाठ हम भाई बहनों को बचपन से पढ़ाया गया था उसे हमने ये सोच कर यकीन के साथ मान लिया क्योंकि हम यही समझते थे कि कोई भी माॅ बाप अपने बच्चों को ग़लत नसीहत नहीं देते हैं। मगर जो ग़लत होता है उसका भी पर्दाफाश हो ही जाता है एक दिन। तुमने मेरी दो बार इज्ज़त बचाई इसे संयोग समझो या समय का बदलाव, जिसके फलस्वरूप मुझे ये समझ आया कि अपने जिस माॅ बाप से मैने तुम लोगों के चरित्र का पाठ पढ़ा था वो दरअसल झूॅठा भी तो हो सकता था। क्योंकि एक बुरे इंसान से अच्छे कर्म की उम्मीद नहीं की जा सकती। जबकि तुमने जो किया वो निहायत ही अच्छे कर्म की पराकाष्ठा थी।
तुम्हारे उस कर्म ने मुझे ये सोचने पर बिवश कर दिया कि तुम वैसे नहीं हो जैसा मेरे माॅ बाप ने अब तक समझाया था। बस, इंसान जब किसी के बारे में गहराई से सोचता है तो उसे कुछ न कुछ तो एहसास होता ही है कि हक़ीक़त क्या है? अब तक तो मैने तुम्हारे बारे में उस तरीके से सोचा ही नहीं था राज मगर उस हादसे के बाद जब मैने तुम्हारे बारे में आदि से अंत तक सोचा तो मुझे एहसास हुआ कि तुम बुरे नहीं हो सकते। इंसान को अपनी सफाई में कुछ भी कहने का अधिकार है जबकि हमने तो तुम लोगों की किसी बात को सुनना ही कभी गवाॅरा नहीं किया था। ऐसे में भला हमें कैसे समझ आता कि सच क्या है? हमसे यकीनन ग़लती हुई है राज और मैं इस ग़लती को ज़रूर सुधारूॅगी। घर पहुॅचते ही माॅम डैड से बताऊॅगी कि कैसे तुमने दो दो बार उनकी बेटी की इज्ज़त की रक्षा की है।"
"तुम्हारे बताने से कुछ नहीं होने वाला नीलम।" मैने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"तुम्हें तो अभी सारी असलियत का पता ही नहीं है। मगर मेरा दावा है कि जब तुम्हें सारी सच्चाई का पता चलेगा तो तुम्हारा दिल हाहाकार कर उठेगा।"
"क्या मतलब??" नीलम ने चौंकते हुए कहा___"तुम्हारी इन बातों का क्या मतलब है राज? तुम किस असलियत की बात कर रहे हो?"
"मैं तुम्हें इस बारे में खुद कुछ नहीं बताऊॅगा।" मैने गंभीर भाव से कहा___"क्योंकि मेरे बताने पर तुम्हें यही लगेगा कि मैं तुम्हारे माॅम डैड के विषय में बेवजह ही अनाश शनाप बक रहा हूॅ। इस लिए इस सबके बारे में तुम्हें खुद ही पता करना होगा नीलम। जब तक तुम्हें खुद सारी बातों का पता नहीं चलेगा या तुम खुद अपनी ऑखों से नही देख लोगी तब तक तुम दूसरे की बताई हुई बात का यकीन नहीं कर सकोगी।"
"आख़िर ऐसी कौन सी बातें हैं राज?" नीलम के चेहरे पर गहन चिंता के तथा सोचने वाले भाव उभरे___"जिनके बारे में तुम बात कर रहे हो? तुम मुझे बताओ राज, मुझे तुम्हारी हर बात पर यकीन होगा।"
"नहीं होगा नीलम।" मैने पुरज़ोर लहजे में कहा__"कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन पर यकीन करना बेहद मुश्किल होता है। यहाॅ तक कि अगर इंसान खुद अपनी ऑखों से भी देख ले तो यकीन नहीं कर पाता। इस लिए मेरे कुछ भी बताने का कोई मतलब नहीं है। तुम खुद सारी बातों का पता लगाओ और फिर उन पर विचार करो।"
"क्या रितू दीदी भी उन सारी बातों को जानती हैं?" नीलम ने कहा___"जिनके बारे में तुम बात कर रहे हो?"
"हाॅ।" मैने कहा___"रितू दीदी को आरी असलियत का पता है।"
"तो क्या यही वजह है कि।" नीलम ने कहा___"आजकल वो माॅम डैड के ख़िलाफ हैं?"
"हाॅ यही वजह है।" मैने कहा___"अब तुम सोच सकती हो कि भला ऐसी वो क्या बातें होंगी जिसके चलते तुम्हारी अपनी दीदी अपने ही माॅम डैड के खिलाफ हो गई हैं?"
मेरी बात सुन कर नीलम कुछ बोल न सकी, बस एकटक मेरी तरफ देखती रही।
मैं समझ सकता था कि वो इन सब बातों के चलते अपने दिलो दिमाग़ को विचारों भॅवर में डुबा रही है। कुछ और हमारे बीच ऐसी ही बातें होती रहीं। उसके बाद मैने उसे सो जाने का कह दिया। हलाॅकि मैं जानता था कि अब उसे सारी रात नींद नहीं आने वाली थी। वो रात भर इन्हीं बातों को सोचती रहेगी कि आख़िर ऐसी कौन सी सच्चाई है जिसकी मैं बात कर रहा हूॅ और जिस सच्चाई को जान कर उसकी अपनी दीदी अपने ही माॅम डैड के खिलाफ़ हो गई है?
नीलम को ऊपर के बर्थ पर लिटाने के बाद मैं भी अपने नीचे वाले बर्थ पर लेट गया और नीलम के साथ हुई बातों के बारे में सोचने लगा। आख़िर क्या करेगी नीलम जब उसे अपने माॅ बाप और भाई की असलियत का पता चलेगा? वो कैसा रिऐक्ट करेगी जब उसे पता चलेगा कि उसके माॅ बाप ने किस तरह इस हॅसते खेलते परिवार को बरबाद किया था? सब कुछ जानने के बाद क्या नीलम भी अपनी बड़ी बहन की तरह अपने माॅ बाप के खिलाफ़ हो जाएगी? मैं इन्ही सब बातों के बारे में सोच रहा था। तभी सहसा मुझे अजय सिंह का ख़याल आया। मैने परसों आने से पहले ही जगदीश अंकल को फोन करके अजय सिंह के साथ एक धाॅसू खेल खेलने का कह दिया था। ये उसी का परिणाम था कि इस वक्त अजय सिंह सीबीआई की गिरफ्त में था। मगर अब जबकि मैं कल दोपहर तक हल्दीपुर रितू दीदी के फार्महाउस पहुॅच जाऊॅगा तो अजय सिंह को भी सीबीआई की गिरफ्त से आज़ाद कर देने का समय आ जाएगा।
अजय सिंह जब सीबीआई की गिरफ्त से निकल कर अपनी हवेली पहुॅचेगा तब वो प्रतिमा को जो कुछ बताएगा उसे सुन कर सबके पैरों के नीचे से ज़मीन गायब हो जाएगी। अजय सिंह का दिमाग़ उस सबके बारे में सोचते सोचते फटने को आ जाएगा मगर उसे कुछ समझ नहीं आएगा। वो इस तरह किंकर्तब्यविमूढ़ सी स्थित में बैठा रह जाएगा जैसे कोई मौत के मुह से अचानक बचने के बाद शून्य में खोया हुआ सा रह जाता है।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दोस्तो, वादे के मुताबिक आप सबके सामने मेगा अपडेट हाज़िर है,,,,,,,
आप सबकी प्रतिक्रिया और रिव्यू का बेसब्री से इन्तज़ार रहेगा।
इस अपडेट को तैयार करने में मैने कितनी मेहनत की है इसका ज़िक्र करना उचित तो नहीं है, पर मुझे यकीन है कि आप सब समझ गए होंगे।
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.........《 52 》
अब तक,,,,,,,,
मेरी बात सुन कर नीलम कुछ बोल न सकी, बस एकटक मेरी तरफ देखती रही। मैं समझ सकता था कि वो इन सब बातों के चलते अपने दिलो दिमाग़ को विचारों भॅवर में डुबा रही है। कुछ और हमारे बीच ऐसी ही बातें होती रहीं। उसके बाद मैने उसे सो जाने का कह दिया। हलाॅकि मैं जानता था कि अब उसे सारी रात नींद नहीं आने वाली थी।
वो रात भर इन्हीं बातों को सोचती रहेगी कि आख़िर ऐसी कौन सी सच्चाई है जिसकी मैं बात कर रहा हूॅ और जिस सच्चाई को जान कर उसकी अपनी दीदी अपने ही माॅम डैड के खिलाफ़ हो गई है?
नीलम को ऊपर के बर्थ पर लिटाने के बाद मैं भी अपने नीचे वाले बर्थ पर लेट गया और नीलम के साथ हुई बातों के बारे में सोचने लगा। आख़िर क्या करेगी नीलम जब उसे अपने माॅ बाप और भाई की असलियत का पता चलेगा? वो कैसा रिऐक्ट करेगी जब उसे पता चलेगा कि उसके माॅ बाप ने किस तरह इस हॅसते खेलते परिवार को बरबाद किया था? सब कुछ जानने के बाद क्या नीलम भी अपनी बड़ी बहन की तरह अपने माॅ बाप के खिलाफ़ हो जाएगी? मैं इन्ही सब बातों के बारे में सोच रहा था। तभी सहसा मुझे अजय सिंह का ख़याल आया। मैने परसों आने से पहले ही जगदीश अंकल को फोन करके अजय सिंह के साथ एक धाॅसू खेल खेलने का कह दिया था। ये उसी का परिणाम था कि इस वक्त अजय सिंह सीबीआई की गिरफ्त में था। मगर अब जबकि मैं कल दोपहर तक हल्दीपुर रितू दीदी के फार्महाउस पहुॅच जाऊॅगा तो अजय सिंह को भी सीबीआई की गिरफ्त से आज़ाद कर देने का समय आ जाएगा।
अजय सिंह जब सीबीआई की गिरफ्त से निकल कर अपनी हवेली पहुॅचेगा तब वो प्रतिमा को जो कुछ बताएगा उसे सुन कर सबके पैरों के नीचे से ज़मीन गायब हो जाएगी। अजय सिंह का दिमाग़ उस सबके बारे में सोचते सोचते फटने को आ जाएगा मगर उसे कुछ समझ नहीं आएगा। वो इस तरह किंकर्तब्यविमूढ़ सी स्थित में बैठा रह जाएगा जैसे कोई मौत के मुह से अचानक बचने के बाद शून्य में खोया हुआ सा रह जाता है।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,,,
उधर रितू मंत्री दिवाकर चौधरी से फोन पर बातें करने के बाद अपने फार्महाउस पहुॅची। उसने जिप्सी को तेज़ रफ्तार से दौड़ाया था और पाॅच मिनट में ही फार्महाउस पहुॅच गई थी। उसे मंत्री की बातों पर ज़रा सा भी ऐतबार नहीं था। हलाॅकि उसने धमकी के रूप में मंत्री को तगड़ी डोज दी थी। मगर इसके बावजूद वो इस बात से संतुष्ट नहीं हो पाई थी कि मंत्री की वजह से विधी के माॅ बाप अब सुरक्षित हैं। उसे पता था कि मौजूदा वक्त में भले ही मंत्री ने उससे वादा कर लिया था कि विधी के माॅ बाप को कुछ नहीं कहेगा मगर वो अपने इस वादे पर ज्यादा देर तक कायम नहीं रह सकता था। क्योंकि वो मंत्री था, वो ये बरदास्त नहीं कर पाएगा कि कोई ऐरा ग़ैरा उसे किसी चीज़ के लिए बिवश करे।
फार्महाउस पर पहुॅच कर रितू तेज़ क़दमों से चलती हुई अपने कमरे में पहुॅची। कमरे में पहुॅच कर सबसे पहले उसने अपनी पाॅकेट से उस मोबाइल की निकाल कर आलमारी में रखा जिस नये मोबाइल से उसने मंत्री से बात की थी। उसके बाद उसने अपने आईफोन को स्विच ऑन किया। फोन के स्विच ऑन होते ही उसने पुलिस कमिश्नर को काल लगाया और मोबाइल कान से सटा लिया।
"यस ऑफिसर।
" उधर से कमिश्नर का प्रभावशाली स्वर उभरा___"क्या प्रोग्रेस चल रही है तुम्हारे ऑपरेशन की?"
"ऑपरेशन तो अभी सफलता पूर्वक चल ही रहा है सर।" रितू ने सहसा गंभीर भाव से कहा___"मगर इस बीच एक प्रोब्लेम आ गई है।"
"व्हाट??" उधर से कमिश्नर का चौंकता हुआ स्वर उभरा___"कैसी प्रोब्लेम आ गई है? इवरीथिंग ओके न?"
"यस सर।" रितू ने कहा___"बट प्रोब्लेम ये है कि मंत्री दिवाकर चौधरी के साथ जो कुछ मौजूदा समय में हो रहा है उसके वजह का उसने अपने तरीके से पता लगाया है। मेरा मतलब है कि वो ये समझता है कि उसकी इस बरबादी के पीछे विधी के घरवालों का हाॅथ है। उसे लगता है कि उसके बच्चों को विधी के बाप ने किडनैप किया है।"
"ऐसा तो उसे लगेगा ही ऑफीसर।" कमिश्नर का स्वर उभरा___" मऐसे मामले में कोई भी ब्यक्ति सर्व प्रथम विधी के घर वालों पर ही शक करेगा, क्योंकि मंत्री के साथ ये सब करने की वजह सिर्फ विधी के घर वालो के पास ही है। इस लिए अगर मंत्री सारी बातों पर विचार करके ये नतीजा निकाला है कि ये सब उस रेप पीड़िता लड़की के घर वाले ही कर रहें हैं तो उसका सोचना ग़लत नहीं है। ख़ैर, तुम बताओ कि अब तुम क्या चाहती हो?"
"ज़ाहिर सी बात है सर।" रितू ने कहा___"कि मंत्री के इस नतीजे के बाद अब विधी के माॅ बाप पर मंत्री का खतरा हो गया है। आप जानते हैं कि इस मामले में उन बेचारों का दूर दूर तक कोई हाॅथ नहीं है। वो तो बेकार में ही इस मौत रूपी खतरे में फॅस पड़े हैं। इस लिए मैं चाहती हूॅ सर कि विधी के माॅ बाप को जल्द से जल्द सुरक्षा मुहय्या कराएॅ आप।"
"ऐसा करना सही नहीं होगा ऑफिसर।" कमिश्नर ने समझाने वाले भाव से कहा___"क्योंकि अगर हम विधी के माॅ बाप को पुलिस प्रोटेक्शन देंगे तो मंत्री के सामने सारी बातें ओपेन हो जाएॅगी। उस सूरत में उनके ऊपर ख़तरा और भी बढ़ जाएगा। ये ऑपरेशन चूॅकि सीक्रेट है इस लिए इसकी सारी चीज़ें सीक्रेट ही रहें तो बेहतर होगा।"
"मगर सर।" रितू ने कहा___"विधी के घर वालों को सुरक्षित तो ईरना ही होगा हमें। वरना उनके ऊपर मंत्री का क़हर कभी भी टूट पड़ेगा।"
"एक काम करो तुम।" कमिश्नर ने कहा___"विधी के माॅ बाप को भी अपने पास ही रखो।"
"लेकिन सर।" रितू ने कहा___"उन्हें मैं अपने पास लेकर कैसे आऊॅगी? संभव है कि मंत्री ने अपने आदमी उनके आस पास निगरानी में लगा दिये हों। उस सूरत में जब वो देखेंगे कि मिस्टर एण्ड मिसेस चौहान किसी के द्वार ले जाए जा रहे हैं तो वो ज़रूर उस बात की सूचना मंत्री को दे देंगे और हमारा पीछा भी कर सकते हैं।"
"रिस्क तो लेना ही पड़ेगा ऑफिसर।" कमिश्नर का गंभीर स्वर___"तुम चौहान को फोन करके कहो कि वो तुम्हें किसी ख़ास जगह पर आकर मिलें उसके बाद उस खास जगह पर हमारे पुलिस के आदमी सादे कपड़ों में उन्हें वहाॅ से रिसीव कर लेंगे।
पुलिस के वो आदमी चौहान और उनकी पत्नी को किसी खास जगह पर ही लेकर आ जाएॅगे जहाॅ से तुम उन्हें रिसीव कर अपने साथ ले जाना।"
"दैट्स ए गुड आइडिया सर।" रितू ने कहा___"हलाॅकि रिस्की तो ये भी है किन्तु जैसा कि आपने कहा रिस्क तो लेना ही पड़ेगा। इस लिए ऐसा ही करते हैं सर।"
"ठीक है।" कमिश्नर ने कहा___"तुम ऐसा ही करो। मगर होशियारी और सतर्कता से।"
"यस सर।" रितू ने कहा।
इसके साथ ही काल कट गई। रितू के चेहरे पर इसके पहले जहाॅ चिंता व परेशानी के भाव थे वहीं अब राहत के भाव झलकने लगे थे। यद्यपि उसे पता था कि ऐसा करना भी रिस्की ही था। क्योंकि मंत्री ने अगर अपने आदमियों को विधी के माॅ बाप की निगरानी में लगा दिया होगा तो यकीनन वो लोग जान जाएॅगे और पीछा करेंगे। मगर ये भी सच था कि विधी के माॅ बाप को सुरक्षित करना ज़रूरी था। अतः रितू ने मोबाइल में विधी के पापा का नंबर खोज कर काल लगा दिया।
"हैलो अंकल मैं रितू बोल रही हूॅ।" उधर से काल रिसीव किये जाते ही रितू ने कहा था।
"ओह हाॅ रितू बेटा।" उधर से मिस्टर चौहान का तनिक चौंका हुआ स्वर उभरा___"कैसी हो तुम? उस दिन के बाद से फिर आई नहीं तुम। क्या विधी के जाने से सारे रिश्ते खत्म हो गए? मेरा दामाद तो अपनी मरहूम पत्नी की अस्थियाॅ तक लेने नहीं आया। ऐसी उम्मीद तो न थी मुझे उससे।"
"राज की जगह उसके नाम से अस्थियाॅ लेने मैं ही तो आई थी अंकल।" रितू ने कहा___"आप से बताया तो था हालातों के बारे में।"
"ओह हाॅ हाॅ बताया था तुमने बेटा।" उधर से चौहान का स्वर उभरा___"क्या करूॅ बेटी कुछ याद ही नहीं रहता। जब से बेटी हमें छोंड़ कर गई है तब से एकदम अकेले हो गए हैं हम दोनो। सच कहें तो कुछ भी अच्छा नहीं लगता। ये ज़िंदगी तो बस बोझ सी लगने लगी है।"
"ऐसा मत कहिए अंकल।" रितू ने दुखी भाव से कहा___"विधी के चले से आप दुखी मत होइये। मैं भी तो आपकी बेटी ही हूॅ। आप मुझे अपनी विधी ही समझिये अंकल। मैने तो उसी दिन आप सबसे रिश्ता बना लिया था जिस दिन विधी को मैने अपनी छोटी बहन बनाया था। उसके जाने का हम सबको बेहद दुख है मगर ये भी सच है कि इस दुख को लेकर बैठा तो नहीं रहा जा सकता न। आप बिलकुल भी दुखी मत होइये और ना ही ये समझिए कि आप अब अकेले हो गए हैं। हम सब आपके ही तो हैं। आपका हम पर वैसा ही हक़ है जैसा कि विधी पर था आपका।"
"ओह शुक्रिया बेटी।" चौहान का लरज़ता हुआ स्वर उभरा___"तुमने ये कह कर सच में मुझे अकेलेपन के एहसास से मुक्त करवा दिया। मेरे दिल में जीने की चाह जाग उठी है। ख़ैर, ये बताओ बेटी कि अब कैसे हालात हैं वहाॅ पर?"
"हालात तो अभी काबू में ही हैं अंकल।" रितू ने कहा___"मगर एक गंभीर समस्या पैदा हो गई है।"
"क कैसी समस्या बेटा?" चौहान के स्वर में एकाएक चिंता के भाव आ गए थे___"सब ठीक तो है न?"
रितू ने संक्षेप में चौहान को मंत्री से संबंधित सारी बातें बता दी।
चौहान ये जान कर चकित था हो गया था कि उसकी बेटी के साथ कुकर्म करने वालों को रितू खुद सज़ा दे रही है। इस बात से चौहान को बड़ी खुशी भी हुई। किन्तु रितू ने मौजूदा हालातों के बारे में जो कुछ भी उसे बताया उससे वो चिंतित भी हो उठा था।
"इस लिए अंकल।" सारी बातें बताने के बाद फिर रितू ने कहा___"मैं चाहती हूॅ कि आप और ऑटी जितना जल्दी हो सके तो घर से निकल कर मेरे पास आने की कोशिश कीजिए।"
"लेकिन बेटा।" उधर से चौहान ने कहा___"उस मंत्री ने हमारे आस पास निगरानी के लिए अपने आदमियों को लगाया होगा तो उस सुरत में हम भला कैसे निकल पाएॅगे यहाॅ से?"
"उसका भी इंतजाम कर दिया है मैने।" रितू ने कहा___"आप बस वो करते जाइये जो मैं कहूॅ।"
"ठीक है बेटा।" चौहान ने कहा___"बताओ क्या करना है हमें?"
"आप अपना ज़रूरी सामान लेकर इसी वक्त तैयार हो जाइये।" रितू ने कहा___"थोड़ी ही देर में मेरे पुलिस डिपार्टमेन्ट के आदमी सादे कपड़ों में आपको लेने आएॅगे। आप उनके साथ चले आइयेगा। उसके बाद का काम मेरे पुलिस के वो आदमी और मैं सम्हाल लेंगे।"
"ठीक है बेटा।" उधर से चौहान ने कहा___"जैसा तुम कहो।"
"ओके फिर आप जल्दी से तैयारी कर लीजिए।" रितू ने कहा___"मैं अपने आदमियों को भेजती हूॅ आपके पास।"
इसके साथ ही रितू ने काल कट कर दी। कुछ पल रुकने के बाद उसने फिर से किसी को फोन लगाया और थोड़ी देर तक किसी से कुछ बातें की। उसके बाद काल कट करके बेड पर आराम से लेट गई। अभी वह लेटी ही थी कि उसका फोन बज उठा। उसने मोबाइल फोन उठाकर स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नाम को देखा तो सहसा उसके चेहरे पर सोचो के भाव उभरे।
"कहो प्रकाश क्या ख़बर है?" रितू ने सोचने वाले भाव से काल रिसीव करते ही पूछा।
"...........। उधर से कुछ कहा गया।
"ओह तो ये बात है।" रितू ने कुछ सोचते हुए कहा__"वैसे कितने आदमी होंगे वो लोग?"
"...........।" उधर से प्रकाश नाम के आदमी ने फिर कुछ कहा।
"चलो अच्छी बात है।" रितू ने कहा___"और कुछ?"
"...........। उधर से फिर कुछ कहा गया।
"क्या???" रितू चौंकी___"डाक्टर भला किस लिए आया था वहाॅ?"
"...........।" उधर से पुनः कुछ कहा गया।
"ओह आई सी।" रितू ने कहा___"लेकिन माॅम को चक्कर कैसे आ गया था? क्या तुमने पता नहीं किया?"
"..........।" उधर से प्रकाश ने कुछ बताया।
"ओह तो ये बात है।" रितू चौंकने के साथ मुस्कुराई भी___"चलो ठीक है प्रकाश। बहुत अच्छी ख़बर दी है तुमने। ऐसी ही अंदर की ख़बर देते रहना और हाॅ ज़रा होशियार और सतर्क रहना।"
ये कह कर रितू ने फोन काट दिया। उसके चेहरे पर इस वक्त कई तरह के भावों का आवागमन चालू हो गया था। ख़ैर उसके बाद रितू अपने डिपार्टमेन्ट के पुलिस वालों के फोन काल का इन्तज़ार करने लगी। लगभग बीस मिनट बाद रितू का आईफोन बजा। रितू ने तुरंत काल को रिसीव किया। काल पुलिस के आदमियों का ही था।
उन्होंने बताया कि वो लोग मिस्टर एण्ड मिसेस चौहान को लेकर चल दिये हैं और बताई हुई जगह पर आ रहे हैं। उन्होंने ये भी बताया कि आस पास ऐसा कोई आदमी नहीं दिखा जिस पर किसी तरह का ज़रा सा भी संदेह किया जा सके।
पुलिस के उस आदमी से बात करने के बाद रितू भी बेड से उठी और जिप्सी की चाभी लेकर कमरे से बाहर की तरफ निकल पड़ी। सीढ़ियों से उतर कर जब वो नीचे आई तो ड्राइंगरूम में रखे सोफों पर नैना और कुरुणा का भाई बैठा दिखा उसे। रितू नीचे आते देख नैना ने उससे कहा___"रितू बेटा, तुम्हारे ये मामा जी कह रहे हैं कि इन्हें अब अपने घर वापस जाना है। कह रहे हैं बहुत काम बाॅकी है घर में।"
"क्यों मामा जी इतना जल्दी?" रितू ने कहा___"अभी तो हमने आपसे ठीक से बातें भी नहीं की है और आप जाने की बात करने लगे।"
"बातें तो हो ही गई हैं रितू बेटा।" हेमराज ने कहा__"अब मुझे जाने दो। बहुत काम है। तुम्हें तो पता है दूसरे की नौकरी में अपनी मनमर्ज़ी तो नहीं चलती न।"
"ठीक है मामा जी।" रितू ने कहा___"जैसा आपको अच्छा लगे। तो कब जा रहे हैं आप?"
"मैं तो तैयार ही बैठा हूॅ बेटा।" हेमराज ने कहा___"बस तुम्हारे आने का ही इन्तज़ार कर रहा था।"
"ओह।" रितू ने कहा___"चलिए फिर। मैं भी उधर ही जा रही हूॅ। सो आपको भी छोंड़ दूॅगी।"
रितू के कहने पर हेमराज सोफे से उठा और बगल से ही रखे एक छोटे से बैग को पीठ पर लाद कर बाहर की तरफ चल दिया। उसके पीछे रितू भी चल दी। थोड़ी ही देर में वो दोनो जिप्सी में सवार सड़क पर चल रहे थे। दोनो के बीच थोड़ी बहुत बात चीत होती रही और फिर वो नहर वाली जगह के पास बने पुल के इसी तरफ रुक गए।
लगभग बीस मिनट बाद सामने से एक टोयटा आती दिखी। रितू को पहचानने में ज़रा भी देरी न हुई कि उस गाड़ी में उसके पुलिस के ही आदमी हैं। कुछ ही देर में वो गाड़ी रितू के पास आकर रुकी। गाड़ी के आगे पीछे के दरवाजे खुले। अगले दरवाजे से पुलिस का एक आदमी उतरा जबकि पीछे के दरवाजे से विधी के माॅ बाप उतरे।
रितू उनके पास जाकर उन्हें नमस्ते किया और उन्हें अपने साथ ला कर अपनी जिप्सी की पिछली शीट पर बैठने का इशारा किया। उन दोनो के बैठने के बाद रितू ने पुलिस वालों से कहा कि वो हेमराज को हरीपुर छोंड़ आएॅ जो यहाॅ से लगभग तीस किलो मीटर की दूरी पर था। रितू के कहने पर वो पुलिस वाले हेमराज की अपनी गाड़ी में बैठा कर वहाॅ से चले गए। उनके जाने के बाद रितू भी अपनी जिप्सी को स्टार्ट कर वापस फार्महाउस की तरफ चल दी।
विधी के माता पिता की सुरक्षित करके रितू अब बेफिक्र हो चुकी थी। अब वो बेफिक्री से कोई भी काम कर सकती थी। रास्ते में रितू ने विधी के माॅ बाप को विराज के बारे में भी बता दिया कि वो कल दोपहर तक मुम्बई से वापस आ जाएगा। ऐसे ही बातें करते हुए ये लोग कुछ ही समय में फार्महाउस पहुॅच गए।
जिप्सी से उतर कर रितू विधी के माता पिता को अंदर ले गई। जहाॅ पर नैना बुआ बैठी थी। रितू ने नैना को विधी के माॅ बाप का परिचय दिया और कहा कि इनके रहने के लिए एक कमरा साफ सुथरा करवा दें। थोड़ी देर ड्राइंग रूम में उन सबसे बातचीत करने के बाद रितू अपने कमरे में चली गई।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अजीब संयोग था।
जैसा कि रितू को पहले से ही अंदेशा था कि मंत्री अपनी हरकतों से बाज नहीं आएगा। कहने का मतलब ये कि जैसे ही मिस्टर एण्ड मिसेस चौहान रितू के फार्महाउस पहुॅचे थे वैसे ही मंत्री ने अपने आदमियों को गुप्त तरीके से विधी के घर के आस पास निगरानी के लिए लगा दिया था। किन्तु मुश्किल से आधे घंटे बाद ही मंत्री के आदमी ने मंत्री को फोन करके बताया कि जिस ब्यक्ति की निगरानी में हम लोग यहाॅ आए थे उसके घर में तो ताला लगा हुआ है। कुछ लोगों ने बताया कि एक सफेद रंग की गाॅड़ी आई थी जिसमे चौहान अपनी बीवी को लिए बैठ गया था। उसके हाॅथ में एक बड़ा सा बैग भी था। उन दोनों के बैठते ही वो सफेद रंग की गाड़ी चली गई थी।
फोन पर अपने आदमी की ये ख़बर सुन कर मंत्री भौचक्का सा रह गया था। वो समझ गया कि भले ही उसने अपने बच्चों के किडनैपर से वादा किया था इसके बाद भी किडनैपर को उसके वादे पर ऐतबार न हुआ था। शायद यही वजह थी कि किडनैपर ने वक्त रहते अपनी सुरक्षा के मद्दे नज़र अपने घर में ताला लगा कर कहीं ऐसी जगह नया ठिकाना बना लिया था जिस जगह के बारे मंत्री को पता तक न चल सके। फोन पर अपने आदमी की ख़बर सुनने के बाद इस वक्त मंत्री अपने उन्हीं तीनों साथियों के साथ ड्राइंगरूम में गंभीर मुद्रा में बैठा हुआ था।
"शिकार हमारे हाॅथ से बहुत ही आसानी से निकल गया चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"उसे आपके वादे के बावजूद पता था कि आप ऐसा कोई क़दम उठाएॅगे। इसी लिए तो उसने फौरन ही अपनी सुरक्षा का इंतजाम कर लिया। सबसे बड़ी बात ये कि आपको ऐसे वक्त में ऐसा कोई क़दम उठाना ही नहीं चाहिए था। क्योंकि संभव है कि इससे हमें भारी खामियाजा भुगतना पड़ जाए। दूसरी बात जब आपको पता चल ही गया था तो उस बात को फोन पर उस किडनैपर को बताना ही नहीं चाहिए था बल्कि आपको जो करना था वो उस किडनैपर की जानकारी में आए बग़ैर ही करना चाहिए था।"
"ग़लती तो हमसे यकीनन हो गई है अवधेश।" दिवाकर चौधरी ने अफसोस भरे भाव से कहा___"हमें लगा कि जब हम उसे बताएॅगे कि उसकी असलियत हम जान गए हैं तो उसके होश उड़ जाएॅगे और अपने बुरे अंजाम का सोच कर वो सब कुछ हमारे हवाले कर देगा जिसके बलबूते पर वो इतना उछल रहा है। इतना ही नहीं वो हमारे बच्चों को भी सही सलामत हमारे पास भेज देगा। इसके बाद वो हमसे अपने उस अपराध की माफ़ी माॅगेगा। मगर ऐसा हुआ नहीं बल्कि वो तो हम पर और भी ज्यादा हावी हो गया था।"
"अब जो होना था वो तो हो ही गया चौधरी साहब।
" सहसा अशोक मेहरा ने कहा___"और इस पर अब बहस करने का कोई फायदा नहीं है। इस लिए हमें अब ये सोचना चाहिए कि अब आगे हमें क्या करना है? वैसे उस चौहान के अचानक अपने घर से गायब हो जाने से एक बात तो साफ हो गई है कि वो अकेला इस काम में नहीं है। बल्कि कोई और भी है जो उसकी मदद कर रहा है।"
"ये तुम कैसे कह सकते हो?" दिवाकर चौधरी के माथे पर बल पड़ा___"और भला कौन ऐसे मामले में उसकी मदद कर सकता है? जबकि सब जानते हैं कि ये मामला हमसे संबंधित है। भला हमसे दुश्मनी मोल लेने का दुस्साहस दूसरा कौंन कर सकता है?"
"कोई तो होगा ही चौधरी साहब।" अशोक मेहरा ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा___"मैने भी अपने तरीके से उस लड़की के बारे में पता लगाया है।"
"क्या मतलब?" चौधरी के साथ साथ सुनीता व अवधेश भी चौंके थे, जबकि अवधेश ने ही पूछा___"क्या पता लगाया है उस लड़की के बारे में?"
"यही कि वो लड़की हमारे बच्चों के ही कालेज में पढ़ती थी।" अशोक मेहरा कह रहा था___"और हमारे बच्चों की फ्रैण्ड ही थी। किन्तु उसके बारे में एक बात ये भी पता चली कि वो लड़की किसी दूसरे लड़के को चाहती थी और फिर एक दिन अविश्वसनीय तरीके से उस लड़के से प्रेम संबंध तोड़ लिया था। उस लड़के से अलग होने के बाद ही वो सूरज के क़रीब आई थी। सूरज के ही एक दूसरे दोस्त ने इस बारे में बताया कि विधी नाम की वो लड़की उस लड़के से संबंध ज़रूर तोड़ लिया था कि किन्तु अकेले में अक्सर वो उस लड़के की याद में ही रोती रहती थी।"
"लेकिन इस मैटर से उस बात का कहाॅ संबंध है अशोक भाई जिसकी बात तुम कर रहे हो कि चौहान की मदद कोई दूसरा भी कर रहा है?" अवधेश ने कहा था।
"संबंध क्यों नहीं हो सकता भाई?" अशोक मेहरा ने कहा___"खुद सोचो कि जो लड़की अपने प्रेमी से अलग होकर उसकी याद में इस तरह रोती थी तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि वो फिर से अपने प्रेमी से मिलने की चाह कर बैठे और मिल ही जाए? दूसरी ग़ौर करने वाली बात ये भी है कि इश्क़ मुश्क कभी दुनियाॅ से नहीं छुपता। संभव है कि विधी और उसके प्रेमी के उन प्रेम संबंधों की ख़बर दोनो के घर वालों को भी रही हो। लेकिन किसी कारणवश मिल न पाएॅ हों वो दोनो या फिर मिलने वाले रहे हों। मगर तभी लड़की के साथ रेप सीन हो गया। लड़की के साथ हुए हादसे का पता विधी के प्रेमी को लगा होगा और उसने अपनी प्रेमिका के साथ हुए इस जघन्य अपराध का बदला लेने के लिए उतारू हो गया हो। जिसका नतीजा आज इस रूप में हमारे सामने है।"
"तम्हारी बातों में वजन तो है अशोक।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"मगर ये महज तुम्हारी संभावनाएॅ हैं जो कि ग़लत भी हो सकती हैं। फिर भी अगर तुम्हारी बातों को मान भी लिया जाए तो इसका मतलब ये हुआ कि हमारे बच्चों को किडनैप करने वाला चौहान नहीं बल्कि उस लड़की का प्रेमी है।"
"बिलकुल।
" अशोक ने कहा___"एक पल के लिए ये सोचा जा सकता है कि लड़की के बाप ने अपनी बेटी के साथ हुए उस कुकर्म का बदला ये सोच कर न लिया कि बदला लेने से वो सब तो वापस मिलने से रहा जो इज्ज़त के रूप में लुट चुका है। या फिर ये भी सोच लिया होगा कि कानूनन भी वो हमारा कुछ नहीं कर पाएगा। मगर लड़की का प्रेमी बदला लेने के सिवा कुछ और सोचेगा ही नहीं और वही वो कर रहा है।"
अशोक मेहरा की इस बात से ड्राइंग रूम में कुछ देर के लिए ब्लेड की धार की मानिंद सन्नाटा छा गया। सभी के चेहरों पर गहन सोचों के भाव नुमायाॅ हो उठे थे।
"मुझे लगता है कि अशोक भाई साहब का ये सोचना एकदम सही है।" सहसा इस बीच पहवी बार सुनीता ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"क्योंकि जिस प्रकार से उसने इतने कम समय में हमारे बच्चों को और हमारी रचना बेटी को किडनैप किया है उस तरह से वो चौहान तो कम से कम कर ही नहीं सकता। वो लड़का जवान है और गरम खून है। रेप केस होने के दूसरे दिन ही जिस तरह से उसने हमारे बच्चों को हमारे ही फार्महाउस से किडनैप किया और इतना ही नहीं बल्कि हमारे खिलाफ़ ऐसा खतरनाक सबूत वहाॅ से प्राप्त किया वो चौहान के बस का तो हर्गिज़ नहीं था। आज जब उसे चौधरी साहब से ये पता चला कि मंत्री महोदय उसकी ये असलियत जान गए हैं कि वो दरअसल चौहान ही है तो उसे चौहान की फिक्र हुई इसी लिए उसने वक्त रहते चौहान को सुरक्षित कर दिया और हमारी पहुॅच से शायद दूर भी कर दिया है।"
"अरे वाह।" दिवाकर चौधरी ने हैरत से ऑखें फैलाते हुए कहा___"क्या खूब दिमाग़ लगाया है मेरी राॅड ने। असलियत भले ही कुछ और ही हो मगर जिस तरह से अशोक और सुनीता ने अपनी बातें रखीं उससे यही लगता है कि ये सब लड़की के उस प्रेमी का ही किया धरा है। ख़ैर, अब सवाल ये है कि लड़की का वह प्रेमी कौन है जिसके पिछवाड़े में इतनी ज्यादा मिर्ची लग गई कि वो अपनी जाने बहार के साथ हुए उस काण्ड का बदला लेने लगा है। आख़िर पता तो चले कि वो किस खेत की पैदाईश है जिसने हम पर हाॅथ डालने का दुस्साहस किया है।"
"मैने उस लड़के का पता भी करवाया है चौधरी साहब।" अशोक मेहरा ने कहा___"वो लड़का हल्दीपुर का है। बड़े घर परिवार से ताल्लुक रखता है किन्तु।"
"किन्तु क्या अशोक?" चौधरी के माथे पर शिकन पैदा हुई।
"पता चला है कि लड़के के ताऊ ने उसे और उसकी माॅ बहन को हर चीज़ से बेदखल कर रखा है।" अशोक मेहरा ने कहा___"लड़के के ताऊ का नाम ठाकुर अजय सिंह है। हल्दीपुर में बड़ी भारी किन्तु शानदार हवेली है तथा अच्छी खासी ज़मीन जायदाद भी है। खुद अजय सिंह एक बड़ा कारोबारी इंसान है। परिवार की आपसी कलह की वजह से उसने अपने मॅझले किन्तु स्वर्गवाशी भाई विजय सिंह के उस लड़के को और लड़के की माॅ बहन को हवेली से बेदखल कर दिया है।"
"ओह बड़ी अजीब बात है ये तो।
" चौधरी ने सोचने वाले भाव से कहा___"फिर तो वो लड़का दर दर का भिखारी ही है। ऐसी हालत में वो ये सब हमारे साथ कैसे रहा पा रहा है? ये तो हैरत की बात है।"
"हैरत वैरत की कोई बात नहीं है चौधरी साहब।" अशोक मेहरा ने कहा___"ताऊ के द्वारा हवेली से बेदखल होने के बाद वो लड़का आजकल मुम्बई में रहता है अपनी विधवा माॅ और बहन के साथ।"
"अच्छा।" चौधरी ने कहा___"तो क्या वो मुम्बई में रहते हुए ये सब कर रहा है?"
"इस बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता मगर।" अशोक मेहरा ने कहा___"मगर संभव है कि उसे अपनी प्रेमिका के साथ हुए काण्ड का पता चला हो और वो मुम्बई से यहाॅ आया हो। उसके बाद उसने ये सब शुरू किया हो।"
"ओह।" चौधरी को जैसे बात समझ आ गई___"संभव है ऐसा ही हो। ख़ैर उस लड़के के परिवार में और कौन कौन लोग हैं?"
"लड़के का बाप तीन भाई थे।" अशोक ने कहा___"सबसे बड़ा अजय सिंह, फिर लड़के का बाप विजय सिंह और उसके बाद अभय सिंह। अजय सिंह के दो बेटियाॅ और एक लड़का है। उसकी बड़ी बेटी हल्दीपुर थाने में थानेदार है।"
"क क्या????" चौधरी ही नहीं बल्कि सभी बुरी तरह चौंके थे, फिर चौधरी ने ही कहा___"उस ठाकुर की बेटी थानेदार है। मतलब की पुलिस वाली है वो?"
"हाॅ मगर आप ये हर्गिज़ भी न सोचें कि।" अशोक मेहरा ने कहा____"कि उसका इस मामले में कोई हाथ है।"
"अरे, क्यों नहीं हो सकता ऐसा?" चौधरी से पहले अवधेश बोल पड़ा था___"वो अपने चचेरे भाई की मदद तो यकीनन कर सकती है भाई।"
"ऐसा नहीं है अवधेश भाई।" अशोक ने कहा___"क्योंकि अजय सिंह ही नहीं बल्कि उसकी औलादें भी उस लड़के और उसकी माॅ बहन से नफ़रत करती हैं।"
"एक मिनट अशोक भाई।" सहसा अवधेश श्रीवास्तव ने कुछ सोचते हुए कहा___"एक मिनट। हमारे बच्चों ने उस लड़की के साथ रेप सीन को अंजाम दिया उसके बाद वो चिमनी में बने अपने फार्महाउस पर चले गए। जहाॅ से उन्हें किडनैप कर लिया गया। चिमनी हल्दीपुर के बाद ही पड़ता है। ख़ैर रेप की वारदात हल्दीपुर के आस पास के ही क्षेत्र में हुई या फिर ऐसा होगा कि हमारे बच्चों ने अपने फार्महाउस पर ही उस लड़की से सामूहिक रेप किया और उसके बाद उसे हल्दीपुर की सीमा के अंदर ले जा कर छोंड़ आए होंगे। ये सब मैं इस लिए कह रहा हूॅ कि वो रेप सीन उस समय काफी फैल गया था उस क्षेत्र में। ख़ैर अब सोचने वाली बात ये है कि अगर रेप पीड़िता लड़की हल्दीपुर की सीमा में पाई गई तो क्या हल्दीपुर के थाने में मौजूद वो थानेदारनी चुप बैठी रही होगी? उसने शुरुआती ऐक्शन तो लिया ही होगा।"
"तुम आख़िर कहना क्या चाहते हो?" अशोक मेहरा ने पूछा___"इस मामले में अचानक तुम इस एंगिल से क्यों सोचने लगे?"
"दरअसल मैं भी तुम्हारी तरह संभावनाएॅ ही ब्यक्त कर रहा हूॅ भाई।" अवधेश ने कहा___"मामला काफी पेचीदा है। मगर मैं इधर उधर की कड़ियाॅ समेटने की कोशिश कर रहा हूॅ।
"
"साफ साफ बोलो क्या कहना चाहते हो तुम?" सहसा चौधरी कर उठा___"यूॅ बातों को घुमाने का क्या मतलब है?"
"जैसा कि अशोक भाई ने कहा।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"कि थानेदारनी अपने भाई की मदद नहीं कर सकती क्योंकि वो भी अपने माॅ बाप की तरह ही उससे नफ़रत करती है। मगर सवाल ये है कि थानेदारनी के क्षेत्र में रिप पीड़िता पाई गई तो क्या थानेदारनी ने इस पर कोई ऐक्शन नहीं लिया होगा?"
"अगर उसने कोई ऐक्शन लिया होता तो उसका पता हमें ज़रूर चलता।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"ये तो सच है कि वो रेप स्कैण्डल एक पुलिस केस ही था मगर उस स्कैण्डल का कोई पुलिस केस नहीं बना। इस बात खुलासा कमिश्नर खुद कर चुका है।"
"या फिर ऐसा हुआ होगा कि उस थानेदारनी ने केस बनाने की कोशिश की होगी।" अशोक ने कहा___"मगर कमिश्नर ने उसे केस बनाने या उस वारदात पर कोई ऐक्शन लेने से मना कर दिया होगा। थानेदारनी भला अपने आला अफसर के खिलाफ़ कैसे कोई क़दम उठाती? "
"हाॅ ऐसा भी हो सकता है।" चौधरी ने कहा___"और आम जनता ने इस पर हो हल्ला इस लिए नहीं किया क्योंकि उसे भी पता है कि मामला सीधा मंत्री के बेटे और उसके बेटे के दोस्तों का था। यानी कि हमारे डर की वजह से जनता ख़ामोश रह गई।"
"तो इन बातों का निष्कर्स ये निकला।" सहसा सुनीता ने गहरी साॅस लेने के बाद कहा___"कि वो लड़का जिसे कि उसके ताऊ ने उसकी माॅ बहन के साथ घर से दर बदर किया वही इस सबके पीछे है। यानी वो अपनी प्रेमिका के साथ हुए उस रेप का बदला ले रहा है।"
"बिलकुल।" अशोक ने पुरज़ोर लहजे में कहा__"विधी के माॅ बाप के अलावा वही एक ऐसा है जो ये सब कर सकता है। यानी ये सब करने की वजह उसके पास भी है।"
"अगर ये वाकई सच है।" अवधेश ने कहा___"तो अब हमें उस लड़के का पता लगाना होगा। मगर इस बार पहले जैसी ग़लती हर्गिज़ भी नहीं होनी चाहिए। वरना इस बार इसका खामियाजा हमें भारी कीमत पर चुकाना पड़ सकता है।"
"बड़ी हैरत की बात है।" दिवाकर चौधरी के लहजे में कठोरता थी, बोला___"एक पिद्दी से इंसान ने हमें इस तरह अपने शिकंजे में कसा हुआ है कि हम आज़ाद होते हुए भी आज़ाद व बेफिक्र नहीं हैं। वो जब चाहे हम सबको बीच चौराहे पर नंगा दौड़ा सकता है और हम कुछ कर नहीं सकते। सारे प्रदेश में हमारी एकछत्र हुकूमत है। हमारी इजाज़त के बिना इस प्रदेश में कहीं का कोई पत्ता भी नहीं हिल सकता। मगर कमाल देखो कि हम सब जो खुद को सबसे बड़ा सूरमा समझ रहे हैं आज उस हरामज़ादे की मुट्ठी में कैद हो कर रह गए हैं। लानत है हम पर और हमारे सूरमा होने पर।"
"आप चिंता मत कीजिए चौधरी साहब।" अशोक मेहरा ने कहा___"बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाएगी? आज भले ही उस कमीने का पलड़ा हम पर भारी है मगर किसी दिन तो उससे भी कोई चूक होगी जिसके तहत वो हमारे हत्थे चढ़ेगा।
उसके बाद हम बताएॅगे कि हमारे साथ इतना बड़ा दुस्साहस करने का कितना खूबसूरत अंजाम होता है।"
"बकवास मत करो अशोक।" चौधरी ने बिफरे हुए से लहजे में लगभग चीखते हुए कहा___"तुम्हारा ये डायलाग हम इसके पहले भी जाने कितनी बार सुन चुके हैं मगर अब तक ऐसा कोई पल नहीं आया जिससे हमें लगे कि हाॅ अब हालात हमारे हक़ में हैं। मादरचोद ने अपाहिज बना के रख दिया है हमे। किसी से ठीक से मिल नहीं सकते। किसी समारोह में नहीं जा सकते। साला हर पल डर लगा रहता है कि ऐसी किसी जगह पर वो हरामज़ादा कोई ऐसी वैसी हरकत न कर दे कि सबके सामने हमारी इज्ज़त का कचरा हो जाए।"
"बुरा मत मानिएगा चौधरी साहब।" अशोक ने कहा___"मगर हमें इतना बेबस बना देने में सबसे बड़ा हाॅथ आपके बेटे सूरज का है।"
"क्या मतलब है तुम्हारा?" चौधरी एक झटके से अशोक की तरफ घूमते हुए कहा था।
"आप खुद सोचिए।" अशोक ने कहा___"हमारे सभी बच्चों का लीडर कौन है___आपका बेटा ही न?"
"हाॅ तो।" चौधरी चकराया।
"आप ये बताइये कि फार्महाउस पर हमारे ऐसे संबंधों की वीडियो क्लिप बनाने की क्या ज़रूरत थी उसे?" अशोक ने कहा___"क्या उसे इतना भी एहसास नहीं था कि ऐसे वीडियो किसी डायनामाइट से कम नहीं होते। हम जैसे लोगों के हज़ारो प्रतिद्वंदी होते हैं जिन्हें हमारी ऐसी ही किसी कमज़ोरी की तलाश रहती है। आज उन्हीं वीडियोज की वजह से हम इतना बेबस व लाचार बने बैठे हैं। अगर वो वीडियोज बने ही न होते तो आज किसी की हिम्मत ही न होती हमें इतना मजबूर करने की।"
"हाॅ हम जानते हैं कि हमारे बेटे ने ऐसे वीडियोज बना कर बहुत बड़ी ग़लती की है।" चौधरी ने खेद भरे भाव से कहा___"मगर अब जो हो गया उसका कोई कर भी क्या सकता है? हमें तो सारे बच्चों की फिक्र है। जाने उनके साथ कैसा सुलूक कर रहा होगा वो हरामज़ादा?"
"हम खुद तो कुछ कर नहीं सकते हैं।" अवधेश ने कहा___"मगर किसी और को इस काम में ज़रूर लगा सकते हैं।"
"क्या मतलब??" अशोक के माथे पर शिकन उभरी।
"मुझे लगता है कि हमें इस काम के लिए किसी क़ाबिल व बहादुर डिटेक्टिव को हायर करना चाहिए।" अवधेश ने कहा___"जासूस लोग गुप्त तरीके से काम करने में काफी माहिर होते हैं। वो अपने और अपनी गतिविधियों के बारे में किसी को तब तक पता नहीं चलने देते जब तक कि वो खुद न चाहें। अगर यही काम हम अपने आदमियों से कराएॅगे तो हमारी किसी गतिविधी का उस लड़के को पता चलने में देर नहीं लगेगी। अब तक के उसके क्रिया कलाप से ये ज़ाहिर हो चुका है कि वो अपने हर काम में बेहद होशियारी और सतर्कता रखता है और हमारी पल पल की ख़बर रखता है। इस लिए हमें किसी डिटेक्टिव को हायर करना चाहिए।"
"आइडिया बुरा नहीं है।" अशोक ने कहा___"मैं तुम्हारी इस सलाह से सहमत हूॅ। यकीनन इस काम में एक डिटेक्टिव ही कुछ कर सकता है।
वो उस लड़के की सारी जन्मकुण्डली भी निकाल लेगा और हमारे बच्चों का पता भी लगा लेगा।"
"तो फिर देर किस बात की है?" चौधरी ने कहा___"अगर तुम दोनों को लगता है कि कोई डिटेक्टिव इस काम को बखूबी सफलतापूर्वक कर सकता है तो फिर ऐसे किसी डिटेक्टिव को फौरन हायर करो।"
"मेरी जानकारी में ऐसा एक डिटेक्टिव है।" अवधेश ने कहा___"मैं आज ही उससे फोन पर बात करता हूॅ और उसे जल्द से जल्द यहाॅ बुलाता हूॅ।"
"अच्छी बात है।" चौधरी ने कहा___"उसे बोलो फौरन हमारे सामने हाज़िर हो जाए। उसको उसके काम की मुहमाॅगी फीस के रूप में रकम मिलेगी।"
अवधेश ने चौधरी की बात सुनकर अपने कोट की पाॅकेट से मोबाइल निकाला और उसमें से किसी को फोन लगाया। थोड़ी देर बात करने के बाद उसने मोबाइल वापस अपनी पाॅकेट में डाल लिया।
"चौधरी साहब।" फिर उसने मंत्री की तरफ देखते हुए कहा___"मैने डिटेक्टिव से बात कर ली है। वो कल तक हमारे पास पहुॅच जाएगा। अब आप किसी बात की फिक्र मत करें। बहुत जल्द हमारा दुश्मन हमारे कब्जे में होगा और हमारे बच्चे हमारे पास होंगे।"
"अच्छी बात है अवधेश।" चौधरी ने कहा___"अब तो हमें तुम्हारे उस डिटेक्टिव पर ही भरोसा करना है। इसके सिवा दूसरा कोई चारा भी नहीं है।"
"आप निश्चिंत हो जाइये चौधरी साहब।" अवधेश ने कहा___"डिटेक्टिव बहुत ही क़ाबिल ब्यक्ति है। मुझे यकीन है कि बिना कोई नुकसान हुए हमारा हर काम हो जाएगा।"
"इससे ज्यादा हमें और चाहिए भी क्या?" चौधरी ने कहने के साथ ही सहसा सुनीता की तरफ देखा___"इतने दिनों में आज पहली बार एक नई उम्मीद पैदा हुई है। इस लिए हम चाहते हैं कि आज तबीयत खुश कर दो तुम।"
"हाय।" सुनीता ने दाॅतों तले अपने होंठ दबा कर आह सी भरते हुए कहा___"कितनी सुंदर बात कही है मेरे बलम ने। मैं तो कब से इसके लिए तड़प रही हूॅ। अब जब मूड बन ही गया है तो चलिए कमरे में और तबीयत हरी कर लीजिए।"
सुनीता की इस बात से चौधरी तो मुस्कुराया ही उसके साथ अशोक व अवधेश भी मुस्कुरा पड़े। इसके बाद चारो ही सोफों से उठ कर कमरे की तरफ बढ़ गए।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
सुबह हुई और एक नये जीवन के नये सफ़ की शुरुआत हुई। ट्रेन की शीट पर सोते हुए मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे ऊपर कोई झुका हुआ है। मुजे मेरे चेहरे पर गरम गरम हवा लगती हुई प्रतीत हो रही थी साथ ही किसी औरत के बदन पर लगे परफ्यूम की खुशबू भीमेरे नथुनों में समा रही थी। मेरी नींद टूटने की यही वजह थी। मैने पट से अपनी ऑखें खोल दी और अगले ही पल मैं ये देख कर बुरी तरह चौंका कि नीलम मेरे चेहरे के पास झुकी हुई थी।
उधर यही हाल नीलम का भी हुआ था। उसे कदाचित उम्मीद नहीं थी कि मैं इस तरह झटके से ऑखें खोल दूॅगा और फिर जैसे ही मैने पट से अपनी ऑखें खोली तो वो एकदम से हड़बड़ा गई थी। मगर हैरत की बात ये हुई कि उसने पलक झपकते ही खुद को सम्हाल भी लिया था।
"गुड माॅर्निंग राज।
" फिर उसने मुस्कुराते हुए बड़ी नज़ाक़त से कहा___"सोते हुए कितने मासूम लगते हो तुम। मैं काफी देर से यही देख रही थी कि मेरा भाई सोते वक्त किसी छोटे से बच्चे की तरह मासम व क्यूट सा दिखता है। पहले मैने सोचा कि तुम्हें जगाऊॅ मगर फिर जब मैने देखा कि तुम गहरी नीद में हो और एकदम से मासूम दिख रहे हो तो मैने तुम्हें जगाना उचित नहीं समझा। बल्कि एकटक तुम्हें देखने लगी थी।"
"अच्छा तो मैं तुम्हें।" मैने उठते हुए किन्तु शरारत से कहा___"छोटा सा बच्चा नज़र आ रहा था सोते वक्त?"
"हाॅ बिलकुल।" नीलम ने मुस्कुराई___"तभी तो उस छोटे से बच्चे की मासूमियत को एकटक निहारे जा रही थी मैं।"
"पर मैने जब तुम्हें देखा रात में।" मैने पुनः शरारत से ही कहा___"तो तुम सोते वक्त ऐसी दिख रही थी जैसे कोई अस्सी साल की बुढ़िया सो रही हो। मैं तो टोटली कन्फ्यूज हो गया था उस वक्त।"
"क्या कहा???" नीलम एकदम से राशन पानी लेकर चढ़ दौड़ी___"मैं तुम्हें बुढ़िया नज़र आ रही थी। रुको अभी बताती हूॅ तुम्हें?"
"अरे नहीं यार।" मैंने एकदम से हड़बड़ाते हुए कहा__"मैं तो मज़ाक कर रहा था। तुम बुढ़िया तो किसी एंगिल से नहीं लगती हो मगर...।"
"मगर क्या???" नीलम ने ऑखें दिखाई।
"मगर दादी माॅ ज़रूर लगती हो।" मैने हॅसते हुए कह दिया।
"क्या बोला???" नीलम एकदम से मेरे ऊपर चढ़ कर मेरे पेट पर बैठ गई, और फिर मेरे सीने में मुक्के मारते हुए बोली___"मैं दादी माॅ लगती हूॅ। रुक बेटा बताती हूॅ अब तुझे मैं।"
नीलम मेरे सीने में मुक्के मारे जा रही थी। मैं भी उससे बचने का कोई खास प्रयास नहीं कर रहा था। मैने तो उसे छेंड़ा ही इस लिए था कि वो ये सब करे। दरअसल इन्हीं सब चीज़ों के लिए तो मैं तरसा था। अब तक तो रितू और नीलम ने कभी मुझे अपना भाई समझा ही नहीं था। भाई बहन के बीच कैसी कैसी शरारतें होती हैं उस सबका मैने कभी स्वाद ही नहीं चखा था। मगर आज और इस वक्त वही सब मेरे और नीलम के बीच हो रहा था। सच कहूॅ तो मुझे इस सबसे बेहद खुशी हो रही थी। दिल में भड़कते हुए जज़्बात जाने क्यों मुझे रुलाने पर उतारू हो रहे थे। मेरा दिल कर रहा था कि इस वक्त भावनाओं में बहते हुए मैं नीलम से लिपट कर खूब रोऊॅ मगर मैं ऐसा नहीं करना चाहता था। क्योंकि उससे माहौल दुखी सा हो जाता जबकि मैं इस पल को जी भर के जीना चाहता था।
उधर हम दोनो बहन भाई की इस धमा चौकड़ी से आस पास बैठे ट्रेन के सब लोग आश्चर्य से ऑख व मुह फाड़े एकटक देखे जा रहे थे। हम दोनो को भी जैसे उन सबसे कोई मतलब नहीं था और ना ही कोई परवाह थी। नीलम ज़ोर ज़ोर से जाने क्या क्या बोले जा रही थी और मेरे ऊपर चढ़ी हुई मुझ पर मुक्कों की बरसात किये जा रही थी। उसकी इस आवाज़ और मेरे तेज़ हॅसी को सुन कर पीछे साइड ऊपर नीचे बर्थ पर सो रहे सोनम और आदित्य को भी जगा दिया।
वो दोनो फौरन ही भाग कर हमारे पास आ गए और इधर का नज़ारा देख कर हैरान रह गए।
"ये तुम दोनो क्या ऊधम मचा रखे हो?" सहसा सोनम ने लगभग ऊॅची आवाज़ में कहा___"तुम दोनो को कुछ होश भी है कि इस वक्त कहाॅ हो तुम दोनो और तुम दोनो की इस हरकत से आस पास वाले कितना डिस्टर्ब हो रहे हैं।"
"दीदी इसने मुझे दादी माॅ बोला।" नीलम ने मुक्के मारना बंद करके शिकायत भरे लहजे मे कहा___"पहले कह रहा था कि मैं बुढ़िया लगती हूॅ फिर बात बदल कर बोला कि मैं दादी माॅ लगती हूॅ।"
"हाॅ तो क्या हो गया?" सोनम दीदी ने हाॅथ नचाते हुए कहा___"उसके ऐसा कहने से क्या तुम सच में दादी माॅ लगने लगी? देखो तो अभी उसके ऊपर बैठी हुई है बेशरम। चल उतर राज के ऊपर से वरना दो चार लगाऊॅगी अभी।"
"नहीं उतरूॅगी।" नीलम ने दो टूक भाव से कहा___"इसने मुझे दादी माॅ क्यों कहा? इससे पहले बोलिए कि ये मुझे बोले कि मैं हूर की परी लगती हूॅ। वरना आप भी देखिये कि कैसे मैं इसे मार मार के इसका भुर्ता बनाती हूॅ?"
"हूर की परी और तू???" मैंने सहसा नीलम की खिल्ली उड़ाने वाले अंदाज़ से कहा___"कभी आईने में अपनी शक्ल देखी है तूने? दादी माॅ तो मैने ऐसे ही कह दिया था तुझे, वरना तो तू बिलकुल बंदरिया लगती है। यकीन न हो तो पूछ ले सोनम दीदी से।"
मेरी इस बात से जहाॅ सोनम दीदी ने अपना सिर पीट लिया वहीं नीलम की त्यौरियाॅ चढ़ गईं। वह एकदम से तमतमाए हुए बोली___"क्या कहा बंदरिया लगती हूॅ? रुक अब तो तुझे सच में नहीं छोंड़ूॅगी। दीदी आप हमारे बीच में मत पड़ना। इसे तो मैं आज छोंडूॅगी नहीं।"
सोनम दीदी चिल्लाती रह गईं जबकि नीलम ने फिर से मुझ पर मुक्कों की बरसात कर दी। मैं महसूस कर रहा था कि वो मुझे मार ज़रूर रही थी मगर बस हल्के हल्के। कदाचित उसे भी इस सबमें मज़ा आ रहा था। किन्तु वो यही ज़ाहिर कर रही थी कि वो मेरी बातों से बेहद गुस्सा हो गई है।
"सोनम दीदी इससे कहिए कि ज्यादा झाॅसी की रानी न बने।" मैने हॅसते हुए कहा___"वरना अगर मैं महाराणा प्रताप बन गया तो फिर ये रोने के सिवा कुछ न कर पाएगी, बंदरिया कहीं की।"
"ओये तू महाराणा प्रताप बन के तो दिखा।" नीलम ने ऑखें निकाली___"मैं भी झाॅसी की रानी से माॅ दुर्गा न बन जाऊॅ तो कहना। बड़ा आया महाराणा प्रताप बनने, बंदर कहीं का।"
"ओये बंदर कौन??" मैने सहसा उसके दोनो हाॅथ पकड़ते हुए कहा___"ठीक से देख आई एम विराज दि ग्रेट।"
"विराज दि ग्रेट माई फुट।" नीलम ने मेरे हाॅथ से अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा___"छोंड़ मेरे हाथ वरना नीलम परी को गुस्सा आ जाएगा और फिर विराज दि ग्रेट को मुर्गा बना देगी समझा?"
"मैं क्यों तेरे हाथ छोंड़ूॅ??" मैने कहा___"तू खुद ही छुड़ा ले न। मैं भी तो देखूॅ कि इस बंदरिया में कितना दम है।"
"ओये तू न दम की बात न कर।" नीलम ने कहा___"मैं चाहूॅ तो दो पल में अपने हाथ छुड़ा लूॅ समझा।
"
"अच्छा छुड़ा के तो दिखा।" मैने ताव दिया उसे।
"रहने दे रहने दे।" नीलम ने कहा___"वरना बाद में सब तुझ पर ही हॅसेंगे कि खुद को महाराणा प्रताप कहने वाला एक मासूम सी लड़की से हार गया।"
"कोई बात नहीं।" मैने कहा___"तुझसे हारना मंजूर है। आख़िर तू मेरी प्यारी सी बहन है न।"
"अब ये मस्का क्यों लगा रहा है?" नीलम ने चौंकते हुए कहा___"क्या नीलम परी से डर गया है?"
"डरता तो मैं उस परवर दिगार से भी नहीं।" मैने नीलम का हाथ छोंड़ कर अपने हाथ की उॅगली को ऊपर की तरफ करते हुए कहा___"मगर मुझे लगता है कि अब बाॅकी सबको बक्श देना चाहिए जो बेचारे हमारी वजह से शायद डिस्टर्ब हो रहे हैं। दूसरी बात सोनम दीदी ने डंडा उठा लिया तो फिर हम दोनो की ख़ैर नहीं रहेगी। कुछ समझ में आया नीलम परी जी?"
"अगर ऐसी बात है।" नीलम ने इस तरह कहा जैसे अहसान कर रही हो___"तो चल बक्श ही देती हूॅ तुझे भी और बाॅकी सबको भी। मगर आइंदा नीलम परी से टकराने की सोचना भी मत वरना खांमाखां बेइज्जती हो जाएगी तेरी।"
"ओये अब ज्यादा उड़ मत समझी।" मैने उसका हाथ पकड़ कर उसे अपने ऊपर से उठाते हुए कहा___"चल अब उतर नीचे।"
मेरे ऐसा कहने पर नीलम मुस्कुराते हुए मेरे ऊपर से उतर गई मगर अंदाज़ ऐसा था उसका जैसे अभी भी जता रही हो कि आइंदा याद रखना। मुझे उसके इस अंदाज़ पर बड़ी ज़ोर की हॅसी आई मगर मैने खुद को रोंक लिया। उधर सोनम दीदी और आदित्य भी ये सब देख कर मुस्कुरा रहे थे। ख़ैर कुछ ही पलों में मैं और नीलम शीट पर आराम से बैठ गए। आदित्य और सोनम भी हमारी ही शीट पर बैठ गए। आस पास बैठे सब लोग अभी भी हमें हैरानी से देख रहे थे। मैने देखा कि नीलम का चेहरा अब एकदम से खिला खिला लग रहा था। उसके होठों पर बहुत ही हल्की सी मुस्कान थी। वो बार बार मेरी तरफ देखने लगती थी। पता नहीं क्या चल रहा था उसके मन में?
"चलो सुबह तो हो गई है।" सोनम दीदी ने मानो बातों का सिलसिला शुरू किया___"इस वक्त अगर गरमा गरम चाय या काॅफी मिल जाती तो कितना अच्छा होता।"
"हाॅ दीदी।" नीलम ने कहा___"मगर यहाॅ पर अभी ये सब कैसे मिल सकता है भला?"
"चिंता मत करो।" मैने कहा___"अगले स्टाप पर जब ट्रेन रुकेगी तो चाय या काॅफी का बंदोबस्त करने की कोशिश करूॅगा मैं।"
"विराज भाई।" सहसा आदित्य ने कहा___"मैं ज़रा फ्रेश होकर आता हूॅ।"
"ओके भाई तुम जाओ।" मैने कहा___"उसके बाद मुजे भी फ्रेश होना है।"
"और हम भी तो फ्रेश होंगे।" नीलम बोल पड़ी___"इस लिए इनके बाद सबसे पहले मैं जाऊॅगी।"
"हर्गिज़ नहीं।" मैने कहा___"आदि के बाद मैं ही जाऊॅगा।"
"तू जा के दिखाना भला।" नीलम ने मानो धमकी सी दी मुझे।
"ऐ अब तुम दोनो फिर से न शुरू हो जाओ।" सोनम दीदी ने कहा था।
"पर दीदी सेकण्ड नंबर पर मैं ही जाऊॅगी।" नीलम ने बुरा सा मुह बनाया___"इसे कह दीजिए कि ये मेरे बाद चला जाएगा।
"
आदित्य हम दोनो की इस बात से मुस्कुराता हुआ उठ कर फ्रेश होने चला गया। जबकि मैने सोनम दीदी के कुछ बोलने से पहले ही कहा___"हाॅ ठीक है तुम ही चली जाना। वैसे भी मुझे इतनी जल्दी नहीं है तेरे जैसे। पहले बता देती तो आदित्य को रोंक देता।"
"ओये अब तू बकवास न कर समझे।" नीलम ने ऑखे दिखाते हुए कहा___"मुझे भी इतनी जल्दी नहीं है।"
"उफ्फ।" सोनम दीदी कह उठी___"तुम दोनो फिर से शुरू हो गए। ओके फाइन अगर तुम दोनो को इतनी जल्दी नहीं है तो मैं चली जाऊॅगी एण्ड दिस इज क्लियर।"
"ये सही कहा दीदी आपने।" मैने हॅसते हुए कहा___"अब आप ही जाना फ्रेश होने। सबसे लास्ट में यही जाएगी।"
"नहींऽऽ।" नीलम एकदम से हड़बड़ा गई___"आदि भैया के बाद मैं ही जाऊॅगी।"
"क्यों अब क्या हुआ तुझे?" सोनम दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा___"अभी तो कह रही थी न कि तुझे कोई जल्दी नहीं है तो अब क्या हुआ?"
"मैं कुछ नहीं जानती।" नीलम ने मानो फैंसला सुना दिया___"आदि भैया के बाद मैं ही जाऊॅगी और अगर आपने दोनो ने मुझे नहीं जाने दिया तो मैं यहीं पर हड़ताल कर दूॅगी।"
"उसे हड़ताल नहीं।" मैने हॅसते हुए कहा___"पोट्टी कर देना कहते हैं पगली।"
"ओये चुप कर तू।" नीलम पहले तो सकपकाई फिर घुड़की सी दी मुझे___"ज्यादा चपड़ चपड़ मत कर वरना ट्रेन के नीचे फेंक दूॅगी तुझे।"
" वैसे बात तो राज ने सही कही है।" सोनम दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा___"उसे हड़ताल करना थोड़ी न कहते हैं।"
सोनम दीदी की इस बात से मेरी हॅसी छूट गई और मेरे साथ ही साथ सोनम दीदी भी हॅसने लगी थी। हम दोनो के हॅसने से नीलम का चेहरा देखने लायक हो गया। ऐसा लगा जैसे वो अभी रो देगी। सामने की शीट पर बैठे लोग भी मुस्कुरा उठे थे। मैने जब देखा कि नीलम कहीं सच में ही न रो दे तो मैने अपनी हॅसी रोंक कर झट से उसे खींच कर खुद से छुपका लिया।
"तुम दोनो बहुत गंदे हो।" नीलम मुझसे अलग होने की कोशिश करते हुए किन्तु रूठे हुए भाव से बोली___"जाओ मुझे तुम दोनो से अब कोई बात नहीं करनी।"
"अरे ऐसा मत करना तू।" मैने उसे मजबूती से छुपकाए हुए कहा___"हड़ताल भले ही यहीं पर कर देना।"
मेरी इस बात से इस बार सोनम दीदी की भी ज़ोरदार हॅसी छूट गई। जबकि मैं नहीं हॅसा क्योंकि मुझे पता था कि मेरे इस बार हॅसने से नीलम की हालत ख़राब हो जाएगी। मैं नहीं चाहता था कि उसका दिल दुख जाए। मुद्दतों बाद तो वो मुझे ऐसे मिली थी। नीलम ने थोड़ी देर मुझसे नाराज़गीवश अलग होने की कोशिश की फिर वो खुद ही मुझसे छुपक कर मुझे कस के पकड़ लिया। वो कुछ बोल नहीं रही थी बल्कि उसने अपनी ऑखें बंद कर ली थी।
ऐसे ही हॅसी मज़ाक करते हुए हम चारो ही बारी बारी से फ्रेश हो गए। अगले स्टाप पर ट्रेन रुकी तो मैं और आदित्य ट्रेन से उतर कर उन दोनो के लिए चाय ले आए। हम चारों ने चाय पी और फिर से बातों में मशगूल हो गए। ट्रेन अपनी गति से चलती रही।
बातों बातों में समय का पता ही नहीं चला और सुबह से दोपहर होने को आ गई।
हम गुनगुन स्टेशन के पास पहुॅचने वाले थे। इस बीच नीलम फिर से गंभीर हो गई थी। मैने उसे समझा दिया कि वो सोनम दीदी को लेकर आराम से गाॅव जाए। मैने उसे खासकर ये कहा कि सारी बातों पता वो खुद ही लगाए तो बेहतर होगा। नीलम और सोनम दीदी ने मुझे अपना अपना मोबाइल नंबर दिया और मुझसे भी लिया।
गुनगुन स्टेशन पहुॅच कर ट्रेन रुकी तो हम सब ट्रेन से नीचे उतरने के लिए गेट की तरफ आए। मैने आस पास का मुआयना किया और आदित्य के साथ नीचे उतर आया। हम दोनो के उतरने के बाद नीलम भी सोनम दीदी के साथ उतर आई। मैने नीलम को बता दिया था कि यहाॅ से अब हम साथ नहीं रह सकते क्योंकि यहाॅ से मेरे लिए ख़तरा शुरू था। ख़ैर, उसके बाद मैं और आदित्य बड़ी सावधानी व सतर्कता से स्टेशन से बाहर की तरफ बढ़ चले। जबकि नीलम व सोनम दीदी हमारे काफी पीछे पीछे आ रही थी।
बाहर आकर मैने आस पास का मुआयना किया तो मुझे एक आदमी हमारी तरफ ही आता दिखा। उसकी निगाह हमारी तरफ ही थी। मैं उसे अपनी तरफ आते देख पहले तो हड़बड़ा सा गया, किन्तु जैसे ही वो कुछ पास आया तो मैं उसे पहचान गया। वो रितू दीदी के पुलिस डिपार्टमेन्ट का आदमी था। पास आते ही उसने मुझे अपने पीछे आने का इशारा किया। मैं और आदित्य उसके पीछे चल दिये। मैं आस पास भी नज़रें घुमा रहा था कि कहीं कोई ऐसा आदमी तो यहाॅ मौजूद नहीं है जो अजय सिंह से संबंध रखता हो। मगर मुझे ऐसा कोई नज़र न आया।
उस पुलिस वाले के पीछे चलते हुए हम एक टीयटा कार के पास पहुॅचे। उस आदमी ने हमें कार की पिछली शीट पर बैठने का इशारा किया। उसके इशारे पर हम दोनो कार का पिछला दरवाजा खोल कर अंदर बैठ गए। इस बीच वो पुलिस वाला भी ड्राइविंग शीट पर बैठ चुका था। कुछ ही पल में कार मंज़िल की तरफ बढ़ चली। कार के अंदर बैठ कर मैने एक बार पीछे मुड़ कर देखा मगर नीलम व सोनम दीदी कहीं नज़र न आईं मुझे। मैं उन दोनों के लिए चिंतित भी था कि वो गाॅव तक कैसे जाएॅगी? हलाॅकि मुझे पता था कि उन्हें लेने कोई न कोई बड़े पापा का आदमी आया ही होगा। मगर मैं एक बार पता कर लेना चाहता था। इस लिए मैने मोबाइल निकाल कर नीलम को फोन लगाया। दूसरी रिंग पर ही नीलम ने फोन उठा लिया। मैने उससे पूछा कि वो कहाॅ है अभी तो उसने बताया कि उसके डैड का एक आदमी जीप लेकर आया है और अब वो उसमें बैठ कर गाॅव जाने वाली है। नीलम की ये बात सुन कर मैं बेफिक्र हो गया और फिर काल कट कर दी।
टोयटा कार तेज़ रफ्तार से मंज़िल की तरफ दौड़ी जा रही थी। मैने रितू दीदी को फोन करके बताया कि मैं उनके द्वारा भेजे गए आदमी के साथ आ रहा हूॅ। रितू दीदी मेरी ये बात सुन कर खुश हो गईं और कहने लगी कि मैं जल्दी आ जाऊॅ।
मैने उन्हें नीलम व सोनम दीदी के बारे में भी बताया और ट्रेन में हुई सारी बातों के बारे में भी बताया। सारी बातें सुन कर वो पहले तो ख़ामोश रहीं फिर बोली चलो जो हुआ अच्छा ही हुआ। रितू दीदी से बात करने के बाद मैने जगदीश अंकल से थोड़ी देर बात की। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपना वो काम कर दिया है जिसके लिए मैने उन्हें कहा था। जगदीश अंकल से बात करने के बाद मैं आराम से शीट की पिछली पुश्त से पीठ टिका कर तथा ऑखें बंद कर लगभग लेट सा गया। मेरे दिमाग़ में आने वाले समय की कई सारी बातें चल रही थीं।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उस वक्त दोपहर के एक या डेढ़ बज रहे थे जब अजय सिंह टैक्सी के द्वारा अपनी हवेली पहुॅचा था। उसका दिलो दिमाग़ बुरी तरह भन्नाया हुआ था। उसके अंदर इतना ज्यादा गुस्सा भरा हुआ था कि अगर उसका बस चले तो सारी दुनियाॅ को आग लगा दे मगर अफसोस वह ऐसा कुछ भी नहीं कर सकता था। कुछ करे तो तब जब उसे पता हो कि करना किसके साथ है? और जिसके साथ करना भी है तो वो है कहाॅ???
नीलम और सोनम तो बारह बजे ही हवेली पहुॅच गई थीं। प्रतिमा अपनी बड़ी बहन की बेटी को आज पहली बार ऑखों के सामने देख कर बेहद खुश भी हुई थी और थोड़ा दुखी भी। सोनम अपनी मौसी से इस तरह मिली थी जैसे वह उससे पहली बार नहीं बल्कि पहले भी मिल चुकी हो। शिवा तो अपनी मौसी की बेटी सोनम की खूबसूरती और उसके साॅचे में ढले जिस्म को देख कर आहें भरने लगा था। उसे अपनी मौसी की लड़की पहली नज़र में ही भा गई थी। उसका मन कर रहा था कि जाए और उसे अपनी बाहों में उठा कर सीधी बेड पर पटक कर उसके ऊपर चढ़ बैठे मगर ऐसा संभव नहीं था। प्रतिमा अपने बेटे की मनोदशा को तुरंत ही ताड़ गई थी, इस लिए उसे अकेले में ले जाकर समझाया था कि वो ऐसी कोई भी हरकत न करे जिससे उसके साथ साथ हम सबको बाद में पछताना पड़े। प्रतिमा के समझाने पर शिवा समझ तो गया था मगर ये तो वही जानता था कि बहुत देर तक वो प्रतिमा के समझाने पर रह नहीं पाएगा।
सफ़र की थकान के कारण नीलम व सोनम ने नहा धो कर थोड़ा बहुत खाना खाया और नीलम के कमरे में दोनों एक ही बेड पर सो गईं थी। उधर अजय सिंह टैक्सी से उतर कर टैक्सी वाले को उसका भाड़ा किराया दिया। यद्दपि उसके पास पैसे के नाम पर चवन्नी भी नहीं थी मगर जहाॅ से उसे छोंड़ा गया था वहाॅ से उसे इतना तो रुपया दे ही दिया गया था कि वो आराम से अपने घर पहुॅच जाए। उसका मोबाइल फोन भी उसे वापस लौटा दिया गया था। ये अलग बात थी कि उसके फोन से सिम कार्ड निकाल लिया गया था और फोन के कैन्टैक्ट लिस्ट से सारे फोन नंबर्स डिलीट कर दिये गए थे। कहने का मतलब ये कि उसका मोबाइल फोन फिलहाल महज एक डमी बन कर रह गया था। ना तो वो किसी को फोन कर सकता था और ना ही उसके पास किसी का फोन आ सकता था। यही वजह थी कि अजय सिंह का दिमाग़ बुरी तरह भन्नाया हुआ था।
टैक्सी से जब अजय सिंह उतरा तो हवेली में तैनात उसके आदमी हैरान रह गए। भाग कर उसके पास आए और हाल अहवाल पूछने लगे। मगर भन्नाए हुए अजय सिंह ने सबको डाॅट डपट कर अपने पास से भगा दिया और पैर पटकते हुए मुख्य दरवाजे के पहुॅचा। दरवाजे को ज़ोर से लात मारी उसने। दरवाजा कदाचित अंदर से बंद नहीं था इसी लिए लात का ज़ोरदार प्रहार पड़ते ही उसके दोनो पल्ले खुलते चले गए। दरवाजे के खुलते ही अजय सिंह ज़मीन को रौंदते हुए अंदर की तरफ बढ़ गया।
उधर ड्राइंगरूम में बैठी प्रतिमा बाहर ज़ोर की आवाज़ सुनकर चौंक पड़ी थी। अभी वह ये देखने के लिए सोफे से उठने ही वाली थी सहसा उसे ठिठक जाना पड़ा। सामने से आते अजय सिंह पर नज़र पड़ते ही वह हैरत से बुत सी बन गई। जबकि अजय सिंह आते ही सोफे पर धम्म से लगभग गिर सा पड़ा। धम्म की आवाज़ से ही प्रतिमा की तंद्रा टूटी और वह फिरकिनी की मानिंद अपनी एड़ियों पर घूमी। सोफे पर पसरे अपने पति को अस्त ब्यस्त हालत में देख कर एक बार वो पुनः हैरान हुई फिर जैसे उसने खुद को सम्हाला और एकदम से मानो बदहवाश सी होकर अजय सिंह की तरफ तेज़ी से बढ़ी।
"अ...अजय।" अजय सिंह के पास पहुॅचते ही वह लरजते हुए स्वर में बोल पड़ी___"तु..तुम अ आ गए???"
प्रतिमा के इस तरह पूछने पर अजय सिंह कुछ न बोला बल्कि अपनी ऑखें बंद किये सोफे की पिछली पुश्त से पीठ टिकाए अधलेटा सा पसरा रहा। उसके कुछ न बोलने पर प्रतिमा बुरी तरह घबरा गई। वो झट से अजय सिंह के बगल से बैठी और अजय सिंह के कंधे पर अपना एक हाॅथ रखते हुए बोली___"तुम कुछ बोलते क्यों नहीं अजय? तुम ठीक तो हो न? और...और इस तरह अचानक तुम वहाॅ से कैसे आ गए?"
प्रतिमा के दूबारा पूछने पर भी अजय सिंह कुछ न बोला। उसकी ये ख़ामोशी प्रतिमा की मानो जान लिए जा रही थी। उसका गला भर आया। आवाज़ भारी हो गई तथा ऑखों में ऑसू उमड़ आए।
"अजऽऽऽय।" फिर उसने रुॅधे हुए गले से किन्तु अजय सिंह को झकझोरते हुए लगभग चीख ही पड़ी___"क्या हो गया है तुम्हें? कुछ तो बोलो। तुम इस तरह यहाॅ कैसे आ गए? तुम तो सीबीआई की गिरफ्त में थे न फिर तुम यहाॅ कैसे? कहीं....कहीं तुम उनकी गिरफ्त से भाग कर तो नहीं आ गए हो? अगर ऐसा है तो ये तुमने ठीक नहीं किया अजय। कानून तुम्हें इसके लिए मुआफ़ नहीं करेगा। बल्कि इस तरह भाग कर आने से तुम्हें शख्त से शख्त सज़ा देगा।"
"मैं कहीं से भाग कर नहीं आया हूॅ प्रतिमा।" अजय सिंह ने सहसा खीझते हुए कहा___"बल्कि मुझे उन लोगों ने खुद ही छोंड़ दिया है।"
"क..क..क्या????" प्रतिमा बुरी तरह उछल पड़ी___"उन लोगों ने तुम्हें खद ही छोंड़ दिया? ऐसा कैसे हो सकता है? सीबीआई के वो लोग तुम्हें ऐसे कैसे छोंड़ सकते हैं? बात कुछ समझ में नहीं आई अजय। आख़िर ये क्या माज़रा है? क्या चक्कर है ये?"
"सच कहा प्रतिमा।" अजय सिंह अजीब भाव से कह उठा___"ये चक्कर ही तो है।
"
"क्या मतलब??" प्रतिमा चौंकी।
"सच्चाई सुनोगी तो तुम्हारे पैरों तले से ये ज़मीन गायब हो जाएगी।" अजय सिंह ने कहा___"ये सीबीआई का जो मामला हुआ है न ये सब महज एक चाल थी मुझे किसी मकसद के तहत इस सबसे दूर करके कैद करने की।"
"ये क्या कह रहे तुम अजय?" प्रतिमा की के चेहरे पर आश्चर्य मानो ताण्डव करने लगा था___"ये सब एक चाल थी? पता नहीं क्या अनाप शनाप बोल रहे हो तुम।"
"मैं अनाप शनाप नहीं बोल रहा प्रतिमा।" अजय सिंह ने सहसा आवेश में आकर कहा___"यही सच है। जो सीबीआई वाले मुझे गिरफ्तार करने आए थे वो सब नकली थे। उनका सीबीआई से कोई ताल्लुक नहीं था। जबकि मैं और तुम सब यही समझे थे कि वो सब सीबीआई के ऑफिसर थे।"
"हे भगवान।" प्रतिमा ने मुख से बेशाख्ता निकल गया___"इतना बड़ा धोखा। अगर वो सीबीआई के लोग नहीं थे तो फिर कौन थे वो? और वो लोग तुम्हें यहाॅ से पकड़ कर क्यों ले गए थे और कहाॅ ले गए थे? आख़िर ये सब करने के पीछे उनका क्या मकसद था? कहीं ये सब हमारी बेटी रितू ने तो नहीं करवाया?"
"नहीं प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा___"ये काम रितू का नहीं है बल्कि ये सब उस हरामज़ादे विराज किया धरा था।"
"ये क्या कह रहे हो तुम?" प्रतिमा बुरी तरह चौंकी थी, बोली___"भला वो ये सब कैसे कर सकता है?"
"क्यों नहीं कर सकता?" अजय सिंह उल्टा प्रतिमा पर ही हवाल लेकर चढ़ बैठा___"तुम्हीं तो कहा करती थी न कि इस सबके पीछे अगर कोई हो सकता है तो वो है विराज। वही है जो हमारा अहित करना चाहता है क्योंकि हमने उसके साथ अत्याचार किया है?"
"हाॅ मगर।" प्रतिमा गड़बड़ा सी गई___"ये सब भी कर सकता है वो ये तो नामुमकिन सी बात है अजय।"
"ये सब उसी ने करवाया है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा___"क्योंकि जिस जगह मुझे रखा गया था वो सब उसी का ज़िक्र कर रहे थे। मैं ये सोच सोच कर आश्चर्यचकित था कि उस नामुराद के ऐसे लोगों से संबंध कैसे हो सकते हैं। आख़िर वो कमीना इतने कम समय में ऐसा कौन सा सूरमा बन गया है जिसके इशारे पर उसका हर काम हो जाए?"
"तुम क्या कह रहे हो अजय मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा।" प्रतिमा ने अपने बाल नोंच लेने वाले अंदाज़ से कहा था।
"कमाल की बात है।" अजय सिंह ने कहा___"अपने आपको दिमाग़ की जादूगरनी समझने वाली को आज मेरी ये बातें समझ में ही नहीं आ रहीं। ख़ैर, बात ये है ये जो कुछ भी हुआ है उसमें सिर्फ और सिर्फ उस गौरी के पिल्ले का ही हाॅथ है। मुझे ये नहीं समझ में आ रहा कि उस कमीने ने आख़िर किस मकसद के तहत मुझे दो दिन के लिए सीबीआई के नकली जाल में फॅसा कर कैद में रखा और फिर आज छोंड़ भी दिया।"
"ये तो सचमुच बड़े आश्चर्य की बात है अजय।" प्रतिमा ने चकित भाव से कहा___"सचमुच ये सोचने वाली बात है कि उसने किस वजह से ऐसा किया होगा? हलाॅकि वो चाहता तो बड़ी आसानी अपना बदला तुम्हारी जान लेकर ले सकता था और तुम यकीनन कुछ नहीं कर सकते थे।
मगर उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया बल्कि उल्टा तुम्हें बिना कोई नुकसान पहुॅचाए छोंड़ भी दिया। ये ऐसी बात है अजय जो आसानी से हजम नहीं हो सकती। हम जिस चीज़ को बेतुकी और ना क़ाबिले ग़ौर बात समझ रहे हैं उसमें कुछ तो पेंच ज़रूर है। बेवजह तो औसने ये सब नहीं किया होगा। ज़रूर ये सब करके उसने अपना कोई अहम कार्य सिद्ध किया होगा। कोई ऐसा कार्य जो फिलहाल हमारी सोच क्या कल्पना से भी कोसों दूर है।"
"यकीनन तुम्हारी बात में सच्चाई है।" अजय सिंह ने कहा___"इस सबसे एक बात ये भी ज़ाहिर होती है कि वो अब भी यहीं है और शायद इस वक्त रितू के साथ ही है।"
"अच्छा ये बताओ।" प्रतिमा ने पहलू बदला___"कि जो सीबीआई के लोग बन कर आए थे वो लोग तुम्हें लेकर कहाॅ गए थे?"
"इस बारे में मुझे कुछ भी नहीं पता चल सका।" अजय सिंह ने हताश भाव से कहा था।
"क्या मतलब??" प्रतिमा पुनः बुरी तरह चौंकी थी।
"उन लोगों ने सब कुछ पहले से प्लान किया हुआ था प्रतिमा।" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली___"जब वो लोग मुझे यहाॅ से अपनी कार में बैठा कर ले जा रहे थे तभी किसी ने पीछे से मुझे बेहोश कर दिया था और फिर जब मेरी ऑख खुली तो मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया कि मैं किस जगह आ गया हूॅ? वहाॅ जिस जगह पर मैं था वहाॅ एक कमरा था जो कि किसी फाइव स्टार होटल के कमरे से हर्गिज़ भी कम न था। कमरे में दूसरा कोई नहीं था। ऐसा नहीं था कि मैं वहाॅ पर कहीं आ जा नहीं सकता था। बल्कि कहीं भी आ जा सकता था मगर उस जगह से बाहर की दुनियाॅ में जाने का जैसे कोई रास्ता ही नहीं था। कमरे से बाहर जहाॅ भी गया हर तरफ ब्लैक कलर की वर्दी में नकाबपोश अपने हाथों में गन लिए तैनात थे। वो किसी से कोई बात नहीं करते थे। जो सीबीआई के ऑफिसर बन कर आए थे उनका कहीं पता ही नहीं था। मैं उन गनधारी नकाबपोशों से चीख चीख कर पूछता रहा कि मुझे यहाॅ किस लिए लाया गया है मगर कोई कुछ बोलता ही नहीं था। उस दिन तो सारा दिन और रात मैं पागलों की तरह ही उन सबके सामने चीखता चिल्लाता रहा। फिर जब मुझे लगा कि यहाॅ पर मेरे चीखने चिल्लाने का कोई असर नहीं होने वाला तो मैं ख़ामोश हो गया। इतना तो मुझे भी पता था कि वजह कोई भी हो वो मेरे सामने ज़रूर आएगी। इस लिए ये सोच कर मैं वापस कमरे में चला गया और अपने वहाॅ होने की वजह जानने का इन्तज़ार करने लगा। वहाॅ पर जब भी मुझे किसी चीज़ की ज़रूरत होती वो मुझे मिल जाती थी। मैं आज़ाद तो था मगर फिर भी कैद ही था वहाॅ। मेरा मोबाइल फोन मेरे पास से गायब था। अतः मैं किसी अपने से कोई काॅटैक्ट भी नहीं कर सकता था।"
"ओह तो फिर आज तुम्हें उन लोगों ने कैसे छोंड़ दिया?" प्रतिमा ने पूछा___"क्या तुम्हें पता चला कि उन लोगों ने तुम्हें क्यों पकड़ा था? और सबसे बड़ी बात ये कि तुम्हें ये कैसे पता चला कि वो सब विराज का किया धरा था?"
"आज ही पता चला।
" अजय सिंह ने कहा___"मैं वहाॅ पर कमरे में रखे अलीशान बेड पर लेटा हुआ था कि तभी कमरे में दो गनधारी नकाबपोश आए और मैने पहली बार उनके मुख से उनकी आवाज़ सुनी। उनमें से एक ने कहा कि मैं बाहर आऊ। मुझसे मिलने उनके कुछ साहब लोग आए हैं। मैं उस गनधारी नकाबपोश की ये बात सुनकर जल्दी से बेड पर उठ बैठा। अड़तालीस घंटे में ये पहला अवसर था जब मुझे किसी से ये जानने का अवसर मिलने वाला था कि मुझे यहाॅ क्यों लाया गया है? अतः मैं उन दोनो गनधारियों के साथ कमरे से बाहर आ गया। बाहर लंबे चौड़े हाल के बीचो बीच एक मध्यम साइज़ की टेबल रखी थी तथा उसके चारो तरफ कुर्सियाॅ रखी हुई थी। मैने टेबल और कुर्सियाॅ उस हाल में पहली बार ही देखा था। टेबल के एक तरफ की चारों कुर्सियों पर एक एक कोटधारी आदमी बैठा था। मैं जब उनके पास पहुॅचा तो उनमें से एक ने मुझे अपने सामने बैठने का इशारा किया। ये वही लोग थे जो मुझे यहाॅ से सीबीआई ऑफिसर बन कर ले गए थे। सच कहूॅ तो उस वक्त उन चाओं को देख कर मुझे बेहद गुस्सा आया मगर मैंने फिर खुद पर बड़ी मुश्किल से काबू किया।
"कहो अजय सिंह।" उन चार में से एक ने बड़ी जानदार मुस्कान के साथ मुझसे कहा___"यहाॅ किसी प्रकार की कोई परेशानी तो नहीं हुई न तुम्हें?"
"मेरी परेशानी की अगर इतनी ही फिक्र होती तुम लोगों को।" मैने आवेशयुक्त भाव से कहा___"तो मुझे इस तरह धोखे से पकड़ कर नहीं लाते यहाॅ।"
"ओह आई सी।" उसने खेद प्रकट करते हुए कहा__"माफ़ करना अजय सिंह। हमें तुम्हारे साथ धोखे के रूप में वो वैसी ज्यादती करनी पड़ी। मगर इसमें भी हमारी कोई ग़लती नहीं थी डियर। दरअसल हमारे विराज सर का ही आदेश था हम तुम्हें इस प्रकार हवेली से गिरफ्तार करके यहाॅ ले आएॅ।"
"वि..विराज..सर???" मैं उसकी ये बात सुन कर एकदम से भौचक्का सा रह गया था।
"अरे तुम हमारे विराज सर को नहीं जानते क्या?" एक अन्य ने मुस्कुराते हुए कहा___"कमाल है अजय सिंह। तुम अपने भतीजे को ही नहीं जातने। ये तो बड़ी हैरत की बात है। जबकि हमारे विराज सर तुमसे इतना स्नेह व लगाव रखते हैं कि वो तुम्हें यहाॅ पर किसी भी तरह की तक़लीफ़ नहीं देना चाहते थे। उनका शख्त आदेश था कि तुम्हें यहाॅ पर किसी भी तरह की कोई परेशानी न होने पाए। तभी तो हमने उनके कहने पर तुम्हारे लिए यहाॅ फाइव स्टार होटल से भी बेहतर सुविधाएॅ मुहैया कराई थी।"
"तो तुम्हारा मतलब है कि ये सब तुमने विराज के आदेश पर किया है?" मैं मन ही मन हैरान था, किन्तु प्रत्यक्ष में कठोर भाव से पूछ रहा था___"मगर क्यों?"
"तुम्हारे इस क्यों का जवाब तो हमारे पास है ही नहीं अजय सिंह।" उस आदमी ने कहा___"हमने तो बस उतना ही किया है जितना कि विराज सर ने हमें करने के लिए कहा था। इसके पीछे उनकी क्या मंशा थी ये तो वहीं बेहतर तरीके से बता सकते हैं तुम्हें।"
"अच्छा।
" मैने कहा___"तो फिर बुलाओ उसे। मैं उससे पूछना चाहता हूॅ कि उसने क्या सोच कर ये सब किया है?"
"उन्हें यहाॅ बुलाने की हिम्मत तो हममें नहीं है।" एक अन्य ने कहा___"हाॅ मगर एक आदेश और आया है उनका हमारे लिए। वो ये कि तुम्हें बाइज्ज़त यहाॅ से आज़ाद कर दिया जाए। इस लिए अब हम वही करने वाले हैं। यानी कि अब तुम्हें आज़ाद कर दिया जाएगा। मगर क्योंकि हम अपना हर काम सीक्रेट तरीके से करते हैं इस लिए तुम्हें पुनः बेहोश करना पड़ेगा हमें।"
मैं उसकी ये बात सुनकर बुरी तरह हैरान रह गया। तभी किसी ने पीछे से मेरी नाॅक में कुछ लगा दिया। जैसे ही मैने नाॅक से साॅस ली उसके कुछ ही पलों बाद मैं बेहोशी के समंदर में डूबता चला गया। जब मेरी ऑख खुली तो मैं अब किसी दूसरी जगह पर खुद को मौजूद पाया। मेरे आस पास बड़े बड़े पेड़ पौधे लगे हुए थे। मैं ये देख कर पहले तो चौंका फिर उठ कर आस पास का जायजा लेने लगा। मैं ये देख कर उछल पड़ा कि मैं किसी जंगल के हिस्से पर पड़ा था। बाएॅ तरफ लगभग पचास या साठ गज की दूरी पर ही एक सड़क नज़र आ रही थी।
अस्त ब्यस्त हालत में मैं कुछ देर वहीं पर बैठा अपने साथ घटी पिछली सभी बातों के बारे में सोचता रहा। उसके बाद मैं किसी तरह उठा और कुछ दूरी पर नज़र आ रही सड़क की तरफ चल दिया। मैं ये समझ चुका था कि उन लोगों ने मुझे आज़ाद कर दिया था। मुझे बेहोश इस लिए किया गया था ताकि मैं उस जगह के बारे में कतई न जान सकूॅ कि उन लोगों ने मुझे कहाॅ पर रखा था। मैं ये भी समझ चुका था कि मैं चाह कर भी अब उन लोगों तक नहीं पहुॅच सकता जो लोग नकली सीबीआई के ऑफिसर बन कर हवेली से मुझे गिरफ्तार करके ले गए थे।
सड़क पर आकर मैं किनारे पर ही खड़ा हो गया और सड़क के दोनो तरफ देखने लगा। मुझा अपने मोबाइल का ख़याल आया तो अनायास ही मेरे दोनो हाथ मेरी पैंट के दोनो पाॅकेट पर रेंग गए। मैं ये जान कर चौंका तथा हैरान हुआ कि मोबाइल मेरी बाई पाॅकेट में मौजूद है। मैने जल्दी से उसे निकाला और स्विच ऑन किया। मगर मैं ये देख कर भौचक्का रह गया कि मोबाईल में मौजूद दोनो सिम कार्ड गायब थे। उसमे नेटवर्क होने का सवाल ही नहीं था। मैने फोन में काॅटैक्ट लिस्ट देखा तो मेरे होश उड़ गए। क्योंकि उसमे से सारे नंबर टिलीट कर दिये गए थे। कहने का मतलब ये कि मैं मौजूदा हालत में किसी को ना तो फोन कर सकता था और ना ही मेरे मोबाइल फोन पर किसी का फोन आ सकता था। ये देख कर मेरा खून खौल गया। उन लोगों पर मुझे भयानक गुस्सा आ गया। ऊपर से साले ऐसी जगह मुझे फेंक दिया था जहाॅ से किसी वाहन का आना जाना भी लगभग न के बराबर था।
सड़क पर मैं घंटों खड़ा रहा किसी वाहन के इन्तज़ार में मगर कोई भी वाहन आता जाता नज़र न आया। प्रतिपल उस हालत में मेरे अंदर गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था।
आख़िर डेढ़ घंटे इन्तज़ार करने के बाद एक टैक्सी आती हुई नज़र आई। उसे देख कर मुझे थोड़ी राहत तो हुई मगर अगले ही पल ये सोच कर मैं मायूस हो गया कि इस वक्त किसी वाहन में जाने के लिए मेरे पास फूटी कौड़ी भी नहीं है। इसके बावजूद मैने अपनी सभी पाॅकेट पर हाॅथ फेरा और अगले ही पल मैं चौंका। पैन्ट की पिछली जेब में मुझे कुछ महसूस हुआ। मैने फौरन ही उस चीज़ को निकाला तो मुझे एक पाॅच सौ का नोट नज़र आया।
पाॅच सौ का नोट उस वक्त मैं इस तरह देख रहा था जैसे मैने कभी उसे देखा ही न हो और सोचने लखा था कि इस प्रकार का ये काग़ज आख़िर है क्या चीज़? ख़ैर, वो टैक्सी जब मेरे क़रीब पहुॅचने को हुई तो मैने उसे रुकने के लिए हाॅथ से इशारा किया। मेरे इशारे पर वो टैक्सी मेरे पास पहुॅच कर रुक गई। मैने देखा कि उसमें जो ड्राइवर था वो कोई पैंतीस के आस पास का काला सा आदमी था। टैक्सी को रुकते ही उसने विंडो से अपना सिर बाहर की तरफ निकाल कर मुझसे पूछा कहाॅ जाना है? मैने उसे पता बताया तो उसने अंदर बैठने का इशारा किया। लेकिन उससे पहले ये बताना न भूला था कि भाड़ा पाॅच सौ रुपये लगेगा। मैं उसके भाड़े का सुन कर मन ही मन चौंका। मगर बोला यही कि ठीक है भाई ले लेना मगर मुझे बताए गए पते पर पहुॅचा दो। बस ये कहानी थी।"
"बड़ी हैरत व बड़ी अजीब कहानी है।" प्रतिमा ने सोचने वाले भाव से कहा___"इसका मतलब उन लोगों ने तुमें ऐसी जगह छोंड़ा था जहाॅ से अगर कोई वाहन मिलता भी तो वो तुमसे भाड़े के रूप पाॅच सौ रुपये ही माॅगता और इसी लिए उन लोगों ने तुम्हारी जेब में पाॅच सौ रुपये डाल दिये थे ताकि तुम आराम से यहाॅ तक पहुॅच सको। ये तो कमाल ही हो गया अजय।"
"कमाल तो हो ही गया।" अजय सिंह ने सोचने वाले अंदाज़ में कहा___"मगर मुझे ऐसा लगता है जैसे वो टैक्सी वाला भी साला उन्हीं का आदमी था। क्योंकि जिस रास्ते पर वो मिला था उस रास्ते पर डेढ़ घंटे इन्तज़ार करने के बाद ही उस टैक्सी के रूप में वाहन मिला था। टैक्सी पर कोई दूसरी सवारी नहीं थी बल्कि ड्राइवर के अलावा सारी टैक्सी खाली ही थी।"
"बिलकुल ऐसा हो सकता है अजय।" प्रतिमा के मस्तिष्क में जैसे झनाका सा हुआ था, बोली___"यकीनन वो टैक्सी और वो टैक्सी ड्राइवर उन लोगों का ही आदमी था। अगर ऐसा है तो इसका मतलब ये भी हुआ कि पाॅच सौ रुपया जहाॅ से आया था तुम्हारे पास वो वापस वहीं लौट भी गया। क्या कमाल का गेम खेला है उन लोगों ने।"
"उन लोगों ने नहीं प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा___"बल्कि उस हरामज़ादे विराज ने। मुझे तो अब तक यकीन नहीं हो रहा कि वो सब विराज के आदमी हैं और विराज के ही हुकुम पर उन लोगों ने ये संगीन कारनामा अंजाम दिया था। तुम ही बताओ प्रतिमा क्या तुम सोच सकती हो कि कल का छोकरा कहीं पर बैठे बैठे ऐसा कोई कारनामा कर सकता है?"
"बेशक नहीं सोच सकती अजय।
" प्रतिमा ने गंभीरता से कहा___"मगर शुरू से लेकर अब तक की उसकी सारी गतिविधियाॅ ऐसी रही हैं कि अब अगर वो कुछ भी अविश्वसनीय करे तो सोचा जा सकता है। इससे एक बात ये भी साबित होती है कि वो कोई मामूली चीज़ नहीं रह गया है। या तो उसे किसी पहुॅचे हुए ब्यक्ति का आशीर्वाद प्राप्त है या फिर सच में वो इतना क़ाबिल हो गया है कि वो आज के समय में हर चीज़ अफोर्ड कर सकता है।"
"यही तो हजम नहीं हो रहा प्रतिमा।" अजय ने झुंझलाहट के मारे कहा___"इतने कम समय में आख़िर उसने ऐसा क्या पा लिया है जिसके बलबूते पर वो कुछ भी कर सकने की क्षमता रखता है? आज के समय में सच्चाई और नेकी कक राह पर चलते हुए इतनी बड़ी चीज़ अथवा कामयाबी नहीं पाई जा सकती। ज़रूर वो कोई ग़लत काम कर रहा है। हाॅ प्रतिमा, ग़लत कामों के द्वारा ही कम समय में बड़ी बड़ी चीज़ें हाॅसिल होती हैं, फिर भले ही चाहे उन बड़ी बड़ी चीज़ों की ऊम्र छोटी ही क्यों न हो।"
"यकीनन अजय।" प्रतिमा ने कहा___"ऐसा ही लगता है। मगर सबसे बड़े सवाल का जवाब तो अभी तक नहीं मिला न।"
"कौन सा सवाल?" अजय सिंह चौंका।
"यही कि उसने तुम्हारे साथ।" प्रतिमा ने कहा___"मेरा मतलब है कि उसने तुम्हें नकली सीबीआई वालों के द्वारा गिरफ्तार करवा के दो दिन तक किसी गुप्त कैद में रखा तो इसमें उसका क्या मकसद छिपा था? आख़िर उसने तुम्हें कैद करवा के अपना कौन सा उल्लू सीधा किया हो सकता है? हमारे लिए ये जानना बेहद ज़रूरी है अजय। आख़िर पता तो चलना ही चाहिए इस सबका।"
"पता चलना तो चाहिए।" अजय सिंह ने कहा___"मगर कैसे पता चलेगा? हमारे पास ऐसा कोई छोटा से भी छोटा सबूत या क्लू नहीं है जिसके आधार पर हम कुछ जान सकें।"
"एक सवाल और भी है अजय।" प्रतिमा ने कुछ सोचते हुए कहा___"जो कि कुछ दिनों से मेरे दिमाग़ में चुभ सा रहा है।"
"ऐसा कौन सा सवाल है भला?" अजय सिंह के माथे पर शिकन उभरी।
"यही कि हमारी बेटी रितू।" प्रतिमा ने कहा___"जब से हमसे खिलाफ़ हुई है तब से वो घर वापस नहीं आई। तो सवाल ये है कि वो रहती कहाॅ है? मुझे लगता है कोई ऐसी जगह ज़रूर है जहाॅ पर वो नैना और विराज के साथ रह रही है। ऐसी कौन सी जगह हो सकती है?"
प्रतिमा की इस बात से अजय सिंह उसे इस तरह देखता रह गया था मानो प्रतिमा के सिर पर अचानक ही दिल्ली का लाल किला आकर खड़ा हो गया हो। फिर जैसा उसे होश आया।
"सवाल तो यकीनन वजनदार है।" फिर अजय सिंह ने कहा___"मगर संभव है कि वो यहीं कहीं आस पास ही किसी के घर में कमरा किराये पर लिया हो और हमारे पास रह कर ही वो हमारी हर गतिविधी पर बारीकी से नज़र रख रही हो।"
"हो सकता है।" प्रतिमा ने कहा___"मगर हमारे इतने क़रीब रहने की बेवकूफी वो हर्गिज़ भी नहीं कर सकती जबकि उसे बखूबी अंदाज़ा हो कि पकड़े जाने पर उसके साथ साथ नैना और विराज का क्या हस्र हो सकता है।
इस लिए इस गाॅव में वो किसी के घर में पनाह नहीं ले सकती।"
"इस गाॅव में न सही।" अजय सिंह बोला___"किसी ऐसे गाॅव में तो पनाह ले ही सकती है जो हमारे इस हल्दीपुर गाॅव के करीब भी हो और वो बड़ी आसानी से हमारी हर मूवमेन्ट को कवरप कर सके।"
"हाॅ ये हो सकता है।" प्रतिमा ने कहा___"किसी दूसरे गाॅव में वो यकीनन रह रही है और हम पर बारीकी से नज़र रखे हुए है। ख़ैर छोंड़ो ये सब बातें, मैं ये कह रही हूॅ कि आज तुम्हारे ससुर जी आ रहे हैं।"
"क क्या???" अजय सिंह उरी तरह चौंका___"स ससुर जी? मतलब कि तुम्हारे पिता जगमोहन सिंह जी??"
"हाॅ डियर।" प्रतिमा ने सहसा खुश होते हुए कहा___"आज वर्षों बाद मैं अपने पिता जी से मिलूॅगी। मगर अजय मुझे अंदर से ऐसा लग रहा है जैसे मैं उनके सामने जा ही नहीं पाऊॅगी। तुम तो जानते हो कि मैने तुमसे शादी उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ जाकर तथा उनसे हर रिश्ता तोड़ कर की थी। इतने वर्षों के बीच कभी भी मैने उनसे न मिलने की कोशिश की और ना ही कभी उनसे फोन पर बात करने की। ये एक अपराध बोझ है अजय जिसके चलते मुझमें हिम्मत नहीं है कि मैं अपने पिता का सामना कर सकूॅ।"
"पर मैं इस बात से हैरान हूॅ।" अजय सिंह ने चकित भाव से कहा___"कि इतने वर्षों बाद उन्हें अपनी बेटी की याद कैसे आई और यहाॅ आने का विचार कैसे आया उनके मन में?"
"ये सब मेरी वजह से ही हुआ है अजय।" प्रतिमा ने कहा___"दरअसल जब तुम्हें सीबीआई के वो लोग गिरफ्तार करके ले गए थे तब मैं बहुत परेशान व घबरा गई थी। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि कैसे मैं तुम्हें सीबीआई की कैद से आज़ाद कराऊॅ? तब पहली बार मुझे अपने पिता का ख़याल आया। हाॅ अजय, तुम तो जातने हो कि मेरे पिता जी बहुत बड़े वकील हैं। कैसा भी केस हो उनके अंडर में आने के बाद उनका मुवक्किल बाइज्ज़त बरी ही होता है। इस लिए मैने सोचा कि तुम्हें कानून की उस गिरफ्त से छुड़ाने के लिए मुझे अपने पिता से ही मदद लेनी चाहिए। मगर चूॅकि मैने उनसे अपने हारे संबंध वर्षों पहले ही तोड़ लिये इस लिए हिम्मत नहीं हो रही थी उनसे बात करने की।"
"ओह।" अजय सिंह हैरत से बोला___"फिर क्या हुआ?"
अजय सिंह के पूछने पर प्रतिमा ने सारा किस्सा बता दिया उसे। ये भी कि कैसे उसके चक्कर खा कर गिरने पर शिवा ने रिऐक्ट किया जिसके तहत उसके पिता जी भी घबरा गए और फिर उन्होंने तुरंत यहाॅ आने के लिए कहा। उनके पूछने पर ही शिवा ने उन्हें यहाॅ का पता भी बताया था। सारी बातें सुन कर अजय सिंह अजीब सी हालत में सोफे पर बैठा रह गया।
"ये तुमने अच्छा नहीं किया प्रतिमा।" फिर अजय सिंह मानो गंभीरता की प्रतिमूर्ति बना बोला___"मैं इस बात से दुखी नहीं हुआ हूॅ कि मेरे सुसर और तुम्हारे यहाॅ आ रहे हैं बल्कि दुखी इस बात पर हुआ हूॅ कि ऐसे हालात में उनका आगमन हो रहा है। तुमें तो सब पता ही है डियर हमारे हालातों के बारे में।
तुम्हारे पिता एक तेज़ तर्रार व क़ाबिल वकील हैं तथा उनका दिमाग़ तेज़ गति से काम करता है। इस लिए अगर इस हालातों के संबंध में कोई एक बात शुरू हुई तो समझ लो कि फिर उस बात से और भी बहुत सी बातें शुरू हो जाएॅगी। उस सूरत में हमारी हालत और भी ख़राब हो सकती है। हम भला ये कैसे चाह सकते हैं कि हमारी असलियत उनके सामने फ़ाश हो जाए?"
"तुम सच कह रहे हो अजय।" प्रतिमा को भी जैसे वस्तु- स्थिति का एहसास हुआ___"इस बारे में तो मैने सोचा ही नहीं था। सोचने का ख़याल ही नहीं आया अजय। हालात ही ऐसे थे कि मुझे मजबूर हो कर अपने पिता डी से बात करनी पड़ी और उन्होंने यहाॅ आने का भी कह दिया। दूसरी बात मुझे तो ये ख्वाब में भी उम्मीद नहीं थी कि तुम आज वापस इस तरह आ जाओगे। वरना मैं अपने पिता को फोन ही नहीं करती।"
"इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है डियर।" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली___"तुमने जो कुछ भी किया उसमें सिर्फ तुमहारी अपने पति के प्रति चिंता व फिक्र थी। ख़ैर अब जो हो गया सो हो गया मगर अब हमें बड़ी ही होशियारी और सतर्कता से काम लेना होगा। तुम उन्हें ये नहीं बताओगी कि कल तुमने उन्हें किस वजह हे फोन किया था बल्कि यही कहोगी कि तुम्हें उनकी बहुत याद आ रही थी। दूसरी बात शिवा को भी समझा दो कि वो उनके सामने ऐसी कोई भी बात न करे जिससे किसी भी तरह की बात खुलने का चाॅस बन जाए।"
"हमारी दूसरी बेटी नीलम भी तो आज आ गई है मुम्बई से।" प्रतिमा ने कहा___"इतना ही नहीं उसके साथ में मेरी बहन की बेटी सोनम भी है।"
"क्या????" अजय सिंह चौंका।
"हाॅ अजय।" प्रतिमा ने बेचैनी से कहा___"वो दोनो ऊपर कमरे में इस वक्त सो रही हैं।"
"अरे तो तुम उनके पास जाओ।" अजय सिंह एकदम से फिक्रमंद हो उठा था, बोला___"और उन दोनो को अच्छी तरह समझा दो कि वो दोनो अपने नाना जी के सामने हालातों के संबंध में किसी भी तरह की कोई बात नहीं करेंगी।"
"ठीक है।" प्रतिमा ने सोफे से उठते हुए कहा___"मैं अभी जाती हूॅ उनके पास और सब कुछ समझाती हूॅ उन्हें।"
ये कह कर प्रतिमा तेज़ तेज़ क़दमों के साथ ऊपर के कमरे में जाने के लिए सीढ़ियों की तरफ बढ़ गई। जबकि उसके जाने के बाद अजय सिंह एक बाथ पुनः असहाय सा सोफे की पिछली पुश्त से पीठ टिका कर पसर गया था। चेहरे पर चिंता व परेशानी के भाव गर्दिश करते हुए नज़र आ रहे थे।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दोस्तो, आप सबके सामने अपडेट हाज़िर है। आप सबकी प्रतिक्रिया और आपके शानदार रिव्यू का इन्तज़ार रहेगा।
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट........《 53 》
अब तक,,,,,,,,
"इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है डियर।" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली___"तुमने जो कुछ भी किया उसमें सिर्फ तुमहारी अपने पति के प्रति चिंता व फिक्र थी। ख़ैर अब जो हो गया सो हो गया मगर अब हमें बड़ी ही होशियारी और सतर्कता से काम लेना होगा।
तुम उन्हें ये नहीं बताओगी कि कल तुमने उन्हें किस वजह हे फोन किया था बल्कि यही कहोगी कि तुम्हें उनकी बहुत याद आ रही थी। दूसरी बात शिवा को भी समझा दो कि वो उनके सामने ऐसी कोई भी बात न करे जिससे किसी भी तरह की बात खुलने का चाॅस बन जाए।"
"हमारी दूसरी बेटी नीलम भी तो आज आ गई है मुम्बई से।" प्रतिमा ने कहा___"इतना ही नहीं उसके साथ में मेरी बहन की बेटी सोनम भी है।"
"क्या????" अजय सिंह चौंका।
"हाॅ अजय।" प्रतिमा ने बेचैनी से कहा___"वो दोनो ऊपर कमरे में इस वक्त सो रही हैं।"
"अरे तो तुम उनके पास जाओ।" अजय सिंह एकदम से फिक्रमंद हो उठा था, बोला___"और उन दोनो को अच्छी तरह समझा दो कि वो दोनो अपने नाना जी के सामने हालातों के संबंध में किसी भी तरह की कोई बात नहीं करेंगी।"
"ठीक है।" प्रतिमा ने सोफे से उठते हुए कहा___"मैं अभी जाती हूॅ उनके पास और सब कुछ समझाती हूॅ उन्हें।"
ये कह कर प्रतिमा तेज़ तेज़ क़दमों के साथ ऊपर के कमरे में जाने के लिए सीढ़ियों की तरफ बढ़ गई। जबकि उसके जाने के बाद अजय सिंह एक बाथ पुनः असहाय सा सोफे की पिछली पुश्त से पीठ टिका कर पसर गया था। चेहरे पर चिंता व परेशानी के भाव गर्दिश करते हुए नज़र आ रहे थे।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,,
उधर पुलिस वालों की कार से मैं और आदित्य भी सुरक्षित रितू दीदी के पास फार्महाउस पर पहुॅच गए थे। सारे रास्ते मैं सारी बातों और सारे हालातों के बारे में बारीकी से मनन करता आया था। इस जंग में मुझे दो ताकतों से भिड़ना था। एक तो अपने ताऊ अजय सिंह से और दूसरा मंत्री से। रितू दीदी ने मुझे मंत्री के संबंध में सारी बातें बता दी थी। मैं जान कर खुश था कि रितू दीदी के पास मंत्री के खिलाफ़ ऐसे सबूत हैं कि वो जब चाहे उस मंत्री और उसके साथियों को बीच चौराहे पर नंगा दौड़ने पर बिवश कर दें। इधर वही हाल मेरा भी था। मेरे पास भी अजय सिंह के खिलाफ़ ऐसे सबूत थे कि उन सबूतों के आधार पर अजय सिंह पलक झपकते ही कानून की ऐसी गिरफ्त में पहुॅच जाएगा जहाॅ से बच कर निकलना उसी तरह नामुमकिन था जैसे किसी नदी के दो किनारोउअं आपस मिलना नामुमकिन ही नहीं असंभव होता है।
मेरे मन में कभी कभी ये ख़याल भी आता था कि इस खेल को एक पल में खत्म कर दूॅ। यानी ग़ैर कानूनी धंधा करने और अवैध गैर कानूनी ऐसा पदार्थ रखने के जुर्म में अजय सिंह ऊम्र भर का लिए जेल की सलाखों के पीछे चला जाए जो पदार्थ किसी भी इंसान की ज़िंदगी खत्म करने के लिए काफी थे। मगर मैं ऐसा करना नहीं चाहता था बल्कि मैं तो अजय सिंह को खुद अपने हाथों से ऐसी सज़ा देना चाहता था कि वो मौत के लिए गिड़गिड़ाए मगर मौत उसे नसीब न हो सके।
मुझे इस बात का भी एहसास था कि आज भले ही मंत्री सच्चाई को पूरी तरह न जानता हो मगर देर सवेर उसे सब कुछ पता चल ही जाएगा।
वो चुप नहीं बैठेगा बल्कि कुछ तो ऐसा करेगा ही कि उसके गले में फॅसी हुई हड्डी निकल सके और उसके बच्चे सही सलामत उसे वापस मिल सकें। मुझे एहसास था कि ये दोनो ही ताकतें बहुत ही खतरनाक साबित हो सकती है हमारे लिए। हम अभी तक इसी लिए सेफ रह सके थे क्योंकि हमने खुल कर तथा सामने आकर कोई काम नहीं किया था। बल्कि हर काम दोनो ताकतों की ग़ैर जानकारी में एवं छुप कर किया था। मगर हालात ज्यादा दिन तक ऐसे ही नहीं बने रह सकते थे। इस लिए इन सब बातों पर विचार करके मुझे सबसे पहले अपनी सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम करना था।
फार्महाउस पर हमें छोंड़ कर वो पुलिस के आदमी वापस चले गए थे। रितू दीदी मुझे वापस आया देख कर बेहद खुश हो गई थी। आदित्य तो सीधा कमरे की तरफ चला गया था जबकि मैं और कुछ देर वहीं ड्राइंगरूम में बैठा सबसे बातें करता रहा। नैना बुआ ने मुझसे मुम्बई में सबका हाल चाल पूछा। उसके बाद मैं भी उठ कर कमरे की तरफ बढ़ गया।
कमरे के अटैच बाथरूम में मैं मस्त ठंडे पानी से नहाया तो तबीयत हरी हो गई। नहा कर मैं टावेल लपेटे ही बाथरूम से कमरे में आ गया। जैसे ही मैं कमरे में आया तो बेड पर आराम से बैठी रितू दीदी पर मेरी नज़र पड़ी तो मैं चौंका। दरअसल मैं इस वक्त सिर्फ एक टावेल में ही था। बाॅकी ऊपर का समूचा जिस्म नंगा ही था मेरा। रितू दीदी के सामने इस तरह आ जाने से मुझे शर्म सी महसूस हुई।
"ओहो क्या बात है राज।" सहसा रितू दीदी की चहकती हुई आवाज़ मेरे कानों से टकराई___"क्या बाॅडी शाॅडी बना रखी है तुमने। ओहो सिक्स पैक भी है। पक्का जिम करते होगे तुम, है न?"
"हाॅ थोड़ा बहुत करता हूॅ दीदी।" मैने शर्माते हुए कहा।
"अरे तुम शर्मा क्यों रहे हो राज?" रितू दीदी का चौंका हुआ स्वर___"भला मुझसे किस बात की शरम भाई? मैं तो तेरी बहन हूॅ कोई ग़ैर लड़की नहीं जिससे तू शरमाए।"
"पर दीदी।" मैने असहज भाव से कहा___"मैं कभी आपके सामने इस हालत में नहीं आया न। इस लिए मुझे थोड़ी शरम आ रही है।"
मेरी ये बात सुन कर रितू दीदी बेड से उतर कर मेरे क़रीब आ गई और फिर मेरे चेहरे को अपनी हॅथेलियों के बीच लेते हुए कहा___"ओए ये क्या बात हुई भला? तू मेरा सबसे अच्छा और सबसे हैण्डसम भाई है। तुझे मुझसे किसी भी तरह से शरमाने की या झिझकने की ज़रूरत नहीं है। तुझे पता है राज, अब तक मैं ऐसे रिश्तों के बीच थी जो कहने को तो मेरे अपने थे मगर उन सभी के अंदर पाप और गंदगी भरी हुई थी। ऐसे लोगों से मेरा कोई संबंध नहीं है अब। दुनियाॅ में मेरा अगर कोई अपना है तो वो है तू। मेरी ज़िंदगी का अब एक ही मकसद है भाई और वो है तेरे साथ ग़लत करने वालों सर्वनाश करना और तुझे संसार की हर खुशी देना। मेरा दिल करता है कि मैं तुझ पर कुर्बान हो जाऊॅ मेरे भाई, फना हो जाऊॅ तुझ पर।"
"मुझे पता है दीदी।
" मैने सहसा मुस्कुरा कर कहा___"कि आप मुझसे बहुत प्यार करती हैं। इसका सबसे बड़ा सबूत यही है कि आज आप अपने ही माता पिता के खिलाफ़ हो गई हैं और अपने माता पिता के सबसे बड़े दुश्मन का साथ दे रही हैं। मुझे इस बात की खुशी नहीं है कि आपने मेरे लिए अपने माता पिता से बगावत की है बल्कि इस बात की खुशी है कि मैं जिस रितू दीदी से बात करने के लिए अब तक तरस रहा था वो आज मेरे पास हैं।"
"काश ये सब मैं पहले ही सोच लेती राज।" रितू दीदी एकदम से दुखी होकर मुझसे लिपट गईं। फिर भारी स्वर में बोलीं___"तो इतने सालों तक मैं अपने भाई से दूर न रहती और ना ही ऐसे हालात पैदा होते।"
"हालात तो तब भी ऐसे ही पैदा होते दीदी।" मैने कहा___"क्योंकि इंसानों की फितरत कभी नहीं बदलती। वो अपनी फितरत से मजबूर होकर पहले भी वही करता जो आज कर रहा है।"
"माना कि मेरे पिता अपनी फितरत के चलते वही सब करते जो आज कर रहे हैं।" रितू दीदी ने कहा___"मगर मैं तेरी बात कर रही हूॅ राज। तू मुझे पहले ही तो मिल जाता न? मेरी वजह से तेरे दिल को इतनी तक़लीफ तो न होती जितनी अब तक हुई थी।"
"कोई बात नहीं दीदी।" मैने प्यार से कहा___"जो गुज़र गया उसे भूल जाइये और आज की बात करिये तथा आज के माहौल में खुश रहिए।"
"तू साथ है तो अब मैं खुश ही रहूॅगी राज।" रितू दीदी ने मेरी ऑखों में देखते हुए कहा___"तुझे पता है राज, इसके पहले मैं कभी किसी लड़के के क़रीब नहीं गई। पता नहीं क्यों पर मुझे हर लड़के से एक नफ़रत सी थी। आज के समय में हर लड़का लड़की एक दूसरे के जाने कितने क़रीब आ जाते हैं मगर मुझे इन सब बातों से बेहद चिढ़ थी। मगर विधी से मिलने के बाद और उसकी प्रेम कहानी सुनने के बाद मुझे एहसास हुआ कि आज भी ऐसे लोग हैं जो पाक़ मोहब्बत करते हैं और एक मिसाल बन जाते हैं। मैं बहुत खुश थी मेरे भाई कि ऐसा इंसान मेरा अपना भाई ही है और फिर मुझे एहसास हुआ कि कितनी ग़लत थी मैं जो तुझे बचपन से ही ग़लत समझती आ रही थी। बस उसके बाद जब सबकुछ पता चला तो तेरे लिए मेरे हृदय में और भी जगह हो गई भाई। मेरी अंतर्आत्मा से बस एक ही आवाज़ आती है और वो ये कि अब तुझसे ही मेरी हर खुशी है और दुख भी।"
"जो होता है सब अच्छे के लिए ही होता है दीदी।" मैने मुस्कुराते हुए कहा___"आज मेरी सबसे अच्छी दीदी मेरे पास है और मुझे इतना प्यार करती है। मैं बता नहीं सकता कि इस बात से मैं कितना खुश हूॅ दीदी। मेरा तो मुम्बई जाने का बिलकुल भी मन नहीं था। मगर सबको लेकर जाना भी ज़रूरी था। लेकिन वहाॅ से वापस आपके पास आ जाने के लिए मैं उतावला हो रहा था। मुझे लग रहा था कि मैं पलक झपकते ही आपके पास पहुॅच जाऊॅ।"
"ऐसी बातें मत कर राज।" रितू दीदी की आवाज़ काॅप सी गई। वो मुझसे कस के लिपट गईं और फिर बोली___"तुझे नहीं पता कि तेरी ऐसी बातों से मैं कितनी कमज़ोर हो सकती हूॅ।
कहीं ऐसा न हो जाए कि मैं तेरे बिना एक पल भी रह न पाऊॅ।"
"तो क्या हुआ दीदी?" मैंने कहा___"सब कुछ ठीक होने के बाद हम सब एक साथ ही तो रहेंगे। फिर आप ऐसा क्यों कह रही हैं?"
"तू नहीं समझेगा राज।" रितू दीदी ने सहसा बेचैनी से पहलू बदला___"ख़ैर छोंड़ ये सब। मैं ये कह रही हूॅ कि विधी के माता पिता भी यहाॅ आ गए हैं। उनसे भी मिल लेना तुम।"
"मैं आपसे एक ज़रूरी बात जानना चाहता हूॅ।" मैने दीदी से कहा___"और वो ये कि ये फार्महाउस आपके पास कैसे है?"
"ये फार्महाउस डैड ने मेरे नाम बहुत पहले ही कर दिया था।" रितू दीदी ने कहा___"ऐसे ही दो फार्महाउस और हैं। एक नीलम के लिए और दूसरा शिवा के लिए। पर तू ये क्यों पूछ रहा है राज?"
"इसका मतलब।" राज को झटका सा लगा था___"इस फार्महाउस के बारे में बड़े पापा जानते हैं। जाने भी क्यों न आख़िर दिया तो उन्होंने ही है आपको। इस लिए अब आप ये भी जान लीजिए कि यहाॅ पर रहना भी हमारे लिए खतरे से खाली नहीं है।"
"क्या????" रितू दीदी भी बुरी तरह हिल गईं, कदाचित उन्हें भी अब तक इस बात का एहसास नहीं था। किन्तु अब हो गया था___"ये तो यकीनन सच कहा तूने। ओह माई गाड मुझे इस बारे में पहले ही सोच लेना चाहिए था। सचमुच राज यहाॅ हममें से कोई भी सुरक्षित नहीं है। ये तो अच्छा हुआ कि अभी तक डैड का ध्यान फार्महाउस की तरफ नहीं गया है। मगर इसमें अब ज़रा भी शक नहीं कि बहुत जल्द उन्हें इस फार्महाउस का ख़याल आ सकता है। वो सोच सकते हैं कि मैं और तुम यहाॅ छुपे हो सकते हैं। अतः वो ज़रूर इसका पता लगाएॅगे। अब क्या होगा राज?"
"फिक्र मत कीजिए।" मैने कहा___"सारे रास्ते मैं यही सोच रहा था और फिर मैने इसका बंदोबस्त भी किया है।"
"बंदोबस्त??" रितू दीदी हैरान।
"हाॅ दीदी।" मैने कहा___"इसका तो मुझे भी अंदाज़ा था कि ये फार्महाउस आपके पास बड़े पापा की वजह से ही आया हो सकता है। इस लिए इसका ख़याल देर सवेर उन्हें आ ही जाएगा। अतः मैने फौरन ही अपने एक दोस्त को फोन किया। मेरा वो दोस्त आजकल इंदौर में है अपने माता पिता व भाई बहन के साथ। घर से और दौलत से भी सम्पन्न है वो। उसके पापा इन्कमटैक्स के बड़े ऑफिसर हैं तथा उसका बड़ा भाई पुलिस में एसीपी है। गुनगुन से क़रीब दस किलोमीटर पहले ही उसका गाॅव है रेवती। जहाॅ पर उसका बड़ा भारी पुश्तैनी घर है। किन्तु उस घर में कोई नहीं रहता है। घर की देख रेख के लिए एक दो केयरटेकर रखे हुए हैं उसके डैड ने। मैने अपने उसी दोस्त से बात की थी तथा उसको सारी बातें भी बताई और कहा कि कुछ समय के लिए मुझे उसके घर की ज़रूरत है रहने के लिए। मेरी सारी बातें सुनकर उसने अपनी माॅम से बात किया। उसकी माॅम मुझे अपने बेटे की तरह ही चाहती थी।
शेखर ने जब अपनी माॅ से मेरी सारी कहानी बताई तो वो मेरे लिए चिंतित हो गईं और फौरन ही उन्होंने कह दिया कि मुझे आज ही उनके घर में शिफ्ट हो जाना चाहिए। उन्होंने घर के केयरटेकर को फोन करके मेरे बारे में बता दिया है। एक काम उन्होंने ये भी किया कि अपनी बहन को जो कि रेवती में ही रहती हैं भी सूचित कर दिया है। उनसे कहा कि वो अपने पति को किसी ऐसे वाहन के साथ मेरे पास भेज दें जिसमें हम सब और हमारा सामान आराम से आ सके।"
"ये तो बहुत ही अच्छी बात है राज।" रितू दीदी ने खुश होकर मेरे गाल पर चुम्बन जड़ दिया___"तूने सचमुच बहुत ही कमाल का और होशियारी का काम किया है। मगर एक समस्या भी है।"
"कैसी समस्या दीदी?" मैं चकराया।
"यही कि हम सब और हमारा सामान वगैरह तो यहाॅ से वहाॅ शिफ्ट हो जाएगा।" रितू दीदी ने कहा___"मगर हम तहखाने में मौजूद उस मंत्री के पिल्लों को कैसे ले जाएॅगे और वहाॅ उन्हें कैसे रखेंगे? यहाॅ तो तहखाना था जहाॅ पर मैने उन सबको कैद किया हुआ है जबकि वहाॅ पर ऐसा कोई तहखाना नहीं हो सकता।"
"कोई ज़रूरी तो नहीं कि उन सबको तहखाने में ही रखा जाए।" मैने कहा___"हम उन लोगों को किसी कमरे में भी वैसे ही बाध कर रख सकते हैं। बस इस बात का ख़याल रखना होगा कि वो चीख चिल्ला न सकें। वरना उनकी आवाज़ से बाहरी लोगों को पता भी लग सकता है।"
"हाॅ ये भी सही है।" रितू दीदी ने कहा___"और हाॅ हरिया काका और शंकर काका भी हमारे साथ ही जाएॅगे। वो बेचारे मुझे अपनी बेटी की तरह ही चाहते हैं। मेरे लिए वो कुछ भी कर सकते हैं। वो दोनो अच्छे इंसान है राज। यहाॅ पर उन्हें अकेले छोंड़ चले जाना कतई उचित नहीं है।"
"ठीक है दीदी।" मैने कहा___"हम उन्हें भी साथ ले चलेंगे। मगर यहाॅ से चलने की फौरन तैयारी कीजिए। मेरे दोस्त शेखर का कभी भी फोन आ सकता है ये बताने के लिए कि उसके मौसा वाहन लेकर हमारे पास पहुॅचने ही वाले हैं।"
"क्या हमें आज ही यहाॅ से निकलना होगा?" रितू दीदी ने हैरानी से कहा था।
"बिलकुल दीदी।" मैने कहा___"हम एक पल की भी देरी नहीं कर सकते। बड़े पापा का कुछ पता नहीं कि उनके मन में किस पल इस फार्महाउस का ख़याल आ जाए और वो फौरन हम सबका पता लगाने के लिए यहाॅ आ धमकें। इस लिए बेहतर यही है कि उनके यहाॅ धमकने से पहले ही हम लोग यहाॅ से कूच कर जाएॅ।"
"सही कह रहा है तू।" रितू दीदी ने हालात की गंभीरता को समझते हुए कहा___"वक्त और हालात का कोई भरोसा नहीं किया जा सकता।"
"ठीक है दीदी।" मैने कहा___"अब आप जाइये और सबको बता दीजिए। मैं भी कपड़े पहन कर आता हूॅ हाथ बटाने।"
"चल ठीक है।" दीदी ने कहा और फौरन ही कमरे से बाहर निकल गईं। उनके जाने के बाद मैने भी आनन फानन में कपड़े पहने। तभी मेरा आई फोन बजा।
(यहाॅ पर मैं आप सबको (खास कर नैना जी को) ये बता दूॅ कि आई फोन सिर्फ रितू दीदी के पास ही नहीं था बल्कि मेरे और गुड़िया (निधी) के पास भी है)
मैने मोबाइल उठाकर देखा तो शेखर का ही काल था। मैने तुरंत ही काल रिसीव कर मोबाइल को कान से लगा लिया। उधर से शेखर ने बताया कि उसके मौसा कुछ ऐसे आदमियों को भी साथ में लेकर आ रहे जो तुम सबकी सुरक्षा का भी ख़याल रखेंगे। मैं उसकी बात सुन कर मुस्कुराया और उसे इसके लिए धन्यवाद दिया। उसने बताया कि दस से बीस मिनट के बीच उसके मौसा मेरे पास पहुॅच जाएॅगे। उसके बाद काल कट हो गई।
मैं फौरन ही कमरे से निकल कर नीचे आया और सबके साथ सामान को इकट्ठा कर उसे पैक करवाने लगा। मैने आदित्य से कहा कि वो हरिया काका को भी इस बात का बता दे और उससे कहे कि वो तहखाने से उन चारों पिल्लों को तथा मंत्री की बेटी को बेहोश कर तहखाने से बाहर निकालने की तैयारी करें। मेरी बात सुनकर आदित्य फौरन ही हरिया काका के पास चला गया। इधर नैना बुआ तथा विधी के माता पिता भी सारे सामान को पैक करने में लगे हुए थे। रितू दीदी ने बताया कि पवन का सामान भी पैक रखा हुआ है जिसे साथ ही यहाॅ से ले चलना है।
लगभग बीस मिनट बाद ही दो इनोवा कार तथा उसके पीछे एक टैम्पो फार्महाउस में दाखिल हुए। मैं ये देख कर हैरान रह गया कि इतने सारे वाहन शेखर ने भेजवा दिये थे। कदाचित उसे अंदाज़ा था कि सबको लाने में इतने ही वाहनों की ज़रूरत पड़ सकती थी। टैम्पो में सारा सामान और दोनो कारों में हम सब लोग बैठ कर आराम से यहाॅ से जा सकता थे। ख़ैर सामान तो पैक हो ही चुका था। अतः मैं और आदित्य जल्दी जल्दी सारे सामान को टैम्पो में लोड करने लगे। इस काम में मौसा के साथ आए हुए चार पाॅच आदमी भी लग गए। कुछ ही देर में सारा सामान टैम्पो में लोड हो गया।
हरिया काका और शंकर काका ने उन चारों पिल्लों और उस पिल्ली को भी टैम्पो में ही ठूॅस दिया और खुद भी उसी टैम्पो में चढ़ गए। मौसा के तीन आदमी भी टैम्पो में चढ़ गए। टैम्पो का पिछला फटका लगा कर ऊपर से मोटी तिरपाल को ढॅक दिया गया। जिससे अंदर का कुछ भी देखा नहीं जा सकता था।
उसके बाद मैने विधी के माता पिता, नैना बुआ, तथा बिंदिया काकी को एक इनोवा में बैठा दिया। उस इनोवा में मौसा का एक आदमी भी आगे की शीट पर हाॅथ में बंदूख लिए बैठ गया। दूसरी इनोवा में मैं आदित्य और रितू दीदी बैठ गए। आगे की शीट पर आख़िरी बचा बंदूकधारी भी बैठ गया। उसके बाद सारा क़ाफिला चल दिया वहाॅ से। इसके पहले हमने अच्छी तरह से चेक कर लिया था कि हमारी कोई ऐसी चीज़ तो नहीं छूट गई जो ज़रूरी हो।
रितू दीदी ने रास्ते में किसी को फोन लगाया और उससे कहा कि उसके फार्महाउस से पुलिस जिप्सी अपने साथ ले जाकर थाने में खड़ा कर दें।
फार्महाउस में एक और जीप थी जो कि अजय सिंह की ही थी उसे वहीं खड़े रहने दिया था। लगभग आधा घंटे बाद हम रेवती पहुॅच गए। इस बीच रास्ते में हमें इक्का दुक्का वाहन तो मिले मगर उनमें कोई मंत्री या अजय सिंह का आदमी नहीं था। रेवती में शेखर के मकान के सामने ही हमारा क़ाफिला रुका। घर के बाहर ही दो केयरटेकर खड़े दिखे। वाहनों के रुकते ही वो हमारे पास आ गए।
हम सब वाहनों से उतर कर बाहर आए तो वो दोनो केयर टेकर हमें घर के अंदर की तरफ ले गए। मैं और आदित्य बाहर ही थे। टैम्पो से पहले उन पाॅचों कैदियों को निकाल कर घर के अंदर एक ऐसे कमरे में ले आए जो सबसे अलग और आख़िर में था। उसके बाद हम सबने मिल कर टैम्पो से सारा सामान उतार कर अंदर ले गए। उन बंदूखधारियों हमारी बड़ी मदद की।
शेखर के मौसा, जिनका नाम केशव शर्मा था वो बड़े ही खुशदिल इंसान थे। मुझे उनका नेचर बड़ा पसंद आया था। वो अंत तक हमारे पास ही रहे और हमारी हर ब्यवस्था के बारे में देखते सुनते रहे तथा हमारी हर ज़रूरों की लिस्ट बनाते रहे। दरअसल यहाॅ रहता तो कोई था नहीं। दो केयरटेकर थे जो कि घर से अलग एक तरफ बने सर्वेन्ट क्वार्टर में रहते थे। वो सारा दिन सारे सामान को जमाने में और रखने में चला गया। इस बीच शेखर की माॅम सुगंधा ऑटी का फोन भी आया था। उन्होंने मुझसे बड़े प्यार से बात की और ये भी कहा कि मैं यहाॅ पर किसी भी चीज़ के लिए संकोच न करूॅ। ये घर अपना ही है और हर चीज़ का उपयोग बड़े शौक से कर सकते हैं हम। मैं सुगंधा ऑटी से बात करके मुतमईन हो गया था और खुश भी। उसके बाद मैं और आदित्य मौसा जी के साथ मार्केट चले गए। जहाॅ से हमें राशन पानी तथा और भी कई सारी चीज़ें लेनी थी। मौसा जी ने कहा कि गैस सिलेण्डर वो अपने यहाॅ से हमे दे देंगे।
सारी ब्यवस्था और सब कुछ सही करवाने के बाद मौसा जी ये कह कर अपने घर चले गए कि हमें जब भी किसी चीज़ की ज़रूरत पड़े तो हम बेझिझक उनसे फोन बता सकते हैं। उन्होंने कहा कि वो बीच बीच में आते रहेंगे हाल चाल के लिए। मौसा जी का घर रेवती में ही था किन्तु मुख्य सड़क के पीछे था। पैदल चल कर जाने में लगभग दस मिनट से भी कम का समय लगता था।
शेखर का ये घर दो मंजिला था तथा काफी बड़ा था। आज के समय का बना ये घर वेल डेकोरेटेड था। अंदर से ऐसा लगता था जैसे कोई बॅगला हो। हलाॅकि मुम्बई वाले मेरे बॅगले के मुकाबले ये कुछ भी नहीं था। होता भी कैसे उस बॅगले की कीमत भी तो डेढ़ सौ करोड़ रुपये थी। ख़ैर रात हो चुकी थी इन सब कामों में। अतः बिंदिया काकी ने अपनी रसोई सम्हाल ली थी। उनकी मदद के लिए नैना बुआ भी साथ थी। विधी की माॅ भी खाना बनाने में मदद करना चाहती थी मगर नैना बुआ ने साफ कह दिया था कि वो बस आराम करें। उन्हें यहाॅ पर कोई काम करने की ज़रूरत नहीं है।
रात का डिनर करने के बाद हम सब अपने अपने कमरों में सोने के लिए चल दिये। विधी के माता पिता ग्राउण्ड फ्लोर पर ही बने कमरे को चुना था अतः वो उसी कमरे में चले गए। नीचे तीन कमरे और भी थे। जिनमे से एक पर हरिया काका व बिंदिया काकी तथा दूसरे पर शंकर काका सोने के लिए चले गए। जबकि ऊपर के कमरों में मैं आदित्य नैना बुआ व रितू दीदी चले गए।
इन सब कामों से हम सब काफी थक चुके थे अतः बेड पर लेटते ही नींद को आन् ही था। किन्तु मुझे नींद नहीं आ रही थी। मेरे मन में कई सारी बातें चल रही थी। फार्महाउस से यहाॅ शिफ्ट हो जाने से अब किसी का ख़तरा नहीं था। बल्कि अब तो खुल कर हम कोई काम कर सकते थे। मैं ये सब सोच ही रहा था कि सहसा मुझे ऐसा लगा जैसे दरवाजे पर बाहर से किसी ने दस्तक दी हो। मैं ये सोचते हुए बेड से उठ कर दरवाजे की तरफ चल दिया कि इस वक्त कौन हो सकता है?
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर हवेली में प्रतिमा का बाप व अजय सिंह का ससुर जगमोहन सिंह उस वक्त हवेली पहुॅचा जब अजय सिंह फ्रेश होने के बाद खाना खाने के लिए डायनिंग टेबल के चारो तरफ लगी कुर्सियों में से मुख्य कुर्सी पर बैठा था। जगमोहन सिंह को हवेली के बाहर तैनात अजय सिंह का एक आदमी अंदर लेकर आया था।
अपने ससुर को आज वर्षों बाद देख कर अजय सिंह फौरन ही अपनी कुर्सी से उठ कर जगमोहन की तरफ बढ़ा और उसके पैर छू कर आशीर्वाद लिया। अभी अजय सिंह अपने ससुर के पाॅव छू कर खड़ा ही हुआ था कि तभी प्रतिमा भी किचेन से हाॅथ में थाली लिए आई। प्रतिमा की नज़र जब अपने पिता पर पड़ी तो वो एकदम से मानो बुत बन गई। काफी देर बाद उसकी तंद्रा तब टूटी जब अजय सिंह ने उससे कहा कि देखो प्रतिमा पापा जी आ गए।
हाॅथ में ली हुई थाली को प्रतिमा ने डायनिंग टेबल पर रखा और फिर भाग कर जगमोहन की तरफ बढ़ी और अपने पिता के गले से लग गई। भावनाओं और जज़्बातों ने मानो प्रबल रूप धारण कर लिया जिसके प्रभाव से उसकी ऑखों से ऑसू झर झर करके बहने लगे थे। प्रतिमा अपने पिता के सीने से छुपकी ज़ार ज़ार रोये जा रही थी। जगमोहन खुद भी बेहद ग़मगीन हो गया था और हो भी क्यों न आख़िर प्रतिमा उसकी लाडली बेटी जो थी। अपनी बेटी को अपने कलेजे से लगाए जगमोहन को आज असीम सुख शान्ति मिल रही थी। वर्षों से उसके अंदर दर्द से भरी हुई टीस कम हो गई थी।
कितनी ही देर तक प्रतिमा अपने पिता के गले लगी रही उसके बाद जब उसके अंदर का गुबार खत्म हुआ तो वो अपने पिता से अलग हुई और अपने पिता से उनका हाल चाल पूछने लगी। कुछ देर बाद अजय सिंह ने प्रतिमा और अपने ससुर से कहा कि वो फ्रेश हो लें ताकि हम साथ में बैठ कर ही खाना खाएॅ। अजय सिंह की बात पर जगमोहन सिंह बोले कि वो बेटी के घर का अन्न कैसे खा सकते हैं? इस पर अजय सिंह ने हॅसते हुए कहा कि पापा जी आप भी क्या बाबा आदम के रीति रिवाज लिए बैठे हैं।
आज के समय के सबसे बड़े वकील होते हुए भी ऐसी बात करते हैं। आख़िर अपने दामाद और बेटी के बार बार कहने पर जगमोहन सिंह को अजय सिंह के साथ बैठ कर खाना ही पड़ा।
खाना खाने के बाद ससुर दामाद के बीच ढेर सारी बातें हुईं उसके बाद अजय सिंह प्रतिमा को बता कर अपनी फैक्ट्री के लिए निकल गया। काफी दिन से फैक्ट्री नहीं गया था वह। वैसे भी वो चाहता था कि वर्षों के बाद बाप बेटी मिले हैं तो वो फ्री होकर एक दूसरे से बातें करें। अजय सिंह प्रतिमा को किनारे पर बुला कर उससे एक बार पुनः ये कहा कि वो या कोई भी जगमोहन जी से हमारे हालातों के संबंध में कोई बात न करे। सब कुछ समझा बुझा कर अजय सिंह हवेली से बाहर आ गया।
बाहर आते ही उसे शिवा इस तरफ ही आता दिखाई दिया। अजय सिंह उसे देख कर ठिठक गया। अपनी ही धुन में मस्ती से आता हुआ शिवा अपने बाप को देख कर हैरान रह गया और फिर एकदम से झपट कर उसके गला लग गया।
"ओह डैड आप आ गए।" शिवा खुशी से झूमता हुआ बोला था।
"मैं तो आ ही गया बर्खुरदार।" अजय सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा___"मगर तुम इस वक्त कहाॅ से इस तरह मस्ती में डूबे चले आ रहे थे?"
"वो मैं गेस्टहाउस की तरफ से आ रहा था डैड।" शिवा ने कहा___"दरअसल आपके बिजनेस संबंधी दोस्तों ने अपने आदमी हमारी मदद के लिए यहाॅ भेज गए थे। इस लिए मैं उन्हीं के पास बैठा हुआ था। माॅम ने कहा था कि उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो उन सबका ख़याल रखूॅ।"
"ओह आई सी।" अजय सिंह आदमियों का सुन कर सहसा चौंक पड़ा था फिर बोला___"चलो ये तो बहुत अच्छी बात है बेटे। मुझे खुशी हुई कि तुम अपनी जिम्मेदारियों को समझने लगे हो। ख़ैर मैं ये कह रहा हूॅ कि आज तुम्हारे नाना जी आए हुए हैं इस लिए तुम या कोई भी उनके सामने हमारे हालातों के संबंध में कोई भी बात नहीं करोगे। और हाॅ, तुम भी ज़रा सम्हल कर उनसे बात करना। वो बहुत ही जहीन इंसान हैं। इंसान को पहचानने में उन्हें ज़रा भी वक्त नहीं लगेगा। अतः सोच समझ कर और होशियारी से उनके सामने जाना। ऐसा न हो कि तुम्हारे हाव भाव से उन्हें ऐसा प्रतीत हो जाए कि तुम किस टाइप के लड़के हो? तुम समझ रहे हो न कि मैं क्या कहना चाहता हूॅ?"
"डोन्ट वरी डैड।" शिवा ने कहा___"मेरी वजह से नाना जी को कुछ और सोचने का मौका ही नहीं मिलेगा और न ही उन्हें हमारे हालातों का कुछ पता चलेगा।"
"गुड ब्वाय।" अजय सिंह मुस्कुराया___"अब जाओ तुम। मैं भी ज़रा उन आदमियों से मिल लूॅ, उसके बाद मुझे थोड़ी देर के लिए फैक्ट्री भी जाना है।"
"ओके बाय डैड।" ये कह कर शिवा हवेली के अंदर की तरफ बढ़ गया।
शिवा का जाने के बाद अजय सिंह भी गेस्ट हाउस की तरफ चल दिया। अभी वो कुछ क़दम ही चला था कि सहसा पीछे से उसे प्रतिमा की आवाज़ सुनाई दी। उसने पलट कर देखा तो प्रतिमा हवेली के मुख्य दरवाजे पर खड़ी थी।
अजय सिंह के पलटते ही प्रतिमा ने उसे बताया कि लैण्डलाइन फोन पर किसी का काल आया हुआ है और वो उससे बात करना चाहता है। प्रतिमा की बात सुन कर अजय सिंह वापस हवेली के अंदर की तरफ चल दिया। उसे याद आया कि उसके मोबाइल पर तो सिम कार्ड है ही नहीं।
"हैलो।" अपने कमरे में रखे लैण्डलाइन फोन के रिसीवर को कान से लगाते ही अजय सिंह ने अपनी आवाज़ को प्रतभावशाली बनाते हुए कहा था।
"ठाकुर।" उधर से किसी की स्पष्ट आवाज़ उभरी__"हम इस प्रदेश के मंत्री दिवाकर चौधरी बोल रहे हैं।"
"म..मंत्री???" अजय सिंह उधर ईआ वाक्य सुन कर बुरी तरह चौंका था, फिर लरजते हुए स्वर में बोला____"क्या सच में आप मंत्री जी ही बोल रहे हैं?"
"हाॅ ठाकुर।" उधर से दिवाकर चौधरी ने खास अंदाज़ में कहा___"क्या तुम्हें हमारे मंत्री होने पर शक़ है?"
"न..न..नहीं नहीं मंत्री जी।" अजय सिंह बुरी तरह सकपकाया___"म मैं तो बस इस लिए ऐसा कह गया क्योंकि मुझे उम्मीद ही नहीं थी कि प्रदेश की इतनी बड़ी शख्सियत का फोन मेरे पास आ सकता है। मैं तो ये सोच सोच कर हैरान हूॅ कि भला मुझसे मंत्री जी का क्या काम हो सकता है जिसके तहत आपने मुझे फोन किया है।"
"कुछ तो खास वजह होगी ही ठाकुर।" उधर से दिवाकर चौधरी ने कहा___"वरना इस फानी दुनियाॅ में बेमतलब कोई भी किसी को याद नहीं करता।"
"हाॅ ये बात तो बिलकुल सच है मंत्री जी।" अजय सिंह के दिमाग़ के घोड़े बड़ी तेज़ी से ये पता लगाने के लिए दौड़ रहे थे कि मंत्री ने उसे किस वजह से फोन किया हो सकता है? किन्तु प्रत्यक्ष में बोला___"आज के समय में हर इंसान मतलबी बन चुका है। ख़ैर आप बताइये मेरे लिए क्या आदेश है आपका?"
"दोस्तों को आदेश नहीं देते ठाकुर।" उधर से चौधरी ने कहा___"बल्कि साफ शब्दों में कह दिया जाता है जो कहना होता है। ख़ैर हम ये कह रहे है कि हम तुमसे मिलना चाहते हैं। मिलने के बाद ही तसल्ली से हमारे बीच बात चीत होगी और ये भी कि वो खास वजह क्या है जिसके तहत हमने तुम्हें फोन किया है?"
"जैसा आप कहें मंत्री जी।" अजय सिंह मंत्री के मुख से दोस्तों शब्द सुन कर सोचने पर मजबूर हो गया था। हलाॅकि मंत्री का उसे फोन करना मौजूदा हालात के हिसाब से उसके लिए कहीं न कहीं राहत और खुशी की बात थी। उसे भी पता था कि मंत्री दिवाकर चौधरी क्या चीज़ है। फिर बोला___"बताइये मुझे कब और कहाॅ मिलने आना होगा आपसे?"
"वैसे समय तो अभी भी है ठाकुर।" उधर से मंत्री ने कहा___"क्योंकि अभी शाम भी नहीं हुई है। इस लिए चाहो तो अभी हमारे यहाॅ आ सकते हो। इस वक्त हम गुनगुन में ही अपने आवास पर मौजूद हैं। किन्तु अगर तुम्हारे पास इस वक्त टाइम नहीं है तो कोई बात नहीं कल सुबह आ जाना। हमें कोई परेशानी नहीं है।
"
"ये कैसी बात कर रहे हैं मंत्री जी?" अजय सिंह ने चापलूसी वाले अंदाज़ से कहा___"आप मुझे अपना समझ कर इतनी इज्ज़त से बुलाएॅ और मैं तत्काल न आऊॅ ऐसा कैसे हो सकता है भला? मैं तो अपने सारे ज़रूरी काम छोंड़ कर आपके पास ही दौड़ा चला आऊॅगा चौधरी साहब। बस कुछ देर तक इंतज़ार कर लीजिए। मैं फौरन ही अपने गाॅव हल्दीपुर से गुनगुन में आपके आवास पर आने के लिए निकल रहा हूॅ।"
"ओके हम इन्तज़ार कर रहे हैं ठाकुर।" उधर से मंत्री ने कहा___"तुम हमारे दोस्त की तरह ही हो इस लिए अपने दोस्त का वैलकम भी हम शानदार तरीके से ही करेंगे।"
"ये तो मेरी खुशनसीबी है मंत्री जी।" अजय सिंह एकदम से खुश होते हुए बोला___"जो आप मुझे अपना दोस्त कह रहे हैं वरना मेरी आपके सामने भला क्या औकात?"
"ऐसी कोई बात नहीं है ठाकुर।" मंत्री ने कहा___"हर इंसान अपनी जगह पर औकात वाला ही होता है। तुम भी अपनी जगह किसी से कम नहीं हो। हमें सब पता है तुम्हारे बारे में। ख़ैर छोंड़ो ये सब। आओ फिर मिलकर ही बाॅकी बातें होंगी।"
"जी ठीक है चौधरी साहब।" अजय सिंह के ऐसा कहते ही उधर से काल कट गई।
रिसीवर को हाॅथ में पकड़े अजय सिंह किसी बुत की मानिंद खड़ रह गया था। उसकी ऑखें ऐसी चमकने लगी थी जैसे उसकी ऑखों के अंदर हज़ारों वाट के बल्ब एकाएक ही रौशन हो उठे थे। चेहरे पर खुशी साफ झलक रही थी। कुछ देर तक अजय सिंह इसी तरह रिसीवर हाॅथ में खड़ा रहा फिर जैसे उसे होश आया। उसने मुस्कुरा कर रिसीवर को वापस केड्रिल पर रखा और फिर कमरे में ही एक तरफ रखी आलमारी की तरफ बढ़ चला।
आलमारी से उसने अपने सबसे अच्छे और सबसे कीमती कपड़े निकाले। अपने जिस्म पर पहले से ही पहने हुए कपड़ों को निकाला उसने और फिर उन कपड़ों को पहनना शुरू किया जिन्हें उसने आलमारी से निकाला था। उसके चेहरे पर इस वक्त एक अलग ही चमक दिख रही थी। ख़ैर कुछ ही देर में वह कपड़ों को पहन कर एक तरफ दीवार से सटे आदमकद आईने के सामने आया और उसमें खुद को देखने लगा। कीमती कोट पैन्ट में इस वक्त वो काफी जॅच रहा था और लग भी रहा था कि वो कोई बहुत बड़ा आदमी है। सब कुछ ठीक ठाक करने के बाद वो मुस्कुराते हुए ही कमरे से बाहर की तरफ चल दिया।
ड्राइंगरूम में बैठे जगमोहन सिंह, प्रतिमा व शिवा की नज़र जैसे ही अजय सिंह पर पड़ी तो जगमोहन सिंह को छोंड़ कर प्रतिमा व शिवा के चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे। जबकि जगमोहन सिंह के चेहरे पर ये सोच कर खुशी के भाव उभरे कि उसका दामाद वाकई में एक शख्सियत वाला तथा प्रभावशाली ब्यक्तित्व रखने वाला इंसान है। उसे पहली बार लगा कि उसकी बेटी ने अपने पति के रूप में ग़लत चुनाव नहीं किया था। यहाॅ आने के बाद उसने इतनी बड़ी हवेली और अंदर बाहर इतने सारे नौकर चाकर देखे तो उसे समझ आ गया था कि उसका दामाद वास्तव में कोई ऐरा ग़ैरा नहीं था।
बल्कि इस गाॅव का राजा था वो।
"प्रतिमा मैं ज़रा मंत्री जी के पास जा रहा हूॅ।" अजय सिंह ने ये बात कुछ इस अंदाज़ से कही थी कि सोफे पर बैठे जगमोहन सिंह पर अपना एक खास असर डाल सके और ऐसा हुआ भी। जबकि अजय सिंह बोला___"अभी उन्हीं का फोन आया हुआ था। उन्होने मुझे किसी ज़रूरी काम से याद किया है। अतः हो सकता है कि मुझे वापस आने में देर हो जाए तो तुम पापा जी का अच्छे से ख़याल रखना।"
"ठीक है आप जाइये।" प्रतिमा ने अपने पिता की मौजूदगी में अजय सिंह से आप कह कर बात की, बोली___"मैं पापा का बहुत अच्छे से ख़याल रखूॅगी।"
"इसमें ख़याल रखने की क्या बात है बेटा?" सहसा जगमोहन सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा___"ये तो मेरा भी अपना ही घर है। अगर किसी चीज़ की ज़रूरत हुई तो मैं खुद ही ले लूॅगा। क्यों बेटी?"
"जी आपने बिलकुल ठीक कहा पापा।" प्रतिमा ने खुशी से मुस्कुराते हुऐ कहा।
"फिर तो ठीक है पापा।" अजय सिंह भी मुस्कुराया__"मुझे आपकी ये बात बहुत अच्छी लगी। ख़ैर मैं जल्दी वापस आने की कोशिश करूॅगा और फिर आपसे ढेर सारी बातें होंगी। अच्छा अब चलता हूॅ।"
अजय सिंह के कहने पर जगमोहन सिंह ने हाॅ में सिर हिलाया जबकि अजय सिंह फौरन ही हवेली से बाहर की तरफ बढ़ चला। उसके मन में इस वक्त मंत्री से मिलने की बड़ी ब्याकुलता पैदा हो गई थी। उसे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि प्रदेश का मंत्री उसे दोस्त मान कर उससे मिलना चाहता है। मंत्री से संबंध होना उसके लिए कितना फायदेमंद हो सकता था इसका बखूबी अंदाज़ा था उसे। इसी लिए तो वो जल्द से जल्द मंत्री के पास पहुॅच जाना चाहता था।
बाहर एक तरफ खड़ी अपनी मर्सडीज कार के पास पहुॅच कर उसने कार का दरवाजा खोला और ड्राइंविंग शीट पर बैठ गया। कुछ ही पलों में उसकी कार गुनगुन के लिए रवाना हो गई थी।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर गुनगुन में अपने आवास पर मंत्री दिवाकर चौधरी अपने दो दोस्तों और एक रखैल दोस्त यानी सुनीता के साथ ड्राइंग रूम में रखे सोफे पर बैठा था। इस वक्त ड्राइंग रूम में इन चारों के अलावा और कोई नहीं था। मंत्री के सुरक्षा गार्ड सब बाहर ही तैनात थे।
"वैसे आपको क्या लगता है चौधरी साहब।" सहसा अशोक मेहरा कह उठा___"वो ठाकुर हमारी इस मामले में क्या सहायता कर सकता है? जबकि उसकी खुद की बेटी ही उसके खिलाफ़ है।"
"इन्हीं सब चीज़ों के बारे में तो जानना है अशोक।" मंत्री ने सोचते हुए कहा___"मुझे लगता है कि इस मामले से जुड़ी हर चीज़ ठाकुर को क्राॅस करती है।
हमने ये तो समझ लिया कि हमारे मामले जो हो रहा है वो कौन और क्यों कर रहा है मगर हम ये भी जानना चाहते हैं कि जो हमारा दुश्मन है उसने या उसकी माॅ बहन ने ऐसा क्या किया था जिसकी वजह से ठाकुर ने उन तीनों को हवेली से ही नहीं बल्कि सारी ज़मीन जायदाद से भी बेदखल कर दिया है? सबसे महत्वपूर्ण बात हमें ये भी जानना है कि ऐसा क्या हुआ है जिसके तहत ठाकुर की अपनी बेटी खुद अपने ही माॅ बाप के खिलाफ़ हो गई है?"
"बात तो आपकी एकदम सही है चौधरी साहब।" अशोक ने कहा___"किन्तु इससे निष्कर्श क्या निकलेगा? मेरा मतलब है कि इससे हमारा फायदा क्या होगा?"
"नफ़ा नुकसान तो अपनी जगह है ही अशोक।" चौधरी ने कहा___"किन्तु इस मामले में कुछ बातें ऐसी हैं जिनके बारे में पक्के तौर पर जानना बहुत ज़रूरी है। तुमने कहा था कि ठाकुर की बेटी जो थानेदारनी है और अपने पैरेन्ट्स के खिलाफ़ है वो हमारे दुश्मन और ठाकुर के भतीजे की मदद इस लिए नहीं कर सकती क्योंकि वो भी उससे अपने माॅ बाप की तरह नफ़रत करती है। ये बातें एक दूसरे से मैच नहीं खा रही हैं अथवा ये भी कह सकते हैं कि जॅच नहीं रही हैं।"
"जी मैं कुछ समझा नहीं चौधरी साहब।" अशोक मेहरा के माॅथे पर उलझनपूर्ण भाव आए___"कौन सी बातें नहीं जॅच रही आपको?"
"यही कि एक तरफ तो तुम ये भी कह रहे हो कि ठाकुर की थानेदारनी बेटी उस विराज नाम के अपने भाई से नफ़रत करती है।" मंत्री ने कहा___"इस लिए वो उसकी मदद नहीं कर सकती। जबकि दूसरी तरफ तुम ये भी कह रहे हो कि ठाकुर की वही थानेदारनी बेटी खुद अपने ही माॅ बाप के खिलाफ़ है। सोचने वाली बात हैं अशोक कि ऐसा कैसे हो सकता है? आम तौर पर बच्चे वही करते हैं जो उनके माॅ बाप उन्हें सीख देते हैं अथवा करने को कहते हैं। यहाॅ सोचने वाली बात ये है कि अगर वो थानेदारनी अपने माॅ बाप की सीख अथवा कहे के अनुसार अपने चचेरे भाई से नफ़रत करती है तो फिर अपने ही माॅ बाप के खिलाफ़ वो किस वजह से हो गई है?"
"आपकी इन सब बातों में ज़बरदस्त प्वाइंट है चौधरी साहब।" सहसा अवधेश श्रीवास्तव कह उठा___"सचमुच ये सोचने वाली बात है कि आख़िर ऐसा क्या हुआ है जिसके चलते ठाकुर की बेटी उसके खिलाफ़ है? संभव है कि उसे कोई ऐसी बात अपने माॅ या पिता की पता चल गई हो जिसके चलते उसने अपने माॅ बाप से किनारा कर लिया हो। या फिर ऐसा हो सकता है कि सोच या विचारों के चलते थानेदारनी अपने पैरेन्टस् से दूर हो।"
"ये सब तो महज संभावनाएॅ हैं अवधेश।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"जो सही भी और ग़लत भी हो सकती हैं मगर हमें वो बात पता करना है जो सिर्फ और सिर्फ सच हो। ख़ैर फिक्र की कोई बात नहीं है, हमने ठाकुर को बुलाया है। वो आता ही होगा हमारे पास। उसी से पूछेंगे कि सच्चाई क्या है?"
"लेकिन चौधरी साहब।
" अशोक मेहरा ने एक बार पुनः हस्ताक्षेप किया___"सवाल तो एक बार फिर खड़ा हो जाता है कि इस सबसे हमारा फायदा क्या होगा? हम ये तो जानते ही हैं कि हमारा दुश्मन ठाकुर का वो भतीजा है जिसका नाम विराज है और वो मुम्बई में रहता है। फिर अचानक आप ठाकुर और उसकी बेटी को बीच में कैसे ले आए? इस मामले में ये कहाॅ से आ गए? ठाकुर की बेटी अपने माॅ बाप के खिलाफ़ है ये उनका आपसी मैटर है। इस लिए हमें इससे क्या लेना देना भला? हमें तो अपने टार्गेट पर फोकस रखना है ना?"
"तुम बात को या तो अनसुना कर गए हो अशोक या फिर बात को समझने की कोशिश ही नहीं कर रहे हो।" मंत्री ने स्पष्ट भाव से कहा___"जबकि तुम्हें सबसे पहले ये सोचना चाहिए कि हम बेवजह फालतू की बकवास करने का शौक नहीं रखते हैं। ख़ैर, बात दरअसल ये कि अगर ठाकुर की बेटी सचमुच में अपने पैरेंट्स के खिलाफ़ है तो वो अपने उस भाई की मदद क्यों नहीं कर सकती जो अपने माॅ बाप की तरह ही उस लड़के से नफ़रत करती थी? संभव है कि उसे उस वजह का पता चल गया हो जिस वजह के चलते उसके बाप ने विराज और विराज की माॅ बहन को हर चीज़ से बेदखल किया था। उसे पता चल गया हो कि जिस वजह से विराज को बेदखल किया था उसके बाप ने वो वजह वास्तव में बेवजह ही थी। यानी विराज व विराज की माॅ बहन अपनी जगह सही रहे हों। उस सूरत में संभव है कि रितू ने उस संबंध में अपने पैरेंट्स से बात की हो और उनसे कहा हो कि विराज और उसकी माॅ बहन को बेदखल करके उसने अच्छा नहीं किया। वो अगर बेक़सूर हैं तो उन्हें उनका हक़ मिलना ही चाहिए। इस संबंध में अपनी बेटी की ये बात शायद ठाकुर को पसंद न आई हो और उसने विराज का हक़ देने से साफ इंकार कर दिया हो। इस वजह से थानेदारनी अपने माॅ बाप से अलग हो गई और संभव है कि इसी के चलते वो अपने उस चचेरे भाई के प्रति अपनी नफ़रत को मिटा कर उसकी मदद भी करने लगी हो। हलाॅकि ये सब भी महज संभावनाएॅ ही हैं किन्तु हो सकता है कि यही सच हो।"
अशोक मेहरा ही नहीं बल्कि वहाॅ बैठे अवधेश व सुनीता भी चौधरी की इन संभावना भरी बातें सुन कर चकित रह गए थे। एक बेटी का अपने पैरेंट्स के खिलाफ़ होने की क्या खूब वजह सोच कर बयान किया था उसने।
"अगर आपकी संभावनाएॅ सच हैं।" फिर अवधेश ने कहा___"तो यकीनन वो थानेदारनी विराज की मदद कर सकती है। मैं सब समझ गया चौधरी साहब, आपने यही सब सोच कर ठाकुर को यहाॅ बुलाया है।"
"बिलकुल।" चौधरी मुस्कुराया___"किन्तु इस वजह के अलावा भी एक महत्वपूर्ण वजह है।"
"वो क्या चौधरी साहब?" तीनो एक बार फिर चौंके।
"अगर ठाकुर ने सचमुच ही विराज और उसकी माॅ बहन को बेवजह ही हर चीज़ से बेदखल किया है।" चौधरी ने कहा___"तो ये भी सच ही होगा कि विराज अपने ताऊ को दुश्मन समझता होगा और ये भी चाहता होगा कि उसका हक़ किसी भी सूरत में उसे मिले।
ठाकुर ने अगर धन दौलत अथवा सारी प्रापर्टी को हथियाने की गरज से उसे बेदखल किया होगा तो फिर ये पक्की बात है कि ठाकुर किसी भी कीमत में वो प्रापर्टी अथवा उस प्रापर्टी में से विराज का हक़ नहीं देगा। कहने का मतलब ये कि विराज को अपना हक़ आसानी से नहीं मिलने वाला। इस लिए वो ऐसा कुछ ज़रूर करेगा जिसके तहत उसे अपने ताऊ से अपना हक़ वापस मिल सके।"
तीनो मुह फाड़े देखते रह गए चौधरी को। किसी के मुख से कोई बोल न फूट सका था। जबकि चौधरी उन सबके चेहरों पर मॅडराते भावों को देखते हुए पुनः कहना शुरू किया____"हलाॅकि ये भी महज संभावनाएॅ ही हैं दोस्तो जो ग़लत भी हो सकती हैं। मगर हमें कहीं न कहीं ऐसा आभास भी हो रहा है कि हमारी इन संभावनाओं पर कुछ न कुछ तो सच्चाई ज़रूर है। हमने ठाकुर, ठाकुर की बेटी, तथा विराज, इन तीनों पर ग़ौर किया है और इनके बीच पैदा हुए हालातों पर भी ग़ौर किया है। इसके बाद ही हमारे दिमाग़ में इन संभावनाओं का आगमन हुआ है।"
"मुझे तो ऐसा लगता है चौधरी साहब।" सहसा अवधेश कह उठा___"कि आपने उन तीनों का ऑपरेशन कर दिया है। आपकी संभावनाओं में कहीं पर भी ऐसा नहीं लग रहा है कि उनमें कहीं कोई लोचा है।"
"ठाकुर की बेटी का अपने माॅ बाप से भले ही चाहे जो पंगा हो अवधेश।" चौधरी ने गहरी साॅस ली___"जिसके तहत वो अपने माॅ बाप के खिलाफ़ है। मगर ये बात तो सच ही समझो कि ठाकुर और विराज का छत्तीस का ऑकड़ा है। ज़र ज़ोरू ज़मीन ये कभी किसी की नहीं हुई। इसने जाने जाने कितने पाक़ रिश्तों को नेस्तनाबूत किया होगा अब तक इसका हममें से कोई अंदाज़ा भी नहीं लगा सकता। विराज व ठाकुर के बीच हक़ की लड़ाई है ये पक्की बात है और जब तक इस लड़ाई का अंत नहीं होगा दोनो में से कोई भी चैन से नहीं बैठेगा। ख़ैर, तुमने सुना होगा कि हमने फोन पर ठाकुर को दोस्त कहा था। वो इसी लिए कहा था कि मौजूदा हालात में हम दोनो का एक ही टार्गेट है-----विराज। इस लिए हमने उसे दोस्त कहा। हम उससे विराज के संबंध में सारी जानकारी हासिल करेंगे और फिर उस हिसाब से आगे की रणनीति बनाएॅगे।"
अभी चौधरी ने ये कहा ही था कि सहसा तभी ड्राइंग रूम में एक आदमी दाखिल हुआ। उसने बड़े अदब से चौधरी को बताया कि बाहर कोई आदमी आपसे मिलने आया है। वो आदमी अपना नाम ठाकुर अजय सिंह बता रहा है। उस आदमी की बात सुन कर चौधरी मुस्कुराया और अपने उस आदमी से कहा कि उसे इज्ज़त से अंदर ले आओ। चौधरी की बात सुन कर वो आदमी पहले अदब से सिर झुकाया फिर वापस बाहर की तरफ चला गया।
कुछ ही देर में उसी आदमी के साथ अजय सिंह ड्राइंग रूम में दाखिल हुआ। उसे देखते ही चौधरी अपने सोफे से उठा हलाॅकि वो प्रदेश का मंत्री था और अजय सिंह के लिए उठना उसकी शान के खिलाफ़ था किन्तु फिर भी वो उठा ही। उसकी देखा देखी बाॅकी सब भी उठ गए।
"मोस्ट वेलकम ठाकुर।
" चौधरी ने गर्मजोशी से तथा मुस्कुराते हुए अजय सिंह से हाॅथ मिलाया और फिर एक अन्य खाली सोफे की तरफ बैठने का इशारा किया और खुद भी अपनी जगह पर आ कर बैठ गया।
"बहुत बहुत शुक्रिया चौधरी साहब।" अजय सिंह ने अपने अंदर ही हड़बड़ाहट पर काबू पाते हुए किन्तु बड़ी शालीनता से कहा___"आज तो मेरे भाग्य ही खुल गए है जो आपके दर्शन हो गए।"
"ऐसा कुछ भी नहीं है ठाकुर।" चौधरी ने कहा___"इस वक्त हम किसी मंत्री की हैसियत से नहीं बल्कि एक आम इंसान तथा एक दोस्त की हैसियत से तुमसे मिल रहे हैं। और वैसे भी ये तो हमें भी पता चला है कि हमसे पहले जो मंत्री थे उनसे तुम्हारे बहुत गहरे ताल्लुकात थे। सारा पुलिस महकमा ही तुम्हारी मुट्ठी में होता था। किन्तु हमने सुना कि रात भर में सारा कुछ बदल गया था। इस सबका बड़ा हो हल्ला भी हुआ था। मगर किसी की समझ में न आया कि ऐसा क्यों हुआ था। आज भी ये रहस्य ही बना हुआ है।"
दिवाकर चौधरी की इस बात से अजय सिंह तो चौंका ही मगर उसके साथ साथ अशोक, अवधेश व सुनीता आदि भी चौंके थे। किन्तु उन लोगों ने बीच में कहा कुछ नहीं।
"हाॅ ये तो आपने सच कहा चौधरी साहब।" अजय सिंह ने सहसा गहरी साॅस ली___"एक वक्त था जब हर चीज़ मेरे लिए आसान थी मगर एक ऑधी आई और सब कुछ उड़ा कर ले गई। अब उन जगहों पर गहन ख़ामोशी के सिवा कुछ भी शेष नहीं रहा।"
"इसका मतलब तो ये हुआ कि वो सारा कुछ तुम्हारी वजह से बदल गया था?" इस बार चौंकने की बारी मानो चौधरी की थी। हैरत से बोला___"मगर आख़िर ऐसा हुआ क्या था ठाकुर? यकीनन कोई बड़ी वजह थी क्योंकि इतना बड़ा सिस्टम यहाॅ तक कि प्रदेश के मंत्री का तबादला हो जाना कोई मामूली बात नहीं है। उस सबसे तो हर कोई हैरान रह गया था। आज जबकि तुम्हारे मुख से ही पता चला कि वो सब तुम्हारी वजह से हुआ था तो इस सबको जानने की उत्सुकता और भी बढ़ गई है।"
अजय सिंह समझ सकता था कि उसे मंत्री को इस सबके बारे में बताना ही पड़ेगा। वो भी चाहता था कि किसी वजह से ही सही मगर उसे मंत्री का साथ मिल जाए। अतः उसने संक्षेप में अपनी फैक्ट्री में लगी आग वाले केस के संबंध में बता दिया। ये भी कि बाद में उसे ये पता चल ही गया कि फैक्ट्री में लगी आग के पीछे उसके अपने ही भतीजे विराज का हाॅथ था। मंत्री ये जान कर हैरान रह गया कि विराज ने इतना बड़ा काण्ड किया हुआ है अपने ताऊ के साथ। अजय सिंह ने मंत्री को ये भी बताया कि मंत्री का तबादला और सारे पुलिस महकमे को बदल देने में भी विराज का ही हाॅथ था। ये बात सुन कर तो चौधरी की गाॅड में कीड़े ही कुलबुलाने लगे। वो सोचने पर मजबूर हो गया कि विराज आख़िर चीज़ क्या है जो मंत्री और सारे पुलिस डिपार्टमेन्ट तक को इधर से उधर कर देने की क्षमता रखता है? चौधरी जैसा ही हाल वहाॅ बैठे बाॅकी सबका भी था।
"तुम्हारी कहानी तो वाकई में हैरतअंगेज है यार।
" चौधरी ने चकित भाव से कहा___"मगर ये समझ नहीं आया कि तुम्हारे भतीजे विराज ने ऐसा किया क्यों?"
मंत्री ने जानबूझ कर ये सवाल किया था। उसे पता तो था किन्तु वो अजय सिंह के मुख से सच्चाई सुनना चाहता था।
"बड़ी लम्बी कहानी है चौधरी साहब।" अजय सिंह ने गहरी साॅस छोंड़ते हुए कहा___"कभी कभी हमारे साथ वो सब भी हो जाता है जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की होती है। दरअसल बात ये थी मैने अपने मॅझले भाई की बीवी और उसके दोनो बच्चों को घर और ज़मीन जायदाद से बेदखल कर दिया था। इसकी वजह ये थी कि मेरे भाई की बीवी गौरी एक चरित्रहीन औरत थी। जवानी में ही उसके पति की मौत हो गई थी जिसकी वजह से उससे अपने अंदर की गर्मी बर्दास्त नहीं हुई। शुरू शुरू में तो सब ठीक था मगर फिर उसके चाल चलन दिखने शुरू हुए। मैं जो कि उसका जेठ लगता था और गाॅवों में रिवाज है कि छोटे भाई की बीवी अपने जेठ के सामने सिर खुला नहीं रखती और ना ही उसे छूती है। मगर गौरी अपनी वासना और हवश की वजह से मुझ पर ही डोरे डालने लगी। मैं उसकी उस हरकत से हैरान था। हमारे खानदान कभी ऐसा नहीं हुआ था। हर कोई छोटे बड़े की मान मर्यादा का ख़याल रखता था। उधर दिनप्रति गौरी की हरकतों से मेरा दिमाग़ खराब होने लगा। मैने उसकी हरकतों के बारे में सबसे पहले अपनी पत्नी को बताया और उससे कहा भी कि वो गौरी को समझाए बुझाए कि ये सब कितना ग़तना ग़लत और पाप कर रही है। मेरी पत्नी ने गौरी को बहुत समझाया। मगर गौरी तो जैसे वासना और हवश में अंधी हो चुकी थी। जिसका नतीजा ये निकला कि एक दिन वो मुझे मेरे कमरे में अकेला देख कर आ धमकी और ज़बरदस्ती मुझसे सेक्स संबंध बनाने को कहने लगी। मैं उसकी उस हरकत और बातों से बहुत गुस्सा हुआ। जबकि वो मुझसे लपटी पड़ी थी। तभी इस बीच मेरी पत्नी आ गई। उसने गौरी को मुझसे छुड़ाया और उसे घसीटते हुए कमरे से बाहर ले गई। मेरी पत्नी ने उस सबके कैमरे द्वारा फोटोग्राफ्स भी निकाले थे। ऐसा इस लिए क्योंकि अगर हम गौरी की इन हरकतों के बारे में घर में किसी से बताते तो कोई भी हमारी बात पर यकीन ही न करता। क्योंकि सब गौरी को बहुत ही ज्यादा संस्कारी और आदर्श औरत मानते थे। ख़ैर उस दिन हमारे पास सबूत भी था इस लिए सबको मानना ही पड़ा और फिर सबकी सहमति से ही मैने उसे और उसीए बच्चों को हवेली से बाहर निकाल दिया। हवेली से बाहर मैने उसे खेतों पर बने मकान में रहने की रियायत ज़रूर दे दी थी। ऐसा इस लिए क्योंकि वो आख़िर थी तो हमारे खानदान की बहू ही। हमने सोचा था कि हवेली से दूर खुतों पर बने मकान में रहेगी तो सब कुछ ठीक ही रहेगा। मगर हमारा ऐसा सोचना भी ग़लत हो गया। क्योंकि वो खेतों पर काम कर रहे मजदूरों पर ही वासना और हवस के चलते डोरे डालने लगी थी। एक दिन हमारे एक मजदूर ने इस बारे में मुझसे डरते हुए बताया।
उसकी बात सुनकर मुझे गौरी पर हद से ज्यादा गुस्सा आया। उसके बाद मैने फैसला कर लिया कि अब उसे और उसके बच्चों को मैं उस गाॅव में नहीं रहने दूॅगा। क्योंकि इससे हमारी और हमारे खानदान की बहुत बदनामी होती। अतः मैने उसे हर चीज़ से बेदखल कर दिया। गौरी का लड़का थोड़ा बहुत समझदार था मगर वो भी अपनी माॅ की बातों को ही सच मानता था। उसे लगता था कि हमने उसकी माॅ को बेवजह ही हवेली से निकाला था। वो अपना और अपनी माॅ बहन का घर खर्चा चलाने के लिए मुम्बई में कहीं नौकरी करने चला गया था। जबकि उसके पीछे यहाॅ उसकी माॅ ये सब गुल खिला रही थी। ख़ैर, एक दिन बाद पता चला कि विराज अपनी माॅ व बहन को अपने साथ मुम्बई ले गया। उसके बाद अभी कुछ समय पहले से ही ये सब शुरू हुआ। यानी विराज ये सोच कर मुझसे बदला ले रहा है कि मैने उसके और उसके परिवार के साथ ग़लत किया है।"
"ओह तो ये हैं सारी बातें।" सब कुछ सुनने के बाद चौधरी ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"लेकिन इतना कुछ हुआ और तुमको अंदाज़ा भी न हुआ कि ये सब तुम्हारे भतीजे ने ही किया है?"
"अंदाज़ा तो तब होता चौधरी साहब।" अजय सिंह ने कहा___"जब मुझे उससे इस सबकी उम्मीद होती। मैं तो यही समझता था कि वो लड़का निहायत ही सीधा सादा और भोला है। भला मुझे क्या पता था कि वो किसी डायनामाइट से कम नहीं है।"
"ख़ैर।" चौधरी ने पहलू बदला___"हमने सुना है कि तुम्हारी अपनी बेटी जो कि पुलिस इंस्पेक्टर है वो आजकल तुम्हारे खिलाफ़ हो चुकी है। ये क्या चक्कर है?"
"चक्कर वक्कर कुछ नहीं है चौधरी साहब।" अजय सिंह मन ही मन बुरी तरह चौंका था किन्तु चेहरे पर चौंकने के भावों को आने न दिया था, बोला___"दरअसल बात ये है कि हमें उसका पुलिस की नौकरी करना ज़रा भी पसंद नहीं था। जबकि पुलिस की नौकरी करना उसका शौक था बचपन से ही। मैने और मेरी पत्नी प्रतिमा ने उससे कहा कि ये पुलिस की नौकरी छोंड़ दो, भला उसे नौकरी करने ज़रूरत ही क्या है? उसे जिस चीज़ की भी ज़रूरत होती है हम उसके बोलने से पहले ही वो चीज़ लाकर उसके क़दमों में डाल देते हैं। मगर वो हमारी बात सुनती ही नहीं। बचपन से ही ज़िद्दी थी वो। एक दिन उसकी माॅ ने कदाचित कुछ ज्यादा ही कड़े शब्दों में कह दिया था। जिसकी वजह से वो गुस्सा हो गई और कहने लगी कि उसे हमारी किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है। वो अपनी ज़रूरतें खुद पूरी कर लेगी। बस उस दिन के बाद से वो ना तो मुझसे बोलती है और ना ही अपनी माॅ से। यहाॅ तक कि घर भी नहीं आती।"
"बड़ी अजीब बात है।" दिवाकर चौधरी ने कहा__"भला तुम लोगों को उसका नौकरी करने से एतराज़ क्यों है? आज की जनरेशन ज़रा एडवाॅस टेक्नालाॅजी में सम्मिलित है। वो खुद पर और अपने टैलेन्ट के बल पर ही जीवन जीना चाहते हैं। अतः तुम दोनो का उसका नौकरी करने से ऐतराज़ करना सरासर ग़लत था।
ख़ैर, जैसा कि तुमने बताया कि उस दिन से वो घर भी नहीं आती है तो सवाल ये है कि वो रहती कहाॅ है फिर? क्या तुमने पता करने की कोशिश नहीं की कि तुम्हारी लड़की रहती कहाॅ है? दिन का तो चलो ठीक है कि वो पुलिस में अपनी ड्यूटी के चलते कहीं न कहीं ब्यस्त ही रहती होगी मगर रात को? रात को कहाॅ रहती होगी वो?"
"पुलिस वाली है चौधरी साहब।" अजय सिंह ने कहा__"खुद कमाती है। इस लिए कहीं न कहीं अपने रहने के लिए कोई किराये से कमरा ले लिया होगा।"
"ये तो तुम संभावना ब्यक्त कर रहे हो ठाकुर।" चौधरी ने कहा___"जबकि तुम्हें खुद पता लगाना चाहिए था कि अगर वो लौटकर हवेली नहीं आती है तो रहती कहाॅ है? कैसे बाप हो तुम ठाकुर?"
अजय सिंह कुछ बोल न सका। उसे एहसास था कि चौधरी सच कह रहा था कि उसे खुद अपनी बेटी के बारे में पता करना चाहिए था। भले ही वो पुलिस वाली थी मगर ये भी सच था कि वो एक लड़की भी थी। वो भले ही अपनी सुरक्षा बखूबी कर ले मगर वो तो उसका बाप था न? उसे तो अपनी बेटी की चिन्ता होनी चाहिए थी। अजय सिंह सोचो में गुम तो था मगर उसके ज़हन में ये भी था कि रितू के साथ उसकी छोटी बहन नैना भी है। शायद यही वजह थी कि उसने अब तक पता करने की कोशिश नहीं की थी कि वो दोनों कहाॅ रहती हैं? अकेले रितू बस होती तो उसे चिंता यकीनन होती मगर उसके साथ में नैना जैसी पढ़ी लिखी व समझदार उसकी बहन भी थी। इस लिए वो बेफिक्र था अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए।
"क्या सोचने लगे ठाकुर?" उसे सोचों में गुम देख कर चौधरी ने कहा___"ख़ैर छोंड़ो यार, ये तुम्हारे घर की बात है तुम्हें जो उचित लगे वो करो। अच्छा एक बात बताओ।"
"ज जी????" अजय सिंह चौंका___"प..पूछिए।"
"क्या ऐसा हो सकता है।" चौधरी ने बड़े ग़ौर से अजय सिंह को देखते हुए कहा___"तुम्हारी बेटी और तुम्हारा भतीजा विराज एक हो गए हों? क्या ऐसा हो सकता है कि विराज ने तुम्हारी बेटी को अपने साथ मिला लिया हो??"
"प..प.पता नहीं।" अजय सिंह के ऊपर जैसे एकाएक सारा आसमान भरभरा कर गिर पड़ा था। बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हालते हुए कहा उसने___"आप ऐसा क्यों कह रहे हैं चौधरी साहब? जबकि ऐसा हर्गिज़ नहीं हो सकता। इसकी वजह ये है कि मेरे तीनो ही बच्चे उसकी माॅ की हरकतों की वजह से उससे और उसकी माॅ बहन से कभी कोई बात करने की तो बात दूर बल्कि उन्हें देखना तक पसंद नहीं करते।"
"ऐसा तुम सोचते हो ठाकुर।" दिवाकर चौधरी ने दार्शनिकों वाले अंदाज़ में कहा___"जबकि अक्सर ऐसा हो जाया करता है जिसकी हमें पूरी उम्मीद होती है कि ऐसा तो कभी हो ही नहीं सकता।"
"क्या मतलब???" अजय सिंह चकरा सा गया।
"मतलब साफ है ठाकुर।" चौधरी ने कहा___"तुम ये सोच कर ये नहीं मान रहे हो कि तुम्हारी बेटी विराज को देखना तक पसंद नहीं करती इस लिए वो उससे मिल नहीं सकती जबकि ऐसा हो भी सकता है कि वो उससे मिल ही गई हो।
विराज की कारगुजारियों से इतना तो पता चल ही गया है कि वो कितना शातिर दिमाग़ रखता है और कितनी ऊॅची पहुॅच भी रखता है। अतः अगर वो अपने शातिर दिमाग़ के चलते तुम्हारी बेटी को अपनी तरफ कर भी ले तो हैरत की बात नहीं होगी। संभव है कि उसने रितू को ऐसा कोई पाठ पढ़ा दिया हो जिसके चलते तुम्हारी बेटी का ब्रेन वाश हो गया हो और अब वो उसे सही मान रही हो और तुम्हें यानी कि अपने बाप को ग़लत।"
अजय सिंह मंत्री की सूझ बूझ तथा उसकी दूरदर्शिता की मन ही मन दाद दिये बिना न रह सका। सच्चाई भले ही कुछ और थी मगर जितना उसने उहे बताया था उस हिसाब से कड़ियों को जोड़ कर सच्चाई के रूप में अपनी संभावनाएॅ इस तरह बयां करना आसान बात न थी। सहसा उसे ख़याल आया कि जबसे वो यहाॅ आया है तब से मंत्री सिर्फ उसी के संबंध में बातें पूछ रहा है जबकि उसे अब तक यही समझ में नहीं आया था कि मंत्री ने आख़िर उसे बुलाया किस लिए था??
"भगवान जाने चौधरी साहब।" फिर उसने पहलू बदलने की गरज से कहा___"कि सच्चाई है इस संबंध में। ख़ैर छोंड़िये ये सब और ये बताइये कि इस नाचीज़ को किस लिए बुलाया था आपने?"
अजय सिंह द्वारा अचानक ही इस तरह पहलू बदल लेना चौधरी को मन ही मन चौंकाया मगर उसने उसे ज़ाहिर न किया। बल्कि उसके पूछने पर वह मुस्कुराया और सेन्टर टेबल पर सजे फल फूल व मॅहगी शराब की तरफ इशारा किया।
"ये तो कमाल हो गया ठाकुर।" फिर चौधरी ने मुस्कुराते हुए ही कहा___"तुम आज यहाॅ पहली बार आए और हमने बातों के चक्कर में ये भी ख़याल नहीं रखा कि घर आए मेहमान का आतिथ्य भी किया जाता है।"
"मैं कोई मेहमान नहीं हूॅ चौधरी साहब।" अजय सिंह ने भी मुस्कुराते हुए कहा___"आपने मुझे दोस्त कह कर मेरा मान बढ़ा दिया है यही बहुत है मेरे लिए। इस नाते अब तो ये भी अपना ही घर हुआ और अपने ही घर में भला कोई मेहमान कैसा हो सकता है?"
"हाॅ तो सही कहा तुमने।" चौधरी हॅसा और फिर बगल से ही बैठे अशोक, अवधेश व सुनीता की तरफ इशारा करते हुए कहा___"इनसे मिलो ठाकुर, ये सब भी हमारे गहरे दोस्त हैं। बल्कि यूॅ समझो कि ये तीनो हमारे दोस्तों की लिस्ट में सबसे ऊपर हैं और आज से तुम भी शामिल हो गए हो।"
"ये तो मेरा सौभाग्य है चौधरी साहब।" अजय सिंह ने खुश होते हुए कहा___"जो आपने मुझे अपने दोस्त का दर्ज़ा दिया है। मैं पूरी कोशिश करूॅगा कि इस दोस्ती पर खरा उतर सकूॅ।"
"चलो फिर इसी बात पर एक एक जाम हो जाए।" चौधरी ने मुस्कुराते हुए कहा___"और हमारी दोस्ती को सेलीब्रेट किया जाए।"
"जी बिलकुल।" अजय सिंह हॅसा और उन तीनों की तरफ देख कर उन तीनो से हैलो किया तथा हाॅथ भी मिलाया। चौधरी के कहने पर सुनीता ने सबके लिए जाम बनाया और साक़ी बन कर सबको पिलाया भी। इस बीच चौधरी ने अजय सिंह को बताया कि सुनीता उसके साथ साथ बाॅकी उन दोनो को भी हर तरह से खुश रखती है।
अजय सिंह ये जान कर हैरान भी हुआ था। मगर फिर ये सोच कर मुस्कुराया भी कि चौधरी भी उसी की तरह ही औरतबाज है।
लगभग आधा घंटे से ऊपर तक जामों का दौर चलता रहा। सब के सब हल्के नशे के सुरूर में आ चुके थे। उसके बाद बातों का सिलसिला फिर से शुरू हुआ। अजय सिंह सबसे काफी खुल चुका था। बाॅकी सब भी अजय सिंह से खुल चुके थे। सुनीता को अजय सिंह की पर्शनाल्टी पहली नज़र में ही भा गई थी और वो उसके नीचे लेटने के लिए बेक़रार हो उठी थी। मगर अभी उसको भी पता था कि उसकी ये बेक़रारी शान्त नहीं होने वाली है। यानी कुछ समय तक इन्तज़ार करना पड़ेगा उसे।
"मज़ा आ गया चौधरी साहब।" अजय सिंह ने नशे के हल्के सुरूर में मुस्कुराते हुए कहा___"आप सच में बहुत अच्छे हैं। एक पल के लिए भी मुझे ऐसा नहीं लगा जैसे इसके पहले आप मेरे लिए ग़ैर थे। सच कहता हूॅ आपसे मिल कर और आपका दोस्त बन कर बहुत अच्छा लग रहा है। बहुत दिनों बाद ऐसे खुश होने का मौका मिला है मुझे।"
"अभी तो इससे भी ज्यादा मज़ा आएगा ठाकुर।" चौधरी ने भी नशे के हल्के सुरूर में कहा___"हमारी दोस्ती में और हमारे साथ में ऐसा ही होता है। हमें वही इंसान अच्छा लगता है जो हमसे वफ़ा करे। वफ़ादार ब्यक्ति के लिए हम कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं।"
"मैं ज़रूर आपका वफ़ादार रहूॅगा चौधरी साहब।" अजय सिंह ने कहा___"आप जब भी मुझे याद करेंगे मैं आपके सामने हर काम छोंड़ कर हाज़िर हो जाऊॅगा। मुझे भी वफ़ादार इंसान ही अच्छे लगते हैं जो दोस्त के लिए कुछ भी कर जाए मगर...।"
"मगर क्या ठाकुर।" चौधरी ने सिर उठा कर अजय सिंह की तरफ देखा___"तुम्हारे स्वागत में हमसे कोई कमी हो गई है क्या? अगर ऐसा है तो बेझिझक बोल दो यार। जो बोलोगे वो मिलेगा तुम्हें। ये दिवाकर चौधरी का वचन है।"
"न नहीं नहीं चौधरी साहब।" अजय सिंह ने हड़बड़ाते हुए कहा___"आपने किसी बात की कमी नहीं की है। मेरे कहने का मतलब ये था कि आपने मुझे बताया नहीं कि आपने मुझे किस वजह से यहाॅ बुलाया था? देखिए अब तो हम दोनो दोस्त बन गए हैं न। इस लिए अगर कोई बात है आपके मन में तो बेझिझक कहिए। मैं वादा करता हूॅ कि अगर मेरे लिए आपका कोई आदेश है तो मैं जान देकर भी उसे पूरा करूॅगा।"
अजय सिंह की बात इस पर चौधरी ने उसे बड़े ध्यान से देखा जैसे जाॅच रहा हो कि उसकी बात पर कितना दम है। फिर अपने हाॅथ में लिए शराब के प्याले को मुह से लगा कर शराब का हल्का सा घूॅट लिया उसके बाद अजय सिंह की तरफ देखते हुए कहा___"आदेश तो कुछ भी नहीं है ठाकुर। बस ये समझो कि आज के समय में जो तुम्हारा दुश्मन है वही हमारा भी दुश्मन है।"
"ये आप क्या कह रहे हैं चौधरी साहब?" अजय सिंह ने ऑखें फैलाते हुए कहा____"मेरा दुश्मन तो मेरा वो हरामज़ादा भतीजा बना हुआ है किन्तु वो आपका दुश्मन कैसे बन गया? बात कुछ समझ में नहीं आई चौधरी साहब।
"
"तुमने कुछ समय पहले किसी लड़की के सामूहिक रेप के बारे में तो सुना ही होगा न?" चौधरी ने कहा।
"र रेप के बारे में???" अजय सिंह के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभरे। फिर सहसा जैसे उसे याद आया___"ओह हाॅ हाॅ सुना था। आप उसी रेप स्कैण्डल की बात कर रहे हैं न जिस पर कुछ समय पहले काफी हो हल्ला हुआ था? मगर फिर सब कुछ शान्त हो गया था। उसके बाद कुछ पता ही नहीं चला कि क्या हुआ? मगर आपका उस रेप केस से क्या संबंध?"
"दरअसल वो रेप हमारे बच्चों की करतूत का नतीजा था ठाकुर।" चौधरी ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"तुम्हारे गाॅव के ही पास की एक विधी नाम की लड़की थी जिसके साथ हमारे बच्चों ने मिल कर रेप किया था। वो लड़की हमारे बच्चों के ही काॅलेज में पढ़ती थी। उस रेप केस पर हो हल्ला तो ज़रूर हुआ था किन्तु उस पर कोई शख्त ऐक्शन इस लिए नहीं लिया गया था क्योंकि मामला हमारे बच्चों का था। यहाॅ का पुलिस कानून हमारे खिलाफ कोई क़दम उठा ही नहीं सकता था। ये बात उस लड़की के घरवालों को भी समझ आ गई थी। इसी लिए लड़की के घरवालों ने भी कोई केस नहीं किया था और इसी वजह से मामला शान्त पड़ गया था। मगर....।"
"मगर????" अजय सिंह के चेहरे पर हैरत के भाव थे।
"मगर रेप के तीसरे दिन हमारे बच्चे हमारे ही फार्महाउस से गायब हो गए।" चौधरी कह रहा था___"और अब तक उनका कहीं कुछ पता नहीं चल सका है। उन बच्चों में एक हमारा बेटा है और तीन लड़कों में से एक अशोक का है दूसरा अवधेश का और तीसरा सुनीता का। हमने सब कुछ करके देख लिया मगर आज तक कहीं भी बच्चों का पता नहीं चला। सबसे गज़ब तो तब हो गया जब हमारी बेटी भी गायब हो गई।"
"ये आप क्या कह रहे हैं चौधरी साहब??" अजय सिंह हक्का बक्का नज़र आने लगा था, बोला___"मगर आपके बच्चों को गायब किसने किया हो सकता है? और अगर बच्चे अगर रेप के बाद से ही गायब हैं तो ज़ाहिर सी बात है कि उन्हें उसी ने गायब किया होगा जिसके साथ उन बच्चों ने अहित किया है। लेकिन गायब करने वाले का आपके पास कोई फोन या किसी तरह की सूचना तो आनी ही चाहिए थी। सीधी सी बात है कि अगर ये सब उसने बदला लेने के उद्देष्य से किया है तो वो देर सवेर ये ज़रूर सूचित करता कि आपके बच्चे उसके कब्जे में हैं।"
"बिलकुल सही कहा तुमने ठाकुर।" चौधरी एकाएक कह उठा__"उसे ज़रूर सूचित करना चाहिए था और उसने ऐसा किया भी है।"
"क्या????" अजय सिंह चौंका___"मेरा मतलब है कि क्या सूचित किया उसने?"
"उसने फोन पर हमें बताया कि हमारे बच्चे उसके कब्जे में ही हैं।" चौधरी ने कहा___"और ये भी बताया कि वो उनके साथ क्या करेगा? शुरू शुरू में तो हमें समझ ही नहीं आया कि ऐसा कौन कर सकता है, क्योंकि हमें यही पता नहीं था कि हमारे बच्चों ने किस लड़की के साथ वो सब किया था? दूसरी बात हम ये सोच रहे थे कि अगर मामला इतना बड़ा था तो पुलिस केस ज़रूर होता।
इस लिए ये जानने के लिए हमने यहाॅ के पुलिस कमिश्नर से भी बात की थी मगर उसने बताया कि पुलिस ने कोई केस नहीं बनाया। पुलिस केस भी तभी बनाती जब लड़की के घर वाले एफआईआर कराने थाने में जाते। मगर लड़की के घर वाले तो पुलिस की दहलीज़ पर गए ही नहीं थे। हमने भी यही समझा था कि वो हमसे डर गए होंगे इसी लिए पुलिस केस नहीं किया। मगर फिर उस किडनैपर से और अशोक के द्वारा ही समझ में आया कि ऐसा कौन और क्यों कर सकता है?"
"ओह तो फिर क्या समझ आया आपको?" अजय सिंह ने पूछा।
"रेप पीड़िता के घर वाले तो ऐसा कर नहीं सकते।" चौधरी ने कहा___"क्योंकि उन्हें पता था कि पुलिस केस से कुछ होने वाला नहीं है और ऐसा करने की क्षमता उनमें थी नहीं। मगर अशोक ने अपने तरीके से पता लगाया कि एक शख्स और है ऐसा जो हमारे बच्चों को इस संबंध में किडनैप कर सकता है।"
"ऐसा शख्स भला कौन हो सकता है चौधरी साहब?" अजय सिंह चौंका।
"तुम्हारा भतीजा विराज।" चौधरी ने मानो अजय सिंह के सिर पर बम्ब फोड़ा।
"क्या????" अजय सिंह इस तरह उछला था जैसे औसके पिछवाड़े पर किसी ने चुपके से गर्म तवा रख दिया हो। फिर हैरत से ऑखें फाड़े हुए बोला___"ये आप क्या कह रहे हैं? भला विराज ऐसा क्यों करेगा?"
"इसकी बहुत बड़ी वजह है ठाकुर।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"दरअसल जिस लड़की का रेप किया था हमारे बच्चों ने उस विधी नाम की लड़की से तुम्हारा भतीजा विराज प्रेम करता था। जब उसे अपनी प्रेमिका के साथ हुए उस भयावह रेप का पता चला तो वो आग बबूला हो गया होगा और फिर मुम्बई से यहाॅ आ कर उसने अपनी प्रेमिका के साथ हुए रेप का बदला लेने के लिए ये सब कारनामा अंजाम दिया। हलाॅकि ये एक संभावना है ठाकुर क्योंकि हमारे पास अभी इस बात का कोई सबूत नहीं है कि विराज ही ये सब कर रहा है। संभावना इस लिए है क्योंकि ये काम या तो विधी के घर वाले कर सकते या फिर विराज। दोनो के ही पास ये सब करने की मजबूत वजह थी। ख़ैर जब हमें अशोक की तहकीक़ात से ये पता चला कि विधी किसी विराज नाम के लड़के से प्रेम करती थी तो हमने विराज के बारे में भी जानकारी हाॅसिल की। उसी जानकारी के तहत ये पता चला कि तुम्हारा भी विराज के साथ ऐसा ही कुछ हाल है। इस लिए हमने सोचा तुमसे मिल कर ही इस संबंध में बात की जाए।"
"सच कहूॅ तो ये बात मेरे लिए निहायत ही नई और चौंकाने वाली है चौधरी साहब।" अजय सिंह के मस्तिष्क में धमाके से हो रहे थे। उसके दिमाग़ की बत्ती भी एकाएक जल उठी थी। अब उसे समझ आया था कि विराज मुम्बई से यहाॅ किस लिए आया था? इसके पहले वो सोच सोच कर परेशान था कि विराज यहाॅ किस वजह से आया रहा होगा।
ख़ैर उसने इन सब बातों को अपने दिमाग़ से झटका और फिर बोला___"मुझे तो पता क्या बल्कि इस बात का अंदाज़ा ही नहीं था कि मेरे भतीजे का किसी लड़की से प्रेम संबंध भी हो सकता है और वो उसके चक्कर में आपके साथ इतना कुछ कर सकता है।"
"दूसरी बात ये कि हम तुम्हारी बेटी के विराज से मिल जाने की बात इस लिए कह रहे हैं क्योंकि वो एक पुलिस ऑफिसर थी।" चौधरी कह रहा था___"उसके थाना क्षेत्र के अंतर्गत रेप की वो वारदात हुई थी। इस लि ऐसा हो ही नहीं सकता कि उसे उस वारदात का पता ही न चला हो। बल्कि ज़रूर चला होगा और जब उसने विधी को उस हालत में देखा होगा तो खुद ही कानूनन कोई ऐक्शन लेने का सोचा होगा। मगर ऐक्शन वो बिना आला ऑफिसर की अनुमति से कैसे ले सकती थी अथवा बिना पीड़िता के घर वालों द्वारा दर्ज़ करवाई गई एफआईआर के कैसे लेसकती थी? कमिश्नर ने उसे इस केस को बनाने से शख्त मना कर दिया होगा। ख़ैर, क्योंकि वो भी पुलिस वाली के साथ साथ एक लड़की थी इस लिए उसे उस रेप पीड़िता विधी से हमदर्दी हुई होगी। जिसके तहत वो उसी हमदर्दी के तहत विधी से मिलने भी गई होगी। उधर विधी के साथ हुई उस घटना की जानकारी किसी तरह विराज को भी हुई और वो फौरन ही मुम्बई से अपनी प्रेमिका के पास आ गया होगा। अतः संभव है कि इसी दौरान विराज की मुलाक़ात तुम्हारी बेटी से हुई हो और उसे भी ये पता चल गया हो कि विधी और विराज दरअसल प्रेमी कॅपल थे। ऐसी मार्मिक घटना के बीच किसी के अंदर मौजूद नफ़रत अगर प्यार में परिवर्तित हो जाए तो कोई हैरत की बात नहीं। ठाकुर, बस इसी वजह से हम कह रहे हैं कि तुम्हारी बेटी इन हालातों में विराज से मिल गई होगी। बाॅकी सच्चाई क्या है ये तो ईश्वर ही बेहतर तरीके से जानता है।"
अजय सिंह चौधरी की संभावना से भरी बातों को सुन कर बुरी तरह चकित था। उसे लगा कहीं यही सब सच तो नहीं? चौधरी की बातों में उसे सच्चाई की बू आ रही थी। हलाॅकि उसे तो पता ही था कि उसकी बेटी विराज का साथ दे रही है आजकल। उसने ये बात चौधरी से बताई नहीं थी, इसकी वजह ये थी कि फिर उसे और भी सारी बातें बतानी पड़ती जिनका हक़ीक़त से संबंध था। मगर अजय सिंह हक़ीक़त बता नहीं सकता था। उसे लगता था कि हक़ीक़त बताने से उसका कैरेक्टर चौधरी के सामने नंगा हो कर रह जाएगा।
"आपकी बातें और आपकी संभावनाएॅ सच भी हो सकती हैं चौधरी साहब।" फिर अजय सिंह ने कहा___"मगर क्योंकि महज संभावनाओं के आधार पर ही तो नहीं चला जा सकता न। इस लिए हमें साथ मिल कर सारी बातों का पता लगाना होगा।"
"हम भी यही कहना चाहते हैं तुमसे।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"मगर हमारे सामने समस्या ये है कि इस मामले में हम कोई भी क़दम खुल कर नहीं उठा सकते।
क्योंकि तुम्हारे भतीजे ने साफ शब्दों में धमकी दी है कि अगर हमने कुछ उल्टा सीधा करने की कोशिश की तो वो हमें ही नहीं बल्कि इन तीनों को भी बीच चौराहे पर नंगा दौड़ा देगा।"
"ये क्या कह रहे हैं आप?" अजय सिंह चौधरी की ये बात सुन कर बुरी तरह हैरान रह गया था, बोला__"भला वो ऐसा कैसे कर सकता है?"
"दरअसल।" चौधरी ने ज़रा झिझकते हुए कहा___"उसके पास हम सबके खिलाफ़ ऐसे सबूत हैं जो अगर पब्लिक के सामने आ जाएॅ तो हम चारों का बेड़ा गर्क हो जाएगा।"
चौधरी की बात सुन कर अजय सिंह चौधरी को इस तरह देखने लगा था जैसे अचानक ही उसके सिर पर गधे का सिर नज़र आने लगा हो। अजय सिंह ये सोच कर भी हक्का बक्का रह गया था कि विराज के पास उसके खिलाफ़ तो उसका बेड़ा गर्क कर देने वाला सबूत था ही और अब चौधरी के खिलाफ़ भी ऐसा सबूत है उसके पास। अजय सिंह को लगा कि उसे चक्कर आ जाएगा ये जान कर मगर फिर उसने खुद को बड़ी मुश्किल से सम्हाला। उसे ये भी समझ आ गया कि जिस उम्मीद से और खुशी से वह चौधरी के पास आया था वो चौधरी तो खुद ही विराज के सामने भीगी बिल्ली बना बैठा है। ये सोचते ही अजय सिंह का सारी उम्मीद और सारी खुशी एक ही पल में नेस्तनाबूत हो गई।
"ये तो बहुत ही गजबनाक बात कह रहे हैं आप।" फिर उसने खुद को सम्हालते हुए कहा___"बड़े आश्चर्य की बात है चौधरी साहब कि आप जैसा इंसान सब कुछ करने की क्षमता रखते हुए भी कुछ नहीं कर सकता है।"
"ये सच है ठाकुर।" चौधरी ने गंभीर भाव से कहा___"जब तक उसके पास हमारे खिलाफ़ वो सबूत हैं तब तक हम कोई ठोस क़दम उठाने का सोच भी नहीं सकते हैं। दूसरी बात उसके कब्जे में हमारे बच्चे भी हैं जिनके साथ वो कुछ भी उल्टा सीधा कर सकता है। ऐसे हालात में हम उसके खिलाफ भला कोई कठोर क़दम कैसे उठा सकते हैं? इस लिए हमने सोचा कि हमारा जो दुश्मन है वही तुम्हारा भी है तो तुम ज़रूर इस मामले में कोई ठोस कार्यवाही कर सकते हो। यकीन मानो ठाकुर, अगर तुम उस नामुराद का पता करके तथा उसके कब्जे से हमारे बच्चों के साथ साथ उस सबूत को भी लाकर हमारे हवाले कर दो तो हम जीवन भर तुम्हारे एहसानमंद रहेंगे। तुम जिस चीज़ की हसरत करोगे वो चीज़ हम लाकर तुम्हें देंगे।"
मंत्री की ये बात सुन कर अजय सिंह चकित रह गया था। उसके मुख से कोई लफ्ज़ न निकल सका था। चौधरी उससे मदद की उम्मीद किये बैठा था जबकि उसे पता ही नहीं था कि इस मामले में तो वो खुद भी पंगु हुआ बैठा है। कितनी अजीब बात थी दोनो एक दूसरे से मदद की उम्मीद कर रहे थे जबकि दोनो ही एक दूसरे की कोई मदद नहीं कर सकते थे। अजय सिंह को एकाएक ही उसका भतीजा किसी भयावह काल की तरह लगने लगा था। उसके समूचे जिस्म में मौत की सी झुरझुरी दौड़ गई थी।
"क्या सोचने लगे ठाकुर।" उसे चुप देख कर चौधरी पुनः बोल पड़ा___"तुमने हमारी बात का कोई जवाब नहीं दिया।
जबकि हम तुमसे इस मामले में मदद की बात कर रहे हैं।"
"मैं तो ये सोचने लगा था चौधरी साहब।" अजय सिंह ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"कि एक पिद्दी से लड़के ने प्रदेश की इतनी बड़ी हस्ती का जीना हराम कर दिया है। अभी तक तो मैं यही सोच रहा था कि उसने तो सिर्फ मेरा ही जीना हराम किया हुआ था मगर हैरत की बात है कि उसने अपने निशाने पर आपको भी लिया हुआ है।"
"सब वक्त और हालात की बातें हैं ठाकुर।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"उसके पास हमारे खिलाफ़ सबूत भी हैं और हमारे बच्चे भी हैं जिनके तहत उसका पलड़ा बहुत भारी है। अगर कम से कम हमारे बच्चे उसके पास नहीं होते तो हम उसे बताते कि हमारे साथ ऐसी ज़ुर्रत करने की क्या सज़ा मिल सकती थी उसे? ख़ैर छोंड़ो, तुम बताओ कि क्या तुम इस मामले में हमारी कोई मदद कर सकते हो या नहीं?"
"मैं पूरी कोशिश करूॅगा चौधरी साहब।" अजय सिंह ने कहा___"कि मैं इस मामले में आपके लिए कुछ खास कर सकूॅ और जैसा कि आपको मैं बता ही चुका हूॅ कि वो नामुराद मुझे भी अपना दुश्मन समझता है और मुझसे बदला ले रहा है तो उस हिसाब से ये भी सच है कि मैं भी यही चाहता हूॅ कि जल्द से जल्द वो मेरी पकड़ में आ जाए। एक बार पता चल जाए कि वो कमीना किस कोने में छुपा बैठा है उसके बाद तो मैं उसका खात्मा बहुत ही खूबसूरत ढंग से करूॅगा।"
"ठीक है ठाकुर।" चौधरी ने कहा___"हम भी यही चाहते हैं कि उसके ठिकाने का पता किसी तरह से चल जाए। उसके बाद हमारे लिए कोई क़दम उठाना भी आसान हो जाएगा।"
ऐसी ही कुछ देर और कुछ बातें होती रहीं। शाम घिर चुकी थी और अब रात होने वाली थी। इस लिए अजय सिंह चौधरी से इजाज़त लेकर वापस हल्दीपुर के लिए निकल चुका था। सारे रास्ते वह चौधरी के बारे में सोचता रहा था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसका भतीजा इतना बड़ा सूरमा हो सकता है कि वो प्रदेश के मंत्री तक को अपनी मुट्ठी में कैद कर ले। उसने मंत्री से कह तो दिया था कि वो इस मामले में उसकी मदद करेगा मगर ये तो वही जानता था कि वो उसकी कितनी मदद कर सकता था? ख़ैर थका हारा व परेशान हालत में अजय सिंह अपनी हवेली पहुॅच गया था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो खुद अपने तथा चौधरी के लिए अब क्या करे?
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दोस्तो, आप सबके सामने अपडेट हाज़िर है,,,,,,,
आप सबकी प्रतिक्रिया तथा रिव्यू का इन्तज़ार रहेगा।
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.......《 54 》
अब तक,,,,,,
"सब वक्त और हालात की बातें हैं ठाकुर।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"उसके पास हमारे खिलाफ़ सबूत भी हैं और हमारे बच्चे भी हैं जिनके तहत उसका पलड़ा बहुत भारी है। अगर कम से कम हमारे बच्चे उसके पास नहीं होते तो हम उसे बताते कि हमारे साथ ऐसी ज़ुर्रत करने की क्या सज़ा मिल सकती थी उसे? ख़ैर छोंड़ो, तुम बताओ कि क्या तुम इस मामले में हमारी कोई मदद कर सकते हो या नहीं?"
"मैं पूरी कोशिश करूॅगा चौधरी साहब।
" अजय सिंह ने कहा___"कि मैं इस मामले में आपके लिए कुछ खास कर सकूॅ और जैसा कि आपको मैं बता ही चुका हूॅ कि वो नामुराद मुझे भी अपना दुश्मन समझता है और मुझसे बदला ले रहा है तो उस हिसाब से ये भी सच है कि मैं भी यही चाहता हूॅ कि जल्द से जल्द वो मेरी पकड़ में आ जाए। एक बार पता चल जाए कि वो कमीना किस कोने में छुपा बैठा है उसके बाद तो मैं उसका खात्मा बहुत ही खूबसूरत ढंग से करूॅगा।"
"ठीक है ठाकुर।" चौधरी ने कहा___"हम भी यही चाहते हैं कि उसके ठिकाने का पता किसी तरह से चल जाए। उसके बाद हमारे लिए कोई क़दम उठाना भी आसान हो जाएगा।"
ऐसी ही कुछ देर और कुछ बातें होती रहीं। शाम घिर चुकी थी और अब रात होने वाली थी। इस लिए अजय सिंह चौधरी से इजाज़त लेकर वापस हल्दीपुर के लिए निकल चुका था। सारे रास्ते वह चौधरी के बारे में सोचता रहा था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसका भतीजा इतना बड़ा सूरमा हो सकता है कि वो प्रदेश के मंत्री तक को अपनी मुट्ठी में कैद कर ले। उसने मंत्री से कह तो दिया था कि वो इस मामले में उसकी मदद करेगा मगर ये तो वही जानता था कि वो उसकी कितनी मदद कर सकता था? ख़ैर थका हारा व परेशान हालत में अजय सिंह अपनी हवेली पहुॅच गया था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो खुद अपने तथा चौधरी के लिए अब क्या करे?
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,,
मैंने दरवाजा खोला तो देखा बाहर रितू दीदी थी। मेरे द्वारा दरवाजा खुलते ही वो मुझे देख कर पहले तो मुस्कुराई फिर जैसे ही उन्हें देख कर मैं एक तरफ हुआ तो वो दरवाजे से अंदर की तरफ कमरे में आ गईं। उन्हें कमरे में आते देख मुझे समझ न आया कि रितू दीदी रात में सोने की बजाय इस वक्त यहाॅ मेरे पास किस वजह से आई हैं?
दरवाजा बंद करके मैं पलटा और बेड की तरफ आ गया। रितू दीदी बेड पर ही एक किनारे पर बैठी हुई थी। इस वक्त उनके खूबसूरत बदन पर नाइट ड्रेस था। मैं खुद भी एक हाफ बनियान और शार्ट्स में था। हलाॅकि मुझे उनके यहाॅ इस वक्त आने पर कोई ऐतराज़ नहीं था बल्कि मैं तो खुश ही हुआ था मगर सोचने वाली बात तो थी ही कि इस वक्त उनके यहाॅ आने की क्या वजह हो सकती है?
"कहीं मैने तुझे डिस्टर्ब तो नहीं किया न राज?" मुझे बेड की तरफ आते देख सहसा रितू दीदी ने बड़ी मासूमियत से कहा___"कहीं ऐसा तो नहीं कि मैने यहाॅ आ कर तेरी नींद में खलल डाल दिया हो?"
"ये आप कैसी बातें कर रही हैं दीदी?" मैं उनके पास ही बेड पर बैठते हुए बोला___"भला आपकी वजह से मैं कैसे डिस्टर्ब हो जाऊॅगा? बिलकुल भी नहीं दीदी, मुझे भी अभी नींद नहीं आ रही थी।"
"अच्छा भला वो क्यों?" रितू दीदी ने सहसा मेरे चेहरे की तरफ ग़ौर से देखते हुए कहा___"क्या विधी की याद आ रही थी?"
"उसकी याद आने का तो सवाल ही नहीं है।" मैने अजीब भाव से कहा___"क्योंकि मैं उसे एक पल के लिए भी भूलता ही नहीं हूॅ।
दूसरी बात याद तो उन्हें करते हैं न जिन्हें हम भूले हुए होते हैं?"
"ओह राज।" रितू दीदी ने एकदम से मेरा चेहरा अपनी हॅथेलियों के बीच ले लिया, और फिर भारी स्वर में मुझसे बोली___"मैं जानती हूॅ कि तू विधी को इतनी आसानी से भूल नहीं सकता है। आख़िर तुम दोनो ने एक दूसरे से टूट कर मोहब्बत जो की थी, ऊपर से वो सब हो गया। मगर भाई, उस सबको याद करने से भी भला क्या होगा? बल्कि होगा ये कि तू हर पल उसे याद करके दुखी होता रहेगा। इस लिए तू खुद को सम्हाल मेरे भाई और उस सबसे बाहर निकल। तुझे पता है न कि मैं तुझे अब किसी भी सूरत में दुखी होते हुए नहीं देख सकती हूॅ। अगर तू खुश नहीं रहेगा तो मैं भी खुश नहीं रहूॅगी। अब तो तेरे ही खुशी में मेरी खुशी है राज और तेरे दुख में मेरा दुख है।"
"मैं जानता हूॅ दीदी।" मैंने उदास भाव से कहा___"मगर क्या करूॅ? यादों पर मेरा कोई अख़्तियार ही नहीं है। दिन तो गुज़र जाता है किसी तरह मगर ये रात.....ये रात और रात की ये तन्हाई जाने कहाॅ से मेरे दिल को दुखी करने के लिए उसकी यादें ले आती हैं? बस उसके बाद सब कुछ ऐसा लगने लगता है जैसे इस संसार में अब कुछ भी नहीं रह गया ऐसा जिसकी वजह से मैं खुश हो सकूॅ।"
"ऐसा मत कह मेरे भाई।" रितू दीदी ने मुझे एकदम से खुद से छुपका लिया और फिर दुखी भाव से बोली___"हम सब भी तो हैं न जिनकी वजह से तू खुश हो सकता है। क्या सिर्फ विधी ही ऐसी थी जिसकी वजह से तू खुश हो सकता था? क्या गौरी चाची और गुड़िया कुछ भी नहीं जिनके लिए तू खुश रह सके?"
"हर रिश्ते की अपनी एक अलग अहमियत होती है दीदी।" मैने कहा___"मगर जो दिल का रिश्ता होता है और प्रेम के रिश्ते से जुड़ा होता है उसकी बात ही अलग होती है। हलाॅकि रिश्ता कोई भी हो उसके टूट जाने पर अथवा उसके न रह जाने पर तक़लीफ़ तो होती ही है। हम जिन्हें चाहते हैं तथा जिनसे प्रेम करते हैं वो अगर दुनियाॅ जहाॅन में हैं तो उनसे ताल्लुक न रहने के बाद भी इतनी तक़लीफ़ नहीं होती लेकिन अगर वो इस दुनियाॅ में ही नहों तो ये सोच सोच कर और भी ज्यादा तक़लीफ़ होती है कि अब वो इंसान उसे कभी भी नहीं मिल सकता। इंसान के दुनियाॅ में बने रहने से ये उम्मीद तो बनी ही रहती है कि कभी न कभी उसे वो ब्यक्ति मिलेगा ही। मगर......।"
"बस कर राज।" रितू दीदी फफक कर रो पड़ी___"मैं और कुछ नहीं सुन सकती। मुझे तो इतने से ही इतनी तक़लीफ़ हो रही है जबकि वो सब तो तेरे साथ घटा है तो तुझे कितनी ज्यादा तक़लीफ़ होती होगी। मुझे उस सबका एहसास है मेरे भाई मगर प्लीज....भगवान के लिए खुद को अपनी इस तक़लीफ़ से निकालने की कोशिश कर।"
"फिक्र मत कीजिए दीदी।" मैने दीदी को खुद से अलग कर उनके चेहरे को अपनी हॅथेलियों में लेते हुए कहा___"ये दुख तक़लीफ़ें लाख असहनीय सही मगर ये मुझे नेस्तनाबूत नहीं कर सकती हैं।
इतनी हिम्मत तो और इतनी कूबत तो है मुझमें कि मैं इन सबको जज़्ब कर सकूॅ। ख़ैर छोंड़िये ये सब और ये बताइये कि आप इस वक्त यहाॅ किस वजह से आई थी? क्या कोई काम था मुझसे?"
"क्या मैं तेरे पास बेवजह नहीं आ सकती राज?" रितू दीदी ने पुनः बड़ी मासूमियत से मुझे देखा था__"क्या मुझे अपने भाई के पास आने के लिए किसी वजह की ज़रूरत है?"
"नहीं दीदी ऐसी तो कोई बात नहीं है।" मैने झेंपते हुए कहा___"बल्कि आप जब चाहें तब मेरे पास आ सकती हैं। मैने तो हालातों के बारे में सोच कर आपसे ऐसा कहा था।"
"हालातों के बारे में बात करने के लिए दिन काफी है मेरे भाई।" रितू दीदी ने कहा___"कम से कम रात में तो उस सबसे दूर होकर हमें सुकून मिले। हर पल उसी के बारे में सोच सोच कर परेशान होना क्या अच्छी बात है?"
"आपने सही कहा दीदी।" मैने कहा___"हर वक्त एक ही चीज़ के बारे में सोच सोच कर परेशान होना बिलकुल भी उचित नहीं है। किन्तु ये भी सच है कि हालात ऐसे हैं कि हम भले ही ये सब सोच कर ऐसा कहें मगर ज़हन से वो सब बातें जाती भी तो नहीं हैं।"
"कोशिश करोगे तो ज़रूर जाएॅगी राज।" रितू दीदी ने कहा___"मगर तुम तो कोशिश ही नहीं करते हो। बस सोचते रहते हो जाने क्या क्या? अच्छा ये बता कि नीलम से क्या बात हुई थी तेरी?"
"बताया तो था आपको।" मैने कहा।
"हाॅ बताया तो था तूने।" रितू दीदी ने सहसा मुस्कुराते हुए कहा___"और ये भी बताया था कि कैसे तुम दोनो ट्रेन में धमाल मचा रखे थे।"
"क्या करता दीदी।" मैने सहसा गंभीर होकर कहा__"उसी सबके लिए तो तरसा था मैं। मैं हमेशा ये चाहता था कि नीलम मुझसे लड़ाई करे, हम दोनो के बीच में खूब शैतनी भरा माहौल बना रहा करे। मगर वो सब ख्वाहिशें ही रहीं। आज सुबह जब ट्रेन में नीलम मेरे ऊपर झुकी हुई मुझे देख रही थी तो अचानक ही मेरे मन में वो सब बातें आ गई थी और फिर मैने उसे छेंड़ा। उसके बाद सचमुच वैसा ही हुआ दीदी जैसे की मैं हमेशा आरज़ू किया करता था। उस वक्त मैं बहुत खुश था औरुझे पता था नीलम भी उस सबसे बेहद खुश थी। उसके हाव भाव से ज़ाहिर हो रहा था कि वो भी मेरे साथ वो सब करके उन पलों को एंज्वाय कर रही थी।"
"काश उस वक्त मैं भी वहाॅ होती राज।" रितू दीदी ने सहसा आह सी भरते हुए कहा___"मैं भी नीलम की तरह तेरे साथ वैसी ही मस्ती करती।"
"अरे पर आप कैसे करती दीदी?" मैं दीदी की ये बात सुन कर चौंक पड़ा था___"आप तो मुझसे बड़ी हैं न, जबकि नीलम और मैं एक ही ऊम्र के हैं इस लिए हमारे बीच वैसी मस्ती हो सकती थी।"
"तो क्या हुआ भाई?" रितू दीदी ने कहा___"मैं तुझसे बड़ी हूॅ तो क्या हुआ? क्या मैं बड़ी होने की वजह से अपने भाई के साथ मस्ती नहीं कर सकती? ये किस कानून की किताब में लिखा है मुझे बता तो ज़रा?"
"हाॅ लिखा तो नहीं है मगर।
" मैं दीदी की बात सुन कर सकपका गया था___"फिर भी आप मुझसे बड़ी तो हैं ही और मैं आपसे खुल कर वैसी मस्ती नहीं कर सकता था।"
"सीधे सीधे कह दे न कि तुझे मेरे साथ मस्ती करना पसंद ही नहीं आता।" रितू दीदी ने सहसा बुरा सा मुह बनाते हुए कहा___"एक नीलम ही बस तो है जिसके साथ तुझे वो सब करना अच्छा लगता है। जाओ मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी।"
रितू दीदी ये कहने के साथ ही मुझसे ज़रा हट कर बैठ गईं और एक तरफ को मुह फुला कर बैठ गईं। मैं ये सब देख कर भौचक्का सा रह गया। मुझे उनसे इस सबकी उम्मीद बिलकुल भी नहीं थी। कदाचित इस लिए क्योंकि उनका कैरेक्टर ही ऐसा था। वो शुरू से ही हिटलर स्वभाव की रही थी। उन्हें ये सब बिलकुल भी पसंद नहीं था। मगर इस वक्त वो हिटलर दीदी नहीं बल्कि किसी छोटी सी बच्ची की तरह मुह फुला कर एक तरफ बैठ गई थी। उनके चेहरे पर इस वक्त इतनी क्यूट सी नाराज़गी देख कर मैं हैरान भी था और अंदर ही अंदर ये सोच कर खुश भी कि इस वक्त रितू दीदी सच में किसी मासूम सी बच्ची की तरह लग रही थी। मुझे उनके इस तरह रूठ कर मुह फुला लेने से उन पर बेहद प्यार आया। मुझे ऐसा लगा जैसे इस क्यूट सी बच्ची पर मैं सारी दुनियाॅ हार जाऊॅ।
"अरे ये क्या बात हुई दीदी?" फिर सहसा मुझे वस्तुस्थित का बोध हुआ तो मैं उनके क़रीब जाते ही उनके कंधे पर हाॅथ रख कर बोला था मगर....।
"दूर रहो मुझसे।" रितू दीदी ने अपने कंधे से मेरे हाॅथ को झटकते हुए उसी रूठे हुए भाव से कहा___"और हाॅ मुझसे बात मत करो अब। मैं तुम्हारी कोई दीदी वीदी नहीं हूॅ। जाओ उस नीलम के पास।"
"ये आप कैसी बातें कर रही हैं दीदी?" मैं हैरान परेशान सा हो कर कह उठा___"आप तो मेरी सबसे अच्छी व सबसे प्यारी दीदी हैं। भला मैं आपसे कैसे दूर हो सकता हूॅ और आपसे बात न करूॅ ऐसा तो हो ही नहीं सकता।"
"बस बस खूब समझती हूॅ मैं।" रितू दीदी ने उसी अंदाज़ से मगर इस बार ज़रा तीखे भाव से कहा___"मस्का लगाना कोई तुमसे सीखे।"
"मैं मस्का नहीं लगा रहा दीदी।" मैं एक बार से उनके पास खिसक कर गया और फिर बोला___"मैं किसी की भी कसम खा कर कह सकता हूॅ कि आप मेरी सबसे अच्छी दीदी हैं और मेरे दिल में जो स्थान आपका है वो किसी और का नहीं हो सकता।"
मेरी इस बात का मानो तुरंत असर हुआ। रितू दीदी एकदम से मेरी तरफ इस तरह देखने लगीं थी जैसे उन्हें मेरी इस बात से कितनी ज्यादा खुशी हुई हो। फिर सहसा जैसे उन्हें याद आया कि वो तो मुझसे रूठी हुई थीं। इस लिए उनके चेहरे के भाव पलक झपकते ही पहले जैसे हो गए और वो फिर से मुह फुला कर एक तरफ को अपना चेहरा कर लिया। मुझे उनके इस तरह रंग बदल लेने से मन ही मन हॅसी तो आई मगर मैं हॅसा नहीं। वरना मुझे पता था कि उसके बाद कैसे हालात हो जाने थे।
"ठीक है दीदी आप मुझसे मत बात कीजिए।
" मैने इमोशनल ब्लैकमेल का नाटक किया___"शायद मेरा नसीब ही ऐसा है कि जिसे भी अपना समझता हूॅ वो मेरा अपना नहीं रहता। एक आप ही तो थी जिन्हें सबसे ज्यादा अपना समझता था और अपनी दुख तक़लीफ़ें दिखाता था मगर....।"
मेरा वाक्य पूरा भी न हो पाया था कि अचानक ही रितू दीदी की एक हॅथेली कुकर के ढक्कन की तरह मेरे मुह पर आकर फिट हो गई। उनकी ऑखों में ऑसू थे। वो मुझे इस तरह देखे जा रही थी जैसे कह रही हों कि आइंदा ऐसी बातें कभी मत करना।
"क्यों ऐसी बातें करता है राज?" फिर दीदी ने सहसा दुखी भाव से कहा___"क्या मैं तुझसे रूठ भी नहीं सकती? मुझे भी नीलम की तरह तुझसे लड़ना झगड़ना है भाई। मुझे भी अपने इस प्यारे भाई के साथ जी भर के मस्ती करनी है। तुझे तो पता है कि मुझे इसके पहले ये सब पसंद ही नहीं था मगर अब मुझे भी लगता है कि मैं तुझसे तेरी बड़ी बहन बन कर नहीं बल्कि तेरी छोटी बहन बन कर रूठूॅ लड़ूॅ और तुझे परेशान करूॅ। मगर तू ही नहीं चाहता कि मुझे भी वैसी खुशी मिले जैसे तुझे और नीलम को वो सब करके मिली थी।"
"ऐसा नहीं है दीदी।" मैने उनको उनके कंधों से पकड़ते हुए कहा___"हमारे पारिवारिक रिश्तों में मेरी और भी कई दीदी होंगी मगर मेरी जो सबसे ज्यादा फेवरेट दीदी है वो सिर्फ आप हो। आपके लिए हॅसते हॅसते अपनी जान भी दे सकता हूॅ मैं। ख़ैर अगर आपकी भी यही इच्छा है तो ठीक है दीदी अब से आप भी मुझसे नीलम की तरह रूठ सकती हैं और लड़ाई झगड़ा कर सकती हैं। मुझे खुशी होगी कि आप भी खुद को इस रूप में खुशी देना चाहती हैं।"
"हाॅ मगर ये तभी होगा न भाई जब तू मुझे भी तुम या तू कह कर संबोधित करे।" रितू दीदी ने कहा___"जैसे तू नीलम से करता है। तभी तो वो सब करने में मज़ा आएगा।"
"ऐसा कैसे हो सकता है दीदी?" मैं दीदी की बात सुन कर बुरी तरह हैरान रह गया था, बोला___"आप मुझसे बड़ी हैं इस लिए मैं उस सबके लिए आपके मान सम्मान को ताक पर नहीं रख सकता।"
"ठीक है मगर उस वक्त तो बोल सकता है न जब हम आपस में वैसी मस्ती करेंगे।" दीदी ने कहा___"बाॅकी आम सिचुएशन में तू वही बोलना जो अब तक बोलता आया है। और हाॅ अब यही फाइनल है। इससे आगे मुझे कुछ नहीं सुनना है, समझ गया न?"
मेरी हालत मरता क्या न करता वाली हो गई थी। मैं अब कुछ नहीं कह सकता था। अगर कहता या कोई ऑब्जेक्शन करता तो निश्चिय ही दीदी नाराज़ हो जाती जो कि मैं कभी नहीं चाह सकता था।
"ठीक है दीदी।" फिर मैने गहरी साॅस ली___"जैसा आपको अच्छा लगे।"
"गुड।" दीदी के चेहरे पर रौनक आ गई___"तो शुरू करें?"
"क्या मतलब??" मैं उनकी इस बात से एकदम से चकरा गया।
"अरे वही भाई।" दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा___"जो तू नीलम के साथ कर रहा था। मैं चाहती हूॅ कि श्रीगणेश हो ही जाए मस्ती का।"
"पर दीदी इस वक्त ये सब??" मैं बुरी तरह घबरा सा गया था।
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करूॅ?
"इस वक्त क्या??" रितू दीदी ने ऑखें दिखाई।
"आप भी कमाल करती हैं।" मैने कहा___"भला ये भी कोई वक्त है इन सब चीज़ों का? हमारी वजह से बेकार में ही सब लोगों की नींद का कबाड़ा हो जाएगा। वैसे भी आज सब बहुत थके हुए हैं। इस लिए इस वक्त नहीं दीदी हम दिन में किसी वक्त धमाल कर लेंगे।"
"हाॅ ये तो सच कहा तूने।" रितू दीदी ने कहा___"सचमुच सबकी नींद का सत्यानाश हो जाएगा। चल कोई बात नहीं। इस वक्त तो तुझे बक्श दिया मगर याद रख कल छोंड़ूॅगी नहीं तुझे।"
"क्या???" मैं दीदी की इस बात से चौंका। फिर सहसा ऊपर की तरफ देखते हुए बोला___"हे भगवान मुझे शैतान की इस बच्ची से बचा लेना।"
"क्या कहा तूने?" रितू दीदी की ऑखें फैल गईं। वो एकदम से मेरी तरफ पलटीं फिर बोली___"मैं शैतान की बच्ची? रुक बताती हूॅ तुझे।"
इससे पहले कि मैं अपने बचाव के लिए कुछ कर पाता रितू दीदी मुझ पर झपट पड़ीं। उन्होंने मुझे धक्का दे कर बेड पर गिरा दिया और खुद भी बेड के बीचो बीच आकर मेरे जिस्म के हर हिस्सों पर गुदगुदी करने लगीं। मुझे उनकी गुदगुदी से हॅसी तो नहीं आ रही थी मगर मैं जानबूझ कर हॅसने लगा था और उनसे अपने कहे की माफ़ियाॅ माॅगने लगा था। मगर रितू दीदी मेरे माफ़ी माॅगने पर भी मुझे गुदगुदी करना बंद नहीं कर रही थीं।
"प्लीज बस कीजिए न दीदी।" मैने हॅसते हुए कहा__"सब लोगों की नींद टूट जाएगी।"
"टूट जाने दे अब।" रितू दीदी ने कहा___"मुझे किसी की कोई परवाह नहीं है समझे? तूने मुझे शैतान की बच्ची बोला है न तो तुझे अब शैतान की ये बच्ची छोंड़ेगी नहीं।"
"अच्छा जी।" मैने कहा___"ऐसी बात है क्या? लगता है इस बच्ची का इलाज करना ही पड़ेगा।"
"तू कुछ नहीं कर पाएगा भोंदूराम।" रितू दीदी ने कहा___"जबकि मैं तेरी हालत ख़राब कर दूॅगी आज।"
"ओ हैलो।" मैने सहसा दीदी के दोनों हाथ पकड़ लिए फिर बोला___"कहीं ऐसा न हो कि मेरी हालत ख़राब करने के चक्कर में खुद तुम्हारी ही हालत ख़राब हो जाए।"
"अच्छा बच्चू।" दीदी अपने हाॅथों को मेरी पकड़ से छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा___"इतनी बड़ी ग़लतफहमी भी है तुझको। शायद तुझे पता नहीं है कि मैं जूड़ो कराटे में ब्लैक बेल्ट होल्डर हूॅ।"
"फाॅर काइण्ड योर इन्फाॅरमेशन।" मैने कहा___"मैं भी मार्शल आर्ट्स में ब्लैक बेल्ट हूॅ। इतना ही नहीं कुंग फूॅ का भी एक्सपर्ट हूॅ मैं। इस लिए तुम मुझे कम समझने की ग़लती मत करना।"
"चल चल हवा आने दे तू।" रितू दीदी ने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा___"बड़ा आया कुंग फू एक्सपर्ट। मेरे सामने तेरा कोई भी आर्ट्स नहीं चलने वाला।"
"और अगर चल गया तो??" मैने मुस्कुराते हुए कहा।
"चल ही नहीं सकता।" रितू दीदी कहने के साथ ही मेरे ऊपर आ गई___"अब बोल बच्चू। बड़ा कुंग फू एक्सपर्ट बनता है न।
"
मैने एकदम से पलटी मारी, रितू दीदी को मुझसे इतनी जल्दी इसकी उम्मीद नहीं थी। परिणाम ये हुआ कि जहाॅ पहले मैं पड़ा हुआ था वहाॅ रितू दीदी पड़ी थी और मैं उनके ऊपर। मेरी इस हरकत से पहले तो रितू दीदी घबरा ही गईं फिर मुझे देखते ही बोली___"ओये ये क्या है? तूने ये कैसे किया?"
"हाहाहाहा क्या हुआ बहना?" मैने उनके दोनो हाॅथ दोनो साइड से बेड पर रख दिया___"हवा निकल गई क्या तुम्हारी? बड़ा जूड़ो कराटे बता रही थी न। अब बोलो क्या करूॅ तुम्हारे साथ?"
"तूने चीटिंग की है।" रितू दीदी मेरी पकड़ से अपने हाॅथ छुड़ाने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा___"तूने धोखे से मुझे नीचे कर दिया है।"
"अच्छा जब हारने लगी तो चीटिंग का नाम दे दिया।" मैने कहा___"चलो यही सही, लेकिन तुम तो जानती हो न प्यार और जंग में सब जायज है। अब बताओ शैतान की बच्ची कि क्या करूॅ तुम्हारे साथ?"
"ओये ज्यादा दिमाग़ न चला समझे।" रितू दीदी ने एकाएक ही मेरे पीछे से अपनी दोनो टाॅगों को दोनो साइड से ऊपर कर मेरी गर्दन में फॅसा लिया और फिर हल्का झटका दिया। परिणाम ये हुआ कि मैं उनके पैरों की तरफ उलटता चला गया। इधर दीदी पलक झपकते ही बेड से उठ कर फिर से मेरे ऊपर आ गईं।
"क्यों कुंग फू एक्सपर्ट अब क्या हाल हैं तेरे?" रितू दीदी मेरे पेट पर बैठी उछलने लगी थी, उन्होंने अपने दोनो हाथों से मेरे हाथ भी पकड़ रखे थे।
"हाल तो बहुत अच्छा है।" मैने कहा___"आपकी जीत में भी मेरी ही जीत है दीदी।"
मेरे ऐसा कहने पर रितू दीदी एकदम से शान्त पड़ गईं। मेरी ऑखों में एकटक देखने लगी थी वो। फिर जाने क्या उनके मन में आया वो उसी हालत में मेरे ऊपर ही मेरे सीने से लग कर छुपक गईं।
"तूने खेल क्यों बंद कर दिया राज।" फिर दीदी उसी हालत में उदास होकर कहा___"मुझे तो बहुत अच्छा लग रहा था।"
"मुझे पता है दीदी।" मैने उनके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा___"मगर ऐसी चीज़ों की शुरूआत थोड़ी थोड़ी से ही होती है न। वैसे भी रात काफी हो गई है। इस सबसे कोई भी यहाॅ आ सकता है और हमें ये सब करते देख कर क्या सोचेगा। इस लिए मुझे लगता है इतना बहुत है आज के लिए। अब आपको भी अपने कमरे में जा कर सो जाना चाहिए।"
"क्यों, क्या मैं तेरे कमरे में तेरे साथ नहीं सो सकती?" रितू दीदी ने सहसा मेरे सीने से अपना सिर उठा कर मेरी तरफ देखते हुए कहा।
"बिलकुल सो सकती हैं दीदी।" मैंने मुस्कुरा कर कहा___"पर मैने ऐसा इस लिए कहा कि आपको शायद अपने कमरे में ही बेहतर तरीके से नींद आए और आप कंफर्टेबल महसूस करें।"
"ऐसा कुछ नहीं है मेरे भाई।" रितू दीदी ने मेरे गाल खींचते हुए किन्तु मुस्कुरा कर कहा___"मुझे तो तेरे साथ सोने में और भी अच्छी नींद आएगी और मुझे कंफर्टेबल भी महसूस होगा। ऐसा लगेगा जैसे मैं दुनियाॅ की सबसे सुरक्षित जगह पर हूॅ।"
"अगर ऐसी बात है तो ठीक है दीदी।
" मैने भी मुस्कुराते हुए कहा___"जैसा आपको अच्छा लगे वैसा कीजिए। अब चलिए सो जाते हैं।"
"ओये क्या तुझे नींद आ रही है?" दीदी ने ऑखें फैलाते हुए कहा था।
"हाॅ लग तो रहा है ऐसा।" मैने कहा।
"ठीक है तू सो जा फिर।" दीदी ने कहने के साथ ही अपना सिर वापस मेरे सीने में रख लिया।
"पर आप तो मेरे ऊपर लेटी हुई हैं न दीदी।" मैने असहज भाव से कहा___"ऐसे में कैसे मैं सो सकूॅगा भला?"
"जिसको सोना होता है न वो कैसे भी सो जाता है।" रितू दीदी ने अजीब भाव से कहा___"मैं तो तेरे ऊपर ही सोऊॅगी। तुझे भी ऐसे ही सोना पड़ेगा आज।"
रितू दीदी की इस बात से मैं हैरान रह गया मगर करता भी क्या? कोई ज़ोर ज़बरदस्ती भी उनसे नहीं कर सकता था। इस लिए चुपचाप अपनी ऑखें बंद कर ली मैने और सोने की कोशिश करने लगा। जबकि मेरे चुप हो जाने पर रितू दीदी जो मेरे सीने पर अपना सिर रखे हुए थी वो मुस्कुराए जा रही थी। उनका पूरा बदन ही मेरे ऊपर था। मुझे बड़ा अजीब भी लग रहा था और असहज भी। असहज इस लिए क्योंकि दीदी के सीने के उभार मेरे सीने के बस थोड़ा ही नीचे धॅसे हुए महसूस हो रहे थे। हलाॅकि मेरे ज़हन में उनके प्रति कोई भी ग़लत भावना नहीं थी मगर सोचने वाली बात तो थी ही। ख़ैर, कुछ ही देर में मुझे नींद आ गई और मैं सो गया। मुझे नहीं पता दीदी को कब नींद आई थी।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर मंत्री दिवाकर चौधरी के यहाॅ से आने के बाद अजय सिंह सारे रास्ते सोचों में गुम रहा था। हवेली से जब वह चला था तो सबसे पहले गुनगुन में वो एयरटेल के सर्विस सेन्टर गया था। जहाॅ से उसने अपने पहले वाले नंबर के ही दो सिम कार्ड लिया था और उन्हें अपने मोबाइल फोन पर डाल लिया था। उसे पता था कि फोन बंद होने की वजह से उससे संबंध रखने वाले सभी उसके चाहने वाले परेशान होंगे। रास्ते में ही कई सारे लोगों के फोन आए थे उसे जिनसे उसने बात की और उन्हें बताया कि किस वजह हे उसका फोन बंद था।
अजय सिंह ने अपने उन बिजनेस दोस्तों से भी बात की जिन्होंने उसकी मदद के लिए अपने अपने आदमी भेजे थे। सबसे फारिग़ होकर ही वह अपने घर पहुॅचा था। हवेली पहुॅचते पहुॅचते उसे रात के साढ़े आठ से ऊपर हो गए थे। अंदर उसे ड्राइंगरूम में सब मिल गए। सब आपस में बात चीत कर हॅसे जा रहे थे। नीलम, सोनम, शिवा, तथा प्रतिमा आदि सब जगमोहन सिंह के पास ही बैठ थे।
अजय सिंह को आया देख कर नीलम व सोनम उससे मिली। अजय सिंह ने उन दोनो को प्यार दिया और फिर कपड़े चेन्ज करने का कह कर अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। प्रतिमा के कहने पर बाॅकी सब भी फ्रेश होने चले गए। रात का डिनर सविता ने तैयार कर दिया था अतः फ्रेश होने के बाद सब एक साथ डायनिंग हाल में आ कर बैठ गए। डिनर के दौरान सबके बीच नार्मल ही बातें हुई।
इस बीच जगमोहन सिंह ने कहा कि उसे कल वापस जाना होगा क्योंकि वो इस समय एक ज़रूरी केस के सिलसिले में लखहगा हुआ है। प्रतिमा की हार्दिक इच्छा थी कि उसके पापा अभी कुछ दिन यहाॅ रुकें मगर उसे भी पता था कि उसके पिता एक बहुत बड़े वकील हैं जिनके पास समय का बहुत ही ज्यादा अभाव है।
जगमोहन सिंह ने ये ज़रूर कहा कि अब वो आते रहेंगे यहाॅ। उनकी इस बात से सब खुश हो गए। ख़ैर डिनर के बाद सब सोने के लिए अपने अपने कमरों में चले गए।
"तो मिल आए तुम मंत्री जी से?" अपने कमरे में आते ही प्रतिमा ने बेड पर लेटे अजय सिंह की तरफ देखते हुए कहा___"वैसे किस सिलसिले में बुलाया था उसने तुम्हें? क्या कोई खास वजह थी?"
"इस बारे में कुछ न ही पूछो तो अच्छा है प्रतिमा।" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली थी।
"अरे ये क्या बात हुई भला?" प्रतिमा बेड पर आते हुए बोली___"क्या कोई ऐसी बात है जिसे तुम मुझसे बताना नहीं चाहते हो?"
"नहीं यार ऐसी कोई बात नहीं है।" अजय सिंह ने बेचैनी से पहलू बदला___"भला ऐसी कोई बात हुई है अब तक जिसे मैने तुमसे शेयर न किया हो?"
"वही तो।" प्रतिमा ने अजय सिंह से सट कर लेटते हुए कहा___"वही तो डियर, मुझे भी तो पता चले कि मंत्री ने किस वजह से मेरे अजय को बुलाया था?"
"दरअसल बात ऐसी है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा___"कि तुम सुनोगी तो हजम नहीं कर पाओगी।"
"अरे जाने भी दो।" प्रतिमा मुस्कुराई___"बड़ी से बड़ी बात तुम्हारी ये प्रतिमा हजम कर चुकी है फिर भला ये क्या चीज़ होगी।"
"मंत्री का जब फोन आया।" अजय सिंह ने कहा___"और जब उसने मुझे दोस्त कहा तो ये सच है कि मुझे उस वक्त बेहद खुशी हुई थी। किन्तु उससे मिल कर तथा उसकी बातें सुनकर मेरी सारी खुशी कपूर की तरह काफूर हो गई।"
"ये तुम क्या कह रहे हो अजय?" प्रतिमा के चेहरे पर हैरत के भाव उभरे___"ऐसी भला क्या बातें कही उसने जिसकी वजह से तुम्हारी उम्मीदों और खुशियों पर पानी फिर गया?"
प्रतिमा के पूछने पर अजय सिंह ने मंत्री का सारा किस्सा उसे सुना दिया। ये भी बताया कि मंत्री उससे खुद मदद की उम्मीद किये बैठा है। सारी बातें सुनने के बाद प्रतिमा का मारे आश्चर्य के बुरा हाल हो गया। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अजय सिंह जो किस्सा सुना रहा है उसमें कहीं कोई सच्चाई है। मगर उसे पता था कि अजय सिंह झूठ मूठ का कोई किस्सा उसे हर्गिज़ भी नहीं सुनाएगा। यानी उसके द्वारा कहा हर लफ्ज़ सही था।
"ये तो बड़ी ही हैरतअंगेज बात है अजय।" प्रतिमा के चेहरे पर मौजूद हैरत कम नहीं हो रही थी, बोली___"उस गौरी का वो पिल्ला इस प्रदेश के मंत्री को भी अपने शिकंजे में लिया हुआ है। यकीन नहीं होता कि कल का छोकरा इतने बड़े बड़े काण्ड कर रहा है।"
"गए थे मंत्री के पास उससे मदद की उम्मीद लेकर।" अजय सिंह ने अजीब भाव से कहा___"मगर खुद उसकी उम्मीद बन कर आ गए।
"
"तुम्हें मंत्री से साफ साफ कह देना चाहिए था अजय कि तुम इस मामले में उसकी कोई मदद नहीं कर सकते।" प्रतिमा ने कहा___"क्योंकि तुम खुद भी कुछ कर सकने की स्थित में नहीं हो।"
"उसे अपने बारे में सारी सच्चाई नहीं बता सकता था डियर।" अजय सिंह ने कहा___"तुम खुद सोचो कि मैं वो सब उससे कैसे बता देता? इससे तो उसके सामने मेरी इज्ज़त का कचरा हो जाता न। वो क्या सोचता मेरे बारे में कि मैंने अपनी वासना और हवश के चलते अपने ही घर की बहू बेटियों की इज्ज़त पर अपनी नीयत ख़राब ही नहीं की बल्कि उनके साथ वो सब करने के लिए क़दम भी बढ़ाया। नहीं प्रतिमा नहीं, इससे तो उसकी नज़र में कोई वैल्यू ही न रह जाती। वो साला मुझे गंदी नाली का कीड़ा समझने लगता।"
"बात तो तुम्हारी ठीक ही है अजय।" प्रतिमा ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा___"मगर अब क्या करोगे तुम? तुमने तो उससे वादा कर लिया है कि तुम इस मामले में उसकी मदद करोगे। जबकि तुम खुद अच्छी तरह जानते हो कि तुम खुद अपनी ही मदद नहीं कर पा रहे हो, फिर उसकी मदद कैसे कर सकोगे? मंत्री से मदद का वादा करके तुमने एक नई मुसीबत को दावत दे दी है अजय। वो मंत्री अब हर समय तुम्हें फोन करेगा अथवा बुलाएगा ये जानने के लिए कि तुमने उसकी मदद के रूप में अब तक क्या किया है? उस सूरत में तुम उसे क्या जवाब दोगे?"
"मैने उससे मदद का वादा नहीं किया है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा___"सिर्फ ये कहा है कि मैं इस मामले में उसकी मदद के लिए अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूॅगा बस। इसमे मुसीबत की बात भला कहाॅ से आ गई? मैने कोई एग्रीमेंट तो किया नहीं है जिसके चलते वो मुझ पर कोई ऐक्शन लेगा। सीधी सी बात है मैने उसकी मदद के लिए अपनी तरफ से कोशिश की मगर उसका काम नहीं हो सका इसमें मैं और ज्यादा क्या कर सकता था?"
"चलो ये तो आने वाला समय ही बताएगा कि इस मामले में क्या होता है?" प्रतिमा ने गहरी साॅस ली___"किन्तु हाॅ ये ज़रूर सोचने वाली बात है कि विराज ने मंत्री को इस ढंग से पंगु बनाया हुआ है। हम तो ये सोच सोच कर परेशान थे कि वो यहाॅ आया किस लिए था, पर अब पता चला कि वो अपनी उस प्रेमिका की वजह से यहाॅ आया था।"
"हाॅ प्रतिमा।" अजय सिंह के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभरे___"मंत्री से मिल कर तथा उसकी बातों से ही इस सच्चाई का पता चला वरना तो हमें पता भी न चलता कि वो साला यहाॅ आया किस वजह से था? इतना ही नहीं उसने मेरे अलावा और किसे अपने मक्कड़ जाल में फॅसा रखा था? मंत्री के जिन लड़कों ने उस विधी नाम की लड़की का रेप किया था वो विराज की प्रेमिका थी और वो गंभीर हालत में हल्दीपुर थाना क्षेत्र में हमारी बेटी रितू के द्वारा पाई गई थी।"
"एक मिनट अजय।" प्रतिमा के चेहरे पर एकाएक ही चौंकने के भाव उभरे थे, फिर उसने कहा___"मुझे अब सारा मामला समझ आ गया है।
ये भी समझ आ गया है कि हमारी बेटी हमारे खिलाफ़ हो कर क्यों उस विराज का साथ देने लगी है जिस विराज की वो अब तक शक्ल भी नहीं देखना चाहती थी।"
"क्या समझ आ गया है तुम्हें?" अजय सिंह के माथे पर सहसा शिकन उभरी।
"ये मामला विधी के रेप से ही शुरू हुआ है।" प्रतिमा ने कहना शुरू किया___"हाॅ अजय ये सारी कहानी विधी के रेप केस से ही शुरू हुई है। मंत्री के द्वारा बताई गई सारी बातों पर ग़ौर करने के बाद इसकी कड़ियाॅ कुछ इस प्रकार से मेरे दिमाग़ में जुड़ी हैं, ग़ौर से सुनो। विधी नाम की जिस लड़की का रेप हुआ वो गंभीर हालत में हमारी बेटी को मिली। रितू चूॅकि पुलिस वाली थी इस लिए ये उसकी ड्यूटी थी कि वो इस मामले में रेप की गई लड़की के रेपिस्टों की तलाश करे और उन्हें कानूनन सज़ा दिलवाए। किन्तु उससे पहले उसने ये किया होगा कि गंभीर हालत में पाई गई उस लड़की को उसने हास्पिटल में भर्ती कराया तथा लड़की के विषय में जानकारी भी हासिल की होगी। रितू ने विधी से तहकीक़ात के रूप में उस लड़की से उसके साथ हुए उस हादसे की सच्चाई प्राप्त की होगी। इसी सच्चाई के दौरान उसे पता चला होगा कि विधी वो लड़की है जो उसके चचेरे भाई विराज से प्यार भी करती थी और विराज भी उससे प्यार करता था। किन्तु उसे ये समझ में न आया होगा कि दो प्यार करने वाले एक दूसरे से दूर कैसे हैं? क्योंकि अगर दूर न होते तो विधी के साथ वो हादसा होता ही नहीं। इस लिए रितू ने विधी से उसके और विराज के बीच की दूरियों के बारे में पूछा होगा तब विधी ने उसे बताया होगा कि सच्चाई क्या है। वो सच्चाई ज़रूर ऐसी रही होगी जिसने रितू के दिल में चोंट की होगी। विधी के द्वारा ही उसे पता चला होगा कि विराज असल में कितना अच्छा लड़का है तथा ये भी कि उसके साथ उसके बड़े पापा ने कितना अत्याचार किया है। विधी की बातों ने रितू को सोचने पर मजबूर कर दिया होगा। किन्तु उसे इतना जल्दी इस बात पर यकीन नहीं आया होगा कि हमने विराज व विराज की माॅ बहन के साथ ग़लत किया हो सकता है। अतः उसने अपने तरीके से इस सबका पता लगाने का सोचा होगा। याद करो अजय ये उसी समय की बात है जब नैना यहीं थी और एक रात मैं तुम और शिवा साथ में ही वो मौज मस्ती कर रहे थे। मुझे पूरा यकीन है कि सच्चाई का पता लगाने की राह पर चलते हुए रितू उस रात हमारी वो रास लीला देख ली होगी। मैं ऐसा इस लिए कह रही हूॅ क्योंकि उस रात के बाद से ही रितू का बिहैवियर हमारे प्रति बदला था। याद करो दूसरे दिन कैसे उसने शिवा को खरी खोटी सुना दी थी। उस वक्त हमें पता नहीं था किन्तु अब समझ आ रहा है कि उसने शिवा को इतने गुस्से से क्यों झिड़का था? ख़ैर, उसके बाद वो बड़ी सफाई से नैना को भी यहाॅ से निकाल ले गई। उसको पता चल गया होगा कि तुम अपनी ही बहन को अपने नीचे लेटाने का मंसूबा बनाए बैठे हो।
इस लिए वो नैना को बड़ी सफाई से यहाॅ ले गई। इस सबसे उसे और कुछ जानने की ज़रूरत ही नहीं रह गई थी। उसने उस रात हम तीनों की सारी बातें सुन ली होगी और जान गई होगी कि विराज की माॅ के साथ असल में हुआ क्या था? अथवा हमने उसके साथ किया क्या था? इतना सब कुछ काफी था उसका हमारे खिलाफ होने के लिए और विराज के साथ मिल जाने के लिए। इन्हीं सब के दौरान उसने विराज को मुम्बई से बुलाया होगा। किन्तु उसके पास विराज का कोई काॅटेक्ट नहीं था इस लिए उसने विराज के क़रीबी दोस्तों के बारे में पता लगाया होगा। विराज के दोस्त के रूप में उसे पवन मिला, पवन को उसने विधी का वास्ता देकर कहा होगा कि वो विराज को यहाॅ बुला ले। बस उसके बाद क्या क्या हुआ इसका तो पता ही है तुम्हें।"
प्रतिमा की इतनी लम्बी चौड़ी थ्यौरी सुन कर अजय सिंह आश्चर्यचकित रह गया था। काफी देर तक उसके मुख से कोई बोल न फूटा। फिर सहसा उसके चेहरे पर प्रतिमा के प्रति प्रसंसा के भाव उभरे। उसे प्रतिमा की सूझ बूझ और दूरदर्शिता की दाद देनी पड़ी। जबकि....।
"अब रहा सवाल इस बात का कि रितू ने इसके पहले विधी के साथ हुए उस रेप हादसे पर उन रेपिष्टों को कानूनन सज़ा क्यों नहीं दिलवाई?" प्रतिमा ने मानो पुनः कहना शुरू किया___"तो इसका जवाब तुम मंत्री के द्वारा पा ही चुके हो। मंत्री के अनुसार इंस्पेक्टर रितू ने विधी रेप केस के रेपिस्टों को पकड़ कर उन्हें कानूनन सज़ा दिलवाने की ज़रूर कोशिश की हो सकती है किन्तु मामला क्योंकि मंत्री के बच्चों का था इस लिए मंत्री की ताकत व पहुॅच के चलते कानूनन भी कुछ नहीं हो सकता था इस लिए रितू के आला अफसर ने भी रितू को इस मामले में हस्ताक्षेप न करने की सलाह दी होगी। विधी के माॅ बाप को भी यही समझ आया होगा, इसी लिए उन्होंने भी कोई केस करने का ख़याल अपने ज़हन से निकाल दिया होगा। दैट्स इट।"
"तुमने तो इस तरह इन सब बातों को खोल दिया है जैसे कि तुम इन सब चीज़ों का लाइव टेलीकास्ट देख रही थी और उसकी कमेंट्री भी कर रही थी।" अजय सिंह प्रभावित लहजे में बोला___"यकीनन तुम्हारा दिमाग़ काफी शार्प है। ख़ैर यहाॅ पर इसके आगे की कड़ी कुछ इस तरह है। विराज जब मुम्बई से आया और उसने अपनी लवर की वो हालत देखी तो उससे सहन नहीं हुआ। बल्कि उसका खून खौल गया होगा। किन्तु उसे भी समझ आ ही गया होगा कि वो विधी को कानूनन कोई न्याय नहीं दिला सकता। क्योंकि रेप करने वालों के आका बहुत बड़ी हस्ती थे। मगर जवान खून इसके बाद भी शान्त न हुआ होगा। तब उसने खुद उन लड़कों को सज़ा देने का सोचा होगा जिन लड़कों ने उसकी प्रेमिका के साथ वो घिनौना कुकर्म किया था। विराज के फैसले पर रितू ने भी अपनी सहमति दी होगी और उसकी मदद करने का वादा भी किया होगा।
मंत्री के ही अनुसार, विराज और रितू मंत्री के फार्महाउस पहुॅचे और वहाॅ से मंत्री के उन बच्चों को धर लिया और वहीं से ही उनके हाथ कुछ ऐसे सबूत भी लगे जो मंत्री को विराज की मुट्ठी में कैद करने के लिए काफी थे दैट्स आल।"
"बिलकुल।" प्रतिमा ने कहा___"मंत्री को जब पता चला कि उसके बच्चों का किडनैपर हल्दीपुर के ठाकुर अजय सिंह का भतीजा है तो उसने आज तुम्हें ये सोच कर फोन किया कि तुम इस मामले में उसकी यकीनन मदद कर सकते हो। ये अलग बात है कि तुम खुद भी मंत्री की तरह ही विराज की मुट्ठी में कैद हो।"
"ये क्या कह रही हो तुम?" अजय सिंह चौका___"मैं भला कैसे उस हरामज़ादे की मुट्ठी में कैद हूॅ?"
"कमाल है डियर।" प्रतिमा मुस्कुराई___"ये बात कैसे भूल सकते हो तुम कि विराज के पास तुम्हारी वो सब चीज़ें हैं जो तुम्हें किसी भी पल कानून की भयानक चपेट में ले लेने के लिए काफी हैं।"
"ओह हाॅ वो न।" अजय सिंह को अचानक ही जैसे सब कुछ याद आ गया और ये भी सच है कि वो सब याद आते ही उसके समूचे जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गई थी। उससे आगे कुछ कहते न बन सका था।
"बड़ी गंभीर सिचुएशन है अजय।" प्रतिमा ने उसके चेहरे के भावों को पढ़ते हुए गंभीरता से कहा___"सबकुछ कर सकने की कूबत होते हुए भी कुछ नहीं कर सकते, न तुम और ना ही वो मंत्री। मगर मुझे एक बात ये समझ नहीं आती कि जब इतना मसाला विराज के पास तुम दोनो के खिलाफ़ मौजूद है तो वो उस मसाले का उपयोग क्यों नहीं करता?"
"किया तो था उपयोग उसने।" अजय सिंह ने कहा___"उस मसाले के आधार पर ही तो उसने नकली सीबीआई वालों को भेजा था मुझे यहाॅ से ले जाने के लिए।"
"अरे हाॅ डियर।" प्रतिमा के मस्तिष्क में जैसे एकाएक ही बल्ब रौशन हुआ, बोली___"इस नये चक्कर को तो मैं भूल ही गई थी। ये भी तो सोचने का एक जटिल मुद्दा है। आख़िर विराज ने ऐसा किस वजह से किया होगा? नकली सीबीआई वालों को भेज कर उसने तुम्हें ग़ैर कानूनी धंधा करने तथा ग़ैर कानूनी पदार्थ रखने के जुर्म में गिरफ्तार करवाया और फिर दो दिन बाद बिना तुमसे कुछ पूछताॅछ किये छोंड़ भी दिया। सोचने वाली बात है कि इस सबसे उसे क्या मिला होगा? या फिर इससे उसका कौन सा फायदा हुआ होगा?"
"साला ऐसे ऐसे काम करता है कि कुछ समझ में ही नहीं आता।" अजय सिंह ने कठोर भाव से कहा___"सोचते सोचते दिमाग़ की नशें तक दर्द करने लगती हैं। मगर मजाल है जो कुछ समझ आए। हद हो गई ये तो। साला कल का छोकरा इतना शातिर होगा ये तो ख्वाब में भी नहीं सोचा था मैने।"
"मुझे कुछ कुछ समझ आ रहा है उसके ऐसा करने का चक्कर।" प्रतिमा ने ये कह कर मानो अजय सिंह के ऊपर बम्ब फोड़ दिया था।
"क..क..क्या समझ आ रहा है तुम्हें?" अजय सिंह बुरी तरह हैरानी से पूछ बैठा था।
"ये तो तुम भी समझते हो न।
" प्रतिमा ने समझाने वाले अंदाज़ से कहा___"कि विराज की नज़र में ये एक जंग है जो उसने हमारे साथ शुरू की हुई है। जब कोई इंसान किसी से जंग शुरू करता है तब वो सबसे पहले अपनी कमज़ोरियों को अपने प्रतिद्वंदी से या तो छुपाता है या फिर उसकी पहुॅच से बहुत दूर कर देता है।"
"तुम क्या कह रही हो?" अजय सिंह उलझ कर रह गया, बोला___"मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा?"
"याद करो अजय।" प्रतिमा ने कहा___"हमारे आदमी ने हमें क्या ख़बर दी थी? यही न कि विराज मुम्बई से आए अपने दोस्त के साथ पवन की फैमिली को एम्बूलेन्स में बैठा कर चला गया था और एम्बूलेन्स के आगे आगे एक जीप भी थी। जिसमें कि यकीनन रितू ही थी। यहाॅ पर मेरे कहने का मतलब ये है कि विराज ने ऐसा क्यों किया? आख़िर उसे क्या ज़रूरत थी पवन और उसकी फैमिली को अपने साथ कहीं ले जाने की? इस सवाल के बारे में अगर ग़ौर से सोचोगे तो जवाब ज़रूर मिल जाएगा। मतलब ये कि पवन और पवन की फैमिली विराज की कमज़ोरी थे। उसने सोचा होगा कि देर सवेर हमे इस बात का पता चल ही जाएगा कि उसके दोस्त पवन ने उसकी सहायता की थी और वो यहाॅ उसके ही घर में रुका था। अतः हम इसके लिए उसके दोस्त और उसकी फैमिली को कोई नुकसान भी पहुॅचा सकते हैं। ये सोच कर उसने पवन आदि को सुरक्षित रखना अपना कर्तब्य समझा। किन्तु उसके सामने समस्या रही होगी कि वो पवन आदि को सुरक्षित कैसे करे? उसकी समस्या का समाधान रितू ने किया होगा। उसने उन सब को किसी ऐसी जगह चलने को कहा होगा जहाॅ पर वो सब लोग पूर्णरूप से सुरक्षित रह सकते थे। यहाॅ पर ये भी समझ आ रहा है कि वो लोग एम्बूलेन्स से ही क्यों गए थे? दरअसल एम्बूलेंस ही एक ऐसा किफायती वाहन हो सकता था जिसमें सब लोग बड़े आराम से तथा बिना किसी बाधा के कहीं भी जा सकते थे। हम या हमारे आदमी सोच ही नहीं सकते थे कि वो लोग किसी एम्बूलेंस जैसे वाहन में यहाॅ से जा सकते हैं।एम्बूलेन्स के आगे आगे कुछ फाॅसले पर रितू अपनी जिप्सी में जा रही थी। फाॅसले पर इस लिए ताकि अगर हम या हमारे आदमी रास्ते में कहीं मिलें भी तो वो उस पर शक न कर सकें किसी बात का। कहने का मतलब ये कि रितू की मदद से विराज ने अपनी एक कमज़ोरी को हमारी पहुॅच से दूर कर दिया।"
"मगर इसमें ये कहाॅ फिट बैठता है कि वो इस सबके लिए मुझे ऐसे चक्कर में फॅसा कर बाद में छोंड़ भी दे?" अजय सिंह सहसा बीच में ही बोल पड़ा था___"और वैसे भी ये वाला चक्कर तो उस सबके बहुत बाद अभी हुआ है।"
"मेरी बात तो पूरी होने दो डियर।" प्रतिमा ने कहा___"मैं सब कुछ विस्तार से ही बता रही हूॅ और तुम्हारे सवाल की तरफ ही आ रही हूॅ। विराज के यहाॅ आने पर हमने ये अनुमान लगाया था कि संभव है कि वो यहाॅ पर अभय के बीवी बच्चों को लेने आया हो।
हलाॅकि ये भी एक अहम बात है अजय, क्योंकि आज के हालात में विराज की दूसरी कमज़ोरी अभय के बीवी बच्चे भी हैं। इस लिए संभव है कि वो उन्हें भी अपने साथ ही ले गया हो। अभय ने उससे कहा होगा कि अगर संभव हो सके तो वो अपने साथ अपनी चाची व अपने भाई बहन को भी ले आए। विराज मुम्बई से यही सोच कर आया रहा होगा कि वो विधी को देखेगा और फिर अपनी छोटी चाची व उसके बच्चों को साथ ले कर पुनः मुम्बई लौट जाएगा। मगर यहाॅ आने के बाद विधी के मामले में वो एक अलग ही चक्कर में पड़ गया। ऐसे माहौल में वो भला वो कैसे यहाॅ से चला जाता? दूसरी बात यहाॅ पर तो वैसे भी उसके लिए खतरा ही था। अतः अपने साथ साथ अपनी कमज़ोरियों को भी दूर करना उसकी पहली प्राथमिकता थी। रितू के द्वारा उसे कोई सुरक्षित जगह तो ज़रूर मिल गई रही होगी मगर उससे कदाचित वो संतुष्ट न रहा होगा। वो चाहता रहा होगा कि उसकी सभी कमज़ोरियाॅ हमारी पहुॅच से काफी दूर होनी चाहिए और काफी दूर तो मुम्बई ही थी। अतः उसने फैसला किया होगा कि सबको मुम्बई भेज दिया जाए। उधर उसे इस बात का भी एहसास रहा होगा कि रितू अब चूॅकि हमारे खिलाफ होकर उसकी मदद कर रही है इस लिए अब उस पर भी खतरा ही है और वो उसे खतरा के बीच में अकेला छोंड़ भी नहीं सकता था। तब उसने एक प्लान बनाया और वो प्लान यही था कि वो तुम्हें कम से कम दो दिन के लिए सीबीआई की गिरफ्त में डलवा दे। इसका फायदा ये था कि जब तुम ही मैदान पर न होते तो रितू पर खतरे की सीमा न के बराबर ही रह जाती। उधर प्लान के मुताबिक विराज अपनी कमज़ोरियों को लेकर वापस मुम्बई चला गया। मुम्बई में सबको छोंड़ कर वो उसी दिन वापस यहाॅ के लिए चल दिया।"
"तो तुम्हारे हिसाब से विराज ने इसी सबके लिए मुझे ऐसे चक्करें फाॅसा था?" अजय सिंह ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"मगर तुमने ये कैसे कह दिया कि विराज उन सबको लेकर मुम्बई ही गया था?"
"इस आधार पर कि उसने तुम्हें दो दिन के लिए ही उस चक्कर में फाॅसा था।" प्रतिमा ने कहा___"इन दो दिनों में वो आराम से मुम्बई जाकर लौट भी सकता है। उसने तुम्हें नकली सीबीआई के जाल में फाॅसा जबकि वो चाहता तो तुम्हें सचमुच में ही रियल सीबीआई की गिरफ्त में पहुॅचा देता। मगर उसने ऐसा नहीं किया। उसका मकसद सिर्फ इतना ही था कि तुम दो दिन के लिए अंडरग्राउण्ड रहो"
"यकीनन ऐसा ही हुआ लगता है।" अजय सिंह ने कहा___"ख़ैर, सोचने वाली बात है कि रितू उसकी मदद कर रही है और वो उसे तथा उसके साथ साथ पवन आदि को भी सुरक्षित ले गई थी। मगर सवाल है कि ऐसी कौन सी जगह वो ले गई होगी?"
"किसी ऐसी जगह।" प्रतिमा ने सोचने वाले भाव से कहा___"जहाॅ पर किसी ग़ैर का आना जाना न हो और जहाॅ पर उन्हें किसी के खतरे का भी आभास तक न हो।"
"ऐसी कौन सी जग......।" अजय सिंह कहते कहते एकदम से रुक गया था।
उसके चेहरे पर चौंकने के भाव उभर आए और फिर वो सहसा अजीब भाव से बोल पड़ा___"अरे....ओह माई गाड मैं भी न बहुत बड़ा बेवकूफ हूॅ प्रतिमा।"
"क्यों, क्या हुआ?" प्रतिमा उसके मुख से ये सुन कर चौंक पड़ी थी, बोली___"ऐसा क्यों कह रहे हो तुम?"
"क्यों न कहूॅ यार?" अजय सिंह एकाएक ही आहत भाव से बोला___"मैं बेवकूफ ही तो हूॅ। इस बारे में तो मुझे पहले ही सोच लेना चाहिए था कि रितू नैना को लिये कहाॅ रह सकती है?"
"क्या मतलब??" प्रतिमा के चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे।
"तुम्हें याद है न कि हमने अपने तीनों बच्चों के नाम एक एक फार्महाउस किया था?" अजय सिंह ने आवेशयुक्त भाव से कहा था।
"ओह हाॅ।" प्रतिमा एकदम से उछल पड़ी थी। एकदम से जैसे उसे अजय सिंह की बात समझ में आ गई थी, अतः बोली___"तो क्या तुम ये कह रहे कि रितू....?"
"हाॅ प्रतिमा।" अजय सिंह प्रतिमा की बात पूरी होने से पहले ही बोल पड़ा___"मैं यही कह रहा हूॅ कि रितू उस समय नैना को लिए अपने उसी फार्महाउस पर गई होगी जिस फार्महाउस को मैने उसके नाम किया था। सोचो प्रतिमा वो जगह उन सबके लिए कितनी आसान तथा महफूज हो सकती है। उफ्फ ये बात मेरे ज़हन में पहले क्यों नहीं आई वरना हम पहले ही रितू नैना आदि सबको पकड़ सकते थे। बहुत बड़ी ग़लती हो गई प्रतिमा, मैं खुद अपनी ही ग़लती की वजह से जीती हुई बाज़ी को हार गया।"
"अरे तो अभी भी क्या बिगड़ा है अजय?" प्रतिमा ने कहा___"हो सकता है कि वो सब अभी भी वहीं पर मौजूद हों। तुम्हें तुरंत ही वहाॅ जाना चाहिए।"
"नहीं प्रतिमा।" अजय सिंह ने पूरी मजबूती से गर्दन को न में हिला कर कहा___"अब कुछ नहीं हो सकता। वो लोग अब हमें फार्महाउस पर नहीं मिलेंगे। क्योंकि ये बात तो वो भी समझते रहे होंगे कि फार्महाउस उनके लिए कुछ समय के लिए ज़रूर सुरक्षित जगह हो सकती है मगर हमेशा के लिए नहीं। ये मत भूलो कि रितू के साथ में विराज भी है। वो कमीना बहुत शातिर है। अब तक की उसकी सारी गतिविधियाॅ ये बताती हैं कि वो हमसे दो क़दम आगे ही रहता है। हम जिस चीज़ के बारे में सोचते हैं वो शातिर लड़का उस चीज़ को पहले ही अंजाम दे चुका होता है।"
"फिर भी एक बार पता करने में क्या जाता है?" प्रतिमा ने कहा___"हो सकता है वो अभी भी वहीं पर हों। उनके दिमाग़ में ये सोच होगी कि उनके वहाॅ होने का पता तुम्हें ज़रूर चलेगा इस लिए तुम फिर ये सोच कर वहाॅ उनका पता करने नहीं जाओगे कि अब वो वहाॅ हो ही नहीं सकते हैं। ये एक मनोवैज्ञानिक सोच है अजय, इसी के आधार पर वो तुम्हारे दिमाग़ को पढ़ता है और वही करता है जिसकी तुम उम्मीद ही नहीं करते। कहने का मतलब ये कि तुम इस वक्त ये सोच रहे हो कि वो लोग वहाॅ होंगे ही नहीं अतः तुम उनका पता करने नहीं जाओगे जबकि वो तुम्हारी इसी सोच के चलते वहाॅ मौजूद रहेंगे।"
"मनोविज्ञान के रूप में तुम्हारा तर्क अच्छा है और अपनी जगह सही भी है।
" अजय सिंह ने कहा___"मगर मुझे नहीं लगता है कि विराज जैसा शातिर दिमाग़ लड़का इतना बड़ा जोखिम उठाएगा। बल्कि संभव है कि उसने कोई दूसरा सुरक्षित ठिकाना ढूॅढ़ लिया होगा। फिर भी अगर तुम्हारा मन नहीं मानता तो ठीक है मैं अभी पता करवा लेता हूॅ।"
ये कह कर अजय सिंह ने सिरहाने की तरफ ही रखे अपने लैण्डलाइन फोन का रिसीवर उठाकर कान से लगाया और उस पर कोई नंबर पंच करने लगा। थोड़ी देर बाद ही उसने अपने किसी आदमी से कहा कि वो फला जगह पर बने उसके फार्महाउस में जाए और पता करे कि वहाॅ इस वक्त कौन कौन मौजूद है? अपने आदमी को हुकुम देने के बाद अजय सिंह ने रिसीवर वापस केड्रिल पर रख दिया।
"थोड़ी ही देर में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा डियर।" अजय सिंह ने कहा___"मेरा आदमी कुछ ही देर में पता करके मुझे उस सबकी सूचना फोन पर दे देगा।"
"इस बात का यकीन तो मुझे भी है अजय।" प्रतिमा ने कहा___"वो लोग फार्महाउस में नहीं होंगे मगर इसके बावजूद एक बार पता करना भी कोई हर्ज़ की बात नहीं है। ख़ैर, चलो ये मान के चलते हैं कि वो लोग फार्महाउस पर नहीं होंगे तो सवाल ये है कि उन लोगों ने आख़िर किस जगह पर अपना दूसरा सुरक्षित ठिकाना बनाया होगा?"
"इस बारे में भला क्या कहा जा सकता है?" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली___"सच कहूॅ तो मेरा अब दिमाग़ ही काम नहीं कर रहा है। समझ में नहीं आता कि आख़िर ऐसा क्या करूॅ जिससे कि सब कुछ मेरी मुट्ठी में आ जाए?"
"सबसे पहले तो तुम्हें अपनी सोच का दायरा बड़ा करना होगा अजय।" प्रतिमा ने उसे ज्ञान देने वाले अंदाज़ से कहा___"तुम्हें विराज की सोच से दो नहीं बल्कि चार क़दम आगे की सोच रखनी होगी। तभी वो सब संभव हो सकता है जो तुम चाहते हो।"
"सबसे बड़ी समस्या ये है डियर कि उसके पास मेरे खिलाफ वो ग़ैर कानूनी सबूत हैं।" अजय सिंह बेचैनी से बोला___"वो साला उनके आधार पर कभी भी कानून की चपेट में ला सकता है।"
"वो उन सबूतों इस्तेमाल नहीं करेगा अजय।" प्रतिमा ने कहा___"अगर करना ही होता तो वो कब का कर चुका होता। वो सबूत तो उसके पास महज तुरुप के इक्के की तरह मौजूद हैं। यानी जब वो दूसरे किसी तरीके से तुमसे अपना बदला नहीं ले पाएगा तब वो उनका इस्तेमाल करेगा। कदाचित उसके मन में ये सोच है कि वो तुम्हें कानून की सलाखों के पीछे पहुॅचा कर आसान सज़ा नहीं देना चाहता। बल्कि खुद अपने हाॅथों से तुम्हें कोई ऐसी सज़ा देना चाहता है छिसके बारे में तुमने ख्वाब में भी न सोचा हो।"
"यकीनन तुम सही कह रही हो प्रतिमा।" अजय सिंह के जिस्म में झुरझरी सी हुई थी, बोला___"उसके मन में यकीनन यही होगा। वो मुझे खुद अपने हाॅथों से सज़ा देना चाहता है। दूसरी बात, जिस तरह से उसने मुझे फॅसा रखा है उससे वो निश्चय ही अपने मंसूबों में कामयाब हो जाएगा।
मगर मुझे ये समझ में नहीं आता कि जब उसकी मुट्ठी में सब कुछ है तो वो देर किस बात पर कर रहा है?"
"यही तो सोचने वाली बात है अजय।" प्रतिमा के चेहरे पर सोचों के भाव उभरे___"वो इतना शातिर है कि हम उसकी सोच को समझ हीं नहीं पाते। जबकि वो हमारी उम्मीदों से परे वाला काम कर जाता है। वो चाहे तो यकीनन एक झटके में ऐसा कुछ कर सकता है जिसके तहत हम सब उसके सामने दीन हीन दसा में हाज़िर हो जाएॅ मगर वो ऐसा इस लिए नहीं कर रहा क्योंकि उसे लगता होगा कि ये काम तो वो कभी भी कर सकता है। वो कुछ ऐसा करने की फिराक़ में होगा जो हमारे लिए हद से भी ज्यादा असहनीय हो। यकीनन ऐसा ही हो सकता है अजय और कदाचित वो ऐसा कर भी रहा है।"
"क क्या कर रहा है वो?" अजय सिंह मानो अंदर ही अंदर काॅप कर रह गया था।
"सबसे पहले तो उसने यही किया।" प्रतिमा ने कहा___"कि उसने हमारी बेटी को हमसे अलग कर अपने साथ मिला लिया। क्या ये बड़ी बात नहीं है अजय कि हमारी जो बेटी उसकी शक्ल तक देखना पसंद नहीं करती थी वो आज शायद विराज को ही सच्चे दिल से अपना भाई मानने लगी है और इतना ही नहीं उसके लिए अपने ही माॅ बाप के खिलाफ़ हो गई। अगर उसे हमारी हर असलियत का पता चल चुका है तो ये भी संभव है कि उसने हमसे रिश्ता भी तोड़ लिया हो। सारी बातों को ग़ौर से सोचो तो समझ में आता है कि वास्तव में विराज ने कितना बड़ा तीर मार लिया है।"
"इसमे कोई संदेह नहीं है यार।" अजय सिंह ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"रितू को अपने साथ इस तरह से मिला लेना बहुत बड़ी बात है।"
"और मुझे तो ये भी लगता है अजय।" प्रतिमा ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा___"कि विराज का अगला क़दम हमारी दूसरी बेटी नीलम को भी अपनी तरफ मिला लेना होगा। नीलम को ज्यादा दुनियादारी का पता नहीं है। किन्तु हाॅ ये सच है कि वो भी अपनी बड़ी बहन की ही तरह सच्चाई की राह पर चलने की सोच रखती है। इस लिए अगर उसे हमारी असलियत के बारे में पता चल गया तो ये निश्चित बात है कि वो भी हमारे खिलाफ़ हो जाएगी। वैसे क्या पता हो ही गई हो।"
"ऐसा तुम कैसे कह सकती हो भला?" अजय सिंह को अपने पैरों तले से मानो ज़मीन खिसकती हुई महसूस हुई, बोला___"नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता। पता नहीं क्या अनाप शनाप बोले जा रही हो तुम?"
"विराज की सोच से अगर चार क़दम आगे चलना है तो ऐसा सोचना ही पड़ेगा डियर हस्बैण्ड।" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा___"मैं ऐसा बेवजह ही नहीं कह रही हूॅ बल्कि ऐसा कहने की मेरे पास कुछ पुख्ता वजहें भी हैं।"
"क कैसी वजहें?" अजय सिंह के चेहरे पर हैरत के भाव उभरे।
"पिछली दो तीन दिन की घटनाओं पर ज़रा बारीकी से ग़ौर करो डियर।" प्रतिमा ने कहा___"विराज ने तुम्हें नकली सीबीआई के जाल में फॅसा कर क्यों अंडरग्राउण्ड किया? इसका जवाब ये है कि उसे अपनी कमज़ोरियों को सुरक्षित या तुम्हारी पहुॅच से दूर करना था।
किन्तु उसे लगा होगा कि उसके मुम्बई चले से यहाॅ रितू और नैना अकेली पड़ जाएॅगी। हालात ऐसे थे कि उन दोनो पर किसी भी समय तुम्हारे रूप में कोई संकट आ सकता था। अतः विराज ने एक तीर से दो शिकार किया, पहला ये कि तुम्हें नकली सीबीआई की कैद में रख कर सुरक्षित सबको यहाॅ से मुम्बई ले जाएगा और दूसरा ये कि उसके यहाॅ न रहने पर रितू व नैना के ऊपर तुम्हारा कोई संकट भी न रहता। दो दिन बाद उसने तुम्हें इसी लिए छोंड़ दिया क्योंकि वो मुम्बई से वापस यहाॅ आ गया और फिर आते ही उसने सबसे महत्वपूर्ण काम ये किया कि फार्महाउस से रितू व नैना को अपने साथ किसी दूसरी ऐसी जगह शिफ्ट किया जहाॅ पर तुम्हारा खतरा न के बराबर ही हो। ये उसी दिन की बात है अजय जब तुम्हें सीबीआई वाले ले गए थे, तब मैने रितू को फोन लगाया था तुम्हारे बारे में बताने के लिए मगर उसने मेरा फोन नहीं उठाया बल्कि काट दिया था। तब मैने नीलम को फोन लगाया और उसे बताया कि यहाॅ क्या हुआ है। उसे मैने ये भी बताया कि उसकी बड़ी बहन हमारे खिलाफ हो गई है। मेरी बात सुन कर वो घबरा गई और उसने यहाॅ आने के लिए कहा था। यहाॅ पर ग़ौर करने की बात ये है कि संभव है कि नीलम ने मुझसे बात करने के बाद रितू से बात की हो और उससे पूछा हो कि वो क्यों माॅम डैड के खिलाफ हो गई हैं। उसके पूछने पर संभव है कि रितू ने उसे हमारी सारी सच्चाई बता दी हो। हलाॅकि ऐसा हुआ नहीं है, क्योंकि अगर ऐसा हुआ होता तो यहाॅ आने के बाद नीलम का बिहैवियर कुछ तो अलग हमें समझ ही आता। किन्तु वो यहाॅ आने पर नार्मल ही थी। इसका मतलब कि रितू ने उसे कुछ नहीं बताया था उस दिन। किन्तु हाॅ ऐसा हो सकता है कि नीलम के द्वारा माॅम डैड के खिलाफ़ हो जाने का कारण पूछने पर रितू ने उससे बस यही कहा हो कि वो खुद सच्चाई का पता लगाए। अतः संभव है कि नीलम अब बड़ी ही सफाई से सच्चाई का पता भी लगा रही हो। दूसरी बात विराज के यहाॅ से जाने के दिन की काॅउटिंग करें तो पता चलता है कि विराज उसी दिन वापस यहाॅ के लिए मुम्बई से चल दिया था जिस दिन हमारी बेटी नीलम वहाॅ से चली थी और फिर आज यहाॅ पहुॅची है। मेरे कहने का मतलब ये है कि ऐसा यकीनन हो सकता है कि विराज और नीलम एक ही ट्रेन से यहाॅ आए हों अथवा ऐसा भी हो सकता है कि ट्रेन में ये दोनो मिले भी हों और उनके बीच कोई बातचीत भी हुई हो।"
"अब बस भी करो यार।" अजय सिंह सहसा खीझते हुए बोल पड़ा था___"तुम तो ऐसी ऐसी बातें नाॅन स्टाप करती चली जा रही हो जो कि अब मेरे सिर के ऊपर से जाने लगी हैं। मुझे समझ में नहीं आता कि ये सब बातें तुम्हारे दिमाग़ में आती कैसे हैं? कभी ऐसा तो कभी वैसा, कभी ये हो सकता है तो कभी वो हो सकता है। व्हाट दा हेल इज दिस यार? तुम तो मेरे दिमाग़ का अपनी बातों से ही दही किये दे रही हो।"
"कमाल करते हो डियर हस्बैण्ड।
" प्रतिमा ने सहसा खिलखिला कर हॅसते हुए कहा___"अगर ऐसा नहीं सोचोगे तो कैसे विराज की सोच से आगे जा पाओगे? कैसे उसे अपनी मुट्ठी में कैद कर पाओगे तुम?"
"भाड़ में जाए विराज।" अजय सिंह सहसा गुस्से में बोल पड़ा___"साले ने जीना हराम कर दिया है मेरा। ऊपर से मेरी बेटी को भी अपने साथ मिला लिया उसने। बस एक बार....एक बार मेरे सामने आ जाए वो। उसके बाद मैं बताऊॅगा कि मेरे साथ ऐसी चुहलबाज़ी करने का अंजाम क्या होता है?"
"सोचने वाली बात है डियर हस्बैण्ड।" प्रतिमा ने अजय सिंह के चेहरे की तरफ देखते हुए कहा___"जो लड़का बग़ैर सामने आए तुम्हारी ये हालत कर रखा है वो अगर खुल कर सामने आ जाए तो सोचो क्या हो?"
"क्या होगा?" अजय सिंह ताव में बोला___"साले माॅ बहन बीच चौराहे पर चोदूॅगा मैं। एक बार सामने बस आ जाए वो हरामज़ादा।"
"इसका उल्टा भी तो हो सकता है डियर।" प्रतिमा ने सहसा मुस्कुरा कर कहा___"हाॅ डियर इसका उल्टा भी तो हो सकता है। यानी कि तुम तो बीच चौराहे पर उसकी माॅ बहन को न चोद पाओ मगर वो सच में ही तुम्हारे बीवी बच्चों को बीच चौराहे पर रौंद डाले।"
"ये क्या बकवास कर रही हो तुम?" अजय सिंह ने कठोर भाव से कहा___"होश में तो हो न तुम? ये तुम कैसी वाहियात बातें कर रही हो?"
"सच हमेशा कड़वा ही लगता है मेरे बलम।" प्रतिमा ने अजय सिंह के चेहरे को अपनी एक हॅथेली से सहला कर कहा___"मगर सोचो तो सही। हालात जिस तरह से उसकी मुट्ठी में हैं उससे क्या वो ये सब नहीं कर सकता?"
प्रतिमा की इस बात पर अजय सिंह कुछ बोन न सका। कदाचित उसे एहसास हो गया था कि प्रतिमा सच कह रही थी। सच ही तो था, वो भला क्या कर सकता था विराज का? जबकि विराज अगर चाहे तो यकीनन वो सब कर सकता है जिस चीज़ की बात प्रतिमा कर रही थी। ख़ैर अभी अजय सिंह ये सब सोच ही रहा था कि तभी सिरहाने की तरफ रखा लैण्डलाइन फोन बज उठा। अजर सिंह ने हाथ बढ़ा कर रिसीवर उठाया और कान से लगा लिया। दूसरी तरफ से कुछ देर तक जाने क्या कहा। जवाब में ये कह कर अजय सिंह ने रिसीवर वापस रख दिया कि "चलो कोई बात नहीं"।
"क्या कहा तुम्हारे आदमी ने?" अजय सिंह के रिसीवर रखते ही प्रतिमा ने उससे पूछा था।
"यही कि इस वक्त फार्महाउस पर कोई इंसान तो क्या एक परिंदा तक मौजूद नहीं है।" अजय सिंह ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"किन्तु हाॅ वहाॅ पर हमारी वो जीप ज़रूर उसे मिली है जो जीप हमारे ही एक आदमी के साथ लापता हो गई थी।"
"इसका मतलब।" प्रतिमा ने सोचने वाले भाव के साथ कहा___"विराज ने मुम्बई से आते ही फार्महाउस से सबको दूसरी किसी सुरक्षित जगह पर शिफ्ट कर दिया है। कदाचित उसे अब ये आभास हो चुका था कि फार्महाउस पर अब एक भी पल रुकना उनके लिए ठीक नहीं है। इस लिए इससे पहले कि तुम्हें उसके वहाॅ होने का पता चले और तुम वहाॅ पहुॅचो उससे पहले ही वो उन सबको लेकर कही दूसरी जगह कूच कर गया।
वाकई अजय, बड़ा ही शातिर दिमाग़ है उसका। वरना सोचने वाली बात है कि इतने दिन तक तो वो वहीं पर रहा था। भला एक दिन और वहाॅ रुक जाने में उसे क्या प्राब्लेम हो सकती थी। मगर नहीं, उसे तो आभास हो गया था कि अब वहाॅ पर खतरा बढ़ गया था उन सबके लिए। अतः फौरन ही सबको लेकर चलता बना वो। अब बताओ डियर हस्बैण्ड, उसकी सोच तुम्हारी सोच से दो क़दम आगे है कि नहीं?"
अजय सिंह निरुत्तर सा हो गया था। उसे समझ में ही नहीं आया कि अब वो प्रतिमा की इस बात का क्या जवाब दे? प्रतिमा बड़े ग़ौर से उसके चेहरे की तरफ कुछ देर तक देखती रही। फिर ये कह कर उसके बगल से ही लेट गई कि___"अब सो जाओ माई डियर। ज्यादा सोचने से कुछ नहीं होगा अब। नई सुबह के साथ तथा नई सोच के साथ कुछ नया करने की कोशिश करना।" अजय सिंह को भी लगा कि प्रतिमा ठीक कह रही है। अतः उसने भी अपने ज़हन से इन सारी बातों को झटका और दूसरी तरफ करवॅट लेकर लेट गया। किन्तु दोनो ही इस बात से बेख़बर थे कि सिरहाने के ऊपर ही एक बड़ी सी खिड़की थी जिसका एक पल्ला हल्का सा खुला हुआ था और उस हल्के खुले हुए पल्ले पर दो कान खरगोश की तरह खड़े उन दोनो की अब तक की सारी बातें सुन चुके थे।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
सुबह मेरी नींद खुली तो देखा कि रितू दीदी अभी भी उसी हालत में मेरे ऊपर लेटी हुई हैं। उनका वजन या ये कहिए कि उनका बोझ ज्यादा तो नहीं था मगर क्योंकि वो रात भर मेरे ऊपर ही लेटी रही थीं तो मुझे अब ऐसा लग रहा था जैसे मेरे ऊपर कितना भारी बोझ रखा हुआ हो। मेरी नींद खुलने का कारण बोझ का एहसास तो था ही किन्तु दूसरा एक कारण ये भी था कि मुझे शूशू आई हुई थी। आप तो जानते ही हैं कि सुबह सुबह शूशू के चलते हमारे महाराज स्टैण्डप पोजीशन में होते हैं।
मुझे महाराज के स्टैण्डप होने का जैसे ही एहसास हुआ मैं एकदम से घबरा सा गया। मुझे लगा कि कहीं अगर रितू दीदी जग गईं और उन्हें भी मेरे महाराज के स्टैण्डप होने का एहसास हो गया तो भारी गड़बड़ हो सकती है। वो मेरे बारे कुछ भी उल्टा सीधा सोच सकती हैं। अतः मुझे उनके जगने से पहले ही अपनी इस हालत को ठीक कर लेना था। मैने हल्का सा सिर उठा कर देखा तो रितू दीदी किसी छोटी सी बच्ची की तरह मेरे सीने पर वैसे ही छुपकी हुई सो रही थी जैसे रात को वो सोई थी।
मैने बहुत ही आहिस्ता से दाहिने तरफ करवॅट लेकर रितू दीदी को बेड पर इस तरह बड़ी सफाई से लेटाया कि उनकी नींद में ज़रा भी खलल न पड़ सके। राइट साइड बेड पर लेटा कर मैने उन्हें ठीक से सीधा कर दिया। हलाॅकि वो सीधी ही थी मगर उनके दोनो हाॅथ मुड़े हुए थे जिन्हें मैने सीधा कर दिया था। मैने देखा रितू दीदी के खूबसूरत चेहरे पर इस वक्त संसार भर की मासूमियत विद्यमान थी। उन्हें मेक-अप का ज़रा भी शौक नहीं था। वो बिना मेक-अप के ही बहुत खूबसूरत थी। बड़ी माॅ(प्रतिमा) की तरह ही वो बेहद खूबसूरत थी।
किन्तु एक अच्छे नेचर की वजह से उनकी खूबसूरती बड़ी माॅ से लाख गुना ज्यादा थी। मुझे रितू दीदी को देख कर उन पर बेपनाह प्यार आ रहा था। मैने झुक कर उनके माॅथे पर हौले से एक किस किया और फिर मुस्कुराते हुए मैं पलट कर आहिस्ता से ही बेड से उतर कर कमरे से अटैच बाथरूथ की तरफ बढ़ गया।
कुछ देर बाद जब मैं बाथरूम से सुबह के कामों से फारिग़ हो कर वापस कमरे में बेड के पास आया तो देखा रितू दीदी अभी भी वैसी ही लेटी हुईं थी किन्तु इस वक्त उनके गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठों पर बहुत ही दिलकस मुस्कान फैली हुई थी। ये देख कर मैं चौंका फिर मैं मुस्कुराते हुए आहिस्ता से बेड पर आ कर रितू दीदी के पास ही बैठ गया और उन्हें देखने लगा।
"गुड मार्निंग माई दा मोस्ट ब्यूटीपुल दीदी।" फिर मैने हौले से मुस्कुराते हुए किन्तु उन्हें देखते हुए ही कहा___"मुझे पता है आप जग चुकी हैं। किन्तु ये समझ नहीं आया कि आपके होठों पर ये खूबसूरत मुस्कान किस बात पर फैली हुई है? हलाॅकि आपको सुबह सुबह इस तरह मुस्कुराते हुए देख कर मैं बहुत खुश हो गया हूॅ।"
मेरी इस बात पर रितू दीदी के होठों की उस मुस्कान में और भी इज़ाफा हुआ और उन्होंने पट से अपनी ऑखें खोल दी। कुछ देर तक मुझे वो उसी मुस्कान के साथ देखती रहीं फिर बोलीं____"मेरे होठों पर ये मुस्कान तेरी ही वजह से है राज। मुझे नहीं पता था कि सुबह सुबह मेरा सबसे खूबसूरत और सबसे अच्छा भाई मुझे इतना प्यार से लेटा कर तथा मेरे माॅथे पर चूम कर मुझसे इतना ज्यादा प्यार करने का सबूत देगा। सच कहती हूॅ मेरे भाई, आज की ये सुबह मेरे लिए अब तक की सबसे बेस्ट सुबह थी।"
"ओह तो आप उस वक्त जगी हुई थीं?" मैने चौंकते हुए कहा___"अगर ऐसा था तो फिर आप चुपचाप ऑखें बंद कर सोये होने का नाटक क्यों कर रही थी?"
"अरे बुद्धूराम।" रितू दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा___"अगर मैं दिखा देती कि मैं जाग चुकी हूॅ तो फिर मुझे तेरा वो प्यार कैसे मिल पाता भला जो तूने मेरे माॅथे पर चूम कर जताया था?"
"अच्छा जी।" मैं कह तो गया मगर अब ये सोच सोच कर घबराने भी लगा था कि रितू दीदी अगर जग गई थी तो कहीं उन्हें मेरे महाराज के स्टैण्डप होने का बोध तो नहीं हो गया? और अगर ऐसा हो गया होगा तो यकीनन वो मेरे में ग़लत सोचने लगी होंगी। मैं भगवान से विनती करने लगा कि प्लीज ऐसा कुछ न होने देना। फिर मैने खुद को सम्हालते हुए बोला___"पर आप जगी कब थीं दीदी?"
"मैं तो तेरे जगने से पहले ही जाग गई थी।" ये कह कर रितू दीदी ने जैसे मेरे सिर पर बम्ब फोड़ा___"पर उठी इस लिए नहीं कि मुझे उस तरह लेटे रहने में बड़ा मज़ा आ रहा था।"
"क्या????" मेरे मुख से मानो चीख सी निकल गई थी, फिर बुरी तरह सकपकाते हुए बोला___"मेरा मतलब आप मेरे जगने से पहले कैसे जग गई थी?"
"अरे ये कैसा सवाल है राज?" रितू दीदी के चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे।
ये अलग बात थी कि उनके होठों पर मुस्कान वैसी ही बरकरार थी, बोली___"क्या मैं तेरे जागने से पहले खुद नहीं जाग सकती और तू इस तरह चौंक क्यों रहा है मेरे जगने की बात सुन कर? क्या तुझे मेरे जाग जाने पर कोई प्राब्लेम हुई है?"
"न.न..नहीं तो।" मैं एक बार फिर बुरी तरह सकपका गया। मुझे समझ न आया कि क्या कहूॅ___"ऐसी तो कोई बात नहीं है दीदी।"
"फिर तू इस तरह चौंका क्यों?" रितू दीदी की मुस्कान और भी गहरी हो गई___"अरे ये क्या???"
"क..क.क्या हुआ दीदी?" मैं उनके इस प्रकार कहने पर बुरी तरह डर गया। मेरे चेहरे पर उभरे पसीने में पल भर में इज़ाफा हो गया।
"ये तेरे माॅथे पर सुबह सुबह इतना पसीना कैसे उभर आया राज?" रितू दीदी ने मानो एक और बम्ब मेरे सिर पर फोड़ दिया___"क्या बात है मेरे भाई तेरी तबीयत तो ठीक है न?"
"त..त.तबीयत???" उनकी इस बात से मेरी हालत पल भर में ख़राब हो गई___"क्या मतलब है आपका? मैं तो एकदम ठीक हूॅ दीदी।"
"तू सच कहा रहा है न?" रितू दीदी ने अजीब भाव से मेरी तरफ ध्यान से देखते हुए पूछा___"और तू सच में ठीक ठाक है न?"
"ओफ्फो दीदी।" मैंने बेचैनी और परेशानी की हालत में कहा___"ये सुबह सुबह क्या अपनी पुलिसगीरी दिखाने लगी हैं आप?"
"पुलिसगीरी??" रितू दीदी चौंकी___"मैं कहाॅ पुलिसगीरी दिखा रही हूॅ तुझे? मैं तो तेरी तबीयत के बारे में ही पूछ रही हूॅ।"
"तो फिर ये पुलिस वालों की तरह तहकीक़ात करने का क्या मतलब है आपका?" मैं अब तक अपनी हालत से काफी हद तक उबर चुका था, बोला___"इतनी देर से देख रहा हूॅ कि आप बाल की खाल निकालने पर तुली हुई हैं। इतना भी नहीं सोचा कि मुझ मासूम पर इस सबसे क्या गुज़रने लगी है, हाॅ नहीं तो।"
मैने ये बात इतने भोलेपन और इतनी मासूमियत से कही थी कि रितू दीदी की हॅसी छूट गई। वो एकदम से बेड पर उठ कर बैठ गई और फिर झपट कर मुझे अपने गले से लगा लिया।
"तू सचमुच बहुत स्वीट है राज।" रितू दीदी ने मेरी पीठ पर अपने दोनो हाथ फेरते हुए कहा___"ऊपर से तेरा आज अपनी इस बात में गुड़िया(निधी) का वो तकिया कलाम यूज करना। उफ्फ जान ही ले गया रे।"
गुड़िया का ख़याल आते ही मेरे अंदर भी एक अजीब सी झुरझुरी दौड़ गई। पलक झपकते ही उसका चेहरा मेरी ऑखों के सामने उभर आया। उस चेहरे में ज़माने भर की उदासी थी, तड़प थी। मेरा दिल एकदम से निधी के लिए बेचैन हो उठा। सुबह सुबह रितू दीदी की जो मुस्कान देख कर मुझे खुशी हुई थी वो गुड़िया का उदास चेहरा मेरी ऑखों के सामने उभर आने से जाने कहाॅ गायब हो गई थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि निधी ने अचानक मुझसे बात करना क्यों बंद कर दिया था? बात करना तो दूर बल्कि वो तो मेरे सामने ही नहीं आती थी।
"क्या हुआ राज?" रितू दीदी ने मुझे चुप जान कर मुझसे अलग होते हुए पूछा___"तू एकदम से गुमसुम सा क्यों हो गया? क्या मेरी बातों से तेरा दिल दुख गया है? देख अगर ऐसी बात है तो प्लीज मुझे माफ़ कर दे।
"
"नहीं दीदी।" मैने उनके मुख पर अपना हाॅथ रख दिया, फिर बोला___"आपने कुछ नहीं किया है। आप भला कैसे मेरा दिल दुखा सकती हैं? मुझे पता है आप मुझे बहुत प्यार करती हैं।"
"तो फिर क्या बात है?" रितू दीदी ने सहसा गंभीर होकर पूछा___"तू एकदम से ही गुमसुम सा क्यों नज़र आने लगा है? आख़िर किस बात ने तुझे इतना सीरियस कर दिया है? क्या मुझे नहीं बताएगा?"
"मैं दरअसल गुड़िया की वजह से सीरियस हो गया हूॅ दीदी।" मैने गंभीरता से कहा___"पता नहीं क्या बात है जो वो मुझसे बात करने की तो बात दूर बल्कि वो मेरे सामने भी नहीं आती। जबकि उसे पता है कि मैं उसकी शरारत भरी बातों के बिना पल भर भी नहीं रह सकता।"
"ऐसा कब से है?" रितू दीदी ने पूछा___"तूने उसे कुछ कहा था क्या? या फिर तूने उसे किसी बात पर डाॅटा होगा। वो तेरी लाडली है इस लिए वो तेरे ज़ारा से भी डाॅट देने पर सीरियस हो सकती है। संभव है ऐसा ही कुछ हो।"
"मैं उसे ख्वाब में भी नहीं डाॅट सकता दीदी।" मैने पुरज़ोर लहजे में कहा___"और ना ही मैने उसे कुछ ऐसा वैसा कहा है जिससे उसे बुरा लग जाए।"
"तो फिर कोई दूसरी वजह होगी।" रितू दीदी ने सोचने वाले भाव से कहा___"कोई ऐसी वजह जिसके बारे में तुम्हें पता ही न हो।"
"ऐसी क्या वजह हो सकती है भला?" मैने कहा___"अगर कोई बात होती तो गुड़िया मुझे ज़रूर बताती।"
"कुछ बातें ऐसी भी होती हैं राज।" रितू दीदी ने समझाने वाले अंदाज़ से कहा___"जिन्हें एक बहन अपने भाई से नहीं कह सकती। वैसे इसका पता करने का सबसे अच्छा तरीका ये है कि तू उसे फोन लगा और उससे बात कर।"
"वो मेरा फोन नहीं उठाएगी दीदी।" मैने कहा___"और ना ही मुझसे बात करेगी। अगर करना होता तो अभी जब मैं मुम्बई गया था तो वो मुझसे कुछ तो बात करती। मगर वो तो मेरे सामने आई तक नहीं। आते समय मैं ही उससे मिलने उसके कमरे में गया था। मैने देखा कि कमरे में बेड पर वो ऑखें बंद कर सोने का दिखावा कर रही थी। मतलब साफ था कि वो मुझसे ना तो मिलना चाहती है और ना ही बात करना चाहती है।"
"बड़ी हैरत की बात है ये तो।" रितू दीदी के चेहरे पर हैरत के भाव उभरे___"चल ठीक है मैं अपने फोन से उसे काल करती हूॅ और मैं उससे बात करती हूॅ।"
"हाॅ ये ठीक रहेगा दीदी।" मैने खुश होते हुए कहा___"पर आप उससे ये मत कहना कि आपने उसे मेरे बातों के चलते फोन किया है और ना ही ये बताना कि मैं आपके ही पास बैठा हुआ हूॅ।"
रितू दीदी ने मेरी बात पर हाॅ में अपना सिर हिलाया और ये कह कर बेड से नीचे उतरने लगी कि वो अपने कमरे से अपना फोन लेकर अभी आती हैं। उनके जाने के बाद मैं बेड पर ही उनके आने का इन्तज़ार करने लगा। बेड के पास ही एक छोटी सी टेबल थी जिसमें मेरा मोबाइल फोन रखा हुआ था। मुझे ख़याल आया कि रितू दीदी के पास तो गुड़िया(निधी) का नंबर है ही नहीं।
अतः मैने टेबल से अपना फोन उठा कर उसमे से गुड़िया का नंबर दीदी को देने का सोचा।
मैने अपने फोन को उठा कर मोबाइल के बगल से लगी बटन पर अॅगूठे से पुश किया तो स्क्रीन जल उठी। स्क्रीन जलते ही उसमें मुझे एक मैसेज नज़र आया जो व्हाट्सएप में था और जिसे नीलम ने भेजा था। मैने फोन को अनलाॅक करके उस मैसेज को खोला। नीलम के भेजे गए मैसेज को पढ़ता चला गया मैं। मैं ये जान कर हैरान हुआ कि नीलम ने मैसेज में सच्चाई का पता लग जाने वाली बात कही थी और वो मुझसे मिलना चाहती थी। मैं चकित था कि नीलम ने इतना जल्दी सच्चाई का पता कैसे लगा लिया? उसने मैसेज में सिर्फ इतना ही लिखा था कि___"राज मुझे पता चल गया है कि सच्चाई क्या है और किस वजह से रितू दीदी माॅम डैड के खिलाफ होकर तुम्हारे साथ हो गई हैं। सारी बातें तुमसे मिलने के बाद ही बताऊॅगी इस लिए मुझे तुमसे फौरन ही मिलना है। अब ये तुम बताओ कि मैं तुमसे कब कैसे और कहाॅ मिल सकती हूॅ। मेरे इस मैसेज का जवाब जितना जल्दी हो सके देना। तुम्हारी बहन नीलम परी।"
मैं नीलम के इस मैसेज से हैरान भी था और खुश भी। हैरान इस लिए कि उसने इतनी जल्दी सच्चाई का पता कर लिया था और खुश इस लिए कि अब वो भी कदाचित रितू दीदी की तरह मेरे पास ही रहेगी। अभी मैं ये सब सोच कर खुश ही हो रहा था कि तभी रितू दीदी मेरे कमरे में अपना फोन लिए आ गईं। उनकी नज़र मेरे चेहरे पर मौजूद खुशी के भावों पर पड़ी तो उनके चेहरे पर चौंकने के भाव उभरे।
"ओये होये बड़ा खुश लग रहा है भाई।" फिर वो मुस्कुराते हुए मुझसे बोली___"कोई दूसरी गर्लफ्रैण्ड मिल गई क्या तुझे?"
"अरे नहीं दीदी।" मैं उनकी इस बात से मुस्कुराते हुए बोला___"ऐसी कोई बात नहीं है। दरअसल मेरे फोन पर नीलम का मैसेज आया था रात में। उसके मैसेज को पढ़ कर ही खुश हो रहा था।"
"ओह तो ये बात है।" रितू दीदी बेड पर मेरे पास ही बैठते हुए कहा___"ऐसा क्या लिख कर भेजा है उसने मैसेज में जिसके चलते तू इतना खुश हो रहा है? ज़रा मुझे भी तो सुना उसका मैसेज।"
लीजिए, आप खुद ही पढ़ लीजिए।" मैने मोबाइल उनके हाथ में पकड़ाते हुए कहा___"हो सकता है कि आप भी मेरी तरह उसका मैसेज पढ़ कर खुश हो जाएॅ।"
"उसके लिए मुझे मैसेज पढ़ने की ज़रूरत नहीं है मेरे प्यारे भाई।" रितू दीदी ने मुझे देखते हुए कहा___"क्योंकि अगर तू खुश है तो मैं तुझे खुश देख कर ही खुश हो जाऊॅगी।"
मैं उनकी इस बात से बस मुस्कुरा कर रह गया। जबकि ऐसा कहने के बाद दीदी ने नीलम के मैसेज की तरफ देखा और मैसेज को पढ़ने लगीं। मैसेज पढ़ते ही उनके चेहरे पर हैरत और खुशी के मिले जुले भाव उभरे और फिर एकाएक ही उनके चेहरे पर गंभीरता छा गई।
"क्या हुआ दीदी?" मैं उनके चेहरे पर अचानक ही उभर आई उस गंभीरता को देख चौंकते हुए पूछा___"आपको नीलम के इस मैसेज को पढ़ कर खुशी नहीं हुई?"
"खुशी तो हुई राज।
" रितू दीदी ने पूर्वत गंभीर भाव से ही कहा___"ये जानकर अच्छा भी लगा कि नीलम को भी सच्चाई का पता चल गया है मगर गंभीरता वाली बात ये है कि कहीं डैड को भी न इस बात का आभास हो जाए कि नीलम को भी सच्चाई पता चल गई होगी। उस सूरत में नीलम पर खतरा भी पैदा हो सकता है।"
"ये आप क्या कह रही हैं दीदी?" मैने हैरानी से कहा__"भला बड़े पापा को इस बात का आभास कैसे हो जाएगा कि नीलम उनकी सच्चाई जान चुकी होगी?"
"तुम मेरी माॅम को नहीं जानते राज।" रितू दीदी ने उसी गंभीरता से कहा___"उन्होंने डैड के साथ ही वकालत की पढ़ाई की थी। उनका दिमाग़ बहुत ही शार्प है। डैड से कई गुना ज्यादा उनका दिमाग़ चलता है। वो पिछले कुछ दिनों की घटनाओं को मद्दे नज़र रखते हुए डैड को ये बात समझा सकती हैं कि नीलम को सच्चाई का पता ज़रूर चल गया होगा अथवा वो सच्चाई का पता लगाने की राह पर चल रह होगी।"
"बात कुछ समझ में नहीं आई दीदी।" मैंने उलझनपूर्ण भाव से कहा___"भला बड़ी माॅ ऐसा क्या सोच कर बड़े पापा को समझाएॅगी?"
"सीधी सी बात है राज।" दीदी ने कहा___"ये तो उन्हें अब तक समझ आ ही गया होगा कि हमने क्या क्या और किस तरीके से किया है? इस लिए उन्हें इस सबकी कड़ियाॅ जोड़ने में कोई मुश्किल नहीं होगी। कहने का मतलब ये कि सारी घटनाओं के बाद वो अब उस दिन की घटनाओं को आपस में मिलाएॅगी जिस दिन डैड को हमारे नकली सीबीआई वाले गिरफ्तार करके ले गए थे और फिर बिना कुछ पूछताॅछ किये उन्हें दो दिन बाद छोंड़ भी दिया था। डैड को ये यो पता चल ही गया था कि वो सब तुम्हारा ही किया धरा था, क्योंकि तुम्हारे उन नकली सीबीआई वाले आदमियों ने अपनी बातों के बीच तुम्हारा ही नाम लिया था। अतः सारी बातें जानने के बाद माॅम को ये सोचने में ज़रा भी समय नहीं लगेगा कि तुमने डैड को दो दिन के लिए अंडरग्राउण्ड करके अपना कौन सा अहम किया हो सकता है। यानी उन्हें ये तो अंदाज़ा था ही कि तुम अभी यहीं हो और यहीं से ही सारी घटनाओं को अंजाम दे रहे हो। मगर ये भी भूलने वाली बात नहीं है कि तुम्हारे पास पवन और उसकी फैमिली भी है जो कि तुम्हारी कमज़ोरी के रूप में हैं। तुम ये हर्गिज भी नहीं चाहोगे कि तुम्हारी कमज़ोरी डैड के हाॅथ लग जाए। क्योंकि उस सूरत में तुम बहुत ही ज्यादा कमज़ोर पड़ जाओगे और ये भी संभव है कि उस सूरत में तुम मजबूरन डैड के हाॅथ भी लग जाओ। उसके बाद किस्सा खत्म। इस लिए तुम यही चाहोगे कि सबसे पहले तुम अपनी कमज़ोरियों को या तो पूर्णरूप से सुरक्षित कर दो या फिर उन्हें डैड की पहुॅच से बहुत दूर कर दो। माॅम के दिमाग़ में यही बातें होगी और वो सोचेंगी कि तुम ऐसा ही करना चाहोगे। यानी पवन तथा उसकी माॅ बहन को डैड की पहुॅच से दूर मुम्बई भेज देना चाहोगे।
किन्तु तुम्हारे पास समस्या ये होगी कि पवन आदि को लेकर जाने के बाद मैं और नैना बुआ यहाॅ अकेली रह जाएॅगी, और हम दोनो पर डैड का खतरा रहेगा। अतः तुम कोई ऐसा जुगाड़ लगाओगे जिससे तुम्हारे दोनो काम आसानी से और सुरक्षित तरीके से हो जाएॅ। तब तुमने सोचा कि डैड के रूप में राजा को ही सह और मात दे दी जाए जिससे ना रहेगा बाॅस और ना ही बजेगी बाॅसुरी वाली बात हो जाएगी। यही तुमने किया भी और जब तुम वापस मुम्बई से लौट आए तो डैड को भी छोंड़ दिया अपने नकली सीबीआई के आदमियों के हवाले से।"
"ये सब तो ठीक है दीदी।" मैने शख्त हैरानी से दीदी की तरफ देखते हुए कहा___"किन्तु इसमें ये बात कहाॅ से आती है कि उन्हें ये पता चल सकता है कि नीलम भी उनकी सच्चाई को जान चुकी है या फिर सच्चाई जानने की राह पर चल रही होगी?"
"वहीं पर आ रही हूॅ माई डियर ब्रदर।" रितू दीदी ने सहसा मुस्कुराते हुए कहा___"माॅम ये सोचेंगी कि उसी दिन तीन तीन लोग हल्दीपुर कैसे आ गए? मतलब कि डैड तो हवेली आए ही उनके साथ साथ उसी दिन नीलम भी हवेली आ पहुॅची और ये भी उनके ज़हन में होगा कि तुम भी वापस मुम्बई से आ गए होगे और इसी लिए डैड को छोंड़ भी दिया था। तो सोचने वाली बात थी ये तीन लोग संयोगवश तो नहीं आ गए थे यहाॅ। यानी कहीं न कहीं इसमें कोई पेंच या भेद ज़रूर था। माॅम को सोचने और समझने में देर नहीं लगेगी कि जिस ट्रेन से तुम आए उसी ट्रेन से नीलम भी आई होगी और बहुत हद तक ये भी संभव है कि तुम दोनो की मुलाक़ात भी ट्रेन में हुई हो। मुलाक़ात जब होती है तो कुछ न कुछ बात चीत भी होती है। अब चूॅकि हालात ऐसे थे कि तुम दोनो के बीच में नार्मल बातें तो होंगी नहीं यानी कि तक़रार भरी अथवा गिले शिकवे संबंधी बातें हुई होंगी। दूसरी बात माॅम ने मुझे फोन किया था पर मैने उनका फोन उठाया नहीं तब उन्होंने नीलम को फोन किया। नीलम ने मुझे फोन कर मुझसे बात की थी और पूछा था कि मैं अपने ही माॅम डैड के खिलाफ होकर तुम्हारे साथ क्यों हूॅ तब मैने उससे कहा था कि वो सच्चाई का पता खुद लगाए। यही बात माॅम ने भी सोचा होगा। यानी उन्हें ये लगा होगा कि मैने नीलम को सारी बातें बता दी होंगी और अब नीलम सच्चाई जान चुकी है। या फिर अगर मैने नहीं बताया होगा तो इतना तो ज़रूर ही कहा होगा कि मेरे माॅम डैड के खिलाफ़ होने की वजह का पता वो खुद लगाए। इस लिए नीलम वजह या सच्चाई का पता लगाने आई होगी।" रितू दीदी ने इतना कहने के बाद गहरी साॅस ली और फिर बोली___"इन सब बातों की वजह से ही मैं कह रही हूॅ राज कि नीलम पर अब ख़तरा है और उस नादान व नासमझ को इस बात का एहसास भी नहीं होगा कि वो कितनी बड़ी मुसीबत में फॅस सकती है। उसे उस जगह से निकालना होगा राज वरना सच में अनर्थ हो सकता है। वो हवश के पुजारी मेरी मासूम बहन को बरबाद कर सकते हैं।"
"नहींऽऽ।
" मैंने सहसा आवेश में आकर कहा___"ऐसा हर्गिज़ नहीं होगा दीदी और मैं होने भी नहीं दूॅगा। अगर मेरी मासूम बहन को उन लोगों ने छुआ भी तो उन्हें इसका अंजाम बहुत ही भयानक रूप से भुगतना पड़ेगा।"
"नीलम के साथ में सोनम भी है।" रितू दीदी ने गंभीरता से कहा___"उसे भी उन लोगों से दूर करना होगा। मैं उस कमीने शिवा को बहुत अच्छे तरीके से जानती हूॅ। उसे वासना और हवश के चलते रिश्तों का कोई भान नहीं रहेगा और वो सोनम को भी हवश भरी नज़रों से देख रहा होगा। हे भगवान ये नीलम उसे अपने साथ लेकर यहाॅ आई ही क्यों थी?"
"फिक्र मत कीजिए दीदी।" मैने कठोरता से कहा___"उन दोनो को कुछ नहीं होगा। अब मैदान में खुल कर आने का समय आ गया है। आपके डैड को ये बताने का समय आ गया है कि अगर मैं उनके सामने भी आ जाऊॅ तो मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं।"
"कुछ भी करने से पहले तुम्हें नीलम और सोनम को सुरक्षित वहाॅ से निकालना होगा।" रितू दीदी ने समझाने वाले अंदाज़ से कहा___"उसके बाद ही हम कोई ठोस क़दम उठाने में सक्षम हो सकते हैं।"
"ठीक है दीदी।" मैने कहा___"मैं नीलम से बात करके उसे सब कुछ समझाता हूॅ कि उसे क्या और कैसे करना है। आप भी गुड़िया से बात कर लीजिए। और हाॅ इस बात की बिलकुल भी फिक्र मत कीजिए कि नीलम व सोनम दीदी में से किसी को भी मेरे रहते कुछ होगा। मैं अपनी जान देकर भी उनकी इज्ज़त और जान की हिफाज़त करूॅगा।"
"ऐसा मत कह राज।" रितू दीदी की ऑखें छलक पड़ी, बोली___"तुझे कुछ होने से पहले ही मैं अपनी जान दे दूॅगी। मेरा सबसे प्यारा भाई ही नहीं रहेगा तो मैं इस पापी दुनियाॅ में अकेली जी कर क्या करूॅगी।"
"सब ठीक ही होगा दीदी।" मैने दीदी को अपने से छुपका लिया___"और मैं सब कुछ ठीक करने की पूरी कोशिश भी करूॅगा। चलिए अब आप भी फ्रेश हो लीजिए, सुबह हो गई है। नैना बुआ आपको आपके कमरे में न देखेंगी तो कहीं आपको ढूॅढ़ने न लग जाएॅ। अतः अब आप जाइये और हाॅ गुड़िया से ज़रूर बात कर लीजिएगा।"
मेरे कहने पर रितू दीदी ने मुझसे अलग होकर हाॅ में सिर हिलाया। मैने उन्हें अपने फोन से गुड़िया का नंबर मैसेज किया। उसके बाद दीदी कमरे से चली गईं। उनके जाने के बाद मैंने गहरी साॅस ली तथा फिर मैने नीलम को मैसेज किया। अपने मोबाइल को हाॅथ में लिए मैं नीलम की तरफ से उसके रिप्लाई का इन्तज़ार करने लगा।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दोस्तो, आप सबके सामने अपडेट हाज़िर है,,,,,,,,
आप सबकी खूबसूरत प्रतिक्रिया और आपके शानदार रिव्यू का बेसब्री से इन्तज़ार रहेगा
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.......《 55 》
अब तक,,,,,,,,
"कुछ भी करने से पहले तुम्हें नीलम और सोनम को सुरक्षित वहाॅ से निकालना होगा।" रितू दीदी ने समझाने वाले अंदाज़ से कहा___"उसके बाद ही हम कोई ठोस क़दम उठाने में सक्षम हो सकते हैं।"
"ठीक है दीदी।
" मैने कहा___"मैं नीलम से बात करके उसे सब कुछ समझाता हूॅ कि उसे क्या और कैसे करना है। आप भी गुड़िया से बात कर लीजिए, और हाॅ इस बात की बिलकुल भी फिक्र मत कीजिए कि नीलम व सोनम दीदी में से किसी को भी मेरे रहते कुछ होगा। मैं अपनी जान देकर भी उनकी इज्ज़त और जान की हिफाज़त करूॅगा।"
"ऐसा मत कह राज।" रितू दीदी की ऑखें छलक पड़ी, बोली___"तुझे कुछ होने से पहले ही मैं अपनी जान दे दूॅगी। मेरा सबसे प्यारा भाई ही नहीं रहेगा तो मैं इस पापी दुनियाॅ में अकेली जी कर क्या करूॅगी?"
"सब ठीक ही होगा दीदी।" मैने दीदी को अपने से छुपका लिया___"और मैं सब कुछ ठीक करने की पूरी कोशिश भी करूॅगा। चलिए अब आप भी फ्रेश हो लीजिए, सुबह हो गई है। नैना बुआ आपको आपके कमरे में न देखेंगी तो कहीं आपको ढूॅढ़ने न लग जाएॅ। अतः अब आप जाइये और हाॅ गुड़िया से ज़रूर बात कर लीजिएगा।"
मेरे कहने पर रितू दीदी ने मुझसे अलग होकर हाॅ में सिर हिलाया। मैने उन्हें अपने फोन से गुड़िया का नंबर मैसेज किया। उसके बाद दीदी कमरे से चली गईं। उनके जाने के बाद मैंने गहरी साॅस ली तथा फिर मैने नीलम को मैसेज किया। अपने मोबाइल को हाॅथ में लिए मैं नीलम की तरफ से उसके रिप्लाई का इन्तज़ार करने लगा।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,,
उधर मंत्री दिवाकर चौधरी के आवास पर।
अशोक मेहरा व अवधेश श्रीवास्तव ड्राइंग रूम में बैठे थे। सामने के सोफे पर एक ब्यक्ति और बैठा हुआ था जो कि अवधेश के साथ ही आया हुआ था। उसका नाम हरीश राणे था। हरीश राणे पेशे से एक प्राइवेट डिटेक्टिव था। उसने बाकायदा अपनी एक अलग डिटेक्टिव एजेंसी खोली हुई थी तथा उसके अंडर में काफी सारे लोग काम करते थे। अवधेश श्रीवास्तव और हरीश राणे की मुलाक़ात कई साल पहले किसी केस के सिलसिले पर ही हुई थी। तब से इन दोनो के बीच यारी दोस्ती का गहरा नाता था।
हरीश राणे बहुत ही क़ाबिल और तेज़ दिमाग़ का डिटेक्टिव था। उसके बारे में कहा जाता है कि उसने अब तक जिस केस को भी अपने हाॅथ में लिया उसे बहुत ही कम समय में साल्व किया था। कदाचित यही वजह है कि आज के समय में हरीश राणे एक केस के लिए अच्छी खासी फीस चार्ज़ करता था। फीस तो उसकी होती ही थी किन्तु उसके आने जाने का खर्चा पानी भी उसे अलग से देना पड़ता था। ख़ैर, इस वक्त ये तीनों ही ड्राइंग रूम में बैठे चौधरी के आने का पिछले एक घंटे से इन्तज़ार कर रहे थे।
चौधरी के पीए ने बताया था कि चौधरी साहब अपनी रखैल सुनीता के साथ कमरे में हैं। अवधेश व अशोक ये जान कर हैरान रह गए थे कि चौधरी आज सुबह सुबह ही सुनीता को भोगने में लग गया था। आम तौर पर ऐसा होता नहीं था, और ना ही चौधरी इस क़दर सुनीता का दीवाना था। मगर जाने क्या बात थी कि आज सुबह सुबह ही चौधरी सुनीता के साथ कमरे में बंद था। उसे ये तक होश नहीं था कि हालात कितने गंभीर थे आजकल।
अवधेश श्रीवास्तव अपने डिटेक्टिव दोस्त हरीश राणे को चौधरी से मिलवाने लाया था। वो चाहता था कि चौधरी राणे से मिल कर अपने तरीके से उसे केस के सिलसिले में बताएॅ और आगे का काम शुरू करने की परमीशन दे। ख़ैर एक घंटे दस मिनट बाद चौधरी और सुनीता एकदम से फ्रेश होकर ड्राइंग रूम में आए। उन दोनो के हाव भाव से बिलकुल भी ऐसा नहीं लग रहा था कि वो दोनो बाॅकी सबकी जानकारी के अंदर क्या गुल खिला कर आए थे। बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे कुछ हुआ ही न हो।
"माफ़ करना यारो।" दिवाकर चौधरी ने सोफे पर बैठते हुए तथा सबकी तरफ नज़रें दौड़ाते हुए कहा___"तुम सबको इन्तज़ार करना पड़ा।"
"कोई बात नहीं चौधरी साहब।" अवधेश ने मजबूरी में ही सही किन्तु मुस्कुराते हुए कहा___"इतना तो चलता है। ख़ैर जैसा कि मैने आपसे ज़िक्र किया था तो मैं अपने साथ अपने डिटेक्टिव दोस्त हरीश राणे को लेकर आया हूॅ। आप इनसे मिल लीजिए और केस से संबंधित बात कर लीजिए।"
"ओह हैलो राणे।" चौधरी ने हरीश की तरफ देखते हुए किन्तु तनिक मुस्कुराते हुए कहा___"भई तुम अवधेश के दोस्त हो तो हमारे भी दोस्त ही हुए। इस लिए हमसे किसी भी बात के लिए संकोच या झिझक करने की ज़हमत मत उठाना।"
"जी बिलकुल चौधरी साहब।" हरीश राणे ने भावहीन स्वर में कहा___"वैसे भी हमारे पेशे में संकोच या झिझक के लिए कोई जगह नहीं होती है। ख़ैर आप बताएॅ मेरे लिए क्या आदेश है? आपके लिए कुछ कर सकूॅ ये मेरा सौभाग्य ही होगा।"
"सारी बातें तो तुम्हें अवधेश ने बता ही दी होंगी।" चौधरी ने कहा___"और शायद ये भी समझा दिया होगा कि तुम्हें करना क्या है?"
"जी बिलकुल।" हरीश राणे ने कहा___"अवधेश ने मुझे इस केस से संबंधित सारी बातें बताई हैं। इसके बावजूद आप अगर अपने मुख से एक बार फिर से इस बारें में मुझे बता देंगे तो ज्यादा बेहतर होगा।"
"दरअसल हालात ऐसे हैं।" दिवाकर चौधरी ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"कि हम सब कुछ कर गुज़रने की क्षमता रखते हुए भी कुछ कर नहीं सकते। अवधेश ने ही सुझाव दिया था कि इस काम में हमारे अलावा एक डिटेक्टिव ही बेहतर तरीके से कोई कार्यवाही कर सकता है। हमें भी लगा कि आइडिया अच्छा है। ख़ैर, हम सिर्फ ये चाहते हैं कि जिस शख्स की वजह से हम कुछ कर नहीं पा रहे हैं उसे तुम हमारे सामने लाकर खड़ा कर दो। किन्तु इस बात का बखूबी और सबसे पहले ख़याल रहे कि उसे इस बात की भनक भी न लगे कि हमने तुम्हारे रूप में कोई जासूस उसके पीछे लगा रखा है। क्योंकि अगर उसे तुम्हारे बारे में पता चल गया तो तुम सोच भी नहीं सकते हो कि तुम्हें हायर करने के लिए तथा उसके पीछे लगाने के लिए हमें इसका कितना संगीन अंजाम भुगतना पड़ सकता है। ख़ैर, हम ये चाहते हैं कि उस शख्स के पास से वो सारे वीडियोज तुम हमें वापस लाकर दो और उसकी कैद से हमारे बच्चों को भी सही सलामत यहाॅ लेकर आओ।
उसके बाद हम खुद देख लेंगे उस बास्टर्ड को कि वो खाली हाॅथ हमारा क्या उखाड़ लेता है?"
"ठीक है चौधरी साहब।" हरीश राणे ने कहा___"मैं आज और अभी से इस काम में लग जाता हूॅ। हलाॅकि इस काम में कोई बहुत बड़ी बात नहीं है जिसके लिए आपको किसी डिटेक्टिव की ज़रूरत पड़ती, मगर चूॅकि आप उस शख्स के द्वारा पंगू बने हुए हैं इस लिए खुद कुछ कर नहीं सकते हैं। अतः आपको कोई ऐसा ब्यक्ति चाहिए जो आपके लिए ये सब इस तरीके से करे कि खुद डिटेक्टिव को भी पता न चल पाए कि वो क्या कर गया है?"
"बिलकुल, तुम सही समझे राणे।" चौधरी ने प्रभावित नज़रों से हरीश को देखते हुए कहा___"तुम खुद समझ सकते हो कि जब तक उसके पास हम लोगों के वो वीडियोज हैं तब तक हम में से कोई भी कोई ठोस ऐक्शन नहीं ले सकता उसके खिलाफ।"
"आप बेफिक्र रहिए चौधरी साहब।" हरीश राणे ने कहा___"बहुत जल्द आप इस बेबसी के आलम से उबर जाएॅगे और फिर आप स्वतंत्र रूप से कुछ भी करने की हालत में भी आ जाएॅगे।"
"आई होप कि ऐसा ही हो।" चौधरी ने कहा___"हम चाहते हैं कि ये काम जितना जल्दी हो सके तुम कर डालो। क्योंकि हमसे अब और ज्यादा ये सब झेला नहीं जा रहा है। अपनी फीस के रूप में जितना चाहो रुपया ले सकते हो हमसे। हमें जल्द से जल्द बस अच्छा रिजल्ट चाहिए।"
"डोन्ट वरी चौधरी साहब।" हरीश राणे ने कहा___"आपको इस सबसे बहुत जल्द ही मुक्ति मिल जाएगी। अच्छा अब मुझे यहाॅ से जाने की इजाज़त दीजिए।"
"ठीक है तुम जाओ राणे।" चौधरी ने कहा___"हमें बड़ी शिद्दत से उस दिन की प्रतीक्षा रहेगी जबकि हमारे बच्चे और वो वीडियोज हमारे पास होंगे।"
मंत्री दिवाकर चौधरी से इजाज़त लेकर हरीश राणे नाम का वो डिटेक्टिव वहाॅ से चला गया। उसके जाने के बाद कुछ देर तक ड्राइंगरूम में सन्नाटा छाया रहा। सबके चेहरों पर सोचो के भाव गर्दिश करते नज़र आ रहे थे।
"ये काम तो बहुत अच्छा हुआ चौधरी साहब।" सहसा पहली बार इस बीच अशोक मेहरा ने अपना मुख खोलते हुए कहा___"मगर आपने तो उस ठाकुर से भी इसके लिए मदद करने की बात की थी तो फिर उसका क्या? मेरा मतलब है कि क्या सचमुच इस मामले में वो हमारी मदद करेगा अथवा उसका वो मदद के लिए हाॅमी भरना महज उस वक्त की बस एक औपचारिकता थी?"
"बेशक, उसकी औपचारिकाता भी समझ सकते हो।" मंत्री ने कहा___"क्योंकि हमें भी ऐसा लगता है कि वो इस मामले में कुछ खास हमारी मदद नहीं कर सकता। उसकी खुद की थानेदारनी बेटी उसके खिलाफ़ है। बेटी के खिलाफ़ होने की जो वजह उसने हमें बताई थी उस वजह में कोई खास बात नहीं थी। क्योंकि महज इतनी सी बात पर कि उसके और उसकी पत्नी को बेटी का पुलिस की नौकरी करना पसंद नहीं था और वो इस बारे में बेटी से बोलते भी थे तो ऐसा नहीं हो सकता कि बेटी इतनी सी बात पर वो अपने पैरेंट्स के खिलाफ़ हो जाए।
खिलाफ़ होने के पीछे ज़रूर कोई ऐसी ठोस वजह होगी जिसके बारे में ठाकुर ने हमें बताना शायद ज़रूरी नहीं समझा या फिर ऐसा हो सकता है कि वो उस वजह को हमसे बताना ही न चाहता रहा हो।"
"बात तो आपकी एकदम सही है चौधरी साहब।" अशोक मेहरा ने सोचने वाले भाव से कहा___"किन्तु सोचने वाली बात तो है ही कि ऐसी क्या वजह हो सकती है जिसके तहत उसकी खुद की बेटी उसके खिलाफ़ हो गई है?"
"हमें लगता है कि ठाकुर खुद भी दूध का धुला हुआ नहीं है।" चौधरी ने कहा___"उसने अपने भतीजे और छोटे भाई की बीवी के संबंध में जो कुछ भी हमें बताया था संभव है कि उसकी उस बात में कोई सच्चाई हो ही न। कहने का मतलब ये कि जिन आरोपों के तहत उसने अपने छोटे भाई की बीवी और उसके बच्चों को हर चीज़ से बेदखल किया था वो सभी आरोप महज उसी की चाल का एक हिस्सा रहे हों। हम ऐसा उसकी बेटी के खिलाफ़ हो जाने की बात के आधार पर कह रहे हैं। ये तो एक यथार्थ सच्चाई है कि झूॅठ या बुराई एक न एक दिन अपना चेहरा सबको दिखा ही देती है। इस लिए अगर ठाकुर ने वो आरोप किसी साजिश के तहत झूॅठ की बुनियाद पर लगाए रहे होंगे तो संभव है कि उसकी वो सच्चाई किसी तरह सामने आ गई हो और उसकी बेटी को भी पता चल गई हो। इतना तो वो भी समझ सकती है कि बुरा करने वाला कभी पलट कर अपने हक़ के लिए इस तरह लड़ाई नहीं किया करता। अगर विराज की माॅ का चरित्र सचमुच में गिरा हुआ रहा होगा तो ये बात कहीं न कहीं से विराज को भी पता चलती और वो उस सूरत में शर्म से पानी पानी होता तथा साथ ही फिर वो कभी पलट कर गाॅव में किसी को अपनी शक्ल न दिखाता। मगर उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया उल्टा इसके विपरीत वो ठाकुर से अपने हक़ के लिए तथा अपने साथ हुए अन्याय के लिए लड़ाई कर रहा है। इस बात से कहीं न कहीं सोचने वाली बात हो ही जाती है कि कहीं ठाकुर ने वो सब आरोप झूठ मूॅठ में ही तो नहीं लगाए थे विराज की माॅ पर? वरना वो इस तरह सीना तान कर तथा इतनी दिलेरी से उससे जंग क्यों करता? यही बात ठाकुर की बेटी भी सोची होगी और फिर उसने सच्चाई का पता भी लगाया होगा। संभव है कि उसे वास्तविक सच्चाई का पता चल गया हो, उस सूरत में वो अपने माॅ बाप के खिलाफ़ हो गई। हलाॅकि सोचने वाली बात तो ये भी है कि अगर माॅ बाप बुरे हैं तो संतान इतनी पाक़ साफ कैसे हो गई कि वो अपने ही माॅ बाप के खिलाफ़ हो जाए?"
"आपकी बातों में यकीनन वजन है।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"मगर ऐसा होता है चौधरी साहब कि कीचड़ में ही कमल खिलते हैं। कहने का मतलब ये कि भले ही ठाकुर और ठाकुर की बीवी बुरे चरित्र वाले रहे हों किन्तु ज़रूरी नहीं कि उसके सभी बच्चे भी उनकी तरह ही बुरे निकलें। हर इंसान की सोच व स्वभाव अलग होता है। अतः संभव है कि ठाकुर की बेटी अच्छी सोच व अच्छे नेचर की लड़की हो और वो अन्याय का साथ देने की सोच न रखती हो।"
"बिलकुल।
" चौधरी ने कहा___"अगर तुम्हारी बातों को मान कर चलें तो ये सवाल भी पैदा हो जाता है कि अगर ठाकुर की बेटी अपने पैरेंट्स के रूप में अन्याय के खिलाफ़ हो गई है तो ये भी ज़ाहिर सी बात है कि फिर उसने न्याय और सच्चाई का साथ देने का भी सोचा हो।"
"यकीनन ऐसा हो सकता है चौधरी साहब।" अशोक मेहरा कह उठा___"न्याय और सच्चाई का साथ देने का मतलब है कि वो विराज का साथ दे रही होगी। उसे सच्चाई का पता चल गया होगा कि विराज और उसकी माॅ पर उसके बाप द्वारा लगाए गए वो सभी आरोप फर्ज़ी थे इस लिए उसे विराज और उसकी माॅ से सहानुभूति हुई होगी और उसने विराज का हक़ दिलाने के लिए उसका साथ देने लगी होगी।"
"अगर सच्चाई यही है।" अवधेश ने कहा___"तो इसका मतलब ये हुआ कि हमारा दुश्मन विराज ही नहीं बल्कि ठाकुर की बेटी भी हुई। इससे एक बात और भी समझ में आती है जो कि अपनी जगह सटीक ही बैठती है।"
"कौन सी बात??" चौधरी के माॅथे पर शिकन उभर आई।
"यही कि।" अवधेश ने कहा___"विधी रेप केस के समय रितू ने ही विराज को मुम्बई से यहाॅ बुलाया होगा।"
"ये तुम क्या कह रहे हो अवधेश?" चौधरी के साथ साथ बाॅकी सबकी भी ऑखें फैली।
"हाॅ चौधरी साहब।" अवधेश ने कहा___"रितू का नाम आने से कुछ बातें मुझे समझ आ रही हैं। जैसा कि ठाकुर की बेटी अपने पैरेंट्स के खिलाफ है तो यकीनन वो विराज का ही साथ दे रही होगी। इस मामले में बहुत गहरी बात भी छुपी है चौधरी साहब जिसकी हमने कल्पना भी नहीं कर सकते थे।"
"ये तुम क्या ऊल जलूल बकने लगे अवधेश?" चौधरी ने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा___"साफ साफ बोलो कि क्या कहना चाहते हो तुम?"
"इन सारी बातों का केन्द्र बिंदू।" अवधेश ने कहा___"विधी का रेप केस ही है। हम सब यही समझ रहे थे कि उस रेप केस पर पुलिस का कोई हाथ नहीं है और ये सच भी था। मगर गौर कीजिए रितू के ही थाना क्षेत्र में विधी गंभीर हालत में पाई गई थी। रितू क्योंकि थानेदारनी थी इस लिए उसे जब गंभीर हालत में पड़ी किसी लड़की की सूचना मिली होगी तो वो फौरन वहाॅ पहुॅची होगी। गंभीर हालत में पड़ी उस लड़की को सर्वप्रथम उसने किसी हास्पिटल में भर्ती कराया होगा। लड़की के होश में आने पर उसने उससे रेप के बारे में सब कुछ पूछा होगा। रितू ने लड़की के घर वालों को भी बुलाया होगा जैसा कि आम तौर होता है। विधी के माॅ बाप आए होंगे और अपनी बेटी की उस हालत को देख कर वो यकीनन दुखी भी हुए होंगे। यहाॅ पर पुलिस केस करने की भी बात आई होगी। किन्तु जब विधी ने बताया होगा कि उसके साथ रेप करने वाले लड़के कौन थे तो विधी के माॅ बाप के हाथ पाॅव फूल गए होंगे और उन्होंने केस करने से मना कर दिया होगा। इधर रितू ने अपने आला अफरान को भी विधी रेप केस के बारे में बताया होगा। बात कमिश्नर तक पहुॅची होगी और कमिश्नर ने भी रितू को यही कहा होगा कि मामले को किसी तरह दबा दो।
ख़ैर, रितू को विधी के द्वारा ही तहकीक़ात में पता चला होगा कि विधी असल में उसके भाई विराज से प्रेम भी करती थी। ये जान कर निश्चय ही रितू ने विराज से संबंध स्थापित कर उसे सब बताया होगा और यहाॅ बुलाया होगा। विराज यहाॅ आया और उसने अपनी प्रेमिका की वो हालत देखी तो उसे सहन नहीं हुआ। उसने अपनी मासूक़ा का बदला लेने के लिए ऐलान किया होगा। इसमे उसका साथ देने के लिए रितू भी सहमत हुई होगी। उसके बाद क्या हुआ आप सबको पता ही है।"
"तुम्हारे कहने का मतलब है कि ठाकुर की थानेदारनी बेटी के द्वारा ही विराज यहाॅ आया और फिर उसने बदला लेने के रूप में ये सब किया?" चौधरी ने कहा___"और इतना ही नहीं वो खुद अपने भाई का साथ भी दे रही है?"
"मैं यही कहना चाहता हूॅ चौधरी साहब।" अवधेश ने पुरज़ोर लहजे में कहा___"और मुझे तो ये भी लगता है कि ये सारा बखेड़ा ही उस थानेदारनी के द्वारा हुआ है।"
"पता नहीं तुम क्या फालतू की बकवास किए जा रहे हो अवधेश।" चौधरी ने खीझते हुए कहा___"तुम अपनी कोई बात पर कामय ही नहीं हो। पहले कह रहे थे कि विराज ने ये सब किया है और अब कह रहे हो कि ठाकुर की उस बेटी ने किया है। आख़िर तुम्हारे दिमाग़ में ये बेसिर पैर की बातें कहाॅ से आती हैं?"
"ये मामला ही ऐसा था चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"कि हम में से कोई भी इसके बारे में ठीक से समझ नहीं पाया था। मगर जैसे जैसे हालात सामने आए उस हिसाब से संभावनाओं की बातें की हमने। ख़ैर, मैं ऐसा इस लिए कह रहा हूॅ कि इसके पीछे भी एक वजह है। जैसे कि जिस समय विधी के रेप का मामला सामने आया उस समय तो विराज यहाॅ था ही नहीं बल्कि रितू ही थी। जिसने पुलिस के रूप में ही सही मगर विधी के केस को हाॅथ में लिया था। ये अलग बात है कि हमारे दबदबे और पुलिस कमिश्नर के मना कर देने पर उसने कोई केस फाइल नहीं किया था। मगर जब उसे पता लगा कि विधी वो लड़की है जो खुद उसके ही चचेरे भाई से प्रेम करती थी तो उसके प्रति रितू की हमदर्दी या सहानुभूति यकीनन अलग ही तरह की हो गई होगी। उसके मन में ये तो आया ही होगा कि विधी के साथ हुए इस कुकर्म पर इंसाफ हो यानी रेप करने वाले लड़कों को कानूनन शख्त से शख्त सज़ा मिले। मगर मामला क्योंकि आपसे ताल्लुक रखता था अतः उस केस पर कानूनी तौर पर कोई ऐक्शन वो चाहते हुए भी न ले पाई थी। इस लिए संभव है कि उसने हमारे बच्चों को सज़ा देने के लिए कानून को अपने हाॅथ में ले लिया हो। जिसके तहत सबसे पहले वो हमारे बच्चों के बारे में अपने मुखबिरों से पता लगवाया होगा और जब उसे पता चल गया होगा कि रेप करने वाले हमारे बच्चे हमारे फार्महाउस पर हैं तो वो उन्हें पकड़ने के लिए वहाॅ जा धमकी होगी। वहाॅ पर उसने हमारे बच्चों को जबरन ग़ैर कानूनी तरीके से गिरफ्तार किया होगा तथा फार्महाउस की तलाशी भी ली होगी।
जहाॅ से उसे हमारे खिलाफ़ वो सारे वीडियोज मिले। इसके बाद वो हमारे बच्चों को लेकर ऐसी जगह गई जहाॅ पर कोई भी जा ही नहीं सकता था।"
"अगर तुम्हारी बातों को सच मानें तो।" चौधरी का दिमाग़ साॅय साॅय करने लगा था, बोला___"फिर वो वीडियोज और वो फोन भी उसी ने किया था हमें। मगर उसकी आवाज़ से ऐसा तो लगता ही नहीं था कि वो किसी लड़की की आवाज़ है बल्कि वो आवाज़ किसी भरभूर मर्द की ही लगती थी।"
"आज के समय में किसी किसी मोबाइल फोन पर ऐसे ऑप्शन भी होते हैं चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"जिसमें एक ब्यक्ति किसी की भी आवाज़ बदल कर बात कर सकता है। संभव है कि उसने ऐसे ही किसी फोन से मर्दाना आवाज़ में आपसे बात की थी। ऐसा इस लिए ताकि आप यही समझें कि सामने वाला कोई मेल पर्शन ही है ना कि फीमेल। इससे होगा ये कि आप इस बारे में सोच ही न सकेंगे कि कोई लड़की ऐसा कर सकती है। आप अपना हर क़दम ये सोचते हुए ही उठाएॅगे कि आपका दुश्मन कोई मेल पर्शन है।"
दिवाकर चौधरी तुरंत कुछ बोल न सका। उसे कहीं न कहीं अवधेश की बातों में सच्चाई की बू आ रही थी। कदाचित यही वजह थी कि वह सोचने पर मजबूर हो गया था।
"उस दिन जब आपने उससे फोन पर ये कहा कि आप ये जान चुके हैं कि वो कौन है।" उधर अवधेश मानो फुल फार्म में कहे जा रहा था___"तो वो चौंक पड़ी होगी। उसे लगा होगा कि आपका सोचना भी अपनी जगह सही है। आख़िर ऐसा करने की वजह विधी के बाप के पास ही तो हो सकती थी। ख़ैर जब उसने जाना कि आप उसको विधी का बाप समझ रहे हैं तो उसे ये भी लगा होगा कि अब विधी के पैरेंट्स को आपसे खतरा हो गया है। इस लिए इससे पहले कि आप विधी के पैरेंट्स तक पहुॅच पाते उससे पहले ही उसने बुद्धिमानी का परिचय देते हुए विधी के पैरेंट्स को आपसे सुरक्षित कर दिया। वरना सोचने वाली बात है कि इससे पहले तो उसे विधी के पैरेंट्स को सुरक्षा प्रदान करने का ख़याल तक न आया था और अगर उस दिन आप वैसा उसे न कहते तो आगे भी ये ख़याल उसके मन में आने वाला नहीं था। कहने का मतलब ये कि आपने खुद ही उसे बता दिया और फिर उसने बड़ी खूबसूरती से आपकी चतुराई को बेवकूफी में बदल दिया।"
"यकीनन तुम्हारी बातों में वजन है अवधेश।" चौधरी ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"जितने कम समय में उसने ये सब किया था उसे विराज तो हर्गिज़ भी नहीं कर पाता। क्योंकि मामला प्रेम का था। वो विधी के साथ हुए उस हादसे के सदमें में ही रह जाता और फिर अगर किसी के समझाने बुझाने पर वो सदमे से बाहर आता भी तो ये सब करने में उसे कुछ तो समय लगता ही।"
"जी बिलकुल।" अवधेश ने कहा___"यही सारी बातें हैं जिसकी वजह से मुझे ऐसा लग रहा है कि ये सब ठाकुर की बेटी का ही किया धरा हो सकता है।
दूसरी बात विराज जब यहाॅ आया तो उसे विधी के साथ हुए उस सदमें से भी रितू ने ही निकाला होगा और फिर उसने उसे बताया होगा उसकी प्रेमिका के साथ जिन लोगों ने ये सब किया है उन लोगों को उसने अपने कब्जे में लिया हुआ है। बस उसके बाद आप खुद सोच लीजिए कि विराज ने क्या किया होगा अथवा ये सब करना उसके लिए कितना आसान हो गया होगा।"
"अगर ठाकुर की उस थानेदारनी बेटी ने ये सब विधी के लिए हमदर्दी के चलते तथा कानून को अपने हाॅथ में लेकर किया है।" चौधरी ने सोचते हुए कहा___"तो ये भी हो सकता है कि उसने इस सबके बारे में अपने पुलिस विभाग के किसी आला अफसर को भी नहीं बताया होगा।"
"ज़ाहिर सी बात है।" अवधेश ने कहा___"अगर वो बताती तो उसे ये सब करने का कोई भी उसका आला अफसर इजाज़त न देता और अगर उसके इस कृत्य की जानकारी किसी आला अफसर को होती तो ज़रूर वो उसके खिलाफ़ कानून को अपने हाॅथ में लेने के लिए ऐक्शन लेता।"
"यहाॅ पर मैं भी अपनी बात रखना चाहता हूॅ।" सहसा अशोक मेहरा ने कहा___"और वो ये कि ऐसा भी तो हो सकता है कि रितू के इस कृत्य के बारे में उसके किसी आला अधिकारी को सब कुछ पता ही हो और वो उसकी सहमति में ही ये सब कर रही हो।"
"ये तुम कैसी बेवकूफी की बातें कर रहे हो अशोक?" चौधरी की ऑखें फैलीं___"ये बात तुम भी अच्छी तरह जानते हो कि यहाॅ के पुलिस महकमें के किसी भी आला ऑफिसर की ऐसी ज़ुर्रत नहीं हो सकती कि वो हमारे खिलाफ़ ऐसा कोई क़दम उठाने के लिए अपने किसी जूनियर शिपाही को कह सके। उन्हें भी पता है कि ऐसा करने का अंजाम कितना भयंकर हो सकता है उनके लिए।"
"भयंकर अंजाम तो तब होगा न चौधरी साहब।" अशोक मेहरा ने कहा___"जब आपको सबूत के साथ ये नज़र आए कि पुलिस ने ऐसा कुछ किया है। जब आपको कुछ ऐसा नज़र ही नहीं आएगा तो आप भला क्या कर लेंगे उनका? ख़ैर ये बात तो पुलिस के आला अफसरान को पता ही है कि वो आपके खिलाफ़ ज़ाहिर रूप से कोई ठोस कार्यवाही नहीं कर सकते हैं, इस लिए संभव है कि उन लोगों ने ये सब गुप्त रूप से शुरू किया हो ताकि हमें उनकी किसी कार्यवाही का भान तक न हो सके। वरना आप खुद सोचिए चौधरी साहब कि पुलिस की एक मामूली सी इंस्पेक्टरनी में इतना साहस और जज़्बा कैसे हो जाएगा कि वो आपके खिलाफ़ खुद कोई ऐक्शन ले सके? ये तो उसे भी पता होगा न कि पोल खुल जाने पर आप उसका क्या हस्र कर सकते हैं? इस लिए ये स्पष्ट हैं चौधरी साहब कि बग़ैर किसी आला ऑफीसर की सह के वो थानेदारनी ऐसा करने का सोच भी नहीं सकती है।"
"तुम्हारी बात भी सही है।" चौधरी के दिमाग़ की बत्तियाॅ जैसे एकाएक ही रौशन हो उठी थीं, बोला___"दूसरी बात ये कि सारा प्रदेश और पुलिस महकमा इस बात को जानता है कि हम जनता के साथ कितना बड़ा अत्याचार करते हैं। यही नहीं बल्कि ऐसा वो हर काम भी करते हैं जिसे ग़ैर कानूनी क़रार दिया जाता है।
पुलिस महकमा इसके लिए हमारे खिलाफ़ कोई कार्यवाही इस लिए नहीं कर पाता क्योंकि एक तो उसके पास हमारे खिलाफ़ कोई सबूत नहीं होता दूसरे हमारा दबदबा और पहुॅच के असर से भी वो ख़ामोश रह जाते हैं।"
"निःसंदेह।" अवधेश कह उठा___"आपकी बात बिलकुल सच है चौधरी साहब। इस लिए अब पुलिस प्रशासन के पास यही एक चारा है कि वो गुप्त रूप से हमारे खिलाफ़ किसी कार्यवाही को अंजाम दें।"
"इसका मतलब ये हुआ।" अशोक ने कहा___"कि रितू और विराज के साथ साथ अब हमें पुलिस का भी ख़तरा है। इन दोनो भाई बहन से तो हम निपट भी लेंगे मगर पुलिस प्रशासन से कैसे निपटेंगे? मामला अगर केन्द्र तक गया होगा तो हमारे लिए बड़ी मुश्किल हो जाएगी चौधरी साहब।"
"नहीं अशोक।" चौधरी ने ठोस लहजे में कहा___"ये मामला इतना भी संगीन नहीं है कि इसकी गूॅज केन्द्र तक पहुॅच जाए। तुम कुछ ज्यादा ही ऊपर की सोच रहे हो।"
"फिर भी चौधरी साहब।" सहसा इस बीच अवधेश बोल पड़ा___"हमें इस बारें में भी सोचना तो चाहिए ही। क्या पता हमारा कोई ऐसा दुश्मन हो जिसने इसके लिए केन्द्र सरकार के काॅन खड़े कर दिये हों।"
"अगर ऐसा होता भी।" चौधरी ने कहा___"तो केन्द्र सरकार अपनी तरफ से हमारे खिलाफ़ जाॅच पड़ताल के लिए किसी सीबीआई जैसे लोगों को नियुक्त करती। वो यहाॅ आते और हमसे पूॅछताछ करते। मगर ऐसा तो कहीं दूर दूर तक समझ में ही नहीं आ रहा कि ऐसा कुछ है। ज़ाहिर है कि ये मामला यहीं तक सीमित है। अतः हम यहाॅ के पुलिस महकमें के आला ऑफिसर्स की क्लास अब ज़रूर लेंगे।"
"वैसे डिटेक्टिव के रूप में हमने हरीश राणे को इस मामले में लगा तो दिया ही है।" अवधेश ने कहा___"सारी सच्चाई का पता अब वही लगाएगा। देखते हैं वो इस सबकी क्या रिपोर्ट देता है हमें?"
अवधेश की बात पर चौधरी सिर्फ सिर हिलाकर रह गया। कुछ देर ऐसी ही कुछ और बातें हुईं उसके बाद सब अपने अपने काम के सिलसिले में वहाॅ से निकल लिए।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर हवेली में।
सबने एक साथ ही बैठ कर ब्रेकफास्ट किया था। उसके बाद प्रतिमा के पिता जगमोहन सिंह सबसे विदा लेकर हवेली से निकल लिए थे। उनको गुनगुन तक छोंड़ने के लिए खुद अजय सिंह अपनी कार से गया था। प्रतिमा को अपने पिता के चले जाने से काफी दुख हुआ था। वर्षों बाद उसे अपने पिता इस रूप में मिले थे। उसका दिल कर रहा था कि वो भी अपने पिता के साथ ही चली जाए। जगमोहन सिंह ने चलने के लिए कहा भी था मगर ज़रूरी कामों का हवाला देकर अजय सिंह ने यही कहा कि हम सब फिर कभी ज़रूर आएॅगे। अजय सिंह जानता था कि हालात अभी ऐसे नहीं हैं कि उसके बीवी बच्चे कहीं आ जा सकें।
इस वक्त ड्राइंग रूम में प्रतिमा और शिवा ही थे। जो आमने सामने सोफों पर बैठे हुए थे।
प्रतिमा जहाॅ अपने पिता के बारे में सोच सोच कर दुखी हो रही थी वहीं शिवा नीलम व सोनम के बारे में सोच सोच कर ख़याली पुलाव बना रहा था। उसके चेहरे पर गर्दिश कर रहे भावों में प्रतिपल बदलाव आता नज़र रहा था। सोनम उसे पहली नज़र में ही बेहद पसंद आ गई थी और उसने इस बात का ज़िक्र अपनी माॅ प्रतिमा से भी किया था। उसने प्रतिमा से कहा था कि उसे सोनम बहुत अच्छी लगती है। काश उससे उसकी शादी हो जाए। मगर प्रतिमा ने इस बात के लिए शिवा को शख्ती से समझा दिया था कि ऐसा कभी नहीं हो सकता। वो उसकी बड़ी बहन है और बहन से भाई की शादी कभी नहीं हो सकती है। प्रतिमा की ये बात सुन कर शिवा का दिल बुरी तरह से टूट गया था।
गाॅव की हर लड़की या औरत को सिर्फ भोगने की चीज़ समझने वाला शिवा आजकल सोनम के प्यार में देवदास सा नज़र आने लगा था। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि ये अचानक उसे क्या हो गया है? सोनम के प्रति उसके दिल में मीठा मीठा सा दर्द क्यों होने लगा है? हर लड़की की भाॅति वो उसे भी हाॅसिल करके भोगने की बात क्यों नहीं सोच रहा? पिछली सारी रात वो इन्हीं सब बातों की वजह से सो नहीं पाया था। उसे सोनम से खुल कर बात करने में अब झिझक होने लगी थी। हलाॅकि वो उसकी मौसी की लड़की थी और उसकी बड़ी बहन लगती थी। मगर पहली नज़र में उसे देखने के बाद ही उसके प्रति उसकी सोच और उसके अंदर का हाल बड़ा अजीब सा गया था। ब्रेकफास्ट करते वक्त भी वह सबकी नज़रें बचा कर सोनम को चोरी से देख ही लेता था। यद्दपि सोनम उससे खुल कर बातें कर रही थी, किन्तु एक भाई बहन के रिश्ते से। सोनम की बातों का वो हाॅ या नहीं में थोड़ा बहुत जवाब दे देता था। उसके इस बिहैवियर से अजय सिंह भी अंदर ही अंदर चौंक पड़ा था। अनुभवी अजय सिंह को समझते देर न लगी कि उसका अय्याश बेटा सोनम के हुश्नो शबाब को देख कर चारो खाने चित्त हो चुका है। हलाॅकि सोनम और नीलम को देख कर उसका खुद का हाल भी शिवा से जुदा न था मगर उसके अंदर उनके प्रति प्रेमी वाला प्यार का अंकुर न फूटा था।
नाना और अजय सिंह के जाने के कुछ देर बाद ही नीलम व सोनम ऊपर अपने कमरे में चली गई थी। जबकि प्रतिमा व शिवा ड्राइंगरूम में ही बैठे रहे थे। इस ड्राइंग रूम में छाई गहन ख़ामोशी से सहसा प्रतिमा की तंद्रा टूटी। उसने अपने बेटे शिवा की तरफ देखा तो उसे गहन सोचों में गुम हुआ पाया। ये देख कर वह हौले से चौंकी।
"कहाॅ गुम है मेरा बेटा?" फिर प्रतिमा ने ज़रा खुद को सम्हालते हुए कहा___"क्या अभी तक भूत नहीं उतरा?"
"अ..आपने कुछ कहा क्या?" शिवा ने सहसा चौंकते हुए कहा।
"हाॅ पूछ रही हूॅ कि क्या अभी भी भूत नहीं उतरा है दिलो दिमाग़ से?" प्रतिमा कहने के साथ ही मुस्कुराई थी।
"भ..भूत???" शिवा चकरा सा गया___"कौन सा भूत माॅम?"
"प्यार वाला भूत।
" प्रतिमा ने कहा___"बेटा ये प्यार वाला भूत बहुत ही खतरनाॅक होता है। जिसके सिर चढ़ता है न फिर कभी उतरता ही नहीं है।"
"ये आप क्या कह रही हैं माॅम?" शिवा ने झेंपते हुए कहा।
"हाय रे।" प्रतिमा मुस्कुराई___"देखो तो कैसे शरमा रहा है आज मेरा बेटा। बेटा ये इश्क़ न बहुत बुरी बला है। ये इश्क़ कम्बख्त उसी से होता है जो हमें कभी नसीब ही नहीं हो सकता।"
"ये तो ग़लत बात है माॅम।" शिवा ने कहा___"आपने भी तो डैड से इश्क़ ही किया था और फिर वो आपको नसीब भी तो हो गए।"
"हाॅ मगर तेरे डैड और मैं आपस में भाई बहन तो नहीं थे न।" प्रतिमा ने कहा___"उन रिश्तों में अगर इश्क़ हो तो कुछ भी करके हम एक हो सकते हैं मगर इस रिश्ते में ऐसा नहीं होता। क्योंकि इस रिश्ते वाले इश्क़ को ये समाज ये दुनियाॅ कभी स्वीकार नहीं करती बल्कि इन रिश्तों के बीच हो गए इश्क़ को पाप का नाम देती है ये दुनिया। इससे परिवार की मान मर्यादा और इज्ज़त का हनन हो जाता है।"
"मैं ये सब समझता हूॅ माॅम।" शिवा ने कहा___"मुझे पता है कि भाई बहन के बीच ये रिश्ता ग़लत है। मगर ये उनके लिए ग़लत होता है न माॅम जो पाक़ साफ होते हैं। हम तो ऐसे हैं जो इन्हीं रिश्तों को भोगने की खूबसूरत इच्छा रखते ही नहीं हैं बल्कि भोगते भी हैं।"
"हाॅ लेकिन ये बात देश समाज को पता तो नहीं है न।" प्रतिमा ने कहा___"ये सब तो घर के अंदर होता है और बिना किसी की जानकारी के होता है। इस लिए जब तक इन रिश्तों के बीच की सच्चाई दुनिया से छुपी है तब तक हम भी पाक़ साफ ही हैं बेटा।"
"कुछ भी कहिये माॅम।" शिवा ने जैसे दृढ़ता से कहा___"मैं सोनम को हद से ज्यादा पसंद करने लगा हूॅ। मेरे दिल में उसके प्रति प्रेम का अंकुर फूट चुका है। कल सारी रात मैं इस बारे में सोचता रहा और फिर इस नतीजे पर पहुॅचा हूॅ कि मैं अगर किसी लड़की से शादी करूॅगा तो वो सोनम से ही करूॅगा। हाॅ माॅम, पता नहीं क्यों पर मुझे अब ऐसा लगने लगा है कि अगर सोनम मेरी जाने हयात न बनी तो मैं एक भी पल जी न सकूॅगा।"
प्रतिमा अपने बेटे की इस बात से आश्चर्यचकित रह गई। अभी तक तो उसे यही लग रहा था कि शिवा ये सब उससे सोनम को भोगने के उद्देश्य से ही कह रहा था मगर इस वक्त उसके चेहरे के भाव चीख चीख कर उसे बता रहे थे कि वो सोनम के लिए कितना सीरियस हो चुका है। प्रतिमा का दिलो दिमाग़ सुन्न सा पड़ गया। उसे समझ न आया कि इस विषम परिस्थिति में वो अपने बेटे को आख़िर कैसे समझाए? वो समझ सकती थी कि प्यार मोहब्बत कैसी चीज़ होती है और फिर इंसान की क्या हालत हो जाती है।
"देखो बेटा।" फिर प्रतिमा ने बहुत ही सीरियस भाव से किन्तु समझाते हुए कहा___"ये सब ठीक नहीं है। सोनम के प्रति ऐसी फीलिंग्स रखना अच्छी बात नहीं है। हो सकता है कि तुम्हारा सोनम के प्रति ये सिर्फ एक आकर्षण हो, जिसे तुम प्यार समझ रहे हो।
ख़ैर, मैं ये कह रही हूॅ कि ये अभी पहली स्टेज है। अभी तुम इस सबके लिए खुद को समझा भी सकते हो और खुद को इसके प्रभाव से बचा भी सकते हो। इस लिए बेहतर होगा कि तुम इस पर विचार करके अमल करो। दूसरी बात, सोनम तुम्हारी बड़ी बहन है। उसके मन में तुम्हारे प्रति ऐसा कुछ भी नहीं होगा मुझे अच्छी तरह पता है। किन्तु अगर उसे पता चल गया कि तुम उसके बारे में ऐसा सोचते हो तो वो तुम्हारे दिल का हाल नहीं समझेगी बल्कि तुम्हें ग़लत नेचर का मानते हुए तुमसे नफ़रत करने लगेगी।"
"ऐसा नहीं होगा माॅम।" शिवा की आवाज़ सहसा भर्रा सी गई, बोला___"मैं उसे खुद समझाऊॅगा कि मैं उससे कितना प्यार करने लगा हूॅ। उसे बताऊॅगा कि मेरे दिल में उसके लिए सिर्फ और सिर्फ प्यार है और हाॅ ये भी कहूॅगा माॅम कि अगर उसे लगता है कि मेरे प्यार में कोई खोट या गंदगी है तो उसे मुझे ठुकरा देने का और मुझसे नफ़रत करने का पूरा हक़ है। मैं सारी ज़िंदगी उसके खूबसूरत चेहरे को अपनी ऑखों में बसा कर तथा उसकी यादों के सहारे जी लूॅगा। उसके अलावा मेरी ज़िंदगी में दूसरी कोई लड़की कभी नहीं आएगी।"
प्रतिमा को ज़बरदस्त झटका लगा। ऐसा लगा जैसे सारा आसमान एकाएक ही भरभरा कर उसके सिर पर गिर पड़ा हो। उसे अपने काॅनों पर यकीन नहीं हो रहा था कि उसने शिवा के मुख से जो सुना वो सच है या ग़लत। कितनी ही देर तक वो किंकर्तब्यविमूढ़ सी स्थिति में बैठी उसे अपलक देखती रही।
"मैं जानता हूॅ माॅम कि आपको आज मेरी इन सब बातों पर बेहद आश्चर्य हो रहा होगा।" शिवा गंभीरता से कह रहा था___"बात भी सच है। किसी कौए से ये उम्मीद नहीं की जा सकती कि वो कोयल की तरह मीठा भी बोल सकता है। मगर सुना है कि जहाॅ किसी चीज़ की उम्मीद नहीं होती वहीं पर एक नया चमत्कार हुआ करता है। कदाचित मेरे साथ भी ऐसा ही हो गया है। कल सारी रात सोचता रहा मैं कि मैं क्यों सोनम की तरफ इस हद तक अट्रैक्ट होता जा रहा हूॅ? मेरे दिल में क्यों उसके लिए प्यार जाग रहा है? सवाल तो मुझे नहीं मिला मगर इतना एहसास ज़रूर हुआ कि सोनम के बिना मेरी ज़िंदगी का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। आज आपकी बातों ने मुझे अंदर से हिला तो दिया है माॅम मगर मेरे दृढ़ निश्चय में और भी ज्यादा इज़ाफा भी हो गया है।"
प्रतिमा को झटके पर झटके लग रहे थे। उसका दिलो दिमाग़ जाम सा हो चुका था। सुना तो था उसने भी कि प्रेम का रोग जब लगता है तो पत्थर से पत्थर दिल इंसान को भी पिघला देता है और उसका असर ये होता है कि इश्क़ के नशे में डूबा हुआ इंसान फिर बहुत ही खूबसूरत ख़यालों का बन जाता है। उसके मुख से कड़वी बातें नहीं निकला करती। इश्क़ हो जाने के बाद इंसान की सोच और उसके ख़यालात बदल जाते हैं। वो अपने प्रियतम की ही खुशियों के बारें में सोचता रहता है।
हर पल यही सोचता है कि कभी ऐसा कोई पल न आने पाए जिसके तहत उसके प्रियतम को ज़रा सी भी तक़लीफ हो जाए। किसी के खूबसूरत चेहरे को अपनी पलकों तले बसा कर तथा उसकी याद के सहारे सारी ऊम्र काट लेने वाले डायलाॅग आज शिवा के मुख से खारिज़ हो रहे थे। जिसने किसी से इश्क़ किया होगा उसे ये बात ज़रूर समझ में आई होगी कि शिवा के ये डायलाॅग किस हद तक सच थे।
अभी प्रतिमा शिवा की इन सब बातों से बुत बनी बैठी ही थी कि सहसा तभी ड्राइंगरूम में नीलम व सोनम एक साथ आकर खड़ी हो गईं। प्रतिमा की नज़र जैसे ही उन दोनो पर पड़ी तो उसने जल्दी से अपने चेहरे के भावों को छुपा लिया और फिर एकाएक ही उसकी नज़र शिवा पर पड़ी तो मन ही मन चौंक पड़ी। शिवा की नज़र सोनम पर स्थिर थी। एकाएक ही उसकी ऑखों में सोनम के प्रति बेपनाह मोहब्बत का सागर भीषण हिलोरें लेता हुआ नज़र आया उसे। कहते हैं कि ऑखें सब कुछ बयां कर देती हैं। प्रतिमा को शिवा की ऑखों ने बता दिया कि वो सोनम के प्रति अपने वजूद के हर ज़र्रे पर सिर्फ और सिर्फ मोहब्बत छलकाए बैठी हैं।
"माॅम मैं और सोनम दीदी।" उधर ड्राइंगरूम में आते ही नीलम ने खुशी वाले लहजे में कहा___"घूमने जा रहे हैं। दीदी कह रही हैं कि उन्हें हमारा ये गाॅव देखना है औ हमारे खेत भी देखना है।"
"ओह चल ठीक है।" प्रतिमा ने सहसा नीलम की तरह ध्यान से देखते हुए कहा___"पर तुम दोनो अकेले कैसे जाओगी?"
"इनके साथ मैं चला जाता हूॅ माॅम।" शिवा भला ये सुनहरा अवसर अपने हाॅथ से कैसे जाने देता, अतः तपाक से बोल पड़ा था____"मैं इन्हें बहुत अच्छे से अपना ये गाॅव और अपने सारे खेत दिखा दूॅगा।"
"कोई ज़रूरत नहीं तुझे हमारे साथ जाने की।" नीलम ने सहसा तुनक मिजाज़ी से कहा___"हम दोनो खुद ही देख लेंगे। क्यों दीदी?"
"बात तो तेरी सही है।" सोनम ने कहा___"लेकिन शिवा को भी साथ ले लेंगे तो कोई दिक्कत थोड़ी न है। आख़िर भाई है वो हमारा। हमारे साथ रहेगा तो हमें भी कंफर्टेबल फील होगा। है न मौसी?"
"बिलकुल ठीक कहा तुमने बेटा।" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा___"लेकिन अगर ये जाएगा तो नीलम और ये दोनो आपस में झगड़ा ही करेंगे। इस लिए एक काम करो बाहर खड़े हमारे सुरक्षा करने वाले आदमियों में से एक दो को साथ ले जाओ। वो क्या है न ज़माना बहुत ख़राब है। कोई ऊॅच नीच हो गई तो समस्या हो जाएगी। इस लिए तुम दोनो के साथ में दो सुरक्षा करने वाले आदमी रहेंगे तो मैं भी बेफिक्र रहूॅगी।"
"हाॅ ये ठीक रहेगा माॅम।" नीलम ने शिवा को चिढ़ाने के लिए अपनी जीभ दिखाते हुए कहा___"इस लंगूर से तो वो ही अच्छे रहेंगे। हमें भी लगेगा कि उनके रहते हम पर कोई ऑच नहीं आएगी। इसके रहते तो कोई भी हमें छेंड़ सकता है और ये बेचारा मार के डर से कुछ बोल भी नहीं पाएगा।
"
"ओये क्यों मेरे भाई को ऐसा बोल रही है तू?" सोनम ने ऑखें दिखाते हुए कहा___"अच्छा भला स्मार्ट तो है हमारा भाई। तेरी ऑखें ख़राब हैं जो तुझे वो लंगूर नज़र आता है।"
"आपने सही कहा दीदी।" शिवा ने आवेश में सोनम को दीदी कह तो दिया मगर अगले ही पल उसकी आवाज़ काॅप गई। मन ही मन उसे अपनी बेबसी पर बेहद क्रोध आया मगर फिर खुद को सम्हाल कर बोला___"जो खुद ही बंदरिया जैसी हों उन्हें सामने वाला लंगूर ही दिखेगा न।"
"ओये तमीज़ से बात कर समझा।" नीलम ने घुड़की सी दी उसे___"भूल मत कि मुझसे छोटा है तू और फिर अगर मैने तुझे लंगूर कह भी दिया तो क्या हो गया? मैने तो तुझे प्यार से लंगूर कहा है।"
"वाह दीदी वाह।" शिवा कह उठा___"प्यार से कहने के लिए लंगूर शब्द ही मिला था आपको? देख लीजिए माॅम, मैं छोटा हूॅ तो सब मुझसे अपने बड़े होने का रौब झाड़ते हैं।"
शिवा ने इतनी मासूमियत से ये कहा था कि सोनम के होठों पर मुस्कान उभर आई। वो तुरंत ही शिवा के बगल पर जाकर बैठी और फिर उसे अपने साइड से छुपका कर बोली____"जाने दे न भाई। ये छिपकली तो है ही दिमाग़ से पैदल लेकिन मैने तो तुझे ऐसा वैसा कुछ नहीं कहा न? मुझे पता है तू हमारा सबसे स्वीटेस्ट भाई है। चल अब नाराज़गी छोंड़ और मुस्कुरा कर दिखा। उसके बाद हमें घूमने भी जाना है।"
सोनम की बातों का असर पलक झपकते ही शिवा पर न हो ऐसा तो अब हो ही नहीं सकता था। वैसे भी अब तो अगर वो उसे ज़हर खाने को भी बोलती तो वो खुशी से खा लेता। ख़ैर सोनम के कहने पर उसके इस तरह उसे छुपका लेने पर शिवा का चेहरा ताज़े खिले गुलाब की मानिंद खिल उठा था। इस वक्त वो इतना खुश हो गया था कि अब अगर उसे मौत भी आ जाती तो वो उसके लिए भगवान से शिकवा न करता।
उधर प्रतिमा चुप बैठी इन तीनो की बातें सुन रही थी और नीलम व सोनम दोनो के ही चेहरों को बड़े ध्यान से देखे जा रही थी। जैसे समझना चाहती हो कि दोनो के मन में घूमने जाने के सिवा कुछ और तो नहीं है। शिवा को वो इन दोनो के साथ जान बूझ कर नहीं भेज रही थी। क्योंकि उसे पता था कि शिवा इस वक्त सोनम के प्यार में पागल है। सोनम ने अगर उसे किसी बात के लिए कहीं भेज दिया तो वो बिना कुछ सोचे समझे चला जाएगा और ये दोनो उसके चले जाने पर कुछ भी करने के लिए आज़ाद हो जाएॅगी। प्रतिमा इस बात के लिए मना भी नहीं कर सकती थी कि वो दोनो घूमने न जाएॅ। इसी लिए शिवा की जगह वो उन्हें सुरक्षा गार्ड्स को साथ में जाने का कह रही थी।
"तो कब जाना है तुम दोनो को?" फिर प्रतिमा ने पूछा।
"कब जाना है क्या मतलब है माॅम?" नीलम ने कहा___"हम दोनो तो तैयार होकर आ ही गए हैं और जा ही रहे थे।"
"चलो ठीक है।" प्रतिमा ने कहने के साथ ही शिवा की तरफ देखा___"बेटा जाओ तुम गेस्ट हाउस से दो आदमियों को बोल दो। वो इन दोनो के साथ चले जाएॅगे।
"
प्रतिमा के मन में अचानक ही गेस्ट हाउस में ठहरे उन आदमियों का ख़याल आया था। जिन्हें अजय सिंह के बिजनेस संबंधी दोस्त मदद के लिए भेज गए थे। नीलम व सोनम के साथ उनमे से ही किन्हीं दो आदमियों को भेजना उचित लगा था उसे। वो हर तरह से इन दोनो की सुरक्षा कर सकते थे। उसे अपने आदमियों की काबीलियत पर अब कोई भरोसा नहीं रह गया था। ख़ैर प्रतिमा के कहने पर शिवा सोफे से उठा और बाहर की तरफ चला गया।
"तो तुम दोनो कैसे जाओगी यहाॅ से?" प्रतिमा ने शिवा के जाते ही पूछा___"मेरा मतलब है कि घूमने के लिए किसी कार या जीप से जाओगी या ऐसे ही पैदल जाना है?"
"इतना ज्यादा पैदल कौन चल पाएगा माॅम?" नीलम ने कहा___"पहले सारा गाॅव घूमना फिर खेतों की तरफ जाना। नहीं माॅम, इतना ज्यादा पैदल चलना मेरे बस का तो हर्गिज़ भी नहीं है।"
"हाॅ मुझे पता था यही कहोगी तुम।" प्रतिमा ने मन ही मन खुश होते हुए कहा___"ख़ैर, बाहर जीप खड़ी है। उसमे ही बैठ कर चले जाना और हाॅ उन आदमियों के साथ ही रहना।"
"ओके माॅम।" नीलम ने कहा___"वैसे आज लंच में क्या बनेगा? वो क्या है न मुझे आज आपके हाॅथ का बना बैगन का हलवा खाना है।"
"क..क्या कहा????" सोनम उसकी बात सुन कर बुरी तरह चौंकी थी। जबकि प्रतिमा कहने के साथ ही इधर उधर देखने लगी थी।
"भागो दीदी भागो।" नीलम सोनम का हाॅथ पकड़ कर खींचते हुए बोली___"वरना माॅम मेरे साथ साथ आपकी भी पिटाई करने लगेंगी डंडे से।"
सोनम को कुछ भी समझ में न आया कि ये अचानक हुआ है क्या है? बैगन का हलवा और फिर नीलम का ये कहना कि भागो वरना माॅम डंडे से पिटाई करने लगेंगी। सोनम को कुछ समझ न आया। ये अलग बात है कि नीलम के खींचने पर वह सोफे से उठ कर बाहर की तरफ ही लड़खड़ाते हुए भाग ली थी। जबकि इधर प्रतिमा उन दोनो के जाते ही मुस्कुरा कर रह गई थी।
नीलम व सोनम जैसे ही बाहर आईं तो देखा कि शिवा के साथ दो हट्टे कट्टे आदमी जीप के पास ही खड़े थे। शिवा उन्हें कुछ बता रहा था। ये देख कर नीलम व सोनम उस तरफ बढ़ चलीं। जीप के पास पहुॅचते ही वो दोनो शिवा के पास ही खड़ी हो गईं।
"दीदी ये दोनो आप लोगों के साथ जाएॅगे।" शिवा ने नीलम की तरफ देखते हुए कहा___"बाॅकी माॅम ने तो आपको सब कुछ समझा ही दिया होगा।"
"हाॅ समझा दिया है।" नीलम ने कहा___"और हाॅ इनको बोल दे कि हमारा हर कहना भी मानेंगे।"
"अरे दीदी ये सब कहने की ज़रूरत नहीं है।" शिवा ने कहा___"ये दोनो बहुत अच्छे और समझदार ब्यक्ति हैं। आपको पता नहीं है ये दोनो ही तगड़े फाइटर हैं। इनके रहते आप दोनो को कोई छू भी नहीं सकता।"
"ओह आई सी।" नीलम ने कहा___"फिर तो अच्छी बात है। चलिये दीदी जीप में बैठते हैं।"
थोड़ी ही देर में नीलम व सोनम जीप में बैठ गईं। एक आदमी जीप की ड्राइविंग शीट पर बैठ गया जबकि दूसरा उसके बगल में। जीप की पिछली शीट पर नीलम व सोनम बैठ गई थी।
जीप जैसे ही चलने लगी तो शिवा ने सोनम की तरफ प्यार भरी नज़रों से देखते हुए बस इतना ही कहा घूम फिर कर जल्दी आइयेगा। उसकी इस बात पर नीलम व सोनम दोनो ही मुस्कुरा उठीं। किन्तु इस बार उनकी इस मुस्कान में ऐसा भेद छिपा था जिसे शिवा जैसा कूढ़मगज लड़का किसी भी तरह से नहीं समझ सकता था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर मुम्बई में।
सबके आ जाने से पूरे बॅगले में एक अलग ही रौनक तथा चहल पहल सी हो गई थी। किन्तु खिले खिले चेहरों पर भी एक उदासी थी जो इस बात का सबूत थी कि विराज के यहाॅ न होने से सब कितने उदास थे। सबको पता था कि विराज किस काम के लिए इस बार गाॅव गया हुआ था। सबके साथ तो गौरी घुली मिली रहती किन्तु अकेले में अपने बेटे के लिए बहुत दुखी हो जाती थी। उसे इस बात की तक़लीफ भी थी कि विराज जब से गया था तब से एक दिन भी फोन नहीं लगाया था और ना ही जगदीश ओबराय की वजह से उसने अपने बेटे को फोन लगाया था।
जगदीश ओबराय ने गौरी से कहा था कि वो फोन करके विराज को कमज़ोर न बनाए। माॅ बेटे के बीच का रिश्ता भावनाओं के बहुत ही नाज़ुक बंधन से जुड़ा होता है जिससे दोनो ही ऐसे हालातों में कमज़ोर पड़ जाते हैं। किन्तु जगदीश ओबराय ने ये भी कहा था वो ईश्वर से अपने बेटे की सलामती की दुवा करे। ये उसकी जंग है उसे स्वतंत्रता पूर्वक इस जंग को इसके अंजाम तक पहुॅचाने दो। सब अपनी अपनी जगह विराज के लिए चिंतित थे तथा परेशान थे मगर सबके दिलों में उसके लिए प्यार था। सबके होठों पर उसकी सलामती के लिए दुवाएॅ थी।
गौरी, करुणा तथा पवन की माॅ। पवन की माॅ का नाम रुक्मणी था। ये तीनो ही आपस में खूब सारी बातें करती रहती थी। किन्तु अकेले में तीनों ही विराज के लिए चिंतित हो जाती थी। एक दूसरे को अपनी चिंता व परेशानी नहीं दिखाती थी। क्योंकि कोई नहीं चाहता था कि सबके बीच एक तनाव या दुख भरा माहौल क्रियेट हो जाए। जगदीश ओबराय व अभय सिंह खुद भी अपनी जगह विराज के लिए चिंतित थे मगर सबको तसल्ली देते रहते थे और यही कहते कि सच्चाई की हमेशा विजय होती है। इस लिए इसके लिए इतना चिंतित व परेशान न हों कोई।
पवन को जगदीश ओबराय ने अपनी कंपनी में ही एक अच्छी पोस्ट पर काम में लगा दिया था। अतः पवन अब ज्यादातर कंपनी में ही रहता था। किन्तु हर वक्त उसका मन अपने दोस्त के लिए अशान्त रहता था। उसे विराज से शिकायत भी थी कि वो उसे यहाॅ सुरक्षित छोंड़ कर खुद मौत के मुह में चला गया था।
पवन की बहन आशा ज्यादातर निधी के साथ ही रहती थी। निधी सुबह स्कूल जाती और फिर शाम को वापस आ जाती थी। हर समय अपनी शरारतों से सबको परेशान करने वाली ये गुड़िया अचानक से इस तरह ख़ामोश हो गई थी जैसे ये शदियों से ऐसी ही रही थी। उसकी इस ख़ामोशी को सब यही समझते कि वो अपने प्यारे से बड़े भइया के लिए सबकी तरह ही दुखी है।
कोई ये नहीं जानता था कि उसने अपनी छोटी सी इस ऊम्र अपने ही भइया से प्रेम का कितना बड़ा रोग लगा लिया था। जिसके चलते उसका हर समय शरारतें करना जाने कहाॅ गुम होकर रह गया था।
आशा को पता था कि निधी शुरू से ही ऐसी नहीं थी। शुरू शुरू में उसकी इस ख़ामोशी को वो खुद भी यही समझती थी कि वो सबकी तरह विराज के लिए दुखी है। इस लिए अब वो शरारतें नहीं करती है। मगर जल्द ही उसे इस कारण के अलावा भी दूसरा कारण समझ में आ गया था। दरअसल निधी भी अब अपने भाई की तरह डायरी लिखने लगी थी। जिसमें वो अपने और अपने प्रियतम भाई के बीच जन्में इस प्रेम के हर पहलुओं के बारें में लिखती थी। अपने दिल के जज़्बातों को वो डायरी के कागज़ों पर लिखती थी। उसे पता था कि डायरी में उसके द्वारा लिखा गया हर लफ़्फ किसी डायनामाइट से कम नहीं है। कहने का मतलब ये कि अगर किसी को ये पता चल जाए कि सबके दिलों में राज करने वाली उनकी ये नटखट गुड़िया अपने ही सगे भाई से प्रेम करती है तो यकीनन इस बात से डायनामाइट की तरह विस्फोट हो जाना था।
डायरी में अपने दिल का हाल बयां करने के बाद निधी उस डायरी को अपने कमरे में ही रखी आलमारी के अंदर वाले लाॅकर में रख कर लाॅक लगा देती थी। मगर एक दिन कदाचित उसका भेद खुल जाना था इस लिए उससे ग़लती हो गई। दरअसल पिछले दिन सुहब सुबह की ही बात है। आशा चाय लेकर निधी के कमरे में पहुॅच गई। उसने देखा कि बेड पर चित्त अवस्था में लेटी निधी के सीने पर एक मोटी सी डायरी थी जिसे वो दोनो हाॅथों से पकड़े सोई हुई थी। आशा जो कि निधी के साथ ही रहती थी। पिछली रात उसे आधी रात के क़रीब शूशू लगी तो उसकी नींद खुल गई। उसने देखा कि रात के उस वक्त टेबल लैम्प जला कर निधी कुछ लिख रही थी। उस वक्त उसने सोचा था कि वो अपनी पढ़ाई ही कर रही है। बाथरूम से आने के बाद उसने कहा भी था उससे कि अब उसे सो जाना चाहिए।
आशा ने प्लेट सहित चाय के कप को बेड के पास ही दीवार से सटे एक छोटे से टेबल पर रखा और फिर वो निधी के पास गई। उसकी नज़र डायरी पर पड़ी। आशा ने ग्रेजुएशन तो नहीं किया था किन्तु दस बारह तक पढ़ी लिखी थी वो। हल्दीपुर गाॅव में बारवीं तक स्कूल था। आगे काॅलेज की पढ़ाई पढ़ने के लिए चिमनी जाना पड़ता था, जो कि पास के ही गाॅव में था। ख़ैर, डायरी देख कर उसे ये तो समझ आ गया कि ऐसी डायरी निधी की पढ़ाई में तो उपयोग होती नहीं होगी तो फिर ऐसा क्या है इसमें जिसे वो सोते समय भी लिए हुए है।
आशा ने बहुत ही आहिस्ता से निधी के हाॅथों से उस डायरी को निकाला और फिर बेड से दो कदम पीछे हट कर उसने डायरी को खोला। डायरी के शुरू के काफी पेज अलग अलग चीज़ों से भरे थे। जैसे कि हर देश के कोड्स वगैरा। अपने देश भारत के अलग अलग राज्यों के मानचित्र। उसके बाद मुख्य पेज शुरू होते थे।
मुख्य पेज पर ही मोटे मोटे अच्छरों में आशा को लिखा नज़र आया____"जियें तो जियें कैसे....बिन आपके??" इस टाइटल के नीचे ही एक मध्यम साइज़ के दो दिल बने हुए थे, जो कि साथ में ही मिले हुए थे। जिसमे एक तरफ वाले में राज और दूसरे वाले में निधी लिखा था। उसके नीचे मोटे अच्छरों में ही लिखा था____"MY LOVE"
आशा को ये सब देख कर ज़बरदस्त झटका लगा। इतना कुछ देख कर कोई भी समझ सकता था कि माज़रा क्या है? आशा ये जान कर हैरान रह गई कि निधी अपने ही बड़े भाई से प्यार करती है। आशा ने झटके से बेड पर सो रही निधी के चेहरे की तरफ देखा। निधी के चेहरे पर इस वक्त सारे संसार की मासूमियत विद्यमान थी। उस चेहरे को देख कर उसे यकीन ही नहीं हुआ कि ये ऐसा कर सकती है। मगर उसके ही द्वारा लिखा गया ये हर लफ्ज़ क्या झूॅठा हो सकता था?
आशा के पूरे जिस्म में एक अजीब सी झुरझुरी तेज़ रफ्तार से दौड़ गई। अंदर ही अंदर जैसे एकाएक ही कोई तेज़ जज़्बातों का भयंकर तूफान उठा जिसने उसके समूचे अस्तित्व को हिला कर रख दिया। उसी जज़्बातों के तूफान का असर था कि उसकी ऑखों में एकाएक ही ऑसू भर आए थे। फिर जैसे उसने खुद के जज़्बातों को सम्हाला और डायरी के उस पेज को पलटा। दूसरे पेज पर कोई ग़ज़ल लिखी हुई थी जिसे आशा ने पढ़ना शुरू किया।
अजब हाल है दिल का बताना भी नहीं मुमकिन।
लब ख़ामोश हैं ऑखों से जताना भी नहीं मुमकिन।।
सबके सामने मुस्कुराने का हुनर भी सीख लेंगे,
मगर तन्हाई में वो हुनर आजमाना भी नहीं मुमकिन।।
तौबा तो की है हमने के तुमसे रूबरू न होंगे मगर,
एक पल फाॅसलों में रह पाना भी नहीं मुमकिन।।
बहुत दिल को समझाया मगर ये एहसास हुआ,
किसी तरह दिल को बहलाना भी नहीं मुमकिन।।
ज़हर दे दो हमको और ये किस्सा तमाम कर दो,
यूॅ तड़प तड़प कर जी पाना भी नहीं मुमकिन।।
माफ़ करना के हमने बेरुख़ी अख़्तियार कर ली,
क्या करें के कोई और बहाना भी नहीं मुमकिन।।
पूरी ग़ज़ल पढ़ने के बाद आशा का दिलो दिमाग़ सुन्न सा पड़ता चला गया। अभी वो ये सब सोच ही रही थी कि सहसा वो बुरी तरह चौंकी। बेड पर पड़ी निधी के जिस्म में हलचल सी हुई प्रतीत हुई उसे। ये देख कर आशा ने जल्दी से डायरी को आगे बढ़ कर निधी के बगल से ही ऐसी पोजीशन में रख दिया कि अगर निधी की नज़र उस पर पड़े भी तो उसे यही लगे कि वो डायरी उसके हाॅथों से सोते वक्त ही छूट कर एक तरफ गिर गई थी। डायरी रखने के बाद आशा जल्दी से टेबल पर से चाय का कब प्लेट सहित उठाया और फिर अपने चेहरे पर खुशी तथा प्यार के भाव लाते हुए निधी के चेहरे के क़रीब झुकते हुए कहा____"गुड मार्निंग गुड़िया। चलो चलो सुबह हो गई है। देखो तो गरमा गरम चाय तुम्हारे पेट में जाने के लिए कैसे उतावली हो रही है।
"
आशा के इस प्रकार कहने पर निधी ने कुछ ही पलों में अपनी ऑखें खोल दी और फिर आशा की तरफ देख कर वो बस ज़रा सा ही मुस्कुराई। आशा के हाॅथ में चाय का कप देख कर वो बेड से उठी और बेड की पिछली पुश्त की तरफ खिसक कर उसने अपनी पीठ उस पर टिकाई और फिर उसने आशा के हाथ से चाय का कप ले लिया। जबकि चाय का कप पकड़ाते ही आशा सीधी खड़ी हो गई। वो देखना चाहती थी कि निधी की नज़र जब अपनी डायरी पर पड़ेगी तो उसका कैसा रिएक्शन होता है?
आशा को इसके लिए ज्यादा देर तक इन्तज़ार नहीं करना पड़ा। निधी ने कप से चाय का पहला ही शिप लिया था कि उसकी नज़र बाएॅ साइड उल्टी पड़ी अपनी डायरी पर पड़ी और फिर उसके चेहरे पर एकदम से डर और घबराहट के मिले जुले भाव उभर आए। उसके पीछे खिसकने से डायरी उलट कर थोड़ी और दूर हो गई थी तथा उलट सी गई थी। निधी ने फौरन ही अपना एक हाॅथ बढ़ा कर डायरी को अपने कब्जे में ले लिया और वहीं अपने हिप्स के पास ही लगभग छुपा सा लिया उसे। उसकी इस नादानी पूर्ण हरकत से आशा के होठों पर फीकी सी मुस्कान उभर आई। उसके मन में पहले तो आया कि वह उससे उस डायरी तथा डायरी में लिखे मजमून के संबंध में कोई बात करे मगर उसने ये सोच कर अपने मन से इस ख़याल को झटक दिया कि उसके पूछने पर कहीं निधी बुरी तरह डर न जाए।
"अच्छा मैं जा रही हूॅ गुड़िया।" फिर आशा ने सामान्य भाव से कहा___"पवन को भी उठा दूॅ। उसे भी ड्यूटी जाना होगा न और हाॅ तू भी जल्दी से फ्रेश होकर नीचे आ जाना। ब्रेकफास्ट रेडी होने ही वाला है।"
"ठीक है दीदी।" निधी ने भी खुद को सामान्य दर्शाते हुए कहा___"आप जाइये मैं आती हूॅ थोड़ी देर में।"
निधी की बात सुन कर आशा कमरे से बाहर चली गई। जबकि उसके जाने के बाद निधी एकाएक ही गहन विचारों में कहीं खो सी गई। अभी वो विचारों में खोई ही थी कि तभी उसका मोबाइल फोन बज उठा। उसने सिरहाने पर ही एक तरफ रखे मोबाइल को उठाया और स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे अनजान नंबर को देखा। उसके चेहरे पर सोचने वाले भाव उभरे। उसे समझ न आया कि उसके मोबाइल पर ये अनजान नंबर से आने वाली काल किसकी हो सकती है?
"हैलो।" फिर जाने क्या सोच कर उसने काल रिसीव किया और उसे कानों से लगाते ही कहा था।
"हैलो गुड़िया।" उधर से रितू की जानी पहचानी आवाज़ सुन कर निधी बुरी तरह चौंक पड़ी थी। उसे आशा, रुक्मणी, पवन और करुणा आदि के द्वारा पता चल गया था कि रितू विराज का पूरी तरह से साथ दे रही है। रितू के इस तरह अपने ही माॅ बाप के खिलाफ़ हो जाने से हर कोई हैरान था। मगर सब ये भी जानते थे कि रितू एक अच्छी लड़की है। वो ग़लत का साथ कभी नहीं दे सकती। उसके माॅ बाप ने अब तक उससे सच छुपाया हुआ था इसी लिए उसका बर्ताव इन लोगों के प्रति ऐसा था।
"गुड़िया तू सुन रही है न?" निधी के चुप रह जाने पर उधर से रितू की पुनः आवाज़ उभरी___"देख, तुझे पूरा हक़ है मुझसे नाराज़ होने का और तुझे नाराज़ होना भी चाहिए। मैं चाहती हूॅ कि तेरा जो मन करे तू मुझे वो सज़ा दे मेरी गुड़िया। तेरी हर सज़ा मैं हॅसते हॅसते कुबूल कर लूॅगी। बस एक बार अपने मुख से मुझे दीदी कह दे। कसम से उसके बाद अगर मुझे मौत भी आ जाएगी तो उसका मुझे कोई दुख नहीं होगा।"
"न..नहींऽऽऽ।" रितू की बातों से निधी की ऑखों से पलक झपकते ही ऑसू बह चले, बुरी तरह तड़प कर बोली___"ये आप कैसी बातें कर रही हैं दीदी? मुझे आपसे कोई शिकायत कोई नाराज़गी नहीं है। मुझे पता है कि इस सबमें आपका कभी कोई दोष था ही नहीं। इस लिए प्लीज आप ये सब मत कहिए। मुझे तो बहुत खुशी हो रही है कि मेरी सबसे अच्छी वाली दीदी ने मुझे फोन किया।"
"हाॅ पर मुझे खुशी नहीं हुई।" उधर से रितू ने अजीब भाव से कहा___"और वो इस लिए कि मेरी सबसे प्यारी गुड़िया ने अपनी इस गंदी दीदी को कोई सज़ा नहीं सुनाई।"
"प्लीज दीदी।" निधी ने आहत भाव से कहा___"ऐसा मत कहिए न खुद को और अगर आपने दुबारा फिर से अपने लिए ऐसा कहा तो मैं आपसे बात नहीं करूॅगी, हाॅ नहीं तो।"
इस बार निधी के ऐसा कहने पर उधर से रितू की रुलाई फूट गई। यही यो सुनना चाहती थी वो निधी के मुख से। निधी के मुख से उसका ये तकिया कलाम कितना मीठा लगता था इसका एहसास वहीं कर सकती थी। मोबाइल पर रितू के सिसकने की आवाज़ सुन कर निधी भी दुखी हो गई। वह फोन पर ही रितू को अपने तरीके से मनाने लगी कि वो न रोएॅ। आख़िर कुछ देर बाद सब ठीक हो ही गया।
"और बताइये दीदी।" फिर निधी ने सामान्य भाव से कहा___"आज आपको मेरी याद कैसे आ गई?"
"तेरी याद तो रोज़ ही आती है गुड़िया।" उधर से रितू ने सहसा गंभीरता से कहा___"किन्तु अपराध बोझ के चलते तुझसे बात करने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी।"
"आप फिर से ऐसी बातें करने लगीं।" निधी ने कहा___"इन बातों को अब जाने दीजिए न दीदी। ख़ैर ये बताइये कि कैसी हैं आप?"
"मैं तो अच्छी ही हूॅ गुड़िया।" रितू ने कहा___"पर मेरा दिल करता है कि तुझे कितना जल्दी अपनी ऑखों के सामने देखूॅ और तुझसे ढेर सारी अच्छी अच्छी बातें करूॅ भी और तुझसे सीखूॅ भी।"
"मेरा भी ऐसा ही दिल करता है दीदी।" निधी ने कहा___"मगर शायद अभी ये मुमकिन नहीं है।"
"हाॅ ये तो है गुड़िया।" रितू ने कहा___"अच्छा एक बात पूछूॅ तुझसे?"
"हाॅ जी दीदी।" निधी के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभरे___"पूॅछिए न।"
"क्या राज ने तुझे कुछ कहा है?" उधर से रितू ने कहा___"या फिर किसी बात पर उसने तुझे डाॅटा है। तू मुझसे बता गुड़िया मैं यहाॅ इसके काॅन खींचूॅगी। इसकी हिम्मत कैसी हुई मेरी गुड़िया को कुछ कहने की।"
"नहीं नहीं दीदी।" निधी बुरी तरह हड़बड़ा गई थी, बोली___"ऐसा कुछ भी नहीं है। मुझे किसी ने कुछ नहीं कहा।
आपको ऐसा क्यों लगा दीदी?"
"राज बता रहा था।" रितू ने निधी की धड़कनों को बढ़ाते हुए कहा___"कि तू कुछ समय से उससे बात ही नहीं कर रही है और ना ही तू उसके सामने आती है। उसका कहना है कि उसने तो ऐसा तुझे कुछ भी नहीं कहा जिससे तू उससे बात ही करना बंद कर दे। मुझे पता है कि वो तुझे अपनी जान से भी ज्यादा चाहता है। अगर तुझे ज़रा सी भी किसी चीज़ से तक़लीफ हो जाए तो उसकी जैसे जान पर बन आती है। फिर क्या बात है गुड़िया, आख़िर ऐसी कौन सी बात हो गई है जिससे तू उससे बात नहीं करती है। यहाॅ तक कि उसके सामने भी नहीं आना चाहती?"
निधी को समझ न आया कि वो रितू को इसका क्या जवाब दे? सच्चाई वो बता नहीं सकती थी और झूॅठ तो ऐसा होता है जो ज्यादा दिनों तक छुपा नहीं रह सकता था। हलाॅकि उसे ये उम्मीद नहीं थी कि विराज ये सब समझता न होगा। उसे तो ये भी उम्मीद नहीं थी कि वो ये बात सीधे तौर पर रितू दीदी से बोल देगा।
"क्या हुआ गुड़िया?" निधी को ख़ामोश जान कर उधर से रितू ने फिर कहा___"तू चुप क्यों हो गई? बता न क्या बात हो गई है ऐसी?"
"ऐसी कोई बात नहीं है दीदी।" निधी अब बोले भी तो क्या___"मैं तो बस ऐसे ही नाराज़ हूॅ उनसे। आप तो जानती ही हैं कि मैं कैसी हूॅ।"
"एक बात हमेशा याद रखना गुड़िया।" उधर से रितू ने कहा___"तू हम सबकी जान है, खास कर राज की। तुझे नहीं पता कि तेरे बात न करने से वो यहाॅ कितना दुखी रहता है। मुझे तो पता ही न चलता अगर मैं कल रात उसके कमरे में अचानक पहुॅच न गई होती तो। मेरे पूछने पर ही उसने ये सब बताया। ख़ैर, एक बात और कहना चाहती हूॅ गुड़िया और वो ये कि मैने तो अपने माॅ बाप और भाई से हर रिश्ता तोड़ लिया है। क्योंकि वो सब बुरे ही नहीं बल्कि पापी लोग हैं। इस दुनिया में अब अगर मेरा कोई सच्चा भाई है तो वो है राज। मुझे पता है कि हमारा भाई राज कोहिनूर हीरा है। उसके दिल में सबके लिए बेपनाह प्यार और सम्मान है। इस लिए ये हम सबका भी फर्ज़ बनता है कि हम उसे वैसा ही प्यार व सम्मान दें।"
"मुझे पता है दीदी।" निधी ने कहा___"और यकीन मानिए कि उनके लिए मेरे दिल में बेपनाह प्यार व सम्मान है और ये मरते दम तक कम न होगा बल्कि बढ़ता ही जाएगा।"
"मुझे तुमसे यही उम्मीद है गुड़िया।" रितू ने निधी की बातों को सामान्य ही समझते हुए कहा___"और देखना जिस दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा न उस दिन से हम सब एक साथ ही रहेंगे और हम सभी बहनें अपने भाई को जी भर के प्यार करेंगे।"
"जी बिलकुल दीदी।" निधी के होठों पर सहसा फीकी सी मुस्कान उभर आई___"अच्छा दीदी अब हम बाद में बात करेंगे। वो क्या है न कि मुझे बाथरूम जाना है। फिर स्कूल भी जाना है।"
"ओह हाॅ।" रितू ने कहा___"चल ठीक है गुड़िया। अच्छे से पढ़ाई करना और हाॅ अपना ख़याल भी रखना।"
इसके साथ ही फोन काल कट गई। निधी ने गहरी साॅस ली और फिर कुछ देर तक इन सारी बातों के बारे में सोचती रही।
फिर वो उठी और बाथरूम की तरफ बढ़ गई।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
इधर मैं नीलम को मैसेज के द्वारा सब कुछ समझाने के बाद विधी के मम्मी पापा या यूॅ कहूॅ कि अपने सास ससुर से मिला। ये पहला अवसर था जब मैं उनके पास हर काम से फारिग़ होकर मिला था। मैने इसके पहले उनसे न मिल पाने के लिए माफ़ी भी माॅगी। ये अलग बात है कि उन दोनो ने मुझे अपने सीने से लगा लिया और ढेर सारा प्यार और दुवाएॅ दी। मुझे अपने सीने से जाने कितनी ही देर तक लगाए रहे थे वो। मैं समझ सकता था कि वो इस वक्त भावनाओं के भॅवर में गोते लगा रहे होंगे। नैना बुआ ने मेरे बारे में सब कुछ उन्हें बता दिया था। सब कुछ जान कर उन्हें दुख भी हुआ और खुशी भी हुई।
काफी देर तक मैं उनके पास ही बैठा रहा उसके बाद मैं उनसे इजाज़त लेकर हरिया काका के पास आ गया। हरिया काका से मैने मंत्री के पिल्लों का हालचाल लिया और उन्हें ये कहा कि मंत्री की बेटी को गंदे तरीके से टार्चर न करें। उन्हें ये भी कहा कि वो उन लड़कों के साथ भी वो सब न करें जो इसके पहले वो कर रहे थे। मैने ऐसा इस लिए कहा कि अब उन लड़कों के साथ ही उनकी बहन भी थी। उसका इस सबमें कोई कुसूर तो था नहीं इस लिए उसके सामने उन लड़कों के साथ वो सब करना उचित नहीं था।
मेरी बातें हरिया काका को समझ में आ गई थी। मंत्री की बेटी रचना पहले की अपेक्षा अब बिलकुल चुप ही रहती थी। अपने भाई के साथ साथ तथा भाई के तीनों दोस्तों की तरफ उसका देखने का भी मन नहीं करता था। ज़ाहिर है कि उसकी ऑखों के सामने हरिया काका ने उसके भाई के साथ वो सब किया था जिसके चलते उसे अपने आप में जिल्लत महसूस हुई थी और वो सब उसके भाई की करतूतों की वजह हे ही हुआ था।
सुबह का नास्ता हम सबने एक साथ ही किया और फिर मैं और आदित्य घर से बाहर की तरफ चल दिये। अभी दो क़दम ही हम दोनो आगे बढ़े थे कि पीछे से रितू दीदी की आवाज़ आई। उनकी आवाज़ से हम दोनो ही ठिठक गए। थोड़ी देर में रितू दीदी हमारे पास आ गईं। इस वक्त वो कत्थई कलर के जीन्स और उसी से मैच करते टाप में थी। टाप के ऊपर लेदर की छोटी सी जाॅकेट डाला हुआ था उन्होंने। ऑखों में सन ग्लासेज था। मैं उन्हें इस लुक में देखता ही रह गया। मेरे इस तरह देखने पर उन्होंने मुस्कुरा कर मेरे दाहिने गाल पर हल्की सी चपत लगाई और फिर हमारे साथ ही बाहर की तरफ चलने लगीं।
"एक बात तुम दोनो ही कान खोल कर सुन लो।" बाहर आते ही रितू दीदी ने हिटलरी अंदाज़ में हम दोनो की तरफ एक एक नज़र देखते हुए कहा___"मुझसे बग़ैर पूॅछे अथवा मेरी जानकारी के बिना तुम दोनो कोई भी काम नहीं करोगे। हम हर काम एक साथ ही करेंगे। कुछ समझ में आया तुम दोनो को? या फिर मैं दूसरे तरीके से समझाऊॅ?"
"दूसरे तरीके से कैसे दीदी?" मैने मुस्कुराते हुए शरारत से पूछा था।
"मेरे पास दूसरा एक ही तरीका है माई डियर ब्रदर।
" रितू ने लेदर की जाॅकेट के एक छोर को पकड़ कर हल्का सा एक तरफ किया तो जींस के पैन्ट में खोंसा हुआ उनका सर्विस रिवाल्वर नज़र आ गया हमें। जबकि उसे दिखाते ही उन्होंने कहा____"जब काम बातों से न बने तो फौरन इस रिवाल्वर की नाल सामने वाले की खोपड़ी में लगा कर सारा काम उसे समझा देना चाहिए। दैट्स आल। आई होप कि तुम दोनो अब अच्छी तरह समझ गए होगे।"
"चलिए आपने इतना कान्फिडेंस के साथ कहा है तो समझ ही लेते हैं।" मैने पुनः शरारत से कहा___"वरना हम दोनो तो ऐसे कूढ़मगज इंसान हैं जो किसी भी तरह से नहीं समझ पाते। क्यों आदी??"
"तू मुझे ज़रूर मरवाएगा अब।" आदित्य दूर हटते हुए बोल पड़ा था।
"क्या यार।" मैने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा___"सारे इमेज का बेड़ा गर्क़ कर दिया तुमने। मेरा दोस्त होकर डर गया? हद है यार, तुम्हें तो मेरी तरह थर थर काॅपने लग जाना चाहिए था।"
"बहुत हो गया।" रितू दीदी ने ऑखें दिखाईं___"अब बोल राज क्या प्लान बनाया है तूने नीलम व सोनम को सुरक्षित यहाॅ लाने का?"
"भाई कार कहाॅ गई?" मैने दीदी के सवाल के जवाब में आदित्य की तरफ देखते हुए कहा___"तुम तो कह रहे थे कि सुबह जब हम यहाॅ से चलेंगे तो कार हमारे दरवाजे पर खड़ी मिलेगी। जबकि यहाॅ तो कार कहीं दिख ही नहीं रही। भाई इतना खूबसूरत मज़ाक मत किया करो न, वरना तुम नहीं जानते मुझे दिल का दौरा सा पड़ने लगता है।"
"अबे मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूॅ यार।" आदित्य ने अपना हाॅथ नचाते हुए कहा___"वो क्या है कि अभी कुछ ही देर पहले शेखर के मौसा जी आए थे। उन्होंने जब घर के बाहर कार खड़ी देखी तो पूछने लगे कि ये कहाॅ से आई? उनके पूछने पर मैने बताया कि हमने खरीदा है इसे। बस फिर क्या था, बोले चला कर बताएॅगे कि उन्हें कार कैसी लगी।"
"ओह तो इसका मतलब।" मैने कहा___"मौसा जी लेके गए हैं। मगर अभी तक आए क्यों नहीं वो?"
"आ जाएॅगे यार।" आदित्य ने कहा___"अभी थोड़ी देर पहले ही तो वो गए हैं जब मैं अंदर तुम्हें बताने गया था।"
"ओये तूने मुझे बताया क्यों नहीं कि तूने कोई कार खरीदी है?" सहसा रितू दीदी शिकायती लहजे में बोल पड़ीं___"और मैं अभी क्या बोल रही थी कि तुम दोनो बिना मुझसे पूछे कोई काम नहीं करोगे फिर क्यों किया?"
"ये बात तो आपने अभी कही है न दीदी।" मैने उन्हें मनाने वाले लहजे से कहा___"जबकि कार लेने की बात तो हमने चार दिन पहले आपस में की थी। बट प्राॅमिस दीदी, इसके बाद का हर काम आपसे पूछ कर ही करेंगे।"
"चल कोई बात नहीं।" रितू दीदी ने कहा___"लो कार भी आ गई। क्या बात है राज, कार तो बहुत अच्छी ली है तूने।"
"इतनी भी अच्छी नहीं है दीदी।" मैने कहा___"सेकण्ड हैण्ड है। ज़रूरत थी इस लिए थोड़ा ज्यादा पैसे देकर लेना पड़ा। नई कार लेने का अभी कोई मतलब नहीं है।
"
अभी हम बात ही कर रहे थे कि शेखर के मौसा जी ने हमारे पास ही कार को रोंका और फिर ड्राइविंग डोर खोल कर बाहर आए।
"यार आदित्य कार तो अच्छी है ये।" केशव जी ने कहा___"कितने में पड़ी ये?"
"ज्यादा नहीं मौसा जी।" आदित्य ने कहा___"दो लाख अस्सी हज़ार। हलाॅकि गरज़ हमारी थी वरना अस्सी हज़ार का चूना नहीं लगता हमें।"
"फिर भी यार।" केशव जी ने कहा___"घाटा इतने में भी नहीं है। ख़ैर, छोंड़ो मैं भी किसी ज़रूरी काम से इधर से गुज़र रहा था। इस लिए अब मैं चलता हूॅ।"
"जी ठीक है मौसा जी।" हम सबने अदब से हाॅथ जोड़ लिए थे।
मौसा जी के जाने के बाद हम तीनो ही उस कार में जाकर बैठ गए। मैने ड्राइविंग शीट सम्हाली। मेरे बगल से रितू दीदी बैठ गई जबकि आदित्य पिछली शीट पर बैठ गया। सबके बैठ जाने के बाद मैने कार को स्टार्ट कर आगे बढ़ा दिया।
"तो क्या प्लान बनाया है तूने?" रास्ते में रितू दीदी ने फिर मुझसे पूछा___"हम उन दोनो को वहाॅ से कैसे यहाॅ लाएॅगे? प्रकाश नाम का मेरा एक आदमी हवेली में ही सुरक्षा गार्ड के रूप में काम करता है। उसी के द्वारा मुझे पता चला था कि जिस दिन तुम्हारे वो नकली सीबीआई वाले डैड को ले कर गए थे उसी दिन हवेली पर डैड के कुछ बिजनेस संबंधी दोस्त भी आए थे। उन सबके साथ काफी सारे ऐसे आदमी थे जो दिखने में फाइटर लगते थे। प्रकाश ने बताया कि उनमे से एक का नाम पाटिल था जो माॅम से कह रहा था कि ठाकुर साहब आएॅ तो बता दीजिएगा कि हमारे ये सभी आदमी आज से उनके ही आदेशों का पालन करेंगे।"
"हाॅ इस बात का ज़िक्र नीलम ने भी मुझसे किया था कल।" मैने दीदी की तरफ एक नज़र डालने के बाद कहा___"उसने बताया था कि गेस्ट रूम में कुछ ऐसे लोग ठहरे हुए हैं जो दिखने में काफी हट्टे कट्टे लगते हैं।"
"मतलब साफ है कि हवेली जाकर वहाॅ से उन दोनो को लाना असंभव काम है।" रितू दीदी ने कहा___"वैसे भी उन सभी आदमियों के रहते हवेली जाने का मतलब है कि मौत के मुह में जाना। सीबीआई वाले हादसे के बाद तो वैसे भी डैड का गुस्सा तुम पर या यूॅ कहो कि हम पर अपने चरम पर होगा। अतः उन्होंने सिक्योरिटी का भी तगड़ा प्रबंध कर लिया होगा। ऐसे में हम हवेली नहीं जा सकते और अगर जाने का सोचें भी तो हमें रात के समय में ही जाना चाहिए क्योंकि रात के अॅधेरे में खतरा कम ही रहता है।"
"हमें हवेली जाने की ज़रूरत ही नहीं है दीदी।" मैने दीदी से कहा___"नीलम और सोनम दीदी खुद ही हवेली से बाहर आएॅगी।"
"ऐसा कैसे संभव हो सकता है?" रितू दीदी के चेहरे पर चौंकने के भाव उभरे थे, बोली___"मौजूदा हालात में माॅम या डैड उन दोनो को बाहर आने ही नहीं देंगे। क्योंकि अगर उन्होंने ये जान लिया होगा कि नीलम भी सच्चाई जान गई है तो वो भी मेरी तरह उनके खिलाफ हो जाएगी और हवेली से बाहर जाने की कोशिश करेगी।
ये सोच कर माॅम या डैड उन दोनो को किसी भी वजह से हवेली के बाहर नहीं जाने देंगे।"
"और अगर मैं ये कहूॅ।" मैने दीदी के ऊपर जैसे धमाका सा किया___"कि इस सबके बावजूद नीलम और सोनम दीदी हवेली से बाहर आएॅगी तो?"
"ये तो फिर चमत्कार ही होगा।" रितू दीदी ने चकित भाव से कहा___"जिस चमत्कार की मौजूदा हालात में ज़रा भी उम्मीद नहीं है।"
"जहाॅ उम्मीद नहीं होती असल में वहीं पर उम्मीद की संभावना होती है दीदी।" मैने दार्शनिकों वाले अंदाज़ से कहा____"खैर, ये चमत्कार तो होने ही वाला है। मैने नीलम को हवेली से बाहर निकलने का शानदार तरीका समझाया दिया था।"
"त तरीका???" रितू दीदी बुरी तरह चौंक पड़ी____"कैसा तरीका?"
"दरअसल मैने सोनम दीदी के बारे में सोच कर ही प्लान बनाया है दीदी।" मैने कहा____"ये तो मुझे भी पता है कि सोनम दीदी पहली बार ही यहाॅ आई हैं। इस लिए ये तो एक स्वाभाविक बात होती है कि जो इंसान पहली बार कहीं जाता है तो वो उस जगह के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने या देख लेने की ख्वाहिश रखता है। मैने भी इसी सोच के तहत प्लान बनाया। दूसरी महत्वपूर्ण बात नीलम ने ये भी बताया कि आज आपके नाना जी जा रहे हैं तथा उन्हें गुनगुन तक छोंड़ने के लिए खुद बड़े पापा कार से जाने वाले हैं। मैने इन सब बातों को भी अपने प्लान के लिए सोचा था। कहने का मतलब ये कि जब बड़े पापा नाना जी को लेकर गुनगुन जा चुके होंगे तब नीलम व सोनम दीदी तैयार होकर तथा अपने मिनी बैग में अपनी सबसे ज्यादा ज़रूरी चीज़ ही लेकर बड़ी माॅ के पास आएॅगी। बड़ी माॅ से नीलम ये कहेगी कि सोनम दीदी हमारा गाॅव तथा हमारे खेत देखना चाहती हैं, इस लिए हम दोनो जा रहे हैं। नीलम के मुख से सोनम सहित जाने की बात सुन कर यकीनन बड़ी माॅ के मन में ये बात आएगी कि कहीं ये लोग यहाॅ से भागने का तो नहीं सोच रही हैं। किन्तु वो इसके लिए उन्हें मना भी नहीं कर पाएॅगी। क्योंकि बात तो सिर्फ गाॅव तथा खेत देखने की होगी। इसके लिए मना करने की उनके पास कोई ठोस वजह नहीं होगी। इस लिए वो उन दोनो को जाने से रोंक न सकेंगी, मगर हाॅ ऐसा प्रबंध ज़रूर कर सकती हैं कि वो हवेली से भागने वाले अपने काम में सफल न हो सकें। इसके लिए संभव है कि वो उन दोनो के साथ एक दो उन दो आदमियों को भेजेंगी जो फाइटर जैसे दिखते हैं। उनके साथ अपने आदमियों को ये सोच कर नहीं भेजेंगी कि उन्हें अपने आदमियों पर अब भरोसा हीं नहीं होगा। बात भी सही है, भला उनके आदमियों ने भरोसा करने लायक अब तक कोई काम ही क्या किया है? ख़ैर, इस सारे मामले के लिए मैने नीलम को भली भाॅति समझाया हुआ है कि वो तथा सोनम दीदी एक पल के लिए भी अपने चेहरों पर ऐसे भाव न लाएॅगी जिससे बड़ी माॅ को उन पर शक हो जाए। क्योंकि फिर उस सूरत में उनका वहाॅ से निकलना मुश्किल हो जाना है।
यानी आप ये भी कह सकती हैं कि वो दोनो वहाॅ से अपने सफलता पूर्वक किये गए अभिनय के द्वारा ही निकल पाएॅगी। अब सवाल ये था कि गाॅव या खेत घूमने पैदल या जीप से जाएॅगी तो इसमें ज्यादा कोई समस्या नहीं थी। क्योंकि मुख्य काम ये है कि उन दोनो का हवेली से बाहर आकर गाॅव की सीमाओं की तरफ बढ़ना था। हवेली के बाहर या यूॅ कहें कि गाॅव की सीमा में ही किसी खास जगह पर हम उन्हें घेर लेंगे। दैट्स आल।"
"उन दोनों को हवेली से बाहर निकालने का तरीका तो बहुत ही अच्छा सोचा है तुमने।" रितू दीदी ने कहा___"मगर उन आदमियों के रहते उन दोनो को अपने पास सुरक्षित लाना इतना आसान काम नहीं है। दूसरी बात ये भी है कि संभव है कि यही बात मेरी माॅम के मन में भी आई हो। यानी कि उन्होने ये अंदाज़ा लगा लिया हो कि नीलम ने तुम्हें मैसेज भेज दिया होगा कि उसे सच्चाई पता चल गई है अतः अब वो तुमसे मिलना चाहती है। उस सूरत में तुम सोचोगे कि अगर नीलम का राज़ बड़ी माॅ के सामने फाश हो गया तो वो यकीनन बड़े पापा से बताएॅगी और फिर बहुत मुमकिन है कि नीलम व सोनम दोनो ही भयानक खतरे में पड़ जाएॅ। ऐसे हाल में तुम्हारी सबसे पहली प्राथमिकता यही होगी कि तुम उन दोनो को हवेली से सुरक्षित बाहर निकलना चाहोगे। आज जब नीलम ने उनसे ये कहा होगा कि सोनम दीदी ये गाॅव तथा हमारे खेत देखना चाहती हैं और वो उन्हें लेकर जा रही है तो यकीनन उनके मन में सबसे पहले यही बात आई होगी कि कहीं ऐसा तो नहीं ये दोनो यहाॅ से बहाना बना कर निकल जाना चाहती हों। किन्तु उनके मन में ये भी होगा कि ऐसे हालात में वो क्या करेंगी इसका अंदाज़ा भी तुम लगा लोगे। अतः वो कुछ ऐसा इंतजाम करेंगी जो तुम्हारी सोच से परे हो अथवा जिसके बारे में तुम सोच ही न सको। यानी कि संभव है कि उन्होंने तुम्हारे अंदाज़े को ध्यान में रखते हुए अपने दो आदमियों को उन दोनो के साथ भेज तो दिया ही हो साथ ही उनके जाने के बाद उन्होंने कुछ आदमी और भी उनके पीछे ये सोच कर लगा दिये हों कि अगर उनकी शंका सच हुई तो बैकअप के लिए कुछ आदमी एक्स्ट्रा रहेंगे। ताकि अगर ऐसी सिचुएशन बन जाए कि तुम उनके पहले वाले आदमियों का तिया पाॅचा करने में कामयाब हो जाओ तो पीछे से आ रहे उनके दूसरे आदमी तुम्हें तुम्हारे इरादों में कामयाब न होने दें।"
"मैं रितू की इन बातों से पूरी तरह सहमत हूॅ राज।" सहसा आदित्य पीछे से बोल पड़ा था____"यकीनन ऐसा हो सकता है। रितू की माॅम के दिमाग़ के बारे में जैसा तुमने बताया था उस हिसाब से मुझे भी लगता है कि वो ऐसा कुछ अंदाज़ा लगा कर सकती हैं। अतः हमें भी उनके अनुसार ही सोच कर क़दम बढ़ाना होगा। वरना हम पर तो जो मुसीबत आएगी वो तो आएगी ही किन्तु इस सबके लिए नीलम व सोनम का कितना बुरा हाल हो सकता है इसका हम अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते।
"
"तुम्हें क्या लगता है आदी?" मैने कहा___"कि ये सब बातें मेरे दिमाग़ में नहीं आई होंगी? बेशक आई हैं मेरे यार। मुझे भी इस बात का ख़याल है कि हर बार एक ही दाॅव अथवा तरीका कारगर सिद्ध नहीं हो सकता। इससे सामने वाला हमारी सोच का दायरा ताड़ लेता है। हलाॅकि मेरा उसूल ही यही है कि मैं सामने वाले को वही सोचने पर मजबूर कर देता हूॅ जो मैं चाहता हूॅ। मैं चाहता हूॅ कि सामने वाला ये सोच बैठे या ये समझ जाए कि मेरे पास बस एक ही तरह का दाॅव है। क्योंकि जब ऐसा होगा तो सामने वाला फिर उसी के हिसाब से अपनी चालें चलता है। जबकि मैं उसकी उस चाल के बाद अपना दूसरा पैंतरा शुरू करूॅगा। ऐसा पैंतरा जिसके बारे में वो सोच भी न सकेगा।"
"इसका मतलब।" रितू दीदी ने कहा___"तुमने इस बारे में पहले से ही कुछ सोचा हुआ है या फिर ये कहूॅ कि ऐसा कुछ इंतजाम कर रखा है तुमने।"
"बिलकुल सही कहा दीदी आपने।" मैने मुस्कुरा कर कहा___"आख़िर मुझे भी तो इस बात का ख़याल रखना ही पड़ेगा न कि उस तरफ शातिर दिमाग़ वाली मेरी बड़ी माॅ भी मौजूद हैं। बात अगर सिर्फ बड़े पापा की होती तो इतना घुमा फिरा कर काम करने की ज़रूरत ही न पड़ती। किन्तु बड़ी माॅ तो फिर बड़ी माॅ हैं न। ख़ैर, मैं ये कह रहा हूॅ कि जिस तरह बैकअप के लिए बड़ी माॅ ने दिमाग़ लगाया हो सकता है उसी तरह मैने भी बैकअप का इंतजाम किया हुआ है। और वैसे भी जंग में बैकअप का होना तो निहायत ही ज़रूरी होता है। जिस योद्धा के पास बैकअप नहीं होता वो जंग के शुरू होते ही मात खा जाता है।"
"वो सब तो ठीक है।" आदित्य रितू दीदी से पहले ही पूछ बैठा____"लेकिन तुमने बैकअप का आख़िर इंतजाम क्या किया है?"
"क्या यार आदी।" मैने पलट कर एक नज़र उसे देखने के बाद कहा____"तुम न ज़रा भी दिमाग़ नहीं लगाते हो।"
"ज्यादा बनो मत।" आदित्य ने तीखे भाव से कहा___"साफ साफ बताओ कि क्या तीर मारा है तुमने?"
"लगता है शेखर के मौसा को भूल गए हो तुम।" मैने पुनः पलट कर आदित्य को देख कर कहा___"कल देखा नहीं था क्या तुमने कि कैसे वो फार्महाउस पर अपने लट्ठधारी आदमियों को लेकर हम लोगों को लेने आए थे? बाद में उन्होंने कहा भी था कि अगर किसी बात की ज़रूरत पड़े तो तुरंत उन्हें याद करें हम। बस फिर क्या था समझदार आदमी को ऐसे मददगार आदमी का सहारा लेने में ज़रा भी देर नहीं करना चाहिए। कहने का मतलब ये कि मैने उन्हें सारी सिचुएशन के बारे में समझा दिया था और ये कहा था कि बैकअप के रूप में वो हमारे पीछे ही रहें। वो मैदान में तभी आएॅ जब उन्हें यकीन हो जाए कि हमारा पलड़ा अब डगमगाने लगा है और हम हारने वाले हैं। तब उन्हें अचानक ही मैदान में एन्ट्री मारनी है। बस उसके बाद तो फिर हम सब कुछ सम्हाल ही लेंगे।"
"ओह अब समझ आया।
" आदित्य ने सहसा गहरी साॅस लेकर कहा___"इसी लिए वो उस वक्त बोल रहे थे कि वो किसी ज़रूरी काम से यहाॅ से गुज़र रहे थे।"
"अब समझे तो क्या समझे डियर?" मैने मुस्कुराते हुए कहा___"बात तो तब थी जब तुम इसके पहले ही समझ जाते।"
"हाॅ हाॅ ठीक है न।" आदित्य ने खिसियाते हुए कहा___"पर मुझे ये बात समझ नहीं आई कि अगर यही बात थी तो उस वक्त उन्होंने हम में से किसी को बताया क्यों नहीं कि वो किस ज़रूरी काम से गुज़र रहे थे?"
"लो कर लो बात।" मैने हॅसते हुए कहा___"उन्हें भला बताने की ज़रूरत ही क्या थी? मुझे तो सब पता ही था क्योंकि मैने ही उनसे बात की थी। उन्होंने तुमसे या दीदी से इस लिए नहीं बताया कि उन्होंने सोचा होगा कि मैने आप दोनो को बता दिया होगा। दूसरी बात आप में से कोई उनसे पूछा भी तो नहीं कि वो किस ज़रूरी काम के लिए वहाॅ से गुज़र रहे थे?"
"हाॅ ये तो सही कहा तुमने।" सहसा दीदी ने मेरी तरफ प्रसंसा भरी नज़रों से देखते हुए कहा___"हमने तो उनसे पूछा ही नहीं था। लेकिन सवाल तो है ही कि वो किस ज़रूरी काम से गुज़र रहे थे?"
"ओफ्फो दीदी।" मैने कहा___"आपसे ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं थी मुझे। बड़ी सीधी सी बात है वो अपने आदमियों को इकट्ठा करने के लिए जा रहे थे।"
"ओह आई सी।" रितू दीदी ने कहा___"चल ये तो बहुत अच्छा किया तुमने जो खुद के लिए भी बैकअप इंतजाम कर लिया है। वरना मैं तो सोच रही थी कि कहीं हम फॅस ही न जाएॅ किसी जाल में।"
"ऐसे कैसे फॅस जाएॅगे दीदी?" मैने कहा___"और फिर रिस्क तो लेना ही पड़ेगा। ये तो कुछ भी नहीं है, आने वाले समय में इससे कई गुना ज्यादा खतरा भी होगा जिसका हमें सामना करना पड़ेगा।"
"हाॅ ये तो है।" दीदी ने कहा____"ख़ैर अभी तो सबसे ज़रूरी यही है कि किसी तरह नीलम व सोनम सुरक्षित हमें हाॅसिल हो जाएॅ। उसके बाद की इतनी चिंता नहीं है क्योंकि तब इस बात का भय नहीं रहेगा कि हमारा कोई अपना उनके चंगुल में है।"
मैं रितू दीदी की इस बात पर बस मुस्कुरा कर रह गया। ऐसे ही बातें करते हुए हम बढ़े चले जा रहे थे हल्दीपुर की तरफ। हम तीनों ही पूरी तरह सतर्क थे। हम इस बात को भी बखूबी समझते थे कि खतरा सिर्फ अजय सिंह की तरफ बस का ही नहीं था बल्कि मंत्री दिवाकर चौधरी की तरफ से भी था। दूसरी बात अब हम पहचाने जा चुके थे दोनो तरफ इस लिए ख़तरा और भी बढ़ गया था हमारे लिए। मगर सच्चाई की राह पर चलने के लिए हम अपने अपने हौंसलों को आसमां की बुलंदियों में परवाज़ करवा रहे थे। आने वाला समय बताएगा कि इस खेल में किसकी जीत मिलती है और किसे हार का कड़वा स्वाद चखना होगा??
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दोस्तो, आप सबके सामने मेगा अपडेट हाज़िर है। आशा करता हूॅ कि आप सभी को पसंद आएगा।
आप सबकी प्रतिक्रिया और आपके रिव्यू का इन्तज़ार रहेगा।
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट........《 56 》
अब तक,,,,,,,,
"हाॅ ये तो सही कहा तुमने।
" सहसा दीदी ने मेरी तरफ प्रसंसा भरी नज़रों से देखते हुए कहा___"हमने तो उनसे पूछा ही नहीं था। लेकिन सवाल तो है ही कि वो किस ज़रूरी काम से गुज़र रहे थे?"
"ओफ्फो दीदी।" मैने कहा___"आपसे ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं थी मुझे। बड़ी सीधी सी बात है वो अपने आदमियों को इकट्ठा करने के लिए जा रहे थे।"
"ओह आई सी।" रितू दीदी ने कहा___"चल ये तो बहुत अच्छा किया तुमने जो खुद के लिए भी बैकअप का इंतजाम कर लिया है। वरना मैं तो सोच रही थी कि कहीं हम फॅस ही न जाएॅ किसी जाल में।"
"ऐसे कैसे फॅस जाएॅगे दीदी?" मैने कहा___"और फिर रिस्क तो लेना ही पड़ेगा। ये तो कुछ भी नहीं है, आने वाले समय में इससे कई गुना ज्यादा ख़तरा भी होगा जिसका हमें सामना करना पड़ेगा।"
"हाॅ ये तो है।" दीदी ने कहा____"ख़ैर अभी तो सबसे ज़रूरी यही है कि किसी तरह नीलम व सोनम सुरक्षित हमें हाॅसिल हो जाएॅ। उसके बाद की इतनी चिंता नहीं है क्योंकि तब इस बात का भय नहीं रहेगा कि हमारा कोई अपना उनके चंगुल में है।"
मैं रितू दीदी की इस बात पर बस मुस्कुरा कर रह गया। ऐसे ही बातें करते हुए हम बढ़े चले जा रहे थे माधोपुर की तरफ। हम तीनों ही पूरी तरह सतर्क थे। हम इस बात को भी बखूबी समझते थे कि ख़तरा सिर्फ अजय सिंह की तरफ बस का ही नहीं था बल्कि मंत्री दिवाकर चौधरी की तरफ से भी था। दूसरी बात अब हम पहचाने जा चुके थे दोनो तरफ इस लिए ख़तरा और भी बढ़ गया था हमारे लिए। मगर सच्चाई की राह पर चलने के लिए हम अपने अपने हौंसलों को आसमां की बुलंदियों में परवाज़ करवा रहे थे। आने वाला समय बताएगा कि इस खेल में किसको जीत मिलती है और किसे हार का कड़वा स्वाद चखना होगा??
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,
नीलम व सोनम के जाने के बाद शिवा वापस पलटा और हवेली के अंदर की तरफ बढ़ चला। उसके होठों पर बड़ी ही दिलकस मुस्कान थी। ज़ाहिर था कि उसकी ये मुस्कान सोनम की वजह से थी। जिसके बारे में वो जाने क्या क्या सोचने लगा था। ख़ैर सोनम के बारे में सोचते हुए ही वह चलते हुए अंदर ड्राइंग रूम में पहुॅचा।
उधर ड्राइंग रूम में प्रतिमा अभी भी बैठी हुई थी। उसके चेहरे पर सोचों के भाव गर्दिश कर रहे थे। शिवा के अंदर आते ही वह सोचो से बाहर आई और उसने शिवा को मुस्कुराते हुए देखा तो सहसा वह चौंकी। फिर अगले ही पल सामान्य भी हो गई, कदाचित उसे शिवा की मुस्कान का राज़ पता चल गया था।
"क्या बात है बेटा।" फिर उसने बेटे की तरफ देखते हुए मुस्कुरा कर कहा___"लगता है मन में बहुत ही मीठी मीठी गुदगुदी हो रही है, है ना?"
"ग..गुदगुदी???" प्रतिमा की इस बात से शिवा एकदम से चकरा सा गया___"कैसी गुदगुदी माॅम?"
"वैसी ही बेटा।" प्रतिमा ने कहा___"जैसी तब हुआ करती है जब किसी से नया नया इश्क़ होता है।
तुम्हारे होठों पर थिरक रही ये मुस्कान इस बात का सबूत दे रही है कि तुम सोनम के बारे में सोच सोच अंदर ही अंदर बेहद रोमांच सा महसूस कर रहे हो।"
"हाॅ माॅम।" शिवा की मुस्कान गहरी हो गई___"ये तो आपने बिलकुल सही कहा। मैं सचमुच सोनम के बारे में ही सोच सोच कर आनंद महसूस कर रहा हूॅ। उफ्फ माॅम मैं बता नहीं सकता कि मैं सोनम के बारे में सोच सोच कर कितना खुश हो रहा हूॅ। क्या ऐसा नहीं हो सकता माॅम कि मेरे इस दिल का ये हाल मेरे बिना बताए सोनम समझ जाए और फिर वो मेरे इस दिल की चाहत को कुबूल कर ले?"
"तुम दीवाने से होते जा रहे हो बेटे।" प्रतिमा एकाएक ही गंभीर हो गई, बोली___"जो कि बिलकुल भी ठीक नहीं है। तुम खुद ये बात अच्छी तरह जानते हो कि जो तुम चाहते हो वो इस जन्म में तो हर्गिज़ भी नहीं हो सकता। फिर इस तरह बेकार की बातें करने का तथा ऐसा सोचने का क्या मतलब है बेटा? अभी भी वक्त है तुम अपने अंदर के इस एहसास को जितना जल्दी हो सके निकाल दो। वरना देख लेना इस सबके लिए बाद में तुम बहुत दुखी होगे।"
"जिन्हें इश्क़ हो जाता है न माॅम।" शिवा ने अजीब भाव से कहा___"फिर उन्हें कोई समझा नहीं सकता और ना ही इश्क़ में पागल हो चुका ब्यक्ति किसी की बातों को समझना चाहता है। उसे तो बस हर घड़ी हर पल अपने प्यार की आरज़ू रहती है। ऐसा नहीं है माॅम कि इसमें दिमाग़ काम नहीं करता है बल्कि वो तो वैसे ही काम करता रहता है जैसे आम इंसानों का करता है मगर दिल के जज़्बातों की जब ऑधी चलती है न तो उस दिमाग़ का सारा दिमाग़ उसके ही पिछवाड़े में घुस जाता है।"
प्रतिमा के चेहरे पर एक बार पुनः हैरत के भाव उभर आए। उसे इस वक्त लग ही नहीं रहा था कि ये वही शिवा है जो इसके पहले हर लड़की या औरत को सिर्फ और सिर्फ हवश की नज़र से देखता था। बल्कि इस वक्त तो वह दुनिया का सबसे शरीफ व संस्कारी दिखाई दे रहा था।
"कहते हैं कि दुनियाॅ में कुछ भी असंभव नहीं है।" उधर शिवा कह रहा था___"अगर किसी चीज़ को पाने की शिद्दत से चाहत करो तो वो यकीनन हाॅसिल हो जाती है। आप जिस चीज़ को असंभव कह रही हैं वो चीज़ भी संभव हो सकती है माॅम, अगर आप चाहो तो।"
"क्...क्या मतलब???" प्रतिमा के माथे पर सलवटें उभरीं।
"मतलब साफ है माॅम।" शिवा ने कहा___"अगर आप और डैड चाहें तो सोनम मेरी जाने हयात ज़रूर बन सकती है और मैं उसे पा कर खुश हो सकता हूॅ।"
"तुम पागल हो गए हो बेटा।" प्रतिमा के चेहरे पर गहन बेचैनी के भाव उभरे, बोली___"सब कुछ जानते व समझते हुए भी तुम बेमतलब की बातें किये जा रहे हो। तुम इस बात को समझ ही नहीं रहे कि ये कितना ग़लत है और कितना मुश्किल है। सोनम तुम्हारी बड़ी बहन है। वो तुम्हें अपना छोटा भाई ही मानती है। उसे नहीं पता है कि उसका छोटा भाई उसके प्रति कैसी सोच रखता है और क्या चाहता है?"
"आप सोनम के माॅम डैड से बात कीजिए माॅम।
" शिवा ने कहा___"मैं सोनम को मना लूॅगा और अगर वो नहीं मानेगी तो उससे कहूॅगा कि वो मुझे अपने प्यार की भीख दे दे। मैं उसे बताऊॅगा कि मैं उसके बिना अब नहीं रह सकता। दूसरी बात जब उसके माॅम डैड इस रिश्ते के लिए मान जाएॅगे तो फिर उसे भी भला क्या परेशानी होगी?"
"हे भगवान।" प्रतिमा ने जैसे अपना माथा पकड़ लिया, फिर बोली___"कैसे समझाऊॅ इस लड़के को? तुमने ये सोच भी कैसे लिया कि सोनम के माॅ बाप इस रिश्ते के लिए मान जाएॅगे? बल्कि सच्चाई तो ये है कि वो ये सब पता चलते ही तुम्हारे साथ साथ हम सब पर भी लानत भेजेंगे और फिर कभी हमारी शक्ल तक देखना न चाहेंगे।"
प्रतिमा की इस बात पर शिवा मन मसोस कर रह गया। एकाएक ही उसके चेहरे पर ऐसे भाव आए जैसे उसे इन सब बातों से बेहद तक़लीफ हुई हो। जबकि उसके चेहरे पर उभर आए इन भावों को बड़े ध्यान से देखते हुए तथा समझाते हुए प्रतिमा ने नम्र भाव से कहा____"देख बेटा इसमें इतना दुखी होने की ज़रूरत नहीं है। मैं अच्छी तरह तेरे अंदर का हाल समझ सकती हूॅ। मुझे इस बात का एहसास है कि सोनम के प्रति तू किस हद तक गंभीर हो चुका है। मगर बेटा सब कुछ वैसा ही नहीं हो जाया करता जैसा हम चाह लिया करते हैं। यथार्थ सच्चाई नाम की भी कोई चीज़ होती है जिसका हमें बेबस होकर ही सही मगर सामना करना पड़ता है और उसे मानना भी पड़ता है। ये तो तू भी अच्छी तरह जानता है कि सोनम तेरी बड़ी मौसी की लड़की है और रिश्ते में वो तेरी बड़ी बहन लगती है। सोनम की माॅ मेरी सगी बहन है इस हिसाब से ये रिश्ता सगा ही हो जाता है। अतः सगे रिश्ते के बीच तुम्हारी और सोनम की शादी हर्गिज़ भी नहीं हो सकती। अगर ऐसा होता कि सोनम की माॅ मेरी सगी बहन न होकर दूर के किसी रिश्ते से बहन लगती तो ऐसा हो भी सकता था। इस लिए तुम्हें इन सब बातों को सोच समझ कर अपने आपको समझाना होगा। मुझे पता है कि अभी ये सब तेरे लिए बहुत मुश्किल होगा मगर ये करना ही होगा बेटा। वरना अभी जिस बात से तुम्हें इतनी तक़लीफ हो रही है उसी बात से आगे चल कर और भी ज्यादा तक़लीफ होगी। दुनियाॅ में एक से बढ़ कर एक खूबसूरत लड़कियाॅ हैं, तू जिस लड़की से कहेगा हम उस लड़की से तेरी शादी करेंगे। मगर प्लीज सोनम का ख़याल अपने दिलो दिमाग़ से निकाल दे। इसी में सबकी भलाई है।"
"ठीक है माॅम।" शिवा ने गहरी साॅस ली और फिर एकाएक ही उसके चेहरे पर दृढ़ता के भाव आए, बोला____"अगर ऐसी बात है तो ठीक है। अब मैं कभी आपसे नहीं कहूॅगा कि आप सोनम से मेरी शादी करवा दीजिए। ख़ैर एक बात कहूॅ माॅम, पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि जैसे ईश्वर ने मुझे मेरे पापों की सज़ा देना शुरू कर दिया है। हाॅ माॅम, ये सज़ा ही तो है कि मुझे एक ऐसी लड़की से बेपनाह मोहब्बत हो गई जो मेरी बहन लगती है और जो मुझे नसीब ही नहीं हो सकती कभी।
वरना ईश्वर अगर चाहता तो मुझे दूसरी किसी ऐसी लड़की से प्यार करवाता जो मुझे सहजता से मिल जाती। मगर नहीं उसे तो मेरे पापों की सज़ा देना था न मुझे। इस लिए ऐसा कर दिया उसने। कोई दूसरा इन सब बातों को समझे या न समझे माॅम मगर मैं अच्छी तरह समझ गया हूॅ और अगर अपने दिल की सच्चाई बयां करूॅ तो वो ये है कि मुझे ईश्वर के इस फैंसले पर कोई शिकायत नहीं है। अगर ये सब करके वो मुझे मेरे पापों की सज़ा ही देना चाहता है तो ठीक है माॅम मुझे स्वीकार है ये। हर ब्यक्ति को अपने कर्मों का फल मिलता है, फिर चाहे उसके अच्छे कर्मों का हो या बुरे कर्मों का। कितनी अजीब बात है न माॅम कि कुछ लोग सारी ज़िंदगी पाप करते हैं मगर उनको उनके पाप कर्म की सज़ा अंत में मिलती है मगर मुझे तो अभी से मिलना शुरू हो गई।"
शिवा की बातें सुन कर प्रतिमा हैरत से ऑखें फाड़े देखती रह गई उसे। उससे कुछ कहते तो न बन पड़ा था किन्तु ये समझने में उसे ज़रा भी देरी न हुई कि उसके बेटे का मानसिक संतुलन आज इस हद तक बिगड़ गया है अथवा उसकी सोच इस हद तक बदल गई है कि वो इस सबको अपने पाप कर्मों की सज़ा समझने लगा है। कहते हैं कि किसी ब्यक्ति को आप सारी ज़िदगी अच्छी चीज़ों का बोध कराते रहो मगर उसे अगर नहीं समझना होता है तो वो सारी ज़िंदगी नहीं समझता मगर वक्त और हालात के पास ऐसी खूबियाॅ होती हैं जिनके आधार पर वह पलक झपकते ही इंसान को आईना दिखा कर सब कुछ समझा देता है और मज़े की बात ये कि इंसान को समझ में भी आ जाता है। यही हाल शिवा का था। उसे सब कुछ समझ आ चुका था, मगर कहते हैं न कि "का बरसा जब कृषि सुखाने"। बस वही दसा थी उसकी।
"ख़ैर छोंड़िये इन सब बातों को माॅम।" उधर शिवा ने जैसे प्रतिमा को होशो हवाश में लाते हुए कहा___"अब से मैं कभी आपसे ऐसी बातें नहीं करूॅगा। आप ये सब डैड से भी मत बताना। वरना उन्हें लगेगा कि मैं भरपूर जवां मर्द होते हुए भी इस सबके चलते बेहद कमज़ोर हो गया हूॅ। वो इस बात को नहीं समझेंगे कि इस सबसे तो मैं और भी मजबूत हो गया हूॅ। मोहब्बत की चोंट को जो इंसान सह जाए उससे मजबूत इंसान भला दूसरा कौन हो सकता है?"
प्रतिमा को समझ न आया कि वह अपने बेटे की इन सब बातों का क्या जवाब दे। किन्तु उसकी बातें उसे आश्चर्यचकित ज़रूर किये हुए थीं। काफी देर तक वह गंभीर मुद्रा में ठगी सी बैठी रही। होश तब आया जब एकाएक ही ड्राइंग रूम में एक तरफ टेबल पर रखे लैण्ड लाइन फोन की घंटी घनघना उठी थी।
"हैलो।" शिवा अपनी जगह से उठ कर तथा फोन के रिसीवर को कान से लगाते ही कहा।
"ओह शिव बेटा।" उधर से अजय सिंह की जानी पहचानी सी आवाज़ उभरी____"मैंने तुम्हारे नाना जी को ट्रेन में बैठा दिया है और अब मैं यहीं से फैक्ट्री के लिए निकल रहा हूॅ। अतः अब शाम को ही आऊॅगा।"
"ठीक है डैड।" शिवा ने सामान्य भाव से कहा।
"ज़रा अपनी माॅम से बात करवाओ।" उधर से अजय सिंह ने कहा।
"एक मिनट डैड।" शिवा ने कहने के साथ ही पलट कर प्रतिमा की तरफ देखा और उसे बताया कि डैड उससे बात करना चाहते हैं।
"हाॅ बोलो अजय।" प्रतिमा ने शिवा से रिसीवर लेकर उसे अपने बाएं कान से लगाते हुए कहा___"क्या बता है? पापा को ट्रेन में सकुशल बैठा दिया है न तुमने?"
"हाॅ उन्हें ट्रेन में बैठा कर अभी अभी स्टेशन से बाहर आया हूॅ।" उधर से अजय सिंह ने कहा____"और अब मैं यहीं से फैक्ट्री जा रहा हूॅ। काफी दिन से नहीं गया हूॅ तो वहाॅ जाना भी ज़रूरी है। बाॅकी सब ठीक है न?"
"हाॅ बाॅकी सब तो ठीक ही है।" प्रतिमा ने कहा___"नीलम, सोनम को अपना ये गाॅव तथा अपने खेत दिखाने ले गई है। सोनम ने उससे कहा होगा कि उसे ये गाॅव और उसके खेत देखना है। अतः नीलम के साथ गई है वो।"
"ये क्या कह रही हो तुम?" उधर से अजय सिंह ने बुरी तरह चौंकते हुए कहा___"उन दोनो को तुमने जाने कैसे दिया प्रतिमा? क्या तुम्हें पता नहीं है कि वो वहाॅ से भागने के उद्देश्य से भी ये कहा होगा कि उन्हे गाॅव तथा खेत देखना है? उफ्फ प्रतिमा तुमने ये क्या बेवकूफी की?"
"फिक्र मत करो अजय।" प्रतिमा ने कहा___"उन दोनो के साथ मैने दो ऐसे आदमियों को भी भेजा है जिन आदमियों को तुम्हारे दोस्त तुम्हारी मदद के लिए यहाॅ भेज कर गए थे। उन आदमियों के रहते वो कहीं भी नहीं जा सकती।"
"अरे वो आदमी साले क्या कर लेंगे?" उधर से अजय सिंह ने खीझते हुए कहा___"तुम्हें तो पता है कि उस साले विराज ने एक साथ हमारे उतने सारे आदमियों का काम तमाम कर दिया था तो फिर ये क्या कर लेंगे उसका? ओफ्फो प्रतिमा तुम्हें उन दोनों को जाने ही नहीं देना चाहिए था। मुझे तुमसे ऐसी बेवकूफी की उम्मीद हर्गिज़ भी नहीं थी।"
"तुम बेवजह ही इतना परेशान हो रहे हो डियर।" प्रतिमा ने कहा___"मुझे भी पता है कि हालात कैसे हैं और इन हालातों में क्या हो सकता है? मैं उन दोनो को गाॅव तथा खेत देखने जाने से भला कैसे रोंक सकती थी? इसी लिए मैंने उनके साथ उन दो आदमियों को भेजा है। बात इतनी सी ही बस नहीं है बल्कि दूर का सोचते हुए मैने उनके जाने के बाद उनके पीछे लगे रहने के लिए और भी आदमियों को एक टीम बना कर भेजा है। ऐसा इस लिए कि अगर वो दोनो सचमुच यहाॅ से भागने का ही ये गाॅव तथा खेत देखने का बहाना बनाया होगा तो वो किसी भी तरह से भागने में कामयाब न हो सकेंगी।
दिखावे के लिए तथा सिचुएशन को सामान्य दिखाने के लिए मैने उन दोनो के साथ सिर्फ दो ही आदमी उनकी सुरक्षा के तहत भेजे किन्तु उनकी जानकारी के बिना कुछ और आदमियों की टीम को ये सोच कर उनके पीछे भेजा कि अगर ये उनका यहाॅ से भागने का ही प्लान था तो ये भी ज़ाहिर है कि ये प्लान उन्होंने खुद नहीं बनाया होगा बल्कि यहाॅ से इस तरह निकलने का प्लान विराज ने ही उन्हें बताया होगा और कहा होगा कि वो दोनो हवेली से बाहर निकल कर किसी ऐसे स्थान पर पहुॅचेंगी जहाॅ से उन दोनो को वो बड़ी आसानी से किन्तु बड़ी सावधानी से हमारे उन दोनो आदमियों के साथ रहने के बावजूद अपने साथ ले जा सकें। विराज की इसी चाल को मद्दे नज़र रखते हुए मैने उन दोनो के पीछे कुछ और आदमियों को एक मजबूत टीम बना कर भेजा है तथा साथ ही ये भी उन्हें कह दिया है कि अगर सचमुच वहाॅ ऐसा कुछ होता दिखे तो वो बेझिझक दूसरी पार्टी यानी विराज व रितू पर गोलियाॅ चला सकते हैं। किन्तु इतना ज़रूर ध्यान देंगे कि उनकी गोलियों से उन दोनो में से किसी की भी मौत न हो जाए। बल्कि उन्हें इस स्थित में लाना है कि वो कुछ करने के लायक न रह जाएॅ। उसके बाद वो उन्हें पकड़ कर हमारे फार्महाउस पर ले आएॅगे।"
"अगर ऐसा है तो फिर ठीक है।" उधर अजय सिंह ने मानो राहत की साॅस ली थी, बोला___"मगर मुझे इस सबसे भी संतुष्टि नहीं हो रही प्रतिमा। पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता है कि हमारे इतने आदमियों के रहते हुए भी वो कमीना उन दोनो को अपने साथ ले जाने में कामयाब हो जाएगा।"
"ऐसा तुम इस लिए कह रहे हो डियर।" प्रतिमा ने सहसा मुस्कुरा कर कहा___"क्योंकि तुमने अभी तक इस मामले में कोई सफलता हाॅसिल नहीं की है। हर बार तुमने अपने आदमियों की वजह से नाकामी का स्वाद चखा है। इस लिए तुम्हें इस सबके बावजूद विश्वास या संतुष्टि नहीं हो रही कि हमारे आदमी विराज के मंसूबों को नाकाम कर पाएॅगे।"
"ये तो सच कहा तुमने प्रतिमा।" अजय सिंह बोला___"पर क्या करूॅ यार हालात हर दिन पहले से कहीं ज्यादा गंभीर व बदतर होते जा रहे हैं। मैं ये किसी भी कीमत पर नहीं चाहता हूॅ कि एक और नाकामी की मुहर मेरे माथे की शोभा बढ़ाने लगे। इस लिए मैं खुद ही आ रहा हूॅ वहाॅ। फैक्ट्री जाना इतना भी ज़रूरी नहीं है। मैं आ रहा हूॅ डियर। इस बार मैं उस हरामज़ादे को कामयाब नहीं होने दूॅगा।"
"ठीक है माई डियर।" प्रतिमा ने कहा___"तुम्हें जैसा अच्छा लगे करो। वैसे कब तक पहुॅच जाओगे यहाॅ?"
"जितना जल्दी पहुॅच सकूॅ।" अजय सिंह ने कहा___"ख़ैर चलो रखता हूॅ फोन।"
इसके साथ ही काल कट हो गई। अजय सिंह से बात करने के बाद प्रतिमा पलट कर वापस सोफे की तरफ आई और बैठ गई। चेहरे पर अनायास ही गंभीरता छा गई थी उसके। फिर उसने शिवा की तरफ देखते हुए कहा___"बेटा सविता से कहो कि अच्छी सी चाय बना कर लाए मेरे लिए।"
"ओके माॅम।
" शिवा ने कहा और सोफे से उठ कर अंदर की तरफ चला गया।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर मुम्बई में।
ब्रेक फास्ट करने के लिए सब एक साथ ही बैठे हुए थे। जिनमें जगदीश ओबराय, अभय सिंह, पवन, दिव्या, आशा तथा निधी बैठे हुए थे। गौरी, रुक्मिणी तथा करुणा सबके लिए नास्ता परोस रही थीं। ब्रेकफास्ट करते हुए सबके बीच थोड़ी बहुत बातचीत भी हो रही थी। किन्तु इस बीच आशा की निगाहें थोड़े थोड़े समय के अंतराल से निधी पर पड़ ही जाती थी।
निधी जो कि अब ज्यादातर ख़ामोश ही रहती थी। वो किसी से भी खुद से कोई बात नहीं करती थी। हलाॅकि सब यही चाहते थे कि वो सबसे बातें करे तथा अपनी शरारत भरी बातों से माहौल को सामान्य बनाए रखे मगर ऐसा हो नहीं रहा था। सबने उससे पूछा भी था कि वो अचानक इस तरह चुप चुप तथा गुमसुम सी क्यों रहने लगी है मगर उसने बस यही कहा था कि वो बस अपने भइया के चले जाने से ऐसी हो गई है। उसकी बातों को सब यही समझ रहे थे विराज जिस काम से गया है वो यकीनन बहुत ख़तरे वाला है जिसके बारे में सोच कर निधी इस तरह चुप हो गई है। आख़िर ये बात तो सब जानते ही थे कि निधी विराज की जान है तथा निधी भी अपने भाई पर जान छिड़कती है। मगर असलियत से आशा के अलावा हर कोई अंजान था।
चुपचाप नास्ता कर रही निधी की नज़र सहसा सामने ही कुर्सी पर बैठी तथा नास्ता कर रही आशा पर पड़ी तो वो ये देख कर एकाएक ही सकपका गई कि आशा उसे ही एकटक देखे जा रही है। उसके ज़हन में पलक झपकते ही सुबह का डायरी वाला सीन याद आ गया। उसके दिमाग़ ने काम किया और उसे ये सोचने पर मजबूर किया कि आशा दीदी उसे इस तरह एकटक क्यों देखे जा रही हैं। उनकी ऑखों में कुछ ऐसा था जिसने निधी को अंदर तक हिला सा दिया था और फिर एकाएक ही जैसे उसके दिमाग़ की बत्ती रौशन हुई। उसके मन में ख़याल उभरा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आशा दीदी ने उसके सोते समय डायरी को हाॅथ ही नहीं लगाया हो बल्कि उसे पढ़ भी लिया हो। इस ख़याल के आते ही निधी की हालत पल भर में ख़राब हो गई। मन के अंदर बैठा चोर इतना घबरा गया कि फिर उसमें नज़र उठा कर दुबारा आशा की तरफ देखने की हिम्मत न हुई।
निधी ने नोटिस किया कि जिस अंदाज़ से आशा उसे देख रही थी उससे तो यही लगता है कि उसने डायरी में लिखी बातें पढ़ ली हैं और जान गई है कि उसमें लिखे गए हर लफ्ज़ का मतलब क्या है? निधी की हालत ऐसी हो गई कि अब उससे वहाॅ पर बैठे न रहा गया। उसने जो खाना था खा लिया और फिर वह एक झटके से उठी और ऊपर अपने कमरे की तरफ तेज़ तेज़ क़दम बढ़ाते हुए चली गई। कमरे में जाकर उसने स्कूल की यूनीफार्म पहनी तथा अपना स्कूली बैग उठाया और फिर फौरन ही कमरे से बाहर आ गई।
उसे इतना जल्दी बाहर आते देख हर कोई चौंका मगर चूॅकि उसके स्कूल जाने का समय होने ही वाला था अतः इस पर ज्यादा किसी ने ग़ौर न किया।
उसने दूर से ही हाॅथ हिला कर सबको बाय किया और बॅगले से बाहर की तरफ बढ़ गई। बाहर आते ही उसने एक ऐसे आदमी को आवाज़ दी जो हर दिन कार से उसे स्कूल छोंड़ने और स्कूल से लाने का काम करता था। ख़ैर, कुछ ही देर में निधी कार में बैठ कर स्कूल की तरफ रवाना हो गई। किन्तु अब उसका मन बेहद अशान्त हो चुका था। उसे ये डर सताने लगा था कि अगर सचमुच आशा ने उसकी डायरी पढ़ ली होगी तो उसे यकीनन पता चल गया होगा कि वो अपने ही सगे भाई से प्यार करती है और आज कल उसी के ग़म में गुमसुम रहने लगी है।
निधी को प्रतिपल ये सब बातें और भी ज्यादा चिंतित व परेशान किये जा रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे? कैसे अब वो अपनी आशा दीदी के सामने जाएगी तथा उन्हें अपना चेहरा दिखाएगी? अगर आशा ने उससे इस बारे में कुछ पूछा तो वो क्या जवाब देगी? उसे पहली बार एहसास हुआ कि डायरी लिख कर उसने कितनी बड़ी ग़लती की है। वरना किसी को इस बात का पता ही न चलता कि उसके दिल में क्या है। मगर अब क्या हो सकता था? तीर तो कमान से निकल चुका था। अतः अब तो बस इंतज़ार ही किया जा सकता था इस सबके परिणाम का। निधी के मन ही मन ये निर्णय लिया कि अब वो आशा दीदी के सामने नहीं जाएगी और ना ही उनसे कोई बात करेगी। मगर उसे खुद लगा कि ऐसा संभव नहीं हो सकता। उसे उनका सामना तो करना ही पड़ेगा क्योंकि वो ज्यादातर उसके पास ही रहती हैं तथा रात में उसके ही कमरे में उसके साथ एक ही बेड पर सोती भी हैं।
ये मामला ही ऐसा था कि इसने निधी की हालत को इस तरह कर दिया था जैसे अब उसके अंदर प्राण ही न बचे हों। वह एकदम से जैसे ज़िदा लाश में तब्दील हो गई हो। उसके मन में ये भी ख़याल उभरा कि अगर आशा दीदी ने वो सब किसी से बता दिया तो क्या होगा? उसकी माॅ गौरी तो उसे जीते जी जान से मार देगी। कोई उसके अंदर की भावनाओं को नहीं समझेगा बल्कि सब उसे ग़लत ही समझेंगे। अगर ये भी कहें तो ग़लत न होगा कि उसने ये सब अपनी नई नई जवानी को बर्दाश्त न कर पाने की गरज़ से अपने ही भाई को फॅसाने का सोच कर किया होगा। इस ख़याल के आते ही निधी को आत्मग्लानि के चलते बेहद दुख हुआ। उसकी झील सी नीली ऑखों से पलक झपकते ही ऑसूॅ छलक कर गिर पड़े। किन्तु उसने जल्दी से उन्हें ये सोच कर पोंछ भी लिया कि कहीं ड्राइवर उसे बैकमिरर के माध्यम से ऑसू बहाते देख न ले।
सारे रास्ते इन सब बातों को सोचते हुए निधी को पता ही नहीं चला कि वो कब स्कूल पहुॅच गई? होश तब आया जब ड्राइवर ने उससे कहा कि उसका स्कूल आ गया है। ड्राइवर पचास की उमर का ब्यक्ति था। उसका ये रोज़ का ही काम था। उसे निधी से काफी लगाव भी हो गया था। उसे वो अपनी बेटी की तरह मानता था। पिछले कुछ समय से वो खुद भी देख रहा था कि निधी एकाएक ही गुमसुम सी हो गई है।
उसने भी कई बार इस बारे में उससे पूछा था मगर निधी ने उससे भी यही कहा था कि वो अपने भइया के लिए दुखी रहती है। भला वो किसी से अपने गुमसुम रहने की वजह कैसे बता सकती थी?
कार से उतर कर निधी बहुत ही बोझिल मन से अपने स्कूल के मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ती चली गई। स्कूल में उसकी अच्छी अच्छी कई सहेलियाॅ बन गई थी। वो सब भी निधी की इस ख़ामोशी से परेशान व चिंतित थी। मगर वो कर भी क्या सकती थी?
इधर निधी के जाने के थोड़ी देर बाद ही आशा निधी के कमरे में पहुॅची। कमरे को उसने अंदर से कुंडी लगा कर बंद किया और फिर पलट कर निधी की डायरी की तलाश करने लगी। मगर बहुत ढूॅढ़ने पर भी उसे निधी की वो डायरी कहीं न मिली। उसने हर जगह बड़ी बारीकी से चेक किया मगर डायरी तो जैसे गधे के सिर का सींग हो गई थी। सहसा आशा को ख़याल आया कि निधी अपनी डायरी को ऐसी वैसी जगह नहीं रख सकती जिससे वो किसी के हाॅथ लग जाए। ज़ाहिर सी बात है कि ऐसी डायरी वो किसी के हाॅथ लगने भी कैसे दे सकती थी जिसे किसी के द्वारा पढ़ लिए जाने के बाद उस पर क़यामत टूट पड़ती। मतलब साफ है कि उसने उस डायरी को ऐसी जगह छुपा कर रखा होगा जहाॅ से मिलना किसी दीगर ब्यक्ति के लिए लगभग असंभव ही हो।
इस ख़याल के तहत आशा ने सोचा कि ऐसी जगह तो इस कमरे में कदाचित आलमारी और आलमारी के अंदर वाला लाॅकर ही हो सकता है जहाॅ पर निधी ने अपनी डायरी छुपाई हो सकती है। अतः आशा ने आगे बढ़ कर आलमारी खोला और आलमारी के अंदर मौजूद लाॅकर को चेक किया तो उसे लाॅक पाया। अंदर के उस लाॅकर की चाभी को उसने ढूॅढ़ना शुरू कर किया मगर चाभी कहीं नहीं मिली उसे। आलमारी में रखी एक एक चीज़ तथा एक एक कपड़े को उलट पलट कर देखा उसने मगर चाभी कहीं न मिली। थक हार कर फिर उसने हर चीज़ को उसी तरह जमा कर रखना शुरू किया जैसे वो पहले रखी हुई थीं उसके बाद वह बेड पर आकर धम्म से बैठ गई और गहरी गहरी साॅसें लेने लगी।
काफी देर तक बेड पर बैठी वो चाभी के बारे में सोचती रही फिर उसे लगा कि संभव है कि लाॅकर की चाभी निधी अपने पास ही रखती हो। यानी इस वक्त वो चाभी उसके पास उसके स्कूली बैग में ही होगी। बात भी सच थी आख़िर वो चाभी अपने पास ही तो रखेगी वरना ऐसे में तो कोई भी उसकी चाभी ढूॅढ़ कर लाॅकर खोल सकता था तथा उसकी डायरी निकाल सकता था और फिर उसे पढ़ भी सकता था। आशा को ये बात सौ परसेन्ट जॅची।
आशा की ऑखों के सामने सुबह ब्रेकफास्ट करते वक्त का सीन फ्लैश करने लगा। जब वो बार बार निधी की तरफ देख रही थी और फिर निधी ने भी उसको अपनी तरफ एकटक देखते हुए देखा था। उस वक्त उसकी हालत बहुत ही दयनीय सी हो गई थी। आशा को समझते देर न लगी कि निधी को उसके इस तरह देखने से ये समझ में आ गया होगा कि उसने सुबह उसकी डायरी को शायद पढ़ लिया होगा और उसका राज़ जान चुकी होगी।
ये सोच ही उसकी हालत ख़राब हो गई थी। आशा जानती थी कि प्यार करना कोई जुर्म नहीं है, किन्तु यही प्यार अगर बहन अपने ही भाई से कर बैठे तो यकीनन ये अनुचित तथा ग़लत हो जाता है। कदाचित यही वजह थी कि निधी की वैसी हालत हो गई थी। उसे डर सताने लगा था कि आशा दीदी उसके बारे में क्या क्या सोचेंगी और अगर ये बात किसी को बता दिया तो इसका क्या अंजाम हो सकता है।
आशा को ये भी एहसास था कि विराज है ही ऐसा कि उससे कोई भी लड़की प्यार कर बैठेगी। फिर चाहे वो बाहरी लड़की हो या फिर खुद उसकी ही बहन। वो खुद भी तो विराज को शुरू से ही अपना सब कुछ मानती आ रही थी। उसे खुद नहीं पता था कि वो कब विराज को अपना दिल दे बैठी थी और फिर जब उसे एहसास हुआ कि वो विराज को बेपनाह प्यार करने लगी है तो एकाएक ही हॅसती खेलती आशा का समूचा अस्तित्व ही बदल गया था। आज जिस ख़ामोशी को निधी ने अख़्तियार कर लिया था उसी ख़ामोशी को एक दिन उसने भी तो ऐसे ही अख़्तियार कर लिया था। अपने प्रेम को उसने विराज के सामने कभी उजागर नहीं किया क्योंकि उसे पता था कि विराज उसे अपनी बहन ही मानता है। दूसरी बात अगर वो उससे अपने प्रेम का इज़हार करती भी तो बहुत हद तक संभव था कि विराज उसे ग़लत समझ बैठता या उसके इस प्रेम को ये कह कर ठुकरा देता वो ऐसा सोच भी कैसे सकती हैं? दूसरी बात, एक तो उमर में वो विराज से बड़ी थी दूसरे आर्थिक तंगी के चलते उसकी शादी भी नहीं हो रही थी। इस सबसे विराज को ही नहीं बल्कि सबको भी यही लगता कि आशा से अपनी जवानी की गर्मी बर्दास्त नहीं हुई इस लिए उसने विराज के साथ संबंध बनाने के लिए प्यार का नाटक शुरू कर दिया है। तीसरी महत्वपूर्ण बात वो भले ही चुलबुल व नटखट स्वभाव की थी किन्तु सिर्फ अपने भाइयों के लिए बाॅकी बाहरी लोगों के सामने उसने कभी अपना सिर तक न उठाया था। लोक लाज तथा घर की मान मर्यादा का ख़याल ही था जिसने उसके लब हमेशा के लिए सिल दिये थे।
जब उसे डायरी के द्वारा ये पता चला कि निधी अपने ही भाई से प्यार करती है तो सहसा उसे झटका सा लगा था और उसके दिल में भावनाओं और जज़्बातों का ये सोच कर भयंकर तूफान उठा था कि जिस विराज को वो अपना सब कुछ मानती आ रही है उस पर तो उसका कोई हक़ ही नहीं है। बल्कि सबसे पहला हक़ तो उसकी खुद की बहन का ही हो गया है। उसने भी सोच लिया कि चलो यही सही। प्यार मोहब्बत तो कम्बख़्त नाम ही उस बला का है जो सिर्फ दर्द देना जानती है इश्क़ करने वालों को। उसे निधी पर बेहद तरस भी आया कि इस मासूम ने उस शख्स से दिल का रोग लगा लिया जो इसका हो ही नहीं सकता। ये समाज ये दुनिया कभी भाई बहन के इस रिश्ते को स्वीकार नहीं करेगी। दुनियाॅ की छोंड़ो खुद उसके ही माॅ बाप या संबंधी इसके खिलाफ हो जाएॅगे।
कहने का मतलब ये कि मोहब्बत ने एक और शिकार फाॅस लिया बेइंतहां दर्द और तक़लीफ देने के लिए।
आशा जानना चाहती थी कि निधी को अपने ही भाई से इस हद तक प्यार कैसे हो गया है? आख़िर ऐसे क्या हालात बन गए थे जिसके तहत निधी ने ये रोग लगा लिया था? दूसरी बात क्या ये बात विराज को भी पता है कि उसकी लाडली बहन उससे इस हद तक प्यार करती है? उसे पता था कि डायरी एक ऐसी चीज़ होती है जिसमें हर इंसान अपने अंदर की हर सच्चाई को पूर्णरूप से सच ही लिखता है। अतः संभव है कि निधी ने भी उस डायरी में वो सब लिखा हो जिसके तहत उसे पता चलता कि किन हालातों में ऐसा हुआ था? हलाॅकि उसे ये भी पता था कि किसी भी इंसान की पर्शनल डायरी उसकी इजाज़त के बिना पढ़ना निहायत ही ग़लत होता है मगर फिर भी वो पढ़ना चाहती थी।
आशा सोच रही थी कि ब्रेकफास्ट करते वक्त निधी की जो हालत हुई थी उससे कहीं वो कुछ उल्टा सीधा करने का न सोच बैठे। ये मामला ही ऐसा है कि वो इस सबसे बहुत डर जाएगी और किसी के पता चल जाने के डर से वो कुछ उल्टा सीधा करने का सोच बैठे। बेड पर बैठी आशा को एकाएक ही हालात की गंभीरता का एहसास हुआ। उसका दिल बुरी तरह धड़कने लगा। उसे निधी की चिंता सताने लगी। उसने फौरन ही निधी से बात करने का सोचा। किन्तु उसके पास खुद का कोई मोबाइल नहीं था।
आशा अतिसीघ्र बेड से नीचे उतरी और भागते हुए कमरे से बाहर आई और फिर नीचे की तरफ दौड़ पड़ी। थोड़ी ही देर में वो गौरी आदि लोगों के पास पहुॅच गई। उसने खुद के चेहरे पर उभर आए घबराहट के भावों को जल्दी से छुपाया और लगभग सामान्य लहजे में ही गौरी से मोबाइल फोन माॅगा। किन्तु गौरी ने बताया कि मोबाइल तो उसके पास है ही नहीं, उसे तो मोबाइल चलाना ही नहीं आता। दूसरी बात ये कि उसे मोबाइल की कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ी। गौरी की ये बात सुनकर आशा बुरी तरह परेशान हो गई। लाख कोशिशों के बावजूद उसके चेहरे पर से परेशानी के वो भाव न मिट सके जो उसके चेहरे पर ढेर सारे पसीने में भींगे दिखने लगे थे। जिसका नतीजा ये हुआ कि गौरी पूछ ही बैठी उससे कि क्या बात है वो इतना परेशान क्यों हो गई है। गौरी की बात का उसने आनन फानन में ही जवाब दिया। तभी वहाॅ पर करुणा भी आ गई। गौरी ने कुछ सोचते हुए करुणा से कहा कि वो अपना मोबाइल फोन आशा को दे दे।
करुणा ने अपना मोबाइल फोन आशा को ये पूछते हुए दे दिया कि क्या बात है तुम इतना परेशान क्यों नज़र आ रही हो। कुछ बात है क्या? आशा ने कहा नहीं चाची ऐसी कोई बात नहीं है वो क्या है कि उसे गुड़िया को फोन करना है तथा उससे पूछना है कि आज वो इतना जल्दी स्कूल क्यों चली गई थी? आपने देखा नहीं था क्या उसने ठीक से नास्ता भी नहीं किया है आज? आशा की इन बातों से गौरी, करुणा तथा रुक्मिणी सहज हो गईं। उन्हें भी बात सही लगी।
क्योंकि उन्होंने भी देखा था कि निधी ने बस थोड़ा बहुत ही खाया था और फिर स्कूल चली गई थी। ख़ैर आशा का निधी के लिए इस तरह चिंता करना उन सबको बहुत अच्छा लगा।
करुणा से मोबाइल लेकर आशा फौरन ही वापस कमरे में आई और उसने फिर से दरवाजा उसी तरह अंदर से कुंडी लगा कर बंद कर दिया। उसके बाद वो बेड पर आ कर बैठ गई। फिर जाने उसे क्या सूझा कि वह बेड से उठी और कमरे से ही अटैच बाथरूम की तरफ बढ़ गई। बाथरूम का दरवाजा अंदर से बंद कर उसने मोबाइल पर निधी का नंबर निकाला और फिर उसे काल लगा कर मोबाइल अपने कान से लगा लिया। इस वक्त उसके चेहरे पर गहन चिंता व परेशानी स्पष्ट रूप से उभर आई थी। रिंग की आवाज़ जाती सुनाई दी उसे और इसके साथ ही उसकी धड़कनें भी बढ़ गईं। मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना भी करने लगी कि सब कुछ ठीक ही हो।
"ह..हैलो।" तभी उधर से निधी का लगभग घबराया हुआ सा स्वर उभरा___"च..चाची वो मैं.....।"
"गुड़िया।" निधी की बात को काटते हुए आशा ने फौरन ही कहा___"मैं तेरी आशा दीदी बोल रही हूॅ और हाॅ फोन मत काटना तुझे राज की क़सम है।"
"द..दीदी आप??" उधर से निधी का बुरी तरह उछला हुआ किन्तु घबराया हुआ स्वर फूटा था।
"गुड़िया।" आशा ने असहज भाव से किन्तु समझाते हुए कहा___"देख तू कोई भी उल्टा सीधा करने का ख़याल अपने मन में मत लाना। अगर तू ये सोच कर डर गई है कि मुझे डायरी के माध्यम से तेरा राज़ पता चल गया है और मैं उसकी वजह से तुझे कुछ कहूॅगी या फिर वो सब किसी से कह दूॅगी तो तू उस सबकी वजह से डर मत और ना ही उससे घबरा कर कुछ ग़लत क़दम उठाने का सोचना। मैं तुझे उसके लिए कुछ नहीं कहूॅगी गुड़िया और ना ही किसी को बताऊॅगी। मुझे पता है कि ये प्यार व्यार ऐसे ही होता है जो रिश्ते नाते नहीं देखता। अतः तू इस सबके लिए बिलकुल भी मत घबराना और ना ही फालतू का टेंशन लेना। तू सुन रही है न गुड़िया???"
"हम्म।" उधर से निधी का बहुत ही धीमा स्वर उभरा।
"मुझे इस बात के लिए माफ़ कर दे गुड़िया।" आशा ने सहसा दुखी भाव से कहा___"कि मैने तेरी डायरी को छुआ और उसे खोल कर पढ़ा भी। किन्तु ये सब मैने जान बूझ कर नहीं किया था। बल्कि वो सब अंजाने में हो गया था। दरअसल जब मैं तेरे पास सुबह तेरे लिए चाय लेकर आई तो देखा कि तू उस डायरी को अपने दोनो हाॅथों से पकड़े सो रही थी। मुझे लगा ऐसी डायरी तेरी पढ़ाई में तो उपयोग होती नहीं होगी तो फिर ये कैसी डायरी है तथा क्या है इसमें जिसे इस तरह लिये तू सो रही है? बस यही जानने के लिए मैने उस डायरी को तेरे हाॅथों से लेकर उसे खोला। किन्तु मुझे उसमें वो सब पढ़ने को मिल गया। लेकिन गुड़िया मैने और कुछ नहीं पढ़ा उसमें। शुरू का ही पेज पढ़ा था और वो ग़ज़ल पढ़ी थी जिसमें तूने लिखा था___"बताना भी नहीं मुमकिन, हाॅ ऐसे ही कुछ लिखा था उसमे।"
"क..
क्या आप सचमुच इस सबके लिए मुझसे नाराज़ या गुस्सा नहीं हैं दीदी?" उधर से निधी का अभी भी धीमा ही स्वर उभरा था।
"हाॅ गुड़िया।" आशा ने सहसा मुस्कुरा कर कहा___"मैं तुझसे बिलकुल भी नाराज़ नहीं हूॅ। भला मैं तुझसे नाराज़ हो भी कैसे सकती हूॅ पागल? किन्तु हाॅ इस बात से दुखी ज़रूर हूॅ कि सबको अपनी शरारतों से परेशान करने वाली मेरी ये लाडली बहन ने एकाएक ही खुद को उदासी की चादर में ढाॅफ लिया है।"
"वक्त और हालात हमेशा एक जैसे तो नहीं हो सकते न दीदी।" उधर से निधी ने अजीब भाव से कहा___"इंसान के जीवन में कभी खुशी तो कभी ग़म वाला समय तो आता जाता ही रहता है। मेरे पास इसके पहले वैसे ही वक्त और हालात थे जबकि मैं खुश रहा करती थी और शरारतें करने के सिवा कुछ नहीं आता था मुझे। मगर अब हालात बदल गए हैं। ईश्वर को मेरा खुश रहना और मेरा वो शरारतें करना शायद अच्छा नहीं लगा तभी तो उसने मुझे दिल का रोगी बना दिया। एक ऐसे इंसान के लिए उसने मेरे दिल में प्रेम का बीज बो दिया जो इंसान मेरा हो ही नहीं सकता। ख़ैर जाने दीजिए दीदी, मैने बहुत हद तक खुद को समझा लिया है। हलाॅकि ये मुश्किल तो था मगर कोई बात नहीं। इतना तो अब सहना ही पड़ेगा न मुझे। मैने भी सोचा कि ऐसे इंसान को पाने की ज़िद भी क्या करना जो मुझे मिल ही न सके और जिसकी वजह से सब कुछ नेस्तनाबूत भी हो जाए।"
निधी की इन बातों ने आशा को जैसे एकदम से ख़ामोश सा कर दिया। उसे समझ न आया कि वो उसकी बातों का क्या जवाब दे? किन्तु इतना एहसास ज़रूर हो गया उसे कि जिस लड़की को सब लोग बच्ची समझते हैं तथा जिसके बारे में ये सोचते हैं कि उसे दुनियादारी की अभी कोई समझ नहीं है वो लड़की दरअसल अब बहुत बड़ी हो गई है। कदाचित इतनी बड़ी कि अपनी इस छोटी सी ऊम्र में भी वो बड़े बड़े बुजुर्गों तथा बड़े बड़े ज्ञानियों को नसीहतें दे सकती है। क्या प्रेम ऐसा भी होता है जो अचानक ही इंसान को इतना बड़ा और इतना बड़ा ज्ञानी बना देता है जिसके चलते वो यथार्थ और ज्ञान की बातें करने लगे?
"आपने ऐसा कह कर यकीनन मेरे दिल को राहत पहुॅचाई है दीदी।" उधर से निधी कह रही थी___"वरना ये सच है कि मैं इस सबसे बहुत ही ज्यादा घबरा गई थी और चिंतित भी हो गई थी। मैं नहीं चाहती दीदी कि मेरी वजह से सब कुछ खत्म हो जाए और अगर सच में आपने किसी से वो सब कुछ बता दिया होता तो ये भी सच है कि फिर मेरे पास आत्म हत्या कर लेने के सिवा कोई दूसरा चारा न रह जाता। मैं किसी को अपना मुह न दिखा पाती और ना ही एक पल के लिए भी वैसी जलालत भरी ज़िंदगी जी पाती।"
"चुप कर तू।" आशा की ऑखों से ऑसुओं का जैसे बाॅध सा फूट पड़ा, बुरी तरह तड़प कर बोली___"ख़बरदार जो दुबारा फिर कभी आत्महत्या वाली बात की। तू सोच भी कैसे सकती है पागल कि मैं किसी से उस बारे में कुछ कह देती? इतनी पत्थर दिल नहीं हूॅ गुड़िया।
मेरे सीने में भी तेरी तरह एक ऐसा दिल धड़कता है जिसमें किसी के लिए बेपनाह मोहब्बत जाने कब से अपना आशियां बना कर रहती है।"
"य..ये आप क्या कह रही हैं दीदी??" उधर से निधी का बुरी तरह चौंका हुआ स्वर उभरा___"आप भी किसी से मोहब्बत करती हैं?"
"क्यों गुड़िया?" आशा ने सहसा फीकी मुस्कान के साथ कहा___"क्या मुझे किसी से मोहब्बत नहीं हो सकती? क्या मेरे अंदर एहसास नहीं हैं? अरे मेरे सीने में भी तो ऐसा दिल है जो धड़कना जानता है रे।"
"मेरा वो मतलब नहीं था दीदी।" उधर से निधी ने मानो सकपकाते हुए कहा___"मैं तो बस आपकी इस बात से हैरान हुई थी कि आप भी किसी से मोहब्बत करती हैं। वैसे कौन है वो शख्स जिसे मेरी प्यारी सी दीदी मोहब्बत करती है? मुझे भी तो बताइये न दीदी।"
"बहुत मुश्किल है गुड़िया।" आशा के चेहरे पर एकाएक ही कई सारे भाव आ कर ठहर गए, बोली___"बस यूॅ समझ ले कि एकतरफा मोहब्बत है ये।"
"मोहब्बत तो है न दीदी।" उधर से निधी ने कहा__"इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि वो एकतरफ से है या फिर दोनो तरफ से। मोहब्बत तो मोहब्बत ही होती है चाहे वो किसी की भी तरफ से हो। आप बताइये न किससे मोहब्बत करती हैं आप? मुझे ये जानने की बड़ी तीब्र उत्सुकता हो रही है प्लीज़ बताइये न।"
"मुझे मजबूर मत कर गुड़िया।" आशा की आवाज़ जैसे काॅप सी गई, बोली___"वर्षों से दबे उस मोहब्बत के एहसास को दबा ही रहने दे। क्योंकि मुझे इतने की ही आदत पड़ चुकी है और इतने से दर्द को ही सहने की हिम्मत है मुझमे। वो अगर बाहर आ गई तो फिर मैं उसे और उसके असहनीय दर्द को सम्हाल नहीं पाऊॅगी। इस लिए मुझसे मत पूछ मेरी गुड़िया। मैं तुझे ही क्या उस शख्स को भी नहीं बता सकती जिसे टूट टूट कर वर्षों से चाहा है मैने।"
"हाय दीदी।" उधर से निधी की मानो सिसकी सी निकल गई। कदाचित ऐसा इस लिए क्योंकि दोनो एक ही रोग के रोगी थे। ख़ैर निधी ने कहा___"ये कैसा रोग है दीदी? ये कैसा दर्द है, ये कैसा एहसास है? न जी पाते हैं और ना ही मर पाते हैं। ना चाहते हुए भी उससे फाॅसला कर लेते हैं जिसके बिना पल भी रह नहीं पाते हैं।"
"जाने दे गुड़िया।" आशा के अंदर से एक हूक सी उठी थी जिसने उसे हिला कर रख दिया था, बोली___"ऐसी बातें मत कर वरना इनका असर ऐसा होता है कि फिर एक पल भी सुकून नहीं मिलता। इस लिए ज़रूरी है कि हम अपने मन को अथवा दिल को बहला लें किसी तरह।"
"हाॅ ये तो सच कहा आपने।" निधी ने कहा___"हमें तो हर हाल में खुद को तथा अपने दिल को बहलाना ही होता है। किन्तु अगर आप बताना नहीं चाहती हैं तो कोई बात नहीं। अगर कभी दिल करे कि आपको अपने दिल के बोझ को हल्का करना है तो मुझसे वो सब बता कर ज़रूर खुद को हल्का कर लीजिएगा।"
"चल बाय।" आशा ने गहरी साॅस ली___"अपना ख़याल रखना और हाॅ अपने चेहरे की ये उदासी को कम करने की कोशिश भी करना।
"
आशा की इस बात पर उधर से निधी ने हाॅ कहा और फिर काल कट गई। बाथरूम के अंदर एक तरफ की दीवार पर लगे आईने के सामने खड़ी आशा काल कट होने के बाद कुछ देर तक आईने में खुद को देखती रही और फिर सहसा उसके लब थरथराते हुए हिले___"तुझे कैसे बता दूॅ गुड़िया कि मेरे दिल में किस शख्स के प्रति बेपनाह मोहब्बत है? अगर तुझे पता चल जाए कि मुझे भी उसी से मोहब्बत है जिससे तुझे है तो बहुत हद तक संभव है कि तेरा दिल टूट जाएगा और फिर तू सब कुछ जानते समझते हुए भी खुद को बिखर जाने से रोंक नहीं पाएगी।"
आईने में दिख रहे अपने अक्श को एकटक देखती हुई आशा की ऑखों से एकाएक ही ऑसुओं के दो मोती छलकते हुए नीचे बाथरूम के फर्स पर गिर कर मानो फना हो गए। फिर उसने जैसे खुद को सम्हाला और मोबाइल को एक तरफ रख कर उसने वाश बेसिन पर लगे नलके को चला कर उसके पानी से अपने चेहरे को धोना शुरू कर दिया। उसके बाद उसने एक तरफ हैंगर पर टॅगे टाॅवेल से अपने धुले हुए चेहरे को पोंछा और फिर मोबाइल लेकर बाथरूम से बाहर आ गई।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर नीलम व सोनम की तरफ।
नीलम व सोनम जीप की पिछली सीट पर बैठी हुई थी। जीप का ऊपरी हिस्सा यानी कि छत नहीं थी। इस लिए चलते हुए खुली हवा लग रही थी दोनो को तथा इधर उधर का नज़ारा भी स्पष्ट दिख रहा था। जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है कि हल्दीपुर गाॅव आस पास के सभी गाॅव से बड़ा था तथा आस पास के कई गाॅवों की पंचायत भी हल्दीपुर ही थी। अजय सिंह का परिवार हल्दीपुर गाॅव का सबसे ज्यादा संपन्न परिवार था।
नीलम की विराज से पहले ही सारी बातें मैसेज के द्वारा हो चुकी थी। विराज ने उसे प्लान भी समझा दिया था तथा ये भी कहा था कि गाॅव तथा खेत घूमने का बहाना करके निकलना हवेली से किन्तु गाॅव में घूमना ही बस नहीं है बल्कि ऐसी जगह आना है जिस तरफ गाॅव की सीमा का आख़िरी छोर हो तथा जिस तरफ से दूसरे गाॅव यानी कि चिमनी के पहले वाले गाॅव माधोपुर की तरफ जाने वाले रास्ते की तरफ आना है। ऐसा इस लिए कि नीलम व सोनम को गाॅव तथा खेत देखने जाने की जानकारी अगर प्रतिमा द्वारा अजय सिंह को होती है तो वो ज़रूर अपने ससुर जगमोहन सिंह को गुनगुन छोंड़ कर वापस सीघ्रता से मुख्य रास्ते से आएगा। ये भी संभव है कि वो अपने साथ मंत्री के आदमियों को अथवा कुछ ऐसे किराए के टट्टुओं को ले आए जो उन्हें रास्ते में ही मिल जाएॅ तो मुसीबत हो जाए।
इन्हीं सब बातों को सोच कर ही विराज ने नीलम से माधोपुर की तरफ ही आने को कहा था। हल्दीपुर के बगल से ही माधोपुर था उसके बाद चिमनी गाॅव। उधर विराज खुद भी गुनगुन के दस किलो मीटर पहले ही बसे गाॅव रेवती से मुख्य मार्ग से न आ कर घूमते हुए इस तरफ आने वाला था।
नीलम व सोनम दोनो ही ऐसा ज़ाहिर कर रही थीं जैसे सचमुच ही वो दोनो गाॅव देखने निकली हैं हवेली से।
विराज ने ये भी कहा था कि संभव है उनके पीछे उसकी माॅम ने और भी ऐसे आदमी लगा दिये हों जो उसकी गतिविधी को नोट करते हुए छुप कर उनका पीछा कर रहे हों। अतः इस बात का ख़याल रखें और अगर वो दिखें तो उनकी वस्तुस्थित से उसे ज़रूर अवगत कराए किन्तु सावधानी से।
नीलम सोनम को बताती जा रही थी कि जब वो छोटी थी तो वो इन जगहों पर कभी कभी घूमने आया करती थी। दोनो ही बातें कर रहीं थी। अब तक दोनो ही गाॅव की सीमा के बाहर की तरफ आ गईं थी। तभी एक जगह ड्राइवर ने जीप को रोंक दिया। ये देख कर दोनो ही चौंकी।
"मैडम अब किधर जाना है?" ड्राइवर ने पीछे पलट कर उन दोनो से पूछा था___"आप तो जानती हैं कि हम दोनो खुद ही यहाॅ पर नये हैं इस लिए हमें रास्तों का कुछ पता नहीं है। अतः आपको जहाॅ जहाॅ घूमना हो हमें बता दीजिए। वैसे आपके भाई शिवा जी ने कहा था कि आपको ये सारा गाॅव देखना है और फिर खेतों की तरफ भी जाना है। इस लिए अब आप बताइये कि यहाॅ से किधर चलना है?"
ड्राइवर की बात सुन कर नीलम के दिमाग़ की बत्ती एकाएक ही रौशन हो उठी और वह मन ही मन ये सोच कर खुशी से झूम उठी कि ड्राइवर को तो यहाॅ के बारे में कुछ पता ही नहीं है। यानी वो अगर चाहे तो कहीं भी चलने को कह सकती है उसे। मगर एकाएक ही उसका मन मयूर ये सोच कर मुरझा भी गया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि इन दोनो को शिवा ने ऐसा ही कुछ पूछने के लिए कहा हो। ताकि मैं अपने तरीके से उसे उस तरफ चलने को कहूॅ जिस तरफ जाने से उसे किसी प्रकार की कोई शंका हो और फिर ये शिवा को मैसेज द्वारा इस सबके बारे में सूचित भी कर दे।
नीलम को अपना ये ख़याल जॅचा। इस लिए उसने ऐसा वैसा कुछ भी करने का ख़याल दिमाग़ से निकाल दिया। किन्तु ये भी उसे पता था कि माधोपुर की तरफ ही उसे जाना है। अतः वो उस तरफ जाने के लिए कोई बहाना मन ही मन में सोचने लगी।
"अरे नीलम।" सहसा सोनम एक तरफ हाॅथ का इशारा करते हुए बोल पड़ी___"वो उस तरफ क्या है?"
"क..कहाॅ दीदी?" नीलम ने भी जल्दी से उस तरफ देखते हुए पूछा जिस तरफ सोनम हाथ से इशारा कर रही थी।
"अरे वहाॅ पर।" सोनम ने अपने उठे हुए हाॅथ को हल्का सा मूवमेंट देते हुए कहा___"उस तरफ देख न। ऐसा लगता है जैसे वहाॅ पर कोई बड़ा सा मंदिर है।"
"अच्छा वो।" नीलम को जैसे दिख गया___"हाॅ वो मंदिर ही है। यहाॅ पर वही एक मंदिर है जो कि काफी प्राचीन मंदिर है। हर साल वहाॅ पर मेला भी लगता है।"
"मुझे उस मंदिर को देखना है नीलम।" सोनम ने सहसा जैसे रिक्वेस्ट की___"मुझे मंदिर में देवी देवताओं के दर्शन करना बहुत अच्छा लगता है। प्लीज इनसे कहो न कि ये मंदिर की तरफ चलें।"
"ठीक है दीदी।" नीलम का मन मयूर एकाएक ही खुशी से फिर झूम उठा था। दरअसल वो मंदिर बगल के ही गाॅव माधोपुर में ही स्थित था।
मंदिर को देख कर सोनम ने उसे देखने की इच्छा ज़ाहिर की तो नीलम ये सोच कर खुश हो गई कि अब उस तरफ जाने का शानदार बहाना भी मिल गया है। अतः उसने तुरंत ही ड्राइवर से कहा कि जीप को मंदिर की तरफ मोड़ ले।
ड्राइवर ने ऐसा ही किया। उसे इस सबमें कुछ भी अटपटा नहीं लगा इस लिए वो भी बिना कोई भाव चेहरे पर लाए जीप को मोड़ दिया उस तरफ। इधर जैसे ही जीप माधोपुर में स्थित उस मंदिर की तरफ मुड़ कर चली तो सहसा सोनम ने बड़े ही रहस्यमय ढंग से नीलम की तरफ देखा।
नीलम उसके इस तरह देखने से अभी बुरी तरह चौंकने ही वाली थी कि सहसा उसे ख़याल आया कि ड्राइवर के पास ही लगे बैकमिरर से ड्राइवर उसे चौंकते हुए देख भी सकता है। अतः उसने जल्दी से अपने चेहरे के भावों को छुपाया और फिर सोनम को सामान्य लहजे में ही बताने लगी कि एक बार वो भी उस मंदिर में मेले के समय गई थी।
नीलम आस पास का नज़ारा देखते हुए ही थोड़ी थोड़ी देर के अंतराल में पीछे भी देख रही थी। विराज ने उससे कहा था कि संभव है कि उसके पीछे और भी कुछ आदमी छुप कर आएॅ। अतः उन्हीं को देख रही थी नीलम, मगर अभी तक उसे ऐसा कुछ नज़र न आया था। ये देख कर उसे लगने लगता कि विराज बेवजह ही इतनी दूर की सोच रहा है। जबकि यहाॅ तो ऐसा कुछ भी नहीं है और अगर होता तो क्या ऐसा कुछ नज़र न आता?
नीलम के एक हाॅथ में पहले से ही मोबाइल था। अतः उसने सामान्य तरीके से ही किन्तु सामने की सीट पर बैठे दोनो ही आदमियों की नज़रों को बचा कर मोबाइल की तरफ देखा। (यहाॅ पर मेरे पाठक पूछ सकते हैं कि सामने की सीट पर बैठे वो दोनो आदमियों की पीठ नीलम व सोनम की तरफ थी तो भला नीलम का उनकी नज़रों से बचाने की बात कहाॅ से आ गई तो दोस्तो इसका जवाब ये है कि ड्राइवर के पास ही बैकमिरर लगा होता है जिसमें वो पीछे की चीज़ें देखता है। यहाॅ पर मैं उसी की बात कर रहा हूॅ)। ख़ैर, नीलम ने बड़ी सावधानी से मोबाइल में व्हाट्सएप खोला और फिर विराज को मैसेज करके बताया कि वो अब कहाॅ पहुॅचने वाली है।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
विराज का ख़याल एकदम सही था। अजय सिंह को जब प्रतिमा के द्वारा ये पता चला कि नीलम व सोनम गाॅव तथा खेत देखने गईं हैं तो वो सचमुच गुनगुन से चल दिया था। किन्तु चलने से पहले उसने अपने एक ऐसे आदमी को भी फोन किया जो गुनगुन में ही रहता था तथा कई तरह के ग़ैर कानूनी धंधे करता था। उस आदमी का नाम फिरोज़ खान था। अजय सिंह ने फिरोज़ को फोन करके उसे सारी सिचुएशन से अवगत कराया और फिर तुरंत ही अपने गुर्गों को लेकर चलने को कहा था।
इस वक्त अजय सिंह और फिरोज़ खान दोनो एक ही कार में थे जबकि फिरोज़ खान के बाॅकी सभी गुर्गे पीछे अलग अलग तीन जीपों में थे। सभी के हाॅथों में हथियार के रूप में मौत का सामान था। अजय सिंह के पास भी एक रिवाल्वर था जो कि उसने फिरोज़ खान से लिया था।
"तो ये वही लड़का है ठाकुर साहब।" अजय सिंह की कार में पैसेंजर सीट पर बैठा फिरोज़ खान बोला___"जो आपका भतीजा है तथा जिसने आपका जीना हराम कर रखा है। आपने बताया था कि कैसे इसने आपकी फैक्ट्री में आग लगा दी थी जिसमें आपका बहुत तगड़ा नुकसान हुआ था?"
"हाॅ खान।" अजय सिंह सहसा दाॅत पीसते हुए कह उठा___"ये वही हरामज़ादा है और अब तो उसकी इतनी हिम्मत बढ़ गई है कि इसने पिछले दिन हमें अपने नकली सीबीआई के आदमियों के जाल में फाॅस कर कैद भी कर लिया था। मेरी बड़ी बेटी जो पुलिस में इंस्पेक्टर है उसे भी इस कम्बख्त ने अपनी तरफ मिला लिया है। ख़ैर, मुझे अपनी औलाद से ये उम्मीद नहीं थी खान कि वो अपने ही माॅ बाप के खिलाफ़ हो जाएगी। जैसे औलाद अगर बिगड़ी हुई हो और वो हज़ार पाप कर डाले तब भी माॅ बाप के लिए वो प्रिय ही होती है और वो उसके अपराधों को क्षमा कर देते हैं उसी तरह क्या औलाद नहीं कर सकती? मैंने जो कुछ भी किया था सिर्फ अपने बीवी बच्चों के उज्वल भविष्य के लिए ही किया था। साला अब तक तो उसी पाप के पैसों को खुश होकर उड़ाती रही थी वो। मगर आज उसे हमसे तथा हमारे उसी पैसों से नफ़रत हो गई? खान, ये मैं जानता हूॅ कि बेटी की इस बगावत से मुझे कितनी तक़लीफ हुई है। उसे इस बात का ज़रा भी ख़याल नहीं आया कि उसके द्वारा ये सब करने से उसके माॅ बाप पर क्या गुज़रेगी?"
"ये सब उस लड़के की वजह से ही हुआ है ठाकुर साहब।" फिरोज़ खान ने कठोरता से कहा___"उसी ने रितू बिटिया को बरगलाया होगा। वरना वो ऐसा कभी न करती।"
"नहीं खान।" अजय सिंह ने मजबूती से अपने सिर को इंकार में हिलाते हुए कहा___"ये सब उस लड़के के बरगलाने से नहीं हुआ है। क्योंकि इसके पहले मेरे साथ साथ मेरे बच्चे भी उस विराज से नफ़रत करते थे और उसकी तथा उसके परिवार में किसी की शक्ल तक देखना पसंद नहीं करते थे। ये सब तो किसी और ही वजह से हुआ है खान। दरअसल मेरी दोनों ही बेटियों को सच्चाई की राह पर चलना शुरू से ही पसंद था। उन्हें ये पता नहीं था कि उनका बाप वास्तव में कैसा है? ख़ैर, इस मामले में मेरा बेटा मुझ पर गया है। मुझे खुशी है कि वो मेरे जैसा है और सच कहूॅ तो मुझे उस पर नाज़ भी है। मगर अब मैने भी फैंसला कर लिया है कि मेरे इस दिल की आग तभी शान्त होगी जब उस विराज के साथ साथ मैं अपनी उन दोनो बेटियों को भी अपने हाथों से बद से बदतर मौत दूॅगा।"
फिरोज़ खान देखता रह गया अजय सिंह को। वो देख रहा था कि इस वक्त अजय सिंह के चेहरे पर ज़लज़ले के से भाव थे। यकीनन उसके अंदर गुस्सा, क्रोध व अपमान ये तीनो ही अपने पूरे जलाल पर थे।
"ख़ैर छोंड़िये इस बात को।" फिरोज़ खान ने जैसे पहलू बदला___"ये बताइये कि उन सबको पकड़ने के लिए क्या प्लानिंग की है आपने?"
"प्लानिंग में कोई कमी नहीं है खान।
" अजय सिंह ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"मेरी बीवी के पास भेजा फ्राई कर देने वाला दिमाग़ है। उसने मुझे बताया था कि उसने उन दोनो के साथ पहले तो सामान्य सिचुएशन बनाए रखने के लिए दो ऐसे आदमियों को जीप में भेजा है जो तगड़े फाइटर कहे जाते हैं। उनके जाने के बाद उसने अलग से उन जैसे ही आदमियों की एक टीम बना कर उनके पीछे इस तरह लगा दिया है कि नीलम व सोनम को वो टीम नज़र ही न आए। उस टीम का काम ये है कि अगर सच में विराज नीलम व सोनम को लेने आ रहा है तो वो यकीनन पहले नीलम व सोनम के साथ गए उन दो आदमियों से भिड़ेगा। अतः हमारी टीम के वो लोग बैकअप के रूप में अपने आदमियों की मदद करेंगे। यानी इस सिचुएशन को देखते हुए ही हमारी दूसरी टीम के आदमी जल्द ही वहाॅ पहुॅच जाएॅगे। मेरी बीवी प्रतिमा के अनुसार अगर बैकअप के रूप में विराज ने भी कोई ऐसा इंतजाम किया होगा तो यकीनन वो भी विराज का पलड़ा कमज़ोर पड़ते देख कर उन सबके बीच टूट पड़ेंगे। उस सूरत में यहाॅ से हम सब भी पहुॅच जाएॅगे और विराज तथा उसके आदमियों का काम तमाम करेंगे। हम लोग एक तरह से डबल बैकअप के रूप में होंगे अपने आदमियों के पीछे। मुझे यकीन है कि इतना कुछ होने के बाद विराज एण्ड पार्टी ज्यादा देर तक हमारा सामना नहीं कर पाएगी और अंततः उन्हें हमारे सामने खुद को सरेण्डर करना ही पड़ेगा।"
"ओह।" फिरोज़ खान प्रभावित लहजे में बोला___"प्लान तो यकीनन आपका शानदार है। सचमुच इस सूरत में आपका वो भतीजा और उसके सभी आदमी घुटने टेक देंगे।"
"बिलकुल।" अजय सिंह ने कहा___"इस सबके बाद विराज और उसके साथ साथ मेरी दोनो बेटियाॅ मेरे कब्जे में होंगी। तब मैं उस हरामी के पिल्ले से अपने साथ हुए इतने भारी नुकसान का गिन गिन के बदला लूॅगा। मुम्बई में सुरक्षित बैठी उसकी माॅ बहन को यहाॅ मेरे पास मेरे पैरों तले आना ही पड़ेगा। उसके बाद तो दुनियाॅ देखेगी कि ठाकुर अजय सिंह के साथ ऐसा दुस्साहस करने वालों का क्या अंजाम होता है?"
"ऐसा ही होगा ठाकुर साहब।" फिरोज़ खान ने दृढ़ता से कहा___"आपने जिस तरह से प्लान बनाया है उस हिसाब से यकीनन आपका वो भतीजा तथा आपकी दोनो बेटियाॅ आपके चंगुल में आ जाएॅगी। मैं अपने साथ अपने लगभग बीस के आस पास आदमी लाया हूॅ। सबके सब आधुनिक हथियारों से लैश हैं। अगर ये सच है कि आपका वो भतीजा उन दोनो को लेने आ रहा है तो यकीनन तगड़ी मुठभेड़ होगी और उस मुठभेड़ में वो लोग बुरी तरह आपसे मात खाएॅगे।"
"इस बार वो हरामी की औलाद नहीं बचेगा खान।" अजय सिंह ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा___"इस बार वो मेरी मुट्ठी में ज़रूर कैद होगा और पिंजरे में कैद परिंदे की तरह फड़फड़ाएगा भी। साले की ऐसी दुर्गति करूॅगा कि मौत और रहम दोनो की ही भीख मागेगा मुझसे।
"
अजय सिंह की इस बात पर फिरोज़ खान बोला तो कुछ नहीं किन्तु उसके जबड़े भिंच गए थे, जैसे जंग के लिए पूरी तरह से तैयार हो गया हो। इसके साथ ही कार के अंदर ख़ामोशी छा गई। कार हल्दीपुर की तरफ तेज़ी से बढ़ी जा रही थी। उनके पीछे पीछे तीन तीन जीपों में सवार फिरोज़ खान के गुर्गे भी चले आ रहे थे।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
कहानी अभी जारी है दोस्तो,,,,,,,,,,
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट........《 57 》
अब तक,,,,,,,,
"अपने भगवान को याद कर ले बच्चे।" फिर उसने मेरी तरफ खतरनाक भाव से बढ़ते हुए कहा___"उनसे दुवा कर कि तेरे जिस्म की हड्डियाॅ सलामत रहें।"
"ये डाॅयालग मैं भी बोल सकता हूॅ तुम्हारे लिए।" मैने मुस्कुरा कर कहा___"पर ये सोच कर नहीं बोला कि फालतू की डींगें मारना मेरी फितरत नहीं है।"
मेरी ये बात सुन कर वो जैसे बुरी तरह तिलमिला गया था। मुझे पता था कि उसके सामने मैं कुछ भी नहीं हूॅ। अगर मैं एक बार भी उसके फौलादी शिकंजे में फॅस गया तो फिर शायद भगवान ही मालिक होगा मेरा। मगर मुझे खुद पर और अपने गुरू की सिखाई हुई कला पर पूर्ण विश्वास था।
वो पूरे वेग से मेरी तरफ बढ़ा और अपने दाहिने हाॅथ को भी उसी वेग से मुझ पर चलाया था। मैं फुर्ती से नीचे झुका मगर झुकते ही मेरे हलक से चीख निकल गई। कारण उसने हाॅथ चलाने के बाद ही अपने दाहिने पैर को उठाकर उसका घुटना भी चला दिया था जो सीधा मेरे झुके हुए चेहरे से टकराया था। मैं उछलते हुए सीधा हुआ ही था कि उसने बिजली की सी फुर्ती से घूम कर मेरे सीने पर फ्लाइंग किक जमा दी। नतीजा ये हुआ कि मेरे हलक से ज़ोर की हिचकी निकली और मैं पीछे की तरफ हवा में लहराते हुए ही नीचे कच्ची ज़मीन पर चारो खाने चित्त जा गिरा। गिरते ही मेरी ऑखों के सामने अनगिनत तारे नाॅच गए। कुछ पल के लिए तो ऑखों के सामने अॅधेरा भी छा गया। प्रहार इतना ज़बरदस्त था कि मुझसे तुरंत उठा न गया। सीने में बड़ी असहनीय पीड़ा महसूस हुई मुझे। मेरे कानो में नीलम व सोनम की चीखें भी टकराई। कदाचित मुझे इस तरह गिरते देख वो बेहर डर गई थी और मुझे कुछ हो जाने की आशंका से वो बुरी तरह चीखी थीं।
सहसा मेरी नज़र मेरे नज़दीक ही पहुॅच चुके उस आदमी पर पड़ी। मेरे क़रीब पहुॅचते ही उसने अपने पैर को उठाया और ज़मीन पर चित्त गिरे मेरे पेट की तरफ तीब्र वेग से चलाया। मैं बिजली की सी फुर्ती से कई पलटा खाते हुए दूसरी तरफ हो गया तथा साथ ही उछल कर खड़ा भी हो गया। ये अलग बात है इस तरह उछल कर खड़े होने से अचानक ही मुझे अपने सीने पर पीड़ा का एहसास हुआ। मैं समझ चुका था कि अगर ये आदमी इसी तरह मुझ पर और दो चार प्रहार करने में सफल हो गया तो यकीनन मेरा काम तमाम हो जाना है। अतः अब मैं उससे पूरी तरह सतर्कता से मुकाबला करने के लिए तैयार हो गया।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,
मंत्री दिवाकर चौधरी इस वक्त गुनगुन में ही एक ऐसी जगह पर था जहाॅ पर उसके ही किसी खास जान पहचान वाले के माल का उद्घाटन समारोह था। माल का मालिक या यूॅ कहिए कि मंत्री के उस जान पहचान वाले खास आदमी का नाम शैलेन्द्र बंसल था। जो मुख्य रूप से आगरा का रहने वाला था। बहुत पहले ही उसकी मुलाक़ात मंत्री से हुई थी। कहते हैं कि जो जैसा होता है उसे वैसा मिल ही जाता है फिर चाहे वो दुनियाॅ के किसी भी कोने में चला जाए।
शैलेन्द्र बंसल और मंत्री के बीच क्या मंत्रणा हुई थी इस बारे में तो ख़ैर वो दोनो ही बता सकते थे किन्तु मंत्री के कैरेक्टर के हिसाब से सोचने पर पता चलता था कि शैलेन्द्र बंसल भी मंत्री के ही जैसे कैरेक्टर का आदमी था। इसका खुलासा तब हुआ जब मंत्री ने शैलेन्द्र को अपने यहाॅ कारोबार के रूप में एक बड़ा सा माॅल स्थापित करने का प्रस्ताव दिया था। मंत्री के ही सहयोग से तथा उसके ही निर्देशन पर गुनगुन में अच्छी खासी ज़मीन पर ग़ैर कानूनी रूप से कब्जा कर उस स्थान पर बहुत ही कम समय में एक बड़ा सा माॅल बन कर तैयार हो गया था जिसका उद्घाटन आज खुद मंत्री के द्वारा हुआ था।
मंत्री के निर्देशन में बना ये माॅल सबकी नज़र में माॅल ही था जहाॅ पर हर तरह का उपयोगी सामान लोगों को ख़रीदने पर मिल जाता मगर कोई नहीं जानता था इसी माॅल के बेसमेन्ट में दरअसल मंत्री व शैलेन्द्र बंसल ग़ैर कानूनी धंधे को अंजाम देने की बुनियाद भी रख चुके थे।
माॅल का उद्घाटन तथा वहाॅ पर कुछ ज़रूरी मीटिंग करने के बाद मंत्री माॅल से बाहर आकर अपने सुरक्षा कर्मियों से घिरा अपनी कार के पास पहुॅचा ही था कि सहसा उसकी कोट की जेब में मौजूद मोबाइल बज उठा। एक हाॅथ से मोबाइल को निकालने के साथ ही मंत्री अपनी कार की पिछली सीट पर बैठ गया। उसके बाद उसने बज रहे मोबाइल की स्क्रीन की तरफ देखा। उसके बैठते ही उसके साथ आगे पीछे उसके सुरक्षा गार्ड भी बैठ गए। इसके बाद कार आगे बढ़ चली।
"हाॅ कहो राणे।" मोबाइल की स्क्रीन पर डिटेक्टिव राणे का नाम देख कर मंत्री ने फौरन ही काल को रिसीव कर मोबाइल को कान से लगाने के साथ ही कहा___"क्या बात है? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुमने उस सारे काम को कर लिया है जिस काम को करने के लिए हमने तुम्हें लगाया था? अगर ऐसा है तो भाई मान गए तुम्हें। इतने कम समय में तो दुनियाॅ का कोई भी जासूस काम को अंजाम नहीं दे सकता। अभी कल ही तो लगे थे तुम काम में।"
"आप ग़लत समझ रहे हैं चौधरी साहब।" उधर से राणे का स्वर उभरा___"जिस काम के लिए आपने मुझे लगाया है वो काम भला इतना जल्दी कैसे हो जाएगा?"
"ओह ऐसा क्या।" मंत्री ने बुरा सा मुह बनाया___"हम तो मियाॅ खांमखां ही तुम्हें जेम्स बाण्ड का बाप नहीं बल्कि दादा समझ बैठे थे।
ख़ैर, ये बताओ कि अगर काम नहीं हुआ है तो तुमने हमें फोन किस बात के लिए किया है?"
"दरअसल मैने।" उधर से राणे ने कहा___"बहुत ही ज़रूरी बात बताने के लिए आपको फोन किया है।"
"अरे तो मियाॅ।" मंत्री तपाक से बोला___"बात क्यों बढ़ा रहे हो? ज़रूरी बात तो तुमें अतिसीघ्र बताना चाहिए न। ख़ैर जल्दी बताओ कौन सी ज़रूरी बात है?"
"कल आपके यहाॅ से जाने के बाद।" उधर से राणे कह रहा था___"मैने अजय सिंह का पता किया और उसके पीछे लग गया। मैं देखना चाहता था कि उसने जो कुछ आपसे कहा था उसमें कितनी सच्चाई थी तथा वो आपके प्रति कितना वफ़ादार है?"
"ओह।" मंत्री के कान खड़े हो गए___"तो क्या देखा और क्या जाना तुमने?"
"कल तो उसने कुछ खास नहीं किया था।" हरीश राणे ने कहा___"किन्तु आज सुबह नौ या दस बजे के क़रीब वह अपनी कार में किसी आदमी को लिए गुनगुन के रेलवे स्टेशन आया था। स्टेशन से बाहर वो अकेला निकला था। मतलब कि उसके साथ जो दूसरा आदमी था उसे वो शायद रेलवे स्टेशन छोंड़ने आया था। स्टेशन के बाहर जब वह आया तो उसी समय उसके मोबाइल पर किसी का काल आया तथा उसने किसी से कुछ देर तक बातें की। बात करने के बाद ही एकदम से उसके हाव भाव बदले से नज़र आए जिसके तहत वो अपनी कार में बैठ कर फौरन स्टेशन से बंदूख से छूटी गोली की तरह हवा हो गया। मैं उसके पीछे ही था कि अचानक कुछ देर बाद उसके पास तीन अलग अलग जीपों में ढेर सारे आदमी हथियारों से लैश आए। उनमें से एक आदमी अजय सिंह की कार में बैठ गया। उसके बाद अजय सिंह की कार के चलते ही बाॅकी तीनों जीपों में सवार आदमी भी अजय सिंह के पीछे पीछे चल पड़े।"
"अब बस भी करो मियाॅ।" सहसा मंत्री राणे की बात बीच में ही काटते हुए किन्तु परेशान भाव से कह उठा___"तुम तो इस तरह शुरू हो गए जैसे कोई टेप रिकार्डर शुरू हो जाता है। मुख्य बात बताओ कि मामला क्या हुआ है बस।"
"मुख्य बात ये है कि।" उधर से राणे ने कहा___"इस वक्त जहाॅ पर मैं हूॅ वहाॅ पर एक से बढ़ कर एक धुरंधर लोगों की पूरी फौज आई हुई है। इतना ही नहीं यहाॅ पर एक मंदिर है जिसके सामने कई सारे हट्टे कट्टे लोग खड़े हैं। एक हट्टा कट्टा आदमी एक मामूली से लड़के से ज़बरदस्त लड़ाई कर रहा है। अजय सिंह तथा उसके साथ आए सब लोग लड़ाई देख रहे हैं। मैने तो अजय सिंह को ये भी कहते सुना है कि इस हराम के पिल्ले को इतना मारो कि हगने मूतने के भी काबिल न बचे। मंदिर के पास ही दो लड़कियाॅ दो आदमियों से घिरी खड़ी हैं तथा बुरी तरह रोये जा रही हैं। उनके मुख से बार बार एक ही बात निकल रही है कि प्लीज उसे कुछ मत करो। इसका मतलब ये हुआ चौधरी साहब कि ये वही लड़का है जिसका नाम विराज है। अजय सिंह ने कदाचित उसे घेर लिया है और अब वह उसके आदमियों के रहमो करम पर है।"
"ओह तो ये बात है।
" मंत्री के जिस्म में जाने क्या सोच कर झुरझुरी सी हुई, बोला___"चलो अच्छा ही हुआ कि वो साला ठाकुर की पकड़ में आ गया है। अब सब कुछ सही हो जाएगा राणे।"
"यकीनन।" उधर से राणे ने कहा___"आपका दुश्मन अजय सिंह की पकड़ में आ चुका है। अब आप अगर चाहें तो इस मौके का फायदा उठा सकते हैं। यानी आप भी यहाॅ आ जाइये और बहती गंगा में डुबकी लगा कर अपना काम भी कर लीजिए।"
"अब हमें वहाॅ आने की ज़रूरत नहीं है राणे।" मंत्री ने कहा___"वो लड़का तो अब अजय सिंह की पकड़ में आ ही गया है। अतः अजय सिंह अपने वादे के अनुसार उसे हमारे हवाले भी कर देगा। उसके बाद तो उसे हमारी हर चीज़ लौटानी ही पड़ेगी। फिर हम उसका क्या हस्र करेंगे इसके बारे में उसने सोचा भी न होगा।"
"तो फिर मेरे लिए क्या आदेश है चौधरी साहब?" उधर से हरीश राणे ने कहा___"मुझे नहीं लगता कि अब इसके बाद भी मेरा कोई काम है यहाॅ। यानी आपका दुश्मन ठाकुर अजय सिंह से देर सवेर आपको मिल ही जाएगा और फिर आप उससे जैसे चाहेंगे वैसे अपने वो वीडियोज तथा अपने बच्चे वापस ले सकेंगे।"
"ठीक कह रहे हो तुम राणे।" मंत्री ने कहा___"अगर यही आलम है वहाॅ का तो फिर अब रह ही क्या गया है तुम्हारे कुछ करने के लिए? इस लिए अगर तुम चाहो तो वापस आ सकते हो या फिर ऐसा करो कि अभी फिलहाल तुम वहीं पर रहो और देखते रहो कि नतीजा क्या निकलता है? जैसा कि इस सबके बारे में ठाकुर ने हमें सूचना तक नहीं दी है इस लिए संभव है कि उसके मन में हमारे प्रति कोई खोट हो। इस लिए तुम ठाकुर की कार्यवाही के बारे में अंत तक देखते रहो। अगर ठाकुर इसके बाद भी हमें उस सबके बारे में नहीं बताता है तो हम उसे भी देख लेंगे। तुम ये ज़रूर देखना कि ठाकुर उस लड़के को तथा अपनी बेटी को कहाॅ कैद करके रखता है?"
"ठीक है चौधरी साहब।" उधर से हरीश राणे के ऐसा कहने के साथ ही मंत्री ने काल कट कर दी। हरीश राणे से बात करने के बाद मंत्री इस सबके बारे में सोचने लगा। उसे उम्मीद तो थी कि ठाकुर उससे गद्दारी नहीं करेगा किन्तु उसे इस बात का भी एहसास था कि ठाकुर साला जब अपनों का ही नहीं हुआ तो भला उसका क्या होगा?
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
रितू और आदित्य इस वक्त दो अलग अलग पेड़ों पर चढ़े हुए थे। जहाॅ से उन दोनों को मंदिर के सामने का नज़ारा स्पष्ट दिख रहा था। विराज के साथ क्या क्या हुआ था ये उन दोनो ने अपनी ऑखों से देखा था। दोनो ही विराज के लिए बेहद चिंतित व परेशान थे। उन दोनो को उम्मीद नहीं थी कि अचानक ही ऐसा कुछ हो सकता है।
विराज को इस तरह मार खाते देख आदित्य तुरंत पेड़ की शाखा से नीचे कूदने ही वाला था कि रितू ने उसे रुकने का इशारा किया था। उसे उसने समझाया था कि उसके जाने से भी इस वक्त कुछ नहीं हो सकता था। उल्टा वो खुद भी विराज की तरह पकड़ में आ सकता है।
आदित्य को रितू से ये उम्मीद नहीं थी किन्तु फिर उसे भी लगा कि रितू सही कह रही है। इस वक्त वहाॅ पर जाना खतरे से खाली नहीं था। संभव था विराज उसकी वजह से कमज़ोर ही पड़ जाता।
दोनो के पास अब कोई दूसरा चारा नहीं था। हलाॅकि रितू के मन में कुछ और ही चल रहा था। उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि वो इस सिचुएशन पर ज्यादा गंभीर नहीं हुई है। कदाचित उसे बस समय का इंतज़ार था।
आदित्य की नज़र सहसा शेखर के मौसा यानी केशव की तरफ पड़ी। केशव जी के साथ तीन जीपों में आदमी थे जिनके हाॅथों में बंदूख, लट्ठ तथा हाॅकी जैसे हथियार नज़र आ रहे थे। जिन पेड़ों पर ये दोनो चढ़े हुए थे उन्हीं पेड़ों के बीच से होते हुए केशव और उसके आदमियों की जीपें गुज़री थीं। ये देख कर आदित्य ने रितू की तरफ देखा। रितू ने भी आदित्य की तरफ देखा मगर उसने कोई रिएक्शन नहीं दिया। पता नहीं क्या चल रहा था उसके मन में??
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
इधर मेरी तरफ।
मैं समझ गया था कि मेरा प्रतिद्वंदी ताकत के मामले में मुझसे कहीं ज्यादा है। अतः अब ताकत के साथ साथ दिमाग़ से भी काम लेना ज़रूरी था। उधर वो आदमी मेरी तरफ इस तरह देख देख कर मुस्कुरा रहा था जैसे वो मुझे सचमुच में चींटी ही समझ रहा हो और जब चाहे मुझे मसल कर रख दे किन्तु अभी वो मुझे जैसे खिला रहा था।
"क्यों बच्चे दर्द तो नहीं हो रहा न?" उस आदमी ने ब्यंगात्मक लहजे में मुस्कुरा कर कहा___"वैसे अभी तो मैने तुम पर ताकत से कोई वार ही नहीं किया है। वरना तुम इस तरह सही सलामत खड़े न रहते बल्कि अपने हाॅथ पैर की हड्डियाॅ तुड़वाए ज़मीन पर पड़े रहते।"
"मैं भी अभी तक सिर्फ देख ही रहा था कि।" मैने कहा___"भाड़े के कुत्तों में कितना दम होता है?"
"अच्छा।" वह तिलमिलाया तो ज़रूर मगर फिर भी मुस्कुरा कर ही बोला___"तो क्या देखा और क्या समझ आया तुझे?"
"यही कि।" मैने मुस्कुरा कर कहा___"कुत्ते तो कुत्ते ही होते हैं वो कभी शेर का शिकार नहीं कर सकते।"
"यू बास्टर्ड।" वो बुरी तरह क्रोध में आते हुए मेरी तरफ बढ़ा और गुस्से में आग बबूला होते हुए मुझ पर हमला कर दिया।
मैं तो अब पूरी तरह से सतर्क हो चुका था और उसके किसी भी हमले के लिए पूरी तरह से तैयार था। जैसे ही उसने मेरी नाॅक में अपने दाहिने हाॅथ का पंच मारा मैं फुर्ती से एक तरफ हुआ और बिजली की सी स्पीड से पलट कर उसकी तरफ पीठ करते हुए उसके उस हाॅथ को दोनो हाॅथों से पकड़ कर अपने दाहिने कंधे पर रखा और फिर पूरी ताकत से नीचे की तरफ ज़ोर का झटका दिया। परिणामस्वरूप कड़कड़ की आवाज़ के साथ ही उसका हाॅथ बीच से टूट गया। हाॅथ के टूटते ही वह हलाल होते बकरे की तरह चिल्लाया।
जबकि मैंने इतने पर ही बस नहीं किया बल्कि फुर्ती से घूम कर उसके पीछे आया और इससे पहले कि वो कुछ समझ पाता मैने फुर्ती से उसके सिर को दोनो हाथों से पकड़ा और ज़ोर से बाॅई तरफ को झटक दिया। नतीजा ये हुआ कि एक बार पुनः फिज़ा में कड़कड़ की आवाज़ हुई और उसकी गर्दन एक तरफ को झूल गई, साथ ही वह लहराते हुए ज़मीन पर गिरा और शान्त पड़ गया। उसे देख कर अब कोई भी कह सकता था कि वो मर चुका है।
आस पास खड़े उसके सभी हट्टे कट्टे आदमी ये नज़ारा देख कर आश्चर्यचकित रह गए। किसी को भी इस सब पर यकीन न आया कि ये दो पल में अचानक क्या हो गया है? अपनी अपनी जगह पर खड़े सबके सब बुत से बन गए थे। ऊपर मंदिर के दरवाजे के जस्ट सामने ही दोनो तरफ से एक एक आदमी से घिरी नीलम व सोनम दीदी भी ये सब देख कर हक्का बक्का रह गई थी।
"ओये मारो रे इस हरामज़ादे को।" सहसा फिज़ा में छा चुके सन्नाटे को एक आदमी ने ज़ोर से चिल्लाते हुए भंग किया, बोला___"इसने अब्दुल को जान से मार दिया। इस साले की हड्डी पसली तोड़ डालो सब।"
उस आदमी की इस बात से सब जैसे होशो हवाश में आए और फिर चारो तरफ से मेरी तरफ दौड़ पड़े। मैं जानता था कि सबके सब साले साॅड हैं। इस वक्त गुस्से में ये सब सचमुच मेरी हड्डियाॅ तोड़ सकते थे। अभी वो सब मेरे नज़दीक पहुॅचे भी नहीं थे कि तभी बहुत सारे आदमी हाॅथों में बंदूख, लट्ठ व हाॅकी जैसे हथियार लिए चारो तरफ से उन सब आदमियों पर टूट पड़े। मैं समझ गया कि ये सब केशव जी के आदमी हैं। ये देख कर मैने राहत की साॅस ली।
केशव जी के वो आदमी बिना कुछ सोचे समझे तथा बिना कुछ बोले एकदम से टूट पड़े थे उन हट्टे कट्टे आदमियों पर। नतीजा ये हुआ कि वो सब जिन जिन के निशाने पर आए वो सब देखते ही देखते लहू लुहान नज़र आने लगे। मंदिर के बाहर इतने सारे आदमी और उनके शोर से वातावरण गूॅज उठा। अभी ये सब हंगामा मचा ही हुआ था कि तभी अलग अलग दिशाओं से एक बार पुनः वैसे ही हट्टे कट्टे आदमी निकल कर आए और केशव जी के उन आदमियों पर पिल पड़े। हलाॅकि उन सबके हाॅथ खाली थे किन्तु जल्द ही उनके हाॅथों में भी हथियार नज़र आने लगे। उन लोगों ने केशव जी के आदमियों से उनके ही हथियार छीन कर उन पर प्रहार करना शुरू कर दिया था।
केशव जी के जिन आदमियों के पास बंदूखें थी वो गोलियाॅ बरसाए जा रहे थे। जिसका नतीजा ये हो रहा था कि जिन पर भी गोली लगती वो सीधा यमलोक ही पहुॅच रहा था। इधर मैं आस पास देख रहा था कि आदित्य व रितू दीदी कहाॅ हैं? मैं हैरान था कि वो दोनो अभी तक आए क्यों नहीं? मैं खुद भी इस मुठभेड़ में किसी न किसी से लड़े जा रहा था।
"सबके सब अपनी अपनी जगह रुक जाओ।" सहसा इस आवाज़ की गर्जना को सुन कर मैं चौंक गया। पलट कर देखा तो ऊपर जहाॅ पर नीलम व सोनम दीदी खड़ी थी उनके पास ही बड़े पापा यानी अजय सिंह खड़े थे।
उनके हाॅथ में रिवाल्वर थी जिसे वो सोनम की कनपटी पर लगाए खड़े थे। उन आदमियों का पता ही नहीं था जो इसके पहले नीलम व सोनम दीदी को कवर किये खड़े थे। शायद सबके आते ही वो भी लड़ाई में शामिल हो गए थे।
अजय सिंह की ज़ोरदार आवाज़ को सुन कर सबके सब जहाॅ के तहाॅ रुक गए। उन सब के रुकते ही अजय सिंह के साथ आए फिरोज़ खान के सभी आदमियों ने केशव तथा उनके आदमियों को गन प्वाइंट पर ले लिया। सब कुछ एकदम से बदल गया। अभी कुछ ही देर पहले तो हालात हमारे हक़ नज़र आए थे किन्तु अब बाज़ी फिर से पलट गई थी।
"तुम लोगों ने बहुत तमाशा कर लिया है।" शान्त पड़ गए माहौल में अजय सिंह की आवाज़ गूॅजी___"अब ज़रा मेरी बात कान खोल कर सुनो सबके सब। अगर मेरे आदमियों के अलावा कोई दूसरा आदमी अपनी जगह से हिला तो समझ लो वो अपनी मौत का जिम्मेदार खुद होगा।"
अजय सिंह की इस बात से कोई कुछ न बोला। कुछ देर की ख़ामोशी के बाद सहसा अजय सिंह ने मेरी तरफ देखा और फिर मुस्कुरा कर कहा___"तो आख़िर तुम मेरी पकड़ में आ ही गए भतीजे? बहुत सताया तुमने और बहुत ज्यादा तड़पाया भी मुझे। मगर कोई बात नहीं, मैं उस सबका ब्याज सहित हिसाब ले ही लूॅगा। मगर उससे पहले मैं ज़रा अपनी बेटियों से तो मिल लूॅ।"
कहने के साथ ही अजय सिंह ने एक हाॅथ बढ़ा कर नीलम को उसके सिर के बालों से पकड़ कर ज़ोर से अपनी तरफ खींचा। नीलम के हलक से दर्द में डूबी चीख़ निकल गई। हलाॅकि उसकी व सोनम दीदी दोनो की ही हालत बहुत ख़राब हो चुकी थी। उनके चेहरों पर मौत जैसा ख़ौफ़ मानो ताण्डव सा कर रहा था।
"क्यों बिटिया रानी।" अजय सिंह ने दाॅत पीसते हुए नीलम के चेहरे के पास अपना चेहरा लाते हुए कहा___"तुम्हारे इस बाप के लौड़े में ऐसी क्या कमी नज़र आ गई थी जो तुम दोनो बहनों ने अपने इस भाई के लौड़े को थाम लिया?"
"अजय सिंह।" मैं पूरी शक्ति से चिल्लाया___"ज़ुबान सम्हाल कर बात कर। ये मत भूल कि जिससे तू इस घिनौने तरीके से बात कर रहा है वो खुद तेरी ही बेटी है। मेरे दिलो दिमाग़ में तेरे लिए जो इज्ज़त बाॅकी थी उसे भी आज तूने ये घिनौनी बात बोल कर खत्म कर ली है। यकीनन तू इस संसार का सबसे गंदा और सबसे पापी इंसान है, बल्कि इंसान ही नहीं है तू, राक्षस है राक्षस।"
"मैं चाहूॅ तो इसी वक्त तेरी इस कड़वी ज़ुबान को तेरे हलक से निकाल कर चील कौवों को खिला दूॅ।" मेरी बातों से तिलमिलाया हुआ अजय सिंह गुर्राया___"मगर जैसा कि मैने कहा न कि पहले मैं अपनी बिटियों से मिल लूॅ, उसके बाद तुझसे भी अच्छे से मिलूॅगा।"
"आप सच में बहुत गंदे हैं डैड।" नीलम ने बुरी तरह रोते हुए कहा___"काश ये सब सच न होता। अच्छा होता कि इस सबके बारे में मुझे पता ही न चलता।
रितू दीदी ने बहुत अच्छा किया था जो उन्होंने आप जैसे गंदे व पापी माॅ बाप को ठुकरा दिया है और अभी जिस तरीके से आपने मुझे वो शब्द कहे हैं उससे आपने बता दिया कि आपके मन में अपनी ही बहू बेटियों के प्रति क्या है?"
"इन सब बातों का अब कोई मतलब नहीं रह गया है बिटिया रानी।" अजय सिंह ने अजीब भाव से कहा___"ये सच है कि मैंने हमेशा अपने ही घर की औरतों व बेटियों को अपने नीचे सुलाने की ख्वाहिश की है। मगर इसमें बुरा क्या किया है मैने ? हर इंसान को अपनी इच्छा पूरी करने का हक़ होता है। मैने भी अपनी इच्छाओं को पूरा ही तो करना चाहा है। ख़ैर छोंड़, ये बता कि तुझे यहीं पर नंगा करूॅ या हवेली ले जाकर आराम से तुझे लड़की से औरत बनाऊॅ?"
"तू कुत्ते की मौत मरेगा अजय सिंह।" मैं पूरी शक्ति से दहाड़ते हुए बोला___"तेरे जिस्म में कीड़े पड़ेंगे। तू सड़ सड़ कर मरेगा। तू वासना और हवश में इतना अंधा हो चुका है कि तुझे रिश्ते नाते भी नज़र नहीं आ रहे हैं।"
"कुत्ते की मौत तो मैं तुझे मारूॅगा भतीजे।" अजय सिंह ने कहा___"लेकिन उससे पहले मैं तेरी माॅ गौरी, तेरी बहन निधी, व तेरी चाची करुणा इन तीनो को जी भर के तेरे ही सामने पेलूॅगा, वो भी आगे पीछे दोनो तरफ से। उसके बाद उन सबको रंडी बज़ार में बेंचूॅगा भी, तब तुझे मारूॅगा।"
"अपने जैसे ही हिजड़ों की फौज ले कर आया है।" मैने कहा___"और इन्हीं हिजड़ों की फौज के बलबूते पर तू इतना कुछ बोल पा रहा है। तुझमें अगर दम है तो मुझसे खुद मुकाबला कर।"
"इसे मारो रे।" अजय सिंह ज़ोर से चिल्लाया___"इस हराम के पिल्ले को इतना मारो कि हगने मूतने के भी काबिल न बचे। बहुत देर से ये हरामज़ादा बड़ बड़ किये जा रहा है। पहले इसकी ही हड्डियाॅ तोड़ो।"
अजय सिंह के कहने की देर थी। चारो तरफ से वही हट्टे कट्टे आदमी मेरी तरफ बढ़ते हुए आ गए। वो चार थे और मैं अकेला। मैं अजय सिंह की उन अश्लीलतापूर्ण बातों से बुरी तरह क्रोध व गुस्से से भन्ना उठा था। जैसे ही एक मेरी तरफ झपटा मैने बिजली की तरह फुर्ती दिखाई और उछल कर एक ज़बरदस्त फ्लाइंग किक उसकी गर्दन पर जड़ दी। उसके मुख से घुटी घुटी सी चीख निकली साथ ही कड़कड़ की आवाज़ भी हुई। ज़मीन पर औंधे मुह जब वह गिरा तो फिर उठ न सका।
ये देख कर नीलम को उसके बालों से पकड़े अजय सिंह हक्का बक्का रह गया। कदाचित उसे मुझसे ऐसे किसी चमत्कार की स्वप्न में भी उम्मीद नहीं थी। वो ऑखें फाड़े मुझे देखने लगा था। इधर उस आदमी के गिर कर शान्त पड़ते ही बाॅकी तीन थोड़ी देर के लिए ठिठके और फिर एक साथ मेरी तरफ झपटे। मैंने अपनी जगह से ऊॅची छलांग लगाई तथा हवा में ही कलाबाज़ी खाते हुए उन तीनों के बीच से बाहर उनके पीछे आ खड़ा हुआ। जबकि वो तीनों ही झोंक में आकर आपस में ही टकरा गए।
"रुक जा सुअर की औलाद।
" तभी अजय सिंह चिल्लाया___"वरना मेरे एक ही इशारे पर मेरे साथ आए मेरे ये सब हथियारों से लैश आदमी तुझे पल भर में गोलियों से भून कर छलनी कर देंगे।"
"तू मुझे गोलियों से छलनी नहीं कर सकता कुत्ते।" मैने कहने के साथ ही अपनी टाॅग चला दी एक की पीठ पर। जिसकी पीठ पर लात का प्रहार पड़ा था वो अपने साथ दूसरे को साथ लिए ही ज़मीन पर गिर गया, जबकि तीसरा अभी पलटा ही था कि मैने पैर के घुटने का वार उसके पेट में किया तो वो बिलबिला उठा। साथ ही बोलता भी जा रहा था ज़ोर से____"तेरे लिए तो मैं एक तुरुप के इक्के की तरह हूॅ न। मुझे बंधक बना कर ही तो तू बाॅकी सबको मुम्बई से यहाॅ बुलाएगा। अगर मैं ही मर गया तो तू कैसे बुला सकेगा उन सबको?"
"ज्यादा बकवास न कर समझा।" अजय सिंह पहले तो सकपकाया, फिर चिल्लाया___"मैं कहता हूॅ ये उछलना कूदना बंद कर वरना मैं नीलम को यहीं पर नंगा कर दूॅगा।"
"नहींऽऽऽ।" अपने बाप की ये बात सुन कर नीलम तो बुरी तरह रोते हुए चीखी ही उसके साथ में सोनम भी चीख पड़ी थी। इधर अजय सिंह का वाक्य जैसे ही मेरे कानों से टकराया मैं एकदम से रुक गया। मैं जानता था कि अजय सिंह ये ज़रूर कर सकता था। उसे इस वक्त अपनी व अपनी बेटी की इज्ज़त की कोई परवाह नहीं थी।
"तुम मेरी इज्ज़त की परवाह मत करो राज।" सहसा नीलम रोते हुए चिल्लाई___"वैसे भी मुझे इस नीच आदमी की ऐसी बेहूदा बातें अपने लिए सुन कर जीने की इच्छा मर गई है। इस लिए तुम मेरी चिन्ता मत करो और इन सारे राक्षसों का वध कर दो।"
"ओहो क्या बात है।" अजय सिंह चमका___"देखो तो क्या इज्ज़त दी है मेरी बिटिया रानी ने मुझे। ख़ैर कोई बात नहीं, पर हाॅ मरना तो है ही तुझे और तुझे ही बस क्यों बल्कि तेरी बड़ी बहन को भी मरना होगा। मुझे ऐसी औलाद के जीने मरने से अब कोई फर्क़ नहीं पड़ेगा जो अपने ही माॅ बाप के मौत का सामान करती फिरे। बचपन से अब तक मैंने तुम दोनो को हर चीज़ दी है। जिस चीज़ पर तुम दोनो ने हाॅथ रखा उस चीज़ को मैने तुम दोनो के नाम कर दी। मगर बदले में दिया क्या तुम दोनो ने?? अरे देने की तो बात दूर बल्कि मेरे दुश्मन का साथ देकर मेरी मौत चाही तुम दोनो ने। अरे माॅ बाप जैसे भी हों माॅ बाप ही होते हैं। ख़ैर जाने दो, मुझे इस बात का दुख नहीं है कि इस लड़के ने मेरा इतना ज्यादा नुकसान करके मेरा जीना हराम किया है बल्कि इस बात का दुख है कि मेरी अपनी बेटियाॅ मुझे और अपनी माॅ तथा भाई को त्याग कर इसका साथ दिया। इस लिए इसकी सज़ा तो मिलेगी तुम दोनो को। मगर उससे पहले तुम दोनो के साथ मैं वो करूॅगा जो दुनियाॅ में किसी भी बाप ने न किया होगा।"
"तुझ जैसे इंसान से और किसी बात की उम्मीद भी क्या की जा सकती है।
" नीलम ने सहसा ज़हरीले भाव से कहा___"जो अपनी ही औलाद को अपने नीचे सुलाना चाहता हो उसके जैसा नीच व पापी दूसरा कौन होगा? उस दिन सोचते सोचते मेरा बुरा हाल हो गया था कि आख़िर ऐसा क्या हो गया है जिसकी वजह से दीदी ने अपने ही माॅ बाप को त्याग दिया है, मगर उस रात जब मैने अपने कानों से सब कुछ सुना तो मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। इतना बड़ा धोखा, इतना बड़ा कुकर्म किया तूने जिसके बारे में अगर किसी को पता चल जाए तो तुझ पर थूॅकना तक पसंद न करे।"
"हरामज़ादी कुतिया।" अजय सिंह बुरी तरह तमतमा गया, और फिर दो तीन थप्पड़ जल्दी जल्दी नीलम के गालों पर जड़ दिया उसने। ये देख कर सोनम उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़ी तो सहसा वहीं पर आ गए फिरोज़ खान ने उसे गन प्वाइंट पर रख लिया। इधर नीलम के गालों पर थप्पड़ पड़ते ही मेरा खून भी खौल गया।
"लड़की पर क्या हाॅथ उठाता है नीच इंसान?" मैने दहाड़ते हुए कहा___"असली मर्द है तो इधर आ और मुझसे दो दो हाॅथ कर। कसम पैदा करने वाले की तेरे जिस्म की एक एक हड्डियों को न तोड़ा तो अपने बाप ठाकुर विजय सिंह की औलाद नहीं।"
"तेरी गर्मी का इलाज अब करना ही पड़ेगा।" अजय सिंह पलट कर गुर्राया, फिर उन्हीं हट्टे कट्टे आदमियों की तरफ देखते हुए कहा___"खड़े क्या हो तुम लोग? इस साले को इतना मारो कि इसकी सारी हेकड़ी निकल जाए।"
बस फिर क्या था? उन तीनों ने मुझे धोना शुरू कर दिया। मैं कुछ करने की हालत में नहीं था। अगर कुछ करता तो अजय सिंह फिर से नीलम के साथ कुछ उल्टा सीधा करने लगता। अभी मैं मार खा ही रहा था कि सहसा मेरे अलावा किसी और की भी चीख गूॅजी वहाॅ। मैने सिर उठा कर देखा तो चौंक गया। आदित्य एक आदमी को बुरी तरह मारे जा रहा था। आदित्य के अचानक ही इस तरह आ जाने से बाॅकी खड़े सब भौचक्के से रह गए।
"तुम यहाॅ क्यों आ गए आदी?" मैंने सहसा हतास भाव से कहा___"तुम्हें यहाॅ नहीं आना चाहिए था।"
"ज्यादा बकवास मत करो समझे।" आदित्य ने तीखे भाव से कहा___"मैं कायर नहीं हूॅ जो इतनी देर से चुपचाप तुम्हें इस तरह मार खाते देखता रहता। बहुत देर से रितू के कहने पर रुका हुआ था मगर अब और नहीं रुक सकता था मेरे यार। तेरा साथ भी न दिया तो साला धिक्कार है मुझ पर।"
मैं अब क्या कहता उसे। उधर आदित्य के आ जाने से अजय सिंह भी चौंका था। उसे नहीं पता था कि आदित्य कौन है, किन्तु इतना तो वो समझ ही गया था कि आदित्य कदाचित मेरा ही साथी है। अतः उसने सीघ्र ही ऊॅची आवाज़ में मुझसे कहा___"अपने साथी को बोल भतीजे कि ज्यादा उछल कूद न करे। अगर यहाॅ पर ये तेरी तरह मार खाने ही आया है तो चुपचाप अब ये भी मार खाए।"
"तुझे तो मैं कुत्ते की तरह मारूॅगा हरामज़ादे।
" आदित्य चीखा___"इतनी देर से देख रहा हूॅ कि तू भाड़े के इन टट्टुओं की वजह से ही शेर बना हुआ है, जबकि खुद तुझमें कितनी मर्दानगी है वो तो तू भी जानता ही होगा साले। कितनी बार मेरे दोस्त ने तुझे लड़ने के लिए ललकारा मगर तू इससे लड़ने नहीं आया। मतलब साफ है कि तू इससे डरता है और खुद भी जानता है कि तू अपने भतीजे से टक्कर नहीं ले सकता। हाहाहाहा राज यार, तेरा ये ताऊ तो कायर और डरपोंक निकला।"
"ठाकुर साहब।" सहसा फिरोज़ खान बोल पड़ा___"आप कहें तो एक ही झटके में इस आदमी का काम तमाम कर दूॅ। इसकी हिम्मत कैसे हुई आपसे ऐसे बात करने की?"
"कोई बात नहीं खान।" अजय सिंह बोला___"इसे भी खुजली हो रखी है। इस लिए इसकी भी धुनाई शुरू करवा दो। कुछ देर में ही हमसे रहम की भीख माॅगने लगेगा।"
"ठीक है ठाकुर साहब।" फिरोज़ खान ने कहा और फिर अपने आदमियों को हुक्म दिया।
कुछ ही देर में हम दोनो की धुनाई शुरू हो गई। ये देख कर नीलम व सोनम दीदी बुरी तरह रोये जा रही थी और साथ ही अजय सिंह से हमें ना मारने के लिए कहे भी जा रही थी। मगर उनके कहने का अजय सिंह पर कोई असर न हुआ।
अभी ये सब हो ही रहा था कि एकाएक ही संपूर्ण वातावरण में पुलिस सायरन की आवाज़ें आने लगी। इन आवाज़ों को सुन कर अजय सिंह व फिरोज़ खान बुरी तरह चौंक पड़े। उन्हें समझ न आया कि यहाॅ पुलिस कैसे आ गई? देखते ही देखते मंदिर के चारो तरफ से ढेर सारे पुलिस वालों का हुजूम उमड़ पड़ा।
"तुम सबको पुलिस ने चारो तरफ से घेर लिया है।" सहसा तभी माइक पर किसी की आवाज़ गूॅजी___"इस लिए सब अपने अपने हथियार नीचे रख कर अपने आपको पुलिस के हवाले कर दो। वरना हमें तुम सब पर गोलियाॅ चलाने में भी कोई हिचकिचाहट नहीं होगी।"
"ठाकुर साहब।" सहसा बुरी तरह घबराया हुआ फिरोज खान कह उठा___"ये पुलिस वाले यहाॅ कैसे आ गए? अब हम सब पुलिस के द्वारा पकड़ लिए जाएॅगे। कुछ कीजिए ठाकुर साहब। आप तो जानते हैं कि पुलिस को मेरी और मेरे आदमियों को बड़ी शिद्दत से तलाश है। मैं और मेरे साथी पुलिस के हाॅथ नहीं लगना चाहते। खुदा के लिए कुछ कीजिए।"
"मुझे पता है कि।" अजय सिंह ने सोचने वाले भाव से कहा___"इन पुलिस वालों को यहाॅ किसने बुलाया है? हाॅ खान, ये सब रितू का किया धरा है। उसी कुतिया ने इन पुलिस वालों को बुलाया है। इतनी देर से देख रहा हूॅ वो हरामज़ादी कहीं दिखाई नहीं दे रही है। ज़रूर पुलिस वालों के साथ ही होगी।"
"किसी का भी किया धरा हो ठाकुर साहब।" फिरोज़ खान ने कहा___"मामला तो बिगड़ ही गया है अब। मगर समझदार आदमी वही है जो ऐसे समय पर भी खुद को बचा ले और अपने दुश्मन को मात दे दे।"
"सही कहा तुमने खान।" अजय सिंह ने कहा____"मुझे ऐसा ही कुछ करना होगा। अरे हाॅ एक काम करता हूॅ। इन दोनो को यहाॅ से अपने साथ ले चलते हैं। वो साला इन्हीं दोनो को लेने आया था न।
अब जब इन्हें नहीं ले जा पाएगा तो यकीनन ये उसकी ज़बरदस्त हार होगी। अब वो इन दोनो के लिए मेरे पास सिर के बल आएगा।"
"बिलकुल सही कहा आपने।" फिरोज़ खान ने कहा__"किन्तु अब हमें देर नहीं करनी चाहिए। यहाॅ से इन दोनो को लेकर बड़ी होशियारी से खिसक लेना चाहिए।"
"ठीक है।" अजय सिंह ने कहा___"चलो इन दोनो को एक एक करके उठा कर ले चलते हैं। इससे पहले कि पुलिस हम तक पहुॅचे हम पीछे के इस वाले हिस्से से निकल लेते हैं। मुख्य रास्ते की तरफ जाना यकीनन खतरे से खाली नहीं होगा। मेरी कार इसी वाले हिस्से की तरफ है। अच्छा हुआ कि कार ज्यादा पीछे की तरफ उस मुख्य रास्ते की तरफ नहीं खड़ी की थी मैने।"
अजय सिंह की बातें सुन कर नीलम व सोनम दीदी बुरी तरह घबरा गई और उनके चंगुल से छूटने के लिए छटपटाने लगी थी। मगर कदाचित अजय सिंह को उनसे इसी बात की उम्मीद थी। यही वजह थी कि उसने मजबूती से उन्हें पकड़ा हुआ था। किन्तु अब उसकी बात से फिरोज़ ने भी सोनम दीदी को पकड़ लिया। यानी एक एक को ले कर मंदिर के बगल से सीढ़ियाॅ उतरने लगे वो दोनो।
नीलम व सोनम जब खुद को उनके चंगुल से न छुड़ा पाई तो पूरी शक्ति से चिल्लाने लगीं। इधर पुलिस के आ जाने से मैं और आदित्य पहले तो हैरान हुए उसके बाद तुरंत ही बात समझ में आ गई कि ये सब रितू दीदी का लास्ट बैकअप प्लान था जिसके बारे में उन्होंने सस्पेंस बनाया हुआ था उस समय। ख़ैर पुलिस वालों ने सबको घेर लिया। इधर नीलम व सोनम दीदी के चिल्लाने से मेरा और आदित्य का ध्यान उस तरफ गया तो देखा अजय सिंह व फिरोज़ खान ज़बरदस्ती उन दोनो को अपने साथ लिए सीढ़ियाॅ उतरते चले जा रहे थे।
मैंने आदित्य की तरफ देखा और फिर हम दोनो ही उनकी तरफ तेज़ी से दौड़ पड़े। अभी हम सीढ़ियों के पास भी न पहुॅचे थे कि सहसा वातावरण में गोली चलने की आवाज़ आई और साथ ही चीख़ की भी। हम दोनो ये देख कर चौंके कि सोनम दीदी को साथ लिए उतर रहा फिरोज़ खान का अचानक ही बैलेंस बिगड़ा और उसके हाॅथ से सोनम का हाॅथ छूट गया, साथ ही वह सीढ़ियों पर लुढ़कता हुआ नीचे चला गया। उसके हाॅथ से उसका रिवाल्वर छूट कर जाने कहाॅ गिर कर गुम सा हो गया था। उसके बाएॅ पैर की टाॅग से खून बहता हुआ नज़र आया।
गोली की आवाज़ और फिरोज़ खान को यूॅ लुढ़कते देख अजय सिंह बुरी तरह उछल पड़ा। भौचक्का सा पहले तो उसने फिरोज़ खान को लुढ़कते हुए देखता रहा उसके बाद जैसे उसे होश आया तो फौरन ही इधर उधर नज़र घुमाई उसने। किन्तु तब तक देर हो चुकी थी। उसी वक्त सीढ़ियों के बगल से ही रितू दीदी मानो प्रगट सी हुई और तेज़ी से अपने बाप के पैर को पकड़ कर झटक दिया। जिसका नतीजा ये हुआ कि बुरी तरह घबरा कर चीखते हुए अजय सिंह भरभरा कर सीढ़ियों पर पिछवाड़े के बल गिर पड़ा। किन्तु उसके साथ ही नीलम भी गिर पड़ी थी।
क्योंकि अजय सिंह ने उसका हाॅथ उस वक्त तक छोंड़ा ही नहीं था। छोंड़ा भी तो तब जब उसके साथ ही साथ नीलम भी अनबैलेंस होकर गिर पड़ी थी। नीलम के मुख से दर्द में डूबी कराह निकल गई।
ये सब हो ही रहा था कि हम दोनो भी उनके पास पहुॅच गए। आदित्य ने तो आते ही फिरोज़ खान को धर लिया। जबकि मैने सीढ़ियों पर गिरने के बाद उठ रहे अजय सिंह को उसके कालर से पकड़ कर उठाया और बिना कुछ बोले पैर के घुटने का वार उसके पेट पर जड़ दिया। अजय सिंह दर्द से चीख पड़ा।
"रुक जाओ राज।" सहसा मेरे क़रीब पहुॅचते ही रितू दीदी ने कहा____"ये इंसान यकीनन सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा ही शिकार है मगर, उससे पहले मुझे इस नीच व पापी इंसान से दो चार बातें तो कर लेने दो।"
दीदी की बात सुन कर मैने अजय सिंह को छोंड़ दिया। अजय सिंह इस वक्त अजीब सी हालत में था। ऐसी हालत में कि उसका वर्णन करना भी कठिन था। इधर मेरे एक तरफ हटते ही रितू दीदी अपने बाप के सामने आ कर खड़ी हो गई।
"सुना है कि माॅ बाप से बढ़ कर।" फिर रितू दीदी ने बड़े ही गंभीर भाव से कहा___"संपूर्ण सृष्टि में कोई नहीं होता। यहाॅ तक कि भगवान भी नहीं। इसी लिए माॅ बाप को श्रेस्ठ व महान कहा जाता है। मगर माॅ बाप भी ऐसे ही महान नहीं बन जाते हैं बल्कि अच्छे कर्मों से महान बनते हैं। तुम नीलम से कह रहे थे कि तुमने हमें सब कुछ दिया है बदले में हमने क्या दिया? इसका जवाब ये है कि हर माॅ बाप अपने बच्चों के लिए बहुत कुछ करते हैं, यहाॅ तक कि ज़रूरत पड़ने पर अपना बलिदान भी दे देते हैं। मगर बच्चे सच में उनके लिए कुछ नहीं कर पाते ऐसा। मगर हम ऐसे नहीं थे, हमने बचपन से लेकर अब तक आप दोनो को दुनिया का सबसे अच्छा माता पिता माना मगर जब सच का पता चला तो रूह काॅप गई हमारी। दुनियाॅ में ऐसे कौन माता पिता हैं जो अपनी ही बेटियों को अपने नीचे सुलाने के बारे में सोचते हैं? मुझे अपनी सिर्फ एक अच्छाई के बारे में बता दो अजय सिंह जो कि तुमने अपने आज तक के जीवन में की हो। अगर तुमने अपनी एक भी अच्छाई के बारे में बता दिया तो इसी वक्त तुम्हारी ये बेटी अपने माॅ बाप के पास वापस लौट आएगी।"
रितू दीदी की इस बात पर अजय सिंह कुछ बोल न सका। किन्तु हाॅ कठोर भाव से देख ज़रूर रहा था। जबकि उसकी इस कठोरता से देखने की ज़रा भी परवाह न करते हुए कहा दीदी ने कहा___"तुम वो इंसान हो अजय सिंह जिसने एक हॅसते खेलते, भरे पूरे व खुशहाल परिवार का बेड़ा गर्क कर दिया। इतना तो मैने भी अपनी ऑखों से देखा था कि विजय चाचा कभी भी तुमसे ऑखें मिला कर बात नहीं करते थे। हम इतने भी अबोध व अज्ञानी नहीं थे कि हमें कुछ समझ न आए। सच्चाई का पता चलने के बाद ही सही मगर मुझे पिछली वो सब बातें याद आईं जो मेरे सामने होती थीं।
तब उनके बारे में नहीं सोचती थी क्योंकि तब तुम्हारी सिखाई हुई बातें मुझे उनके बारे में सोचने की भी ज़रूरत महसूस नहीं कराती थी। मगर अब सब कुछ खुली किताब की तरह हो गया है। तुमने धन दौलत के लालच में तथा गौरी चाची को हाॅसिल करने के जुनून में अपने देवता जैसे भाई को ज़हरीले सर्प से डसवा कर मौत के घाट उतार दिया। उसके बाद झूठ मूठ कर आरोप लगा कर मेरी देवी समान चाची को चरित्रहीन बना दिया। इतना ही नहीं एक रात तुम दोनों की बातों को जब दादा जी ने सुन लिया और वो जब गुस्से से तुम्हारे कमरे में आ धमके और तुम्हें खरी खोटी सुनाने लगे तो तुमने उन्हें भी जान से मार देने की धमकी दी। ये भी कहा कि अगर उन्होंने किसी के सामने ज्यादा गला फाड़ने की कोशिश की तो तुम उनकी छोटी बेटी यानी कि नैना बुआ को उठवा लोगे। दादा जी उस वक्त ये सोच कर डर गए कि तुम वाकई में ऐसा कर सकते हो। जो अपने भाई का न हुआ वो भला किसका हो जाएगा? दादी जी रोते हुए अपने कमरे में चले गए। उन्होंने दादी से तुम्हारा सारा काला चिट्ठा बताया जिसे सुन कर बेचारी दादी का भी बुरा हाल हो गया। दूसरे दिन अभय चाचा स्कूल पढ़ाने गए हुए थे, उस समय दादा दादी तैयार होकर विजय चाचा की दी हुई कार से जब कहीं जाने लगे तो तुमने पूछा कि वो कहाॅ जा रहे हैं तब उन्होंने एक बार फिर से गुस्सा होते हुए साफ साफ तुमसे कहा कि वो पुलिस स्टेशन जा रहे हैं। ताकि तुम्हारी रिपोर्ट कर सकें। दादा जी की बात सुन कर तुम्हारी हवा निकल गई। तुम फौरन ही माॅम के पास गए और माॅम को सारी बात बताई तब माॅम ने कहा कि इससे बचने का एक ही तरीका है कि दादा दादी को खत्म कर दिया जाए। तुम्हारे पास इसके अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं था। इस लिए फौरन ही अपनी कार लेकर निकल लिये। रास्ते में ही तुमने अपने इसी फिरोज़ खान नाम के साथी को फोन लगाया और इसे दादा दादी को जान से मार देने की सुपारी दी। इसने फौरन ही तुम्हारी बात मान कर रास्ते में ही ट्रक द्वारा दादा जी की कार को टक्कर मार दी। ट्रक की ज़ोरदार टक्कर से दादा जी की कार सड़क पर ही दो तीन पलटियाॅ खाईं। ये देख कर ये खान फौरन ही वहाॅ से ट्रक लेकर फरार हो गया। सुनसान सड़क पर उलटी पड़ी कार के अंदर दादा दादी खून से लथपथ बेहोश पड़े थे। तभी कोई वाहन वाला उसी रास्ते से आया और उसने जब वो सब देखा तो उसने इसकी सूचना पुलिस को दी। पुलिस वहाॅ पहुॅची और कार के अंदर खून से लथपथ पड़े दादा दादी को चेक किया तो वो दोनो ही ज़िंदा थे उस वक्त। अतः फौरन ही उन्हें बेहतर इलाज़ के लिए गुनगुन ले गए। तहकीक़ात में ही पता चला कि जिनका एक्सीडेंट हुआ था वो दरअसल हल्दीपुर के ठाकुर गजेन्द्र सिंह बघेल तथा उनकी धर्मपत्नी इन्द्राणी सिंह बघेल हैं। इस बात का पता चलते ही तुम्हें सूचित किया पुलिस ने।
तुम ये जान कर बुरी तरह घबरा गए कि दादा दादी तो ज़िंदा हैं अभी और वो पुलिस को सब कुछ बता भी देंगे। अतः तुम फौरन ही गुनगुन के लिए हवेली से रवाना हो गए। ख़ैर दादा दादी के सिर पर बड़ी गंभीर चोंटें आई थी जिसकी वजह से वो दोनो ही कोमा में चले गए। डाक्टर अब भला क्या कर सकता था। उसने साफ कह दिया था कि अब तो बस समय का ही इन्तज़ार करें कि कब वो दोनो कोमा से बाहर आते हैं। डाक्टर की बात सुन कर तुमने फिलहाल के लिए तो राहत महसूस की मगर तुम भी जानते थे कि कोमा एक ऐसी चीज़ होती है जिसमें गया इंसान कभी भी होश में आ सकता है। यानी तुम्हें डर था कि दादा दादी अगर कोमा से बाहर आ गए तो तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा। अतः तुमने फिर से माॅम के परामर्श किया और फिर दादा दादी को बेहतर इलाज़ का कह कर एक ऐसी जगह ले गए जहाॅ के बारे में ज्यादा किसी को पता ही नहीं था। ख़ैर छोंड़ो ये सब, तुम्हारे जुर्म की दास्तान तो बहुत लम्बी है मगर मैंने तुमसे ये सब इस लिए कहा है कि तुम जान सको कि मुझे सब कुछ पता है। तुमने इतने अपराध व पाप किये हैं कि इसके लिए शायद भगवान भी माफ़ नहीं करेगा और करना भी नहीं चाहिए।"
रितू दीदी की बात सुन कर अजय सिंह का मुह लटक गया इस बार। उसके चेहरे पर शर्म व अपमान के भाव एकाएक ही उभर आए थे। तभी इस बीच नीलम आई और रितू के गले लग कर सिसक सिसक कर रोने लगी। सोनम दीदी भी सिसक रही थी। उधर आदित्य ने फिरोज़ खान को मार मार कर अधमरा कर दिया था। उसमें अब हिलने तक की शक्ति नहीं बची थी। तभी दो पुलिस वाले आए और फिरोज़ खान को उठा कर ले गए।
फिरोज़ खान के जितने भी आदमी थे तथा प्रतिमा ने जो आदमी भेजे थे उन सबको पुलिस ने पकड़ लिया था। ये सारी पुलिस फोर्स गुनगुन में नये नये आए एसीपी रमाकान्त शुक्ला के द्वारा लाई गई थी। सबको पकड़ने के बाद एसीपी रमाकान्त शुक्ला चल कर अजय सिंह के पास आया।
"अब आपके भी ससुराल चलने का वक्त हो चुका है ठाकुर साहब।" एसीपी ने मुस्कुराते हुए कहा___"उम्मीद करता हूॅ कि ससुराल में आप खुद को बेहतर महसूस करेंगे।"
"नये नये आए लगते हो ऑफिसर।" अजय सिंह ने उसकी तरफ तिरछी नज़र से देखते हुए कहा___"इस लिए इतना अकड़ रहे हो। मगर ज्यादा खुशफहमी में मत रहना कि तुम मुझे सुसराल में ज्यादा देर तक रख पाओगे।"
"जानता हूॅ।" एसीपी पुनः मुस्कुराया___"मगर फिलहाल तो मेरे साथ चलना ही पड़ेगा आपको। बाद का बाद में देखा जाएगा। वैसे भी हम तो यहाॅ फिरोज़ खान जैसे वान्टेड मुजरिम को ही पकड़ने आए थे। हमें सूचना मिली थी कि यहाॅ पर वो मुज़रिम अपने पूरे दलबल के साथ मौजूद है। इस लिए आ धमके यहाॅ। मगर हमें क्या पता था कि उसके साथ साथ मुझे आप जैसी कमीनी शख्सियत को भी धर लेना पड़ेगा।"
"तमीज़ से बात करो ऑफिसर।
" अजय सिंह बुरी तरह तिलमिलाते हुए तीखे भाव से बोला___"वरना ऐसा न हो कि इस बददमीजी के लिए तुम्हें बाद में पछताना पड़े।"
"रस्सी जल गई मगर कसबल बाॅकी हैं अभी।" एसीपी ने कठोर भाव से कहा___"वैसे तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूॅ कि मैं किसी के बाप से भी नहीं डरता। इस लिए मुझ पर धौंस जमाने की सोचना भी मत। वरना मेरे हाॅथ में आया हुआ मुजरिम मुख से कम बल्कि पिछवाड़े से ज्यादा चिल्लाता है। अब इज्ज़त से चलो मेरे साथ वरना ले जाने के तरीके तो हम पुलिस वालों को बड़े शानदार भी आते हैं।"
एसीपी के गरम होते मिजाज़ को देख कर अजय सिंह अंदर ही अंदर अपमान का कड़वा घूॅट पी कर रह गया। फिर उसने आग उगलती ऑखों से पहले मुझे देखा फिर रितू दीदी को उसके बाद एसीपी रमाकान्त शुक्ला के साथ चल दिया। कुछ दूर जाने के बाद सहसा अजय सिंह रुका और फिर पलट कर बोला___"अभी तो मैं जा रहा हूॅ मगर जल्द ही लौटूॅगा और इस बार जब लौटूॅगा न तो तुम में से किसी को भी ज़िंदा नहीं छोंड़ूॅगा।"
अजय सिंह की ये बात सुन कर मैं, आदित्य, रितू दीदी व सोनम दीदी ने तो कुछ न कहा किन्तु नीलम को जाने क्या हुआ कि वो तेज़ी से अपने बाप के पास गई और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता "चटाऽऽक"। अजय सिंह का दाहिना गाल झन्ना गया।
"ये तमाचा मामूली भले ही है।" फिर नीलम ने गुर्राते हुए कहा___"मगर ये तुम्हें इस बात की याद ज़रूर दिलाएगा कि तूने क्या पाप किया है जिसके तहत ये इनाम के रूप में मिला है तुझे तेरी ही बेटी से। अब जा यहाॅ से, मुझे तेरी शक्ल भी देखना अब गवाॅरा नहीं है।"
अजय सिंह से इतना कहने के बाद रोती हुई नीलम हमारे पास आ गई जबकि अपनी ही बेटी से ऐसा इनाम पा कर अजय सिंह मानो गर्त में डूबता चला गया। वह फिर रुका नहीं बल्कि एसीपी के साथ दूर होता चला गया। उसके जाते ही हम सब भी एक तरफ चल पड़े। मगर तभी गज़ब हो गया।
वातारण में धांय से गोली चलने की आवाज़ हुई और फिर फिज़ा में नीलम की चीख भी गूॅज गई। दरअसल नीलम के थप्पड़ मारने पर अजय सिंह अपमान में जल उठा था। वो एसीपी के साथ ही बगल से चल रहा था। तभी उसकी नज़र एसीपी के होलेस्टर में फॅसी उसकी रिवाल्वर पर पड़ी थी। अजय सिंह ने पलक झपकते ही जैसे निर्णय ले लिया था और फिर बेहद फुर्ती से उसने एसीपी के होलेस्टर से रिवाल्वर निकाला और पलट कर उसने नीलम पर गोली चला दी थी। हम में से किसी को भी इसकी उम्मीद नहीं थी। उधर गोली चलने की आवाज़ से एसीपी भी बौखला गया था। उसने जैसे ही पलट कर अजय सिंह की तरफ देखा तो चौंक पड़ा। कारण अजय सिंह ने मुस्कुराते हुए खुद ही उसका रिवाल्वर उसे दे दिया। एसीपी उसके इस बिहैवियर से दंग रह गया था।
गोली नीलम की पीठ के दाहिने भाग के थोड़ा सा नीचे लगी थी। नीलम की पीठ से खून की तेज़ धार बहने लगी थी।
वो लहरा कर गिर ही जाती अगर मैने फुर्ती से उसे पकड़ न लिया होता। सिचुएशन एकदम से ही बदल गई थी। नीलम को गोली लगने से हम सब बुरी तरह घबरा गए थे। उसकी प्रतिपल बिगड़ती हालत से हम सब रो पड़े। मैने उसे अपनी गोंद में उठा लिया और तेज़ी से मंदिर के पीछे खड़ी अपनी कार की तरफ भाग चला। मेरे पीछे ही बाॅकी सब दौड़ने लगे थे।
पुलिस और एसीपी ने सबको पकड़ा था किन्तु केशव जी तथा उनके साथ आए लोगों को नहीं पकड़ा था। ये मेरे लिए हैरानी की बात थी। किन्तु इस वक्त उनसे इसके बारे में पूछने का किसी को होश न था। रितू व सोनम दीदी बुरी तरह रोये जा रही थी। सीघ्र ही मैं नीलम को लिए कार के पास पहुॅचा। आदित्य ने जल्दी से कार का पिछला गेट खोला तो मैने नीलम को पिछली सीट पर किसी तरह लेटाया और जगह बनाते हुए खुद भी सीट पर बैठ गया। सीट पर बैठने के बाद मैने नीलम को खुद से छुपका लिया तथा उसकी ठीठ पर हाॅथ रख कर दबा दिया ताकि खून ज्यादा बहने न पाए। मेरे बैठते ही आदित्य ने कार की ड्राइंविंग सीट सम्हाली।
केशव जी ने रितू दीदी से कहा कि वो सोनम दीदी को अपनी कार में बैठा लेंगे। क्योंकि मेरी कार में आगे की सीट पर रितू दीदी बैठ गई थी और पीछे अब जगह ही नहीं थी। किन्तु सोनम दीदी न मानी। वो बुरी तरह रोये जा रही थी और कह रही थी कि वो नीलम के पास ही रहेंगी। मैने भी ज्यादा समय बरबाद न करते हुए गेट की तरफ खिसक लिया। सोनम दीदी दूसरी तरफ से आकर नीलम के पैरों की तरफ सीट पर ही बैठ गईं। ख़ैर सबके बैठते ही आदित्य ने कार को तेज़ी से दौड़ा दिया। हमारे पीछे पीछे ही केशव जी तथा उनके आदमी जीपों में आ रहे थे।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
"ये तुम क्या कह रहे हो राणे?" अपने आवास के ड्राइंग रूम में लैण्डलाइन फोन के रिसीवर को कान से लगाए मंत्री ने बुरी तरह चौंकते हुए कहा था____"ठाकुर और उसके आदमियों को पुलिस पकड़ कर ले गई?"
"..............।" उधर से हरीश राणे ने कुछ कहा।
"क्या कह रहे हो तुम।" चौधरी हैरान___"वहाॅ पर भारी मात्रा में पुलिस आई हुई थी?? मगर पुलिस वहाॅ आई कैसे? हमारा मतलब है कि पुलिस को वहाॅ पर किसने बुलाया होगा? एक मिनट राणे....एक मिनट, हम सब समझ गए। ये ज़रूर उस थानेदारनी का काम होगा। उसी ने पुलिस को बुलवाया होगा। ठाकुर के इतने सारे आदमियों को पंगु बना देने का यही तो सबसे ज़बरदस्त तरीका था राणे। साली तगड़ा गेम खेल गई। एक ही झटके में सारा खेल ही खत्म कर दिया उसने।"
"............।" उधर से राणे ने फिर कुछ कहा।
"ओह तो ठाकुर ने जाते जाते अपनी ही बेटी को गोली मार कर लहूलुहान कर दिया।" चौधरी के चेहरे पर मौजूद भावों में परिवर्तन हुआ___"और अब विराज एण्ड पार्टी ठाकुर की उस लड़की को मरने से बचाने के लिए फौरन ही हास्पिटल लेकर आ रहे हैं। उन्हें आने दो राणे, वो ज़रूर यहीं आएॅगे।
ताकि गुनगुन के ही किसी अच्छे से हास्पिटल में उसे भर्ती करा सकें और उसका बेहतर से बेहतर इलाज़ करा सकें। उन्हें आने दो यहाॅ हम उन सबका बहुत अच्छे से स्वागत करेंगे। तुम बस उनके पीछे ही रहना और हमें हालातों की ख़बर देते रहना।"
"..............।" राणे ने उधर से फिर कुछ कहा।
"वो सब हम देख लेंगे राणे।" चौधरी ने कहा___"हम कमिश्नर से इस बारे में पता करेंगे तथा ठाकुर से भी मिलेंगे। अगर उसने हमसे ये कहा कि वो ये सब करने के बाद ही इस सबके बारे में बताने वाला था तो ज़रूर उसकी ज़मानत करवाएॅगे हम। वरना भला हमें क्या पड़ी है उसे जेल से छुड़ाने की? जिस काम के लिए हमने उससे संपर्क बनाया था वो काम तो तुमने बखूबी कर ही दिया है और अब हमें पल पल की ख़बर भी दे रहे हो कि हमारे दुश्मन कहाॅ आ रहे हैं। इस लिए अब ज्यादा फिक्र की बात ही नहीं है।"
"..............।" उधर से हरीश राणे ने कुछ कहा।
"हाॅ ये भी सही कहा तुमने।" चौधरी ने कहा___"यानी हमें इस वक्त अभी उन पर हाॅथ नहीं डालना चाहिए। बल्कि उनके असल ठिकानों के बारे में पता करना चाहिए। उसके बाद ही हमें उन पर कार्यवाही करनी चाहिए। ये तुमने सही सलाह दी है राणे। बात भी सही है, अभी अगर हमने उन पर हाॅथ डाला तो संभव है कि इससे हम पर या हमारे बच्चों पर ही कोई संकट आ जाए। क्या पता उसका कोई आदमी हमारी गतिविधियों पर नज़र रखे हुए हो, उस सूरत में वो हमें ही नुकसान पहुॅचा सकता है। अतः ये ज़रूरी है कि हम अभी चुप ही रहें और उसके असल ठिकाने का तुम्हारे द्वारा पता करने की कोशिश करें।"
"..................।" उधर से राणे ने फिर कुछ कहा।
"ठीक है राणे।" फिर चौधरी ने कहा___"अब ऐसा ही करेंगे। तुम बस उनके पीछे ही लगे रहना और हाॅ ये बताने की आवश्यकता नहीं है कि उनसे ज़रा सावधान रहना।"
इसके साथ ही चौधरी ने रिसीवर वापस केड्रिल पर रख दिया। इस वक्त उसके चेहरे पर राहत के भाव थे। खुशी की एक अलग ही चमक उसके चेहरे पर दिखाई देने लगी थी। रिसीवर रखने के बाद वह आया और फिर से सोफे पर बैठ गया। उसके सामने ही अगल बगल के सोफों पर अवधेश, अशोक व सुनीता आदि बैठे हुए थे।
"हमारे इस काम में उस जासूस के लिए ये सब करना कोई मुश्किल काम नहीं था।" फिर मंत्री ने शिगार सुलगाने के बाद कहा___"और ना ही ये ऐसा केस था जिसमें उसे अपना माथा पच्ची करना पड़ता। ये सब तो हम भी कर सकते थे किन्तु तब जब करने की स्थित में होते। ख़ैर, जो भी हो, अच्छी बात ये है कि हालात अब हमारे हक़ में बहुत हद तक आ चुके हैं।"
"क्या कहा राणे ने?" अशोक के पूछने पर चौधरी ने सबको सब कुछ बता दिया। सारी बातें जानने के बाद उन तीनों के भी चेहरों पर राहत व खुशी के भाव उभर आए।
"हालात तो वाकई हमारे पक्ष में हैं चौधरी साहब।" अशोक ने कहा___"और ये हमारे लिए खुशी की बात भी है।
किन्तु ठाकुर के साथ आज जो कुछ भी हुआ वो अगर न होता तो यकीनन आज उसकी गिरफ्त में उसका भतीजा तथा उसकी बेटी होती। उसके बाद वो हमें इस बात की जानकारी देता। कहने का मतलब ये कि इतना कुछ हो जाने के बाद हम अतिसीघ्र ही अपने दुश्मन से मिलते और उसके कब्जे से अपनी हर चीज़ ले भी लेते। लेकिन ऐसा हो नहीं सका, पुलिस ने ऐन मौके पर आकर सारा खेल ही ख़राब कर दिया।"
"इस मामले में पहली बार पुलिस का हाॅथ भी दिखाई दिया है चौधरी साहब।" अवधेश ने कहा____"और जिस तरह से इतनी सारी पुलिस फोर्स को लेकर वो एसीपी वहाॅ पहुॅचा था इससे ज़ाहिर होता है कि कहीं न कहीं पुलिस का भी इस मामले में दखल है। बल्कि ये कहना चाहिए कि शुरू से ही दखल था। ये अलग बात है कि इसके पहले पुलिस ने खुले तौर पर इस बात को ज़ाहिर नहीं किया था।"
"ये बात तो मैने उसी दिन कही थी।" सहसा अशोक ने तपाक से कहा___"कि संभव है कि पुलिस इस सारे मामले में गुप्त रूप से शामिल हो और आज इस बात का सबूत के रूप में पता भी चल गया हमें।"
"हम कमिश्नर से इस बारे में अभी बात करेंगे।" मंत्री ने कहने के साथ ही अपना मोबाइल निकाला____"उसे अब साफ साफ बताना ही पड़ेगा कि माज़रा क्या है तथा उसने हमें धोखे में रखने की हिम्मत कैसे की?"
कहने के साथ ही मंत्री ने पुलिस कमिश्नर को काल लगा कर मोबाइल अपने कान से लगा लिया। दूसरी तरफ काफी देर तक रिंग जाने के बाद काल रिसीव की गई।
"जी कहिए मंत्री जी।" उधर से कमिश्नर की आवाज़ उभरी___"आज इस नाचीज़ को कैसे याद किया आपने?"
"ये ड्रामेबाज़ी छोंड़ो कमिश्नर।" चौधरी ने सपाट लहजे में कहा___"और ये बताओ कि ये सब क्या चक्कर चला रहे हो तुम?"
"च..चक्कर???" उधर से कमिश्नर का चौंका हुआ स्वर उभरा____"ये आप क्या कह रहे हैं मंत्री जी?"
"देखो कमिश्नर।" चौधरी ने तीखे भाव से कहा___"हमें फालतू की बकवास बिलकुल भी पसंद नहीं है। तुम अच्छी तरह जानते हो और समझते भी हो कि हम किस बारे में बात कर रहे हैं?"
"बड़ी अजीब बात कर रहे हैं आप मंत्री जी।" उधर से कमिश्नर ने कहा___"भला जिस बात को आप बताएॅगे ही नहीं उस बात के बारे में मैं कैसे कुछ जान पाऊॅगा? आप तो जानते हैं कि इंसान अंतर्यामी तो होता ही नहीं है।"
"हम हल्दीपुर में आधा घंटा पहले घटी घटना के बारे में बात कर रहे हैं।" चौधरी ने मन ही मन दाॅत पीसते हुए कहा___"अब ये मत कहना कि तुम इस घटना के बारे में भी नहीं जानते।"
"ओह तो आप उस घटना की बात कर रहे हैं?" उधर जैसे कमिश्नर की अब बात समझ में आई थी, बोला___"उस घटना के बारे में तो मुझे अच्छी तरह पता है मंत्री जी। लेकिन आपका उस घटना से क्या लेना देना है? जबकि हमारे डिपार्टमेंट के एसीपी ने तो वहाॅ पर एक मोस्ट वान्टेड अपराधी को पकड़ने के लिए घेराबंदी की थी और फिर अपराधी को पकड़ कर अपने साथ ले भी आए।
"
"किस अपराधी को पकड़ने गई थी तुम्हारी पुलिस?" मंत्री ने पूछा।
"यूॅ तो शहर कई तरह के मुजरिमों से भरा पड़ा है मंत्री जी मगर।" उधर से कमिश्नर ने कहा___"हमारी पुलिस फोर्स ने जिस मोस्ट वान्टेड अपराधी को पकड़ने के लिए हल्दीपुर के पास वाले गाॅव माधोपुर में घेराबंदी की थी उसका नाम फिरोज़ खान है। इस नाम के अपराधी के बारे में तो आपने भी काफी सुना होगा। आप तो जानते हैं कि ये अपराधी कब से पुलिस व कानून के लिए सिर का दर्द बना हुआ था। आज हमारे ही एक विश्वासपात्र मुखबिर ने हमें बताया कि फिरोज़ खान अपनी गैंग के साथ इस समय माधोपुर में मौजूद है। बस फिर क्या था, हमने उसे पकड़ने के लिए अभी हाल ही में नये नये आए एसीपी रमाकान्त शुक्ला को भेज दिया। मगर मेरी समझ में ये नहीं आता कि आपको इस मामले से क्या लेना देना हो गया? अगर मुनासिब समझें तो मुझे भी बताइये मंत्री जी।"
"नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।" चौधरी ने बात को टालने की गरज़ से कहा___"वैसे पता चला है कि तुम्हारी पुलिस ने हल्दीपुर के ठाकुर अजय सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया है। भला ये क्या चक्कर है कमिश्नर? क्या वो ठाकुर भी फिरोज़ खान की तरह मोस्ट वान्टेड अपराधी है?"
"ठाकुर अजय सिंह को तो ज़रूरी पूॅछताॅछ के लिए गिरफ्तार किया गया है मंत्री जी।" उधर से कमिश्नर ने कहा___"दरअसल हमारे मुखबिर ने बताया था कि फिरोज़ खान हल्दीपुर के ठाकुर अजय सिंह की कार में ही बैठा हुआ था। इस लिए उन्हें गिरफ्तार करना पड़ा। तहकीक़ात में उनसे पूछा जाएगा कि फिरोज़ खान नाम का खतरनाक अपराधी उनकी कार में उनके साथ क्यों बैठा हुआ था? आख़िर उनका फिरोज़ खान से क्या संबंध है?"
"ओह तो ये बात है।" चौधरी को मानो बात समझ में आ गई, बोला____"वैसे सुना है कि ठाकुर और उसके भतीजे के बीच किसी मामले में तगड़ी रंजिश है। सुना तो ये भी है कि ठाकुर की बेटी खुद तुम्हारे पुलिस डिपार्टमेंट की इंस्पेक्टर है और वो अपने ही माॅ बाप के खिलाफ़ होकर ठाकुर के दुश्मन भतीजे का साथ दे रही है।"
"बाॅकी सारी बातों के बारे में तो मुझे कुछ नहीं पता है मंत्री जी।" उधर से कमिश्नर ने कहा___"लेकिन ये सच है कि ठाकुर अजय सिंह की बेटी हमारे पुलिस डिपार्टमेंट में इंस्पेक्टर के रूप में कार्यरत है। बहुत ही इमानदार तथा बहादुर ऑफीसर है वो।"
"अब इस बारे में तो तुम्हें ही पता होगा कमिश्नर।" चौधरी ने कहा___"आफ्टरआल वो तुम्हारे पुलिस महकमे से है। चलो कोई बात नहीं, अच्छा अब हम फोन रखते हैं।"
इतना कह कर चौधरी ने काल कट कर दी। फिर बुझ चुके शिगार को सामने टेबल पर रखे ऐशट्रे में रखा और दूसरा शिगार निकाल कर सुलगा लिया। शिगार के दो तीन गहरे गहरे कश लेने के बाद उसने ढेर सारा धुआॅ ऊपर की तरफ उछाला।
"क्या कहा कमिश्नर ने चौधरी साहब?" अवधेश श्रीवास्तव पूछे बग़ैर न रह सका था।
"बेवकूफ़ बनाने की कोशिश कर रहा था हमें।" चौधरी ने कहा___"उस साले को ये पता ही नहीं है कि वो किसे बेवकूफ बनाने चला था? साला राजनीति का खेल हम खेलते हैं और वो हमसे राजनीति कर रहा था।"
"ऐसा क्या कह रहा था वो आपसे?" अशोक ने पूछा।
मंत्री ने उसे सारी बातें बता दी, उसके बाद उसने फिर से शिगार का एक कश लिया फिर बोला___"जबकि साफ पता चलता है कि सच्चाई क्या है? डिटेक्टिव राणे के अनुसार विराज एण्ड पार्टी ठाकुर की दूसरी बेटी को लेने गए थे। किसी तरह से इस बात की जानकारी ठाकुर को हुई और वह फिरोज़ खान को उसके गुर्गों के साथ माधोपुर जा धमका, जहाॅ पर उसका आमना सामना विराज एण्ड पार्टी से हुआ। विराज को अंदेशा रहा होगा कि उसका ताऊ उसे पकड़ने का ऐसा ही कुछ इंतजाम करके आएगा। इस बात को ध्यान में रखते हुए उन लोगों ने भी ठाकुर से बचने का उपाय सोचा होगा। ठाकुर की बेटी क्योंकि अब विराज के साथ ही है इस लिए ठाकुर से बचने के लिए उसने अपने पुलिस महकमें का सहारा लिया। उसे पता था कि पुलिस के आ जाने से अजय सिंह कुछ कर नहीं पाएगा। बात भी सही है कि पुलिस से पंगा करने का कोई मतलब ही नहीं था। यानी वो सब पुलिस की मदद से बड़े आराम से ठाकुर की दूसरी बेटी को ले आएॅगे और ठाकुर कुछ भी नहीं कर पाएगा।"
"यकीनन चौधरी साहब।" अवधेश ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"ठाकुर ने विराज एण्ड पार्टी को घेर कर पकड़ने का ज़बरदस्त प्लान बनाया था। ये अलग बात है कि बदकिस्मती से उसके उस ज़बरदस्त प्लान की खुद उसकी ही बेटी ने धज्जियाॅ उड़ा दी। इतना ही नहीं पुलिस को बुलवा कर वो अपनी छोटी को बहन को तो अपने साथ ले ही गई ऊपर से अपने बाप को भी गिरफ्तार करवा दिया।"
"लेकिन ठाकुर भी कम कमीना नहीं था।" अशोक ने झट से कहा___"पुलिस के साथ जाते जाते भी उसने एसीपी का रिवाल्वर निकाल कर अपनी छोटी बेटी को गोली मार दी। ये इस बात का सबूत है चौधरी साहब कि उस वक्त वह अपनी औलाद से किस क़दर ख़फा था और फिर गुस्से में आकर उसने बेटी को जान से मारने की कोशिश की। अगर समय रहते उसकी बेटी का विराज एण्ड पार्टी ने इलाज़ करवा लिया तब तो ठीक है वरना ठाकुर ने तो अपनी बेटी का काम तमाम कर ही दिया है समझिये।"
"जो भी होता है अच्छे के लिए ही होता है।" मंत्री दिवाकर चौधरी ने कहा___"इस सबकी वजह से हमारा फायदा ये हुआ है कि हमारा दुश्मन हमारे जासूस राणे की नज़र में आ गया है। राणे विराज एण्ड पार्टी के पीछे साये की तरह लगा रहेगा। अभी तो वो सब किसी हाॅस्पिटल में ही गए होंगे क्योंकि ठाकुर की बेटी को मौत से बचाना उन सबकी पहली प्राथमिकता होगी। उसके बाद वो यकीनन उस जगह जाएॅगे जहाॅ पर उन लोगों ने अपना ठिकाना बनाया होगा। राणे को जैसे ही उनके ठिकाने का पता चल जाएगा वैसे ही वो हमें सूचित कर देगा।
बस, उसके बाद क्या होगा ये बताने की ज़रूरत नहीं है शायद।"
"ये तो वाकई हमारे ही हक़ में है।" सहसा इस बीच सुनीता बोल पड़ी___"ठाकुर की घटना ने उसे भले ही करारी शिकस्त दी हो मगर इस सबमें हमारा यकीनन फायदा हो गया है। दूसरी बात जासूस राणे को इस काम के लिए बुलाने का भी बहुत अच्छा निर्णय साबित हुआ हमारा।"
"बिलकुल सही कहा तुमने।" चौधरी ने कहा___"अगर राणे को हमने बुलाया न होता तो हमें इतनी बड़ी सफलता हर्गिज़ भी नहीं मिल सकती थी। क्योंकि इस बात का हमें पता ही न चलता कि विराज एण्ड पार्टी और ठाकुर के बीच क्या हुआ है? ठाकुर का भी कोई भरोसा नहीं था कि वो हमें इस बारे में कुछ बताता भी या नहीं।"
"ख़ैर, जो भी हो।" अवधेश ने कहा___"इस सबसे हमें फायदा तो यकीनन ही हुआ है मगर इस बीच हमारे लिए ये सोचना भी महत्वपूर्ण है कि इस मामले में पुलिस का दखल किस उद्देश्य से हुआ है? क्या सचमुच ही वो मोस्ट वान्टेट अपराधी फिरोज़ खान को ही पकड़ने के उद्देश्य से वहाॅ पर पहुॅची थी या फिर इसके पीछे भी पुलिस की कोई ऐसी चाल थी कि वो एक तीर से दो शिकार कर सके। कहने का मतलब ये कि ज़ाहिर तौर पर उसने हमें यही दिखाया हो कि उसका दखल महज फिरोज़ खान को ही पकड़ना था जबकि असल में उसका मकसद कुछ और ही रहा हो, जिसका संबंध हमसे हो।"
"हो सकता है।" चौधरी के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभर आए____"किन्तु कमिश्नर की बातों से भी कुछ ज़ाहिर नहीं हो सका। या तो उसने जान बूझ कर हमें घुमा दिया है या फिर ऐसा कुछ हो ही न। यानी हो सकता है कि हम जिस चीज़ की शंका कर रहे हैं वो बेवजह ही हो।"
"शंका तो शंका ही होती है चौधरी साहब।" अशोक ने कहा___"भले ही वो बेवजह ही हो मगर हमारे मन में शंका तो है न। इस लिए जब तक हमें इस मामले में सच्चाई का पता नहीं चलता तब तक हमारी ये शंका हमारे अंदर से जाएगी भी नहीं।"
"चलो अगर ऐसा है भी।" चौधरी ने कहा___"तो वो आने वाले समय में ज़ाहिर तो हो ही जाएगा। तब हम देख लेंगे कि हमें उस बारे में क्या करना है। अभी के हालात में जो ज़रूरी है, हमे उस पर ज्यादा ध्यान देना है। हमें किसी भी कीमत पर अपने बच्चे तथा हमारे लिए डायनामाइट बने उन वीडियोज को हाॅसिल करना है। मौजूदा हालातों पर ग़ौर करें तो ये स्पष्ट हो चुका है कि बहुत जल्द राणे के द्वारा हमें इस सबमें सफलता मिलेगी।"
चौधरी की बात सुन कर सबके सिर सहमति में हिले। उसके बाद कुछ और इधर उधर की बातें हुई उन लोगों के बीच। फिर सब अपने अपने काम पर चले गए।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
इधर आदित्य ऑधी तूफान की तरह दौड़ाते हुए कार को हास्पिटल की तरफ लिए जा रहा था। नीलम की हालत की वजह से हम सब बेहद दुखी हो गए थे। मैं बार बार नीलम को पुकार रहा था। उसकी पलकें बार बार बंद हो जाती थी। मैने अपने एक हाॅथ की हॅथेली को नीलम की पीठ पर कस के लगाया हुआ था ताकि उसका खून न बहने पाए।
नीलम पहले तो दर्द और पीड़ा से कराह रही थी किन्तु अब वो प्रतिपल शान्त पड़ती जा रही थी। उसकी ये हालत देख कर मैं बदहवाश सा था और बार बार उसे पुकार रहा था। मेरे बाएॅ साइड ही नीलम के पैरों के पास बैठी सोनम दीदी अभी भी सिसक रही थीं। वो खुद भी पागलों की तरह नीलम को पुकारे जा रही थी।
रितू दीदी आगे बैठी हुई थी। उनके चेहरे पर भी पीड़ा के भाव उभर आते थे किन्तु उन्होंने खुद को सम्हाला हुआ था। उनके चेहरे पर मौजूद भाव प्रतिपल बदल रहे थे। कभी कभी तो ऐसे भाव उभर आते थे जैसे उन्होंने किसी बात के लिए कठोर फैसला किया हो। आदित्य फुल स्पीड से कार को भगा रहा था। तभी डैश बोर्ड के पास ही रखा मेरा मोबाइल फोन बज उठा। फोन के बजने से जैसे रितू दीदी की तंद्रा टूटी। उन्होंने हाॅथ बढ़ा कर मोबाइल उठाया और स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे मौसा जी नाम को देख कर काल रिसीव की उन्होंने।
उधर से मौसा जी ने जाने ऐसा क्या कहा कि रितू दीदी एकदम से चौंक पड़ी, साथ ही कार की खिड़की से इधर उधर देखने भी लगी थी। फिर उन्होंने ये कह कर फोन रख दिया कि___"आपने यकीनन ये बहुत बड़ी ख़बर दी है मौसा जी। किन्तु उसे बोलिए कि अगर संभव हो सके तो उसे पकड़ ले। आप भी जल्दी से उसके पास जाइये और जाकर उसे अपने कब्जे में ले लीजिए।"
"क्या हुआ रितू??" कार चलाते हुए आदित्य ने सहसा एक नज़र रितू दीदी की तरफ डालते हुए पूछा।
"मंत्री मेरी चेतावनी के बावजूद अपनी हरकतों से बाज नहीं आया।" रितू दीदी ने कहा___"उसने जब देखा कि वो खुद कुछ नहीं कर सकता है तो उसने अपने काम के लिए एक जासूस को बुलवाया और उस जासूस को हमारे पीछे लगा दिया।"
"ये क्या कह रही हो तुम?" आदित्य रितू की बात सुन बुरी तरह चौंका था, फिर बोला___"मगर तुम्हें ये सब कैसे पता चला?"
"मुझे नहीं।" रितू दीदी ने कहा___"बल्कि मौसा जी के एक आदमी को पता चला है। उसी ने बताया है मौसा जी को। दरअसल हम सब लोग तो वहाॅ से चले आए मगर मौसा जी का एक आदमी ग़लती से वहीं रह गया। मौसा जी बता रहे थे कि उनका वो आदमी उस वक्त अपना पेट साफ करने चला गया था। इसी बीच हम सब वहाॅ से जल्दबाज़ी में निकल आए। कुछ देर में जब वो अपना पेट साफ करके आया तो हम लोगों को दूर जाते हुए देखा उसने। वो वहाॅ से चलते हुए कुछ दूर आया। फिर उसने अपना मोबाइल निकाल कर मौसा जी को फोन करने ही वाला था कि तभी उसे किसी के बात करने की आवाज़ सुनाई दी। वो आवाज़ की दिशा में गया तो उसने देखा कि मंदिर से लगभग पचास मीटर की दूरी पर एक आदमी पेड़ की ओट में खड़ा किसी से फोन पर बातें कर रहा था। मौसा जी का आदमी उससे कुछ ही दूरी पर था। उसने उस आदमी के कुछ पास जाकर उसकी बातें सुन ली। उसकी बातों में डैड के अलावा हमारा भी ज़िक्र था, साथ ही वह जिससे बात कर रहा था उसे वह चौधरी साहब कह कर संबोधित कर रहा था।
मौसा जी के आदमी को उसकी बातों से समझ आ गया कि वो हम सबके पीछे ही लगा हुआ है। अतः उसने तुरंत ही इस बात की सूचना मौसा जी को फोन लगा कर दे दी।"
"ओह तो ये बात है।" आदित्य ने कहा।
"हाॅ, मैने अपने मुखबिरों को मंत्री तथा उसके सभी साथियों के पीछे लगाया हुआ था।" रितू दीदी ने कहा___"उन सबकी रिपोर्ट यही थी कि मंत्री या उसके साथियों ने ऐसा वैसा कुछ नहीं किया है। बल्कि उन सबकी दिन चर्या तथा कार्य सामान्य ही था। मुझे भी उम्मीद नहीं थी कि वो कमीना अपने इस काम के लिए किसी जासूस को हायर कर लेगा। मगर कोई बात नहीं, ये बहुत अच्छा हुआ कि मंत्री के उस जासूस का पता चल गया। कहते हैं कि ईश्वर जो भी करता है उसके पीछे कोई ठोस वजह ज़रूर होती है। वरना सोचने वाली बात है कि मौसा जी जिन आदमियों को अपने साथ लेकर आए थे उन आदमियों में से किसी एक को उस वक्त टायलेट क्यों आता? ये ईश्वर की ही मर्ज़ी थी कि उसे उस वक्त टायलेट आया और वो टायलेट के लिए हमसे दूर चला गया। उसके बाद जब वह आया तो हम सब उस जगह से निकल चुके थे जबकि वो वहीं छूट गया। ईश्वर हमारे साथ है आदित्य, वो नहीं चाहता कि किसी वजह से हम फॅस जाएॅ। हमें नहीं पता था कि मंत्री ने कोई जासूस हमारे पीछे लगाया हुआ है अतः ईश्वर इस सबके द्वारा हमें उस जासूस के बारे में भी बता दिया।"
"सचमुच।" आदित्य कह उठा___"कुदरत का हर काम हैरतअंगेज़ होता है। ख़ैर, अब उस जासूस का क्या करना है?"
"अभी तो फिलहाल उसे किसी भी तरह से पकड़ लेने के लिए मैंने मौसा जी से कहा है।" रितू दीदी ने कहा___"उसका पकड़ में आना भी बेहद ज़रूरी है वरना वो हमारा पीछा करता रहता और अंततः हमारे ठिकाने तक पहुॅच जाता। उसके बाद वो हमारे ठिकाने के बारे में मंत्री को बता देता। बस फिर तो खेल ही खत्म हो जाना था।"
"सचमुच।" आदित्य ने कहा___"बहुत बड़ी मुसीबत में फॅसने वाले थे हम सब।"
"हाॅ आदित्य।" रितू दीदी ने कहा___"मंत्री अपने दलबल के साथ अगर हमारे ठिकाने पर आ धमकता तो हम उस हालात में उस वक्त कुछ कर नहीं पाते और फिर हम सबके साथ मंत्री क्या सुलूक करता इसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता।"
"शुकर है।" आदित्य ने कहा___"ईश्वर ने हमें बचा लिया। अब तो यही दुवा करो कि वो जासूस मौसा जी की पकड़ में आ ही जाए। वरना अगर वो हाॅथ से निकल गया तो मुसीबत एक बार फिर से हम पर आ जाएगी। ईश्वर बार बार ऐसा संयोग नहीं बनाएगा।"
"सही कहा तुमने।" रितू दीदी ने कहा___"देखते हैं मौसा जी तथा उनके आदमी क्या करते हैं? इस वक्त तो हमें नीलम को बचाना है।"
"वैसे एक बात कहूॅ रितू।" आदित्य ने कहा___"तुम्हारे जैसा कमीना बाप मैने आज तक न कहीं देखा है और ना ही कहीं सुना है। खुद पापों की गठरी लिए फिरता है और अपनी ही बेटी के साथ......छिः..मुझे तो सोच कर ही ऐसे आदमी से घृणा हो रही है।"
"अगर मेरी बहन को कुछ हुआ न आदित्य।
" सहसा रितू दीदी के मुख से ज़हर में डूबे शब्द निकले___"तो उस इंसान का मैं वो हाल करूॅगी कि बड़े से बड़ा जल्लाद भी उसका हाल देख कर थर्रा जाएगा।"
"अब तो उसकी नियति ही ऐसी बन चुकी है।" आदित्य ने कहा___"कि उसकी जब भी मौत होगी तो यकीनन बहुत भयानक तरीके से होगी।"
आदित्य की बात पर रितू दीदी कुछ न बोली। किन्तु उनके चेहरे के भाव बता रहे थे कि अपने अंदर के तूफान को उन्होंने कितनी मुश्किल से रोंका हुआ है। मैं उन दोनों की सारी बातें सुन रहा था। तभी रितू दीदी ने किसी को फोन लगाया और उससे कुछ बातें की। आदित्य ने बहुत ही कम समय में कार को हाॅस्पिटल पहुॅचा दिया।
हाॅस्पिटल के सामने कार के रुकते ही मैने जल्दी से गेट खोला और नीलम को सावधानी से निकाल कर अपनी गोंद में लिया और बिना किसी की तरफ देखे हाॅस्पिटल की तरफ लगभग दौड़ते हुए जाने लगा। मेरे पीछे ही बाॅकी सब भी आ रहे थे। कुछ ही देर में मैं नीलम को लिए हाॅस्पिटल के अंदर आ गया। वहाॅ का माहौल देख कर ऐसा लगा जैसे वहाॅ के डाक्टर तथा कर्मचारी हमारा ही इन्तज़ार कर रहे थे। जल्द ही दो आदमी स्ट्रेचल लिये मेरे पास आए। मैने आहिस्ता से नीलम को स्ट्रेचर पर लिटा दिया। मेरे लेटाते ही वो दोनो आदमी स्ट्रेचर को तेज़ी से ठेलते हुए ले जाने लगे। मैं, आदित्य, रितू व सोनम दीदी भी साथ ही साथ चलने लगे थे। थोड़ी ही देर में वो दोनो आदमी नीलम को स्ट्रेचर सहित ओटी में ले गए। डाक्टर ने हम सबको ओटी के बाहर ही रोंक दिया और खुद अंदर चला गया।
हम चारो वहीं पर खड़े रह गए थे। हम चारों के मन में बस एक ही बात थी कि नीलम को कुछ न हो। अभी हम सब वहाॅ पर खड़े ही थे कि तभी वहाॅ पर एसीपी रमाकान्त शुक्ला भी आ गया। उसने आते ही रितू दीदी से नीलम के बारे में पूछा तो दीदी ने बता दिया कि अभी अभी उसे ओटी में ले जाया गया है। एसीपी ने रितू दीदी से कहा कि उसने समूचे हास्पिटल में अंदर बाहर पुलिस के आदमी सादे कपड़ों में तैनात कर दिये हैं। इस लिए अब किसी का ख़तरा नहीं है। एसीपी की बात सुन कर रितू दीदी ने उसे इसके लिए धन्यवाद किया। कुछ देर बाद एसीपी ये कह कर चला गया कि वो नीलम का हाल चाल लेने फिर आएगा।
एसीपी के जाने के कुछ देर बाद हम चारों वहीं गैलरी पर दीवार से सटी हुई रखी लम्बी चेयर्स पर बैठ गए। कुछ देर बाद मैं उठा और हाॅस्पिटल से बाहर पानी लाने के लिए चला गया। पानी लाकर मैने रितू दीदी व सोनम दीदी को दिया। उसके बाद उसी कुर्सी पर बैठ कर हम सब डाक्टर के बाहर आने का इन्तज़ार करने लगे। हम सबके लबों से बस एक ही दुवा निकल रही कि नीलम को कुछ न हो।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दोस्तो, आप सबके सामने अपडेट हाज़िर कर दिया है। आशा करता हूॅ कि आप सबको पसंद आएगा।
आप सबकी प्रतिक्रिया तथा आप सबके रिव्यू का इन्तज़ार रहेगा।
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट........
《 58 》
अब तक,,,,,,,
हाॅस्पिटल के सामने कार के रुकते ही मैने जल्दी से गेट खोला और नीलम को सावधानी से निकाल कर अपनी गोंद में लिया और बिना किसी की तरफ देखे हाॅस्पिटल की तरफ लगभग दौड़ते हुए जाने लगा। मेरे पीछे ही बाॅकी सब भी आ रहे थे। कुछ ही देर में मैं नीलम को लिए हाॅस्पिटल के अंदर आ गया। वहाॅ का माहौल देख कर ऐसा लगा जैसे वहाॅ के डाक्टर तथा कर्मचारी हमारा ही इन्तज़ार कर रहे थे। जल्द ही दो आदमी स्ट्रेचर लिये मेरे पास आए। मैने आहिस्ता से नीलम को स्ट्रेचर पर लिटा दिया। मेरे लेटाते ही वो दोनो आदमी स्ट्रेचर को तेज़ी से ठेलते हुए ले जाने लगे। मैं, आदित्य, रितू दीदी व सोनम दीदी भी साथ ही साथ चलने लगे थे। थोड़ी ही देर में वो दोनो आदमी नीलम को स्ट्रेचर सहित ओटी में ले गए। डाक्टर ने हम सबको ओटी के बाहर ही रोंक दिया और खुद अंदर चला गया।
हम चारो वहीं पर खड़े रह गए थे। हम चारों के मन में बस एक ही बात थी कि नीलम को कुछ न हो। अभी हम सब वहाॅ पर खड़े ही थे कि तभी वहाॅ पर एसीपी रमाकान्त शुक्ला भी आ गया। उसने आते ही रितू दीदी से नीलम के बारे में पूछा तो दीदी ने बता दिया कि अभी अभी उसे ओटी में ले जाया गया है। एसीपी ने रितू दीदी से कहा कि उसने समूचे हास्पिटल में अंदर बाहर पुलिस के आदमी सादे कपड़ों में तैनात कर दिये हैं। इस लिए अब किसी बात का ख़तरा नहीं है। एसीपी की बात सुन कर रितू दीदी ने उसे इसके लिए धन्यवाद किया। कुछ देर बाद एसीपी ये कह कर चला गया कि वो नीलम का हाल चाल लेने फिर आएगा।
एसीपी के जाने के कुछ देर बाद हम चारों वहीं गैलरी पर दीवार से सटी हुई रखी लम्बी चेयर्स पर बैठ गए। कुछ देर बाद मैं उठा और हाॅस्पिटल से बाहर पानी लाने के लिए चला गया। पानी लाकर मैने रितू दीदी व सोनम दीदी को दिया। उसके बाद उसी कुर्सी पर बैठ कर हम सब डाॅक्टर के बाहर आने का इन्तज़ार करने लगे। हम सबके लबों से बस एक ही दुवा निकल रही कि नीलम को कुछ न हो।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,,
उधर हवेली में।
ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठी प्रतिमा अपने मोबाइल से बार बार अपने पति अजय सिंह के मोबाइल पर फोन लगा रही थी किन्तु अजय सिंह का फोन बंद बता रहा था। अजय सिंह का फोन बंद बताने से प्रतिमा को किसी अनहोनी आशंका होने लगी थी। उसके चेहरे पर एकाएक ही गहन चिंता, परेशानी तथा बेचैनी के भाव उभर आए थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अजय ने अपना फोन क्यों बंद कर रखा है? वो अजय सिंह से फोन पर बात करके ये जानना चाहती थी कि वो इस वक्त कहाॅ है तथा बाॅकियों के हालात कैसे हैं? मगर अजय सिंह का फोन बंद बताने से प्रतिमा को अब प्रतिपल बेचैनी सी होने लगी थी। उसके मन में तरह तरह के ख़यालों का आवागमन शुरू हो गया था।
उसके सामने ही दूसरे सोफे पर शिवा किसी और ही दुनियाॅ में खोया हुआ नज़र आ रहा था।
उसे जैसे अपने माॅ बाप की कोई ख़बर ही नहीं थी। वो तो बस सोनम के ख़यालों में खोया हुआ था। नीलम व सोनम को अब तक तीन से चार घंटे हो गए थे। मगर वो दोनो अब तक वापस नहीं लौटी थी। किन्तु शिवा को जैसे समय का ख़याल ही नहीं था। वो तो बस अपनी ऑखों के सामने नज़र आ रहे सोनम के खूबसूरत चेहरे को ही अपलक देखे जा रहा था। हलाॅकि जब प्रतिमा ने उसे इस बात से अवगत कराया कि वो दोनो यहाॅ से भागने का सोच कर ही गई हो सकती हैं तो शिवा का दिल एकदम से बैठ सा गया था। बाद में प्रतिमा के ही निर्देश पर उसने कुछ नये आदमियों की मजबूत टीम बना कर उनके पीछे लगा दिया था।
"उफ्फ क्या करूॅ इस इंसान का।" सहसा तभी प्रतिमा की खीझी हुई इस आवाज़ से शिवा हकीक़त की दुनियाॅ में आया, जबकि प्रतिमा कह रही थी____"कभी कोई काम ठीक से नहीं कर सकते हैं। ये तो हद हो गई, इतना लापरवाह इंसान मैने आज तक नहीं देखा।"
"क्या हुआ माॅम?" शिवा ने प्रतिमा के एकाएक ही तमतमा गए चेहरे को देखते हुए कहा____"किस लापरवाह इंसान की बात कर रही हैं आप?"
"तुम्हारे बाप की।" प्रतिमा ने आवेश में कहा___"जो कि हद दर्ज़े का लापरवाह और बेवकूफ इंसान है।"
"अरे ये आप क्या कह रही हैं माॅम?" शिवा अपनी माॅ की बातों से बुरी तरह हैरान रह गया।
"सच ही तो कह रही हूॅ मैं।" प्रतिमा ने कहा___"वरना कौन ऐसा करता है कि इतनी ख़राब सिचुएशन में होकर अपना फोन ही बंद कर दे?"
"क्या मतलब???" शिवा जैसे चकरा सा गया।
"तुम्हारे बाप से फोन द्वारा पूछना चाहती थी कि वहाॅ के हालात कैसे हैं?" प्रतिमा ने कहा___"मगर महाशय का मोबाइल फोन ही ऑफ बता रहा है। अब तुम ही बताओ कि ऐसे हालात में कौन अपना फोन कर बंद करके रखता है?"
"बात तो आपने सही कही माॅम।" शिवा के चेहरे पर एकाएक सोचने वाले भाव उभरे____"ऐसे हालात में कोई भी अपना फोन ऑफ नहीं रख सकता। हाॅ अगर मोबाइल ही डिस्चार्ज़ हो गया हो तो अलग बात है। लेकिन माॅम मुझे यकीन है डैड अपना फोन ऑफ नहीं करेंगे ऐसे वक्त में। ज़रूर कोई बात हो गई होगी।"
"चुप कर तू।" प्रतिमा अंदर ही अंदर जाने क्यों बुरी तरह हिल गई, बोली___"जो मुह में आता है बिना सोचे समझे बोल देता है।"
"ऐसा नहीं है माॅम।" शिवा ने नर्म भाव से कहा___"लेकिन आप खुद सोचिए कि क्या डैड ऐसे वक्त में अपना फोन ऑफ कर सकते हैं, नहीं ना? उन्हें भी पता है कि हालात कितने गंभीर हैं। लेकिन ये भी सच है कि अगर डैड का फोन ऑफ बता रहा है तो ज़रूर कोई ऐसी बात होगी जिसके बारे में फिलहाल हमें कुछ भी पता नहीं है।"
शिवा की इस बात पर प्रतिमा तुरंत कुछ बोल न सकी। उसके चेहरे पर गहन सोचों के भाव ज़रूर उभर आए थे। जैसा सोच रही हो कि क्या सच में ऐसा कुछ हुआ होगा? उधर अपनी माॅम को सोचों में गुम देख कर शिवा पुनः कह उठा____"इस तरह बैठने से कुछ नहीं होगा माॅम। मुझे लगता है कि हमें डैड का पता करना चाहिए।
जैसा कि आपने मुझे बताया था कि आज विराज रितू दीदी के साथ नीलम व सोनम को लेने आने वाला है शायद, इसी लिए आपने उनके पीछे अलग से एक मजबूत टीम बना कर मेरे द्वारा भेजवाया था। वहीं दूसरी तरफ से डैड भी अपने साथ कुछ आदमियों को लिए आ रहे हैं। इस बात से यही ज़ाहिर होता है कि अगर विराज सचमुच आ रहा है तो डैड तथा हमारे आदमियों के साथ उसकी भिड़ंत अनिवार्य है। इस भिड़ंत में यकीनन हमारी जीत होगी। यानी कि अंततः विराज रितू दीदी के साथ पकड़ा ही जाएगा। उसके बाद डैड उन सबको फार्महाउस ले जाएॅगे। फार्महाउस पहुॅचने के बाद ही वो हमें फोन करने वाले थे। किन्तु उनके फोन बंद बताने से ऐसा प्रतीत होता है जैसे हमने जो उम्मीद की थी वो हुआ ही नहीं है।"
"नहीं नहीं।" प्रतिमा ने पूरी मजबूती से इंकार में सिर हिलाया, बोली___"ऐसा नहीं हो सकता बेटा। इस बार मैने और तेरे डैड ने उस विराज की सोच से बहुत आगे बढ़ कर प्लान बनाया था। मुझे उसकी सोच का अब अंदाज़ा हो चुका था, इसी लिए तो डबल बैकअप रखा था हमने। एक हमारे आदमियों का दूसरा तेरे डैड के साथ आए आदमियों का। डबल बैकअप के बाद तो जीत हमारी ही होनी निश्चित थी बेटा।"
"काश! ऐसा ही हुआ हो माॅम।" शिवा ने कहा___"उन सबके साथ साथ नीलम व सोनम भी तो पकड़ ली गई होंगी। उफ्फ! कितना भरोसा था मुझे कि सोनम ये गाॅव तथा हमारे खेते घूम कर वापस यहीं आएगी। मगर कदाचित नीलम ने उसे भी सब कुछ बता दिया था तभी तो दोनो एक साथ चली गईं। मगर अब मैं अपने दिल का क्या करूॅ माॅम? ये तो उसी का होकर रह गया है।"
शिवा की इस बात का प्रतिमा अभी कुछ जवाब देने ही वाली थी सहसा तभी ड्राइंग रूम में बड़े वेग से एक आदमी दाखिल हुआ। उसके चेहरे से ही लग रहा था कि वो कहीं से मैराथन दौड़ लगा कर आया है। बुरी तरह हाॅफ रहा था वह। प्रतिमा व शिवा उसे देख कर बुरी तरह चौंक पड़े।
"क्या बात है हैदर?" शिवा ने उसकी तरफ हैरानी से देखते हुए कहा___"तुम इतना हाॅफ क्यों रहे हो? और...और तुम यहाॅ कैसे, तुम तो टीम के साथ ही गए थे न?"
"हाॅ छोटे ठाकुर।" हैदर नाम के उस आदमी ने हाॅ में सिर हिलाते हुए कहा___"गया तो मैं टीम के साथ ही था। मगर,
"मगर क्या???" शिवा उतावलेपन में पूछ बैठा।
"सब कुछ गड़बड़ हो गया छोटे ठाकुर।" हैदर ने दीनहीन दशा में बोला____"ठाकुर साहब ने तो सबको पकड़ ही लिया था और बाज़ी भी हमारे ही हाॅथ में थी। मगर ऐन वक्त पर वहाॅ पुलिस की पूरी फौज आ गई और फिर एसीपी के निर्देश पर सबको हिरासत में ले लिया गया। यहाॅ तक कि ठाकुर साहब को भी वो एसीपी गिरफ्तार करके ले गया है। मैं किसी तरह छुपता छुपाता वहाॅ से निकल कर ये सब बताने के लिए आपके पास आया हूॅ।"
हैदर की बात सुन कर शिवा तथा प्रतिमा दोनो को ही जैसे साॅप सूॅघ गया। दोनो के ही चेहरों की हालत ऐसे हो गई जैसे कपड़े से पानी निचोड़ लेने पर कपड़े की हो जाती है।
प्रतिमा को तो ऐसा लगा जैसे दिल का दौरा पड़ जाएगा। उसकी ऑखों के सामने अॅधेरा सा छा गया। शिवा की नज़र जब प्रतिमा पर पड़ी तो वह अपने सोफे से उठ कर बड़ी तेज़ी से उसके पास आकर उसे सम्हाला। हालत तो उसकी भी ख़राब हो चुकी थी। किन्तु जवान खून था अभी इस लिए हैदर की इस डायनामाइट जैसी बात को हजम कर गया था।
"सब कुछ खत्म हो गया बेटा।" प्रतिमा अपने बेटे की बाहों में सिमटी एकदम से असहाय भाव से बोली___"अब कुछ भी शेष नहीं रहा। तेरी बहन रितू ने अपने महकमे का सहारा ले कर अपने बाप को एक और क्षति पहुॅचा दी। उसने अपने बाप के माथे पर एक और नाकामी की मुहर लगा दी। इस बात से ज़ाहिर होता है कि उसके दिल में अपने माॅ बाप के प्रति ज़रा सी भी जगह नहीं रह गई है।"
"मैं उस कुतिया को ज़िंदा नहीं छोंड़ूॅगा माॅम।" शिवा के मुख से सहसा गुर्राहट निकली___"डैड को जेल भिजवा कर उसने ये अच्छा नहीं किया है। भला उसकी हमसे क्या दुश्मनी है माॅम, दुश्मनी तो विराज से है।"
"मैडम, ठाकुर साहब ने गुस्से में आकर अपनी छोटी बेटी नीलम को गोली भी मार दी है।" सहसा हैदर ने ये कह कर मानो धमाका सा किया____"नीलम की हालत बहुत ही गंभीर है। उसे वो लोग यकीनन हास्पिटल ले गए होंगे।"
"ये क्या कह रहे हो तुम??" प्रतिमा हैदर की ये बात सुन कर सकते में आ गई। चेहरा सफेद फक्क पड़ गया।
"हाॅ मैडम।" हैदर ने कहा___"गुस्से में पागल हुए ठाकुर साहब ने एसीपी का रिवील्वर निकाल कर नीलम पर फायर कर दिया था। गोली नीलम की पीठ पर लगी थी। जहाॅ से खूॅन बहे जा रहा था।"
"हे भगवान!।" प्रतिमा की ऑखें छलक पड़ीं___"ये कैसा दिन दिखा रहे हो हमे? एक बाप अपनी ही बेटियों के खून का प्यासा हो चुका है।"
"लेकिन हैदर।" प्रतिमा के रुदन पर ज़रा भी ध्यान दिये बग़ैर शिवा ने पूछा___"डैड ने नीलम पर गोली क्यों चलाई थी?"
हैदर ना शुरू से लेकर अंत तक की सारी राम कहानी संक्षेप में कह सुनाई। उसकी इस राम कहानी में वो सीन भी था जिसमें अजय सिंह ने अपनी ही बेटी नीलम से अश्लील बातें की थी। ये भी कि अंत में कैसे नीलम ने ठाकुर साहब को थप्पड़ मारा था जिसकी वजह से गुस्से में आकर अजय सिंह ने एसीपी का रिवाल्वर छीन कर नीलम पर गोली चलाई थी। सारी बातें सुनने के बाद शिवा तो बस हैरान ही था किन्तु प्रतिमा एकदम से मानो बुत बन गई थी। उसका चेहरा एकदम से तेज़हीन सा हो गया था।
"अब मेरे लिए क्या आदेश है छोटे ठाकर?" हैदर ने कहा।
"तुम जाओ हैदर।" शिवा ने गंभीरता से कहा___"गेस्ट हाउस में आराम करो। हम सोचते हैं कि अब इसके आगे हमें क्या करना है?"
शिवा के कहने पर हैदर वहाॅ से चला गया। उसके जाने के बाद ड्राइंगरूम में मरघट जैसा सन्नाटा छा गया। काफी देर तक माॅ बेटे के बीच यही आलम रहा। जैसे उनमें से किसी को कुछ सूझ ही न रहा हो कि अब क्या बात करें?
"आख़िर जिस चीज़ की नियति बन चुकी थी।
" सहसा प्रतिमा ने कहीं खोये हुए से कहा___"उसका आग़ाज हो ही गया। इस लड़ाई में किसी न किसी को तो शहीद होना ही है। फिर चाहे वो नीलम ही क्यों न हो?"
"आपने बिलकुल सही कहा माॅम।" शिवा ने भी गंभीर भाव से कहा___"किसी न किसी के साथ तो ये होना ही है। मगर एक बात तो मैं भी कहूॅगा, और वो ये कि डैड ने नीलम पर गोली चला कर अच्छा नहीं किया। मैं जानता हूॅ कि आपको मेरी ये बात नागवार लग सकती है। मगर इसके बावजूद कहूॅगा मैं कि डैड को नीलम पर गोली नहीं चलाना चाहिए था। मैं मानता हूॅ कि मेरी दोनो बहनों ने हमसे बगावत करके ग़लत किया है। उन्हें सोचना चाहिए था कि माॅ बाप कैसे भी हों हैं तो अपने ही। वैसे ही डैड को भी सोचना चाहिए था माॅम। हम उन्हें उनके किये की सज़ा ज़रूर देते मगर इस तरह नहीं कि उनको जान से ही मार दें। ये सब उस विराज की वजह हे हुआ है, उसी ने मेरी दोनो बहनों को बहकाया है। उसी ने उन दोनो का ब्रेनवाश किया है, वरना उनके दिलो दिमाग़ में कम से कम ये सोच तो रहती ही कि माॅ बाप जैसे भी हों, वो अपने ही होते हैं।"
प्रतिमा शिवा की ये बातें सुन कर मन ही मन हैरान थी। शिवा का बदला हुआ ये रवैया उसे हजम नहीं हो रहा था। किन्तु उसे ये भी पता था कि शिवा अपने बाप की टूकाॅपी है। यानी सूरज कभी पश्चिम से उदय नहीं हो सकता।
"क्या बात है।" प्रतिमा ने हैरानी से कहा___"आज अपनी बहनों से इतनी हमदर्दी? क्या ये सोनम से हुए इश्क़ का असर है बेटा? जिसने तेरी सोच को इस हद तक बदल दिया है?"
"मुझे खुद पता नहीं है माॅम।" शिवा ने नज़रें चुराते हुए कहा___"मैं सिर्फ इतना समझ रहा हूॅ कि डैड ने नीलम पर गोली चला कर अच्छा नहीं किया। अगर वही गोली वो विराज पर चला देते तो शायद मुझे उनसे कोई शिकायत न रहती।"
"ख़ैर छोंड़।" प्रतिमा ने इस मैटर को ज्यादा न बढ़ाने की गरज़ से कहा___"अब हमें ये सोचना है कि तेरे डैड को पुलिस से कैसे छुड़ाया जाए? उन पर नीलम को जान से मारने की कोशिश का भी केस लग सकता है, और संभव है कि उस एसीपी ने ये केस लगा भी दिया हो उन पर। अतः हमें अब किसी क़ाबिल वकील से मिलना पड़ेगा। ताकि वो उनको जेल से किसी तरह छुड़ा सके।"
"हाॅ ये सच कहा आपने।" शिवा ने कहा___"डैड को जेल से तो छुड़ाना ही पड़ेगा।"
"रुको मैं पता करती हूॅ।" प्रतिमा ने कहा___"मेरी जानकारी में एक क़ाबिल वकील है जो अजय को जेल से छुड़ा सकती है। मेरी एक काॅलेज फ्रैण्ड है। मैने और अनीता ब्यास ने एक साथ ही एलएलबी किया था। उसके बाद उसने वकालत को ही अपना पेशा बना लिया जबकि मैं अजय के साथ घर बसा कर सिर्फ एक हाउसवाइफ बन कर रह गई। हलाॅकि अजय ने मुझे इस बात के लिए कभी भी मना नहीं किया कि मैं वकालत न करूॅ। बल्कि हमने तो साथ में ही इसकी पढ़ाई की थी। अजय तो चाहते थे कि हम दोनो वकील बन जाएॅ। मगर मैने ही इंकार कर दिया था।
किन्तु आज सोचती हूॅ कि काश मैं बन ही जाती तो आज अपने अजय को चुटकियों में जेल से छुड़ा लाती।"
"वकालत तो आप आज भी कर सकती हैं माॅम।" शिवा ने कहा___"आपके पास इस सबके राइट्स तो होंगे ही।"
"सब कुछ है बेटा।" प्रतिमा ने कहा___"मगर ये सब अब इतना आसान भी नहीं है। उसके लिए पहले इस सबकी बारीकियों को समझना पड़ता है। कई तरह के केसों का अध्ययन करना पड़ता है। मैं कभी कोर्ट के अंदर वकील का चोंगा पहन कर नहीं गई, इस लिए मुझे इसका तज़ुर्बा भी नहीं है। दूसरी बात अनुभव भी कोई चीज़ होती है। जो कि मुझे नहीं है। हर चीज़ का एक क्रम होता है। अगर आप समय के साथ ही साथ लाइन पर चल रहे हैं तब तो आप सीधी लाइन पर ही बिना किसी रुकावट के चलते रहेंगे पर अगर आपने लाइन को बहुत पहले ही छोंड़ दिया है तो फिर लम्बे समय बाद उसी लाइन पर चलना ज़रा मुश्किल सा हो जाता है। वो फिर तभी अपनी लय पर आएगा जब उसकी नियमित प्रैक्टिस हो। ख़ैर, छोंड़ इस बात को। मैं अनीता को फोन लगा कर उससे बात करती हूॅ। मेरे फ्रैण्ड सर्कल में एक वही है जो अब तक मेरे टच में में है। बाॅकियों का तो कहीं पता ही नहीं है।"
कहने के साथ ही प्रतिमा ने अपने मोबाइल को अनलाॅक करके उस पर अनीता ब्यास का नंबर ढूॅढ़ने लगी। जबकि शिवा ये कह कर सोफे से उठा कि वो कुछ देर में आता है अभी।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
केशव जी के जिस आदमी ने फोन पर उस जासूस के बारे में सूचित किया था उसका नाम निरंजन वर्मा था। रितू ने जब केशव जी से कहा कि वो अपने उस आदमी से कहे कि उसे पकड़ने की कोशिश करे और खुद भी वापस जाएॅ वहाॅ तो केशव ने वैसा ही किया था। उन्होंने निरंजन को फोन करके उससे पूछा था कि क्या वो अकेले उस जासूस को पकड़ सकता है तो निरंजन ने कहा कि वो इस बारे में कुछ कह नहीं सकता है। क्योंकि उसने सुना था कि कोई कोई जासूस लड़ने के मामले में भी काफी निपुण होते हैं। इस लिए बेहतर यही होगा कि वो उस पर सिर्फ नज़र रखे और फिर जब वो सब आ जाएॅगे तो उसे जल्द ही घेर लिया जाएगा। केशव जी को भी निरंजन की बात सही लगी। इस लिए वो फुल स्पीड में अपने आदमियों को लिए आ रहे थे।
इधर निरंजन बड़ी सफाई से हरीश राणे पर नज़र रखे हुए था। किन्तु उसे भी पता था कि ये जासूस यहाॅ पर ज्यादा देर तक रुकने वाला नहीं है। उसके पास काले रंग की एक पल्सर बाइक थी। इस वक्त वह बाइक के ही पास नीचे बैठा बाइक में कुछ कर रहा था। निरंजन को समझ नहीं आ रहा था कि वो बाइक के पास इस तरह बैठ कर क्या कर रहा है? निरंजन उससे बस कुछ ही दूरी पर एक पेड़ की ओट में छुप कर खड़ा था और उस पर नज़र रखे हुए था। उसके पास हथियार के रूप में कुछ भी नहीं था। जबकि उसे पूर्ण विश्वास था कि उस जासूस के पास रिवाल्वर ज़रूर होगा। यही वजह थी कि वो खुल कर उसके सामने नहीं जा रहा था।
निरंजन के चेहरे पर प्रतिपल बेचैनी बढ़ती जा रही थी।
क्योंकि उसे पता था कि जासूस अगर यहाॅ से चला गया तो फिर उसे ढूॅढ़ पाना मुश्किल होगा। अतः वह बार बार देवी माॅ से प्रार्थना कर रहा था कि केशव जी सारे आदमियों को लेकर जल्दी आ जाएॅ। उसकी नज़र सामने ही थी। जहाॅ पल्सर बाइक के पास नीचे बैठा वो जासूस कुछ कर रहा था। जासूस का चेहरा उसके बगल से दिख रहा था। निरंजन के मन में कई बार ये ख़याल आया था कि वो चुपके से जाए और उस जासूस को दबोच ले मगर अगले ही पल वो उसके पास जाने का अपना ये ख़याल त्याग देता था। क्योंकि बार बार उसे उसके पास रिवाल्वर होने का बोध करा देता था। उसने आस पास देख भी लिया था। पास में कहीं भी उसे कोई डंडे जैसी वस्तु भी न नज़र आई थी जिसे लेकर वो उस जासूस के पास चला जाता।
अभी निरंजन उस जासूस को देख ही रहा था कि तभी वो जासूस उठ कर खड़ा हुआ और अपने दाहिने पैर को बाइक के आगे वाले पहिये पर रिम में रख कर उस पर ज़ोर से दबाव बनाया। ये देख कर निरंजन के मस्तिष्क में झनाका सा हुआ। एकाएक ही उसके दिमाग़ की बत्ती जल उठी। साला इतनी देर से वो समझ नहीं पा रहा था कि ये जासूस बाइक के पास बैठा कर क्या रहा था? अब उसे समझ आया था। दरअसल बाइक का अगला पहिया पंचर था अथवा उसमें हवा कम थी। पहिये पर निरंजन का ध्यान पहली बार गया था। उसने ग़ौर से देखा पहिये पर जहाॅ पर से हवा भरी जाती है वहाॅ पर कोई पतली सी तार या फिर यू कहें कि पतला सा पाइप लगा हुआ था। जिसका दूसरा सिरा इस वक्त उस जासूस के दाहिने हाॅथ में था।
निरंजन को समझ न आया कि अगर बाइक का अगला पहिया पंचर है या उसमे हवा कम है तो वो जासूस यहाॅ पर उसे ठीक कैसे कर लेगा और ये पतला सा पाइप क्यों लगा रखा है उसने पहिये की निब पर? तभी वो जासूस पुनः बैठ गया। इस बार निरंजन ने भी अपनी जगह बदली और फिर ध्यान से देखा उसने। पाइप का दूसरा सिरा उस जासूस ने अपने होठों पर दबाया और फिर निरंजन ने देखा कि जासूस के दोनो गाल फूल गए। ये देख कर निरंजन की हॅसी छूट ही गई होती अगर उसने जल्दी से अपने मुह को अपने हाथों से भींच न लिया होता तो। दरअसल वो जासूस पाइप लगा कर मुह से हवा भर रहा था पहिये पर। बस यही देख कर निरंजन को बड़ी ज़ोर की हॅसी आ गई थी। उसने सोचा कि इसे जासूस किसने बना दिया? भला मुह से भी कोई बाइक के पहिये पर हवा भरता है? ये तो दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य ही है।
निरंजन ने भी सोचा कि बेचारा यहाॅ पर बाइक में हवा भरवाए भी तो कैसे? किन्तु मुख से हवा तो भरने से रही। कहने का मतलब ये कि जासूस की इस क्रिया पर निरंजन उसे बेवकूफ ही समझ रहा था। मगर वो उस वक्त हैरान रह गया जब वो जासूस पुनः उठा और पहले की भाॅति अपना दाहिना पैर रिम में रख दबाव बनाया। उसके चेहरे से ज़ाहिर हुआ कि अब वो संतुष्ट है। उसने झुक कर तुरंत ही पाइप को पहिये के निब से निकाला।
निरंजन ने देखा कि निब के पास लगे पाइप के उस छोर पर कोई चीज़ लगी हुई थी। ये देख कर निरंजन का दिमाग़ घूम गया। चकित होकर वह उस जासूस को देखे जा रहा था। अब उसे समझ आया कि वो जासूस यूॅ ही तो नहीं बन गया होगा। ज़रूर उसमें काबीलियत थी।
अभी निरंजन ये सब सोच ही रहा था कि तभी उसने देखा कि वो जासूस उस पाइप को लिए बाइक के बाएॅ साइड आया और फिर अपनी दाहिनी टाॅग उठा कर बाइक की सीट पर बैठ गया। ये देख कर निरंजन एकदम से हड़बड़ा गया। वो समझ गया कि अब ये जासूस यहाॅ से चला जाएगा। निरंजन को समझ न आया कि वो उसे कैसे यहाॅ से जाने से रोंके? वो खुद निहत्था था वरना वो कोई जोखिम उठाने का सोचता भी। उसे पूरा यकीन था कि उस जासूस के पास पिस्तौल होगी। यही वजह थी कि वो उसके पास खुल कर जा नहीं रहा था। किन्तु अब हालात बदल गए थे। क्योंकि निरंजन की ऑखों के सामने ही वो जासूस बाइक पर बैठ चुका था और अब ये भी तय था कि वो बाइक को स्टार्ट कर यहाॅ से चला ही जाएगा।
निरंजन ने देखा कि बाइक पर बैठा जासूस उस पतले से पाइप को गोल गोल छल्ली की शक्ल देकर समेट रहा था। उसकी पीठ निरंजन की तरफ ही थी। पाइप का दूसरा सिरा जासूस की दाहिनी जाॅघ से थोड़ा ही नीचे झूल रहा था और प्रतिपल ऊपर की तरफ उठता भी जा रहा था। ये देख कर निरंजन के दिमाग़ की बत्ती जली। उसके चेहरे पर एकाएक ही कुछ सोच कर चमक आ गई। वो फुर्ती से अपनी जगह से हिला और फिर बड़ी सावधानी व सतर्कता से लम्बे लम्बे क़दम बढ़ाते हुए जासूस के पीछे पहुॅच गया।
हरीश राणे को सहसा अपने पीछे किसी की मौजूदगी का एहसास हुआ। उसने इस एहसास के तहत ही जल्दी से पीछे मुड़ कर देखना चाहा मगर अगले ही पल जैसे बिजली सी कौंधी। निरंजन ने डर व भय की वजह से बड़ी ही फुर्ती का प्रदर्शन किया था। उसने जासूस के मुड़ने से पहले ही झुक कर जासूस के नीचे जाॅघ के पास झूलते उस पाइप को पकड़ा और फिर तेज़ी से खड़े होकर उसी छोर से दूसरा हाॅथ सरका कर उसने जासूस के सिर से अपनी एक कलाई घुमा कर बड़ी फुर्ती से उस पाइप को जासूस की गर्दन पर कस दिया।
हरीश राणे को ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि उसके साथ पलक झपकते ही ऐसा कुछ हो सकता है। वह एकदम से हकबका कर रह गया था। हलाॅकि उसने खुद को बड़ी तेज़ी से सम्हाला था मगर तब तक उसके गले में निरंजन ने उस पाइप को किसी फाॅसी के फंदे की तरह कस दिया था। निरंजन ये सोच कर जी जान लगाए हुए था कि अगर उसने ज़रा सी भी ढील दी तो ये जासूस उसे जान से मार देगा। निरंजन के दिमाग़ में बस एक यही बात थी, बाॅकी उसे किसी बात का कोई होश ही नहीं था। उसे इस बात का ज़रा भी इल्म नहीं रह गया था कि उसके द्वारा इतनी ताकत से गले में पाइप को कसने से वो जासूस कुछ ही पलों में मर भी सकता है।
उधर राणे जल बिन मछली की तरह छटपटाए जा रहा था।
वो अपने दोनो हाथों से अपने गले में फॅसे पाइप को पकड़ने की कोशिश कर रहा था मगर पाइप में निरंजन की पूरी ताकत लगी हुई थी। जिसकी वजह से राणे उसे हिला भी नहीं पा रहा था। देखते ही देखते राणे का बुरा हाल हो गया। उसका गोरा चेहरा लाल सुर्ख पड़ गया। चेहरे पर पसीना और तड़प साफ पता चल रही थी। किसी किसी पल वह खाॅसने भी लगता था। उसकी ऑखों की पुतलियाॅ जैसे बाहर कूद पड़ने को आतुर हो उठी थीं।
राणे की हालत प्रतिपल बिगड़ती जा रही थी। बाइक पर बैठा वह बुरी तरह खुद को झटके भी दे रहा था मगर मजाल है कि निरंजन की पकड़ में ज़रा सा भी ढीलापन आया हो। कहते हैं कि मौत से बचने के लिए इंसान अंत तक हर तरह से प्रयास करता है फिर भले ही उसके प्रयास विफल ही होते रहें। निरंजन के सिर पर जुनून सवार था और वो किसी यमराज की तरह राणे के सिर पर आ खड़ा हुआ था। राणे को एहसास हो गया कि अब वो मरने ही वाला है। उसे अब साॅस लेना भी मुश्किल पड़ रहा था। बुरी तरह छटपटाते हुए राणे ने एकाएक अपने एक हाॅथ को गले में फॅसे पाइप से हटा कर उसी हाॅथ की कुहनी का वार बड़ी तेज़ी से पीछे निरंजन के पेट के हल्का ऊपरी भाग पर किया। उसके इस वार से निरंजन के हलक से पीड़ा भरी कराह निकल गई और उसकी पकड़ तथा उसकी ताकत कमज़ोर पड़ गई। हलाॅकि उसने जल्दी से उस दर्द को बर्दास्त करके पुनः पाइप को कसना चाहा मगर तक मानो देर हो गई। क्योंकि जैसे ही निरंजन ने पुनः ताकत लगाई वैसे ही राणे ने कुहनी का वार जल्दी जल्दी कई बार निरंजन के पेट में कर दिया था। नतीजा ये हुआ कि निरंजन की पकड़ काफी ज्यादा ढीली व कमज़ोर पड़ गई। वह बुरी तरह दर्द व पीड़ा से बिलबिला उठा था।
निरंजन के कमज़ोर पड़ते ही हरीश राणे ने बड़ी तेज़ी से अपने गले से उस पाइप को पकड़ कर खींचा और फिर उसे ऊपर करते हुए सिर से निकाल दिया। हालत तो उसकी अब भी बहुत ख़राब थी। बुरी तरह खाॅस रहा था तथा बुरी तरह गहरी गहरी साॅसें भी ले रहा था। गोरा चेहरा लाल सुर्ख पड़ गया था। चेहरे पर ढेर सारा पसीना उभर आया था। गले से पाइप को निकालते ही वह बाइक से खुद को बाएॅ साइड गिरा लिया था तथा साथ ही कई पलटियाॅ भी खा लिया था। मगर तब तक उसकी पसली में निरंजन के बूट की ज़बरदस्त ठोकर लग चुकी थी। निरंजन जानता था कि अगर वह अब भी उसे सम्हलने का मौका दिया तो वो उसके लिए काल बन सकता है। अतः वह मौत के डर से उस पर वार पे वार किये जा रहा था।
हरीश राणे अभी अभी मौत से बच कर निकला था। इस लिए उसे खुद पर नियंत्रण पाने के लिए कुछ समय चाहिए था मगर निरंजन था कि उस पर प्रहार किये जा रहा था। अचानक ही निरंजन ने देखा कि जासूस ने अपने हाॅथ को पीछे ले जाकर रिवाल्वर निकाल रहा है। ये देख कर निरंजन के समूचे जिस्म में मौत की सिहरन दौड़ गई।
जैसे ही राणे ने रिवाल्वर निकाल कर अपने हाॅथ को निरंजन की तरफ उठाना चाहा वैसे ही मौत के डर से निरंजन ने उसकी उस कलाई पर अपनी टाॅग चला दी। नतीजा ये हुआ कि राणे के हाॅथ से रिवाल्वर छूट कर दूर जा गिरा तथा कलाई पर तेज़ ठोकर लगने से वो दर्द से कराह उठा।
निरंजन ने देखा कि रिवाल्वर उसकी पहुॅच में ही है इस लिए वो जल्दी से रिवाल्वर की तरफ लपका मगर तभी वह मुह के बल ज़मीन पर गिरा। गिरते ही उसके मुख से चीख़ निकल गई। राणे ने पलट कर उसका पैर पकड़ कर खींच लिया था जिससे वो अनबैलेंस होकर मुह के बल गिरा था। रिवाल्वर उसकी पहुॅच से लगभग डेढ़ दो हाॅथ ही दूर था। इधर निरंजन का पैर पकड़ कर खींचते ही राणे उसके ऊपर एकदम से आने की कोशिश की तो निरंजन घबरा कर पलट गया। नतीजतन इस बार राणे मुह के बल गिरा। किन्तु उसके एक हाॅथ में निरंजन का पैर अभी भी था।
निरंजन ने अपने पैर को उससे छुड़ाने के लिए ज़ोर से झटका दिया मगर उसका पैर तो न छूटा किन्तु झटकने से उसका पैर राणे की छाती से टकराया। निरंजन आवेश और घबराहट में अपने पैर को झटका देता ही रहा, जिसका नतीजा ये हुए कि बार बार छाती पर उसका पैर ज़ोर से लगने से आख़िर राणे को उसका पैर छोंड़ना ही पड़ा। इधर निरंजन जो कि दोनो हाॅथ पीछे की तरफ ज़मीन पर टिका कर बैठ चुका था वो अपने पाॅव के आज़ाद होते ही तेज़ी से रिवाल्वर की तरफ पलट कर लगभग उस पर कूद सा गया। उसके हाॅथ में रिवाल्वर आ चुका था। अभी वह रिवाल्वर के साथ पलटा ही था कि तभी राणे उसके ऊपर जंप मार कर आ गया।
राणे ने तुरंत ही निरंजन के रिवाल्वर वाले हाॅथ को पकड़ने के लिए अपना एक हाॅथ बढ़या तो निरंजन ने अपने उस हाॅथ को ऊपर अपने सिर के पीछे साइड कर लिया। राणे जैसे ही उसे पकड़ने के लिए उस तरफ झुका वैसे ही निरंजन ने अपना दूसरा हाॅथ छुड़ा कर ज़ोर से एक मुक्का राणे की कनपटी में मारा जिससे राणे उसके ऊपर से दूसरी तरफ पसर गया। इधर राणे के गिरते ही निरंजन लेटे लेटे ही एक साथ तीन चार पलटियाॅ खाता चला गया। जब तक राणे उठ कर उसके पास पहुॅचता तब तक निरंजन उठ कर बैठ चुका था, साथ ही रिवाल्वर वाला हाॅथ भी ऊपर उठा कर उस पर तान चुका था।
"रुक जा मादरजाद।" निरंजन आवेश में जल्दी से चिल्लाया था___"वरना इस रिवाल्वर की सारी गोलियाॅ तेरे सीने में उतार दूॅगा और ये मैं यूॅ ही नहीं कह रहा हूॅ बल्कि सचमुच ऐसा कर भी दूॅगा। क्योंकि तुझे जान से मार देने पर भी मुझे कुछ नहीं वाला। बल्कि इनाम ही मिलेगा मुझे।"
हरीश राणे निरंजन का ये डायलाॅग तथा उसके खतरनाॅक लहजे को देख कर एकदम से अपनी जगह पर गया। उसके चेहरे पर पहली बार डर व भय के चिन्ह नज़र आए।
किन्तु उसे ये समझ नहीं आया कि ये आदमी है कौन और उसके पीछे उसकी मौत बन कर कहाॅ से आ गया था? क्या ये विराज व रितू का आदमी है जो उसके पीछे ही लगा हुआ था?
"कौन हो तुम?" हरीश राणे ने सतर्क भाव से पूछा___"और इस तरह मुझ पर जानलेवा हमला करने का क्या मतलब है तुम्हारा?"
"जिस तरह तू मंत्री का कुत्ता बन कर हमारे बाॅस के अज़ीज़ लोगों के पीछे लगा हुआ था।" निरंजन ने लहजे को कठोर बनाते हुए कहा___"उसी तरह मैं भी तेरे पीछे लगा हुआ था। ख़ैर, अब तू पकड़ में आ ही चुका है तो ये भी समझ गया होगा कि अब तेरा क्या हस्र होने वाला है?"
"ओह तो तुम्हें ये ग़लतफहमी है।" हरीश राणे ने बड़े अजीब भाव से कहा____"कि तुमने मुझे पकड़ लिया है?"
"ज्यादा शेखी मत झाड़।" निरंजन उसकी बात पर गड़बड़ा सा गया, फिर बोला___"वरना बता ही चुका हूॅ कि तुझे जान से मार देने पर मुझे कुछ नहीं होगा बल्कि इनाम ही मिलेगा।"
"अच्छा।" हरीश राणे सहसा मुस्कुराया___"तो फिर देर किस बात की है प्यारे? तुम्हारे निशाने पर हूॅ, खत्म कर दो मुझे और जल्दी से अपना इनाम भी हाॅसिल कर लो।"
"लगता है।" निरंजन अंदर ही अंदर हैरान___"कि तुझे मरने की बहुत जल्दी है।"
"क्या करें दोस्त?" राणे ने कहा___"अब जब तुमने कह ही दिया है ऐसा तो फिर देर किस बात की करना? मुझे लगता है कि तुम्हें भी अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। अतः मेरी सलाह मानो और जल्दी से मुझे खत्म कर दो।"
निरंजन उसकी इस बात पर समझ न सका कि ये जासूस आख़िर है किस किस्म का ब्यक्ति? मौत सामने खड़ी है और ये ऐसी बातें कर रहा है। इसे ज़रा भी मौत का ख़ौफ नहीं है। जबकि निरंजन तो बस उसे डरा और धमका ही रहा था। ताकि वह कोई बेजा हरकत करने की कोशिश न करे। उसे पता था थोड़ी ही देर में उसके बाॅस यानी कि केशव शर्मा अपने आदमियों सहित यहाॅ पहुॅच ही जाएॅगे। अतः तब तक उसे इस जासूस को रोंके रखना था। मगर उसकी इन ऊल जुलूल बातों ने उसका सिर चकरा कर रख दिया था।
"क्या सोचने लगे प्यारे?" हरीश राणे उसे चुप देख कर कह उठा___"अरे भई चलाओ गोली मुझ पर और खत्म करो मुझे। तुम तो यार लगता है बस डींगे ही मारना जानते हो। जबकि मुझसे अब इन्तज़ार नहीं हो रहा।"
"ओये ज्यादा बकवास न कर समझा।" निरंजन ने उत्तेजित भाव से कहा___"वरना सच में तेरा राम नाम सत्य कर दूॅगा मैं।"
हरीश राणे कोई मामूली इंसान नहीं था। घुटा हुआ जासूस था, उसे समझते देर न लगी कि निरंजन उसे सिर्फ धमका रहा है। अगर उसे जान से मारना ही होता तो इतनी बातें न करता बल्कि कब का उसे यमलोक पहुॅचा दिया होता। अतः उसने पूरी सतर्कता से निरंजन की हर गतिविधी को नोट करते हुए बेख़ौफ निरंजन की तरफ बढ़ने लगा। ये देख कर निरंजन अंदर ही अंदर बुरी तरह घबरा गया। साथ ही उसके दिमाग़ ने काम करना भी बंद कर दिया। उसे समझ न आया कि ये साला अब उसकी तरफ क्यों बढ़ रहा है?
"ये...
ये तू क्या कर रहा है मादरजाद?" बुरी तरह बौखलाते हुए निरंजन हकलाते हुए बोल उठा____"मैं कहता हूॅ रुक जा वरना सच में गोली मार दूॅगा तुझे।"
"मैं भी तो यही चाहता हूॅ प्यारे।" हरीश राणे ने मुस्कुराते हुए कहा___"मगर तुम हो कि मुझे जान से मारते ही नहीं। इस लिए अब मैं खुद ही तुमसे रिवाल्वर लेकर खुद को गोली मार लूॅगा। मुझे समझ आ गया है कि तुमसे रिवाल्वर चलाया नहीं जाएगा।"
"तू...तू पागल है क्या रे?" निरंजन हैरान परेशान सा बोल पड़ा___"देख मेरी तरफ मत आ। वरना अगर मेरा भेजा गरम हो गया न तो तू सच में मेरे हाॅथों मारा जाएगा।"
"नहीं प्यारे।" हरीश राणे बोला___"मुझे पता चल गया है कि अब तुम मुझे गोली नहीं मार सकते। क्योंकि तुम्हें मुझसे अचानक ही बेइंतहां मोहब्बत हो गई है। हाय, ये मोहब्बत भी न बहुत बुरी चीज़ होती है कम्बख़्त।"
"साले।" निरंजन उसकी बातों से बुरी तरह भन्ना गया, बोला___"तुझे एक बार में बात समझ में नहीं आती है क्या? अब अगर एक क़दम भी आगे बढ़ाया तूने तो देख लेना यहीं पर ढेर हुआ नज़र आएगा।"
"ऐसा ग़ज़ब मत करना प्यारे।" राणे चहका___"ऐसा लगता है कि तुम्हारी तरह मुझे भी तुमसे मोहब्बत हो रही है। ओह नहीं नहीं....मुझे किसी से भी मोहब्बत नहीं हो सकती। खास कर उससे तो हर्गिज़ भी नहीं जो खुद ही मेरी तरह औज़ार लिए फिरता हो।"
निरंजन बोला तो कुछ नहीं किन्तु उसे एहसास हुआ कि फालतू की बकवास करते हुए ये जासूस उसके काफी पास आ गया है। अभी निरंजन ये सोच ही रहा था कि अचानक ही मानो बिजली सी कौंधी। हरीश राणे ने हैरतअंगेज़ कारनामा किया था। पलक झपकते ही उसका जिस्म हवा में लहराया और इससे पहले की निरंजन कुछ समझ पाता राणे उसको लिए ज़मीन पर कई पलटियाॅ खाता चला गया। निरंजन के हाॅथ से रिवाल्वर जाने कब छूट गया था। अपने ऊपर हुए इस अप्रत्याशित हमले से निरंजन बुरी तरह बौखला गया था। जब तक उसे कुछ होश आया तब तक देर हो चुकी थी।
पलटियाॅ खाने के बाद राणे सबसे पहले उठा और फिर उसने निरंजन को कुछ भी करने का अवसर नहीं दिया। लात घूॅसों की बरसात सी कर दी उसने। निरंजन की चीख़ें फिज़ा में गूॅजती रही।
"हमने कहा था न प्यारे।" हरीश राणे निरंजन की छाती पर बैठा हुआ बोला___"कि तुमसे रिवाल्वर नहीं चलाया जाएगा। हमने तो ये भी कहा था कि हमें खत्म कर दो मगर नहीं तुम्हें तो हमसे मोहब्बत हो गई थी न। अब भुगतो मेरी जान। पीछे से वार करने वाला कायर बुज़दिल व हिंजड़ा होता है और ये सब बातें तुम में हैं, ये तुमने पहले ही साबित कर दिया था।"
अभी राणे ये सब निरंजन को बोल ही रहा था कि तभी वातावरण में वाहनों के आने का शोर गूॅजा। हरीश राणे ये महसूस करते ही बुरी तरह उछल पड़ा। उसने पलट कर देखा ही था कि निरंजन ने तेज़ी से एक मुक्का उसकी गर्दन के पास जड़ दिया। जिससे एक चीख़ के साथ राणे पलट कर नीचे गिर गया।
उसके गिरते ही निरंजन उठा और सबसे पहले उसने राणे की पसली में बूट की ज़ोरदार ठोकर मारी। ठोकर लगते ही राणे दर्द से बिलबिला उठा।
इधर देखते ही देखते चारो तरफ से केशव जी ने तथा उनके आदमियों ने दोनो को घेर लिया। कुछ लोग दौड़ते हुए आए और हरीश राणे को पकड़ लिया। हरीश राणे समझ गया कि अब कुछ नहीं हो सकता। अतः उसने भी समझदारी का परिचय दिया और बिना कोई हील हुज्जत किये उनके द्वारा पकड़ कर ले जाने से चला गया। थोड़ी ही देर में वह केशव जी के आदमियों के बीच जीप में बैठा था। उसके दोनो हाॅथ पीछे की तरफ करके रस्सी से बाॅध दिये गए थे। उसका जो रिवाल्वर लड़ते वक्त निरंजन के हाॅथ से छूट कर गिर गया था उसे निरंजन ने फिर से उठा कर अपने पास रख लिया था। हरीश राणे को लिए वो काफिला वापस रेवती के लिए चल पड़ा था। केशव जी राणे को पकड़ कर बेहद खुश थे। उन्होंने निरंजन को इसके लिए शाबाशी दी तथा ये भी कहा कि उसने वास्तव में बहुत बड़ा काम किया है इस लिए उसे इसके लिए इनाम ज़रूर मिलेगा। निरंजन इनाम की बात से बेहद खुश हो गया था। इतना ही नहीं जासूस को पकड़वाने से उसका सिर गर्व से ऊॅचा हो गया था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर हास्पिटल में।
हम सब बुझे बुझे से बैठे थे। नीलम के लिए हर कोई चिंतित व परेशान था। हम में से किसी को भी ये उम्मीद नहीं थी कि अजय सिंह ऐसा कुछ कर सकता है। वरना ऐसा होता ही नहीं। ख़ैर, लम्बे इन्तज़ार के बाद आख़िर ओटी का दरवाजा खुला और डाॅक्टर बाहर आया। हम सब उसे देख कर एक साथ एक ही झटके से उस लम्बी चेयर से उठ कर खड़े हो गए थे। फिर लगभग एक साथ ही डाॅक्टर की तरफ लपके थे।
"डाॅक्टर साहब।" मैने उतावलेपन से किन्तु बेहद ही अधीर भाव से पूछा___"सब कुछ ठीक तो है न? नीलम ठीक तो है न?"
"डोन्ट वरी यंग मैन।" डाॅक्टर ने कहा___"वो अब ख़तरे से बाहर हैं। शुकर था कि बुलेट उनकी राइट साइड की पीठ पर थोड़ा निचले हिस्से पर लगी थी। अगर लेफ्ट साइड थोड़ा ऊपर लगती तो यकीनन वो गोली उनके दिल को भेद सकती थी। हमने बुलेट निकाल दिया है। अब वो ठीक हैं। थोड़ी देर बाद उन्हें दूसरे कमरे में शिफ्ट कर दिया जाएगा तो आप सब उनसे मिल सकेंगे।"
"ओह थैंक्यू डाॅक्टर।" आदित्य बोल पड़ा___"थैंक्यू सो मच। आपने बहुत बड़े संकट से बचा लिया।"
"थैक्यू तो आप लोगों का भी करना चाहिए।" डाॅक्टर ने कहा___"जो आप वक्त रहते उन्हें यहाॅ लाने में कामयाब हो गए। वरना सचमुच कुछ भी हो सकता था। मुझे फोन पर एसीपी साहब ने इस बारे में बता दिया था और कहा भी था कि जैसे ही आप लोग यहाॅ आए वैसे ही हम उनका तुरंत इलाज़ शुरू कर दें।"
थोड़ी देर डाॅक्टर से और बातचीत हुई उसके बाद वो चला गया। हम सब अब खुश थे कि नीलम अब ठीक है। थोड़ी ही देर में एक नर्स आई उसने बताया कि हम नीलम से मिल सकते हैं।
अतः उसके कहने के साथ ही हम सब लगभग दौड़ते हुए नर्स के पीछे पीछे गए और उस कमरे में दाखिल हो गए जिसमें नीलम को शिफ्ट किया गया था।
कमरे में पहुॅचते ही हमने देखा कि हास्पिटल वाले बेड पर नीलम करवॅट के बल लेटी हुई थी। उसका चेहरा दरवाजे की तरफ ही था किन्तु ऑखें बंद थी। हम लोगों के आने की आहट पाते ही उसने अपनी ऑखें खोल दी। जैसे ही उसने हमे देखा उसके चेहरे पर एक साथ कई तरह के भाव आए और फिर सहसा उसके होठों पर फीकी सी मुस्कान फैल गई।
रितू दीदी व सोनम दीदी एक साथ ही उसकी तरफ बढ़ीं और उसके पास खड़ी हो गई। रितू दीदी ने नम ऑखों से उसके माथे से होते हुए सिर पर हाॅथ फेरा और फिर झुक कर उसके माॅथे को चूम लिया। उनके मुख से कोई लफ्ज़ नहीं निकला। कदाचित कुछ कहने की हिम्मत ही न हुई थी उनमें। किन्तु इस क्रिया से ही उन्होंने जता दिया कि उसके ठीक होने पर उन्हें कितनी खुशी हुई है। सोनम दीदी भी नम ऑखों से नीलम को देख रही थी।
"भगवान का लाख लाख शुकर है नील।" सोनम दीदी उसे प्यार से नील कहा करती हैं, बोलीं____"उसने तुझे कुछ नहीं होने दिया वरना जब तुझे गोली लगी थी न तो जैसे हम सबके जिस्मों से प्राण ही निकल गए थे।"
"ये ज़िंदगी उसी गंदे इंसान की दी हुई थी दीदी।" नीलम ने करुण भाव से कहा___"जिसे उसने गोली मार कर अपनी तरफ से अब खत्म कर दिया है। अब ये मेरा दूसरा जन्म है जिसमें अब उसका कोई हक़ नहीं है। बल्कि आप लोगों का है।" कहने के साथ ही नीलम ने रितू दीदी की तरफ देखा फिर बोली___"मुझे आप पर नाज़ है दीदी कि आपने राज का साथ दिया और सच्चाई का साथ दिया। आज आपकी ही वजह से हम सब उस शैतान से बच कर यहाॅ आ गए हैं।"
"साथ तो हमेशा उसी का देना चाहिए नीलम।" रितू दीदी ने कहा___"जिसका साथ देने से हमारे ज़मीर तथा हमारी आत्मा को तक़लीफ न हो बल्कि उन्हें तृप्ति का एहसास हो। माॅ बाप हमेशा वंदनीय होते हैं और वो मेरे लिए भी हमेशा रहेंगे किन्तु वो माॅ बाप जिनकी अच्छी छवि में मन में है ना कि वो जो अपनी ही बहू बेटियों के बारे में ग़लत सोचते हैं। थोड़ा बहुत जो सम्मान बाॅकी था उनके लिए वो आज की इन घटनाओं से पूरी तरह खत्म हो चुका है। अब इस दिल में उनके लिए सिर्फ और सिर्फ नफ़रत व घृणा है। आज अगर तुझे कुछ हो जाता न तो क़सम ऊपर वाले की मैं उस इंसान का वो हाल करती कि दुबारा इस धरती पर पैदा होने से इंकार कर देता।"
"जाने दीजिए दीदी।" नीलम ने कहने के साथ ही मेरी तरफ देखा, फिर मुस्कुरा कर बोली____"एक तरह से ये अच्छा ही हुआ। इसी बहाने सही मगर मुझे आज अपने इस भाई का अपने लिए इतना सारा प्यार व तड़प तो देखने को मिल गई। मैं महसूस कर रही थी उस वक्त जब मैं इसकी बाहों में असहाय सी पड़ी थी। मेरे कानों में इसकी हर बात सुनाई दे रही थी।
मैं सोच रही थी कि एक मेरा वो भाई था जिसने कभी ये नहीं जताया कि वो अपनी बहनों से कितना प्यार करता है और एक ये भाई है जिसे हमने बचपन से जलील करके दुख दिया आज वो मुझे उस हालत में देख कर ऐसे तड़प रहा था जैसे गोली मुझे नहीं बल्कि इसको लगी थी। ये ख़याल बार बार मन में आता है कि इतना प्यार करने वाले भाई से हमने अब तक इतनी घृणा कैसे की थी?"
"ओये बंदरिया।" मैं एकदम से उसके पास आकर बोल पड़ा____"ये क्या बकवास किये जा रही है तू? तुझसे मैं कोई प्यार, व्यार नहीं करता समझी। उस वक्त तो मैं वो सब नाटक कर रहा था।"
"चल ठीक है भाई।" नीलम ने मुस्कुरा कर कहा___"मान लिया कि वो सब तेरा नाटक था मगर सच कहूॅ तो मुझे वो तेरा नाटक भी बहुत भाया राज। मैं चाहती हूॅ कि तू जीवन भर मेरे साथ ऐसा ही नाटक करता रहे।"
"अब तुम दोनो यहीं पर न शुरू हो जाना।" सहसा सोनम दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा___"जाओ जाकर पता करो डाॅक्टर से कि हम इसे यहाॅ से कब तक ले जा सकते हैं?"
"अरे इसकी क्या ज़रूरत है दीदी?" मैने मुस्कुरा कर कहा___"मैं तो कहता हूॅ कि इसे यहीं पर पड़ी रहने देना चाहिए और हम लोगों को अब घर चलना चाहिए।"
"तू न अब मुझसे पिटेगा सच में।" सोनम दीदी ने ऑखें दिखाते हुए कहा___"अब जा जल्दी यहाॅ से।"
"जो हुकुम आपका।" मैने अदब से सिर झुका कर कहा और फिर कमरे से बाहर चला आया। मेरे पीछे पीछे आदित्य भी मुस्कुराता हुआ चला आया।
"मेरे भाई को इस तरह भगा कर आपने अच्छा नहीं किया दीदी।" सहसा नीलम ने कहा___"जब वो मुझे इस तरह चिढ़ाता है तो मुझे भी बड़ा अच्छा लगता है। मैं भी उसके जैसा ही बर्ताव करने लगती हूॅ। मैं चाहती हूॅ कि जिन चीज़ों के लिए वो बचपन से तरसा था वो उन सभी चीज़ों को आज जी भर के जिए। हमारी वजह से अब तक जितना उसका दिल दुखा है अब वो हमारे साथ ऐसी ही नोंक झोंक करके अपने उस दिल को खुश रखे।"
"मुझे पता है नील।" सोनम दीदी ने कहा___"मुझे भी अच्छा लगता है जब वो तुझे इस तरह बंदरिया कह कर चिढ़ाने लगता है। किन्तु मैं उसे ये सब कह कर इस लिए रोंक देती हूॅ कि मुझे भी बड़े होने का इस तरह से फायदा उठाने में मज़ा आता है। मैं ये देख कर खुश हो जाती हूॅ कि कैसे वो अपने से बड़ों की बात सहजता से मान जाता है। अब रितू से ही पूछ ले, ये तो उसके साथ ही रहती है। संभव है कि ये भी मेरी तरह अपने बड़े होने का फायदा उठाती हो। क्यों रितू सच कहा न मैने?"
"सबकी सोच अलग अलग होती है सोनम।" रितू दीदी ने कहा___"तुम दोनो को ऐसा करके खुशी मिलती है जबकि मेरा कुछ और ही हिसाब है। तुम तो जानती ही हो कि मेरा स्वभाव कैसा है?"
"हाॅ जानती हूॅ।" सोनम दीदी ने कहा___"कि तेरा स्वभाव हिटलर वाला है। मगर कभी खुद को बदल कर भी देख। संभव है कि कुछ नया नज़र आये।
"
सोनम दीदी की इस बात पर रितू दीदी मुस्कुराई और कुछ पल के लिए कहीं खो सी गईं फिर जैसे उन्होंने तुरंत ही खुद को सम्हाला और ये कह कर बाहर की तरफ चली गईं कि उसे कुछ ज़रूरी फोन काल करना है। रितू दीदी के जाने के बाद सोनम दीदी ने वापस नीलम की तरफ देखा।
"तो आपको भी राज के साथ ऐसा करने में मज़ा आता है?" नीलम ने मुस्कुराते हुए कहा।
"अरे नहीं रे।" सोनम दीदी ने अजीब भाव से कहा___"ऐसी कोई बात नहीं है। मैं तो ऐसे ही कह रही थी। ख़ैर छोंड़, अब तू ठीक है न? तुझे पीठ पर पेन तो नहीं हो रहा न अभी?"
"नहीं दीदी।" नीलम ने कहा___"अब अच्छा लग रहा है। बस सीधा लेटने में प्राब्लेम हो रही है।"
"वो तो होगी ही।" सोनम दीदी ने कहा__"अभी नया नया ज़ख्म है। इस लिए तुझे सीधा लेटने में कुछ दिन प्राब्लेम होगी। तुझे भी इस बात का ख़याल रखना होगा और हाॅ राज के साथ ज्यादा उछल कूद मत करने लगना। वरना तेरा ये ज़ख्म फिर से ताज़ा हो जाएगा।"
"ऐसा तो तभी संभव है दीदी।" नीलम ने मुस्कुराते हुए कहा___"जब वो मेरे सामने ही न आए। क्योंकि जैसे ही वो मेरे सामने आएगा। मैं फिर उसे छेंड़ूॅगी और फिर क्या होगा ये तो आप जानती ही हैं।"
"तू नहीं सुधरने वाली।" सोनम दीदी ने हैरानी से देखते हुए कहा___"अरे पागल कुछ दिन तो सबर कर ले।"
"हाय दीदी! कुछ दिन राज से झगड़ा किये बिना कैसे रह पाऊॅगी मैं?" नीलम ने आह सी भरते हुए कहा___"पता नहीं क्यों पर उससे झगड़ा करने का हर पल दिल करता है मेरा। मैं अकेले में सोचा करती हूॅ कि हर वक्त राज को छेंड़ना क्या अच्छी बात है? मगर ये सब सोचने के बावजूद ऐसा हो जाता है। आप ही बताइये मैं क्या करूॅ दीदी?"
सोनम दीदी नीलम की बात सुन कर बस मुस्कुरा कर रह गई। उसके चेहरे पर कई तरह के भाव आए और चले गए। जबकि उसकी मनोदशा से अंजान नीलम ने इस बार ज़रा गंभीरता से कहा___"एक बात कहूॅ दीदी??"
"हम्म कहो।" सोनम दीदी ने धीरे से कहा।
"काश! राज मेरा भाई न होता।" नीलम ने धड़कते हुए दिल के साथ कहा।
"ये...ये क्या कह रही हो तुम??" सोनम दीदी उसकी इस बात पर बुरी तरह चौंकी। ऑखों में हैरत के चिन्ह लिए वो बोलीं___"इसके पहले तो कह रही थी कि राज जैसा भाई पा कर तू बहुत खुश है। फिर अब ऐसा क्यों कह रही है?"
"हर लड़की सोचती है कि उसे ऐसा जीवन साथी मिले जो उससे बहुत ही ज्यादा प्यार करे।" नीलम ने कहीं खोये हुए से कहा___"उसकी केयर करे तथा उसे एक पल के लिए भी खुद से दूर न करे। उसे कभी किसी बात पर दुखी न होने दे। ये सारी खूबियाॅ राज में हैं दीदी। मुझे पता है कि वो अपनी बहनों पर अपनी जान छिड़कता है। मगर उसे देख कर ये ख़याल भी मन में आता है कि काश राज के जैसा ही हमें जीवन साथी मिले।
मगर आज के समय में ये संभव नहीं है और अगर मान भी लें कि ऐसे इंसान इस दुनियाॅ में मिल भी सकते हैं तो क्या उनमें से कोई हमारा जीवन साथी बनेगा?"
"तो तू कहना क्या चाहती है?" सोनम दीदी के चेहरे पर सशंक भाव उभरे।
"आपको मेरी बातें यकीनन बुरी अथवा ग़लत लगेंगी दीदी।" नीलम ने उसी गंभीरता से कहा___"मगर ये सच है कि मेरे मन में कभी कभी ये ख़याल आता है कि काश राज मेरा भाई न होता तो मैं उसे ही अपना जीवन साथी बना लेती। राज को देखते ही उस पर निसार हो जाने का दिल करता है दीदी। उसे देख कर मैं भूल जाती हूॅ कि वो मेरा भाई है, और फिर जब ख़याल आता है कि वो मेरा भाई है तो जाने क्यों इस बात से दिल में दर्द होने लगता है? अंदर से एक टीस उभरती है और फिर समूचा जिस्म काॅप कर रह जाता है।"
"तू न कुछ भी बोलती रहती है।" सोनम दीदी ने बुरा सा मुह बनाया। ये अलग बात है कि नीलम की इन बातों से उसके अंदर एक अजीब से एहसास की झुरझरी सी दौड़ गई थी, बोली___"चल अब ज्यादा इस बारे में मत सोच। राज आता ही होगा अभी। तुझे यहाॅ से लेकर भी तो चलना है न।"
"आप मेरी बातों को नज़रअंदाज़ कर रही हैं न?" नीलम ने सोनम दीदी के चेहरे को ग़ौर से देखते हुए कहा___"ऐसा मत कीजिए न दीदी। एक आप ही हैं जिनसे मैं अपने दिल की हर बात कर सकती हूॅ। इस लिए मेरी बात सुन लीजिए और उस पर अपनी राय भी दीजिए कि मैं जो कुछ कह रही हूॅ वो सही है या ग़लत?"
"क्या राय दूॅ मैं?" सोनम दीदी ने नीलम की ऑखों में झाॅकते हुए कहा___"तूने तो सब कुछ कह कर ये ज़ाहिर कर ही दिया है कि तेरे मन में राज के प्रति अब क्या है? अब अगर मैं इस पर ये कहूॅ कि ये सब सोचना भी ग़लत है तो क्या फर्क़ पड़ता है उससे? इतना तो मैं समझ ही सकती हूॅ कि अगर राज के प्रति तेरे मन में ऐसे ख़याल आ चुके हैं तो इसका साफ मतलब है कि कहीं न कहीं तेरे दिल में राज के प्रति भाई वाली फीलिंग के अलावा भी एक अलग फीलिंग्स आ चुकी है। अतः ऐसी फीलिंग्स जब एक बार किसी के दिल में आ जाती हैं तो फिर उसकी सोच भी बदल जाती है। वो उसे ही सही मानता है फिर चाहे भले ही वो सबसे ज्यादा अनैतिक अथवा ग़लत हो।"
"मुझे पता है दीदी।" नीलम की ऑखें एकाएक ही सजल हो उठीं, बोली___"राज के प्रति ऐसी फीलिंग्स रखना ग़लत बात है। मगर ये भी सच है कि अब ये फीलिंग्स मेरे दिल से आसानी से जाएगी नहीं। इस लिए मैने अब एक फैंसला किया है।"
"फ..फैंसला???" सोनम दीदी चौंकी___"कैसा फैंसला?"
"यही कि मैं राज के क़रीब नहीं रहूॅगी।" नीलम ने दृढ़ता से कहा___"बल्कि उससे दूर चली जाऊॅगी। इस लड़ाई के बाद ये सच है कि मेरे माॅ बाप व भाई या तो ज़िन्दगी भर जेल की सलाखों के पीछे कैद हो कर रह जाएॅगे या फिर ऐसे भी हालात बन सकते हैं कि वो सब जान से मारे जाएॅ। तब तो हम दोनो बहनें अनाथ ही हो जाएॅगी।
हलाॅकि इसके बाद भी मेरे अपनों में गौरी चाची, अभय चाचा और करुणा चाची आदि सब भी होंगे मगर इनके पास रहने से अक्सर मेरा सामना राज से होता ही रहेगा। उस सूरत में मेरे मन में ना चाहते हुए भी उसके प्रति आकर्शण बढ़ेगा जिसे शायद मैं रोंक भी नहीं पाऊॅगी। इस लिए बेहतर है कि इस सबके बाद मैं आपके साथ मुम्बई में मौसी के पास ही रहूॅ। राज से दूर रहने से कम से कम ये तो होगा कि धीरे धीरे मैं अपने दिल से उसे निकाल पाने में सफल हो सकती हूॅ।"
"इसका मतलब।" सोनम दीदी ने कहा___"ये सच है कि तू अपने ही भाई राज को अब एक प्रेमी की दृष्टि से देखने लगी है और उसके प्रति तेरे अंदर चाहत की भावना प्रतिपल बढ़ती ही जा रही है?"
"शायद यही सच है दीदी।" नीलम ने सहसा आहत भाव से कहा___"राज ने मेरी इज्ज़त की रक्षा जिस तरह से की थी उसके बाद से ही मुझे ये महसूस हुआ था कि राज के बारे में अब तक जो कुछ मैं अपने माॅम डैड के द्वारा पढ़ाए गए पाठ के तहत सोचती थी वो सब सिरे से ही ग़लत था। मेरे अंदर इस बात के एहसास होने के साथ ही राज के प्रति कोमल भावनाओं का उदय हुआ था। उसके बाद मुझे नहीं पता कि मैं उसके बारे में सोचते सोचते कब उसे चाहने लगी? जब उसने अचानक ही काॅलेज आना बंद कर दिया था तब मैं यही सोच कर रोती थी कि वो आज के समय में मुझसे कितनी नफ़रत करने लगा है कि अब उसने मेरी वजह से काॅलेज आना भी बंद कर दिया। ये सब सोच सोच कर मुझे अपने आप से घृणा होने लगी थी कि मैने अपने उस भाई का बचपन से दिल दुखाया जिसका कभी कोई दोष था ही नहीं। बल्कि उसके दिल में तो हम दोनों बहनों के लिए वैसा ही प्यार व सम्मान था जैसा उसके दिल में गुड़िया(निधी) के लिए है। उसके बाद जब वो दुबारा मेरी इज्ज़त की रक्षा करते हुए मुझे ट्रेन पर मिला तो एक बार फिर से मेरा अंतर्मन ये सोच कर ज़ार ज़ार रो पड़ा कि उसने एक बार फिर से मेरी इज्ज़त की रक्षा की। यानी उसके दिल में आज भी हम दोनो बहनों के लिए वही प्यार व सम्मान है और चाहता है कि हम दोनों को कभी कोई ऑच तक न आए। बस उसके बाद तो जैसे सब कुछ बदल गया दीदी। जब मैने ये महसूस किया कि वो मुझसे झगड़ा करते हुए फिर से अपने बचपन को जीना चाहता है तो मैंने भी उसकी चाहत में उसका पूरा साथ दिया। मुझे भी उसे खुश देखने में अच्छा लगने लगा। इन्हीं सब बातों के बीच ही शायद ऐसा हुआ है कि मेरे दिल में उसकी अच्छाई और खूबियों को देख कर ऐसी चाहत जागी है। आज जब उसने मुझे अपनी बाहों में समेटे तथा मुझे उस हालत में देख कर पागल हुआ जा रहा था तो मैं उस हालत में भी ये सोच रही थी कि ये इतना अच्छा कैसे हो सकता है? इससे कोई नफ़रत कैसे कर सकता है? बस उसके बाद मैंने पहली बार अपने दिल की आवाज़ को सुना और फिर उसकी हो गई। मुझे पता है कि ये ग़लत है। अगर राज को मेरे दिल की बात पता चल गई तो संभव है कि वो मुझे ग़लत समझ बैठे।
वो सोचेगा कि जैसे माॅ बाप थे वैसी ही उसकी औलाद भी है। जो अपने ही सगे रिश्तों के प्रति ऐसी सोच रखती है।"
"अगर यही सब बात है।" सोनम दीदी ने कहा___"और अगर ये भी कि तुम उसकी हो गई हो तो फिर ये अचानक उससे दूर हो जाने का फैंसला क्यों किया तुमने? क्या सिर्फ इस लिए कि राज तुझे ग़लत समझेगा?"
"ये वजह तो है ही दीदी।" नीलम ने सहसा कुछ सोचते हुए कहा___"किन्तु एक दूसरी महत्वपूर्ण वजह और भी है।"
"दूसरी ऐसी कौन सी वजह हो सकती है?" सोनम दीदी के चेहरे पर सोचों के भाव नुमायां हुए।
"आपने शायद ग़ौर नहीं किया दीदी।" नीलम ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"किन्तु मैने बहुत अच्छे से ग़ौर किया है।"
"क्या मतलब??" सोनम दीदी चकरा सी गईं।
"आप और मैं।" नीलम ने कहा___"जिस रितू दीदी को हिटलर समझते हैं, उन्हीं हिटलर दीदी की ऑखों में आज मुझे उस वक्त थोड़ी देर के लिए कुछ खास नज़र आया जब आपने उनसे कहा था कि____'कभी खुद को बदल कर भी देख। संभव है कि कुछ नया नज़र आये।' उस वक्त उनकी ऑखों में पल भर के लिए एक टीस सी नज़र आई थी फिर उन्होंने जल्दी ही खुद को सम्हाल लिया था। कहते हैं कि चोंट के दर्द का एहसास वही कर सकता है जिसे कभी वैसी ह चोंट लगी हो। उस वक्त उनकी ऑखों में जो भाव थे उन भावों ने मुझे बता दिया कि वो दरअसल क्या है?"
"ये तू क्या अनाप शनाप बके जा रही है नील?" सोनम दीदी ने हैरत से कहा___"कहीं तू ये तो नहीं कहना चाहती है कि रितू भी राज से प्यार करती है? ओह माई गाड, ऐसा कैसे हो सकता है? नहीं नहीं...रितू ऐसा नहीं कर सकती नील। वो एक सुलझी हुई तथा समझदार लड़की है। उसे पता है कि ऐसा सोचना भी पाप होता है।"
"प्यार तो हर मायने में पवित्र ही होता है दीदी।" नीलम ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"फिर चाहे वो किसी से भी हो गया हो। दूसरी बात, जब किसी को किसी से प्यार हो जाता है न तब सबसे पहले उस इंसान का विवेक शून्य हो जाता है। प्यार में पड़ा हुआ इंसान उसी को सही मानता है जिसे आम इंसान अनैतिक व पाप की संज्ञा देता है। मैने रितू दीदी की ऑखों में उस पवित्र प्यार को देखा है दीदी। मुझे नहीं पता कि ये सब कैसे संभव हो सकता है? मगर ऑखें कभी ग़लत नहीं होती हैं। ख़ैर मुझे इससे कोई प्राब्लेम नहीं है बल्कि मैं खुश हूॅ कि मेरी जो दीदी लड़कों की ज़ात से नफ़रत करती थी तथा प्यार व्यार को बकवास कहती थीं आज वो खुद राज की चाहत में गिरफ्तार हैं। यकीनन उनकी सोच बदल गई होगी और अब उनके सीने में एक ऐसा दिल धड़कता होगा जो बहुत ही नाज़ुक हो चुका होगा तथा जिसमें किसी के लिए बेपनाह प्यार का सागर हिलोरें लेता होगा। अब जबकि मुझे इस बात का एहसास हो ही चुका है तो क्यों मैं उनकी राह का रोड़ा बनूॅ दीदी? मेरी दीदी के दिल में जीवन में पहली बार किसी के लिए ऐसी भावनाओं का उदय हुआ है। मैने देखा है कि वो सबसे हट कर रहती थी।
उनका स्वभाव बहुत शख्त होता था। प्यार की भाषा से बात करना जैसे उन्हें आता ही नहीं था। मैं और शिवा उनसे बहुत डरते थे। यहाॅ तक कि डैड भी उनसे ज्यादा हॅसी मज़ाक नहीं करते थे। अतः अपनी उस दीदी को खूबसूरत प्यार के एहसास के साथ इस खूबसूरती से बदलता देख कर मैं कैसे उनकी खुशियाॅ छीनने का काम कर दूॅगी? नहीं दीदी, मैं अपनी दीदी की उम्मीदों को चकनाचूर नहीं कर सकती। उनकी पाक़ भावनाओं को नहीं कुचल सकती मैं। वरना वो यकीनन इस सबसे टूट कर बिखर जाएॅगी। इस लिए मैने फैंसला कर लिया है कि मैं इस सबके बाद वापस आपके साथ मुम्बई चली जाऊॅगी।"
"तू इतनी गहरी बातें कर सकती है यकीन नहीं होता नील।" सोनम दीदी की आवाज़ भर्रा गई___"तेरा इतना बड़ा दिल होगा मैने सोचा भी नहीं था। अपनी दीदी के लिए इतना बड़ा त्याग करना कोई मामूली बात नहीं है। इसके पहले मैं तेरी बातों से सचमुच तुझे ग़लत समझ बैठी थी किन्तु आख़िर की तेरी इस बात ने मुझे ये एहसास करा दिया कि ये प्यार भले ही अपने भाई से हो गया हो मगर इसमें कोई गंदगी तथा कोई पाप नहीं है।"
अभी सोनम दीदी ने ये कहा ही था कि तभी कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई और फिर मैं आदित्य के साथ अंदर आ गया। आते ही मैने अपने अंदाज़ में सबसे पहले नीलम को छेंड़ा जिस पर वह बस मुस्कुरा कर रह गई। उसके बाद मैंने उसे कहा कि डाॅक्टर ने कहा है कि हम तुम्हें ले जा सकते हैं। अतः अब चलो यहाॅ से। ख़ैर थोड़ी ही देर में मैं नीलम को लिए हास्पिटल से बाहर आया और कार की पिछली सीट पर उसे वैसे ही लेकर बैठ गया जैसे आते समय लेकर बैठा था। सोनम दीदी भी मेरे दूसरी साइड बैठ गईं। आदित्य कार की ड्राइविंग सीट पर बैठा ही था कि रितू दीदी भी आ गईं। रितू दीदी के बैठते ही आदित्य ने कार को आगे बढ़ा दिया।
लगभग पंद्रह मिनट में ही हम रेवती में शेखर के घर के सामने पहुॅच गए। हम सब कार से बाहर आये। नीलम ने कहा कि वो अब ठीक है और खुद अपने पैरों पर चल सकती है। अतः मैने उसे सहारा देकर कार से बाहर ले आया। उसके बाद हम सब घर के अंदर आ गए। अंदर ड्राइंगरूम में नैना बुआ तथा बिंदिया काकी थी। नैना बुआ ने जैसे ही हम सबको देखा वो भाग कर आईं और नीलम को अपने गले से लगाया ही था कि नीलम के मुख से कराह निकल गई। दरअसल नैना बुआ ने नीलम की पीठ के उस हिस्से पर अपनी बाॅह का कसाव कर दिया था गलती से, जहाॅ पर उसे गोली लगी थी।
नीलम की कराह सुन कर नैना बुआ जल्दी से नीलम से अलग हुईं और फिर उससे माफ़ी माॅगने लगीं। उनकी ऑखों में ढेर सारे ऑसू थे। कदाचित केशव जी यहाॅ आए थे और उन्होंने बुआ को सब कुछ बता दिया था। यही वजह थी कि नैना बुआ नीलम को देख कर भागते हुए आईं थी। ख़ैर, उसके बाद मैं सोनम के साथ नीलम को सहारा देते हुए उसे उसके रूम में ले आया और बेड पर करवॅट के बल आहिस्ता से लेटा दिया।
मेरे पीछे पीछे ही बाॅकी सब आ गए थे। बिंदिया काकी की भी ऑखों में ऑसू थे। रितू दीदी थोड़ी पीछे खड़ी हुई थीं, उनकी ऑखें हल्का सुर्ख नज़र आ रही थीं। ऐसा लगता था जैसे वो रोई हों। मैं उन्हें देख कर चौंका और ऑखों के इशारे से ही पूछा कि क्या हुआ आपको? जवाब में उन्होंने सिर हिला कर बताया कि कुछ नहीं बस ऐसे ही।
इधर नैना बुआ नीलम के पास ही बेड पर बैठ गईं थी और उससे थोड़ी बहुत बातें कर रही थी। साथ ही अपने भाई को बुरा भला भी कहे जा रही थी। मैं कुछ देर तक रूम में रहा और फिर आदित्य के साथ ही बाहर आ गया।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर मंत्री दिवाकर चौधरी के आवास पर।
अजय सिंह इस वक्त उसके पास ही सामने वाले सोफे पर बैठा था। अभी कुछ ही देर पहले चौधरी उसे अपने सोर्स से तथा अपने वकील को लेकर ज़मानत पर छुड़ा कर लाया था। गुनगुन में नया नया आया एसीपी उसे काफी शख्त मिजाज़ लगा था। किन्तु चौधरी का तो ये इलाका ही था अतः वो खुद भी किसी से डरने वाला नहीं था। कहने का मतलब ये कि बड़ी आसानी से वो अजय सिंह को छुड़ा लाया था। इस वक्त अजय सिंह अपना मुह लटकाए बैठा हुआ था। ड्राइंग रूम में इस वक्त वो दोनो ही थे।
"इतनी शातिर दिमाग़ वाली बीवी के रहते हुए भी तुम इतनी बुरी तरह से मात खा गए ठाकुर।" सहसा चौधरी ने अजय सिंह की तरफ देखते हुए कहा___"हैरत की बात है। अच्छा होता कि तुम हमें इस मामले में पहले से बताए होते तो हम इसमें ज़रूर तुम्हारी मदद करते। हमारे दखल पर यहाॅ की पुलिस में इतनी हिम्मत ही नहीं होती कि वहाॅ जा कर तुम सबको गिरफ्तार कर लेती। हम बड़ी आसानी से तुम्हारे उस भतीजे को और तुम्हारी दोनो बेटियों को पकड़ लेते। उसके बाद तो उनका खेल खत्म ही हो जाना था।"
"डबल बैकअप का प्लान भी अपनी जगह कमज़ोर नहीं था चौधरी साहब।" अजय सिंह ने गंभीरता से कहा___"हमने उन सबको लगभग पकड़ ही लिया था। मगर हमारी उम्मीद से परे वहाॅ भारी संख्या में पुलिस फोर्स आ गई और सबकुछ हमारे हाथ से निकल गया।"
"इसमें यकीनन तुम्हारी ग़लती है ठाकुर।" चौधरी ने पुरज़ोर लहजे में कहा___"तुम्हें और तुम्हारी पत्नी को इस बात पर भी ग़ौर करना चाहिए था कि तुम्हारी बेटी, तुम्हारी बेटी होने के साथ साथ एक पुलिस वाली भी है जो ऐसे हालात पर अपने डिपार्टमेंट से पुलिस फोर्स को भी बुलवा सकती है। उस सूरत में तुम्हें हमसे संपर्क करना चाहिए था। हम इस समस्या का तुरंत समाधान करते। हम मंत्रियों के पास ऐसे हालात में पुलिस फोर्स को मनचाही जगह पर ले जाने का बहुत आसान तरीका आता है। कहने का मतलब ये कि हम आनन फानन में किसी जगह का दौरा करते जहाॅ पर भारी मात्रा में हम पुलिस को अपने पास बुला लेते। पुलिस डिपार्टमेंट को इतना जल्दी इतनी पुलिस फोर्स वहाॅ पर भेजने के लिए सोचना पड़ जाता।"
"मैं मानता हूॅ चौधरी साहब।
" अजय सिंह ने नज़रें चुराते हुए कहा___"कि मैने आपको इस बारे में न बता कर भारी ग़लती की है। वरना आज ऐसा नहीं होता। मगर इसमें भी मेरी आपके लिए एक पाक़ भावना ही थी। मैं चाहता था कि ये सब होने के बाद मैं आपके सामने आपके उन दुश्मनों को लाकर आपको सर्प्राइज दूॅगा और यही मेरी दोस्ती व वफ़ादारी का प्रमाण भी होता। मगर अफसोस ऐसा नहीं कर पाया मैं। इसके लिए आप मुझे माफ़ कर दीजिए मंत्री जी। आपने मुझे अपना समझ कर जेल से भी छुड़ा लिया। इसके लिए मैं जीवन भर आपका आभारी और ऋणी रहूॅगा।"
"कोई बात नहीं ठाकुर।" चौधरी ने कहा___"जीवन में हार जीत का खेल तो चलता ही रहता है। इस लिए इसमें ज्यादा चिंता करने की कोई बात नहीं है। इस सबके बाद भी हम उन लोगों को बहुत जल्द पकड़ लेंगे। क्योंकि हमने इस सबके लिए एक जासूस को लगाया हुआ है। आज उसी ने बताया था कि माधोपुर में क्या हो रहा था? उस समय के हालात के अनुसार हमें लगा कि तुम यकीनन उनको पकड़ लोगे और फिर उन्हें हमारे सामने ले आओगे। इसी लिए हमने भी कोई ऐक्शन नहीं लिया। बाद में उस जासूस ने बताया कि वहाॅ पर भारी मात्रा में पुलिस फोर्स आई और तुम सबको पकड़ कर ले भी गई तो हमने सोचा चलो कोई बात नहीं तुम्हें तो हम जेल से छुड़ा ही लेंगे। किन्तु हमने जासूस को ये भी कहा कि ठाकुर की बेटी को गोली लगी है तो वो लोग उसका इलाज कराने हास्पिटल ज़रूर जाएॅगे। उसके बाद वो उस जगह जाएॅगे जहाॅ पर उन लोगों ने अपना ठिकाना बनाया हुआ है। बस उसके ठिकाने का पता चलते ही हम उसे उसके ही ठिकाने पर घेर लेंगे। हम चाहते तो उन लोगों को हास्पिटल में भी घेर सकते थे किन्तु हमने ऐसा नहीं किया। क्योंकि हमें सबसे पहले अपने बच्चों को तलाशना था और ये तभी हो सकता था जब वो लोग हास्पिटल के बाद अपने ठिकाने पर जाते। हमने उस जासूस को इसी का पता लगाने के लिए लगा रखा है। वो हमें बहुत जल्द सूचित करेगा कि उन लोगों का ठिकाना कहाॅ है। उसके बाद हम अपने आदमी लेकर जाएॅगे और उसके ठिकाने पर धावा बोल देंगे।"
"ये तो बहुत ही अच्छा किया है आपने।" अजय सिंह के चेहरे पर एकाएक ही रौनक आ गई___"इसका मतलब ये हुआ कि हम पूरी तरह से हारे नहीं हैं। बल्कि बाज़ी अभी भी हमारे हाॅथ में हैं।"
"बिलकुल।" चौधरी ने मुस्कुरा कर कहा___"बस जासूस के फोन आने की देर है। जैसे ही उसका फोन आया और उसने हमें बताया वैसे ही हम यहाॅ से चल पड़ेंगे।"
"वाह चौधरी साहब।" अजय सिंह के चेहरे पर खुशी की चमक आ गई___"मानना पड़ेगा आपको। आपने भी ऐसा कारनामा कर रखा है जिसके बारे में वो लोग सोच भी नहीं सकते हैं।"
अजय सिंह की बात पर चौधरी बस मुस्कुरा कर रह गया। कुछ देर उन दोनो के बीच और भी कुछ बातें हुईं उसके बाद अजय सिंह चौधरी से इजाज़त लेकर उसके आवास से अपने गाॅव हल्दीपुर के लिए निकल लिया।
चौधरी ने उसे जाने के लिए अपनी एक जीप दे दी थी।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दोस्तो, आप सबके सामने अपडेट हाज़िर है। आशा करता हूॅ कि आप सबको पसंद आएगा।
आप सबकी प्रतिक्रिया और आपके रिव्यू का इन्तज़ार रहेगा।
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट........《 59 》
अब तक,,,,,,,,
"ये तो बहुत ही अच्छा किया है आपने।" अजय सिंह के चेहरे पर एकाएक ही रौनक आ गई___"इसका मतलब ये हुआ कि हम पूरी तरह से हारे नहीं हैं। बल्कि बाज़ी अभी भी हमारे हाॅथ में हैं।"
"बिलकुल।" चौधरी ने मुस्कुरा कर कहा___"बस जासूस के फोन आने की देर है। जैसे ही उसका फोन आया और उसने हमें बताया वैसे ही हम यहाॅ से चल पड़ेंगे।"
"वाह चौधरी साहब।" अजय सिंह के चेहरे पर खुशी की चमक आ गई___"मानना पड़ेगा आपको। आपने भी ऐसा कारनामा कर रखा है जिसके बारे में वो लोग सोच भी नहीं सकते हैं।"
अजय सिंह की बात पर चौधरी बस मुस्कुरा कर रह गया। कुछ देर उन दोनो के बीच और भी कुछ बातें हुईं उसके बाद अजय सिंह चौधरी से इजाज़त लेकर उसके आवास से अपने गाॅव हल्दीपुर के लिए निकल लिया। चौधरी ने उसे जाने के लिए अपनी एक जीप दे दी थी।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,
आदित्य के साथ जब मैं नीचे आया तो देखा ड्राइंग रूम में केशव जी बैठे थे। हम दोनो को देखते ही उनके होठों पर मुस्कान उभर आई। उसके बाद उन्होंने मुझसे नीलम के बारे में पूछा तथा ये भी कहा कि वो खुद उसे देखना चाहते हैं। अतः मैं उन्हें अपने साथ ऊपर नीलम के कमरे में ले गया। कमरे में पहुॅच कर उन्होंने सबके सामने ही नीलम को देखा और फिर बड़े प्यार से उससे उसकी तबीयत का पूछा। उनके पूछने पर नीलम ने भी बड़ी शालीनता से अपनी तबीयत के बारे में उन्हें बता दिया। उसके बाद वो कमरे से बाहर आ गए और मेरे साथ ही नीचे आ गए। नीचे आकर मैं आदित्य के साथ बैठा ही था कि रितू दीदी भी आ गईं।
"उस जासूस का क्या हुआ मौसा जी?" नीचे आते ही रितू दीदी ने केशव जी की तरफ देखते हुए भावहीन स्वर में पूछा___"क्या आप उसे पकड़ने में कामयाब हुए?"
"हमारी किस्मत बहुत अच्छी थी रितू बेटा।" केशव जी ने कहा___"जिसके तहत वो हमारे हाॅथ लग गया। मेरा वो आदमी जिसने हमें उसके बारे में फोन पर बताया था उसका नाम निरंजन वर्मा है। उसने बड़ी बहादुरी का काम किया है। उसने मुझे बताया कि अगर उस जासूस की बाइक के अगले पहिये की हवा न निकली होती तो वो हमारे हाथ न लगता।"
"ये आप क्या कह रहे हैं मौसा जी?" रितू दीदी के साथ साथ हम सब भी हैरान हो गए, फिर दीदी ने कहा___"उस जासूस की बाइक की वजह से वो हमारे हाॅथ लगा है?"
रितू की इस बात पर केशव जी ने निरंजन और उस जासूस की सारी राम कहानी बताई। सारी बात सुनने के बाद हम तीनों ही चकित रह गए थे। कुछ देर तक कोई कुछ न बोला।
"ये तो बड़े ही आश्चर्य की बात है मौसा जी।
" मैने सोचने वाले भाव से कहा___"उस जासूस की बाइक के अगले पहिए में हवा नहीं थी इस लिए वो उतने समय तक वहाॅ रुका रहा। आपका वो आदमी भी वाकई में बड़ा काम का साबित हुआ। उसने उस जासूस को पकड़ने में अपनी जान तक दाॅव पर लगा दी। वरना अगर वो जासूस हाॅथ से निकल जाता तो यकीनन हमारे लिए बहुत बड़ा संकट हो सकता था।"
"बेशक।" केशव जी ने कहा___"अगर उसके बारे में हमें पता न चलता तो वो हमारा पीछा करता ही रहता और फिर जब उसे तुम लोगों के इस ठिकाने का पता चल जाता तो वह तुरंत ही मंत्री को सब कुछ बता देता। उसके बाद मंत्री क्या करता इसका तुम बखूबी अंदाज़ा लगा सकते हो।"
"अब इस मंत्री का खेल खत्म करना ही पड़ेगा।" सहसा रितू दीदी ने कठोर भाव से कहा___"मेरी चेतावनी के बावजूद इसने इतना बड़ा दुस्साहस किया और हमारे पीछे किसी जासूस को भी लगाया। अब तो इसका किस्सा खत्म करना ही पड़ेगा। बहुत हो गया अब।"
"मेरा भी यही ख़याल है दीदी।" मैने कहा___"कम से कम इससे इसकी तरफ से तो हम बेफिक्र हो जाएॅगे और फिर खुल कर तथा बेझिझक बड़े पापा से मुकाबला कर सकेंगे।"
"सही कहा तूने।" रितू दीदी ने कहा___"किन्तु उससे पहले हमें उस जासूस से मिलना भी होगा। उसे हम ऐसे ही नहीं छोंड़ सकते हैं। उसका भी कोई न कोई इंतजाम करना पड़ेगा हमें।"
"मेरे ख़याल से उसे हम तब तक अपने पास रखते हैं जब तक कि मंत्री का किस्सा खत्म नहीं हो जाता।" सहसा आदित्य कह उठा___"उसके बाद हम उसे छोंड़ सकते हैं। जब मंत्री ही नहीं रहेगा तो वो किसके लिए हमारे पीछे लग कर जासूसी करेगा?"
"आदी की बात एकदम करेक्ट है दीदी।" मैने कहा__"ऐसा ही करना चाहिए हमें।"
"आपका क्या कहना है मौसा जी?" रितू दीदी ने सहसा केशव की तरफ देखते हुए कहा___"ये तो सच है कि हम उस जासूस को मौजूदा हालात में छोंड़ नहीं सकते हैं और ना ही उसे जान से मारने का सोच सकते हैं। क्योंकि वो निर्दोष है। उसने वही किया है जो एक जासूस को करना चाहिए था। ये उसका पेशा ही है, अतः आप भी अपनी राय दीजिए कि क्या किया जाए?"
"देखो मैं तो एक ही बात जानता हूॅ बेटा।" केशव जी ने कहा___"कि ऐसे हर उस आदमी को खत्म कर दो जिससे हमें किसी प्रकार के ख़तरे का अंदेशा हो। किन्तु मामला चूॅकि एक जासूस का है इस लिए उसे खत्म करना ग़लत होगा। अतः मैं भी आदित्य की बात से सहमत हूॅ। यानी कि उसे तब तक यहाॅ कैद करके रखा जाय जब तक कि मंत्री का कल्याण नहीं हो जाता। मगर,
"मगर क्या मौसा जी?" रितू दीदी के माथे पर शिकन उभरी।
"मगर मुझे एक बात समझ नहीं आई।" केशव जी ने सोचने वाले अंदाज़ में कहा___"और वो ये कि जब मंत्री के खिलाफ़ तुम्हारे पास ऐसा डायनामाइट जैसा सबूत है तो उसे अब तक छोंड़ क्यों रखा था तुमने? जबकि होना तो यही चाहिए था कि उसे तुरंत ही कानून की चपेट में ले लिया जाता।"
"आपका सोचना बिलकुल सही है मौसा जी।
" रितू दीदी ने कहा___"किन्तु मंत्री को अब तक छोंड़े रखने के दो कारण थे। पहला ये कि उसे एहसास कराना था कि जब उसके खुद के बच्चों के साथ बहुत बुरा होता है तब कैसा महसूस होता है? दूसरा कारण ये कि उसके संबंध ऐसे ऐसे लोगों से हैं जिनकी पूर्ण जानकारी हमारे पास अभी भी नहीं है। ये तो लगभग सब जानते हैं कि वो कैसे कैसे ग़ैर कानूनी धंधा करता है किन्तु पुलिस के पास उसके खिलाफ़ ऐसे कोई सबूत नहीं हैं जिसकी वजह से उसे गिरफ्तार किया जा सके। मेरे पास भी उन वीडियोज के अलावा और कुछ नहीं है। मैं चाहती थी कि ये वाला मामला निपट जाने के बाद मंत्री के खिलाफ मौजूद उन सबूतों का पता करूॅगी। यही वजह थी कि मंत्री के मैटर को इतना लम्बा खींचना पड़ा। किन्तु अब ऐसा लगता है कि मंत्री को सबक सिखाना ही पड़ेगा। उसके सामने खुल कर जाना ही पड़ेगा और फिर उसकी ऑखों में ऑखें डाल कर उसे बताना पड़ेगा कि वो हमारा कुछ नहीं कर सकता है जबकि हम चाहें तो उसका कुछ भी कर सकते हैं।"
"ओह आई सी।" केशव जी ने कहा___"तो ये बात है। ठीक है फिर, जैसा तुम्हें बेहतर लगे वैसा करो। किन्तु हाॅ उससे पहले चलो उस जासूस से भी तो मिल लो तुम लोग। संभव है कि उससे भी कोई महत्वपूर्ण जानकारी मिल जाए।"
केशव जी की इस बात से हम सब सोफों से उठ कर खड़े हो गए और फिर केशव जी के साथ ही बाहर की तरफ चले गए। बाहर आकर हम सब केशव जी की कार में बैठ गए। आदित्य केशव जी के बगल में आगे की सीट पर बैठ गया था जबकि मैं और रितू दीदी पिछली सीट पर बैठ गए थे। हम सबके बैठते ही केशव जी ने कार को आगे बढ़ा दिया।
लगभग पाॅच मिनट बाद ही केशव जी ने कार को एक मकान के पास ले जाकर रोंका। कार के रुकते ही हम सब कार से बाहर आ गए। हम सबकी नज़र उस मकान पर पड़ी जिसके सामने के पोर्च पर एक लकड़ी का तखत रखा हुआ था और उसमे चार साॅवले रंग के आदमी बैठ कर ताश खेल रहे थे। कार की आवाज़ से ही उनका ध्यान हमारी तरफ गया था। जिससे उन चारों ने ताश खेलना बंद करके तखत से उतर गए थे।
हम तीनों केशव जी के पीछे पीछे मकान के पोर्च में आ गए। पोर्च में रुक कर केशव जी ने अपने एक आदमी से कहा सब ठीक है न? जवाब में आदमी ने बड़े अदब से हाॅ में सिर हिलाया। उस आदमी की हाॅ देख कर केशव जी मकान के अंदर की तरफ बढ़ चले। उनके साथ हम तीनों भी बढ़ चले थे।
ये मकान यूॅ तो पक्का ही था किन्तु इसकी हालत देख कर तथा केशव जी की छवि देख कर यही लगता था कि इस मकान पर केशव जी अपने आदमियों को रखते थे। या फिर उनके रहने की जगह ही यही थी।
हलाॅकि सोचने वाली बात तो ये भी थी कि केशव जी का कैरेक्टर ऐसा क्यों था कि उनके अंडर में ऐसे ऐसे लोग थे और उनका हर कहा भी मानते थे? इस बारे में हम सबके दिमाग़ में सवाल तो उभरा था किन्तु केशव जी से इस बारे में पूछने का या तो समय ही नहीं मिला था हमें या फिर हम उनकी निजी ज़िंदगी में कोई हस्ताक्षेप ही नहीं करना चाहते थे। हमारे लिए यही बहुत था कि वो हमारी मदद कर रहे थे।
मकान के अंदर भी कुछ लोग नज़र आए हमें जो कि अलग अलग जगहों पर इस वक्त खड़े दिख रहे थे। बाहर से अंदर आते ही सबसे पहले एक छोटा सा हाल था उसके बाद दोनो तरफ तीन तीन कमरे बने हुए थे। सामने की तरफ ऊपर के फ्लोर में जाने के लिए चौड़ी सीढ़ी थी। उस सीढ़ी के अगल बगल भी एक एक कमरा था। केशव जी के साथ हम तीनो सीढ़ी के दाहिने साइड वाले कमरे की तरफ बढ़ गए।
केशव जी के कहने पर ही एक आदमी ने उस कमरे का ताला खोला और फिर उसके बाद दरवाजा भी खोला। ये देख कर हमें समझते देर न लगी कि केशव जी इस मामले में काफी होशियारी से काम ले रहे थे। ख़ैर कमरे के अंदर हम सब दाखिल हुए तो बाॅए साइड ही दीवार से सट कर खड़े उस जासूस पर हमारी नज़र पड़ी। उसके दोनो हाॅथ ऊपर की तरफ एक साथ मोटी रस्सी से बॅधे थे। इतना ही नहीं उसके मुख पर एक टेप भी चिपका हुआ था ताकि वह चीखे चिल्लाए न। उसके दोनो हाॅथ तो ऊपर की तरफ रस्सी से बॅधे हुए थे ही साथ ही उसके दोनो पैर भी अलग अलग दिशा में फैले हुए रस्सी से बॅधे थे।
ये कमरा अंदर से एकदम खाली था। जासूस की स्थित देख कर ये समझना ज़रा भी मुश्किल नहीं था कि केशव जी ने उसका तगड़ा इंतजाम किया था। उसे इस हालत में देख कर मैं केशव जी की समझदारी का कायल हो गया।
"आपने तो मेहमान का बहुत अच्छे तरीके से स्वागत कर रखा है मौसा जी।" मैंने जासूस की तरफ एक नज़र डालने के बाद केशव जी से कहा___"ख़ैर कोई बात नहीं। इनके मुह से ज़रा ये टेप तो हटाइए। इन महानुभाव की मनमोहक आवाज़ सुनने का बहुत दिल कर रहा है।"
मेरी बात पर केशव जी मुस्कुराए और फिर राणे के मुख से टेप निकाल दिया। टेप के हटते ही राणे गहरी गहरी साॅसें लेने लगा। यद्यपि टेप तो सिर्फ उसके मुख पर ही चिपकाया गया था, साॅस लेने के लिए उसकी नाॅक तो खुली ही थी।
"हाॅ तो मिस्टर डिटेक्टिव।" मैने उस जासूस के बिलकुल पास आते हुए कहा___"आप इज्ज़त से खुद ही सब कुछ बताएॅगे या फिर मुझे आपके मुख से कुछ भी उगलवाने के लिए कोई दूसरा हथकंडा इस्तेमाल करना पड़ेगा? हलाॅकि मुझे उम्मीद है कि आप खुद ही सब कुछ बता देंगे। क्योंकि आप जासूस हैं और आपको पता है कि ऐसी परिस्थितियों में क्या होता है? ख़ैर, मैं आपकी जानकारी के लिए बता दूॅ कि जिस मंत्री के लिए आप जासूसी कर रहे थे वो इस प्रदेश का निहायत ही घटिया ब्यक्ति है। ऐसा कोई कुकर्म तथा ऐसा कोई जुर्म नहीं है जो वो करता न हो।
यहाॅ तक कि दूसरों की बहू बेटियों के साथ ग़लत तो करता ही है साथ ही उनका सौदा भी करता है। मैं ये सब बातें आपसे इस लिए बता रहा हूॅ ताकि आपको भी पता होना चाहिए कि आप जिसके लिए हमारा बेड़ा गर्क करने चले हैं वो कैसा इंसान है? अपने ज़मीर को जगाइये जासूस महोदय। जीवन में रुपया पैसा कमाने के लिए और भी कई अच्छे रास्ते हैं। जासूस का मतलब ये नहीं होता कि आप किसी के लिए भी काम करना शुरू कर दें। बल्कि उस ब्यक्ति के लिए काम करें जिसे आप समझते हों कि ये अच्छा ब्यक्ति है तथा इसे किसी बुरे इंसान ने सताया है।"
मेरी ये बातें सुन कर वो जासूस कुछ न बोला। बस मेरी तरफ देखता रहा। उसके चेहरे पर ऐसे भाव उभर आए थे जैसे एकाएक ही वह किन्हीं विचारों के आधीन हो गया हो। मैं कुछ देर तक उसे देखता रहा।
"आपको पता है ये कौन हैं?" मैने रितू दीदी की तरफ इशारा करके उस जासूस से कहा___"ये मेरी बड़ी बहन हैं और पुलिस में इंस्पेक्टर हैं। इन्होंने जब ये जाना कि कानूनन ये मंत्री के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर सकती हैं तो इन्होंने कानून को अपने हाॅथ में ले लिया।इन्होंने इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं की कि इसके लिए इन्हें कानून खुद कठोर सज़ा दे सकता है तथा अगर ये मंत्री जैसे राक्षस इंसान के पकड़ में आ गईं तो मंत्री इनका क्या हस्र कर सकता है। कहने का मतलब ये कि अपनी जान को जोखिम में डाल कर इन्होंने मंत्री के खिलाफ बिगुल बजाया हुआ है। सिर्फ इस लिए कि इस प्रदेश से मंत्री दिवाकर चौधरी जैसे लोगों की गंदगी दूर हो सके तथा ऐसे लोगों से मासूम व निर्दोष जनता को निजात मिल सके। रुपया पैसा सबकी ज़रूरत है जासूस महोदय किन्तु उससे बढ़ कर अपनी जान भी प्यारी होती है। हम सब सच्चाई की राह पर चलने वाले वो इंसान हैं जिनके सिर पर क़फन बॅधा हुआ है।"
"ये सब तुम क्या बातें सुना रहे हो दोस्त।" सहसा आदित्य ने कहा___"क्या तुम समझते हो कि तुम्हारी इन बातों से इस जासूस के विचार बदल जाएॅगे। नहीं भाई, इन्हें तो सिर्फ पैसों से मतलब हैं। इन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि प्रदेश में आम इंसानों के साथ क्या अत्याचार हो रहा है? मैं तो कहता हूॅ कि इससे कुछ पूछना ही बेकार है। हमारे पास जो भी सबूत मंत्री के खिलाफ है उसी के आधार पर हम उसे धर लेंगे।"
"आप लोग क्या जानना चाहते हैं मुझसे?" सहसा जासूस गंभीर भाव से बोल पड़ा___"पूछो, मैं सब कुछ बताने को तैयार हूॅ। मुझे भी इस बात का अंदेशा है कि मंत्री के खिलाफ़ खुद पुलिस विभाग गुप्त रूप से लगा हुआ है। मुझे पता है कि मंत्री तथा उसके साथी बहुत ही अपराधी किस्म के इंसान हैं। तुमने मुझे एहसास करा दिया है कि वाकई मैं ग़लत ब्यक्तियों का साथ दे रहा था। तुमने बिलकुल सही कहा भाई कि जीवन में पैसा ही सब कुछ नहीं होता है।"
"तो फिर बताइये।
" मैने मन ही मन हैरान होते हुए कहा___"कि मंत्री ने आपको किस किस काम के लिए हमारे पीछे लगाया था?"
"आप लोगों ने मंत्री को तथा उसके साथियों को इस लायक छोंड़ा ही नहीं है कि वो खुद इस मामले में कोई ऐक्शन ले सके।" जासूस ने कहा___"इस लिए उसने इस काम के लिए मुझे हायर किया। एक और महत्वपूर्ण बात है जो कि तुम्हारे लिए जानना बेहद ज़रूरी है। वो बात ये है कि मंत्री आपके ताऊ अजय सिंह के साथ भी मिला हुआ है। मैं अजय सिंह के ही पीछे लगा था और उसी का पीछा करते हुए मैं आज उस जगह पहुॅचा था जहाॅ तुम्हारा और अजय सिंह का आमना सामना हो रहा था। मैने उस सबकी सूचना फोन द्वारा मंत्री को दी थी। मंत्री को मैने कहा भी था कि वो अगर चाहें तो इस मौके पर खुद भी आकर तुम लोगों के साथ कुछ भी कर सकते हैं। मगर मंत्री ने शायद ये सोच कर इसके लिए बाद में मना कर दिया कि संभव है कि उस सूरत में तुम्हारे द्वारा उसके बच्चों का कुछ अहित हो जाता। इस लिए उसने मुझसे बस यही कहा कि मैं तुम लोगों के पीछे लग कर तुम्हारे ठिकाने का पता करूॅ। जैसे ही मेरे द्वारा उसे तुम लोगों के ठिकाने का पता चल जाता वैसे ही वो अपने दलबल के साथ तुम लोगों के ठिकाने पर धावा बोल देता।"
हरीश राणे की बात सुन कर हम सब बुरी तरह हैरान रह गए थे। हम सब ये जान कर चौंके थे कि अजय सिंह मंत्री से मिला हुआ है। इस तरफ तो हमने सोचा ही नहीं था और यकीनन ये हमारी सबसे बड़ी ग़लती भी थी। ख़ैर अब तो जासूस द्वारा हमें इस बात का पता चल ही चुका था।
"एक और बात।" तभी राणे ने फिर कहा___"जब मैने मंत्री से फोन पर बात की थी तो ये सवाल भी उभरा था कि संभव है कि अजय सिंह उसे धोखा दे रहा हो। क्योंकि उसने मंत्री को बताए बिना ही तुम सबको पकड़ने के लिए वो सब किया था। जबकि मंत्री से हुई दोस्ती के अनुसार उसे उस सबके बारे में मंत्री से बताना चाहिए था। इस बात पर मंत्री ने कहा था कि अगर अजय सिंह सचमुच उसे धोखा दे रहा है तो वो उसे इसके लिए सज़ा ज़रूर देगा। किन्तु अगर उसने ये सब ये सोच कर किया है कि बाद में वो हमें अपने भतीजे को तथा अपनी बेटी को हमारे सामने ले आएगा और अपनी दोस्ती का प्रमाण देगा तो यकीनन हम उसे जेल से भी छुड़ाएॅगे। मंत्री की इस बात से तुम लोग समझ सकते हो कि अजय सिंह जेल से उसके द्वारा छूट भी सकता है। अगर ये कहूॅ तो भी ग़लत न होगा कि वो अब तक छूट ही गया होगा।"
"ऐसा कैसे कह सकते हो तुम?" केशव जी ने पूछा।
"सीधी सी बात है।
" राणे ने कहा___"बात चाहे जो भी हो किन्तु मंत्री एक बार अजय सिंह से मिलना ज़रूर चाहेगा और मिल कर ये भी जानना चाहेगा कि उसने वो सब कारनामा उसको बिना बताए कैसे अंजाम दिया था? क्या इसके पीछे उसकी गद्दारी थी या फिर कुछ और? मंत्री की इस बात पर अजय सिंह ज़रूर यही कहेगा कि वो ये सब करके अपने भतीजे और अपनी बेटी को उसके सामने ले आकर उसे सरप्राइज के रूप में तोहफा देना चाहता था। किन्तु ऐसा हो न सका। अजय सिंह की ये बात सुन कर मंत्री को भी लगेगा कि अजय सिंह वास्तव में उसके लिए ये सब पाक़ भावना से करना चाहता था। अतः ये सोच कर मंत्री उसे जेल से ज़रूर छुड़ाएगा। जिस समय मैने उसे फोन पर अजय सिंह को पुलिस द्वारा ले जाने के बारे में बताया था। उस समय और अब के समय के बीच कई घंटों का फर्क़ हो चुका है। इस लिए ये संभव है कि अब तक मंत्री ने अजय सिंह को जेल से छुड़ा ही लिया होगा।"
"हम भी तो यही चाहते हैं जासूस महोदय।" मैने मुस्कुराते हुए कहा___"कि वो जेल से छूट कर फिर से बाहर आ जाए और इसी लिए रितू दीदी ने उसके छूट जाने का इंतजाम भी किया हुआ था।"
"क्या मतलब।" हरीश राणे बुरी तरह चौंका___"भला तुम लोग ऐसा क्यों चाहते हो? बात कुछ समझ में नहीं आई। ये सब क्या चक्कर है?"
"मंत्री को और अजय सिंह को अगर जेल में सड़ाना ही होता।" मैने कहा___"तो ये काम तो हम बहुत पहले ही कर चुके होते। मगर ऐसा किया नहीं क्योंकि इनके गुनाहों की सज़ा हम अपने तरीके से ही देना चाहते हैं। रितू दीदी ने पुलिस कमिश्नर से जब पुलिस प्रोटेक्शन की बात की तभी ये तय हो गया था कि अजय सिंह को सबके साथ पकड़ कर ले तो जाएॅगे मगर उस पर कोई केस नहीं बनाया जाएगा। केस न बनने से अजय सिंह का जेल से छूट जाना आसान ही हो जाना था। वरना आप खुद सोचिए जासूस महोदय कि उसने तो अपनी ही बेटी को जान से मारने की कोशिश की थी वो भी एसीपी के रिवाल्वर से। उस सूरत में तो वो लम्बे से नप सकता था। एसीपी रमाकान्त शुक्ला तो गुस्से में आकर अजय सिंह पर केस बनाने के लिए तैयार भी हो गया था किन्तु कमिश्नर साहब ने इसके लिए उसे मना कर दिया। वरना अगर केस बन जाता तो मंत्री इतनी सहजता से अजय सिंह को छुड़ा न पाता। उसकी पहुॅच का भी कोई असर न होता। क्योंकि एसीपी कोई मामूली ब्यक्ति नहीं था। उसे केन्द्र से भेजा गया है, इस लिए उसके काम में किसी की भी दखलअंदाज़ी नहीं चलती।"
"अगर ऐसी बात है।" राणे ने कहा___"तो फिर वो इस सबके लिए राज़ी कैसे हो गया? मेरे कहने का मतलब ये है कि जैसा कि तुमने कहा कि एसीपी को केन्द्र सरकार ने भेजा है तथा उसके काम में कोई हस्ताक्षेप भी नहीं कर सकता तो फिर ये कैसे हो गया कि उसने अजय सिंह पर कमिश्नर के मना कर देने पर केस ही नहीं बनाया? जबकि उसे तो इस मामले में शख्त से शख्त कार्यवाही ही करनी चाहिए थी।
"
"वो यहाॅ शख्त कार्यवाही के लिए ही आया था।" रितू दीदी ने हस्ताक्षेप किया___"किन्तु कमिश्नर साहब ने उसे यहाॅ के सारे हालातों के बारे में बताया, ये भी कि कैसे मैं अपने ही माॅ बाप के खिलाफ हूॅ और कैसे मंत्री का काम तमाम करने के काम पर लगी हुई हूॅ? सारे हालातों पर ग़ौर करने के बाद वो इसके लिए तैयार हो ही गया। दूसरी बात ये भी थी कि उसे यहाॅ भेजा ही इस लिए गया है कि वो मंत्री जैसे लोगों की गंदगी को इस प्रदेश से मिटा सके और ये काम तो मैं कर ही रही हूॅ। उसे तो इस प्रदेश की गंदगी मिटाने से मतलब है फिर चाहे वो किसी भी तरीके से मिटाई जाए।"
"ओह तो ये बात है।" राणे को जैसे सब कुछ समझ आ गया था, फिर बोला___"किन्तु शुरू में मैने महसूस किया था कि मैने जब मंत्री और अजय सिंह के एक होने की बात बताई तो तुम सब उस बात से हैरान हो गए थे। इसका मतलब ये हुआ कि तुम लोगों को इस बात का अंदेशा तक नहीं था कि अजय सिंह और मंत्री आपस में मिले भी हो सकते हैं?"
"कमिश्नर साहब ने फोन पर मुझे ये ज़रूर बताया था।" रितू दीदी ने कहा___"कि मंत्री ने उन्हें फोन किया था तथा फोन पर वो ऐसे सवाल जवाब कर रहा था जैसे ये जानना चाहता हो कि पुलिस गुप्त रूप से कहीं उसके पीछे तो नहीं लगी हुई है। उसने बातों बातों में इस बात को भी पूछा था कि हल्दीपुर के ठाकुर अजय सिंह को पुलिस पकड़ कर ले गई है तो ये सब क्या चक्कर है? उसने कमिश्नर से घुमा फिरा कर ये भी कहा कि सुना है कि अजय सिंह की बेटी पुलिस में है और अपने बाप के खिलाफ भी है। मंत्री के पूछने पर कमिश्नर साहब ने यही कहा कि ये सब पारिवारिक मामला है अतः उन्हें इस बारे में ज्यादा पता नहीं है। कहने का मतलब ये कि ये तो समझ में आया कि मंत्री ने कमिश्नर से अजय सिंह का ज़िक्र किया मगर उसकी बातें ऐसी थी कि उससे इस बात का अंदेशा उस वक्त मुझे न हो पाया था कि वो अजय सिंह से वास्तव में मिला हुआ ही हो सकता है। दूसरी बात ये कि मेरे मुखबिरों ने भी ऐसी किसी बात का ज़िक्र नहीं किया। जबकि मैने तो दोनो के ही पीछे मुखबिर लगाए हुए थे।"
"कमाल की बात है।" राणे मुस्कराया___"कैसे मुखबिर थे जो ये भी न पता लगा सके कि अजय सिंह और मंत्री कब कहाॅ किससे मिलते हैं? जैसा कि तुमने बताया कि तुमने इन दोनो के पीछे मुखबिर लगाया हुआ था तो ये कैसे हो सकता है कि तुम्हारे मुखबिरों को इन दोनो की गतिविधियों का पता ही न चल सके? अजय सिंह के पीछे लगा हुआ मुखबिर बड़ी आसानी से पता लगा सकता था कि वह कब कहाॅ जाता है? यानी अगर वो मंत्री से मिलने उसके आवास पर जाता तो क्या ये सब उस मुखबिर ने अपनी ऑखों से नहीं देखा होता? इसका तो यही मतलब हुआ कि तुम्हारे मुखबिरों ने अपना काम इमानदारी से किया ही नहीं बल्कि तुम्हें धोखे में ही रखा।"
राणे की इस बात से रितू दीदी तुरंत कुछ बोल न सकीं थी।
मैने भी हैरानी से उनकी तरफ देखा था। रितू दीदी के चेहरे पर कई तरह के भाव आए और चले भी गए। सहसा उनके चेहरे पर कठोर भाव उभर आए।
"यकीनन ऐसा ही है।" फिर उन्होंने गहरी साॅस लेकर कहा___"मेरे मुखबिरों ने अपना काम सही से नहीं किया। इसके लिए उन्हें कठोर दंड ज़रूर मिलेगा। दोनो तरफ की घटनाओं से इस बात की तरफ मेरा ध्यान भी नहीं गया। दूसरी बात मुझे अपने मुखबिरों से इस बात की उम्मीद भी नहीं थी कि वो कमीने ऐसी लापरवाही करेंगे।"
"चलो कोई बात नहीं रितू बेटा।" सहसा केशव जी ने कहा___"माना कि तुम्हारे मुखबिरों ने इस काम में थोड़ी नहीं बल्कि बहुत ही ज्यादा लापरवाही दिखाई किन्तु इससे हमें नुकसान तो नहीं हुआ न? अतः इस बात को छोंड़ो और अब ये सोचो की आगे क्या करना है?"
"मैं भी ये कहना चाहता हूॅ कि।" रितू दीदी के बोलने से पहले ही राणे बोल पड़ा____"अब आप लोगों को भी मुझे यहाॅ से जाने देना चाहिए। आप लोगों को मैने पूरी इमानदारी से सारी बातें सच सच बता दी हैं। अतः अब मुझे इस तरह यहाॅ कैद करके रखने का तो कोई मतलब नहीं बनता न।"
"ज्यादा होशियारी दिखाने की कोशिश मत करो जासूस महोदय।" मैने कहा___"माना कि आपने हमें सारी बातें सच सच बता दी हैं। मगर मौजूदा हालात में इसके बावजूद हम आपको यहाॅ से जाने नहीं दे सकते। क्योंकि इतना तो हम भी सोच सकते हैं कि आपने ये सब ये सोच कर बता दिया हमे कि सब कुछ सुनने के बाद हमें यही लगे कि अब आप हमारे ही हक़ में हैं और हमारा किसी भी तरह का नुकसान नहीं कर सकते हैं। इस लिए हम आपको छोंड़ देंगे। जबकि यहाॅ से छूटते ही आप पुनः अपना रंग बदल सकते हैं और हमारा काम तमाम करवा सकते हैं। इस लिए जासूस महोदय आपको छोंड़ देने का काम तो फिलहाल हम किसी भी सूरत में नहीं कर सकते। अतः आप अपने दिमाग़ से छूटने का ख़याल निकाल दें। किन्तु हाॅ हम ये वादा करते हैं कि यहाॅ आपको कोई तक़लीफ नहीं होने देंगे और जैसे ही मंत्री का काम तमाम हो जाएगा वैसे ही आपको भी यहाॅ से आज़ाद कर दिया जाएगा।"
"सबसे पहली बात तो तुम मुझे जासूस महोदय कहना बंद करो।" राणे ने कहा___"मेरा नाम हरीश राणे है। अतः मुझे राणे कह कर संबोधित कर सकते हो। दूसरी बात तुम बेवजह ही ये शक कर रहे हो कि यहाॅ से चूटते ही मैं ऐसा वैसा कुछ कर दूॅगा। मेरा यकीन करो यंग मैन, मुझे रियलाइज हो चुका है कि मैं जो कुछ भी अब तक मंत्री के लिए कर रहा था वो उचित नहीं था। मुझे पता है कि मंत्री और उसके सभी साथी जुर्म व अपराध करने वाले महान पापी हैं। इस लिए अब मैं उनके लिए कोई काम नहीं करूॅगा। बल्कि यहाॅ से छूटने के बाद मैं वापस अपने शहर लौट जाऊॅगा।"
"हो सकता है कि आपकी बातें सच ही हों मिस्टर राणे।" मैने कहा___"मगर चूॅकि आप एक जासूस हैं अतः आप भी समझ सकते हैं कि मौजूदा हालात मैं हम आपको छोंड़ देने का जोखिम नहीं उठा सकते।
इस लिए आप इसके लिए हमे माफ़ करें और यहीं रहें।"
मेरी बात सुन कर राणे बेबस भाव से मुझे देखता रह गया। फिर एकाएक ही उसके होठों पर मुस्कान उभर आई, बोला___"सही कहते हो भाई। मैं समझ सकता हूॅ कि ऐसे हालात में तुम मुझे यकीनन छोंड़ देने का जोखिम नहीं उठा सकते। ख़ैर कोई बात नहीं, जैसा तुम्हें अच्छा लगे करो। और हाॅ मेरी तरफ से बेस्ट ऑफ लक इसके लिए।"
राणे की ये बात सुन कर हम सब मुस्कुराए और फिर केशव जी के इशारे पर एक आदमी ने पुनः राणे के मुख में टेप चिपका दिया। उसके बाद सभी आदमियों को कुछ ज़रूरी हिदायतें दे कर हम सब वहाॅ से बाहर की तरफ चल पड़े।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर अजय सिंह जब हवेली पहुॅचा तो शाम के चार बज चुके थे। अजय सिंह को प्रतिमा ड्राइंग रूम में ही बैठी मिली थी। उसके चेहरे से साफ पता चल रहा था कि वो अपने पति के लिए कितनी चिंतित व परेशान थी। उसने अपनी वकील दोस्त अनीता ब्यास से फोन पर बात की थी। अनीता के पूछने पर उसने संक्षेप में कुछ बातें बताई थी उसे। उसकी उस दोस्त ने उसे आश्वस्त किया था कि वो चिंता न करे, वो उसके पति को छुड़ाने की पूरी कोशिश करेगी। उसने प्रतिमा से कहा था कि वो शाम को उससे मिलने भी आएगी।
इधर अजय सिंह जैसे ही ड्राइंग रूम में दाखिल हुआ तथा प्रतिमा के बगल वाले सोफे पर बैठा वैसे ही कहीं खोई हुई प्रतिमा का ध्यान अजय सिंह की तरफ गया। उसे पहले तो यकीन नहीं हुआ किन्तु फिर एकाएक ही उसके चेहरे पर पहले हैरानी के भाव उभरे उसके बाद तुरंत ही खुशी के भावों ने उसका मुरझाया हुआ चेहरा ताज़े खिले गुलाब की मानिन्द खिला दिया।
"ओह अजय तुम आ गए।" खुशी से फूली न समाती हुई प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा था किन्तु तुरंत ही उसके चेहरे पर हैरानी व उलझन के भाव भी उभर आए, बोली___"मगर तुम वहाॅ से आ कैसे गए अजय? तुम्हें तो पुलिस का वो एसीपी गिरफ्तार करके ले गया था न? फिर तुम पुलिस से छूट कर आ कैसे गए? क्या पुलिस ने तुम्हें यूॅ ही छोंड़ दिया या फिर तुमने कुछ ऐसा वैसा किया है?"
"मैने कुछ भी ऐसा वैसा नहीं किया है प्रतिमा।" अजय सिंह ने सपाट लहजे में कहा___"बल्कि मुझे मंत्री जी ने पुलिस से ज़मानत पर छुड़ाया है। मगर...।"
"मगर क्या अजय??" प्रतिमा के माॅथे पर बल पड़ा।
"यही कि मंत्री का तो नाम ही है कि उसने मुझे पुलिस से छुड़ाया है।" अजय सिंह ने सोचने वाले भाव से कहा___"सच तो ये कि पुलिस मुझे खुद ही छोंड़ देना चाहती थी।"
"ये..ये क्या कह रहे हो तुम?" प्रतिमा हैरान___"भला पुलिस तुम्हें क्यों छोंड़ना चाहेगी? और....और ऐसा भला तुम कैसे कह सकते हो?"
"बेवकूफी भरे सवाल मत करो प्रतिमा।" अजय सिंह ने नाराज़गी के साथ कहा___"साधारण मामला होता तो सोचा भी जा सकता था कि पुलिस ने मामूली बात पर पकड़ा और फिर छोंड़ भी दिया। किन्तु ये मामला साधारण नहीं था।
मैने एसीपी का रिवाल्वर छीन कर उसके सामने ही नीलम को गोली मारी थी। इस लिए इस अपराध के लिए तो मुझे लम्बे से नप जाना चाहिए था। मुझ पर साफ साफ अटेम्प्ट टू मर्डर का केस लगता। तुम अच्छी तरह जानती हो कि इस केस के तहत मेरा कानून से छूटना उस सूरत में तो नामुमकिन ही था जबकि उस संगीन अपराध का चश्मदीद गवाह खुद एसीपी ही था। इतने बड़े अपराध के बावजूद वो मंत्री मुझे बड़ी आसानी से छुड़ा लाया। वो साला समझता होगा कि ये सब उसके रुतबे तथा दबदबे का कमाल है जबकि ऐसा है नहीं। बल्कि सच्चाई यही है कि पुलिस खुद चाहती थी कि मैं सहजता से छूट जाऊॅ। इसका मतलब ये भी हुआ कि उस संगीन अपराध के लिए एसीपी ने मुझ पर कोई केस ही नहीं बनाया है।"
"बात तो तुम्हारी यकीनन सौ पर्शेन्ट सही है।" प्रतिमा के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभरे___"किन्तु सवाल ये है कि पुलिस ऐसा क्यों चाहेगी कि तुम उसकी गिरफ्त से आसानी से छूट जाओ? दूसरी बात, अगर पुलिस को तुम्हें इस तरह सहजता से छोंड़ ही देना था तो उस वक्त उसने तुम्हें गिरफ्तार ही क्यों किया था?"
"कमाल है।" अजय सिंह ने हैरानी से प्रतिमा की तरफ देखा, फिर बोला___"ये सब तुम पूछ रही हो प्रतिमा? जबकि तुम तो छोटी सी छोटी बात को पकड़ कर उलझी हुई बातों को सुलझाने में माहिर हो।"
"हाॅ मगर।" प्रतिमा ने कहा___"तब जब मन में तुम्हारे प्रति ऐसी चिंता नहीं होती। हलाॅकि सोच तो मैं अभी भी सकती हूॅ। किन्तु तुम खुद ही बता दो तो क्या बुराई है?"
"ये तो साबित हो चुका है कि।" अजय सिंह ने कहा___"विराज मुझसे कानूनी रूप से कोई बदला नहीं लेना चाहता। क्योंकि अगर उसे इस तरीके से लेना ही होता तो वो ये काम पहले ही कर लेता। यानी कि मेरे खिलाफ उसके पास जो सामान है उसे वो पुलिस को सौंप देता और बता देता कि ये सब उसके ताऊ यानी कि मेरा है। बस खेल खत्म। किन्तु उसने ऐसा नहीं किया। मतलब साफ है कि वो जो कुछ भी करेगा अपने तरीके से तथा अपने बलबूते पर करेगा। नीलम व सोनम को यहाॅ से ले जाने वाला वाक्या जब सामने आया तो उसे बखूबी पता था कि हम उसके मंसूबों को नाकाम करने की जी तोड़ कोशिश करेंगे। ये सोच कर उसने भी अपने पक्ष को मजबूत किया। रितू ने उसे सुझाव दिया होगा कि अगर इसके बावजूद उसका पलड़ा कमज़ोर पड़ता है तो उस सूरत में वो पुलिस का सहारा लेगी। पुलिस फोर्स के आ जाने से सारा मामला ही उलट जाएगा और फिर वो बड़ी आसानी से नीलम व सोनम को अपने साथ ले जाएॅगे और कोई कुछ कर भी नहीं पाता। ऐसा हुआ भी। किन्तु उसे ये उम्मीद नहीं थी कि इस सबके बीच नीलम को मेरे द्वारा गोली भी मार दी जाएगी। उनका मकसद तो इतना ही था कि पुलिस के आने के आने के बाद जब मैं और मेरे आदमी कुछ नहीं कर पाएॅगे तो वो बड़े आराम से नीलम व सोनम को ले जाएॅगे और मेरे माॅथे पर एक और हार व नाकामी की मुहर लगा जाएॅगे।
किन्तु नीलम को गोली लगने से मामला थोड़ा बिगड़ गया। उसे लगा कि सबके साथ मुझे गिरफ्तार तो होना ही था और फिर बाद मुझे छोंड़ ही दिया जाना था, किन्तु नीलम को गोली मार देने से केस बन जाने वाली बात हो गई थी। केस बन जाने की सूरत में मेरा पुलिस से छूटना मुश्किल हो जाता। जो कि विराज हर्गिज़ भी नहीं चाहता था। तब उसने रितू से कहा होगा कि वो कुछ ऐसा करे कि मुझ पर कोई केस ही न बने। उस सूरत में फिर जब कोई मुझे ज़मानत पर छुड़ाने आएगा तो मैं आसानी से छूट जाऊॅगा। विराज के इस सुझाव को या यूॅ कहो कि उसकी इस इच्छा को रितू ने तुरंत मान लिया होगा और फिर उसने ऐसा ही कोई इंतजाम कर दिया होगा। जिसका नतीजा ये निकला कि बाद में मंत्री मुझे बड़ी आसानी से छुड़ाने में कामयाब हो गया। दैट्स आल।"
"ओह तो ये बात है।" प्रतिमा ने कहा___"वैसे कमाल की बात है कि आज तुम्हारा दिमाग़ भी काफी शार्प साबित हुआ जो इतनी बारीकी से ये सब सोचा और इस सबका जूस निकाल कर भी रख दिया। मगर....।"
"अब क्या हुआ??" अजय सिंह बोल पड़ा।
"तुमने नीलम को जान से मारने की कोशिश क्यों की अजय?" प्रतिमा ने सहसा गंभीर होकर कहा___"उसने तो हमारे साथ ऐसा वैसा कुछ भी नहीं किया था। उस वक्त भी उसने तुमसे उस लहजे में सिर्फ इसी लिए बात की क्योंकि तुमने उससे बात ही ऐसे गंदे तरीके से की थी। तुम खुद सोचो अजय कि तुमने जीत के अहंकार तथा आवेश में आकर कितना ग़लत ब्यौहार किया था। सबके सामने तुम्हें अपनी ही बेटी से उस तरीके से बात नहीं करनी चाहिए थी। क्योंकि इसका असर हमारे ही आदमियों पर पड़ेगा। वो सोचेंगे कि जो इंसान सबके सामने अपनी ही बेटी के साथ ऐसी अश्लीलता और ऐसी कूरता कर सकता है वो वास्तव में कितना घटिया होगा। हाॅ अजय, इससे हमारी ही इमेज ख़राब होती है। कोई भी सभ्य लड़की ये बर्दाश्त नहीं कर पाएगी कि सबके सामने उसका ही बाप उससे ऐसी अश्लीलता से बात करके उसे जलील व शर्मसार करे।"
"यकीनन सच कह रही हो तुम।" अजय सिंह ने गहरी साॅस लेकर कहा___"बाद में मुझे भी एहसास हुआ कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। मगर उस वक्त हालात ही ऐसे बन गए थे कि मैं आपे से बाहर हो गया था। एक तो मैं उस हरामज़ादे की बातों से तथा उसे देख कर पागल हुआ जा रहा था जिसने अब तक मुझे शिकस्त ही दी थी। साला ऐसे ऐसे डाॅयलाग बोल रहा था कि मेरे अंदर उन डायलाग को सुनकर उन्हें सहने की शक्ति ही नहीं बची थी। मुझे लग रहा था कि उस हराम के पिल्ले को कैसे भी करके खत्म कर दूॅ और ऐसा होता भी अगर वहाॅ पुलिस फोर्स न आ गई होती तो। मैं अंदर ही अंदर एक और हार व नाकामी से पागल व ब्यथित हुआ जा रहा था ऊपर से मेरी दोनो बेटियों ने सामने आकर जो कुछ कहा उसने मेरे गुस्से को और भी बढ़ा दिया था। रही सही कसर नीलम ने सबके सामने मुझे थप्पड़ मार कर पूरी कर दी थी।
बस उसके बाद मैंने अपना आपा खो दिया और वो सब कर बैठा। तुम खुद अंदाज़ा लगा सकती हो प्रतिमा कि उस वक्त मैं किस मानसिक हालत में रहा होऊॅगा?"
"चलो ये सुन कर अच्छा लगा कि तुम्हें नीलम को गोली मारने वाली बात पर अपनी ग़लती का एहसास हुआ।" प्रतिमा ने कहा___"किन्तु क्या तुम्हारे मन में ये विचार भी उठा है कि तुम्हें एक बार नीलम का हाल चाल जान लेना चाहिए? कुछ भी हो आख़िर वो है तो हमारी बेटी ही।"
"नहीं प्रतिमा।" अजय सिंह का चेहरा एकाएक कठोर हो गया, बोला___"मेरे लिए मेरी दोनो बेटियाॅ अब मर चुकी हैं। इस दुनियाॅ में अब तुम्हारे और हमारे बेटे के अलावा मेरा कोई नहीं है। एक बात और आज के बाद तुम मुझसे उन दोनो के बारे में कोई भी बात नहीं करोगी। ये मेरी पहली और आख़िरी वार्निंग है।"
"मर्द कभी नहीं समझ सकता एक औरत की पीड़ा को।" प्रतिमा ने सहसा भारी स्वर में कहा___"मगर मुझे तुमसे उम्मीद थी अजय कि तुम मेरी पीड़ा को समझोगे।"
"कहना क्या चाहती हो तुम?" अजय सिंह ने अजीब भाव से प्रतिमा की तरफ देखा।
"तुम जानते हो अजय कि मैं आज भी तुमसे उतना ही प्यार करती हूॅ जितना पहले करती थी।" प्रतिमा ने कहा___"और मैं जाने कितनी बार तुम्हें अपने बेपनाह प्यार का सबूत भी दे चुकी हूॅ। तुम्हारे सिर्फ एक इशारे पर मैं पराए मर्द के नीचे खुशी खुशी लेट गई। कभी इसके लिए तुमसे शिकायत नहीं की और ना ही तुमसे नाराज़ हुई। तुम्हारी हर खुशी में मैने अपनी खुशी देखी। तुम्हारी तरह सबके लिए कठोर भी बन गई। मगर मैं एक औरत के साथ साथ एक माॅ भी हूॅ अजय। औलाद चाहे जैसी भी हो वो अपनी माॅ के लिए सबसे सुंदर व सबसे अनमोल होती है। मुझे अब तक इतनी ज्यादा तकलीफ़ नहीं हुई थी किन्तु इस हादसे से हुई है। मैं मानती हूॅ कि मेरी दोनो बेटियों ने हमारे खिलाफ जा कर ग़लत किया है मगर जब ये सोचती हूॅ कि उन दोनो ने ऐसा क्यों किया तब इस क्यों के जवाब को सोच कर ही दिल दहल जाता है। आख़िर अपने सामने तो इस सच्चाई को हमें भी मानना ही पड़ेगा न कि हमने अपनी ही बेटियों के साथ तथा बाॅकी सबके साथ ग़लत सोचा और ग़लत किया भी।"
"इन सब बातों को कहने का क्या मतलब है?" अजय सिंह ने कहा___"और....और आज अचानक ये बातें ही क्यों? नहीं प्रतिमा, अब इन सब बातों को सोचने का कोई मतलब नहीं है और सोचना भी नहीं। क्योंकि अब बात बहुत आगे निकल चुकी है। अब तो इसका फैसला दो पक्षों में से किसी एक पक्ष के खत्म हो जाने पर ही होगा। उसके पहले तो कुछ हो ही नहीं सकता। इसके पहले तो ये था कि मैंने ये सब अपने बीवी बच्चों के लिए किया किन्तु अब ये भी है कि जिन चीज़ों की ख्वाहिश थी उसे हर हाल में पूरा करना है। अगर मेरे द्वारा वो सब बरबाद हुए हैं तो उनके द्वारा मेरा भी तो बहुत कुछ नुकसान हुआ। इस लिए अब ऐसी बातें अपने ज़हन में मत लाओ।
ख़ैर छोंड़ो, मुझे भी ज़रा फ्रेश होना है। एक बात और, चिंता की कोई बात नहीं है। विराज भले ही मुझे शिकस्त देकर चला गया है मगर बहुत जल्द उसका भी किस्सा खत्म होने वाला है। क्योंकि मंत्री ने उसके पीछे जासूस लगाया हुआ है। वो जासूस बहुत जल्द उसके ठिकाने का पता मंत्री जी को देगा उसके बाद मंत्री विराज के ठिकाने पर धावा बोल देगा। उस साले विराज के साथ साथ तुम्हारी दोनो बेटियों का भी खेल खत्म हो जाएगा।"
ये सब कहने के बाद अजय सिंह उठा और अंदर कमरे की तरफ बढ़ गया। जबकि उसकी बातें सुनने के बाद प्रतिमा पहले तो हैरान हुई फिर सामान्य हो कर बैठी रही। चेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते रहे।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उस वक्त रात के दो बज रहे थे।
गुनगुन स्थित मंत्री दिवाकर चौधरी के बॅगले के पिछले भाग पर जहाॅ कि अशोक व देवदार जैसे पेड़ लगे हुए थे दो काले साए अॅधेरे में छिपे खड़े थे। दोनो के ही जिस्मों पर काला स्याह लबादा था। यहाॅ तक कि दोनो के चेहरे तथा हाॅथ तक काले कपड़ों से ढॅके हुए थे। चेहरे व सिर पर चढ़े काले मास्क से सिर्फ उनकी ऑखें ही झाॅक रही थी या फिर ये भी कि जब वो दोनो बात करने के लिए मुह खोलते तो उनके दाॅत चमक उठते थे। कहने का मतलब ये कि वो दोनो ही सिर से लेकर पाॅव तक काले किन्तु चुस्त दुरुस्त कपड़ों से ढॅके हुए थे।
बॅगले के चारो तरफ बाउण्ड्री वाल थी जिसमें थोड़ी थोड़ी दूरी पर रोशनी के लिए मध्यम साइज के एलईडी बल्ब लगे हुए थे। बाउण्ड्री वाल के अंदर तथा बाहर दोनो तरफ हाॅथों में गन लिए गार्ड्स भी खड़े नज़र आ रहे थे। रात के इतने समय भी वो सब मुस्तैदी से खड़े थे। उन सभी के जिस्मों पर भी काले ही कपड़े थे तथा सिर पर काली कैप थी।
बॅगले का मुख्य दरवाजा जो कि खालिश स्टील का ही था। उस दरवाजे के पास भी दोनो तरफ गनमैन तैनात थे। ख़ैर हम बात कर रहे थे उन दो रहस्यमय सायों की। ये दोनो ही साए क़रीब दस मिनट से उन पेड़ों के पास अॅधेरे में छिपे खड़े थे। बारह फीट ऊॅची बाउण्ड्री वाल को दोनो ने बड़ी ही दक्षता से लाॅघ लिया था। जिसके लिए उन्हें रस्सी की मदद लेनी पड़ी थी। उनकी चारो ऑखें बड़ी बारीकी से चारो तरफ का अध्ययन कर रही थीं। दोनो ने एक बात नोट की कि जितने भी गनमैन वहाॅ तैनात थे वो सब अपनी जगह पर ही कायम थे। यानी वो सब अपनी पोजीशन नहीं बदलते थे। सिर्फ दो ही ऐसे गनमैन थे जो हर पाॅच मिनट में इस तरफ आते थे और फिर इधर उधर सरसरी सी नज़र डाल कर वापस लौट जाते थे।
बाउण्ड्री वाल से बॅगले की इमारत की दूरी लगभग बीस फुट थी। नीचे ज़मीन पर चारो तरफ विदेशी घाॅस उगी हुई थी। बाउण्ड्री वाल की तरफ ही ये सारे पेड़ लगे हुए थे। हलाॅकि बीच बीच में ऐसे छोटे छोटे पौधे भी लगे हुए थे जो अक्सर बाग़ों की शोभा बढ़ाने के उपयोग में आते थे। किन्तु ये पौधे दो तरफ ही दिख रहे थे।
सामने की तरफ विदेशी घाॅस तो थी ही साथ ही बीचो बीच सफेद मारबल लगा हुआ था जो कि मुख्य दरवाजे तक था।
इस बार जब वो दोनो गनमैन आकर वापस लौटे तो उन दोनो सायों की नज़रें आपस में मिलीं और फिर दोनो ही बारी बारी पेड़ के पास से निकल कर बड़ी तेज़ी से इमारत की दीवार की तरफ उस हिस्से की तरफ बढ़े जहाॅ पर लगभग पंद्रह फुट की ऊॅचाई पर एक शीशे की खिड़की थी तथा उस खिड़की के सामने ही छोटी सी बालकनी थी। खिड़की पर देखने से ऐसा प्रतीत होता था जैसे अंदर अॅधेरा हो। बालकनी में भी स्टील की रेलिंग लगी हुई थी। ये हिस्सा बॅगले के बाएॅ साइड था।
बालकनी के नीचे पहुॅचते ही एक साए ने तुरंत ही अपने हाॅथ में ली हुई रस्सी को एक हाॅथ से गोल गोल घुमाया और फिर तेज़ी से ऊपर की तरफ उछाल दिया। रस्सी बड़े वेग से लहराती हुई ऊपर की तरफ गई और रेलिंग के ऊपरी भाग से ऊपर उठ कर वापस नीचे की तरफ आने को हुई तो वो रेलिंग के दूसरे हिस्से से पर फॅस गई। हलाॅकि रस्सी के छोर पर लगे लोहे के मामूली से राॅड से आवाज़ हुई किन्तु वो आवाज़ बहुत धीमी हुई थी। क्योंकि वो राॅड स्टील में लगने के साथ ही नीचे से ऊपर की तरफ उठा तो वो बीच से निकल कर नीचे दीवार पर टकरा गया था।
"जल्दी करो।" दूसरे साए ने धीमी आवाज़ में उस पहले साए से कहा जिसने रस्सी को ऊपर बालकनी की तरफ उछाला था, बोला___"हमें पाॅच मिनट से पहले ऊपर पहुॅचना होगा। वरना वो दोनो गनमैन फिर से इधर आ जाएॅगे।"
"बस हो ही गया है।" पहले साए ने ऊपर देखते हुए अपने एक हाॅथ को हल्का सा झटका दिया। परिणामस्वरूप दीवार के पास ही झूल रहा वो मामूली सा राॅड तेज़ी से नीचे सरका और कुछ ही पलों में पहले वाले साए के हाॅथ में आ गया। राॅड के हाॅथ में आते ही उसने दूसरे साए की तरफ देख कर बोला___"गो।"
पहले साए की बात सुनते ही दूसरा साया तेज़ी से आगे बढ़ा और रस्सी के दोनो भागों को पकड़ कर पहले उसे हल्का सा अपनी तरफ खींचा। जैसे चेक कर रहा हो कि सब ठीक है कि नहीं। उसके बाद वो दोनों हाॅथों से रस्सी को थोड़ा और ऊपर से पकड़ा और फिर झूल गया। कुछ ही पलों में वो रस्सी में झूलता हुआ ऊपर बालकनी के पास पहुॅच गया। नीचे खड़ा पहला साया चारो तरफ देख रहा था। तभी ऊपर पहुॅच गए साये ने रस्सी को झटका दिया तो नीचे खड़े साए ने उसकी तरफ देखा। ऊपर पहुॅच चुके साए ने हाॅथ के इशारे से उसे ऊपर आने को कहा।
उसका इशारा मिलते ही पहला वाला साया भी रस्सी को पकड़ कर ऊपर झूलते हुए कुछ ही पलों में पहुॅच गया। उसके पहुॅचते ही दूसरे साए ने रस्सी को ऊपर खींच लिया। तभी पहले वाले साए ने नीचे देखा, वो दोनो गन मैन इसी तरफ आ रहे थे। ये देख कर दोनो साए वहीं बालकनी पर बैठ कर छिप गए। थोड़ी ही देर में उन्होंने देखा कि वो दोनो गन मैन वापस जा रहे हैं तो ये दोनो भी उठ गए।
"चलो अब काम पर लग जाओ।
" दूसरे साए ने धीमी आवाज़ में कहा___"किन्तु सावधानी से।"
"जो हुकुम।" पहले साए ने अदब से सिर को हल्का सा खम करते हुए धीमी आवाज़ में कहा।
पहले वाले साए ने पलट कर खिड़की को देखा। उस खिड़की पर शीशा लगा हुआ था तथा दो पल्लों की खिड़की थी। पहले साए ने खिड़की में हाॅथ लगा कर उसे अंदर की तरफ हल्के से पुश किया तो कुछ न हुआ। मतलब साफ था खिड़की के दोनो पल्ले अंदर से बंद थे।
"ये अंदर से बंद है।" पहले वाले साए ने पलट कर दूसरे साए से कहा___"शुकर है कि हम काॅच काटने वाला हीरा लेकर आए थे, लाओ उसे।"
"ऐसे काम के लिए।" दूसरे साए ने धीरे से कहा___"ऐसी चीज़ की ज़रूरत तो पड़ती ही है।"
दूसरे साए ने कहा और अपने काले लबादे से हीरा निकाल कर पहले वाले साए के हाथ में दे दिया। हीरा लेकर पहला साया वापस मुड़ा और दाहिने पल्ले में एक हाॅथ जमा कर हीरे से पल्ले पर लगे शीशे को खास तरीके से काटना शुरू कर दिया। उसके दूसरे हाॅथ में एक अजीब सी चीज़ थी जो कि शीशे से ही चिपकी हुई थी। कुछ ही देर में शीशे का एक आयताकार टुकड़ा कट गया। पहले साए ने अपने दूसरे हाॅथ को अपनी तरफ बहुत ही सावधानी से खींचा। नतीजा ये हुआ कि वो कटा हुआ टुकड़ा उस अजीब सी चीज़ से चिपका हुआ अपनी जगह से बाहर आ गया।
अभी पहला साया उस टुकड़े को खींचा ही था कि दूसरे साए ने धीरे से कहा कि जल्दी से किन्तु सम्हल कर बैठ जाओ, क्योंकि नीचे वो दोनो गन मैन इस तरफ वापस आ गए हैं। अगर हम दोनो बालकनी में खड़े रहेंगे तो संभव है कि वो ऊपर देखें और फिर उनकी नज़र हम दोनो पर पड़ जाए। साये की बात सुन कर दोनो ही वहीं पर दुबक कर बैठ गए थे। ख़ैर कुछ ही देर बाद जब वो दोनो गन मैन वापस चले गए तो ये दोनो साए भी उठ कर खड़े हो गए।
पहले वाले साए ने काॅच का वो टुकड़ा बैठे समय ही बालकनी में एक तरफ रख दिया था। अतः अब उसने खिड़की के कटे हुए हिस्से में अपना दाहिना हाॅथ सावधानी से डाला और फिर अंदर से ही नीचे की तरफ लाकर उसने खिड़की की कुण्डी को तलाशा और उसे ऊपर उठा कर खोल दिया। उसके बाद उसने अंदर से ही दूसरे पल्ले की कुण्डी को भी खोल दिया। साये को अंदर की तरफ पर्दा लगा होने का भी पता चला। ख़ैर, अपना हाॅथ सावधानी से बाहर निकाल कर उसने खिड़की के दोनो पल्लों को अंदर की तरफ पुश किया तो हल्की सी आवाज़ हुई किन्तु दोनो ही पल्ले अंदर की तरफ खुले न। पहले साये को समझते देर न लगी कि पल्लों के अंदर की तरफ ऊपर भी कुण्डियाॅ हैं जो कि बंद हैं। अतः साए ने फिर से उसी कटे हुए भाग से अंदर हाथ डाला और फिर ऊपर हाॅथ करके ऊपर की कुण्डी को नीचे की तरफ हल्के से खिसका दिया। ऐसा ही उसने दूसरे पल्ले पर भी किया।
थोड़ी ही देर में खिड़की के दोनो पल्ले अंदर की तरफ पुश किये जाने से खुलते चले गए। ये देख कर दोनो सायों के होठों पर मुस्कान उभर आई।
जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि खिड़की के अंदर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कि अॅधेरा था। हलाॅकि खिड़की में अंदर की तरफ पर्दे लगे होने की वजह से भी अॅधेरे का आभास हो सकता था। अतः पहले साए ने पल्ले खोलने के बाद अॅधेरे में डूबे पड़े कमरे की तरफ अपने कान लगा दिया। कदाचित इस लिए कि वो अंदर की किसी भी चीज़ की आहट को सुन सकें। किन्तु अंदर से कोई भी बारीक से बारीक आवाज़ नहीं आ रही थी। मतलब साफ था कि कमरा पूरी तरह खाली था। उसमें किसी भी आदमी का कोई वजूद नहीं था।
पहले साए ने एक छोटी सी पेंसिल टार्च अपने लबादे से निकाली और कमरे के अंदर की तरफ एक हाॅथ से पर्दे को हटा कर उसे रौशन किया। पेंसिल टार्च के प्रकाश का हल्का सा फोकस कमरे के अंदर की हर चीज़ पर साए के द्वारा हाॅथ से घुमाने पर घूमने लगा। कमरे के बाएॅ तरफ ही एक आलीशान बेड नज़र आया। उसके कुछ ही फाॅसले पर दो सोफे रखे नज़र आए। खिड़की के नीचे लगभग तीन फुट की दूरी पर कमरे का फर्स था जिसमें बेहतरीन टाइल्स लगी हुई नज़र आई। सारी चीज़ों को देखने के बाद पहला साया आराम से पर्दा हटा कर खिड़की के रास्ते कमरे में आ गया। उसके बाद दूसरा साया भी आ गया।
कमरे में आते ही दूसरे साए ने खिड़की के दोनो पल्ले बंद किये और फिर सावधानी से पर्दा खींच दिया। उसके बाद पेंसिल टार्च की मदद से ही हर जगह को बारीकी से देखने लगे। दीवार पर लगी पेंटिंग्स से ही पता चला कि ये कमरा मंत्री के बेटे सूरज चौधरी का है। दीवार पर कई जगह उसकी खुद की भी फोटो लगी हुई थी साथ ही कई जगह ऐसी पेंटिंग्स भी लगी हुई थी जो कि लड़कियों व औरतों की नग्नता को उजागर कर रही थी।
"ज़रा चेक करो कि कमरे का दरवाजा अनलाॅक है या नहीं।" दूसरे साए ने धीरे से कहा___"और अगर अनलाॅक है तो तुम यहाॅ से उस कमरे में जाने की कोशिश करो जो कमरा खुद मंत्री का हो। वहाॅ जा कर बारीकी से हर चीज़ को देखो। इस वक्त मंत्री अपने इस आवास पर नहीं है। किसी ज़रूरी काम से बाहर गया हुआ है। फिर भी ज़रा सावधानी से काम लेना। अब जाओ।"
दूसरे साए की बात सुन कर पहला साया कमरे के दरवाजे की तरफ बढ़ा। दरवाजे के पास पहुॅच कर उसने दरवाजे के हैण्डल को पकड़ कर घुमाया मगर वह घूमा नहीं। इसका मतलब कमरा बाहर से लाॅक था। बात भी जायज़ थी, मंत्री का बेटा तो यहाॅ था नहीं इस लिए मंत्री ने या फिर उसके किसी कर्मचारी ने इस कमरे को बाहर से लाॅक कर दिया होगा। ख़ैर, दरवाजे को लाॅक जान कर वो साया पलट कर दूसरे साए के पास आया और उसे बताया कि दरवाजा बाहर से लाॅक है। उसकी बात सुन कर दूसरे साए ने अपने लबादे से निकाल उसके हाॅथ में कोई चीज़ दी।
पहले साए ने पेंसिल टार्च की रोशनी में उस चीज़ को देखा तो अनायास ही उसके होठों पर मुस्कान उभर आई। दरअसल वो चीज़ "मास्टर की" थी।
फिर क्या था, मास्टर की लेकर पहला साया तुरंत दरवाजे के पास गया और दरवाजे पर लगे हैण्डिल के कीहोल में उस मास्टर की को डाला और विपरीत दिशा में घुमा दिया। नतीजा ये हुआ कि दरवाजा अनलाॅक हो गया। ये देख कर वो साया एक बार फिर मुस्कुराया और फिर दरवाजे को अपनी तरफ सावधानी से खींचा। दरवाज़े के बाहर गैलरी थी जो कि एलईडी ट्यूब लाइट तथा बल्बों के प्रकाश से रौशन थी।
बाहर बल्बों का प्रकाश देख कर साया अपनी जगह रुक गया। कदाचित वो सोचने लगा था कि रोशनी में वो आगे कैसे बढ़े? किन्तु शायद बढ़ना ज़रूरी था। अतः उसने दरवाजे से अपना सिर बाहर निकाल कर गैलरी के दोनों तरफ देखा। गैलरी पूरी तरह सुनसान पड़ी थी। हलाॅकि गैलरी बहुत लम्बी नहीं थी, बल्कि कुछ ही दूरी पर वो विपरीत दिशा में मुड़ गई थी। साये ने कुछ देर सोचने में लगाया और फिर बड़ी सावधानी से दरवाजे से बाहर गैलरी में आ गया। सनसान गैलरी पर सावधानी से चलते हुए वो मोड़ तक आ गया। मोड़ पर ठिठक कर उसने दूसरी तरफ की किसी भी आहट को सुनने के लिए दीवार के किनारे की तरफ अपना कान सटा दिया।
थोड़ी ही देर में वह अपनी जगह से हिला और गैलरी के मोड़ पर मुड़ गया। किन्तु थोड़ी ही दूर जाने के बाद उसे वापस लौटना पड़ा क्योंकि आगे गैलरी समाप्त थी। आगे कोई रास्ता नहीं था। साये को समझ आ गया कि वह दूसरी तरफ आ गया है। तभी तो उसे यहाॅ पर कहीं कोई दूसरे कमरे का दरवाजा नहीं दिखा था। ख़ैर, वापस उसी जगह आकर वह दूसरी साइड वाली गैलरी की तरफ बढ़ चला। आठ दस कदम चलने के बाद ही उसे अंदर की तरफ वाली बालकनी की रेलिंग नज़र आई। रेलिंग के पास पहुॅच कर उसने देखा कि बालकनी दोनो तरफ थी लगभग बीस कदम की दूरी पर उसे नीचे जाने के लिए सीढ़ियाॅ नज़र आई। रेलिंग के दूसरी तरफ नीचे काफी बड़ा ड्राइंगरूम नज़र आया। अपने स्थान पर खड़ा साया कुछ देर तक कुछ सोचता रहा फिर वह बाएॅ साइड की तरफ बढ़ चला। कुछ ही दूरी पर उसे एक और गैलरी नज़र आई। उसने गैलरी की तरफ देखा तो उसे एक कमरे का दरवाजा नज़र आया। दरवाज़ा देख कर वह तेज़ी से उसकी तरफ बढ़ा। थोड़ी ही देर में वो दरवाजे के पास पहुॅच गया। दरवाजे के हैण्डिल को पकड़ कर उसने उसे घुमाया तो पता चला कि वो लाॅक है। ये देख कर उसने फौरन ही अपने लबादे से वो मास्टर की निकाली और की होल में चाभी डाल कर घुमा दिया। दरवाजा हल्की सी आवाज़ के साथ खुल गया।
उसने बहुत ही आहिस्ता से दरवाजे को अंदर की तरफ पुश किया तो पता चला अंदर अॅधेरा है। साया कुछ देर तक किसी तरह की आवाज़ को सुनने की कोशिश करता रहा मगर कोई आवाज़ उसे अंदर की तरफ से सुनाई नहीं दी। ये महसूस कर उसने लबादे से पैंसिल टार्च निकाली और उसके प्रकाश को कमरे के अंदर की तरफ फोकस किया। फोकस जिस चीज़ पर पड़ा वो बेड था। किन्तु बेड पर कोई इंसान सोया हुआ नज़र न आया।
साया बेख़ौफ अंदर दाखिल हो गया। कमरे के अंदर हर चीज़ को उसने पैंसिल टार्च की रोशनी में देखा। मगर उसे ऐसा कुछ नज़र न आया जिसे शायद उसे तलाश थी।
लगभग दस मिनट बाद वह कमरे से वापस बाहर आ गया। अभी वह दरवाजे से बाहर निकला ही था किसी से टकरा गया। किसी दूसरे ब्यक्ति के होने की आशंका से ही वह बुरी तरह हड़बड़ा गया। किन्तु जैसे ही टकराने वाले पर उसकी नज़र पड़ी तो सामान्य हो गया। टकराने वाला वो दूसरा साया था जो उसके साथ ही यहाॅ इस तरह आया था।
"क्या हुआ?" उस दूसरे साये ने धीमी आवाज़ से पूछा___"कुछ मिला क्या??"
"नहीं।" पहले वाले ने कहा___"अभी तो यही नहीं पता चल रहा कि मंत्री का निजी कमरा कौन सा है? वो यहाॅ ऊपर है या फिर नीचे है।"
"पता तो करना ही पड़ेगा।" दूसरे साए ने कहा___"मंत्री के परिवार में उसके दो बच्चे ही हैं। बीवी कुछ साल पहले ही ईश्वर को प्यारी हो चुकी है। ख़ैर, इस वक्त क्योंकि मंत्री अपने आवास पर नहीं है इस लिए ये बॅगला अंदर से खाली ही है। बाहर गनमैन तैनात हैं। हमें जल्द से जल्द मंत्री के कमरे को ढूॅढ़ना होगा।"
"ठीक है।" पहले वाले ने कहा___"मैं नीचे की तरफ चेक करता हूॅ।"
"ओके।" दूसरे वाले ने कहा___"अगर तुम्हें या मुझे मंत्री का कमरा मिलता है तो तुरंत फोन पर मिस काल देना है। फोन बाइब्रेशन पर है अतः बाइब्रेशन से ही पता चल जाएगा। अब जाओ तुम।"
दूसरे साए की बात सुन कर पहला साया सीढ़ियों की तरफ तेज़ी से बढ़ गया। आख़िर काफी मसक्कत के बाद मंत्री का कमरा मिल ही गया। मंत्री का कमरा नीचे ही था। पहले साये ने दूसरे साये को फोन पर मिस काल देकर सूचित कर दिया। थोड़ी ही देर में वो दोनो मंत्री के कमरे में थे।
मंत्री चूॅकि बॅगले में नहीं था इस लिए बॅगले के अंदर कोई था ही नहीं। बॅगले के बाहर गनमैन ज़रूर तैनात थे किन्तु उनमें से किसी को भी इस बात का अंदेशा नहीं था कि बॅगले के अंदर दो चोर बड़ी सफाई से उनकी ऑखों में धूल झोंक कर घुस चुके हैं। ख़ैर, दोनो सायों ने मंत्री के कमरे में जाकर सबसे पहले तो दरवाजे को अंदर से बंद किया उसके बाद जिस काम के लिए आए थे उस काम में लग गए। कमरे में पहले से ही नाइट बल्ब जल रहा था। किन्तु पहले वाले साए ने तेज़ रोशनी के लिए मेन बल्ब भी जला दिया। अब कमरे में तेज़ प्रकाश था तथा कमरे में रखी हर चीज़ स्पष्ट नज़र आने लगी थी।
दोनो ने बहुत ही बारीकी से हर चीज़ को देखना शुरू कर दिया। दोनो के हाव भाव से ऐसा लग रहा था जैसे वो इस काम में काफी माहिर हों। लगभग बीस मिनट की मेहनत के बाद वो दोनो ही इस तरह एक दूसरे के पास खड़े हो गए जैसे किसी चीज़ के न मिलने से बेहद चिंतित व परेशान हो गए हों।
"लगता है यहाॅ कुछ नहीं है।
" पहले साए ने धीमी आवाज़ से कहा___"मंत्री ने उन चीज़ों को ज़रूर किसी ऐसी जगह छुपाया होगा जहाॅ पर वो चीज़ें किसी बाहरी आदमी को किसी सूरत में न मिल सकें।"
"वो चीज़ें ऐसी हैं भी नहीं जो इतनी आसानी से हमें मिल जाएॅगी।" दूसरे साये ने कहा___"ऐसी चीज़ों को तो हर इंसान सात तिज़ोरियों के अंदर ही छुपा कर रखता है। इस लिए हमें ऐसी ही किसी जगह को तलाश करना होगा जहाॅ पर हमारी नज़रें पड़ी तो हों किन्तु हमने उस जगह को अंजाने में नज़रअंदाज़ कर दिया हो।"
"हाॅ ये भी सही कहा।" पहले साए ने इधर उधर नज़रें घुमाते हुए कहा___"तो ठीक है एक बार फिर से हम हर जगह बारीकी से चेक करते हैं। संभव है कि इस बार हमारे हाॅथ कुछ लग ही जाए।"
पहले साए की बात सुन कर दूसरे साए ने सहमति में सिर हिलाया और फिर से वो हर जगह का बारीकी से मुआयना करने में लग गया। कमरे में मौजूद हर चीज़ बेसकीमती थी। फिर चाहे वो मंत्री का बेड हो, सोफे हों, फर्श में बिछा कालीन हो या फिर दीवारों पर लगी पेंटिंग्स।
पहला साया बेड के दाहिने साइड की दीवार की तरफ देख रहा था। उस दीवार पर हर दीवार की तरह ऊॅचाई पर पेंटिंग्स लगी हुई थी किन्तु पेंटिंग्स के नीचे दीवार पर नीचे से लगभग छः फुट की ऊॅचाई पर ऐसे नक्काशी की गई थी जैसे किसी बड़े से आदम कद शीशे के फ्रेम पर खूबसूरत नक्काशी की हुई होती है। दरअसल दीवार पर वो एक फ्रेम जैसा ही कुछ बना हुआ था। किन्तु फ्रेम के अंदर का भाग खाली था। यानी कि उसमें कोई चित्र वगैरह नहीं बना हुआ था। बल्कि ऐसा लगता था जैसे कि किसी बड़ी सी चीज़ का सिर्फ फ्रेम बना दिया गया हो। पहला साया दीवार में बने उस खाली फ्रेम को बड़े ध्यान से देखने लगा। एकाएक ही उसकी ऑखें सिकुड़ीं। उसने तुरंत ही दीवार के इधर उधर किसी खास चीज़ की तलाश में अपनी नज़रें दौड़ाईं।
दीवार पर बने उस फ्रेम के बाईं तरफ एक मध्यम साइज़ की पेंटिंग लगी हुई थी। पहला साया जाने क्या सोच कर उस पेंटिंग की तरफ बढ़ा। पेंटिंग के पास पहुॅच कर उसने अपने एक हाॅथ से पेंटिंग के फ्रेम को पकड़ कर बाईं तरफ किया। पेंटिंग के निचले भाग के बाईं तरफ होते ही जो चीज़ नज़र आई उसे देख कर साये की ऑखें पहले तो हैरत से फटीं फिर एकाएक ही उनमें चमक आ गई। उसने तुरंत ही पलट कर दूसरे साये को धीमी आवाज़ देकर अपने पास बुलाया।
दूसरे साये के पास आते ही उसने उस साये को भी पेंटिंग के पीछे दीवार पर नज़र आ रही उस चीज़ को दिखाया। दरअसल वो चीज़ एक छोटे से कम्प्यूटर के माॅनीटर जैसी थी। ऊपरी तरफ दीवार से चिपकी हुई स्क्रीन और स्क्रीन के नीचे कीबोर्ड। स्क्रीन के ऊपरी भाग पर दो कलर की बत्तियाॅ थीं। जिनमें से एक हरी तथा दूसरी लाल कलर की थी। लाल कलर वाली बत्ती इस वक्त रौशन थी। स्क्रीन पर लिखा था "प्लीज इन्टर योर पासवर्ड"।
"मुझे लगता है कि।
" पहले साए ने धीमे स्वर में कहा___"ये किसी ऐसी जगह के लिए है जहाॅ पर जाने के लिए इसमें सबसे पहले पासवर्ड डालना पड़ता है।"
"बिलकुल ठीक कहा तुमने।" दूसरे साये ने दीवार पर इधर उधर नज़र दौड़ाते हुए कहा____"किन्तु यहाॅ पर ऐसा तो कुछ नज़र नहीं आ रहा जिससे ऐसा प्रतीत होता हो कि यहाॅ से कहीं दूसरी जगह जाने का कोई रास्ता हो।"
"ज़रा इस चीज़ को देखिए।" पहले साए ने दाहिनी तरफ दीवार पर नज़र आ रहे उस खाली फ्रेम की तरफ इशारा करते हुए कहा___"इस दीवार पर ये छः फीट ऊॅचा तथा साड़े तीन फीट चौड़ा फ्रेम भला किस उद्देश्य से बनवाया गया होगा? अगर ये मान कर चलें कि ये दीवार पर महज शोभा बढ़ाने के लिए बनवाया गया है तो फिर इसी तरह के सेम फ्रेम दो तरफ की दीवारों पर भी बने होने चाहिए थे। एक तरफ तो कमरे का दरवाजा है। अतः उस तरफ ना भी बनवाया जाता तो कोई बात न थी। किन्तु ऐसा फ्रेमनुमा डिजाइन सिर्फ इसी एक तरफ की दीवार पर क्यों बनवाया गया हो सकता है?"
"यकीनन तुम्हारी बात में प्वाइंट है।" दूसरे साए ने दीवार पर बने उस फ्रेम की आकृति को गौर से देखते हुए कहा___"अगर इस स्क्रीन से ये पता चलता है कि ये किसी चीज़ के लिए पासवर्ड माॅग रहा है तो ये भी हो सकता है कि यहाॅ पर कोई ऐसी जगह हो सकती है जहाॅ जाने के लिए हमें इसमें पासवर्ड डालना होगा। इसका मतलब ये हुआ कि यहाॅ पर कहीं कोई दूसरी जगह भी है जहाॅ जाने का रास्ता बना होगा। जोकि फिलहाल हमें नज़र नहीं आ रहा। हलाॅकि ऐसा भी हो सकता है कि ये माॅनीटर सिस्टम किसी और ही चीज़ के लिए हो।"
"बिलकुल हो सकता है।" पहले साए ने कहा___"किन्तु इस कमरे में ऐसे खास सिस्टम का उपयोग भला किस चीज़ के लिए हो सकता है? मुझे लगता है कि ये इलेक्ट्रिक सिस्टम लगाया ही इस लिये गया है कि इसके माध्यम से ही हमें कहीं जाने का रास्ता नज़र आए। कहने का मतलब ये कि अगर हम इस स्क्रीन पर सही पासवर्ड डाल दें तो मुमकिन है कि किसी जगह जाने का रास्ता नज़र आ जाए या फिर रास्ता ही बन जाए। या फिर ऐसा भी हो सकता है कि कुछ और ही हो जाए।"
"हाॅ ये सही कहा तुमने।" दूसरे साए ने कहने के साथ ही दीवार पर बने उसी फ्रेम की तरफ पुनः देखा___"कहीं ऐसा तो नहीं कि ये फ्रेम ही वो रास्ता हो। बेशक ऐसा ही हो सकता है क्योंकि ये फ्रेम नीचे फर्श से ऊपर की तरफ है। दूसरी बात इसका साइज बिलकुल वैसा ही है जैसे किसी दरवाजे का होता है। वरना सोचने वाली बात है कि अगर ऐसा कोई फ्रेम सिर्फ कमरे की शोभा बढ़ाने के लिए बनाया गया होता तो ये फर्श से लगा हुआ नहीं होता बल्कि फर्श से एक या दो फीट की ऊॅचाई से बना हुआ होता। तीसरी बात ये बनाया ही इस तरह गया है कि आम इंसान इसे देख कर यही समझेगा कि ये सिर्फ एक फ्रेम ही है जो कि कमरे की शोभा बढ़ाने के लिए एक तरफ की दीवार पर बनाया गया है।
"
"इसका मतलब कि ये साबित होता हुआ नज़र आ रहा है कि ये फ्रेम कहीं जाने का दरवाजा ही है।" पहले साये ने कहा___"और ये तभी खुलेगा जब हम इस इलेक्ट्रिक सिस्टम में पासवर्ड डालेंगे?"
"करेक्ट।" दूसरे साये ने कहा____"अब सवाल ये है कि इसका पासवर्ड क्या होगा?"
"इसका कीबोर्ड बिलकुल वैसा ही है जैसे किसी कम्प्यूटर का होता है।" पहले साये ने उस स्क्रीन से लगे ही कीबोर्ड की तरफ देखते हुए कहा___"इसका पासवर्ड किसी के नाम से अथवा किन्हीं संख्याओं से भी हो सकता है।"
"बेशक हो सकता है।" दूसरे साए ने कहा___"और ये हमारे लिए काफी चिंता का विषय भी हो गया है। क्योंकि अगर हमें इसका सही पासवर्ड न मिला तो ये दरवाजा नहीं खुलेगा। मुझे पूरा यकीन है कि इस दरवाजे के पार ही ऐसी वो जगह है जहाॅ पर हमें वो चीज़ें मिल सकती हैं जिसके लिए हम यहाॅ आए हैं। हलाॅकि ये सिर्फ हमारा अंदेशा ही है कि यहाॅ पर कोई दरवाजा हो सकता है जहाॅ पर जाने के लिए ये इलेक्ट्रिक सिस्टम लगाया गया है। ऐसा भी हो सकता है कि इसका उपयोग इसके अलावा भी किसी और चीज़ के लिए हो। किन्तु एक बार चेक तो करना ही चाहिए हमें। संभव है कि वैसा ही हो जैसे का हमें अंदेशा है।"
"कुछ भी हो सकता है। मगर चेक तो यकीनन करना ही पड़ेगा। ख़ैर, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इसका पासवर्ड यहीं कहीं मौजूद हो?" पहले साये ने कहा___"मेरे कहने का मतलब है कि इसका पासवर्ड मंत्री ने आलमारी में ही कहीं छुपा कर रखा हुआ हो। मैं ऐसा ये सोच कर कह रहा हूॅ कि जब ये सिस्टम लगवाया गया होगा तब इसका सबकुछ नया नया ही रहा होगा। शुरू शुरू में किसी भी चीज़ का पासवर्ड हमें इतना जल्दी याद नहीं होता और अगर याद हो भी गया तो उसके भूल जाने के चान्सेस ज्यादा रहते हैं। ऐसा हम सबके साथ होता है। इस लिए ऐसा मुमकिन है कि जैसे हम किसी चीज़ का पासवर्ड अलग से लिख कर उसे सम्हाल कर रख लेते हैं वैसे ही मंत्री ने भी किया हो।"
"सही कहा तुमने।" दूसरे साये ने कहा___"ऐसा हो सकता है। मंत्री ने इसका पासवर्ड यहीं कहीं छुपा कर रखा होगा। अतः हम कमरे में रखी इन आलमारियों की तलाशी लेते हैं।"
दूसरे साये की बात सुन कर पहले साये ने हाॅ में सिर हिलाया और फिर दोनो ही कमरे में रखी तीन तीन आलमारियों की तरफ बढ़े। उन तीन आलमारियों में एक अनलाॅक थी जबकि बाॅकी की दो आलमारियाॅ लाॅक थी। दोनो ने एक एक लाॅक आलमारी को सम्हाल लिया। मास्टर की से दोनो आलमारियों को अनलाॅक किया और फिर उसके अंदर तलाशी अभियान शुरू कर दिया।
दोनो ही आलमारियों में कई तरह के काग़जात भरे पड़े थे। जिन्हें उलट पलट कर वो दोनो ही साये बारीकी से देख रहे थे। किन्तु उन कागजातों में उन्हें उस सिस्टम का पासवर्ड जैसा कुछ न मिला। आलमारी के अंदर ही एक और लाॅकर था जोकि बंद था। उन दोनों ने उन लाॅकरों को भी मास्टर की से खोला।
अंदर वाले लाॅकर्स में काफी सारी ज्वेलरी तथा बैंक की काॅपी पासबुक वगैरह थी तथा काफी सारे नोटों के बंडल भी थे।
तभी दूसरे साये को उस लाॅकर से कुछ मिला जिसे उसने लाॅकर से बाहर निकाला। वो एक डायरी थी। दूसरे साये ने उस डायरी को खोल कर उसके हर पेज को बारीकी से देखना शुरू कर दिया। उसमें काफी कुछ चीज़ें लिखी हुई थी। काफी सारे पेज़ देखने के बाद सहसा एक पेज पर साये की नज़र ठहर गई।
"मिल गया।" साये के मुख से ज़रा ऊॅची आवाज़ निकल गई। मारे खुशी के उसे होश ही नहीं रह गया था कि वो दोनो इस वक्त मंत्री के बॅगले में चोर की हैंसियत से आए हुए हैं। वो तो शुकर था कि बॅगले के अंदर कोई था नहीं वरना उसकी इस आवाज़ से ज़रूर किसी न किसी को पता चल जाता। ख़ैर उसकी आवाज़ से और तो किसी को पता न चला किन्तु पहला साया ज़रूर चौंक कर उसकी तरफ देखने लगा था। दूसरे साये को भी तुरंत ही ख़याल आ गया था कि खुशी के आवेश में उसके मुख से कुछ ज्यादा ही ऊॅची आवाज़ निकल गई थी। दोनो ही कुछ देर अपनी साॅसें रोंके खड़े रहे।
पहला साया दूसरे वाले के पास आया और फिर उसकी तरफ देख कर बोला___"बाहर जो गनमैन तैनात हैं उन्हें यहाॅ बुलाना है क्या?"
"साॅरी।" दूसरा साया बोला___"मारे खुशी के याद ही नहीं रह गया था कि हम यहाॅ चोर बन कर आए हुए हैं। ख़ैर, ये देखो। हमें जिसकी तलाश थी वो इस डायरी में है। तुम्हारा कहना बिलकुल सही था कि मंत्री ने उस सिस्टम का पासवर्ड अलग से कहीं लिख कर छुपाया हुआ होगा।"
"तो फिर देर किस बात की है?" पहले साये ने धीमें स्वर में मुस्कुराते हुए कहा___"हमें यहाॅ पर आए हुए काफी समय हो गया है। इस लिए अब हमें जल्दी जल्दी अपने काम को अंजाम देना होगा। ऐसा न हो कि मंत्री वापस लौट आए यहाॅ। साला दुर्भाग्य को कोई नहीं जानता कि कब किसके सिर पर आ धमके।"
"सही कहा तुमने।" दूसरे साये ने कहा___"आओ फिर शुरू करते हैं।"
कहने के साथ ही दूसरा साया उस सिस्टम की तरफ बढ़ चला, उसके पीछे पीछे ही पहला साया भी बढ़ चला था। सिस्टम के पास पहुॅच कर दूसरे साये ने डायरी पर लिखे पासवर्ड को सिस्टम पर बड़ी सावधानी से डाला और फिर इंटर का बटन दबा दिया। इन्टर का बटन दबाते ही स्क्रीन के ऊपर लगी हरी बत्ती जल उठी साथ ही स्क्रीन पर "वैलकम" लिखा नज़र आया। ये देख कर वो दोनो साये अभी मुस्कुराये ही थे कि तभी उनके दाहिनी तरफ हल्की सी आवाज़ हुई। दोनो ने पलट कर उस तरफ देखा।
दीवार में जिस जगह वो फ्रेम बना हुआ था उसी फ्रेम के बीचों बीच से एक दरवाजा खुलता हुआ अंदर की तरफ जाने लगा था। वो एक ही पल्ले का मोटा सा दरवाजा था। जो बंद होने पर बिलकुल दीवार की तरह ही नज़र आता था। कुछ ही पलों में वो दरवाजा पूरा खुल कर दाहिने साइड हो गया। दरवाजे के उस तरफ अॅधेरा था जो कि इस तरफ के उजाले से थोड़ा दूर हो गया था।
दोनो ही साये दरवाजे के पास आकर खड़े हो गए। दरवाजे से आगे लगभग तीन फीट पर फर्श था उसके बाद नीचे जाने के लिए सीढ़ियाॅ नज़र आ रही थीं।
"कमाल है।" पहला साया बोल पड़ा___"ये तो बेसमेंट लगता है। कोई सोच भी नहीं सकता था कि यहाॅ पर ऐसा कुछ हो सकता है।"
"ऐसे लोग।" दूसरे साये ने कहा____"ऐसे कामों के लिए ऐसी ही जगहों का ज्यादातर चुनाव करते हैं और इससे सेफ्टी भी रहती है। वरना खुद सोचो कि कोई दूसरा यहाॅ तक कैसे पहुॅच जाएगा? ख़ैर छोंड़ो, आओ इसके अंदर चलते हैं।"
"मुझे लगता है कि।" पहले साये ने कहा___"हम में से किसी एक को ही अंदर जाना चाहिए जबकि किसी एक को यहीं पर रहना चाहिए। क्योंकि ऐसा भी हो सकता है कि बाहर तैनात गनमैनों में से कोई बॅगले के अंदर ये सोच कर आ जाए कि एक बार अंदर की तरफ का हाल चाल भी देख लिया जाए। अतः अगर ऐसी वैसी कोई बात होती है तो कम से कम हम में से कोई एक यहाॅ रह कर उसे सम्हालने की कोशिश तो करेगा।"
"ये भी सही कहा तुमने।" दूसरे साये ने कहा___"तो ठीक है तुम यहीं रहो। इसके अंदर जाने का काम अब मेरा है।"
"ओके बेस्ट ऑफ लक।" पहले साए ने कहने के साथ ही अपने दाहिने हाॅथ का अॅगूठा दिखाया उसे___"लेकिन हाॅ ज़रा सम्हाल कर।"
दूसरे साये ने हाॅ में सिर हिलाया और दरवाजे के उस पार बढ़ चला। उस पार के फर्श पर आकर वह ठिठका और दोनो तरफ देखा तो उसे बाईं तरफ दीवार पर एक स्विच नज़र आया। उसने उस स्विच को पहले ध्यान से देखा उसके बाद उसने हाॅथ बढ़ा कर स्विच का बटन दबा दिया। परिणामस्वरूप सीढ़ियों के ऊपर लगी एक ट्यूबलाइट रौशन हो गई। अब वहाॅ पर काफी प्रकाश था।
दूसरा साया सामने की तरफ मुड़ कर बड़ी सावधानी से सीढ़ियों पर उतरता चला गया। जबकि कमरे में दीवार के पास ही खड़ा पहला साया उसे जाते हुए देखता रहा। उसके दिल की धड़कनें अनायास ही बढ़ गईं थी। उधर कुछ ही पलों में दूसरा साया सीढ़ियाॅ उतर कर बेसमेंट में पहुॅच गया। नीचे की लास्ट सीढ़ी से थोंड़ी ही दूरी पर दाहिनी तरफ की दीवार में एक और स्विच नज़र आया। साये ने उस स्विच का बटन ऑन कर बेसमेंट की लाइट जला दी। लाइट के जलते ही बेसमेंट में तीब्र प्रकाश फैल गया।
तीब्र रौशनी में बेसमेंट की हर चीज़ स्पष्ट नज़र आने लगी थी। किन्तु जिस खास चीज़ पर साये की नज़र पड़ी उसे देख कर उसकी ऑखें फटी की फटी रह गईं। बेसमेंट काफी बड़ा था। ऐसा लगता था जैसे ये कोई लम्बा चौड़ा हाल हो। चारो तरफ की दीवारों पर अलग अलग चीज़ों का क्रमशः स्टाक था यहाॅ। किन्तु सबसे खास चीज़ ये थी कि हाल के सामने अंतिम छोर के फर्स पर ही एक बड़ी सी ट्राली थी जिसके ऊपर दो हज़ार के तथा पाॅच सौ के नोटों के बंडल नीचे से ऊपर की तरफ रखे हुए थे। ये सब न्यू करेन्सी थी। जोकि पाॅलिथिन में बंद थी। इतने सारे रुपये को देख कर किसी की भी ऑखें फटी की फटी रह जातीं।
उस ट्राली के आगे दीवार से सटे स्टील के खाॅचे बने हुए थे जिनके दो खाॅचों में चमचमाते हुए गोल्ड के बिस्किट रखे हुए थे। बिस्किट के वो दोनो ही खाॅचे पारदर्शी शीशे से बंद थे। बाॅकी के खाॅचों में लकड़ी के बाक्स थे। फर्श पर भी काफी सारे बाॅक्स रखे हुए थे।
ये सारी चीज़ें देख कर साये की ऑखें फटी हुई थी। किन्तु जल्द ही उसने खुद को मानो सम्हाला और आगे की तरफ बढ़ चला। लकड़ी के एक बाक्स के पास पहुॅच कर उसने बाक्स के ऊपर लगे लकड़ी के ही ढक्कन रूपी पटरे को पकड़ कर अपनी तरफ खींच कर उसे निकाला। ढक्कन के हटते ही बाक्स में रखी हुई जो चीज़ नज़र आई उसे देख कर साये की ऑखें एक बार पुनः हैरत से फैलीं। बाक्स में एक जैसी कई सारी गन रखी हुई थी। मतलब साफ था कि यहाॅ पर जितने भी ऐसे बाक्स थे उन सब में तरह तरह की गन्स ही थीं।
साये ने चारो तरफ नज़र घुमा कर बारीकी से देखना शुरू कर दिया। दाएॅ तरफ एक केबिन जैसा बना हुआ था। साया उस तरफ बढ़ गया। केबिन में पहुॅच कर उसने देखा कि ये एक छोटा सा केबिन है जिसमें एक तरफ ऊॅची सी मेज थी तथा मेज के ऊपर एक कम्प्यूटर रखा हुआ था। मेज में कई सारे दराज थे। साये ने एक एक करके सभी दराज को खोल कर देखा। उन सब में कई तरह की रसीद व काग़जात थे तथा कई सारी फाइलें भी थीं। साये ने उन सभी फाइलों को बारीकी से देखना शुरू कर दिया।
फाइलों में से कुछ फाइलों को उसने अलग करके एक तरफ रखा। उसके बाद उसने एक नज़र कम्प्यूटर पर डाली। कुछ देर तक वह उसे देखते हुए सोचता रहा। फिर वह अलग की हुई फाइलों को लेकर केबिन से बाहर आ गया। जैसा कि बताया जा चुका है कि बेसमेंट काफी बड़ा था। साया हर जगह जा जा कर बारीकी से देखने लगा। तभी एक तरफ उसे एक बड़ा सा दरवाजा नज़र आया। ये दरवाजा ठीक वैसा ही था जैसा कि बेसमेंट में आने के लिए उस कमरे में था। इस दरवाजे के बाईं तरफ वैसा ही एक और सिस्टम लगा हुआ था। जिसमें पासवर्ड डालने के लिए स्क्रीन पर "प्लीज इन्टर योर पासवर्ड" लिखा हुआ था। साये ने कुछ सोचते हुए अपने लबादे से एक छोटा सा मोबाइल निकाला और उसमें से हरा बटन दबाया। हरा बटन दबाते ही उसमें डायल काल की लिस्ट में एक ही नंबर दिखा जिसे उसने पुनः हरा बटन दबा कर डायल कर दिया। डायल करते ही मोबाइल को कान से लगा लिया उसने, कुछ ही सेकण्ड में दूसरी तरफ से काल रिसीव किया गया।
"यहाॅ पर वैसा ही एक और दरवाजा है।" काल रिसीव किये जाने पर साये ने तुरंत बिना किसी भूमिका के धीमे स्वर में कहा___"अतः तुम उस डायरी में देखो कि क्या इसका भी पासवर्ड उसमें है या फिर इन दोनो दरवाजों का एक ही पासवर्ड है। जल्दी से देख कर मुझे बताओ।"
उधर यकीनन पहला वाला साया ही था। दूसरे साये को अपने कान में कुछ देर सुरसराहट की आवाज़ आती रही उसके बाद कुछ कहा गया। जिसके जवाब में साये ने कहा___"ओह एक मिनट।
"
कहने के साथ ही ये साया दरवाजे के बाएॅ साइड दीवार पर लगे सिस्टम के पास तेज़ी से गया। सिस्टम के पास पहुॅचते ही बोला___"हाॅ अब बताओ।"
उधर से शायद पहला वाला साया इस साये को पासवर्ड बता रहा था जिसे ये वाला साया उसके बताने के साथ ही कीबोर्ड पर अपनी एक उॅगली से पंच करता जा रहा था। थोड़ी ही देर में साये के द्वारा "इन्टर" का बटन दबाए जाते ही सिस्टम पर लगी हरी बत्ती जल उठी। बत्ती के जलते ही वो दरवाजा हल्की आवाज़ के साथ इस तरफ ही खुलता चला गया। दूसरी तरफ अॅधेरा था जोकि इधर की रौशनी से हल्का सा दूर हो गया। हल्की रोशनी होते ही सामने सींढ़ियाॅ नज़र आईं जो कि ऊपर की तरफ जा रही थी। साया उन सीढ़ियों को देख कर पहले कुछ देर कुछ सोचा फिर आगे बढ़ कर उन सीढ़ियों पर चढ़ता चला गया। सीढ़ी के ऊपर आकर उसने देखा कि सामने एक और दरवाजा है किन्तु ये दरवाजा लोहे का था। दरवाजे के निचले भाग की दरार में हल्की रोशनी दिख रही थी। मतलब साफ था दरवाजे के दूसरी तरफ कुछ और भी था किन्तु क्या? इस सवाल का जवाब तो उस तरफ पहुॅच कर ही मिल सकता था।
साये ने देखा कि दरवाजा इस तरफ से ही बंद है। क्योंकि मोटा सा ताला कुण्डे पर झूल रहा था। ऐसा ताला साये ने पहली बार ही देखा था। कुण्डे के पास ही एक छिद्र था, वो छिद्र ऐसा था जैसे कीहोल हो। यानी कि ये दरवाजा दो तरह से लाॅक था। साये ने झुक कर कीहोल से अपनी एक ऑख सटा दी। दूसरी तरफ काफी उजाला था तथा उस उजाले में ही उसे ऐसा नज़र आया जैसे उस तरफ कोई फैक्ट्री हो। कुछ लोग भी उस तरफ नज़र आए। जिनमें कुछ आम आदमियों के साथ साथ हाॅथों में गन लिए कुछ गार्ड्स भी थे।
उस तरफ का नज़ारा देख कर साये ने कीहोल से अपनी ऑख हटा ली। उसके बाद वह एक पल के लिए वहाॅ नहीं रुका बल्कि पलट कर वापस चल दिया। बेसमेंट में आकर उसने दरवाजे को बड़ी सावधानी से बंद किया। दरवाजा जैसे ही पूरा बंद हुआ वैसे ही बगल से दीवार पर लगे उस सिस्टम के स्क्रीन पर "डोर हैज बीन क्लोज्ड" लिखा नज़र आया और साथ ही ऊपर लगी लाल बत्ती जल उठी। लाल बत्ती के जलते ही स्क्रीन पर फिर से "प्लीज इन्टर योर पासवर्ड" लिख गया।
कुछ ही देर में बेसमेंट से चलता हुआ वो साया सीढ़ियों के पास आया और फिर सीढ़ियाॅ चढ़ते हुए कमरे में पहले वाले साये के पास आ गया। दरवाजे को बंद करने के बाद उसने पहले गहरी गहरी साॅसें ली। उसके बाद उसने पहले साए की तरफ देखा तो हल्के से चौंका।
"ये क्या है?" दूसरे साये ने पहले साये के हाॅथ में बैग देख कर पूछा।
"इसमें मंत्री का लैपटाॅप है।" पहले साये ने कहा___"ये मुझे इस बेड के नीचे बने बाक्स में मिला है। मैने इसे अभी देखा नहीं है। हो सकता है कि इसमें भी पासवर्ड वाला चक्कर हो इस लिए इसे हम अपने साथ ही ले चलेंगे।"
"ये बहुत अच्छा हुआ।
" दूसरे साए ने कहा___"मंत्री के लैपटाॅप में भी काफी कुछ मसाला मिल सकता है। ख़ैर, इन फाइलों को भी इस बैग में डाल लो। उसके बाद हमें तुरंत यहाॅ से निकलना है। अब यहाॅ पर ज्यादा देर रुकना ठीक नहीं है।"
"ठीक है।" पहले साए ने कहने के साथ ही बैग को बेड पर रखा और दूसरे साये से फाइलें लेकर बैग में डाल लिया।
उसके बाद ये दोनो ही शातिर चोर जिस तरह छुपते छुपाते हुए यहाॅ बड़ी होशियारी से आए थे वैसे ही यहाॅ से निकल भी गए। बालकनी से जब दोनो नीचे ज़मीन पर उतर आए तो बालकनी में इनकी वो रस्सी ही फॅस गई। वो तो शुकर था कि इस तरफ आने वाले वो दोनो गनमैन इस तरफ आए ही नहीं। वरना उन्हें बालकनी की रेलिंग से झूलती हुई ये रस्सी ज़रूर दिख जाती और ये दोनो भी। ख़ैर दोनो ने किसी तरह उस रस्सी को निकाल ही लिया और फिर उसी रस्सी के द्वारा बाउण्ड्री वाल के उस पार भी चले गए। थोड़ी ही देर में वो दोनो अॅधेरे का लाभ उठाते हुए कहीं गायब से हो गए।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दोस्तो, आप सबके सामने मेगा अपडेट हाज़िर है। आशा करता हूॅ कि आप सबको पसंद आएगा।
आप सबकी प्रतिक्रिया का बेसब्री से इन्तज़ार रहेगा।
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट........《 60 》
अब तक,,,,,,,
"ये क्या है?" दूसरे साये ने पहले साये के हाॅथ में बैग देख कर पूछा।
"इसमें मंत्री का लैपटाॅप है।" पहले साये ने कहा___"ये मुझे इस बेड के नीचे बने बाक्स में मिला है। मैने इसे अभी देखा नहीं है। हो सकता है कि इसमें भी पासवर्ड वाला चक्कर हो इस लिए इसे हम अपने साथ ही ले चलेंगे।"
"ये बहुत अच्छा हुआ।" दूसरे साए ने कहा___"मंत्री के लैपटाॅप में भी काफी कुछ मसाला मिल सकता है। ख़ैर, इन फाइलों को भी इस बैग में डाल लो। उसके बाद हमें तुरंत यहाॅ से निकलना है। अब यहाॅ पर ज्यादा देर रुकना ठीक नहीं है।"
"ठीक है।" पहले साए ने कहने के साथ ही बैग को बेड पर रखा और दूसरे साये से फाइलें लेकर बैग में डाल लिया।
उसके बाद ये दोनो ही शातिर चोर जिस तरह छुपते छुपाते हुए यहाॅ बड़ी होशियारी से आए थे वैसे ही यहाॅ से निकल भी गए। बालकनी से जब दोनो नीचे ज़मीन पर उतर आए तो बालकनी में इनकी वो रस्सी ही फॅस गई। वो तो शुकर था कि इस तरफ आने वाले वो दोनो गनमैन इस तरफ आए ही नहीं। वरना उन्हें बालकनी की रेलिंग से झूलती हुई ये रस्सी ज़रूर दिख जाती और ये दोनो भी। ख़ैर दोनो ने किसी तरह उस रस्सी को निकाल ही लिया और फिर उसी रस्सी के द्वारा बाउण्ड्री वाल के उस पार भी चले गए। थोड़ी ही देर में वो दोनो अॅधेरे का लाभ उठाते हुए कहीं गायब से हो गए।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,
सुबह हुई।
मंत्री दिवाकर चौधरी एक विशेष दौरे पर गया हुआ था। किन्तु दौरे पर भी उसका पूरा ध्यान अपने जासूस उस हरीश राणे के फोन पर ही था। उसे पता था कि राणे बहुत जल्द उसे विराज और रितू के ठिकाने का पता फोन पर बताएगा।
पिछला सारा दिन और फिर लगभग सारी रात गुज़र गई थी मगर हरीश राणे का फोन अब तक न आया था उसके पास। उसने सोचा कि संभव है कि विराज और रितू अभी हास्पिटल में ही अपनी बहन नीलम का इलाज़ करवा रहे होंगे। जिसके चलते वो लोग अभी अपने ठिकाने पर वापस न गए होंगे। शायद यही वजह होगी कि राणे ने उसे अब तक कोई फोन न किया था। ख़ैर उम्मीद पर तो दुनियाॅ कायम है। यही हाल चौधरी का था। पिछली शाम को ही वह दौरे पर निकल गया था। उसका प्रोग्राम पहले से ही फिक्स था। अतः दौरे से लौटने में उसे दूसरा दिन शुरू हो जाना था।
सुबह मंत्री की ऑख उसके मोबाइल फोन के बजने से ही खुली थी। उसने उठ कर टाइम देखा तो सुबह के साढ़े पाॅच बज रहे थे। मोबाइल की स्क्रीन पर हरीश राणे का नाम देख कर उसके होठों पर मुस्कान उभर आई, साथ ही चेहरे पर चमक भी पैदा हो गई। उसने बेहद खुशी के साथ काल को रिसीव कर मोबाइल को कान से लगाया था और खुशी खुशी पूछा भी था कि 'बोलो राणे सुबह सुबह खुश ख़बरी सुनने के बहुत उतावले हो रहे हैं हम'। उसकी इस बात पर राणे ने उधर से खुशी वाले लहजे में ही कहा था कि चौधरी साहब आपका काम संपन्न हो गया है। इस लिए आप जल्दी से अपने आवास पर आ जाइये।
हरीश राणे की ये बात सुन कर चौधरी खुशी से फूला नहीं समाया था। वह फोन पर ही सारी बात जान लेना चाहता था मगर राणे ने कहा कि आमने सामने बात करने का मज़ा ही कुछ और होगा। इस लिए आप आइये और अपने सभी साथियों को भी बुला लीजिएगा। उसके बाद ही तसल्ली से सारी बात बताई जाएगी। राणे की इस बात से मंत्री ने हॅसते हुए कहा था कि ठीक है राणे हम जल्द से जल्द पहुॅच रहे हैं।
मंत्री जब अपने दलबल के साथ वापस लौट कर गुनगुन स्थित अपने आवास पर आया तो उस वक्त सुबह के सात बज गए थे। उसने अपने साथियों को राणे से बात करने के बाद ही फोन पर अपने आवास पर आ जाने को कह दिया था। शानदार बॅगले के अंदर पहुॅचते ही मंत्री दिवाकर चौधरी को ड्राइंगरूम में अपने सभी साथी सोफों पर बैठे मिल गए। किन्तु हरीश राणे उसे कहीं नज़र न आया। ये देख कर उसके चेहरे पर चौकने के भाव उभरे। बाॅकी उसके साथी लोग तो सामान्य ही बैठे हुए थे।
"अरे अवधेश।" मंत्री ने सोफे पर बैठने के बाद अवधेश की तरफ देखते हुए कहा___"राणे कहाॅ गया भई? उसने तो हमें सुबह फोन करके जल्द से जल्द यहाॅ आने को कहा था और अब वह खुद ही यहाॅ नहीं है। कमाल है भाई, इन जासूसों का भी कुछ समझ नहीं आता। कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं।"
"मैं तो यहीं हूॅ चौधरी साहब।" सहसा तभी हरीश राणे की चिर परिचित आवाज़ ड्राइंग रूम में गूॅजी___"और अपने साथ आपके लिए ऐसा तोहफा भी लेकर आया हूॅ कि आप उस तोहफ़े को देखेंगे तो यकीनन आप मुझ पर अपनी ये सारी दौलत लुटा देंगे।"
राणे की इस आवाज़ को सुन कर चौधरी ने पलट कर राणे की तरफ देखा।
राणे के साथ साथ आ रहे जिन दो इंसानी चेहरों पर उसकी नज़र पड़ी उन्हें देख कर उसके चेहरे पर सोचने वाले भाव उभरे। यहाॅ पर एक अजीब बात ये भी हुई कि चौधरी के बाॅकी साथियों पर हरीश की इस बात का कोई भी प्रभाव न पड़ा था। वो तीनो ऐसे चुपचाप बैठे थे जैसे कि वो माटी के पुतले में तब्दील हो गए हों।
"ओह तो तुम यहीं हो।" राणे के साथ साथ उन दो चेहरों को भी देखते हुए चौधरी ने कहा___"हमें लगा कि हमें सीघ्र बुला कर तुम खुद ही गायब हो। ख़ैर, ये बताओ कि किस तोहफ़े की बात कर रहे थे तुम?"
"यही तो हैं।" राणे मुस्कुराते हुए अपने साथ आए उन दोनो की तरफ इशारा करते हुए कहा___"हाॅ चौधरी साहब, ये दोनो ही तो तोहफ़े हैं आपके लिए जिन्हें मैं अपने साथ लेकर आया हूॅ। क्या आपने इन दोनो को पहचाना नहीं?"
राणे की ये बात सुन कर चौधरी एकदम से चौंका। बड़े ग़ौर से उन दोनो को देखने लगा था वह। चौधरी जिन दो चेहरों को ग़ौर से देखे जा रहा था वो दोनो उसे इस संसार के सबसे खूबसूरत कपल नज़र आए। ऐसा लग रहा था जैसे वो दोनो सबसे अलग हों। इस वक्त वो दोनो चौधरी को देख कर मुस्कुरा रहे थे।
"ये दोनो खूबसूरत कपल कौन हैं भाई?" चौधरी के माॅथे पर उलझन के भाव आए थे___"और ये दोनो भला हमारे लिए तोहफे जैसे कैसे हो सकते हैं?"
"आप भी कमाल करते हैं चौधरी साहब।" हरीश राणे ने ठहाका लगा कर हॅसने के बाद कहा___"आप इन दोनो को नहीं पहचानते हैं? ये तो दुनियाॅ का सबसे बड़ा आश्चर्य है। अरे ये दोनो तो वही हैं चौधरी साहब जिन्होंने आपकी रातों की नींद हराम कर रखी थी। जी हाॅ, ये वही हैं जिन्होंने आपके बच्चों को अपने कब्जे में लिया हुआ था और उन वीडियोज के बल पर आपको भीगी बिल्ली बनाया हुआ था।"
"क्याऽऽऽ????" सोफे पर बैठा चौधरी राणे की इस बात को सुन कर इस तरह उछल पड़ा था जैसे अचानक ही उसके पिछवाड़े के निचले हिस्से की सोफे की पुश्त गर्म तवे में तब्दील हो गई हो। आश्चर्य से ऑखें फाड़े वह कुछ देर तक हकबकाया सा देखता रहा। फिर जैसे उसे होश आया तो अजीब भाव से बोला___"ये..ये दोनो वही हैं?? नहीं नहीं राणे....ये दोनो तो बहुत मासूम दिख रहे हैं, ये भला इतना बड़ा काण्ड कैसे कर सकते हैं?"
"लो भाई।" राणे फिर हॅसा और फिर मेरी तरफ देखते हुए कहा___"अब तुम ही बताओ इन्हें।"
राणे की बात सुन कर मैं मुस्कुराया और फिर मैं चौधरी के क़रीब आ गया। मेरे साथ ही रितू दीदी भी आ गई।
"तुझे मंत्री किसने बना दिया चौधरी?" मैने सहसा तीखे भाव से कहा___"तुझमें तो इतनी भी समझ नहीं है कि मौजूदा हालात में तुम्हारे लिए तोहफे के रूप में राणे किसे ला सकता है? अगर समझ होती तो फौरन ही समझ जाता कि हम दोनो कौन हैं?"
"ज़बान को लगाम दे लड़के।
" बुरी तरह तिलमिलाया हुआ चौधरी सहसा गुर्रा उठा___"तुझे पता नहीं है कि तू इस वक्त कहाॅ खड़ा है? हमसे इस लहजे में बात करने वालों का बहुत ही भयावह अंजाम होता है।"
"अंजाम का डर उन्हें होता है चौधरी।" मैने कहा___"जिन के पिछवाड़े में दम नहीं होता। तुझे तो इतना भी एहसास नहीं हो रहा कि तेरे आवास में आकर मैं तेरे ही सामने तुझसे इस लहजे में बात कैसे कर सकता हूॅ?"
"जब किसी की मौत आती है तो वो ऐसे ही तेरे जैसे अनाप शनाप बकने लगता है।" चौधरी ने कहा।
"तुझे क्या लगता है?" रितू दीदी ने कहा___"हम लोग तेरे सामने राणे की वजह से आए हैं? नहीं चौधरी, ये सब तो हमारा ही खेल है। हमने ही राणे के द्वारा फोन करवा के तुझे यहाॅ बलवाया है। तेरे ये सभी साथी इतनी देर से पुतले की तरह क्यों बैठे हैं क्या तुझे कुछ समझ नहीं आया?"
रितू दीदी की बात सुन कर चौधरी के मस्तिष्क में मानो एकाएक ही विष्फोट सा हुआ। दिमाग़ की सारी बत्तियाॅ रौशन हो उठी। सारी बातें बड़ी तेज़ी से उसके मन में चलने लगी। उसने अजीब भाव से अपने साथियों की तरफ देखा और फिर राणे की तरफ।
"खेल खत्म हो चुका है चौधरी साहब।" राणे तुरंत बोल उठा___"मैं तो कल ही इनके आदमियों के द्वारा पकड़ लिया गया था। उसके बाद इन लोगों ने मुझसे सब कुछ पूछ लिया और मुझे बताना ही पड़ा। मुझे भी इस बात का अंदेशा था कि आपके पीछे गुप्त रूप से कार्यवाही की जा रही है। अतः मैने सोचा कि अगर मैने आपके लिए काम किया तो निश्चय ही मैं भी कानून की चपेट में आ जाऊॅगा इस लिए मैंने वही रास्ता चुना जो सच्चा था और मेरे लिए बेहतर भी था।"
"गद्दार।" चौधरी पूरे क्रोध में बोल पड़ा___"अपनी सलामती के लिए तूने हमें फॅसवा दिया। तुझे ज़िंदा नहीं छोंड़ेंगे हम। तुम सबको अब मौत ही मिलेगी। तुम लोग अब यहाॅ से ज़िंदा वापस नहीं जा सकते।"
"जिनके दम पर तू हमें मौत देने की बात कर रहा है न वो सब तो पुलिस की गिरफ्त में आ चुके हैं।" मैने सहसा झुक कर चौधरी की ऑखों में ऑखें डाल कर कहा___"और तेरे में इतना दम ही नहीं है कि तू मेरा बाल भी उखाड़ सके।"
मेरी इस बात से चौधरी को साॅप सा सूॅघ गया। अनुभवी आदमी था। उसे समझते देर न लगी कि जिस अंदाज़ से मैं उससे बात कर रहा था वो तभी संभव था जब वो कुछ भी कर पाने की पोजीशन में न हो। अभी मैं उसे देख ही रहा था कि सहसा तभी बाहर से ढेर सारे पुलिस के आदमी अंदर दाखिल हुए। उन सभी पुलिस वालों के बीच से ही एसीपी रमाकान्त शुक्ला चलता हुआ हमारे पास आया।
"वेल डन इंस्पेक्टर रितू।" फिर उसने दीदी की तरफ देख कर कहा___"यकीनन तुम दोनो ने बहुत ही बड़ा काम किया है।" कहने के साथ ही एसीपी चौधरी की तरफ पलटा___"दुनियाॅ की कोई भी ताकत अब तुम्हें कानून की सलाखों के पीछे से नहीं निकाल सकती।
तुम्हारे खिलाफ़ हमें इतने सबूत मिल चुके हैं कि अब तुम किसी भी कीमत पर बच नहीं सकते।"
"किन सबूतों की बात कर रहे हो आफीसर?" चौधरी ने हैरानी से कहा___"और ये इतनी सारी पुलिस फोर्स यहाॅ किस लिए लेकर आए हो तुम?"
"देखते जाओ चौधरी।" एसीपी ने कहा___"कुछ ही देर में सब कुछ पता चल जाएगा तुम्हें।"
पुलिस वालों को कदाचित पहले ही समझा दिया गया था कि क्या करना है। अतः वो यहाॅ आते ही अपने काम पर लग गए थे। चौधरी ये सब देख कर एकाएक बुरी तरह बौखला गया। उसके चेहरे पर डर व घबराहट के भाव उभर आए। चिंता व परेशानी के चलते पूरा चेहरा पसीने पसीने हो गया उसका। उसके साथियों का भी वही हाल था।
कुछ ही देर में वहाॅ पर पुलिस महकमे के कुछ और आला अधिकारी आ गए। चौधरी को कुछ भी करने का मौका न मिला। वो तो यही नहीं समझ पा रहा था कि इतनी सारी पुलिस फोर्स इतनी जल्दी यहाॅ कैसे आ गई? अंदर की तरफ गए हुए पुलिस वाले थोड़ी ही देर में बाहर आए और उन्होंने जो कुछ बताया उसे सुन कर चौधरी के सिर पर सारा आसमान भरभरा कर गिर गया। उसका चेहरा एकदम से निस्तेज पड़ गया।
लगभग एक घंटे की कठोर कार्यवाही के बाद आला अधिकारियों के साथ मंत्री को गिरफ्तार कर बॅगले से बाहर ले जाया जाने लगा। बाहर आते ही चौधरी ने देखा कि बाहर भीड़ जमा है। उस भीड़ में प्रेस व मीडिया के लोग थे जो मंत्री व पुलिस के आला अधिकारियों से तरह तरह के सवाल पूछने लगे थे। प्रेस व मीडिया वालों को संक्षेप में उनके सवालों के कुछ जवाब देकर चौधरी को लेकर पुलिस वाले चले गए। मंत्री के आवास को सील कर पुलिस सिक्योरिटी लगा दी गई।
ये मामला ही ऐसा था कि पलक झपकते ही मंत्री की गिरफ्तारी की ख़बर प्रदेश में हर तरफ फैल गई। मंत्री के चाहने वाले तथा पार्टी के उसके सहयोगियों ने विरोध प्रदर्शन तो किया किन्तु उस सबको पुलिस वालों ने सम्हाल लिया। मैं और रितू दीदी मंत्री के इस किस्से को खत्म करके वापस लौट आए थे। हरीश राणे को खुशी खुशी हमने छोंड़ दिया था। वो खुद भी इस सबसे खुश था कि उसने अच्छाई का साथ दिया। राणे जाते जाते हम लोगों के कान्टैक्ट नंबर ले गया था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर मंत्री के पकड़े जाने की ये ख़बर हवेली में अजय सिंह को भी हो गई। इस ख़बर ने अजय सिंह की हालत को लकवा मारने जैसी बना दिया। कुछ समय के लिए तो उसे ऐसा लगा जैसे इस संसार में अब कुछ बचा ही नहीं है बल्कि सब कुछ शून्य में ही खो गया है। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा कुछ हो जाएगा। विराज और रितू ने उसके लिए जैसे हर तरफ से रास्ता ही बंद कर दिया था। कहाॅ वह मंत्री के फोन द्वारा ये पता चलने का इन्तज़ार कर रहा था कि उसका भतीजा और उसकी बेटी आदि सब पकड़ लिए गए हैं और कहाॅ अब इस ख़बर ने उसके मुकम्मल वजूद को ही हिला कर रख दिया था।
अजय सिंह मंत्री के पकड़े जाने से चिंतित व परेशान तो था ही साथ ही वह इस बात के लिए भी बेहद परेशान हो गया था कि उसके दोस्तों ने अपने जिन आदमियों को उसकी सहायता के लिए भेजा था वो सब पुलिस द्वारा पकड़ लिए गए थे। सुबह से फोन पर फोन आ रहे थे उसे। ये सब फोन उसके उन दोस्तों के ही थे। जो कह रहे थे कि उन्हें अपने आदमियों के पकड़े जाने का इतना दुख नहीं है बल्कि चिंता इस बात की है कि उनके वो सब आदमी पुलिस के सामने अपना मुह न खोल दें जिसकी वजह से वो सब भी कानून की चपेट में आ जाएॅ। अतः इससे बचने के लिए वो सब अजय सिंह से कोई न कोई समाधान चाह रहे थे। मगर अजय सिंह कुछ कहने की हालत में ही नहीं था। वो तो खुद भी अब मंत्री की वजह से असहाय सा हो गया था। मंत्री का कानूनन इस तरह पकड़े जाना उसके लिए बहुत बड़ी क्षति थी। क्योंकि अब उसे मंत्री पर ही भरोसा था कि वो उसे इस सारे खेल में जीत दिलाएगा। मगर अब सब कुछ जैसे स्वाहा हो चुका था।
प्रतिमा और शिवा सुबह से उसके पास ही थे। इस वक्त दोपहर हो चुकी थी। अजय सिंह अकेला ही ड्राइंग रूम में गुमसुम सा बैठा था। प्रतिमा किसी काम से बाहर गई हुई थी। शिवा अपने कमरे में था। सोफे पर बैठा अजय सिंह शिगार पे शिकार फूके जा रहा था। सविता जो उसकी घरेलू नौकरानी थी उसने उसे अब तक जाने कितनी बार चाय बना कर पिलाया था। हालात की गंभीरता का उसे भी एहसास था। उसे इस हवेली का सब कुछ पता था किन्तु उसने कभी इस मामले में हवेली के किसी भी सदस्य से कोई बात नहीं की थी। उसे पता था कि इस बारे में बात करने का सबसे पहले तो उसका कोई हक़ ही नहीं है दूसरी बात उसकी बातों को कोई सुनना पसंद भी नहीं करता।
सारी बातों को सोचते सोचते अजय सिंह इतना परेशान हो चुका था कि उसका सिर दर्द करने लगा था। वह उठा और सविता को आवाज़ दे कर कहा कि वो उसके सिर की बढ़िया से मालिश कर दे। ये कह कर अजय सिंह अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। सविता चालीस के आस पास की साॅवली सी औरत थी। उसका पति उसे बरसों पहले छोंड़ कर चला गया था। सविता और उसका पति पहले खेतों पर ही काम करते थे। बाद में उसका पति जब वापस लौट कर न आया तो गजेन्द्र सिंह ने उसे हवेली के काम धाम पर लगा लिया। सविता को हवेली में रहते हुए लगभग दस साल हो गए थे। उसने इस हवेली के अंदर अब तक क्या क्या हुआ सब कुछ देखा सुना था। मगर उसने कभी इस बारे में कोई दखलअंदाज़ी न की थी। उसे ये भी पता था कि अजय सिंह का परिवार कैसा है तथा ये भी कि ये रिश्तों को नहीं मानते। उसने शिवा को अपनी ऑखों से अपनी ही माॅ को संभोग करते देखा था। उस दिन उसे लगा था कि कलियुग वाकई आ चुका है।
अजय सिंह ने सविता के साथ जाने कितनी बार संभोग किया था इसका उसे खुद पता नहीं था। कई बार वह पेट से भी हुई थी किन्तु अजय सिंह ने हर बार उसके पेट से अपना बीज गिरवा दिया था।
सविता ने परिस्थितियों के साथ पहले ही समझौता कर लिया था। उसका अपना कोई नहीं था। रितू व नीलम को वो अपनी ही बेटी की तरह मानती थी और हमेशा दुवा किया करती थी कि वो दोनो खुश रहें। रितू व नीलम भी उसे बहुत इज्ज़त व सम्मान देती थीं। उन दोनो ने कभी उसे नौकरानी नहीं समझा था। बल्कि हमेशा उसे काकी ही कहती थी। हलाॅकि शिवा का ब्यौहार अपने बाप की तरह ही था। किन्तु सविता के साथ ज़बरदस्ती करने की हिम्मत उसमे कभी न हुई थी। सविता एक तंदुरुस्त तबीयत की औरत थी। मेहनत कर करके वह बेहद मजबूत हो गई थी। वह दिखती भी ऐसी थी कि शिवा जैसा छोकरा उससे ज़बरदस्ती करने की हिम्मत कर ही नहीं सकता था। पिछले कुछ सालों से अजय सिंह ने सविता को भोगना बंद कर दिया था। इस बात से सविता को राहत महसूस हुई थी। अजय सिंह के सविता के साथ संबंधों की जानकारी प्रतिमा को शुरू से ही थी। किन्तु उसे इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी।
थोड़ी ही देर में सविता अपने हाॅथ में एक कटोरी लिए अजय सिंह के कमरे में दाखिल हुई। कटोरी में शुद्ध सरसो का तेल था। कमरे में पहुॅचते ही सविता ने देखा कि अजय सिंह बेड पर लेटा हुआ है। आज काफी समय बाद अकेले कमरे में अजय सिंह के पास आते हुए सविता को थोड़ा असहज सा लगा। किन्तु उसे पता था कि मालिश तो उसे करनी ही पड़ेगी और अगर अजय सिंह ने उसके साथ संभोग करने की इच्छा ज़ाहिर की तो उसे उसकी वो इच्छा भी पूरी करनी पड़ेगी।
अजय सिंह की नज़र हाॅथ में कटोरी लिए आई सविता पर पड़ी तो उसने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। पहले की अपेक्षा सविता का जिस्म काफी आकर्षक सा हो गया था। हर अंग अपनी जगह सही से ढला हुआ था। ऊम्र का असर उसके सिर के बालों से दिख रहा था। बाॅकी उसका समूचा जिस्म कसा हुआ था। सीने के उभार प्रतिमा से कतई कम न थे। ब्लाऊज फाड़ कर बाहर आने को आतुर थे। अजय सिंह को ग़ौर से अपनी तरफ देखते देख सविता के संपूर्ण जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गई।
"चलिए मालिक।" फिर उसने खुद को सामान्य बनाते हुए कहा___"आपके माॅथे पर मालिश कर देती हूॅ।"
"ओह हाॅ हाॅ।" अजय सिंह उसकी बात सुनते ही कुछ झेंप सा गया___"इस वक्त मालिश की वाकई बहुत ज़रूरत है सविता। प्रतिमा बाहर गई हुई है वरना तुम्हें तक़लीफ न देता। वो खुद भी बहुत अच्छी मालिश कर लेती है।"
"कोई बात नहीं मालिक।" सविता ने बेड के क़रीब आते हुए कहा___"मैं तो अक्सर मालकिन की मालिश करती ही रहती हूॅ। आज आपकी भी कर देती हूॅ। चलिए लेट जाइये अब।"
"इन कपड़ों को उतार दूॅ क्या?" अजय सिंह ने अपने बदन के ऊपर पहने कपड़ों की तरफ दःखते हुए कहा।
"मालिश तो माॅथे पर करनी है न मालिक।" सविता ने जल्दी से कहा___"कपड़े उतारने की क्या ज़रूरत है?"
"बात तो ठीक ही है तुम्हारी।
" अजय सिंह कहने के साथ ही मुस्कुराया___"पर अगर पूरे बदन की मालिश कर दोगी तो क्या बुराई है? मुझे भी तो पता चले कि तुम अपनी मालकिन की किस तरह से मालिश किया करती हो?"
अजय सिंह की बात सुन कर सविता को साॅप सा सूॅघ गया। उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था। ऐसा नहीं था कि उसने अजय सिंह को बिना कपड़ों के देखा नहीं था बल्कि उसने तो इसके पहले न जाने कितनी बार खुद बिना कपड़ों के उसके साथ संभोग किया था किन्तु एक दो सालों से ये रिश्ता लगभग मिट सा गया था। इस लिए उसे इस बात का अंदेशा था कि कहीं आज फिर ऐसे हालात न बन जाएॅ कि उसे संभोग करना पढ़ जाए। दूसरी बात ये भी थी कि अब वो किसी सूरत में नहीं चाहती थी कि वो इस आदमी के साथ वो सब करे। उसने मन ही मन ईश्वर को याद किया कि उसे इस परिस्थिति से बचाए।
उसकी इस फरियाद को मानो ईश्वर ने सुन भी लिया, क्योंकि तभी कमरे में एक तरफ टेबल पर रखे लैण्डलाइन फोन की घंटी घनघना उठी थी। फोन के बजने से अजय सिंह के चेहरे पर अप्रिय भाव उभरे। फिर उसने बेड के किनारे पर खिसक कर फोन के रिसीवर को उठा कर कान से लगाते ही हैलो कहा।
".............।" उधर से जाने क्या कहा गया। किन्तु इतना ज़रूर हुआ कि उसके चेहरे पर बुरी तरह चौंकने के भाव उभरे और फिर सहसा उसने पलट कर सविता को कमरे से चले जाने को कहा। उसके इस तरह चले जाने का सुन कर पहले तो सविता चौंकी फिर जल्द ही वापस कमरे से बाहर की तरफ चल पड़ी।
कमरे से बाहर आते ही सविता ने राहत की साॅस ली और फिर किचेन की तरफ बढ़ गई। किचेन में उसने तेल की कटोरी को रखा और फिर किचेन से बाहर ड्राइंगरूम की तरफ बढ़ गई। ड्राइंगरूम में आते ही उसकी नज़र मालकिन यानी की प्रतिमा पर पड़ी जो एक तरफ टेबल पर ही रखे फोन के रिसीवर को कान से लगाए खड़ी थी। उसका चेहरा दूसरी तरफ था। सविता अपनी मालकिन को देख कर वापस अंदर की तरफ चली गई।
उधर कमरे में अजय सिंह काफी देर तक किसी से बात करता रहा। उसके चेहरे पर कई तरह के भावों का आवागमन चालू था। ख़ैर कुछ देर बाद उसने अपने कान से हटा कर रिसीवर को वापस केड्रिल पर रख दिया। रिसीवर रखने के बाद उसने एक गहरी साॅस ली और फिर सहसा जाने क्या सोच कर मुस्कुरा उठा।
अभी अजय सिंह मुस्कुरा ही रहा था कि तभी कमरे में प्रतिमा दाखिल हुई। प्रतिमा को देख कर अजय सिंह की मुस्कान और गहरी हो गई। उसके होठों पर फैली इस मुस्कान को देख कर प्रतिमा के होठों पर भी मुस्कान फैल गई।
"क्या बात है जनाब।" फिर प्रतिमा ने उसके समीप आते हुए कहा___"बहुत मुस्कुरा रहे हो। कारून का कोई ख़जाना मिल गया है क्या?"
"ऐसा ही समझो डियर।" अजय सिंह कहने के साथ ही आलमारी की तरफ बढ़ा, फिर बोला___"बल्कि अगर ये कहूॅ तो ग़लत न होगा कि कारून का ख़जाना भी उसके सामने कुछ नहीं है।
"
"ओह ऐसा क्या?" प्रतिमा की ऑखें फैली___"ज़रा मुझे भी तो बताओ कि ऐसा कौन सा ख़जाना मिल गया है जिसके सामने कारून के ख़जाने की कोई औकात ही नहीं है।"
"ज़रूर बताऊॅगा प्रतिमा।" आलमारी से कोट निकालने के बाद अजय सिंह ने कहा___"पहले ख़जाने को मेरे हाॅथ तो लगने दो।"
"क्या मतलब??" प्रतिमा के चेहरे पर चौंकने के भाव उभरे___"क्या वो ख़जाना अभी तुम्हारे हाॅथ नहीं लगा है?"
"लग जाएगा माई डियर।" अजय सिंह ने कोट पहनते हुए कहा___"और इस ख़जाने को मेरे हाथ लगने से ब्रम्हा भी नहीं रोंक पाएॅगे।"
"बड़ी अजीब बातें कर रहे हो आज।" प्रतिमा ने सहसा तिरछी नज़रों से देखते हुए कहा___"कहीं तुम्हारे इस ख़जाने का संबंध रितू अथवा विराज से तो नहीं है?"
"ज्यादा दिमाग़ मत चलाओ प्रतिमा।" अजय सिंह ने सपाट लहजे में कहा___"बस समय का इन्तज़ार करो। ख़ैर, मैं ज़रूरी काम से बाहर जा रहा हूॅ शाम तक लौटूॅगा। शिवा से कहना वो कहीं बाहर न जाए बल्कि हवेली में ही रहे।"
प्रतिमा की प्रतिक्रिया सुने बिना ही अजय सिंह कमरे से बाहर निकल गया। उसके जाते ही प्रतिमा के चेहरे पर सहसा गहन पीड़ा के भाव उभरे और फिर एकाएक ही उसकी ऑखें छलक पड़ीं। आगे बढ़ कर वह बेड पर धम्म से बैठ गई। उसके मनो मस्तिष्क में ऑधियाॅ सी चलने लगी थी।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर मंत्री दिवाकर चौधरी के अपने साथियों सहित पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए जाने की सूचना मैने मंत्री के बेटे सूरज चौधरी व उसके तीनो साथियों को भी दे दी। चारो इस ख़बर को सुन कर बिलकुल असहाय से हो गए। ऐसा लग रहा था जैसे उनके जिस्मों में जान ही न रह गई हो। चारो की हालत वैसे भी बहुत ही दयनीय हो चुकी थी। भरपेट खाना न मिलने की वजह से तथा शारीरिक व मानसिक यातनाओं के चलते वो चारो ही बेहद कमज़ोर लगने लगे थे। दूसरे कमरे में मंत्री की बेटी को भी रितू दीदी ने उसके बाप के संबंध में सूचित कर दिया था। रचना चौधरी इस ख़बर से बुत बन कर रह गई थी। किन्तु जब उसके मुख से लफ्ज़ निकले तो बड़े अजीब थे। उसका कहना था कि मेरे बाप भाई ने जितने पाप कर्म किये थे उसका अंजाम तो यही होना था न।
सूरज चौधरी व उसके तीनो दोस्त हर तरह से टूट चुके थे। मौत की भीख माॅग रहे थे चारो मगर मौत मिलना इतना आसान नहीं था। इस बीच मैने फैंसला किया कि इन सबको यहाॅ से आज़ाद कर दिया जाए। उन चारो की हालत देख कर मुझे इस बात का बोध हो चुका था कि वो पश्चाताप की आग में जल रहे हैं। बड़े से बड़े अपराध के लिए भी इंसान को क्षमा कर दिया जाता है और उसे सुधरने का एक मौका दिया जाता है। दूसरी बात, ये सब करके मुझे मेरी विधी तो मिलनी नहीं थी। उसके साथ हुए अत्याचार का मैने बदला ले लिया था इन लोगों से।
उन चारों को आज़ाद कर देने वाले मेरे फैंसले से थोड़ी न नुकुर के बाद आख़िर सब राज़ी हो गए थे।
किन्तु सवाल ये था कि वो आज़ाद होने के बाद जाएॅगे कहाॅ? क्योंकि मंत्री का बॅगला तो पुलिस द्वारा सील कर दिया गया था। इस सवाल का जवाब रितू दीदी ने दिया, ये कह कर कि ये सब चिमनी में अपने पुश्तैनी घर जा सकते हैं। रितू दीदी की इस बात से समस्या का समाधान हो चुका था। अतः अब यही फैंसला हुआ कि इन सबको बेहोश करके चिमनी भेज दिया जाए।
मैने मौसा जी को फोन करके सारी बात बताई और उनसे आग्रह किया कि क्या वो इन चारो को चिमनी भेजने का काम करवा सकते हैं? मेरी इस बात पर वो हॅस कर बोले इसमें संकोच की क्या बात है बेटा? थोड़ी ही देर में केशव जी अपने कुछ आदमियों को लेकर हमारे पास आ गए। मैने और आदित्य ने चारो को बेहोश कर दिया और केशव की गाड़ी में उन सबको डलवा दिया। उनके साथ ही रचना को भी बेहोश करके डाल दिया था। ये सब होने के बाद केशव जी अपने आदमियों के साथ चिमनी गाॅव के लिए निकल गए।
उन सबको आज़ाद करने के बाद मन को थोड़ा शान्ति सी मिल गई थी। इस वक्त ड्राइंग रूम में मैं रितू दीदी तथा आदित्य बैठे हुए थे। नैना बुआ व सोनम दीदी नीलम के पास उसके कमरे में थीं।
"चलो मंत्री और उसके बच्चों से छुटकारा मिल गया आख़िर।" सहसा आदित्य ने कहा___"अब हम सारा फोकस तुम्हारे ताऊ पर लगा सकते हैं। वैसे मुझे तो लगता है कि अब हमें खुल कर हवेली में उसके सामने ही चले जाना चाहिए और फिर उन सबका भी काम तमाम कर देना चाहिए। अजय सिंह मौजूदा हालात में कुछ भी कर सकने की पोजीशन में नहीं है। उसकी आख़िरी उम्मीद निःसंदेह मंत्री ही था जोकि अब वो भी कानून की लम्बी चपेट में आ चुका है। दूसरी बात उसके जितने भी आदमी थे उन सबको भी पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है। कहने का मतलब ये कि इस वक्त अजय सिंह निहत्था व असहाय अवस्था में है। हम बड़ी आसानी से उसे लपेटे में ले सकते हैं और उसका हिसाब किताब कर सकते हैं।"
"इस बात का एहसास तो उसे भी हो ही गया होगा मेरे यार।" मैने कहा___"वो भी इस बात को समझता होगा कि मौजूदा हालात में हम उसके बारे में क्या सोच रहे होंगे? इस लिए वो पूरी कोशिश करेगा कि वो हमारी सोच को सही साबित न होने दे। यानी कि वो कुछ ऐसा ज़रूर करेगा जिससे हम उसके सामने इस तरह न जा सकें जिस तरह की तुम बात कर रहे हो।"
"राज बिलकुल सही कह रहा है आदित्य।" रितू दीदी ने गहरी साॅस लेकर कहा___"मैं अपने डैड को बहुत अच्छी तरह से जानती हूॅ। वो इस परिस्थिति में भी कोई ऐसा जुगाड़ कर ही लेंगे कि हम उनके पास इस तरह से उनका तिया पाॅचा करने न पहुॅच सकें।"
"तुम्हारे हिसाब से वो ऐसा क्या जुगाड़ कर सकता है अब?" आदित्य ने पूछा___"जबकि मौजूदा हालात साफ शब्दों में बता रहे हैं कि वो अब कुछ भी करने की पोजीशन में नहीं रह गया है।"
"इस बारे में मैं कुछ कह नहीं सकती।
" रितू दीदी ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा___"किन्तु उनके संबंध कई ऐसे लोगों से रहे हैं अथवा ये कहूॅ कि हैं जो ऊॅचे दर्ज़े के अपराधी हैं। अतः संभव है कि डैड अपने ऐसे ही किन्हीं अपराधी दोस्तों से मौजूदा हालात में मदद की गुहार लगाएॅ।"
"चलो ये मान लिया कि तुम्हारे डैड के ऐसे लोगों से संबंध हैं और वो उन लोगों से इस समय मदद माॅग सकते हैं।" आदित्य ने कहा___"किन्तु यहाॅ पर मैं एक सलाह देना चाहता हूॅ, और वो सलाह ये है कि तुम्हारे डैड को उस आधार पर भी तो बड़ी आसानी से भीगी बिल्ली बना कर अपने पास बुलाया जा सकता है जो आधार इस वक्त राज के पास मौजूद है, यानी कि अजय सिंह का ग़ैर कानूनी सामान। उस सामान के आधार पर अजय सिंह यकीनन भीगी बिल्ली बन कर हमारे पास खुद ही आ जाएगा।"
"ऐसा नहीं हो सकता आदी।" मैने कहा___"क्योंकि अब तक ये बात मेरे ताऊ को भी ताई के समझाने पर समझ आ ही गई होगी कि मैं उन्हें उनके ग़ैर कानूनी सामान के आधार पर कोई क्षति नहीं पहुॅचाना चाहता बल्कि अपने बलबूते पर ही अपने व अपने परिवार के साथ हुए हर अत्याचार का बदला लेना चाहता हूॅ। अगर मुझे उस सामान के आधार पर ही अपने ताऊ का क्रियाकर्म करना होता तो मैं ये काम बहुत पहले ही कर चुका होता। इस लिए इस बात पर सोचने का कोई मतलब ही नहीं है दोस्त।"
"मैं तुम्हारी बातों से पूर्णतया सहमत हूॅ।" आदित्य ने कहा___"किन्तु उन्हें ये भी तो पता होगा न कि अगर तुम अपने बलबूते पर अपने ताऊ का कोई भी बाल बाॅका न कर पाए तो फिर तुम्हारे पास अंतिम चारा वो ग़ैर कानूनी सामान ही तो होगा। यानी कि तुम उस सामान के आधार पर ही आख़िरी चारे के रूप में अपने ताऊ का काम तमाम करोगे। कहने का मतलब ये कि इस वक्त अगर तुम उसी ग़ैर कानूनी सामान की धमकी देकर अपने ताऊ को भीगी बिल्ली बना कर अपने पास आने पर मजबूर करोगे तो वो यही समझेंगे कि शायद तुम्हारे पास अब यही एक चारा रह गया था जिसके तहत तुमने अजय सिंह के उस ग़ैर कानूनी सामान का सहारा लिया है और उसे अपने पास इस तरह बुला रहे हो।"
"मनोविज्ञान की दृष्टि से तुम्हारा ये सोच कर कहना यकीनन सही है।" मैने कहा___"किन्तु मत भूलो कि उस तरफ बड़ी माॅ हैं जो खुद दिमाग़ के मामले में हम सबसे बीस ही हैं। कहने का मतलब ये कि सारे हालातों पर ग़ौर करने के बाद वो इसी नतीजे पर पहुॅचेंगी कि इतना कुछ होने के बाद तो हमारा पक्ष पहले से और भी ज्यादा मजबूत हो गया है, तो फिर अचानक ये गैर कानूनी सामान को आधार बना कर अजय सिंह को हम क्यों अपने पास बुला रहे हैं?"
"अरे तो उनके नतीजों से हमें क्या लेना देना भाई?" आदित्य ने कहा___"वो सारे हालातों पर ग़ौर करके क्या नतीजा निकालती हैं इससे हमें क्या फर्क़ पड़ता है? हमें तो अपने काम से मतलब है, फिर चाहे वो जैसे भी हो।
"
"और मेरे सिद्धान्तों व उसूलों का क्या?" मैने आदित्य की तरफ अजीब भाव से देखते हुए कहा___"हम सच्चाई व धर्म की राह पर चल रहे हैं दोस्त। हम भले ही अब तक धोखे से या किसी चाल से यहाॅ तक पहुॅचे हैं किन्तु प्यार व जंग में ये जायज था। मगर यहाॅ पर एक नियम अथवा एक सिद्धान्त तो मैंने उन्हें जता ही दिया था कि मैं अजय सिंह के खिलाफ उसके ग़ैर कानूनी सामान के आधार पर कोई ऐक्शन नहीं लूॅगा, बल्कि सब कुछ अपने बलबूते पर ही करूॅगा। इस बात को मैं अब तक निभाता भी आया हूॅ और आगे भी इसे निभाना चाहता हूॅ। ये मेरे जिगर व मेरी मर्दानगी का सबूत भी होगा भाई कि मैने अपने बलबूते पर ही सब कुछ किया। इसके विपरीत अगर मैने जंग के आख़िर में ये क़दम उठाया तो फिर मेरी साख़ का क्या औचित्य रह जाएगा? मेरा ताऊ इस बात को भले ही न समझ पाए मगर मुझे यकीन है कि मेरी इस मनोभावना को बड़ी माॅ ज़रूर समझेंगी, और मैं चाहता भी हूॅ कि उनके मन में मेरे कैरेक्टर का ये मैसेज जाए। दूसरी बात, हमे ऐसा करने की ज़रूरत भी क्या है दोस्त? आप दोनो के रहते तो मैं सारी दुनिया को फतह कर सकता हूॅ।"
"एक सच्चा इंसान तथा एक सच्चा वीर ऐसा ही होना चाहिए।" सहसा रितू दीदी ने मेरी तरफ प्रसंसा भरी नज़रों देखते हुए कहा___"मुझे तुझ पर नाज़ है मेरे भाई। मेरा दिल करता है कि तेरे लिए अपनी अंतिम साॅस तक निसार कर दूॅ।"
"ऐसा मत कहिए दीदी।" मैने सहसा भावुकतावश उनकी तरफ देखते हुए कहा___"अभी तो हम सबको एक साथ बहुत सारी खुशियाॅ बाॅटनी हैं। इस सबके बाद हम एक नये संसार का शुभारम्भ करेंगे। उस नये संसार में बेपनाह प्यार और बेपनाह खुशियाॅ होंगी।"
"और मुझे अपनी उन खुशियों से किनारा कर दोगे क्या तुम लोग?" आदित्य मुस्कुराते हुए बोल पड़ा___"ऐसा सोचना भी मत राज। वरना देख लेना तुम्हारे घर के बाहर धरना देकर बैठ जाऊॅगा।"
"ऐसा मत करना दोस्त।" मैने मुस्कुराते हुए कहा___"गाॅव के लोग धरने के रूप में एक ही आदमी को बैठा देखेंगे तो उसे कुछ और ही समझ लेंगे।"
"ओ हैलो।" आदित्य ने ऑखें दिखाई___"क्या मतलब है तुम्हारा? क्या समझ लेंगे गाॅव के लोग___भिखारी?? चल कोई बात नहीं यार। तुम्हारे लिए ये भी बन जाऊॅगा।"
"तुम्हें बाहर धरने पर बैठने की ज़रूरत नहीं है आदित्य।" रितू दीदी ने कहा___"रक्षाबंधन आने वाला है। इतने वर्षों में पहली बार मैं राज को राखी बाधूॅगी। राज की तरह तुम भी मेरे भाई ही हो। मैं और भी बहुत खुश हो जाऊॅगी कि तुम्हारे जैसा एक नेक दिल इंसान मेरा भाई बन जाएगा।"
"कितनी सुंदर बात कही है तुमने।" आदित्य सहसा किसी गहरे ख़यालों में खोता नज़र आया___"तुम्हारे ही जैसी एक बहन थी मेरी___प्रतीक्षा। मेरी लाडली थी वो, हर साल रक्षाबंधन के दिन मेरी कलाई पर एक साथ ढेर सारी राखियाॅ बाॅध देती थी। फिर कहती कि सभी राखियों का वो अलग अलग पैसा लेगी मुझसे।
" कहने के साथ ही आदित्य की ऑखों से ऑसू छलक पड़े, बोला___"मगर चार साल पहले अपने प्यार में धोखा खाने की वजह से उसने खुदखुशी की कोशिश की। दो मंजिला मकान की छत से कूद गई वो। हास्पिटल में इलाज चला मगर डाक्टर ने बताया कि वो कोमा में जा चुकी है। आज चार साल हो गए। आज भी वो लाश बनी पड़ी है। जिस लड़के ने उसे धोखा दिया था उसे ऐसी सज़ा दी थी मैने कि वो किसी भी लड़की से संबंध बनाने का सोच ही नहीं सकता अब।"
आदित्य की ये बातें सुन कर मैं और रितू दीदी भी सीरियस हो गए। रितू दीदी उठ कर आदित्य के पास गई और उसे अपने से छुपका लिया। मैं खुद भी आदित्य की दूसरी तरफ बैठ कर उसके कंधे को थपथपा रहा था।
"दुखी मत हो आदित्य।" रितू दीदी ने कहा___"प्रतीक्षा जल्द ही ठीक हो जाएगी। चलो अब शान्त हो जाओ। देखो ये ईश्वर का विधान ही तो था कि मैं तुम्हारी बहन के रूप में तुम्हें मिली और चार साल से सूनी पड़ी तुम्हारी कलाई में राखी भी बाधूॅगी।"
"भगवान का बहुत बहुत शुक्रिया।" आदित्य ने रितू दीदी से अलग होते हुए ऊपर की तरफ सिर करके कहा___"जो उसने मुझे बहन के रूप में मेरी प्रतीक्षा को मेरे पास भेज दिया। मैं तुमसे यही कहूॅगा रितू कि तुम भी प्रतीक्षा की तरह मेरी कलाई पर ढेर सारी राखियाॅ बाॅधना।"
"जैसी तुम्हारी इच्छा।" दीदी ने मुस्कुरा कर कहा___"तुम दोनो बैठो मैं ज़रा काकी(बिंदिया) को चाय बनाने के लिए कहने जा रही हूॅ।"
"ठीक है।" आदित्य ने कहा। उसके बाद रितू दीदी उठ कर अंदर की तरफ चली गईं। जबकि मैं और आदित्य वहीं बैठे रहे।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उधर मुम्बई में।
जगदीश ओबराय बॅगले के बाहर लान में एक तरफ हरी हरी विदेशी घाॅस के बीचो बीच रखी कुर्सी पर बैठा शाम का अखबार पढ़ रहा था। इस वक्त वह यहाॅ पर अकेला ही था। उसके सामने की बाॅकी सभी कुर्सियाॅ खाली थी। तभी मेन गेट से अंदर आती हुई एक कार की आवाज़ से उसका ध्यान मेन गेट की तरफ गया।
मेन गेट से अंदर दाखिल हुई कार चलते हुए सीधा पोर्च में जाकर रुकी। कार के रुकते ही पैसेंजर सीट की तरफ का गेट खुला और अभय सिंह अपने पैर पोर्च के फर्श पर रखते हुए बाहर निकला। बाहर आते ही उसने लान में एक तरफ कुर्सी में बैठे जगदीश ओबराय की तरफ देखा। जगदीश ओबराय को देखते ही उसके होठों पर मुस्कान उभर आई और वह उस तरफ ही बढ़ता चला गया।
"कहो भाई क्या कहा डाक्टर ने?" अभय के कुर्सी पर बैठते ही जगदीश ओबराय ने मुस्कुराते हुए उससे पूछा___"वैसे तुम्हारे चेहरे की चमक देख कर ज़ाहिर हो रहा है कि रिपोर्ट पाॅजिटिव ही है।"
"बिलकुल सही कहा आपने भाई साहब।" अभय सिंह ने खुशी से कहा___"रिपोर्ट एकदम सही है। बस कुछ ही दिनों में सब कुछ सही हो जाएगा और ये सब आपकी वजह से ही संभव हो सका है। इसके लिए मैं आपका हमेशा आभारी रहूॅगा।
"
"अरे इसमें मेरा आभारी रहने की क्या बात है भई?" जगदीश ओबराय ने कहा___"सब कुछ करने वाला तो ऊपरवाला है। हम तो बस माध्यम ही होते हैं।"
"ऊपरवाले को भी तो कुछ करने के लिए किसी न किसी माध्यम की आवश्यकता ही पड़ती है भाई साहब।" अभय सिंह ने कहा____"ये उसी का नतीजा है कि आप इस सबके लिए माध्यम बने और ये सब हुआ वरना अब तक जो कुछ भी हुआ है उसके बारे में तो हम में से कोई ख़्वाब में भी नहीं सोच सकता था।"
"पर इसमें भी सबसे बड़ा योगदान गौरी बहन का है अभय भाई।" जगदीश ओबराय ने कहा___"उसने करुणा बहन से कुरेद कुरेद कर तथा ज़बरदस्ती पूछा था और तब करुणा ने बताया कि तुममें समस्या क्या है? गौरी बहन ने वो बात बहाने से ही सही किन्तु मुझसे कही। मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि तुम में ये समस्या हो सकती है। तुम भी अपने बिना मतलब के स्वाभिमान व शर्म के चलते इस बारे में किसी से कहना नहीं चाहते थे। बेकार की सोच और बेकार के सिद्धान्त लिए बैठे थे। तुम्हें अपनी पत्नी की इच्छाओं का खुशियों का कोई ख़याल ही नहीं था। ख़ैर, जो भी हुआ अच्छा ही हुआ। अब खुशी की बात ये है कि तुम फिजिकली अब कुछ ही दिनों में पूरी तरह से ठीक हो जाओगे और तुम्हारे पति पत्नी के रिश्तों के बीच फिर से खुशियाॅ भी आ जाएॅगी।"
"सचमुच गौरी भाभी को सबका ख़याल रहता है।" अभय सिंह ने मुग्ध भाव से कहा___"वो यकीनन देवी हैं भाई साहब। कभी कभी सोचा करता हूॅ कि इतने अच्छे लोगों के साथ ईश्वर ऐसा अन्याय कैसे कर देता है? भला क्या बिगाड़ा था किसी का उन्होंने?"
"एक नये अध्याय को शुरू करने के लिए पुराने ख़राब हो चुके अध्याय को खत्म करना ही पड़ता है।" जगदीश ओबराय ने कहा___"हम आम इंसान ईश्वर के क्रिया कलाप को समझ नहीं पाते हैं जबकि सबसे ज्यादा उसे ही पता होता है कि हमारे लिए क्या अच्छा हो सकता है? ईश्वर ने मेरे साथ क्या कुछ नहीं कर दिया है। आज से पहले अरब पति होते हुए भी मैं इतनी बड़ी सल्तनत में अकेला था किन्तु आज मेरे पास गौरी जैसी बहन है और विराज व निधी जैसे मेरे बच्चे हैं। उनके साथ साथ तुम सब भी मिल गए। इन सभी रिश्तों में मुझे प्यार व सम्मान हद से ज्यादा मिल रहा है। अब इससे ज्यादा क्या चाहिए मुझे? इस दुनियाॅ में हम क्या लेकर आए थे और क्या लेकर जाएॅगे? सब कुछ यहीं रह जाएगा, असली दौलत व असली सुख तो इन्हीं में है। आज ईश्वर के इस न्याय से मैं बहुत खुश हूॅ।"
"सही कहा आपने भाई साहब।" अभय सिंह ने कहा___"काश हर इंसान आप जैसी सोच वाला हो जाए तो ये संसार कितना खूबसूरत हो जाए। एक मेरे बड़े भाई साहब हैं जिन्होंने अपने मतलब के लिए हर रिश्ते की बलि चढ़ा दी तथा अपनों के साथ इतना बड़ा अत्याचार कर डाला। क्या उन्हें ये बात नहीं पता होगी कि उन्होंने जिन चीज़ों के लिए ये सब किया वो चीज़ें मरने के बाद उनके साथ नहीं जाएॅगी।
बल्कि उनके इस कर्म से उनके मरने के बाद भी लोग उन्हें बुरा भला ही कहेंगे।"
"इस संसार में हर तरह के इंसानों का होना ज़रूरी है अभय।" जगदीश ने कहा___"ईश्वर हर तरह के प्राणियों की रचना करता है, फिर उन्हीं के द्वारा खेल भी रचाता है और उस खेल का आनंद भी लेता है। उसने हम इंसानो के लिए नियम बनाए और उन नियमों पर चलने के लिए उसने समय समय पर हमें किसी न किसी माध्यम से रास्ता भी बताया। ख़ैर ये प्रसंग तो बहुत बड़ा है भई, इसे समझना और इस पर अमल करना बहुत कठिन है। तुम बताओ क्या कहा डाक्टर ने?"
"बाॅकी का तो आपको पता ही है।" अभय सिंह ने कहा___"उस दिन की रिपोर्ट के अनुसार इलाज शुरू हो चुका था। आज उसने टेस्ट लिया तो रिजल्ट बेहतर निकला। उसने बताया कि बहुत जल्द पहले जैसी बात हो जाएगी।"
"चलो ये तो अच्छी बात है।" जगदीश ओबराय ने कहा___"तुम भी ज़रा संजम और संयम का ख़याल रखना और दवा दारू समय समय पर करते रहना। ईश्वर ने चाहा तो बहुत जल्द सब कुछ ठीक हो जाएगा।"
"जी बिलकुल।" अभय सिंह ने कहा___"अच्छा भाई साहब मैं ज़रा आज की दवाइयों को अंदर रख कर आता हूॅ। वो अभी कार में ही रखी हुई हैं।"
"ओह हाॅ।" जगदीश ओबराय ने कहा___"और हाॅ अंदर गौरी बहन से कहना ज़रा गरमा गरम चाय तो बना कर पिलाए।"
जगदीश ओबराय की बात सुन कर अभय सिंह ने हाॅ में सिर हिलाया और कुर्सी से उठ कर कार की तरफ बढ़ गया। कार से उसने एक प्लास्टिक की थैली निकाली और उसे लेकर बॅगले के अंदर चला गया।
वहीं एक तरफ निधी के कमरे में निधी और आशा बेड पर बैठी हुई थी। पिछले दिन हुई बातचीत से निधी आशा के सामने आने से थोड़ा असहज सा महसूस करती थी, किन्तु आशा के समझाने पर उसकी झिझक व शर्म बहुत हद तक दूर हो गई थी। आशा पहले भी ज्यादातर उसके पास ही रहती थी किन्तु जब से उसके सामने ये बात खुल गई थी कि निधी विराज से प्यार करती है तब से वो और भी निधी के समीप ही रहती थी। आशा उमर में रितू जैसी ही थी तथा एक समझदार व सुलझी हुई लड़की थी इस लिए वो निधी को एक पल के लिए उदास या मायूस नहीं होने देती थी।
आशा के ही पूछने पर निधी ने उसे बताया कि कैसे उसे अपने भाई से प्यार हुआ और कैसे उसने अपने उस प्यार को विराज के सामने उजागर भी किया था। आशा सारी बातें सुन कर हैरान थी। सबसे ज्यादा इस बात पर कि निधी ने विराज से अपने प्यार का इज़हार भी कर दिया है। ये अलग बात है कि विराज ने इसे अनुचित व ग़लत कहते हुए उसे इस संबंध में समझाया था। उसने उसे ये भी समझाया था कि इस रिश्ते को दुनियाॅ वाले कभी स्वीकार नहीं कर सकते और ना ही उसके घर वाले। विराज अपनी इस लाडली को जी जान से चाहता था किन्तु एक बहन भाई के रूप में। वो नहीं चाहता था कि उसकी कठोरता से निधी को ज्यादा दुख पहुॅचे।
छोटी ऊम्र का आकर्शण कभी कभी ज़िद के चलते इतना उग्र रूप धारण कर लेता है कि अगर उसे समय रहते सम्हाला न गया तो परिणाम गंभीर भी निकल आते हैं।
शुरू शुरू में आशा को भी यही लगा था कि निधी अपने भाई पर महज आकर्षित है। किन्तु जब उसने निधी से इस संबंध में सारी बातों को जाना और उसकी डायरी के हर पेज पर दिल को झकझोर कर रख देने वाले मजमून को पढ़ा तो उसे महसूस हुआ कि ये महज आकर्शण नहीं है बल्कि ये बेपनाह मोहब्बत का प्रत्यक्ष सबूत है। आशा ने निधी की इजाज़त से ही उसकी डायरी को पढ़ना शुरू किया था। यूॅ तो डायरी में लिखी हर बात अपने आप में निधी की तड़प बयां करती थी किन्तु निधी के द्वारा लिखी गई ग़ज़लें ऐसी थीं जो आशा के दिल को बुरी तरह तड़पा देती थी। उसे ऐसा लगता जैसे ग़ज़ल की हर बात में उसी का हाले दिल बयां किया गया है। निधी अपने आपको बहलाने के लिए ज्यादातर किताबों में ही डूबी रहती थी। आशा उसकी पढ़ाई में कोई हस्ताक्षेप नहीं करती थी। किन्तु उसे भी पता था कि किसी चीज़ में अति हानिकारक होती है। इस लिए वो निधी का हर तरह से ख़याल भी रखती थी। इस वक्त भी वह उसके लिए चाय लेकर आई थी।
निधी ने चाय पिया और फिर कुछ देर इधर उधर की बातें करने के बाद वह फिर से किताबों में डूब गई थी। जबकि आशा बेड पर सिरहाने की तरफ रखे पिल्लो के नीचे से निधी की डायरी निकाल कर उसे पढ़ने लगी थी। उसमें एक ग़ज़ल थी जिसे वो बार बार पढ़े जा रही थी।
अब किसी भी बात का यूॅ मशवरा न दे कोई।
इश्क़ गुनाहे अजीम नहीं तो सज़ा न दे कोई।।
अज़ाब तो मोहब्बत के साथ ही मिल जाते हैं,
फिर ग़मों को हमारे घर का पता न दे कोई।।
कैसे समझाएॅ के ऑधियों के बस का भी नहीं,
ये तो दिल के चिराग़ हैं इन्हें हवा न दे कोई।।
दिल की चोंट तो दिलबर से ही रफू होती है,
बेवजह इस दिल की अब दवा न दे कोई।।
इस लिए अपने दिल को समझा लिया हमने,
सरे राह मेरे महबूब का सिर झुका न दे कोई।।
आग लगे इस इश्क़ को के इसकी वजह से,
परेशां हो के मुझको कहीं भुला न दे कोई।।
आशा ने इस ग़ज़ल को बार बार पढ़ा। उसके दिल में अजीब सी हचचल होने लगी थी। काफी देर तक वो उसके बारे में सोचती रही। वो हैरान भी थी कि निधी इतना कुछ कैसे लिख सकती है? पर सबूत तो उसकी ऑखों के सामने ही था। आशा ने निधी से पूछा भी था कि ये किस शायर की लिखी हुई ग़ज़ल है, जवाब में निधी ने बस मुस्कुरा दिया था। जब आशा ने ज़ोर दिया तो उसने बताया कि ये उसके ही दिल की आवाज़ है जिसे उसने शब्दों में पिरो कर ग़ज़ल का रूप दे दिया है। निधी की इस बात पर आशा सोचों में गुम हो गई। फिर जैसे उसने खुद को सम्हाला। उसकी नज़र डायरी के दाहिने वाले पेज़ पर लिखी एक और ग़ज़ल पर पड़ी। उसने उस ग़ज़ल को भी पढ़ना शुरू किया।
दिल तो दरिया ही था इक ग़म भी समंदर हो गया।
फक़त दर्द से फाॅसला था वो भी मयस्सर हो गया।।
हर वक्त ज़हन में अब उनका ही ख़याल तारी है,
मेरी पलकों के तले हर ख़्वाब सिकंदर हो गया।।
इसके पहले तो बहारे गुल का हर मौसम हरा रहा,
अब खिज़ां क्या आई के हर बाग़ बंज़र हो गया।।
मेरी ज़रा सी आह पर तड़प उठते थे कुछ लोग,
आजकल तो मोम का हर पुतला पत्थर हो गया।।
कितनी हसीं थी ज़िन्दगी मरीज़-ए-दिल से पहले,
अब तो नज़र के सामने बस वीरां मंज़र हो गया।।
अपनी बेबसी का ज़िक्र भला करें भी तो किससे,
बस छुप छुप के रोना ही अपना मुकद्दर हो गया।।
इस ग़ज़ल को पढ़ कर आशा के संपूर्ण जिस्म में झुरझुरी सी हुई। दिल में इक हूक सी उठी जिसने उसकी ऑखों में पलक झपकते ही ऑसुओं का सैलाब सा ला दिया। उसने पलट कर चुपके से निधी की तरफ देखा। निधी पूर्व की भाॅति ही किताबों में खोई हुई थी। ये देख कर आशा को ऐसा लगा जैसे उसका दिल एकदम से धड़कना बंद कर देगा। उसने बड़ी मुश्किल से अपने अंदर के प्रबल वेग में मचलने लगे जज़्बातों को सम्हाला और फिर डायरी को बंद कर बेड पर चुपचाप ऑखें बंद करके लेट गई। दिलो दिमाग़ एकदम से शून्य सा हो गया था उसका। उसे निधी के दर्द का बखूबी एहसास हो चुका था। किन्तु दिमाग़ में ये सवाल ताण्डव सा करने लगा कि कोई लड़की इस हद तक कैसे किसी को चाह सकती है कि उसके प्रेम में इस तरह बावरी सी होकर ग़ज़ल व कविता लिखने लग जाए? मन ही मन जाने क्या क्या सोचते हुए आशा को पता ही नहीं चला कि कब नींद ने उसे अपनी आगोश में ले लिया था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अजय सिंह तेज़ रफ्तार से कार चलाते हुए शहर की तरफ जा रहा था। इस वक्त उसके चेहरे पर पत्थर सी कठोरता विद्यमान थी। उसकी नज़र बार बार कार के अंदर लगे बैक मिरर पर पड़ जाती थी। वह काफी समय से देख रहा था कि उसके पीछे लगभग सौ मीटर के फाॅसले पर एक जीप लगी हुई है। पहले उसे लगा था कि शायद कोई लोकल आदमी होगा जो उसकी तरह ही शहर जा रहा है किन्तु फिर जाने क्या सोच कर अजय सिंह ने उसे परखने का सोचा था? अजय सिंह ने कई बार अपनी कार की रफ्तार को धीमा किया था, ये सोच कर कि पीछे आने वाली जीप उसे ओवरटेक करके उसके आगे निकल जाएगी मगर ऐसा एक बार भी नहीं हुआ था। बल्कि उसकी कार के धीमा होते ही उस जीप की रफ्तार भी धीमी हो जाती थी।
अनुभवी अजय सिंह को समझते देर न लगी कि पीछे लगी जीप वास्तव में उसका पीछा कर रही है। इस बात के समझते ही उसे ये भी समझ आ गया कि संभव है ऐसा उसके साथ अब से पहले भी हो चुका हो। उसके मस्तिष्क में दो नाम आए रितू और विराज। यकीनन इन दोनो ने उसकी हर गतिविधि पर नज़र रखने के लिए कोई आदमी उसके पीछे लगा रखा था। अजय सिंह को अब सब समझ आ गया था कि क्यों वो बार बार मात खा रहा था अपने दुश्मन से। उसके दुश्मन को उसकी हर ख़बर रहती थी तभी तो वो उससे चार क़दम आगे रहता था।
अजय सिंह को अपने आप पर बेहद गुस्सा भी आया कि उसने इस बारे में पहले क्यों नहीं सोचा था? जबकि ये एक अहम बात थी। उसकी बेटी के लिए ये सब करना महज बाएॅ हाथ का खेल था। वो एक पुलिस वाली थी, जिसके तहत मुजरिमों को खोजने के लिए उसके अपने गुप्त मुखबिर होना लाजमी बात थी। किन्तु अब भला इस बारे में सोचने का क्या फायदा था? जो होना था वो तो हो ही चुका था, मगर अब जो होने वाला था ये उसने सोच लिया था।
अजय सिंह ने अपने पीछे लगी उस जीप को चकमा देने का मन बना लिया था। अब वो अपनी गतिविधियों की जानकारी अपने दुश्मन तक नहीं पहुॅचने देना चाहता था। उसने कार को तेज़ रफ्तार से दौड़ा दिया और कुछ ही समय में शहर के अंदर दाखिल हो गया। बैक मिरर पर उसकी नज़र बराबर थी। वो देख रहा था कि पीछे लगी जीप भी उसी रफ्तार से आ रही थी। अजय सिंह को पता था कि उस जीप को चकमा देने का काम वो शहर में ही कर सकता था। क्योंकि यहाॅ पर आबादी थी तथा कई सारे रास्ते थे जहाॅ पर पल में गुम हो सकता था। अजय सिंह ने ऐसा ही किया, यानी शहर में दाखिल होते ही कई सारे रास्तों से चलते हुए पीछे लगी जीप की पहुॅच से दूर हो गया। इस बीच उसने किसी से फोन पर बात भी की थी।
थोड़ी ही देर में अजय सिंह ने कार को सड़क के किनारे रोंक दिया। वह बैक मिरर पर अभी भी देख रहा था। लगभग दस मिनट गुज़र गए। पीछे लगी जीप का कहीं कोई पता न था। अलबत्ता इस बीच एक कार ज़रूर उसके सामने आकर रुकी। कार से एक साधारण कद काठी का आदमी बाहर निकला और चल कर अजय सिंह के पास आया। उस आदमी को देख कर अजय सिंह अपनी कार से नीचे उतरा। अजय सिंह के उतरते ही वो आदमी अजय सिंह की कार में बैठ गया। कार में बैठते ही उसने कार को आगे पीछे करके यू टर्न लिया और वहाॅ से चला गया। उस आदमी से अजय सिंह ने कोई बात न की थी, शायद उसने फोन पर ही उसे सब कुछ समझा दिया था। ख़ैर उस आदमी के जाते ही अजय सिंह भी उस आदमी की कार के पास पहुॅचा और कार की ड्राइविंग सीट पर बैठ कर कार को आगे बढ़ा दिया।
कुछ ही समय में अजय सिंह की ये कार जिस जगह रुकी उसके बाएॅ तरफ एक ऊॅची सी बिल्डिंग थी। ये बिल्डिंग पाॅच मंजिला थी। नीचे के ग्राउंड फ्लोर पर कई दुकानें थी जबकि दूसरे फ्लोर पर बिल्डिंग की बाहरी दीवार पर स्टील के बड़े बड़े अच्छरों से "दा जिम" लिखा था। बाॅकी के ऊपरी फ्लोर पर कुछ और भी चीज़ें थीं जिनका ज़िक्र करना यहाॅ ज़रूरी नहीं है।
कार से उतर कर अजय सिंह उसी बिल्डिंग की तरफ बढ़ चला। बिल्डिंग के ऊपरी फ्लोर पर जाने के लिए दोनो तरफ की दुकानों के बीच एक बड़ा सा चैनल गेट लगा था। उस चैनल गेट से ही सीढ़ियाॅ लगी थी। अजय सिंह तेज़ तेज़ क़दमों से चलता हुआ उस चैनल गेट के पास पहुॅचा और फिर सीढ़ियाॅ पर चढ़ता हुआ ऊपर की तरफ चला गया।
कुछ ही देर में वो दूसरे फ्लोर यानी कि दा जिम वाले हिस्से के एक बड़े से मीटिंग हाल में दाखिल हुआ। मीटिंग हाल में पहले से ही कुछ गिनती के लोग बैठे हुए थे।
"हैलो फ्रैण्ड्स।" अजय सिंह उन सबकी तरफ देखते हुए कहा और फिर फ्रंट की मुख्य कुर्सी पर बैठ गया।
"अच्छा हुआ ठाकुर साहब।" उनमे से एक ने अजय सिंह की तरफ देखते हुए कहा___"कि आपने ये मीटिंग की और हम सबको यहाॅ बुला लिया। हम खुद भी चाहते थे कि सामने बैठ कर इस बारे में तसल्ली से बात करें। हम सबने आपकी मदद के लिए अपने अपने आदमियों को आपके पास भेजा था किन्तु उस दिन के हादसे में हमारे वो सब आदमी पुलिस द्वारा पकड़ लिए गए। ये हमारे लिए बिलकुल भी अच्छा नहीं हुआ है। आप समझ सकते हैं कि पुलिस के पास पत्थरों का भी मुह खुलवा लेने की कूवत होती है। इस लिए अगर हमारे आदमियों ने पुलिस के सामने अपना अपना मुह खोल दिया तो उसका अंजाम यही होगा कि बहुत जल्द हम सब भी पुलिस के द्वारा धर लिये जाएॅगे।"
"मामला वाकई बेहद गंभीर हो गया है कमलकान्त।" अजय सिंह ने कहने के साथ ही शिगार सुलगा लिया, फिर बोला___"इस मामले को हम बड़ी आसानी से सुलझा लेते मगर आज मंत्री जी की गिरफ्तारी से बहुत बड़ा झटका लगा है। हम में से किसी को भी ये उम्मीद नहीं थी कि मंत्री जैसा चतुर व शातिर इंसान इस तरह पलक झपकते ही पुलिस के द्वारा धर लिया जाएगा। ख़ैर, आप सब चिंता न करें, क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि पुलिस उन सबको छोंड़ देगी।"
"क्याऽऽऽ???" मीटिंग हाल में बैठे वो सब इस बात को सुन कर उछल पड़े थे, एक अन्य बोला___"ऐसा आप कैसे कह सकते हैं ठाकुर साहब? जबकि ये असंभव बात है। पुलिस भला ऐसे संगीन अपराधियों को कैसे छोंड़ देगी?"
"उसकी एक ठोस वजह है।" अजय सिंह ने कहा___"इस शहर की पुलिस का सारा महकमा भले ही बदल गया था किन्तु इस बात को गुज़रे हुए काफी समय हो गया है। इस देश में ऐसे पुलिस वालों की कमी नहीं है जिनका इमान थोड़े से पैसों के लिए डगमगा जाता है। कहने का मतलब ये कि पुलिस महकमे में एक खास पुलिसिया ऐसा ही है जिसका इमान हमने पैसे से डगमगा दिया है। उसी ने हमे फोन पर इस सबके बारे में जानकारी दी थी।"
"क..कैसी जानकारी ठाकुर साहब?" कमलकान्त के चेहरे पर हैरानी के भाव आए।
"यही कि पुलिस ने हमारे जिन आदमियों को गिरफ्तार किया था।" अजय सिंह ने कहा___"उनके खिलाफ कोई केस फाइल नहीं किया गया है अब तक और महकमे के अंदर का माहौल भी यही ज़ाहिर कर रहा है कि आगे भी अभी उन पर कोई केस फाइल होने की संभावना नहीं है। दरअसल पुलिस डिपार्टमेंट अभी मंत्री की गिरफ्तारी पर ज्यादा ज़ोर दे रहा है। पुलिसिये ने बताया कि एसीपी रमाकान्त शुक्ला को केन्द्र से भेजा गया था मंत्री और उसके साथियों के खिलाफ़ गुप्तरूप से सबूत इकट्ठा कर उन्हें गिरफ्तार करने के लिए।
ताकि इस प्रदेश से गंदगी दूर हो सके।"
"वो सब तो ठीक है ठाकुर साहब।" अभिजीत सहाय नाम का आदमी बोल पड़ा___"लेकिन इससे ये तो साबित नहीं होता कि मंत्री की वजह से पुलिस हमारे आदमियों पर कोई केस फाइल नहीं करेगी। बल्कि पुलिस का तो काम ही यही है मुजरिमों को सज़ा दिलाना। अतः देर सवेर पुलिस अपना काम ज़रूर करेगी।"
"पूरी बात तो सुनो भाई।" अजय सिंह बोला___"एसीपी मंत्री तथा मंत्री के साथियों को लेकर यहाॅ से जा चुका है। उनका फैसला अब अदालत में होगा और ज़ाहिर है कि प्राप्त सबूतों के आधार पर उन सबको संगीन से संगीन सज़ा होगी। एसीपी का काम सिर्फ इतना ही था यानी अब यहाॅ पर वो नहीं आएगा। उसी पुलिसिये ने बताया था कि पुलिस कमिश्नर की उसने बातें सुनी थी जो वो मेरी बेटी से कर रहे थे। मामला ये है कि ये सारा फसाद रितू और विराज ने पुलिस कमिश्नर की सहमति से ही किया था। दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि कमिश्नर की बातों से ये पता चला है कि उसे इस बात की जानकारी विराज या रितू द्वारा नहीं दी गई है कि उनके पास हमारे खिलाफ ऐसा डायनामाइट सबूत है जिसके बेस पर वो हमे जब चाहे कानून की चपेट में ला सकते हैं। कहने का मतलब ये कि कमिश्नर की समझ में मामला यही है कि ये महज एक पारिवारिक मामला है जिसमें हमने विराज व उसकी फैमिली के साथ ग़लत किया है, जिसके लिए वह हमसे अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहा है। विराज का साथ रितू दे रही है जो कि कमिश्नर की सहमति पर ही है। अब सोचने वाली बात ये है कि जब कमिश्नर को इस बारे में पता ही नहीं है कि हम क्या धंधा करते हैं तो फिर भला वो हमारे आदमियों किस बारे में पूछताॅछ करेगा? और अगर करेगा भी तो वो यही कहेंगे कि उन लोगों को हमने किराए पर हायर किया था। यानी उनमे से कोई आप लोगों का नाम नहीं लेगा। रही बात उस हादसे की जिसके कारण वो गिरफ्तार किये गए थे तो वो भी रितू की ही वजह से हुआ था। उस हादसे में ग़ैर कानूनी तरीके से हमारा साथ देने के लिए उन लोगों को सज़ा के तौर पर थोड़ी बहुत सज़ा मिल सकती है अथवा ज़ुर्माना भरवा कर उन्हें छोंड दिया जा सकता है।"
"अगर ऐसा है।" कमलकान्त बोला___"तब तो ठीक है ठाकुर साहब। हम किसी तरह से अपने आदमियों को छुड़ाने की कोशिश कर लेंगे। किन्तु आपसे गुजारिश है ऐसा फिर न हो।"
"ऐसा भी इसी लिए हो गया कमलकान्त।" अजय सिंह ने पुरज़ोर लहजे में कहा___"क्योंकि हमें उस सबकी ज़रा भी उम्मीद नहीं थी। हलाॅकि वो हमारी ग़लती थी। हमें इस बात की तरफ भी ध्यान देना चाहिए था कि दुश्मन की तरफ हमारी बेटी है जो एक पुलिस वाली है और वो इस सबके लिए अपने पुलिस महकमे का सहारा ले सकती है। ख़ैर, छोंड़िये इस बात को। हमने वकील से बात कर ली है वो सब आदमी बहुत जल्द छूट जाएॅगे।
"
"अब आगे का क्या प्रोग्राम है आपका?" अभिजीत सहाय ने कहा___"उस हादसे की वजह से जीती हुई बाज़ी आप हार गए थे। इस लिए इसके आगे क्या करने का सोचा है आपने?"
"कहते हैं कि समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता।" अजय सिंह ने दार्शनिकों वाले अंदाज़ से कहा___"हार जीत जंग करने वाले हर ब्यक्ति के हिस्से में आती है। कभी वह हारता है तो कभी जीतता भी है। कहने का मतलब ये कि दुर्भाग्य की वजह से अब तक हम हारते ही आए थे मगर अब ऐसा नहीं होगा।"
"क्या मतलब है आपका?" कमलकान्त के माॅथे पर शिकन उभरी, बोला___"आप तो ऐसे कह रहे हैं जैसे कि आपके पास अपने दुश्मन के खिलाफ कोई बहुत बड़ा सबूत लग गया है जिसके तहत आप अपने दुश्मन को बड़ी आसानी से अपने पंजे पर दबोच लेंगे।"
"बिलकुल सही कहा कमलकान्त।" अजय सिंह के चेहरे पर चमक थी, बोला___"ऐसा ही हुआ है। उसने हमारे साथ बहुत खेल खेला अब एक खेल हम भी दिखाएॅगे उसे। एक ऐसा खेल जिसके बारे में उसने ख़्वाब में नहीं सोचा होगा। सबके सब एक ही झटके में हमारे क़दमों तले पालतू कुत्तों की तरह दुम हिलाते नज़र आएॅगे।"
"ऐसी क्या बात हो गई है ठाकुर साहब?" अभिजीत के चेहरे पर हैरानी थी___"जिसके तहत आप इतनी दृढ़ता व इतने विश्वास के साथ कह रहे कि सबके सब आपके पैरों तले आ जाएॅगे?"
"बस देखते जाओ सहाय।" अजय सिंह ने प्रभावशाली लहजे में कहा___"सब कुछ बहुत जल्द समझ आ जाएगा। ख़ैर, हम ये कह रहे हैं कि हमें इसी वक्त वैसे ही कुछ आदमी चाहिए जैसे आप लोगों ने हमारी मदद के लिए भेजे थे।"
अजय सिंह की इस बात पर वहाॅ बैठे सभी लोग कुछ देर तक तो चकित भाव से उसे देखते रहे फिर उन लोगों सहमति में सिर हिलाया। कुछ देर बाद ही मीटिंग खत्म हो गई। अजय सिंह के उठते ही बाॅकी सब भी अपने अपने रास्तों पर चले गए।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दोस्तो, आप सबके सामने मेगा अपडेट हाज़िर है। आशा करता हूॅ कि आप सबको पसंद आएगा।
हमेशा की तरह आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा।
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट........《 61 》
अब तक,,,,,,,
"क्या मतलब है आपका?" कमलकान्त के माॅथे पर शिकन उभरी, बोला___"आप तो ऐसे कह रहे हैं जैसे कि आपके पास अपने दुश्मन के खिलाफ कोई बहुत बड़ा सबूत लग गया है जिसके तहत आप अपने दुश्मन को बड़ी आसानी से अपने पंजे पर दबोच लेंगे।"
"बिलकुल सही कहा कमलकान्त।" अजय सिंह के चेहरे पर चमक थी, बोला___"ऐसा ही हुआ है। उसने हमारे साथ बहुत खेल खेला अब एक खेल हम भी दिखाएॅगे उसे। एक ऐसा खेल जिसके बारे में उसने ख़्वाब में नहीं सोचा होगा। सबके सब एक ही झटके में हमारे क़दमों तले पालतू कुत्तों की तरह दुम हिलाते नज़र आएॅगे।"
"ऐसी क्या बात हो गई है ठाकुर साहब?" अभिजीत के चेहरे पर हैरानी थी___"जिसके तहत आप इतनी दृढ़ता व इतने विश्वास के साथ कह रहे कि सबके सब आपके पैरों तले आ जाएॅगे?"
"बस देखते जाओ सहाय।
" अजय सिंह ने प्रभावशाली लहजे में कहा___"सब कुछ बहुत जल्द समझ आ जाएगा। ख़ैर, हम ये कह रहे हैं कि हमें इसी वक्त वैसे ही कुछ आदमी चाहिए जैसे आप लोगों ने हमारी मदद के लिए भेजे थे।"
अजय सिंह की इस बात पर वहाॅ बैठे सभी लोग कुछ देर तक तो चकित भाव से उसे देखते रहे फिर उन लोगों सहमति में सिर हिलाया। कुछ देर बाद ही मीटिंग खत्म हो गई। अजय सिंह के उठते ही बाॅकी सब भी अपने अपने रास्तों पर चले गए।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,
बड़ा ही सनसनीखेज मंज़र था।
ये कोई फार्महाउस था जो कि शहर की आबादी से दूर था। फार्महाउस काफी बड़ा था। बीचो बीच दो मंजिला इमारत बनी हुई थी। चारो तरफ हट्टे कट्टे तथा काली वर्दी पहने गनधारी तैनात थे। इमारत के सामने विशाल मैदान में कई कार व जीपें खड़ी हुई थी। किन्तु इस बीच सबसे सनसनीखेज बात ये थी कि इमारत के बगल से बने गेस्टहाउस के आकार का जो घर बना था उसके सामने की दीवार पर कुछ लोग रस्सियों में बॅधे खड़े थे। सबके हाॅथ आपस में बॅधे ऊपर की तरफ घर की रेलिंग से झूलती रस्सियों पर बॅधे हुए थे।
विराज, गौरी, निधी, अभय, करुणा, दिव्या, शगुन, आशा, रुक्मिणी, आदित्य, रितू, सोनम, नीलम, नैना, बिंदिया तथा शंकर व हरिया ये सब मोटी मोटी रस्सियों में बॅधे हुए छटपटा रहे थे। विराज, रितू व आदित्य के चेहरों पर जहाॅ कठोरता के भाव थे वहीं बाॅकी सबके चेहरे दहशत से भरे पड़े थे। जबकि इन सबके सामने खड़े थे अजय सिंह, प्रतिमा, शिवा तथा उनके कई सारे हथियारबंद आदमी। सबके होठों पर जानदार व विजयात्मक मुस्कान छाई हुई थी। अजय सिंह कुछ देर पहले ही ज़ोर ज़ोर से अट्ठहास लगा रहा था। किन्तु उसके तुरंत बाद ही उसका चेहरा गुस्से से आग बूबला नज़र आने लगा था। यही हाल प्रतिमा व शिवा का भी था। इन तीनों के चेहरों पर इस वक्त गुस्सा व नफ़रत के बेशुमार भाव गर्दिश कर रहे थे।
"हर ब्यक्ति से चुन चुन के हिसाब लूॅगा।" वातावरण में मानो अजय सिंह की दहाड़ गूॅजी___"बहुत तड़पाया है तुम सबने मुझे। मेरे दिन का चैन व रातों की नींद हराम कर रखी थी तुम लोगों ने। सबका हिसाब सूद समेत लूॅगा मैं।" कहने के साथ ही अजय सिंह विराज के नज़दीक आया फिर उसके जबड़े को अपने दाहिने हाॅथ से शख्ती से पकड़ते हुए कहा___"क्या समझता था तू अपने आपको? दो चार बार मुझे करारी शिकस्त क्या दे दी साला अपने आपको जेम्स बाॅण्ड का बाप समझने लगा। अरे तेरे जैसे जेम्स बाण्ड तो मेरे कच्छे के अंदर पाये जाते हैं समझा? देख लिया न, एक ही झटके में चारो खाने चित्त कर दिया है तुम सबको मैने। मैं चाहूॅ तो इसी वक्त तुम सबके साथ जो चाहूॅ वो कर सकता हूॅ, और करूॅगा भी। अपने हर नुकसान का बदला लूॅगा मगर उससे पहले अपनी ख़्वाहिशों को पूरा करूॅगा मैं। मेरी ख्वाहिशों के बारे में तो तुम सब बहुत अच्छी तरह जानते हो न।
"
"एक बार मेरे ये हाॅथ खोल कर देखो बड़े भइया।" सहसा अभय गुस्से से उबलता हुआ बोल पड़ा___"अकेले तुम तीनों का राम नाम सत्य न कर दिया तो ठाकुर गजेन्द्र सिंह बघेल की औलाद न कहलाऊॅ।"
"यही, बस यही।" अजय सिंह तपाक से बोला___"यही अकड़ तो तुम सबकी निकालनी है मुझे। तुम सबके गुरूर और स्वाभिमान को अपने पैरों के तले रौंदना है मुझे। उसके बाद यहाॅ सबके सामने तुम सबके साथ ऐसा नंगा नाच करूॅगा कि ऊपर बैठे फरिश्तों का कलेजा भी दहल जाएगा।"
"डैड आपको जो भी करना है करिये।" सहसा अजय सिंह के पीछे से आता हुआ शिवा बोल उठा____"किन्तु अब मुझसे बरदास्त नहीं हो रहा। आप तो जानते हैं कि मेरी ख्वाहिश क्या है। अतः आप मुझे मेरी इस जाने बहार निधी का जी भर के रस पान करने की इजाज़त दीजिए।"
"अरे इजाज़त क्यों माॅगता है शहज़ादे?" अजय सिंह ने ज़ोर का ठहाका लगाते हुए कहा____"ये सब तो यहाॅ आए ही इसी सबके लिए हैं। तुझे जो पसंद आए उसे भोगना शुरू कर दे। मेरा शिकार तो ये गौरी है। कसम से इसे पाने के लिए मैं कितना तड़पा हूॅ ये तो सिर्फ मैं ही जानता हूॅ।"
"हरामज़ादे।" रस्सियों से बॅधा विराज बुरी तरह दहाड़ते हुए चिल्ला उठा____"अगर मेरी माॅ बहनों को हाॅथ लगाने की कोशिश की तो समझ लेना तेरे हाॅथ उखाड़ कर कुत्तों के सामने डाल दूॅगा।"
"चिल्ला मेरे भतीजे।" अजय सिंह ज़ोर से हॅसा___"और ज़ोर से चिल्ला। क्योंकि अब तू सिर्फ यही कर सकता है। जबकि मैं और मेरा बेटा यहाॅ मौजूद हर औरत व लड़की का रसपान करेंगे। उसके बाद यहाॅ मौजूद मेरे सभी आदमी उन्हें जी भर के भोगेंगे। उफ्फ! बाद मुद्दत के ये दिन आया है जिसका मुझे शिद्दत से इन्तज़ार था।"
अजय सिंह की इस बात पर रस्सियों में बॅधे विराज, आदित्य, अभय, हरिया व शंकर जैसे मर्द बुरी तरह छटपटा कर रह गए। गुस्सा, अपमान, व जलालत का कड़वा घूॅट पी जाने के सिवा जैसे उनके पास कोई दूसरा चारा ही नहीं था। जबकि अजय सिंह की बात तथा उसके मंसूबों का देख कर सभी औरतों व लड़कियों की रूह तक फना हो गई।
इधर ज़ोरदार कहकहे लगाते हुए अजय सिंह व शिवा अपने अपने पसंदीदा शिकार की तरफ बढ़ चले। रस्सियों में बॅधे सबके सब बुरी तरह छटपटा रहे थे। औरतों व लड़कियों की हालत पल भर में ख़राब हो गई। कुछ ही पलों में अजय सिंह व शिवा अपने अपने शिकार यानी कि गौरी व निधी के पास पहुॅच गए।
"उफ्फ।" निधी के क़रीब पहुॅचते ही शिवा ने ज़हरीली मुस्कान के साथ कहा___"मेरी राॅड बहन तो पहले से और भी ज्यादा खूबसूरत हो गई है। लगता है मुम्बई का पानी काफी सूट किया है तुझे। चल ये तो और भी बहुत अच्छा हुआ। तेरी इस मादक किन्तु कच्ची जवानी का रसपान करने में अब और भी मज़ा आएगा।"
"हरामज़ादे कुत्ते।" विराज पूरी शक्ति से बंधनों को खींचते हुए चिल्लाया____"मेरी बहन से इस तरह बात करने का अंजाम बहुत भयंकर होगा।
अगर अपनी खैरियत चाहता है तो दूर हट जा गुड़िया से वरना माॅ कसम यहीं ज़िंदा गाड़ दूॅगा तुझे।"
"ये गीदड़ भभकी किसी और को देना बेटा।" शिवा ने ज़हरीली मुस्कान के साथ कहा___"चिन्ता मत कर, तेरा भी हिसाब करना है मुझे। तूने उस समय मुझ पर हाॅथ उठाया था न। उसका हिसाब तो ज़रूर लूॅगा तुझसे। मगर उससे पहले अपनी जाने जिगर से अपना मूड तो बना लूॅ।"
शिवा की बात पर विराज बुरी तरह छटपटा कर रह गया। उसे अपनी बेबसी पर बेहद क्रोध भी आ रहा था और रोना भी। उधर अजय सिंह भी गौरी के पास पहुॅच चुका था। उसने गौरी को बहुत ही नज़ाकत से ऊपर से नीचे तक कई बार देखा और फिर उसकी ऑखों में देखते हुए मुस्कुराया।
"सचमुच।" फिर अजय सिंह ने मानो मंत्रमुग्ध हो चुके भाव से कहा___"आज भी वैसी ही हो जैसे तब थी जब मैने तुम्हें पहली बार देखा था। वही सादगी, वही तीखे नैन नक्श, वही साॅचे में ढला हुआ मदमस्त कर देने वाला गदराया हुआ जिस्म। कसम से गौरी, तुम्हें अगर हज़ार बार भी भोग लूॅ तो मेरी तिश्नगी न बुझेगी। तुम्हें पता है, तुम वो दूसरी स्त्री हो जिससे मुझे सचमुच का प्यार हो गया था। मैं चाहता था कि तुम खुशी खुशी मेरी आगोश में आ जाओ। मगर जब तुम नहीं आई तो मुझे हर वो रास्ता अख्तियार करना पड़ा जिसके तहत मुझे लगता था कि तुम मेरी आगोश में आ सकती हो। पर कदाचित मैं ग़लत था गौरी या फिर मेरे प्यार में वो बात ही नहीं थी जिसके तहत तुम मेरी हो जाती।"
"भाभी से तमीज़ से बात करो बड़े भइया।" अभय बुरी तरह छटपटाते हुए बोला___"इतनी भी नीचता मत दिखाओ कि ईश्वर को भी शर्म आ जाए।"
"ओहो।" अजय सिंह ने ब्यंगात्मक भाव से उसे देखते हुए कहा___"तो मेरा छोटा भाई भी अब मुझसे इस ज़ुबान में बात करेगा। लगता है गौरी ने थोड़ा बहुत अपनी मदमस्त जवानी का स्वाद चखा दिया है तुम्हें।"
"ख़ाऽऽऽमोश।" अभय सिंह पूरी शक्ति से दहाड़ा था, बोला____"अपनी ज़बान को लगाम दे बेशर्म इंसान। बस एक बार मुझे इस बंधन से आज़ाद कर दे। उसके बाद देख कि क्या हस्र करता हूॅ तेरा।"
"इस तरह चिल्लाने का कोई फायदा नहीं है छोटे।" अजय सिंह ने पूरी ढिठाई से कहा____"क्योंकि अब यहाॅ पर वही होगा जो सिर्फ और सिर्फ मैं चाहूॅगा। तुम सबकी ऑखों के सामने हम दोनो बाप बेटे एक एक औरत व एक एक लड़की की इज्ज़त का मर्दन करेंगे।"
इतना कहने के साथ ही अजय सिंह पलटा और पुनः गौरी के समीप आ गया। उसने जैसे ही हवस भरी ऑखों से गौरी की तरफ देखा वैसे ही गौरी ने नफरत व घृणा से उसके चेहरे पर थूॅक दिया। ये देख कर अजय सिंह तो आग बबूला हुआ ही किन्तु इस बीच गौरी के समीप तेज़ी से आकर प्रतिमा ने उसके गाल पर एक झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ दिया।
"साली कुतिया।" प्रतिमा किसी शेरनी की भाॅति गुर्राते हुए बोली___"तेरी हिम्मत कैसे हुई अजय के चेहरे पर थूॅकने की? अपने आपको बड़ी सती सावित्री समझती है न।
अभी यहीं सबके सामने तेरे इस जिस्म को नुचवाती हूॅ। अपने रूप और सौंदर्य का बहुत घमंड है न तुझे, रुक ऐसा हाल करवाऊॅगी कि सब थूॅकेंगे तुझ पर।" कहने के साथ ही प्रतिमा एक झटके से अजय सिंह की तरफ पलटी, फिर गुस्से से फुंफकारते हुए बोली____"देख क्या रहे हो अजय? आगे बढ़ो और चीर फाड़ कर फेंक दो इस रंडी के जिस्म से इसके सारे कपड़े। ज़रा भी रहम न करना इस दो टके की राॅड पर।"
प्रतिमा का भभकता हुआ चेहरा तथा उसकी बातें सुन कर अजय सिंह पर तुरंत प्रतिक्रिया हुई। वह झटके से आगे बढ़ा और गौरी के जिस्म पर मौजूद सफेद साड़ी के ऑचल को पकड़ कर एक झटके से अपनी तरफ खींच लिया। जिससे गौरी का ऊपरी जिस्म अर्धनग्न सा हो गया। सफेद ब्लाउज पर कसे हुए उसके बड़े बड़े उन्नत उभार सबकी नज़रों में आ गए। उधर अजय सिंह की इस हरकत से वातावरण में कई सारी चीखें गूॅज गईं। गौरी तो लाज व शर्म की वजह से चिल्लाई ही थी किन्तु उसके साथ ही विराज आदि सब भी चीख पड़े थे। एकदम से जैसे वातावरण में कोलाहल सा मच गया था।
"हरामज़ादे।" विराज के सब्र का बाॅध मानो टूट गया। भयंकर गुस्से में भभकते हुए उसने अपने दोनो हाॅथों को नीचे की तरफ पूरी ताकत से खींचा। उसका गोरा चेहरा लाल सुर्ख पड़ता चला गया। कुछ ही पलों में रस्सी टूटती चली गई। रस्सी के टूटते ही वह तीव्र वेग से नीचे ज़मीन पर गिरा और फिर गुलाटियाॅ खाता चला गया। किन्तु तुरंत ही बिजली की स्पीड से उठ कर खड़ा भी हो गया। उसके दोनो हाॅथ आपस में अभी भी रस्सी से बॅधे हुए थे। वह उसी हालत में अजय सिंह की तरफ दौड़ पड़ा।
पलक झपकते ही वह अजय सिंह के ऊपर छलांग चुका था। अजय सिंह के ऊपर विराज का जिस्म बड़े वेग से टकराया था जिसके परिणाम स्वरूप वो भरभरा कर वहीं ज़मीन पर गिरा। विराज पहले तो उसके ऊपर ही था किन्तु ज़मीन पर दोनो के गिरते ही विराज उसके ऊपर से दूसरी तरफ लुढ़कता चला गया था। किन्तु वह फौरन ही उठा और पल भर में अजय सिंह के सीने में सवार हो गया। उसके सीने पर सवार होते ही वह अपने दोनो बॅधे हाथों का दुहत्थड़ उसके सीने पर पूरे वेग से मारने लगा। ये सब इतनी जल्दी हुआ कि कुछ देर तक तो कोई कुछ समझ भी न पाया। हर कोई हक्का बक्का रह गया था।
सबको होश तो तब आया जब वातावरण में अजय सिंह की दर्द भरी चीखें गूॅजने लगी थी। चारो तरफ तैनात गनमैन तुरंत ही हरकत में आ गए। वो एक साथ उस तरफ बढ़े जहाॅ पर विराज अजय सिंह के ऊपर चढ़ा हुआ उस पर दुहत्थड़ बरसाए जा रहा था।
"आज तुझे ज़िंदा नहीं छोंड़ूॅगा हरामज़ादे।" विराज मारने के साथ साथ गुस्से में बोलता भी जा रहा था___"तूने मेरी देवी जैसी माॅ का अपमान किया है। उन पर अपनी गंदी दृष्टि डाली है। तुझ जैसे पापी का इस दुनियाॅ में जीने का कोई अधिकार नहीं है।
"
विराज अभी ये सब बोल ही रहा था कि तभी चारो तरफ से दौड़ते हुए आए गनमैनों ने उसे पकड़ कर अजय सिंह के ऊपर से खींच कर दूर कर दिया। गनमैनों के बंधन में जकड़ा हुआ विराज बुरी तरह चीखे जा रहा था तथा खुद को उनकी पकड़ से छुड़ाने के लिए पूरी ताकत लगाए जा रहा था। किन्तु चारो तरफ से हाॅथ पैर पकड़े गनमैनों की पकड़ से वह छूट नहीं पा रहा था। ये अलग बात थी कि गनमैनों को उसे सम्हालने में काफी ज़ोर आजमाईश करनी पड़ रही थी।
इधर विराज के हटते ही अजय सिंह ज़मीन से उठा और तमतमाया हुआ वह गनमैनों द्वारा पकड़े विराज की तरफ बढ़ा और फिर जल्दी जल्दी उसने विराज पर लात घूॅसों की बौछार कर दी। अजय सिंह यहीं पर ही नहीं रुका बल्कि उसने झपट कर एक गनमैन से उसकी गन छीनी और दो कदम दूर हटते हुए उसने विराज की तरफ गन का दहाना खोल दिया। परिणामस्वरूप दो पल के भीतर ही गन से निकली गोलियाॅ विराज के जिस्म को छलनी करती चली गईं। वातावरण कई सारे गलों से निकली चीख़ व चिल्लाहट से गुंजायमान हो उठा। उधर गोलियों से छलनी हो गए विराज का समूचा जिस्म उसके ही लाल सुर्ख खून से नहाता चला गया।
"राऽऽऽऽऽऽज।" अपने कमरे में बेड पर गहरी नींद में सोई पड़ी गौरी पूरी शक्ति से चिल्लाते हुए हड़बड़ा कर उठ बैठी। उसकी इस चीख से रात के गहरे सन्नाटे में डूबा समूचा बॅगला मानो झनझना कर रह गया। बेड पर बदहवाश सी बैठी गौरी विछिप्त सी हालत में इधर उधर देखे जा रही थी। उसका चेहरा भय व दहशत से पीला ज़र्द पड़ा हुआ था। समूचा जिस्म पसीने से तर बतर था। बुरी तरह हाॅफे जा रही थी वह।
गौरी की इस भयानक चीख़ से बॅगले के अंदर अपने अपने कमरों में बेड पर सोया हुआ हर इंसानी जीव बुरी तरह उछल कर उठ बैठा था। जैसे ही उन्हें ये एहसास हुआ कि चीख़ गौरी के कमरे से आई है तो सब के सब अपने अपने कमरों से दौड़ पड़े। किसी को होश भी नहीं था कि कौन किस हालत में बेड पर सोया हुआ था?
थोड़े ही समय में सबके सब गौरी के कमरे के दरवाजे पर ऑधी तूफान की तरह पहुॅचे। अभय व पवन ने दरवाजे को पूरी ताकत से थपथपाया। किन्तु दरवाजा तो खुलता चला गया। यानी कि दरवाजा अंदर से बंद नहीं था। शायद गौरी को दरवाजा बंद करने का ख़याल ही नहीं आया था। आता भी कैसे, उसके ख़यालों में तो हर पल उसका बेटा रहता था। जो उसकी ऑखों का तारा था, उसके जीने का आख़िरी सहारा था। उसे पता था कि वो इस समय मौत के मुह में है। ख़ैर, दरवाजे को खुलता देख पवन ने जल्दी से दरवाजे को पूरा धकेला और फिर सबके सब कमरे में दाखिल हो गए।
कमरे में दाखिल होते ही सबकी नज़र एक साथ बेड पर पागलों की सी हालत में बैठी गौरी पर पड़ी। गौरी को इस वक्त किसी बात का होश नहीं था और ना ही उसे अपनी हालत का ख़याल था। उसकी सफेद साड़ी का ऊपरी हिस्सा बेड शीट पर ही एक तरफ गिरा हुआ था।
उसकी इस हालत को देख कर करुणा तेज़ी से उसकी तरफ बढ़ी और उसने उसके ऑचल को उसके सीने पर ढॅकते हुए खुद भी बेड के किनारे बैठ कर उसे दोनो हाॅथों से सम्हाल लिया।
"क्या हुआ दीदी???" करुणा सहसा दुखी भाव से गौरी के बुत बने जिस्म को झकझोरते हुए बोली___"आप इतनी ज़ोर से क्यों चीखी थी? बताइये न दीदी, क्या हुआ है?"
"र..र..रा..ज।" सहसा गौरी के थरथराते हुए लबों से बड़ी अजीब सी आवाज़ निकली___"मे..मेरे..बेटे..को मार दिया उन लोगों ने। उन हत्यारों ने मेरे जिगर के टुकड़े को गोलियों से भून दिया। मेरा बेटा खून से लथपथ हो गया है। वो रो रहा है...वो माॅ माॅ कह कर मुझे पुकार रहा है। हाय रे...मेरे बेटे को जान से मार दिया उन कंजरों ने।" कहने के साथ ही गौरी दहाड़ें मार मार कर रो पड़ी___"मुझे मेरे बेटे के पास जाना है। मुझे मेरे बेटे के पास पहुॅचा दो। मुझे अपना बेटा जीवित चाहिए। ईश्वर मेरे बेटे को मुझसे नहीं छीन सकता। अगर ऐसा हुआ तो उसे मेरी बद्दुवा लगेगी। मुझे मेरे बेटे के पास जाना है।"
इतना सब कहने के साथ ही गौरी को चक्कर सा आ गया और वह करुणा की बाहों में अचेत सी लुढ़क गई। गौरी की इन बातों ने सबको जैसे सकते में ला दिया। सबके पैरों तले से मानों ज़मीन गायब हो गई। सबके सब उसकी बात सुन कर इस तरह अवाक से अपनी अपनी जगह खड़े रह गए थे मानों सबको एक साथ ही लकवा मार गया हो। होश तब आया जब करुणा की करुण चीखें सबके सुन्न पड़ चुके कानों में पड़ी।
कुछ ही पल पहले मानो वक्त ठहर सा गया था। करुणा की चीख ने मानो सबके जिस्मों में प्राणों का संचार कर दिया था। वस्तुस्थित का एहसास होते ही सबसे पहले निधी के हलक से आवाज़ निकली। वह रोते हुए गौरी की तरफ दौड़ पड़ी और उससे लिपट कर रोने लगी। उसके बाद तो सब के सब अपनी अपनी भावनाओं के साथ गौरी के पास पहुॅच गए थे। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें? गौरी की इस हालत ने सबको मानों विवेकहीन सा कर दिया था। रुक्मिणी व आशा ने आगे बढ़ कर गौरी को सम्हाला और उसे ध्यान से देखा।
"जल्दी से कोई पानी ले आओ।" फिर रुक्मिणी ने दुखी भाव से लगभग ज़ोर से चिल्ला कर कहा___"इसे चक्कर आया हुआ है। इसने ज़रूर कोई बहुत ही बुरा सपना देखा है। उसी की वजह से यह इतनी ज़ोर से चीखी थी।"
रुक्मिणी की बात सुन कर पवन जो पास ही खड़ा था वो तुरंत कमरे से बाहर की तरफ दौड़ते हुए गया और कुछ ही पलों में एक स्टील के मग में पानी ले कर आ गया। अभय ने आगे बढ़ कर उससे पानी से भरा स्टील का मग लिया और उससे चुल्लू में पानी डाल कर गौरी के चेहरे पर छिड़कने लगा। अभय सिंह की ऑखों में ऑसू व चेहरे पर पीड़ा के भाव थे। कदाचित अपनी देवी समान भाभी की इस हालत से वह खुद भी बेहद दुखी हो गया था।
जगदीश ओबराय बॅगले में नहीं था। वो शाम के लगभग सात बजे ही कहीं बाहर चला गया था।
उसने बताया था कि वह बिजनेस के संबंध में किसी ज़रूरी काम से जा रहा है। ख़ैर, कुछ ही देर में गौरी को पुनः होश आ गया। होश में आते ही वह रोते हुए राज राज चिल्लाने लगी। उसे यूॅ रोता देख सबकी ऑखें छलक पड़ीं। बड़ी मुश्किल से उसे सम्हाला सबने। वो बार बार यही कहती कि उसे अपने बेटे के पास जाना है। उसके बेटे को हत्यारों ने गोलियों से छलनी कर दिया है।
काफी देर तक सबके समझाने बुझाने के बाद आख़िर वह कुछ शान्त हुई। सबने उसे समझाया और यकीन दिलाया कि उसके बेटे को किसी ने कुछ नहीं किया है बल्कि उसका बेटा पूर्णतया सुरक्षित है। सबने अपने अपने तरीके से गौरी को समझाया तो था और तसल्ली भी दी थी किन्तु माॅ का हृदय पूरी तरह से शान्त न हो सका था। उसका अंतर्मन संतुष्ट नहीं था। मगर सबको दिखाने के लिए वह शान्त ज़रूर हो गई थी। कदाचित उसने भी सोचा कि ये महज एक ख्वाब ही था और इसकी वजह से उसे सबको दुखी या चिंतित नहीं करना चाहिए।
लगभग एक घंटे बाद सब अपने अपने कमरों में चले गए। गौरी के पास केवल रुक्मणि रह गई थी। अपनी माॅ की इस हालत से निधी भी काफी ब्यथित हो गई थी। खास कर इस बात को सुन कर कि उसके भाई को या यूॅ कहिए कि उसके प्यार को गोलियों से छलनी कर दिया है हत्यारे ने। गौरी के इस स्वप्न ने सबको झकझोर कर रख दिया था। उस रात फिर कोई भी ठीक से सो नहीं पाया था। कदाचित इस लिए भी कि एक ये सच्चाई तो थी ही कि विराज मौत के मुह में था। रितू तथा रितू की पुलिस भले ही उसके साथ थी किन्तु दुर्भाग्य कभी किसी को बता कर नहीं आता। हर कोई विराज के लिए चिंतित था और हर वक्त उसकी सलामती के लिए भगवान से दुवाएॅ कर रहा था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मैं और आदित्य बाहर से घूम फिर कर शाम को लगभग सात बजे घर पहुॅचे। अंदर आते ही आदित्य ने कहा वो फ्रेश होने अपने कमरे में जा रहा है। उसके जाने के बाद मैं सीधा नीलम के कमरे में उसको देखने के लिए चला गया। नीलम के कमरे का दरवाजा पूरी तरह से बंद नहीं था बल्कि थोड़ा सा खुला हुआ था। मैने उस खुले हुए हिस्से के पास चेहरा ले जाकर पहले सोनम दीदी को आवाज़ दी। किन्तु जब अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो मैं कुछ पल सोचने के बाद खुद ही दरवाजा खोल कर कमरे के अंदर आ गया।
कमरे में रखे शानदार बेड पर नीलम करवॅट के बल लेटी हुई थी। उसकी ऑखें बंद थी इस वक्त। कदाचित सो रही थी या फिर ऑखें बंद करके आराम कर रही थी। मैं उसके क़रीब जा कर बेड के पास ही खड़ा हो गया। मेरी नज़र उसके मासूम व खूबसूरत से चेहरे पर पड़ी। इस वक्त वो किसी छोटी सी बच्ची की भाॅति मासूम दिख रही थी। मुझे उसकी इस मासूमियत पर बेहद प्यार आया। मेरे होठों पर मुस्कान फैल गई। तभी अचानक मेरे मन में उसे छेंड़ने का ख़याल आया मगर फिर मैंने अपने मन से उसे छेंड़ने का ख़याल झटक दिया।
मुझे लगा इस वक्त इसे आराम से सोने देना चाहिए। ये सोच कर मैं उसके चेहरे के क़रीब झुका और प्यार से उसके माॅथे पर हौले से चूॅम लिया। उसके बाद मैं पुनः सीधा खड़ा हुआ और फिर बिना कुछ बोले ही पलट कर कमरे से बाहर की तरफ जाने के लिए बढ़ा ही था कि सहसा तभी मैं चौंक पड़ा। पीछे से नीलम ने उसी वक्त मेरी दाहिनी कलाई को पकड़ लिया था।
उसके इस तरह मेरी कलाई पकड़ लेने पर मैं बरबस ही मुस्कुरा उठा। मेरे दिमाग़ में तुरंत ही ये बात आई कि नीलम ने कदाचित मुझे छेंड़ने के लिए ही मेरी कलाई पकड़ ली है। अतः ये सोचते हुए मैं पूर्वत मुस्कुराते हुए उसकी तरफ पलटा। नीलम ने अपने एक हाॅथ से मेरी कलाई को पकड़ा हुआ था, किन्तु उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। वो बस मुझे एकटक देखे जा रही थी। उसकी ऑखों में कुछ था जो फिलहाल मेरी समझ में नहीं आया कि वो क्या था?
"क्या बात है बंदरिया?" मैने उसे इस तरह देखते देख छेंड़ने वाले भाव से कहा___"क्या मुझसे पंगा लेने का इरादा है? देख अगर ऐसा है तो फिलहाल अपने ज़हन से इस ख़याल को निकाल दे। क्योंकि इस हालत में तुझको मुझसे पंगा लेना भारी पड़ जाएगा। इस लिए मेरी बात मान पहले तू ठीक हो जा। उसके बाद तू शौक से मुझसे जैसे चाहे पंगे ले लेना।"
"ऐसी कोई बात नहीं है राज।" नीलम ने सहसा गंभीरता से कहा___"तुमसे तो मैं इस हाल में भी पंगा लेने को तैयार हूॅ और यकीन मानो मुझे पंगे के भारी पड़ने की कोई फिक्र नहीं है। मगर मैं इस वक्त तुमसे कुछ और ही बात कहना चाहती हूॅ।"
"ओह आई सी।" मैने उसे गंभीर हालत में देखते हुए ज़रा खुद भी कुछ गंभीरता का नाटक करते हुए कहा___"तो ये बात है। फरमाइए, क्या कहना चाहती हैं आप?"
"कहने को तो बहुत कुछ है मेरे दिल में।" नीलम की आवाज़ सहसा लड़खड़ा सी गई, किन्तु तुरंत ही जैसे उसने खुद को मजबूती से सम्हालते हुए कहा___"मगर सिर्फ यही कहना चाहती हूॅ कि मेरी रितू दीदी का हमेशा ख़याल रखना। मैं नहीं चाहती कि उनका मोम का बन चुका दिल फिर से पत्थर में तब्दील हो जाए।"
"क्या मतलब???" मैं नीलम की इस बात से एकदम से चकरा सा गया, बोला___"ये क्या ऊल जुलूल बोल रही हो तुम?"
"एक गुजारिश भी है तुमसे।" नीलम ने मेरी बात पर ज़रा भी ध्यान न देते हुए फीकी मुस्कान से कहा___"इतने कम समय में भी मुझे एहसास हो चुका है कि तुम्हारे दिल में हम सबके लिए बेपनाह प्यार व सम्मान की भावना है। इस लिए मेरी गुज़ारिश है कि हमेशा ऐसे ही बने रहना। चाहे जैसी भी परिस्थितियाॅ आ जाएॅ मगर तुम खुद को नहीं बदलना।"
"ये तुम कैसी बातें कर रही हो नीलम?" मैं नीलम की इन बातों से बुरी तरह हैरान व चकित रह गया था, फिर बोला___"देखो किसी भी तरह की पहेलियाॅ मत बुझाओ। जो भी बात है उसे साफ साफ कहो।"
"अब इससे ज्यादा साफ साफ नहीं कह सकती मेरे भाई।
" नीलम ने भारी आवाज़ में कहा___"मुझे पता है कि तुम बेहद समझदार हो, इस लिए मैं उम्मीद करती हूॅ कि तुम मेरी बातों को समझ जाओगे।"
"देखो अगर तुम्हारे ये सब कहने का मतलब।" मैने इस बार ज़रा गंभीर भाव से कहा___"इस बात से है कि इस सबके बाद क्या होगा तो तुम इस बात से बेफिक्र रहो। मैं जानता हूॅ कि इस जंग का अंत यकीनन बेहद दुखदायी होगा। मगर होनी तो अटल है न। पाप और बुराई का अंत तो निश्चित है। किन्तु उसके बाद हम सब साथ मिल कर एक नया संसार बनाएॅगे। उस नये संसार में हम सब एक साथ ढेर सारी खुशियों का हिस्सा होंगे। मैं तुमसे वादा करता हूॅ कि जीवन में कभी भी किसी को मैं उदास या दुखी होने का मौका नहीं दूॅगा।"
"मुझे पता है राज।" नीलम ने फीकी सी मुस्कान के साथ मेरी तरफ देखते हुए कहा____"मैं जानती हूॅ कि तुम्हारे रहते कोई भी जीवन में दुखी नहीं हो पाएगा। किन्तु मेरे ये सब कहने का मतलब इन सब बातों से नहीं था भाई, बल्कि मैं तो बस रितू दीदी के लिए वो सब कह रही थी।"
"क्या मतलब??" मेरे चेहरे पर सोचने वाले भाव उभरे।
"यही तो बिवसता है राज।" नीलम ने बेबस भाव से मेरी तरफ देखा___"कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें मुख से नहीं कहा जाता बल्कि सामने वाले को खु ही समझ जाना होता है और मैं तुमसे यही उम्मीद करती हूॅ कि तुम बिना कुछ बताए सब कुछ समझ जाओगे।"
"कमाल है।" मैं चकित भाव से कह उठा____"भला ये क्या बात हुई? मैं कोई अंतर्यामी हूॅ क्या जो किसी के बताए बिना ही सब कुछ जान लूॅगा या फिर समझ लूॅगा?"
"क्यों नहीं राज।" नीलम ने बड़े ग़ौर से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"तुम यकीनन बिना कुछ बताए सब कुछ समझ सकने की काबीलियत रखते हो और मुझे ऐसा लगता भी है कि तुम सब कुछ समझते भी हो।"
"अब ये क्या बात हुई यार?" मैं बुरी तरह चौंका।
"पता नहीं क्यों?" नीलम ने पूर्वत मेरी तरफ बड़े ग़ौर से देखते हुए ही कहा___"पर मुझे ऐसा लगता है कि तुम जानते समझते सब कुछ हो मगर प्रत्यक्ष रूप में ज़ाहिर यही करते हो कि तुम्हें सामने वाले की कोई भी बात समझ में नहीं आई है। है ना?"
"और मुझे ऐसा लग रहा है।" मैने कहा___"कि जैसे तुम मुझसे पंगा लेने के मूड हो। क्योंकि तुम्हारी ये बेसिर पैर की बातें इसी बात का इशारा करती हैं। मगर मिस नीलम, जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूॅ तुमसे कि तुम इस वक्त मुझसे पंगा लेने की हालत में नहीं हो। इस लिए बेहतर होगा कि अपने ज़हन से पंगा लेने वाले ख़याल निकाल दो।"
मेरी इस बात से नीलम कुछ न बोली। बस एकटक देखती रही मेरी तरफ। मैं खुद भी उसी की तरफ देख रहा था। उसके चेहरे पर कई तरह के भावों का आवागवन चालू था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी बात के लिए उसे अपने आपसे काफी ज़द्दो जहद करनी पड़ रही हो। एकाएक ही उसने मेरे चेहरे से अपनी नज़रें हटाईं और अपने सिर को दूसरी तरफ कर लिया।
मैं ये देख कर बुरी तरह चौंका कि दूसरी तरफ सिर किये नीलम की ऑखों से ऑसू छलक पड़े थे। मुझे कुछ समझ न आया किन्तु इतना ज़रूर हुआ कि उसकी ऑखों से इस तरह ऑसू छलकते देख मैं बेचैन हो गया।
"अरे ये क्या मेरी प्यारी सी बहन की ऑखों से ऑसू क्यों छलक पड़े?" मैं एकदम से उसके समीप ही बेड के किनारे पर बैठ गया और फिर उसके हाॅथ को अपने हाॅथ में लेकर बोला___"देख अगर तुझे मेरी किसी बात से बुरा लगा हो तो मुझे माफ़ कर दे। मैं तुझे इस तरह ऑसू बहाते नहीं देख सकता। तू तो जानती ही है कि मैं कितना बेवकूफ हूॅ। मुझमें किसी की भावनाओं को समझने का ज्ञान नहीं है। अतः अगर तुझे मेरी किसी बात से तक़लीफ हुई है तो प्लीज माफ़ कर दे मुझे।"
"ऐसा मत कह राज।" नीलम एकदम से मेरी तरफ पलट कर सिसक उठी____"तू तो ऐसा है जो भूल से भी किसी को कोई तक़लीफ नहीं दे सकता। मुझे खुशी है दुनियाॅ में सबसे खूबसूरत दिल का लड़का मेरा भाई है। ये ऑसू तो फक़त ऐसी ही खुशी के तहत छलके हैं। मैं नहीं जानती कि किसके जीवन में क्या क्या खोना और पाना लिखा है मगर मेरी हसरत तो यही है कि मेरी रितू दीदी को हर वो चीज़ मिल जाए जिस चीज़ की उन्होंने रज़ा की हो।"
"मेरे रहते मेरी बहनों को कभी भी किसी चीज़ की कमी का एहसास तक नहीं होगा नीलम।" मैने कहा___"मैं बहनें मेरी जान हैं, उनके लिए कुछ भी कर सकता हूॅ मैं। रितू दीदी ही बस क्यों मैं तो अपनी सभी बहनों को बराबर प्यार व सम्मान दूॅगा।"
"जैसा तुम्हें अच्छा लगे वैसा करना राज।" नीलम ने गहरी साॅस ली____"अब तुम जाओ और नैना बुआ या सोनम दीदी में से किसी को भेज दो। मेरा सिर ज़रा भारी भारी सा लग रहा है।"
"सिर भारी लग रहा है???" मैं चौंका___"इतनी सी बात के लिए उनको क्यों कष्ट देना? लाओ मैं तुम्हारे सिर की मालिश कर देता हूॅ। इतना तो मैं भी कर सकता हूॅ।"
"तुम रहने दो राज।" नीलम ने कहा___"तुम परेशान न हो। सोनम दीदी को भेज देना।"
"ओये चिंता मत कर यार।" मैं सहसा मुस्कुराया___"सिर की मालिश ही करूॅगा, तेरा गला नहीं दबाऊॅगा मैं।"
"काश! तू मेरा गला ही दबा दे भाई।" नीलम की आवाज़ एक बार पुनः जाने क्या सोच कर भर्रा गई___"तेरे पास तेरी ही बाहों के दरमियां इस दुनियाॅ से रुख़्सत हो जाऊॅगी।"
"ज्यादा बकवास मत कर।" मैने सहसा कठोर भाव से कहा___"वरना कान के नीचे एक लगाऊॅगा तो सारा सेन्टिमेंट निकल जाएगा तेरा। अब अगर कुछ बोला तो देखना फिर।"
मेरी बात सुन कर नीलम बस मुस्कुरा कर रह गई। जबकि मैं उसके सिरहाने के क़रीब ही बैठ कर उसके माॅथे पर हाॅथ से मालिश का दबाव आहिस्ता आहिस्ता करने लगा और साथ ही सोचने लगा कि नीलम ने आख़िर ऐसी बात क्या सोच कर कही हो सकती है? अभी मैं नीलम की बातों के बारे में सोच ही रहा था कि तभी कमरे में नैना बुआ व सोनम दीदी एक साथ ही आ गईं।
मुझे इस तरह नीलम का सिर दबाते देख वो दोनो ही चौंकते हुए एक जगह ठिठक गईं।
"ओहो।" फिर सहसा नैना बुआ ने मुस्कुराते हुए कहा___"क्या बात है राज, अपनी लाडली बहन की बड़ी सेवा कर रहे हो तुम। वैसे मैने सुना है कि तुम दोनो आपस में बड़ा लड़ते झगड़ते हो। फिर ये सेवा भाव कैसे?"
"क्या बताऊॅ बुआ?" मैने बड़ी मासूमियत से कहा__"मैं इससे चाहे जितना भी लड़ूॅ झगड़ूॅ लेकिन आख़िर है तो ये मेरी प्यारी बहन ही न? बेचारी का सिर भारी भारी सा हो रहा था तो कहने लगी कि मैं आप में से किसी को बुला दूॅ। मैने सोचा कि इतनी सी बात पर भला आप लोगों को क्यों कष्ट देना? अब जब मैं खुद ही यहाॅ पर मौजूद हूॅ तो क्या थोड़ी देर इसके सिर की मालिश करके इसके सिर का भारीपन नहीं दूर कर सकता? बस यही सोच कर सेवा करने लगा था इस बेचारी की मगर हाय रे मेरी किस्मत! ये तो इस हाल में भी मेरा भेजा फ्राई करने पर तुल गई। अच्छा हुआ कि आप दोनो यहाॅ आ गईं, अब आप ही इसे सम्हालिये। मैं तो अब यहाॅ से अब नौ दो ग्यारह ही हो जाऊॅगा।"
"अरे अब बस भी कर राज।" सोनम दीदी हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए कह उठीं___"कितना बोलता है तू। हर वक्त उसे बस तंग ही करने का सूझता है तुझे।"
"लो कर लो बात।" मैने कहा___"ख़ैर क्या कहूॅ अब? ठीक है जा रहा हूॅ मैं। अब आप ही देखो इस बंदरिया को। गुड बाॅय।"
इतना कहने के बाद ही मैं पैर पटकते हुए कमरे से बाहर चला गया। जबकि मुझे इस तरह जाते देख सोनम दीदी व नैना बुआ खिलखिला कर हॅस पड़ीं। नीलम के होठों पर भी फीकी सी मुस्कान थी। किन्तु उसके चेहरे के भावों से ऐसा लगता था जैसे किसी किसी पल वो कहीं खो सी जाती थी।
कमरे से बाहर जैसे ही मैं आया तो मेरे पैंट की जेब में पड़ा हुआ मेरा मोबाइल फोन बज उठा। मैं तेज़ तेज़ क़दमों के साथ चलता हुआ नीचे आया और फिर बाहर की तरफ निकल गया। इस बीच मैने मोबाइल पर आ रही काल को रिसीव कर मोबाइल को कान से लगा लिया था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उस वक्त रात के लगभग बारह बज रहे थे। सारा शहर सोया पड़ा था। कही दूर किसी घंटाघर में लगे हुए घंटे ने बारह बजते ही ज़ोर की आवाज़ दी। खाली पड़ी सड़कों पर अभी कुछ ही देर पहले गहन सन्नाटा छाया हुआ था किन्तु कुछ ही पलों के भीतर इस सन्नाटे को भेदते हुए कई सारी गाड़ियाॅ सड़क पर सरपट दौड़ती हुई आईं और फिर एकाएक ही उन सबकी रफ्तार आश्चर्यजनक रूप से धीमी हो गई। वो लगभग चार गाड़ियाॅ थीं। जिनमें से एक टाटा सफारी थी बाॅकी कि तीनों बुलैरो थीं।
धीमी रफ्तार से चलती हुई वो चारों ही गाड़ियाॅ एक के बाद एक आगे के मोड़ पर दाहिने साइड मुड़ गईं। कुछ ही देर में वो चारो एक ऊॅचे मकान के सामने आकर रुकीं। गाड़ियों के रुकते ही चारो गाड़ियों के दरवाजे एक साथ मगर आहिस्ता से खुले। सभी गाड़ियों के खुल चुके दरवाजों में से एक के बाद एक आदमी बाहर निकले।
सभी आदमियों के हाॅथ में पिस्तौल स्पष्ट नज़र आ रही थी। टाटा सफारी से दो आदमी बाहर निकले थे। उनमें से एक आदमी की कद काठी से प्रतीत होता था कि वह कोई युवक ही था किन्तु दूसरा आदमी कुछ एज्ड नज़र आ रहा था।
तीनो बुलैरो गाड़ियों से निकले हुए पिस्तौल धारी आदमी पलक झपकते ही उस ऊॅचे मकान के सामने की दीवार तथा मुख्य दरवाजे के इतर बितर मुस्तैदी से तैनात हो गए। उनकी मुस्तैदी देख कर ऐसा लग रहा था जैसे वो किसी महत्वपूर्ण मिशन पर आए हुए हैं। जबकि टाटा सफारी से निकले हुए वो दोनो ही आदमी आराम से किन्तु बेआवाज़ चलते हुए मुख्य दरवाज़े के क़रीब आ कर खड़े हो गए। दरवाजे के पास खड़े हो कर वो दोनो ही बाएॅ साइड देखने लगे।
बाईं तरफ एक आदमी बड़ी दक्षता से रस्सी को ऊपर की बालकनी की रेलिंग में फॅसा कर ऊपर की तरफ चढ़ता चला जा रहा था। सबकुछ मानो पहले से ही प्लानिंग की गई थी कि यहाॅ पहुॅच कर कौन कब क्या करेगा। ख़ैर, कुछ ही देर में वो आदमी रस्सी के द्वारा ऊपर बालकनी में पहुॅच गया। ऊपर बालकनी से चलता हुआ वो दाईं तरफ की खिड़की के पास पहुॅचा। खिड़की के पास पहुॅच कर उसने बड़े एहतियात से खिड़की के पल्लों को अंदर की तरफ पुश किया। किन्तु खिड़की के पल्ले टस से मस न हुए। ये देख कर उस आदमी ने फौरन ही अपने एक हाॅथ को अपने काले लबादे में डाला और कोई चीज़ बाहर निकाली।
यकीनन वो चीज़ खिड़की के पल्लों पर लगे शीशों को काटने वाला हीरा था। उस आदमी ने बड़े एहतियात से तथा बड़ी सफाई से उस हीरे के द्वारा पल्ले पर लगे शीशे को काटा और उसका कटा हुआ टुकड़ा सावधानी से निकाल कर बालकनी में ही नीचे एक तरफ रख दिया। उसके बाद उसने कटे हुए पल्ले में हाॅथ डाल कर खिड़की के पल्लों की कुण्डी को खोल दिया। कुछ ही देर में खिड़की के दोनो ही पल्ले पूरी तरह अंदर की तरफ खुलते चले गए। अंदर की तरफ यूॅ तो अंधेरा ही था किन्तु खिड़की के अंदर की तरफ से लगे पर्दों को हटा कर उस आदमी ने अंदर किसी भी तरह ही चीज़ की आहट को सुनने के लिए अपने कान खड़े कर दिये थे। कुछ देर तक वह ऐसी ही पोजीशन में रहा फिर वह एकदम से खिड़की पर चढ़ कर अंदर कमरे की तरफ अंदाज़े से अपने पैर आहिस्ता आहिस्ता रखता चला गया।
कमरे में आते ही उसने सबसे पहले अपने लबादे से कोई चीज़ निकाली। कुछ ही पलों में पेंसिल टार्च का मध्यम प्रकाश कमरे के फर्श पर उसके पास ही उत्पन्न होता हुआ दिखा। उस आदमी ने पेंसिल टार्च के फोकस को धीरे धीरे आगे बढ़ाते हुए उस दिशा की तरफ किया जिस तरफ से उसे कुछ देर पहले किसी चीज़ की आवाज़ महसूस हुई थी। पेंसिल टार्च का फोकस बढ़ता हुआ कमरे में एक तरफ रखे शानदार बेड की तरफ पहुॅचा। बेड में दोनो किनारों पर दो दो पैर नज़र आए।
आदमी ने टार्च के फोकस को थोड़ा ऊपर किया तो पता चला कि बेड पर दो खूबसूरत लड़कियाॅ गहरी नींद में सोई हुई हैं।
दो लड़कियों को गहरी नींद में सोते देख वो आदमी पहले तो अजीब तरह से मुस्कुराया फिर एकाएक ही वह अपनी एड़ियों पर घूम गया। घूमने के बाद वह बड़ी सावधानी से कमरे के दरवाजे की तरफ बढ़ता चला गया। दरवाजे के पास पहुॅच कर उसने दरवाजे पर लगे हैण्डिल को घुमाया जिससे दरवाजा खुल गया। दरवाजे को हल्का खोल कर उसने पहले बाहर की तरफ हल्का सा सिर निकाल कर इधर उधर देखा, उसके बाद वह दरवाजे को खोल कर बड़े आराम से कमरे से बाहर आ गया।
कमरे के बाहर सफेद ट्यूब लाइट का प्रकाश था। हर चीज़ स्पष्ट देखी जा सकती थी। इस वक्त समूचे मकान में गहन सन्नाटा छाया हुआ था। वो आदमी बड़ी सावधानी से आगे बढ़ता हुआ सीढ़ियों के पास आ कर रुक गया। सीढ़ियों के पास ही एक मोटे से खंभे की आड़ में छिप कर उसने पहले इधर उधर देखा उसके बाद नीचे चारो तरफ बारीकी से देखने लगा। सब कुछ बेहतर समझ कर वह खंभे की ओट से निकल कर सीढ़ियों से नीचे की तरफ बेआवाज़ उतरता चला गया।
सीढ़ियों से नीचे आकर वह दाई तरफ बढ़ा। कुछ ही देर में वह मुख्य दरवाजे के पास पहुॅच गया। मुख्य दरवाजा अंदर की तरफ से बंद था। उस आदमी ने बड़ी सावधानी से मुख्य दरवाजे के मोटे से हैण्डिल को घुमा कर दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खुलते ही सामने वो दोनो ही आदमी खड़े नज़र आए जो टाटा सफारी से बाहर निकले थे। इतने से काम में ही उस आदमी को लगभग दस से पंद्रह मिनट का समय लग गया था। किन्तु वो सब इस बात से बेफिक्र से नज़र आए।
दरवाजा खुलते ही टाटा सफारी से उतरे हुए वो दोनो आदमी मकान के अंदर की तरफ दाखिल हो गए। उनके साथ ही कुछ और लोग भी अंदर की तरफ दाखिल हुए जबकि कुछ लोग बाहर ही मुस्तैदी से खड़े रहे। मुख्य दरवाजे से अभी वो आठ या दस कदम ही आगे बढ़े होंगे कि तभी किसी चीज़ के गिर कर टूटने की तेज़ आवाज़ हुई। इस आवाज़ ने उन सबकी रूह तक को कॅपकॅपा कर रख दिया। सारी सावधानी सारी सतर्कता धरी की धरी रह गई थी। किन्तु अब क्या हो सकता था?
आवाज़ होने के बाद वो सब काफी देर तक अपनी जगह चुपचाप खड़े रह गए थे। जब उस आवाज़ की वजह से कहीं से कोई भी प्रतिक्रिया न हुई तो ये सब अपनी अपनी जगह से हिले। किन्तु अभी चार कदम ही आगे बढ़े थे कि तभी उन सबके कानों में किसी नारी की आवाज़ पड़ी। जो बाईं तरफ से आती हुई नज़र आ रही थी। आते हुए ही उसने कहा था कि "कौन है वहाॅ"?
चालीस के आस पास की ऊम्र की उस मध्यम कदकाठी व शक्लो सूरत की औरत को देखते ही सबको पहले तो मानो साॅप सा सूॅघ गया किन्तु फिर जैसे अचानक ही बिजली सी कौंधी। पास आ चुकी औरत पर दो पिस्तौल धारी झपट पड़े थे।
अचानक हुई इस क्रिया से वो औरत बुरी तरह डर कर अभी भयानक आवाज़ में चीखने ही वाली थी कि तभी एक पिस्तौल वाले के एक हाॅथ की हॅथेली किसी कुकर के ढक्कन की भाॅति उसके मुह से चिपक गई।
मुह पर हॅथेली रूपी ढक्कन चिपकते ही औरत गूॅ-गूॅ करती रह गई। वह उन दोनो से छूटने के लिए बुरी तरह छटपटाए जा रही थी। तभी एक तीसरा पिस्तौल वाला आदमी उसके पास सामने से पहुॅचा और बेहद धीमें किन्तु खतरनाॅक भाव से बोला____"ज्यादा छटपटा मत वरना देख रही है न, इस पिस्तौल की सारी की सारी गोलियाॅ तेरे भेजे में उतार दूॅगा। पलक झपकते ही तेरी रूह ऊपर बैठे खुदा के दरबार में हाज़िरी बजाती नज़र आएगी।"
उस आदमी के द्वारा कहे गए इन खतरनाॅक वाक्यों का तुरंत ही उस औरत पर असर हुआ। वो एकदम से बुत सी बन गई। मगर मुसीबत अभी टली न थी क्योंकि इधर जैसे ही औरत ने छटपटाना बंद किया वैसे ही उधर इस बार एक मर्दाना आवाज़ उभरी। ये आवाज़ उसी तरफ से आई थी जिस तरफ से ये औरत आई थी। मर्दाना आवाज़ में कहा गया वाक्य ये था कि____"का हुआ रे बिंदिया? ई बखत ससुरी ना खुद सोवत है तू अउर ना हमका सोने देत है।"
इस वाक्य के साथ ही बाॅकी आदमियों की सिट्टी पिट्टी गुम होती नज़र आई। मगर चूॅकि ओखली में तो सिर पड़ ही चुका था इस लिए अब मूसल से क्या डरना वाली बात हो गई थी? कहने का मतलब ये कि जैसे ही वो आदमी ये सब कहते हुए सामने आया वैसे ही उसकी नज़र बिंदिया को पकड़े दो आदमियों पर पड़ी। वह एकदम से हक्का बक्का रह गया। इससे पहले कि वह अपने होशो हवाश में आ पाता दो आदमियों ने फौरन ही उसे दबोच लिया। उसके बाद वैसा ही हाल उसका भी हुआ जैसे अभी कुछ देर पहले बिंदिया का हुआ था।
"ओहो तो तू भी यहीं है हरिया।" टाटा सफारी से आए हुए दो आदमियों में से एक ने आगे बढ़ते हुए बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में कहा____"वाह बहुत खूब। वैसे अच्छा सिला दिया नमक हलाली का। हमने तो समझा था कि हमने अपने सभी फार्महाउस पर बड़े ही वफ़ादार कुत्तों को रखा हुआ है मगर, हमें क्या पता था कि हमारे रखे हुए कुत्ते एक दिन हमें ही काटने पर उतारू हो जाएॅगे। ख़ैर, कोई बात नहीं। इसकी सज़ा तो तुम सबको मिलेगी ही मगर उससे पहले बाॅकी लोगों का भी तो अच्छी तरह से प्रबंध कर लिया जाए।"
वो आदमी यकीनन अजय सिंह था जबकि दूसरा वो युवक खुद उसका ही बेटा शिवा था। हरिया ने अजय सिंह की इस बात का कोई जवाब न दिया। बल्कि अजय सिंह को इस वक्त यहाॅ अपने दलबल के साथ देख कर उसकी सिट्टी पिट्टी गुम हो गई। उसके चेहरे से ही पता चल रहा था कि वह बुरी तरह डर गया था।
इधर अजय सिंह अभी पुनः कुछ कहने ही वाला था कि ऊपर सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए किसी के आने की आहट हुई। अजय सिंह तथा उसके आदमियों ने फौरन ही इधर उधर होकर छिपने का उपाय किया। सीढ़ियों से नीचे आने वाली नैना थी। इस वक्त उसके जिस्म पर नाइट सूट था।
सीढ़ियों से नीचे उतर कर वह अपनी ही धुन में किचेन की तरफ बढ़ती चली गई। अजय सिंह को समझते देर न लगी कि उसे इस वक्त के हालात के बारे में कोई अंदेशा तक नहीं है। अतः अजय सिंह ने फौरन ही अपने एक अन्य आदमी को इशारा किया।
अजय सिंह का इशारा पाते ही वो आदमी बड़ी सावधानी से तथा बेआवाज़ किचेन की तरफ बढ़ता चला गया। कुछ ही देर में जब वो वापस आया तो वह अपनी दोनों बाहों के सहारे उठाए हुए नैना को आता दिखाई दिया। नैना कोई भी हरकत नहीं कर रही थी। मतलब साफ था कि उस आदमी ने नैना को बड़ी सफाई से बेहोश कर दिया था।
"ज्यादा समय नहीं है हमारे पास।" उस आदमी के आते ही अजय सिंह ने धीमे स्वर में कहा___"इस लिए जैसा कहा गया था फौरन ही वैसा करो। उसके बाद जल्दी से यहाॅ निकलना भी है।"
अजय सिंह की इस बात को सुन कर उसके अन्य आदमी फौरन ही हरकत में आ गए। कुछ लोग नीचे की तरफ के कमरों की तलाशी लेने लगे और बाॅकी लोग सीढ़ियों के द्वारा ऊपर की तरफ चले गए। लगभग दस मिनट बाद ही मंज़र ये था कि ऊपर से आने वाले आदमियों के कंधों पर एक एक इंसानी जीव बेहोश अवस्था में लदा हुआ नज़र आ रहा था। नीचे के एक कमरे से एक आदमी शंकर के बेहोश जिस्म को कंधे पर लादे आ रहा था।
उन सबके आते ही अजय सिंह बिंदिया व हरिया को पकड़े आदमियों को भी इशारा किया। इशारा मिलते ही उन आदमियों ने पलक झपकते ही खतरनाॅक हरकत की। जिसका नतीजा ये हुआ कि कुछ ही पलों में बिंदिया व हरिया दोनो ही बेहोश हो चुके थे। सबको लेकर बाहर की तरफ बढ़ चले वो लोग।
कुछ ही देर में सभी बेहोश हो चुके लोगों को बाहर खड़ी गाड़ियों पर भूसे की तरह ठूॅस दिया गया। उसके बाद सभी आदमी अपनी अपनी गाड़ियों पर बैठ गए। टाटा सफारी के चलते ही बाॅकी तीनों गाड़ियाॅ भी उसके पीछे चल दी। गहरी नींद में सोये शहर वासियों को इस सबका ज़रा भी इल्म न हुआ कि रात के सन्नाटे में यहाॅ क्या कुछ हो चुका था? जबकि अजय सिंह सबको लेकर अपने नियत स्थान की तरफ ऑधी तूफान की तरह बढ़ा चला जा रहा था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
सुबह हुई।
उधर मुम्बई में,
उस वक्त सब लोग सुबह का नास्ता कर रहे थे जब एकाएक ही पवन के मोबाइल फोन की घंटी बजी थी। पवन अपने कमरे से तैयार होकर ही नास्ता करने आया था। नास्ता करने के बाद उसे कंपनी चले जाना था। डायनिंग हाल में कुर्सी पर बैठे पवन का मोबाइल उसकी पैन्ट की जेब में बज रहा था। चारो तरफ कुर्सियों पर बैठे बाॅकी सबका ध्यान भी उसके मोबाइल की रिंगटोन पर गया। सबका ध्यान एक साथ जाने की विशेष बात ये थी कि पवन के मोबाइल की रिंग टोन पर "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ ना छोंड़ेंगे" बज रही थी।
पवन पहले तो हड़बड़ाया फिर सबकी तरफ देखते हुए वह कुर्सी से उठा और अपनी बाईं जेब से मोबाइल निकाला। मोबाइल की स्क्रीन पर "राज" लिखा नज़र आ रहा था।
यानी कि उसके मोबाइल पर विराज की काल आ रही थी। ये देख कर पवन के चेहरे पर सहसा खुशी की चमक उभर आई। उसने मुस्कुराते हुए तुरंत ही काल को रिसीव किया और फिर जाने क्या सोच कर उसने मोबाइल का स्पीकर ऑन करके बोला___"आख़िर तुझे इतने दिनों बाद ही सही मगर मेरी याद आ ही गई न राज।"
"हमें तो तुम सबकी ही बहुत ज़ोरों से याद आती है बर्खुरदार।" मोबाइल पर उधर से अजय सिंह की इस आवाज़ को पहचानने में किसी को ज़रा सी भी देर न हुई। सबके सब इस आवाज़ को सुन कर एकदम हक्के बक्के से रह गए। जबकि उधर से स्पीकर पर पुनः अजय सिंह की इस बार ज़रा कठोर आवाज़ उभरी____"मैं अच्छी तरह जानता हूॅ कि इस वक्त इस नंबर से मेरी आवाज़ सुन कर तुम सबके पैरों तले से ज़मीन गायब हो गई होगी। हर किसी को साॅप सा सूॅघ गया होगा। ख़ैर मुझे लगता है कि तुम में से किसी को भी मुझे ये बताने की या फिर समझाने की ज़रूरत नहीं है कि इस वक्त तुम लोगों का वो मसीहा विराज तथा उसके साथ साथ और भी बाॅकी लोग मेरे रहमो करम पर हैं। इस लिए बेहतर होगा कि बग़ैर मेरी किसी चेतावनी के तुम सब वहाॅ से फौरन मेरे पास या यूॅ कहो कि मेरे सामने आकर घुटनों के बल मेरे पैरों पर झुक जाओ।"
स्पीकर से उभर रहे अजय सिंह के ये वाक्य डायनिंग टेबल पर मौजूद लगभग सभी के मनो मस्तिष्क में ऐसा धमाका कर रहे थे जिसकी भीषण गूॅज से सभी के कानों के पर्दे तक झनझना रहे थे। और फिर ऐसा लगा जैसे एक ही पल में सब कुछ खत्म हो गया हो। चारो तरफ कुर्सियों पर बैठे सबके सब मानो किसी ऋषि के द्वारा दिए गए भयंकर श्राप की वजह से अचानक ही पत्थर की शिला में तब्दील होते चले गए हों। एक ही पल में वक्त मानो ठहर सा गया था। जो जिस हालत में बैठा था वो वैसी ही हालत में स्टेच्यू में तब्दील हो गया था।
सबकी चेतना तब जागृत हुई जब पुनः स्पीकर से अजय सिंह की आवाज़ के साथ साथ ज़ोरों का अट्ठहास गूॅजा था___"देखा, मैने कहा था न कि तुम सबको साॅप सा सूॅघ जाएगा। मगर साॅप सूॅघ जाने से कुछ नहीं होगा मेरे प्यारो बल्कि जो कुछ भी होगा मेरे पास आने के बाद ही होगा। इस लिए फौरन वहाॅ से चले आओ। वरना तुम लोग सोच भी नहीं सकते कि यहाॅ पर मैं तुम्हारे उस मसीहा के साथ साथ बाॅकी सबका भी क्या हस्र कर सकता हूॅ?"
अभी स्पीकर पर अजय सिंह का ये वाक्य पूरा ही हुआ था कि सहसा डायनिंग हाल में एक भयंकर चीख़ गूॅज उठी, साथ ही फर्श पर किसी चीज़ के गिरने की ज़ोरदार आवाज़ हुई। इस चीख़ व आवाज़ को सुन कर सबके सब बुरी तरह उछल पड़े। जैसे ही सबने चीख़ की दिशा में देखा तो सबके होश उड़ गए। दरअसल ये चीख गौरी के हलक से खारिज़ हुई थी। वो अपने हाॅथ में बर्तन पर कुछ लिए हुए किचेन से आ रही थी और डायनिंग हाल में आते ही उसने स्पीकर पर उभर रही अजय सिंह की उस आवाज़ के साथ साथ उसके संपूर्ण वाक्य को सुन लिया था।
उसके बाद ही उसके हलक से ये भयंकर चीख़ निकली थी।
पवन के हाॅथ से मोबाइल छूटते छूटते बचा। उधर गौरी की चीख़ सुन किचेन से रुक्मिणी व करुणा भी भागती हुई डायनिंग हाल की तरफ आ गई थीं। गौरी को डायनिंग हाल के फर्श पर अजीब हालत में लुढ़की पड़ी देख कर भौचक्की सी रह गई वो दोनो। इधर डायनिंग टेबर के चारो तरफ रखी कुर्सियों पर बैठे बाॅकी सब लोग भी अपनी अपनी जगहों से उठ कर गौरी की तरफ दौड़ पड़े थे। देखते ही देखते डायनिंग हाल में रोना धोना शुरू हो गया। यहाॅ का रोना धोना चालू मोबाइल के द्वारा अजय सिंह भी सुन रहा था और ज़ोरों से हॅसे जा रहा था।
"हाहाहाहाहा यही।" उधर से अजय सिंह की आवाज़ पुनः उभरी____"अब यही हाल होगा तुम सबका। मगर जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूॅ इस सबसे कुछ नहीं होगा बल्कि यहाॅ आने पर ही होगा। इस लिए अब मैं आख़िरी बार कह रहा हूॅ कि तुम सब वहाॅ से फौरन ही मेरे सामने हाज़िर हो जाओ। कल दोपहर तक तुम सब मेरी ऑखों के सामने होने चाहिए। दोपहर तक अगर तुम सब नहीं आए तो समझ लेना कि इसका परिणाम कितना घातक हो सकता है।"
इन वाक्यों के साथ ही अजय सिंह कहकहे लगा कर हॅसा और फिर काल कट हो गई। किन्तु उसके इन वाक्यों को सुनने की हालत में यहाॅ था ही कौन? यहाॅ तो बस रोना धोना तथा चीख़ पुकार ही मचा हुआ था। बड़ी मुश्किल से एक दूसरे को सम्हाला सबने।
उधर होश में आते ही गौरी दहाड़ें मार मार रोने लगी और चीख़ चीख़ कहने लगी____"मैने कहा था न कि हत्यारे ने मेरे बेटे को मार दिया है। हे भगवान! अब अगर मेरा बेटा ही नहीं तो मैं भला जी कर क्या करूॅगी? मुझे भी मौत दे दे भगवान। मैं अपने बेटे के बग़ैर एक पल भी जीवित नहीं रहना चाहती।"
"शान्त हो जाइये भाभी।" अभय सिंह सिसकते हुए बोल उठा___"हमारे राज को कुछ नहीं होगा। वो मादरजाद तो बस गीदड़ भभकियाॅ ही दे रहा था। जबकि मैं जानता हूॅ कि वो मेरे भतीजे का बाल भी बाॅका नहीं कर सकता। मेरा भतीजा शेर है शेर....ये साले सब गीदड़ हैं भाभी। भगवान के लिए भरोसा कीजिए और शान्त हो जाइये। सब कुछ ठीक हो जाएगा।"
"कुछ भी ठीक नहीं होगा अभय।" गौरी बुरी तरह बिलखते हुए बोली___"वो हत्यारा मेरे बेटे को गोलियों से छलनी छलनी कर देगा। वो मेरे बेटे के खून प्यासा है। मुझे मेरे बेटे के पास पहुॅचा दो अभय मैं तुम्हारे पाॅव पड़ती हूॅ।"
गौरी पागल सी हो गई थी। सचमुच ही वो अभय के पैरों पर गिर पड़ी। अभय का कलेजा ये देख कर हाहाकार कर उठा। बुरी तरह तड़प उठा वह। तेज़ी से वह पीछे की तरफ हटा और फिर तुरंत ही गौरी को दोनो कंधों से पकड़ कर ऊपर किया।
"क्यों मुझे पाप के सागर में डुबा रही हैं भाभी?" अभय सिंह रो पड़ा____"आप जानती हैं कि मैंने हमेशा आपको अपनी माॅ की तरह समझा है। मेरे पैरों में गिर कर मुझे ऐसे गर्त में मत डुबाइये कि जहाॅ से मैं फिर कभी निकल ही न पाऊॅ।
"
"मुझे मेरे बेटे के पास पहुॅचा दो कोई।" गौरी पागलों की तरह सबकी तरफ याचना भरी दृष्टि से देखते हुए बोले जा रही थी___"मेरा बेटा बहुत कष्ट में है। वो सब मिलके उसे मार देंगे। मुझे अभी के अभी मेरे बेटे के पास जाना है और अगर तुम लोग मुझे नहीं पहुॅचाओगे तो मैं खुद ही चली जाऊॅगी। मुझे यहाॅ अब नहीं रहना। मेरे बेटे को मार देंगे वो लोग।"
इतना सब कहने के साथ ही गौरी को चक्कर आ गया और वह रुक्मिणी की गोंद में ही शिथिल पड़ गई। उसकी हालत देख कर हर कोई रो रहा था। निधी की हालत बेहद ख़राब थी। वो अपनी माॅ को अपने बेटे के लिए इस तरह तड़पते देख खुद भी तड़पी जा रही थी। हालत तो सबकी ही ख़राब थी।
"ऐसे कब तक यहाॅ इन्हें रोता तड़पता हुआ देखते रहेंगे अभय चाचू?" सहसा पवन ऊॅचे स्वर में मानो चीख सा पड़ा___"मेरा दोस्त वहाॅ भयंकर संकट में है। मैं खुद भी अब यहाॅ एक पल के लिए भी रुकना नहीं चाहता। उस कसाई का कोई भरोसा नहीं है। वो कुछ भी कर सकता है।"
"सही कहते हो तुम।" अभय सिंह ने सहसा अपने ऑसुओं को पोंछते हुए बोला____"फौरन यहाॅ से चलने की तैयारी करो पवन। गौरी भाभी को अगर राज के पास न ले जाया गया तो ये यहीं पर अपना सिर पटक कर मर जाएॅगी। वैसे भी जिस तरह से उसने चेतावनी देकर हम सबको वहाॅ बुलाया है तो हम सबको फौरन जाना ही पड़ेगा। इसके सिवा दूसरा कोई चारा नहीं है। मौजूदा हालात में वो कुछ भी कर सकता है। इंसान से राक्षस बन गया है वो। मगर भवानी माॅ की कसम अगर उसने मेरे भतीजे को ज़रा सी भी चोंट पहुॅचाई तो सारी दुनियाॅ को आग लगा दूॅगा मैं।"
"ठीक है चाचू।" पवन ने कहा___"आप इन्हें देखिये। मैं तब तक सबकी टिकटों का इंतजाम करता हूॅ। वैसे मुमकिन तो नहीं मगर देखता हूॅ शायद सबके लिए टिकटें मिल ही जाएॅ।"
"आप एक बार जगदीश भाई साहब को भी फोन पर इस बारे में सब कुछ बता दीजिए।" पवन के जाते ही करुणा ने अभय सिंह की तरफ देखते हुए दुखी भाव से कहा___"आख़िर इस बारे में जानकारी तो उन्हें भी होनी ही चाहिए कि हम अचानक यहाॅ से किस वजह से जा रहे हैं?"
"सही कहा तुमने।" अभय सिंह ने कहने के साथ पैन्ट की जेब से अपना मोबाइल निकाला, फिर बोला___"भाई साहब को बताना बेहद ज़रूरी है। वैसे भी वो हमें अपने सगे जैसा ही मानते हैं। उन्हें इस बारे में बताना ही चाहिए। रुको मैं अभी बात करता हूॅ उनसे।"
कहने के साथ ही अभय ने जगदीश ओबराय को फोन लगाया। कुछ देर तक टुक टुक की आवाज़ आती रही, उसके बाद सहसा मोबाइल से आवाज़ उभरी___"आप जिस उपभोक्ता से बात करना चाहते हैं वो इस समय उपलब्ध नहीं है अथवा नेटवर्क क्षेत्र से बाहर हैं।"
ये सुन कर अभय सिंह परेशान सा हो गया। उसने पुनः नंबर रिडायल कर फोन लगाया। किन्तु फिर से वही जवाब मिला।
अभय ने कई बार फोन मिलाया मगर हर बार यही बताया गया कि वो इस समय उपलब्ध नहीं है अथवा नेटवर्क क्षेत्र से बाहर हैं। अभय को चिंतित व परेशान देख कर करुणा ने उससे पूछा कि क्या हुआ? उसके सवाल पर अभय सिंह ने उसे सब कुछ बता दिया। जिसे सुन कर वो भी चिंता में पड़ गई।
ख़ैर, जितना जल्दी हो सकता था उतना जल्दी किया गया। यानी फौरन ही सबको तैयार कर चलने के लिए कहा गया। किन्तु यहाॅ किसी को भला क्या तैयार होना था? जो जिन कपड़ों में था वो वैसे ही चलने को तैयार हो गया था। लगभग एक घंटे बाद पवन सिंह बॅगले पर आया। उसने बताया कि रिज़र्व में सिर्फ पाॅच ही टिकटों का इंतजाम हो सका है। बाॅकी की सब वेटिंग या आरएसी की टिकटें मिली हैं। पवन की बात सुन कर अभय ने कहा कोई बात नहीं। जाना तो अनिवार्य ही है फिर चाहे भले ही जनरल में ही क्यों न जाना पड़े। पवन ने बताया कि ट्रेन शाम की है। उससे पहले एक और थी जो कि सुबह नौ बजे की थी मगर वो जा चुकी है।
पवन की इस बात ने सबको निराश व मायूस सा कर दिया। सबके सब अतिसीघ्र यहाॅ से जाना चाहते थे। मगर जाने का साधन तो अब शाम को ही मिलने वाला था। अतः शाम का इन्तज़ार करना ही सबकी नियति थी। कहते हैं कि जब हम बड़ी शिद्दत से चाहते हैं कि वक्त गुज़र जाए तब ऐसा कदापि नहीं होता। बल्कि एक एक पल मानो शदियों में तब्दील हो जाता है। कुछ ऐसा ही आलम था यहाॅ पर।
सारा दिन सबके बीच ऐसा आलम रहा जैसे कोई हमारे बीच का दुनियाॅ से ही जा चुका हो। डायनिंग टेबल पर नास्ते के लिए परोसी गई थाली व प्लेट सब वैसी की वैसी ही रखी रह गई थी। किसी ने उस तरफ देखा तक न था और ना ही कोई अपने कमरे की तरफ गया था। बॅगले के नौकर चाकर तक संजीदा थे इस सबसे। अभय सिंह सुबह से अब तक हज़ारों बार जगदीश ओबराय को फोन लगा चुका था किन्तु उसका नंबर अभी भी नेटवर्क क्षेत्र के बाहर ही बता रहा था।
बड़ी मुश्किल से ही सही किन्तु वक्त अतिमंद्र गति से गुज़र ही गया। ट्रेन के निर्धारित समय से आधा घंटा पहले ही सबके सब रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर पहुच गए। रुक्मिणी व करुणा गौरी के साथ ही थी। हर कोई उदास व दुखी था। आधे घंटे बाद जब ट्रेन आई तो सब ट्रेन की तरफ लगभग भागते हुए बढ़े। ट्रेन में चढ़ कर हर कोई सीट पर बैठ चुका था। रिज़र्व सीटों पर औरतों और लड़कियों को बैठा दिया गया था। हलाॅकि रिज़र्व में पाच ही सीटें मिली थी। जिनमें गौरी रुक्मिणी करुणा निधी व दिव्या को बैठा दिया गया था। शगुन दिव्या के साथ ही बैठा हुआ था। जबकि पवन अभय व आशा ट्रेन के फर्श पर ही खड़े थे।
गौरी को रुक्मिणी व करुणा ने बड़ी मुश्किल से सम्हाला हुआ था। सारा दिन रोती रही थी वो जिसकी वजह से उसकी ऑखें लाल सुर्ख पड़ चुकी थीं। चेहरे पर ऐसी वीरानी थी जैसे इस चेहरे ने कभी किसी तरह की खुशियो से भरी बहार को देखा ही न हो।
कुछ ही समय बाद ट्रेन अपने गंतब्य स्थान के लिए चल पड़ी। ट्रेन के चल पड़ने से सबके मन में थोड़ी राहत के भाव उभर आए थे। आने वाले समय में किसके साथ क्या क्या होने वाला था इसकी कल्पना से ही सबकी रूहें काॅप जाती थी।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दोस्तो, अपडेट हाज़िर है। आशा है आप सभी को पसंद आएगा।
आप सबकी प्रतिक्रिया का बेसब्री से इन्तज़ार रहेगा।
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.......《 62 》
अब तक,,,,,,,
सारा दिन सबके बीच ऐसा आलम रहा जैसे कोई हमारे बीच का दुनियाॅ से ही जा चुका हो। डायनिंग टेबल पर नास्ते के लिए परोसी गई थाली व प्लेट सब वैसी की वैसी ही रखी रह गई थी। किसी ने उस तरफ देखा तक न था और ना ही कोई अपने कमरे की तरफ गया था। बॅगले के नौकर चाकर तक संजीदा थे इस सबसे। अभय सिंह सुबह से अब तक हज़ारों बार जगदीश ओबराय को फोन लगा चुका था किन्तु उसका नंबर अभी भी नेटवर्क क्षेत्र के बाहर ही बता रहा था।
बड़ी मुश्किल से ही सही किन्तु वक्त अतिमंद्र गति से गुज़र ही गया। ट्रेन के निर्धारित समय से आधा घंटा पहले ही सबके सब रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर पहुच गए। रुक्मिणी व करुणा गौरी के साथ ही थी। हर कोई उदास व दुखी था। आधे घंटे बाद जब ट्रेन आई तो सब ट्रेन की तरफ लगभग भागते हुए बढ़े। ट्रेन में चढ़ कर हर कोई सीट पर बैठ चुका था। रिज़र्व सीटों पर औरतों और लड़कियों को बैठा दिया गया था। हलाॅकि रिज़र्व में पाच ही सीटें मिली थी। जिनमें गौरी रुक्मिणी करुणा निधी व दिव्या को बैठा दिया गया था। शगुन दिव्या के साथ ही बैठा हुआ था। जबकि पवन अभय व आशा ट्रेन के फर्श पर ही खड़े थे।
गौरी को रुक्मिणी व करुणा ने बड़ी मुश्किल से सम्हाला हुआ था। सारा दिन रोती रही थी वो जिसकी वजह से उसकी ऑखें लाल सुर्ख पड़ चुकी थीं। चेहरे पर ऐसी वीरानी थी जैसे इस चेहरे ने कभी किसी तरह की खुशियो से भरी बहार को देखा ही न हो। कुछ ही समय बाद ट्रेन अपने गंतब्य स्थान के लिए चल पड़ी। ट्रेन के चल पड़ने से सबके मन में थोड़ी राहत के भाव उभर आए थे। आने वाले समय में किसके साथ क्या क्या होने वाला था इसकी कल्पना से ही सबकी रूहें काॅप जाती थी।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,
दूसरे दिन।
उस वक्त दोपहर हो चुकी थी।
अजय सिंह के इस विशाल फार्महाउस पर इस वक्त अलग ही नज़ारा था। ये दृष्य तो गौरी के स्वप्न की तरह ही था किन्तु उससे थोड़ा भिन्न ही था। लम्बे चौड़े फार्महाउस के बीचो बीच दो मंजिला बड़ा सा मकान बना हुआ था। चारों तरफ हरी हरी घाॅस से भरा हुआ विशाल मैदान तथा हर तरफ लगे हुए तरह तरह के पेड़ पौधे यहाॅ की खूबसूरती का एक बड़ा ही सुंदर नज़ारा पेश कर रहे थे। किन्तु इस वक्त इस खूबसूरत नज़ारे में भी जैसे ग्रहण सा लगा हुआ था।
मैदान में लगे पेड़ पौधों के बीच का ही दृष्य था ये।
कतार में लगे पेड़ों पर कई सारे लोग रस्सियों से बॅधे जकड़े हुए थे। विराज, रितू, आदित्य, नैना, सोनम, नीलम, बिंदिया, हरिया व शंकर आदि सब कतार से ही पेड़ों से रस्सियों द्वारा बॅधे हुए थे। विशाल मैदान में चारो तरफ काली वर्दी में तैनात गुंडे मवालियों जैसी शक्ल के काफी सारे लोग हाथों में बंदूखें लिए खड़े थे। मैदान में एक तरफ कुछ दूरी पर कई सारी गाड़ियाॅ भी खड़ी हुई थी।
उन्हीं पेड़ों की गहरी छाॅव में अजय सिंह एक कुर्सी पर बैठा हाॅथ में लिए हुए रिवाल्वर को बार बार अपनी उॅगली पर नचा रहा था। उसके पीछे उसका बेटा शिवा खड़ा था। उसकी कमर में भी एक रिवाल्वर ठुॅसा हुआ था। अजय सिंह की पत्नी यानी कि प्रतिमा भी अजय सिंह के पास ही खड़ी हुई थी। वातावरण में चारो तरफ एक अजीब सा भयावह सन्नाटा फैला हुआ था।
"दोपहर तो हो चुकी है ठाकुर साहब।" तभी सहसा एक आदमी अजय सिंह के पास आता हुआ बोला____"किन्तु आपके बाॅकी शिकार तो अभी तक यहाॅ नहीं पहुॅचे। कहीं ऐसा तो नहीं कि वो लोग पुलिस के पास चले गए हों सहायता माॅगने के लिए? अगर ऐसा हुआ तो यकीन मानिए हमारे सारे किये कराए पर पानी फिर जाएगा और हम सब जेल के अंदर चक्की पीसते नज़र आएॅगे।"
"नहीं सहाय।" अजय सिंह ने कठोर भाव से कहा___"वो लोग पुलिस के पास जाने का सोच भी नहीं सकते हैं। वो जानते हैं कि अगर उन लोगों ने इस मामले में पुलिस को कुछ भी बताया तो उसका अंजाम बहुत ही खतरनाॅक हो सकता है। इस लिए तुम इस बात से बेफिक्र रहो। वो सब सिर के बल भागते दौड़ते हुए रेलवे स्टेशन से सीधा यहीं आएॅगे। उसके बाद क्या होगा ये समझाने की ज़रूरत नहीं है तुम्हें।"
"हाॅ ये तो सही कहा आपने।" अभिजीत सहाय ने कमीनी मुस्कान के साथ कहा___"आज यहाॅ पर एक अनोखा इतिहास लिखा जाएगा। आने वाले बाॅकी शिकार यहाॅ आ तो जाएॅगे मगर तुरंत ही हमारे आदमियों द्वारा धर लिए जाएॅगे और फिर वो सब भी इन लोगों की तरह पेड़ों पर रस्सियों में बॅधे नज़र आने लगेंगे।"
"मुझसे तो अब बरदास्त ही नहीं हो रहा डैड।" शिवा अपने बाप के सामने आते हुए बोला____"एक एक पल कैसे काट रहा हूॅ ये सिर्फ मैं जानता हूॅ। मेरी ऑखों के सामने ही मेरी ये बहने रस्सियों में बॅधी पेड़ों पर चिपकी खड़ी हैं और आप मुझे कुछ करने ही नहीं दे रहे हैं।"
"बस थोड़ी देर और सब्र करो मेरे बेटे।" अजय सिंह ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"उसके बाद तुम्हें जो करना हो करते रहना। मज़ा तो तभी आएगा न जब बाॅकी के लोग भी यहाॅ पर हर तरह का तमाशा देखने के लिए पहुॅच जाएॅ।"
"ठीक है डैड।" शिवा ने मन मसोस कर कहा___"आप कहते हैं तो मैं थोड़ी देर और सब्र कर लेता हूॅ।"
"ये हुई न बात।" अजय सिंह मुस्कुराया, फिर सहाय की तरफ देखते हुए बोला___"अपने आदमियों को पूरी तरह से सतर्क रहने का अल्टीमेटम दे दिया है न सहाय तुमने?"
"डोन्ट वरी ठाकुर साहब।
" अभिजीत सहाय ने कहा___"हमारे आदमी पूरी तरह से सतर्क हैं। उनकी नज़र से एक परिंदा भी यहाॅ से छूट कर नहीं जा सकेगा।"
"वेरी गुड।" अजय सिंह ने कहा____"उन लोगों के आते ही हमारे आदमी उन सबको धर लेंगे और फिर उन्हें भी इन लोगों की तरह यहाॅ के पेड़ों पर रस्सियों से बाॅध देंगे। ये फाइनल गेम है सहाय और इस गेम का विनर सिर्फ और सिर्फ हम ही होंगे। असली खिलाड़ी वही है जो सामने वाले को पूरी तरह से पस्त करके उसे नेस्तनाबूत कर दे।"
अभी अजय सिंह ने इतना कहा ही था कि पीछे की तरफ से किसी के ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ें सुनाई देने लगी थीं। चिल्लाने की आवाज़ें सुनते ही सबका ध्यान उस तरफ गया। कई सारे बंदूख धारियों से घिरे हुए अभय, पवन, गौरी, रुक्मिणी, करुणा, आशा, निधी, दिव्या व शगुन, इस तरफ ही चले आ रहे थे। ये सब देख कर अजय सिंह के साथ साथ सहाय, शिवा व प्रतिमा के होंठो पर जानदार मुस्कान उभर आई।
देखते ही देखते कुछ ही देर में सबको अलग अलग पेड़ों पर रस्सियों से बाॅध दिया गया। रस्सियों में जकड़ी गौरी बुरी तरह छटपटाए जा रही थी। उसकी नज़र जैसे ही रस्सियों में बॅधे अपने बेटे विराज पर पड़ी वैसे ही वह बुरी तरह तड़प कर रोने लगी थी। विराज के साथ साथ रितू नीलम सोनम आदित्य आदि को रस्सियों में बॅधे थे, किन्तु इस वक्त ये सब अचेत अवस्था में थे।
"तो आख़िर तुम सब लोग यहाॅ पर मरने के लिए आ ही गए।" अजय सिंह उन सबके बीच ज़मीन पर चहल क़दमी करते हुए कठोर भाव से बोला___"वैसे क्या समझते थे तुम सब लोग कि मेरे क़हर से बचे रहोगे? हाहाहाहा ऐसा कभी नहीं हो सकता। जब तक मेरे द्वारा तुम सबको सज़ा नहीं मिल जाती तब तक तुम लोग किसी भी चीज़ से मुक्त नहीं हो सकते थे।"
"मेरे बेटे को कुछ मत करना।" सहसा गौरी ने रोते हुए कहा____"मैं आपके सामने हाॅथ जोड़ती हूॅ। भगवान के लिए उसे छोंड़ दो। उसके किये की सज़ा मुझे दे लो मगर मेरे बेटे को कुछ मत करना।"
"हाय! मेरी बुलबुल ये क्या हालत बना ली है तुमने?" अजय सिंह गौरी के क़रीब आते हुए चहका___"यकीन मानो तुम्हारी ये हालत देख कर मेरे दिल को बहुत दुख हो रहा है। अरे तुम तो मेरी जाने बहार हो डियर। कभी मेरे दिल के बारे में भी सोचा होता तो समझ में आता तुम्हें कि कोई किस क़दर चाहता है तुम्हें? मगर तुमने तो कभी मेरे बारे में सोचना तक गवारा न किया। आख़िर क्या कमी थी मुझमें? तुम्हारे उस अनपढ़ गवार पति से तो लाख गुना अच्छा था मैं। उससे कहीं ज्यादा अच्छी हैंसियत भी है मेरी। वो तो खेतों पर दिन रात काम करने वाला महज एक मजदूर था जबकि मैं तो यहाॅ का सम्पन्न राजा था। तुमको दुनियाॅ हर ऐशो आराम व सुख देता। मगर तुमको तो उस मजदूर से ही प्रेम था।"
"कोई भी इंसान धन दौलत से राजा नहीं बन जाता नीच इंसान।
" गौरी का लहजा एकाएक कठोर हो उठा___"राजा बनने के लिए दूसरों के प्रति अपनी खुशियों का तथा अपने हर सुखों का त्याग करना पड़ता है। तुझमें तो सिर्फ एक ही खूबी है बेग़ैरत इंसान और वो है हर रिश्तों की मान मर्यादा का हनन करना। तेरे जैसे कुकर्मी के लिए सिर्फ और सिर्फ नफ़रत व घृणा ही हो सकती है।"
"उफ्फ।" अजय सिंह ने बुरा सा मुह बनाया___"मेरे प्रति इतनी घटिया बात कैसे सोच सकती हो तुम? अरे तुम कहती तो मैं तुम्हारे लिए खुद को पूरी तरह बदल भी देता मेरी जान। मैं वो सब बनने को तैयार हो जाता जो तुम मुझे बनने को कहती। मगर तुमने तो मुझसे इस बारे में कभी कुछ कहा ही नहीं। इसमे भला मेरा क्या कसूर है गौरी? मैं तो बस अपने दिल के हाॅथों मजबूर था और वही करता चला गया जो मेरा दिल कहता रहा था। मगर कोई बात नहीं डियर, अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। तुम कहोगी तो मैं अब भी वैसा ही बन जाऊॅगा जैसा तुम कहोगी। ये समझ लो कि तुम्हारी स्वीकृति से सब कुछ एक पल में बदल जाएगा। कहने का मतलब ये कि तुम अगर अब भी मेरी हो जाओ तो ये सब लोग मेरे क़हर से बच जाएॅगे।"
"तू अपने और अपने इस सपोले के बारे में सोच हरामज़ादे।" होश में आते ही मेरी आवाज़ वातावरण में गूॅज उठी___"तू अगर ये समझता है कि तूने हम सबको रस्सियों में इस तरह बाॅध कर बहुत बड़ा तीर मार लिया है तो इस खुशफहमी में मत रह तू। दुनियाॅ की कोई भी ताकत तुझको मेरे हाॅथों मरने से बचा नहीं सकती।"
"तू अब कुछ नहीं कर सकता भतीजे।" अजय सिंह ने विराज की तरफ देखते हुए कहा___"तेरा सारा उछलना कूदना समाप्त हो चुका है। अब तक तुझे जो कुछ भी करना था वो सब कर लिया है तूने। अब तो मेरी बारी है और यकीन मान मैं अपनी बारी में अब कोई कसर नहीं छोंड़ूॅगा कुछ भी करने में। ख़ैर, अभी तो तुझे ये भी पता नहीं है कि मेरे एक ही झटके में तू और ये सब मेरी कैद में कैसे आ गए? तुझे पूछना चाहिए भतीजे कि मुझे तेरे ठिकाने का कैसे पता चला? और फिर कैसे तुम सब यहाॅ पहुॅच गए?"
अजय सिंह की इस बात पर सन्नाटा सा छा गया। ये सच था कि विराज एण्ड पार्टी को होश आते ही सबसे पहले उनके मन में यही सवाल उभरा था कि वो अचानक यहाॅ कैसे आ पहुॅचे हैं? एक के बाद एक सब कोई होश में आ चुका था। खुद को इस तरह रस्सियों में बॅधे देख वो सब बुरी तरह चौंके थे तथा बुरी तरह छटपटाने लगे थे। किन्तु जब यहाॅ के दृष्य व माहौल पर सबकी नज़र पड़ी तो जैसे सबके पैरों तले से ज़मीन ही गायब हो गई थी। विराज और रितू ये देख कर आश्चर्यचकित थे कि मुम्बई से बाॅकी सब लोग भी यहाॅ आ चुके हैं और वो सब भी उनकी तरह रस्सियों से बॅधे हुए हैं।
"हाहाहाहाहा क्यों भतीजे ज़बान को लकवा क्यों मार गया तुम्हारे?" अजय सिंह ठहाका लगा कर हॅसा___"पूछ न कि ये सब कैसे हुआ? खुद को बड़ा तीसमारखां समझ रहा था न तू? अब पूछ कि ये सब कैसे हो गया? एक ही झटके में तू भी यहाॅ आ गया और मुम्बई में रह रहे तेरे ये सब चाहने वाले भी यहाॅ आ गए। होश में आने के बाद तुझे सबसे पहले यही पूछना चाहिए था।"
"तुम बताने के लिए इतना ही मरे जा रहे हो तो खुद ही बता दो।" आदित्य ने कहा____"वैसे मुझे पूरा यकीन है कि इसमें भी तेरे जैसे कूढ़मगज का अपना कोई दखल नहीं होगा।"
"इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता बेटा।" अजय सिंह ने कहा___"जंग में सेना का सारा ही योगदान होता है किन्तु जंग की जीत का सारा श्रेय राजा को ही जाता है। ख़ैर, अगर मेरा भतीजा ये जान जाए कि ये सब कैसे हुआ है तो यकीनन उसे दिल का दौरा पड़ जाएगा।"
"क्या मतलब??" मैं चकरा सा गया।
"छोटे को रस्सियों से मुक्त कर दो सहाय।" अजय सिंह ने अभिजीत सहाय की तरफ देखते हुए कहा___"मुझे लगता है कि ये खुद ही बताए तो ज्यादा बेहतर होगा।"
अजय सिंह की इस बात से हर कोई भौचक्का रह गया। सचमुच सबके पैरों के तले से ज़मीन खिसक गई किन्तु अभी भी बात पूरी तरह से समझ में नहीं आई थी। उधर अजय सिंह के कहने पर अभिजीत सहाय ने एक आदमी को इशारा किया तो उसने जा कर अभय सिंह को रस्सियों से मुक्त कर दिया। रस्सी से छूटते ही अभय सिंह मुस्कुराया और फिर अपने कपड़ों को झाड़ता हुआ अजय सिंह के पास आ कर खड़ा हो गया।
अभय सिंह के होठों पर इस वक्त बहुत ही रहस्यमय मुस्कान थी। मैं ही क्या हम सब भी उसे इस तरह देख कर चकित थे। जबकि अभय सिंह कुछ देर हम सबकी तरफ उसी रहस्यमय मुस्कान के साथ देखता रहा।
"माफ़ करना राज।" अभय सिंह ने मेरी तरफ देखने के बाद माॅ की तरफ देखा___"आप भी मुझे माफ़ कीजिएगा भाभी जी। मगर मैं क्या करता? इस दुनियाॅ में हर कोई सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में ही तो सोचता है।"
"अ..भय तुम।" गौरी के होठ बुरी तरह थरथरा कर रह गए, बोली___"तुमने ये सब किया है??"
"करने वाले तो बड़े भइया ही हैं भाभी।" अभय सिंह ने मुस्कुरा कर कहा___"मैने तो सिर्फ इन्हें फोन पर राज के ठिकाने के बारे में बताया था। आप सब समझ सकते हैं कि राज के ठिकाने का पता चल जाने के बाद बड़े भइया के लिए ये सब कर लेना कितना आसान रहा होगा।"
"नहींऽऽऽ।" गौरी के कुछ बोलने से पहले ही करुणा बुरी तरह रोते हुए चीख पड़ी____"आप ऐसा नहीं कर सकते। आप ऐसे नीच इंसान का साथ कैसे दे सकते हैं जिसके बेटे ने खुद आपकी पत्नी व बेटी के साथ ग़लत करने की कोशिश की थी? नहीं नहीं, आप इस नीच आदमी की तरह नहीं हो सकते। भगवान के लिए कह दीजिए कि ये सब आपने नहीं किया।"
हम सब अभय सिंह की इस बात से हक्के बक्के थे। मुख से कोई बोल ही नहीं फूट रहा था। अभय सिंह का इस तरह पलटी मारना हम सबके लिए यकीनन अविश्वसनीय था।
किन्तु सच्चाई तो अब सबके सामने ही थी। उसे कैसे कोई नकार सकता था?
"वाह अभय।" गौरी ने हताश भाव से कहा___"क्या खूब बेटे होने का फर्ज़ निभाया है तुमने। कल तक तो बड़ा कह रहे थे कि तुमने हमेशा मुझे अपनी माॅ की तरह समझा है। फिर आज ऐसा क्या हो गया कि एक झटके में तुम फरिश्ता से राक्षस बन गए? आख़िर मैंने या मेरे बच्चों ने ऐसा क्या बुरा कर दिया था तुम्हारा कि तुमने हम सबको इस आदमी के सामने ला कर इस तरह खड़ा कर दिया?"
"मैने कहा न भाभी।" अभय सिंह ने कहा___"हर कोई सिर्फ अपने बारे में ही सोचता है। बड़े भइया ने अपने बारे में सोचा था इस लिए उन्होंने वो सब किया। किन्तु क्या किसी ने मेरे बारे में सोचा कभी? भगवान ने एक बेटा दिया वो भी दिमाग़ से डिस्टर्ब। आपके बेटे को अरबपति आदमी ने अपनी संपूर्ण दौलत से नवाज दिया। इस लिए आप भी खुश हो गए। मगर मेरा क्या??? मेरा तो कहीं कोई महत्व ही न रह गया। दिमाग़ से डिस्टर्ब बेटा है, उसका क्या भविष्य हो सकता है ये बताने की ज़रूरत नहीं है। इस लिए मैने बहुत सोच समझ कर एक सौदा किया।"
"स सौदा???" गौरी के होंठ काॅपे। हम सब के चेहरों पर भी गहन उलझन के भाव उभर आए।
"हाॅ भाभी।" अभय सिंह ने कहा____"मैने बड़े भइया को फोन लगाया और उनसे कहा कि अगर आपको इस जंग में जीत हासिल करनी है तो आपको मेरा कहना मानना पड़ेगा। वरना आप किसी भी तरह से इस जंग में जीत नहीं पाएॅगे। क्योंकि इनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी तो विराज के पास रखा इनका वो सब ग़ैर कानूनी सामान है। उस सामान के तहत विराज इन्हें जब चाहे कानून की गिरफ्त में जीवन भर के लिए डलवा सकता है। ये बात इन्हें भी अच्छी तरह पता है। तब इन्होंने मुझसे कहा कि मैं इस जंग में क्या कर सकता हूॅ? मैने बताया कि इनका सारा ग़ैर कानूनी सामान आज की तारीख़ में मेरे कब्जे में है। इस सामान की कीमत ये होगी कि ये मेरे बेटे का बेहतर से बेहतर इलाज़ करवाएॅगे, साथ ही ज़मीन जायदाद में आधा हक़ मेरा होगा। इन्हें मेरा वो सौदा मंजूर था, इस लिए बात को आगे बढ़ा दिया गया। ये उसी का नतीजा है कि आज आप सब यहाॅ हैं। कल जगदीश ओबराय का फोन इसी लिए नहीं लग रहा था क्योंकि मैं ग़लत नंबर पर काल लगा रहा था। मैं नहीं चाहता था कि उस सिचुएशन में जगदीश वहाॅ आ जाए और मेरे काम में कोई अड़चन आ जाए। ये मेरी ही स्कीम थी कि सुबह नास्ते के समय में बड़े भइया विराज के फोन से पवन के फोन पर काल करें ताकि वैसे हालात बन जाएॅ। हलाॅकि जैसा मैने सोचा था उससे बेहतर ही माहौल बन गया था। क्योंकि पवन ने अपने मोबाइल का स्पीकर खुद ही ऑन कर दिया था।"
"ओह तो तुमने सिर्फ इस वजह से हम सबके साथ इतना बड़ा धोखा किया है।
" गौरी ने कहा____"तुम्हें क्या लगता है कि अभय जिस आदमी के साथ तुमने हम सबका सौदा किया है वो आदमी तुम्हारे लिए इतना कुछ करेगा? अरे जिसने ज़मीन जायदाद के लिए अपने माॅ बाप व भाई तक को जान से मार दिया वो तुम्हें भी तो मार सकता है। रही बात तुम्हारे बेटे के इलाज़ की तो वो हम भी करवा देते। मैने तो इस बारे में सोच भी लिया था। याद करो मैने ही इस बात के लिए ज़ोर दिया था कि तुम खुद की समस्या को भी दूर कर लो। मैने जगदीश भाई साहब से बात की और फिर तुम्हारा इलाज हुआ। मैं नहीं जातनी कि इस सबके बाद भी तुम्हारे अंदर ये बात कैसे आ गई कि हम सबको एक ही झटके में इस तरह मौत के मुह में डाल दिया जाए?"
गौरी की ये बातें सुन कर अभय सिंह तुरंत कुछ बोल न सका। कदाचित गौरी की इस बात ने उसे सोचने पर मजबूर किया कि "एक तो अजय सिंह अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद से गुज़र सकता है दूसरी ये कि वो खुद उसके बेटे के बेहतर इलाज़ के बारे में सोचे बैठी थी"। इधर अभय सिंह को एकदम से चुप हो जाते देख अजय सिंह मन ही मन बुरी तरह चौंका।
"ये औरत तुझे बरगलाने की कोशिश कर रही है छोटे।" अजय सिंह ने तपाक से कहा___"ये ऐसा कुछ भी नहीं कर सकती जिसकी इस वक्त ये बातें गढ़ रही है। तुम्हारे बेटे का बेहतर इलाज़ मैं करवाऊॅगा। बल्कि अगर ये कहूॅ तो ज्यादा उचित होगा कि मैंने तो इस बारे में शुरूआत भी कर दी है। तुम अपने बच्चे के लिए बिलकुल भी फिक्र मत करो छोटे। उसका इलाज़ मैं खुद विदेश में करवाऊॅगा।"
"तुम अपनी मर्ज़ी से कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र हो अभय।" गौरी ने कहा___"ईश्वर जानता है कि मैने या मेरे मरहूम पति ने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा था। हॅसते खेलते घर में आग लगाने वाला तो सिर्फ यही एक शख्स था। इतना तो अब तुम भी समझ ही गए हो कि इसने अपनी खुशी के लिए तथा अपने स्वार्थ के लिए हम सबके साथ क्या कुछ नहीं किया है। ज़मीन जायदाद और हवेली को हड़पने के चक्कर में इसने अपने ही भाई को ज़हरीले सर्प से डसवा कर मार डाला। उसके बाद अपनी करतूत को छुपाने के लिए इसने माॅ बाबू जी का एक्सीडेन्ट करवाया। आज जब ईश्वर ने इंसाफ किया तो तिलमिला उठा ये। मैं हैरान हूॅ कि तुम सब कुछ जानते बूझते हुए भी इसका साथ देने के लिए अथवा इससे इस तरह का सौदा कैसे कर बैठे? हमें इस बात का दुख नहीं है कि तुमने हम सबको धोखा दिया और फिर यहाॅ ले आए। क्योंकि जीवन में इतना कुछ पा लिया है और सहन कर लिया है कि अब किसी बात से कोई फर्क़ ही नहीं पड़ता। किन्तु हाॅ इस सबके बाद भी तुम्हारे प्रति यही दिल करता है कि तुम ऐसी मुसीबत में न फॅस जाओ जिसके तहत एक बार फिर से ये कहानी दोहरा दी जाए।"
"माॅ की बात सही है चाचा जी।
" सहसा मैने भी इस बीच हस्ताक्षेप किया____"दूसरी बात, आपको क्या लगता है कि मैं ये सब अपने हक़ को पाने के लिए कर रहा हूॅ?? नहीं चाचू, आप तो देख ही चुके हैं कि आज के समय में मैं अगर चाहूॅ तो इस पूरे गाॅव को एक पल में खरीद लूॅ। बात ज़मीन जायदाद या किसी प्रापर्टी की नहीं है बल्कि बात है अपने साथ हुए अन्याय की और अत्याचार की। सवाल उठता है कि आख़िर इन्हें किस चीज़ की कमी थी? दादा जी की ज़मीन जायदाद में तो उनके सभी बेटों का बराबर ही हक़ था। ज़मीनों में रात दिन खून पसीना बहा कर मेरे पिता जी ने एक मामूली से घर को इतनी बड़ी हवेली में तब्दील कर दिया। घर में हर सुख सुविधाएॅ हो गईं, यहाॅ तक कि मेरे ही पिता जी के खून पसीने की कमाई से इनके खुद के कारोबार की बुनियाद भी रखी गई। बदले में इन्होंने कभी कुछ दिया नहीं था और ना ही किसी ने इनसे कुछ पाने की आशा की थी कभी। अब सवाल ये उठता है कि ऐसी क्या वजह थी कि इन्होंने एक हॅसते खेलते परिवार को ख़ाक में मिला दिला? अगर इन्हें ज़मीन जायदाद की इतनी ही भूॅख थी तो खुल के कहते। मुझे पूरा यकीन है कि उस समय मेरे पिता जी इनकी भूॅख को शान्त करने की पूरी कोशिश करते। भले ही उन्हें अपने बीवी बच्चों को लेकर घर से निकल जाना पड़ता।"
"देखो तो।" अजय सिंह अंदर ही अंदर बुरी तरह भिन्ना गया था, बोला____"साला आज का छोकरा, कैसी भाषणबाज़ी कर रहा है। इसे तो इतनी भी तमीज़ नहीं है कि जब बड़े आपस में बात कर रहे हों तो बच्चों को बीच में नहीं बोलना चाहिए।"
"और जब बड़े ही पाप करने की हर सीमा लाॅघ जाएॅ तो उसका क्या?" सहसा रितू दीदी बोल पड़ीं____"इस लड़ाई में किसके साथ क्या होगा इस बात का फैंसला तो ऊपर वाला कर ही देगा। किन्तु यहाॅ पर मैं भी ये कहना चाहती हूॅ कि दुनियाॅ में ऐसा कौन सा बाप है जो अपनी ही बेटियों को अपने नीचे सुलाने का तसव्वुर भी करता हो? आप कहते हैं कि राज को तमीज़ नहीं है बात करने की। जबकि सच्चाई तो ये है कि तमीज़, मान मर्यादा, इज्ज़त इन सब चीज़ों का अगर किसी में हद से ज्यादा अभाव है तो वो सिर्फ और सिर्फ आप में है। इस जन्म में तो किसी तरह ये जीवन काटना ही होगा मुझे, क्योंकि मैने अपना ये जीवन अपने सच्चे भाई राज की सुरक्षा में अर्पण कर दिया है। किन्तु मरने के बाद ईश्वर से सिर्फ यही फरियाद करूॅगी कि किसी ग़रीब बाप की औलाद बना देना मगर आप जैसे किसी पापी की औलाद न बनाना।" कहते कहते रितू दीदी की ऑखें छलक पड़ी थीं, फिर वो अभय सिंह की तरफ देखते हुए बोलीं___"आपसे ये उम्मीद नहीं थी चाचू कि आप अपने बेटे के बेहतर इलाज़ के स्वार्थ में अपने इस नीच व घटिया भाई का साथ देंगे। इससे अच्छा तो यही होता कि आपका बेटा जीवन भर वैसा ही रहा आता।"
"तुम ठीक कहती हो रितू।" करुणा ने रोते हुए कहा___"मेरा बेटा ऐसे ही अच्छा है।
मुझे इसका कोई इलाज विलाज नहीं करवाना। इस नीच आदमी के पैसे का एक आना भी अपने बेटे पर नहीं लगाना चाहती मैं।" कहने के साथ ही करुणा ने अभय सिंह की तरफ देखा और फिर बोली____"कितना अभिमान था मुझे कि कम से कम मेरा पति अपने मॅझले भाई की तरह नेक दिल तो है। मगर आज आपने मेरे उस अभिमान को चकनाचूर कर दिया है अभय सिंह। किन्तु एक बात कान खोल कर सुन लो, ये मेरा बेटा है। मैं इसे खुद जान से मार देना पसंद करूॅगी मगर इस आदमी के पाप का पैसा इस पर नहीं लगाऊॅगी। और अगर आपने मुझे मजबूर किया तो देख लेना अच्छा नहीं होगा। मैं अपने बच्चों के साथ खुद ज़हर खा कर जान दे दूॅगी।"
"नहींऽऽऽ करुणा नहीं।" अभय सिंह पूरी शक्ति से चीख़ पड़ा, बुरी तरह तड़प कर बोला____"तुम ऐसा कुछ भी नहीं करोगी। मुझसे ग़लती हो गई करुणा, प्लीज मुझे माफ़ कर दो। मेरी मति मारी गई थी जो मैने इस आदमी के साथ ऐसा सौदा कर लिया।" कहने के साथ ही अभय सिंह गौरी की तरफ बढ़ा फिर बोला____"मुझे माफ़ कर दो भाभी। आपने मेरे लिए इतना कुछ किया और मेरी जानकारी के बिना भी मेरे बेटे के इलाज़ करवाने का सोचा, और मैं मूरख आप ही के साथ इतना बड़ा पाप कर बैठा। हे भगवान! तू मुझे इस सबके लिए माफ़ न करना।"
अभय सिंह को इस तरह पलटी खाते देख अजय सिंह भौचक्का सा रह गया। किन्तु फिर जल्द ही सम्हल भी गया वह। कदाचित उसे अंदेशा था कि अभय सिंह अपनी बातों से मुकर जाएगा। अतः उसने फौरन ही सहाय की तरफ देखते हुए कहा____"इस नामुराद को फौरन रस्सियों में बाॅधो सहाय। मुझे पता था ये अपनी बात पर कायम नहीं रह पाएगा। शायद इसका भी इन लोगों के साथ ही मरना लिखा है तो यही सही।"
अजय सिंह की बात सुन कर सहाय फौरन ही हरकत में आया। उसने अपने आदमियों को भी इशारा किया और खुद भी अभय सिंह की तरफ लपका। उधर अजय सिंह की ये बात अभय सिंह के भी कानों में पड़ चुकी थी। जैसे ही सहाय उसके पीछे पहुॅचा वैसे ही अभय सिंह तेज़ी से पलटा और पलक झपकते ही उसने एक हाथ से सहाय को उसकी गर्दन से पकड़ कर अपनी बाहों में कसा और दूसरे हाथ में लिए रिवाल्वर को उसकी कनपटी पर रख दिया।
अजय सिंह ये देख कर हक्का बक्का रह गया। उसे समझ न आया कि अभय सिंह के पास रिवाल्वर कहाॅ से और कब आ गया? उधर अभय सिंह के बंधनों में जकड़ा अभिजीत सहाय उससे छूटने के लिए छटपटाए जा रहा था।
"अपने आदमियों से कह सहाय।" अभय सिंह ने खतरनाक भाव से कहा___"कि ये सब अपने अपने हथियार फेंक दें और फिर इन सब को रस्सियों के बंधन से मुक्त कर दें। वरना तेरा काम तमाम करने में मुझे ज़रा भी समय नहीं लगेगा।"
"फ..फेंक दो।" मौत के डर से थरथराता हुआ सहाय एकदम से चीखा____"अपने अपने हथियार फेंक दो और वही करो जो इसने कहा है।"
"कोई भी अपने हथियार नहीं फेंकेगा सहाय।" अजय सिंह ने कहा___"और हाॅ डरो मत। ये तुम्हें कुछ नहीं करेगा।
"
"मैं मरना नहीं चाहता ठाकुर साहब।" सहाय बुरी तरह छटपटाते हुए बोला___"इस आदमी का लहजा बता रहा है कि ये इस वक्त कुछ भी कर सकता है। हाॅ ठाकुर साहब अगर मैने अपने आदमियों को हथियार फेंकने के लिए नहीं कहा तो ये मुझे खत्म कर देगा।"
"बड़े भइया।" अभय सिंह गुर्राया____"आजमाने की कोशिश मत करो। समय की नज़ाकत को देख कर काम करो। और हाॅ एक बात याद रखो, मुझे मरने का कोई डर नहीं है। अब तो बस हर जगह मुझे मौत ही मौत दिखाई दे रही है। इस लिए अगर भलाई चाहते हो तो वही करो जो मैने कहा है।"
अजय सिंह अपने छोटे भाई के गुस्से से भलीभाॅति परिचित था। इस लिए उसने उसका कहा मानने में ही अपनी भलाई समझी। वो देख रहा था कि इस वक्य अभय सिंह सहाय को अपने आगे किये हुए है और हर तरफ उसकी पैनी नज़र है। छोटी सी एक ग़लती सहाय का भेजा उड़ा सकती थी और सहाय के मर जाने से उसके आदमी उसका कोई आदेश नहीं मानेंगे।
बहुत ही मजबूर व लाचार भाव से अजय सिंह ने एक बार सबकी तरफ देखा उसके बाद उसने सभी गनमैनों की तरफ देखते हुए हाॅ में अपने सिर को हिलाया। प्रतिमा व शिवा ये सब देख कर बुरी तरह आतंकित से नज़र आने लगे थे। ख़ैर अजय सिंह के इशारे से सभी गनमैनों ने अपने हथियार फेंक दिये।
"अब इन सबके बंधनों को भी खोलो।" अभय सिंह ने गनमैनों को हुक्म सा दिया।
अजय सिंह का दिमाग़ बड़ी तेज़ी से दौड़ रहा था। वो जानता था कि ऐसे में वह जीती हुई बाज़ी हार जाएगा। अतः वह कोई न कोई जुगत लगाने में लगा हुआ था। उधर अभय सिंह के कहने पर कुछ गनमैन आगे बढ़े और सबके बंधनों को खोलने लगे।
अभय सिंह पूरी तरह सतर्क था। वह सहाय की कनपटी पर रिवाल्वर सटाए हर तरफ देख रहा था। किन्तु ज्यादा देर तक उसकी सतर्कता उसके काम न आ सकी। अचानक ही एक तरफ से धाॅय की आवाज़ हुई थी और फिर अभय सिंह के हलक से दर्द में डूबी चीख़ निकल गई। रिवाल्वर की गोली सीधा उसके कान को छू कर गुज़र गई थी। गर्म गर्म शोला कान की लौ को मानो भीषण तपिश देकर गुज़रा था। जिसका असर ये हुआ कि अभय सिंह छिटक कर दूर हट गया था। रिवाल्वर जाने कब उसके हाॅथ से निकल गया था। सहाय उसकी गिरफ्त से छूटते ही एक तरफ को सरपट भागा था।
इधर अभय सिंह के साथ हुए इस हादसे ने अजय सिंह के पलड़े को पुनः मजबूत करने की राह पकड़ ली। सबके बंधनों को छुड़ाने में लगे गनमैन इस हादसे के होते ही फौरन अपनी अपनी गन्स की तरफ लपके। उधर आदित्य, रितू, मैं और पवन जल्दी जल्दी अपने बंधन खोलते जा रहे थे। दरअसल जो गनमैन हमारे बंधनों को खोल रहे थे वो इस हादसे के होते ही उसे वैसी ही हालत में छोंड़ कर अपने अपने हथियारों की तरफ दौड़ पड़े थे।
उधर अभय सिंह जब तक खुद को सम्हालता अजय सिंह उसके पास पहुॅच चुका था। उसने ज़ोर की लात अभय सिंह के पेट में मारी। अभय सिंह लहराता हुआ दूर जा कर गिरा।
अजय सिंह इस वक्त हिंसक जानवर की तरह लग रहा था। अफरा तफरी के माहौल को देख कर शिवा का भी दिमाग़ चल गया। वह फौरन ही इधर उधर देखने लगा। तत्काल ही उसकी नज़र सोनम पर पड़ी। वह तेज़ी से उसकी तरफ बढ़ा। सोनम के पास पहुॅच कर उसने बेख़ौफ होकर उसकी दाहिनी कलाई को पकड़ लिया फिर बोला___"आओ मेरी जान। हम भी अपना प्रोग्राम बनाते हैं। सोचा था कि दिल की बात मान कर इस सबसे तौबा कर लूॅगा। मगर कदाचित ये मेरी किस्मत में ही नहीं है।"
"छोंड़ दे मुझे।" सोनम ने अपनी कलाई को उससे छुड़ाते हुए कहा____"तेरे जैसा घटियाॅ इंसान तो सारे संसार में भी न होगा। अपनी ही बहन के बारे में इतना गंदा सोचने में तुझे ज़रा भी शर्म नहीं आती।"
"यही तो बात है सोनम।" शिवा अपने से बड़ी ऊम्र की बहन को पूरी ढिठाई से उसके नाम से संबोधित करते हुए कहा___"जब मुझे पता चला कि मुझे तुमसे प्यार हो गया है तो मैने भी सोचा चलो अच्छा ही हुआ। दुनियाॅ की एक हसींन लड़की से अगर मेरी शादी हो जाएगी तो मेरा जीवन धन्य हो जाएगा। मगर जल्द ही समझ में आ गया कि प्यार मोहब्बत साली होती ही उसी से है जो हमें कभी मिलने वाला नहीं होता। मुझे लगा यार इससे अच्छा तो वही था जबकि मैं सिर्फ रासलीला से ही खुश रहता था।"
"मुझे तेरी ये बकवास नहीं सुननी कमीने।" सोनम ने गुस्से में कहा____"मैं कहती हूॅ छोंड़ दे मेरा हाॅथ वरना तेरे लिए अच्छा नहीं होगा।"
"पर अगर तुम चाहो तो मैं अब भी बदल सकता हूॅ।" शिवा ने उसकी बात पर ध्यान दिये बिना ही बोला___"हाॅ सोनम, तुम मेरी मोहब्बत को स्वीकार कर लो और मुझसे शादी कर लो। हलाॅकि मैं जानता हूॅ कि हम दोनो के माॅ बाप इस रिश्ते के लिए एग्री नहीं होंगे। इस लिए हम कहीं दूर चले जाएॅगे। वहीं कहीं एक नया संसार बसाएॅगे। मैने तो सबकुछ सोच भी लिया है सोनम। तुम किसी भी बात की चिन्ता मत करो। धन दौलत बहुत है, उसी में हम जीवन भर ऐश करेंगे। क्या कहती हो...आहहहहह।"
अभी शिवा का वाक्य पूरा ही हुआ था कि तभी उसके गाल पर झन्नाटेदार थप्पड़ पड़ा था। उसके कान एकदम से झनझना कर रह गए थे। अपने गाल को सहलाता हुआ शिवा जब सीधा हुआ तो उसकी नज़र विराज पर पड़ी। विराज को देखते ही उसकी नानी मर गई।
"इससे बेहतर मौका नहीं मिलेगा बेटा।" मैने उसकी ऑखों में झाॅकते हुए कहा___"सुना है मुझसे दो दो हाॅथ करने के लिए बड़ा फुदकता था तू। अब आ गया हूॅ सामने तो हो जाए दो दो हाॅथ? क्या कहता है?"
"सब वक्त वक्त की बातें हैं भाई।" शिवा ने सहसा फीकी सी मुस्कान के साथ कहा____"हो सकता है कि मैं पहले भी तुमसे दो दो हाॅथ करने के काबिल न रहा होऊॅ किन्तु फिर भी दो दो हाॅथ करने की हिमाकत ज़रूर करता मगर अब वो बात नहीं रह गई।"
"क्यों क्या हुआ?" मैने मुस्कुरा कर कहा___"शेर का सामना होते ही सारी हेकड़ी निकल गई?"
"हेकड़ी तो अभी भी है भाई।
" शिवा ने कहा___"मगर जैसा कि मैने कहा न कि अब वो बात नहीं रह गई। अब तो बस बात ये है कि किसी से इश्क़ हुआ और हम खुद ही मर गए। अब अगर तुम एक मरे हुए को मारना चाहते हो तो ठीक है लो हाज़िर हूॅ, जो जी में आए कर लो। वादा करता हूॅ कि उफ्फ तक नहीं करूॅगा।"
शिवा की ये बात सुन कर मैं बुरी तरह हैरान रह गया। मुझे समझ न आया कि ये बद्जात बोल क्या रहा है। जबकि मेरी उलझन को देखते हुए सोनम दीदी ने कहा___"ये कमीना कहता है कि ये मुझसे प्यार करता है और अब शादी भी करना चाहता है।"
"क्याऽऽऽ?????" सोनम दीदी की बात सुन कर मैं बुरी तरह उछल पड़ा। आश्चर्य से शिवा की तरफ देखते हुए बोला___"आख़िर गंदा खून कर भी क्या सकता है? जिसका बाप हमेशा अपने ही घर की बहू बेटियों पर नीयत ख़राब करता रहा हो उसका बेटा भला कैसे दूध का धुला हुआ हो जाएगा?"
"इस बारे में बात करने का कोई फायदा नहीं है भाई।" शिवा ने कहा___"क्योंकि इश्क़ जब किसी के सिर चढ़ जाता है न तो फिर उसे ब्रम्हा भी नहीं समझा सकता। अतः तुम इस चक्कर में मत पड़ो। बल्कि उस चक्कर में पड़ो जिसके लिए तुम्हें पड़ना चाहिए। इस वक्त तुम खुद के साथ साथ अपने लोगों की जान की फिक्र करो। एक बात और, मेरी तरफ से बेफिक्र रहना।"
शिवा ने इतना कहा और फिर बड़े ही करुण भाव से सोनम की तरफ देखा। उसके बाद वह एक पल के लिए भी उस जगह नहीं रुका। मैं उसकी इस विचित्र सी हरकत से तथा उसकी बातों से बुरी तरह चकित था। तभी वातावरण में गोलियाॅ चलने की आवाज़ें आने लगी। मैं एकदम से फिरकिनी की मानिंद घूमा।
आदित्य, रितू दीदी व पवन के हाॅथों में गनें थी और वो अधाधुंध गोलियाॅ बरसाए जा रहे थे। पवन का तो निशाना ही नहीं लग रहा था। ये देख कर मैं मुस्कुराया। साले ने जीवन में कभी खिलौने का तमंचा तक न देखा था और आज दोस्ती के लिए गन लिए मौत का ताण्डव कर रहा था। मैने चारो तरफ देखा, मुझे औरतों में कहीं कोई दिखाई न दिया। ये देख कर मैं बुरी तरह चौंक गया। मन में सवाल उभरा कि ये सब कहाॅ गईं? कहीं किसी को कुछ हो तो नहीं गया। मैं सोनम दीदी को छोंड़ कर एक तरफ को भागा।
रितू दीदी, आदित्य व पवन पेड़ों की ओट में पोजीशन लिए हुए थे। अजय सिंह, प्रतिमा, अभय चाचा, व सहाय कहीं दिख नहीं रहे थे। संभव है उन्होंने भी किसी पेड़ की ओट में पोजीशन लिया हुआ था। मैं छिपते छिपाते हुए फार्महाउस की इमारत के पिछले भाग में आ गया। यहाॅ आ कर मैने चारों तरफ देखा। कहीं कोई नहीं था। नीचे ज़मीन पर मरे हुए गनमैन अपने ही खून में नहाए पड़े थे।
माॅ लोगों को कहीं न देख कर मैं बहुत ज्यादा चिंतित व परेशान हो गया। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ये सब इतना जल्दी कहाॅ चले गए? मैं इमारत के पिछले भाग से निकल कर सामने की तरफ आया ही था कि तभी धाॅय की आवाज़ हुई। कहीं से गोली चली थी जो कि मेरे दाहिने बाजू को छू कर निकल गई थी।
मैं इस सबसे बेखबर सा हो गया था। मेरे ज़हन में सिर्फ माॅ लोगों का ही ख़याल तारी था।
गोली की आवाज़ से तथा अपनी बाजू में उसकी छुवन से मैं बुरी तरह उछल पड़ा था और इसी उछलाहट में मैं फौरन ही एक पेड़ की ओट में आ गया। ओट से सिर निकाल कर मैंने आस पास का बारीकी से मुआयना किया। तभी मेरे कानों में इमारत के अंदर से कुछ लोगों की आवाज़ सुनाई दी। मैं आवाज़ों को सुनने के लिए ग़ौर से ध्यान लगाया। तभी मेरे कानों में मेरी माॅ की आवाज़ पड़ी। वो कह रही थी____"मुझे बाहर जाने दो। वहाॅ मेरा बेटा गोलियों के बीच में खड़ा है और तुम सब कहती हो कि मैं यहीं पर रहूॅ। अरे मेरे बेटे को कुछ हो गया तो मेरे ज़िन्दा रहने का क्या मतलब रह जाएगा?"
मैं सब समझ गया। मतलब माॅ लोग सब इमारत के अंदर हैं और शायद सुरक्षित भी हैं। वरना वो ऐसी बात उन लोगों को न कहतीं। ये सोच कर मैं फौरन ही जम्प मार कर दूसरे पेड़ की तरफ भागा। मेरे ऐसा करते ही एकदम से गोलियों की आवाज़ें आने लगीं। किसी तरह बचते बचते मैं आदित्य के पास पहुॅच ही गया। आदित्य ने मुझे देखा तो इशारे से ही पूछा बाॅकी सब कैसे हैं? तो मैने बताया सब ठीक हैं।
अभी मैं आदित्य को इशारे से ये बताया ही था कि तभी सोनम दीदी की चीख़ गूज उठी। ऐसा लगा जैसे उन्हें कोई मार रहा हो। मैने फौरन ही उस तरफ देखने की कोशिश की। बाॅई तरफ अजय सिंह सोनम दीदी को उनके सिर के बालों से पकड़े घसीटते हुए लिए आ रहे थे। उनके एक हाॅथ में रिवाल्वर भी था। ये देख कर मैं सकते में आ गया।
"अगर इस लड़की को ज़िन्दा देखना चाहते हो तो तुम सब सामने आ जाओ।" अजय सिंह की आवाज़ गूॅजी___"और हाॅ अपने अपने हथियार फेंक कर ही आना, वरना मैं इस लड़की को गोली मार दूॅगा।"
अजय सिंह की इस धमकी पर हम में से कोई कुछ न बोला। कुछ पलों तक अजय सिंह इधर उधर देखते हुए खड़ा रहा। उसके बाद फिर बोला___"मैं सिर्फ तीन तक गिनूॅगा। अगर मेरे तीन गिनने तक तुम लोग मेरे सामने नहीं आए तो समझ लो ये लड़की अपनी जिंदगी से हाॅथ धो बैठेगी।"
अजय सिंह ने गिनना शुरू कर दिया। पेड़ों की ओट में छुपे हम सब को बाहर निकलना अब अनिवार्य था। अजय सिंह ने जैसे ही तीन कहा हम सब उसके सामने आ गए। हम लोगों को देख कर अजय सिंह मुस्कुराया किन्तु फिर एकाएक ही उसके चेहरे के भाव खतरनाॅक रूप से बदले। उसने रिवाल्वर वाला हाॅथ उठाया और बिना कुछ कहे फायर कर दिया। गोली सीधा रितू दीदी के पेट में लगी। फिज़ा में रितू दीदी की हृदयविदारक चीख़ गूॅज गई।
अजय सिंह से अचानक इस कृत्य की कल्पना हम में से किसी ने न की थी। उधर पेट में गोली लगते ही रितू दीदी कटे हुए वृक्ष की तरह लहरा कर वहीं ज़मीन पर गिरने लगी। मैं बिजली की सी तेज़ी से उनकी तरफ लपका। रितू दीदी को बाॅहों में सम्हाले मैं बुरी तरह रोते हुए चीखने लगा। वो मेरी बाॅहों में थीं।
उनके चेहरे पर पीड़ा के असहनीय भाव थे किन्तु ऑखें मुझ पर स्थिर थीं।
"दीदी, ये क्या हो गया दीदी?" मैं उन्हें सम्हालते हुए वहीं ज़मीन पर उकड़ू सा बैठ गया____"नहीं नहीं, आपको कुछ नहीं हो सकता।"
"अभी जंग खत्म नहीं हुई पगले।" रितू दीदी ने पीड़ित भाव से कहा____"अभी तो इस धरती पर वो इंसान जीवित है जिसने अपना आख़िरी सबूत ये दे दिया है कि उसके दिल में किसी के लिए भी कोई रहम अथवा प्यार नहीं है। ऐसे इंसान को जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है।"
"मैं उसे ज़िंदा नहीं छोंड़ूॅगा दीदी।" मैने सिसकते हुए कहा___"बस आप को कुछ नहीं होना चाहिए। मैं आपको खोना नहीं चाहता।"
"होनी को कौन टाल सकता है राज?" दीदी ने सहसा मेरे चेहरे को एक हाॅथ से सहलाते हुए कहा___"बड़ी आरज़ू थी कि जीवन भर तेरे साथ रहूॅगी। तुझे खुद से दूर नहीं जाने दूॅगी। मगर देख ले, आज खुद ही तुझसे दूर जा रही हूॅ।"
"नहीं नहीं।" मैने उन्हें खुद से छुपका लिया और बुरी तरह रोते हुए बोला___"आप कहीं नहीं जा रही हैं। मैं आपको कहीं जाने भी नहीं दूॅगा। मुझे मेरी दीदी सही सलामत चाहिए। मैं आपके बिना जी नहीं पाऊॅगा।"
"इतना प्यार मत दिखा राज।" रितू दीदी की आवाज़ लड़खड़ा गई____"वरना मरने के बाद भी मुझे शान्ति नहीं मिलेगी। ख़ैर, अभी तू जा मेरे भाई। वरना वो राक्षस फिर किसी को गोली मार देगा। देख तुझे मेरी कसम है, तू जा राज।"
दीदी की कसम ने मुझे मजबूर कर दिया। मैं भारी मन से उन्हें वहीं पर छोंड़ कर पलटा। इधर रितू के साथ हुए इस हादसे ने आदित्य पवन व अभय चाचा को भी अचेत सा कर दिया था। वो सब ठगे से ऑखें फाड़े देखे जा रहे थे।
"अपनी ज़िद व अपने अहंकार में किस किस को मारोगे अजय?" सहसा इस बीच प्रतिमा ने अजय सिंह की तरफ देखते हुए बेहद ही करुण भाव से रोते हुए कहा___"उस दिन भी तुमने नीलम को जान से मार ही दिया था और आज एक और बेटी को जान से मार दिया। आख़िर किस किस को जान से मारोगे तुम? ये दौलत ये ज़मीन जायदाद किसके भोगने के लिए बनाई है तुमने? मुझे भी मार दो, अपनी ऑखों के सामने अपनी बेटियों को इस तरह मरते देख कर भला कैसे चैन से जी पाऊॅगी मैं?"
"ये मेरी कोई नहीं लगती प्रतिमा।" अजय सिंह गुर्राया___"अगर लगती तो आज ये अपने बाप के साथ खड़ी होती ना कि अपने बाप के दुश्मनों के साथ।"
"तो क्या ग़लत किया इन्होंने?" प्रतिमा ने बिफरे हुए लहजे से कहा___"अरे इन लोगों ने तो वही किया जो हर लड़की को करना चाहिए। अपने इज्ज़त और सम्मान की रक्षा करना हर लड़की या औरत का धर्म है। तुम तो उसके बाप हो न, तुम्हें तो खुद अपने घर की इज्ज़त की हर तरह से रक्षा करना चाहिए थी। मगर तुम तो खुद ही अपनी ही बहू बहन व बेटियों की अस्मत को लूटने वाले बन गए।
"
"ये तुम कौन सी भाषा बोल रही हो प्रतिमा?" अजय सिंह की ऑखें फैली____"आज तुम्हारे मुख से ऐसी बातें कैसे निकलने लगीं? क्या सब कुछ भूल गई हो तुम? तुम तो खुद भी उतनी ही गुनहगार हो जितना कि तुम इस वक्त मुझे समझ रही हो। इस लिए ऐसी बात मत करो, क्योंकि ये सब तुम पर शोभा नहीं देती हैं।"
"मैं मानती हूॅ कि मैं इस सबमें बराबर की गुनहगार हूॅ अजय।" प्रतिमा ने कहा___"मगर ये भी एक सच है कि इस सबके लिए भी सिर्फ तुम ही जिम्मेदार हो। मैं तो तुमसे अंधाधुंध प्यार ही करती थी। किन्तु अपने मतलब के लिए तुमने ही मुझे ऐसे काम को करने के लिए प्रेरित किया था। तुम्हारे प्यार में अच्छा बुरा ऊॅच नीच कभी नहीं सोचा मैने। सिर्फ यही सोचा कि मेरे किसी भी काम से सिर्फ तुम खुश रहो। मगर अब ये जो कुछ भी हो रहा है उसने मुझे इस बात का एहसास करा दिया है कि तुमने कभी मुझे प्यार किया ही नहीं था। तुम्हें तो सिर्फ खुद से और अपनी ख़्वाहिशों से ही प्यार था। अगर ऐसा न होता तो आज तुम इस तरह अपनों के दुश्मन न बन गए होते और ना ही इस तरह क्रूरता से अपनी ही बेटियों को जान से मार देने का सोचते। ख़ैर, देर से ही सही मगर मैं ये स्वीकार कर चुकी हूॅ कि मैंने तुम्हारे प्यार के चलते सबके साथ ऐसा गुनाह व पाप किया है जो कदाचित माफ़ी के लायक हो ही नहीं सकता है। मुझे भी किसी से माफ़ी की इच्छा नहीं है। इतना कुछ होने के बाद तो वैसे भी अब जीने का दिल नहीं करता। मेरा वजूद इतना घिनौना हो चुका है कि दुनिया का गिरा से गिरा हुआ इंसान भी कदाचित मेरी तरफ देखना भी पसंद न करे। किन्तु सुना है पश्चाताप करने से और नेक काम करने से मन को शान्ति मिलती है। इसी लिए मैने पश्चाताप के रूप में वो किया जो मुझे बहुत पहले करना चाहिए था।"
"क्या मतलब???" अजय सिंह चौंका____"क..क्या किया है तुमने?"
"अब तक तो दिमाग़ पर दिल ही हावी था अजय।" प्रतिमा ने कहा___"मगर जब दिल ही टूट कर बिखर गया तो दिमाग़ का ज़ोर पड़ ही गया उस पर। उस शाम जब तुम फोन पर अभय से बातें कर रहे थे तब मैने भी ड्राइंग रूम में रखे फोन पर तुम दोनो की बातें सुनी थी। तुम तो जानते हो कि वो दोनो ही फोन एक ही हैं। अगर एक पर किसी का फोन आएगा तो उस दूसरे फोन के माध्यम से भी दूसरा ब्यक्ति पहले वाले फोन पर हो रही बातचीत को बड़े आराम से सुन सकता है। ख़ैर तुम दोनो की बातें सुनी मैने और तब मुझे पूरी तरह समझ आ गया कि सारी ज़िंदगी तुम्हारे लिए अपना सब कुछ लुटाने वाली मैं कितनी पापिन थी जो कभी तुम्हारी खुशियों के सिवा किसी और पर होते अत्याचार को न देख सकी थी। तुमने अभय को विश्वास दिलाया कि तुम उसके बेटे का बेहतर इलाज़ करवाओगे और ज़मीन जायदाद में आधा हिस्सा भी दोगे। बदले में तुम्हें तुम्हारा वो ग़ैर कानूनी सामान व विराज के सभी चाहने वाले अपने पास चाहिए।
अभय तो अपने बेटे के लिए अपना विवेक खो कर यकीन के साथ तुमसे इतना बड़ा सौदा कर बैठा जबकि मैं जानती थी कि तुम वैसा कभी नहीं करोगे जिस बात के लिए तुमने अभय को विश्वास दिलाया था। अपना मतलब निकल जाने के बाद तुम वही करोगे जो सबके साथ करना चाहते हो। मैं हैरान थी कि पढ़ा लिखा अभय इतनी बड़ी बेवकूफी व अपनों के साथ सिर्फ अपने बेटे के बारे में सोच कर इतना बड़ा विश्वासघात कैसे कर सकता है? लेकिन जल्द ही मुझे समझ आया कि भाई किसका है। मेरे दिमाग़ में ये बात भी आई कि संभव है कि अभय ने कोई दूर की कौड़ी सोची हुई है। कहने का मतलब ये कि इस जंग में अगर तुम्हारे साथ साथ मैं व हमारा बेटा मारे गए या कानून की चपेट में आ गए तो ये विराज को भी किसी तरह अपने रास्ते से हटा देगा। उस सूरत में सारी ज़मीन जायदाद का ये अकेला हक़दार हो जाएगा। ये सब बातें सोच कर मुझे एहसास हुआ कि जिसने इस सारी ज़मीन जायदाद को हीरे की शक्ल दी तथा जिसका कहीं कोई कसूर ही नहीं था उसे उसके भाई ने तो पहले ही मिटा दिया था और अब एक और भाई आ गया उसी इतिहास को दोहराने के लिए। मुझे पहली बार गौरी के बारे में सोच कर उस पर तरस आया। एकाएक ही मेरा हृदय झनझना उठा। अंदर कहीं से कोई बड़े ज़ोर से चीख कर कहा 'इस बेचारी ने ऐसा कौन सा पाप किया था जिसकी वजह से इसके साथ इतना कुछ हो गया?' इंसान को बदलने के लिए सिर्फ एक ही मामूली सी चीज़ काफी होती है। अगर हम किसी के बारे में एक बार इस तरह से सोच लें तो फिर बहुत मुमकिन है कि फिर हमें उसकी अथवा अपनी वास्तविकता का बोध होने लगता है। वही हुआ मेरे साथ। हृदय परिवर्तन तो अपनी बेटी के साथ हुए हादसे से ही होने लगा था किन्तु उस फोन की वजह से पूरी तरह से ही हो गया। सारी बातों को सोचने के बाद मैने फैंसला कर लिया कि अब वो नहीं होंने दूॅगी जिसके लिए तुमने एक हॅसते खेलते परिवार की बलि चढ़ाई थी। हाॅ अजय, जैसे अभय ने अपने स्वार्थ के लिए अपनों के साथ विश्वासघात कर तुमसे वो सौदा किया उसी तरह मैने भी एक फोन किया।"
"क्या मतलब??" अजय सिंह बुरी तरह चौंका___"कैसा फोन किया तुमने?"
"मेरे पास विराज का नंबर नहीं था।" प्रतिमा ने कहा___"और मेरी बेटी मेरा फोन उठाती ही नहीं थी। तब मैने सीधा पुलिस कमिश्नर को फोन किया। पुलिस कमिश्नर को इस लिए क्योंकि मौजूदा वक्त में जो कुछ भी हुआ उससे ये बात साबित हो चुकी थी कि रितू अपने पुलिस महकमें की सह पर ही वो सब कर रही थी। हलाॅकि मैं पूरी तरह श्योर नहीं थी। किन्तु फिर भी मैने एक बार कमिश्नर से बात करने का ही सोचा और फिर उन्हें फोन लगाया। फोन पर मैने कमिश्नर से साफ साफ शब्दों में बता दिया कि सिचुएशन क्या है। उसके बाद मैंने उनसे कहा कि मुझे एक बार विराज से बात करना है।
उन्होंने मेरी बातों को बारीकी से सोचा समझा और फिर रितू को फोन किया और उससे विराज का नंबर लेकर मुझे दिया।"
"उस वक्त मैं और आदित्य बाहर घूमने गए थे जब मेरे फोन पर बड़ी माॅ का फोन आया था।" बड़ी माॅ की बात खत्म होते ही मैने तुरंत कहा___"इन्होंने मुझे फोन पर सारी बातें बता दी। हलाॅकि मुझे शुरू शुरू में इनकी बात पर ज़रा भी यकीन न हुआ। क्योंकि मैं सोच ही नहीं सकता था कि अभय चाचा हमारे साथ ऐसा कर सकते हैं। तब इन्होंने कहा कि ये अपनी बातों का सबूत तो नहीं दे सकती हैं मगर मैं खुद इस बात की जाॅच पड़ताल तो कर ही सकता हूॅ। दूसरी बात मुझे भी कहीं न कहीं लग रहा था कि अपनी बेटी के साथ हुए हादसे के चलते बड़ी माॅ में कुछ तो परिवर्तन आना ही चाहिए था। ख़ैर, इनकी ख़बर के बाद मैने भी वहाॅ पर रितू दीदी आदि को सब कुछ बता दिया और रात में ये सब होने का इंतज़ार करने के लिए कह दिया। वहीं मैने मुम्बई में भी पवन को फोन कर दिया था। उसे मैने समझाया था कि वो इस बारे में किसी से कुछ न कहे किन्तु अगर बड़े पापा का फोन उसके पास आए तो वो फोन का स्पीकर ऑन करके ज़रूर सबको इनकी बात सुनाए। क्योंकि उसके बाद तो उन्हें यहाॅ आना ही था। मैं भी अब खुल के इनके सामने आना चाहता था। किन्तु ये सब बहुत ही ज्यादा खतरनाक भी था। क्योंकि इससे किसी को भी कुछ भी हो सकता था। ख़ैर रितू दीदी ने कमिश्नर से बात की और उन्हें सारी बातों से अवगत कराया और पुलिस प्रोटेक्शन की माॅग भी की। कमिश्नर ने हमें बेफिक्र रहने को कहा। कल रात जब आप अपने दलबल के साथ हमारे ठिकाने पर पहुॅचे तब हम सब जाग रहे थे। आप ये समझ रहे हैं कि आप बड़ी आसानी से हम सबको बेहोश कर यहाॅ ले आए जबकि सच्चाई तो यही है कि आपका काम हमने खुद आसान किया था। वरना आप ही सोचिए कि ऐसे आलम में इतने लापरवाह हम कैसे हो जाएॅगे कि कोई आए और हम सबको बड़ी सहजता से बेहोश करके अपने साथ जहाॅ चाहे ले जाए। जबकि मैं चाहता तो उसी वक्त आप और आपके सभी आदमी मौत के घाट उतर चुके होते। मगर मैने अपने दोस्त शेखर के मौसा जी को उस रात वहाॅ पर सिक्योरिटी रखने से मना कर दिया था। उसके बाद क्या हुआ वो तो आप अच्छी तरह जानते ही हैं।"
"चलो अच्छा हुआ कि तुमने खुद ही ये सब बता दिया।" अजय सिंह ने भभकते हुए लहजे से कहने के साथ ही बड़ी माॅ की तरफ देखा___"पर तुमने ये सब करके अच्छा नहीं किया प्रतिमा और इसके लिए तुम्हें मौत से कम सज़ा तो हर्गिज़ भी नहीं मिल सकती।"
"कितनी आश्चर्य की बात है न अजय।" प्रतिमा ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"इतना कुछ होने के बाद भी तुम्हारा हृदय परिवर्तन नहीं हुआ। तुम्हें ज़रा भी एहसास नहीं हुआ कि ये जो कुछ भी तुमने किया है वो कितना ग़लत था। बल्कि अभी भी तुम वही सब करने पर आमादा हो जिसका नतीजा तुम्हारे लिए किसी भी सूरत में अच्छा नहीं हो सकता।
आज तुम्हारी इस हालत को देख कर सचमुच मुझे तरस आ रहा है। आज मैं ये सोचने पर मजबूर हूॅ कि पच्चीस साल पहले मैने तुममे ऐसा क्या देखा था कि तुमसे इस क़दर प्यार कर बैठी थी? तुम किसी के नहीं हो सकते अजय, तुम अकेले ही ऐसी मौत मरोगे जिसकी लाश पर कीड़े पड़ेंगे।"
"हरामज़ादी कुतिया।" गुस्से में तिलमिलाए हुए अजय सिंह ने बड़ी तेज़ी से अपने रिवाल्वर वाले हाॅथ को ऊपर हवा में उठाया और फिर___धाॅय।
प्रतिमा के सबसे क़रीब अभय सिंह ही था। माहौल की नज़ाकत का जैसे उसे बखूबी एहसास था तभी तो उन्होंने गोली के चलते ही जम्प लगाई थी। किन्तु गोली की स्पीड ने अपना काम तमाम करने में कोई कसर न छोंड़ी थी। प्रतिमा को बचाने के चक्कर में गोली अभय सिंह के कंधे पर जा लगी थी। फिज़ा में अभय सिंह की दर्द से डूबी चीख़ निकल गई थी। अभय सिंह प्रतिमा को लिए ज़मीन पर उलटता चला गया था।
इधर इस नज़ारे को देख कर मैने भी अजय सिंह पर जम्प लगाई थी। मगर मेरे जम्प लगाने से पहले ही उसने एक और फायर कर दिया था। जिसका नतीजा ये हुआ कि इस बार गोली अभय सिंह के पेट में लगी थी। उस वक्त वो जल्दी से उठने की कोशिश कर रहा था तभी गोली आकर उसके पेट में लग गई थी। एक साथ कई चीखें फिज़ा में गूॅज गई थी। इधर तीसरा फायर करने से पहले ही मैं अजय सिंह के ऊपर आ गिरा था। इस गुत्थम गुत्था में सोनम दीदी भी लोट पोट हो गई थीं। अजय सिंह की पकड़ से छूटते ही सोनम दीदी अभय सिंह व प्रतिमा की तरफ चिल्लाते हुए दौड़ पड़ी थी।
इधर मैने अजय सिंह के उस हाॅथ में एक कराट मारी जिसमें वो रिवाल्वर लिये हुए था। कराट लगते ही अजय सिंह के हाॅथ से रिवाल्वर छूट कर गिर गया। मैने उस पर लात घूॅसों की बरसात कर दी। अजय सिंह हलाल होते बकरे की तरह चिल्लाने लगा। वह खुद भी हाॅथ पैर चला रहा था किन्तु सब ब्यर्थ। मैं उसके ऊपर से उठा और फिर उसे उठा कर पूरी ताकत से दूर फेंक दिया। हवा में लहराते हुए अजय सिंह दूर जा कर गिरा।
जहाॅ पर अजय सिंह गिरा था वहीं पर एक गन पड़ी थी। जिसे देख कर वह अपना हर दर्द भूल गया और झपट कर उसने उस गन को उठा लिया। तभी फिज़ा में पुलिस सायरन की आवाज़ गूॅजने लगी। अजय सिंह गन लेकर तुरंत पलटा और मेरी तरफ देखते हुए गन को ऊपर करने लगा। इससे पहले की वह गन का ट्रिगर दबा पाता कहीं से एक साथ दो फायर हुए। एक गोली सीधा अजय सिंह के सीने में दिल वाले स्थान पर लगी जबकि दूसरी उसके थोड़ा नीचे। पलक झपकते ही उन दोनो जगहों से खून की धार फूट पड़ी और अजय सिंह कटे हुए बृक्ष की भाॅति लहरा कर ज़मीन पर गिरा और फिर एकदम से शान्त पड़ गया।
फायर की आवाज़ से मैं बिजली की तरह पलटा था। अजय सिंह के दाहिनी तरफ कुछ ही दूरी पर शिवा रिवाल्वर लिए खड़ा था। उसके चेहरे पर अजीब से भाव थे। मैं उसे चकित भाव से देखे जा रहा था।
जबकि वह अपने बाप को मारने के बाद पलटा और मेरी तरफ देखते हुए बोला____"अपने हाॅथ इस पापी के खून से मत रॅगो भाई। इसे इससे बड़ी सज़ा और क्या मिलेगी कि इसने जिसे सबसे ज्यादा प्यार किया उसी ने इसकी साॅसें छीन ली। नफ़रत के इस पुजारी को मर ही जाना चाहिए था।"
"मगर तूने..।" मेरा वाक्य अधूरा रह गया।
"कुछ मत कहिए भाई।" शिवा की आवाज़ लड़खड़ा गई, बोला___"मैं नहीं जानता कि मुझसे ये सब कैसे हो गया। मगर अंदर से कोई कह रहा है कि बहुत अच्छा किया तुमने। माॅ बाप अपने बच्चों को अच्छे संस्कार व स्वावलम्बी बनने की सीख देते हैं मगर मेरे इस बाप ने तो मुझे अपनी ही तरह बनने की सीख दी। ख़ैर छोंड़िये भाई, मुझे भी अब खुशी हो रही है कि मैने आज कोई अच्छा काम किया है। ये नियति मैने खुद चुनी है। अपने बाप के कत्ल के इल्ज़ाम में या तो मुझे फाॅसी हो जाएगी या फिर ऊम्र कैद। किसी से बेपनाह इश्क़ भी हुआ मगर सिर्फ मुझे ऊम्र भर तड़पाने के लिए। मैने अपने इस छोटे से जीवन में ही इतने ऊॅचे दर्ज़े के पाप किये हैं जिसके लिए ईश्वर मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा।"
"ये तू कैसी बकवास कर रहा पगले?" उसकी बातें सुन मेरा गला रुॅध सा गया। जाने क्यों इस वक्त वो मुझे बहुत प्यारा सा लगा जिसके लिए मेरा दिल रोने लग गया था। हलाॅकि उसने भी अपने बाप की तरह हमें जलील करने में कोई कसर न छोंड़ी थी।
"जाइये भाई।" तभी शिवा ने कहा____"अब तो सब खेल खत्म हो गया है। पुलिस भी आ गई है और अब वो मुझे कानूनन फाॅसी के फंदे पर झुलाने के लिए यहाॅ से ले जाएगी। सबकी देख भाल करना भाई, और सबको ढेर सारी खुशियाॅ देना। एक नया संसार बनाइये और उसमें सबको खुश रखिये।"
अभी शिवा अपनी इन बातों से मुझे चकित ही किये था कि हर तरफ पुलिस के आदमी फैलते हुए आ गए। मेरी नज़र दूर से ही कमिश्नर पर पड़ी। मैने पलट कर देखा तो शिवा अपने बाप के मृत शरीर के पास ही अपने हाॅथ में रिवाल्वर लिए बैठ गया था। मतलब साफ था कि वो पुलिस को दिखाना चाहता था कि उसने खुद ही अपने बाप का खून किया है और अब पुलिस को उसे गिरफ्तार कर लेना चाहिए। बड़ी अजीब बात थी वो चाहता तो खुद को बचा भी सकता था। क्योंकि खून करते हुए पुलिस ने उसे देखा ही नहीं था और हम लोग ये बात पुलिस को बताने के बारे में सोच भी सकते थे या नहीं भी।
कमिश्नर जब शिवा के पास पहुॅचा तो शिवा उसकी तरफ देख कर बोला___"अच्छा हुआ कि आप आ गए। आज इस पापी को इसके ही पापी बेटे ने मौत के घाट उतार दिया है। लीजिए अब मुझे गिरफ्तार कर लीजिए।"
शिवा की इस बात पर कमिश्नर बुरी तरह हैरान रह गया। किन्तु अपराधी जब खुद ही अपना गुनाह कबूल कर रहा था तो भला उन्हें क्या आपत्ति हो सकती थी? कमिश्नर ने अपने साथ आए एक एसआई को इशारा किया।
एसआई ने शिवा के हाॅथ से रिवाल्वर को रुमाल में लपेट कर लिया और फिर उसके दोनो हाॅथों में हॅथकड़ी डाल दी।
मैं दौड़ते हुए रितू दीदी के पास आया था। रितू दीदी को आदित्य अपनी गोंद में लिए बैठा था। रितू दीदी की साॅसें अभी चल रही थी। पवन अभय चाचा के पास चला गया था। जहाॅ पर प्रतिमा अभय की हालत को देख कर रो रही थी। अभय चाचा की हालत भी काफी ख़राब थी। उनका पूरा जिस्म उनके खून से नहाया हुआ था। प्रतिमा बार बार एक ही बात कह रही थी कि मुझे मर जाने दिया होता। मुझ पापिन को क्यों बचाया तुमने?
पुलिस सायरन की आवाज़ सुन कर इमारत के अंदर से बाॅकी सब लोग भी आ गए थे। यहाॅ का मंज़र देख कर सबकी चीख़ें निकल गई थी। माॅ ने जब मुझे सही सलामत देखा तो मुझे खुद से छुपका लिया और मेरे चेहरे पर हर जगह चूमने चाटने लगीं। मैने उन्हें खुद से अलग किया और बताया कि रितू दीदी व अभय चाचा को गोली लगी है। उन्हें जल्द ही हास्पिटल ले जाना पड़ेगा। मेरी बात सुन कर सब लोग रितू दीदी व अभय चाचा के पास आ गए।
रितू दीदी व अभय चाचा की हालत बहुत ख़राब थी। सब लोग रो रहे थे। मैं और पवन दौड़ते हुए कुछ ही दूरी पर खड़ी कई सारी गाड़ियों की तरफ गए। उनमें से एक गाड़ी को स्टार्ट कर मैं फौरन ही उसे इस तरफ ले आया। आदित्य ने रितू दीदी को उठा कर जल्दी से टाटा सफारी में बड़े एहतियात से बिठाया। रितू दीदी के बैठते ही नैना बुआ भी उनके पास आकर बैठ गईं। आदित्य भाग कर गया और दूसरी गाड़ी ले आया। उस गाड़ी में अभय चाचा को फौरन लेटाया गया। उसमें करुणा चाची व रुक्मिणी चाची बैठ गईं। दूसरी अन्य गाड़ियों में बाॅकी सब लोग भी बैठ गए। इसके बाद हम सब तेज़ी से गुनगुन की तरफ बढ़ चले।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दोस्तो, आप सबके सामने अपडेट हाज़िर है। आशा है आप सबको पसंद आएगा।
दोस्तो इस अपडेट के बाद अब एक आख़िरी अपडेट ही आएगा। ख़ैर, आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा।
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.......《 63 》
अब तक,,,,,,,,
शिवा की इस बात पर कमिश्नर बुरी तरह हैरान रह गया। किन्तु अपराधी जब खुद ही अपना गुनाह कबूल कर रहा था तो भला उन्हें क्या आपत्ति हो सकती थी? कमिश्नर ने अपने साथ आए एक एसआई को इशारा किया। एसआई ने शिवा के हाॅथ से रिवाल्वर को रुमाल में लपेट कर लिया और फिर उसके दोनो हाॅथों में हॅथकड़ी डाल दी।
मैं दौड़ते हुए रितू दीदी के पास आया था। रितू दीदी को आदित्य अपनी गोंद में लिए बैठा था। रितू दीदी की साॅसें अभी चल रही थी। पवन अभय चाचा के पास चला गया था। जहाॅ पर प्रतिमा अभय की हालत को देख कर रो रही थी। अभय चाचा की हालत भी काफी ख़राब थी। उनका पूरा जिस्म उनके खून से नहाया हुआ था। प्रतिमा बार बार एक ही बात कह रही थी कि मुझे मर जाने दिया होता।
मुझ पापिन को क्यों बचाया तुमने?
पुलिस सायरन की आवाज़ सुन कर इमारत के अंदर से बाॅकी सब लोग भी आ गए थे। यहाॅ का मंज़र देख कर सबकी चीख़ें निकल गई थी। माॅ ने जब मुझे सही सलामत देखा तो मुझे खुद से छुपका लिया और मेरे चेहरे पर हर जगह चूमने चाटने लगीं। मैने उन्हें खुद से अलग किया और बताया कि रितू दीदी व अभय चाचा को गोली लगी है। उन्हें जल्द ही हास्पिटल ले जाना पड़ेगा। मेरी बात सुन कर सब लोग रितू दीदी व अभय चाचा के पास आ गए।
रितू दीदी व अभय चाचा की हालत बहुत ख़राब थी। सब लोग रो रहे थे। मैं और पवन दौड़ते हुए कुछ ही दूरी पर खड़ी कई सारी गाड़ियों की तरफ गए। उनमें से एक गाड़ी को स्टार्ट कर मैं फौरन ही उसे इस तरफ ले आया। आदित्य ने रितू दीदी को उठा कर जल्दी से टाटा सफारी में बड़े एहतियात से बिठाया। रितू दीदी के बैठते ही नैना बुआ भी उनके पास आकर बैठ गईं। आदित्य भाग कर गया और दूसरी गाड़ी ले आया। उस गाड़ी में अभय चाचा को फौरन लेटाया गया। उसमें करुणा चाची व रुक्मिणी चाची बैठ गईं। दूसरी अन्य गाड़ियों में बाॅकी सब लोग भी बैठ गए। इसके बाद हम सब तेज़ी से गुनगुन की तरफ बढ़ चले।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आगे,,,,,,,
ऑधी तूफान बने हम सब आख़िर हास्पिटल पहुॅच ही गए। जल्दी जल्दी हमने रितू दीदी व अभय चाचा को स्ट्रेचर पर लिटा कर हास्पिटल के अंदर ले गए। कुछ ही देर में उन दोनो को ओटी के अंदर ले जाया गया। उन्हें अंदर ले जाते ही ओटी का दरवाज़ा बंद हो गया और हम सब बाहर ही चिंता व परेशानी की हालत में खड़े रह गए।
हम सब बेहद दुखी थे और भगवान से उन दोनो को सलामत रखने की मिन्नतें कर रहे थे। करुणा चाची के ऑसू बंद ही नहीं हो रहे थे। कमिश्नर साहब ने पहले ही फोन करके यहाॅ पर डाक्टरों को बता दिया था ताकि यहाॅ पर किसी प्रकार की परेशानी न हो सके और जल्द ही उनका इलाज़ शुरू हो जाए।
बड़ी माॅ हम सब से अलग एक तरफ गुमसुम सी खड़ी थीं। उनकी माॅग का सिंदूर मिटा हुआ था तथा हाॅथ की चूड़ियाॅ भी कुछ टूटी हुई थीं। मतलब साफ था कि पति की मौत के बाद उन्होंने खुद को विधवा बना लिया था। इस वक्त उनके चेहरे पर संसार भर की वीरानी थी। ऑखों में सूनापन था।
अधर्म पर धर्म की तथा बुराई पर अच्छाई की जीत तो हो चुकी थी किन्तु इस जीत में सच्चाई की राह पर चलने वाले दो ब्यक्ति जीवन और मृत्यु के बीच लटके हुए थे। मैं रितू दीदी के लिए सबसे ज्यादा दुखी था। मेरी ऑखों के सामने रह रह कर उनकी सुंदर छवि चमक उठती थी। उनके साथ बिताए हुए हर लम्हें याद आ रहे थे। रितू दीदी ने शुरू से लेकर अब तक मेरा कितना साथ दिया था ये बताने की आवश्यकता नहीं है। अगर मैं ये कहूॅ तो ज़रा भी ग़लत न होगा कि इस जीत का सारा श्रेय ही उनको जाता है। उन्होंने क़दम क़दम पर मुझे सम्हाला था और मेरी रक्षा की थी।
यूॅ तो मैं जीवन भर उनका ऋणी ही बन चुका था किन्तु एक ये भी सच्चाई थी कि मैं उन्हें किसी भी सूरत में खोना नहीं चाहता था। मैं बचपन से ही उन्हें बेहद पसंद करता था और उनके लिए कुछ भी कर गुज़रने की चाहत रखता था। अब तक तो नहीं पर अब लग रहा था कि अगर उन्हें कुछ हो गया तो मैं एक पल भी जी नहीं पाऊॅगा।
आदित्य मेरे पास आया और मुझसे बोला कि मैं खुद को सम्हालूॅ और सबको भी सम्हालूॅ। वो खुद भी बेहद दुखी था। उसने हम सबको अपना ही मान लिया था। उसने मुझे समझाया कि मैं खुद को मजबूत करूॅ वरना सब इस सबसे दुखी होते रहेंगे। आदित्य की बात सुन कर मैने खुद को सम्हाला और फिर सबको वहीं एक तरफ लम्बी सी बेंच में बैठ जाने के लिए कहा। मेरे ज़ोर देने पर आख़िर सब लोग बैठ ही गए। मेरी नज़र दूर एक तरफ खड़ी बड़ी माॅ पर पड़ी तो मैं उनके पास चला गया।
बड़ी माॅ कहीं खोई हुई सी खड़ी एकटक शून्य को घूरे जा रही थीं। मैं उनके पास जा कर उनके कंधे पर हाॅथ रखा तो जैसे उनकी तंद्रा टूटी। उन्होंने मेरी तरफ अजीब भाव से देखा और फिर बिना कुछ बोले फिर से शून्य में देखने लगीं। मैने बड़ी माॅ से भी बैठ जाने के लिए कहा तो वो मेरे साथ ही दूसरी साइड की बेंच की तरफ आईं और बैठ गईं। उनके पास ही मैं भी बैठ गया। हलाॅकि मेरे उनके पास बैठ जाने से सामने ही बेंच पर बैठे सब लोग मुझे घूर कर देखने लगे थे मगर मैने उनके घूरने की कोई परवाह नहीं की।
मेरे मन में बड़ी माॅ की उस वक्त की बातें गूॅज रही थी जब उन्होंने मुझे फोन किया था। इतना तो मुझे पता था कि हर इंसान को एक दिन अपने गुनाहों का एहसास होता है। वक्त और हालात इंसान को ऐसी जगह ला कर खड़ा कर देते हैं जब उसे शिद्दत से अपने गुनाहों का एहसास होने लगता है। वही हाल बड़ी माॅ का भी था। एक ये भी सच्चाई थी कि उन्होंने अपने पति से ऑख बंद करके तथा बिना कुछ सोचे समझे बेपनाह प्रेम किया था। जिसका सबूत ये था कि उन्होंने अजय सिंह के हर गुनाह में उसका खुशी खुशी साथ दिया था। उन्होंने कभी भी अपने पति से ये नहीं कहा कि वो ग़लत कर रहा है और वो ग़लत में उसका साथ नहीं देंगी। इंसान जब बार बार गुनाह करने लगता है तब उसका ज़मीर ख़ामोश होकर बैठ जाता है। या फिर इंसान ज़बरदस्ती अपने ज़मीर का करुण क्रंदन दबाता चला जाता है। मगर अंत तो हर चीज़ का एक दिन होता ही है। फिर चाहे वो जिस रूप में हो। ख़ैर, मेरे मन में बड़ी माॅ से फोन पर हुई वो सब बातें चल रही थीं।
बड़ी माॅ से फोन पर पहले तो मैने कठोरतापूर्ण ही बातें की थी किन्तु जब उन्होंने अभय चाचा की असलियत और अपने पति से उनके द्वारा फोन पर हुई बातों के बारे में बताया तो पहले तो मैं हॅसा था, क्योंकि मुझे लगा कि बड़ी माॅ मुझसे कोई चाल चलने का सोच रही हैं जिसमें वो अभय चाचा के खिलाफ ऐसी बातें बता कर मेरे मन में चाचा के प्रति शंका या दरार जैसा माहौल बनाना चाहती हैं। मगर उनकी बातों ने जल्द ही मुझे ये सोचने पर मजबूर कर दिया था कि भला उन्हें ऐसा करने की क्या ज़रूरत थी? दूसरी बात उन्होंने मुझसे कुछ ऐसी बातें भी कीं जिन बातों की मैं उनसे उम्मींद ही नहीं कर सकता था।
काफी समय तक हम सब ऐसे ही बैठे रहे थे। हम सबकी साॅसें हमारे हलक में अटकी हुई थी। ना चाहते हुए भी मन में ऐसे भी ख़याल आ जाते जिनके तहत हमारे जिस्म का रोयाॅ रोयाॅ तक काॅप जाता था। आख़िर लम्बे इन्तज़ार के बाद ओटी के ऊपर लगा लाल बल्ब बुझा और फिर दरवाजा खुला। दरवाज़ा खुलते ही हम सब एक साथ ही खड़े होकर डाक्टर के पास तेज़ी से पहुॅचे।
"डाक्टर साहब।" सबसे पहले माॅ गौरी ने ही ब्याकुल भाव से पूछा___"मेरा बेटा और बेटी कैसी है अब? वो दोनो ठीक तो हैं न? जल्दी बताइये डाक्टर साहब। वो दोनो ठीक तो है न?"
गौरी माॅ की ब्याकुलता को देख कर डाक्टर तुरंत कुछ न बोला। ये देख कर हम सब पलक झपकते ही घबरा गए। एक साथ हम सब डाक्टर पर चढ़ दौड़े। करुणा चाची बुरी तरह रोने लगी थी। उन्हें इस तरह रोते देख दिव्या भी रोने लगी थी। हम सब को इस तरह ब्यथित देख डाक्टर के चेहरे के भाव बदले।
"आप सबको इस तरह।" डाक्टर ने कहा___"दुखी होने की ज़रूरत नहीं है। वो दोनो ही अब खतरे से बाहर हैं। हमने उनके शरीर से बुलेट निकाल दी है। फिलहाल वो खतरे से बाहर हैं किन्तु खून ज्यादा बह जाने से उनकी हालत अभी बेहतर नहीं है। ख़ैर अभी तो वो दोनो बेहोश हैं। इस लिए आप लोग उनसे बात नहीं कर सकते हैं।"
डाक्टर की बात सुन कर हम सबके निस्तेज पड़ चुके चेहरों पर जैसे नई ताज़गी सी आ गई। हम सब एक दूसरे की तरफ देख देख कर एक दूसरे से कहने लगे कि सब ठीक है। डाक्टर कुछ और भी बातें बता कर चला गया। उसके जाते ही हम सबने ईश्वर का लाख लाख धन्यवाद किया। गौरी माॅ को अचानक ही जाने क्या हुआ कि वो पलटी और गैलरी में एक तरफ को लगभग दौड़ते हुई गईं। हम सब उन्हें इस तरह जाते देख चौंके तथा साथ ही हम सब भी उनके पीछे की तरफ तेज़ी से बढ़ चले।
कुछ ही देर में हम सब जिस जगह उनका पीछा करते हुए पहुॅचे उस जगह का दृष्य देख कर हम सबकी ऑखें नम हो गईं। दरअसल वो गणेश जी का एक छोटा सा मंदिर था। जिसके सामने अपने दोनो हाॅथ जोड़े बैठी गौरी माॅ नज़र आईं हमें। हम सब भी उनके पास जाकर गणेश जी के सामने अपने अपने हाॅथ जोड़ कर खड़े हो गए।
गणेश जी की मूर्ति के सामने खड़े हो कर हम सबने उनकी स्तुति की और उनकी इस कृपा के लिए हम सबने उन्हें सच्चे दिल से धन्यवाद दिया।
जैसा कि डाक्टर ने बताया था कि अभी रितू दीदी व अभय चाचा बेहोश हैं। अतः हम सब उनके होश में आने की प्रतीक्षा करने लगे थे। ख़ैर दिन ढल चुका था। मुझे पता था कि इस सबके चक्कर में किसी ने सुबह से कुछ खाया भी नहीं था। अतः मैंने आदित्य व पवन को साथ लिया और पास के ही एक होटेल से सबके लिए खाने पीने का प्रबंध किया। मेरे और आदित्य के ज़ोर देने पर आख़िर सबको थोड़ा बहुत खाना ही पड़ा। हलाॅकि इसके लिए कोई तैयार नहीं था क्योंकि आज हमारे परिवार के एक बड़े सदस्य की मौत हो चुकी थी तथा दूसरा अपने पिता के कत्ल के इल्ज़ाम में गिरफ्तार हो चुका था। निश्चय ही उसे या तो फाॅसी की सज़ा होगी या फिर ऊम्र कैद।
वो दोनो बुरे ही सही किन्तु उनसे खून का रिश्ता तो था ही। फार्महाउस पर कदाचित अभी भी अजय सिंह का मृत शरीर पड़ा होगा। हम सब तो रितू दीदी व अभय चाचू को लेकर हास्पिटल आ गए थे। उसके बाद वहाॅ पर अजय सिंह की लाश यूॅ ही लावारिश ही पड़ी रह गई होगी। या फिर ऐसा हुआ होगा कि कमिश्नर ने इस पर कोई कानूनी प्रक्रिया की होगी। जिसके तहत वो अजय सिंह की लाश का पंचनामा कर उसे पोस्टमार्डम के लिए ले गए होंगे। इस बारे में हमें कोई जानकारी अभी तक मिली नहीं थी, बल्कि ये महज हम सबका ख़याल ही था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उस वक्त रात के दस बज रहे थे जब हास्पिटल की एक नर्स ने आ कर हमें बताया कि रितू दीदी व अभय चाचू को होश आ गया है। हम सब नर्स की ये बात सुन कर बेहद खुश हुए और फिर फौरन ही हम सब उस कमरे में पहुॅचे जहाॅ पर रितू दीदी व अभय चाचू को शिफ्ट किया गया था। हम सबने उन दोनो को सही सलामत देखा तो जान में जान आई। करुणा चाची अभय के पास जा कर रोने लगी थी। ये देख कर माॅ ने उन्हें समझाया कि अब उसे रोना नहीं चाहिए बल्कि खुश होना चाहिए कि ईश्वर ने सब कुछ ठीक कर दिया है।
मैं रितू दीदी के पास ही बैठ गया था और एकटक उनके चेहरे की तरफ देख रहा था। वो खुद भी मुझे देखे जा रही थी। उनकी ऑखों में खुशी के ऑसू थे तथा होंठ कुछ कहने के लिए काॅपे जा रहे थे। ये देख कर मैने उन्हें इशारे से ही शान्त रहने को कहा और फिर झुक कर उनके माथे पर चूम लिया। मेरे ऐसा करते ही उनकी ऑखें बंद हो गईं। ऐसे जैसे कि मेरे ऐसा करने से उन्हें कितना सुकून मिला हो। नीलम, सोनम दीदी, आशा दीदी, निधी व दिव्या पास ही चारो तरफ से घेरे खड़ी थीं।
यहाॅ पर मुझे एक चीज़ बहुत अजीब लग रही थी और वो था बड़ी माॅ का बिहैवियर। वो हम सबसे अलग दूर खड़ी थीं। दूर से ही वो अपनी बेटी रितू को देख रही थी। उनकी ऑखों में ऑसू थे। उनसे कोई बात नहीं कर रहा था और ना ही वो किसी से बात करने की कोई कोशिश कर रही थीं।
उन्होंने तो जैसे खुद को हम सबसे अलग समझ लिया था।
उस रात हम सब हास्पिटल में ही रहे। दूसरे दिन डाक्टर से मिले तो डाक्टर ने कुछ दिन बेड रेस्ट के लिए यहीं रहने का कहा। इस बीच कमिश्नर साहब भी हमसे मिलने आए और सबका हाल अहवाल लिया। रितू दीदी से वो बड़े प्यार से मिले तथा उन्हें ये भी कहा कि उन्हें उन पर नाज़ है। कमिश्नर साहब ने बताया कि अजय सिंह की डेड बाॅडी पोस्टमार्डम के बाद आज दोपहर तक मिल जाएगी। ताकि हम उनका अंतिम संस्कार कर सकें।
अभय चाचा के बार बार ज़ोर देने पर माॅ इस बात पर राज़ी हुई कि वो बाॅकी सबको लेकर गाॅव जाएॅ। अभय चाचा ने बड़ी माॅ से भी आग्रह किया कि वो सबके साथ गाॅव जाएॅ। मैने नैना बुआ आदि को पवन के साथ ही हवेली जाने का कह दिया। जबकि मैं और आदित्य रितू दीदी व अभय चाचा के पास ही रुकना चाहते थे।
आख़िर बहुत समझाने बुझाने के बाद सब जाने के लिए राज़ी हुए। हास्पिटल से बाहर आकर मैने सबको गाड़ियों में बैठा दिया। मैने केशव जी को फोन करके बुला लिया था। सारी घटना के बारे में जान कर पहले तो वो हैरान हुए उसके बाद खुश भी हुए। मैने उनके कुछ आदमियों को माॅ लोगों के साथ हल्दीपुर जाने के लिए उनसे कहा। केशव जी मेरी बात तुरंत मान गए और फिर उन्होंने सीघ्र ही अपने आदमियों बुला लिया।
करुणा चाची जाने को तैयार ही नहीं हो रही थी। मैने बड़ी मुश्किल से उन्हें समझाया और कहा कि वो किसी बात की फिक्र न करें। ख़ैर उन सबके जाने के बाद मैने कमिश्नर साहब से शिवा के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उन्होंने शिवा से बात की थी कि वो चाहे तो कानून से छूट सकता है। किन्तु शिवा अपनी बात पर अडिग है। उसका कहना है कि वो इस जीवन से मुक्ति चाहता है। उसमें अब इतनी हिम्मत नहीं है कि वो वापस सबके बीच रह सके। सारी ज़िंदगी वो सबके सामने शर्म से गड़ा रहेगा और चैन से जी नहीं पाएगा। शिवा के न मानने पर ही कमिश्नर साहब ने केस फाइल किया। अपने बाप की चिता को आग देने के लिए उसे यहाॅ लाया जाएगा उसके बाद पुलिस उसे वापस जेल में बंद कर देगी। अदालत का फैसला क्या होगा इसका पता चलते ही उस पर कानूनी कार्यवाही होगी।
कमिश्नर साहब के जाने के बाद मैं और आदित्य वापस रितू दीदी व अभय चाचा के पास आ गए। अभय चाचा ने मुझसे कहा कि मैं इस सबके बारे में अपनी बड़ी बुआ यानी सौम्या बुआ को भी बता दूॅ और यहाॅ बुला लूॅ। फोन पर सारी बातें बताना उचित नहीं था। चाचा की बात सुन कर मैने बुआ को फोन लगाया। थोड़ी ही देर में दूसरी तरफ से बुआ की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी। मैने उन्हें अपना परिचय दिया और जल्द से जल्द हल्दीपुर आने को कहा। मेरे इस तरह बुलाने पर वो चिंतित होकर पूछने लगीं कि बात क्या है? उनके पूछने पर मैने बस यही कहा कि आप बस आ जाइये।
शाम होते होते कमिश्नर साहब की मौजूदगी में शिवा ने अपने बाप अजय सिंह की चिता को अग्नि दे दी। हल्दीपुर ही नहीं बल्कि आस पास के गाॅव में भी ये ख़बर जंगल की आग की तरह फैल गई थी कि ठाकुर गजेन्द्र सिंह बघेल का बड़ा बेटा अब इस दुनियाॅ में नहीं रहा। शमशान पर लोगों की भारी भीड़ जमा थी। आदित्य को रितू दीदी व अभय चाचू के पास छोड़ कर मैं भी गाॅव आ गया था।
सौम्या बुआ आ चुकी थी। यहाॅ आ कर जब उन्हें अपने भाई की मौत का पता चला तो वो दहाड़ें मार मार कर रोने लगी थी। किन्तु बड़ी माॅ ने उन्हें सम्हाल लिया था और कठोर भाव से ये भी कहा कि ऐसे इंसान के मरने का शोक मत करो जिसने अपने जीवन में किसी के साथ कोई अच्छा काम ही न किया हो। बड़ी माॅ की ऐसी बातें सुन कर सौम्या बुआ हतप्रभ रह गई थीं। उन्हें थोड़ी बहुत पता तो था किन्तु सारी असलियत से वो अंजान थीं।
सारी क्रिया संपन्न होते ही सब अपने अपने घर चले गए। इधर हवेली में हर तरफ एक भयावह सा सन्नाटा फैला हुआ था। हवेली के नौकर चाकर सब संजीदा थे। सौम्या बुआ के साथ उनके पति भी आए थे। मैने उनसे सब का ख़याल रखने का कहा और जीप लेकर वापस गुनगुन आ गया। ऐसे ही एक हप्ता गुज़र गया। मैं और आदित्य डाक्टर की परमीशन से रितू दीदी व अभय चाचा को हास्पिटल से घर ले आए। दोनो की हालत अभी नाज़ुक ही थी। इस लिए उनकी देख रेख के लिए सब मौजूद थे।
तेरवीं के दिन ब्राम्हणों को भोज कराया गया। सभी नात रिश्तेदार आए हुए थे। सबकी ज़ुबान पर बस एक ही बात थी कि ठाकुर खानदान में ये अचानक क्या हो गया है? हलाॅकि इतना तो सब समझते थे कि ठाकुर खानदान में कुछ सालों से ग्रहण सा लगा हुआ था। दबी ज़मान में तो लोग ये भी कहते थे कि अजय सिंह ने घर की खुशियों में खुद आग लगाई थी। ख़ैर, एक दिन कमिश्नर साहब का फोन आया उन्होंने बताया कि अदालत ने शिवा को ऊम्र कैद की सज़ा सुनाई है। ये जान कर हम सबको बहुत अजीब लगा था। शिवा ने अपनी मर्ज़ी से अपने इस अंजाम का चुनाव किया था, जबकि वो चाहता तो बड़े आराम से वो कत्ल के इल्ज़ाम से बरी हो जाता। बल्कि अगर ये कहा जाए तो ग़लत न होगा कि उस पर कत्ल जैसा कोई इल्ज़ान लगता ही नहीं। मेरे ज़हन में उससे अंतिम मुलाक़ात की वो सब बातें घूम रहीं थी। मैं समझ सकता था कि वह एकदम से जुनूनी हो चुका था। उसकी सोच ऐसी हो चुकी थी कि उसे कोई समझा नहीं सकता था।
अजय सिंह की मौत के बारे में मैने जगदीश ओबराय को पहले ही सब कुछ बता दिया था। वो ये जान कर आश्चर्यचकित थे कि अभय चाचा ने इतना बड़ा धोखा किया था हमारे साथ। तेरवीं के दिन जगदीश ओबराय हमारे गाॅव आए थे। एक दो दिन रुक कर वो वापस मुम्बई चले गए थे। साथ ही हम सबको समझाया बुझाया भी था कि अब हम सब एक नये सिरे से जीवन पथ पर आगे बढ़ें।
जाते समय वो थोड़ा मायूस लगे मुझे तो मैने और माॅ ने उनसे पूॅछ ही लिया कि क्या बात है? हमारे पूछने पर उन्होंने बस इतना ही कहा कि वो अकेले मुम्बई में रह नहीं पाएॅगे। उनकी बातों को हम बखूबी समझते थे। इस लिए उन्हें तसल्ली दी कि वो फिक्र न करें। माॅ ने कहा कि राज और गुड़िया की तो पढ़ाई ही चल रही है अभी। इस लिए वो बहुत जल्द मुम्बई आ जाएॅगे।
जैसा कि आप सबको पता है कि हवेली में तीनों भाइयों का बराबर हिस्सा था तथा हवेली बनाई भी इस तरह गई थी कि सबको बराबर बराबर मिल सके। अतः हवेली में आते ही हम सब अपने अपने हिस्सों में रहने लगे थे। किन्तु इसमें नई बात ये थी कि हम सबका खाना पीना एक ही रसोई में बनने लगा था। रितू दीदी व अभय चाचा की सेहत में काफी सुधार हो गया था। रितू दीदी हमारे हिस्से पर ही एक कमरे में रह रही थीं। बड़ी माॅ(प्रतिमा) अपने हिस्से पर अकेली रहती थी। वो किसी से कोई बात नहीं करती थी और ना ही किसी के सामने आती थी। सारा दिन और रात वो अपने कमरे में ही रहती। रितू दीदी व नीलम उनसे कोई बात नहीं करती थीं। हलाॅकि ऐसा नहीं होना चाहिए था मगर कदाचित दिलो दिमाग़ से वो सब बातें अभी निकली नहीं थी। इस लिए उनसे कोई बात करना ज़रूरी नहीं समझता था। हलाॅकि मैं आदित्य व पवन उनसे बात करते थे और उनके लिए दोनो टाइम का खाना व चाय नास्ता मैं ही लेकर उनके पास जाता था और तब तक उनके पास रहता जब तक कि वो खा नहीं लेती थी।
ऐसे ही समय गुज़र रहा था। धीरे धीरे सब नार्मल हो रहे थे। किन्तु एक चीज़ ऐसी थी जिसने मुझे दुखी किया हुआ था और वो था गुड़िया(निधी) का मेरे प्रति बर्ताव। इतना कुछ होने के बाद और इतने दिन गुज़र जाने के बाद मैने ये देखा था कि उसने मुझसे कोई बात नहीं की थी और ना ही मेरे सामने आने की कोई ख़ता की थी। मैं समझ नहीं पा रहा था कि अपने दिल की इस धड़कन को कैसे मनाऊॅ? मेरे मन में कई बार ये विचार आया कि मैं उसके पास जाऊॅ और उससे बातें करूॅ। उससे पूछूॅ कि ऐसा क्या हो गया है कि उसने मुझसे बात करने की तो बात दूर बल्कि मेरे सामने आना भी बंद कर रखा है? मगर मैं चाह कर भी ऐसा कर नहीं पा रहा था क्योंकि गुड़िया के पास हर समय आशा दीदी बनी रहती थी। अपनी इस बेबसी को मैं किसी के सामने ज़ाहिर भी नहीं कर सकता था।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ऐसे ही कुछ दिन और गुज़र गए। नीलम तो अब लगभग पूरी तरह ठीक ही हो गई थी। उसकी पीठ का ज़ख्म भी अब ठीक हो चला था। मैं नीलम को अक्सर छेंड़ता रहता था, जिसके जवाब में वो बस मुस्कुरा कर रह जाती थी। मैं उसकी इस प्रतिक्रया से हैरान भी होता और मायूस भी। हैरान इस लिए क्योंकि वो मेरे छेंड़ने पर जवाब में खुद भी मुझे छेंड़ने का कोई उपक्रम नहीं करती थी बल्कि सिर्फ मुस्कुरा कर रह जाती थी।
जबकि मायूस इस लिए क्योंकि मैं उससे यही उम्मींद करता था कि वो भी मुझें छेंड़े अथवा मुझसे लड़े झगड़े। मगर जब वो ऐसा न करती तो मैं बस मायूस ही हो जाता था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि नीलम ऐसा क्यों कर रही थी। मैं महसूस कर रहा था कि नीलम कुछ दिनों से बड़ी अजीब अजीब सी बातें करती थी। उसकी बातों में सबसे ज्यादा इसी बात पर ज़ोर होता था कि मैं रितू दीदी का हमेशा ख़याल रखूॅ और उन्हें कभी दुखी न होने दूॅ।
एक दिन सुबह के लगभग आठ बजे सोनम दीदी व नीलम अपने अपने हाॅथों में छोटा सा बैग लिए तथा तैयार होकर हम सबके बीच आईं और माॅ(गौरी) से कहा कि वो मुम्बई जा रही हैं। कारण ये था कि उनके काॅलेज की पढ़ाई का नुकसान हो रहा था। बात पढ़ाई की थी इस लिए किसी ने उन दोनो को जाने से मना नहीं किया। जाते वक्त नीलम मेरे गले लग मुझसे मिली और एक पुनः उसने रितू दीदी का तथा सबका ख़याल रखने का कहा और फिर मेरी तरफ अजीब भाव से देखने के बाद वह पलट कर सोनम दीदी के साथ हवेली से बाहर निकल गई।
नीलम के जाने से मुझे ऐसा लगा जैसे मेरा कुछ छूटा जा रहा है। नीलम की ऑखों में ऑसू के क़तरे थे। जिन्हें उसने बड़ी सफाई से पोंछ लिया था। दूसरे दिन रुक्मिणी चाची ने हम सबसे अपने घर जाने को कहा। माॅ ने उनसे कहा भी मगर वो नहीं मानी। अतः उन्हें उनके सामान के साथ उनके घर भेज दिया गया। माॅ ने उनसे कहा था कि उनका जब भी दिल करे वो यहाॅ आती रहें।
हम सब अब फिर से एक साथ हो गए थे। इस बात से गाॅव के लोग भी काफी खुश थे। दिन भर किसी न किसी का आना जाना लगा ही रहता था हवेली पर। अभय चाचा व मैं उन सबसे मिलते और दुनियाॅ जहान की बातें होतीं। बड़ी माॅ का रवैया वही था यानी वो अपने कमरे से बाहर नहीं निकलती थीं। पवन लोगों के जाने के बाद मुझे लगा कि अब गुड़िया से बात करने का मौका मिलेगा मगर मेरी उम्मीदों पर पानी फिर गया। क्योंकि आशा दीदी के जाने के बाद गुड़िया का सारा समय उनके घर पर ही गुज़रता था और रात में भी वो उनके घर पर ही सो जाती थी। हवेली में अगर वो आती भी तो दिव्या व रितू दीदी के पास ही रहती। कहने का मतलब ये कि वो खुद को अकेली रखती ही नहीं थी। कदाचित उसे अंदेशा था कि मैं उससे मिलने की तथा उससे बात करने की कोशिश करूॅगा। गुड़िया के इस रवैये से मेरा दिल बहुत दुखी होने लगा था। एक नये संसार का ये रूप देख कर मैं ज़रा भी खुश नहीं था।
मेरा ज्यादातर समय या तो रितू दीदी के पास रहने से या फिर आदित्य के साथ ही गुज़र रहा था। एक दिन अभय चाचा ने कहा कि जब तक उनका स्वास्थ सही नहीं हो जाता मैं खेतों की तरफ का हाल चाल देख लिया करूॅ। चाचा की इस बात से मैं और आदित्य खेतों पर गए और वहाॅ पर सब मजदूरों से मिला। खेतों पर काम कर रहे सभी मजदूर मुझे वहाॅ पर इस तरह देख कर बेहद खुश हो गए थे। सबकी ऑखों में खुशी के ऑसू थे।
सब एक ही बात कह रहे थे कि हम अपने जिन मालिक को(मेरे पिता जी) देवता की तरह मानते थे उनके जाने के बाद हम सब बेहद दुखी थे। अजय सिंह ने तो हमेशा हम पर ज़ुल्म ही किया था। किन्तु अब वो फिर से खुश हो गए थे। अपने असल मालिक की औलाद को देख कर वो खुश थे और चाहते थे कि अब वैसा कोई बुरा समय न आए।
एक दिन सुबह जब मैं बड़ी माॅ के लिए चाय नास्ता देने उनके कमरे में गया तो कमरे में बड़ी माॅ कहीं भी नज़र न आईं। उनकी तरफ का सारा हिस्सा छान मारा मैने मगर बड़ी माॅ का कहीं पर भी कोई नामो निशान न मिला। इस बात से मैं भचक्का रह गया। मुझे अच्छी तरह याद था कि जब मैं रात में उनके पास उन्हें खाना खिलाने आया था तब वो अपने कमरे में ही थीं। मैने अपने हाॅथ से उन्हें खाना खिलाया था। हर रोज़ की तरह ही मेरे द्वारा खाना खिलाते समय उनकी ऑखें छलक पड़तीं थी। मैं उन्हें समझाता और कहता कि जो कुछ हुआ उसे भूल जाइये। मेरे दिल में उनके लिए कोई भी बुरा विचार नहीं है।
मैं कमरे को बड़े ध्यान से देख रहा था, इस उम्मीद में कि शायद कोई ऐसा सुराग़ मिल जाए जिससे मुझे पता सके कि बड़ी माॅ कहाॅ गई हो सकती हैं। मगर लाख सिर खपाने के बाद भी मुझे कुछ न मिला। थक हार कर मैं कमरे से ही क्यों बल्कि उनके हिस्से से ही बाहर आ गया। अपनी तरफ डायनिंग हाल में आकर मैने अभय चाचा से बड़ी माॅ के बारे में सब कुछ बताया। मेरी बात सुन कर अभय चाचा और बाॅकी सब भी हैरान रह गए। इस सबसे हम सब ये तो समझ ही गए थे कि बड़ी माॅ शायद हवेली छोंड़ कर कहीं चली गई हैं। उनके जाने की वजह का भी हमें पता था। इस लिए हमने फैसला किया कि बड़ी माॅ की खोज की जाए।
नास्ता पानी करने के बाद मैं आदित्य अभय चाचा बड़ी माॅ की खोज में हवेली से निकल पड़े। अपने साथ कुछ आदमियों को लेकर हम निकले। अभय चाचा अलग गाड़ी में कुछ आदमियों के साथ अलग दिशा में चले जबकि मैं और आदित्य दूसरी गाड़ी में कुछ आदमियों के साथ दूसरी दिशा में। हमने आस पास के सभी गाॅवों में तथा शहर गुनगुन में भी सारा दिन बड़ी माॅ की तलाश में भटकते रहे मगर कहीं भी बड़ी माॅ का पता न चला। रात हो चली थी अतः हम लोग वापस हवेली आ गए। हवेली आ कर हमने सबको बताया कि बड़ी माॅ का कहीं भी पता नहीं चल सका। इस बात से सब बेहद चिंतित व परेशान हो गए।
नीलम तो मुम्बई जा चुकी थी, उसे इस बात का पता ही नहीं था। रितू दीदी को मैने बताया तो उन्होंने कोई जवाब न दिया। उनके चेहरे पर कोई भाव न आया था। बस एकटक शून्य में घूरती रह गई थी। उस रात हम सब ना तो ठीक से खा पी सके और ना ही सो सके। दूसरे दिन फिर से बड़ी माॅ की तलाश शुरू हुई मगर कोई फायदा न हुआ। हमने इस बारे में पुलिश कमिश्नर से भी बात की और उनसे कहा कि बड़ी माॅ की तलाश करें।
चौथे दिन सुबह हम सब नास्ता करने बैठे हुए थे।
नास्ते के बाद एक ही काम था और वो था बड़ी माॅ की तलाश करना। नास्ता करते समय ही बाहर मुख्य द्वार को किसी ने बाहर से खटखटाया। दिव्या ने जाकर दरवाज़ा खोला तो बाहर एक आदमी खड़ा था। उसकी पोशाक से ही लग रहा था कि वो पोस्टमैन है। दरवाजा खुलते ही उसने दिव्या के हाॅथ में एक लिफाफा दिया और फिर चला गया।
दिव्या उससे लिफाफा लेकर दरवाज़ा बंद किया और वापस डायनिंग हाल में आ गई। हम लोगों के पास आते ही दिव्य ने वो लिफाफा अभय चाचा को पकड़ा दिया। अभय चाचा ने लिफाफे को उलट कर देखा तो उसमें मेरा नाम लिखा हुआ था। ये देख कर अभय चाचा ने लिफाफा मेरी तरफ सरका दिया।
"ये तुम्हारे नाम पर आया है राज।" अभय चाचा ने मेरी तरफ देखते हुए कहा___"देखो तो क्या है इसमें?"
"जी अभी देखता हूॅ चाचा जी।" मैने कहने के साथ ही टेबल से लिफाफा उठा लिया और फिर उसे एक तरफ से काट कर खोलने लगा। लिफाफे में एक तरफ मेरा नाम व पता लिखा हुआ था तथा दूसरी तरफ भेजने वाले के नाम में "नारायण रस्तोगी" तथा उसका पता लिखा हुआ था।
लिफाफे के अंदर तह किया हुआ कोई काग़ज था। मैने उसे निकाला और फिर उस तह किये हुए काग़ज को खोल कर देखा। काग़ज में पूरे पेज पर किसी की हैण्डराइटिंग से लिखा हुआ कोई मजमून था। मजमून का पहला वाक्य पढ़ कर ही मैं चौंका। मैने लिफाफे को उलट कर भेजने वाले का नाम पुनः पढ़ा। मुझे समझ न आया कि ये नारायण रस्तोगी कौन है और इसने मेरे नाम ऐसा कोई ख़त क्यों लिखा है? जबकि मेरी समझ में इस नाम के किसी भी ब्यक्ति से मेरा दूर दूर तक कोई वास्ता ही नहीं था। मुझे हैरान व चौंकते हुए देख अभय चाचा ने पूछ ही लिया कि क्या बात है? मैने उन्हें बताया लिफाफा भेजने वाले को तो मैं जानता ही नहीं हूॅ फिर इसने मेरे नाम पर ये लिफाफा क्यों भेजा हो सकता हैं? अभय चाचा ने पूछा कि ख़त में क्या लिखा है उसने? उनके पूछने पर मैंने ख़त में लिखे मजमून को सबको सुनाते हुए पढ़ने लगा। खत में लिखा मजमून कुछ इस प्रकार था।
मेरे सबसे अच्छे बेटे राज!
सबसे पहले तो यही कहूॅगी कि तू वाकई में एक देवता जैसे इंसान का नेकदिल बेटा है और मुझे इस बात की खुशी भी है कि तू अच्छे संस्कारों वाला एक सच्चा इंसान है। ईश्वर करे तू इसी तरह नेकदिल बना रहे और सबके लिए प्यार व सम्मान रखे। जिस वक्त तुम मेरे द्वारा लिखे ख़त के इस मजमून को पढ़ रहे होगे उस वक्त मैं इस हवेली से बहुत दूर जा चुकी होऊॅगी। मुझे खोजने की कोशिश मत करना बेटे क्योंकि अब मेरे अंदर इतनी हिम्मत व साहस नहीं रहा कि मैं तुम सबके बीच सामान्य भाव से रह सकूॅ। जीवन में जिसके लिए सबके साथ बुरा किया उसने खुद कभी मेरी कद्र नहीं की। मेरी बेटियाॅ मुझे देखना भी गवाॅरा नहीं करती हैं, और करे भी क्यों? ख़ैर, मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है बेटे।
दिल से बस यही दुवा व कामना है कि वो जीवन में सदा सुखी रहें।
मेरा जीवन पापों से भरा पड़ा है। मैने ऐसे ऐसे कर्म किये हैं जिनके बारे में सोच कर ही अब खुद से घृणा होती है। मुझमें अब इतनी हिम्मत नहीं है कि मैं किसी को अपना मुह भी दिखा सकूॅ। आत्मग्लानी, शर्म व अपमान का बोझ इतना ज्यादा है कि इसके साथ अब एक पल भी जीना मुश्किल लग रहा है। बार बार ज़हन में ये विचार आता है कि खुदखुशी कर लूॅ और इस पापी जीवन को खत्म कर दूॅ मगर मैं ऐसा भी नहीं करना चाहती। क्योंकि जीवन को खत्म करने से ईश्वर मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा। मुझे इस सबका प्रयाश्चित करना होगा बेटे, बग़ैर प्रयाश्चित के भगवान भी मुझे अपने पास फटकने नहीं देगा। इस लिए बहुत सोच समझ कर मैने ये फैसला किया है कि मैं तुम सबसे कहीं दूर चली जाऊॅ और अपने पापों का प्रयाश्चित करूॅ। तुम सबके बीच रह कर मैं ठीक से प्रयाश्चित नहीं कर सकती थी।
ज़मीन जायदाद के सारे काग़जात मैने अपनी आलमारी में रख दिये हैं बेटा। वकील को मैने सब कुछ बता भी दिया है और समझा भी दिया है। अब इस सारी ज़मीन जायदाद के सिर्फ दो ही हिस्से होंगे। पहला तुम्हारा और दूसरा अभय का। मैने अपने हिस्से का सबकुछ तुम्हारे नाम कर दिया है। कुछ हिस्सा अभय के बेटे के नाम भी कर दिया है। इसे लेने से इंकार मत करना बेटे, बस ये समझ लेना कि एक माॅ ने अपने बेटे को दिया है। मुझे पता है कि तुम्हारे अंदर मेरे प्रति वैसा ही आदर सम्मान है जैसा कि तुम्हारा अपनी माॅ के प्रति है। ख़ैर, इसी आलमारी में वो कागजात भी हैं जो तुम्हारे दादा दादी से संबंधित हैं। उन्हें तुम देख लेना और अपने दादा दादी के बारे में जान लेना।
अंत में बस यही कहूॅगी बेटे कि सबका ख़याल रखना। अब तुम ही इस खानदान के असली कर्ताधर्ता हो। मुझे यकीन है कि तुम अपनी सूझ बूझ व समझदारी से परिवार के हर सदस्य को एक साथ रखोगे और उन्हें सदा खुश रखोगे। अपनी माॅ का विशेष ख़याल रखना बेटे, उस अभागिन ने बहुत दुख सहे हैं। हमारे द्वारा इतना कुछ करने के बाद भी उस देवी ने कभी अपने मन में हमारे प्रति बुरा नहीं सोचा। मैं किसी से अपने किये की माफ़ी नहीं माग सकती क्योंकि मुझे खुद पता है कि मेरा अपराध क्षमा के योग्य नहीं है।
मेरी बेटियों से कहना कि उनकी माॅ ने कभी भी दिल से नहीं चाहा कि उनके साथ कभी ग़लत हो। मैं जहाॅ भी रहूॅगी मेरे दिल में उनके लिए बेपनाह प्यार व दुवाएॅ ही रहेंगी। मुझे तलाश करने की कोशिश मत करना। अब उस घर में मेरे वापस आने की कोई वजह नहीं है और मैं उस जगह अब आना भी नहीं चाहती। मैंने अपना रास्ता तथा अपना मुकाम चुन लिया है बेटे। इस लिए मुझे मेरे हाल पर छोंड़ दो। यही मेरी तुमसे विनती है। ईश्वर तुम्हें सदा सुखी रखे तथा हर दिन हर पल नई खुशी व नई कामयाबी अता करे।
अच्छा अब अलविदा बेटे।
तुम्हारी बड़ी माॅ!
प्रतिमा।
ख़त के इस मजमून को पढ़ कर हम सबकी साॅसें मानों थम सी गई थी। ख़त पढ़ते समय ही पता चला कि ये ख़त तो दरअसल बड़ी माॅ का ही था। जिसे उन्होंने फर्ज़ी नाम व पते से भेजा था मुझे। काफी देर तक हम सब किसी गहन सोच में डूबे बैठे रहे।
"बड़ी भाभी के इस ख़त से।" सहसा अभय चाचा ने इस गहन सन्नाटे को चीरते हुए कहा____"ये बात ज़ाहिर होती है कि अब हम चाह कर भी उन्हें तलाश नहीं कर सकते। क्योंकि ये तो उन्हें भी पता ही होगा कि हम उन्हें खोजने की कोशिश करेंगे। इस लिए अब उनकी पूरी कोशिश यही रहेगी कि हम उन्हें किसी भी सूरत में खोज न पाएॅ। कहने का मतलब ये कि संभव है कि उन्होंने खुद को किसी ऐसी जगह छुपा लिया हो जिस जगह पर हम में से कोई पहुॅच ही न पाए।"
"सच कहा आपने।" मैने कहा___"ख़त में लिखी उनकी बातें यही दर्शाती हैं। किन्तु सवाल ये है कि अगर उन्होंने ख़त के माध्यम से ऐसा कहा है तो क्या हमें सच में उन्हें नहीं खोजना चाहिए?"
"हर्गिज़ नहीं।" अभय चाचा ने कहा___"कम से कम हम में से कोई भी ऐसा नहीं चाह सकता कि बड़ी भाभी हमसे दूर कहीं अज्ञात जगह पर रहें। बल्कि हम सब यही चाहते हैं कि सब कुछ भुला कर हम सब एक साथ नये सिरे से जीवन की शुरुआत करें। हवेली को छोंड़ कर चले जाना ये उनकी मानसिकता की बात थी। उन्हें लगता है कि उन्होंने हम सबके साथ बहुत बुरा किया है इस लिए अब उनका हमारे साथ रहने का कोई हक़ नहीं है। सच तो ये है कि हवेली छोंड़ कर चले जाने की वजह उनका अपराध बोझ है। इसी अपराध बोझ के चलते उनके मन में ऐसा करने का विचार आया है।"
"बात चाहे जो भी हो।" सहसा इस बीच माॅ ने गंभीर भाव से कहा___"उनका इस तरह हवेली से चले जाना बिलकुल भी अच्छी बात नहीं है। उन्हें तलाश करो और सम्मान पूर्वक उन्हें वापस यहाॅ लाओ। हम सब उन्हें वैसा ही आदर सम्मान देंगे जैसा उन्हें मिलना चाहिए। उन्हें वापस यहाॅ पर लाना ज़रूरी है वरना कल को यही गाॅव वाले हमारे बारे में तरह तरह की बातें बनाना शुरू कर देंगे। वो कहेंगे कि अपना हक़ मिलते ही हमने उन्हें हवेली से वैसे ही बेदखल कर दिया जैसे कभी उन्होंने हमें किया था। आख़िर उनमें और हम में फर्क़ ही क्या रह गया? इस लिए सारे काम को दरकिनार करके सिर्फ उन्हें खोज कर यहाॅ वापस लाने का का ही काम करो।"
"आप फिक्र मत कीजिए भाभी।" अभय चाचा ने कहा___"हम एड़ी से चोंटी तक का ज़ोर लगा देंगे बड़ी भाभी की तलाश करने में। हम उन्हें ज़रूर वापस लाएॅगे और उनका आदर सम्मान भी करेंगे।"
"ठीक है फिर।" माॅ ने कहने के साथ ही मेरी तरफ देखा___"बेटा तू तब तक यहीं रहेगा जब तक कि तुम्हारी बड़ी माॅ वापस इस हवेली पर नहीं आ जातीं। मैं जानती हूॅ कि तुम दोनो की पढ़ाई का नुकसान होगा किन्तु इसके बावजूद तुझे अभय के साथ मिल कर अपनी बड़ी माॅ की तलाश करना है।"
"ठीक है माॅ।
" मैने कहा___"जैसा आप कहेंगी वैसा ही होगा। मैं जगदीश अंकल को फोन करके बता दूॅगा कि मैं और गुड़िया अभी वहाॅ नहीं आ सकते।"
"पर मुझे अपनी पढ़ाई का नुकसान नहीं करना है माॅ।" सहसा तभी गुड़िया(निधी) कह उठी___"बड़ी माॅ को तलाश करने का काम मुझे तो करना नहीं है। अतः मेरा यहाॅ रुकने का कोई मतलब नहीं है। पवन भइया को भी कंपनी में काम करने के लिए जाना ही है मुम्बई। मैने आशा दीदी से बात की है वो मेरे साथ मुम्बई जाने को तैयार हैं। इस लिए मैं कल ही यहाॅ से जा रही हूॅ।"
गुड़िया की इस बात से हम सब एकदम से उसकी तरफ हैरानी से देखने लगे थे। किसी और का तो मुझे नहीं पता किन्तु उसकी इस बात से मैं ज़रूर स्तब्ध रह गया था और फिर एकाएक ही मेरे दिल में बड़ा तेज़ दर्द हुआ। अंदर एक हूक सी उठी जिसने पलक झपकते ही मेरी ऑखों में ऑसुओं को तैरा दिया। मैं खुद को और अपने अंदर अचानक ही उत्पन्न हो चुके भीषण जज़्बातों को बड़ी मुश्किल से सम्हाला। अपने ऑसुओं को ऑखों में ही जज़्ब कर लिया मैने।
"ये तू क्या कह रही है गुड़िया?" तभी माॅ की कठोर आवाज़ गूॅजी___"तूने मुझे बताए बिना ही ये फैंसला ले लिया कि तुझे मुम्बई जाना है। मुझे तुझसे ऐसी उम्मीद नहीं थी।"
"मैं आपको इस बारे में बताने ही वाली थी माॅ।" निधी ने नज़रें चुराते हुए किन्तु मासूम भाव से कहा___"और वैसे भी इसमे इतना सोचने की क्या बात है? बड़ी माॅ की खोज करने मुझे तो जाना नहीं है, बल्कि ये काम तो चाचा जी लोगों का ही है। दूसरी बात अब मेरे यहाॅ रहने का फायदा भी क्या है, बल्कि नुकसान ही है। आज एक महीना होने को है स्कूल से छुट्टी लिए हुए। इस लिए अब मैं नहीं चाहती कि मेरी पढ़ाई का और भी ज्यादा नुकसान हो।"
"बात तो तुम्हारी सही है गुड़िया।" अभय चाचा ने कहने के साथ ही माॅ(गौरी) की तरफ देखा___"भाभी अब जो होना था वो तो हो ही चुका है। आज महीना होने को आया उस सबको गुज़रे हुए। धीरे धीरे आगे भी सब कुछ ठीक ही हो जाएगा। रही बात बड़ी भाभी को खोजने की तो वो मैं राज और आदित्य करेंगे ही। गुड़िया के यहाॅ रुकने से उसकी पढ़ाई का नुकसान ही है। इस लिए ये अगर जा रही है तो इसे आप जाने दीजिए। आप तो जानती ही हैं कि मुम्बई में भी जगदीश भाई साहब अकेले ही हैं। वो आप लोगों के न रहने से वहाॅ पर बिलकुल भी अच्छा महसूस नहीं कर रहे होंगे। इस लिए गुड़िया पवन और आशा जब उनके पास पहुॅच जाएॅगे तो उनका भी मन लगेगा वहाॅ।"
अभय चाचा की इस बात से माॅ ने तुरंत कुछ नहीं कहा। किन्तु वो अजीब भाव से निधी को देखती ज़रूर रहीं। ऐसी ही कुछ और बातों के बाद यही फैंसला हुआ कि निधी कल पवन व आशा के साथ मुम्बई चली जाएगी।
इस बीच सवाल ये भी उठा कि पवन व आशा के चले जाने से रुक्मिणी यहाॅ पर अकेली कैसे रहेंगी? इस सवाल का हल ये निकाला गया कि पवन और आशा के जाने के बाद रुक्मिणी यहाॅ हवेली में हमारे साथ ही रहेंगी।
नास्ता पानी करने के बाद मैं, आदित्य व अभय चाचा बड़ी माॅ की तलाश में हवेली से निकल पड़े। अभय चाचा का स्वास्थ पहले से बेहतर था। हलाॅकि मैंने उन्हें अभी चलना फिरने से मना किया था किन्तु वो नहीं मान रहे थे। इस लिए हमने भी ज्यादा फिर कुछ नहीं कहा। दूसरे दिन निधी पवन व आशा के साथ मुम्बई के लिए निकल गई। गुनगुन रेलवे स्टेशन उनको छोंड़ने के लिए मैं और आदित्य गए थे। इस बीच मेरा दिलो दिमाग़ बेहद दुखी व उदास था। गुड़िया के बर्ताव ने मुझे इतनी पीड़ा पहुॅचाई थी कि इतनी पीड़ा अब तक किसी भी चीज़ से न हुई थी मुझे। मगर बिना कोई शिकवा किये मैं ख़ामोशी से ये सब सह रहा था। मैं इस बात से चकित था कि मेरी सबसे प्यारी बहन जो मेरी जान थी उसने दो महीने से मेरी तरफ देखा तक नहीं था बात करने की तो बात ही दूर थी।
ट्रेन में तीनो को बेठा कर मैं और आदित्य वापस हल्दीपुर लौट आए। मेरा मन बेहद दुखी था। आदित्य ने मुझसे पूछा भी कि क्या बात है मगर मैने उसे ज्यादा कुछ नहीं बताया बस यही कहा कि बड़ी माॅ और गुड़िया के जाने की वजह से कुछ अच्छा नहीं लग रहा है। एक हप्ते पहले आदित्य बड़ा खुश था जब रितू दीदी ने उसकी कलाई पर राखी बाॅधी थी। उसके दोनो हाॅथों में ढेर सारी राखियाॅ बाॅधी थी दीदी ने। जिसे देख कर आदित्य खुद को रोने से रोंक नहीं पाया था। उसके इस तरह रोने पर माॅ आदि सब लोग पहले तो चौंके फिर जब रितू दीदी ने सबको आदित्य की बहन प्रतीक्षा की कहानी बताई तो सब दुखी हो गए थे। सबने आदित्य को इस बात के लिए सांत्वना दी। माॅ ने तो ये तक कह दिया कि आज से वो मेरा बड़ा बेटा है और इस घर का सदस्य है। आदित्य ये सुन कर खुशी से रो पड़ा था। मेरी सभी बहनों ने राखी बाॅधी थी। गुड़िया ने भी मुझे राखी बाॅधा था किन्तु उसका बर्ताव वही था। उसके इस रूखे बर्ताव से सब चकित भी थे। माॅ ने तो पूछ भी लिया था कि ये सब क्या है मगर उसने बड़ी सफाई से बात को टाल दिया था।
हवेली आ कर मैं अपने कमरे में चला गया था। जबकि आदित्य अभय चाचा के पास ही बैठ गया था। सारा दिन मेरा मन दुखी व उदास रहा। जब किसी तरह भी सुकून न मिला तो उठ कर रितू दीदी के पास चला गया। मुझे अपने पास आया देख कर रितू दीदी मुस्कुरा उठीं। उनको भी पता चल गया था गुड़िया वापस मुम्बई चली गई है। मेरे चेहरे के भाव देख कर ही वो समझ गईं कि मैं गड़िया के जाने की वजह से उदास हूॅ।
मुझे यूॅ मायूस व उदास देख कर उन्होंने मुस्कुरा कर अपनी बाहें फैला दी। मैं उनकी फैली हुई बाहों के दरमियां हल्के से अपना सिर रख दिया।
मेरे सिर रखते ही उन्होंने बड़े स्नेह भाव से मेरे सिर पर हाॅथ फेरना शुरू कर दिया। अभी मैं रितू दीदी की बाहों के बीच छुपका ही था कि तभी नैना बुआ भी आ गईं और बेड पर मेरे पास ही बैठ गईं।
"क्या बात है मेरा बेटा उदास है?" नैना बुआ ने मेरे सिर के बालों पर उॅगलियाॅ फेरते हुए कहा____"पर यूॅ उदास रहने से क्या होगा राज? अगर कोई बात है तो उसे आपस में सलझा लेना होता है।"
"सुलझाने के लिए मौका भी तो देना चाहिए न बुआ।" मैंने दीदी की बाहों से उठते हुए कहा___"खुद ही किसी बात का फैंसला ले लेना कहाॅ की समझदारी है? उसे ज़रा भी एहसास नहीं है उसके इस रवैये से मुझ पर आज दो महीने से क्या गुज़र रही है।"
"ये हाल तो उसका भी होगा राज।" रितू दीदी ने कहा___"वो तेरी लाडली है। ज़िद्दी भी है, इस लिए वो चाहती होगी कि पहल तू करे।"
"किस बात की पहल दीदी?" मैने अजीब भाव से उनकी तरफ देखा।
"मुझे लगता है कि ये बात तू खुद समझता है।" रितू दीदी ने एकटक मेरी तरफ देखते हुए कहा___"इस लिए पूछने का तो कोई मतलब ही नहीं है।"
मैं उनकी इस बात से उनकी तरफ ख़ामोशी से देखता रहा। नैना बुआ को समझ न आया कि किस बारे में रितू दीदी ने ऐसा कहा था। इधर मैं खुद भी हैरान था कि आख़िर रितू दीदी के ये कहने का क्या मतलब था? मैने रितू दीदी की तरफ देखा तो उनके होठों पर फीकी सी मुस्कान उभर आई थी। फिर जाने क्या सोच कर उनके मुख से निकलता चला गया।
कौन समझाए हमें के आख़िर ये बला क्या है।
दर्द में भी मुस्कुराऊॅ मैं, तो फिर सज़ा क्या है।।
हम जिस बात को लबों से कह नहीं सकते,
कोई उस बात को न समझे, इससे बुरा क्या है।।
रात दिन कुछ भी अच्छा नहीं लगता हमको,
इलाही ख़ैर हो, खुदा जाने ये माज़रा क्या है।।
समंदर में डूब कर भी हमारी तिश्नगी न जाए,
इस दुनियाॅ में इससे बढ़ कर बद्दुवा क्या है।।
अपनी तो बस एक ही आरज़ू है के किसी रोज़,
वो खुद आ कर कहे के बता तेरी रज़ा क्या है।।
रितू दीदी के मुख से निकली इस अजीबो ग़रीब सी ग़ज़ल को सुन कर मैं और नैना बुआ हैरान रह गए। दिलो दिमाग़ में इक हलचल सी तो हुई किन्तु समझ में न आया कि रितू दीदी ने इस ग़ज़ल के माध्यम से क्या कहना चाहा था?
रात में खाना पीना करके हम सब सो गए। दूसरे दिन नास्ता पानी करने के बाद मैं और आदित्य अभय चाचा के साथ फिर से बड़ी माॅ की खोज में निकल गए। ऐसे ही हर दिन होता रहा। किन्तु कहीं भी बड़ी माॅ के बारे में कोई पता न चल सका। हम सब इस बात से बेहद चिंतित व परेशान थे और सबसे ज्यादा हैरान भी थे कि बड़ी माॅ ने आख़िर ऐसी कौन सी जगह पर खुद को छुपा लिया था जहाॅ पर हम पहुॅच नहीं पा रहे थे। उनकी तलाश में ऐसे ही एक महीना गुज़र गया। इस बीच हमने सभी नात रिश्तेदारों को भी बता दिया था उनके बारे में।
बड़ी माॅ के पिता जी यानी जगमोहन सिंह भी अपनी बेटी के बारे में सब कुछ जान कर बेहद दुखी हुए थे। किन्तु होनी तो हो चुकी थी। वो खुद भी अपनी बेटी के लापता हो जाने पर दुखी थे।
एक दिन अभय चाचा के कहने पर मैने रितू दीदी की मौजूदगी में बड़ी माॅ के कमरे में रखी आलमारी को खोला और उसमें से सारे काग़जात निकाले। उन काग़जातों में ज़मीन और जायदाद के दो हिस्से थे। तीसरा हिस्सा यानी कि अजय सिंह के हिस्से की ज़मीन व जायदाद तथा दौलत में से लगभग पछत्तर पर्शैन्ट हिस्सा मेरे नाम कर दिया गया था जबकि बाॅकी का पच्चीस पर्शेन्ट अभय चाचा के बेटे शगुन के नाम पर था। उसी आलमारी में कुछ और भी काग़जात थे जो दादा दादी के बारे में थे। उनमें ये जानकारी थी कि दादा दादी को कहाॅ पर रखा गया है?
सारे काग़जातों को देख कर मैने रितू दीदी से तथा अभय चाचा से बात की। मैने उनसे कहा कि मुझे उनके हिस्से का कुछ भी नहीं चाहिए बल्कि उनके हिस्से का सब कुछ रितू दीदी व नीलम के नाम कर दिया जाए। मेरी इस बात से अभय चाचा भी सहमत थे। जबकि रितू दीदी ने साफ कह दिया कि उन्हें कुछ नहीं चाहिए। मगर मैं ज़मीन जायदाद पर कोई ऐसी बात नहीं बनाना चाहता था जिससे भविष्य में किसी तरह का विवाद होने का चान्स बन जाए।
एक दिन हम सब दादा दादी से मिलने शिमला गए। शिमला में ही किसी प्राइवेट जगह पर उन्हें रखा था बड़े पापा ने। शिमला में हम सब दादा दादी से मिले। वो दोनो अभी भी कोमा में ही थे। उन्हें इस हाल में देख कर हम सब बेहद दुखी हो गए थे। डाक्टर ने बताया कि पिछले महीने उनकी बाॅडी पर कुछ मूवमेंट महसूस की गई थी। किन्तु उसके बाद फिर से वैसी ही हालत हो गई थी। डाक्टर ने कहा कि तीन सालों में ये पहली बार था जब पिछले महीने ऐसा महसूस हुआ था। उम्मीद है कि शायद उनके जिस्म में फिर कभी कोई मूवमेन्ट हो।
हमने डाक्टर से दादा दादी को साथ ले जाने के लिए कहा तो डाक्टर ने हमसे कहा कि घर ले जाने का कोई फायदा नहीं है, बल्कि वो अगर यहीं पर रहेंगे तो ज्यादा बेहतर होगा। क्योंकि यहाॅ पर उनकी देख भाल के लिए तथा किसी भी तरह की मूवमेन्ट का पता चलते ही डाक्टर उस बात को बेहतर तरीके से सम्हालेंगे।
डाक्टर की बात सुन कर माॅ ने कहा कि वो माॅ बाबू जी को साथ ही ले जाएॅगी। वो खुद उनकी बेहतर तरीके से देख भाल करेंगी। उन्होंने डाक्टर से ये कहा कि वो किसी क़ाबिल नर्स को हमारे साथ ही रहने के लिए भेज दें। काफी समझाने बुझाने और बहस के बाद यही फैंसला हुआ कि हम दादा दादी को अपने साथ ही ले जाएॅगे। डाक्टर अब क्या कर सकता था? इस लिए उसने हमारे साथ एक क़ाबिल नर्स को भेज दिया। शाम होने से पहले ही हम दादा दादी को लेकर हल्दीपुर आ गए थे।
बड़ी माॅ की तलाश ज़ारी थी।
किन्तु अब इस तलाश में फर्क़ ये था कि हमने अपने आदमियों को चारो तरफ उनकी तलाश में लगा दिया था। पुलिस खुद भी उनकी तलाश में लगी हुई थी। अभय चाचा के कहने पर मैं भी अब अपनी पढ़ाई को आगे ज़ारी रखने के लिए मुम्बई जाने को तैयार हो गया था। मैं तो अपनी तरफ से यही कोशिश कर रहा था कि ये जो एक नया संसार बनाया था उसमे हर कोई सुखी रहे, मगर आने वाला समय इस नये संसार के लिए क्या क्या नई सौगात लाएगा इसके बारे में ऊपर बैठे ईश्वर के सिवा किसी को कुछ पता नहीं था।
~~~~~~~~~~समाप्त~~~~~~~~~~~~~
दोस्तो, आप सबके सामने इस कहानी का आख़िरी अपडेट हाज़िर है। उम्मीद करता हूॅ कि आप सबको पसंद आएगा।
हमेशा की तरह आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा।