काला इश्क़!
Disclaimer : "कहानी शुरू करने से पहले मैं बता दूँ की ये मेरी स्वयं की रचना है, कहीं से भी इसे कॉपी नहीं किया गया है| यदि कोई महानुभाव इसे कॉपी करना चाहते हैं तो कृपया credits मेरा नाम: मानु अवश्य दें| इस कहानी का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है| यदि कोई समानता होती है तो उसे मात्र एक संयोग कहा जा सकता है|"
कहानी शुरू होती है एक छोटे से गाँव में जहाँ एक खेती बाड़ी करने वाला जमींदार परिवार रहता है| बड़े भाई सुमेश जमीन की खरीद फरोख करते हैं और उनके छोटे भाई राजेश इन जमीनों पर खेती बाड़ी का काम देखते हैं| बड़े भाई सुमेश का एक लड़का है जिसका नाम चन्दर है और उसकी शादी हो चुकी है| हाल ही में चन्दर के यहाँ बेटी पैदा हुई है परन्तु उसके पैदा होने से घर में कुछ ख़ास ख़ुशी का माहौल नहीं है| बेटी का नाम रितिका रखा गया है, नाम के अनुसार उसके गुण भी हैं, सूंदर और प्यारी सी मुस्कान लिए नन्ही सी परी| छोटे भाई राजेश का भी एक लड़का है जिसका नाम मानू है, और ये कहानी मानु की ही है!
(बाकी कहानी में जैसे जैसे पात्र आते जायेंगे आपको उनका नाम पता चल जायेगा|)
रितिका कुछ महीनों की होगी की कुछ ऐसा भयानक हुआ जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता| रितिका की माँ और चन्दर में जरा भी नहीं बनती थी, चन्दर हर छोटी छोटी बात पर रितिका की माँ पर हाथ छोड़ दिया करता था| रितिका के जन्म के बाद तो भाभी की हालत और भी ख़राब हो गई, चन्दर भैया उससे ढंग से बोलते-बतियाते भी नहीं थे| इसका कारन ये था की उन्हें लड़के की चाहत थी ना की लड़की की| रितिका को उन्होंने कभी अपनी गोद में भी नहीं उठाया था प्यार करना तो दूर की बात थी| मेरी (मानू) उम्र उस समय X साल की थी और तभी एक अनहोनी घटी! भाभी को हमारे खेतों में काम करने वाले एक लड़के से प्रेम हो गया| और प्रेम इस कदर परवान चढ़ गया की एक दिन वो लड़का भाभी को भगा के ले गया| जब ये बात सुबह सबको पता चली तो तुरंत सरपंचों को बुलाया गया और सरपँच ने गाँव के लठैतों को बुलावा भेजा| "बाहू" उन लठैतों का सरगना था और जब उसे सारी बात बताई गई तो उसने १ हफ्ते का समय माँगा और अपने सारे लड़के चारों दिशाओं में दौड़ा दिए| किसी को उस लड़के के घर भेजा जो भाभी को भगा के ले गया था तो किसी को भाभी के मायके| सारे रिश्तेदारों से उसने सवाल-जवाब शुरू कर दिए ताकि उसे किसी तरह का सुराग मिले| इधर रितिका को इस बात का पता भी नहीं था की उसकी अपनी माँ उसे छोड़ के भाग गई है और वो बेचारी अकेली रो रही थी| वो तो मेरी माँ थी जिन्होंने उसे अपनी गोद में उठाया और उसका ख़याल रखा|
छः दिन गुजरे थे की बाहू भाभी और उनके प्रेमी उस लड़के को उठा के सरपंचों के सामने उपस्थित हो गया| बाहु अपनी गरजती आवाज में बोला; "मुखिया जी दोनों को लखनऊ से दबोच के ला रहा हूँ| ये दोनों दिल्ली भागने वाले थे! पर ट्रैन में
चढ़ने से पहले ही दबोच लिया हमने|" भाभी को देख के चन्दर का गुस्सा फुट पड़ा और उसने एक जोरदार तमाचा भाभी के गाल पर दे मारा| पंचों ने चन्दर को इशारे से शाँत रहने को कहा| मुखिया जी उठे और उन्होंने जो गालियाँ देनी शुरू की और उस लड़के के खींच-खींच के तमाचे मारे की उस लड़के की हालत ख़राब हो गई| भाभी हाथ जोड़ के मिन्नतें करने लगी की उसे छोड़ दो पर अगले ही पल मुखिया का तमाचा भाभी को भी पड़ा| "तेरी हिम्मत कैसे हुई हमारे गाँव के नाम पर थूकने की? घर से बहार तूने पैर निकाला तो निकाला कैसे?” ये देख के सभी सर झुका के खड़े हो गए! मुखिया ने बाहु की तरफ देखा और जोर से चिल्ला कर बोले; "बाहु ले जाओ दोनों को और उस पेड़ से बाँध कर जिन्दा जला दो!" ये सुन के सभी मुखिया को हैरानी से देखने लगे पर किसी की हिम्मत नहीं हुई कुछ कहने की| बाहु ने दोनों के जोरदार तमाचा मारा और भाभी और वो लड़का जमीन पर जा गिरे| फिर वो दोनों को जमीन पर घसींट के खेत के बीचों-बीच लगे पेड़ की और चल दिया| दोनों ने बड़ी मिन्नतें की पर बाहु पर उसका कोई फर्क नहीं पड़ा| उसके बलिष्ठ हाथों की पकड़ जरा भी ढीली नहीं हुई और उसने दोनों को अलग अलग पेड़ों से बाँध दिया| फिर अपने चमचों को इशारे से लकड़ियाँ लाने को कहा| चमचों ने सारी लकड़ियाँ भाभी और उस लड़के के इर्द-गिर्द लगा दी और पीछे हट गए| बाहु ने मुड़ के मुखिया के तरफ देखा तो मुखिया ने हाँ में अपनी गर्दन हिलाई और फिर बाहु ने अपने कुर्ते की जेब से माचिस निकाली और एक तिल्ली जला के लड़के की ओर फेंकी| कुछ दो मिनट लगे होंगे लकड़ियों को आग पकड़ने में और इधर भाभी और वो लड़का दोनों छटपटाने लगे| फिर उसने भाभी की तरफ देखा और एक और तिल्ली माचिस से जला कर उनकी और फेंक दी| भाभी और वो लड़का धधकती हुई आग में चीखते रहे ... चिलाते रहे.... रोते रहे ...
पर किसी ने उनकी नहीं सुनी| सब हाथ बाँधे ये काण्ड देख रहे थे| ये फैसला देख और सुन के सभी की रूह काँप चुकी थी और अब किसी भी व्यक्ति के मन में किसी दूसरे के लिए प्यार नहीं बचा था| जब आग शांत हुई तो दोनों प्रेमियों की राख को इकठ्ठा किया गया और उसे एक सूखे पेड़ की डाल पर बांध दिया गया| ये सभी के लिए चेतावनी थी की अगर इस गाँव में किसी ने किसी से प्यार किया तो उसकी यही हालत होगी| मैं चूँकि उस समय बहुत छोटा था तो मुझे इस बात की जरा भी भनक नहीं थी और रितिका तो थी ही इतनी छोटी की उसकी समझ में कुछ नहीं आने वाला था| इस वाक्य के बाद सभी के मन में मुखिया के प्रति एक भयानक खौफ जगह ले चूका था| कोई भी अब मुखिया से आँखें मिला के बात नहीं करता था और सभी का सर उनके सामने हमेशा झुका ही रहता था| पूरे गाँव में उनका दबदबा बना हुआ था जिसका उन्होंने भरपूर फायदा भी उठाया| आने वाले कुछ सालों में वो चुनाव के लिए खड़े हुए और भारी बहुमत से जीत हासिल की और सभी को अपने जूते तले दबाते हुए क्षेत्र के विधायक बने| बाहु लठैत उनका दाहिना हाथ था और जब भी किसी ने उनसे टकराने की कोशिश की तो उसने उस शक़्स का नामो-निशाँ मिटा दिया|
update 1
इस दर्दनाक अंत के बाद घरवालों ने चन्दर भैया की शादी दुबारा करा दी और जो नई दुल्हन आई वो बहुत ही काइयाँ निकली! रितिका उसे एक आँख नहीं भाति थी और हमेशा उसे डाँटती रहती| बस कहने को वो उसकी माँ थी पर उसका ख्याल जरा भी नहीं रखती थी| मैं अब बड़ा होने लगा था और रितिका के साथ हो रहे अन्याय को देख मुझे उस पर तरस आने लगता| मैं भरसक कोशिश करता की उसका मन बस मेरे साथ ही लगा रहे तो कभी मैं उसके साथ खेलता, कभी उसे टॉफी खिलाता और अपनी तरफ से जितना हो सके उसे खुश रखता| जब वो स्कूल जाने लायक हुई तो उसकी रूचि किताबों में बढ़ने लगी| जब भी मैं पढ़ रहा होता तो वो मेरे पास चुप चाप बैठ जाती और मेरी किताबों के पन्ने पलट के उनमें बने चित्र देख कर खुश हो जाया करती| मैंने उसका हाथ पकड़ के उसे उसका नाम लिखना सिखाया तो उन अक्षरों को देख के उसे यकीन ही नहीं हुआ की उसने अभी अपना नाम लिखा है| अब चूँकि घर वालों को उसकी जरा भी चिंता नहीं थी तो उन्होंने उसे स्कूल में दाखिल नहीं कराया पर वो रोज सुबह जल्दी उठ के बच्चों को स्कूल जाते हुए देखा करती| मैंने घर पर ही उसे A B C D पढ़ना शुरू किया और वो ख़ुशी-ख़ुशी पढ़ने भी लगी| एक दिन पिताजी ने मुझे उसे पढ़ाते हुए देख लिया परन्तु कुछ कहा नहीं, रात में भी जब हम खाना खाने बैठे तो उन्होंने मुझसे कोई बात नहीं की| मुझे लगा शायद पिताजी को मेरा रितिका को पढ़ाना अच्छा नहीं लगा| अगली सुबह में स्कूल में था तभी मुझे पिताजी और रितिका स्कूल में घुसते हुए दिखाई दिए| मैं उस समय अपनी क्लास से निकल के पानी पीने जा रहा था और पिताजी को देख मैं उनकी तरफ दौड़ा| पिताजी ने मुझसे
हेडमास्टर साहब का कमरा पूछा और जब मैंने उन्हें बताया तो बिना कुछ बोले वहाँ चले गए| पिताजी को स्कूल में देख के डर लग रहा था| ऐसा लग रहा था जैसे वो यहाँ मेरी कोई शिकायत ले के आये हैं और मैं मन ही मन सोचने लगा की मैंने पिछले कुछ दिनों में कोई गलती तो नहीं की? मैं इसी उधेड़-बुन में था की पिताजी मुझे हेडमास्टर साहब के कमरे से निकलते हुए नज़र आये और बिना कुछ बोले रितिका को लेके घर की तरफ चले गए| जब मैं दोपहर को घर पहुँचा तो रितिका बहुत खुश लग रही थी और भागती हुई मेरे पास आई और बोली; "चाचू... दादा जी ने मेरा स्कूल में दाखिला करा दिया!" ये सुनके मुझे बहुत अच्छा लगा और फिर इसी तरह हम साथ-साथ स्कूल जाने लगे| रितिका पढ़ाई में मुझसे भी दो कदम आगे थी, मैंने जो झंडे स्कूल में गाड़े थे वो उनके भी आगे निकल के अपने नाम के झंडे गाड़ रही थी| स्कूल में अगर किन्हीं दो लोगों की सबसे ज्यादा तारीफ होती तो वो थे मैं और रितिका| जब में दसवीं में आया तब रितिका पाँचवीं में थी और इस साल मेरी बोर्ड की परीक्षा थी| मैं मन लगाके पढ़ाई किया करता और इस दौरान हमारा साथ खेलना-कूदना अब लगभग बंद ही हो गया था| पर रितिका ने कभी इसकी शिकायत नहीं की बल्कि वो मेरे पास बैठ के चुप-चाप अपनी किताब से पढ़ा करती| जब मैं पढ़ाई से थक जाता तो वो मेरे से अपनी किताब के प्रश्न पूछती जिससे मेरे भी मन थोड़ा हल्का हो जाता| दसवीं की बोर्ड की परीक्षा अच्छी गई और अब मुझे उसके परिणाम की चिंता होने लगी| पर जब भी रितिका मुझे गुम-सुम देखती वो दौड़ के मेरे पास आती और मुझे दिलासा देने के लिए कहती; "चाचू क्यों चिंता करते हो? आप के नंबर हमेशा की तरह अच्छे आएंगे| आप स्कूल में टॉप करोगे!" ये सुन के मुझे थोड़ी हँसी आ जाती और फिर हम दोनों क्रिकेट खेलने लगते| आखिरकार परिणाम का दिन आ गया और मैं स्कूल में प्रथम आया| परिणाम से घर वाले सभी खुश थे और आज घर पर दवात दी गई| रितिका मेरे पास आई और बोली; "देखा चाचू बोला था ना आप टॉप करोगे!" मैंने हाँ में सर हिलाया और उसके माथे को चुम लिया| फिर मैंने अपनी जेब से चॉकलेट निकाली और उसे दे दी| चॉकलेट देख के वो बहुत खुश हुई और उछलती-कूदती हुई चली गई|ग्यारहवीं में मेरे मन साइंस लेने का था परन्तु जानता था की घर वाले आगे और पढ़ने में खर्चा नहीं करेंगे और ना ही मुझे कोटा जाने देंगे| इसलिए मैंने मन मार के कॉमर्स ले ली और फिर पढ़ाई में मन लगा लिया| स्कूल में मेरे दोस्त ज्यादा नहीं थे और जो थे वो सब के सब मेरी तरह किताबी कीड़े! इसलिए सेक्स आदि के बारे में मुझे कोई ज्ञान नहीं मिला और जो थोड़ा बहुत दसवीं की बायोलॉजी की किताब से मिला भी उसमें भी जान सुखी रहती की कौन जा के लड़की से बात करे? और कहीं उसने थप्पड़ मार दिया तो सारी इज्जत का भाजी-पाला हो जायेगा| इसी तरह दिन गुज़रने लगे और मैं बारहवीं में आया और
फिर से बोर्ड की परीक्षा सामने थी| खेर इस बार भी मैंने स्कूल में टॉप किया और इस बार तो पिताजी ने शानदार जलसा किया जिसे देख घर के सभी लोग बहुत खुश थे| जलसा ख़तम हुआ तो अगले दिन से ही मैंने कॉलेज देखने शुरू कर दिए| कॉलेज घर से करीब ४ घंटे दूर था तो आखिर ये तय हुआ की मैं हॉस्टल में रहूँगा पर हर शुक्रवार घर आऊँगा और संडे वापस हॉस्टल जाना होगा| जब ये बात रितिका को पता चली तो वो बेचारी बहुत उदास हो गई|
मैं: क्या हुआ ऋतू? (मैं रितिका को प्यार से ऋतू बुलाया करता था|)
रितिका: आप जा रहे हो? मुझे अकेला छोड़ के?
मैं: पागल... मैं बस कॉलेज जा रहा हूँ ... तुझसे दूर थोड़े ही जाऊँगा? और फिर मैं हर फ्राइडे आऊँगा ना|
रितिका: आपके बिना मेरे साथ कौन बात करेगा? कौन मेरे साथ खेलेगा? मैं तो अकेली रह जाऊँगी?
मैं: ऐसा नहीं है ऋतू! सिर्फ चार दिन ही तो मैं बहार रहूँगा ... बाद में फिर घर आ जाऊँगा|
रितिका: पक्का?
मैं: हाँ पक्का ... प्रॉमिस करता हूँ|
रितिका को किया ये ऐसा वादा था जिसे मैंने कॉलेज के तीन साल तक नहीं तोडा| मैं हर फ्राइडे घर आ जाया करता और संडे दोपहर हॉस्टल वापस निकल जाता| जब मैं घर आता तो रितिका खुश हो जाया करती और संडे दोपहर को जाने के समय फिर दुखी हो जाय करती थी|
update 2
इधर कॉलेज के पहले ही साल मेरे कुछ 'काँड़ी' दोस्त बन गए जिनकी वजह से मुझे गांजा मिल गया और उस गांजे ने मेरी जिंदगी ही बदल दी| रोज रात को पढ़ाई के बाद में गांजा सिग्रेटे में भर के फूँकता और फ़ूँकते-फ़ूँकते ही सो जाया करता| सारे दिन की टेंशन लुप्त हो जाती और नींद बड़ी जबरदस्त आती| पर अब दिक्कत ये थी की गांजा फूँकने के लिए पैसे की जर्रूरत थी और वो मैं लाता कहाँ से? घर से तो गिनती के पैसे मिलते थे, तभी एक दोस्त ने मुझे कहा की तू कोई पार्ट टाइम काम कर ले! आईडिया बहुत अच्छा था पर करूँ क्या? तभी याद ख्याल आया की मेरी एकाउंट्स बहुत अच्छी थी, सोचा क्यों न किसी को टूशन दूँ? पर इतनी आसानी से छडे लौंडे को कोई काम कहाँ देता है? एक दिन मैं दोस्तों के साथ बैठ चाय पी रहा था की मैंने अखबार में एक इश्तिहार पढ़ा: 'जर्रूरत है एक टीचर की' ये पढ़ते ही मैं तुरंत उस जगह पहुँच गया और वहाँ मेरा बाकायदा इंटरव्यू लिया गया की मैं कहाँ से हूँ और क्या करता हूँ? जब मैंने उन्हें अपने बारे में विस्तार से बताया और अपनी बारहवीं की मार्कशीट दिखाई तो साहब बड़े खुश हुए| फिर उन्होंने अपनी बेटी, जिसके लिए वो इश्तिहार दिया गया था उससे मिलवाया| एक दम सुशील लड़की थी और कोई देख के कह नहीं सकता की उसका बाप इतने पैसे वाला है| उसका नाम शालिनी था, उसने आके मुझे नमस्ते कहा और सर झुकाये सिकुड़ के सामने सोफे पर बैठ गई| उसके पिताजी ने उससे से मेरा तार्रुफ़ करवाया और फिर उसे अंदर से किताबें लाने को कहा| जैसे ही वो अंदर गई उसके पिताजी ने मेरे सामने एक शर्त साफ़
रख दी की मुझे उनकी बेटी को उनके सामने बैठ के ही पढ़ाना होगा| मैंने तुरंत उनकी बात मान ली और उसके बाद उन्होंने मुझे सीधे ही फीस के लिए पूछा! अब मैं क्या बोलूं क्या नहीं ये नहीं जानता था| वो मेरी इस दुविधा को समझ गए और बोले; १००/- प्रति घंटा| ये सुन के मेरे कान खड़े हो गए और मैंने तुरंत हाँ भर दी| इधर उनकी बेटी किताब ले के आई और मेरे सामने रख दी| ये किताब एकाउंट्स की थी जो मेरे लिए बहुत आसान था| उस दिन के बाद से मैं उसे रोज पाँच बजे पढ़ाने पहुँच जाता और एक घंटा या कभी कभी डेढ़-घंटा पढ़ा दिया करता| वो पढ़ने में इतनी अच्छी थी की कभी-कभी तो मैं उसे डेढ़-घंटा पढ़ा के भी एक ही घंटा लिख दिया करता था| शालिनी के पहले क्लास टेस्ट में उसके सबसे अच्छे नंबर आये और ये देख उसके पिताजी भी बहुत खुश हुए और उसी दिन उन्होंने मुझे मेरी कमाई की पहली तनख्वा दी, पूरे ३०००/- रुपये! मेरी तनख्वा मेरे हाथों में देख मैं बहुत खुश हुआ और अगले दिन चूँकि शुक्रवार था तो मैंने सबसे पहले कॉलेज से बंक मारा और रितिका के लिए नए कपडे खरीदे और उसके बाद एक चॉकलेट का बॉक्स लेके मैं बस में चढ़ गया| चार घंटे बाद में घर पहुँचा तो चुपचाप अपना बैग कमरे में रख दिया ताकि कोई उसे खोल के ना देखे| इधर दबे पाँव में रितिका के कमरे में पहुँचा और उसे चौंकाने के लिए जोर से चिल्लाया; "सरप्राइज"!!! ये सुनते ही वो बुरी तरह डर गई और मुझे देखते ही वो बहुत खुश हुई| जैसे ही वो मेरी तरफ आई मैंने उसे कस के गले लगा लिया और बोला; "HAPPY BIRTHDATY ऋतू"!!! ये सुनके तो वो और भी चौंक गई और उसने आज कई सालों बाद मेरे गाल पर चुम लिया और "THANK YOU" कहा| मैंने उसे अपने कमरे में भेज दिया और मेरा बैग ले आने को कहा| जब तक वो मेरा बैग लाइ मैं उसके कमरे में बैठा उसकी किताबें देख रहा था| उसने बैग ला के मेरे हाथ में दिया और मैंने उसमें से उसका तोहफा निकाल के उसे दिया| तोहफा देख के वो फूली न सामै और मुझे जोर से फिर गले लगा लिया और मेरे दोनों गालों पर बेतहाशा चूमने लगी| उसे ऐसा करते देख मुझे बहुत ख़ुशी हुई! घर में कोई नहीं था जो उसका जन्मदिन मनाता हो, मुझे याद है जब से मुझे होश आया था मैं ही उसके जन्मदिन पर कभी चॉकलेट तो कभी चिप्स लाया करता और उसे बधाई देते हुए ये दिया करता था और वो इस ही बहुत खुश हो जाया करती थी| जब की मेरे जन्मदिन वाले दिन घर में सभी मुझे बधाई देते और फिर मंदिर जाया करते थे| मुझे ये भेद-भाव कतई पसंद ना था परन्तु कुछ कह भी नहीं सकता था|
खेर अपना तौफा पा कर वो बहुत खुश हुई और मुझसे पूछने लगी;
रितिका: चाचू मैं इसे अभी पहन लूँ?
मैं: और नहीं तो क्या? इसे देखने की लिए थोड़ी ही दिया है तुझे?!
वो ये सुन के तुरंत नीचे भागी और बाथरूम में पहन के बहार आके मुझे दिखाने लगी| नारंगी रंग की A - Line की जैकेट के साथ एक फ्रॉक थी और उसमें रितिका बहुत ही प्यारी लग
रही थी| उसने फिर से मेरे गले लग के मुझे धन्यवाद दिया, परन्तु उसकी इस ख़ुशी किसी को एक आँख नहीं भाई| अचानक ही रितिका की माँ वहाँ आई और नए कपड़ों में देखते ही गरजती हुई बोली; "कहाँ से लाई ये कपडे?" जब वो कमरे में दाखिल हुई और मुझे उसके पलंग पर बैठा देखा तो उसकी नजरें झुक गई| "मैंने दिए हैं! आपको कोई समस्या है कपड़ों से?" ये सुन के वो कुछ नहीं बोली और चली गई| इधर रितिका की नजरें झुक गईं और वो रउवाँसी हो गई| “ऋतू .... इधर आ|” ये कहते हुए मैंने अपनी बाहें खोल दी और उसे गले लगने का निमंत्रण दिया| ऋतू मेरे गले लग गई और रोने लगी| "चाचू कोई मुझसे प्यार नहीं करता" उसने रोते हुए कहा|
"मैं हूँ ना! मैं तुझसे प्यार नहीं करता तो तेरे लिए Birthday Present क्यों लाता? चल अब रोना बंद कर और चल मेरे साथ, आज हम बाजार घूम के आते हैं|" ये सुन के उसने तुरंत रोना बंद किया और नीचे जा के अपना मुंह धोया और तुरंत तैयार हो के आ गई| मैं भी नीचे दरवाजे पर उसी का इंतजार कर रहा था| तभी मुझे वहाँ माँ और पिताजी दिखाई दिए| मैंने उनका आशीर्वाद लिया और उन्हें बता के मैं और रितिका बाजार निकल पड़े| बाजार घर से करीब घंटा भर दूर था और जाने के लिए सड़क से जीप करनी होती थी| जब हम बाजार आये तो मैंने उससे पूछना शुरू किया की उसे क्या खाना है और क्या खरीदना है? पर वो कहने में थोड़ा झिझक रही थी| जब से मैं बाजार अकेले जाने लायक हुआ था तब से मैं रितिका को उसके हर जन्मदिन पर बाजार ले जाया करता था| मेरे अलावा घर में कोई भी उसे अपने साथ बाजार नहीं ले जाता था और बाजार जाके मैंने कभी भी अपने मन की नहीं की, हमेशा उसी से पूछा करता था और वो जो भी कहती उसे खिलाया-पिलाया करता था| पर आज उसकी झिझक मेरे पल्ले नहीं पड़ी इसलिए मैंने उस खुद पूछ लिया; "ऋतू? तू चुप क्यों है? बोलना क्या-क्या करना है आज? चल उस झूले पर चलें?" मैंने उसे थोड़ा सा लालच दिया| पर वो कुछ पूछने से झिझक रही थी;
मैं: ऋतू... (मैं उसे लेके सड़क के इक किनारे बनी टूटी हुई बेंच पर बैठ गया|)
रितिका: चाचू .... (पर वो बोलने से अभी भी झिझक रही थी|)
मैं: क्या हुआ ये तो बता? अभी तो तू खुश थी और अभी एक दम गम-सुम?
रितिका: चाचू... आपने मुझे इतना अच्छा ड्रेस ला के दिया..... इसमें तो बहुत पैसे लगे होंगे ना? और अभी आप मुझे बाजार ले आये ...और.... पैसे....
मैं: ऋतू तूने कब से पैसों के बारे में सोचना शुरू कर दिया? बोल?
रितिका: वो... घर पर सब मुझे बोलेंगे...
मैं: कोई तुझे कुछ नहीं कहेगा! ये मेरे पैसे हैं, मेरी कमाई के पैसे|
ये सुनते ही रितिका आँखें बड़ी कर के मुझे देखने लगी|
रितिका: आप नौकरी करते हैं? आप तो कॉलेज में पढ़ रहे थे ना? आपने पढ़ाई छोड़ दी?
मैं: नहीं पगली! मैं बस एक जगह पार्ट टाइम में पढ़ाता हूँ|
रितिका: पर क्यों? आपको तो पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए? दादाजी तो हर महीने पैसे भेजते हैं आपको! कहीं आपने मेरे जन्मदिन पर खर्चा करने के लिए तो नहीं नौकरी की?
मैं: नहीं .... बस कुछ ... खर्चे पूरे करने होते हैं|
रितिका: कौन से खर्चे?
मैं: अरे मेरी माँ तुझे वो सब जानने की जर्रूरत नहीं है| तू अभी छोटी है....जब बड़ी होगी तब बताऊँगा| अब ये बता की क्या खायेगी?(मैंने हँसते हुए बात टाल दी|)
रितिका ने फिर दिल खोल के सब बताया की उसे पिक्चर देखनी है| मैं उसे ले के थिएटर की ओर चल दिया और दो टिकट लेके हम पिक्चर देखने लगे और फिर कुछ खा-पी के शाम सात बजे घर पहुँचे|
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एक
update 3
सात बजे घर पहुँचे तो ताऊ जी और ताई जी बहुत नाराज हुए|
ताऊ जी: कहाँ मर गए थे दोनों?
मैं: जी वो... आज ऋतू का जन्मदिन था तो.....(आगे बात पूरी होती उससे पहले ही उन्होंने फिर से झाड़ दिया|)
ताऊ जी: जन्मदिन था तो? इतनी देर तक बहार घूमोगे तुम दोनों? कुछ शर्म हाय है दोनों में या शहर पढ़ने जा के बेच खाई?
इतने में वहाँ पिताजी पहुँच गए और उन्होंने थोड़ा बीच-बचाव करते हुए डाँटा|
पिताजी: कहा था ना जल्दी आ जाना? इतनी देर कैसे लगी?
मैं: जी वो जीप ख़राब हो गई थी| (मैंने झूठ बोला|)
ताऊ जी: (पिताजी से) तुझे बता के गए थे दोनों?
पिताजी: हाँ
ताऊ जी: तो मुझे बता नहीं सकता था?
पताजी: वो भैया मैं तिवारी जी के गया हुआ था वो अभी-अभी आये हैं और आपको बुला रहे हैं|
ये सुनते ही ताऊ जी कमर पे हाथ रख के चले गए और साथ पिताजी भी चले गए| उनके जाते ही मैंने चैन की साँस ली और रितिका की तरफ देखा जो डरी-सहमी सी खड़ी थी और उसकी नजरें नीचे झुकी हुई थीं|
मैं: क्या हुआ?
रितिका: मेरी वजह से आपको डाँट पड़ी!
मैं: अरे तो क्या हुआ? पहली बार थोड़े ही है? छोड़ ये सब और जाके कपडे बदल और नीचे आ|
रितिका सर झुकाये चली गई और मैं आंगन में चारपाई पर बैठ गया| तभी वहाँ माँ आई और उन्होंने भी मुझे डाँट लगाईं| खेर रात गई बात गई!
अगली सुबह मैं अपने दोस्त से मिलने गया ये वही दोस्त है जिसके पिताजी यानि तिवारी जी कल रात को आये थे|
संकेत तिवारी: और भाई मानु! क्या हाल-चाल? कब आये?
मैं: अरे कल ही आया था, और तू सुना कैसा है?
संकेत तिवारी: अरे अपना तो वही है! लुगाई और चुदाई!
मैं: साले तू नहीं सुधारा! खेर कम से कम तू अपने पिताजी के कारोबार में ही उनका हाथ तो बताने लगा! अच्छा ये बता यहाँ कहीं माल मिलेगा?
संकेत तिवारी: हाँ है ना! बहुत मस्त वाला और वो भी तेरे घर पर ही है!
मैं: क्या बकवास कर रहा है?
संकेत तिवारी: अबे सच में! तेरी भाभी....
हाय-हाय क्या मस्त माल है!
मैंने: (उसका कॉलर पकड़ते हुए) बहनचोद साले चुप करजा वरना यहीं पेल दूँगा तुझे!
संकेत तिवारी: अच्छा-अच्छा.......... माफ़ कर दे यार.... सॉरी!
मैं ने उसका कॉलर छोड़ा और जाने लगा तभी उसने आके पीछे से मेरे कंधे पर हाथ रखा और कान पकड़ के माफ़ी माँगने लगा|
संकेत तिवारी: भाई तेरी बचपन की आदत अभी तक गई नहीं है! साला अभी भी हर बात को दिल से लगा लेता है|
मैं: परिवार के नाम पर कोई मजाक बर्दाश्त नहीं है मुझे! और याद रखिओ इस बात को दुबारा नहीं समझाऊँगा|
संकेत तिवारी: अच्छा यार माफ़ कर दे! आगे से कभी ऐसा मजाक नहीं करूँगा| चल तुझे माल पिलाता हूँ!
खेत पर एक छप्पर था जहाँ उसका टूबवेल लगा था| वहीँ पड़ी खाट पर मैं बैठ गया और उसने गांजा जो एक पुटकी में छप्पर में खोंस रखा था उसे निकला और फिर अच्छे से अंगूठे से मला और फिर सिगरेट में भर के मेरी ओर बढ़ा दी| मैंने सिगरेट मुंह पर लगाईं और सुलगाई और पहला काश मारते ही दिमाग सुन्न पड़ने लगा और मैं उसकी की चारपाई पर लेट के काश मारने लगा| सिगरेट आधी हुई तो उसने मेरे हाथ से सिगरेट ले ली और वो भी फूँकने लगा|
संकेत तिवारी: और बता ... कोई लड़की-वड़की पटाई या फिर अब भी अपने हाथ से हिलाता है?
मैं: साले फर्स्ट ईयर में हूँ अभी घंटा कोई लड़की नहीं मिली जिसे देख के आह निकल जाए!
संकेत तिवारी: अबे तेरा मन नहीं करता चोदने का? बहनचोद स्कूल टाइम से देख रहा हूँ साला अभी तक हथ्थी लगाता है|
मैं: अबे यार किससे बात करूँ, सुन्दर लड़की देख के लगता है की पक्का इसका कोई न कोई बॉयफ्रेंड होगा| फिर खुद ही खुद को रिजेक्ट कर देता हूँ|
संकेत तिवारी: अबे तो शादी कर ले!
मैं: पागल है क्या? शादी कर के खिलाऊँगा क्या बीवी को?
संकेत तिवारी: अपना लंड और क्या?
मैं: बहनचोद तू नहीं सुधरेगा!!!
संकेत तिवारी: अच्छा ये बता ये माल कब फूँकना शुरू किया?
मैं: यार कॉलेज के पहले महीने में ही कुछ दोस्त मिल गए और फिर घर की याद बहुत आती थी| इसे फूँकने के बाद दिमाग सुन्न हो जाता और मैं चैन से सो जाया करता था|
संकेत तिवारी: अच्छा ये बता, रंडी चोदेगा?
मैं: पागल हो गे है क्या तू?
संकेत तिवारी: अबे फट्टू साले! तेरे बस की कुछ नहीं है!
मैं: बहनचोद मैं तेरी तरह नहीं की कोई भी लड़की चोद दूँ! प्यार भी कोई चीज होती है?!
संकेत तिवारी: ओये भोसड़ीवाले ये प्यार-व्यार क्या होता है? बेहजनचोद पता नहीं तुझे तेरी भाभी के बारे में?
मैं: (चौंकते हुए) क्या बोल रहा है तू?
और फिर संकेत ने मुझे सारी कहानी सुनाई जिसे सुन के सारा नशा काफूर हो गया| खेत में खड़ा वो पेड़ जिसमें दोनों प्रेमियों की अस्थियां हैं जहाँ पिताजी कभी जाने नहीं देते थे वो सब याद आने लगा| ये सब सुन के तो बुरी तरह फट गई और दिल में जितने भी प्यार के कीड़े थे सब के सब मर गए! मैंने फैसला कर लिया की चाहे जो भी हो जाये प्यार-व्यार के चक्कर में
नहीं पडूँगा! खेर उस दिन के बाद मेरे मन में प्यार की कोई जगह नहीं रह गई थी| मैंने खुद का ध्यान पढ़ाई और पार्ट-टाइम जॉब में लगा दिया और जो समय बच जाता उसमें मैं रितिका के साथ कुछ खुशियां बाँट लेता| दो साल और निकल गए और मैं थर्ड ईयर में आ गया और रितिका भी दसवीं कक्षा में आ गई| अब इस साल उसके बोर्ड के पेपर थे और उसका सेंटर घर से कुछ दूर था तो अब घर वालों को तो कोई चिंता थी नहीं| उनकी बला से वो पेपर दे या नहीं पर मैं ये बात जानता था इसलिए जब उसकी डेट-शीट आई तो मैं ने उससे उसके सेंटर के बारे में पूछा| वो बहुत परेशान थी की कैसे जाएगी? उसकी एक-दो सहलियां थी पर उनका सेंटर अलग पड़ा था!
मैं: ऋतू? क्या हुआ परेशान लग रही है?
रितिका: (रोने लगी) चाचू ... मैं....कल पेपर नहीं दे पाऊँगी! सेंटर तक कैसे जाऊँ? घर से अकेले कोई नहीं जाने दे रहा और पापा ने भी मना कर दिया? दादाजी भी यहाँ नहीं हैं!
मैं: (ऋतू के सर पर प्यार से एक चपत लगाई|) अच्छा ?? और तेरे चाचू नहीं हैं यहाँ?
रितिका: चाचू ... पेपर तो सोमवार को है और आप तो रविवार को चले जाओगे?
मैं: पागल ... मैं नहीं जा रहा! जब-जब तेरे पेपर होंगे मैं ठीक एक दिन पहले आ जाऊँगा|
और हुआ भी यही .... मैं पेपर के समय रितिका को सेंटर छोड़ देता और जब तक वो बहार नहीं आती तब तक वहीँ कहीं घूमते हुए समय पार कर लेता और फिर उसे ले के घर आ जाता| रास्ते में हम उसी के पेपर को डिसकस करते जिससे उसे बहुत ख़ुशी होती| सारे पेपर ख़तम हुए और आप रिजल्ट का इंतजार था| पर इधर घर वालों ने उसकी शादी के लिए लड़का ढूँढना शुरू कर दिया| जब ये बात रितिका को पता चली तो उसे बहुत बुरा लगा क्योंकि वो हर साल स्कूल में प्रथम आया करती थी पर घर वाले हैं की उनको जबरदस्ती उसकी शादी की पड़ी थी| रितिका अब मायूस रहने लगी थी और मुझसे उसकी ये मायूसी नहीं देखि जा रही थी, परन्तु मैं कुछ कर नहीं सकता था| शुक्रवार शाम जब मैं घर पहुँचा तो रितिका मेरे पास पानी ले के आई पर उसके चेहरे पर अब भी गम का साया था| रिजल्ट रविवार सुबह आना था पर घर में किसी को कुछ भी नहीं पड़ी थी| मैंने ताई जी और माँ से रितिका के आगे पढ़ने की बात की तो दोनों ने मुझे बहुत तगड़ी झाड़ लगाईं! ''इसकी उम्र में लड़कियों की शादी हो जाती है!" ये कह के उन्होंने बात खत्म कर दी और मैं अपना इतना सा मुंह ले के ऊपर अपने कमरे में आ गया| कुछ देर बाद रितिका मेरे पास आई और बोली; ''चाचू... आप क्यों मेरी वजह से बातें सुन रहे हो? रहने दो...
जो किस्मत में लिखा है वो तो मिलके रहेगा ना?"
"किस्मत बनाने से बनती है, उसके आगे यूँ हथियार डालने से कुछ नहीं मिलता|" इतना कह के मैं वहाँ से उठा और घर से निकल गया| शनिवार सुबह मैं उठा और फिर घूमने के लिए घर से निकल गया| शाम को घर आया और खाना खाके फिर सो गया| रविवार सुबह मैं जल्दी उठा और नाहा-धो के तैयार हो गया| मैंने रितिका को आवाज दी तो वो रसोई से निकली और मेरी तरफ हैरानी से देखने लगी; "जल्दी से तैयार होजा, तेरा रिजल्ट लेने जाना है|" पर मेरी इस बात का उस पर कोई असर ही नहीं पड़ा वो सर झुकाये खड़ी रही| इतने में उसकी सौतेली माँ आ गई और बीच में बोल पड़ी; "कहाँ जा रही है? खाना नहीं बनाना?"
"भाभी मैं इसे ले के रिजल्ट लेने जा रहा हूँ!" मैंने उनकी बात का जवाब हलीमी से दिया|
"क्या करोगे देवर जी इसका रिजल्ट ला के? होनी तो इसकी शादी ही है! रिजल्ट हो या न हो क्या फर्क पड़ता है?" भाभी ने तंज कस्ते हुए कहा|
"शादी आज तो नहीं हो रही ना?" मैंने उनके तंज का जवाब देते हुए कहा और रितिका को तैयार होने को कहा| तब तक मैं आंगन में ही बैठा था की वहाँ ताऊ जी, पिताजी, चन्देर, माँ और ताई जी भी आ गए और मुझे तैयार बैठा देख पूछने लगे;
ताऊ जी: आज ही वापस जा रहा है?
मैं: जी नहीं! वो ऋतू का रिजल्ट आएगा आज वही लेने जा रहा हूँ उसके साथ|
पिताजी: रिजल्ट ले के सीधे घर आ जाना, इधर उधर कहीं मत जाना| पंडितजी को बुलवाया है रितिका की शादी की बात करने के लिए|
मैंने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया की तभी रितिका ने ऊपर से साड़ी बात सुन ली और उसका दिल अब टूट चूका था| मैंने उसे जल्दी आने को कहा और फिर अपनी साईकिल उठाई और उसे पीछे बिठा के पहले उसे मंदिर ले गया और वहाँ उसके पास होने की प्रार्थना की और फिर सीधे बाजार जा के इंटरनेट कैफ़े के बहार रुक गया|
मैं: रिजल्ट की चिंता मत कर, तू फर्स्ट ही आएगी देख लेना!
रितिका: क्या फायदा! (उसने मायूसी से कहा)
मैं: तेरी शादी कल नहीं हो रही! समझी? थोड़ा सब्र कर भगवान् जर्रूर मदद करेगा|
पर रितिका बिलकुल हार मान चुकी थी और उसके मन में कोई उम्मीद नहीं थी की कुछ अच्छा भी हो सकता है| करीब दस बजे रिजल्ट आया और दूकान में भीड़ बढ़ने लगी, मैंने जल्दी से रितिका का रोल नंबर वेबसाइट में डाला और जैसे ही उसका रिजल्ट आया मैं ख़ुशी से उछाल पड़ा! उसने 97% अंक स्कोर किये थे| ये जब मैंने उसे बताया तो वो भी बहुत खुश हुई और मेरे गले लग गई| हम दोनों ख़ुशी-ख़ुशी दूकान से मार्कशीट का प्रिंट-आउट लेके निकले और मैं उसे सबसे पहले मिठाई की दूकान पर ले गया और रस मलाई जो उसे सबसे ज्यादा पसंद थी खिलाई| फिर मैंने घर के लिए भी पैक करवाई और हम फिर घर पहुँचे|
update 4
घर पहुँचते ही देखा तो पंडित जी अपनी आसानी पर बैठे थे और कुछ पोथी-पत्रा लेके उँगलियों पर कुछ गिन रहे थे| उन्हें देखते ही रितिका के आँसूं छलक आये और जो अभी तक
खुश थी वो फिर से मायूस हो के अपने कमरे में घुस गई| मुझे भी पंडित जी को देख के घरवालों पर बहुत गुस्सा आया की कम से कम कुछ देर तो रुक जाते| ऋतू कुछ दिन तो खुश हो लेती! इधर रितिका के हेडमास्टर साहब भी आ धमके और सब को बधाइयाँ देने लगे पर घर में कोई जानता ही नहीं था की वो बधाई क्यों दे रहे हैं?
"रितिका के 97% आये हैं!!!" मैंने सर झुकाये कहा|
"सिर्फ यही नहीं भाई साहब बल्कि, रितिका ने पूरे प्रदेश में टॉप किया है! उसके जितने किसी के भी नंबर नहीं हैं!" हेडमास्टर ने गर्व से कहा|
"अरे भाई फिर तो मुँह मीठा होना चाहिए!" लालची पंडित ने होठों पर जीभ फेरते हुए कहा| |
मैंने भाभी को रस मलाई से भरा थैला दीया और सब के लिए परोस के लाने को कहा| इतने में हेड मास्टर साहब बोले; "भाई साहब मानना बढ़ेगा, पहले आपके लड़के ने दसवीं में जिले में टॉप किया था और आपकी पोती तो चार कदम आगे निकल गई! वैसे है कहाँ रितिका?" मैंने रितिका को आवाज दे कर बुलाया और वो अपने आँसुंओं से ख़राब हो चुके चेहरे को पोंछ के नीचे आई और हेडमास्टर साहब के पाँव छुए और उन्होंने उसके सर पर हाथ रख के आशीर्वाद दिया| फिर उसने मुझे छोड़के सभी के पाँव छुए और सब ने सिर्फ उसके सर पर हाथ रख दिया पर कुछ बोले नहीं| आज से पहले ऐसा कुछ नहीं हुआ था! इससे पहले की रस मलाई परोस के आती पंडित बोल पड़ा; "जजमान! एक विकट समस्या है लड़की की कुंडली में!" ये सुनते ही सारे चौंक गए पर रितिका को रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ा| वो बस हाथ बंधे और सर झुकाये मेरे साथ खड़ी थी| पंडित ने आगे अपनी बात पूरी की; "लड़की की कुंडली में ग्रहों और नक्षत्रों की कुछ असामान्य स्थिति है जिसके कारन इसका विवाह आने वाले पाँच साल तक नामुमकिन है!"
ये सुन के सब के सब सुन्न हो गए और इधर रितिका के मुख पर अभी भी कोई भाव नहीं आया था| "परन्तु कोई तो उपाय होगा? कोई व्रत, कोई पूजा पाठ, कोई हवन? कुछ तो उपाय करो पंडित जी?" ताऊ जी बोले|
"नहीं जजमान! कोई उपाय नहीं! जब तक इसके प्रमुख ग्रहों की दशा नहीं बदलती तब तक कुछ नहीं हो सकता? जबरदस्ती की गई तो अनहोनी हो सकती है?" पंडित ने सबको चेतावनी दी! ये सुन के सब के सब स्तब्ध रह गए| करीब दस मिनट तक सभी चुप रहे! कोई कुछ बोल नहीं रहा था की तभी मैंने चुप्पी तोड़ते हुए कहा; "तो रितिका को आगे पढ़ने देते हैं? अब पाँच साल घर पर रह कर करेगी भी क्या? कम से कम कुछ पढ़ लिख जाएगी तो परिवार का नाम रोशन होगा!" ये सुनते ही ताई जी बोल पड़ी; "कोई जर्रूरत नहीं है आगे पढ़ने की? जितना पढ़ना था इसने पढ़ लिया अब चूल्हा-चौका संभाले! पाँच साल बाद ही सही पर जायेगी तो ससुराल ही? वहाँ जा के क्या नाम करेगी?" इतने में ही हेडमास्टर साहब बोल पड़े; "अरे भाभी जी क्या बात कर रहे हो आप? वो ज़माना गया जब लड़कियों के पढ़े लिखे होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता था! आजकल तो लड़कियां लड़कों से कई ज्यादा
आगे निकल चुकी हैं! शादी के बाद भी कई सास-ससुर अपनी बहु को नौकरी करने देते हैं जिससे न केवल घर में आमदनी का जरिया बढ़ता है बल्कि पति-पत्नी घर की जिम्मेदारियाँ मिल के उठाते हैं| हर जगह कम से कम ग्रेजुएट लड़की की ज्यादा कदर की जाती है! वो घर के हिसाब-किताब को भी संभालती है| अगर कल को रितिका के होने वाले पति का कारोबार हुआ तो ये भी उसकी मदद कर सकती है और ऐसे में सारा श्रेय आप लोगों को ही मिलेगा| आपके समधी-समधन आप ही को धन्यवाद करेंगे की आपने बच्ची को इतने प्यार से पढ़ाया लिखाया है!"
''और अगर इतनी पढ़ाई लिखाई के बावजूद इस के पर निकल आये और ये ज्यादा उड़ने लगी तो? या मानलो कल को इसके जितना पढ़ा लिखा लड़का न मिला तो?" ताऊ जी ने अपना सवाल दागा! "आपको लगता है की आपकी इतनी सुशील बेटी कभी ऐसा कुछ कर सकती है? मैंने इसे आज तक किसी से बात करते हुए नहीं देखा| सर झुका के स्कूल आती है और सर स्झुका के वापस! ऐसी गुणवान लड़की के लिए वर न मिले ऐसा तो हो ही नहीं सकता" आप देख लेना इसे सबसे अच्छा लड़का मिलेगा!" हेडमास्टर साहब ने छाती ठोंक के कहा|
"पर..." पिताजी कुछ बोलने लगे तो हेडमास्टर साहब बीच में बोल पड़े| "भाई साहब मैं आपसे हाथ जोड़ के विनती करता हूँ की आप बच्ची को आगे पढ़ने से न रोकिये! ये बहुत तरक्की करेगी, मुझे पूरा विश्वास है इस पर!"
"ठीक है... हेडमास्टर साहब!" ताऊ जी बोले और भाभी को मीठा लाने को बोले| ताऊ जी का फैसला अंतिम फैसला था और उसके आगे कोई कुछ नहीं बोला, इतने में भाभी रस मलाई ले आई पर उनके चेहरे पर बारह बजे हुए थे| सभी ने मिठाई खाई और फिर पंडित जी अपने घर निकल गए और हेड मास्टर साहब अपने घर| साफ़ दिखाई दे रहा था की रितिका के आगे पढ़ने से कोई खुश नहीं था और इधर रितिका फूली नहीं समां रही थी| घर के सारे मर्द चारपाई पर बैठ के कुछ बात कर रहे थे और इधर मैं और रितिका दूसरी चारपाई पर बैठे आगे क्या कोर्स सेलेक्ट करना है उस पर बात कर रहे थे| रितिका साइंस लेना चाहती थी पर मैंने उसे विस्तार से समझाया की साइंस लेना उसके लिए वाजिब नहीं क्योंकि ग्यारहवीं की साइंस के लिए उसे कोचिंग लेना जर्रूरी है| अब चूँकि कोचिंग सेंटर घर से घंटा भर दूर है तो कोई भी तुझे लेने या छोड़ने नहीं जायेगा| ऊपर से साइंस लेने के बाद या तो उसे इंजीनियरिंग करनी होगी या डॉक्टरी और दोनों ही सूरतों में घर वाले उसे घर से दूर कोचिंग, प्रेपरेशन और टेस्ट के लिए नहीं जाने देंगे! अब चूँकि एकाउंट्स और इकोनॉमिक्स उसके लिए बिलकुल नए थे तो मैंने उसे विश्वास दिलाया की इन्हें समझने में मैं उसकी पूरी मदद करूँगा| अब रितिका निश्चिन्त थी और उसके मुख पर हँसी लौट आई थी, वो उठ के अपने कमरे में गई| अगले महीने मेरे पेपर थे तो मैं उन दिनों घर नहीं जा सका और जब पहुँचा तो रितिका के स्कूल खुलने वाले थे और मैं पहले ही उसके लिए
कुछ हेल्पबूक्स ले आया था| उन हेल्पबूक्स की मदद से मैंने उसे एकाउंट्स और इकोनॉमिक्स के टिप्स दे दिए| अब मेरे कॉलेज के रिजल्ट का इंतजार था और मैं घर पर ही रहने लगा था| पार्ट टाइम वाली टूशन भी छूट चुकी थी तो मैंने घर पर रह के रितिका को पढ़ना शुरू कर दिया और अब वो एकाउंट्स में बहुत अच्छी हो चुकी थी| जब मेरे रिजल्ट आया तो घरवाले बहुत खुश हुए क्योंकि मैंने कॉलेज में टॉप किया था| मैं घर लौटा तो घर वालों ने उस दिन गाँव में सबको पार्टी दे डाली, क्योंकि खानदान का मैं पहले लड़का था जो ग्रेजुएट हुआ था| पार्टी ख़तम हुई और अगले दिन से ही ताऊ जी ने शादी के लिए जोर डालना शुरू कर दिया पर मैं अभी शादी नहीं करना चाहता था| उन्हें शक हुआ की कहीं मेरा कोई चक्कर तो नहीं चल रहा, इस पर मैंने उन्हें आश्वस्त किया की ऐसा कुछ भी नहीं है| मैं बस नौकरी करना चाहता हूँ, अपने पाँव पर खड़ा होना चाहता हूँ| पर वो मेरी बात सुन के भड़क गए की मुझे भला नौकरी की क्या जर्रूरत है? भरा-पूरा परिवार है और इसमें नौकरी करने की कोई जर्रूरत नहीं, वो चाहें तो उम्र भर मुझे बैठ के खिला सकते हैं| पर मेरे लिए उन्हें समझाना बहुत मुश्किल था फिर मैंने उन्हें वादा कर दिया की 40 साल की उम्र तक मुझे नौकरी करने दें उसके बाद में घर की खेती-बाड़ी संभाल लूंगा और साथ ही ये भी वचन दे डाला की तीन साल बाद में शादी भी कर लूँगा| खेर बड़ी मुश्किल से हाथ-पाँव जोड़ के मैंने सब को मेरे नौकरी करने के लिए मना लिया पर रितिका बहुत उदास थी| मैंने मौका देख के उससे बात की;
मैं: ऋतू तू खुश नहीं है?
रितिका: चाचू... आप नौकरी करोगे तो घर नहीं आओगे? फिर मैं दुबारा अकेली रह जाऊँगी! पहले तो आप २-३ दिन के लिए घर आया करते थे पर अब तो वो भी नहीं! सिर्फ त्यौहार पर ही मिलोगे?
मैं: बाबू... ऐसा नहीं बोलते! मैं घर आता रहूँगा फिर अब अगले साल से तो तू भी बिजी हो जाएगी! बोर्ड्स हैं ना अगले साल!
रितिका: पर ..... (वो जैसे कुछ कहना चाहती हो पर बोल न रही हो|)
मैं: तू चिंता मत कर मैं हर सेकंड सैटरडे घर पर ही रहूँगा| ठीक है? और हाँ अगर तुझे कुछ भी चाहिए किताब, कपडे या कुछ भी तू सीधा मुझे फोन कर देना| मैं तुझे अपने ऑफिस का नंबर दे दूँगा|
रितिका: तो आप कहाँ नौकरी करने जा रहे हो? कहीं से कोई ऑफर आया है?
मैं: नहीं अभी तो नहीं .... कल जा के एक दो जगह कोशिश करता हूँ|
मैंने कोशिश की और आखिर एक दफ्तर में नौकरी मिल ही गई| रहने के लिए कमरा ढूँढना तो उससे भी ज्यादा मुश्किल निकला! ऑफिस से करीब घंटाभर दूर मुझे एक किराये का कमरा मिल गया| शुरू का एक महीना मेरे लिए काँटों भरा था! घर से दफ्तर और दफ्तर से घर आते जाते हालत ख़राब हो जाती! जैसे ही पहली तनख्वा हाथ आई मैंने सबसे पहले अपने लिए बुलेट खरीदी......
EMI पर! घेवालों के लिए कुछ कपडे खरीदे और रितिका के लिए कुछ किताबें और एक सूंदर सी ड्रेस ली! जब सबसे अंत में मैंने उसे ये तौफा दिया तो वो ख़ुशी से झूम उठी और मुझे थैंक्स बोलते हुए उसकी जुबान नहीं थक रही थी|
update 5
खैर दिन बीतने लगे और ऑफिस में मुझे एक सुंदरी पसंद आई, परन्तु कभी हिम्मत नहीं हुई की उससे कुछ बात करूँ! बस काम के सिलसिले में जो बात होती वो होती| इसी तरह एक साल और निकला, और अब रितिका बारहवीं कक्षा में थी और इसी साल उसके बोर्ड के पेपर थे| सेंटर घर से काफी दूर था और इस बार भी मुझे रितिका को पेपर के लिए लेके जाना था| मैं आज जब उसे सेंटर छोड़ने गया तो उसकी सहेलियां मुझे देख के कुछ खुस-फुसाने लगी और हँसने लगी| मैंने उस समय कुछ नहीं कहा और निकल गया और वापस दो घंटे बाद पहुँचा और बहार उसका इंतजार करने लगा| जब वो वापस आई तो हमने पहले पेपर डिसकस किया और फिर मैंने उससे सुबह हुई घटना के बारे में पूछा| तब उसने बताय की उसकी सहेलियों को लगा की मैं उसका बॉयफ्रेंड हूँ! "क्या? और तूने क्या कहा?" मैंने चौंकते हुए पूछा| "मैंने उन्हें बताया की आप मेरे चाचू हो और ये सुनके उनके होश उड़ गए!" और ये कहते हुए वो हँसने लगी| मैंने आगे कुछ नहीं कहा और उसे घर वापस छोड़ा और मैं फिर से दफ्तर निकल गया| दफ्तर पहुँचते-पहुँचते देर हो गई और बॉस ने मेरी एक छुट्टी काट ली! खेर मुझे इस बात का इतना अफ़सोस नहीं था| आज रितिका का आखरी पेपर था और मैं जानता था की उसके सारे पेपर जबरदस्त गए हैं! पर आज जब वो पेपर दे कर निकली तो उसने सर झुका के एक ख्वाइश पेश की; "चाचू....
आज मेरा पिक्चर देखने का मन है!" अब चूँकि मैं उसका दिल तोडना नहीं चाहता था सो मैंने उससे कहा; "आज तो देखना मुश्किल है क्योंकि अगर हम समय से घर नहीं पहुंचे तो आज बवाल होना तय है! तू ऐसा कर कल का प्रोग्राम रख, कल दूसरा शनिवार भी है और मेरी ऑफिस की भी छुट्टी है|"
"पर कल तो कोई पेपर ही नहीं है?" उसने बड़े भोलेपन से कहा| "अरे बुधु! ये तू जानती है, मैं जानता हूँ पर घर पर तो कोई नहीं जानता ना?" मेरी बात सुन के वो खुश हो गई| हम घर पहुँचे तो रितिका बहुत चहक रही थी और आज रात की रसोई उसी ने पकाई| मुझे उसके हाथ का बना खाना बहुत पसंद था क्योंकि उसे पता था की मुझे किस तरह का खाना पसंद है| इसलिए जब भी मैं घर आता था तो वो बड़े चाव से खाना बनाती थी और मैं उसे खुश हो के 'बक्शीश' दिया करता था! अगले दिन दुबारा स्कूल ड्रेस पहन के नीचे आई तो भाभी ने उससे पूछा; "कहाँ जा रही है?" इससे पहले की वो कुछ बोलती मैं खुद ही बोल पड़ा; "पेपर देने और कहाँ?" मेरा जवाब बहुत रुखा था जिसे सुन के भाभी आगे कुछ नहीं बोली| हम दोनों घर से बहार निकले और बुलेट पर बैठ के सुबह का शो देखने चल दिए| थिएटर पहुँच के मैंने उसे पिक्चर दिखाई और फिर हमने आराम से बैठ के नाश्ता किया| फिर वो कहने लगी की मंदिर चलते हैं तो मैं उसे एक मंदिर ले आया | दिन के बारह बजे थे और मंदिर में कोई था नहीं, यहाँ तक की पुजारी भी नहीं था| हम अंदर से दर्शन कर के बहार आये और रितिका मंदिर की सीढ़ियों पर बैठने की जिद्द करने लगी| तो उसकी ख़ुशी के लिए हम थोड़ी देर वहीँ बैठ गए, तभी अचानक से रितिका ने अपना सर मेरे कंधे पर रख दिया और मेरा हाथ अपने दोनों हाथों के बीच दबा दिया| मैंने कुछ नहीं कहा पर मन ही मन मुझे अजीब लग रहा था, पर मैं फिर भी चुप रहा और इधर-उधर देखने लगा की हमें इस तरह कोई देख ना ले| तभी मुझे कोई आता हुआ दिखाई दिया तो मैंने हड़बड़ा के रितिका को हिला दिया और मैं अचानक से खड़ा हो गया| मैं जल्दी से नीचे उतरा और बुलेट स्टार्ट की और रितिका को बैठने को कहा पर ऐसा लगा मानो वो वहाँ से जाना ही ना चाहती हो| वो अपना बस्ता कंधे पर टंगे कड़ी मुझे देख रही थी| "क्या देख रही है? जल्दी बैठ घर नहीं जाना?" मैंने फिर से उसे कहा तो जवाब में उसने सर ना में हिलाया तो मैंने जबरदस्ती उसका हाथ पकड़ा और बैठने को कहा और वो बैठ ही गई| हम वहाँ से चल पड़े इधर रितिका ने पीछे बैठे हुए अपना सर मेरी पीठ पर रख दिया| शुरू के पंद्रह मिनट तो मैं कुछ नहीं बोला पर अंदर ही अंदर मुझे अजीब लगने लगा| घर करीब २० मिनट दूर होगा की मैंने बाइक रोक दी और रितिका से पूछा:
मैं: क्या हुआ पगली? तू कुछ परेशान लग रही है?
रितिका: हम्म
मैं: क्या हुआ? बता ना मुझे?
वो बाइक से उत्तरी और मेरे सामने सर झुका के खड़ी हो गई| मैं अभी भी बाइक पर बैठा था और बाइक स्टैंड पर नहीं थी|
रितिका: मुझे आपसे एक बात कहनी है|
मैं:
हाँ-हाँ बोल|
रितिका: वो... वो.... मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ!
मैं: अरे पगली मैं जानता हूँ तू मुझसे प्यार करती है| इसमें तू ऐसे परेशान क्यों हो रही है?
रितिका: नहीं-नहीं आप समझे नहीं! मैं आपसे सच-मुच् में दिलों जान से प्यार करती हूँ!
मेरा ये सुनना था की मैंने एक जोरदार थप्पड़ उसके बाएँ गाल पर रख दिया| मैं सोच रहा था की ये मुझसे चाचा-भतीजी वाले प्यार के बारे में बात कर रही है पर इसके ऊपर तो इश्क़ का भूत सवार हो गया था!
"तेरा दिमाग ख़राब है क्या? जानती भी है तू क्या कह रही है? और किसे कह रही है? मैं तेरा चाचा हूँ! चाचा! तेरे मन में ऐसा गन्दा ख्याल आया भी कैसे? नशा-वषा तो नहीं करने लगी तू कहीं?" मैंने गरजते हुए कहा|
रितिका की आँखें भर आईं थी पर वो अपने आँसू पोंछते हुए बोली; "प्यार करना कोई गन्दी बात है? आपसे सच्चा प्यार करती हूँ! प्यार उम्र, रिश्ते-नाते कुछ नहीं देखता! प्यार तो प्यार होता है!" रितिका की आवाज जो अभी कुछ देर पहले डरी हुई थी अब उसमें जैसे आत्मविश्वास भर आया हो| उसका ये आत्मविश्वास मेरे दिमाग में गुस्से को निमंत्रण दे चूका था इसलिए मैं चिल्लाते हुए बाइक से उतरा और बाइक छोड़ दी और वो जाके धड़ाम से सड़क पर गिरी| मैंने एक और थप्पड़ रितिका के दाएँ गाल पर दे मारा और जोर से चिल्ला के बोला; "कहाँ से सीखा तूने ये सब? हाँ?.... बोल? इसीलिए तुझे पढ़ाया लिखाया जाता है की तू ये ऊल-जुलूल बातें करे? तुझे पता भी है प्यार क्या होता है?" रितिका की आँखों से आंसुओं की धरा बहे जा रही थी पर वो उसका आत्मविश्वास आज पूरे जोश पर था इसलिए वो भी मेरे सामने तन के जवाब देने लगी; "प्यार या प्रेम एक अहसास है। प्यार अनेक भावनाओं का, रवैयों का मिश्रण है जो पारस्परिक स्नेह से लेकर खुशी की ओर विस्तारित है। ये एक मज़बूत आकर्षण और निजी जुड़ाव की भावना है। किसी इन्सान के प्रति स्नेहपूर्वक कार्य करने या जताने को प्यार कहते हैं। प्यार वह होता है जो आपके दुख में साथ दें सुख में तो कोई भी साथ देता है| प्यार होता है तो हमारी ज़िन्दगी बदल जाती है| प्यार तो एक-दूसरे से दूर रहने पर भी खत्म नहीं होता। जब किसी इंसान के बिना आपको अपना जीवन नीरस लगे! एक दिन वह दिखाई न दे तो दिल बुरी तरह से घबराने लगे। आपको भूख कम लगने लगे या खाने-पीने की सुध न रहे। अखबार में पहले उसकी, फिर अपनी राशि देखें। जब भी वह उठकर कहीं जाए तो आपकी निगाहें उसका पीछा करती रहें।
मेरे लिए तो यही प्यार है!" उसने खुद पर गर्व करते हुए जवाब दिया| इधर रितिका के प्रेम की परिभाषा सुन के मेरे तो होश ही उड़ गए! "तुझे किसने कहा मैं तुझसे प्यार करता हूँ?" मेरे पास उसकी परिभाषा का कोई जवाब नहीं था तो मैंने उससे सवाल करना ही बेहतर समझा| "बचपन से ले के आज तक ऐसा क्या है जो आपने मेरे लिए नहीं किया? मेरा स्कूल जाना, मुझे पढ़ाना, मेरे लिए नए कपडे लाना, मेरा जन्मदिन मनाना वो भी तब घर में कोई मेरा जन्मदिन नहीं मनाता| मुझे अनगिनत दफा आपने डाँट खाने से बचाया, जब जब मैं रोइ तो आप होते थे मेरे आँसूं पोछने! और भी उद्धरण दूँ?" उसने फ़टाक से अपना जवाब दिया| "मैंने ये सब इसलिए किया क्योंकि मुझे तुझ पर तरस आता था| घर में हर कोई तुझे झिड़कता रहता था और तुझे उन्हीं झिड़कियों से बचाना चाहता था|" मेरा जवाब सुन वो जरा भी हैरान नहीं लगी| "प्यार किसी की दया, भावना और स्नेह प्रस्तुत करने का तरीका भी है। किसी इन्सान के प्रति स्नेहपूर्वक कार्य करने या जताने को भी प्यार कहते हैं। ये आपका प्यार ही था जो हमेशा मेरा हित और भला चाहता था, आप बस इस सब से अनजान हो!" साफ़ था की रितिका के ऊपर मेरी किसी भी बात का असर नहीं पड़ने वाला था तो मैंने सोच लिया की इसे अब सब सच बता दूँगा| "ये सभी किताबें बातें हैं! तुझे नहीं पता की असल जिंदगी में प्यार करने वालों के साथ क्या होता है?!" ये कहते हुए मैंने उसे उसकी माँ और उनके प्रेमी के साथ गाँव वालों ने क्या किया था सब सुना दिया और इसे सुनने के बाद वो एक दम सन्न रह गई और उसके चेहरे से साफ़ पता चल गया था की उसके पास इसका कोई भी जवाब नहीं है| अगले दस मिनट तक वो बूत बनी खड़ी रही और इधर मेरी नजर मेरी बाइक पर गई जो नीचे पड़ी थी और उसकी इंडिकेटर लाइट टूट गई थी जिसे देख मुझे और गुस्सा आने लगा| मैंने गुस्से से रितिका को बाइक पर बैठने को कहा और इस बार उसने एक ही बार में मेरी बात सुनी और डरी-सहमी सी वो पीछे आ कर बैठ गई| मैंने फटा-फ़ट बाइक दौड़ाई और घर के दरवाजे पर उसे छोड़ा और वहीँ से बाइक घुमा के वापस शहर लौट आया| शहर आते-आते शाम हो गई और जैसे ही घर में घुसा पिताजी का फोन आया तो मैंने उन्हें झूठ बोल दिया की बॉस ने कुछ जर्रूरी काम दिया था इसलिए जल्दी वापस आ गया| उस रात दो बजे तक माल फूँका और दिमाग में रह-रह के रितिका की बातें गूँज रही थी!
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एक हफ्ता बीता और शुक्रवार के दिन माँ का फ़ोन आया और उन्होंने जो बताया वो सुन के मेरे पाँव-तले जमीन खिसक गई| मैंने बॉस से अर्जेंट छुट्टी माँगी ये कह के की माँ बीमार हैं और मैं वहाँ से धड़-धडाते हुए बाइक चलते हुए घर पहुँचा! भागता हुआ घर में घुसा और सीधा रितिका के कमरे में घुसा तो वो जैसे अध्-मरी वहाँ पड़ी थी| उसके कपड़ों से बू आ रही थी और जब मैंने उसे उठाने के लिए उसका हाथ पकड़ा तो पता चला की उसका पूरा जिस्म भट्टी की
तरह तप रहा था| मैंने पानी की बूँदें उसके चहेरे पर छिडकी तो भी उसकी आँखें नहीं खुली| मैं भागता हुआ नीचे आया तो आँगन में माँ बेचैन खड़ी मिली| उन्होंने बताया की घर पर कोई नहीं है सिवाय उनके और रितिका के| सब किसी ने किसी काम से बहार गए हैं, बीते ६ दिन से रितिका ने कुछ खाया नहीं है, ना ही वो अपने कमरे से बहार निकली थी| १-२ दिन तो सबको लगा की बुखार है अपने आप उतर जायेगा पर उसने खाना-पीना भी छोड़ दिया! ये सुन के तो मेरी हालत और ख़राब हो गई और मैं घर से भागता हुआ निकला और बाइक स्टार्ट की और भगाते हुए बाजार पहुँचा और वहाँ जाके डॉक्टर से मिन्नत कर के उसे घर ले के आया| उसने रितिका का चेक-उप किया और मुझे तुरंत ड्रिप चढाने को कहा और अपने पैड पर बहुत सारी चीजें लिख दीं जिसे मैं दुबारा बाजार से ले के आया| मेरे सामने डॉक्टर ने रितिका को ड्रिप लगाईं और मुझे कड़ी हिदायत देते हुए समझाया की ड्रिप कैसे निकालना है| उनकी बातें सुन के तो मेरी और फ़ट गई की ये मैं कैसे करूँगा!
पहली बोतल तो करीब डेढ़ घंटे में चढ़ी पर उसके बाद वाली चढ़ने में ३ घंटे लगे! मैं सारा टाइम रितिका के कमरे में बैठा था और मेरी नजरे उसके मुख पर टिकी थीं और मन कह रहा था की अब वो आँखें खोलेगी! माँ ने खाने के लिए मुझे नीचे बुलाया पर मैं खाना ऊपर ले के आगया और उसे ढक के रख दिया| रात के एक बजे रितिका की आँख खुली और मैंने तुरंत भाग के उसके बिस्तर के पास घुटने टेक कर उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा; "ये क्या हालत बन ली तूने?" उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कराहट आई और उसने पानी पीने का इशारा किया| मैंने उसे सहारा देके बैठाया और पानी पिलाया फिर उससे खाने को कहा तो उसने ना में गर्दन हिला दी| "देख तू पहले खाना खा ले, उसके बाद हम इत्मीनान से बात करते हैं|" पर वो अब भी मना करने लगी| "अच्छा... तू जो कहेगी वो मैं करूँगा ... बस तू खाना खा ले! देख मैं तेरे आगे हाथ जोड़ता हूँ! मैं तुझे इस हालत में नहीं देख सकता!" ये सुन के वो फिर से मुस्कुराई और बैठने की लिए कोशिश करने लगी और मैंने उसे सहारा दे के बैठाया और फिर अपने हाथ से खाना खिलाया और फिर दवाई दे के लिटा दिया| मैं सारी रात उसी के सिरहाने बैठा रहा और जागता रहा| सुबह के ४ बजे उसका बुखार कम हुआ और उसने अपना हाथ मेरी कमर के इर्द-गिर्द लपेट लिया और सोने लगी| सुबह 8 बजे पिताजी और ताऊ जी शादी से लौटे और तब तक मैं रितिका के कमरे में बैठा ऊंघ रहा था| मुझे उसके सिरहाने बैठा देख वो दोनों बहुत गुस्सा हुए और जोर से गरजे; "उतरा नहीं इसका बुखार अभी तक?" ताऊ जी ने बहुत गुस्से में कहा| "ऐसा हुआ क्या था इसे? एक हफ्ते से खाना पीना बंद कर रखा है?" पिताजी ने गुस्से से कहा| "वो पिताजी.... दरअसल पेपर ...
आखरी वाला अच्छा नहीं गया था! इसलिए डरी हुई है! कल मैं डॉक्टर को लेके आया था उन्होंने दवाई दी है, जल्दी अच्छी हो जाएगी|" मैंने रितिका का बचाव किया| थोड़ी देर बाद ताई जी और माँ भी ऊपर आ गए और मुझे रितिका के सिरहाने बैठे उसके सर पर हाथ फेरते हुए देख के ताई जी बोली; "तूने सर पर चढ़ा रखा है इसे! अब तू अपना काम धंधा छोड़ के इसके पास बैठा है! ये नौकरी आखिर तूने की ही क्यों थी?"
"नौकरी छूट गई तो अच्छा ही होगा, आखिर ताऊ जी भी तो ये ही चाहते हैं!" मैंने उनके ताने का जवाब देते हुए कहा| ताई जी ने मुझे घूर के देखा और फिर नीचे जाने लगीं| इधर माँ ने आके मेरे गाल पर एक चपत लगा दी और कहा; "बहुत जुबान निकल आई है तेरी!" इतना कह के वो भी नीचे चलीं गई| रितिका ये सब आंखें मीचे सुन रही थी| माँ के नीचे पहुँचते ही रितिका ने आँख खोली और कहा; "अब भी साबुत चाहिए आपको?" मैं उसकी बात समझ नहीं पाया| "मैं क्या कुछ समझा नहीं?"
रितिका: "मेरी बीमारी सुनते ही आप अपना सारा काम छोड़ के मेरे सिरहाने बैठे हो! सबसे मेरा बीच-बचाव कर रहे हो! दवा-दारू के लिए भाग दौड़ कर रहे हो, और तो और कल रात से एक पल के लिए भी सोये नहीं! अगर ये प्यार नहीं है तो क्या है?"
मैं: पगली! मैं तुझे कैसे समझाऊँ? मेरे मन में ऐसा कुछ नहीं है!
रितिका: आप चाहे कितनी भी कोशिश कर लो छुपाने की, पर मेरा दिल कहता है की आप मुझसे प्यार करते हो|
मैं:अच्छा ... चल एक पल को मैं ये मान भी लूँ की मैं तुझसे प्यार करता हूँ, पर आगे क्या?
रितिका: शादी!!! (उसकी आँखें चमक उठी थीं|)
मैं: इतना आसान नहीं है पागल! ये दुनिया... ये समाज ... ये नहीं हो सकता! ये नहीं हो सकता| (ये कहता हुए मेरी आँखें भीग आईं थीं और मैंने अपना सर झुका लिया|)
रितिका: कुछ भी नामुमकिन नहीं है! हम घर से भाग जायेंगे, किसी नई जगह अपना संसार बनाएंगे| (उसने मेरे सर को उठाते हुए आशावादी होते हुए कहा|)
मैं: नहीं... तू समझ नहीं रही.... ये सब लोग हम दोनों को मौत के घाट उतार देंगे| मैं अपनी चिंता तो नहीं करता पर तू……….. प्लीज मेरी बात मान और ये भूत अपने सर से उतार दे| (मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा पर मेरी बात उस पर रत्ती भर भी असर नहीं दिखा रही थी|)
रितिका: ऐसा कुछ नहीं होगा! आप विश्वास करो मुझ पर, कोई भी हमें नहीं ढूंढ पायेगा|
मैं: ये नामुमकिन है! तेरी माँ को इन्होने ६ दिन में ढूंढ निकला था और तब ना तो मोबाइल फ़ोन थे ना ही इंटरनेट| आज के जमाने में मोबाइल, इंटरनेट, जीपीएस सब कुछ है और तो और वो मुखिया साला अब मंत्री है| इन्हें हमें ढूंढने में ज्यादा समय नहीं लगेगा|
रितिका: बस एक मौका .... एक मौका मुझे दे दो की मैं आपके मन में मेरे लिए प्यार पैदा कर सकूँ! वादा करती हूँ की अगर मैं नाकामयाब हुई तो फिर कभी आपको दुबारा नहीं कहूँगी की मैं आपसे प्यार करती हूँ और वही करुँगी जो आप कहोगे|
मैं: ठीक है ...
पर अगर मेरे मन में तुम्हारे लिए प्यार पैदा नहीं हुआ तो तुम्हें मुझे भूलना होगा और समय आने पर एक अच्छे से लड़के से शादी करनी होगी!
रितिका: मंजूर है...... पर मेरी भी एक शर्त है! आप मुझसे झूठ नहीं बोलोगे!
मैं: कैसा झूठ?
रितिका: वो समय आने पर आपको पता चल जायेगा| पर अभी आपको मेरे सर पर हाथ रख के कसम खानी होगी|
मैं: मैं कसम खाता हूँ की मैं कभी भी तुमसे झूठ नहीं कहूँगा! अब तू आराम कर ... मैं थोड़ा नहा लेता हूँ|
ये कहते हुए मैंने एक जोरदार अंगड़ाई ली और फिर नीचे आके ठन्डे-ठन्डे पानी से नहाया और तब जा के मुझे तारो तजा महसूस हुआ| दोपहर के बारह बज गए थे और भाभी ने मुझे आवाज देके रसोई में बुलाया; "ये लो मानु जी, जा के अपनी चाहिती को खिला दो|" ये कहते हुए उन्होंने एक थाली में खाना भर के मेरी ओर बढ़ा दी! मैंने चुप-चाप थाली उठाई और बिना कुछ बोले वापस ऊपर आ गया| रितिका जाग चुकी थी और भाभी की बात सुन के मंद-मंद मुस्कुरा रही थी| मैंने उसे उठा के बिठाया और वो दिवार से टेक लगा के बैठ गई पर वो प्यारी सी मुस्कान उसके होठों पर अब भी थी! "बड़ी हँसी आ रही है तुझे?" मैंने उसे छेड़ते हुए कहा| जवाब में उसने कुछ नहीं कहा और शर्माने लगी| मैंने दाल-चावल का एक कोर उसे खिलने के लिए अपनी उँगलियों को उसके होठों के सामने लाया तो उसने बड़ी नज़ाकत से अपने होठों को खोला और पहला कोर खाया| "आपके हाथ से खाना आज तो और भी स्वाद लग रहा है|"
"अच्छा? पहली बार तो नहीं खिला रहा मैं तुझे खाना!" मैंने उसे उस के बचपन के वाक्य याद दिलाये! "याद है.... पर अब बात कुछ और है|" और ये कह के वो फिर से मुस्कुराने लगी| उसकी बात सुन के मैं झेंप गया और उससे नजरें चुराने लगा| अब आगे बढ़ के रितिका ने भी थाली से एक कोर लिया और मुझे खिलाने के लिए अपनी उँगलियाँ मेरी और बढ़ा दी| मैंने भी उसके हाथ से एक कोर खाया और उसे रोक दिया ये कह के; "बस! पहले तू खा ले फिर मैं खा लूँगा|"
"नहीं... आप मुझे एक कोर खिलाओ और मैं आपको एक कोर खिलाऊँगी!" उसने बड़े प्यार से मेरी बात का विरोध किया| "तू बहुत जिद्दी हो गई है!" मैंने उसे उल्हना देते हुए कहा| "अब आपकी चहेती हूँ तो थोड़ा तो जिद्दी बन ही जाऊँगी|" उसने भाभी की बात प्यार से दोहराई| मैंने आगे कुछ नहीं कहा और हम एक दूसरे को इसी तरह खाना खिलाते रहे| खाने के बाद मैंने उसे दवाई दे के लिटा दिया और मैं नीचे जाने को हुआ तो वो बोली; "आप भी यहीं लेट जाओ|" मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा और थोड़ा गुस्से से कहा: "ऋतू...
" बस वो मेरी बात समझ गई की ऐसा करने से घरवाले कुछ गलत सोचेंगे| रितिका के बगल वाला कमरा मेरा ही था तो मैं उसमें जा के अपने बिस्तर पर पड़ गया और सो गया| शाम पाँच बजे मेरी आँख खुली और मैं आँखें मलता हुआ रितिका के कमरे में घुसा तो देखा वो वहाँ नहीं है| मैंने नीचे आँगन में झाँका तो वो वहाँ भी नहीं थी! तभी मुझे छत पर उसका दुपट्टा उड़ता हुआ नजर आया और मैं दौड़ता हुआ छत पर जा चढ़ा| वो मुंडेर पर बैठी दूर कहीं देख रही थी| "ऋतू यहाँ क्या कर रही है?" मेरी आवाज सुनके जब उसने मेरी तरफ देखा तो उसकी आँखें नम थी| मैं तुरंत ही आपने घुटनों पर आ गया और उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में ले के बोला; "क्या हुआ ऋतू? तू रो क्यों रही है? किसी ने कुछ कहा?" मेरे चेहरे पर शिकन की रेखा देख कर वो मेरे गले आ लगी और रोने लगी और रोते हुए कहा; "आप......आप....कल ......चले ......जाओगे!" "अरे पगली! मैं सरहद पर थोड़े ही जा रहा हूँ! अब काम है तो जाना पड़ेगा ना? काम तो छोड़ नहीं सकता ना?! पर तू मुझे प्रॉमिस कर की तू अपना अच्छे से ख्याल रखेगी और दुबारा बीमार नहीं पड़ेगी|" मैंने उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा| "पहले आप वादा करो की आप अगले शुक्रवार आओगे!" उसने अपने आँसूँ पोछते हुए कहा|
"ऋतू.... सॉरी पर मैं नहीं आ पाउँगा! अगले शनिवार मेरी एक डेडलाइन है और बॉस भी इतनी छुट्टी नहीं देंगे| इस बार भी मैं ये झूठ बोल के आया की माँ बीमार हैं|" मैंने उसे समझाया| "तो मेरा..... मैं कैसे...." आगे कुछ बोलना छह रही थी पर उसके आँसूँ उसे कुछ कहने नहीं दे रहे थे| "देख...
पहले तू रोना बंद कर फिर मैं तुझे एक तरीका बताता हूँ|" उसने तुरंत रोना बंद कर दिया और अपने आँसूँ पोछते हुए बोली; "बोलिये"| "ये देख मेरा नया मोबाइल! मंगलवार को ही लिया था मैंने और ये ले मेरा कार्ड, ये मुझे बॉस ने बनवा के दिया था| इसमें लिखे मोबाइल पर तू रोज १ बजे फ़ोन करना माँ के मोबाइल से| माँ हर रोज दोपहर को 1 बजे सो जाती है तो तेरे पास कम से कम एक घंटा होगा मुझसे बात करने का, ठीक है?" ये सुन के वो थोड़ा निश्चिन्त हुई फिर मैंने अपने मोबाइल से हम दोनों की एक सेल्फी खींची और उसी दिखाई तो वो बहुत खुश हुई| घर में सिर्फ मेरे और चन्दर के पास ही स्मार्टफोन था बाकी सब अब भी वही बटन वाला फ़ोन इस्तेमाल करते थे| खेर रितिका का मन थोड़ा बहलाने के लिए मैं उसकी फोटो खींचता रहा और उसे स्मार्टफोन के बारे में कुछ बताने लगा और उसे एक-दो गेम भी खेलनी भी सीखा दी| जब तक रितिका छत पर गेम खेलने में बिजी थी तब तक मैं छत पर टहलने लगा और बीते ४८ घंटों में जो कुछ हुआ उसके बारे में सोचने लगा| तभी अचानक से रितिका ने फुल आवाज में एक गाना बजा दिया और मेरे ध्यान उसकी तरफ गया; "ऐसे तुम मिले हो, जैसे मिल रही हो, इत्र से हवा, काफ़िराना सा है इश्क है या क्या है|" उसने गाने की कुछ पंक्तियों में अपने दिल के जज्बात प्रकट किये| मैं कुछ नहीं बोला पर मुस्कुराता हुआ उसकी सामने मुंडेर पर बैठ गया| "ख़ामोशियों में बोली तुम्हारी कुछ इस तरह गूंजती है, कानो से मेरे होते हुए वो दिल का पता ढूंढती है|" रितिका ने फिर से कुछ पंक्तियों से मेरे मन को टटोला| मैं खड़ा हुआ और अपना बायाँ हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिया और उसने उसे थाम लिया और हम धीरे-धीरे इसी तरह हाथ पकड़े छत पर टहलने लगे और तभी; "संग चल रहे हैं, संग चल रहे हैं, धुप के किनारे छाव की तरह..|" मैंने गाने की कुछ पंक्तियों को दोहराया| "हम्म..
ऐसे तुम मिले हो, ऐसे तुम मिले हो, जैसे मिल रही हो इत्र से हवा, काफ़िराना सा है, इश्क हैं या, क्या है??" मैंने इश्क़ है या क्या है उसकी आँखों में देखते हुए कहा और ये मेरा उससे सवाल था| उसने कोई जवाब नहीं दिया बस मुस्कुरा के नीचे चली गई और मैं कुछ देर के लिए चुप-चाप मुंडेर पर बैठ गया और उसे नीचे जाते हुए देखता रहा| थोड़ी देर बाद मैं भी नीचे आ गया और रितिका के कमरे में देखा तो वो अपने पलंग पर लेटी हुई थी और छत की ओर देख रही थी| मैं आगे अपने कमरे की तरफ जानेलगा तो वो मुझे देखते हुए बोली; "सुनिए"| उसकी आवाज सुनके मैं रुका और उसके कमरे की दहलीज पर से उसके कमरे में झांकते हुए बोला; "बोलिये'| ये सुनते ही उसके चेहरे पर फिर से मुस्कराहट आ गई और उसने इशारे से मुझे उसके पास पलंग पर बैठने को कहा| मैं अंदर आया और उसके पलंग पर बैठ गया| रितिका अभी भी लेटी दुइ थी और उसने लेटे-लेटे ही अपना हाथ आगे बढ़ा के मेरा दाहिना हाथ पकड़ लिया और बोली; "अगर मैं आपसे कुछ माँगू तो आप मुझे मना तो नहीं करोगे?" मैंने ना में सर हिला के उसे आश्वासन दिया| "मैं आपको kiss करना चाहती हूँ|" उसने बहुत प्यार से अपनी इच्छा व्यक्त की| पर मैं ये सुनके एकदम से हक्का-बक्का रह गया! मैंने ना में सर हिलाया और बिना कुछ कहे उठ के जाने लगा तो रितिका ने मेरा हाथ पकड़ के रोक लिया| "अच्छा I'm Sorry!!!" वो ये समझ चुकी थी की मुझे उसकी ये बात पसंद नहीं आई| रितिका ने मेरा हाथ छोड़ा और मैं अपने कमरे में आ कर पलंग पर लेट गया और गहरी सोच में डूब गया| ये जो कुछ भी हो रहा था वो सही नहीं था! जिस रास्ते पर वो जा रही थी वो सिर्फ और सिर्फ मौत के पास खत्म होता था| मन में आया की मैं उसकी बातों को इसी तरह दर-गुजर करता रहूँ और शायद धीरे-धीरे वो हार मान ले, पर अगर वो उसका दिल टूट गया तो? उसने कोई ऐसी-वैसी हरकत की जिससे उसके जान पर बन आई तो? कुछ समझ नहीं आ रहा था ....
अगर कहीं से माल मिल जाता तो दिमाग थोड़ा शांत हो जाता" इसलिए मैं एक दम से उठा और घर से बाहर निकल के तिवारी के घर जा पहुँचा| वो समझ चूका था तो वो एक कमरे में घुसा और कुछ अपनी जेब में डाल के चुप-चाप मेरे साथ चल दिया| उसके खेत पर आके हम चारपाई पर बैठ गए और फिर इधर-उधर की बातें हुई और माल फूँका! माल फूँकने के बाद मेरे दिमाग शांत हुआ और में आठ बजे तक उसी के खेत पर छपाई पर पड़ा रहा और आसमान में देखता रहा| तभी अचानक घड़ी पर नजर गई तो एकदम से उठा और घर की तरफ तेजी से चलने लगा| घर पहुँचा तो सभी मर्द आँगन में बैठे खाना खा रहे थे और मुझे देखते ही ताई जी बोली; "आ गया तू? खाने का समय हो गया है! ये ले खाना और दे आ उस महरानी को|" मैं रितिका का खाना ले कर उसके कमरे में पहुँचा तो वो सर झुकाये जमीन पर बैठी थी| मेरी आहट सुन के उसने दरवाजे की तरफ देखा और मेरे हाथ में खाने की थाली देख के वो उठ के पलंग पर बैठ गई| मैंने उसे खाना दिया और मुड़ के जाने लगा तो वो बोली; "आप भी मेरे साथ खाना खा लो|" मैंने बिना मुड़े ही जवाब दिया; "मेरा खाना नीचे है|" इतना कह के मैं नीचे आ गया और खाना खाने लगा| खाना खा के मैं ऊपर आया की चलो रितिका को दवाई दे दूँ तो वो दरवाजे पर नजरे बिछाये मेरा इंतजार कर रही थी|
मैंने कमरे में प्रवेश किया और कोने पर रखे टेबल पर से उसकी दवाई उठाने लगा की तभी रितिका पीछे से बोली; "नाराज हो मुझसे?" मैंने जवाब में ना में सर हिलाया और फिर दवाई ले कर रितिका की तरफ मुड़ा| मेरे एक हाथ में दवाई और एक हाथ में पानी का गिलास था| ''पहले आप कहो की आप मुझसे नाराज नहीं हैं| तभी मैं दवाई लूँगी!" रितिका ने डरते हुए कहा| "हमारा रिश्ता अभी नया-नया है, और ऐसे में जल्दबाजी मुझे पसंद नहीं! अपनी शर्त याद है ना?" मैंने दवाई और पानी का गिलास रितिका के हाथ में देते हुए कहा| "मुझे माफ़ कर दीजिये! आगे से मैं ऐसा नहीं करुँगी|" उसने दुखी होते हुए कहा और दवाई ले ली और फिर चुप-चाप अपने पलंग पर लेट गई| मुझे बुरा लगा पर शायद ये उस समय के लिए सही था| अगले दिन मुझे जाना था तो मैं जल्दी उठा और नीचे आया तो देखा रितिका नहाके तैयार आंगन में बैठी मेरा इंतजार कर रही थी| मुझे देखते ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई| मैंने भी उसकी मुस्कराहट का जवाब मुस्कराहट से दिया और नहाने घुस गया| जब बहार आया तो रितिका रसोई में बैठी पराठे सेक रही थी| "तुझे चैन नहीं है ना?" मैंने उसे थोड़ा डांटते हुए कहा| "अभी जरा सी ठीक हुई नहीं की लग गई काम में|" ये सुन के वो थोड़ा मायूस हो गई की तभी ताई जी बोल पड़ी; "हो गई जितना ठीक होना था इसे| इतने दिनों से खाट पकड़ रखी है और काम हमें करना पड़ रहा है|"
"क्यों भाभी कहाँ गई?" मैंने थोड़ा रितिका का बीच-बचाव किया| इतने में पीछे से भाभी कमरे से निकली और बोली; "ये रही भाभी! मुझसे सारे घर का काम-धाम नहीं होता! एक सहारा था की जब तक
इसकी शादी नहीं होती तो कम से कम ये हाथ बंटा देगी पर तुम्हें तो इसे आगे और पढ़ाना है और तो और जब से आये हो तब से इसी की तीमारदारी में लगे हो| कभी बैठते हो हमारे पास?" भाभी ने अच्छे से खरी-खोटी सुनाई और मैं जवाब देने को बोलने ही वाला था की रितिका मेरे पास आ गई और बुदबुदाते हुए बोली; "छोड़ दो, आप ऊपर जा के नाश्ता करो|" मैं ऊपर आकर अपने कमरे में बैठ गया और प्लेट दूसरी तरफ रख दी| इधर रितिका भी ऊपर आ गई और प्लेट दूर देख के एकदम से अंदर आई और प्लेट उठाई और पराठे का एक कोर उसने अचार से लगा के मुझे खिलने को हाथ आगे बढ़ाया| "भाभी की वजह से ही तुम नीचे गई थी ना काम करने|" रितिका ने कोई जवाब नहीं दिया बस मूक भषा में मुझे खाने को कहा| मैंने उसके हाथ से एक निवाला खा लिया फिर उसके हाथ से प्लेट ले कर उसे नीचे जाने को कहा| वो भी सर झुकाये हुए नीचे चली गई और कुछ देर बाद मेरी लिए एक कप में चाय ले आई| "तुने नाश्ता किया?" उसने हाँ में सर हिला दिया और जाने लगी की मैंने दुबारा पूछा; "झूठ तो नहीं बोल रही ना?" तो वो मुड़ी और ना में सर हिलाया| "और दवाई?" तब जाके वो बोली; "अभी नहीं ली, थोड़ी देर में ले लूँगी|"
"रुक" इतना कह कर मैं उठा और उसके कमरे से दवाई ले आया और उसे दवाई निकाल के दी और अपनी चाय भी| उसने मेरे हाथ से दवाई ली और एक घूँट चाय पि कर कप मुझे वापस दे दिया| जैसे ही वो नीचे जाने को पलटी मैंने उसके कंधे पर हाथ रख के उसे रोका और उसे आँखें बंद करने को कहा| उसने धीरे-धीरे अपनी आँखें मीचली और सर नीचे झुका लिया| मैंने आगे बढ़ कर उसके मस्तक को चूमा! मेरा स्पर्श पाते ही वो आके मुझसे लिपट गई और उसकी आँखों में जो आंसुओं के कतरे छुपे थे वो बहार आ गए| मैंने भी उसे कस के अपने जिस्म से चिपका लिया और उसके सर पर बार-बार चूमने लगा|
"बस अब रोना नहीं....
और मेरे पीछे अपना ख़याल रखना| समय पर दवाई लेना और मुझे रोज फ़ोन करना|" इतना कह के मैंने रितिका को खुद से अलग किया और उसके आँसूं पोछे और मैं नीचे उतर आया| नीचे पिताजी और ताऊ जी भी आ चुके थे| मुझे नीचे उतरता देख वो समझ गए की मैं वापस जा रहा हूँ| मैंने सब के पाँव छुए की तभी रितिका भागती हुई मेरे पीछे जाने लगी तो मैं रुक गया और उसे फिर से चेतावनी देता हुआ बोला; "दुबारा अगर बीमार पड़ी ना तो बहुत मारूँगा|" उसने मुस्कुरा के हाँ में सर हिलाया और मुझे हाथ उठा के 'बाए' कहने लगी| मैं बाइक स्टार्ट की और शहर लौट गया| ठीक एक बजे मुझे रितिका फ़ोन आया, उस समय मैं रास्ते में ही था तो मैंने बाइक एक किनारे खड़ी की और उससे बात करने लगा| इसी तरह दिन बीतने लगे और हम रोज एक से दो बजे तक बातें करते| वो मुझे हर एक दिन मुझे यही कहती की आप कैसे हो? आपने खाना खाया? आपकी बहुत याद आती है और आप कब आओगे? पर मैं हर बार उसकी बात को घुमा देता की उसका दिन कैसा था? घरवाले कैसे हैं आदि! वो भी मुझे आस-पड़ोस में होने वाली सभी घटनाएं बताती और कभी-कभी ये भी पूछती की ऑफिस में क्या चल रहा है? एक दिन की बात है की रितिका ने मुझे फ़ोन किया पर मैं उस समय मीटिंग में था तो उसका फ़ोन उठा नहीं सका| उसी रात उसने मुझे ग्यारह बजे फ़ोन किया| समय देखा तो मैं एक दम से घबरा गया की कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं हो गई! पर रितिका को लगा की मैं उससे नाराज हूँ इसलिए मैंने उसका फ़ोन नहीं उठाया| खेर मैंने उसे समझा दिया की मैं मीटिंग में था इसलिए फ़ोन नहीं उठा पाया और आगे भी अगर मैं उसका फ़ोन न उठाऊँ तो वो परेशान ना हो! इधर मेरी छुटियों से बॉस बहुत परेशान थे इसलिए उन्होंने मुझे आखरी चेतावनी दे दी| इसलिए मेरा घर जाना दूभर हो गया और उधर रितिका ने मुझसे घर ना आने का कारन पुछा तो मैंने उसे सारी बात बता दी| वो थोड़ा मायूस हुई पर मैंने उसे ये कह के मना लिया की हम रोज फ़ोन पर तो बात करते ही हैं| वहाँ आने से तो हम खुल के बात भी नहीं कर पाएंगे| पर वो उदास रहने लगी और इधर मैं भी मजबूर था!
update 7
महीने बीते और उसके बारहवीं के रिजल्ट का समय आ गया| उसके रिजल्ट से एक दिन पहले मैं रात को घर पहुँच गया| वो मुझे देख के बहुत खुश हुई और मुझे गले लगना चाहा पर मैंने उसे इशारे से मन कर दिया और फिर मैं अपने कमरे में सामान रख के नीचे आ गया| आज रात तो उसने जबरदस्त खाना बनाया जिसे खा के आत्मा तृप्त हो गई| अब चूँकि घरवाले सामने थे तो हम दोनों ने ज्यादा बात नहीं की और मैं पिताजी और ताऊ जी के साथ ही बैठा रहा| घर में सब जानते थे की कल रितिका का रिजल्ट है पर कोई भी उत्साहित या चिंतित नहीं था| उन्हें तो जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था| जब सोने का समय हुआ तो मैं अपने कमरे में आकर लेट गया और दरवाजा बंद कर लिया| रात के दस बजे होंगे की मेरे दरवाजे पर एक बहुत हलकी सी दस्तक हुई!
मैं जानता था ये दस्तक किसकी है इसलिए मैंने उठ के दरवाजा खोला और सामने रितिका ही खड़ी थी| मैं वापस आ के अपने पलंग पर बैठ गया और वो उसी दरवाजे पर खड़ी रही| घर में अभी भी सभी जाग रहे थे इसलिए वो अंदर नहीं आई थी| "तो मैडम जी! कल रिजल्ट है?! क्या चल रहा है मन में? डर लग रहा है की नहीं?" मैंने उसे छेड़ते हुए पुछा| "डर? बिलकुल नहीं! मैं तो बस ये सोच रही हूँ की मेरे पास होने पर आप मुझे क्या दोगे?" उसने पूरे आत्मविश्वास से कहा| "क्या चाहिए तुझे?" मैंने उत्सुकता से पुछा| "पहले वादा करो की आप मना नहीं करोगे?" उसका जवाब सुन मैं सोच में पड़ गया, क्योंकि मैं जानता था की वो Kiss की ख्वाइश करेगी जो मैं पूरा नहीं कर सकता| अगर वो मुझसे पैसे मांगती, कपडे मांगती, या कुछ भी मांगती तो मैं उसे मन नहीं करता| मुझे चुप देख के शायद वो समझ गई की मैं क्या सोच रहा हूँ|
रितिका: क्या सोच रहे हो?
मैं: जानता हूँ की तू क्या माँगने वाली है और मैं वो नहीं दे सकता| (मैंने थोड़े रूखेपन से जवाब दिया|)
रितिका: अच्छा? ठीक है! अभी नहीं बाद में दे देना! अब तो ठीक है?
मैं: समय लगेगा|
रितिका: हम इंतज़ार करेंगे... हम इंतज़ार करेंगे...क़यामत तक
खुदा करे कि क़यामत हो, और तू आए
हम इंतज़ार करेंगे ...
न देंगे हम तुझे इलज़ाम बेवफ़ाई का
मगर गिला तो करेंगे तेरी जुदाई का
तेरे खिलाफ़ शिकायत हो और तू आए
खुदा करे के कयामत हो, और तू आए
हम इंतज़ार करेंगे ...
ये ज़िंदगी तेरे कदमों में डाल जाएंगे
तुझी को तेरी अमानत सम्भाल जाएंगे
हमारा आलम-ए-रुखसत हो और तू आए...
बुझी-बुझी सी नज़र में तेरी तलाश लिये
भटकते फिरते हैं हम आज अपनी लाश लिये
यही ज़ुनून यही वहशत हो और तू आए|
(इतना कह के वो जाने लगी तो मैंने भी उसके गाने को पूरा कर दिया|)
मैं: ये इंतज़ार भी एक इम्तिहां होता है
इसीसे इश्क़ का शोला जवां होता है
ये इंतज़ार सलामत हो
ये इंतज़ार सलामत हो और तू आए
ख़ुदा करे कि क़यामत हो, और तू आए
हम इंतज़ार करेंगे... (ये सुन के वो पलटी और आगे की पंक्तियाँ गाने लगी|)
रितिका: बिछाए शौक़ से, ख़ुद बेवफ़ा की राहों में
खड़े हैं दीप की हसरत लिए निगाहों में
क़बूल-ए-दिल की इबादत हो
क़बूल-ए-दिल की इबादत हो और तू आए
ख़ुदा करे कि क़यामत हो, और तू आए
हम इंतज़ार करेंगे...
मैं: वो ख़ुशनसीब है जिसको तू इंतख़ाब करे
ख़ुदा हमारी.... (इतना कहते हुए मैं रुक गया क्योंकि आगे के शब्द मैं बोलना नहीं चाहता था| पर रितिका ने उन अधूरी पंक्तियों को खुद पूरा किया|)
रितिका: …. ...
मोहब्बत को क़ामयाब करे
जवां सितारा-ए-क़िस्मत हो
जवां सितारा-ए-क़िस्मत हो और तू आए
ख़ुदा करे कि क़यामत हो, और तू आए
हम इंतज़ार करेंगे|
गाना पूरा कर के वो मुस्कुराई और पलट के चली गई| मैं जानता था की रितिका को गाना गुन-गुनाना बहुत अच्छा लगता था| जब हम छोटे थे तब हम दोनों अक्सर अंताक्षरी खेलते थे और वो सभी गानों को पूरा गाय करती थी और मैं कभी उसका साथ देता और कभी=कभी उसका गाना सुनता रहता था| खेर रात में हम दोनों चैन से सोये और जब मैं सुबह उठा तो रितिका पहले से ही तैयार खड़ी थी और नीचे आंगन में मेरा इंतजार कर रही थी| मुझे देखते ही वो इशारे से कहने लगी की आप लेट हो गए हो! मैंने भी ऊपर खड़े-खड़े ही अपने कान पकडे और उसे Sorry कहा और तुरंत नीचे आ कर नाहा-धो के तैयार हो गया और फिर हम दोनों ही नाश्ता कर के बाइक पर बैठ के निकल गए| हम साइबर कैफे पहुंचे तो आज वहाँ और भी ज्यादा भीड़ लगी थी| मैंने रितिका का हाथ पकड़ा और भीड़ के बीचों-बीच से होता हुआ अंदर जा पहुँचा और फ़टाफ़ट रितिका का रोल नंबर डाल के उसके रिजल्ट के लोड होने का वेट करने लगा| जैसे-जैसे पेज लोड हो रहा था दोनों की धड़कनें तेज हो चली थीं| आखिर जब पेज पूरा लोड हुआ तो उसके नंबर देख दोनों की आँखों में खुशियाँ उमड़ चुकी थीं| 98.5% देख के वो ख़ुशी से चिल्ला पड़ी और मेरे गले लग गई| वहाँ खड़े सब हमें ही देख रहे थे और जब उन्होंने देखा की उसके 98.5% आये हैं तो वहां भी हल्ला मच गया! वहाँ आये की माता-पिता उसे बधाइयाँ देने लगे और वो सब को धन्यवाद करने लगी| आज रितिका के मुख पर बहुत ख़ुशी थी| पहले मैंने उसे अच्छा सा नाश्ता कराया और फिर मिठाई ली और हम घर की तरफ चल दिए| घर आते-आते थोड़ी देर हो गई| करीब बारह बजे होंगे की जैसे ही हम घर के नजदीक पहुंचे तो वहाँ बहुत सी गाड़ियाँ खड़ी थी| दो लाल बत्ती वाली और बाकी डिश एंटेना वाली| मैंने बाइक खड़ी कर के रितिका की तरफ देखा तो वो हैरान थी; "लो भाई ...
अब तो तुम सेलिब्रिटी हो गई हो!" मैंने ऐसा कह के उसे छेड़ा और शर्म से रितिका के गाल लाल हो गए और उसने अपना सर झुका लिया| जब हम घर के दरवाजे के पास पहुंचे तो वहाँ गाँव के सभी लोग खड़े अंदर झाँक रहे थे| हम दोनों को देखते ही सब हमें अंदर जाने के लिए जगह देने लगे और हमारे कदम अंदर पड़ते ही ताऊ जी ने हँसते हुए हम दोनों को गले लगने के लिए बुलाया| तब जा के पता चला वहाँ तो मीडिया वालों का जमावड़ा लगा था, आखिर रितिका पूरे प्रदेश में प्रथम आई थी! आज तो ताऊ जी समेत सब ने उसे बहुत प्यार किया और सब उसे मुबारकबाद और आशीर्वाद दे चुके तब मंत्री जी आगे आये| उस ने भी आगे आते हुए रितिका को आशीर्वाद दिया और फिर उसके बाद कैमरे की तरफ देख के लम्बा-चौड़ा भाषण दिया की कैसे हमें लड़कियों को आगे पढ़ाना चाहिए और वो ही इस देश का भविष्य हैं! ये सुन के तो मैं भी दंग था क्योंकि ये वही शक़्स था जिसने रितिका की माँ और उसके प्रेमी को पेड़ से बाँध के जिन्दा जलाने का फरमान सुनाया था| पर रितिका अभी ये बात नहीं जानती थी की उसकी माँ का कातिल ही उसे आशीर्वाद दे रहा है| जैसे ही मंत्री जी का भाषण खत्म हुआ सब ने तालियाँ बजा दी और फिर रिपोर्टर ने हेडमास्टर साहब से भी रितिका की इस उपलब्धि के बारे में पुछा तो वो कहने लगे; "अरे भाई मैं क्या कहूँ! मुझे तो गर्व है की मैं ऐसे स्कूल का हेडमास्टर हूँ जहाँ मानु और रितिका जैसे विद्यार्थी पड़ते हैं! पहले मानु ने प्रदेश में टॉप किया था और अब देखो उसकी भतीजी ने भी पूरे प्रदेश में टॉप किया|" ये सुन के सारे रिपोर्टर और कैमरा मैन मेरी तरफ घूम गए| "तो बताइये मानु जी पहले आपने टॉप मारा और अब आपकी भतीजी ने भी पूरे प्रदेश में टॉप किया है,आपको कैसा लग रहा है?" एक रिपोर्टर ने पुछा| मेरे कुछ कहने से पहले ही ताऊ जी बोल पड़े; "जी हमारे घर के दोनों बच्चे ही बहुत समझदार है और दिल लगा के पढ़ते हैं|"
"तो आगे आप रितिका को कॉलेज पढ़ने भेजेंगे?" एक रिपोर्टर ने उनसे सवाल पुछा| पर उसका जवाब मंत्री जी ने खुद दिया; "इसमें पूछने की क्या बात है? शहर के कॉलेज में बच्ची का दाखिला होगा और आप देखना ये वहाँ भी टॉप ही करेगी!" ये सुन के तो रितिका बहुत खुश हुई और उसके चेहरे से उसकी ख़ुशी साफ झलक रही थी|
मंत्री की बात सुन सभी चमचे ताली बजाने लगे और उनकी जय-जयकार शुरू हो गई| खेर ये ड्रामा दो घंटों तक चला और शाम होने तक सभी चले गए और घर में जितने भी लोग थे सब आज टी.वी.
में आने से बहुत खुश थे| रात के खाने के समय ताऊ जी ने रितिका को सभी मर्दों के सामने बिठा दिया और मेरी तरफ देख के सवाल किया;
ताऊ जी: हाँ भाई मानु तू बता, ये कॉलेज कहाँ है और कितनी दूर है?
मैं: जी शहर में दो ही कॉलेज हैं| एक रेलवे फाटक के पास है और एक वो जिसमें मैंने पढ़ाई की थी| फाटक वाले के पास कोई हॉस्टल नहीं है तो सबसे उत्तम मेरा वाला कॉलेज ही रहेगा| बल्कि मेरी ही कक्षा में पढ़ने वाली एक लड़की की माँ एक लड़कियों का हॉस्टल चलती हैं जो की कॉलेज से करीब १० मिनट की दूरी पर है| हॉस्टल में रहना-खाना और एक पुस्तकालय भी है| (मैंने उन्हें सारी डिटेल बताई|)
ताऊ जी: वो तो ठीक है ... पर ... वहाँ अगर ये इधर-उधर कहीं चली गई तो?
मैं: जी हॉस्टल के कानून सख्त होते हैं| शाम को 7 बजे के बाद वो किसी को भी बहार जाने नहीं देते, खाने का समय भी निर्धारित है और कहीं भी जाने से पहले वार्डन को बताना जर्रूरी होता है और अगर कोई बिना बताये कहीं आये-जाए तो उसकी खबर घरवालों को की जाती है| रहना, खाने, नहाने, कपडे धोने की सब की व्यवस्था हॉस्टल के अंदर में होती है| रितिका को सिर्फ कॉलेज जाना है और वहाँ से हॉस्टल वापस|
ताऊ जी: ठीक है परसों मैं, चन्दर और तेरे पिताजी तुझे शहर में मिलेंगे| वहाँ जा के देखता हूँ!
उनकी बात से साफ़ था की अगर उन्हें मंत्री का डर ना होता तो वो रितिका को कतई कॉलेज पढ़ने नहीं जाने देते| इसलिए मरते क्या न करते उन्हें उनकी बात का मान तो रखना ही था| खेर खाने के बाद मैं छत पर आ गया और कान में हेडफोन्स लगा के गाना सुनते हुए टहलने लगा| रात को ठंडी-ठंडी हवा चलने के कारन छत पर टहलने में मजा आ रहा था| तभी रितिका दबे पाँव ऊपर गई और पीछे से आके उसने मुझे अपनी बाहों में जकड लिया| उसके स्पर्श से ही मैं हड़बड़ा गया पर रितिका ने अपना सर मेरी पीठ पर रख दिया पर मैं चुप-चाप खड़ा रहा| ठंडी हवा के झोंकें मेरे चेहरे पर आज बहुत अच्छे महसूस हो रहे थे| करीब 5 मिनट बाद मैंने रितिका को खुद से अलग किया और मुंडेर पर जा बैठा| इधर वो भी मुझसे थोड़ा दूर हो कर बैठी, क्योंकि घर पर हम दोनों अकेले तो नहीं थे|
रितिका: मैं सोच रही हूँ की हम कलकत्ता भाग जाते हैं!
मैं: (उसकी बात सुन के चौंकते हुए) क्या?
रितिका: हाँ! वहाँ हमें कोई नहीं जानता!
मैं: अच्छा? और वहाँ जा के रहेंगे कहाँ? खाएंगे क्या? और करेंगे क्या?
रितिका: रहना और खाना तो मुझे नहीं पता पर करेंगे तो प्यार ही! एक नई जन्दगी की शुरुरात करेंगे|
मैं: नई जिंदगी शुरू करना इतना आसान नहीं है| उसके लिए पैसे चाहिए! मेरे पास कुछ पैसे हैं पर उसमें हमें सर ढकने की जगह भी नहीं मिलेगी खाने और रहने की तो बात ही छोड़ दो| फिर तेरी पढ़ाई का क्या? अगर भागना ही था तो इतना पढ़ाई क्यों की?
रितिका: मेरे जीवन का लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ आपसे शादी करना है|
मैं: पागल मत बन! इतनी मेहनत की है,
इसे मैं बर्बाद नहीं होने दूँगा|
रितिका: (अपना सर पीटते हुए) तो अभी और पढ़ना है? घर में आपकी शादी की बात चलने लगी है|
मैं: जानता हूँ पर तू चिंता मत कर मैं अभी शादी नहीं कर रहा|
रितिका: जबरदस्ती कर देंगे तो क्या करोगे और वैसे भी आपकी कुंडली मैं कौनसे ग्रहों की दशा ख़राब है की आपकी शादी टल जायेगी|
मैं: तो तेरी कुंडली में कौनसा ग्रहों की दशा ख़राब थी| (ये सुनते ही रितिका के पाँव तले जमीन खिसक गई|)
रितिका: तो.....वो..... (रितिका के मुँह से बोल नहीं फुट रहे थे|)
मैं: मैंने उस लालची पंडित को पैसे खिला के झूठ बुलवाया था| तेरे स्कूल और कॉलेज का टाइम कैलकुलेट कर के ही मैंने उसे पाँच साल बोला था| (रितिका ये सुन के उठ खड़ी हुई और आके मेरे सीने से लग कर रोने लगी|)
रितिका: मैं गलत नहीं थी! आप मुझसे बहुत प्यार करते हो बस कभी जताते नहीं हो! आपने मेरे लिए इतना सब कुछ किया.....
इसके आगे मैंने उसे कुछ कहने नहीं दिया और उसे खुद से अलग किया और घडी देखते हुए ऐसे जताया की बहुत लेट हो गया है और मैं वहाँ से जाने लगा तो रितिका बोल पड़ी;
रितिका: कहाँ जा रहे हो आप? आप ने कहा था की आप मुझे गिफ्ट दोगे?
मैं: ऋतू ... मैंने ....
रितिका: (मेरी बात बीच में काटते हुए) घबराओ मत मैं ऐसा कुछ नहीं माँगूँगी जो आपको देने में दिक्कत हो| ये तो बहुत आसान है आपके लिए!
मैं: अच्छा? क्या चाहिए?
रितिका: आपको याद है जब हम छोटे थे और रात को कभी अगर माँ मुझे डाँट देती तो आप कैसे मुझे अपने सीने से लगा के सुलाते थे? आज भी वैसे ही सोने का मन है मेरा!
मैं: (मुस्कुराते हुए) तब हम छोटे थे और अब.....
रितिका: (मेरी बात बीच में काटते हुए) सारी रात ना सही तो कुछ घंटों के लिए? प्लीज! आप तो जानते हो की मुझे नींद जल्दी आ जाती है, फिर आप चले जाना! प्लीज.. प्लीज.. प्लीज..
प्लीज!!!
उसकी बात सुनके मन नहीं हुआ की उसका दिल तोडूं इसलिए मैंने हाँ में सर हिलाया और वो ख़ुशी से उठ खड़ी हुई और भागती हुई अपने कमरे में भाग गई| करीब 10 मिनट बाद में आया तो पाय की वो कुर्सी पर बैठी दरवाजे पर टकटकी बाँधे मेरा इंतजार कर रही है| जैसे ही मैं अंदर आया वो दौड़ के दरवाजे के पास गई और चिटकनी लगाईं फिर मेरे पास आई और मेरे सीने से लग गई| उसकी साँसों की गर्माहट मुझे मेरे सीने पर महसूस हो रही थी और इधर रितिका के हाथ मेरी पूरी पीठ पर चलने लगे थे और मेरे भी हाथ स्वतः ही उसकी पीठ पर आ गए और उसकी बैकलेस कुर्ती पर आज मुझे पहली बार उसकी नंगी पीठ का एहसास हुआ| ये एहसास इतना ठंडा था की मैं छिटक कर उससे अलग हो गया| उसकी नंगी पीठ के एहसास ने मेरे अंदर वासना की चिंगारी ना जला दे इसलिए मैं उससे छिटक कर दूर हो गया था और उससे नजरें चुराने लगा था| वो फिर भी धीरे-धीरे मेरी तरफ बढ़ी और मेरा हाथ पकड़ के अपने पलंग की तरफ ले जाने लगी और फिर वो लेट गई और मुझे धीरे से अपने पास लेटने को खींचा| मैं लेट गया पर मेरी नजरें छत पर टिकी थी की तभी रितिका ने मेरे दाएं हाथ को खींच के अपनी तरफ करवट लेटने को मजबूर किया और फिर बाएं हाथ को सीधा किया और उसे अपना तकिया बनाया और फिर वो दुबारा मेरी छाती में समां गई| फिर मेरे बाएं हाथ को उठाके उसने अपनी कमर पर रखा और अपना हाथ मेरी कमर पर रख कर खुद को मेरे सीने से समेट लिया| उसकी गर्म-गर्म सांसें मेरे दिल पर महसूस होने लगी थी, जितनी भी सख्ती मेरे दिल में थी जो मुझे उसके करीब नहीं जाने देती थी आज वो पिघलने लगी थी| मेरे मन में आज बहुत जोरों की उथल-पुथल हो रही थी! दिमाग कह रहा था की ये गलत है, तेरे साथ इस लड़की की भी जिंदगी तबह हो जाएगी! पर दिल था की वो बहकने लगा था और कह रहा था की जो होगा वो देखा जायेगा! प्यार के लिए जान भी देनी पड़ी तो कोई गम नहीं| तभी दिमाग बोला की ऋतू का क्या होगा? तेरे साथ तो वो भी मौत के घात उतार दी जाएगी! इसी जद्दोजहत के चलते मन बेचैन होने लगा की तभी रितिका ने मेरी छाती को चूमा! उसके नरम होठों के स्पर्श से ही दिल ने दिमाग पर जीत हासिल कर ली और मैंने रितिका को और कस के अपने सीने से चिपका लिया| और मेरे इस दबाव के चलते उसने भी अपनी गिरफ्त मेरे इर्द-गिर्द सख्त कर ली| कब आँख बंद हुई ये पता ही नहीं चला और जब पता चला तो घडी में पोन तीन हुए थे| मैंने धीरे से खुद को रितिका की गिरफ्त से छुड़ाया और मैं दबे पाँव उठ के उसके कमरे से अपने कमरे में आ गया| पर नींद अब उचाट हो गई थी और मन में फिर से वहीँ जंग छिड़ चुकी थी| मैं खुद को तो किस्मत के हवाले छोड़ सकता था पर ऋतू को नहीं! दिमाग और दिल दोनों ने ही एक मत बना लिया की चाहे कुछ भी हो मैं ऋतू के प्यार को अपना लूँ! मैंने दृढ निश्चय कर लिया था की मैं कैसे न कैसे उसे भगा ले जाऊँगा, कब कहाँ और कैसे
इस पर मुझे अब घोर विचार करना था| सुबह पाँच बजे तक सोचते-सोचते एक जबरदस्त प्लान बना के तैयार कर लिया था, ऐसा प्लान जिसमें बाल भर भी कोई गड़बड़ नहीं थी| हर एक बात का ध्यान रखा था मैंने और अपने इस प्लान पर मुझे फक्र था| मैं इस प्लान के बारे में सोच-सोच के मुस्कुरा रहा था की तभी रितिका मेरे दरवाजे को खोल के अंदर आई और मुझे इस तरह बैठ के मुस्कुराते हुए देख कर बोली; "गुड मॉर्निंग!" उसे देखते ही मैं उठ के खड़ा हो गया और उसे गले लगाने को अपनी बाहें खोल दी| वो भी बिना कुछ बोले आके मेरे सीने से लग गई| "I Love You !!!" मैंने आँखें मूंदें हुए कहा तो वो जैसे अपने कानों पर विश्वास कर ही नहीं पाई और मुझसे थोड़ा अलग हुई और मेरे मुख पर देखने लगी की कहीं मैं उसके साथ मजाक तो नहीं कर रहा| पर उसे मेरी आँख में सचाई और उसके लिए वो प्यार नजर आया तो वो फिर से मेरे गले लग गई और बोली; "I Love You Too !!! मैं जानती थी आप मेरा प्यार एक ना एक दिन कबूल कर लोगे|" आज हम दोनों की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था पर घर की बंदिश भी थी इसलिए हम अलग हुए, पर हाथ अभी थामे हुए थे फिर मैंने जब रितिका के चेहरे पर नजर डाली तो आज उसका चेहरा दमक रहा था|
update 8
नीचे से भाभी की आवाज आई तो मैंने उसका हाथ छोड़ दिया और वो मुस्कुराते हुए नीचे जाने लगी| वो नीचे पहुँची ही थी की मैंने अपने फोन पर गाना फुल आवाज में चला दिया और खुद भी उसी गाने के अल्फाज गाने लगा;
"हसता रहता हूँ तुझसे मिलकर क्यूँ आजकल....
बदले बदले हैं मेरे तेवर क्यूँ आजकल....
आखें मेरी हर जगह ....
ढूंढे तुझे बेवजह...
ये मैं हूँ या कोई और है मेरी तरह..
कैसे हुआ.. कैसे हुआ..
तू इतना ज़रूरी कैसे हुआ
कैसे हुआ.. कैसे हुआ..
तू इतना ज़रूरी कैसे हुआ ....
मैं बारिश की बोली समझता नहीं था
हवाओं से मैं यूँ उलझता नहीं था..
है सीने में दिल भी कहाँ थी मुझे ये खबर
कहीं पे हो रातें कहीं पे सवेरा
आवारगी ही रही साथ मेरे
ठहर जा ठहर जा ये कहती है तेरी नज़र
क्या हाल हो गया है ये मेरा..
आखें मेरी हर जगह ढूंढे तुझे बेवजह
ये मैं हूँ या कोई और है मेरी तरह..
कैसे हुआ.. कैसे हुआ..
तू इतना ज़रूरी कैसे हुआ
कैसे हुआ.. कैसे हुआ..
तू इतना ज़रूरी कैसे हुआ| हम्म्म ममममम मममम… "
जब ये गाना खत्म हुआ तो मैं अपने कपडे ल कर नीचे आया तो सभी के सभी आंगन में बैठे चाय पी रहे थे और मेरा गाना सुन रहे थे| मैं जब नीचे आया तो पिताजी बोले; "हो गया तेरा गाना?" मैं बुरी तरह झेंप गया और ऋतू की तरफ देखने लगा और उम्मीद करने लगा की वो मेरे गाने का मतलब समझ गई हो| वो मुझे देख के मंद-मंद मुस्कुरा रही थी जो ये संकेत था की वो समझ चुकी है| मैं सीधा बाथरूम में घुस के नहाने लगा पर गाना अब भी गुनगुना रहा था| नाहा धो के, चाय नाश्ता कर के मैं निकलने को हुआ तो बहार ना जाके ऊपर गया, ये बहाना कर के की मैं कुछ भूल गया हूँ| दो मिनट बाद ऋतू भी ऊपर आ गई और कमरे की चौखट पर कंधे के सहारे खड़ी हो गई|
ऋतू: क्या भूल गए?
मैं: वो....वो.... कुछ तो भूल गया हूँ!
ऋतू चल के आगे आई और मेरे दिल पर अपनी ऊँगली रखते हुए बोली;
ऋतू: ये तो नहीं?
मैं: नहीं... ये तो तुम्हारे पास है!
ये सुन के रितिका मुस्कुराने लगी और मेरे सीने से लग गई|
ऋतू: तो अब कब भेंट होगी आपसे?
मैं: अब शहर में ही मिलेंगे|
ऋतू: हाय! उसमें तो कम से कम एक महीना लगेगा!
मैं: 'बिरहा' के बाद मिलन का दोहरा मजा होता है|
ये सुन कर आँसूं के दो कतरे ऋतू की आँखों से छलक आये और मेरी कमीज को भीगोने लगे|
ऋतू: तो क्या बीच में एक भी दिन नहीं आ सकते मुझे मिलने?
मैं: कोशिश करूँगा पर वादा नहीं कर सकता| बॉस बहुत नाराज है मेरी छुटियों को लेकर!
ऋतू: ठीक है ...
पर मैं फिर भी इंतजार करुँगी आपका!
मैंने ऋतू को खुद से अलग किया और वो अपने आँसू पोछने लगी| मैंने उसके चेहरे को अपने हथेलियों में लिया और उसके दाएँ गाल पर अपने होंठ रख दिए| मेरे होठों के स्पर्श से जैसे वो सिंहर उठी और पंजों पर खड़ी होके मेरे होठों को चूमना चाहा| पर मैंने उसके होठों पर ऊँगली रख के उसे रोक दिया; "अभी नहीं! कोई आ जाएगा|" ये सुन कर वो झूठ-मूठ का गुस्सा दिखाने लगी| मैंने पुनः उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके बाएँ गाल को चूम लिया| तब जाके उसका गुस्सा शांत हुआ और वो मेरे सीने से फिर लग गई| इसी मीठी याद को लिए मैं घर से निकला और ऑफिस पहुँचा, बॉस अगले दिन की आधी छुट्टी दे दे इसलिए देर रात तक मैं ऑफिस में बैठा काम निपटाता रहा| अगले दिन पिताजी, ताऊजी और चन्दर सब मुझे बस स्टैंड पर मिले| वहाँ से कॉलेज करीब आधा घंटा दूर था तो हम ऑटो से कॉलेज पहुँचे| कॉलेज के गेट पर ही कल्लू भैया मिल गए और मुझे देखते ही सलाम करने लगे| कॉलेज के दिनों में मैंने उनकी थोड़ी मदद की थी तो वो तब से मेरी बहुत इज्जत किया करते थे| मुझे सलाम करता देख सभी हैरान थे| कल्लू भैया से दुआ-सलाम कर के जब हम अंदर आये तो पिताजी बोले; "तेरा तो बड़ा रुतबा है यहाँ? पढ़ाई करता था की दंगाई!" मैंने उनकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और उन्हें कॉलेज दिखाने लगा| चूँकि सुबह का टाइम था तो विद्यार्थी क्लास में थे, अगर सब बाहर मटर गश्ती करते दिख जाते तो ऋतू का कॉलेज में पढ़ने का सपना तोड़ दिया जाता| आखिर में मैं पिताजी को हेडमास्टर साहब के पास ले गया तो मुझे देख वो फूले नहीं समाय और तुरंत गले से लगा लिया आखिर उनके कॉलेज का टॉपर जो था| फिर जब उन्हें पता चला की ऋतू भी मेरी तरह जिले की टॉपर है तो वो बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने सभी को अपने पैसों से मिठाई मंगवा के खिलाई! मंत्री का नाम लेने की जर्रूरत ही नहीं पड़ी और कॉलेज में रितिका एडमिशन पक्का हो गया| हेडमास्टर साहब ने जबरदस्ती चाय-नाश्ता कराया और फिर हमने वहाँ से विदा ली और १० मिनट पैदल चल के हॉस्टल के बाहर पहुँचे| हॉस्टल के गार्ड ने मुझे देखते ही सलाम ठोका और ये देख के तो सभी अचरज करने लगे| गार्ड हमें अंदर ले के आया और मोहिनी मैडम को बुलाया| ये मोहिनी मैडम वहीँ तो जो कॉलेज में मेरे साथ पढ़ती थी| नाम बिलकुल रंग-रूप से मेल खाता था उसी की माँ ये हॉस्टल चलाती थी|
मोहिनी मुझे देखते ही मुस्कुराती हुई आई; "अरे मानु जी! इतने सालों बाद कैसे याद आई हमारी?" पिताजी समेत सभी हैरान था क्यों की आजतक उनके सामने मुझे कभी किसी ने 'मानु जी' कह के नहीं बुलाया था| "हाँ वो दरसल मेरे भाई की लड़की रितिका....
" आगे मेरे कुछ बोलने से पहले ही वो बोल पड़ी; "मुबारक हो जी आपको! चाचा की तरह उसने भी टॉप मारा!" इतना कहते हुए वो मेरे गले लग गई, पर मैंने उसे अभी तक छुआ नहीं था और ये नजारा देख सभी मुँह बाय हैरान थे| दरअसल मोहिनी बहुत ही मुँहफट और अल्हड सवभाव की थी| जब वो बात करती थी तो उसे दुनियादारी की कतई चिंता नहीं होती थी और वो अपने मन की बात बोलने से कभी नहीं हिचकती थी| खेर मुझे उसे रोकना था की कहीं वो कुछ और ना बक दे; "ये मेरे पिताजी, ताऊ जी और चन्दर भैया हैं! वैसे आंटी जी कहाँ हैं?" मैंने उससे पूछा तो उसे मेरे परिवार वालों का ध्यान आया और उसने पहले सब को हाथ जोड़ कर नमस्ते की फिर शर्मा कर अंदर भाग गई| उसके जाते ही मैं ने सब की तरफ देखा तो वो सब अब भी हैरान थे की उनका सीधा साधा लड़का जो कभी किसी लड़की से बात नहीं करता था वो इतना बड़ा हो चूका है की एक लड़की उसके गले लग रही है वो भी उसके परिवार के सामने| "जी वो..." मेरे कुछ कहने से पहले ही आंटी जी आ गईं| "अरे भाईसाहब आप सब खड़े क्यों हैं? बैठिये-बैठिये! ये लड़की भी न बिलकुल बुधु है!" मैंने आगे बढ़ कर आंटी जी के पाँव छुए तो उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया और फिर हम सभी उनके घर की बैठक में बैठ गए| मैंने उनका परिचय सब से कराया और हमारे आने का कारन भी बताया तो उन्हें सुन के बड़ी ख़ुशी हुई और उन्होंने तुरंत मोहिनी को आवाज दे कर चाय-नाश्ता मँगवाया| ताऊ जी और पिता जी ने बड़ी ना-नुकुर की पर आंटी जी नहीं मानी; "अरे भाई साहब आज पहली बार तो आप सभी से मुलाकात हुई है और ये तो घर की बात है! आपका लड़का मानु बहुत मन लगा कर पढता था, और इसी की वजह से मेरी बुधु लड़की पास हुई है| आप रितिका की कतई चिंता ना करो ये उसके लिए उसका दूसरा घर है, यहाँ उसे किसी चीज की कोई दिक्कत नहीं होगी! मेरी बेटी की तरह रहेगी वो यहाँ!" तभी वहाँ मोहिनी चाय-नाश्ता ले कर आ गई और सब को परोस कर खुद अपनी माँ की बगल में हाथ बंधे खड़ी हो गई| "सुन लड़की तेरे कमरे में एक अलग से पलंग डलवा और कल से रितिका भी तेरे ही कमरे में रहेगी|" आंटी की बात सुन उसने बस 'जी' कहा| "बहनजी ... वो ... पैसे....." ताऊ जी ने बस इतना ही कहा था की वो बोल पड़ी; "भाई साहब मैं अब क्या बोलूं...
घर की बात है!" इस पर पिताजी भी तपाक से बोले; "देखिये बहनजी, एक-आध दिन की बात होती तो बात कुछ और थी! पर उसे तीन साल यहाँ रहना है| जो पैसे आप बाकी सभी लड़कियों के घरवालों से ले रही हैं वो हम भी दे देंगे|" तभी चन्दर भी बोल पड़ा; "बाकी लड़कियों के घरवाले आपको कितने पैसे देते हैं?" ये सुन के मुझे, पिताजी और ताऊ जी को बहुत गुस्सा आया और ताऊ जी चन्दर को घूर के देखने लगे पर तभी मेरी नजर दिवार पर लगे बोर्ड पर पड़ी जिस पर सब कुछ लिखा था| मैंने इशारे से पिताजी को वहाँ देखने को कहा और उन्होंने ताऊ जी को कहा| "चलिए जी ये लीजिये 6,०००/-" उन्होंने अपनी जेब में हाथ डाला और 2,000 के नोट निकाले और आंटी जी को देने लगे पर आंटी जी ने मना कर दिया| वो समझ चुकी थी को हम सबने बोर्ड पढ़ लिया है| "मैं आपकी बात का मान रखती हूँ पर आपको भी मेरी बात का मान रखना होगा| ये पैसे जो बोर्ड पर लिखे हैं वो औरों के लिए है और आप सब तो अपने हैं इसलिए आप मुझे केवल 4,०००/- दीजिये|" उन्होंने केवल 2,000 के दो नोट लिए और मोहिनी को रजिस्ट्रेशन की किताब लाने को कहा| मोहिनी ने तुरंत वो किताब और बिल बुक उन्हें ला के दी| आंटी जी ने रजिस्ट्रेशन की किताब मुझे दे दी और खुद 4,०००/- के बिल बनाने लगी| "पर बहन जी आप हमारे लिए 2,०००/- का नुक्सान क्यों सह रही हैं?" ताऊ जी ने कहा|
"नुक्सान कैसा जी? अब आपका लड़का मेरी बेटी को पढ़ाता था तब तो उसने कभी नहीं कहा की उसका नुक्सान हो रहा है?" आंटी ने बिल की कॉपी ताऊ जी को देते हुए कहा| "पर आंटी जी उसमें मेरा नुक्सान थोड़े ही था? मेरा भी तो रिविशन हो जाता था!" मैंने उनकी बात का उत्तर दिया| "अब बताइये बहनजी?" पिताजी ने मेरी बात का समर्थन किया| "भाई साहब जिस २,०००/- की बात आप कर रहे हैं वो हमारा मुनाफा होता है| अब आप बताइये की कोई अपनों से मुनाफा कमाता है?" आंटी की इस बात का किसी के पास भी जवाब नहीं था इसलिए उनकी बात मान कर ताऊ जी ने उनसे वो बिल ले लिया और इधर मैंने रजिस्ट्रेशन वाली बुक में रितिका की सभी जानकारी लिख दी बस मोबाइल नंबर की जगह कुछ नहीं लिखा| जब आंटी जी ने मोबाइल नंबर माँगा तो ताऊ जी ने कहा; "बहन जी रितिका के पास मोबाइल नहीं है| उसे इन सब चीजों का कोई शौक नहीं है|" ये सुन के आंटी जी ने मोहिनी को ताना मारा; "सीख इनकी लड़की से कुछ? ये तो सारा दिन मोबाइल में घुसी रहती है|" ये सुन कर उस बेचारी का सर शर्म से झुक गया अब उसे बचाने के लिए मैंने चलने की इजाजत माँगी तो सारे उठ खड़े हुए और आंटी हमें बाहर छोड़ने आई और मुझसे बोली; "अरे मानु बेटा तुम क्या कर रहे हो आज कल?" तभी मोहिनी बीच में बोल पड़ी; "शादी-वादी कर ली होगी!" "नहीं आंटी जी वो मैं फिलहाल बाईपास के पास जो बड़ी सी बिल्डिंग हूँ वहाँ जॉब कर रहा हूँ|"
"कमाल है? इतने सालों से तुम यहीं पर जॉब कर रहे हो पर हमें कभी मिलने नहीं आये!?" उन्होंने थोड़ा गुस्सा दिखते हुए
कहा| "जी वो... समय नहीं मिलता ... शनिवार और इतवार मैं घर चला जाता हूँ... इसलिए...." मैंने सफाई दी|
"ये सब मैं नहीं जानती ... एक शहर में हो कर कभी तो आ जाया करो! ये तो तुम्हारा अपना घर है|" उन्होंने मेरे कान पकड़ते हुए कहा| "जी ....ठीक... है... आऊँगा....आऊँगा!!!" मैंने हँसते हुए कहा जैसे की वो मेरा कान मरोड़ रही हों और ये देख के सभी खिल-खिला के हंस पड़े| खेर हँसी-ख़ुशी मैंने सब को बस स्टैंड छोड़ा और मैं विदा ले कर अपने ऑफिस आ गया|
update 9
ठीक १ बजे ऋतू का फ़ोन आया और मैंने उसे बता दिया की उसके कॉलेज और हॉस्टल दोनों जगह बात हो गई है| ये सुन कर वो बहुत खुश हो गई और पूछने लगी की सब लोग कहाँ है? तो मैंने उसे बता दिया की वो सब बस में बैठे हैं और 5 बजे तक घर पहुँचेंगे| इसके बाद वही प्यार भरी बातें हुई और फिर मेरे बॉस ने आवाज दे दी तो मुझे जल्दी ही जाना पड़ा|
रात के ग्यारह बजे मेरा फ़ोन बजा तो मैंने घडी देखि, चिंता हुई की सब ठीक तो है?
ऋतू: ये मोहिनी कौन है? (उसने बहुत गुस्से में कहा|)
मैं: क्या...? (अभी भी नींद से ऊंघते हुए|)
ऋतू: वही छमक छल्लो जो आपसे गले लगी थी आज?
मैं: (उबासी लेते हुए) वो... दोस्त ... है|
ऋतू: दोस्त है तो दोस्त की तरह रहे! गले लगने की क्या जर्रूरत है उसे?
मैं: अरे बाबा! वो इतने साल बाद मिले ना तो ....
ऋतू: (बीच में बात काटते हुए) ऐसी भी क्या दोस्ती है की होश तक नहीं उसे की आपके साथ घर के बड़े लोग भी हैं! और आप को भी बहुत मज़ा आ रहा था जो उसे अपने सीने से चिपकाये हुए थे!
मैं: अरे मेरी बात तो सुनो! वो दरअसल थोड़ा मुँहफट है!
ऋतू: (बीच में बात काटते हुए) वो सब मैं नहीं जानती, आप उससे दूर रहो वरना मैं उसका मुँह नोच लुंगी!
इतना कह के ऋतू ने फ़ोन काट दिया, तो मैंने दुबारा फ़ोन घुमाया पर उसने फिर काट दिया| तीसरी बार... चौथी बार... पाँचवी बार... छठी बार...सातवीं बार...आठवीं बार...नौंवी बार... इस बार उसने फ़ोन उठाया|
मैं: ऋतू... मेरी बात तो सुन लो एक बार?
ऋतू: (सुबकते हुए) हम्म...
मैं: जैसा तू सोच रही है वैसे कुछ नहीं है| कॉलेज के दिनों में मैं उसे पढ़ाया करता था वो भी उसके घर जा कर| बस इसके अलावा कुछ नहीं है!
ऋतू: घरवाले... आपकी शादी की बात कर रहे हैं! (उसने सुबकते हुए कहा|)
मैं: अरे तो करने दे ... मैं कौन सा शादी कर रहा हूँ! तू चिंता मत कर!
ऋतू: मैं.... आपसे अलग... नहीं रह सकती!.... मैं जान दे दूँगी!
मैं: SHUT UP!!! दुबारा ऐसी कोई बात कही तो मैं तुझसे कभी बात नहीं करूँगा| अब बेधड़क आराम से सो जा...
मैं कोशिश करता हूँ की घर एक चक्कर लगा लूँ|
ये सुन कर उसका सुबकना बंद हुआ और उसने I LOVE YOU कह के फ़ोन काटा| अब मुझे उससे कैसे भी मिलने जाना था पर जाऊँ कैसे? बॉस छुट्टी देगा नहीं! पर उन दिनों किस्मत मुझ पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान थी, जो चाह रहा था वो मिल रहा था| इसलिए जब घर जाने का मौका चाहने लगा तो अगले दिन वो भी मिल गया| बॉस ने कुछ फाइल पहुँचाने के लिए मुझे कहा| बीच रस्ते में मेरा गाँव था और बॉस जानते थे की मैं घर जर्रूर जाऊँगा इसलिए मेरी ख़ुशी पढ़ते हुए बोले; "कल लंच तक आ जाना|" मैंने ख़ुशी से हाँ कहा और तुरंत निकल पड़ा, पहले फाइल पहुँचाई और फिर वापसी में घर पहुँचा| बुलेट की आवाज सुनते ही ऋतू भागती हुई बाहर आई और मुझे देखते ही उसकी आँखें चमक उठी| उसने आगे बढ़ के मुझे गले लगना चाहा पर बाहर पिताजी और ताऊ जी बैठे थे इसलिए अपना मन मार के चुपचाप खड़ी हो कर मुझे उनसे बात करता हुआ देखने लगी| जब तक मेरी बात खत्म नहीं हुई वो वहाँ से हिली नहीं, शायद उसे डर था की मैं कहीं बहार से ही ना चला जाऊँ| जैसे ही मेरी बात खत्म हुई वो भागती हुई अंदर चली गई पर जब मैंने अंदर घुस के देखा तो वो मुझे कहीं नहीं मिली| आंगन में माँ, ताई जी और भाभी बैठी सब्जी काट रही थी| "अचानक कैसे आना हुआ?" भाभी ने पूछा|
"कुछ काम से पास के गाँव आना हुआ था|" मैंने रुखा सा जवाब दिया और अपने कमरे की तरफ चल दिया| जैसे ही सीढ़ी चढ़ के ऊपर पहुँचा तो ऋतू अपने कमरे में घुस गई और इशारे से मुझे अंदर आने को कहा| मैं उसके कमरे में घुसा और उसने मेरा हाथ पकड़ के मुझे अपने पलंग पर बिठा दिया, फिर अपने दुपट्टे से मेरा पसीना पोछने लगी| उसकी ख़ुशी उसके चेहरे से साफ़ झलक रही थी, वो मुड़ी और टेबल से पानी की गिलास और गुड़ उठा के मुझे दिया| मैंने गुड़ खाया और फिर पानी पिया और उसकी तरफ प्यार से देखने लगा| "आपको भूख लगी होगी?| उसने मुस्कुरा कर कहा और मुड के जाने लगी तो मैंने उसकी कलाई थाम ली और बैग से गुलाब निकाल के अपने घुटनों पर आते हुए कहा; "मेरी जान के लिए!" ऋतू ने मेरे हाथ से गुलाब ले लिया और फिर उसे अपने होठों से चूमा| फिर वो मेरी तरफ देख कर मुस्कुराई और झुक कर मेरे माथे को चूमा| मैं खड़ा हुआ और उसे अपने सीने से जकड़ लिया| इससे पहले की आगे कुछ बात हो पाती नीचे से मेरा बुलावा आ गया और मुझे ऋतू को छोड़ के नीचे जाना पड़ा| खेर वो शाम मुझे नीचे सब के बीच बैठ के बितानी पड़ी पर रात को खाने के समय ताऊ जी ने मेरी शादी की बात छेड़ी;
ताऊ जी: तो बरखुरदार! शादी के बारे में क्या विचार है?
मैं: जी अभी नहीं!
पिताजी: क्यों भला? लड़की तो तूने पहले ही पसंद कर रखी है ना?!
मैं: कौनसी लड़की?
चन्दर: अरे वही जो शहर में मिली थी, जिसने तुम्हें देखते ही गले लगा लिया था?
मैं: (खीजते हुए) वो खुद गले लग गई थी, मैंने उसे गले नहीं लगाया था| और आप सब से किसने कहा की मैं उससे शादी करना
चाहता हूँ? मैं बस उसे कॉलेज टाइम में पढ़ाया करता था इससे ज्यादा और कुछ नहीं है!
ताऊ जी: अरे हम अंधे-बहरे थोड़े ही हैं जो हमें उसकी माँ का बार बार 'अपना' कहना सुनाई नहीं देता! कितनी बार उन्होंने तुझे घर आने को कहा था?
मैं: वो सब इसलिए कह रही थी क्योंकि मैं उनकी बेटी को मुफ्त में पढ़ाता था, हॉस्टल का खाना कितना वाहियात होता था इसलिए वो बदले में मुझे घर का खाना खिलाया करती थी और इसी कारन उनका अपनापन मेरे प्रति थोड़ा ज्यादा है| इससे ज्यादा उन्होंने कभी कुछ नहीं कहा|
पिताजी: तो कब करेगा तू शादी?
मैं: पिताजी एक बार नौकरी पक्की हो जाये, पैसा अच्छा कमाने लगूँ तो मैं शादी कर लूँगा|
ताऊ जी: तुझे पैसे की क्यों चिंता है? इतना बड़ा खेत.....
मैं: (उनकी बात काटते हुए) मुझे अपने पाँव पर खड़ा होना है| जब मुझे लगेगा की मैं अपने पाँव पर खड़ा हो गया हूँ तो मैं आपको खुद बता दूँगा और शायद आप भूल रहे हैं की आपने वादा किया था!
मेरा इतना कहना था की उन्हें अपना वादा याद आ गया और उन्होंने आगे कुछ नहीं कहा बस गुस्से से मुझे एक बार देखा और फिर खाना खाने लगे| खाने के बाद मैं ऊपर आ गया और छत पर चक्कर लगाने लगा| घंटे भर बाद ऋतू भी खाना खा के ऊपर आ गई और मुझे इस तरह गुम-सुम छत पर टहलते हुए देखने लगी| जब मेरी नजर उस पर पड़ी तो मैं ने पाया की वो बड़ी गौर से मुझे देख रही थी और मन ही मन कुछ सोच रही थी| "क्या हुआ जान?" मेरी आवाज सुन कर वो होश में आते हुई बोली; "कुछ नहीं...
बस ऐसे ही आपको देख रही थी| आपके जितना प्यार करने वाले को पा कर आज मुझे खुद पर बहुत गर्व हो रहा है|” आगे कुछ बोलने से पहले ही भाभी आ गई और उन्होंने ऋतू को बिस्तर लाने को कहा| आज सभी औरतें छत पर सोने वाली थीं सो मैं उतर के अपने कमरे में लेट गया| अगली सुबह मुझे जल्दी जाना था तो मैं बिना नाश्ता किये जाने लगा तो ऋतू भाग के मेरे पास आई और परांठे जो की उसने पैक कर दिए थे मुझे दे दिए और नीचे चली गई|
कुछ दिन बीते और आखिर वो दिन आ ही गया जब ऋतू को कॉलेज ज्वाइन करना था| शनिवार को घर आते-आते रात हो गई, घर के सभी लोग खाना खा चुके थे| मुझे देखते ही ऋतू ने तुरंत खाना परोस के मुझे दे दिया और खुद अपने कमरे में चली गई| मैं खाना खा के ऊपर आया तो देखा उसने अपने कमरे में सारा सामान समेट रखा था| एक बैग जिसमें उसके कपडे थे वो तैयार रखा था, पूरे कमरे को उसने अच्छे से साफ़ किया था| जब उसकी नजर मुझ पर पड़ी तो उसके चेहरे ने उसकी सारी खुशियों को बयान कर दिया| उसने मुझे गले लगाना चाहा पर तभी पीछे से ताई जी आ गई और कमरे को देखते हुए ऋतू को ताना मारते हुए बोली; "चलो शुक्र है तू ने अपने कमरे को साफ़ कर दिया वरना ये भी हमें ही करना पड़ता|"
"समझदार है!" मैंने उनके ताने का जवाब दिया और फिर अपने कमरे में आ कर लेट गया| मेरे जाते ही ताई जी ऋतू को ज्ञान देने लगी की शहर में उसे किन-किन बातों का ध्यान रखना है| मैं अपने कमरे से उनकी सारी बातें सुन रहा था, ये ज्ञान कम और ताने ज्यादा थे! मैं चुप-चाप करवट लेके लेट गया और सुबह पाँच बजे के अलार्म के साथ उठ बैठा| मैं बाहर आया और अंगड़ाई लेने लगा तो देखा ऋतू नीचे घर के काम कर रही है| मुझे देखते ही वो मुस्कुरा दी और फिर अपने काम में लग गई| मैं जल्दी से नाहा-धो के तैयार हुआ और फिर सभी ने नाश्ता किया|
ताऊ जी: देख ऋतू शहर जा के कहीं मटर-गश्ती शुरू न कर देना! तेरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई में रहना चाहिए और हर शनिवार-इतवार को दोनों घर आते रहना|
मैं; जी ... आप तो जानते ही हैं की मुझे दूसरे और आखरी शनिवार की छुट्टी मिलती है..... तो....
पिताजी: ठीक है... पर ख्याल रखिओ ऋतू का और हमें तुम दोनों की कोई शिकायत नहीं आनी चाहिए!
मैं: जी...
वैसे भी हमारा मिलना कहाँ हो पायेगा?
ताई जी: क्यों?
मैं: मेरे पास समय ही नहीं होता! एक संडे मिलता है तो उसमें भी कपडे धो ना और खाना बनाने में समय निकल जाता है| शाम को फ्री होता हूँ पर हॉस्टल में 6 बजे के बाद मनाही है|
ताई जी: तो इसे (ऋतू) कोई दिक्कत हुई तो?
ताऊ जी: अरे कुछ दिक्कत नहीं होगी| सब देखा है हमने, तू चिंता मत कर|
मैंने आगे कुछ और नहीं कहा और फटाफट नाश्ता किया और अपनी बुलेट रानी को कपडा मारने बाहर चला गया| सब कुछ अच्छे से साफ़ कर के जब मैंने पीछे पलट के देखा तो ऋतू अपना बैग कंधे में टाँगे खड़ी थी| मैंने आगे बढ़ कर उससे बैग लिया और बाइक पर बैठ गया और बैग को पेट्रोल की टंकी पर रख लिया| एक स्टाइल वाली किक मारी और भड़भड़ करती हुई बुलेट स्टार्ट हुई, मैंने पलट के ऋतू को पीछे बैठने को कहा| तो वो सम्भल के बैठ गई और अपना दायाँ हाथ मेरे कंधे पर रख लिया| सारे घर वाले बाहर आ कर खड़े हो चुके थे और ऋतू की कुछ सहेलियां भी बुलेट की आवाज सुन कर वहाँ आ कर खड़ी हो गईं और हाथ हिला कर उसे बाय कहने लगी| ताऊ जी ने फिर से कहा; "सम्भल के जाना और वहाँ जा के हमें फ़ोन करना|" अब उन्हें भी तो थोड़ा बहुत दिखावा तो करना था ना! गाँव से करीब दो किलोमीटर दूर पहुंचे होंगे की मैंने बाइक रोक दी और ऋतू से दोनों तरफ टांग कर के बैठने को कहा| उसने ठीक वैसे ही किया और अपने दोनों हाथों को मेरी बगल से ले कर सामने की तरफ लाइ और मेरी छाती को कस के पकड़ लिया| उसका सर मेरी पीठ में धंसा हुआ था और आँखें बंद थी| ऋतू की गर्म सांसें मुझे मेरी पीठ पर महसूस हो रही थी, मैं बाइक को 40 की स्पीड में ही चला रहा था ताकि इस सफर का जितना हो सके उतना आनंद ले सकूँ|
दो घंटे की ड्राइव के बाद अब थकावट होने लगी तो मैंने बाइक एक ढाबे की तरफ मोड़ दी जहाँ की मैं अक्सर रुका करता था, जब भी घर जाता या आता था| बाइक रुकते ही ऋतू जैसे अपने ख्यालों की दुनिया से बाहर आई| "चलो चाय पीते हैं|" मैंने उसे कहा तो वो बाइक से उतरी और मैंने बाइक पार्क की और हम दोनों ढाबे में घुसे| मुझे देखते ही वेटर ने तपाक से नमस्ते की और ऋतू को मेरे साथ देखते ही वो समझ गया की वो प्रियतमा है और उसने नमस्ते दीदी कहा! ऋतू ने उसकी नमस्ते का जवाब दिया और फिर हम खिड़की के पास वाले टेबल पर बैठ गए| "आपको पता है मैं क्या सोच रही थी?" ऋतू ने मुझसे पुछा तो मैंने ना में सर हिला दिया| "मुझे ऐसा लग रहा था जैसे हम दोनों इस नर्क से भाग के कहीं अपनी छोटी सी दुनिया बसाने जा रहे हैं| इन दो घंटों में मैं जो कुछ भी सोच सकती थी वो सब सोच लिया की हमारा घर कैसा होगा, बच्चे कितने होंगे!" ऋतू ने बड़े भोलेपन से कहा और मैंने सोचा की मुझे उसे अब अपने प्लान से अवगत करा देना चाहिए|
मैं: घर से भागना इतना आसान नहीं है जितना तुम सोच रही हो| जैसे ही हम घर से भागेंगे उसके कुछ घंटों में ही लठैतों को बस
स्टैंड और रेलवे स्टेशन भेजा जायेगा हमें रोकने के लिए| हर बस को रोक कर चेकिंग की जाएगी और हमें पकड़ के मौत के घात उतार दिया जायेगा| इसलिए हमें जो कुछ भी करना है वो बहुत सोच समझ कर करना होगा और किसी भी हालात में घर पर या किसी भी इंसान को हमारे इस रिश्ते के बारे में कुछ पता नहीं चलना चाहिए! सबसे जर्रूरी चीज जो हमें चाहिए वो है पैसा| इस साल डेढ़ साल की नौकरी में मैं कुछ 10 हजार ही जोड़ पाया हूँ| मेरी नौकरी के बारे में घर में सब जानते हैं और मुझे भी कुछ पैसे घर भेजने पड़ते हैं| पर अब तुम चूँकि शहर आ चुकी हो तो अगले साल से तुम्हें भी कुछ पार्ट टाइम नौकरी करनी होगी| ये वही पैसे हैं जिससे हम बचा सकते हैं और जिनकी मदद से दूसरे शहर में हमें घर किराये पर लेना, बर्तन-भांडे आदि खरीदने में मदद करेंगे|
ऋतू: और हम भागेंगे कैसे?
मैं: तुम्हारे थर्ड ईयर के पेपर होने के अगले दिन ही हम भागेंगे| मैं घर पर फ़ोन कर दूँगा की हम घर आ रहे हैं, अब चूँकि घर पहुँचने में 4 घंटे लगते हैं और घर वाले कम से कम 6 से 8 घंटे तक हमें नहीं ढूंढेंगे तो हमारे पास इतना टाइम गैप होगा की हम ज्यादा से ज्यादा दूरी तय कर सकें| यहाँ से हम सीधा बनारस जायेंगे और वहाँ से बैंगलोर!
ऋतू: बैंगलोर?
मैं: हाँ... वो बड़ा शहर है और वहाँ तक हमें ढूँढना इतना आसान नहीं होगा| मोबाइल फेंकना होगा, बैंक अकाउंट बंद करना होगा और तुम्हारे नए कागज बनवाने होंगे|
ऋतू: कागज?
मैं: आधार कार्ड और PAN कार्ड|
ऋतू: वो तो घर में कभी बनाने नहीं दिए|
मैं: जानता हूँ और वही हमारे काम आएगा| नए कागजों का कोई पेपर ट्रेल नहीं होगा|
ऋतू मेरी सारी बातें हैरानी से सुन रही थी की मैंने इतनी सारी प्लानिंग कर रखी है| इतने में मोहिनी का फ़ोन आ गया, जिसे देख कर ऋतू को बहुत गुस्सा आया| उसने दरअसल पूछने के लिए फ़ोन किया था की हम दोनों कब तक पहुँच रहे हैं| "ये क्यों फोन कर रही थी आपको?" उसने गुस्सा दिखते हुए पूछा| "जान, वो पूछ रही थी कब तक हम दोनों हॉस्टल पहुंचेंगे| अब गुस्सा छोडो और चाय पियो और हाँ याद रहे उसे भूले से भी हमारे बारे में शक़ नहीं होना चाहिए|" ये सुन कर ऋतू कुछ बुदबुदाई और फिर चाय पीने लगी| उसकी इस अदा पर मुझे हँसी आ गई जिसे देख के वो भी थोड़ा मुस्कुरा दी| खेर हम चाय पी कर निकले और दो घंटे बाद शहर पहुँच गए| रास्ते भर ऋतू मुझसे उसी तरह चिपकी रही जैसे मुझे छोड़ना ही ना चाहती हो| खेर जैसे ही हम शहर में दाखिल हुए मैंने ऋतू को ढंग से बैठने को कहा और वो पहले की तरह बायीं तरफ दोनों पैर कर के बैठ गई और उसका दाहिना हाथ मेरे दाएं कंधे पर था| बुलेट रानी हॉस्टल की गेट पर रुकी तो गार्ड ने आगे आ कर मुझे नमस्ते की और ऋतू का बैग लेना चाहा तो मैंने उसे मन कर दिया और बाइक पार्क कर मैं ऋतू के साथ अंदर आया| दरवाजे पर नॉक की तो दरवाजा मोहिनी ने खोला और उसके चेहरे पर
हमेशा की तरह ख़ुशी साफ़ झलक रही थी| "अरे हमारी टॉपर ऋतू भी आई है!" उसने ऋतू को छेड़ते हुए कहा| ऋतू ने मोहिनी को नमस्ते कहा और फिर हम बैठक में बैठ गए और तभी आंटी जी भी आ गईं तो माने आगे बढ़ कर उनके पाँव छुए और मेरे पीछे-पीछे ऋतू ने भी उसके पैर छुए| आंटी जी ने मोहिनी ख़ास हिदायत दी की वो ऋतू का अच्छे से ख्याल रखे और इसी के साथ मेरे जाने का समय हो गया तो मैं उठ के खड़ा हुआ और नमस्ते कर के जैसे ही बाहर जाने को मुड़ा की ऋतू रोने लगी और मेरे सीने से लग गई| उस पगली ने ये भी नहीं देखा की वहाँ मोहिनी और आंटी जी भी हैं| "वो दरअसल पहली बार घर से बाहर कहीं रुकी है, इसलिए घबरा रही है|" मैंने जैसे तैसे बात को सँभालने की कोशिश की| "अरे बेटी रोने की क्या बात है? ये भी तो तेरे घर जैसा ही है| मोहिनी अंदर ले जा ऋतू को|" आंटी जी ने ऋतू के सर पर हाथ फेरते हुए कहा| जैसे-तैसे मैंने ऋतू के हाथों को जो मेरी पीठ पर कस चुके थे उन्हें खोला और ऋतू के आँसू पोछे; "बस अब रोना नहीं है! मैं कल सुबह 09:30 आऊँगा तैयार रहना| तब जा कर उसका रोना बंद हुआ और फिर मोहिनी ऋतू का हाथ पकड़ के अंदर ले गई| "अरे बेटा तुम क्यों तकलीफ करते हो? मोहिनी कल छोड़ आएगी इसे कॉलेज|" आंटी ने कहा|
"आंटी जी वो पहला दिन है और मैं साथ रहूँगा तो इसे डर कम लगेगा|" मेरी बात सुन के आंटी ने और कुछ नहीं कहा और मैं उनसे विदा ले कर घर आ गया| मेरा घर और ऑफिस हॉस्टल से 1 घंटे दूर था| घर लौट कर कपडे वगैरह धो कर, खाना खाया और जल्दी सो गया| सुबह फटाफट तैयार हो कर मैं हॉस्टल पहुँच गया और मेरी बुलेट रानी की आवाज सुनते ही ऋतू भागती हुई बाहर आई और उसके पीछे-पीछे मोहिनी भी आई और ऋतू की इस भागने की हरकत पर मुस्कुराने लगी| "चलो भाई Best of Luck पहले दिन के लिए| अगर कोई तकलीफ हो तो मुझे बताना|" मोहिनी ने मुस्कुराते हुए कहा| "हाँ ...
ये कॉलेज की गुंडी थी, आज भी बहुत चलती है इनकी|" मैंने हँसते हुए कहा और फिर हम कॉलेज के लिए चल पड़े| मुझे कॉलेज गेट पर देखते ही कल्लू भैया दौड़ कर आये और सलाम किया| मेरे साथ ऋतू को देख वो समझ गए की वो मेरी प्रियतमा है| हम दोनों को देख कर कोई नहीं कह सकता था की मैं ऋतू का चाचा हूँ, 5 साल का अंतर् तो कोई पकड़ ही नहीं सकता था| खुद को मैं अच्छे से मेन्टेन रखता था, एक दम क्लीन-शैवेन रहता था, कपडे ब्रांडेड जिससे की लगे ही ना की मैं गाँव-देहात का रहने वाला हूँ|
"अगर कोई भी परेशानी हो तो कल्लू भैया को कह देना|" मैंने ऋतू से कहा ताकि उसके मन का डर कम हो| कॉलेज पूरा घुमा के उसे उसकी क्लास की तरफ छोड़ने जा रहा था की उसकी नजर उस दिवार पर पड़ी जहाँ मेरी तस्वीर लगी थी और वो मुझे खींच के उस तरफ ले जाने लगी| मेरी तस्वीर देख कर उसे काफी गर्व महसूस हो रहा था| "मैं चाहता हूँ तुम्हारी भी तस्वीर मेरी बगल में लगे|" मेरी बात सुन कर ऋतू का आत्मविश्वास लौट आया और उसने हाँ में सर हिलाया| "शाम को 5 बजे मुझे गेट पर मिलना, इतना कह के मैंने उसे उसकी क्लास में भेज दिया| ऑफिस आने में घंटा भर लग गया और बॉस बहुत गुस्सा हो गए, पर मुझे तो शाम को जल्दी जाना था और ये बात कैसे कहूँ उनको?! मैंने उनकी डाँट का जरा भी विरोध नहीं किया और सर झुकाये सुनता रहा| एक कंपनी का पूरा फाइनेंसियल डाटा मेरे पास पेंडिंग पड़ा था इसलिए उनकी डाँट खत्म होते ही मैं सिस्टम पर बैठ गया और काम करने लगा| लंच के समय भी सभी कहते रहे पर मैं नहीं गया और बड़ी मुश्किल से केशबूक कम्पलीट की| बॉस ने जब देखा तो खुद ही मुझे खाने के लिए बोलने लगे तब मैंने उनसे जल्दी जाने की बात कही तो वो भड़क गए| "गर्लफ्रेंड का चक्कर है ना?" उन्होंने डाँटते हुए कहा| "जी मेरे भाई की लड़की का आज कॉलेज में पहला दिन है वो कहीं इधर-उधर न चली जाए इसलिए उसे हॉस्टल छोड़ के मैं वापस आ जाऊँगा|" मैंने उनसे आखरी बार विनती की तो थोड़ी ना-नुकुर के बाद मान गए और बोल दिया की कल सुबह तक सारा डाटा उन्हें किसी भी हालत में कम्पलीट चाहिए| जैसे ही चार बजे मैं फ़टाफ़ट अपनी बुलेट रानी को ले के कॉलेज के लिए निकला और ठीक पाँच बजे मैं कॉलेज गेट पर रुका, मुझे देखते ही ऋतू रोती हुई भाग के मेरे पास आई|
update 10
मैं: क्या हुआ रो क्यों रही हो?
ऋतू: वो....वो....कैंटीन में.... रैगिंग .... उसने... मुझे .... डांस..... करने को.....
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मैं: (बीच में बोलते हुए) क्या नाम है उसका?
ऋतू: तोमर
बस ऋतू का इतना कहना था की मैं बाइक से उतरा और उसका हाथ पकड़ के तेजी से कैंटीन में घुसा और देखा वहाँ कुछ लड़कियां डांस कर रही हैं और सेकंड और थर्ड ईयर के बच्चे खड़े देख कर हँस रहे हैं| मैंने ऋतू का हाथ छोड़ा और भीड़ के बीचों-बीच होता हुआ सामने जा पहुँचा| 5 लड़कों का एक झुण्ड सब की रैगिंग कर रहा था और मुझे देखते ही उनमें से एक बोला; "ये लो एक और बच्चा आ गया|"
"तुम में से तोमर कौन है?" मैंने गरजते हुए कहा| ये सुन कर उनका हीरो लड़का सामने आया और बोला; "मैं हूँ बे!" उसकी आँखें पूरी लाल थी, जिसका मतलब था उसने अभी-अभी गांजा फूंका है| "इस कॉलेज में रैगिंग अलाउड नहीं है, जानता है ना तू?" मैंने उसकी आँखों में आँखें डाल के कहा| "तू कौन है बे? प्रिंसिपल का चमचा!?" ये सुनते ही मैंने एक जोरदार तमाचा उसके बाएं गाल पर रख दिया और वो मिटटी चाट गया| उसके सारे चमचे आ कर उसे उठाने लगे| जिन बच्चों की रैगिंग हो रही थी वो सब डरे-सहमे से एक तरफ खड़े हो गए और पूरी कैंटीन में शान्ति छ गई! "तेरी ये हिम्मत साले!" ये कहते हुए वो तोमर नाम का लड़का अपने होठों पर लगे खून को साफ़ करते हुए बोला और अपना मोबाइल निकाल कर अपने भाई को फ़ोन करने लगा| "भाई....भाई....एक लड़के ने... मुझे बहुत मारा...मेरा खून निकाल दिया... आप जल्दी आओ भाई!" ये कहके उसने फ़ोन काट दिया और मुझे बोला; "रुक साले ...तू यहीं रुक.... एक बाप की औलाद है तो यहीं रुक|"
"यहीं बैठा हूँ.... बुलाले जिसे बुलाना है|" ये कह कर मैंने पास पड़ी कुर्सी उठाई और उसे उस लड़के की तरफ घुमा कर रख कर बैठ गया| तभी पीछे से ऋतू आ गई और इससे पहले वो कुछ कहे मैंने उसे इशारा कर के वापस भेज दिया|
तोमर: अच्छा ... ये तेरी बंदी है ना?! कौन से क्लास में है तू?
मैं: वो प्रिंसिपल रूम के बाहर जो दिवार है न उस पर सबसे ऊपर वाली तस्वीर मेरी है!
तोमर: वही तस्वीर तेरी कल अखबार में भी छपेगी!
मैं: आने दे तेरे भाई को फिर पता चलेगा किसकी तस्वीर छपेगी कल!
तोमर: हाँ-हाँ देख लेंगे.... और तुम लोग भी सुन लो सालों! जो कोई भी मेरे खिलाफ जाता है उसका क्या हाल होता है!
मैं: चुप-चाप बैठ जा अब! वरना दूसरे झापड़ में यहीं हग देगा!
तोमर: तेरी तो.....
इसके आगे वो कुछ कहता की उसका भाई पीछे से आ गया| मेरी पीठ अभी भी उस शक़्स की तरफ थी की तभी आवाज आई; "हाँ भई किसने पेल दिया तुझे?" ये सुन कर जैसे ही मैं पलटा तो देखा ये तो सोमू भैया हैं| उन्होंने भी देखते ही मुझे पहचान लिया और आगे बढ़ कर सीधे गले लगा लिया| "अरे मानु इतने साल बाद! कैसा है तू?" ये कहते हुए सोमू भइया मुस्कुरा कर मुझसे बात कर रहे थे और वो तोमर को भूल ही गए|
"ओ भैया? इसे क्या गले लगा रहे हो इसी ने तो मारा है मुझे!" तोमर बोला|
"अरे? तू तो पढ़ाकू लड़का था, तूने कैसे हाथ छोड़ दिया?!"
"भैया ....
आपका भाई लड़कियों की रैगिंग कर रहा था, उन्हें यहाँ आइटम नंबर वाले गानों पर डांस करवा रहा था|" ये सुनते ही उनका चेहरा तमतमा गया और वो बड़ी तेजी से उसके पास गए और एक जोरदार तमाचा उसके बाएं गाल पर दे मारा| ठीक उसी समय उन्हें गांजे की महक आई तो उन्होंने उसे उठा के एक और तमाचा मारा और वो फिर नीचे जा गिरा| "हरामजादे!!! तेरी हिम्मत कैसे हुई लड़कियों की रैगिंग करने की? ये कॉलेज हमारी माँ के नाम पर है और तू उन्हीं के नाम को गन्दा कर रहा है! समझाया था ना तुझे की कॉलेज की लड़कियों का सम्मान करना, पर तू....कुत्ते! बहुत चर्बी चढ़ी है न तुझे, अभी उतारता हूँ तेरी चर्बी!" ये कहते हुए सोमू भैया ने अपनी बेल्ट निकाल ली और एक जोर दार चाप उसके कंधे पर पड़ी| मैंने भाग कर उनका हाथ पकड़ कर उन्हें रोका; "छोड़ दे मुझे मानु! इस कुत्ते ने हमारे खानदान की इज्जत पर कीचड़ उछाला है!"
"भैया...." मैंने बस इतना ही कहा था की उन्होंने अपना हाथ छुड़ाया और एक बेल्ट और चाप दी! अब मैंने जैसे तैसे उन्हें पीछे से पकड़ लिया और पीछे की तरफ खींचने लगा पर मुझे बहुत ताकत लगानी पढ़ रही थी| भैया थे ही इतने बलिष्ट! उधर तोमर जमीन पर पड़ा दर्द से करहा रहा था और उसके चमचे हाथ बांधे पीछे खड़े सब कुछ देख रहे थे|
सोमू भैया: तेरी तो मैं जान ले लूँगा कुत्ते!
मैं: भैया.. छोड़ दो ... तमाशा मत खड़ा करो... हम बैठ कर बात करते हैं!"
सोमू भैया: कोई बात-वात नहीं करनी मुझे! छोड़ तू मुझे!
मैं: भैया मैं आपके आगे हथजोड़ के विनती कर रहा हूँ! आप घर चलो ... वहाँ आप जो चाहे इसे सजा दे देना|
तब जा कर भैया का गुस्सा कुछ काबू में आया और उन्होंने बेल्ट छोड़ दी| "तुम सब लोग सुन लो! आज के बाद यहाँ किसी ने भी रैगिंग की तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा| रैगिंग करनी है तो उस फाटक वाले कॉलेज में पढ़ो, इस कॉलेज में प्यार, मोहब्बत, आशिक़ी, नशे के लिए कोई जगह नहीं है| मानु जैसे स्टूडेंट्स ने इस कॉलेज की जो शान बनाई है वो बनी रहनी चाहिए और इस शान पर अगर किसी ने कलंक लगाने की कोशिश की तो वो जान से जायेगा!" सोमू भैया ने गरज के साथ अपना फरमान सुनाया| "....
और मानु, इस कुत्ते की गलती के लिए मैं तुझसे हाथ जोड़ कर माफ़ी माँगता हूँ|" ये कहते हुए भैया ने हाथ जोड़े तो मैंने उनके हाथ पकड़ लिए; "ये क्या कर रहे हो भैया? लड़का भटक गया है, आप इस समझाओगे तो समझ जायेगा|"
"सुना तूने कुत्ते! चल माफ़ी माँग मानु से|" भैया ने गरजते हुए तोमर से कहा| वो बेचारा रोता हुआ खड़ा हुआ और हाथ जोड़ के माफ़ी मांगने लगा तो मैंने भी उसे माफ़ कर दिया| "आज के बाद तूने किसी को भी परेशान किया ना तो देख फिर! और आप सभी को भी बता दूँ, इसका नाम राकेश है और आज के बाद आप में से किसी भी स्टूडेंट को इससे डरने की जर्रूरत नहीं है, कोई भी इसे तोमर नहीं कहेगा| साले कुत्ते! हमारी जात का नाम ले कर ऐसे डरा रखा है जैसे की कोई तोप हो! घर चल तू अब, जरा पिताजी को भी पता चले तेरे खौफ के बारे में|" ये कहते हुए भैया ने उसके पिछवाड़े पर लात मारी और वो बेचारा शर्म के मारे सर झुका कर निकल लिया| भैया से कुछ बातें हुई और फिर हम दोनों गेट पर पहुँचे, पीछे पीछे ऋतू भी आ रही थी तो भैया ने उससे पूछा: "हाँ भई तुम क्यों हमारे पीछे आ रही हो? कुछ काम है क्या मुझसे?"
"जी....वो....." इतना कहते हुए ऋतू ने मेरी तरफ इशारा कर दिया और ये सुनके भैया हँसते हुए बोले; "अच्छा जी... तो यही हैं जिनकी वजह से तुम ने राकेश को पेल दिया|"
"भैया वो...."
"अरे छोडो भाई! हम सब समझ गए!" ये कहते हुए वो मुझे छेड़ने लगे| "चलो बढ़िया है! खुश रहो!" इतना कह कर भैया अपनी गाडी में बैठ के निकल गए|
उनके जाते ही डरी-सहमी सी ऋतू मेरे सीने से लग गई और रोने लगी| उस ने आज पहली बार ऐसा कुछ देखा था जो उसके लिए पूरी तरह नया अनुभव था| मैंने उसे पुचकार के चुप कराया और उसके माथे को चूमा तो वो कुछ शांत हुई| फिर उसे बाइक पर बिठा कर हॉस्टल छोड़ा और कल की मुलाक़ात का समय भी तय हुआ और इसी तरह रोज़ कॉलेज के बाद एक घंटे के लिए मिलना, घूमना-फिरना, प्यार भरी बातें करना... ऐसे करते हुए दिन बीते.. बस मेरे लिए ऑफिस और पर्सनल लाइफ को बैलेंस करना मुश्किल हो रहा था जिसका पता मैंने ऋतू को कभी चलने नहीं दिया....
और फिर वो दिन आया जब ऋतू का जन्मदिन था|
मैंने आज पूरे दिन की छुट्टी ले रखी थी, ऋतू को भी मैंने बता दिया था की वो आज आधे दिन के बाद बंक मार के मेरे साथ चले| सबसे पहले तो मैं उसे एक अच्छी सी रोमांटिक मूवी दिखाने ले गया और फिर उसके बाद उसे आज पहली बार अपने घर पर लाया| कमरे में दाखिल होते ही वो कमरे की सजावट देख कर दंग रह गई| फ्रिज से केक निकाल के जब मैंने रखा तो उसकी आँखों में ख़ुशी के आँसूं छलक आये| केक पर लगी मोमबत्ती बुझा कर सबसे पहला टुकड़ा उसने मुझे खिलाया और फिर वही आधे टुकड़ा मैंने ऋतू को खिला दिया| मैंने उसे कस के अपने सीने से लगा लिया पर अगले ही पल वो मुझसे थोड़ा दूर हुई और नीचे जमीन की तरफ देखने लगी| फिर मेरी आँखों में देखा और अपने पंजों पर खड़ी हो कर मेरे होठों को चूम लिया| मैं उसके इस अचानक हुए हमले से थोड़ा हैरान था, जो उसने साफ़ पढ़ ली और शर्म से सर झुका लिया| पर आज मैं अपनी जान को कैसे नाराज करता सो मैं आगे बढ़ा और ऋतू के चेहरे को अपने दोनों हाथों में थामा और उसे गुलाबी होठों को चूमा| मेरे स्पर्श से ऋतू के जिस्म में हलचल शुरू हो चुकी थी और उसने अपने दोनों होठों को मेरे हाथों पर रख दिया| इधर मैंने अपने होठों को थोड़ा खोला और ऋतू के निचले होंठ को अपने मुँह में भर लिया और उसे चूसने लगा| ५ सेकंड के बाद मैंने ऐसा ही उसके ऊपर वाले होंठ के साथ भी किया| ऋतू ने कभी ऐसा चुम्बन महसूस नहीं किया था इसलिए वो मदहोश होने लगी थी, उसका जिस्म हल्का होने लगा था और उसके जिस्म का वजन मुझ पर आने लगा था| इधर मैं बारी-बारी उसके दोनों होठों को चूसने में लगा था की तभी मेरे लंड में तनाव आने लगा और दिमाग ने जैसे बहुत तेज करंट मुझे मारा और मैंने ऋतू को खुद से अलग किया| हम दोनों की सांसें भारी हो चली थी और मेरे तन और दिमाग में जंग छिड़ चुकी थी| तन सम्भोग चाहता था और दिमाग उसके परिणाम से डरता था| ऋतू को आ रहे आनंद में जैसे ही विघ्न पड़ा उसने अपनी आँखें खोली और फिर मेरी तरफ हैरानी से देखने लगी की भला क्यों मैंने ये चुंबन तोडा?! पर उसके ऊपर जैसे कुछ फर्क पड़ा ही नहीं| इसलिए वो धीरे-धीरे कदमों से मेरे पास आई और मैं धीरे-धीरे पीछे हटने लगा और पलंग पर जा बैठा| वो मेरे पास आकर खड़ी हो गई और फिर घुटने मोड़ के नीचे बैठ गई और मेरे चेहरे को अपने हाथ में थामा और फिर से अपने गुलाबी होंठ मेरे होठों पर रखे और मेरे नीचले होंठ को अपने मुँह में भर के चूस ने लगी| ऋतू मेरे कश्मक़श को समझ नहीं रही थी और बस मेरे होठों को बारी-बारी से चूस रही थी| इधर मेरा काबू भी खुद के ऊपर से छूटने लगा था और हाथ अपने आप ही उठ के उसके दोनों गालों पर आ चुके थे, मेरी जीभ भी अब कोतुहल करने को तैयार थी| जैसे ही ऋतू ने मेरे ऊपर के होंठ को छोड़ के नीचले होंठ को पकड़ने के लिए अपना मुँह खोला मैंने अपनी जीभ उसके मुँह में सरका
दी और मैं ये महसूस कर के हैरान था की उसने तुरंत ही मेरी जीभ को मुँह में भर के चूसना शुरू कर दिया| अब तो मेरी हालत ख़राब हो चुकी थी, लंड कस के खड़ा हो चूका था और पैंट में तम्बू बना चूका था| हाथ नीचे आ कर ऋतू के वक्ष को छूना चाहते थे पर अभी भी दिमाग में थोड़ी ताक़त थी इसलिए उसने हाथों को नीचे सरकने नहीं दिया|
इधर ऋतू को तो जैसे मेरी जीभ इतनी पसंद आ रही थी की वो उसे छोड़ ही नहीं रही थी और सांसें रोक कर उसे चूस-चूस के निचोड़ना चाहती थी| ऋतू के हाथ भी हरकत करने लगे थे और उस ने मेरी शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए थे| बस तीन ही बटन खुले थे की मैंने उसके हाथों को रोक दिया, तभी ऋतू ने मेरी जीभ की चुसाई छोड़ी और अपनी जीभ मेरे मुँह में सरका दी तो मैंने उसकी जीभ को चूसना शुरू कर दिया| इधर ऋतू के हाथों ने फिर से मेरी कमीज के बटन खोलना शुरू कर दिया था और मेरे हाथों ने उसके चेहरे को थामा हुआ था| अब लंड की हालत यूँ थी की वो पैंट फाड़ के बाहर आने को मचल रहा था और दिमाग में फिर से घंटी बजने लगी थी की कहीं कुछ हो ना जाए! मैंने ऋतू की जीभ को चूसना बंद किया और इससे पहले की मैं कुछ कहूं उसने पुनः अपने होठों से मेरे निचले होंठ को अपने मुँह की गिरफ्त में ले लिया| जैसे-तैसे कर के मैंने इस चुंबन को तोडा और ऋतू के होठों पर ऊँगली रखते हुए कहा; "बस! बाकी...शादी के बाद!" ये सुन के वो ऐसे मुँह बनाने लगी जैसे किसी छोटे बच्चे के हाथ से लॉलीपॉप छीन ली हो! "awwww मेरा छोटा बच्चा|" ये कह के मैंने उसे गले लगा लिया और फिर खाने ले लिए कुछ आर्डर किया| मैं बाथरूम में घुसा ताकि अपने लंड मियां को शांत कर लूँ, कहीं ऋतू देख लेती तो पता नहीं क्या सोचती?!
दस मिनट में मैं उसे शांत कर के और मुँह धो कर बहार लौटा तो देखा ऋतू पलंग पर बैठी है| उसकी पीठ दिवार से लगी थी और दोनों पाँव पलंग पर सीधे थे| उसने अपनी दोनों बाहें खोल के मुझे पलंग पर बुलाया| मैं उसके गले लगने के बजाये उसकी गोद में सर रख कर लेट गया| ऋतू के उँगलियाँ मेरे बालों में चलने लगी;
ऋतू: ये बर्थडे अब तक का Best बर्थडे था| थैंक यू जानू!
मैं: हम्म...
ऋतू: एक और थैंक यू आपको!
मैं: एक और? किस लिए?
ऋतू: Kiss करना सिखाने के लिए| (ये कह के ऋतू हँसने लगी|) वैसे आप तो काफी expert निकले? और कितनी बार कर चुके हो?
मैं: पागल फर्स्ट टाइम था!
ऋतू: अच्छा? इतना परफेक्ट कैसे?
मैं: वीडियो देख-देख के सीख गया|
ऋतू: अच्छा? मुझे भी दिखाओ!
मैं: नहीं... उसमें 'और' भी कुछ है! 'वो सब' अभी नहीं!
ऋतू: स्कूल और कॉलेज में बहुत सी लड़कियां हैं जिन्होंने 'वो सब' कर रखा है और वो सब मज़े ले कर सुनाती हैं| इसलिए theory तो मुझे अच्छे से पता है|
मैं: अच्छा? चलो प्रैक्टिकल शादी के बाद कर लेना?
ऋतू: इतना इंतजार करना पड़ेगा? आप भी ना?! आप की उम्र के लड़के तो लड़कियों के पीछे पड़े रहते हैं इन सब के लिए और एक आप हो की.....
मैं: अब कुछ तो फर्क होगा न मुझ में और बाकियों में, वरना तुम मुझिसे प्यार क्यों करती?
ऋतू: आपका मन नहीं करता?
मैं: करता है.... पर जिम्मेदारियां भी हैं! घर से भागना आसान काम नहीं है!
ऋतू: हम प्रोटेक्शन इस्तेमाल करते हैं|
मैं: तुम सच में चाहती हो की पहली बार में मैं कॉन्डम इस्तेमाल करूँ?
ऋतू: नहीं....(कुछ सोचते हुए) मैं गर्भनिरोधक गोली ले लूँगी|
मैं: ऐसा कुछ नहीं करना ... थोड़ा सब्र करो! (मैंने थोड़ा डाँटते हुए कहा|)
ऋतू: सॉरी! पर आप वीडियो तो दिखा दो ना प्लीज? देखने से तो कुछ नहीं होगा|
मैं: तुम बहुत जिद्दी हो! ये लो...
ये कहते हुए मैंने उसे अपने फ़ोन में राखी एक ब्लू-फिल्म लगा के दे दी और तभी दरवाजे पर दस्तक हुई| खाना आ चूका था तो मैंने खाना लिया और ऋतू के हाथ से फ़ोन छीन लिया और कहा; "पहले खाना ... बाद में देख ना|" ये कहते हुए मैंने उसे पहली बार पिज़्ज़ा दिखाया और बताया की ये है क्या| ऋतू को पिज़्ज़ा बहुत पसंद आया और हम दोनों ने खाना खाया और वापस पलंग पर बैठ गए पर इस बार ऋतू ने अपना सर मेरी गोद में रखा था और वो वही ब्लू-फिल्म देखने लगी| ब्लू-फिल्म से उसके जिस्म का तो पता नहीं पर मेरे लंड में हरकत होने लगी थी| वो तन के खड़ा होना चाहता था पर ऋतू का सर ठीक उसी के ऊपर था, मैंने थोड़ा हिलना चाहा की मैं उसका सर हटा दूँ पर वो ये सब समझ चुकी थी और उसने कुछ इस कदर करवट ले ली अब उसका बायां गाल ठीक मेरे लंड के ऊपर थे| वो मुझ से कुछ नहीं बोली बस बड़ी गौर से ब्लू-फिल्म देखती रही| इधर लंड मियां बगावत पर उत्तर आये और अपने आप ही पैंट के ऊपर से ऋतू के गाल पर थाप देने लगे जिसे ऋतू ने शायद महसूस भी किया| अब मैंने उठ के खड़े होने की कोशिश की तो ऋतू ने वीडियो रोक दी और हँसते हुए कहा; "अच्छा बाबा! अब तंग नहीं करुँगी!" मतलब वो मेरे लंड को साफ़ महसूस कर रही थी और जान बुझ कर मेरे साथ ऐसा कर रही थी| "तू बदमाश हो गई है|" ये कहते हुए मैंने उसके गाल पर हलकी सी थपकी लगाईं| मैं वापस दिवार से पीठ लगा कर बैठ गया और उसने भी अपना सर अब मेरे सीने से टिका लिया और वीडियो देखने लगी| चुदाई का सीन शुरू हुआ ही था की ऋतू का हाथ मेरे लंड पर आगया और ऐसा लगा जैसे वो नाप के देख रही हो के मेरा लंड उस आदमी के लंड के मुकाबले कितना बड़ा है| मैंने धीरे से उसका हाथ अपने लंड से हटा दिया और वापस उसका हाथ अपनी छाती पर रख दिया| 30 मिनट की वीडियो को उसने बिना काटे देखा और उसका जिस्म पूरा गर्म हो चूका था" उसने वीडियो पूरी होते ही फ़ोन रखा और खड़ी हो गई और मेरा हाथ पकड़ के मुझे खींच के लेटने को कहा और फिर खुद मेरी बगल में लेट गई| अपने दाएं हाथ को मेरे गाल पर रखा और मुझे Kiss करने लगी| शुरू-शुरू में मैंने भी उसकी Kiss का जवाब बहुत अच्छे से दिया पर जब लंड फिर से खड़ा हो गया तो मैंने उसे रोक दिया; "बस जान!" और फिर घडी देखि तो सवा पांच बजे थे| "कुछ देर और रुक
जाते हैं ना?" ऋतू ने मेरा हाथ पकड़ के मुझे उठने से रोकते हुए कहा| "आने-जाने में 1 घंटा लगेगा, फिर हॉस्टल में क्या बोलोगी?" मैंने तुरंत अपने कपड़े ठीक किये पर ऋतू का तो जैसे जाने का मन ही नहीं था| "कल भी बंक मारूँ?" उसने खुश होते हुए कहा|
"दिमाग ख़राब है? यही सब करने के लिए यहाँ आई थी? फर्स्ट सेमेस्टर में फ़ैल हो गई तो घर वाले फिर घर पर बिठा देंगे| समझी? कॉलेज पढ़ने के लिए होता है समय बर्बाद करने के लिए नहीं और आज के बाद कभी मुझे बिना बताये बंक मारा ना तो सोच लेना!" मैंने ऋतू को थोड़ा झाड़ते हुए कहा| डाँट सुन के उसका सर झुक गया; "पढ़ाई के मामले में कोई मस्ती नहीं! समझी?" उसने हाँ में सर हिलाया और फिर मैंने उसकी ठुड्डी पकड़ के ऊँची की और उसके होठों को चूमा| तब जा के वो फिर से खुश हो गई और अपने कपडे ठीक किये और मुँह हाथ धो के हम घर से निकले और मैंने ऋतू को हॉस्टल छोड़ा| ऋतू को मैं कभी भी कॉलेज के गेट से पिकअप नहीं करता था बल्कि चौक पर बत्ती के पास मेरी बाइक हमेशा खड़ी होती थी और हॉस्टल भी मैं उसे कुछ दूरी पर छोड़ता था ताकि कोई भी हमें एक साथ न देखे| खेर ऋतू बाइक से तो उत्तर गई पर उस का हॉस्टल जाने का मन कतई नहीं था इसलिए उसे खुश करने के लिए मैंने अपने बैकपैक से उसके लिए एक गिफ्ट निकाला और उसे दे दिया| गिफ्ट देख कर वो खुश हो गई, गिफ्ट में एक फ़ोन था और एक सिम-कार्ड भी| वो ख़ुशी से उछलने लगी और अचानक से मेरे गले लग गई और थैंक यू कहते हुए उसकी जुबान नहीं तक रही थी| "इसका पता किसी को भी नहीं चलना चाहिए? न कॉलेज में न हॉस्टल में?" मैंने उसे थोड़ा सख्त लहजे में कहा और जवाब में उसने हाँ में सार हिलाया पर उसके चेहरे की ख़ुशी अब भी कायम थी| जाने से पहले उसने अचानक से मेरे होठों को चूमा और फिर हॉस्टल की तरफ भगति हुई घुस गई, मैंने भी बाइक घुमाई और ऑफिस आ गया और काम करने लगा| ये मेरा रोज का काम था की शाम को जल्दी ऋतू को मिलने पहुँचो और ऋतू को हॉस्टल छोड़ के ऑफिस देर तक बैठो और फिर देर रात घर पहुँचो और बिना खाये-पीये सो जाओ! बॉस इसलिए कुछ नहीं कहता था की उसे काम कम्पलीट मिलता था पर मेरी कई बार रेल लग जाती थी!
update 11
जो बदलाव अब मैं ऋतू में देख रहा था वो ये था की वो अब उसका प्यार मेरे लिए अब कई गुना बढ़ चूका था| जब भी उसे टाइम मिलता तो वो कहीं छुप कर मुझे फ़ोन करती, व्हाट्स ऍप पर मैसेज करती रहती| रोज सुबह-सुबह उसका प्यार भरा मैसेज देख कर मैं उठता| तरह-तरह के हेयर स्टाइल बना कर उसका सेल्फी भेजना और मेरे पीछे पड़ जाना की मैं उसे सेल्फी भेजूँ! जब भी हम मिलते तो वो मेरा हाथ थाम लेती, और तरह-तरह की फोटो खींचती| कभी मुझे kiss करते हुए तो कभी पॉउट करते हुएऔर बहाने से मुझे Kiss करती| कभी इस पार्क में, कभी उस पार्क में, कभी किसी कैफ़े में और यहाँ तक की एक दिन उसने एक पुराने खंडर जाने की भी फरमाइश कर दी| ये खंडर
प्रेमी जोड़ों के लिए जन्नत था क्योंकि यहाँ कोई आता-जाता नहीं था| जब हम वहाँ पहुँचे तो वहाँ कोई जगह खाली नहीं थी पर ऋतू मेरा हाथ थामे मुझे खींच के अंदर और अंदर ले जा रही थी| उसे तो जैसे भूत-प्रेत का कोई डर ही नहीं था| अंदर पहुँच कर वो मेरी तरफ मुड़ी और अपनी बाहें मेरे इर्द-गिर्द लपेट ली| फिर वो अपने पंजो पर खड़ी हो गई और मेरे होठों पर Kiss कर दी| मेरे दोनों हाथ उसकी पीठ पर घूमने लगे थे और इधर ऋतू ने अपनी बाहें मेरे गले में डाल ली| हम अपने Kiss में इतना मग्न थे की आस-पास की कोई खबर ही नहीं थी| जब जेब में फ़ोन बजा तब जा के होश आया, फोन ऋतू के हॉस्टल से था जिसे देखते ही हम तुरंत बाहर आये और फटाफट हॉस्टल पहुँचे|
इस शनिवार हमें घर जाना था तो मैं सुबह-सुबह ऋतू को लेने हॉस्टल पहुँचा| रास्ते भर ऋतू मेरी पीठ से चिपकी रही और हमारा एक मात्र हॉल्ट वो ढाबा ही था जहाँ रुक कर हम चाय पीने लगे|
ऋतू: तो अब हम अपने रिश्ते को आगे कब ले कर जा रहे हैं?
मैं: आगे? मतलब?
ऋतू: 'वो'
मैं: वो सब शादी के बाद|
ऋतू: पर क्यों?
मैं: तुम प्रेग्नेंट हो गई तो?
ऋतू: ऐसा कुछ नहीं होगा|
मैं: ऋतू! मैं इस बारे में अब कोई बात नहीं करूँगा! नहीं मतलब नहीं! (मैंने गुस्से से कहा)
ऋतू: अच्छा ठीक है! पर आप आज रात को मेरे कमरे में तो आओगे आज? कितने दिनों बाद आज मौका मिला है|
मैं: पागल हो गई हो क्या? किसी ने देख लिया तो क्या होगा जानती हो ना?
ऋतू: कोई नहीं देखेगा| आप सब के सोने के बाद आ जाना|
मैं: नहीं!
ऋतू: मैं इंतजार करुँगी!
इतना कह कर वो टेबल से उठ गई और बाइक के पास जा कर खड़ी हो गई| मैं बिल भर के बाहर आया और बिना उससे कुछ बोले बाइक स्टार्ट की और हम फिर से हवा से बातें करते हुए घर की ओर चल दिए| रास्ते में ऋतू उसी तरह मुझसे चिपकी रही पर मैंने उससे और कोई बात नहीं की| हम घर पहुँचे और ऋतू ने सब के पैर छू के आशीर्वाद लिया और मैं सीधा अपने कमरे में घुस गया और बिस्तर पर पड़ गया| कुछ देर बाद ऋतू ऊपर आई और मेरे कमरे में झांकते हुए निकल गई| वो समझ गई थी की मैं उससे नाराज हूँ| उसी ने घर पर आज खाना बनाया और फिर सब के साथ बैठ के यहाँ-वहाँ की बातें चल ने लगी| हमेशा की तरह ऋतू भी कोने में बैठी बातें सुनती रही पर मेरा सर भन्ना रहा था सो मैं उठ के बाहर चला गया| कुछ ही दूर गया हूँगा की पीछे से संकेत की आवाज आई और फिर उस के साथ खेत पर बैठ कर माल फूँका| रात साढ़े आठ बजे घर घुसा तो घरवालों ने ताने मारने शुरू कर दिए की इतने दिन बाद आया है, ये नहीं की कुछ देर सब के साथ बैठ जाये| मैं बिना कुछ कहे ऊपर गया और तौलिया ले कर नीचे आ कर नहाया और ऊपर कमरे में टी-शर्ट डालने ही वाला था की मेरे नंगे जिस्म पर मुझे ऋतू ने पीछे से जकड लिया| उसकी उँगलियाँ मेरी छाती पर घूमने लगी थी, मैंने तुरंत ही उसे खुद से दूर किया; "दिमाग ख़राब है तेरा?" गुस्से से लाल
मैंने टी-शर्ट पहनी और नीचे जा कर सब के साथ बैठ गया और बातों में ध्यान लगाने लगा|
रात के खाने के बाद मैं छत पर टहल रहा था और ऋतू में आये बदलावों के बारे में सोच रहा था| उसके जिस्म में भूख की ललक मुझे साफ़ नजर आ रही थी|तभी वहाँ ऋतू चुप-चाप आ कर खड़ी हो गई| नजरें झुकी हुई, हाथ बाँधे वो जैसे अपने जुर्म का इकरार कर रही हो| बचपन में जब भी उससे कोई गलती हो जाती थी तो वो इसी तरह खड़ी हो जाती थी और उस समय जब तक मैं उसे गले लगा कर माफ़ न कर दूँ उसके दिल को चैन नहीं आता था| 'ऋतू.... तू ये सब क्यों कर रही है? खुद पर काबू रखना सीख प्लीज! वरना सब कुछ खत्म हो जायेगा!" ये कहते हुए मैंने उसके सामने हाथ जोड़ दिए| जिसे देख उसकी आँख से आँसूं गिरने लगे| इस बात की परवाह किये बिना की हम घर पर हैं और कोई हमें देख लेगा मैंने ऋतू को कस कर अपने गले लगा लिया| मेरी बाहों में आते ही वो टूट के सुबकने लगी और बोली; "जानू.... मैं क्या करूँ? मुझसे ये दूरी बर्दाश्त नहीं होती| हम एक शहर में हो कर भी कभी दिल भर के मिल नहीं पाते| हमेशा हॉस्टल की घंटी या कोई साथ न देख ले वाला डर हमें एक दूसरे के करीब नहीं आने देता| आप जी तोड़ कोशिश करते हो की हम ज्यादा से ज्यादा साथ रहे पर आपको अपनी नौकरी भी देखनी है| आप जब भी मिलते हो तो वो पल मैं आपके साथ जी भर के जीना चाहती हूँ इसलिए उन कुछ पलों में मैं सारी हदें तोड़ देती हूँ| जन्मदिन वाले दिन के बाद से तो आपके बिना एक पल को भी चैन नहीं आता! रात-रात भर तकिये को खुद से चिपकाए सोती हूँ, ये सोच कर की वो तकिया आपका जिस्म है जिसकी गर्मी से शायद मेरा जिस्म थोड़ा ठंडा पद जाए पर ऐसे कभी नहीं होता| पढ़ाई में भी मन नहीं लगता, किताब खोल कर बस आप ही के ख्यालों में गुम रहती हूँ| आपके जिस्म की गर्माहट को महसूस करने को हरपल बेताब रहती हूँ| प्लीज-प्लीज हम अभी क्यों नहीं भाग जाते? मैं आप के साथ एक पेड़ के नीचे रह लूँगी पर अब और आप से दूर नहीं रहा जाता|" उसकी बातें सुन कर उसके दिल का हाल मैं जान चूका था पर इस कोई इलाज नहीं था| अगर मेरा खुद के शरीर पर काबू है इसका मतलब ये तो नहीं तो की दूसरे का भी उसके शरीर पर काबू हो?
"जान! मैं समझ सकता हूँ तुम कैसा महसूस करती हो, और यक़ीन मनो मेरा भी वही हाल है पर हम दोनों को एक दूसरे पर काबू रखना होगा! हम अभी नहीं भाग सकते, बिना पैसों के हम बनारस तो क्या इस जिले के बहार नहीं जा सकते| हमें बहुत बड़ी लड़ाई लड़नी है और उसके लिए खुद पर काबू रखना होगा| मैं ये नहीं कहता की हम मिलना बंद कर दें, पर हमें जिस्मानी रिश्ते को रोकना होगा| ये Kissing, ये Hugging .....
इन सब पर काबू रखना होगा| जब मौका मिलेगा तब हम ये सब करेंगे और प्लीज Sex अभी नहीं! वो शादी के बाद!" इसके आगे मेरे कुछ कहने से पहले ही ऋतू मुझसे अलग हो गई और सर झुकाये हुए बोली; "इससे तो अच्छा है की मैं जान ही दे दूँ!" ऋतू की आँखें से आँसूं थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे, मैंने आगे बढ़ कर उसके आँसू पोछने चाहे पर वो एकदम से मुड़ी और नीचे अपने कमरे में चली गई| मैं कुछ देर तक और छत पर टहलता रहा और सोचता रहा| घडी पर नजर डाली तो बारह बज रहे थे, मैं अपने कमरे की तरफ जाने लगा तो ऋतू के कमरे का दरवाजा खुला था| अंदर झाँका तो पाया ऋतू अब भी रो रही थी और अपने तकिये को अपनी छाती से चिपकाये हुए थी| पता नहीं क्यों पर बार-बार वो तकिये को चुम रही थी| शायद ये सोच रही होगी की वो तकिया मैं हूँ| तभी उसने करवट बदली पर इससे पहले वो मुझे देख पाती मैं दिवार की आड़ में छुप गया और वो करवट बदल के फिर से उसी तकिये को खुद से चिपकाये हुए प्यार करती रही| 15 मिनट तक मैं छुप कर उसे यूँ तकिये से लिपटे रोता देखता रहा पर मजबूर था क्योंकि अगर कोई घरवाला देख लेता तो?!!! मन मार के जैसे ही अपने कमरे में जाने को मुड़ा की नीचे से ताऊ जी की आवाज आई; "इतनी रात गए क्या कर रहा है?" ये सुनते ही मैं हड़बड़ा गया, शुक्र है की मैं ऋतू के कमरे में नहीं घुसा वरना आज सब कुछ खत्म हो जाता| "जी वो.... नींद नहीं आ रही थी इसलिए छत पर टहल रहा था|" मेरी आवाज सुनते ही ऋतू उठ के बहार आ गई और बिना कुछ बोले ही मेरे मुँह पर दरवाजा बंद कर दिया| मैं भी उसके इस बर्ताव से चौंक गया और समझ गया की उसे बहुत बुरा लगा है| मैं अपना इतना सा मुँह ले कर अपने कमरे में आ गया और बिस्तर पर लेट गया पर नींद तनिक भी नहीं आई| घड़ियाँ गिन-गिन कर रात गुजारी और सुबह जब चलने का समय हुआ तो ऋतू अब भी खामोश थी| गाँव से कुछ दूर आने के बाद मैंने बाइक रोक दी और ऋतू को दोनों तरफ पैर कर के बैठने को कहा तो उसने मेरी ये बात भी अनसुनी कर दी| मजबूरन मुझे ऐसे ही बाइक चलानी पड़ी, ढाबे पर पहुँच कर मैंने बाइक रोकी और ऋतू को चाय पीने चलने को कहा तो उसने फिर से मना कर दिया| अब मैंने जबरदस्ती उसका हाथ पकड़ के खींचा और उसे ढाबे में ले गाय और जबरदस्ती चाय पिलाई| "जान! I'm Sorry!!! प्लीज मुझे माफ़ कर दो! मैं तुम्हें दुःख नहीं पहुँचाना चाहता था| तुम जो सजा दोगी वो मंजूर है पर प्लीज मुझसे बात करो!" मैंने ऋतू से की मिन्नतें की पर वो कुछ नहीं बोली| हमने चुप-चाप चाय पी और फिर हम वापस हाईवे पर आ गए, पर मैंने बाइक बजाये हॉस्टल की तरफ ले जाने के अपने घर की तरफ मोड़ दी| घर पहुँचने से पहले मैंने बाइक एक मेडिकल स्टोर के पास रोकी और कुछ दवाइयाँ ले कर वापस आया| "आपकी तबियत ख़राब है?" ऋतू ने चिंता जताते हुए पूछा| तो मैंने मुस्कुरा कर नहीं कहा और बाइक घर की तरफ घुमा दी| जैसे ही घर पहुँच कर मैंने बाइक रोकी तो ऋतू बड़ी
हैरानी से मेरी तरफ देखने लगी| मैंने उसे ऊपर कमरे की तरफ चलने को कहा और कमरे की चाभी भी उसे दे दी| मैंने बाइक नीचे पार्क की और घर फ़ोन कर दिया की हम घर पहुँच गए हैं, और साथ ही ऋतू के हॉस्टल में फ़ोन कर दिया की गाँव में कुछ काम है इसलिए मैं उसे कल हॉस्टल छोड़ दूँगा| फिर खाने के मैगी ली और सारा सामान ले कर मैं कमरे में आया| ऋतू खड़ी हो कर पीछे वाली खिड़की से बाहर कुछ देख रही थी| मुझे देखते ही वो बोली; "मुझे हॉस्टल कब छोड़ोगे?" मैंने ऋतू का हाथ पकड़ा और उसे खींच के पलंग के पास ले आया और बोला: "आज की रात और कल की दोपहर आप मेरे साथ गुजारोगे!" ये सुन के ऋतू बोली: "क्यों?"
"आपने कहा था ना आप का मन मेरे बिना नहीं लगता तो मैंने सोचा की क्यों न आपको इतना प्यार करूँ की आपको मेरी कमी कभी महसूस न हो|" ये सुन कर ऋतू ने मेरी तरफ पीठ कर दी और बोली; "मैं जानती हूँ ये आप सिर्फ मुझे खुश करने के लिए कर रहे हो| आपको ऐसा कुछ भी करने की जर्रूरत नहीं जिसके लिए आपका मन गवाही ना देता हो|" मैं ने ऋतू को पीछे से अपनी बाँहों में जकड़ा और उसके कान में फुसफुसाता हुआ बोला; "दिल से कह रहा हूँ|" इतना कह कर मैंने उसे गोद में उठा लिया और बिस्तर पर ला कर लिटा दिया और झुक कर ऋतू के होठों को चूम लिया| मेरे होंठ के स्पर्श से उसकी सारी कठोरता खत्म हो गई और उसने अपनी बाहें मेरी गर्दन के इर्द-गिर्द डाल दी और मेरे Kiss का जवाब देने लगी| मैंने अपने होंठ खोले के अपनी जीभ से उसके होठों को रगड़ा और फिर अपने दोनों होठों के भीतर उसके नीचे होंठ को भर के चूसने लगा| तभी ऋतू ने धीरे से मुझे खुद से दूर किया और बोली; "आप ....
मुझे धोका तो नहीं दोगे ना?" मैंने ना में सर हिलाया| "पर एक शर्त है! वादा करो की पढ़ाई में ध्यान लगाओगे|"
"वादा करती हूँ जानू! पढ़ाई को ले कर आपके पास कोई शिकायत नहीं आएगी|" इतना कह के ऋतू ने अपनी बाहें फिर से मेरी गर्दन पर जकड़ दी और मुझे खींच के अपने ऊपर झुका लिया और अपनी जीभ से मेरी जीभ को छूने व चूसने लगी| उसके हाथ मेरी पीठ पर घूम रहे थे पर मेरे हाथ अभी भी मेरे वजन को संभाले हुए थे| मैं उठा और ऋतू की आँखों में देखते हुए अपनी शर्ट के बटन खोलने लगा और वो भी उठ बैठी पर पलंग पर घुटनों के बल बैठ के मेरे चेहरे को अपने दोनों हाथों से थामा और फिर से मेरे होठों को बारी-बारी से चूसने लगी| मैंने अपनी कमीज उतारी पर ऋतू ने एक पल के लिए भी मेरे होठों को अपने मुँह से आजाद नहीं किया| मैंने ही अपने होठों को उससे छुड़ाया और कहा; "जान कपडे तो उतारो|" ये सुनते ही उसके गाल शर्म से लाल हो गए| मैं समझ गया की वो क्यों शर्मा रही है| मैंने खुद उसके सूट को उतारने के लिए हाथ आगे बढाए तो उसकी नजरें झुक गईं| मैंने धीरे से उसका सूट उतरा और ऋतू ने इसमें मेरा पूरा सहयोग दिया| अब वो मेरे सामने सिर्फ एक ब्रा में थी और शर्म से अब भी उसकी नजरें झुकी हुई थीं| मैंने उसकी ठुड्डी पकड़ के ऊपर की और उसके गुलाबी होठों को चूमा और धीरे-धीरे उसे फिर से लिटा दिया और उसके ऊपर आ कर उसके होठों को चूसने लगा| उसका निचला होंठ बहुत फूला हुआ था, और हो भी क्यों ना पिछले कुछ महीनों से मैं जो उसका रसपान कर रहा था|लंड मियाँ पूरे जोश में आ कर बहार आने को बेताब थे पर ऋतू को तो जैसे Kiss करने से फुरसत ही नहीं थी| मैं भी कोई जल्दी नहीं दिखाना चाहता था इसलिए हम दोनों पिछले १५ मिनट से बस एक दूसरे को होठों को चूस और चाट ही रह थे| शायद ऋतू को भी मेरे लंड का एहसास होने लगा तो उसके हाथ अपने पा ही मेरे लंड महराज पर आ गए और वो धीर-धीरे से उसे सहलाने लगी| ऐसा लगा जैसे वो ये अनुमान लगा रही हो की मेरा लंड कितना बड़ा है| लंड को मिल रहे स्पर्श से उसमें तनाव बढ़ता ही जा रहा था और अब पैंट में कैद होने से दर्द हो रहा था| मैंने धीरे-धीरे अपने हाथ को सरका कर ऋतू की पिजामि के नाड़े पर रख दिया और अपनी उँगलियों से नाड़े का छोर ढूंढने लगा| ऋतू भी मेरी उँगलियों को अपनी नाभि के आस पास महसूस करने लगी थी और उसका जो हाथ अभी तक लंड को सहला रहा था वो अब मेरी बनियान के अंदर जा घुसा था और जैसे कुछ ढूंढ रहा था| आखिर मुझे नाड़े का छोर मिल ही गया और मैंने उसे धीरे-धीरे खींचना शुरू कर दिया| आखिर कर वो खुल गया और ऋतू की पजामी अब ढीली हो चुकी थी| मैंने अपना हाथ धीरे-धीरे अंदर सरकना शुरू कर दिया और इधर ऋतू के जिस्म में सिहरन शुरू हो गई थी| फिर मैं एक पल के लिए रुक गया और ऋतू के होठों को अपने होठों की पकड़ से आजाद करते हुए कहा; "जान! पहली बार बहुत दर्द होगा! मुझे कम
पर तुम्हें बहुत ज्यादा होगा, खून भी निकलेगा!" ये सुन कर ऋतू थोड़ा डर गई|
"आपसे दूर रहने के दर्द से तो कम होगा ना?" ये कह कर उसने मुझे अपनी सहमति दी और मैंने मुस्कुरा कर उसके माथे को चूमा| मेरा हाथ उसकी पैंटी पर आ चूका था और मुझे उसके ऊपर से ही उस की बुर की गर्मी महसूस होने लगी थी| मैंने अपनी बीच वाली ऊँगली को ऋतू की पैंटी के ऊपर रगड़ना शुरू कर दिया जिसके परिणाम स्वरुप ऋतू की सीत्कार निकल गई| आनंद से उसकी आँखें बंद हो चली थीं| मैंने अब अपना हाथ उसकी पैंटी से बहार निकाला और उसकी पजामी को पकड़ कर नीचे सरकाने लगा पर अब भी ऋतू ने अपनी आँख नहीं खोली थी| पजामी तो निकाल दी मैंने पर ऋतू की गुलाबी रंग की पैंटी ने मेरा मन मोह लिया| उसे देखते ही मन ही नहीं कर रहा था की उसे निकालूँ, ऊपर से ऋतू की माँसल जांघें मेरे लंड में कोहराम मचाने लगी थी| मैंने नीचे झुक कर ऋतू की नाभि के नीचे चूम लिया और अपने दोनों हाथों की उँगलियों को उसकी पैंटी में फँसा कर के उसे नीयकाल दिया और अब जो मेरे सामने थी उसे देख तो मेरा कलेजा धक कर के रह गया| एक दम गुलाबी और चिकनी बुर! उसके गुलाबी पट बंद थे और बुर की रक्षा कर रहे थे, उन्हें देखते ही मेरे मुँह में पानी आ गया! मैं उनपर झुक कर उन्हें चूमना चाहता था पर जैसे ही मेरी गर्म साँस ऋतू को अपने बुर पर महसूस हुई उसने ने अपने दोनों हाथों से मेरे चेहरे को थामा और अपने ऊपर आने को कहा| "जानू वो सब बाद में! पहले आप….." उसने बात अधूरी छोड़ दी पर मैं समझ गया की उसे सेक्स करना है ना की फोरप्ले! "जान… फोरप्ले अगर नहीं किया तो बहुत दर्द होगा| तुम बस रिलैक्स करो और इतने बरसों से जो मैं वीडियो देख कर जो ज्ञान अर्जित किया है उसे इस्तेमाल करने दो|" मेरी बात सुन कर हम दोनों के चेहरे पर मुस्कान आ गई| तभी मैंने गौर किया की ऋतू की ब्रा तो मैंने निकाली ही नहीं| अब ये ऐसा काम था जो मैंने कभी किया नहीं था और ना ही इसके बारे में कोई ज्ञान मुझे वीडियो देखने से मिला था| मैंने ऋतू का हाथ पकड़ के उसे उठा के बिठाया और उसके होठों को चूसने लगा और अपने हाथ उसके पीछे ले जाकर ब्रा के हुक ढूंढने लगा| जब उँगलियों ने उन्हें ढूंढा तो ये दिक्का थी की उन्हें खोलने के लिए उसका सिरा कहाँ है? ऋतू मेरी ये नादानी समझ गई और उसने मेरे होठों से अपने होंठ छुड़ाए और अपने दोनों हाथ पीछे ले जा कर ब्रा के हुक खोल दिए| ब्रा ढीली हो गई बार अभी भी ऋतू के जिस्म से चिपकी हुई थी| मैंने धीरे से ऋतू की ब्रा को उसके सुनहरे जिस्म से अलग किया और पलंग से नीचे गिरा दिया| अपनी ब्रा को नीचे गिरते देख ऋतू कसमसाने लगी थी, मेरी नजर जब उसकी छाती पर पड़ी तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गई| ऋतू के कोमल चुचुक मुझे उसे छूने को कह रहे थे, वो गुलाबी अरेओला ....सससस.....
हाय! मैंने थोड़ा सा झुक कर ऋतू के बाएं चुचुक को अपने होठों से छुआ और अपनी जीभ से उसके छोटे से प्यार से निप्पल को छेड़ा तो ऋतू के मुँह सिसकारी निकल पड़ी| मैंने ऋतू के चेहरे पर देखा तो उसकी गर्दन पीछे की ओर झुकी हुई थी और आँखें बंद थी|
मैं उठ कर खड़ा हुआ और अपनी बेल्ट खोली और फिर पैंट के हुक खोलते ही वो नीचे जा गिरी, मेरे कच्छे पर बने उभार को ऋतू टकटकी बांधे देखती रही| मैं पलंग से उतरा और अपनी पैंट कुर्सी पर फेंकी और बैग से कुछ निकाल कर वापस ऋतू के पास आ गया| जब मैं लौटा तो ऋतू मुझे थोड़ी डरी सी दिखी; "क्या हुआ जान?!" मैंने उसके दाएं गाल को छूते हुए कहा| "आप उठ कर गए तो मुझे लगा आप मुझे छोड़के जा रहे हो!|" ये कहते हुए उसकी आँखें नम हो गई|
"जान मैं तो बस ये लेने गया था|" ये कहते हुए मैंने उसे कंडोम दिखाया| पहले तो ऋतू को समझ ही नहीं आया की मेरे हाथ में आखिर है क्या फिर जब उसने डिब्बे पे लिखा पढ़ा तो वो नाराज होते हुए बोली; "नहीं! आप इसे यूज़ नहीं करोगे! ये हमारा.... पहलीबार है.... और मुझे फील करना है....सब कुछ! मैं बाद में गर्भनिरोधक गोली ले लूँगी|" ये कहते हुए उसने मेरे हाथ से कंडोम का डिब्बा छीन लिया और दूर फेंक दिया| मैंने आगे उससे बहस करना ठीक नहीं समझा उल्टा मैं फिर से ऋतू के ऊपर आ गया और ऋतू की नाभि पर अपने होंठ रखे और ऋतू के मुँह से फिर से "सससस...'' आवाज निकली| अगला चुम्बन मैंने ऋतू की गुलाबी बुर की फाँकों पर किया तो उसके पूरे जिस्म में करंट दौड़ गया और उसके मुँह से फिर से सीत्कार फूट पड़ी| मैंने अपनी जीभ से ऋतू की बुर की फाँकों को कुरेदना शुरू कर दिया| ऐसा लगा मानो जीभ की नोक अपने लिए अंदर जाने का रास्ता बना रही हो| पर बुर के गुलाबी होंठ खुल ही नहीं रहे थे, तो मैंने जितना हो सके उतना मुँह खोला और ऋतू की बुर के ऊपर रख दिया| अपनी जीभ से मैंने फाँकों को जोर से कुरेदना शुरू कर दिया| आखिर फाँकों को मुझ पर तरस आ गया और अंगड़ाई लेते हुए मुझे बुर का छेद दिखाई दिया| बस फिर क्या था मैंने उस अध्खुली फाँक को अपने मुँह में भर के मैं यूज़ चूसने लगा| इधर ऋतू पर इसका बहुत मादक असर हुआ और उसके मुँह से बस सिसकारियाँ ही सिसकारियाँ फूटने लगी....."स्स्सस्स्स्स...स्स्सस्स्स्स.... ससससस आए ससससस हहहह स्स्सस्स्स्स!!!" ऋतू की सिसकारियाँ मेरे लिए प्रोत्साहन का काम कर रही थी और मैंने अपनी पूरी जीभ से बुर के द्वार को चाटना...चूसना...कुरेदना...शुरू कर दिया| ऋतू के दोनों हाथ मेरे सर के ऊपर थे और वो मेरे बालों में अपने हाथ फिराने लगी| अब मैंने अपने दोनों हाथ की उँगलियों से ऋतू के बुर के द्वार को खोला और अपनी जीभ जितनी हो सके उतनी अंदर डाल दी| जैसे ही जीभ अंदर घुसी ऋतू चिहुँक पड़ी; "सीईई ...
!!!!" मैंने अपनी जीभ से ऋतू की बुर चुदाई शुरू कर दी और मेरे इस प्रहार से उसकी हालत ख़राब होने लगी थी| वो बार-बार मेरे सर का दबाव अपनी बुर पर बढ़ाती जा रही थी| "सससससस...ीसीसीसीसीसिस..... सीईई..... सीईई.... ईईई .... आआह्ह्हह्ह्ह्ह!!!" करते हुए वो झाड़ गई और हाँफते हुए निढाल हो कर रह गई| उसका सारा रस मैंने अपनी जीभ से चाट-चाट कर पी लिया था! आखिर मैं भी उसके ऊपर से उठ कर उसकी बगल में लेट गया| पिछले पाँच मिनट से मुँह खोल कर ऋतू की बुर चाटने से मुँह दर्द करने लगा था|
दो मिनट बाद जब ऋतू की सांसें नार्मल हुई तो वो करवट ले कर मेरी छाती पर अपना सर रख कर लेट गई| "जानू! आज मुझे पता चला की चरम सुख क्या होता है! थैंक यू!!!!" मैंने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया क्योंकि उसे तो तृप्ति मिल गई थी पर मैं तो अभी भी प्यासा था| ऋतू शायद समझ गई तो उसका डायन हाथ मेरे लंड पर आ गया और वो उसे सहलाने लगी| अपने मुँह को खोल ऋतू ने मेरे दाएं निप्पल को मुँह में भर लिया जैसे शिकायत कर रही हो की क्यों मैंने अभी तक उसके स्तनों को प्यार नहीं किया? मैंने ऋतू के दाएं गाल को अपनी उँगलियों से सहलाया और उसके मुँह से अपने निप्पल को छुड़ाया और उसकी आँखों में देखते हुए कहा; "जान......." मेरा बस इतना कहना था की वो मेरी बात समझ गई और मुझे उसके चेहरे पर डर की रेखा दिखने लगी| "डर लग रहा है?!" मैंने पूछा तो जवाब में ऋतू ने बस हाँ में सर हिला दिया| "मैं पूरी कोशिश करूँगा की मेरी जान को कम से कम दर्द हो|" सबसे पहले मैंने अपना कच्छा उतारा और ऋतू की टांगों को खोल कर उनके बीच घुटने मोड़ कर बैठ गया| मेरे फनफनाते हुए लंड को ऋतू एक टक बांधे घूर रही थी, जैसे की सोच रही हो की ये दानव मेरी छोटी सी बुर में कैसे घुसेगा?! मैंने बहुत सारा थूक अपने लंड पर चुपेड़ा और उसे धीरे से ऋतू की बुर के होठों पर छुआया| इतने भर से ही उसने अपनी आँखें कस के भीँचलि जैसे की उसे बहुत दर्द हुआ हो! इसलिए मैं बिना लंड अंदर डाले उसके ऊपर छा गया और उसके होठों को एक बार चूमा, तब जाके उसकी आँखें खुलीं| मैं समझ गया की लंड अंदर डालने से पहले मुझे ऋतू को थोड़ा उत्तेजित करना होगा| इसलिए मैं उसके जिस्म को चूमता हुआ उसके स्तनों पर आ गया और गप्प से उसके दाएं स्तन को अपने मुँह में भर लिया और अपनी जीभ से उसके निप्पल से छडने लगा| अपने दाएं हाथ से मैंने ऋतू के बाएं स्तन को धीरे दबाना शुरू कर दिया| अपनी उँगलियों से मैं ऋतू के बाएं निप्पल को दबाने लगा और उसके दाएं निप्पल को तो मैं ऐसे चूसने लगा था जैसे उस में से दूध निकल रहा हो| पाँच मिनट की चुसाई के बाद मैंने ऋतू के बाएं स्तन को भी ऐसे ही चूसा उसके छोटे से निप्पल को मैं दांतों से खींच रहा था और बीच-बीच में काट भी रहा था| ऋतू बहुत ज्यादा उत्तेजित हो गई थी और अपना हाथ नीचे ले जा कर मेरा लंड पकड़ के अपनी बुर की तरफ खींचने में लगी
थी| मैंने जब उसके बाएं चुचुक को छोड़ा तो देखा उसके दोनों स्तन लाल हो चुके थे और उनपर मेरे दांतों के निशाँ साफ़ नजर आ रहे थे| मैंने और समय गँवाय बिना अपना लंड उसकी बुर के द्वार पर रखा और धीरे से अंदर धकेला| मेरे लंड की चमड़ी चूँकि अभी भी बंद थी तो लंड अंदर नहीं गया पर इससे ऋतू को दर्द बहुत हुआ और उसने अपनी सर को बायीं तरफ झटक दिया| मैंने सोचा की बिना दम लगाए तो लंड अंदर जायेगा नहीं इसलिए मैंने अपनी कमर को पीछे किया और एक झटका मार के लंड अंदर डाला| मेरी इस हकात से मेरी और ऋतू दोनों की जान पर बन आई! मेरे लंड की चमड़ी एकदम से खुली और जलन से मेरी गांड फ़ट गई और उधर ऋतू के मुँह से जोरदार चींख निकली! "आआआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह.....मममममअअअअअ.....!!!" दर्द से दोनों का बुरा हाल था, मन तो कर रहा था की लंड बहार निकाल के लेट जाऊँ पर ये जानता था की ागलीबार और दर्द होगा| इसलिए मैंने ऋतू के होठों को अपने मुँह में भर लिया और उसकी पीड़ा उसके गले में ही रोक दी| ऋतू ने दर्द के मारे अपने नाखून मेरी नंगी पीठ में धंसा दिए और उनमें से खून भी निकल आया| नीचे लंड में दर्द और पीठ में जलन से मैं तड़प उठा| मैं इसी तरह से ऋतू के ऊपर अपना वजन दाल आकर लेटा रहा और उसके होठों को चुस्त रहा और उसके मुँह में अपनी जीभ घूमता रहा| करीब पाँच मिनट हुए और ऋतू ने अपने नाखून मेरी पीठ से निकाल दिए और अपने हाथ वापस पलंग पर रख दिए| उसी वक़्त मुझे मेरे लंड पर गर्म पानी का एहसास हुआ, मतलब की ऋतू झाड़ चुकी थी और वो निढाल होकर बिना कुछ बोले ही बिस्तर पर लाश की तरह पड़ी थी| मैंने ऋतू के होठों को छोड़ा और ऋतू के चेहरे की तरफ देखने लगा, ऋतू की आँखें बंद थी और उसके मस्तक पर पसीने की बूँदें थी| मैंने ऋतू के गाल को चूमा और उसे पुकारा; "जान!" तो जवाब में बस उसके मुँह से "हम्म..." निकला|
"बहुत दर्द हो रहा है?" मैंने उसके माथे को चूमते हुए पूछा तो जवाब में बस उसके मुँह से "हम्म" निकला और दर्द की एक लकीर चेहरे पर आ गई| मेरा दिल भी उसके दर्द को महसूस कर रहा था इसलिए मैं ऋतू के ऊपर से हटने लगा, की तभी उसने अपने दोनों हाथों को मेरी गर्दन में डाल के हटने नहीं दिया| "जान... आपको दर्द हो रहा है! रूक जाते हैं!" मैंने चिंता जताते हुए कहा| "नहीं....
" वो बस इतना ही बोल पाई और मुझे अपने ऊपर से हटने नहीं दिया| मैंने ऋतू के माथे फिर से चूम लिया और उसने अपनी गर्दन ऊँची कर के अपने होंठ मेरे सामने कर दिए जैसे कह रही हो की आप गलत जगह को चूम रहे हो| मैंने ऋतू के होठों को चूसना शरू कर दिया, इसका असर अब ऋतू पर दिखने लगा था और जिस्म में अब हरकत होने लगी थी| उसका दर्द कुछ कम होने लगा था और उसकी उँगलियाँ अब मेरे सर के बालों में घूमने लगी थी| मैंने उसके होठों को छोड़ा और ऋतू के चेहरे पर देखा तो उसने अपनी आँख खोली और उसकी आँखें मुझे नम दिखाई दे रही थी| उसकी मूक सहमति से मैंने अपने लंड को धीरे से बाहर निकाला और फिर धीरे से अंदर किया तो ऋतू की कमर कांपने लगी और उसने कस के मुझे अपने आलिंगन में जकड लिया| उसकी दोनों टांगें मेरी कमर के इर्द-गिर्द लिपट चुकी थी और उनके दबाव से ये साफ़ था की ऋतू अब भी पूरी तरह तैयार नहीं है| पर मेरा सब्र अब जवाब देने लगा था, मेरे लंड में अब तनाव बहुत बढ़ चूका था ऊपर से चमड़ी खींचने की वजह से लंड में दर्द अभी था| मैंने फिर से ऋतू की तरफ देखा तो उसकी आँखें अब भी दर्द के मारे मीच राखी थी| "जान! प्लीज!!!!" मेरा इतना कहाँ था की उसने आँखें बंद किये हुए ही हाँ में गर्दन हिला दी| मैंने धीरे से अपनी कमर को पीछे खींचा और धीरे उसे अंदर-बहार करने लगा| ऋतू की बुर की गर्माहट बढ़ रही थी और उस गर्माहट से मेरे लंड को काफी आराम मिल रहा था| इसी तरह धीरे-धीरे करते हुए करीब दस मिनट हुए होंगे की मेरा ज्वालामुखी फूटने को तैयार था और मैं उसे बहार खींचने वाला था की ऋतू ने कस के अपने जिस्म को मेरे जिस्म से चिपका लिया और मुझे ऐसा करने नहीं दिया और हम दोनों ही साथ-साथ झड़े! झड़ते ही मैं पास्ट हो कर ऋतू के ऊपर गिरा और उसका भी हाल ख़राब ही था| करीब पाँच मिनट बाद मैं उसके ऊपर से उठ के उसकी बगल में लेट गया और अपने लंड और उसकी बुर की तरफ देखा| दोनों ही खून और हमारे कामरस से सने थे, खून तो काफी निकला था और दोनों ही की यौन अंग सूझ चुके थे| मेरे लंड के सुपडे के इर्द-गिर्द सूजन थी तो ऋतू की बुर मुझे सूजी हुई दिख रही थी| दस मिनट बाद में उठा और बाथरूम जा कर अपने लंड को पानी से हलके हाथ से धोया और वापस आकर जमीन पर नंगा ही बैठ गया| जमीन की ढंडक चप से चूतड़ों को ठंडा कर गई| मैं दिवार का सहारा ले कर दोनों टांगें खोल कर बैठ गया| ऋतू की तरफ देखा तो वो अब भी सो रही थी और इधर मेरे पेट में आवाजें आने लगी थीं| इसलिए में उठा और बैग से मैगी का पैकेट निकाला और बनाने लगा| मैगी की खुशबु से ऋतू की नींद खुल गई और उसने धीरे से आकर मुझे पीछे से अपनी बाँहों में जकड लिया| उसका नंगा जिस्म मेरी नंगी पीठ पर मह्सूस होते ही मैं पीछे मुड़ा और ऋतू के होंठों को चूम लिया| मैंने नोटिस किया की उसके होंठ भी थोड़े सूजे लग रहे थे|
ऋतू: जानू! आप क्यों बना रहे हो, मुझे बोल
दिया होता तो मैं बना देती|
मैं: आज मैंने अपनी जान को बहुत दर्द दिया है, इसलिए सोचा आज मैं ही तुम्हें अपने हाथ से बना हुआ कुछ खिला दूँ|
ऋतू: दर्द तो आपको भी हुआ होगा ना? पर सच कहूँ तो आज अपने मुझे दुनिया भर की ख़ुशी एक साथ दे दी है! इसलिए आज तो मुझे आपकी सेवा करनी है, आखिर आज से आप मेरे पति जो हो गए हो!
मैं: चलो मुँह-हाथ धो कर आओ|
ऋतू हँसते हुए बाथरूम में चली गई और मैंने मग्गी एक ही प्लेट में परोस ली और प्लेट ले कर जैसे ही बिस्तर की तरफ घुमा की मुझे उस पर खून और हमारे कामरस का घोल पड़ा हुआ मिला| मैंने प्लेट टेबल पर राखी और चादर को बिस्तर से हटाया पर तब तक अभूत देर हो चुकी थी, मेरा गद्दा भी बीच में से लहू-लुहान हो चूका था! मैंने पंखा तेज चालु किया और जमीन पर ही प्लेट ले कर बैठ गया| ऋतू जब बाथरूम से आई तो मुझे नीचे बैठा देख हैरान हुई पर इससे पहले वो कुछ बोलती उसकी नजर बिस्तर पर पड़ी और वहां खून देख कर उसकी आँखें फटी की फटी रह गई|
"हाय! इतना सारा खून! कुछ बचा भी मेरे जिस्म में या सब निकल गया?" ये सुन कर मुझे हँसी आ गई और मुझे हँसता देख ऋतू भी खिलखिलाकर हँस पड़ी| ऋतू भी मेरे सामने ही नंगी फर्श पर बैठ गई और ठन्डे फर्श की चपत जब उसके चूतड़ों पर लगी तो वो 'आह' कर के फिर हँसने लगी| हमने मैगी खाई और फिर ऋतू बर्तन उठा कर किचन में रखने चली गई और मैं उठ कर बाथरूम में हाथ-मुँह धोने चला गया| मैंने बाथरूम से ही ऋतू को आवाज दे कर दूसरी चादर बिछाने को कहा| ऋतू ने जैसे ही अलमारी से चादर निकाली उसे मेरी गांजे की पुड़िया दिखाई दे गई| उसे जरा भी देर नहीं लगी ये समझते हुए की ये गांजा है और जैसे ही मैं बाथरूम से निकला वो मुझे पुड़िया दिखाते हुए बोली; "ये क्या है?" उसके हाथ में पुड़िया देखते ही मेरी हवा खिसक गई| अब उससे झूठ तो बोल नहीं सकता था;
मैं: वो....गा...गांजा है! (मैंने सर झुकाये हुए कहा|)
ऋतू: आप गांजा पीते हो? (उसने हैरानी से पूछा|)
मैं: कभी-कभी...
ऋतू: क्यों पीते हो? (उसने गुस्सा करते हुए पूछा|)
मैं: वो... वो... कभी...टेंशन होती है तो.... थोड़ा....
ऋतू: टेंशन तो दुनियाभर में सब को है, तो क्या सब ये पीते हैं?
मैं: सॉरी!
ऋतू: कब से पी रहे हो आप?
मैं: कॉलेज...के ...
ऋतू: और इसके लिए पैसे कहाँ से आते थे?
मैं: वो... टूशन....देता... था...तो....
ऋतू: तो इस काम के लिए आप कॉलेज के दिनों में जॉब करते थे?
मैं:हाँ ...
ऋतू: मुझे कभी कुछ बताया क्यों नहीं? अगर आपको कोई बिमारी लग जाती तो?
मैं: सॉरी....मैं...मैं....
ऋतू: आज के बाद आप कभी भी इसे हाथ नहीं लगाओगे! समझे?
मैं: हाँ ...
ऋतू: खाओ मेरी कसम? (ऋतू मेरे पास आई और मेरा हाथ अपने सर पर रख कर मेरे जवाब का इंतजार करने लगी|)
मैं: मैं तुम्हारी कसम खता हूँ...
आज के बाद कभी इसे हाथ नहीं लगाऊँगा!
ये सुन कर ऋतू ने वो पुड़िया कूड़े में फेंक दी और नाराज हो कर बिस्तर पर दूसरी चादर बिछाने लगी| मैं अपने हाथ बांधे सर झुकाये उसे देखता रहा| जब चादर बिछ गई तो ऋतू मेरे पास आई और मेरी ठुड्डी ऊपर उठाई और मेरी आँख में देखते हुए बोली; "और क्या-क्या शौक हैं आपके?"
"जी...कभी-कभी दारु भी पीता हूँ!" ये सुनते ही ऋतू की आँखें चौड़ी हो गईं और उसका गुस्सा फिर से लौट आया|
"मतलब अपनी जान देने की पूरी तैयारी कर रखी है आपने? आपको कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा? ये कभी सोचा आपने?" ये कहते हुए उसकी आँखें नम हो आईं थी| "अरे जानू... मैं कोई रोज-रोज थोड़ी ही पीता हूँ? वो तो कभी कभार किसी पार्टी में या किसी के बर्थडे पर! चलो आई प्रॉमिस आज के बाद ये सब बंद! अब तो मुस्कुरा दो मेरी जान!" ये सुन कर ऋतू को तसल्ली हुई और उसके चेहरे पर मुस्कान लौट आई| घडी में 2:30 बजे थे, पेट भरा था और सेक्स से दिल भी भरा हुआ था तो अब बारी थी सोने की| मैंने हम दोनों के पहनने के लिए अलमारी से दो टी-शर्ट निकाली तो ऋतू कहने लगी; "क्या जर्रूरत है? हम दोनों ही तो हैं यहाँ!" तो मैंने टी-शर्ट वापस अंदर रख दी और हम दोनों एक दूसरे के आगोश में लेट गए|
मैं: जान! अब भी दर्द हो रहा है?
ऋतू: हम्म्म...थोड़ा-थोड़ा ... और आपको?
मैं: थोड़ा...
ऋतू का हाथ अपने आप ही मेरे लंड पर आ गया और वो अपनी उँगलियों से उसे सहलाने लगी| चुदाई की थकावट ऋतू पर असर दिखाने लगी थी आँखें बोझिल होने लगी और वो सो गई, पर मेरा मन अब भी प्यासा था| अब उसे उठाने का मन नहीं किया और इधर नींद में उसने अपने को और कस कर मेरे जिस्म से चिपका लिया और सो गई| मैं उसके दाएं गाल को सहलाता हुआ कब सो गया पता ही नहीं चला| जब आँख खुली तो साँझ हो चुकी थी और घडी सात बजा रही थी| मैं उठा तो ऋतू भी उठ गई और अपनी बाहें खोल कर उसने अंगड़ाई ली| ऋतू के स्तन अंगड़ाई लेने से आगे को निकल आये और मुझसे कण्ट्रोल नहीं हुआ तो मैंने उसके दाएं स्तन को चूम लिया| ऋतू की 'सीईई' निकल गई और उसने अपने दोनों हाथों से मेरे सर को अपने स्तन पर दबा दिया| मैंने अपनी जीभ से उसके पूरे स्तन को चाटा और उससे अलग हो कर खड़ा हो कर अंगड़ाई लेने लगा| मेरा मुँह ठीक ऋतू के सामने था और अभी ऋतू के स्तनपान के बाद लंड खड़ा हो गया था जो अंगड़ाई लेते समय ऋतू के सामने बिलकुल सीधा खड़ा था और उसे अपने पास बुला रहा था| मैंने जब ऋतू की तरफ देखा तो पाया वो मंत्रमुग्ध सी मेरे ही लंड को देख रही थी| मैंने एक चुटकी बजा कर उसकी तन्द्रा को भंग किया और जैसे वो किसी ख्यालों की दुनिया से बाहर आई हो वैसे मुझे देख कर मुस्कुरा दी| मैंने उसे अपना तौलिया दिया और नहाने को कहा तो उसने अदा के साथ वो तौलिया लिया और मेरा हाथ पकड़ के अंदर बाथरूम में खींच के ले जाने लगी| "जान! वहाँ इतनी जगह नहीं है की हम दोनों एक साथ नहा सकें|"
"जगह
बन जाएगी, आप आओ तो सही|" उसने फिर से मेरा हाथ खींचा और मैं भी उसके साथ अंदर घुस गया| उसने इशारे से मुझे कमोड पर बैठने को कहा, खुद शावर का मुँह मेरी तरफ कर के चालु किया और आ कर मेरी गोद में बैठ गई| लंड मियां ऋतू के बुर के सम्पर्क में आते ही अकड़ के खड़े हो गए|पानी की बूंदें ऋतू के जिस्म पर ज्यादा और मेरे ऊपर कम पढ़ रही थी| ऋतू टकटकी बंधे मुझे देखे जा रही थी की तभी पानी की एक धार ऋतू के बालों से बहती हुई ठीक उसके निचले होंठ पर आ गई| ऋतू के गुलाबी होंठ उस पानी से पूरी तरह भीग पाते उससे पहले ही मैंने उसके निचले होंठ को अपने मुँह में भर के चूसा| ऋतू की उँगलियाँ मेरे बालों में चलने लगी थी और उसके भीतर भी आग दहकने लगी थी| मेरे लंड ने भी नीचे से धीरे-धीरे उसकी बुर पर थाप देना शुरू कर दिया था| ऋतू ने अपने होठों को मेरे होठों की गिरफ्त से छुड़ाया और सीढ़ी कड़ी होगी और फिर मेरे लंड को अपनी बुर के नीचे सेट किया और धीरे-धीरे अपनी बुर को मेरे लंड पर दबाने लगी पर जैसे ही थोड़ा सूपड़ा अंदर गया उसे दर्द होने लगा| दरसल उसकी बुर अभी अंदर से सूखी थी इसलिए वो फिर से कड़ी हो गई और अपने दाहिने हाथ में ढेर सारा थूक उसने चुपड़ा और मेरे लंड के सुपाड़ी पर अच्छे से लगा दिया और फिर धीरे-धीरे मेरे लंड पर अपनी बुर को रबाने लगी| इस बार लंड अंदर जाने लगा पर दर्द तो उसे अभी भी हो रहा था| वासना हम दोनों ही के अंदर भड़क चुकी थी और मुझसे उसका ये 'स्लो ट्रीटमेंट' बर्दाश्त नहीं हो रहा था| इसलिए मैंने भी नीचे से कमर को धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठाना शुरू कर दिया ताकि लंड जल्दी से अंदर चला जाए| लंड अभी आधा ही अंदर गया था की वो दर्द के मारे रूक गई और मेरी हालत तो ऐसे हो गई हो जैसे किसी ने गाला दबा कर साँस रोक दी हो| ऋतू की बुर ने कस के लंड को जकड लिया और जैसे वो उसे अंदर जाने से रोक रही हो और लंड मियाँ थे जो और अंदर जाना चाहते थे| "जान?!" मैंने ऋतू से मिन्नत करते हुए कहा तो उसने हाँ में गर्दन हिला कर मुझे खुद ही आगे बढ़ने की इज्जाजत दे दी| मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूँ की ऋतू को ज्यादा दर्द न हो पर ये कमबख्त जिस्म वासना से जल रहा था इसलिए मैंने कुछ ज्यादा ही जोर से लंड अंदर पेल दिया और ऋतू की एक जोरदार चीख निकली; "आअह", उसने अपनी गर्दन दर्द के मारे पीछे की तरफ झटक दी| मैंने अपने दोनों हाथों को उसकी नंगी पीठ पर फिराया और उसे अपने जिस्म से चिपका लिया| दर्द के मारे उसकी आँख बंद हो चुकी थी और आंसुओं की लकीर बह निकली थी| पर लंड मियाँ इधर बुर की गर्मी में पिघलने लगे थे और मेरी कमर ने अपने आप ही ऋतू को ऊपर झटका देना शुरू कर दिया| ऋतू ने कस कर मेरे सर को अपनी छाती से दबा लिया और अपने हाथों को लॉक कर दिया जिससे मेरा सर हिल भी नहीं सकता था| दो-चार सेकंड बाद जब साँस लेने में दिक्कत होने लगी तो हाथों ने ऋतू की पीठ पर
चलना शुरू किया और जैसे ही उँगलियों में उसके बाल आये तो मैंने उन्हें पीछे की तरफ खींचा| ऋतू की गर्दन पीछे की तरफ खींच गई और उसकी गिरफ्त मेरे सर के इर्द-गिर्द ढीली पड़ी| मैंने उसके बालों को अपनी ऊँगली से ढीला छोड़ा तब ऋतू ने अपनी आँखें खोली और मेरी आँखों में देख कर उसे जैसे होश आया हो| इधर मेरी कमर फिर से नीचे से धक्के देने लगी पर ऋतू ऊपर ज्यादा नहीं उठ रही थी| जब उसे इस बात का एहसास हुआ तो उसने खुद ही मेरे लंड पर धीरे-धीरे ऊपर-नीचे होना शुरू कर दिया| "ससससीई" कहते हुए उसने अपनी गति बढ़ा दी थी, माने अपने दोनों हाथों को उसकी कमर के इर्द-गिर्द कस रखा था की कहीं वो गिर ना जाये| ऋतू पर अब चुदाई की खुमारी चढ़ने लगी थी और उसने अपने दोनों हाथों को अपने बालों में अदा के साथ फिराना शुरू कर दिया था| ऐसा करने से उसके स्तन उभर के बाहर आ गए थे और उन्हें देख मेरा सब्र जवाब देने लगा था|
पाँच मिनट और की ऋतू ने पानी बहाना शुरू कर दिया और वो तक कर मेरे सीने से लगने को आई| पर मैंने उसके दाहिने स्तन को पकड़ लिया और चूसने लगा| ऋतू ने मेरे सर को फिर से अपने स्तन पर दबाना शुरू कर दिया| उसकी उँगलियाँ फिर से मेरे सर पर रास्ता बनाने लगी और मैंने बारी-बारी से उसके दोनों स्तनों को चूसना और काटना शुरू कर दिया| पर मेरा लंड अब अकड़ कर चीखने लगा था और ऋतू तो जैसे थक कर अपना सारा वजन मुझ पर डाल कर पड़ी थी और अपने स्तनों को चुसवा कर मजे ले रही थी| मैंने अपने दोनों हाथों से ऋतू की कमर को कस कर पकड़ा और मैं उठ खड़ा हो गया और उसे दिवार से सटा कर अपने लंड को जोर से अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया| ऋतू की दोनों टांगें मेरी कमर के इर्द-गिर्द टाइट हो चुकी थी और वो मेरे और दिवार के बीच दबी हुई थी| मेरी रफ़्तार बहुत तेज थी, इतनी तेज की ऋतू एक बार फिर झाड़ गई और उसने फिर से मुझे कस कर अपने से चिपका लिया पर मैंने अपने धक्के चालु रखे और अगले ही क्षण मैंने अपना सारा गाढ़ा रस उसकी बुर में बहा दिया और उसके ऊपर ही लुढ़क गया| शावर से आ रहे ठन्डे पानी मेरे सर पर पड़ रहा था जिसके कारण जिस्म ज्यादा थका नहीं था| मिनट भर बाद मैंने ऋतू की आँखों में देखा तो मुझे उसकी आँखों में संतुष्टि नजर आई, उसने धीरे से अपने पैरों को नीचे फर्श पर टिकाया और मैं उससे दूर हुआ| पर अगले ही पल उसने मेरा हाथ थामा और अपने पंजों पर खड़े हो कर मेरे होठों को चूम लिया और मुस्कुरा दी| फिर हम साथ नहाये, उसने मुझे और मैंने उसे साबुन लगाया और फिर शावर के नीचे नहा के हम दोनों बाहर आये| अब तो बड़ी जोर से भूख लगी थी इसलिए मैंने खाना आर्डर करना चाहा तो ऋतू ने मना कर दिया और खुद ही बिना कपडे पहने किचन में खाना बनाने लगी| मैंने ही एक टी-शर्ट निकाल कर उसे दी;
मैं: जान इसे पहन लो|
ऋतू: क्यों? मुझे बिना कपडे के देखना आपको पसंद नहीं?
मैं: तुम्हें ऐसे देख कर
मेरा ईमान डोल रहा है|
ऋतू: हाय! सच्ची?
मैं: हाँजी!
ऋतू: डोलने दो! मैं तो आपकी ही हूँ| (ऋतू ने मुझे आँख मारते हुए कहा|)
ऋतू ने मेरी बात नहीं मानी खाना बनाने में लगी रही पर मेरा मन कहाँ मानने वाला था| मैं भी उसके पीछे सट के खड़ा हो गया और अपने दोनों हाथों को उसकी कमर से लेजाते हुए उसकी नाभि के ऊपर कस दिया| उसकी सुराही सी गर्दन मुझे चूमने के लिए बुला रही थी| मेरे दहकते होठों ने जैसे ही छुआ की ऋतू के मुँह से मादक सी सिसकारी निकल गई| "सससस...sssss .... आप जान ले कर रहोगे मेरी!" उसने मेरे हाथों को खोल कर आजाद होने की एक नाकाम कोशिश की पर मैं कहाँ मानने वाला था, मैं उसी तरह उसे अपनी बाँहों में कैसे हुए अपनी कमर को दाएँ-बाएँ हिलाने लगा और धीरे-धीरे नाचने लगा| ऋतू भी मेरा साथ देने लगी और उसने शेल्फ पर रखे अपने फ़ोन पर गाना चला दिया|
"तुझको मैं रख लूँ वहाँ
जहाँ पे कहीं है मेरा यकीं
मैं जो तेरा ना हुआ
किसी का नहीं
किसी का नहीं"
गाना सुनते-सुनते हम थिरकते रहे और ऋतू साथ-साथ खाना भी बनाती रही| रात नौ बजे तक मैं यूँ ही उसके जिस्म से अटखेलियाँ करता रहा और वो कसमसा कर रह जाती| आखिर खाना बना और ऋतू ने एक ही थाली में दोनों के लिए खाना परोसा और मुझे फर्श पर ही बैठने को कहा| मैं फर्श पर दिवार से सर लगा कर बैठा था, वो थाली पकडे मेरे सामने बैठ गई और मुझे अपने हाथ से कोर खिलाने लगी| मैंने भी उसे अपने हाथ से खिलाना शुरू कर दिया, खाना खा कर दोनों ही पलंग पर लेट गए| नींद तो आने वाली थी नहीं तो ऋतू ने कहा की उसे पोर्न मूवी देखनी है इसलिए मैंने उसे एक मूवी फ़ोन में चला कर दी| मैं दिवार का सहारा ले कर बैठा था और वो मेरे सीने पर सर रख कर बैठी थी| उस मूवी में लड़की के स्तन बहुत बड़े थे जिन्हें देख ऋतू को अपने स्तनों के अकार से निराशा हुई| उसके स्तनों का साइज 29 था और अब चूँकि मैं उसकी निराशा ताड़ गया था इसलिए मैंने मूवी रोक दी| "क्या हुआ जान?" तो उसने जवाब में अपना सर झुका लिया और अपने स्तनों को देखते हुए बोली; "आपको तो बड़े...... पसंद हैं.... और मेरे....
तो छोटे!" उसने अटक-अटक कर कहा| "मैंने तुमसे प्यार तुम्हारे इनके (उसके स्तनों को छूटते हुए) लिए नहीं किया|"
"सच?" उसकी आँखें चमक उठीं| "इन लड़कियों के बड़े इसलिए होते हैं क्योंकि इन्होने सर्जरी कराई है|" इतना कह के मैंने उसे थोड़ा ज्ञान बाँटा, पर सर्जरी का नाम सुन के जैसे वो हैरान हो गई| उसने फ़ोन साइड में रखा और और मेरी आँखों में देखते हुए बोली; "मैं भी कराऊँ?" "बेबी! आपको ऐसा कुछ भी कराने की कोई जर्रूरत नहीं है! मैंने आपसे कहा ना की मैं आपसे प्यार करता हूँ| भगवन ने आपको जैसा भी बनाया है सुन्दर बनाया है और ये सर्जरी वगैरह करके इसकी सुंदरता ख़राब मत करो|" मेरा जवाब सुन कर वो संतुष्ट हो गई, उसे विश्वास होगया की मेरा प्यार सिर्फ उसके जिस्म तक सीमित नहीं है|
update 12
मैंने फिर से ऋतू को अपने आगोश में ले लिया और हम दोनों लेट गए| मैं पीठ के बल लेटा था और ऋतू मेरी तरफ करवट किये हुए थी, उसका बायाँ हाथ मेरी छाती पर था और वो मेरी शेव की हुई छाती पर अपनी उँगलियाँ चला रही थी| तभी उसने अपनी बायीं टांग उठा कर मेरे लंड पर रख दी और अचानक ही उसके मुँह से दर्द भरी 'आह' निकल गई| "क्या हुआ जान?!" मैंने चिंता जताते हुए उससे पूछा तो उसने मुस्कुरा कर ना में गर्दन हिला दी| मैं उठ बैठा और लाइट जला कर उसकी बुर की तरफ देखा तो पाया की वो बहार से सूज गई है| उसके कोमल पट सूजे हुए दिखे| जिस लड़की से मैं इतना प्यार करता हूँ, आज उसी को मैंने इतना दर्द दे दिया वो भी सिर्फ अपनी वासना में जल कर? ग्लानि से मेरा सर झुक गया तो ऋतू उठ बैठी और मेरे सर को अपने दोनों हाथों में थाम के ऊपर उठाया और बोली; "आपको क्या हुआ?"
"सॉरी! मेरी वजह से तुम्हें इतना दर्द हो रहा है|" इतना कह के मैंने शर्म से सर फिर झुका लिया| उसने फिर से मेरा सर ऊपर किया और मेरी आँखों में आँखें डाले बोलने लगी;"जानू! ये तो बस १-२ दिन में ठीक हो जायेगा, आप खामखा अपने को दोष ना दो|"
"ठीक है! अब तुम्हें दर्द दिया है तो दवा भी मैं ही करूँगा|" इतना कह कर मैं उठा और किचन में पानी गर्म करने लगा|
ऋतू: आप क्या कर रहे हो?
मैं: पानी गर्म कर रहा हूँ, उससे सेक देने से आराम मिलेगा|
ऋतू: रहने दो ना,आप मेरे पास लेटो|
मैं: आ रहा हूँ|
पानी थोड़ा गर्म हो चूका था, मैंने एक छोटा तौलिया लिया और रुई का एक टुकड़ा ले कर मैं वापस पलंग पर लौट आया| तौलिये को मैंने ऋतू की कमर के नीचे रख दिया ताकि पानी से बिस्तर गिला न हो जाये और फिर रुई को गर्म पानी में भिगो कर ऋतू के बुर की सिकाई करने लगा| इस सिकाई से उसे बहुत आराम मिला और उसने की बार मुझे रोका, ये कह के की उसे आराम मिल गया पर मैं फिर भी करीब दस मिनट तक उसकी बुर की सिकाई करता रहा| "बस बहुत हो गई सिकाई, अब मेरे पास आओ|" ये कहते हुए ऋतू ने अपनी बाहें खोल दीं और मैंने बर्तन नीचे रखा, उसे अपनी बाहों में भर कर लेट गया| हम इसी तरह सो
गए पर रात के ग्यारह बजे होंगे की ऋतू चौंक कर उठ गई और हाँफने लगी| "क्या हुआ जान? कोई बुरा सपना देखा?" मैंने ऋतू से पूछा तो जवाब में वो कुछ नहीं बोली बल्कि अपने दोनों हाथों से अपने चेहरे को ढक कर रोने लगी| मैंने उसके दोनों हाथों को उसके चेहरे से हटाया और उसके माथे पर चूमा और उसे अपने सीने से लगा लिया| करीब दो मिनट बाद उसका रोना बंद हुआ और उसने सुबकते हुए जो कहा उसे सुन मेरे होश उड़ गए; "आप.... मैंने ... बहुत बुरा....सपना...." ऋतू ने सुबकते हुए कहा| मैं तुरंत उससे अलग हुआ, कमरे की लाइट जलाई और उसके लिए पानी ले कर आया| पानी पीने के बाद उसने एक गहरी साँस ली और बोली;
ऋतू: मैंने सपना देखा की माँ मुझसे बदला लेने के लिए आपके साथ सेक्स कर रही है|
मैं: (चौंकते हुए) क्या? क्या बकवास कर रही है? तेरी माँ मतलब मेरी भाभी और भला हम दोनों ऐसा!? छी!
ऋतू: आपको नहीं पता पर एक रात मैं और माँ छत पर सो रहे थे| वो नींद में आपका नाम बड़बड़ा रही थी और तकिये को अपने से चिपकाए हुए कसमसा रही थी|
मैं: ये नहीं हो सकता?! पर .... पर ... हमारे बीच तो सीधे मुँह बात भी नहीं होती| तो सेक्स......
ऋतू: मुझे नहीं पता|
इतना कह कर ऋतू फिर से रोने लगी| "ऐसा कभी नहीं होगा! मैं तुझसे प्यार करता हूँ और भाभी मेरे साथ कभी भी वो सब करने में कामयाब नहीं होगी|" मैंने ऋतू को फिर से अपने गले लगा लिया और उसकी पीठ सहला कर उसे चुप कराने लगा|ऋतू का सुबकना कम हुआ तो हम दोनों लेट गए पर अगले ही पल वो मुझसे कस के चिपक गई, जैसे की उसे डर हो के सच में कोई मुझे उससे चुरा लेगा| इधर मेरे दिमाग में उथल-पुथल मची हुई थी की भाभी भला मेरे बारे में ऐसा कैसे सोच सकती हैं? मैंने तो कभी भाभी को इस नजर से नहीं देखा? हम दोनों के बीच तो कभी सीधे मुँह बात भी नहीं हुई? तभी मुझे संकेत की बात याद आई जब उसने भाभी को 'माल' कहा था| क्या भाभी के गैर मर्दों के साथ रिश्ते हैं? ये सभी सोचते-सोचते दिमाग जोर से चलने लगा था, अब अगर ऋतू नहीं होती तो मैं गांजा पीता और इस टेंशन से बाहर निकल जाता| पर अब तो उसे वादा कर चूका था तो तोड़ता कैसे? इसलिए ऐसे ही चुप-चाप बिस्तर पर पड़ा रहा| न जाने कैसे शायद ऋतू ने मेरी चिंता भाँप ली और उसने अपनी गर्दन मेरे बाजू पर से उठाई और मेरे होठों को चूम लिया| उसके इस चुंबन से मेरा ध्यान भाभी से हटा, पर ये बहुत छोटा सा चुंबन था| शायद आज की दमदार सेक्स के बाद वो काफी तक चुकी थी| मेरे आगोश में आते ही उसकी आँख लग गई और वो चैन की नींद सो गई| इधर ऋतू के जिस्म की भीनी खुशबु और उसे आज सकूँ से प्यार करने के बाद मैं भी सो गया|
update 13
रात के एक बजे थे, खिड़की से आ रही चांदनी की रौशनी कमरे में फैली हुई थीकी तभी ऋतू बाथरूम से आई तो उसने पाया की मेरा लंड एक दम कड़क हो चूका है और छत की तरफ मुँह कर के सीधा खड़ा है और फुँफकार रहा है| दरअसल मैं उस समय कोई सेक्सी सपना देख
रहा था जिस कारन लंड मियाँ अकड़ चुके थे| पता नहीं उसे क्या सूजी की वो मेरी टांगों के बीच आ गई और घुटने मोड़ के बैठ गई| मेरे लंड को निहारते हुए वो ऊपर झुकी और धीरे-धीरे अपना मुँह खोले हुए वो नीचे आने लगी| सबसे पहले उसने अपनी जीभ की नोक से मेरे लंड को छुआ और मेरी प्रतिक्रिया जानने के लिए मेरी तरफ देखने लगी| जब मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो उसने अपने मुँह को थोड़ा खोला और आधा सुपाड़ा अपने मुँह में भर के चूसा| ''सससससस''' नींद में ही मेरे मुँह से सिसकारी निकल गई| उसने धीरे-धीरे पूरा सुपाड़ा अपने मुँह के भीतर ले लिया और रुक गई| "ससस...अह्ह्ह..." अब ऋतू से और नीचे जाय नहीं रहा था तो उसने आधा सूपड़ा ही अपने मुँह के अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया| इधर मैं नींद में था और मेरे सपने में भी ठीक वही हो रहा तह जो असल में ऋतू मेरे साथ कर रही थी| पर ऋतू को अभी ठीक से लंड चूसना नहीं आया था, उसके मुँह में होते हुए भी मेरा लंड अभी तक सूखा था| जबकि उसे तो अभी तक अपने थूक और लार से मेरे लंड को गीला कर देना चाहिए था| पूरे दस मिनट तक वो बेचारी बीएस इसी तरह अपने होठों से मेरे लंड को अपने मुँह में दबाये हुए ऊपर-नीचे करती रही और अंत में जब मेरा गर्म पानी निकला तो मेरी आँख खुली और ऋतू को देख मैं हैरान रह गया| मेरा सारा रस उसके मुँह में भर गया था और वो भागती हुई बाथरूम में गई उसे थूकने| मैं अपनी पीठ सिरहाने से लगा कर बैठ गया और जैसे ही ऋतू बहार आई उसकी नजरें झुक गई| तो जान! ये क्या हो रहा था? आपके साथ तो मैं बिना कपडे के भी नहीं सो सकता?!" मैंने ऋतू को छेड़ते हुए कहा| वो एक दम से शर्मा गई और पलंग पर आ कर मेरे सीने पर सर रख कर बैठ गई| "वो न..... जब मैं उठी तो..... आपका वो...... मुझे देख रहा था!" ऋतू ने शर्माते हुए मेरे लंड की तरफ ऊँगली करते हुए कहा|
मैं: देख रहा था मतलब? इसकी आँख थोड़े ही है?
ऋतू: ही..ही...ही... पता नहीं पर उसे देखते ही मैं .... जैसे मैं अपने आप ही ..... (इसके आगे वो कुछ बोल नहीं पाई और शर्मा के मेरे सीने में छुप गई|)
मैं: चलो अब सो जाओ वरना अभी थोड़ी देर में फिर से आपको देखने लगा|
ये सुनते ही ऋतू के गाल लाल हो गए और हम दोनों फिर से एक दूसरे की बाहों में लेट गए और चैन से सो गए| सुबह मेरी नींद चाय की खुशबु सूंघ कर खुली और मैंने उठ के देखा तो ऋतू किचन में चाय छान रही थी| मैं पीछे से उसके जिस्म से सट कर खड़ा हो गया और अपनी बाँहों को उसके नंगे पेट पर लोच करते हुए उसकी गर्दन पर चूमा| "Good Morning जान!"
"सससस....आज तो वाकई मेरी Morning Good हो गई|" ऋतू ने सिसकते हुए कहा|
ऋतू: काश की रोज आप मुझे ऐसे ही Good Morning करते?
मैं: बस जान.... कुछ दिन और|
ऋतू: कुछ साल ...
दिन नहीं|
मैं: ये साल भी इसी तरह प्यार करते हुए निकल जायेंगे|
ऋतू: तभी तो ज़िंदा हूँ|
इतना कह कर ऋतू मेरी तरफ मुड़ी और अपनी दोनों बाहें मेरे गले में डाल दी और अपने पंजों पर खड़ी हो कर मेरे होंठों को चूम लिया| मैंने अपनी दोनों हाथों से उसकी कमर को जकड़ लिया और उसे अपने जिस्म से चिपका लिया|
मैंने घडी देखि तो नौ बज गए थे और मुझे 11 बजे ऋतू को हॉस्टल छोड़ना था तो मैंने उससे नाश्ते के लिए पूछा| ऋतू उस समय बाथरूम में थी और उसने अंदर से ही कहा की वो बनाएगी| जब ऋतू बहार आई तो वो अब भी नंगी ही थी;
मैं: जान अब तो कपडे पहन लो?
ऋतू: क्यों? (हैरानी से)
मैं: हॉस्टल नहीं जाना?
ये सुनते ही ऋतू का चेहरा उतर गया और उसका सर झुक गया| मुझसे उसकी ये उदासी सही नहीं गई तो मैंने जा कर उसे अपने गले से लगा लिया और उसके सर को चूमा|
ऋतू: आज भर और रुक जाऊँ? (उसने रुनवासी होते हुए कहा|)
मैं: जान! समझा करो?! देखो आपको कॉलेज भी तो जाना है?
ऋतू: आप उसकी चिंता मत करो मैं साड़ी पढ़ाई कवर अप कर लूँगी|
मैं: और मेरे ऑफिस का क्या? आज की भी मुझे पूरे दिन की छुट्टी नहीं मिली|
ऋतू के आँख में फिर से आँसूँ आ गए थे| अब मैंने उसे अपनी गोद में उठाया और उसे पलंग पर लिटाया और मैं भी उसकी बगल में लेट गया|
मैं: अच्छा तू बता मैं ऐसा क्या करूँ की तुम्हारे मुख पर ख़ुशी लौट आये?
ऋतू: आज का दिन हम साथ रहे|
मैं: जान वो पॉसिबल नहीं है, वरना मैं आपको मना क्यों करता?
ऋतू फिर से उदास होने लगी तो मैंने ही उसका मन हल्का करने की सोची;
मैं: अच्छा मैं अगर तुम्हें अपने हाथ से कुछ बना कर खिलाऊँ तब तो खुश हो जाओगी ना?
ऋतू: (उत्सुकता दिखाते हुए) क्या?
मैं: भुर्जी खाओगी?
ऋतू: Hawwwwww ...
आप अंडा खाते हो? घर में किसी को पता चल गया न तो आपको घर से निकाल देंगे!
मैं: मेरे हाथ की भुर्जी खा के तो देखो!
ऋतू: ना बाबा ना! मुझे नहीं करना अपना धर्म भ्रस्ट|
मैं: ठीक है फिर बनाओ जो बनाना है| इतना कह कर मैं बाथरूम में घुस गया और नहाने लगा| नाहा-धो के जब तक मैं ऑफिस के लिए तैयार हुआ तब तक ऋतू ने प्याज के परांठे बना के तैयार कर दिए| पर उसने अभी तक कपडे नहीं पहने थे, मुझे भी दिल्लगी सूझी और मैं ने उसे फिर से पीछे से पकड़ लिया और उसकी गर्दन को चूमने लगा|
ऋतू: इतना प्यार करते हो फिर भी एक दिन की छुट्टी नहीं ले सकते| शादी से पहले ये हाल है, शादी के बाद तो मुझे time ही नहीं दोगे|
मैं: शादी के बाद तो तुम्हें अपनी पलकों अपर बिठा कर रखूँगा| मजाल है की तुम से कोई काम कह दूँ!
ऋतू: सच?
मैं: मुच्!
हमने ख़ुशी-ख़ुशी नाश्ता खाया और वही नाश्ता ऋतू ने पैक भी कर दिया| फिर मैंने उसे पहले उसके कॉलेज छोड़ा और उसके हॉस्टल फ़ोन भी कर दिया की ऋतू कॉलेज में है| फ़टाफ़ट ऑफिस पहुँचा और काम में लग गया| शाम को फिर वही 4 बजे निकला, ऋतू के कॉलेज पहुँचा और मुझे वहाँ देख कर वो चौंक गई| वो भाग कर गेट से बाहर आई और बाइक पर पीछे बैठ गई, हमने चाय पी और फिर उसे हॉस्टल के गेट पर छोड़ा|
अगले दिन सुबह-सुबह ऑफिस पहुँचते ही बॉस ने मुझे बताया की हमें शाम की ट्रैन से मुंबई जाना है| ये सुनते ही मैं हैरान हो गया; “सर पर अमिस ट्रेडर्स की GST रिटर्न पेंडिंग है!"
"तू उसकी चिंता मत कर वो अंजू (बॉस की बीवी) देख लेगी|" बॉस ने अपनी बीवी की तरफ देखते हुए कहा| ये सुन कर मैडम का मुँह बन गया और इससे पहले मैं कुछ बोलता की तभी ऋतू का फ़ोन आ गया और मैं केबिन से बाहर आ गया|
मैं: अच्छा हुआ तुमने फ़ोन किया| मुझे तुम्हें एक बात बतानी थी, मुझे बॉस के साथ आज रात की गाडी से मुंबई जाना है|
ऋतू: (चौंकते हुए) क्या? पर इतनी अचानक क्यों? और.... और कब आ रहे हो आप?
मैं: वो पता नहीं... शायद शनिवार-रविवार....
ये सुन कर वो उदास हो गई और एक दम से खामोश हो गई|
मैं: जान! हम फ़ोन पर वीडियो कॉल करेंगे... ओके?
ऋतू: हम्म...प्लीज जल्दी आना|
update 14
ऋतू बहुत उदास हो गई थी और इधर मैं भी मजबूर था की उसे इतने दिन उससे नहीं मिल पाउँगा| मैं आ कर अपने डेस्क पर बैठ गया और मायूसी मेरे चेहरे से साफ़ झलक रही थी| थोड़ी देर बाद जब अनु मैडम मेरे पास फाइल लेने आईं तो मेरी मायूसी को ताड़ गईं| "क्या हुआ मानु?" अब मैं उठ के खड़ा हुआ और नकली मुस्कराहट अपने चेहरे पर लाके उनसे बोला; "वो मैडम ... दरअसल सर ने अचानक जाने का प्लान बना दिया| अब घर वाले ...
" आगे मेरे कुछ बोलने से पहले ही मैडम बोल पड़ीं; "चलो इस बार चले जाओ, अगली बार से मैं इन्हें बोल दूँगी की तुम्हें एडवांस में बता दें| अच्छा आज तुम घर जल्दी चले जाना और अपने कपडे-लत्ते ले कर सीधा स्टेशन आ जाना|" तभी पीछे से सर बोल पड़े; "अरे पहले ही ये जल्दी निकल जाता है और कितना जल्दी भेजोगे?" सर ने ताना मारा| "सर क्या करें इतनी सैलरी में गुजरा नहीं होता| इसलिए पार्ट टाइम टूशन देता हूँ|" ये सुनते ही मैडम और सर का मुँह खुला का खुला रह गया| सर अपना इतना सा मुँह ले कर वापस चले गए और मैडम भी उनके पीछे-पीछे सर झुकाये चली गईं| खेर जैसे ही 3 बजे मैं सर के कमरे में घुसा और उनसे जाने की अनुमति माँगी| "इतना जल्दी क्यों? अभी तो तीन ही बजे हैं?" सर ने टोका पर मेरा जवाब पहले से ही तैयार था| "सर कपडे-लत्ते धोने हैं, गंदे छोड़ कर गया तो वापस आ कर क्या पहनूँगा?" ये सुनते ही मैडम मुस्कुराने लगी क्योंकि सर को मेरे इस जवाब की जरा भी उम्मीद नहीं थी| "ठीक है...तीन दिन के कपडे पैक कर लेना और गाडी 8 बजे की है, लेट मत होना|" मैंने हाँ में सर हिलाया और बाहर आ कर सीधा ऋतू को फ़ोन मिलाया पर उसने उठाया नहीं क्योंकि उसका लेक्चर चल रहा था| मैं सीधा उसके कॉलेज की तरफ चल दिया और रेड लाइट पर बाइक रोक कर उसे कॉल करने लगा| जैसे ही उसने उठाया मैंने उसे तुरंत बाहर मिलने बुलाया और वो दौड़ती हुई रेड लाइट तक आ गई|
बिना देर किये उसने रेड लाइट पर खड़ी सभी गाडी वालों के सामने मुझे गले लगा लिया और फूट-फूट के रोने लगी| मैंने अब भी हेलमेट लगा रखा था और मैं उसकी पीठ सहलाते हुए उसे चुप कराने लगा| "जान... मैं कुछ दिन के लिए जा रहा हूँ| सरहद पर थोड़े ही जा रहा हूँ की वापस नहीं आऊँगा?! मैं इस संडे आ रहा हूँ... फिर हम दोनों पिक्चर जायेंगे?" मेरे इस सवाल का जवाब उसने बीएस 'हम्म' कर के दिया| मैंने उसे पीछे बैठने को कहा और उसे अपने घर ले आया, वो थोड़ा हैरान थी की मैं उसे घर क्यों ले आया पर मैंने सोचा की कम से कम मेरे साथ अकेली रहेगी तो खुल कर बात करेगी| वो कमरे में उसी खिड़की के पास जा कर बैठ गई और मैं उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया और उसकी गोद में सर रख दिया| ऋतू ने मेरे सर को सहलाना शुरू कर दिया और बोली;
ऋतू: संडे पक्का आओगे ना?
मैं: हाँ ...
अब ये बताओ क्या लाऊँ अपनी जानेमन के लिए?
ऋतू: बस आप आ जाना, वही काफी है मेरे लिए|
उसने मुस्कुराते हुए कहा और फिर उठ के मेरे कपडे पैक करने लगी| मैंने पीछे से जा कर उसे अपनी बाँहों में जकड़ लिया| मेरे जिस्म का एहसास होते ही जैसे वो सिंहर उठी| मैंने ऋतू की नंगी गर्दन पर अपने होंठ रखे तो उसने अपने दोनों हाथों को मेरी गर्दन के पीछे ले जा कर जकड़ लिया| हालाँकि उसका मुँह अब भी सामने की तरफ था और उसकी पीठ मेरे सीने से चुपकी हुई थी| आगे कुछ करने से पहले ही मेरे फ़ोन की घंटी बज उठी और मैं ऋतू से थोड़ा दूर हो गया| जैसे ही मैं फ़ोन ले कर पलटा और 'हेल्लो' बोला की तभी ऋतू ने मुझे पीछे से आ कर जकड़ लिया| उसने मुझे इतनी जोर से जकड़ा की उसके जिस्म में जल रही आग मेरी पीठ सेंकने लगी| "सर मैं आपको अभी थोड़ी देर में फ़ोन करा हूँ, अभी मैं ड्राइव कर रहा हूँ|" इतना कह कर मैंने फ़ोन पलंग पर फेंक दिया और ऋतू की तरफ घूम गया| उसे बगलों से पकड़ कर मैंने उसे जैसे गोद में उठा लिया| ऋतू ने भी अपने दोनों पैरों को मेरी कमर के इर्द-गिर्द जकड़ लिया और मेरे होठों को चूसने लगी| मैंने अपने दोनों हाथों को उसके कूल्हों के ऊपर रख दिया ताकि वो फिसल कर नीचे न गिर जाए| ऋतू मुझे बेतहाशा चुम रही थी और मैं भी उसके इस प्यार का जवाब प्यार से ही दे रहा था| मैं ऋतू को इसी तरह गोद में उठाये कमरे में घूम रहा था और वो मेरे होठों को चूसे जा रही थी| शायद वो ये उम्मीद कर रही थी की मैं उसे अब पलंग पर लिताऊँगा, पर मेरा मन बस उसके साथ यही खेल खेलना चाहता था|
ऋतू: जानू...मैं आपसे कुछ माँगूँ तो मन तो नहीं करोगे ना? (ऋतू ने चूमना बंद किया और पलकें झुका कर मुझ से पूछा|)
मैं: जान! मेरी जान भी मांगोंगे तो भी मना नहीं करूँगा| हुक्म करो!
ऋतू: जाने से पहले आज एक बार...
(इसके आगे वो बोल नहीं पाई और शर्म से उसने अपना मुँह मेरे सीने में छुपा लिया|)
मैं: अच्छा जी??? तो आपको एक बार और मेरा प्यार चाहिए???
ये सुन कर ऋतू बुरी तरह झेंप गई और अपने चेहरे को मेरी छाती में छुपा लिया| अब अपनी जानेमन को कैसे मना करूँ?
update 15 (1)
मैंने ऋतू को गोद में उठाये हुए ही उसे एक खिड़की के साथ वाली दिवार के साथ लगा दिया| ऋतू ने अपने हाथ जो मेरी पीठ के इर्द-गिर्द लपेटे हुए थे वो खोल दिए और सामने ला कर अपने पाजामे का नाडा खोला| मैंने भी अपने पैंट की ज़िप खोली और फनफनाता हुआ लंड बाहर निकाला| ऋतू ने मौका पाते ही अपनी दो उँगलियाँ अपने मुँह में डाली और उन्हें अपने थूक से गीला कर अपनी बुर में डाल दिया| मैंने भी अपने लंड पर थूक लगा के धीरे-धीरे ऋतू की बुर में पेलने लगा| अभी केवल सुपाड़ा ही गया होगा की ऋतू ने खुद को मेरे जिस्म से कस कर दबा लिया, जैसे वो चाहती ही ना हो की मैं अंदर और लंड डालूँ| दर्द से उसके माथे पर शिकन पड़ गई थी, इसलिए मैं ने उसे थोड़ा समय देते हुए उसके होठों को चूसना शुरू कर दिया| जैसे ही मैंने अपनी जीभ ऋतू के मुँह में पिरोई की उसने अपने बदन का दबाव कम किया और मैं ने भी धीरे-धीरे लंड को अंदर पेलना शुरू किया| ऋतू ने मेरी जीभ की चुसाई शुरू कर दी थी और नीचे से मैंने धीरे-धीरे लंड अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया था| पाँच मिनट हुए और ऋतू का फव्वारा छूट गया और उसने मुझे फिर से कस कर खुद से चिपटा लिया| पाँच मिनट तक वो मेरे सीने से चिपकी रही और अपनी उखड़ी साँसों पर काबू करने लगी| मैंने उसके सर को चूमा तो उसने मेरी आँखों में देखा और मुझे मूक अनुमति दी| मैंने धीरे-धीरे लंड को अंदर बहार करना चालू किया और धीरे-धीरे अपनी रफ़्तार बढ़ाने लगा| ऋतू की बुर अंदर से बहुत गीली थी इसलिए लंड अब फिसलता हुआ अंदर जा रहा था| दस मिनट और फिर हम दोनों एक साथ झड़ गए| ऋतू ने फिर से मुझे कस कर जकड़ लिया और बुरी तरह हाँफने लगी| उसे देख कर एक पल को तो मैं डर गया की कहीं उसे कुछ हो ना जाये| मैंने उसे अपनी गोद से उतारा और कुर्सी पर बिठाया और उसके लिए पानी ले आया| पानी का एक घूँट पीते ही उसे खाँसी आ गई तो मैंने उसकी पीठ थप-थापाके उस की खाँसी रुक वाई| "क्या हुआ जान? तुम इतना हाँफ क्यों रही हो? कहीं ये आई-पिल का कोई रिएक्शन तो नहीं?" मैंने चिंता जताते हुए पूछा|
"ओह्ह नो! वो तो मैं लेना ही भूल गई!" ऋतू ने अपना सर पीटते हुए कहा|
"पागल है क्या? वो गोली तुझे 72 घंटों में लेनी थी! कहाँ है वो दवाई?" मैंने उसे डाँटते हुए पूछा तो उसने अपने बैग की तरफ इशारा किया| मैंने उसका बैग उसे ला कर दिया और वो उसे खंगाल कर देखने लगी और आखिर उसे गोलियों का पत्ता मिल गया और मैंने उसे पानी दिया पीने को| पर मेरी हालत अब ख़राब थी क्योंकि उसे 72 घंटों से कुछ ज्यादा समय हो चूका था| अगर गर्भ ठहर गया तो??? मैं डर के मारे
कमरे में एक कोने पर जमीन पर ही बैठ गया| ऋतू उठी अपने कपडे ठीक किये और मेरे पास आ गई और मेरी बगल में बैठ गई| "कुछ नहीं होगा जानू! आप घबराओ मत!" उसने अपने बाएं हाथ को मेरे कंधे से ले जाते हुए खुद को मुझसे चिपका लिया|
update 15 (2)
मेरी आँखें नम हो चलीं थीं, पर आंसुओं को मैंने बाहर छलकने नहीं दिया और खुद को संभालते हुए मैं उठ के खड़ा हुआ और बाथरूम में मुँह धोने घुसा| जब बाहर आया तो ऋतू मायूस थी; "जानू! आप मुझसे नाराज हो?" मैंने ना में सर हिलाया तो वो खुद आ कर मेरे गले लग गई| आगे हम कुछ बात करते उससे पहले ही बॉस का फ़ोन आ गया और वो मुझसे कुछ पूछने लगे| इधर ऋतू ने मेरे बैग में कपडे सेट कर के रख दिए थे और खाने के लिए सैंडविच बना रही थी| बॉस से बात कर के मैं वहीँ पलंग पर बैठ गया और मन ही मन ये उम्मीद करने लगा की ऋतू अभी गर्भवती ना हो जाये| मेरी चिंता मेरे चेहरे से झलक रही थी तो ऋतू मेरे सामने हाथ बांधे कड़ी हो गई और मेरी तरफ बिना कुछ बोले देखने लगी| मैं अपनी चिंता में ही गुम था और जब मैंने पाँच मिनट तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो वो मेरे नजदीक आई, अपने घुटने नीचे टिका कर बैठी और मेरी ठुड्डी ऊपर की| "क्यों चिंता करते हो आप? कुछ नहीं होगा! आप बस जल्दी आना, मैं यहाँ आपका बेसब्री से इंतजार करुँगी|" इतना कह कर उसने मेरे होठों को चूमा और मेरे निचले होंठ को चूसने लगी| मैंने जैसे-तैसे खुद को संभाला और ऋतू के होठों को चूसने लगा| दो मिनट बाद मैं उठ खड़ा हुआ, अपने कपडे बदले और फिर ऑटो कर के पहले ऋतू को हॉस्टल छोड़ा| फिर उसी ऑटो में मैं स्टेशन आ गया, पर ऋतू मेरी चिंता भाँप गई थी इसलिए उसने आधे घंटे बाद ही मुझे कॉल कर दिया| पर ये कॉल उसने अपने मोबाइल से नहीं बल्कि मोहिनी के नंबर से किया था;
मैं: हेल्लो?
ऋतू: आप पहुँच गए स्टेशन?
मैं: हाँ...
बस अभी कुछ देर हुई|
ऋतू: अकेले हो? कुछ बात हो सकती है?
मैं: हाँ बोलो?
ऋतू: वो मुझे आपसे कुछ पूछना था, एकाउंट्स को ले कर|
और फिर इस तरह उसने मुझसे सवाल पूछना शुरू कर दिए| पार्टनरशिप एकाउंट्स में उसे JLP पर डाउट थे| हम दोनों बात ही कर रहे थे की वहाँ सर और मैडम आ गए| अब चूँकि वो मेरे पीछे से आये थे तो उन्होंने मेरी JLP को लेके कुछ बातें सुन ली थी और वो ये समझे की मैं अपने स्टूडेंट से बात कर रहा हूँ| जिस बेंच पर मैं बैठा था उसी पर जब उन्होंने सामान रखा तो मैं चौंक गया और ऋतू को ये बोलके फ़ोन काट दिया की मैं थोड़ी देर बाद कॉल करता हूँ|
अनु मैडम: अरे! तुम तो ऑन-कॉल भी पढ़ाते हो?
ये सुन कर मैं और मैडम दोनों हँसने लगे पर सर को ये हँसी फूटी आँख न भाई|
सर: अच्छा मानु सुनो, मैं नहीं जा पाउँगा तो ऐसा करो तुम और अनु चले जाओ| वहाँ से तुम्हें अँधेरी वेस्ट जाना है, वहाँ तुम्हें Palmer Infotech जाना है जहाँ पर एक टेंडर के लिए मीटिंग रखी गई है| PPTs मैं तुम दोनों को मेल कर दूँगा, ठीक है? राखी तुम दोनों को वहीँ मिलेगी|
मैंने जवाब में सिर्फ हाँ में गर्दन हिलाई और सर ने मुझे टिकट का प्रिंटआउट दे दिया| इतना कह कर सर चले गए और मैडम और मैं उसी बेंच पर बैठ गए| मैडम ने तो कोई नावेल निकाल ली और वो उसे पढ़ने लगी और इधर ऋतू ने फिर से फ़ोन खनखा दिया और मैं थोड़ी दूर जा कर उससे बात करने लगा| जब मैंने उसे बताया की मैडम और मैं एक साथ जा रहे हैं तो वो नाराज हो गई|
ऋतू: आपने तो कहा था सर जा रहे हैं तो ये मैडम कहाँ से आईं?
मैं: यार वो बॉस की वाइफ हैं, कुछ काम से वो नहीं जा रहे इसलिए उन्हें भेजा है|
ऋतू: What’s her name?
मैं: अनु मैडम
ऋतू: Age?
मैं: I don’t know… maybe 30, 35… I don’t know! (मैंने झुंझलाते हुए कहा|)
ऋतू: How does she look like?
मैं: What?
ऋतू: I mean her figure, bust size etc!
मैं: Are you mad? She’s my boss’s wife.
ऋतू: वो सब मुझे नहीं पता, दूर रहने उससे|
मैं: ओह हेल्लो मैडम! मैं उनके साथ ऑफिस ट्रिप पर जा रह हूँ घूमने नहीं जा रहा|
ऋतू: जो तो उसी के साथ रहे हो ना?
मैं: पागल जैसे तुम सोच रही हो वैसा कुछ भी नहीं हैं| वो बस मेरी बॉस है!
ऋतू आगे कुछ बोलने वाली थी पर फिर चुप हो गई और फ़ोन रख दिया| साफ़ था वो जल भून कर राख हो गई थी| मैं वापस बेंच पर बैठने जा रहा था की उसने मुझे वीडियो कॉल कर दिया| मैंने क्योंकि हेडफोन्स पहने थे तो मैंने कॉल उठा लिया|
ऋतू: मुझे देखन है आपकी अनु मैडम को?!
मैं: तू पागल है क्या? किसी ने देख लिया तो?
ऋतू: आपको मेरी कसम!
मैंने हार मानते हुए चुपके से दूर से ऋतू को अनु मैडम का चेहरा दिखाया| ठीक उसी समय मैडम ने मेरी तरफ देखा और हड़बड़ी में मैंने कॉल काट दिया| पर मैडम को लगा की मैं सेल्फी ले रहा हूँ इसलिए उन्होंने बस मुस्कुरा दिया|ऋतू ने आग बबूला हो कर दुबारा कॉल किया और मुझ पर बरस पड़ी;
ऋतू: ये किस एंगल से मैडम लग रही हैं? ये तो मॉडल हैं मॉडल! मैं ना.....
आह! (ऋतू गुस्से में चीखी|)
मैं: जान! एक टेंडर के लिए....
ऋतू: (मेरी बात काटते हुए) उससे दूर रहना बातये देती हूँ! वरना उसका मुँह नोच लुंगी!
इतना कह कर उसने फ़ोन काट दिया| मुझे उसकी इस नादानी पर प्यार आ रहा था और मैंने उसे दुबारा फ़ोन किया और उसके कुछ बोलने से पहले ही मैंने उसे फ़ोन ओर एक जोरदार "उउउउम्मम्मम्मम्माआआअह्ह्ह्हह" दिया| ये सुनते ही वो पिघल गई और मैंने उसे यक़ीन दिला दिया की उसे चिंता करने की कोई जर्रूरत नहीं है| मुझ पर सिर्फ और सिर्फ उसका अधिकार है!
update 16
ऋतू से बात करके मैं वापस बेंच पर बैठ गया और फ़ोन में गेम खेलने लगा, मेरे और मैडम के बीच अब भी कोई बातचीत नहीं हो रही थी| कुछ देर बाद ट्रैन आ गई और प्लेटफार्म पर लग गई, पर दिक्कत ये थी की मेरी टिकट कन्फर्म नहीं थी और मैडम वाली टिकट कन्फर्म तो हुई पर वो सर के नाम पर थी| कंजूस सर ने स्लीपर की टिकट बुक की थी, जबकि फर्स्ट ऐ.सी. में टिकट्स खाली थी| लखनऊ से मुंबई की 32 घंटे की यात्रा वो भी बिना कन्फर्म टिकट के, ये सोच कर ही थकावट होने लगी थी मुझे| जैसे-तैसे मैंने मैडम का बैग तो उनकी सीट पर रख दिया और मैं इधर-उधर जा कर कोई खाली सीट खोजने लगा| दूसरे कोच में मुझे एक सीट खाली मिली और मैं उधर ही अपना बैग ले कर बैठ गया| करीब पंद्रह मिनट बाद मुझे मैडम का कॉल आया;
अनु मैडम: मानु? कहाँ हो तुम?
मैं: जी...मैं S2 में हूँ, वहाँ कोई सीट खाली नहीं थी इसलिए|
अनु मैडम: अरे गाडी चलने वाली है, आप जल्दी आओ यहाँ!
मुझे बड़ा अजीब लगा पर मैंने उनसे कोई बहस नहीं की और उठ कर चल दिया| अब मैं जहाँ बैठा था वहाँ शायद मुझे बर्थ मिल भी जाती पर मैडम ने बुलाया तो मुझे अपनी विंडो सीट छोड़के मैडम के पास वापस जाना पड़ा| जब में S1 कोच में पहुँचा तो देखा वहाँ दो हट्टे-कट्टे आदमी मैडम की बर्थ पर बैठे हैं, तब मुझे समझ आया की वो क्या कह रहीं थी| मैं वहाँ पहुँचा तो मुझे देखते ही वो दोनों आदमी समझे की मैं मैडम का बॉयफ्रेंड हूँ और उनमें से एक उठ कर कहीं चला गया| में ठीक मैडम की बगल में बैठ गया पर मेरे और उनके जिस्म के बीच गैप था| "ये बैग आप सीट के नीचे रख दो|" मैडम ने कहा तो मैंने वैसा ही किया और चुप-चाप दूसरी खिड़की से बाहर देखने लगा| ट्रैन चल पड़ी और इधर मैडम मेरे बिलकुल नजदीक आ गईं और मेरे कान में खुसफुसाईं; "आपकी सीट कन्फर्म हुई?" मैं उनकी इस हरकत से चौंक गया और मैंने ना में सर हिलाया| "TTE से बात करें?" मैडम ने कहा तो मैंने हाँ में सर हिलाया| मैडम के इतना करीब आने से मुझे उनके परफ्यूम की महक आने लगी थी और वो बहुत जबरदस्त थी| मदहोश कर देने वाली, पर ये ऋतू का प्यार था जो मुझे बहकने नहीं दे रहा था| कुछ देर बाद TTE आया और उसे देखते ही वो आदमी जो मेरी बगल में बैठा था उठ के भाग खड़ा हुआ| मैडम ने चुपके से मेरे हाथ में 500 के चार नोट पकड़ा दिए थे और मुझे ये देख कर बहुत
हैरानी हो रही थी| इधर TTE ने जब हम से टिकट माँगी तो मैंने उसे टिकट दिखाई तो वो बोला की; "मानु कौन है?" मैंने हाँ में सर हिला कर बताया| फिर उसने कहा; "आप मैडम किसी और की टिकट पर सफर कर रही हैं?" अब मुझे कैसे भी बात संभालनी थी, तो मैंने ही कहा; "सर वो दरसल एक गड़बड़ हो गई थी, मैंने मैडम की जगह सर का नाम लिख दिया था? आप चाहे तो देख लीजिये मैडम का PAN Card उसमें इनके हस्बैंड का नाम वही है जो टिकट में लिखा है|” वो तुरंत मेरी चालाकी भाँप गया और बोला; "बेटा, चलो तुमने नाम गलत भरा पर लिंग भी गलत भर दिया? महिला को पुरुष लिख दिया?" अब ये सुन कर तो सब हँस पड़े| उन्होंने हँसते हुए कहा; "कोई बात नहीं, पति की टिकट पर पत्नी ही तो सफर कर रही है|" अब वो जाने लगा तो मैडम ने ही उन्हें रोका; "सर दो मैं से एक ही टिकट कन्फर्म हुई है आप प्लीज देख लीजिये एक और टिकट कन्फर्म हो जाए?"
"सॉरी मैडम पर सिवाए फर्स्ट ऐ.सी. के सारे फुल हैं| कहो तो मैं फर्स्ट ऐ.सी. की दो टिकट बना दूँ?" अब ये सुन के तो मैं ने सोचा की भाई ये 32 घंटे बैठे-बैठे ही निकलेंगे| पर मैडम तपाक से बोलीं; "ठीक है TTE साहब आप दो टिकट बना दीजिये|" अब ये देख मैं हैरानी से मैडम को देखने लगा| उसने मैडम से 7800/- माँगे, तो मैडम ये सुन कर थोड़ा सोच में पड़ गईं| अब मैं उठ खड़ा हुआ और TTE साहब को थोड़ा मस्का लगाने लगा और उन्हें थोड़ा दूर ले जा कर कहा; "सर प्लीज थोड़ा रहम करो! देखो यही टिकट लेनी होती तो मैं बुक करा देता| कुछ तो कन्सेशन करो? मैं अयोध्या रहता हूँ, आपको कुछ भी काम हो तो आप कहना| प्लीज सर!" अब ये सुन कर वो थोड़ा तो नरम हो गया| "अरे तुम तो हमारे गाँव वाले निकले!" ये कहते हुए हमारी बातें शुरू हुई, फिर मैने उसकी बात अपनी पिताजी से करवाई और तब पता चला की ये मेरे दोस्त संकेत तिवारी के छोटे चाचा हैं| उन्होंने मुझसे मेरा मोबाइल नंबर लिया और अपना नंबर भी दिया और फिर दो टिकट भी बना दिए जब पैसे की बात आई तो उन्होंने कहा है जो मन करे वो दे दो| मैंने दो हजार मैडम वाले और हजार अपनी जेब से उन्हें दे दिए और वो आगे चले गए| वापस आ कर मैंने मैडम से कहा की हमें आगे जाना है, इधर मैडम भी होशियार निकली उन्होंने 500/- में अपनी टिकट एक आंटी को बेच दे दी| हम फर्स्ट ऐ.
सी में अपने कम्पार्टमेंट में घुसे तो अंदर घुसते ही मैडम घबरा गईं| अंदर दो लौंडे बैठे थे और शक्ल से ही चरसी लग रहे थे| मैडम की घबराहट उनके चेहरे से ही झलक रही थी तो मुझे ही आगे आना पड़ा| मैंने मैडम को बहार रुकने का इशारा किया और सामान उठा कर सीट के नीचे डाला और फिर उन्हें अंदर आने को कहा| जैसे ही दोनों ने मैडम को देखा तो ठरक्पना उनके चेहरे पर आ गया और उनकी शक़्लें देख मैं गंभीर हो गया| "आप दोनों झाँसी जा रहे हैं?" उनमें से एक ने बात शुरू की तो मैंने जवाब देते हुए नहीं कहा और बात आगे बढे उसके पहले ही मैडम मुझसे सट कर बैठ गईं और खिड़की के बाहर देखने लगीं| फिर मेरी तरफ मुँह कर के धीमी आवाज में बोलीं की उन्हें भूक लगी है| उनका व्यवहार अचानक से गर्लफ्रेंड वाला हो गया था और मुझसे इससे बहुत अनकम्फर्टेबले महसूस हो रहा था| मैंने बैग से ऋतू के पैक किये हुए सैंडविच निकला और उन्हें दे दिया| वो बाहर मुँह कर के खाने लगीं, इधर उन दोनों कमीनों की नजर अभी भी उन पर टिकी हुई थी| मैं समझ सकता था की उन्हें कितना अनकम्फर्टेबले महसूस हो रहा है पर मैं इस समय कुछ नहीं कर सकता था, बस हर थोड़ी-थोड़ी देर में उन दोनों की हरकत पर नजर रखे हुए था| वो दोनों भी कभी फ़ोन में कुछ देखते, कभी एक दूसरे से बात करते और मेरी नजर बचा-बचा के अनु मैडम को देखते| मैडम उनकी सारी हरकतें कनखी नजरों से देख रही थी और गुस्सा उनके चेहरे पर झलक रहा था| उनमें से एक ने मैडम की तरफ देखते हुए अपने लंड पर हाथ रख दिया और उसे दबाने लगा| इससे पहले की मैं उसे कुछ कहता मैडम को अचानक से क्या सुझा की उन्होंने अपना सर मेरी जांघ पर रख दिया और उन दोनों की तरफ पीठ कर के लेट गईं| इससे पहले की वो मैडम को पीछे से देख पाते मैंने उनपर एक चादर डाल दी| पर मेरी हालत ख़राब हो गई थी, मैडम का सर मेरे लंड से कुछ सेंटीमीटर दूर था और उनकी सांसें मुझे उस पर साफ़ महसूस हो रही थी| लंड अब फुल ताव में अकड़ने लगा था और मुझे डर लग रहा था की अगर मैडम को ये महसूस हो गया तो वो मेरे बारे में क्या सोचेंगी| मैं मन ही मन उन कमीनों को गाली दे रहा था, न वो हरामी यहाँ होते और ना ही मैं इस परिस्थिति में फँसता| मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं अपने दोनों हाथों को कहाँ रखूँ? दायाँ हाथ तो मैंने अपने दायीं तरफ सीट पर रख लिया पर बायाँ हाथ कहाँ रखूँ? मैडम के सर पर रख नहीं सकता था और न ही उसे अपने बाएं घुटने पर रख सकता था| तो मैंने उसे मोड़ के अपने सर के पीछे रख लिया और पीछे तक लगा कर बैठ गया| मेरे मन में मैडम के लिए कोई गंदे विचार नहीं थे पर लंड का दिमाग तो होता नहीं, उसे गर्मी मिली नहीं की वो टनटनाते हुए अकड़ गया| इधर ये दोनों जल भून के राख हो चुके थे और मन ही मन मुझे गाली दे रहे होंगे की क्यों मैंने मैडम के जिस्म को ढक दिया| थोड़ी देर में ऋतू का फ़ोन आया और अब मैं अजब
दुविधा में फँस गया था! अगर उठ के जाऊँ तो मैडम अकेली रह जाएँगी और ये भूखे भेड़िये कोई बदसलूकी न करें उनके साथ और यहाँ बैठा रहा तो फ़ोन पर बात कैसे करूँ| आखिर मैंने फ़ोन उठा लिया और हेडफोन्स कान में लगाए हुए ही उससे बात करने लगा, पर वो मेरी हालत समझ गई और पूछने लगी की मैं क्या कर रहूँ? मैंने बस 'कुछ नहीं' कहा, पर वो समझ गई और जोर देने लगी की मैं उसे बताऊँ तो मैंने उसे बस ये कह के टाल दिया की मैं "बाद में कॉल करता हूँ|" उसने फिर से मुझे कॉल कर दिया पर मैंने उठाया नहीं|
नौ बजे एक अटेंडें आया और उसने मुझसे खाने को पूछा तो मैंने उसे दो थाली बोल दी और सामने वाले एक लड़के ने भी दो थाली बोल दी| उनमें से एक बाहर गया हुआ था और जब वो आया तो उसकी आँखें सुर्ख लाल थी, मतलब साफ़ था की वो अभी माल फूँक कर आया है| मैंने अभी तक मैडम को छुआ नहीं था पर जब अटेंड खाना ले कर आया तो मुझे उन्हें उठाना था| अब मैं उनका नाम नहीं ले सकता था, भले ही वो उन दोनों को ये जता रहीं हों की हम दोनों पति-पत्नी हैं| उन्हें छू भी नहीं सकता था अब हार मानते हुए मैंने सोचा की उनकी दायीं बाजू को छू कर उन्हें उठाऊँ की तभी TTE वहाँ से गुजरे और उन्होंने हम दोनों को इस हालत में देख लिया| मेरी बुरी तरह फटी की अब मैं गया काम से पर उन्होंने कुछ नहीं कहा बस मुस्कुरा दिए और चले गए| मैंने मैडम के बाजू को थोड़ा हिलाया और उन्हें उठा दिया| वो उठीं और अपने होठों को पोछने लगी, मैंने अपनी पैंट पर देखा तो मेरे लंड के पास से गीली हो चुकी थी| सोते समय मैडम के मुँह से लार निकली थी जिसने मेरे लंड के पास गीला निशान बना दिया था| जब उनकी नजर वहाँ पड़ी तो वो बुरी तरह झेंप गईं और नजर चुरा कर बाथरूम चली गईं| इधर उन दोनों छिछोरों ने जब ये देखा तो वो भी गन्दी हंसी हँसने लगे| मैंने मैडम वाली चादर ही उठा ली और पैंट के ऊपर डाल ली| जब मैडम आ गईं तो मैं हाथ धोने जाने लगा तो मैडम मुझे देख कर फिर से शर्मा गईं और वापस सीट पर सर झुका कर बैठ गईं| मैं हाथ धो कर आया तो देखा वो दोनों हरामी खुसफुसा रहे थे; "देख रहा है?! मियाँ-बीवी का प्यार? इसीलिए कह रहा था की तू भी शादी कर ले!" मैं आगे कुछ बोलता उससे पहले ही मैडम ने इशारे से मुझे अपने पास बैठने को कहा और हम दोनों खाना खाने लगे|
update 17
खाना खाने के बाद भी उन कमीने लड़कों की नजरें मैडम पर बानी हुई थी और मैडम बस खिड़की से बाहर देखे जा रही थी| मुझे अब उन पर तरस आने लगा था और मैं मन ही मन सोचने लगा की क्या करूँ? मैंने अपने बैग से लैपटॉप निकाला और उसमें हेडफोन्स कनेक्ट कर के उन्हें दिया| वो हैरानी से मुझे देखने लगी पर जब मैंने उन्हें मूवी देखने को कहा तो वो मुस्कुरा दीं और मूवी प्ले करके देखने लगी| मैंने ऊपर से दो तकिये उतार के अदम को दे दिए जिन्हें मैडम ने अपनी गोद में एक के ऊपर एक रख लिया और सबसे ऊपर
उन्होंने लैपटॉप रख लिया| इतनी ऊंचाई होगई थी की मैडम आराम से मूवी देख सकें और उन लड़कों की आँखों से अपने जिस्म को बचा सकें| अब तो वो दोनों मुझे देखने लगे की क्यों मैंने उनके हुस्न के दीदार में बाधा डाल दी| मैडम भी मेरी चालाकी समझ चुकी थी और उन्होंने मुझे नजर बचा के दबी आवाज में थैंक यू और मैंने बस हाँ में गर्दन हिला दी| मैं भी पाँव ऊपर कर के बैठ गया और ऋतू को मैसेज करने लगा| मैंने उसे अभी जो भी कुछ हुआ उसके बारे में कुछ नहीं बताया था वर्ण वो फिर कोई काण्ड कर देती| मैंने उसे सॉरी कहा की दरसल मैं उस समय मैडम से बात कर रहा था इसलिए फ़ोन नहीं उठा पाया पर वो मुझसे रूठ चुकी थी और थोड़ी ही देर में ऑफलाइन चली गई| मूवी देख कर मैडम हँस रही थी और उनकी हंसी मन्त्र-मुग्ध करने वाली थी पर मेरा दिल तो अब किसी और का हो चूका था| इतने साल से ऑफिस में काम कर रहा था पर मैडम को कभी इस तरह मैंने मुस्कुराते हुए नहीं देखा था| वो हमेशा ही ऑफिस में काम करती रहती थी और शायद ही कभी मुस्कुराईं हो! खेर अब चूँकि ऋतू मुझसे नाराज थी तो बात करने वाला कोई था नहीं मेरे पास, तो मैं बैठे-बैठे ऊबने लगा था| मैडम ने मेरी परेशानी भाँप ली और वो मेरे कंधे पर सर रख चिपक गईं और लैपटॉप को थोड़ा टेढ़ा कर लिया, हेडफोन्स का एक सिरा उन्होंने मुझे दे दिया| आज तक सिर्फ एक ऋतू थी जिसने कभी मेरे कंधे पर अपना सर रखा हो अब ऐसे में मैडम के सर रखने से मुझे बहुत ही अजीब महसूस हो रहा था| वो दोनों लड़के मैडम के इस तरह से बैठने से आहें भरने लगे और मैंने गौर किया तो पाया की मैडम की एक जाँघ उन्हें दिखने लगी थी| अब चूँकि मैडम ने चूड़ीदार पहना था और उनकी कुर्ती शॉर्ट थी तो उनके जिस्म का उभार उन्हें साफ़ दिख रहा था| मैंने मेरे बगल में पड़ी चादर को उठा के उन पर डाला और तब मैडम को एहसास हुआ की वो लौंडे क्या देख रहे थे और उन्हें बहुत मायूसी होने लगी| मैंने मूवी को फ़ास्ट-फॉरवर्ड कर के हँसी वाला सीन लगा दिया जिसे देख कर मैडम मुस्कुरा दी| वो समझ गईं थीं की मैंने ये सिर्फ उन्हें खुश करने के लिए किया था| रात के बारह बजे होंगे और अब मुझ पर नींद हावी होने लगी थी, अब मैडम तो सो चुकी थीं पर मुझे बड़ी जोर से नींद आ रही थी| मेरी उबासी सुन कर वो समझ गईं और उन्होंने मुझे अपनी गोद में सर रख कर लेटने को कहा तो मैं फिर से हैरान हो गया| मैंने ना में सर हिलाया और वैसे ही बैठा रहा, जेब से एक च्युइंग गम निकाली और चबाने लगा| रैपर मैंने जेब में डाल लिया, फिर मैडम ने भी एक गम माँगी तो मैंने उन्हें भी दे दी| उनका ध्यान मूवी में लगने से उनका अनकम्फर्टेबले लेवल कम हो चूका था|
रात एक बजे गाडी झाँसी पहुँची और ये दोनों लौंडे अपना सामान ले कर उत्तर गए और तब जा कर मैडम का सर मेरे कंधे से उठा| उनके जाते ही दो ऑन्टी केबिन में घुसीं और सामने वाली बर्थ
पर बैठ गईं और अपना सामान सेट करने लगीं| मैंने भी मैडम से ऊपर जा के सोने की इजाजत माँगी तो उन्होंने हँसते हुए इजाजत दे दी| सामने वाली एक आंटी भी हँसने लगी| मैंने चादर बिछाई और लेट गया और घोड़े बेच के सो गया| पौने तीन बजे मैडम ने मुझे उठाया तो मैं चौंक कर उठ गया; "सॉरी मानु! वो मुझे ....जाना है|" मैं तुरंत समझ गया की उन्हें वाशरूम जाना है और इतनी रात को ट्रैन में उन्हें अकेले जाने से डर लग रहा है| मैं जूते पहनके उनके साथ बाथरूम तक गया और फिर वापस उन्ही के साथ आ गया| वापस आने के रास्ते में वो शर्मिंदा महसूस कर रहीं थीं पर मैंने ''its alright mam, I can understand.” कह के बात खत्म कर दी| सुबह 8 बजे मैं उठा और अभी इटारसी स्टेशन आया था और अटेंड चाय ले कर आया था| मैडम ने उसे रात के खाने और चाय के पैसे दिए और मैं भी नीचे उतर आया|
फ्रेश हो कर मैं चाय पीने लगा;
अनु मैडम: वो टिकट कितने की थी?
मैं: 3,०००/- की| (मैंने चाय की चुस्की लेते हुए कहा|)
अनु मैडम: वो तो 8,०००/- माँग रहा था?
मैं: वो दरसल उनसे बात की तो पता चला की वो मेरे ही गाँव के हैं और मेरे ही दोस्त के चाचा हैं|
अनु मैडम: आपका गाँव कहाँ है?
मैं: अयोध्या
अनु मैडम: अरे वाह! कभी बताया नहीं आपने?
मैं: जी कभी टॉपिक ही नहीं छिड़ा| पर मैडम सर को पता चला तो वो बहुत गुस्सा होंगे?
अनु मैडम: उन्हें बोलने की कोई जर्रूरत नहीं| उन्हें जरा भी समझ नहीं है, बस सारा टाइम हुक्म चलाते रहते हैं| अचनक से मुझे कहा की तुम चली जाओ, भला ये कोई बात हुई?
उन्हें सर पर बहुत गुस्सा आ रहा था और मैं उनकी किसी भी बात का जवाब हाँ या नहीं में दे रहा था बस चुप-चाप सुने जा रहा था| दस मिनट तक उनके मन की भड़ास निकलती रही और मैं सर झुकाये सुनता रहा की तभी वो दोनों आंटी आ गईं जो फ्रेश होने गईं थी| उनके आते ही मैडम चुप हो गईं और मेरा सर झुका होने से उन्हें लगा की मैडम मुझे हिओ डाँट रही हैं| "अरे बेटा क्या हुआ? काहे झगड़ रहे हो?" पहली आंटी बोलीं|
"अरे मियाँ-बीवी तो ये खट-पट चलती रहती है|" ये कह के दूसरी आंटी हँसने लगी, और ठीक उसी समय वही TTE आ गया और उसने ये मियाँ-बीवी वाली बात सुन ली| अब इससे पहले मैं कुछ बोलता मैडम ही बोल पड़ी; "आंटी मैं झगड़ नहीं रही थी, आपके आने से पहले यहाँ दो छिछोरे बैठे थे और वो बस मुझे घूरे ही जा रहे थे|" मैं बिना कुछ बोले ही वहाँ से उठ के बाहर आ गया और ऋतू को फ़ोन करने लगा|
मैं: Good Morning जान!
ऋतू: जा के अपनी अनु मैडम को बोलिये|
मैं: यार... प्लीज .... बात तो....
ऋतू: बात भी आप जाके अनु मैडम से करिये| मुझे कॉलेज जाना है|
इतना बोल कर उसने कॉल काट दिया, मैं जानता था की वो फ़ोन पर नहीं मानने वाली| TTE ने पीछे से मेरी बातें सुन ली थी और वो आ कर मुझसे चुटकी लेने लगे; "लगे रहो!" मेरा जवाब सुनने से पहले ही वो आगे चले गए| खेर रात दस बजे ट्रैन मुंबई छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस पहुँची और मैं दोनों का सामान ले कर उतर गया| टैक्सी वाले से अँधेरी वेस्ट के लिए पूछा तो कोई भी जाने को तैयार नहीं था, मैंने ओला पर ढूंढा तो एक मिल गया पर अब स्टे की दिक्कत थी| टैक्सी वाले ने अपने जान-पहचान के 6-7 होटल दिखाए पर कहीं भी रूम खाली नहीं था और जहाँ था भी वो सिर्फ सिंगल रूम था| बड़ी मुश्किल से एक होटल मिला और मैडम वहाँ पूछताछ करने गईं और मैं बाहर ही रुक गया टैक्सी वाले के पास| मैडम ने अंदर से मुझे आवाज दी; "मानु जी आ जाइये|" मैंने शुक्र मनाया की कम से कम कमरा मिल गया वर्ण रात के 1 बजे कहाँ मारे-मारे फिरते| टैक्सी वाले को पैसे दे कर मैं उनके पास आया तो उन्होंने मुझे रजिस्टर में साइन करने को कहा| जब मैंने डिटेल पढ़ी तो मैं हैरान रह गया| मैडम ने Mr. Manu Maurya and Mrs. Anu Maurya लिखा था| अब ये देख कर मैंने मैडम की तरफ देखा तो वो बड़ी नार्मल लगीं मुझे! मैंने साइन तो कर दिया पर दिल अंदर से धक-धक करने लगा था| कमरे के अंदर पहुँचा तो लाइट्स मध्यम थीं, बिलकुल रोमांटिक वाली| मैंने तुरंत ही कमरे की ट्यूब लाइट जला दी और जब मैडम की तरफ देखा तो उनकी सांसें बहुत तेज थीं| वो सीधा बाथरूम में घुस गईं और आधे घंटे तक वहीँ रहीं| अब ज्यादा सोचने की जर्रूरत नहीं थी की वो वहाँ क्या कर रहीं हैं, मैंने इस मौके का फायदा उठाया और तुरंत अपने कपडे चेंज कर लिए| फिर मैं सोफे पर अपना बिस्तर लगाने लगा| जब मैडम बाहर आईं तो वो मुझसे नजरें चुरा रहीं थीं और मेरी तरफ पीठ किये हुए ही बोलीं; "आप यहाँ बेड पर सो जाओ वहाँ सोफे पर कैसे सोओगे?"
"It’s alright mam! I’ll manage.” मैंने भी उनकी तरफ देखे बिना ही कहा|
“um..
actually they had just one room and we’ve been searching for an hour… it was very late so… I…” मैडम को आगे बोलने में बहुत हिचकिचाहट हो रही थी|
“I can understand mam!” इतना कह कर मैंने कमरे की लाइट बंद की और लेट गया| कुछ देर बाद मैडम उठीं और कपडे बदलने के लिए बाथरूम में घुस गईं, लाइट के स्विच की आवाज से मैं चौंक कर उठ गया और देखा तो मैडम अभी बाहर आईं थीं और वो सिल्क की शॉर्ट नाइटी जो उनके जिस्म से इस कदर चिपकी हुई थी की क्या कहूँ? उनके कंधे नंगे थे और उन पर बस एक पतली सी स्ट्रिंग थी| डीप कट जिससे उनकी छातियों की घाटी साफ़ दिख रही होगी| अब चूँकि मैं दूर था तो वो घाटियाँ नहीं देख सकता था| अब ये सब देखते ही मेरे लंड में तनाव आने लगा था और मैं मुँह दूसरी तरफ कर के खुद पर काबू करने लगा| मैंने ऋतू के बारे में सोचना शुरू कर दिया| उसका मासूम चेहरा याद करने लगा, पर उसे याद करते ही मुझे कल शाम का वाक्य याद आ गया| अब तो लंड अकड़ के पूरा खड़ा हो गया और मैंने जान बुझ कर दूसरी तरफ करवट ली और मैं लंड की अकड़न छुपाने लगा| दस मिनट बाद मुझे कमरे में शराब की महक आने लगी और ये ऐसी महक थी जिसने मेरे दिमाग में कोहराम मचा दिया| मन बेचैन होने लगा और मैं उस खुशबु का पीछा करते हुए उठ बैठा और देखा मैडम बिस्तर पर बैठीं और उनके हाथ में एक पेग है! अब ये देखते ही मुझे डर लगने लगा की कहीं कुछ गलत न हो जाए| मैडम ने जब मुझे बैठे हुए देखा तो वहीँ से मुझसे पूछा; "आप पियोगे?" मैंने ना में सर हिलाया पर कमरे में इतनी रौशनी नहीं थी की वो मेरी गर्दन हिलती हुई देख सकें| इसलिए उन्होंने दुबारा पूछा पर मेरे जवाब देने से पहले ही मेरे क़दमों में जैसे जान आ गई और वो अपने आप ही उनकी तरफ चल पड़े| पर दिमाग ने जैसे अंतर् आत्मा को झिंझोड़ा और अपना वादा याद दिलाया| मैंने “no thank you mam” कहा और बाथरूम में घुस गया, वाशबेसिन के सामने खड़े हो कर अपने आप को देखने लगा और अपने मन पर काबू करने लगा" बार-बात खुद को ऋतू को किया वादा याद दिलाने लगा, पर मन शर्म की खुशबु से बावरा हो गया था| मन कह रहा था की एक बार चीट करने में दिक्कत ही क्या है?! मैंने अपने मुँह पर पानी मारना शुरू कर दिया ताकि खुद को किसी तरह संभाल सकूँ| एक दृढ निश्चय कर मैं बाहर आया और वापस सोफे पर लेट गया और चादर ओढ़ ली पर मन साला काबू में नहीं आ रहा था| मैंने करवटें बदलनी शुरू कर दीं| मैडम ने इसका कुछ अलग ही मतलब निकाला, "Manu the couch’s not comfortable come and sleep on the other side, its not like I need the whole bed to myself! We are grownups and know our limits. No need to be afraid of me!”
“No mam, its okay… it’s a new place….umm….” मुझसे बोला नहीं जा रहा था| “Then come we’ll talk.” उन्होंने बात शुरू करने के लिए कहा|
अब मैं उठा और जा कर उनके सामने खड़ा हो गया तो उन्होंने अपने पास बैठने को कहा तो मैंने पास पड़ी कुर्सी उठा ली और उसे घुमा कर बैठ गया|
अनु मैडम: आप बहुत फॉर्मेलिटी दिखाते हो?
मैं: umm… you’re my boss, I’m your employee.
How can I sit or sleep next to you on a bed?
अनु मैडम: chivalry ???
मैं: yes mam!
अनु मैडम: That’s the first time….. For me! (उन्होंने एक सिप लिया|)
मैं अब उनसे नजरें चुरा के इधर-उधर देख रहा था|
अनु मैडम: So do you have a girlfriend?
मैं: No
अनु मैडम: Wow! How come you’re single? You’re such a gentleman?
मैं: umm… I don’t get time!
अनु मैडम: I know… I know…. That asshole husband of mine is always yelling on you! I know….. bloody bastard! Ruining everyone’s life…. But I…(hic) … won’t let… (hic)
शराब अब मैडम पर अपने जादू दिखाने लगी थी और उन्होंने हिचकी लेना शुरू कर दिया था|
मैं: ummm… mam… its getting late… we’ll talk tomorrow!
पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया और आखरी घूँट जैसे तैसे पिया और बाथरूम जाने को उठीं और लड़खड़ाने लगीं| मैंने कमरे की लाइट्स जला दी ताकि उन्हें ठीक से दिखाई दे और तब मैंने उन्हें ठीक से देखा और जो शराब का जादू मेरे मन पर हावी था वो खत्म हो गया और लंड अकड़ने लगा| मैडम अब बाथरूम में घुस गईं थीं, तो मैंने एक गहरी साँस ली और अपने जज्बातों पर काबू करने लगा और सोफे की तरफ घुमा और तभी मेरी नजर बोतल पर पड़ी| मैडम ने कम से कम तीन पेग मारे थे व्हिस्की के वो भी नीट! अब तो मुझे डर लगने लगा की आज रात जर्रूर कुछ होगा? ये सोचते हुए मैं एक कदम चला हूँगा की मुझे मैडम के बाथरूम से बाहर आने की आवाज आई और वो गिरने लगी| मैंने भाग कर उन्हें तुरंत थाम लिया पर अब तो गजब ही सीन था! मैंने मैडम को कमर से पकड़ रखा था और वो नीचे को झुकी हुई थीं| उनकी नाइटी बिलकुल उनके शरीर से चिपकी हुई थी, जिससे उनके सारे के सारे उभार दिखने लगे थे| उनके वो 38D के वक्ष! 30 इंची कमर मुझे उनकी तरफ खींचने लगी थी| लंड तो फूल चूका था और पूरी तैयारी में था की आज उसे कुछ नया मिलेगा चखने को मर मन मेरे काबू में था| मैंने उन्हें सहारा दे कर खड़ा किया, पर मैडम के मन में मेरे लिए कुछ गंदे विचार नहीं थे इसलिए उन्होंने किसी भी तरह की पहल नहीं की थी| मुझे लग रहा था की वो शायद इतने होश में तो हैं की सही और गलत पहचान सकें| खेर मैं उन्हें पलंग तक ले आया और उन्हें लिटा दिया और उनके ऊपर चादर डाल दी और वापस आ कर अपने पलंग पर लेट गया| मैं लेटे-लेटे सींचने लगा की ये आखिर हो क्या रहा था मेरे साथ? मेरे मन में उनके लिए कोई गंदे विचार नहीं हैं फिर भी किस्मत क्यों मेरे साथ ऐसा कर रही थी? ट्रैन में उनका मुझे पति बनाने का नाटक! मेरी गोद में सर रख लेट जाना वो भी बिना मुझसे पूछे? ठीक है की उन्हें उन लड़कों की गन्दी नजरों से बचना था पर एटलीस्ट मुझसे पूछा तो होता? फिर होटल के रजिस्टर में Mr. Manu Maurya nad Mrs.
Anu Maurya लिखना? मुझे अपने साथ बिस्तर पर लेटने को कहना? फिर भले ही वो इसलिए कहा हो की मैं आराम से सो सकूँ! पर हूँ तो मैं पराया ही ना? ऑफिस में उन्होंने सिवाए काम के कभी मुझसे कोई बात नहीं की, प्लेटफार्म पर भी वो कुछ नहीं बोल रहीं थी, पर ट्रैन में बैठते ही वो इतना कैसे बदल गईं? हम दोनों में तो दोस्ती भी नहीं है की मैं इस साब को ये मान कर टाल दूँ की दोस्तों में ये सब चलता है| ये सोचते-सोचते मैं सो गया और सुबह 8 बजे उठा और देखा तो मैडम अब भी सो रही हैं| मैं नाहा-धो के तैयार हो गया| पर मैडम अब भी नहीं उठीं थी, मैंने एक ब्लैक कॉफ़ी आर्डर की और मैडम को उठाने के लिए उनके कन्धर पर दो उँगलियों से ना चाहते हुए छुआ| पर मैडम नहीं उठीं तो मजबूरन मुझे उन्हें थोड़ा हिलाना पड़ा और वो थोड़ा कुनमुनाने लगीं और अपनी आँखें खोलीं जो ठीक से खुल भी नहीं रही थीं; “ Good Morning Mam!” मेरा मुस्कुराता हुआ चेहरा देख कर उन्हें होश आया और उन्होंने साइड टेबल पर पड़ी अपनी घडी उठाई और टाइम देखा| मैं तुरंत घूम गया क्योंकि मुझे पता था उन्होंने बहुत तंग नाइटी पहनी है और उन्हें इस हालत में शर्म आना तय है| मेरे घूमते ही मैडम तुरंत बाथरूम में घुस गईं और मैं अपने बैग में लैपटॉप और कुछ फाइल रखने लगा| मेरी पीठ अब भी बाथरूम की तरफ थी, मैडम फटाफट बहार आईं और अपने कपडे ढूंढने लगीं| मैं बिना उनकी तरफ मुड़े ही दरवाजा खोल कर बाहर चला गया|
दस मिनट ही मैडम की ब्लैक कॉफ़ी आ गई जिसे मैंने चुप-चाप कमरे में रख दिया और बाहर लॉबी में बैग ले कर आगया| आधे घंटे बाद मैडम भी अपना बैग और लैपटॉप ले कर बाहर आ गईं और मुझसे नजरें चुराती हुई बाहर आ गईं और फ़ोन कर के राखी से पूछने लगीं की वो कहाँ है| मैडम ने इस समय बिज़नेस सूट पहन रखा था और वो बहुत सुन्दर लग रहीं थी, पर मुझे क्या? मेरे पास तो मेरा प्यार था; ऋतू! उसके आगे सब फीका था! मैंने ओला बुला ली थी और उसने हमें Palmer Infotech छोड़ा| वो एक बहुत बड़ी बिल्डिंग थी, जैसे की फिल्मों में दिखाया जाता है| दसवीं मंजिल पर पहुँचे तो वहां का नजारा बिलकुल कॉर्पोरेट वाला था| सभी लोग वहाँ बिज़नेस सूट पहने थे, एक मैं ही था जो वहाँ सिर्फ टाई पहने आया था| मुझे तो ऐसा लग रहा था जैसे की मैं वहाँ इंटरव्यू दे ने आया हूँ| मैं अभी उस कॉर्पोरेट कल्चर को महसूस करने में बिजी था की पीछे से राखी ने आ कर मेरी पीठ पर हाथ रखा और मैं एक दम से पलटा|
ये राखी वही लड़की थी जो पहले मेरे ऑफिस में काम करती थी और जिसे मैं ऋतू से प्यार होने से पहले पसंद करता था| "Hi Maanu! How’re you?”
“I’m fine, how you doing? How’s your new job?” मैंने पूछा|
“I already resigned, I’ll be joining sir again!” उसने कहा पर आगे कुछ बात होने से पहले ही मैडम आ गईं और वो अब भी मुझसे नजरें चुरा रही थीं| "मानु....अ...आप...
यहीं वेट करो!" इतना कह कर मैडम और राखी दोनों अंदर चले गए| मैं सोचने लगा की ये सब हो क्या रहा है? मुझे अगर मीटिंग में शामिल ही नहीं करना था तो मुझे यहाँ लाये ही क्यों? पर फिर मुझे समझ आया की सबने बिज़नेस सूट पहना है और ऐसे में मैं ही सब से अलग दिख रहा था? मुझे ये सोच कर बड़ी निराशा हुई की मेरे पास कोई बिज़नेस सूट नहीं है| मैं वहीँ वेटिंग एरिया में चुप-चाप बैठ गया और ऋतू को फ़ोन किया पर उसने फ़ोन काट दिया! मुझे लगा की शायद क्लास में होगी, पर जब वो क्लास में होती तो कॉल काटते समय वो मैसेज कर देती थी| इसबार उसका कोई मैसेज नहीं आया था, मतलब साफ़ था की वो बहुत नाराज है| पर मैंने जब वहाँ लड़के-लड़कियों को आपस में खुल कर बातें करते देखा तो मैं सोचने लगा की जब वो जॉब करेगी तभी ये सब समझेगी| खेर मीटिंग 3 घंटे चली और मैं बुरी तरह बोर हो चूका था| जब मैडम और राखी बाहर आये तो वो काफी खुश दिखे पर मुझे मायूस देख राख ने पूछा; "क्या हुआ मानु?" मैडम फिर से नजरें चुरा कर दूसरी तरफ मुँह कर के जाने लगीं| "कुछ नहीं यार, आज पता चला की इंसान की जिंदगी में कपड़ों की क्या वैल्यू होती है!" ये मैडम ने सुन लिया पर वो कुछ नहीं बोलीं और रिसेप्शन की तरफ चली गईं| राखी मेरे पास आ कर बैठ गई और डिटेल पूछने लगी पर मैंने उसकी बात टाल दी| उसने बताय की प्रेजेंटेशन सक्सेसफुल रही और शायद कॉन्ट्रैक्ट हमें ही मिलेगा| तभी मैडम आ गईं और उन्होंने हमें कैफेट्रेरिअ चलने को कहा| वहाँ जा कर उन्होंने खाना आर्डर किया पर मेरा मन अब भी बुझा हुआ|
मैडम और राखी मीटिंग के बारे में बात कर रहे थे और मैं बस खिड़की से बाहर देख रहा था, वैसे भी मैं क्या इनपुट देता जब मुझे ये ही नहीं पता था की वहाँ हुआ क्या है? मैं अपनी कॉफ़ी ले कर चुप-चाप उठा और एक काँच की खिड़की के पास आ कर खड़ा हो गया| मेरा बयां हाथ मेरी पैंट की पॉकेट में था और मैं बस वो हरा-भरा नजारा देख रहा था| उम्मीद कर रहा था की शायद ऋतू कॉल कर दे, उसकी आवाज सुने हुए बहुत टाइम हो गया था| मैंने फ़ोन निकाला और दुबारा मिलाया पर एक घंटी बजते ही उसने फ़ोन काट दिया| आगे मैं कुछ सोचता उससे पहले ही राखी आ गई; "मानु! Come yaar! Let’s celebrate?” मैडम ने लंच आर्डर कर दिया था, मैं वापस आ कर बैठ गया और फिर राखी ने अपनी बातों से मेरा ध्यान लगाए रखा| मैं बस हाँ-ना में मुस्कुरा कर जवाब दे रहा था| लंच के बाद राखी की ट्रैन थी तो वो निकल गई, पर मेरी और मैडम की ट्रैन रात 11 बजे की थी जो हमें लखनऊ अगले दिन रात 3 बजे छोड़ती| राखी के जाने के बाद हम दोनों अकेले उसी टेबल पर बैठे थे, मैडम अब भी मुझसे नजरें चुरा रही थीं और मुझे रह-रह कर ऋतू की याद आ रही थी| अब वापस होटल भी नहीं जा सकते थे क्योंकि वहाँ एक कमरे में हम दोनों ही ऑक्वर्ड हो जाते| बात शुरू करते हुए मैंने मैडम से कहा; “congratulations mam … for the contract!” जवाब में उन्होंने बीएस
मुस्कुरा दिया और "thank you" कहा| “so mam….should we just sit here…. Or go out?” मैडम ये सुन कर हैरानी से मेरी तरफ देखने लगीं| “Go out? Where?” उन्होंने पूछा| “ummm… how about beach?” मैंने थोड़ा उत्साह दिखते हुए कहा| तो उन्होंने वही प्यारी सी मुस्कान दी और वो उठ कड़ी हुईं| उनकी awkwardness अब खत्म हो गई थी| मैंने ओला बुक की और और उसने हमें जुहू बीच छोड़ा|
update 18
वहाँ पहुँच कर मैं एक्सपेक्ट कर रहा था की बिलकुल खाली जगह होगी पर ये तो भीड़-भाड़ वाली जगह निकली| मैडम तो जा कर रेत में लगे पाँव बैठ गईं और मैं इधर-उधर टहलता रहा और फोटो क्लिक करता रहा, कुछ सेल्फी भी ली और सब फोटो ऋतू को भेज दी| उसने सब फोटो देख ली पर जवाब कुछ नहीं दिया| मैं वापस मैडम के पास आया तो वो ढलते हुए सूरज को देख रही थीं और मंद-मंद मुस्कुरा रही थी| मैंने दो नारियल लिए और मैडम की तरफ बढ़ाया, मैडम एक डीएम से चौंक गईं पर बोली कुछ नहीं| एक सिप नारियल पानी पीने के बाद मुझे इशारे से वहीँ रेट में बैठने को कहा| मैं भी उन्हीं के साथ बैठ गया पर थोड़ी दूर और ढलते हुए सूरज को देखने लगा| फिर बैठे-बैठे कुछ फोटो खींची और उन्हें एडिट करने लगा| मैडम ने ये देख लिया पर कुछ बोली नहीं, फिर वो कुछ सोचने लगी और अपना मुँह झुका लिया| “Manu… I….I’m sorry for whatever happened last night? I misbehaved…” उन्होंने सर झुकाये हुए कहा, पर इससे पहले वो कुछ आगे कहती मैंने उनकी बात काट दी| "But nothing happened mam! I mean we had a lil chat and then you were kindaa drunked and said a lot of things about sir and then I said good night. That’s it…. Well you did almost fell down.” ये सुन कर मैडम के मन से गिलटी वाली फीलिंग खत्म हुई और वो गिरने वाली बात से तो वो थोड़ा हँस भी दी|
“Thank God! I’ve been living in guilt since morning. I thought I may have done something which was…..” वो आगे कहते-कहते रुक गईं| उन्हें डर था की नशे की हालत में शायद हम दोनों ने सेक्स किया होगा|
“I’ve another confession to make, I kindaa took advantage of your chivalry in the past 48 hours! I mean that train incident, writing our names as Mr. and Mrs. Maurya… I’m really sorry! I was so scared in train… I’ve never travelled alone in my entire life and ….” उन्होंने सर झुकाये हुए कहा|
“Its okay mam… I can understand… I know it wasn’t intentional or anything.”
“मेरा इरादा तुम्हें छूने का कतई नहीं था, उस समय तुम मेरे लिए सहारा थे और मुझे तुम पर भरोसा था की तुम मेरा कोई गलत फायदा नहीं उठाओगे| वैसे ही भरोसा जो एक दोस्त को दूसरे दोस्त पर होता है|" ये सुनने के बाद मुझे मेरे रात वाले सवालों का जवाब मिल गया था| मैडम मुझे अपना दोस्त समझती थीं पर ये सब शुरू कैसे हुआ ये जानने को मन बेचैन था| “umm… mam if you don’t mind me asking, in office we barely spoke! I mean we only had conversation regarding work. So h..h.. how did we become friends?” मैंने थोड़ा झिझकते हुए पूछा|
“Well I don’t think a conversation is required to start a friendship.
” मैडम का ये जवाब मुझे बहुत ही अटपटा लगा क्योंकि बिना बात किये कोई दोस्त कैसे बन सकता है? पर मैंने आगे उनसे इस बारे में कोई बात नहीं की और चुप-चाप सूरज को ढलते हुए देखने लगा| अचानक ही मैडम कड़ी हुईं और मुझे अभी अपने साथ चलने को कहा| मुझे लगा की उनका मन भर गया होगा इसलिए वो अब जाना चाहती हैं पर फिर मेरी नजर उनके पैरों पर पड़ी| मैडम अब भी नंगे पाँव थीं मतलब वो चाहती थी की मैं उनके साथ वॉक करूँ| मैंने भी अपने जूते उतारे और नंगे पाँव हम दोनों रेत पर चलने लगे| “The general traits of a friendship include similar interests, mutual respect and an attachment to each other….” ये कहते हुए मैडम एकदम से रुक गईं, ऐसा लगा जैसे वो कुछ ऐसा बोल गईं जो उन्हें नहीं बोलना चाहिए था| मैं अब कुछ-कुछ समझने लगा था की आखिर मैडम के मन में क्या चल रहा है पर कुछ भी कहने से डर रहा था| डर इसलिए रहा था की कहीं मैं गलत निकला तो मैडम के नजर में जो मेरी इज्जत है वो चली जाएगी और एक डर ये भी था की कहीं मेरे कुछ कहने से उनका दिल न टूट जाए| मैंने सोचा की मैं अपनी बात कुछ इस तरह से रखूँगा की उन्हें ये समझ आ जाये की मैं प्यार क्यों नहीं कर सकता|
“You’re even giving me company in walking!” इतना कह कर वो हँसने लगीं| “So now we’re friends right?” अब मैं इसका जवाब ना तो नहीं दे सकता था, इसलिए मैंने हाँ में सर हिलाया और मैडम ने हाथ मिलाने के लिए अपना दायाँ हाथ आगे बढ़ाया| मैंने अभी उनसे हाथ मिलाया और मुस्कुरा दिया, हम वॉक करते-करते करीबन एक किलोमीटर दूर आ गए तो मैडम ने चाय पीने के लिए कहा| टापरी वाली मस्त चाय पी कर मैडम में शॉपिंग के लिए बोला और हम जुहू मार्किट आ गए वहाँ मैडम ने कुछ बालियाँ खरीदी और खरीदते वक़्त वो बार-बार मुझसे पूछती की ये कैसी है| मैंने भी पूरा इंटरेस्ट लेते हुए उन्हें एक बालियाँ उठा के दीं जो उन पर बहुत जच रही थी| उन्हें पहन के तो मैडम खुश हो गईं और मेरी पसंद की तारीफ करने लगीं| मेरा मन किया की मैं ऋतू के लिए भी एक बाली खरीदूं पर मैडम से क्या कहूँगा ये सोच कर रह गया| कुछ दूर आ कर मैडम ने मॉल जाने के लिए कहा और हम एक मॉल में घुसे| वहाँ एक शोरूम में मैडम ने मुझे एक बिज़नेस सूट दिया और try करने को कहा| अब ये देख कर तो मेरी आँख फटी की फटी रह गई| "I’m sorry mam! I can’t take this.”
"क्यों?" मैडम ने सवाल पूछा| “Mam its way too costly! I …I can’t afford it!” मैंने दबी हुई आवाज में कहा| “Oh come on! It’s a gift… from a friend to another.
”
“No…No…No… Mam… I can’t… please” मैंने उन्हें मना करते हुए कह| पर उन्होंने जबरदस्ती करते हुए कहा; "इसका मतलब की हम दोस्त नहीं हैं?" "जी मैंने ऐसा तो कुछ नहीं कहा| दोस्ती में जर्रूरी तो नहीं की इतना महँगा गिफ्ट दिया जाए?" मैंने उन्हीं की बात उन पर डालते हुए कहा| "पर मैं अपनी ख़ुशी से दे रही हूँ!"
"जानता हूँ mam पर मैं इतना महँगा गिफ्ट अभी deserve नहीं करता!" मैंने बात खत्म करना चाहा पर मैडम तो जैसे अड़ ही चुकी थी की वो मुझे गिफ्ट दे कर रहेंगी| "क्या deserve नहीं करता?" उन्होंने गुस्से में मेरा हाथ पकड़ के मुझे एक तरफ खड़ा किया और गुस्से में बोली; "एक लड़का जो पिछले दो दिन से मेरा इतना ख्याल रख रहा है, ट्रैन में मुझे उन लफंगों की गन्दी नजरों से बचाता है! होटल के एक कमरे में मैं नशे में थी फिर भी जिसने मेरा कोई गलत फायदा नहीं उठाया वो ये सूट deserve नहीं करता तो फिर इस दुनिया में chivalry की कोई कीमत ही नहीं है|"
"Mam तो आप मुझे ये सब करने की कीमत दे रहे हो? अभी तो आप ने कहा की हम दोस्त हैं और अभी आप कीमत की बात कर रहे हैं?"
"मेरा वो मतलब नहीं था..... उस टाइम आपने राखी से कहा था ना की आज पता चला की इंसान की जिंदगी में कपड़ों की क्या वैल्यू होती है, मुझे बहुत बुरा लगा|"
"Mam वो...." आगे बोलने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे| मैं बहुत ही गैरतमंद इंसान हूँ और उनसे ऐसा कोई भी तोहफा नहीं लेना चाहता था| शायद वो ये समझ गईं थीं इसलिए वो बोलीं; "अच्छा एक शर्ट तो ले लो?" अब मुझे बुरा लग रहा था की मैं भला कब तक उन्हें ऐसे मना करूँ| "ठीक है पर पैसे मैं दूँगा|"
"अरे ये क्या बात हुई? ठीक है! पसंद मैं करुँगी|" उन्होंने हँसते हुए कहा और मैंने भी और मना नहीं किया| फिर मैडम ने एक नेवी ब्लू कलर की एक शर्ट पसंद की जिसे मैंने उन्हें try करके दिखाया और पैसे मैंने दिए|
शाम के 6 बजने लगे थे तो मैडम ने पावभाजी खाने के लिए कहा| मैं इधर सोच रहा था की ऋतू के लिए क्या खरीदूँ, आखिर मुझे याद आया की उसने एक बार मुझसे डायरी माँगी थी| तो पावभाजी खाने के बाद मैंने एक डायरी ली और मैडम ने मुझे वो डायरी लेते देखा तो खुद को पूछने से खुद को रोक पाईं; "आप शायरी करते हो क्या?" अब मुझे कुछ तो जवाब देना ही था सो मैंने हाँ में सर हिला दिया और ये सुन करते वो मुझसे और भी ज्यादा इम्प्रेस हो गईं| तो एक शेर हमें भी सुनाइए! मैडम की फरमाइश पर मुझे ऋतू की याद आ गई और फिर मुझे घुलम अली जी का एक शेर याद आ गया;
"फासले ऐसे भी होंगे,
ये कभी सोचा ना था.
सामने बैठा था मेरे,
और वो मेरा ना था|"
ये सुनते ही मैडम एक दम से चुप हो गईं और एक पल के लिए मेरे सामने ऋतू का चेहरा आ कर ठहर गया| "आप शायरी इस डायरी में जर्रूर लिखना|" इतना कह कर मैडम ने अपनी चुप्पी तोड़ दी और मैंने भी सोचा की इसे पढ़ कर ऋतू भी खुश हो जाएगी| शायद उसे उसकी बेरुखी भी याद आ जाये! खेर हम थोड़े दूर वहीँ घूमें, मैंने मैडम की कुछ तसवीरें लीं उन्हींके फ़ोन से और फिर खाना खा कर होटल 8 बजे पहुँचे| वहाँ से चेक-आउट किया और स्टेशन पहुँच गए और वहाँ एक बेंच पर बैठ गए| ट्रैन आई और हम अपनी-अपनी बर्थ पर लेट गए| इस बार हमारी टिकट्स कन्फर्म हो गई थीं, नाम वाली दिक्कत अब भी हुई तो फिर मैंने कैसे ना कैसे कर के बात संभाल ली|
आज रात मैं चैन से सोया इस ख़ुशी में की सैटरडे मुझे देख कर ऋतू खुश हो जाएगी| हालाँकि मैडम ने दो बार मुझे उठाया था क्योंकि उन्हें वाशरूम जाना था और मैंने इसका कोई माइंड नहीं किया| अगले दिन आठ बजे मैडम ने मुझे उठाया, फ्रेश हो कर हम ने चाय-नाश्ता किया| सर का फ़ोन आया और मुझे नहीं पता की उनकी क्या बात हुई क्योंकि मैं डायरी में वही शेर लिख रहा था| सर से बात कर के मैडम ने बात शुरू की; "Isn’t it strange, a handsome guy filled with so much of chivalry is single?” उन्होंने chivalry शब्द पर बहुत जोर दे कर कहा| ये सुन कर मेरे मन में जो पहले विचार आया था की शायद मैडम मुझसे प्यार करती हैं, क्यों ना उस विचार का गाला घोट दूँ| मैंने बहुत गंभीर होते हुए कहा; "Mam my village is famous for honor killing! My cousin’s wife was burned alive because of this!” ये सुनते ही मैडम के हालत देखने लायक थी, उनका मुँह खुला का खुला रह गया| उनका हँसता-खेलता हुआ चेहरा मायूस हो गया और तभी उनको याद आय की वो ट्रैन वाला हादसा और जो होटल में हुआ वो; "I….I’m really sorry! That TTE saw us…and…h…how….what are you going to tell them?” उनकी घबराहट उनके चेहरे से झलक रही थी और मैं भी अंदर ही अंदर जानता था की जब ये बात सामने आएगी तो काण्ड होना तय है| क्योंकि कोई भी मेरी बात पर ऐतबार नहीं करता की जो कुछ हुआ उसमें मेरी कोई गलती नहीं थी| मैंने नकली मुस्कराहट अपने चेहरे पर लाते हुए कहा; “Haven’t thought about it! But don’t worry I won’t drag you in that mess!” मैंने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा पर बिलकुल मायूस हो गईं और फिर से गिलटी महसूस करने लगी| अब उस समय मैं अगर ज्यादा कुछ बोलता तो शायद उसका कुछ गलत मतलब निकलता, उन्हें कहीं ये ना लगे की मेरे मन में भी उनके लिए कोई प्यार-व्यार है इसलिए मैं चुप-चाप फिर से लेट गया| पर मैडम बहुत उदास थीं!
अब एक हँसता-खेलता इंसान मेरे कारन गुम-शूम हो गया था और रह-रह कर मैं गिलटी महसूस करने लगा था| "Mam you don’t have to worry, the least punishment I’ll get is either marriage or kicked from home.
And trust me I’m really happy for the later punishment!” मैंने थोड़ा हँसते हुए कहा ताकि उनका कुछ मन हल्का हो पर वो अब भी गुम-सुम थीं| "Mam आपके इस तरह गुम-सुम होने से इसका कोई हल तो निकलेगा नहीं| जब ये बात सामने आएगी तब मैं इसका कोई ना कोई हल निकाल लूँगा|" पर मैडम अब भी चुपचाप थीं, इससे ज्यादा मैं उन्हें कुछ कह नहीं सकता था| पूरा सफर वो इसी तरह गुम-सुम रहीं और मुझसे कोई भी बात नहीं की| रात दो बजे हम स्टेशन पहुँचे और अब वहाँ से घर जाना था| सर कार ले कर हम दोनों को लेने आये और मुझे घर छोड़ा| जब मैं जाने लगा तो मैडम ने मुस्कुराते हुए कहा; "कल की छुट्टी ले लेना, See you on Monday!" ये सुन कर मेरी लाटरी निकल गई और मैंने उन्हें 'Thank you mam' कहा और ऊपर चला गया| सर की उस टाइम जली जर्रूर होगी पर वो कुछ बोले नहीं| बिस्तर पर ऐसे ही पड़ गया और सो गया, अगली सुबह 7 बजे उठ कर तैयार हुआ और ऋतू के कॉलेज के लिए निकल गया| उसके कॉलेज के गेट पर बाइक रोक कर उसका इंतजार करने लगा, जैसे ही उस की नजर मुझ पर पड़ी वो भाग कर आई और मेरे गले लग गई और उसकी आँखों से गंगा-जमुना बहने लगी| "ये तीन मैंने कैसे काटे मैं ही जानती हूँ!" उसने रोते-रोते कहा|
"तीन दिन से मेरे कॉल 'काट' ही तो रही थी|" मैंने उसे छेड़ते हुए कहा| ये सुन कर ऋतू फिर से गुस्सा हो गई पर उसे मानाने के लिए मैंने उसे उसका तौहफा दिया| डायरी देख कर तो वो खुश हो गई और उस पर छापे गेटवे ऑफ़ इंडिया की तस्वीर देख कर वो और भी खुश हो गई| अंदर खोल कर देखा तो दूसरे पैन पर मैंने वही शेर लिखा था जिसे पढ़ कर उसे मेरे दिल के दर्द के बारे में एहसास हुआ पर वो कान पकड़ के माफ़ी माँगने लगी| इतने में उसकी एक सहेली भी आ गई और मुझे देखते ही वो समझ गई की मैं उसका बॉयफ्रेंड हूँ| हालाँकि मैं ये नहीं चाहता था और उम्मीद कर रहा था की ऋतू बोलेगी की मैं उसका चाचा हूँ| पर ऋतू के कुछ कहने से पहले ही वो बोल पड़ी; "ओह! तो ये ही हैं वो जिनकी वजह से तू इतने दिन गुम-सुम थी?" ये सुन कर वो शर्मा गई और मेरी बाजू पर अपना सर रख दिया| "Hi" मैंने इतना कहा और उसने होना हाथ आगे करते हुए कहा; "Myself काम्य|| मैंने उसका हाथ मिलाया और "मानु" कहा| काम्य ने मेरा हाथ बहुत जोर से दबा रखा था और वो हाथ छोड़ ही नहीं रही थी इसे देख ऋतू जल गई और उसने दोनों का हाथ छुड़वा दिया| "हेल्लो मैडम आप जा कर अपने वाले से हाथ मिलाओ|" ये सुन कर हम दोनों हँस पड़े|
"तो चलें?" मैंने ऋतू से कहा तो हैरानी से मेरी तरफ देखने लगी| "क्या कोई जर्रूरी लेक्चर है?" वो खुश हो गई और ना में सर हिलाया और फ़ौरन बाइक पर पीछे बैठ गई| काम्य और जोर से हँसने लगी और फिर बाय बोल कर चली गई| ऋतू हमेशा की तरह मेरी पीठ से चिपक कर बैठ गई, जैसे की तीन दिन से उसका जिस्म बर्फ बन गया था और मेरे बदन की तपिश से वो सारी बर्फ पिघलना चाहती थी| "तो जान! बताओ की जाना कहाँ है?" मैंने उससे पूछा|
"घर और कहाँ?" ऋतू तपाक से बोली| मैं समझ
गया था की उसे घर क्यों जाना था तो मैंने रास्ते से खाने के लिए कुछ पैक करवाया और फिर हम दोनों घर आ गए|
update 19
ऊपर आ कर जैसे ही मैंने दरवाजा बंद किया की ऋतू ने मुझे पीछे से कस कर अपनी बाहों में भर लिया| "हम्म्म्म....आप के बिना इतना दिन मैं अधूरी हो गई थी|" ऋतू ने मेरी पीठ पर कमीज के ऊपर से kiss करते हुए कहा| मैं उसकी तरफ घुमा और उसे गोद में उठा कर पलंग पर लिटाया और जूते उतार के मैं भी उसकी बगल में पाँव ऊपर कर के लेट गया| उसने मेरे बाएं हाथ को अपना तकिया बनाया और मुझसे मुंबई के बारे में सब पूछने लगी| मैंने पहले तो उसे मेरे कॉर्पोरेट वर्ल्ड का एक्सपीरियंस बताया जिसे सुन कर वो दंग रह गई| मेरे बिज़नेस सूट वाली बात पर वो भी मायूस हुई और कहने लगी की जब उसे पहली सैलरी मिलेगी तो वो मुझे ये सूट दिलाएगी| ये सुन कर मुझे उस पर बहुत प्यार आने लगा| वहाँ खींची तसवीरें देख ऋतू का मन वहाँ जाने का कर रहा था और वो कहने लगी की शादी के बाद जब हमारी लाइफ सेटल हो जाएगी तो वो मुंबई मेरे साथ जर्रूर जाएगी| इसी तरह से हम दोनों बातें करते रहे और फिर मैंने सोचा की उसे सच-सच बता दूँ जो भी कुछ हुआ, क्योंकि मैं उससे कुछ भी नहीं छुपाना चाहता था| तो मैंने उसे शुरू से लेकर आखिर तक सारी बात बता दी और ये सब सुनते ही वो छिटक कर मुझसे दूर कड़ी हो गई|
ऋतू: तो इसलिए गए थे ना आप उस मैडम के साथ? (उसने गुस्से में कहा)
मैं: यार मैंने क्या किया? बॉस ने लास्ट मोमेंट पर बोला की उनकी जगह Mam जाएँगी तो मैं क्या करता?
ऋतू: उसकी हिम्मत कैसे हुई आपको छूने की?
मैं: यार कुछ गलत इंटेंशन नहीं था उनका| वो बस....
ऋतू: (मेरी बात काटते हुए) आपको कैसे पता की इंटेंशन सही थी या गलत? और आपक ने उसे खुद को छूने कैसे दिया? (ऋतू ने चीखते हुए कहा|)
मैं: ऋतू बात को समझने की कोशिश कर! वो दोनों लड़के उन्हें घूर-घूर के देख रहे थे! She was scared! वो मुझे trust करती थीं इसलिए उन्होंने सिर्फ मेरी गोद में सर रखा| मैंने उन्हें जरा भी नहीं छुआ?
ऋतू: ये देखने के लिए मैं तो नहीं थी ना? एक होटल में दोनों पति-पत्नी के नाम से रहे रहे थे! आपने उसे जरा भी नहीं कहा की mam आप ये गलत कर रहे हो?
मैं: रात के तीन बज रहे थे, कहीं भी कमरा नहीं मिल रहा था! हर कोई गलत ही सोच रहा था तो ऐसे में उन्हें मजबूरन झूठ लिखना पड़ा| मेरा विश्वास कर उस रात मैं सोफे पर सोया था और वो पलंग पर! हमारे बीच कुछ भी नहीं हुआ था| एक पल भी मेरे मन में कोई गलत विचार नहीं आया! उन्होंने तो मुझे दारु भी ऑफर की पर मैंने सिर्फ इसलिए मना कर दिया क्योंकि मैंने तुमसे वादा किया था|, इतना प्यार करता हूँ तुम से!
ऋतू: मैं कैसे मान लूँ? एक कमरे में एक आदमी और एक औरत हैं और फिर भी उन दोनों के बीच कुछ नहीं हुआ! ये सतयुग है क्या?
मैं: .....
ऋतू: (मेरे कुछ कहने से पहले ही ऋतू बोल पड़ी|) आपको कैसा लगता अगर ये सब मेरे साथ हुआ होता? क्या आप मेरी बात पर भरोसा करते?
मैं: (उसकी आँखों में देखते हुए) हाँ ... मैं तुम्हारी बात का विश्वास करता क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूँ, तुम पर आँख मूँद कर विश्वास करता हूँ|
ऋतू: Well मैं आप पर विश्वास नहीं कर सकती! उस जैसी बाला की खूबसूरत औरत के साथ आप रहे और फिर भी उसे छुआ तक नहीं|
ये सुन कर मेरा दिल बहुत दुख की वो मुझ पर जरा भी भरोसा नहीं करती| पर मैंने जैसे-तैसे खुद को संभाला|
ऋतू: जब मैंने उसे वीडियो कॉल पर देखा था तभी से मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था! मुझे पता था वो आपको मुझसे छीन लेगी| (ये बोलते हुए रोने लगी| मैंने उसके आँसूँ पोछने चाहे तो उसने मेरा हाथ झिटिक दिया|)
मैं: जान मेरी बात को समझो! प्लीज ... प्लीज मेरा विश्वास करो! (मैंने उसके आगे हाथ जोड़े पर उसका उसक पर कोई असर नहीं पड़ा|)
ऋतू: आप एक बात का जवाब दो, जब आपके बॉस ने कहा की मेरी जगह आप मेरी बीवी के साथ चले जाओ तो आप मना नहीं कर सकते थे?
मैं: यार वो बॉस है मेरा, उसका कहा मानने के पैसे मिलते हैं मुझे|
ऋतू: कल को वो कहेगा की उसकी बीवी के साथ सो जाओ तो आप सो जाओगे?
ये सुन कर मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने ऋतू पर हाथ छोड़ दिया|
मैं: बस! अब बहुत हो गया, इतनी देर से मैं मिन्नतें कर रहा हूँ और तुम्हें उस पर विश्वास ही नहीं हो रहा है| मैं चूतिया था जो मैंने तुम्हें सब कुछ बता दिया, ये विश्वास कर के की तुम्हें सच पता होना चाहिए| पर नहीं तुम्हें तो बेकार का बखेड़ा खड़ा करना है?
ऋतू रोने लगी और रोते हुए बोली; "आपके मन में उस के लिए प्यार है, उसकी इज्जत प्यारी है आपको? मेरी कोई वैल्यू नहीं?" इतना कह कर वो रोती हुई चली गई, मैं भी उसके पीछे-पीछे भागा और उसे आवाज दे कर रोकना चाहा पर वो नहीं रुकी और ऑटो कर के चली गई| मुझे उसकी चिंता हुई तो मैंने जल्दी से ऑटो का नंबर नोट किया और घर वापस आ गया| मैं जमीन पर बैठा सोचता रहा की अभी जो कुछ हुआ उसमें मेरी गलती थी क्या? ऋतू को सच बताना गलती थी? या उस दिन मौके का फायदा नहीं उठाना गलती थी? या फिर मैंने ऋतू पर हाथ उठाया, वो गलत था? पर मैंने हाथ इसलिए उठाया क्योंकि अनु मैडम के चरित्र पर ऊँगली उठा रही थी! दिमाग में जैसे उधेड़-बुन शुरू हो गई थी, दिमाग कहता था की तुझे ऋतू को बताने की जर्रूरत नहीं थी| पर दिल कह रहा था की तूने इसलिए बताया क्योंकि आगे चल कर हमारे रिश्ते में कोई गाँठ ना पड़ जाए| ये ऋतू का बचपना है, कुछ देर में शांत हो जायेगा| पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, मैं उसे कॉल करता रहा पर उसने फ़ोन बंद कर दिया| मैंने उसके कॉलेज के चक्कर लगाना शुरू कर दिया पर अब उसने मुझे वहाँ भी इग्नोर करना शुरू कर दिया| एक दिन मैं उसके हॉस्टल भी गया उससे मिलने पर वहाँ भी उसने मुझसे कोई बात नहीं की, बस हाँ-ना में
जवाब देती रही| अब चूँकि वहाँ आंटी जी थीं तो मैं ज्यादा कुछ कह भी नहीं पाया| वो भी उठ कर चली गई ये बहाना कर के उसे असाइनमेंट पूरा करना है| पूरे दो हफ्ते तक ऋतू इसी तरह करती रही, फोन बंद रखती और मैं यहाँ उसे रोज फ़ोन करता इस आस में की शायद अब वो फ़ोन उठा ले! इधर ऑफिस में मैडम अब मुझसे हँसते हुए बात करने लगी थीं, पर सिर्फ तब जब सर नहीं होते थे| मैं उनके सामने बीएस उसी तरह जवाब देता जैसे पहले देता था उससे ज्यादा मैंने कुछ रियेक्ट नहीं किया| जब की मेरे मन का दुःख सिर्फ मैं ही जानता था|
एक दिन मैं ऑफिस मीटिंग में था की तभी कुछ हुआ| ऋतू मेरे ऑफिस आई और उसने जानबूझ कर अनु मैडम से बात शुरू की;
ऋतू: हेल्लो mam!
अनु मैडम: Hi ... सॉरी मैंने आपको पहचाना नहीं!
ऋतू: Actually mam मुझे ये डायरी ट्रैन में मिली| किसी Mr. Manu की डायरी है| इसमें यहाँ का एड्रेस लिखा था तो मैं एड्रेस ढूंढते हुए यहाँ आ गई| (ये एड्रेस उसने खुद ही लिखा था|)
अनु मैडम: ओह! हाँ... ये तो मानु की ही डायरी है| Thank you so much!
ऋतू: Is he your husband?
अनु मैडम: Oh no no no… he works here, he’s in a meeting right now.
ऋतू: I’m really sorry… I didn’t mean to….. sorry!
अनु मैडम: Its okay!
तभी सर ने मैडम को बात करते हुए देख लिए और अंदर बुलाया; "That’s my husband! I…I’m sorry I’ve to go. Why don’t you wait here and we can have a cup of coffee.”
“Oh no..no.. mam I’ve to leave… I’ve to rush back to my hostel.”
“Then please gimme your number, I’ll call you and then we can have a a cup of coffee, my treat!!” और ऋतू ने उन्हें अपना नंबर दिया और मैडम ने उन्हें अपना फ़ोन नंबर दिया| इधर सर हमें नए AS (Accounting Standard) पर ज्ञान दे (चोद) रहे थे| मैडम अंदर आईं और उन्होंने मेरी तरफ डायरी बढ़ा दी| ये वही डायरी थी जो मैंने ऋतू को दी थी! उसे देखते ही मेरे चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी और मैं बाहर जाने को बेचैन हो गया| "Excuse me sir" इतना कह कर मैं बाहर भागा पर वहाँ कोई भी नहीं था| मैं सोचने लगा की अभी हुआ क्या? ये डायरी मैडम तक कैसे पहुँची? अभी मैं ये सोच ही रहा था की मैडम ने पीछे से मेरे कंधे पर हाथ रखा और मेरी उधेड़-बुन समझते हुए उन्होंने मुझे सारी बात बताई|
मैडम की बात सुन कर मुझे बहुत गुस्सा आया की ऋतू यहाँ तक आई सिर्फ डायरी वापस करने! अपना गुस्सा मैं काम पर उतारने लगा और देर रात तक ऑफिस में बैठा रहा| कई बार फ़ोन मिलाया पर ऋतू का फ़ोन बंद ही था| तब मुझे लगा की ऋतू ने मेरा नम्बर ब्लॉक तो नहीं कर दिया, इसलिए मैंने ऑफिस के लैंडलाइन से फ़ोन किया तो इस बार घंटी गई| 5-7 घंटी के बाद उसने फ़ोन उठा लिया; "तो मेरा नंबर ब्लॉक कर रखा था ना?" ये सुन कर वो कुछ नहीं बोली| फिर मन नहीं किया की आगे उसे कुछ कहूं, इसलिए मैंने फ़ोन रख दिया और अपना बैग उठा के चल दिया| घर आया और बिना कुछ खाय-पीये ही सो गया|
update 20
उस रात मुझे बुखार चढ़ गया पर फिर भी सुबह मैं नाहा-धो के ऑफिस निकल गया| पर दोपहर होने तक हालत बहुत ज्यादा ख़राब हो गई, कमजोरी ने हालत बुरी कर दी| मैंने एक चाय पि पर तब भी कोई आराम नहीं मिला, नजाने कैसे पर मैडम को
मेरी ख़राब तबियत दिख गई और वो मेरे पास आईं, मेरे माथे पर हाथ रख उन्हें मेरे जलते हुए शरीर का एहसास हुआ और उन्होंने मुझे डॉक्टर के जाने को बोला| मैं ऑफिस से निकला और बड़ी मुश्किल से घर बाइक चला कर पहुँचा| घर आते ही मैं बिस्तर पर पड़ा और सो गया, रात 8 बजे आँख खुली पर मेरे अंदर की ताक़त खत्म हो चुकी थी| मैंने खाना आर्डर किया ये सोच कर की कुछ खाऊँगा तो ताक़त आएगी पर खाना आने तक मैं फिर सो गया| जब से मैं शहर आ कर पढ़ने लगा था तब से मैं अपना बहुत ध्यान रखता था| जरा सा खाँसी-जुखाम हुआ नहीं की मैं दवाई ले लिया करता था| मैं जानता था की अगर मैं बीमार पड़ गया तो कोई मेरी देखभाल करने वाला नहीं है, पर बीते कुछ दिनों से मैं बहुत मटूस था| ऐसा लगता था जैसे मैं चाहता ही नहीं की मैं ठीक हो जाऊँ| खाना आने के बाद उसे देख कर मन नहीं किया की खाऊँ, दो चम्मच दाल-चावल खाये और फिर बाकी छोड़ दिया और बिस्तर पर पड़ गया| रात दस बजे मैडम का फ़ोन आया और उन्होंने मेरा हाल-चाल पूछा तो मैंने झूठ बोल दिया; "Mam मुझे कुछ दिन की छुट्टी चाहिए ताकि मैं घर चला जाऊँ, यहाँ कोई है नहीं जो मेरी देखभाल करे|" मैडम ने मुझे छुट्टी दे दी और मैं फ़ोन बंद कर के सो गया| वो रात मुझ पर बहुत भारी पड़ी, रात 2 बजे मेरा बुखार 103 पहुँच गया और शरीर जलने लगा| प्यास से गाला सूख रहा था और वहाँ कोई पानी देने वाल भी नहीं था| ऋतू को याद कर के मैं रोने लगा और फिर होश नहीं रहा की मैं कब बेहोश हो गया|
जब चेहरे पर पानी की ठंडी बूंदों का एहसास हुआ तो धीरे-धीरे आँखें खोलीं, इतना आसान काम भी मुझसे नहीं हो रहा था| पलकें अचानक ही बहुत भारी लगने लगी थीं, खिड़की से आ रही रौशनी के कारन मैं ठीक से देख भी नहीं पा रहा था| कुछ लोगों की आवाजें कान में सुनाई दे रही थी जो मेरे आँख खोलने पर खेर मना रहे थे| "उठो ना?" ऋतू ने मुझे हिलाते हुए कहा और तभी उसकी आँख से आँसू का एक कतरा गिरा जो सीधा मेरे हाथ पर पड़ा| अपने प्यार को मैं कैसे रोता हुआ देख सकता था, मैंने उठने की जी तोड़ कोशिश की और बाकी का सहारा ऋतू ने दिया और मुझे दिवार से पीठ लगा कर बिठा दिया| अब जा के मेरी आँखों की रौशनी ठीक हो पाई और मुझे अपने कमरे में 3-4 लोग नजर आये| मेरे मकान मालिक अंकल, उनका लड़का और उनकी बहु और बगल वाले पांडेय जी| मेरे मुँह से बोल नहीं फुट रहे थे क्योंकि गला पूरी तरह से सूख चूका था| ऋतू ने मुझे पीने के लिए पानी दिया और जब गला तर हुआ तो थोड़े शब्द बाहर फूटे; "आप सब यहाँ?"
सुभाष जी (मकान मालिक) बोले; "अरे बेटा तेरी तबियत इतनी ख़राब थी तो तूने हमें बताया क्यों नहीं? ये लड़की भागी-भागी आई और इसने बताया की तू दरवाजा नहीं खोल रहा, पता है हम कितना डर गए थे की कहीं तुझे कुछ हो तो नहीं गया?" अब मुझे सारी बात समझ आ गई, पर हैरानी की बात ये थी की ऋतू यहाँ आई क्यों? पर ऋतू को रोते हुए देख उसपर जो कल तक
गुस्सा आ रहा था वो अब भड़कने लगा था| "चलिए डॉक्टर के|" ऋतू ने सुबकते हुए कहा| मैंने ना में सर हिलाया; "इतनी कोई घबराने की बात नहीं है, दवाई खाऊँगा तो ठीक हो जाऊँगा|" "आपका पूरा बदन बुखार से जल रहा है और आप इसे हलके में ले रहे हैं?" ऋतू ने अपने आँसूँ पोछते हुए कहा| पर मैं अपनी जिद्द पर अड़ा रहा और डॉक्टर के नहीं गया| मैं जानता था की मुझे इस तरह देख कर ऋतू को बहुत दर्द हो रहा था और यही सही तरीका था उसे सबक सिखाने का! मुझ पर भरोसा नहीं करने की कुछ तो सजा मिलनी थी उसे! चूँकि मेरा सर दर्द से फट रहा था तो मैंने उसे चाय बनाने को कहा| चाय बना के वो लाई तो सबने चाय पि पर मेरे लिए वो चाय इतनी बेसुआद थी की क्या बताऊँ! मेरी जीभ का सारा स्वाद मर चूका था, इतना बुखार था मुझे| सब ने मुझे कहा की मैं डॉक्टर के चला जाऊँ पर मैंने कहा की आज की रात देखता हूँ! आखिर सब चले गए और ऋतू मुझे दूर किचन काउंटर से देख रही थी| 1 बजा था तो मैंने उसे हॉस्टल लौटने को कहा पर अब वो जिद्द पर अड़ गई| "जब तक आप ठीक नहीं हो जाते मैं कहीं नहीं जा रही!" उसने हक़ जताते हुए कहा|
"हेल्लो मैडम! आप यहाँ किस हक़ से रुके हो?" मैंने गुस्से से कहा| जो गुस्सा भड़का हुआ था वो अब धीरे-धीरे बाहर आने लगा था|
"आपकी जीवन संगनी होने के रिश्ते से रुकी हूँ!" उसने बड़े गर्व से कहा|
" काहे की जीवन संगनी? जिसे अपने पति पर ही भरोसा नहीं वो काहे की जीवन संगनी?" मैंने एक ही जवाब ने उसका सारा गर्व तोड़ कर चकना चूर कर दिया|
"जानू! प्लीज!" उसने रोते हुए कहा|
"तुम्हारे इस रूखे पन से मैं कितना जला हूँ ये तुम्हें पता है? वो तुम्हारे कॉलेज के बाहर रोज आ कर रुकना इस उम्मीद में की तुम आ कर मेरे सीने से लग जाओगी! अरे गले लग्न तो छोडो तुमने तो एक पल के लिए बात तक नहीं की मुझसे! ऐसे इग्नोर कर दिया जैसे मेरा कोई वजूद ही नहीं है! कैसे की मैं तुम्हारे लिए कोई अनजान आदमी हूँ! मैं पूछता हूँ आखिर ऐसा कौन सा पाप कर दिया था मैंने? तुम्हें सब कुछ सच बताया सिर्फ इसलिए की हमारे रिश्ते में कोई गाँठ न पड़े और तुमने तो वो रिश्ता ही तार-तार कर दिया| जानता हूँ एक पराई औरत के साथ था पर मैंने उसे छुआ तक नहीं, उसके बारे में कोई गलत विचार तक नहीं आया मेरे मन में और जानती हो ये सब इसलिए मुमकिन हुआ क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूँ| पर तुम्हें तो उस प्यार की कोई कदर ही नहीं थी| जब मुंबई गया था तब तुमने एक दिन भी मेरा कॉल उठा कर मुझसे बात नहीं की, सारा टाइम फ़ोन काट देती थी| पिछले दो हफ़्तों से तुम ने मेरा नंबर ब्लॉक कर दिया!!! किस गलती की सजा दे रही थी मुझे?" मेरे शूल से चुभते शब्दों ने ऋतू के कलेजे को छन्नी कर दिया था और वो बिलख-बिलख कर रोने लगी| "I’m …really ….very very….
sorry! मैंने आपको बहुत गलत समझा| ऋतू ने रोते हुए कहा| फिर उसने अपने आँसूँ पोछे और हिम्मत बटोरते हुए कहा; "उस दिन मैं आपके ऑफिस जान बुझ कर आई थी अनु मैडम से मिलना| मुझे देखना था ... जानना था की आखिर उसमें ऐसा क्या है जो मुझ में नहीं! पर उनसे बात कर के मुझे जरा भी नहीं लगा की उनका या आपका कोई चक्कर है! मैंने उनसे पूछा क्या आप उनके पति हो तो उनके चेहरे पर मुझे कोई शिकन या गिल्ट नहीं दिखा| मुझे वो बड़ी सुलझी और सभ्य लगीं, उस दिन मुझे खुद पर गुस्सा आया की मैंने उनके बारे में ऐसा कुछ सोचा| वो तो आपको सिर्फ अपना दोस्त मानती हैं! मुझे बहुत गिलटी हुई की मेरे इस बचपने की वजह से मैंने आपको इतना तड़पाया इतना दुःख दिया| आप चाहते तो वो सब उनके साथ कर सकते थे और मुझे इसकी जरा भी भनक नहीं होती| पर आपने सब सच बताया और यही सोच-सोच कर मैं शर्म से मरी जा रही थी| मुझे माफ़ कर दीजिये! मैं वादा करती हूँ की मैं आज के बाद कभी आप पर शक नहीं करुँगी|”
मैंने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और बिस्तर से उठ के बाथरूम जाने को उठा तो एहसास हुआ की मुझे बहुत कमजोरी है| ऋतू तेजी से मेरे पास आई और मुझे सहारा दे कर उठाने लगी| बाथरूम से वापस भी उसी ने मुझे पलंग तक छोड़ा| मैं लेटा और लेटते ही सो गया और करीब घंटे भर बाद ऋतू ने मुझे खाना खाने को उठाया| "मैं खा लूँगा, तुम हॉस्टल वापस जाओ|" इतना कह के मैं उठ के बैठ गया, पर मेरी बातों से झलक रहे रूखेपन को ऋतू मेहसूस कर रही थी| वो दरवाजे तक गई और दरवाजे की चिटकनी लगा दी और मेरी तरफ देखते हुए अपनी कमर पर दोनों हाथ रख कर कड़ी हो गई; "मैं कहीं नहीं जाने वाली! जब तक आप तंदुरुस्त नहीं हो जाते मैं यहीं रहूँगी, आपके पास!"
"बकवास मत कर! हॉस्टल में क्या बोलेगी की रात भर कहाँ थी और घर पर ये खबर पहुँच गई ना तो तुझे घर बिठा देंगे, फिर भूल जाना पढ़ाई-लिखाई!" ये कहते-कहते मेरे सर में दर्द होने लगा तो मैं अपने दोनों हाथों से अपना सर पकड़ के बैठ गया| मेरा सर झुका हुआ था तो ऋतू मेरे नजदीक आई और मेरी ठुड्डी पकड़ के ऊपर उठाई और बोली; "मैंने आपके फोन से आंटी जी को फ़ोन कर दिया और उन्हें आपकी तबियत के बारे में सब बता दिया| उन्होंने कहा है की मैं यहाँ रुक सकती हूँ|” ये सुनते ही मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने अपनी गर्दन घुमा ली; “तेरा दिमाग ठिकाने है की नहीं?!” मैंने उसे गुस्से से डाँटा पर उसका उस पर कोई असर नहीं पड़ा, वो बस सर झुकाये वहीँ खड़ी रही| "तू क्यों सब कुछ तबाह करने पर तुली है? तुझे यहाँ आने के लिए किसने कहा था? कॉलेज में भी तेरी दोस्त का हमारे रिश्ते के बारे में तूने सब बता दिया और यहाँ भी सब को हमारे बारे में सब पता चल गया है, अब तू हॉस्टल नहीं जाएगी तो वो सब क्या सोचेंगे?" माने उसे समझाया, जो शायद उसके दिमाग में घुसा या फिर वो मुझे मैनिपुलेट करते हुए बोली; "आज आपकी तबियत बहुत
ख़राब है! मुझे बस आज का दिन रुकने दो, कल आपकी तबियत ठीक हो जाएगी तो मैं वापस चली जाऊँगी| प्लीज...." ऋतू ने हाथ जोड़ कर मुझसे मिन्नत करते हुए कहा| अब मैं थोड़ा पिघल गया और उसे रुकने की इजाजत दे दी| वो खुश हो गई और थाली में दाल-चावल परोस के लाई और खुद ही मुझे खिलाने लगी, मैंने मना किया की मैं खा लूँगा पर वो नहीं मानी| पहला कौर खाते ही मुझे एहसास हुआ की खाने में कोई टेस्ट ही नहीं है! बिलकुल बेस्वाद खाना! मेरी शक्ल से ही ऋतू को पता चल गया की खाने में कुछ तो गड़बड़ है तो उसने एक कौर खा के देखा और बोली; "नमक-मिर्च सब तो ठीक है?!" पर मैं समझ गया की बुखार के कारन ही मेरे मुँह से स्वाद चला गया है और इसलिए खाने का मन कतई नहीं हुआ| पर ऋतू ने प्यार से जोर-जबरदस्ती की और मुझे खाना खिला दिया| मैं बस खाने को पानी के साथ लील जाता की कम से कम पेट में चला जाए तो कुछ ताक़त आये|
खाना खा कर ऋतू ने मुझे क्रोसिन दी और मैं फिर से लेट गया और फिर सीधा शाम 5 बजे उठा| बुखार उतरा तो नहीं था बस कम हुआ था, तो मैंने ऋतू से कहा की वो हॉस्टल चली जाए| "आपका बुखार कम हुआ है उतरा नहीं है| रात में फिर से चढ़ गया तो?" उसने चिंता जताते हुए कहा| फिर वो पानी गर्म कर के लाई और उसने मुझे 'स्पंज बाथ' दिया और दूसरे कपडे दिए पहनने को| फिर वही बेस्वाद चाय पि, हम दोनों में अब बातें नहीं हो रही थी| ऋतू बीच-बीच में कुछ बात करती थी पर मैं उसका जवाब हाँ या ना में ही देता था| फिर वो रात का खाना बनाने लगी, पर मेरा मन अब कमरे में कैद होने से उचाट हो रहा था| मैं खिड़की पास खड़ा हो गया और ठंडी हवा का आनंद लेने लगा| ऋतू ने मुझे बैठने को एक कुर्सी दी और कुछ देर बाद वहाँ मोहिनी आ गई|
"अरे मानु जी! क्या हालत बना ली आपने?" उसकी आवाज सुनते ही मैं चौंक कर गया और उसकी तरफ हैरानी से देखने लगा| "दीदी ये तो बेहोश हो गए थे मकान मालिक से डुप्लीकेट चाभी ली और घर खोला तब ....
" ऋतू के आगे बोलने से पहले ही मैं बोल पड़ा; "अब पहले से बेहतर हूँ, वैसे अच्छा हुआ तुम आ गई| जाते समय इसे साथ ले जाना|"
"अरे अभी तो आई हूँ? और आप जाने की बात आकर रहे हो? बड़े रूखे हो गए आप तो? कहाँ गए आपकी chivalry???" मोहिनी मुझे छेड़ते हुए बोली|
"chivalry से तौबा कर ली मैंने! खाया-पीया कुछ नहीं गिलास तोडा बारह आना|" मैंने ऋतू को टोंट मारते हुए कहा| ये सुन कर ऋतू ने मोहिनी से नजर बचा कर कान पकडे और दबे होठों से सॉरी बोला|
"ऐसा क्या होगया की हमारे chivalry के राजा ने तौबा कर ली? बैठ इधर ऋतू मैं तुझे एक किस्सा सुनाऊँ| बात तब की है जब हम दोनों कॉलेज में थे, पढ़ाई में मैं जीरो थी हाँ उसके आलावा कल्चरल प्रोग्राम में मैं हमेशा आगे रहती थी| बाकी सारे सब्जेक्ट्स तो मैं जैसे-तैसे संभाल लेती पर एकाउंट्स मेरे सर के ऊपर से जाता था और तुम्हारे चहु ठहरे एकाउंट्स के महारथी| मेरी माँ ने इन्हें मुझे पढ़ाने के लिए बोला वो भी घर आ कर| तो जनाब हमेशा मुझे 2 फुट की दूरी से पढ़ाते थे| ऐसा नहीं था की माँ का डर था बल्कि वो तो ज्यादातर बहार ही होती थीं पर मजाल है की कभी इन्होने वो दो फुट की दूरी बाल भर भी कम की हो! अब मुझे इनके मज़े लेने होते थे तो मैं जानबूझ कर कभी-कभी इनके नजदीक खिसक कर बैठ जाती और ये एक दम से पीछे सरक जाते| इनकी मेरे नजदीक आने से इतनी फटती थी की पूछ मत! पूरे कॉलेज को पता था की जनाब मुझे पढ़ाते हैं और वो सब पता नहीं क्या-क्या बोलते थे इन्हें| कइयों ने इन्हें चढ़ाया की आज तू मोहिनी का हाथ पकड़ ले और बोल दे उसे की तू उससे प्यार करता है, उसे मिनट नहीं लगेगा पिघलने में पर आज तक इन्होने कभी मुझसे कुछ नहीं कहा|"
ऋतू ये सब सुन कर हैरान थी क्योंकि मैंने उसे ये सब कभी नहीं बताया था, पर ये सुनने के बाद उसे बहुत बुरा लग रहा था की क्यों उसने मुझे पर शक किया| खेर चाय पीना और कुछ गप्पें मारने के बाद मोहिनी हँसती हुई बोली; "चलो आपके बीमार पड़ने से एक तो बात अच्छी हुई, की इसी बहाने पता तो चल गया की आप रहते कहाँ हो?! अब तो आना-जाना लगा रहेगा|"
"अगर एक बार पूछ लेते तो मैं वैसे ही बता देता|" मैंने भी हँसते हुए बता दिया|
"अच्छा जी? चलो आगे से ध्यान रखूँगी| चल भई रितिका?"
"दीदी प्लीज मैं आज यहीं रुक जाऊँ? अभी बुखार सिर्फ कम हुआ है उतरा नहीं है, रात को तबियत ख़राब हो गई तो कौन यहाँ देखने वाला?" ऋतू ने मिन्नत करते हुए कहा|
"कोई जर्रूरत नहीं है, मैं ठीक हूँ|" मैंने उसी रूखेपन से जवाब दिया|
"कोई बात नहीं तू रुक जा यहाँ|" मोहिनी ने ऋतू के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा| फिर मेरी तरफ देख कर बोली; "आप ना ज्यादा उड़ो मत! वरना मैं भी यहीं रुक जाऊँगी| वैसे भी अब तो आपने chivalry से तौबा कर ही ली है, तो अब तो कोई दिक्कत नहीं होगी आपको?!" मोहिनी ने मुझे छेड़ते हुए कहा|
"यार आप अब भी नहीं सुधरे!" मैंने हँसते हुए कहा|
"जो सुधर जाए वो मोहिनी थोड़े
ही है|" इतना कह कर वो मुस्कुराते हुए चली गई| ये सब सुन कर अब तो जैसे ऋतू के मन में प्यार का सागर उमड़ पड़ा| उसने बड़े प्यार से खाना बनाया पर नाक बंद थी और जो थोड़ी-बहुत खुशबु मैं सूँघ पाया उससे लगा की खाना जबरदस्त बना होगा, पर जब ऋतू ने मुझे पहला कौर खिलाया तो वही बेस्वाद! जैसे -तैसे खाना निगल लिया और फिर ऋतू को खाने के लिए बोला| वो अपना खाना ले कर मेरे सामने बैठ गई और खाने लगी| खाने के बाद उसने मुझे फिर से क्रोसिन दी और हम दोनों लेट गए| रात के 1 बजे मुझे फिर से बुखार चढ़ गया और मैं बुरी तरह कँप-कँपाने लगा| ऋतू शायद जाग रही थी तो उसने मेरी कँप-कँपी सुनी और तुरंत लाइट जलाई और उठ कर मुझे पीठ के बल लिटाया| जैसे ही उसने मेरे माथे को छुआ तो वो चीख पड़ी; "हाय राम! अ...अ....आपका बदन तो भट्टी की तरह जल रहा है!" सबसे पहले उसने मुझे थोड़ा बिठाया और एक क्रोसिन की गोली दी फिर उसने आननफानन में सारी चादरें उठाई और एक-एक कर मुझ पर डाल दी| पर मैं अब भी काँप रहा था, ऋतू की आँखों से आँसूँ बहने लगे और जोर-जोर से मेरे हाथ और पाँव मलने लगी| जब उसे कुछ और नहीं सुझा तो वो उठी और आ कर मेरी बगल में लेट गई और मुझे उसने अपनी तरफ करवट करने को कहा| उसने मेरा मुँह अपनी छाती में दबा दिया और खुद मुझसे इस कदर लिपट गई जैसे की कोई जंगली बेल किसी पेड़ से लिपट जाती है| मैंने भी उसे कस कर जकड लिया और अपने ऊपर भी उसने वो चादरें डाल ली और मेरी पीठ रगड़ने लगी| उसकी सांसें तेज चलने लगी थी, वो घबरा रही थी की कहीं मैं मर गया तो? उसने बुदबुदाते हुए कहा; "मैं आपको कुछ नहीं होने दूँगी| प्लीज.....प्लीज...
मुझे छोड़ कर मत जाना| आपके बिना मेरा कौन है? कैसे जीऊँगी मैं?" करीब एक घंटा लगा मेरे जिस्म पर दवाई का असर होने में और मेरी कँप-कँपी थम गई| ऋतू के सारे कपडे मेरे माथे और उसके जिस्म के पसीने से भीग चुके थे! धीरे-धीरे हम दोनों इसी तरह एक दूसरे की बाहों में सो गए| सुबह पाँच बजे मेरी आँख खुली और मैंने खुद को उसकी गिरफ्त से धीरे से छुड़ाया और उसके मस्तक पर चूमा| बुखार अब कम था पर मेरे होठों के एहसास से ऋतू जाग गई और मुझे जागता हुआ पा कर मेरी आँखों में देखते हुए पूछा; "अब आपकी तबियत कैसी है?" माने मुस्कुरा कर हाँ में गर्दन हिलाई और वो समझ गई की मैं ठीक हूँ| उसने मेरा माथा छुआ तो घबरा गई और बोली; "बुखार खत्म नहीं हुआ आपका! आज आपको मेरे साथ डॉक्टर के चलना होगा|" मैंने जवाब में बस हाँ कहा| कल तक मुझे जो गुस्सा ऋतू पर आ रहा था वो अब प्यार में बदल गया था| अब मैं उससे अब अच्छे से बात आकर रहा था और वो भी अब पहले की तरह खुश थी| नाश्ता कर के वो मेरे साथ हॉस्पिटल के लिए निकली पर मेरे जिस्म में ताक़त कम थी तो नीचे आ कर हमने फ़ौरन ऑटो किया और हॉस्पिटल पहुँचा| डॉक्टर ने चेक-अप किया और डेंगू का टेस्ट कराने को कहा| ये सुनते ही ऋतू बहुत घबरा गई, मानो की जैसे डॉक्टर ने कहा हो की मुझे कैंसर है| खेर ब्लड सैंपल देने के टाइम जब नर्स ने सुई लगाईं तो ऋतू से वो भी नहीं देखा गया और मुझे होने वाला उसके चेहरे पर दिखने लगा, उसका बचपना देख नर्स भी हँस पड़ी| खेर हम दवाई ले कर घर लौटे और रिपोर्ट कल सुबह आने वाली थी|
update 21
ऋतू बहुत घबराई हुई थी और मुझे उसकी घबराहट दूर करनी थी; "जान!" इतना सुनना था की वो भागती हुई आई और मेरे सीने से लग गई और फफक का करो पड़ी| "कान तरस गए थे आपके मुँह से ये सुनने को|" उसने रोते हुए कहा| "आपको कुछ हो जाता तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं करती| प्लीज मुझे माफ़ कर दो!" मैंने उसके सर को चूमा और उसे कस के अपनी छाती से चिपका लिया, तब जा कर उसका रोना कम हुआ| तभी अनु मैडम का फ़ोन बज उठा और फ़ोन ऋतू के हाथ के पास था और उसी ने मुझे फ़ोन उठा कर दिया| पर इस बार उसके मुँह पर जलन या कोई दुःख नहीं था| मैडम ने मेरा हालचाल पूछा पर मैंने उन्हें ये नहीं बताया की मैं यहीं शहर में हूँ वरना वो घर आती और फिर ऋतू को देख के हजार सवाल पूछती| जब उन्हें पता चला की मुझे डेंगू होने के चांस हैं तो वो भी घबरा गईं पर मैंने उन्हें ये झूठ बोल दिया की यहाँ सब परिवार वाले हैं मेरी देख-रेख करने को! ऋतू ये सब बड़ी गौर से सुन रही थी और जैसे ही मेरी बात खत्म हुई तो उसने पूछा की मैंने झूठ क्यों बोला; "mam यहाँ आ जाती तो तुम कहाँ छुपती?" ये सुन कर ऋतू को समझ आ गया और वो कुछ खाने के लिए बनाने लगी| फिर आस-पडोसी भी आये और मेरा हाल-चाल पूछने लगे| सुभाष जी तो ऋतू की तारीफ करते नहीं थक रहे थे!
भाई ऐसा जीवन साथी तो बड़ी मुश्किल से मिलता है,
जो लड़की शादी से पहले इतना ख्याल रखती हो वो भला शादी के बाद कितना ख्याल रखेगी?! ये सुन ऋतू के गाल शर्म से लाल हो गए|
"तुम दोनों जल्दी से शादी कर लो इसी बहाने बिल्डिंग में थोड़ी रौनक बनी रहेगी|" पांडेय जी ने कहा|
"जी अभी पहले ये अपनी पढ़ाई तो पूरी कर ले!" माने मुस्कुरा कर जवाब दिया तो ऋतू ने भाभी के कंधे पर अपना मुँह छुपा लिया, ये देख सब हँस पड़े| चाय पी कर सब गए तो ऋतू ने खाना बनाया और खुद अपने हाथ से मुझे खिलाया और आज तो मैंने भी उसे अपने हाथ से खिलाया| खाना खा कर ऋतू ने मुझे अपना सर उसकी गोद में रख कर लेटने को कहा| थोड़ी देर बाद दोनों की आँख लग गई और फिर जब मैं उठा तो ऋतू चाय बना के लाइ| चाय की चुस्की लेते हुए मैंने अपनी चिंता उस पर जाहिर की;
मैं: ऋतू....चीजें वैसे नहीं हो रही जैसी होनी चाहिए!
ऋतू: क्यों?? क्या हुआ?
मैं: मैं चाहता था की हमारा प्यार एक राज़ रहे तब तक जब तक की तुम अपने फाइनल ईयर के पेपर नहीं दे देती| पर यहाँ तो सबको पता चल चूका है!
ऋतू: कल जब मैं आपसे मिलने आई तो मैं 20 मिनट तक आपका दरवाजा खटखटाती रही, आपको दसियों दफा कॉल किया पर आप ने कोई जवाब ही नहीं दिया| मेरा मन अंदर से कितना घबरा रहा था ये आप सोच भी नहीं सकते! कलेजा मुँह को आ गया था, लगता था की हमारा साथ छूट गया और वो भी सिर्फ मेरी वजह से! मैंने हार कर पड़ोसियों से पूछा तो उन्होंने कहा की मकान मालिक के पास डुप्लीकेट चाभी है| मैंने उनसे ये कहा की मैं आपकी मंगेतर हूँ और आपसे मिलने आई हूँ, तब जा कर उन्हें मेरी बात का भरोसा हुआ| कॉलेज में मेरी सिर्फ और सिर्फ एक दोस्त है काम्या, वो भी आपके बारे में ज्यादा नहीं जानती| मैंने उसे बीएस इतना बताया की आप एक ऑफिस में जॉब करते हो, इससे ज्यादा जब भी वो पूछती है तो मैं बात टाल जाती हूँ| उस दिन सूमो भय भी शायद जान या समझ चुके हों, क्योंकि उनका भाई तो अब हमारे कॉलेज में नहीं पढता| हॉस्टल में मैं किसी से ज्यादा बात नहीं करती, जी लगा कर पढ़ती हूँ तो इसलिए किसी को हमारे रिश्ते के बारे में भनक तक नहीं| हम एक समाज में रहते हैं, अब मिलेंगे तो लोग देखेंगे ही और बिना मिले तो मैं आपसे रह नहीं सकती!
मैं: और तुम्हारी पढ़ाई का क्या?
ऋतू: आपसे किया वादा मुझे याद है!
ये सुन कर मैं थोड़ा निश्चिन्त हुआ पर फिर भी एक डर तो था की अगर बात खुल गई तो ऋतू की पढ़ाई ख़राब हो जाएगी, पर फिर सोचा की जो होगा देखा जायेगा! वो रात बड़े प्यार से बीती, सोने के समय आज भी ऋतू ने मुझे कल की तरह अपने सीने से चिपका लिया और गहरी सांसें लेते हुए सो गई| मैं समझ रहा था की मेरे इतने करीब होने से उसके जिस्म में क्या उथल-पुथल मची हुई है पर मैं अभी इतना स्वस्थ नहीं हुआ था की उसके साथ सेक्स कर सकूँ! आज दो बार दवाई लेने से ये फायदा हुआ था की अब बुखार नहीं था, बॉडी अब भी रिकवर कर रही थी| अगले दिन रिपोर्ट आई और
हुआ भी वही जो डॉक्टर ने कहा था| डेंगू! डॉक्टर ने खूब साड़ी दवाइयाँ लिख दी, बुखार रोकने से ले कर मल्टी विटामिन तक! गोलियां भी रिवाल्वर के कारतूस के साइज की! अगले तीन दिन तक ऋतू ने मेरी बहुत देखभाल की और मेरे कई बार उसे हॉस्टल जाने के आग्रह करने के बाद भी उसने मेरी बात नहीं मानी| बुखार अब नहीं था पर कमजोरी बहुत थी मेरा प्लेटलेट काउंट काफी गिर चूका था, ये तो ऋतू 4 टाइम खाना बना कर मुझे खिला रही थी तो ज्यादा घबराने वाली बात नहीं थी| रात में सोने के समय रोज ऋतू मुझे अपने सीने से चिपका कर सोती, रोज रात को मेरी आँखों के सामने उसके स्तनों की घाटी होती और सुबह आँख खुलते ही मुझे फिर वही घाटी दिखती|
मोहिनी भी मुझे से मिलने रोज आई और अपने साथ फ्रूट्स लाती और वही हँसी-मज़ाक चलता रहा| तीसरे दिन तो आंटी जी भी आ गईं और उन्होंने भी ऋतू की बहुत तारीफ की; "भाई भतीजी हो तो ऋतू जैसी की अपने चाचा का इतना ख़याल रखती है|" ये सुन कर ऋतू को उतना अच्छा नहीं लगा जितना सुभाष अंकल की तारीफ करने से हुई थी| अब उन्होंने तो ऋतू को मेरी मंगेतर माना था और आंटी जी ने उसे भतीजी! "माँ सेवा करेगी ही, इसके चाचू ने भी इसका कम ख्याल रखा है? स्कूल से लेकर एक ये ही तो हैं जो इसे पढ़ा रहे हैं|" मोहिनी की बात सुन कर ऋतू खुद को बोलने से नहीं रोक पाई; "आंटी जी घर में सिर्फ और सिर्फ ये ही हैं जिन्होंने मुझे बचपन से लेकर अब तक पढ़ाया है| दसवीं और बारहवीं मैं इन्हीं की वजह से पढ़ पाई वरना घरवाले तो सब पीछे पड़े थे की ब्याह कर ले|"
नोट करने वाली बात ये थी की ऋतू ने मुझे एक बार भी 'चाचू' नहीं बोला था और मैं ये बात समझ चूका था पर डर रहा था की आंटी ये बात पकड़ न लें| शुक्र है की उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया! उनके जाने के बाद मुझे ध्यान आया की घर में मेरी तबियत के बारे में किसी को पता है या नहीं? क्या ऋतू ने किसी को बताया?
"ऋतू, तूने घर में फ़ोन किया था?" मैंने ऋतू से घबराते हुए पूछा|
"नहीं... मुझे याद नहीं रहा|" ऋतू का जवाब सुन कर मैं गंभीर हो गया| मैंने तुरंत फ़ोन घर मिला दिया ये जानने के लिए की कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं है? पर शुक्र है की कोई घबराने की बात नहीं थी| मैं ने राहत की साँस ली और ऋतू को बताया की आगे से ये बात कभी मत भूलना| मुझे जर्रूर याद दिला देना वरना वो लोग अगर हॉस्टल पहुँच गए तो बखेड़ा खड़ा हो जायेगा| उसने हाँ में सर हिलाया उसने भी चैन की साँस ली| आज रात सोने के समय भी उसने ठीक वही किया, मेरा सर अपने सीने से लगा कर वो लेट गई| मैं इतने दिनों से उसके जिस्म की गर्मी को महसूस कर पा रहा था, पर मजबूर था की कुछ कर नहीं सकता था| आज मैंने ठान लिया था की इतने दिनों से ऋतू मेरी तीमारदारी में लगी है तो उसे थोड़ा खुश करना तो बनता है| मैंने ऋतू के स्तनों की घाटी को अपने होठों से चूमा तो उसकी सिसकारी फुट पड़ी; "ससससस...अ..ह.
..हह" और वो हैरत से मेरी तरफ देखने लगी| मुझे ऐसा लगा जैसे वो मुझसे मिन्नत कर रही हो की मैं उसकी इस आग का कुछ करूँ| मैंने थोड़ा ऊपर आते हुए उसके गुलाबी होठों को चूम लिया, आगे मेरे कुछ करने से पहले ही ऋतू के अंदर की आग प्रगाढ़ रूप धारण कर चुकी थी| उसने गप्प से अपने होठों और जीभ के साथ मेरे होठों पर हमला कर दिया| उसकी जीभ अपने आप ही मेरे मुँह में घुस गई और मेरी जीभ से लड़ने लगी| मैंने भी अपने दोनों हाथों से उसके चेहरे को थामा और अपने होठों से उसके निचले होंठ को मुँह में भर चूसने लगा| ये मेरा सबसे मन पसंद होंठ था और मैं हमेशा उसके नीचले होंठ को ही सबसे ज्यादा चूसता था| दो मिनट तक मैं बीएस उसके निचले होंठ को चुस्त रहा और जब जी भर गया तो अपनी जीभ और निचले होठ की मदद से उसके ऊपर वाले होंठ को मुँह में भर के चूसने लगा| जीभ से मैं उसके ऊपर वाले मसूड़ों को भी छेड़ दिया करता| इधर ऋतू के हाथों ने अपनी हरकतें शुरू कर दी, सबसे पहले तो वो मेरी टी-शर्ट को उतारने की जद्दोजहद करने लगे| पर मैंने अपने हाथों से उसे रोक दिया और वापस उसके चेहरे को थाम लिया और अपनी जीभ और होठों से उसके होठों को बारी-बारी चुस्त रहा| ऋतू को इसमें बहुत मजा आ रहा था पर उसे चाहिए था मेरा लंड, जो मैं उसे दे नहीं सकता था! मैंने उसके होठों को चूसना रोका और उसके चेहरे को थामे हुए ही कहा; "अपना पाजामा निकाल और जो मैं कह रहा हूँ वो करती जा|" मेरी बात सुन उसने लेटे-लेटे अपनी पजामी का नाडा खोल दिया और उसे अपनी गांड से नीचे करते हुए उतार फेंक दिया और बेसब्री से मेरे अगले आदेश का इंतजार करने लगी| मैं सीधा लेट गया, पीठ के बल उसे और मेरे दोनों तरफ टांग कर के मेरे पेट पर बैठने को कहा| ऋतू तुरंत उठ कर वैसे ही बैठ गई, फिर मैंने उसके कूल्हों पर अपना हाथ रखा और उसे धीरे-धीरे सरक कर मेरे सर की तरफ आने को कहा| वो भी धीरे-धीरे कर के ठीक मेरे मुँह के ऊपर आ कर उकडून हो कर बैठ गई| कमरे में अँधेरा था इसलिए न तो मैं और न वो मेरी शक्ल और भावों को देख पा रही थे| जैसे ही मेरी जीभ ने उसकी बुर के कपालों को छुआ तो वो चिंहुँक उठी और ऊपर की ओर हवा में उचक गई|
मैंने उसकी जनघ पर हाथ रख कर उसे मेरे मुँह पर बैठने को कहा और तब जा कर वो नीचे वापस मेरे मुँह पर बैठ गई| मैंने अपने हाथों से उसकी जांघों को पकड़ लिया ताकि वो और न उचक जाए| मैंने फिर से ऋतू के बुर के कपालों को जीभ से छेड़ा पर इस बार वो ऊपर नहीं उचकी| अब मैंने अपने होठों से उन कपालों को पकड़ लिया और नीचे की तरफ खींचने लगा, ऋतू को हो रहे मीठे दर्द के कारन उसके मुँह से 'आह' निकल गई| उसने अपने दोनों हाथों से मेरे सर को थाम लिया और दबाव देकर अपने बुर को मेरे मुँह पर रगड़ना चाहा" पर मैंने उसे ऐसा करने से रोक दिया, अपने दोनों हाथों को मैं उसकी जांघ से हटा कर उसके बुर के इर्द-गिर्द इस कदर सेट
किया की मेरे दोनों हाथों के बीच उसकी बुर थी| ऋतू का उतावलापन बढ़ने लगा था और मैं उसे रो रहा था ताकि वो ज्यादा से ज्यादा मजा ले सके| मैंने ऋतू के कपालों को होठ से चूसना शुरू कर दिया था और इधर ऋतू अपनी कमर मटका रही थी ताकि वो अपनी बुर को और अंदर मेरे मुँह में घुसा दे!
मैंने जितना हो सके उतना अपना मुँह खोला, ऋतू की बुर को जितना मुँह में भर सकता था उतना मुँह में भरा और अपनी जीभ उसके बुर में घुसा दी| मेरी जीभ उसके बुर के कपालों के बीच से अपना रास्ता बना कर जितना अंदर जा सकती थी उतना चली गई| "स्स्स्सस्स्स्स...आअह्ह्ह्हह" इस आवाज के साथ ऋतू ने मेरी जीभ का अपनी बुर में स्वागत किया| मैंने अपनी जीभ अंदर-बाहर करनी शुरू कर दी और इधर ऋतू बेकाबू होने लगी| उसने अपनी कमर इधर-उधर मटकाना शुरू कर दी और अपने हाथों से मेरे सर के बाल पकड़ के खींचने लगी| इधर मेरी जीभ अंदर-बहार हो रही थी और उधर ऋतू ने अपनी कमर को आगे-पीछे हिलाना शुरू कर दिया| हम दोनों एक ऐसे पॉइंट पर पहुँच गए जहाँ मेरी जीभ और ऋतू की कमर लय बद्ध तर्रेके से आगे-पीछे हो रहे थे| 5-7 मिनट और ऋतू की बुर से रस निकल पड़ा जो मेरे मुँह में भरने लगा| ऋतू ने अपनी दोनों टांगें चौड़ी की और अपने बुर को मेरे मुँह पर दबा दिया और सारा रस मेरे मुँह में उतर गया| अपना सारा रस मुझे पिला कर वो नीचे खिसकी और अपनी बुर को ठीक मेरे लंड पर रख कर वो मेरे ऊपर लुढ़क गई| उसकी सांसें तेज हो चुकी थी और पसीनों की बूंदों ने उसके मस्तक पर बहना शुरू कर दिया था| दस मिनट बाद जब उसकी सांसें नार्मल हुई तो वो बोली; "Thank You!!!" मैंने उसके मस्तक को चूम लिया और उसे अपनी बाहों में भर लिया| उसके बाद तो ऋतू को बड़ी चैन की नींद आई, ऐसी नींद की वो सारी रात मेरी छाती पर सर रख कर ही सोई| सुबह मैंने ही उसे जगाया वो भी उसके सर को चूम कर|
update 22
"हाय! क्या शुरुवात हुई है सुबह की!" ऋतू ने मेरी छाती पर लेटे हुए ही अंगड़ाई लेते हुए कहा| फिर वो उठी और उसकी नजर अपनी पजामी पर पड़ी जो फर्श पर पड़ी थी| उसने वो उठा कर पहना और बाथरूम में नहाने चली गई| मोहिनी ने उसके कुछ कपडे ला दिए थे जिन्हें पहन कर ऋतू बाहर आई| आज तो मेरा भी मन नहाने का था पर ठन्डे पानी से नहाने के बजाये आज मुझे गर्म पानी मिला नहाने को| जब मैं नहा कर बाहर निकला तो ऋतू गुम-शूम दिखी, मैंने उसे हमेशा की तरह पीछे से पकड़ लिया और अपने हाथ को उसके पेट पर लॉक कर दिया|
मैं: क्या हुआ मेरी जानेमन को?
ऋतू: मैं बहुत सेल्फिश हूँ!
मैं: क्यों? ऐसा क्या किया तुमने?
ऋतू: कल रात को..... आपने तो मुझे सटिस्फाय कर दिया.... पर मैंने नहीं.... (ऋतू ने शर्माते हुए कहा|)
मैं: अरे तो क्या हुआ? दिन भर मेरा ख्याल रखती हो, तक गई थी इसलिए सो गई| इसमें मायूस होने की क्या बात है?
ऋतू: नहीं... मैं....
मैं: पागल मत बन! अभी मेरी तबियत पूरी तरह ठीक नहीं है, जब ठीक हो जाऊँगा ना तब जितना चाहे उतना सटिस्फाय कर लेना मुझे!
मैंने उसे छेड़ते हुए कहा और ऋतू भी हँस पड़ी|
मैं: तू इतने दिनों से कॉलेज नहीं जा रही है, तेरी पढ़ाई का नुक्सान हो रहा होगा इसलिए कल से कॉलेज जाना शुरू कर|
ऋतू: आप पढ़ाई की चिंता मत करो! मैं सारा कवर-अप कर लूँगी!
मैं: ऋतू... बात को समझा कर! तकरीबन एक हफ्ता होने को आया है, आंटी जी और मोहिनी क्या सोचते होंगे? मेरी बात मान और कल से कॉलेज जाना शुरू कर और मेरी चिंता मत कर मैं घर चला जाता हूँ| वैसे भी पिताजी को मेरी तबियत के बारे में कुछ मालूम नहीं है, ऐसे में कुछ दिन वहाँ रुकूँगा तो बात बिगड़ेगी नहीं|
ऋतू ने बहुत ना-नुकुर की पर मैंने उसे मना ही लिया| शाम को जब मोहिनी आई तो मैंने उसे ऋतू को साथ ले जाने को कहा;
मोहिनी: अरे ऋतू चली गई तो आपका ध्यान कौन रखेगा?
मैं: मैं कल सुबह घर जा रहा हूँ वहाँ सब लोग हैं मेरा ख्याल रखने को| मैं तो संडे ही निकल जाता पर तबियत बहुत ज्यादा ख़राब थी!
खेर ऋतू अपना मन मारकर चली गई और उसने जो खाना बनाया था वही खा कर मैं सो गया| पिताजी को फ़ोन कर दिया था और वो मुझे लेने बस स्टैंड आ रहे थे| 4 घंटों का थकावट भरा सफर क्र मैं गाँव के बस स्टैंड पहुँचा जहाँ पिताजी पहले से ही मौजूद थे| उन्हें नहीं पता था की मेरी तबियत इतनी खराब है की बस स्टैंड से घर तक का रास्ता जो की 15 मिनट का था उसे मैंने 5 बार रुक-रुक कर आधे घंटे में तय किया| घर जाते ही मैं बिस्तर पर जा गिरा|
कमजोरी इतनी थी की बयान करना मुश्किल था, ऋतू ने मुझे शाम को फ़ोन किया पर मैं दपहर को खाना खा कर सो रहा था| मेरे फ़ोन ना उठाने से वो बहुत परेशान हो गई और धड़ाधड़ मैसेज करने लगी, पर डाटा बंद था इसलिए मैसेज भी seen नहीं थे| वो बेचैन होने लगी और दुआ करने लगी की मैं ठीक-ठाक हूँ| रात को आठ बजे मैं उठा तब मैंने फ़ोन देखा और फटाफट ऋतू को फ़ोन किया| "मैंने कहा था न की मैं आपकी देखभाल करुँगी, पर आपने जबरदस्ती मुझे खुद से दूर कर दिया! देखो आपकी तबियत कितनी ख़राब हो गई! आपने फ़ोन नहीं उठाया तो मैंने मजबूरन घर फ़ोन किया और तब मुझे पता चला की आपकी कमजोरी और बढ़ गई है!" ऋतू ने रोते-रोते खुसफुसाते हुए कहा|
"जान! मैं ठीक हूँ! उस टाइम थकावट हो गई थी, पर अब खाना खा कर दवाई ले चूका हूँ| तुम मेरी चिंता मत करो!" मैंने उसे तसल्ली देते हुए कहा|
"आपने जान निकाल दी थी मेरी! जल्दी से ऑनलाइन आओ मुझे आपको देखना है!" इतना कह कर ऋतू ने फ़ोन रख दिया और मैंने अपने हेडफोन्स लगाए और ऑनलाइन आ गया| ऋतू हमेशा की तरह बाथरूम में हेडफोन्स लगाए हुए मुझसे वीडियो कॉल पर बात करने लगी| बहुत सारे kisses मुझे दे कर उसे चैन आया और फिर रात को चाट करने के लिए बोल कर चली गई| रात दस नाज़े से वो मेरे साथ चाट पर लग गई और 12 बजे मैंने ही उसे सोने को कहा
ताकि उसकी नींद पूरी हो| इधर मैं फ़ोन रख कर सोने लगा की तभी मूत आ गया| मैंने सोचा बजाये नीचे जाने के क्यों न छत पर ही चला जाऊँ| जब मैं छोटा था तो कभी-कभी रात को छत की मुंडेर पर खड़ा हो जाता और अपने पेशाब की धार नीचे गिराता| यही बचपना मुझे याद आ गया तो मैं भी मुस्कुराते हुए छत पर आ गया और अपना लंड निकाल कर मुंडेर पर चढ़ गया और मूतने लगा| जब मूत लिया तो मैं पीछे घुमा और वहाँ जो खड़ा था उसे देखते ही मेरी सिट्टी-पिट्टी गुल हो गई|
पीछे भाभी खड़ी थी और उनकी नजर मेरा लंड पर टिकी थी| जब मेरी नजरें उनकी नजरों का पीछा करते हुए मेरे ही लंड तक आई तो मैंने फट से लंड पाजामे में डाला और मुंडेर से नीचे आ गया| मैं बुरी तरह से झेंप गया था और वापस अपने कमरे की तरफ जा रहा था| इतने में पीछे से भाभी बोली; "मुझे तो लगा था की तुम आत्महत्या करने जा रहे हो, पर तुम तो मूत रहे थे! बचपना गया नहीं तुम्हारा देवर जी!" ये सुन कर मैं एक पल को रुका पर पलटा नहीं और सीधा आँगन में आ गया, हाथ-मुँह धोया और वापस कमरे में जाने लगा की तभी भाभी ऋतू वाले कमरे के बाहर अपनी कमर पर हाथ रखे मेरा इंतजार कर रही थी| "तन से तो जवान हो गए, पर मन से अब भी बच्चे हो!| उन्होंने हँसते हुए कहा| मैं अब भी शर्मा रहा था तो सर झुका कर अपने कमरे में घुस गया और वो ऋतू वाले कमरे में घुस गईं| लेटते ही मुझे ऋतू की वो बात याद आई जिसमें भाभी मेरे बारे में सोच के नींद में मेरा नाम बड़बड़ा रही थी| आज उन्होंने ने जिस तरह से मुझे 'देवर जी' कहा था वो भी बहुत कामुक था! मैं सचेत हो चूका था और मेरा मन भाभी के जिस्म की प्यास को महसूस करने लगा था, पर ऋतू का प्यार मुझे गलत रास्ते में भटकने नहीं दे रहा था| अगले कुछ दिन तक भाभी मेरे साथ यही आँख में चोली का खेल खेलती रही और सबकी नजरें बचा कर मुझे अपने जिस्म की नुमाइश आकृति रही| जब भी मैं अपने कमरे में अकेला होता तो वो झाड़ू लगाने के बहाने आती और अपने पल्लू को अपने स्तनों पर से हटा के अपनी कमर से लपेट लेती| उसके स्तनों की वो घाटी इतनी गहरी थी जिसका अंदाजा लगाना मुश्किल था| भाभी की 44D साइज की छातियाँ दूध से भरी लगती थी, 37 की उम्र में भी उसकी छातियों में बहुत कसावट थी| झाड़ू लगाते हुए वो मेरे पलंग के नजदीक आ गई और इतना झुक गई की मुझे उनके निप्पल लग-भग दिख हो गए| मैं उठ के जाने को हुआ तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया; "कहाँ जा रहे हो देवर जी?!" मैंने कोई जवाब नहीं दिया और मुँह फेर लिया| "मेरा तो काम हो गया!" इतना कह कर उन्होंने मेरा हाथ छोड़ दिया और अपनी कातिल हंसी हँसते हुए चली गई| उनकी ये डबल मीनिंग वाली बात मैं समझ चूका था, वो तो बस मुझे अपने स्तन दिखाने आई थीं! कमरा तक ठीक से साफ़ नहीं किया था उन्होंने, पहले तो सोचा की उन्हें टोक दूँ पर फिर चुप रहा और वापस लेट गया| वो पूरा दिन भाभी मुझे देख-देख आकर हँसती रही
और मेरे जिस्म में आग पैदा हो इसकी कोशिश करती रही| अगले दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ, मैं आँगन में लेटा हुआ था और वो हैंडपंप के पास उकडून हो कर बैठी कपडे धो रही थी| मैं जहाँ लेटा था वहाँ मेरे बाएं तरफ रसोई और दाएं तरफ गुसलखाना था जहाँ पर हैंडपंप लगा था| मैं पीठ के बल लेटा हुआ था और अपने फ़ोन में कुछ देख रहा था की मैंने 'गलती' से दायीं तरफ करवट ली| करवट लेते ही मेरी नजर अचानक से भाभी पर पड़ी जो मेरी तरफ देख रही थी और उनका निचला होंठ उनके दाँतों तले दबा हुआ था| उनकी दायीं टाँग सीधी थी और उन्होंने उसके ऊपर से अपने पेटीकोट ऊपर चढ़ा रखा था| भाभी मेरी तरफ प्यासी नजरों से देख रही थी और सोच रही थी की मैं उठ कर आऊँगा और उन्हें गोद में उठा कर ले जाऊँगा|
भाभी ने अपना पेटीकोट और ऊपर चढ़ा दिया और उनकी माँसल जाँघ मुझे दिखने लगी| ये देखते ही मुझे झटका लगा और मैंने तुरंत दूसरी तरफ करवट आकर ली और ये देख आकर भाभी खिलखिलाकर हँस पड़ी| रात खाने के बाद मैं छत पर थोड़ा टहल रहा था की तभी ऋतू का फ़ोन आ गया और मैं उससे बात करने लगा| बात करते-करते रात के 11 बज गए, मैंने ऋतू को बाय कहा और फ़ोन पर एक लम्बी सी Kiss दी और फ़ोन रखा| मौसम अच्छा था, ठंडी-ठंडी हवाएँ जिस्म को छू रही थी और मजा बहुत आ रहा था| मैंने सोचा की आज यहीं सो जाता हूँ, पास ही एक चारपाई खड़ी थी तो मैं ने वही बिछाई और मैं दोनों हाथ अपने सर के नीचे रख सो गया| रात के एक बजे मेरे कान में भाभी की मादक आवाज पड़ी; "देवर जी!!!" ये सुनते ही मैं चौंक कर उठ गया और सामने देखा तो भाभी दिर्फ़ ब्लाउज और पेटीकोट में मेरे सामने खड़ी हैं| पूनम के चाँद की रौशनी में उनका पूरा बदन जगमगा रहा था| 38 इंची की कमर और उनकी 44D की छातियाँ मेरे ऊपर कहर ढा रही थी! मेरी नजरें अपने आप ही उनकी ऊपर-नीचे होती छातियों पर गाड़ी हुई थी| भाभी जानती थी की मैं कहाँ देख रहा हूँ इसलिए वो और जोर से सांसें लेने लगीं| दिमाग में फिर से झटका लगा और मैं ने उनकी मन्त्र-मुग्ध करती छातियों से अपनी नजरें फेर ली| "यहाँ क्या कर रहे हो देवर जी?" भाभी ने फिर से उसी मादक आवाज में कहा|
"वो मौसम अच्छा था इसलिए ...." मैंने उनसे मुँह फेरे हुए ही कहा| "हाय!!!...सच कहा देवर जी! सससस...
ठंडी-ठंडी हवा तो मेरे बदन पर जादू कर रही है| मैं भी यहीं सो जाऊँ?" भाभी की सिसकी सुन मैं उठ खड़ा हुआ और नीचे जाने लगा| "आप चले जाओगे तो मैं कहाँ सोऊँगी?" भाभी बोलती रही पर मैं रुका नहीं और अपने कमरे में आ कर दरवाजा बंद कर के लेट गया| भाभी का मुझे रिझाने का काम पूरे 5 दिन और चला और इन्हीं दिनों मैं इतना तंदुरुस्त हो गया की अपना ख्याल रख सकूँ! घर के असली दूध-दही-घी की ताक़त से जिस्म में जान आ गई थी| अब मुझे वहाँ से जल्दी से जल्दी निकलना था वरना भाभी मेरे लंड पर चढ़ ही जाती! एक हफ्ते बाद में वापस शहर पहुँचा तो मेरा प्यार मुझे लेने के लिए बस स्टैंड आया था| ऋतू मुझे देखते ही मेरे गले लग गई और उसकी पकड़ देखते ही देखते कसने लगी| "जानू! पूरे दस दिन आप मुझसे दूर रहे हो! आगे से कभी बीमार पड़े ना तो देख लेना! मैं भी आपके ही बगल में लेट जाऊँगी!" ये सुन कर मैं हँस पड़ा, हम घर पहुँचे और ऋतू के हाथ का खाना खा कर मन प्रसन्न हो गया| मैंने जान कर ऋतू को भाभी द्वारा की गई हरकतों के बारे में कुछ नहीं बताया वरना फिर वही काण्ड होता! इन पंद्रह दिनों में मैं बहुत कमजोर हो गया था इसीलिए उस दिन ऋतू ने मेरे ज्यादा करीब आने की कोशिश नहीं की| अगले दिन मैंने ऑफिस ज्वाइन किया तो मेरी कमजोरी अनु मैडम से छुपी नहीं और वो कहने लगी की मुझे कुछ और दिन आराम करना चाहिए, अब तो राखी ने भी ज्वाइन कर लिया था और भी मैडम की बात को ही दोहराने लगी| सिर्फ एक मेरा बॉस था जो मन ही मन गालियाँ दे रहा था|
update 23
उस दिन मैं शाम को ऋतू से मिल नहीं पाया क्योंकि काम बहुत ज्यादा था और राखी मैडम से बैलेंस शीट फाइनल नहीं हो रही थी तो मुझे उसकी मदद करनी पड़ी| शाम को देर हो गई थी इसलिए मैंने ही उसे घर ड्राप किया था| अगले दिन मुझे ऋतू का फ़ोन आया तो वो बहुत घबराई हुई थी!
मैं: क्या हुआ? तू घबराई हुई क्यों है?
ऋतू: I….I…. I think I’m pregnant!!!
मैं: WHAT???!!!! H….How…. this … happened?!
ऋतू: I missed …..
my periods!
ये सुन कर दोनों खामोश हो गए, मेरा दिमाग तो जैसे सुन्न हो चूका था|
ऋतू: जानू! हेल्लो???? जानू????
ऋतू की आवाज सुन कर मैं अपनी सोच से बाहर निकला;
मैं: मैं आ रहा हूँ तेरे कॉलेज, मुझे लाल बत्ती पर मिल|
इतना कह कर मैं ऑफिस से भागा, मैडम ने मुझे भागते हुए देखा तो तुरंत मुझे कॉल कर दिया| मैं अभी बाइक के पास ही पहुँचा था| मैंने उन्हें झूठ बोल दिया की परिवार के किसी लड़के को हॉस्पिटल लाये हैं| मैं बाइक भगाता हुआ कॉलेज पहुँचा और ऋतू वहीँ इंतजार कर रही थी| मैं उसे ले कर शहर के दवाखाने नहीं जा सकता था वरना कल को कोई काण्ड अवश्य होता| इसलिए मैं उसे ले कर बाराबंकी आ गया| दो घंटे के रास्ते में हमारी कोई भी बात नहीं हुई, ऋतू मेरे जिस्म से चिपकी बस सुबक रही थी| उसकी आँख के आँसू मेरी कमीज पीछे से भीगा रहे थे| शहर में घुसते ही पहले मैंने ऋतू को एक मंगलसूत्र खरीद कर दिया और साथ ही मैं सिंदूर की एक डिब्बी| ऋतू हैरानी से मेरी तरफ देखने लगी;
ऋतू: हम शादी कर रहे हैं? (उसने खुश होते हुए कहा|)
मैं: नहीं! ये सिन्दूर लगा ले और मंगलसूत्र पहन ले अगर डॉक्टर पूछे तो कहना की हमारी शादी को 5 महीने ही हुए हैं|
ये सुन कर ऋतू मायूस हो गई, पर मेरा ध्यान अभी सिर्फ इस बात को जानने में था की क्या वो प्रेग्नेंट है? दिमाग तैयारी करने लगा था की अगर वो प्रेग्नेंट है तो मुझे उसके साथ जल्द से जल्द भागना होगा! एक महंगे से हॉस्पिटल के बाहर मैंने बाइक रोकी और फिर हम दोनों अंदर पहुँचे| कार्ड बनवा कर हम बीअत गए, डिटेल में मैंने अपना नंबर डाला और ऋतू का नाम बदल कर प्रिया कर दिया| कुछ देर इंतजार करने के बाद हम डॉक्टर के केबिन में घुसे और डॉक्टर ने हम दोनों का नाम पूछा तो मैंने उन्हें अपना नाम रितेश बताया| ये सुन कर ऋतू थोड़ा हैरान हुई क्योंकि मैं ऋतू को नकली नाम बताना भूल गया था| मैंने ऋतू का हाथ दबा कर उसे समझा दिया|
डॉक्टर: तो बताइये मिस्टर शुभम क्या समस्या है?
मैं: जी mam ... मुझे लगता है की प्रिया प्रेग्नेंट है... और अभी हम दोनों ही जॉब कर रहे हैं तो....I hope you can understand!
डॉक्टर: Yeah ... Yeah .... प्रिया आप चलो मेरे साथ|
ऋतू उठ कर उनके साथ चली गई और करीब 15 मिनट बाद डॉक्टर और ऋतू साथ आये|
डॉक्टर: You should have used precaution!
मैं: Mam ... वो... Sorry! पर ऋतू ने I-pill तो ली थी|
डॉक्टर: 72 घंटों के अंदर ली थी?
मैं: नहीं mam .... थोड़ा लेट हो गई थी!
डॉक्टर: देखो इस समय ऋतू के साथ थोड़ी कम्प्लीकेशन है! She's not physically fit to be a mom! Also, you can’t choose the abortion… cause then she won’t be able to conceive …ever!
ये सुन कर हम दोनों के दूसरे को देखने लगे और हमारी परेशानियाँ हमारी शक्ल से दिख रही थी|
डॉक्टर: See I’ll write some medication which she has to take on a daily basis, this will only delay the pregnancy. If she stopped the medication, then she’ll have to conceive the baby. She also needs multi-vitamins to be physically fit in order to … you know… be a mom.
One more thing I’d like to ask, how long have you been married?
मैं: 5 months! But why?
डॉक्टर: You didn’t tell me anything about your wife’s orgasms?
अब ये सुन कर तो मैं दंग रह गया!
मैं: I thought they’re natural…..I….I had no idea…. its …a disease?!!
डॉक्टर: It’s not a disease … yes she reaches orgasm a bit early but don’t worry I’ve taught her a technique to last longer!
ये कहते हुए उन्होंने ऋतू को आँख मारी! खेर हम दवाई ले कर बाहर आये और दोनों भूखे थे तो मैंने ऋतू को एक रेस्टुरेंट में चलने को कहा| वहाँ खाना आर्डर कर ने के बाद हमने बात शुरू की;
मैं; घबराओ मत! सब कुछ ठीक हो जायेगा|
ऋतू: सब मेरी गलती थी, मैं अगर दवाई टाइम पर ले लेती तो ये सब नहीं होता!
मैं: जो हो गया सो हो गया! अब ये दवाई टाइम से खाना और ये बताओ की तुम अंदर से कमजोर कैसे हो? खाना ठीक से नहीं खाती?
ऋतू: नहीं तो... मैं तो ठीक से खाती-पीती हूँ!
मैं: और ये ओर्गास्म???
ऋतू: जब भी हम प्यार कर रहे होते थे तो मैं सबसे पहले..... मतलब वो.... और आप हमेशा देर तक....तो मैं.... (ऋतू को ये कहने में बड़ा संकोच हो रहा था|)
मैं: पगली! छोड़ ये सब और खाना खा| (मैंने उसका ध्यान उन बातों से हटाया और खाने में लगा दिया|)
खाना खा कर निकले तो बॉस का फ़ोन आ गया पर मैं चूँकि उस समय ड्राइव कर रहा था इसलिए फ़ोन नहीं उठा पाया| पहले मैंने ऋतू को हॉस्टल छोड़ा क्योंकि अब शाम के 4 बज रहे थे और मुझे ऑफिस पहुँचते-पहुँचते 5 बज गए| बॉस मुझे देखते ही जोर से चिल्लाया; "कहाँ था सारा दिन?" ये सुन कर मैडम अपने केबिन से बाहर आईं और मेरे बचाव में कूद पड़ी; "मुझे बता कर 'गए थे'! कजिन को एक्सीडेंट हो गया था और वो हॉस्पिटल में एडमिट था|" ये सुन कर बॉस ने मैडम को घूर के देखा और फिर बिना कुछ कहे अंदर केबिन में चला गया| मैं जानता था की आज तो मैडम को ये बहुत सुनाएगा इसलिए मैंने मैडम से दबे शब्दों में कहा; "mam! मेरी वजह से सर आपको बहुत डाटेंगे! आप को....
" आगे मेरे कुछ भी कहने से पहले उन्होंने मेरी बात काट दी; "दोस्त को बचाना तो धर्म है!" इतना कह कर मैडम हँस पड़ी और मैं भी मुस्कुरा दिया| पर मन ही मन जानता था की mam को आज बहुत सुनना पड़ेगा|
खेर काम तो करना ही था और मैडम को कम डाँट पड़े इसलिए थोड़ी देर बैठ कर काम निपटाया और घर पहुँच गया| घर आते ही ऋतू को फ़ोन किया और उसे याद दिलाया की उसने गोली खाई या नहीं?! मैंने तो फ़ोन में भी रिमाइंडर डाल लिया ताकि मैं कभी भूलूँ नहीं| अगले दिन जब ऋतू से शाम को मिला तो वो मुझे थोड़ी गुम-सुम लगी, पूछने पर उसने कहा;"क्या मैं ये बेबी कंसीव नहीं कर सकती?" ये सुन कर पहले तो सोचा की उसे झिड़क दूँ पर फिर सोचा की उसे ठीक से समझाता हूँ; "जान! अगर आप ये बेबी कंसीव करते हो तो हमें जल्दी शादी करनी पड़ेगी| जल्दी शादी करने के लिए हमें जल्दी भागना होगा, और भाग तो हम जाएंगे पर भाग कर जाएंगे कहाँ? कहाँ रहनेगे? क्या खाएंगे? सिर्फ प्यार से पेट नहीं भरता ना?" ये सुन कर ऋतू कुछ सोचने लगी और फिर बोली; "मैं भी जॉब करूँ?"
"जान! आप जॉब करोगे तो पढ़ाई कब करोगे? दोनों चीजें आप एक साथ मैनेज नहीं कर सकते और फिर आप जॉब करोगे तो हम रोज मिलेंगे कैसे? पर ऋतू का दिमाग इन सवालों के जवाब पहले ही सोच लिया था| "मैं पार्ट टाइम जॉब करुँगी, वो भी आप ही की कंपनी में|" ये सुन कर मैं हैरान हो गया और हैरानी से ऋतू को देखने लगा| "नहीं!!!" मैंने बस इतना ही जवाब दिया और बात को वहीँ दबा दिया| ऋतू ने भी डर के मारे आगे कुछ नहीं बोला|
कुछ दिन और बीते, हम इसी तरह रोज मिलते पर जॉब के लिए ऋतू ने मुझसे आगे कोई बात नहीं की| संडे आया तो ऋतू ने जिद्द कर के मेरे घर आ गई, और आज तो वो बहुत जयदा ही खुश लग रही थी| आज वो पहली बार स्कर्ट पहन के आई थी और अपनी कुर्ती ऊपर उठा कर ऋतू ने मुझे अपनी नैवेल दिखाई| मेरी नजर उसकी नैवेल पर पड़ी तो मैं टकटकी बांधें उसी को देखता रहा| "क्या बात है आज तो मेरी जान मेरी जान लेने के इरादे से आई है!!!" ये कहते हुए मैंने ऋतू को अपनी छाती से चिपका लिया|
"वो प्रेगनेंसी वाले दिन के बाद मुझे तो लगा था की आप मुझे अब शादी तक छुओगे ही नहीं! आपको सडके करने को ही इतना सज-धज कर आई हूँ! सससस.....आ...आ...ह...नं...
सच्ची कितने दिनों से आपके लिए प्यार के लिए तड़प रही थी|" ऋतू ने कसमसाते हुए कहा|
"पागल! तुझे प्यार किये बिना तो मैं भी नहीं रह सकता! उस दिन जब तूने मुझे प्रेगनेंसी की बात बताई तो मैं मन ही मन सोच कर बैठा था की अब जल्दी ही तुझे भगा कर ले जाऊँ|" मैंने ऋतू को बाएं गाल को चूमते हुए कहा|
"सच्ची?" ऋतू ने खिलखिलाते हुए कहा|
"हाँ जी! बहुत प्यार करता हूँ मैं अपनी ऋतू से|" ये कहते हुए मैंने ऋतू के होंठों को चूम लिया|
update 24
कुछ दिन और बीते, हम इसी तरह रोज मिलते पर जॉब के लिए ऋतू ने मुझसे आगे कोई बात नहीं की| संडे आया तो ऋतू ने जिद्द कर के मेरे घर आ गई, और आज तो वो बहुत जयदा ही खुश लग रही थी| आज वो पहली बार स्कर्ट पहन के आई थी और अपनी कुर्ती ऊपर उठा कर ऋतू ने मुझे अपनी नैवेल दिखाई| मेरी नजर उसकी नैवेल पर पड़ी तो मैं टकटकी बांधें उसी को देखता रहा| "क्या बात है आज तो मेरी जान मेरी जान लेने के इरादे से आई है!!!" ये कहते हुए मैंने ऋतू को अपनी छाती से चिपका लिया|
"वो प्रेगनेंसी वाले दिन के बाद मुझे तो लगा था की आप मुझे अब शादी तक छुओगे ही नहीं! आपको सडके करने को ही इतना सज-धज कर आई हूँ! सससस.....आ...आ...ह...नं... सच्ची कितने दिनों से आपके लिए प्यार के लिए तड़प रही थी|" ऋतू ने कसमसाते हुए कहा|
"पागल! तुझे प्यार किये बिना तो मैं भी नहीं रह सकता! उस दिन जब तूने मुझे प्रेगनेंसी की बात बताई तो मैं मन ही मन सोच कर बैठा था की अब जल्दी ही तुझे भगा कर ले जाऊँ|" मैंने ऋतू को बाएं गाल को चूमते हुए कहा|
"सच्ची?" ऋतू ने खिलखिलाते हुए कहा|
"हाँ जी! बहुत प्यार करता हूँ मैं अपनी ऋतू से|" ये कहते हुए मैंने ऋतू के होंठों को चूम लिया|
अब आगे ......
मेरे होठों के सम्पर्क में आते ही ऋतू मचलने लगी और उसने अपने दोनों हाथों को मेरी गर्दन के पीछे ले जाके लॉक कर दिया| ऋतू उचक कर मेरे होठों को चूस रही थी और मुझे उसकी इस हरकत पर बहुत प्यार आ रहा था| मैंने उसे गोद में उठा लिया और किचन कॉउंटर पर ला कर बिठा दिया| ऋतू अब बिलकुल मेरे बराबर थी, और उसका मेरे होठों को चूमना जारी था| ऋतू के होंठ तो आज मुझ पर कुछ ज्यादा ही कहर डाल रहे थे, वो अपने होठों से मेरे होठों को बारी-बारी निचोड़ रही थी| इधर मेरे दिलों-दिमाग में उसकी नाभि ही छाई हुई थी| हाथ अपने आप ही उसकी नाभि के ऊपर थिरकने लगे थे| एक अजीब सी खुमारी थी, उस पर ऋतू की जिस्म की महक मुझे बहका रही थी| मैंने फिर से ऋतू को गोद में उठाया और पलंग पर ला कर लिटा दिया और खुद भी उसके ऊपर छा गया| अब मैंने अपने निचले होंठ और जीभ के साथ उसके निचले होंठ को अपने मुँह में भर लिया और उसे चूसने लगा| ऋतू की उँगलियाँ मेरे बालों में रास्ते बनाने लगी थी| निचले होंठ कर रस निचोड़ कर मैंने उसके ऊपर वाले होंठ को भी ऐसे ही निचोड़ा| मेरे हाथ अब नीचे आ कर उसके कुर्ते के ऊपर से स्तनों को दबाने लगे और उन्हें धीरे-धीरे मसलने लगे| मैं रुका और अपने घुटनों पर बैठ गया और ऋतू का हाथ पकड़ के उसे बिठाया| मुझे आगे उसे कुछ कहना नहीं पड़ा और उसने खुद ही अपना कुरता निकाल के फेंक दिया| मैं ने भी ताव में आकर अपनी टी-शर्ट निकाल फेंकी और फिर से ऋतू के ऊपर चढ़ गया और उसके होठों को अपने होठों में भींच कर चूसने लगा| ऋतू ने अपने दोनों हाथों से मेरा चेहरा थाम लिया और उसने भी अपनी जीभ से हमला कर दिया| मेरे मुँह में दाखिल हुई उसकी जीभ मेरी जीभ से लड़ने लगी| मैं ने अपने दाँतों से उसकी जीभ पकड़ ली और ऋतू थोड़ा छटपटाने लगी! इधर मेरी उँगलियों ने ऋतू की ब्रा के स्ट्राप को नीचे खिसका दिया| मैंने Kiss तोडा और ऋतू के कंधे को चूम लिया, जवाब में ऋतू ने अपनी उँगलियों को मेरे बालों में फँसा दिया| मैंने अपनी उँगलियों से अब उसकी ब्रा को उसके कंधे से होते हुए नीचे लाना शुरू कर दिया, ऋतू ने अपनी पकड़ मेरे बालों पर ढीली की और अगले ही पल उसकी ब्रा उसके सीने से अलग हो कर जमीन पर पड़ी थी| ऋतू मेरी आँखों में प्यास देख रही थी और मैं भी उसकी आँखों में वही प्यास देख रहा था| मैंने झुक कर ऋतू के बाएँ स्तन को अपने मुँह में भर लिया और उसे चूसने लगा| और ऋतू ने फिर से अपनी उँगलियाँ मेरे बालों में फँसा दीं| "काश...ससस..ससस...आ.आ..ननहहह....मैं आपको अपना दूध पिला सकती|" ये कहते हुए ऋतू सिसकारियां लेने लगी! उसकी टांगें भी हरकत करने लगीं और मेरी टांगों से लिपटने लगीं| ऋतू की बात आज मुझे बहुत उत्तेजक लग रही थी और मुझे ऐसा लगने लगा की वो मुझे जान-बुझ कर उत्तेजित कर रही है| "ससस...आ..आ..ह...ह....न...न...
जानू! एक बार काट लो ना!" उसका कहना था और मैंने उसके बाएँ स्तन को काट लिया; "आआह्ह्ह्ह.....हहह...स..ससससस...ननन... न!!!!!" उसकी दर्द भरी कराह सुन मुझे और उत्तेजना हुई और मैंने ऋतू का दायाँ स्तन मुँह में भर लिया और उसे चूसने लगा| "ससस....आ...न.....ह... इसे भी...काटो....ना...प्लीज!" ये सुनते ही मैंने उसके दाएँ चूची को डाँट से काट लिया; "ईईई....माँ....आह....ससस...आ..न..हह...!!!" उसकी कराह निकली और मैं उत्तेजना से भर गया और वापस बाएँ स्तन की चूची को भी काट लिया| "ईईई...माँ......ाआनंनं.....ससस!!!! जानऊउउउउउउउ!!!!" ऋतू ने अपना दबाव मेरे सर पर और बढ़ा दिया|
अगले दस मिनट तक मैं यूँ ही कभी उसके एक स्तन को चूसता तो कभी दूसरे स्तन को! ऋतू ने धीरे-धीरे अपनी पकड़ मेरे सर पर से कम की तो मैं नीचे खिसका और उसकी नैवेल पर रूक गया| अपने होठों से मैंने उसकी नैवेल को चूमा, अगले ही पल मैंने अपनी जीभ उसमें डाल दी" इसके परिणाम स्वरुप ऋतू का पूरा जिस्म ऊपर की तरफ उठ गया| मैंने अपने निचले होंठ को उसकी नैवेल पर ऊपर से नीचे रगड़ना शुरू कर दिया| जीभ से मैं उसकी नैवेल को कुरेदने लगा, ऋतू से अब ये दोहरा हमला बर्दाश्त नहीं हो रहा था और वो छटपटाने लगी थी| पाँच मिनट तक उसकी नैवेल की चुसाई कर मैं और नीचे खिसका तो वहां तो अभी स्कर्ट का कब्ज़ा था| ऋतू ने तुरंत ही नाडा खोला और स्कर्ट अपनी गांड से नीचे खिसका दी और बाकी का काम मैंने किया| अब तो सिर्फ ऋतू की पैंटी बची थी| पैंटी देख कर मैं उस पर झुका और ऋतू की बुर को चूमना चाहा| पर ऋतू ने मुझे रोक दिया और अपनी पैंटी निकाल कर अपनी दोनों टांगें खोल दी| उसकी ये हरकत देख मेरे मुख पर मुस्कराहट छ गई और मुझे देख ऋतू ने अपने दोनों हाथों से अपने मुँह को ढक लिया| मैं झुक कर ऋतू की बुर को चूमने लगा तो उसने फिर मुझे रोक दिया, वो उठ के बैठी और मुझे अपने ऊपर खींच लिया| "आज मेरे जानू को और इंतजार नहीं करवाऊँगी|" इतना कह कर उसने मुझे अपने ऊपर से धकेल दिया और मुझे नीचे लिटा कर मेरे ऊपर चढ़ गई| अपनी चारों उँगलियों को ऋतू ने अपने थूक से चुपड़ा और अपनी बुर की फांकों को गीला करने लगी, अपनी दो उँगलियों से उसने अपनी ही थूक से अपनी बुर को अंदर से गीला कर दिया|
उसने अपने थूक से सने हाथों से मेरा पाजामा बुरी तरह खींचना शुरू कर दिया, वासना उस पर इस कदर हावी थी की वो तो मेरा पाजामा फाड़ने को भी तैयार थी| आखिर पाजाम निकालते ही उसने उसे दोर्र फेंक दिया और मेरे कच्छे को देख कर बोली; "सच्ची आज के बाद मेरे होते हुए आप कभी कच्चा मत पहनना! नहीं तो मैं आपके सारे कच्छे फाड़ दूँगी!" ऋतू का उतावलापन आज साफ़ दिख रहा था| मेरा कच्छा तो उसने नोच कर निकाला और गुस्से से कमरे के दूसरे कोने में फेंक दिया, फिर से उसने अपना गाढ़ा थूक अपनी चारों उँगलियों पर निकाला और पहले मेरे लंड पर चुपड़ने लगी और फिर बाकी का अपनी बुर में घुसेड़ दिया! ऋतू
का ये रूप देख कर मैं हैरान था!
ऋतू अब धीरे-धीरे अपनी बुर को मेरे लंड के ठीक ऊपर ले आई और धीरे-धीरे बुर को नीचे मेरे लंड पर दबाने लगी| मेरा सुपाड़ा पूरा अंदर जा चूका था और ऋतू के बुर की गर्मी मुझे अपने लंड पर महसूस होने लगी थी| मैं जानता था की अगर मैंने नीचे से जरा भी झटका मारा तो ऋतू की हालत दर्द के मारे खराब हो जायेगी, इसलिए में बिना हिले-डुले पड़ा रहा|
ऋतू ने बहुत हिम्मत दिखाई और धीरे-धीरे और नीचे आने लगी और मेरा लंड और अंदर जाने लगा| जब आधा लंड अंदर चला गया तो ऋतू रुक गई और मुझे लगा जैसे इसके आगे वो नहीं बढ़ेगी| ऋतू की चेहरे पर दर्द की लकीरें थीं और मुँह से दर्द भरी आह निकल रही थी| "स..आह...हम्म....मम...हह...आअह्ह्ह...अंह..!!!" ऋतू की बुर में उठ रहा दर्द उसकी जुबान से बाहर आ रहा था| जितना लंड अंदर गया था उतना ही अंदर लिए उसने ऊपर-नीचे होना शुरू कर दिया और मैं मन मार कर रह गया की वो मेरा पूरा लंड अंदर न ले सकी| अगले पांच मिनट तक ऋतू मेरे पेट पर अपना हाथ रख कर अपनी गांड ऊपर नीचे करती रही और मेरा बेचारा आधा लंड ही उसकी बुर की गर्मी की सिकाई पा रहा था| ऋतू को मेरे चेहरे से मेरी प्यास दिख रही थी और वो जानती थी की मेरा पूरा लंड उसकी बुर की गर्माहट चाहता है तो उसने ऊपर-नीचे होना रोक दिया और मेरे ऊपर लेट गई| "मुझे लगा की वो स्खलित हो गई है इसलिए आराम कर रही है पर उसने मुझे चौंकाते हुए पुछा; "जानू! आप ऐसे क्यों हो? अपना दर्द मुझसे क्यों छुपाते हो? मैं जानती हूँ की मैं आपको सेक्स में वो सुख नहीं दे पाती जो आप चाहते हो पर आपने कभी मुझसे क्यों कुछ नहीं कहा? आपके छूटने से पहले मैं स्खलित हो जाती हूँ पर आप हैं की.....
क्या पराया समझते हो मुझे?"
ये सुन कर मुझे एहसास हुआ की मैं ऋतू से सेक्स में उसका पूरा साथ ना देने से थोड़ा दुखी था पर कभी उससे कहने की हिमायत नहीं जुटा पाया| "जान! ऐसा नहीं है! मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ, मेरे लिए तुम्हारे दिल का प्यार जर्रूरी है! सेक्स मेरे लिए मायने नहीं रखता! तुम्हें उससे ख़ुशी मिलती है और तुम्हें खुश देख मैं भी खुश हो लेता हूँ| बचपन से ले कर जब तक मैं घर पर था तब तक हम साथ खेले-खाये, बड़े हुए पर मेरे कॉलेज के वजह से मुझे शहर आना पड़ा और तब शायद तुमने खुद का ख़याल रखना बंद कर दिया| या शायद घर पर सब के तानों के दुःख के कारन तुम अच्छे से खाना नहीं खाती थी, इसीलिए तुम्हारा शरीर अंदर से कमजोर है और शायद इसीलिए तुम सेक्स में ज्यादा देर तक नहीं साथ दे पाती! पर उससे मेरा प्यार तुम्हारे लिए कभी कम नहीं हुआ! हाँ कुछ दिन पहले तुम ने मेरे दिल को बहुत ठेस पहुँचाई थी, पर उस किस्से के बाद तो हम और नजदीक ही आये हैं ना? मेरी बात सुन कर ऋतू मेरी आँखों में देखते हुए बोली; "मैं जानती हूँ आप मुझसे कितना प्यार करते हो और मेरे दिल को चोट न पहुंचे इसलिए आप ने मुझे कभी ये नहीं बताया| पर उस दिन जब में उस डॉक्टर के साथ अंदर गई चेक-अप के लिए तब मैंने उन्हें साड़ी बात बताई और उन्होंने मुझे कुछ बातें बताई! मैं वादा करती हूँ की आज के बाद मैं आपका पूरा साथ दूँगी!"
''आपको वादा करने की कोई जर्रूरत नहीं है!" ये सुन कर ऋतू मुस्कुराई और मेरे होठों को चूम लिया| मेरे लंड अभी भी आधा ऋतू की बुर में था और ऋतू ने धीरे-धीरे अपनी कमर को मेरे लंड पर दबाना शुरू किया| धीरे-धीरे ...धीरे-धीरे ...धीरे-धीरे ...धीरे-धीरे और आखिर में पूरा लंड ऋतू की बुर में समां गया| दर्द के मारे ऋतू की आँखें बंद हो चुकी थी और आँसूँ की धरा बह निकली थी| "ससससस.....आअह्ह्ह्ह......मा....म...म.म.म.म....मममम.....ंन्न......ह्ह्ह्हह्ण....!!!" ऋतू का दर्द देख कर मन दुखी होने लगा था और लंड मियाँ अंदर बुर की गर्मी पा कर मचलने लगे थे| "जान! दर्द हो रहा है तो मत करो!" मैंने ऋतू से कहा पर उसने अपनी ऊँगली मेरे होठों पर रख दी| "ससस...आज...मेरे जानू.....को....सब....ससस...आअह्ह्ह..हहह्णणम्म्म....ममम...
!!" ऋतू की दर्द भरी सिसकारियाँ अचानक ही मादक सिसकारियाँ बन चुकी थी| दो मिनट तक वो बिना हिले-डुले मेरे लंड को पानी बुर में भरे, आँखें मूंदे हुए बैठी रही| फिर उसने अपने दोनों हाथों को मेरी छाती पर रखा और अपनी कमर धीरे-धीरे ऊपर लाई, लंड का सुपाड़ा भर अंदर रहा गया था और फिर ऋतू धीरे-धीरे अपनी कमर को वापस नीचे लाई! दो मिनट में ही उसकी बुर ने रस छोड़ दिया, और वो गर्म-गर्म रस मेरे लंड को और भी गर्म करने लगा| ऋतू जैसे ही ऊपर उठी उसका रस बहता हुआ बाहर आया पर इस बार ऋतू रुकी नहीं और उसने लय-बद्ध तरीके से अपनी कमर ऊपर-नीचे करनी शुरू कर दी| 5 मिनट और फिर ऋतू उकड़ूँ हो कर बैठ गई और तेजी से उसने अपनी गांड ऊपर नीचे करने शुरू कर दी| अब तो मेरा लंड बड़ी आसानी से फिसलता हुआ उसकी बुर में अंदर-बाहर हो रहा था और ऋतू को भी बहुत जोश चढ़ आया था| अगले दस मिनट तक वो बिना रुके ऐसे ही ऊपर-नीचे करती रही और मेरी और मेरे लंड की हालत खराब कर दी| मेरे जिस्म में एक ऐठन आई और वही ऐठन ऋतू के जिस्म में भी आई और दोनों एक साथ अपना रस बहाने लगे, वो रस ऋतू के बुर में पहले भरा और काफी-कुछ रिस्ता हुआ बहार आने लगा|
ऋतू थक कर पस्त हो गई और मेरे ऊपर ही लुढ़क गई| हम दोनों की सांसें बहुत तेज थी, और लंड मियाँ अब भी ऋतू की बुर के अंदर फँसे पड़े थे| पाँच मिनट के बाद जब दोनों की सांसें सामान हुई तो आज मेरे चेहरे की संतुष्टि देख ऋतू को खुद पर गर्व होने लगा| मैंने करवट ले कर उसे अपने ऊपर से उतारा और अपनी बगल में लिटा दिया, इसी बीच मेरा लंड भी बहार आया| ऋतू की बुर से चम्मच भर गाढ़ा तरल बहंता हुआ बाहर आया जिसे देख कर मुझे बहुत आनंद आया| मैं वापस ऋतू की बगल में लेट गया, ऋतू ने मेरी तरफ करवट की और अपनी बायीँ टांग उठा कर मेरे लंड पर रख दी| वो अब भी उस गाढ़े तरल से अनजान थी!
update 25
हम दोनों ऐसे ही लेटे रहे और दस मिनट बाद मैंने ऋतू से बात शुरू की;
मैं: मेरी जान ने बड़े मन से डॉक्टर की साड़ी टिप्स फॉलो की, ऐसी क्या टिप्स दी थी उन्होंने?
ऋतू: (शर्माते हुए) उन्होंने कहा था की अपने पति को एक्साइट करो! कुछ मर्दों को बातों से एक्साइटमेन्ट होती है तो, किसी को नोचने-काटने से, किसी को चूमने-चूसने से होती है!
मैं: अच्छा?
ऋतू: हाँ जी! मुझे ये भी बताया की जल्दी स्खलित नहीं होना चाहिए बल्कि जितना रोक सको उतना बेहतर है! जब लगे की क्लाइमेक्स होने वाला है, तभी रुक जाओ और अपने पार्टनर को Kiss करते रहे| थोड़ा सब्र से काम लो और जल्दीबाजी मत दिखाओ! और तो और मुझे उन्होंने प्राणायाम भी करने को कहा और हस्तमैथुन नहीं करने को कहा|
मैं: तुम हस्थमैथुन करती थी?
ऋतू: जब आप नहीं होते थे तब करती थी! पर उस दिन के बाद मैंने बंद कर दिया, आपको पता है कितना मुश्किल होता है? आप को तो पता नहीं क्या सिद्धि प्राप्त है की आप खुद को इतना काबू में रखते हो! मुझे तो
आपके पास आते ही आपके जिस्म की महक बहकाने लगती है| मन करता है आपके सीने से चिपक जाऊँ!!!!
मैं: जानू! सब तुम्हारे प्यार का असर है, वही मुझे कहीं भटकने नहीं देता|
अब तक ऋतू को बिस्तर पर गीलापन महसूस हो गया था, इसलिए वो उठ बैठी और हम दोनों का गाढ़ा-गाढ़ा रस देख कर बुरी तरह शर्मा गई| वो उठी और थोड़ा बहुत रस उसकी बुर से बहता हुआ उसकी जाँघों तक पहुँच गया था| खेर ऋतू बाथरूम से मुँह-हाथ और बुर धो कर आई और फिर मैंने भी मुँह-हाथ और लंड धोया! जब में बहार आया तो ऋतू चाय बना रही थी और जैसे ही मैंने कच्छा उठाया पहनने को तो ऋतू आँखें बड़ी कर के देखने लगी, मैंने मुस्कुरा कर कच्छा वपस जमीन पर पड़ा रहने दिया| "क्यों कपडे पहन रहे हो? मेरे सामने शर्म आती है?" ऋतू ये कह कर हँसने लगी| मैं उसके पीछे आया और उसे पीछे से अपनी बाहों में जकड लिया| मेरा सोया हुआ लंड ऋतू की गांड से चिपका और मैं उसके कान में खुसफुसाते हुए बोला; "सॉरी जान!"
"अच्छा आप खिड़की के नीचे बैठो, में चाय ले कर आती हूँ||" मैं वापस खिड़की के नीचे बिना कपडे पहने ही बैठ गया| ऋतू ने मुझे चाय दी और पलंग से चादर उठा कर धोने डाल दी और फिर मेरी गोद में नंगी ही बैठ गई| ऋतू की गांड ठीक मेरे लंड के ऊपर थी;
ऋतू: अच्छा ...मुझे आपसे ...एक बात कहनी थी| (ऋतू ने बहुत सोचते-सोचते हुए कहा|)
मैं: हाँ जी कहिये| (मैंने ऋतू के बालों में ऊँगली फिराते हुए कहा|)
ऋतू: मुझसे अब आपसे दूर रहा नहीं जाता| आपका कहाँ की नई जिंदगी शुरू करने के लिए पैसों की जर्रूरत है वो सच है पर ये तो कहीं नहीं लिखा होता की ये सारा बोझ आप ही उठाएंगे? मैं भी आपका ये बोझ बाँटना चाहती हूँ, मैं भी जॉब करुँगी! ताकि जल्दी पैसे इक्कट्ठा हों और मैं और आप जल्दी से यहाँ से भाग जाएँ|
ऋतू की बात सुन कर मैं हैरान था क्यों की वो बेसब्र हो रही थी और इस समय मेरा उसपर चिल्लाना ठीक नहीं था, तो मैंने उसे समझते हुए कहा;
मैं: जान! मैं बिलकुल मना नहीं करता की आप जॉब मत करो! मैंने तो आपको अपना प्लान बताया था ना? अगले साल से आप भी पार्ट टाइम जॉब शुरू करना! फिलहाल मैं कल ही सर से अपनी सैलरी बढ़ाने की बात करूँगा नहीं तो मैं जॉब स्विच कर लूँगा|
ऋतू: प्लीज जानू!
मैं: जान! समझा करो! आप पढ़ाई और जॉब एक साथ नहीं संभाल पाओगे! कॉलेज की अटेंडेंस भी जर्रूरी है ना? फिर हॉस्टल के टाइमिंग भी तो इशू है|
ऋतू: मैं सब संभाल लूँगी, सैटरडे और संडे करुँगी तो कॉलेज की अटेंडेंस में भी कुछ फर्क नहीं पड़ेगा| हॉस्टल की टाइमिंग के लिए मैं आंटी जी से बात कर लूँगी और उन्हें मना भी लूँगी| प्लीज मुझसे अब ये दूरी बर्दाश्त नहीं होती!
मैं: जॉब करोगी तो सैटरडे-संडे हम दोनों कैसे मिलेंगे? तब कैसे रहोगी मुझसे बिना मिले? और ये मत भूलो की हमें कभी-कभी सैटरडे-संडे घर भी जाना होता है, उसका क्या? रास्ते में अकेले आना-जाना कैसे मैनेज
करोगी?
ऋतू: मैं आप ही की कंपनी में जॉब करुँगी तो हम एक साथ और भी टाइम बिता पाएंगे और रही घर जाने की बात तो आपके बस इतना बोलने से की आप ऑफिस के काम में बिजी हो तो कोई कुछ नहीं कहेगा| आप बोल देना की मेरे एग्जाम है...कुछ भी झूठ बोल देना...ज्यादा हुआ तो कभी-कभी चले जायेंगे| एटलीस्ट मुझे एक बार कोशिश तो करने दीजिये, एक बार अनु मैडम से बात तो करने दीजिये!
मैं: अच्छा जी तो सब सोच कर आये हो?! मेरे ऑफिस में जॉब करोगे तो मेरे साथ-आना जाना तो छोडो वहां मुझसे बात भी नहीं कर सकती तुम!
ऋतू: क्यों भला?
मैं: वहाँ किसी ने पूछा तो क्या कहूँ? ये मेरी भतीजी है! या फिर तुम मुझे सब के सामने 'चाचा' कह पाओगी?
ऋतू: तो हम वहाँ बिलकुल अजनबी होंगे?
मैं जी हाँ!
ऋतू: हाय! ये तो बेस्ट हो गया फिर! दुनिया की नजर से छुप-छुप कर मिलना, बातें करना बिलकुल फिल्मों की तरह|
मैं: फिल्मों का कुछ ज्यादा ही भूत नहीं चढ़ गया?
ऋतू: नहीं ...आपके प्यार का भूत है...जो सर से उतरता ही नहीं|
मैं: ऋतू ...देख कल को ये बात खुल गई तो ...सब कुछ खत्म हो जायेगा, प्लीज बात को समझ! (मैंने गंभीर होते हुए ऋतू के सर को चूमा|)
ऋतू: मैंने आज तक आपसे जो माँगा है आपने दिया है, एक आखरी बार मेरी ये जिद्द पूरी कर दो और मैं वादा करती हूँ की आगे से कभी कोई जिद्द नहीं करुँगी|
मैं: ठीक है, पर आपको मुझसे एक और वादा करना होगा|
ऋतू: बोलिये
मैं: कॉलेज खत्म होने से पहले हम शादी नहीं करेंगे| तुम अपनी पढ़ाई को हरगिज़ डाव पर नहीं लगाओगी|
ऋतू: ओफ्फो!!! जानू आप ना सच में बहुत सोचते हो! किस ने कहा की मैं अपनी ग्रेजुएशन कम्पलीट नहीं करुँगी?! मैं शादी के बाद भी तो कॉरेस्पोंडेंस से पढ़ सकती हूँ ना? फिर तो आप कहोगे तो मैं पोस्ट ग्रेजुएशन भी कर लूँगी| एक्चुअली करना ही पड़ेगा वरना आगे जॉब कहाँ मिलेगी!
ऋतू ने बड़ी सरलता से ये बात कही पर ये बात मेरे गले नहीं उत्तर रही थी|
मैं: तुमने वादा किया था ना की कॉलेज की नेक्स्ट टोपर तुम बनोगी! मेरी तस्वीर के साथ तुम्हारी तस्वीर लगेगी... भूल गई? (ये कह कर मैं उठ खड़ा हुआ और हाथ बाँधे खिड़की से बहार देखने लगा|)
ऋतू: (मुझे पीछे से अपनी बाहों में जकड़ते हुए|) ठीक है जान! जब तक मेरी ग्रेजुएशन पूरी नहीं होती तब तक हम शादी नहीं करेंगे| पर उससे एक दिन भी जयदा नहीं रुकूंगी मैं!
ये कहते हुए ऋतू ने मेरी नंगी पीठ को चूमा| उसके स्तन मेरी पीठ में गड रहे थे, मैं ऋतू की तरफ घूमा और उसके होठों को चूम लिया| उसका निचला होंठ मैंने अपने होठों और जीभ से चूसना शुरू कर दिया था|
अगले दिन मैंने सर से अपनी सैलरी को ले कर बात की;
मैं: गुड-मॉर्निंग सर!
बॉस: गुड- मॉर्निंग! अमिस ट्रेडर्स के नए इनवॉइस आये हैं, उन्हें चढ़ा देना|
मैं: जी...
आपसे कुछ बात करनी थी|
बॉस: हाँ बोलो|
मैं: सर मुझे सैलरी में रेज (raise) चाहिए|
बॉस: क्यों?
मैं: सर मुझे आपके पास काम करते हुए तकरीबन 3 साल हो गए हैं और इन सालों में मेरी सैलरी में एक भी बार रेज नहीं हुआ|
बॉस: पहले तुम रेगुलर तो बनो| आये-दिन छुट्टी मारते हो, शाम को ऑफिस खत्म होने से पहले ही चले जाते हो| ऐसे थोड़े ही चलेगा!
मैं: सर मेरी छुट्टियाँ पहले से कम हो गई हैं, आखरी बार छुट्टी तब ली थी जब मुझे डेंगू हो गया था| वो छुट्टियाँ भी विथाउट पे थी! शाम को जल्दी जाता हूँ तो बाद में वापस आ कर काम भी तो खत्म कर देता हूँ| आज तक आपको किसी भी काम के लिए मुझे दो बार नहीं कहना पड़ा है, इसलिए सर प्लीज सैलरी रेज कर दीजिये|
बॉस: देखते हैं...अभी जा कर अमिस ट्रेडर्स का डाटा चढ़ाओ|
मैं: सॉरी सर, पर अगर आप सैलरी रेज नहीं करना चाहते तो मैं रिजाइन कर देता हूँ|
मैंने सर को अपना रेसिग्नेशन लेटर दे दिया|
में: सर इसमें 1 महीने का नोटिस पीरियड है, अगले महीने से मैं जॉब छोड़ देता हूँ|
इतना कह कर मैं चला गया| बॉस बहुत हैरान था क्योंकि उसे ऐसी जरा भी उम्मीद नहीं थी| तकरीबन 3 साल का एक्सपीरियंस था मेरे पास और कहीं भी जॉब कर सकता था, इसलिए मुझे जरा भी परवाह नहीं थी| इधर बॉस की फटी जर्रूर होगी क्योंकि ऐसा मेहनती 'मजदूर' उसे कहाँ मिलता जो एक आवाज में उसका सारा काम कर देता था| मैंने दोपहर को लंच भी नहीं किया और बिल एंटर करता रहा| लंच के बाद मैडम आईं और जब उन्हें सर से ये पता चला की मैं रिजाइन कर रहा हूँ तो पता नहीं उन्होंने सर को क्या समझाया की सर खुद मुझे बुलाने के लिए आये| मैं उनके केबिन में हाथ बंधे खड़ा हो गया, मैडम और सर मेरे सामने ही बैठे थे;
बॉस: अच्छा ये बताओ की रेज क्यों चाहिए तुम्हें? पार्ट टाइम टूशन तो तुम पढ़ा ही रहे हो और अभी सिंगल हो तो तुम्हारा खर्चा ही क्या है?
मैं: सर 20,000/- की सैलरी में 8,000/- तो रेंट है, घर का खर्चा जिसमें खाना-पीना, बिजली-पानी सब जोड़-जाड कर 6-7 हजार हो जाता है| बाइक का तेल-पानी और मेंटेनेंस 1500/-,तो बचे 3,500/-! तीन साल में मेरी सेविंग कुछ 60-65 हजार ही हुई है| घर तो मैं ने पैसे भेजना बंद कर दिए! अब आप ही बताइये की आगे शादी करूँगा तो घर कैसे चलेगा मेरा?
मेरा जवाब सुन कर मैडम के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई पर सर के पास कोई जवाब नहीं बचा था|
बॉस: ठीक है मैं 2,000/- बढ़ा देता हूँ!
मैं: सॉरी सर! एटलीस्ट मुझे 5,000/- का रेज चाहिए| (अब मैं बार्गेन करने पर उत्तर आया तो मैडम के चेहरे पर और मुस्कराहट चा गई|)
बॉस: क्या? मैं इतना रेज नहीं कर सकता|
मैं: सरमार्किट में 30,000/- का ऑफर मिल रहा है मुझे, मैं तो फिर भी आपसे 25,000/- मांग रहा हूँ, वो भी 3 साल बाद! हर साल अगर 2,000/- भी बढ़ाते तो भी अभी आपको 6,000/- बढ़ाने पड़ते!
बॉस: नहीं! 3,000/- बढ़ा दूँगा इससे ज्यादा नहीं!
मैं: सर आप शुक्ल जी को 35,000/- देते हैं, ना तो वो ऑफिस से बहार का
काम करते हैं ना ही ऑफिस के अंदर रह कर कोई काम करते हैं| जब तक आप उन्हें चार बार न कह दें वो फाइल खत्म करते ही नहीं|
बॉस: उनकी फॅमिली है, बच्चे हैं!
मैं: तो सर काबिलियत का कोई मोल नहीं? अगर फॅमिली का ही मोल है तो मैं अपने सारे परिवार को यहीं बुला लेता हूँ! फिर तो मुझे ज्यादा पैसे मिलेंगे ना?
बॉस: क्या करोगे 5,000/- बढ़वा के? तुम्हारे परिवार के पास इतनी जमीन है!
मैं: सर मैं उनके टुकड़ों पर नहीं पलना चाहता, अपना अलग स्टैंड है मेरा| अगर जमीन ही देखनी होती तो मैं यहाँ 20,000/-की नौकरी करता?
बॉस: चलो अगर मैं सैलरी बढ़ा दूँ तो तुम्हें ये शाम को जल्दी जाना बंद करना होगा!
मैं: सर मैं अगर जल्दी जाता हूँ तो वापस आ कर सारा काम खत्म कर देता हूँ और अगले दिन आपको फाइल टेबल पर मिलती है| बाकी ऑफिस में सोमवार से शुक्रवार काम होता है मैं तो फिर भी 6 दिन आता हूँ|
बॉस ने ना में सर हिलाया और मैंने भी आगे कुछ नहीं कहा और वापस अपने डेस्क पर बैठ गया और काम करने लगा| शाम को मैंने इनवॉइस की फाइल सर को कम्पलीट कर के दी और ऋतू से मिलने निकल पड़ा| ऋतू को जब ये सब बताया तो वो ये सुन कर मायूस हो गई| उसने अभी तक अनु मैडम से अपनी जॉब की बात नहीं की थी वरना बॉस मेरी सैलरी कतई रेज नहीं करता, क्योंकि उसे ऋतू का स्टिपेन्ड (stipend) भी देना पड़ता और मेरी सैलरी रेज भी करनी पड़ती| "लगता है आपके साथ ऑफिस में काम करना सपना रह जायेगा|" उसने मायूस होते हुए कहा| मैंने ऋतू की ठुड्डी पकड़ के ऊपर उठाई और उसकी आँखों में ऑंखें डाले कहा; "ये अकेला ऑफिस तो नहीं है ना जहाँ हम दोनों साथ काम कर सकते हैं, ये नहीं तो कोई दूसरा ऑफिस सही|"
पर कुदरत को कुछ और ही मंजूर था, करीबन एक हफ्ते बाद एक और एम्प्लोयी ने बॉस के काइयाँपन से तंग आ कर रिजाइन कर दिया| उसी दिन सर ने मुझे अपने केबिन में बुलाया और कहा;
बॉस: मानु मैं तुम्हारी सैलरी रेज कर रहा हूँ, लेकिन अगले महीने से!
मैं: ठीक है सर...थैंक यू!
मैं ख़ुशी-ख़ुशी बहार आया और अपना काम करने लगा की तभी मैडम आ गईं; "अरे पार्टी कब दे रहे हो?"
"अगले महीने mam ... सैलरी अगले महीने से बढ़ेगी!"
"ये ना!! सच्ची बहुत कंजूस हैं! चलो कोई बात नहीं अगले महीने पार्टी पक्की! अच्छा सुनो...
वो प्रोजेक्ट के डिटेल आ गई हैं मेरे पास तो उस पर डिस्कशन करना है, लंच के बाद| ठीक है?
"जी mam"
मैडम के जाते ही मैंने ऋतू को कॉल किया और उसे खुशखबरी दी और उसे नए प्रोजेक्ट के बारे में भी बताया| "अभी के अभी मैडम को कॉल कर और कॉफ़ी पीने के बहाने कॉलेज के आस-पास बुला और उनसे जॉब की बात छेड़ और जैसे समझाया था वैसे ही बात करना|" ये सुन कर ऋतू बहुत खुश हुई और उसने तुरंत ही मैडम को फ़ोन मिलाया और उसके कुछ देर बाद मैडम भी निकल गईं| आगे जो कुछ हुआ उसके बारे में ऋतू ने मुझे खुद बताया;
ऋतू: Hi mam!
अनु मैडम: Hi!!!
दोनों एक टेबल पर बैठ गए और mam ने दो कॉफ़ी आर्डर की|
ऋतू: I’m sorry to bother you mam!
अनु मैडम: Oh no no no… that’s okay! I always look for reason to escape from office! So what do you do? Where do you stay?
ऋतू: I’m a B Com student and I live in the hostel nearby. I actually neede your help. Umm…I’m actually looking for some work. Actually…umm…. I don’t want to be a burden on my family…I thought I can … you know earn something…. And learn from the experience… can you help me find a part time job? Like Saturdays and Sundays… Maybe in your company? Here’s my 10th and 12th marksheet! (ऋतू ने बहुत सोच-सोच कर और घबराते हुए बोला|)
ये सुन कर मैडम कुछ सोच में पड़ गईं और फिर बोलीं;
अनु मैडम: Ok join me from Saturday! I’ve a project and I was thinking of someone of your caliber to work with. But, stipend will be 1,000/- only, since you’re not joining us for 6 days a week!
ऋतू: No problem mam, that’s not an issue. Thank you mam! Thank you!!!!
लंच के बाद जब मैडम आईं तो वो बहुत खुश लग रहीं थीं, उन्होंने मुझे और रेखा को अपने केबिन में बुलाया|
अनु मैडम: एक लड़की और हमें ज्वाइन कर रही है, पर वो सिर्फ सैटरडे और संडे ही आ पायेगी|
रेखा: क्यों mam?
अनु मैडम: यार! काम जयदा है और यहाँ कोई भी नहीं है जो PPTs और EXCEL पर फटाफट काम करता हो| ये लड़की अभी स्टूडेंट है और कुछ काम सीखना चाहती है| मानु जी आप संडे आ पाओगे? क्योंकि मंडे to सैटरडे तो ऑफिस का काम ही चलेगा पार्ट टाइम में आप दोनों काम करो तो मैं आपको कम्पेन्सेट भी करवा दूँगी|
मैं: ठीक है mam ... no problem.
राखी; ठीक है mam ...
कोई दिक्कत नहीं|
शाम को जब मैं और ऋतू मिले तो आज मैंने उसे कस कर अपनी बाहों में भर लिया| ऋतू को समझते देर ना लगी की उसकी नौकरी पक्की हो गई है| मैंने उसे कुछ बात बातें की सब के सामने उसे मुझसे मेरा नाम ले कर बात करनी है और किसी को जरा भी शक नहीं होना चाहिए की हम दोनों एक दूसरे को जानते हैं, ये सुन कर ऋतू बहुत एक्साइट हो गई! कुछ दिन और बीते और आखिर सैटरडे आ ही गया, ऋतू ने अपने हॉस्टल में आंटी जी से बात कर ली और उन्हें वही तर्क दिया जो उसने अनु मैडम को दिया था| आंटी जी ने बात कन्फर्म करने के लिए मुझे कॉल भी किया और मैंने उन्हें विश्वास दिला दिया की ऋतू कोई गलत काम नहीं कर रही है, पर उन्हें ये नहीं बताया की वो मेरी ही कंपनी में काम करेगी| सैटरडे सुबह मैं जल्दी से ऑफिस पहुँच गया, ठीक 10 बजे ऋतू की एंट्री हुई| नारंगी रंग के सूट में आज ऋतू क़यामत लग रही थी|
update 26
ऋतू को देखते ही ये बोल अपने आप मेरे मुँह से निकलने लगे;
"एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा, जैसे
खिलता गुलाब, जैसे
शायर का ख्वाब, जैसे
उजली किरन, जैसे
बन में हिरन, जैसे
चाँदनी रात, जैसे
नरमी बात, जैसे
मन्दिर में हो एक जलता दिया, हो!"
मेरी बगल में ही राखी खड़ी थी और ये गाना सुनते ही मुझे कोहनी मारते हुए बोली; "क्या बात है मानु जी?!!" अब मुझे कैसे भी बात को संभालना था तो मैंने बात बनाते हुए कहा; "सच में यार ये हूर-परी कौन है?"
"पता नहीं! चलो न चल के इंट्रो लेते हैं इसका|" राखी ने खुश होते हुए कहा|
"ना यार! कहीं बॉस की कोई रिश्तेदार निकली तो सर क्लास लगा देंगे दोनों की|" अभी हम दोनों ये बात कर ही रहे थे की ऋतू के ठीक पीछे से अनु मैडम और सर आ गए| और उन्हें देख कर हम दोनों अपने-अपने डेस्क पर चले गए| मैडम ने बॉस से ऋतू का इंट्रो कराया और बताय की प्रोजेक्ट के लिए ऋतू ने 'as a trainee' ज्वाइन किया है| फिर मैडम ने मुझे और राखी को बुलाया और ऋतू से इंट्रो कराया; "ऋतू ये दोनों आपके टीम मेट्स हैं, राखी और मानु|" ऋतू ने राखी से हाथ मिलाया और मुझे हाथ जोड़ कर नमस्ते कहा| ये देख कर राखी के चेहरे से हँसी छुप नहीं पाई और उसे हँसता देख मैडम ने उससे पूछा भी की वो क्यों हँस रही है पर वो बात को टाल गई| "और मानु ये हैं रितिका, फर्स्ट ईयर कॉलेज स्टूडेंट हैं|" अब मैंने भी अपनी हँसी किसी तरह छुपाई और बस "नमस्ते" कहा| ये देख कर ऋतू के चेहरे पर भी मुस्कराहट आ गई| "अरे हाँ..
आपकी डायरी इन्हीं ने लौटाई थी|" मैडम ने मुझे डायरी वाली बात याद दिलाई| "ओह्ह! Really!!! Thank You रितिका जी!!" मैंने मुस्कुरा कर ऋतू को थैंक यू कहा|
मेरा ऋतू को रितिका कहने से उसे थोड़ा अटपटा सा लगा जो उसके चेहरे से साफ़ झलक रहा था|
खेर मैडम ने ऋतू को ब्रीफ करने के लिए हम दोनों तीनों को अपने केबिन में बुलाया और ऋतू को राखी के साथ प्लानिंग और एनालिसिस में लगा दिया और मेरा काम इनकी प्लानिंग और एनालिसिस के हिसाब से PPTs और Excel Sheet तैयार करना था| अभी चूँकि मुझे पहले बॉस का काम करना था तो मैं उसी काम में लगा था| पर मेरी नजरें काम में कम और ऋतू पर ज्यादा थी| ऋतू को वादा करने से पहले मैं कभी-कभी चाय-सुट्टा पीता था, उसी वक़्त राखी भी आ जाया करती थी पर वो सिर्फ चाय ही पीती थी| आज भी वही हुआ, राखी खुद भी आईं और साथ में ऋतू को भी ले आई|
राखी: अरे मुझे क्यों नहीं बोला की आप चाय पीने जा रहे हो?
मैं: आप लोग बिजी थे! (मैंने ऋतू की तरफ देखते हुए कहा और मुझे अपनी तरफ देखता हुआ पा कर ऋतू का सर शर्म से झुक गया|)
राखी: अच्छा?? (मेरे ऋतू को देखते हुए राखी ने जान कर अच्छा शब्द बहुत खींच कर बोला| जिसे सुन ऋतू की हँसी छूट गई|)
मैं: और बाताओ क्या-क्या सीखा रहे हो आप रितिका जी को? (मैंने इस बार राखी की तरफ देखते हुए कहा|)
राखी: घंटा! मैडम तो बोल गई की प्लानिंग करो एनालिसिस करो पर साला करना कैसे है ये कौन बताएगा? (राखी के मुँह से 'घंटा' शब्द सुन ऋतू हैरान हो गई|)
मैं: तो 2 घंटे से दोनों कर क्या रहे थे?
राखी: कुछ नहीं.... कुछ इधर-उधर की बातें| आपकी बातें!!! (राखी ने मुझे छेड़ते हुए कहा|)
मैं: मेरी बातें?
राखी: और क्या? जब मैं पहलीबार ज्वाइन हुई तब मुझसे तो आपने कभी बात नहीं की? और रितिका को देखते ही गाना निकल गया मुँह से?
ये सुन कर मैं जानबूझ कर शर्मा गया और ऋतू हैरानी से आँखें बड़ी करके मुझे देखने लगी|
ऋतू: कौन सा गाना गए रहे थे सर?
राखी: एक लड़की को देखा तो....
मैं कुछ नहीं बोला और एक घूँट में सारी चाय पी कर वापस ऊपर आ गया, और मुझे जाता हुआ देख राखी ठहाके मार के हँसने लगी| आज ऋतू के मुझे 'सर' कहने पर मुझे एक अजीब सी ख़ुशी हुई और वो भी शायद समझ गई थी| लंच के बाद मैं दोनों के साथ रिसर्च, प्लानिंग और एनालिसिस में उनके साथ लग गया| मैंने दोनों को पुराना डाटा दिखाया और उसकी मदद से रेश्यो निकालना बता कर मैं अपने डेस्क पर वापस आ गया| कुछ देर बाद अनु मैडम भी आईं और वो भी मेरे इस बदले हुए बर्ताव से थोड़ा हैरान थीं| उन्होंने मुझे दोनों की मदद करते हुए देख लिया था इसलिए मेरी सराहना करने से वो नहीं चूँकि; "अरे भैया तुम दोनों से ज्यादा होशियार है मानु! कुछ सीखो इनसे, अपना काम तो करते ही हैं साथ-साथ दूसरों की मदद भी करते हैं|" ये बात मैडम ने शुक्ल जी को सुनाते हुए कही|
शाम को जब जाने का नंबर आया तो मैं सोचने लगा की कैसे ऋतू को घर छोड़ूँ? अब मैं सामने से जा कर तो पूछ नहीं सकता था इसलिए मुझे कुछ न कुछ तो सोचना ही था! तभी मैडम ने उसे खुद ही लिफ्ट ऑफर कर दी और मैं बस ऋतू और मैडम को जाता हुआ देखता रहा| राखी पीछे से आई और मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बोली; "आज लिफ्ट मिलेगी?" मैंने बस मुस्कुरा कर हाँ कहा और फिर ऋतू की जगह राखी को अपने पीछे बिठा कर उसके घर छोड़ा| मेरे घर पहुँचने के घंटे भर बाद ऋतू का वीडियो कॉल आया, वो बाथरूम में बैठे हुए खुसफुसाई;
ऋतू: I Love You जानू! uuuuuuuuuuuuuummmmmmmmmmmmmmmmmmaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh !!!!!
मैं: क्या बात है बहुत खुश है आज?
ऋतू: जानू! बर्थडे के बाद आज का दिन मेरे लिए सबसे जबरदस्त था! कल के दिन के लिए सब्र नहीं कर सकती मैं|
मैं: अच्छा जी? जब मुझसे नाराज हुई थी और हमने पहली बार 'प्यार' किया था वो दिन जबरदस्त नहीं था? (मैंने ऋतू को छेड़ते हुए कहा|)
ऋतू: वो दिन तो मेरे जीवन का वो स्वर्णिम दिन था जिसका ब्यान मैं कभी कर ही नहीं सकती| उस दिन तो हमने एक दूसरे को समर्पित कर दिया था| हमारा अटूट रिश्ता उसी दिन तो पूरा हुआ था|
मैं: वैसे आज मुझे तुम्हारे 'सर' कहने पर बड़ी अजीब सी फीलिंग हुई! पेट में तितलियाँ उड़ने लगी थी!
ऋतू: आपका नाम ले कर आपको पुकारने का मन नहीं हुआ, इसलिए मैंने आपको 'सर' कहा| एक बात तो बताइये, आपने सच में मुझे देख कर गाना गाय था?
मैं: हाँ, तू लग ही इतनी प्यारी रही थी की गाना अपने आप मेरे मुँह से निकल गया|
ये सुन कर ऋतू मुस्कुराने लगी| फिर इसी तरह हँसी-मजाक करते-करते खाने का समय हो गया और खाना मुझे ही बनाना था पर बुरा ऋतू को लग रहा था| "हमारी शादी जल्दी हुई होती तो मैं आपके लिए खाना बनाती|" ऋतू ने नाराज होते हुए कहा| "जान! शादी के बाद जितना चाहे खाना बना लेना पर तब तक थोड़ा-बहुत एडजस्ट तो करना पड़ता है|" मैंने ऋतू को मनाते हुए कहा|
"वैसे कितना रोमांटिक होगा जब आप और मैं एक साथ एक ही ऑफिस जायेंगे?! स्टाफ के सारे लोग हमें देख कर
जल-भून जायेंगे!" ऋतू की बात सुन कर मेरे चेहरे पर मुस्कराहट आ गई|
"लोगों को जलाने में बहुत मजा आता हैं तुम्हें?" मैंने पूछा|
"अब आपके जैसा प्यार करने वाला हो तो जलाने में मजा तो आएगा ही|" ऋतू ये कहते हुए हँसने लगी| तभी बहार से मोहिनी की आवाज आई; "अरे अब क्या बाथरूम में बैठ कर एकाउंट्स के सवाल हल कर रही है?! जल्दी बहार आ, खाना लग गया है|" ऋतू ने हड़बड़ा कर कॉल काटा और मुझे बहुत जोर से हँसी आ गई| बाद में उसका मैसेज आया; "बहुत मजा आता है ना आपको मेरे इस तरह छुप-छुप कर आपसे बात करने में?!" मैंने भी जवाब में हाँ लिखा और फ़ोन रख कर खाना बनाने लगा| खाना खा कर बड़ी मीठी नींद सोया और सुबह जल्दी से तैयार हो गया, सोचा की आज ऋतू को मैं ही ऑफिस ड्राप कर दूँ पर फिर याद आया की किसी ने देख लिया तो? तभी दिमाग में प्लान आया की मैं ऋतू को बस स्टैंड पर छोड़ दूँगा वहाँ से वो पैदल आ जाएगी| पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, ऋतू को मैडम ही लेने आ रही थी| मैं अपना मन मार के ऑफिस पहुँचा, पर वहां कोई नहीं था तो मैं नीचे चाय पीने लगा, तभी वहां राखी आ गई और वो भी मेरे साथ चाय पीने लगी|
अनु मैडम और ऋतू एक साथ गाडी से निकले और हमारे पास ही आ कर खड़े हो गए और चाय पीने लगे| चाय पी कर हम सब एक साथ ऊपर आये और सीधा मैडम के केबिन में बैठ गए| कल के काम पर डिस्कशन के बाद मैडम ने तीनों को अलग-अलग बिठा दिया और राखी को प्लानिंग और ऋतू को एनालिसिस का काम दे दिया| मैं बैठा कुछ PPTs स्टडी कर रहा था, मैडम भी मेरे पास आ गईं और कल जो कुछ थोड़ा बहुत काम हुआ था उसके ग्राफ्स बनाने में मदद करने लगी| मैडम को पमरे साथ बैठा देख ऋतू को अंदर से जलन होने लगी थी, वो बहाने से बार-बार आ रही थी और मैडम से कुछ न कुछ पूछ रही थी| हालाँकि ऋतू बहुत कोशिश कर रही थी की उसकी जलन मुझ पर जाहिर ना हो पर मैं उसकी जलन महसूस कर पा रहा था| आखरी बार जब ऋतू मैडम से कुछ पूछने आई तो मैडम उठ खड़ी हुई; "मानु आप ये PPTs का आर्डर ठीक करो मैं जरा रितिका को एक बार सारा काम समझा दूँ वरना बेचारी सारा टाइम इधर-उधर भटकती रहेगी|”
ऋतू को आधा घंटा समझाने के बाद मैडम ने मुझे उसकी हेल्प करने को कहा और खुद बाहर चली गईं| अब मैंने ऋतू के साथ बैठ कर उसे कुछ फाइल्स वगैरह के बारे में बताया, क्योंकि उसे कंप्यूटर उसे थोड़ा-बहुत ही आता था जो भी उसने अभी तक कॉलेज में सीखा था| आज मैंने उसे माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस के बारे में बताय और टाइप करने के लिए कुछ शॉर्टकट बताये| ये सब ऋतू ने अब्दी ध्यान से सुना और अपने राइटिंग पैड में लिख लिया| जब मैं उठ के जाने लगा तो ऋतू ने मेरा हाथ चुपके से पकड़ लिया और मुझे खींच कर बिठा दिया| वो खुसफुसाती हुई बोली; "कहाँ जा रहे हो आप? बैठो ना थोड़ी देर और!" मैं भी बैठ गया पर हम दोनों में कोई बात नहीं हो रही थी, बस एक दूसरे को देख रहे थे| ऋतू ने मेरा हाथ अपने हाथ में
ले लिया था और उसके हाथों की तपिश मुझे मेरे ठन्डे हाथों पर होने लगी थी| उसके होंठ थर-थरा रहे थे और मेरा मन भी उन्हें चूमने को व्याकुल था! आज अगर ऑफिस नहीं होता तो हम दोनों मेरे घर पर एक दूसरे के पहलु में होते!
"यहाँ कोई एकांत जगह नहीं है जहाँ आप और मैं थोड़ा टाइम....." ऋतू इतना कहते हुए रुक गई| मुझे उसका उतावलापन देख कर हँसी आ रही थी; "जान! ये ऑफिस है मेरा! यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता, किसी ने देख लिया ना तो ???"
ये सुन कर ऋतू का दिल टूट गया, "अच्छा चाय पियोगी?" ये सुन कर ऋतू की आँखों में चमक आ गई| हम दोनों उठ के नीचे आये और मैंने ऋतू को मेरी वाली स्पेशल चाय पिलाई| हम अभी चाय पी ही रहे थे की राखी आ गई; "अच्छा जी! मेरे से चोरी-छुपे चाय पी जा रही है?" उसने हम दोनों को छेड़ते हुए कहा|
"मैंने सोचा की आज रितिका जो को मानु वाली स्पेशल चाय पिलाई जाए|" मैंने बात बनाते हुए कहा|
"वो तो बिना सिगेरट के पूरी नहीं होती!" ये कहते हुए राखी ने चाय के साथ एक सिगरेट ली और काश ले कर मेरी तरफ बढ़ा दी| ये देख कर ऋतू हैरान हो गई, उसे लगा शायद मैंने उससे किया वादा तोड़ दिया है|
"सॉरी! मैंने छोड़ दी|" मेरा जवाब सुन कर राखी हैरान हो गई?
"हैं??? आप ही ने तो इलाइची वाली चाय के साथ ये कॉम्बो बनाया था और अब खुद ही नहीं पी रहे?" राखी की बात सुन कर ऋतू दुबारा हैरान हो गई|
"पर अब छोड़ दी| अब जीने की आदत हो गई है|" ये मैंने ऋतू को देखते हुए कहा| इस बार तो राख ने मेरी चोरी पकड़ ही ली; "अच्छा जी!!! रितिका जी को खुश करने को कह रहे हो!" ये सुन कर हम तीनों ठहाका लगा कर हँसने लगे| बस इसी तरह हँसी-मजाक में वो दिन निकला और मैडम ने ही राखी और ऋतू को घर छोड़ा और मैं अकेला घर वापस आ गया|
update 27
इसी तरह ऋतू और मेरे प्यार भरे दिन बीतने लगे, सोमवार से शुक्रवार उससे शाम को मिलना और फिर शनिवार और इतवार साथ-साथ ऑफिस में पूरा दिन गुजारना| घर से फ़ोन आता तो मैं कह देता की मैं नहीं आ पाउँगा क्योंकि बॉस छुट्टी नहीं दे रहा है| ऋतू के आने के बाद ऑफिस में एक ग्रुप बन आगया था| मैं, अनु मैडम, राखी और ऋतू का एक ग्रुप और बाकी लोगों का एक ग्रुप! मैडम भी ऋतू के काम से बहुत खुश थीं और प्रोजेक्ट भी आधा खत्म भी हो गया था| मैडम तो इतनी खुश थीं की उन्होंने कहा की ऋतू की ग्रेजुएशन के बाद वो हमारा ऑफिस ही ज्वाइन कर ले| पर ये तो मेरा मन जानता था की ऋतू की ग्रेजुएशन के बाद तो हम दोनों ही यहाँ नहीं होंगे!
आज का दिन बहुत अलग था, चूँकि आज शनिवार था तो आज ऋतू भी ऑफिस आई हुई थी| 11 बजे राख ऑफिस में आई और उसके हाथ में मिठाई का डिब्बा था| सबसे पहले बॉस को और फिर मैडम को उसने खुशखबरी दी की उसकी शादी तय हो गई है| ऑफिस में सब का उसने मुंह मीठा कराया और मेरा नंबर आखरी था| ऋतू से प्यार होने से पहले मैं राखी को बहुत पसंद करता था, पर कभी उससे काम के इलावा कोई बात नहीं की|
हम दोनों ने जो भी थोड़ा बहुत खुल के बातें की वो सब राख के मुंबई मिलने के बाद था| शायद इसीलिए उसकी शादी की बात सुन कर थोड़ा दुःख हुआ! पर अगले ही पल मुझे ऋतू का हँसता हुआ चेहर दिखा और मुझे होश आया की मेरे पास तो ऋतू का प्यार है! मन में ख़ुशी थी इस बात की, की राखी की शादी हो रही है पर दुःख शायद इस बात का था की पिछले कीच दिनों में हम जो थोड़ा बहुत खुल कर बातें करने लगे थे वो अब कभी नहीं हो पायेगी! मैं अपना ये गम छुपाये हुए था पर शायद ऋतू समझ चुकी थी| लंच में हम दोनों नीचे चाय पीने गए थे की तभी ऋतू ने मुझे एक तरफ अकेले में आने को कहा|
ऋतू: राखी वही लड़की है न जिसे आप बहुत प्यार करते थे?
मैं: पसंद करता था!
ऋतू: समझ सकती हूँ की आपको कैसा लगा होगा आज!
मैं: I’m happy for her!
ऋतू: Tha I know, but what about your inner wound! It must be hurting you from inside?!
मैं: It did hurt, but then I saw your beautiful smiling face and realized I’ve the most loving person with me.
ये सुन कर ऋतू के गाल शर्म से लाल हो गए| आगे हम कुछ बातें करते उससे पहले ही राखी आ गई और उसकी और ऋतू की बातें शुरू हो गई| दोनों कपड़ों को ले कर कुछ बातें कर रही थीं, मैंने आखरी घूँट चाय का पिया और फिर वहाँ से निकल आया| वो पूरा दिन ऋतू मेरे आस-पास मंडराती रही, किसी न किसी बहाने से मुझसे कुछ भी पूछने आती और मुझे हँसाती बुलाती रहती| उस दिन ऋतू को नजाने क्या सूझी की उसने मैडम से जल्दी जाने की बात बोली, अब मैडम तो उसे घर छोड़ने के लिए निकलना चाहती थीं क्योंकि उनको बॉस के सामने काम करना बिलकुल पसंद नहीं था| बॉस हमेशा उनपर धौंस जमाते और काम करवाते रहते थे| इसलिए मैडम इसी फिराक में रहती की कहीं न कहीं किसी न किसी बहाने से ऑफिस से निकल जाएँ| पर ऋतू ने बड़ी शातिर चाल चली; "mam वो मुझे अमीनाबाद मार्किट जाना है! वहाँ आपकी कार कैसे जाएगी? वहाँ तो पार्किंग भी नहीं मिलती? आप अगर सर (मेरी तरफ इशारे करते हुए) से कह दें तो वो मुझे वहाँ छोड़ देंगे?!" ऋतू ने जब मेरी तरफ इशारा किया तब मैं उसी तरफ देख रहा था पर जैसे मैडम ने मेरी तरफ देखा मैंने तुरंत नजरें फेर लीं| मेरी खुशकिस्मती की मैडम समझ नहीं पाईं और उन्होंने मुझे आवाज लगा कर बुलाया; "मानु जी! जरा हमारी रितिका की मदद कर दो| उसे अमीनाबाद मार्किट जाना है, आप उसे वहाँ छोड़ दो|" ये सुन कर बिलकुल हैरान था; "पर mam वहाँ तो इस वक़्त बहुत भीड़ होती है?"
"हाँ जी तभी तो आपको कह रही हूँ, आप रितिका को वहाँ छोड़ कर घर निकल जाना|" मैडम ने कहा|
"पर mam ...
वो सर???" माने थोड़ी चिंता जताई|
"कौन सा आप पहली बार जल्दी निकल रहे हो, मैं कह दूँगी की आज आपकी टूशन क्लास थोड़ा जल्दी थी|" मैडम की बात सुन कर रितिका का मन प्रसन्न हो गया और उसकी ख़ुशी उसके चेहरे से झलकने लगी| मैंने अपना बैग उठाया और हम दोनों नीचे आने को उतरने लगे| पर मैं जानबूझ कर चुप रहा ताकि मैडम को ये ना लगे की ये हमारी मिली-भगत है| नीचे आ कर मैंने ऋतू से कहा; "बहुत दिमाग चलने लगा है आज कल तेरा?" ऋतू बस हँसने लगी और आ कर मेरी बाइक पर पीछे बैठ गई| "अच्छा जान कहाँ है?" मैंने पूछा| "बाज़ार जायेंगे और कहाँ?" ऋतू ने थोड़ा इठलाते हुए जवाब दिया| मैंने बाइक उसी तरफ भगाई, वहाँ पहुँच कर ऋतू ने मुझे एक दूकान के सामने रुकने को कहा| मेरा हाथ पकड़ के मुझे वो अंदर ले गई और मेरे लिए शर्ट पसंद करने लगी| पर बेचारी जल्दी ही मायूस हो गई; "क्या हुआ जान!" मैंने उससे प्यार से पूछा तो उसने बताया की जो स्टिपेन्ड मिला था उससे वो मेरे लिए एक शर्ट लेना चाहती थी पर शर्ट की कीमत 1200/- से शुरू थी| "अरे पगली! ये तो स्टिपेन्ड है सैलरी थोड़े ही?! जब सैलरी मिलेगी तब ले लेना शर्ट, अभी हम तेरे लिए कुछ बालियाँ खरीदते हैं| पर ऋतू का मन नहीं था इसलिए मैंने उसे बहुत मस्का लगाया और उसके लिए मैंने बहुत सुंदर इमीटेशन वाली जेवेलरी खरीदवाई| पैसे ऋतू ने ही दिए और अब वो बहुत खुश थी; "पहली सैलरी जब मिलेगी ना तो आपके लिए मैं बिज़नेस सूट खरीदूँगी!" उसने मुझे चेताया और मैंने भी उसकी बात में हाँ मिला दी| उस दिन उसे मैंने ठीक 6 बजे उसके हॉस्टल छोड़ दिया और घर वापस आ गया| मन अब हल्का था और इसका सारा श्रेय ऋतू का जाता है| अगर वो मेरी जिंदगी में ना होती तो मैं अभी कहीं बैठ कर दारु पी रहा होता| कुछ और दिन बीते और आखिर मेरा जन्मदिन आ गया पर वो आया संडे के दिन! शुक्रवार को ही ऋतू ने मुझे कह दिया था की मैं संडे की छुट्टी ले लूँ पर जब मैंने अनु मैडम से छुट्टी मांगी तो उन्होंने कहा; "मानु जी! संडे को तो वीडियो कॉन्फ्रेंस है और हम सबको वहीँ बैठना है और आप ही तो उन्हें ग्राफ्स और PPTs समझाओगे! ये (बॉस) तो उस दिन यहाँ होंगे नहीं!" अब मैं आगे क्या कहता इसलिए मैंने उनकी बात मान लीं और ऋतू को लंच में फ़ोन कर के बता दिया| ऋतू का तो मुँह बन गया और वो मुझसे 'थोड़ा' नाराज हो गई| अगले दिन जब वो आई तब भी मुझसे कुछ नहीं बोली और मुझे गुस्सा दिखाते हुए मुँह इधर-उधर झटकती रही! उस दिन बॉस ने सारा काम मेरे मत्थे थोप दिया था और खुद शुक्ल जी और बाकियों को ले कर इलाहबाद निकल गए| मुझे गुस्सा तो बहुत आया पर एहि सोच कर संतोष कर लिया की कम से कम ऋतू तो मेरे सामने है ना| अब उसे मनाने के लिए मैं ही उसकी डेस्क के आस-पास मंडराता रहा|
"जान! मेरा प्यार बच्चा! मुझसे नाराज है?" मैंने सबसे नजर बचाते हुए ऋतू से तुतलाती हुई जुबान में कहा| ये सुन कर ऋतू के चेहरे पर हँसी
छा गई| "जानू! प्लीज कल छुट्टी ले लो, आपका बर्थडे अच्छे से सेलिब्रेट करना है!" ऋतू ने बहुत सारा जोर दे कर कहा| "बाबू! मैडम ने कहा है की कल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग है और हम तीनों आना है| इसलिए मुझे तो क्या आपको भी छुट्टी नहीं मिलेगी| ऐसा करते हैं की ऑफिस के बाद कहीं बाहर चलते हैं!" मैंने ऋतू को समझाते हुए कहा| "पर हॉस्टल में क्या कहूँगी?" ऋतू ने पूछा| अब इसका तो कोई इलाज नहीं था मेरे पास! "एक आईडिया है! आज जा के आंटी से कह देना की कल तुम्हें गाँव जाना है, मैं तुम्हें ठीक 7 बजे लेने आऊँगा और फिर तुम अपना छोटा सा बैग मेरे घर पर रख देना| उसके बाद ऑफिस और फिर बाद में पार्टी!" ये सुन कर ऋतू इतनी खुश हुई की उसने मुझे गले लगाने को अपने हाथ खोल दिया पर जब उसे एहसास हुआ की वो ऑफिस में है तो उसने ऐसे जताया जैसे वो अंगड़ाई ले रही हो| अगले दिन सारा काम प्लान के हिसाब से हुआ, मैं ऋतू को लेने अपनी बाइक पर हॉस्टल पहुँचा और वो मोहिनी को बाय बोल कर मेरे साथ निकल पड़ी| हमने घर पर ऋतू का बैग (जिसमें ऋतू जब गाँव जाती थी तो कुछ किताबें ले जाय करती थी|) रखा और फिर मैंने कपडे बदले और दोनों ऑफिस आ गए| आज मैंने ऋतू के सामने पहली बार शर्ट और टाई बंधी थी, शर्ट अंदर टक (tuck) थी और टाई लटक रही थी| ऋतू का मन बईमान हो रहा था और वो बार-बार सब की नजरें बचा कर मुझे कभी kiss करने का इशारा (Pout), तो कभी आँख मार देती| जब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग शुरू हुई तो मैडम ने सबसे पहले अपना ओपनिंग स्टेटमेंट दिया और उसके बाद ऋतू और राखी ने अपने एनालिसिस के बारे में बताया और मैं उन्हीं के साथ खड़ा हो कर ग्राफ्स दिखा रहा था| इसी एनालिसिस और ग्राफ्स के साथ मैंने अनु मैडम के क्लोजिंग स्टेटमेंट की PPT चला दी|
प्रेजेंटेशन के बाद मैडम बहुत खुश थीं और वो राखी और ऋतू के गले लग कर अपनी ख़ुशी प्रकट कर रही थीं| पर मुझसे वो गले नहीं मिलीं बल्कि हैंडशेक किया और बधाई दी! “Guys I’d like to celebrate this day, not only we nailed the presentation but its our beloved Manu’s birthday!” मैडम की बातें सुन कर मैं हैरान हो गया और अचरज भरी आँखों से उन्हें देखने लगा| “You thought you can escape without giving us treat?? Hunh??” मैं अब भी हैरान था और इधर राखी आ कर मेरे गले लग गई और 'Happy Birthday Dear' बोली| मैं अब भी हैरान था की मैडम को कैसे पता? "Mam, but how did you …..
” मेरी बात मैडम ने पूरी होने ही नहीं दी और बोल पड़ीं; "I’m really sorry! एक ही जगह काम करते हुए हमें 3 साल होगये पर आज तक मैंने कभी आपको बर्थडे विश (wish) नहीं किया, न कभी मैंने आपसे पूछा न कभी इस बारे में सोचा पर उस दिन अचानक से मेरी नजर आपकी फाइल पर पड़ी और आपका resume पढ़ा तब पता चला| सच में हम लोग अपनी जिंदगी में इतने व्यस्त हैं की अपने करीबी लोगों के, अपने colleagues के बर्थडे तक याद नहीं रखते| खेर अब ऐसा नहीं होगा और आज की पार्टी मेरी तरफ से!" मेरा ध्यान अब भी मैडम की बातों पर था और ऋतू मेरी तरफ देख कर हैरान थी| मैडम मेरे पास आईं और मुझे 'Happy Birthday मानु जी!' बोला और गले लग गईं, मैं अब भी कोई react नहीं कर पा रहा था| मेरे मुँह से बीएस 'Thank You Mam' निकला|
अनु मैडम को मेरे गले लगा देख ऋतू को जलन होने लगी और वो मेरे पास आई 'Happy Birthday Sir!!!' बोल कर मेरे गले लग गई| मैंने भी बहुत गर्म जोशी से उसे कस के गले लगा लिया और 'Thank You' बोला| “Let’s go to a pub!” मैडम ने बड़ी गर्म जोशी में कहा और राखी तुरंत तैयार हो गई पर मैं और ऋतू अब भी खामोश खड़े थे| "रितिका आप ड्रिंक करते हो?" मैडम ने ऋतू से पूछा| "किया तो नहीं मैडम पर आज जर्रूर करुँगी|" ऋतू ने भी बड़ी गर्म जोशी से जवाब दिया| "और आप मानु जी, आज तो आपको भी पीनी होगी!" मैडम ने मुझे हुक्म देते हुए कहा| मैंने नजर बचाते हुए ऋतू की तरफ देखा तो वो पहले से ही मेरी तरफ देख रही थी और जैसे ही हमारी नजर मिली तो उसने सर हिला कर हाँ कहा| मैंने भी मैडम को जवाब सर हिला कर हाँ कहा| मैडम ने और मैंने अपनी-अपनी गाड़ियाँ ऑफिस के पार्किंग लोट में ही छोड़ दी और मैंने कैब बुलवाई, मैं ड्राइवर के साथ और बाकी तीनों पीछे बैठ गए| पब का चुनाव मैंने ही किया, ये एक brewery थी और यहाँ की बियर बहुत ही मशहूर थी| हम चारों ने दो काउच वाला टेबल पकड़ा, अब मैडम एक काउच पर बैठ गईं और राखी दूसरे काउच पर| बचे मैं और ऋतू, तो ऋतू तो मैडम के बगल में बैठने से रही| आखिर वो राखी की बगल में बैठ गई और मैं मैडम के बगल में, ड्रिंक्स मेनू मैडम और मैंने उठाया; "भई मैं तो 30ml chivas लूँगी आप लोग देख लो क्या लेना है|" इतना कह कर मैडम ने मेनू रख दिया|
"Mam पहले एक-एक Lager Beer लेते हैं, It’s their sepeciality and I promise You’re gonna love it!” मैडम ने झट से मेरी बात मान ली और मैंने 4 Lager Beer आर्डर की| "क्या बात है मानु जी? बड़ी नॉलेज है आपको बीयर्स की?" राखी ने मुझे छेड़ते हुए पूछा| "कॉलेज के दिनों में कभी-कभी दोस्तों के साथ आता था|" मैंने कहा| जब बियर आई, सबने cheers किया और एक-एक सिप लिया तो मैडम की आँखें हैरानी से फटी रह गई| "मानु जी! You’re a geniuos! मानना पड़ेगा की आपकी ड्रिंक्स के मामले में चॉइस बहुत बढ़िया है!"
राखी की तारीफ करने से नहीं चुकी; "सीरियसली मानु जी! ना तो ये कड़वी है ना ही इसकी महक इतनी स्ट्रांग है! मैंने आजतक जितनी भी बियर पि ये वाली उनमें बेस्ट है|"
"अरे रितिका तुम्हें अच्छी नहीं लगी?" मैडम ने रितिका से
पूछा| "Mam पहलीबार के लिए ये एक्सपीरियंस बहुत बढ़िया है| मैं सोच रही थी की ये बदबू मारेगी और मुझे कहीं वोमिट ना होजाये पर ये तो बहुत स्मूथ है|" ऋतू ने मेरी तरफ देखते हुए कहा| अब खाने की बारी आई तो ऋतू को छोड़ कर हम तीनों नॉन-वेज निकले| हम सब के लिए तो मैंने चिकन विंग्स मंगाए और ऋतू के लिए हनी चिल्ली पोटैटो, आज पहली बार उसने ये डिश खाई और उसे पसंद भी बहुत आई| बियर का मग खत्म करते ही, सब पर बियर सुरूर चढ़ने लगा| लाउड म्यूजिक का असर राखी और ऋतू पर छाने लगा, अगला राउंड फिर से रिपीट हुआ| इस बार तो बियर खत्म होते ही राखी उठ खड़ी हुई और डी.जे. के सामने खड़ी होकर झूमने लगी और गाने पर थिरकने लगी| दो मिनट बाद
वो ऋतू को भी खींच कर ले गई और बियर का नशा ऋतू पर थोड़ा ज्यादा ही दिखने लगा और दोनों ने झूमना शुरू कर दिया| गाने अभी अंग्रेजी बज रहे थे, मैं और मैडम अकेले बैठे बस गाने को एन्जॉय कर रहे थे|
update 28
कुछ देर बाद मैडम ने पूछा की क्या मैं हार्ड ड्रिंक लूँगा तो मैंने हाँ कह दिया| मैडम ने दो Chivas 30ml मंगाई! हमने चियर्स किया और पहला सिप लिया| मैंने आज पहलीबार इतनी महंगी दारु पि थी और उसका स्वाद वाक़ई में बहुत अच्छा था| बिलकुल स्मूथ और गले से उतरते हुए बिलकुल नहीं जल रही थी| टेस्ट भी बिलकुल स्मूथ... मैं तो उसके सुरूर में खोने लगा था| इतने दिनों बाद दारु मेरे सिस्टम में गई थी और पूरा सिस्टम ख़ुशी में नाच रहा था! मैडम को अब अच्छा नशा हो गया था और वो उठ कर खड़ी हुईं और वेटर को बुला कर उसके कान में कुछ कहा और फिर मेरा हाथ पकड़ के मुझे खड़ा किया| मैडम मुझे जबरदस्ती डांस फ्लोर पर ले गईं और उन्होंने थिरकना शुरू कर दिया| डी.जे. ने आखिर मैडम का गण बजा दिया; "आजा माहि... आजा माहि...आ सोनिये वे आके ..." ये सुनते ही मैडम ने जो डांस किया की मैं बस देखता ही रह गया, ऋतू और राखी भी मैडम के साथ डांस करने लगे| मैडम मेरी तरफ देखते हुए डांस कर रही थी और लिप सिंक कर के गा रही थीं; "आजा माही... आजा माही...
आ सोनेया वे आके अज मेरा गल लग जा तू!" ये सुन कर मुझे बड़ी शर्म लग रही थी, पर ऋतू का ध्यान इस बार नहीं था|
मैंने भी थोड़ा डांस करना शुरू कर दिया था और तीनों के साथ डांस कर रहा था| अगला गाना बजा; "Angel eyes" और फिर तो मैडम और मैंने मिलके साथ डांस किया| मैडम ने आकर मुझे गले लगा लिया और मेरा हाथ उठा कर अपनी कमर पर रख लिया और अपनी बाहें मेरे गले में डाल दि और हम दोनों थिरकने लगे| ऋतू ने जब ये देखा तो उसने कुछ रियेक्ट नहीं किया बस मुझे आँख मार दी और अपना डांस चालु रखा| "my baby’s got ooooooooooooooo” मैं और मैडम एक साथ लिप सिंक कर के गा रहे थे| फिर गाने की लाइन आई; "तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया, बैठे ही बैठे मैंने दिल खो दिया!" तो मैडम ने मेरी आँखों में आँखें डालते हुए गाने लगी| मैंने मैडम की इस बात का कोई जवाब नहीं दिया, देता भी क्या? मुझे लग रहा की मैडम तो बस गाना गा रही हैं, सच में मुझसे प्यार का इजहार थोड़े ही कर रहीं हैं! वैसे ये सुनने में रोमांटिक तो लग रहा था पर हम तो पहले ही ऋतू के हो चुके थे!
अगला गाना चेंज हुआ तो मैडम शर्मा गईं और अपना पेग पीने चली गईं और इधर ऋतू मेरे पास आ कर नाचने लगी| अगला गाना ये प्ले हुआ; "गज़ब का है दिन सोचो ज़रा ये दीवानापन देखो ज़रा तुम हो अकेले हम भी अकेले मज़ा आ रहा है कसम से.. कसम से.." बस फिर क्या था मैंने और ऋतू ने किसी की भी परवाह किये बगैर एक दूसरे को कस कर बाहों में भरा और गाने पर थिरकने लगे|
अब मैडम भी अपना पेग खत्म कर के वापस आ चुकी थीं, मैंने भी धीरे-धीरे ऋतू से दूरी बना ली और मैडम को शक नहीं होने दिया| अगला गाना बजा; "थोया-थोया" और अब तक राखी जो लड़कियों वाले ग्रुप में नाच रही थी वो मेरे पास आ गई;
"तूने क्या किया मेरी जान-ए-जा
एक नज़र में ही दिल चुरा लिया
मुझको क्या हुआ कोई जाने न
तुझको देखा तोह होश खो दिया" राखी ने ये लाइन मेरी तरफ ऊँगली करते हुए गाई| अब जब मेरी बारी आई तो मैंने भी गाने की आगे की लाइन गाई;
"तेरी हर नज़र तेरी हर अदा
क्या कहु तुमपे दिल है यह फ़िदा
तुझसे है ज़मीन तुझसे आसमान
तुझसे बढ़कर नहीं कोई नशा" और हम सारे नाचने लगे| अब बारी थी मेरी की मैं भी अपना पेग खत्म कर दूँ तो मैं तीनों को नाचता हुआ छोड़ के अपना पेग पीने लगा| तभी वहां नेक्स्ट गाना लगा; “Shape of you” मैं जल्दी से वपस डांस फ्लोर पर आ गया और चारों जोश से भर के नाचने लगे, "I'm in love with your body…
Oh—I—oh—I—oh—I—oh—I" ये लाइन चारों एक साथ चीखते हुए गा रहे थे| इस गाने के खत्म होने के बाद चारों चूँकि थक चुके थे इसलिए सारे वापस आ कर काउच पर 'फ़ैल' गए! जब सबकी सांसें दुरुस्त हुईं तो राखी ने कहा की उसे एक और बियर चाहिए और ऋतू ने कहाँ मुझे कोई हार्ड ड्रिंक try करना है| मैं हैरानी से ऋतू की तरफ देखने लगा, मैंने सोचा की मुझे उसे समझाना चाहिए तो मैंने बात बदलते हुए कहा; "आप में से किसी को brewery tank देखना है?" ऋतू ने जल्दी
से अपना हाथ उठाया पर उसके अलावा किसी ने कोई जोश नहीं दिखाया| मैडम ने भी कहा की बाद में देखेंगे अभी मैं ड्रिंक्स का आर्डर दे दूँ| "रितिका जी, आप आज LIIT try कर के देखो|" मैंने कोशिश की कि ऋतू हार्ड ड्रिंक ना ले वर्ण वो आज क्या रायता फैलाती ये मैं जानता था| "ये हार्ड ड्रिंक है?" ऋतू ने फटक से पूछा| "नहीं... its Long Island Ice Tea"
"पर बियर के बाद चाय कौन पीता है!" ऋतू ने बड़े भोलेपन से पूछा|
ऋतू की बात सुन कर मैं बहुत जोर से हँसा, राखी और यहाँ तक कि मैडम को भी नहीं पता था कि LIIT क्या होती है! "ये कोई चाय नहीं है बल्कि दो-तीन तरह कि हार्ड ड्रिंक्स को मिला कर बनाया जाता है| टेस्ट में ये मीठी होती है पर नशा बियर के मुकाबले थोड़ा ज्यादा होता है|" ये सुन कर तीनों ने try करने की हामी भरी और मैंने तीनों के लिए ये मंगाई और अपने लिए 'ale beer' मंगाई| जब आर्डर सर्व हुआ तो तीनों मेरी तरफ देखने लगे और पूछने लगे की मैंने क्या मंगाया है? "ये 'ale beer' है| ये थोड़ी स्ट्रांग है, टेस्ट में हलकी सी कॉफ़ी की महक आती है|" ये सुनना था की सबसे पहले मैडम ने एक सिप लिया और दूसरा सिप ऋतू ने लिया और लास्ट सिप राखी ने लिया|
"ये तो थोड़ी कड़वी है!" ऋतू ने मुँह बनाते हुए कहा| उसके इस बचकानेपन पर मुझे हँसी आ गई| आधी बियर खत्म कर मैं वाशरूम के लिए उठा और ऋतू भी उठ खड़ी हुई और फिर हम दोनों वाशरूम आ गए| अंदर घुसने से पहले ही मैंने ऋतू का हाथ पकड़ लिया और उसके कान में बोला; "हार्ड ड्रिंक मत लेना!" उसने सवालियां नजरों से पूछा की आखिर क्यों नहीं लेना तो मैंने उसे समझाया; "नशे में अगर तुमने कुछ बक दिया तो काण्ड हो जायेगा!" पर उसने मेरी बात को अनसुना किया और वाशरूम में घुस गई| मैं भी वाशरूम में घुस गया पर मन ही मन तैयारी कर चूका था की बेटा आज तो काण्ड होना तय है! खेर वापस आया तो मैडम ने कहा की सब brewery tank देखना चाहते हैं| मैं उन्हें काउंटर के पीछे ले गया और उन्हें स्टेनलेस स्टील से बने टैंक दिखाए| तीनों वो देख कर खुश हो गए, दरअसल ये तो दारु थी जिसका थोड़ा-थोड़ा नशा सब पर छाने लगा था| हम वापस आ कर बैठे ही थे की डी.जे. ने गाना लगाया 'साइको सैयां'| अब ये सुन के तो तीनों पागल हो गए और मुझे खींच कर डांस फ्लोर पर ले आये और तीनों मेरे से चिपक कर नाचने लगे| मैं भी शराब के सुरूर में तीनों के साथ कदम से कदम मिला कर डांस करना शुरू कर दिया| उसके बाद तो डी.
जे ने एक के बाद ऐसे गाने बजाये की हम चारों ने बिना रुके आधा घंटा डांस किया| आखिर कर थक कर हम चारों काउच पर बैठे और मैडम ने लास्ट राउंड खुद आर्डर किया| Chivas के 2 30ml पेग और मेरे और अपने लिए मैडम ने 60ml large पेग मंगाया| मेरा कोटा सबके मुकाबले काफी बड़ा था इसलिए मैं अब भी होश में था| जबकि ऋतू और राखी तो ढेर हो चुके थे, दोनों को बहुत तगड़ा नशा हो चुका था| मैंने मैडम से चलने को कहा तो उन्होंने bill मंगवाया और बिल 8,000/- का आया| अब मैं और मैडम बिल भरने के लिए जिद्द करने लगे पर मैडम ने बात नहीं मानी और खुद ही बिल भरा| जब मैडम उठ कर खड़ी हुईं तो नशा उन पर जोर दिखाने लगा और वो लडख़ड़ाईं, मैंने उन्हें संभालना चाहा तो मेरा हाथ सीधा उनकी कमर पर जा पहुंचा| फिर मैडम ने जैसे-तैसे खुद को संभाला, पर ऋतू और राखी तो काउच पर ऐसे फैले हुए थे जैसे की कोई लाश! मैंने दोनों को उठाया और चलने को कहा तो दोनों से खड़ा नहीं हुआ जा रहा था| मैडम ये देख कर हँसने लगी, अब मैंने दोनों को जैसे-तैसे सहारा देकर उठाया और दोनों ने अपनी एक-एक बाँह मेरे गले में डाल दी| मैं दोनों के बीच में था और मैंने दोनों को उनकी कमर से संभाला हुआ था| ऋतू और राखी का सर मेरे सीने पर था और मैडम ने इस मौके का फायदा उठा कर अपना फ़ोन निकला और मेरी इस हालत में फोटो खींची और फिर हम चारों की सेल्फी भी ली| जैसे-तैसे मैं दोनों को बहार ले कर आया और मैडम भी लड़खड़ाते हुए बहार आ कर खड़ी हो गई|
"मानु जी ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई !!! कैब बुला..... लो ..... नाआ....
" मैडम ने शब्दों को खींच-खींच कर बोलना शुरू कर दिया| पर मैं कैब बुलाऊँ कैसे? ऋतू और राखी दोनों मेरे सीने से चिपकी हुई थी| मैंने दोनों को हिला- डुला कर होश में लाना चाहा, जैसे ही दोनों को थोड़ा होश आया की दोनों ने उलटी करनी शुरू कर दी| दोनों ही मुझसे अलग हो कर अलग-अलग दिशा में जा कर उलटी करने लगी, अब मैंने फटाफट फ़ोन निकाला और कैब बुक कर दी| मैंने पानी की बोतल ला कर ऋतू और राखी को दी और तभी कैब आ गई| अब तो मुझ पर भी दारु का असर चढ़ना शुरू हो गया था पर उतना नहीं था जितना मैडम और ऋतू पर था| मैं आगे बैठा और बाकी तीनों बड़ी मुश्किल से पीछे बैठे| किसी का हाथ किसी पर था तो किसी का मुँह किसी की गोद में! ड्राइवर भी हँस रहा था और कह रहा था साहब कैसे छोड़ोगे सब को? मैंने उसे पहले मैडम को घर छोड़ने के लिए कहा और गाडी उस तरफ चल पड़ी| मैडम का घर आया तो मैंने मैडम को जगाया, उनकी तो आँख भी नहीं खुल रही थी| कुनमुनाते हुए वो उठीं और शायद उनको थोड़ा होश था तो वो बोलीं की आज रात सब उन्हीं के घर सो जाते हैं| मैंने मना किया तो मैडम ने कहा की ऋतू को हॉस्टल इस हालत में कैसे छोड़ोगे? और राखी को उसके घर कैसे छोड़ोगे? उसके घर वाले बवाल करेंगे| आखिर मैडम ने राखी के घर फ़ोन कर के बोल दिया की राखी उन्हीं के घर रुकेगी रात और कल सुबह आ जायेगी घर|
मैं और मैडम पहले गाडी से उतरे पर बाकी दोनों देवियाँ बेसुध पड़ी थीं| मैंने ऋतू को खींच कर बाहर निकला और मैडम ने राखी को, ऋतू को मैंने गोद में उठा लिया और जैसे ही उसे मेरे जिस्म का एहसास हुआ उसने अपने दोनों हाथों को मेरे गले में डाल दिया| मैडम ने मुझे जब इस तरह से ऋतू को उठाये हुए देखा तो वो आँखें चढ़ा कर मुझे छेड़ते हुए बोली; "क्या बात है मानु जीईईईईईईईईई !!!" मैंने बस मुस्कुरा दिया और आगे कहता भी क्या| मैडम ने राखी को अपने शरीर का सहारा दे रखा था और उसका दाएं हाथ मैडम के गले में था| मैडम आगे और मैं पीछे था, दरवाजा खोल कर मैडम अंदर आईं और मुझे एक कमरे की तरफ इशारा किया, मैं वहीँ पर ऋतू को ले कर घुस गया| मैडम भी मेरे पीछे-पीछे राखी को ले कर आईं और राखी तो बेड पर औंधी पड़ गई (कुछ इस तरह)|
पर ऋतू ने अपनी बाहों को मेरे गले में कस रखा था| जब मैं उसे लिटाने लगा तो वो मुझे kiss करने के लिए pout करने लगी| ये मैडम ने देखा तो वो दरवाजे का सहारा ले कर खड़ी हो गईं और देखने लगीं की क्या मैं उसे Kiss करूँगा या नहीं?! चाहता तो मैं भी ऋतू को चूमना था पर मैडम के होते हुए ये नहीं हो सकता था| मैंने मैडम की तरफ मुँह घुमा लिया ताकि ऋतू मुझे Kiss न कर सके| मैडम ये देख कर हँस पड़ी और मैं भी हँस दिया| जैसे-तैसे मैंने ऋतू के हाथों को अपनी गर्दन से छुड़ाया और मुड़ के जाने लगा तो वो बुदबुदाते हुए बोली; "जानू!...उम्म्म... ममम.... प्लीज...
!!!" अब मैं क्या कहूं क्या करूँ कुछ समझ नहीं आया पर शुक्र है की मैडम ने इसका कोई गलत मतलब नहीं निकाला और बोली; "आज कुछ ज्यादा ही नशा हो गया रितिका को, ये भी होश नहीं है की वो कहाँ है और किसके साथ है|" मैंने बस जवाब में 'जी' कहा और हम बाहर हॉल में आ गए, अब बात ये थी की मैं सोऊँगा कहाँ? पर मैडम तो आज कुछ ज्यादा ही मूड में थी, उन्होंने 1000 Pipers की बोतल निकाली और दो पेग बना कर ले आईं|
मैं तो आज जैसे सातों जन्म की दारु की प्यास बुझा लेना चाहता था क्योंकि जानता था की कल से ऋतू मुझे पीने नहीं देगी| इसलिए मैंने पेग लिया और खड़ा-खड़ा ही पीने लगा और मैडम के घर को देखने लगा| उनसे नजरें मिलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी इसलिए मैं बस नजरें चुरा रहा था| "मानु जीईईईईईई!!! आप मेरे रूम में सो जाइये मैं यहाँ हॉल में काउच पर सो जाउँगी|" अब भला मैं ये कैसे मान सकता था; "नहीं Mam आप अंदर सो जाइये मैं यहाँ सो जाऊँगा|"
"आज तो आप बर्थडे बॉय हैं, आज तो आपका ज्यादा ख्याल रखना चाहिए|" मैडम ने सिप लेते हुए कहा|
"Mam अब तो 12:30 बज गए, मेरा दिन ख़त्म! अब तो मैं वापस से पहले वाला मानु ही हूँ|" मैंने अपने पेग का आखरी घूँट पीते हुए कहा|
"चलिए ना आपकी न मेरी, हम दोनों ही सो जाते हैं!" मैडम ने थोड़ा दबाव बनाते हुए कहा और मेरा हाथ पकड़ के मुझे कमरे की तरफ ले जाने लगी| पर मैं वहीँ रूक गया और बोला; "Mam अच्छा नहीं लगता! ऋतू...मेरा मतलब रितिका और राखी भी हैं घर पर| वो कल सुबह उठेंगी तो कुछ गलत न सोचें| इसलिए प्लीज Mam आप अंदर सो जाइये मैं बहार सो जाता हूँ|" मैंने मैडम से विनती की तो मैडम मेरी आँखों में देखने लगी; "सच्ची मानु जी! आप ..... कुछ ज्यादा ही .... खय... (ख़याल)… सोचते हो|" मैडम ने किसी तरह से बात को संभालते हुए कहा| वो जानती थी की मेरे मन में उनके लिए प्रेमियों वाल प्यार नहीं बल्कि एक अच्छे दोस्त जैसे मान-सम्मान है| इसलिए वो मुस्कुरा दीं और मुझे अंदर से तकिया ला कर दिया और फिर सोने चली गईं| मैं भी काउच पर जूते-मोजे उतार के लेट गया और फ़टक से सो गया| शराब का नशा अब दिमाग पर बहुत चढ़ रहा था, रात के करीब 2 बजे होंगे की मुझे किसी के हाथ का स्पर्श अपने होठों पर हुआ|
update 29
ये कोई और नहीं बल्कि ऋतू थी जो अभी भी नशे में थी और अपने बिस्तर से उठ कर मेरे सिरहाने खड़ी थी| पर मुझ पर तो दारु का नशा सवार था इसलिए मैं बस उस हसीं पल का लुत्फ़ उठा रहा था, जिसमें ऋतू मेरे होठों को बारी-बारी चूस रही थी| उसके हाथों ने मेरी कमीज के बटन खोलने शुरू कर दिए थे और मैं अब भी होश में नहीं आया था| सारे बटन खोल कर ऋतू मेरी टांगों की तरफ आई और झुक कर मेरी पैंट की ज़िप खोली, फिर बेल्ट खोलने की कोशिश में उसने मुझे थोड़ा हिला दिया जिसके कारन मेरी नींद टूटी और मैं कुनमुनाया; "उम्म्म...
ममम" पर ऋतू को जैसे कुछ फर्क ही नहीं पड़ा और वो फिर से मेरी बेल्ट खोलने लगी| पर चूँकि बेल्ट बहुत टाइट थी तो उसे खोलने में ऋतू को कठनाई हो रही थी| उसने हार मानते हुए मुझे ही हिलाना शुरू कर दिया, 3-4 बार हिलाते ही मेरी आँख खुल गई| पर हॉल में कम रौशनी थी जिससे मैं ये नहीं देख पाया की कौन है और खुसफुसाते हुए पूछ बैठा; "कौन है?" जवाब में ऋतू ने मेरे होठों को फिर से अपने मुँह में भर लिया और मेरे ऊपर के होंठ को चूसने लगी| अब मुझे समझते देर न लगी की ये ऋतू है, पर दिमाग नशे से इतना सुन्न था की मैं जल्दी रियेक्ट नहीं कर पाया| पर फिर भी इतनी सुद्ध तो थी की मैं अपने घर नहीं बल्कि मैडम के घर पर हूँ और वहाँ मेरे और ऋतू के अलावा दो लोग और हैं| मैंने बड़ी मुश्किल से ऋतू के होठों से अपने होठों को छुड़वाया और खुसफुसाते हुए बोला; "जान! क्या कर रहे हो? हम mam के घर पर हैं! कोई आ जायेगा...." पर मेरी बात पूरी होने से पहले ही ऋतू मेरे ऊपर लेट गई और फिर से अपने होठों से मेरे होठों को कैद कर लिया| अब तो मुझे भी जोश आ ने लगा था पर खुद को काबू करने लगा| दो मिनट मेरे होंठ चूसने के बाद ऋतू ने खुद ही उन्हें छोड़ दिया और मेरी छाती पर सर रख कर बोली; "जानू! आज बहुत मन कर रहा है! बड़े दिन हुए आपने मुझे प्यार नहीं किया?!"
"जान! हम mam के घर पर हैं, कोई आगया तो?" मैंने ऋतू को समझाते हुए कहा|
"कोई नहीं आएगा जानू! Mam और राखी दोनों गहरी नींद में हैं और मैंने Mam के कमरे का दरवाजा बंद कर दिया है| प्लीज मान जाओ ना!" अब मेरा प्यार मुझसे इतने प्यार से मिन्नत कर रहा है तो मैं भला उसका दिल कैसे तोड़ सकता था| "तो आप नहीं मानने वाले ना?!" मैंने ऋतू के बालों में हाथ फेरा और उसे उठ कर खड़ा होने को कहा| मैंने एक बार खुद इत्मीनान किया की मैडम और राखी सो रहे हैं ना?! फिर दोनों कमरों के दरवाजे को मैंने धीरे से बंद कर दिया, वापस आया तो ऋतू काउच पर लेटी थी और उसने अपने डिवाइडर का नाडा खोल कर नीचे खिसका दिया था| उसकी पैंटी भी घुटनों तक उतरी हुई थी, अब मैंने भी जल्दी से अपनी पैंट खोल दी और कच्छा नीचे किया और लंड पर खूब सारा थूक चुपेड़ा| अपने घुटने मोड़ कर मैं ऋतू के ऊपर छा गया और हाथों से पकड़ के लंड उसकी बुर के द्वार से भीड़ा दिया| मैं जानता था की जैसे ही मैं लंड ऋतू की बुर में पेलुँगा वो दर्द से चिल्लायेगी इसलिए मैंने सबसे पहले उसके होठों को अपने मुँह से ढक दिया| मैंने अपनी जीभ उसके मन में डाल दी और ऋतू उसे चूसने लगी, इसका फायदा उठाते हुए मैंने नीचे से अपने लंड को उसकी बुर में उतार दिया| सिर्फ सुपाड़ा ही अंदर गया था की ऋतू ने मेरी जीभ को दर्द महसूस होने पर काट लिया| अब 'आह' कहने की बारी मेरी थी पर वो आवाज निकल नहीं पाई, जोश आया तो मैंने नीचे से एक और झटका मारा और आधा लंड बुर में पहुँच गया| ऋतू ने मेरी जीभ छोड़ दी और उसकी सीत्कारें मेरे मुँह
में ही दफन हो कर रह गई| कुछ "गुं..गुं..गुं..!!!" की आवाजें बाहर आ रहीं थी|
ऋतू का दर्द मुझसे कभी बर्दाश्त नहीं होता था, इसलिए मैं तुरंत रूक गया| मैंने उसके होठों के ऊपर से अपना मुँह हटा लिया, मेरे हटते ही कुछ पल में ऋतू की सांसें सामान्य हुई और वो बोली; “जानू! प्लीज ... रुको मत! पूरा अंदर कर दो!!!!" ऋतू की बात सुन उसका मेरे लिए प्यार मैं समझ गया और वापस उस पर झुक गया| धीरे-धीरे बिना रुके मैंने अपना पूरा लंड उसकी बुर में पहुँचा दिया| अब मैंने धीरे-धीरे अपने लंड को अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया, ऋतू से ये सुख बिना आवाज किये बयान करना मुश्किल था| उसने अपने दाहिने हाथ की कलाई अपने मुँह पर भर ली और उसे काटने लगी| उसकी सीत्कार उसके मुँह में ही कैद होने लगी और इधर मेरी रफ़्तार तेज होने लगी थी| 10 मिनट तक ही ऋतू टिक पाई और फिर वो झड़ने लगी, पर इससे पहले की मैं झड़ता राखी के कमरे का दरवाजा खुला और वो बाहर आई| उसपर नजर सबसे पहले ऋतू की पड़ी और उसने मुझे एक डीएम से अपने ऊपर से ढकेल दिया| जब मेरी नजर ऋतू की नजर के पीछे-पीछे गई तो राखी मुझे वाशरूम जाती हुई दिखी और मैं भी हड़बड़ा कर उठा और फटाफट अपनी पैंट पहनने लगा| ऋतू ने भी अपने कपडे ठीक किये और अंदर कमरे में भाग गई| ये तो शुक्र था की हॉल में रौशनी कम थी और काउच जिस पर हम दोनों थे वो दरवाजे के साथ वाली दिवार के साथ था| राखी ने हम दोनों को नहीं देखा और वो सीधा ही वाशरूम में घुस गई थी| जब वो बाहर आई तो मैं चुप-चाप ऐसे लेटा था जैसे सो रहा हूँ, उसने आ कर मेरी टाँग हिला कर मुझे उठाया; "रितिका कहाँ है?" ये सुन कर तो मैं अवाक रह गया, मुझे लगा की उसने मुझे और ऋतू को सेक्स करते हुए देख लिया! मैंने फिर भी अनजान बनते हुए, कुनमुनाते हुए कहा; "प....
पता नहीं!"
"अंदर तो नहीं है? आप लोग उसे वहीँ तो नहीं छोड़ आये ना?" ये सुन कर मुझे सुकून हुआ की उसने कुछ देखा नहीं! मैं तुरंत उठ के बैठ गया और ऐसे दिखाने लगा की मुझे सच में नहीं पता की वो कहाँ है| मैंने हॉल की लाइट जलाई; "आप ने वाशरूम देखा?" पर तेज लाइट से जैसे ही कमरे में रौशनी हुई हम दोनों की आँखें चौंधिया गईं और राखी ने अपनी आँखों पर हाथ रखा और बोली; "मैं अभी वहीँ से तो आ रही हूँ|" मैं जान बुझ कर उसी कमरे में घुसा और देखा ऋतू वहीँ सो रही है; "अरे ये तो रही!" मैंने फिर से चौंकने का नाटक करते हुए कहा| राखी अंदर आई और एक दम से चौंक गई; "ये यहाँ कैसे आई? मैं जब उठी तब तो यहाँ कोई नहीं था?" उसने जा कर ऋतू को छू कर देखा और फिर उसे जगाने लगी तो ऋतू चौंक कर उठ गई और हैरानी से हम दोनों को देखने लगी| "तू यहाँ तो नहीं थी जब मैं उठी?" राखी ने ऋतू से पूछा|
"मैं किचन में थी पानी पीने, जब वापस आई तो आप यहाँ नहीं थे| क्या हुआ?" ऋतू की बात सुन कर राखी की हँसी छूट गई|
"यार तुमने सच में डरा दिया मुझे! मुझे लगा की कोई भूत-प्रेत है यहाँ!" अब ये सुन कर हम तीनों हँस पड़े|
खेर वो दोनों वापस लेट गए और मैं पहले बाथरूम में घुसा और जा कर लंड हिलाया और पानी निकाल कर सो गया| सुबह सात बजे मैडम ने मुझे उठाया और हमारी Good Morning हुई फिर उन्होंने कॉफ़ी का मग मुझे दिया| "नींद तो आई नहीं होगी आपको?" मैडम ने मुझसे पूछा|
"Mam नींद तो जबरदस्त आई पर राखी ने रात को भूत देख लिया!" मेरी बात सुन कर मैडम एक दम से हैरान हो गईं| फिर मैंने उन्हें सारी बात बताई तो मैडम हँस पड़ी| हमारी हँसी सुन कर ऋतू और राखी दोनों बाहर आ आगये| मैडम ने उन्हें भी कॉफ़ी दी और हमारी कल रात के बारे में बातें शुरू हुईं| जब मैडम ने ऋतू को बताया की वो नशे में मुझे मैडम के सामने Kiss करने वाली थी तो वो बुरी तरह झेंप गई! "आय-हाय! शर्मा गई लड़की! अब तो नाम बता दे की कौन है वो लड़का?" ऋतू की नजरें झुकी हुई थी और उसने बस इतना ही कहा; "है एक...." बस इसके आगे वो कुछ नहीं बोली और कॉफ़ी का कप रख कर वाशरूम चली गई|
राखी: वैसे मानु जी, आपके शराब के ज्ञान को सलाम! (राखी ने मुझे छेड़ते हुए कहा|)
अनु मैडम: सब तरह शराब चखी है आपने| (मैडम ने राखी की बात में अपनी बात जोड़ दी|)
मैं: Mam कॉलेज के दिनों में ......
ये सब try की थी| (मैंने थोड़ा झिझकते हुए जवाब दिया|)
राखी: पर पैसे कहाँ से लाते थे तब?
मैं: पार्ट टाइम में टूशन पढ़ाता था| उससे जो पैसे कमाता था उससे ये शौक़ पूरे होते थे|
अनु मैडम: अरे वाह! तभी से Independent हो आप!
राखी: और भी कोई शौक़ है इसके अलावा?
अब मैं सोच में पड़ गया की कुछ बोलूँ या नहीं पर तभी ऋतू आ गई और उसने जाने की इज्जाजत माँगी|
अनु मैडम: अरे पहले नाश्ता तो करो!
फिर मैडम, राखी और ऋतू सब एक साथ किचन में घुस गए और मैं भी फ्रेश हो कर मैडम की बालकनी में खड़ा हो गया और सुबह की धुप का मजा लेने लगा| नाश्ता कर के हम सब को निकलते-निकलते 9 बज गए| मैडम ने आज मुझे और राखी को छुट्टी दे दी और ये सुनते ही ऋतू की आँखें चमक उठी| मैंने कैब बुक की और सबसे पहले राखी का ड्राप पॉइंट डाला और फिर लास्ट में मेरा और ऋतू का| राखी जब उतरी तो वो मेरे पास आई और मुझे कान पकड़ के सॉरी बोला| मैं भी बड़ा हैरान था की ये मुझे क्यों सॉरी बोल रही है| "कल रात शायद नशे में मैंने आपसे कोई बदसलूकी की हो तो उसके लिए सॉरी|"
"पर आपने कुछ नहीं किया! रिलैक्स!" मैंने उसे आशवस्त किया की कुछ भी नहीं हुआ| फिर जब हम घर पहुँचे तो ऋतू फुल मूड में थी| दरवाजे बंद होते ही ऋतू ने मुझे जोर से खींचा और पलंग के सामने खड़ा कर दिया और फिर जोर से धक्का दे कर मुझे पलंग पर गिरा दिया| मैं अभी सम्भल भी नहीं पाया था की ऋतू मेरे ऊपर कूद पड़ी और मेरे पेट पर बैठ गई| फिर झुक कर उसने मेरे होठों को अपने होठों से मिला दिया फिर अपना मुँह खोला और अपनी जीभ से मेरे ऊपर वाले होंठ को सहलाया| उसे अपने मुँह में भर के चूसने लगी, मेरे हाथों ने उसकी पीठ को सहलाना शुरू कर दिया| अब बारी थी मेरी, मैंने भी थोड़ा जोश दिखाया और उस के Kiss का जवाब देने लगा| मैंने अपने हाथों से उसे कास के अपने से चिपका लिया और पलट कर अपने नीचे ले आया| नीचे आ कर मैंने उसके डिवाइडर को निकाल कर फेंक दिया और उसकी कच्छी उतार के पहले उसे सूँघा, फिर उसे भी फेंक दिया| ऋतू की नंगी बुर मेरे सामने थी और ऐसा नहीं था की मैं वो पहली बार देख रहा था, बल्कि जब भी देखता था तो सम्मोहित हो जाता था|
मेरा मुँह अपने आप ही ऋतू की बुर पर झुकता चला गया और जोश आते ही मैंने अपने मुँह को जितना खोल सकता था उतना खोल कर ऋतू की बुर को अपने मुँह से ढक दिया| जीभ सरसराती हुई अंदर चली गई और ऋतू के बुर में लपलपाने लगी| इतने भर से ही ऋतू की बुर ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया और उसने मेरे कमीज के कॉलर को पकड़ के ऊपर खींच लिया| अब मैंने तो अभी भी पैंट पहनी थी पर ऋतू इतनी बेसब्री थी की उसने पैंट की ज़िप खोली और मेरे लंड को टटोलने लगी| लंड पकड़ में आते ही उसने उसे बहार निकाला और अपनी बुर के मुख से भिड़ा दिया| ऋतू के बुर का पानी पहके मेरे लंड के सुपाडे से टच हुआ था मेरे जिस्म में झुरझुरी छूट गई| मैंने पूरी ताक़त से एक झटका
मारा और लंड फिसलता हुआ और चीरता हुआ ऋतू के बुर में पहुँच गया| "माँ...आ..आ..आ..आ ..आ..आ...आ..मम...आह....हह..हहा...आय....!!" ऋतू के मुँह से जोरदार चीख निकली और उसने अपने दाँत मेरे कंधे पर गड़ा दिए! तब जा कर मुझे ऋतू के दर्द का एहसास हुआ| ऋतू के दाँत अब भी मेरे कंधे पर गड़े हुए थे और मैं बिना हिले-डुले ही उसपर पड़ा रहा| पॉंच मिनट तक हम दोनों इस तरह बिना हिले-डुले पड़े रहे, फिर धीरे-धीरे ऋतू ने अपने दाँत मेरे कंधे पर से हटाये और नीचे से उसने अपनी बुर को सिकोड़ा| ये मेरे लिए संकेत था, मैंने धीरे-धीरे लंड अंदर-बाहर करना शुरू किया और अगले दो मिनट में ही मेरी स्पीड बढ गई और ऋतू फिर से झड़ गई! उसके झंडने से मेरे लंड की स्पीड और भी ज्यादा बढ़ गई, पर ऋतू ने मुझे रोकना चाहा और मेरी छाती पर दबाव दे कर मुझे खुद से दूर करने लगी| पर मैं फिर भी लगा रहा, शायद ऋतू से ये बर्दाश्त नहीं हो रहा था और उसने मुझे बहुत जोर से झटका दे कर खुद से अलग कर दिया| मुझे उसके इस बर्ताव से बड़ी खीज हुई और मैं उसके ऊपर से हट गया और दूर जा कर खड़ा हो गया| मेरी सांसें तेज थी और गुस्से से चेहरा तमतमा रहा था, ऋतू की नजर मुझ पर पड़ी तो वो शं गई और दूसरी तरफ मुँह कर के लेटी रही|
दरअसल ऋतू के जल्दी छूट जाने से और मुझे बीच मजधार में छोड़ देने से मैं बहुत गुस्से में था|
update 30 (1)
मेरा गुस्सा अब बेकाबू होने लगा था और मुझे कैसे भी शांत करना था| मैंने अपनी कमीज, पैंट सब उतार फेंकी, नंगा बाथरूम में घुस गया और शावर चला कर उसके नीचे खड़ा हो गया| पानी की ठंडी-ठंडी बूँदें सर पर पड़ीं तो गुस्सा थोड़ा कम हुआ और लंड 'बेचारा' सिकुड़ कर बैठ गया| दस मिनट तक मैं शावर के नीचे आँखें मूंदें खड़ा रहा, पर गुस्सा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था| बदन का पानी पोंछ कर जब बहार निकला तो सामने ऋतू सर झुकाये खड़ी थी| मैं उसके बगल से निकल गया और अपने कपडे पहनने लगा| ऋतू पीछे से आई और मुझे अपनी बाहों में भर कर बोली; "सॉरी!" मैंने उसके हाथ अपने जिस्म से अलग किये और बोला; "क्यों मेरे जिस्म में आग लगा रही है, जब उसे बुझा नहीं सकती! मैंने तो नहीं कहा था न की आके मेरे से चिपक जा?" मैंने बड़े रूखे तरीके से उसे दुत्कारा| ऋतू ने सर झुकाये हुए ही अपने कान पकडे और फिर से सॉरी बोला| पर मेरा तो कल रात से दो बार KLPD हो चूका था तो उसका गुस्सा तो था| मैंने आगे कुछ नहीं बोला और ऋतू का बैग उठाया और उसे रेडी होने को कहा पर वो वहाँ से हिली ही नहीं| "सॉरी जानू! आज के बाद कभी ऐसा नहीं करुँगी!" ऋतू ने फिर से कान पकड़ते हुए कहा| अब तक जिस गुस्से को मैंने रोक रखा था वो आखिर फुट ही पड़ा;
"क्या दुबारा नहीं करुँगी? हाँ? बोल??? कल रात को मन किया था न मैंने? बोला था ना की हम mam के घर पर हैं, पर तुझे चैन नहीं था! आखिर मुझे क्या मिला? तू तो जा कर सो गई और मैं बाथरूम में जा कर masturbate कर के सो गया| अभी भी, मैंने तुझे छुआ तक नहीं
और तू ही आ कर मुझसे चिपकी थी ना? तेरी तो जिस्म की आग बुझ गई, पर मेरा क्या? अगर मुझे masturbate ही करना था तो सेक्स क्यों? अगर तुझे कोई बिमारी होती तो मैं फिर भी समझता, ये तो तेरा उतावलापन है जिसके कारन प्यासा मैं रह जाता हूँ| उस दिन तो बड़े गर्व से कह रही थी की डॉक्टर ने ये सिखाया है, वो सिखाया है अब क्या हुआ उस सब का? सिर्फ यही नहीं you know shit about sex! Don’t even know how to give a proper blowjob! And if I’m licking you down there you never let me do it, always pull me up on you! कितने महीनों से कर रहे हैं हम ये? बोल??? 6 महीने से!!! और इन 6 महिनों में कितनी बार Porn देखा तूने मेरे फ़ोन में? उससे कुछ नहीं सीखा? और तेरी वो दोस्त काम्य जो तुझे अपने सेक्स के किस्से बड़ी डिटेल में बताया करती थी? उससे कभी कुछ नहीं सीखा तूने? You’ve never ever satisfied me once in these 6 months but still I’m with you, do you know why? Because I fucking love you dammit!!!” ऋतू सर झुकाये सब सुनती रही और फिर आकर मेरे सीने से लग गई| उसकी आँखें छलछला गईं और मेरे अंदर जो गुस्सा था वो अब शांत हो गया| मैंने उसे अब भी नहीं छुआ था और मैं उससे कुछ बोलता उससे पहले ही बॉस का फ़ोन आ गया| मैंने ऋतू को खुद से अलग किया और फ़ोन उठाया|
ऋतू ने अपने कपडे बदले और मेरी फ़ोन पर बात खत्म होने तक वो फिर से सर झुकाये खड़ी हो गई| बात कर के मैंने ऋतू को उसके हॉस्टल छोड़ा और मैं वापस ऑफिस आगया| मुझे ऑफिस में देखते ही मैडम का पारा चढ़ गया और वो बॉस पर बरस पड़ी; "मैंने मानु जी को छुट्टी दी थी फिर क्यों बुलाया उन्हें?" ये सुन कर बॉस एक दम से उनका चेहरा देखने लगा| मैं उस समय बॉस के साइन कराने खड़ा था और मैं भी थोड़ा हैरान था| सर इससे पहले की मैडम पर बरसते मैंने उन्हें अपनी उपस्थिति से अवगत कराते हुए कहा; "Mam वो AMIS Traders की GST की लास्ट डेट थी!" सर चुप हो गए बस मैडम को घूर के देखने लगे| मैंने जल्दी से फ़ोन निकाला और मैडम को कॉल मिला कर फ़ोन वापस जेब में डाल लिया| मैडम का फ़ोन बजा और उन्होंने देख लिया की मेरा ही कॉल है इसलिए बिना कुछ बोले फ़ोन कान से लगा कर बाहर चली गई| कुछ देर बाद मैडम मेरे डेस्क पर आईं और सामने बैठ गईं और बोलीं; "मानु जी आप कहीं और जॉब ढूँढ लो! यहाँ रहोगे तो अपने बॉस की तरह हो जाओगे|" मैडम का मूड बहुत ख़राब था तो मैंने उन्हें हँसाने के लिए कहा; "Mam फिर तो आपका प्रोजेक्ट अधूरा रह जायेगा और फिर हमारी फ्रेंडशिप का क्या?"
"दूसरी जॉब से हमारी फ्रेंडशिप थोड़े ही खत्म होगी? और रही प्रोजेक्ट की तो जाए चूल्हे में!" मैडम ने मुस्कुराते हुए कहा|
"इतनी मेहनत की है आपने Mam की उसे waste करना ठीक नहीं| इस प्रोजेक्ट के बाद मैं कोई और ऑप्शन ढूँढता हूँ|" मैंने मैडम की बात का मान रखते हुए कहा|
"अच्छा एक बात बताओ, अगर मैंने अपनी अलग कंपनी शुरू की तो मुझे ज्वाइन करोगे?" मैडम ने उत्सुकता वश पूछा|
"बिलकुल Mam ये भी कोई कहने की बात है?! कम से कम आप सैलरी तो अच्छी दोगे!" मैंने हँसते हुए कहा और मैडम ये सुन कर हँस दी| शाम को
मैं निकलने वाला था की ऋतू का फ़ोन आया; "जानू! अब भी नाराज हो?" ऋतू ने तुतलाते हुए पूछा| मुझे उसके इस बचपने पर हँसी आ गई| "नहीं" बस इतना बोला की मैडम मुझे आती हुई दिखाई दी| मैंने ऋतू को कहा की बाद में बात करता हूँ और फ़ोन काट दिया| "मानु जी! मुझे Market ड्राप कर दोगे?" मैं फिर से हैरान था और मेरी हैरानी भांपते हुए मैडम बोली; "आपके बॉस गाडी ले गए!" अब ये सुन कर मुझे थोड़ा इत्मीनान हुआ और मैडम मेरे पीछे एक तरफ दोनों पैर रख कर बैठ गईं|
अनु मैडम: वैसे मानु जी आप बुरा न मानो तो एक बात कहूँ?
मैं: जी Mam कहिये|
अनु मैडम: आप इतना डरते क्यों हो?
मैं: डरता हूँ? मैं कुछ समझा नहीं mam?
अनु मैडम: अभी मैंने आप से लिफ्ट मांगी तो आप हैरान थे? कल भी जब मैंने आपको बर्थडे विश किया तब भी, डांस करने के समय भी! आपके बॉस से भी जब मैंने कंप्लेंट की कि उन्होंने क्यों आपको आज बुलाया जब कि मैंने आपको छुट्टी दी है तब भी आप बहुत हैरान थे! दोस्ती में तो ये सब चलता है ना?
मैं: Mam आप विश्वास नहीं करेंगे पर पिछले कुछ महीनों से मेरे साथ जो कुछ हो रहा है वो मेरे साथ कभी नहीं हुआ| बचपन से मैं बहुत सीधा-साधा लड़का था....
अनु मैडम: (मेरी बात काटते हुए) वो तो अब भी हो|
मैं: शायद! Anyway मेरे दोस्त सब लड़के ही रहे हैं और लड़कियों से मेरी फ़ट.... I mean डर लगता था| फिर आप मेरे गाँव कि हिस्ट्री तो जानते ही हैं, अब ऐसे में मैंने कभी किसी लड़की से सिवाय किसी काम ...I mean work related बात ही की है| मुझे डर इसलिए लगता है की सर आपकी और मेरी दोस्ती को कभी नहीं समझ सकते| हम रहते ही ऐसे समाज में हैं जहाँ एक लड़का और एक लड़की दोस्त नहीं हो सकते| तो ऐसे में आपका मेरी साइड लेना किसी को सही नहीं लगेगा|
अनु मैडम: तो इसका मतलब हमें सिर्फ वही करना चाहिए जो सब को अच्छा लगे? अपनी ख़ुशी के लिए कुछ भी नहीं?
मैं: मैडम प्लीज मुझे गलत मत समझिये, But I fear for you! I don’t want to cause any troubles in your married life.
अनु मैडम: I understand! And that’s very sweet of you! But I assure you, you’re not the reason ….. anyway….. ummm….
Let’s have some पानी के बताशे!
मैंने बाइक एक चाट वाले के पास रोकी और मैडम और मैंने compete करते हुए पानी के बताशे खाये| विनर मैडम ही निकलीं और हारने की सजा मैडम ने ये रखी की इस संडे को मैं उन्हें 'टुंडे कबाबी' खिलाऊँ| इस तरह हँसते हुए मैं उन्हें बाजार छोड़ कर घर निकल गया| घर पहुँचते ही ऋतू का फ़ोन आया और उसने पूछा; "पानी के बताशे कैसे लगे?"
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ये सुन कर मैं हैरान तू हुआ पर मैंने जवाब ऐसा दिया की ऋतू और चिढ जाए| "लाजवाब थे! इतना स्वाद तो मुझे आज तक कभी आया ही नहीं!" मेरी ये डबल मीनिंग वाली बात ऋतू समझ गई| "जानूउउ उउउउउउउउउउउउ!!! मैं आप पर शक़ नहीं कर रही! मैं आप पर खुद से ज्यादा भरोसा करती हूँ| दरअसल काम्य ने आपको मार्किट में बताशे खाते हुए देखा और मुझे फोन कर के चढाने लगी की तेरा 'बंदा' यहाँ किसी और लड़की के साथ बताशे खा रहा है!" ऋतू के मुँह से 'बंदा' शब्द सुन कर मुझे बहुत जोर से हँसी आ गई| "क्या हुआ? हँस क्यों रहे हो?" ऋतू ने थोड़ा हैरान हो कर पूछा| "मैं तुम्हारा 'बंदा' हूँ?" मैंने ऋतू को छेड़ते हुए पूछा| "वो कॉलेज में बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड को बंदा-बंदी कहते हैं|"
"जानता हूँ! मैं भी उसी कॉलेज में पढ़ा हूँ!" मैंने हँसते हुए कहा|
"हाँ...तो ... वो मुझे चढाने लगी की आप किसी और को घुमा रहे हो! तो ये सुन कर पहले तो मुझे बड़ी हँसी आई फिर मैंने उसे डाँट दिया ये कह कर की मैं अपने प्यार पर पूरा भरोसा करती हूँ| वो मुझे कभी धोका नहीं दे सकते! तू चुप-चाप अपना काम कर! इतना कह कर मैंने फ़ोन रख दिया|"
"अच्छा जी? बहुत भरोसा करते हो मुझ पर?"
"हाँ जी! इतने दिन आपके साथ ऑफिस में काम कर के देख लिया की कैसे आप खुद को सँभालते हो| आजतक आपने कभी राखी या अनु मैडम से कोई गलत तरह की बात नहीं की| हमेशा उनसे अदब से बात करते हो, कल भी पार्टी में आप नशे में थे तब भी आप खुद को संभाले हुए थे| ये आपका मेरे लिए प्यार नहीं तो क्या है? आजतक कभी मुझे राखी ने नहीं कहा की आपने कभी उसे किसी गलत नजर से देखा हो या उस से कोई अभद्र बात कही हो| एक बार आप पर शक़ करने की गलती कर चुकी हूँ पर अब चाहे भगवान् भी आ कर मुझे कह दें की आपने किसी लड़की के साथ कुछ गलत किया है तो भी मैं नहीं मानूँगी|" ऋतू की बात सुन कर मैं समझ गया था की ऋतू राखी के जरिये मेरा बैकग्राउंड चेक करवा रही थी, ठीक है भाई कर लो जितनी चेकिंग करनी हो आपने!
खेर इस तरह वो दिन सिर्फ बात करते हुए निकला| हम मिलते तो रोज थे पर सिर्फ बातें ही होती थीं ना तो ऋतू मुझे छूने की कोशिश लारती और न ही मैं उसे छूता था| मैंने ये सोच कर ही संतोष कर लिया की शादी के बाद ऋतू को सेक्स की अच्छी से 'कोचिंग' दूँगा, उसे सब सिखाऊँगा की कैसे अपने पार्टनर को खुश किया जाता है| दिन गुजरते गए और आखिर वो दिन आ गया जब राखी कि शादी थी| शाम को हम सब को जाने का न्योता था और मैंने ऋतू को लेने और छोड़ने की
जिम्मेदारी ली| अब पहले तो उसे लेहंगा-चोली खरीदवाया और अपने लिए मैंने बस एक ब्लैज़र लिया| हॉस्टल वाली आंटी जी ने ऋतू को थोड़ी ज्यादा छूट दे रखी थी, उसका कारन ये था की ऋतू हॉस्टल में सिर्फ और सिर्फ अपने काम से काम रखती थी और पढ़ाई में मन लगाती थी| कुछ उन्हें मेरा भी ख़याल था इसलिए ऋतू ने जब कहा की वो लेट आएगी तो आंटी जी ने मना नहीं किया| उसके हॉस्टल की लड़की ऋतू से बहुत जलती थी की इतने कम समय में वो आंटी जी की चहेती बन गई| ऋतू को पिक करने के लिए मैं थोड़ा जल्दी निकला और उसे चौक पर बुला लिया| मैं पहले से ही वहाँ उसका इंतजार कर रहा था| जैसे ही मेरी नजर ऋतू पर पड़ी मैं उसे बस देखता ही रह गया!
वहाँ पर जो कोई भी खड़ा था वो बस ऋतू को ही ताड़े जा रहा था| "क्या देख रहे हो आप?" ऋतू ने शर्माते हुए पूछा| "हाय! आज तो क़हर ढा रही हो! दुल्हन से ज्यादा तो लोग तुम्हें ही देखेंगे!" मेरी बात सुन कर ऋतू के गाल शर्म से लाल हो गए और वो आ कर पीछे बैठ गई और बोली; "आप तैयार क्यों नहीं हुए? ऐसे ही जाने वाले हो क्या?" मैंने सोचा थोड़ा मजाक कर लेता हूँ तो मैंने कह दिया की; "हाँ मैं ऐसे ही जाऊँगा, सैलरी नहीं बची इसलिए अपने लिए कुछ नहीं खरीदा|"
"पर आपने तो कहा था की आपने ब्लैज़र लिया है?" ऋतू ने चौंकते हुए कहा|
"झूठ बोला था वरना तुम लेहंगा-चोली नहीं लेती|" अब ये सुन कर ऋतू को बहुत गुस्सा आया| "गाडी रोका! मुझे नहीं जाना कहीं! वापस छोड़ दो मुझे हॉस्टल!"
"अरे बाबू शांत हो जाओ, मैं मज़ाक कर रहा था| हम अभी घर जा रहे हैं वहाँ मैं चेंज करूँगा तब निकलेंगे|" मैंने ऋतू को प्यार से समझाया| घर पहुँच कर ऋतू ने अपने लहंगे को थोड़ा नीचे बाँधा जिससे उसका नैवेल दिखने लगा| छरहरा बदन पर उसका अपना ये नैवेल दिखाना आज नजाने कितनो की जान लेने वाला था| अब मैं सबसे पहले नहाने गया, नहा के बहार सिर्फ कच्छे में आया और अलमारी से अपनी शर्ट निकाली| मुझे ऐसे देख कर ऋतू ने अपनी ऊँगली दाँतों तले दबा ली और सिसक कर रह गई| मैंने सोचा की अभी जाने में बहुत समय है तो अभी से क्या कपडे पहनने पर ऋतू जिद्द करने लगी की मुझे अभी पहन के दिखाओ| अब उसकी बात मानते हुए मैंने वाइट शर्ट, पैंट, ब्लैज़र और लोफ़र्स पहन के उसे दिखाया|
मुझे पूरा तैयार देख कर ऋतू की आँखें फ़ैल गईं; "जानू! मानना पड़ेगा की आप की पसंद कपड़ों के मामले में बहुत बढ़िया है| I’m so lucky to have you as my husband!”
"Really??? Well thank you mademoiselle!” मेरी बात सुन कर ऋतू शर्मा गई और आ कर मेरे सीने से लग गई| "एक बात कहूँ जानू?" ऋतू ने मेरे सीने से लगे हुए ही कहा, जवाब में मैंने बस; "हम्म" कहा|
"आज हम दोनों कहीं कैंडल लाइट डिनर करने चलें? उसके बाद शादी में चले जायेंगे|" ऋतू मेरे आँखों में देखते हुए कहा| अब भला मैं अपने प्यार को कैसे मना करता| मैंने फटाफट कैब बुक की और ऋतू को मैं 'Oudhyana- Vivanta By Taj' ले आया| ये लखनऊ का सब से बड़ा 5 स्टार
रेस्टुरेंट है, वहाँ की चमक देख कर ऋतू की आँखें जगमगा उठीं| मेरे कॉलेज के दिनों में मैं यहाँ से कई बार गुजरा था और यही सोचता था की शादी होगी तब यहाँ जर्रूर आऊँगा| एक वेटर हमें हमारे टेबल तक ले जाने को आया| मैं और ऋतू किसी प्रेमी जोड़े की तरह बाँहों में बाहें डाले चल रहे थे| टेबल पर पहुँच कर मैंने ऋतू की कुर्सी खींची और फिर उसे बिठाया और फिर मैं उसके ठीक सामने बैठ गया| खुला गर्डन था और वहाँ बहुत सारे टेबल लगे हुए थे, हमारी तरह वहाँ कुछ प्रेमी जोड़े थे और बाकी सब foreigners और कुछ अमीर आदमी आये थे| ऋतू आज पहली बार इतनी महंगी जगह आई थी और उसकी आँखें वहाँ की चकाचौंध में खो गईं और वो सब कुछ देखने लगी| वेटर मेनू ले कर आया पर ऋतू की आँखें तो अब भी वहाँ के नज़ारे देखने में लगी थी| धीमी-धीमी आवाज में वहाँ म्यूजिक गूँज रहा था, मैंने ऋतू का हाथ पकड़ा तो उसकी आँखें भर आईं थी| मैं उठ कर खड़ा हुआ और उसे अपने सीने से लगा लिया|
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"t ... thank you !!!!" ऋतू ने रोते-रोते कहा| "But baby why are you crying?” मैंने उससे पूछा तो ऋतू ने अपने आँसूँ पोछे और बोली; "मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था की मैं कभी ऐसी जगह आ पाऊँगी| ऐसी जगह जहाँ के Main Gate के अंदर घुसने की भी मेरी औकात नहीं है, वहाँ आप मुझे डिनर के लिए लेके आये हो! Thank You!"
"मेरी जानेमन इससे भी कई ज्यादा कीमती है!"
अगले ही पल मैंने अपनी दायीं टाँग मोड़ी और घुटने को जमीन से टिकाया, बायीं बस मोड़ी और ऋतू का बयां हाथ अपने बाएं हाथ में लेते हुए उससे पूछा; " मैंने तुम पर बहुत बार चीखा हूँ, चिल्लाया हूँ यहाँ तक की तुम पर हाथ भी उठाया है पर ये सच है की मैं प्यार सिर्फ और सिर्फ तुम्हीं से करता हूँ| उस दिन जब मैंने तुम्हें पहलीबार दिल से गले लगाया था उसी दिन मैंने तुम्हें अपना दिल दे दिया था| मैं वादा करता हूँ की तुम्हें जिंदगी भर खुश रखूँगा, तुम्हें कभी कोई तकलीफ नहीं दूँगा, तुम्हें पलकों पर बिठा कर रखूँगा| (एक लम्बी साँस लेते हुए) Will you marry me???" ये सुन कर ऋतू की आँखें छलक आईं और उसने हाँ में गर्दन हिलाई और बैठे-बैठे ही मेरे गले लग गई| वहाँ मौजूद सभी लोगों ने तालियाँ बजाई और तब जा कर हम दोनों को होश आया की हम दोनों बाहर आये हैं| ऋतू ने शर्म के मारे अपना मुँह दोनों हाथों से छुपा लिया| तभी वहाँ एक अंकल आये और मुझसे बोले; "Come on man let’s put a ring on her!”
“But I don’t have any ring with me! I didn’t plan this far!” मैंने उन्हें बताया तो उन्होंने फ़ौरन वेटर को बुलाया और उसके कान में कुछ खुसफुसाये| उसके बाद ऋतू से बोले; “May the love you share today grow stronger as you grow old together.” इतने में वही वेटर वापस आ गया और उसने उन्हें एक छोटी सी डिब्बी दी जिसमें एक वाइट सिल्वर की वेडिंग रिंग थी! उन्होंने मुझे वो डिब्बी दे दी और ऋतू को पहनाने को कहा| मैं और ऋतू हैरानी से उन्हें देखने लगे; "A gift for the beautiful couple.
” उन्होंने कहा|
“Sorry sir, but I can’t take this!” मैंने उन्हें मना किया| “Oh comeon dear! Its just a small gift! Take it!” उन्होंने जबरदस्ती करते हुए वो डिब्बी मेरे हाथ में पकड़ा दी| “No..No..Sir… I’ll pay you for this!” वो मुस्कुराने लगे और अपनी जेब में से एक कार्ड निकाला और मुझे दे दिया; "ये लो...जब टाइम हो तब आ कर पैसे दे जाना पर अभी तो ये Moment ख़राब मत करो|" मैंने उनके हाथ से कार्ड ले कर रख लिया और वापस प्रोपोज़ करने का पोज़ बनाया और ऋतू से पूछा; "Will you marry me?” ऋतू ने शर्मा कर हाँ कहा और फिर मैंने उसे वो रिंग पहना दी और ऋतू कस कर मेरे सीने से लग गई| मैंने उसके सर को चूमा और पूरा गार्डन तालियों से गूँज उठा| ौंसले ने फिर से हमें आशीर्वाद दिया और वापस अपने टेबल पर अपने दोस्तों के साथ बैठ कर शराब एन्जॉय करने लगे| ऋतू बहुत खुश थी और उसकी ये ख़ुशी देख कर मैं भी बहुत खुश था| हमने खाना खाया और फिर मैं उन अंकल को दुबारा Thank You बोल कर निकल आया| अब बारी थी राखी की शादी अटेंड करने की, कैब बुक की और उसके आने तक ऋतू मुझसे चिपकी खड़ी रही| कैब में जब हम बैठे तो ऋतू मेरे बाएं कंधे पर सर रख कर बैठ गई और उसी रिंग को देखे जा रही थी| "अब इसे उतार दो, वरना सब पूछेंगे की किसने दी?" मेरी बात सुन कर ऋतू जैसे अपनी ख्यालों की दुनिया से बाहर आई| "ना! मैंने नहीं उतारने वाली!" उसने मुँह बनाते हुए कहा| "तो सब से क्या कहोगी?" मैंने पूछा| "कह दूँगी मेरे लवर ने दी है|" ये कह कर वो मुस्कुराने लगी| "और जब उस लड़के का नाम पूछेंगे तब?"
"वो सब मैं देख लूँगी! आप उसकी चिंता मत करो|" इतना कह कर ऋतू फिर से उसी रिंग को देखने लगी| मैंने भी सोचा की अपने आप संभालेगी, मैं तो कुछ कह भी नहीं सकता और रायता फैलना है तो फ़ैल ही जाए! जो होगा देख लूँगा! ये सोच कर मैं भी इत्मीनान से बैठ गया| बैंक्वेट हॉल आने लगा तो मैंने ऋतू से कहा की वो अपना मेक-अप ठीक कर ले, फिर हम दोनों जब कैब से उतरे तो ऋतू ने फिर से मेरी बाहों में बाहें डाल ली| हम दोनों कपल लग रहे थे और ये अभी के लिए थोड़ा ज्यादा था| मैंने ऋतू के कान में खुसफुसाते हुए कहा; "जान! यहाँ बॉस भी आएंगे तो थोड़ा सा डिस्टेंस मेन्टेन करो|" ये सुन कर ऋतू ने नकली गुस्सा दिखाया और मेरा हाथ छोड़ दिया| अभी अंदर घुसे भी नहीं थे की मुझे मेरे ऑफिस के colleagues मिल गए और बेशर्मों की तरह ऋतू को घूरे जा रहे थे| "बॉस और अनु mam आगये?" मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने बताया की वो अंदर हैं इसलिए मैंने ऋतू को अंदर जाने को कहा| पर उसका मन अंदर जाने को कतई नहीं था| मैंने उसे आँखों से इशारा कर के समझाया की ये लोग मुझे छोड़ने वाले नहीं हैं, तब जा कर ऋतू मानी| उसके जाते ही सब मेरे ऊपर टूट पड़े, "साले कैसे फँसा लिया तूने?" मैं उनकी सारी बातें बस टालता रहा ये कह की मैंने ऐसा कुछ नहीं किया बस कैब शेयर की थी हमने| पर कमीने तो कमीने ही होते हैं, मैं किसी तरह से उनसे बच के अंदर आ गया| अंदर आ कर देखा
तो एक टेबल पर सर, अनु मैडम और ऋतू बैठे हुए बात कर रहे थे| मुझे देखते ही सर बोल उठे; "तुम दोनों साथ आये हो फिर आगे-पीछे क्यों एंटर हुए? हम क्या बेवक़ूफ़ बैठे हैं यहाँ?"
"सर वो बाहर शुक्ल जी मिल गए थे उन्होंने रोक लिया| वैसे साथ आने में कैसे शर्म?" इतना कह कर मैं वहीँ बैठ गया पर मन ही मन ऋतू को कोसने लगा की उसे कोई और जगह नहीं मिली बैठने को?! इधर सर उठ कर कुछ खाने के लिए गए और अनु मैडम को मेरी तारीफ करने का मौका मिल गया; "मानु जी! आज तो बहुत हैंडसम लग रहे हो!"
"Thank you mam!" मैंने शर्माते हुए कहा| "आपको तो रोज ऐसे ही रेडी हो कर ऑफिस आना चाहिए|" ऋतू ने मज़ाक करते हुए कहा|
"हाय!! फिर हम दोनों (अनु मैडम और ऋतू) काम कैसे करेंगे?" अनु मैडम ने ठंडी आह भरते हुए कहा| ये सुन कर हम तीनों हँस पड़े, इतने में सर कुछ खाने को ले आये और सीधा ऋतू को ऑफर कर दिया| ये देख कर मैं थोड़ा हैरान हुआ पर फिर मैं समझ गया की आज ऋतू लग ही इतनी सुन्दर रही है की हर एक की नजर सिर्फ उसी पर है| मैं अपने लिए कुछ खाने के लिए लेने को उठा तो मेरे पीछे-पीछे अनु मैडम भी उठ गईं| जब मैंने मैडम को ढंग से सजा-सांवरा देखा तो मैंने भी उनकी तारीफ करते हुए कहा; "वैसे mam you’re looking fabulous today! ये सुन कर मैडम भी शर्मा गईं और बोलीं; "उतनी सुंदर तो नहीं जितनी आज रितिका लग रही है| उसका लेहंगा तुम ने ही सेलेक्ट किया था ना?" मैंने बिलकुल अनजान बनते हुए कहा; "नहीं तो mam!" मैडम ने शायद मेरी बात मान ली या फिर उन्होंने जानबूझ कर उस बात को और ज्यादा नहीं कुरेदा|
खेर मैं और मैडम खाने-पीने की सभी चीजों का मुआइना कर रहे थे, की तभी उनकी नजर मसाला डोसे पर गई और वो मुझे खींच कर वहाँ ले गईं| मैं एक्स्ट्रा बटर डलवा कर उनके लिए डोसा बनवाया और अपने लिए मैं आलू-चीज पफ ले आया| जब मैंने उन्हें ऑफर किया तो उन्होंने एक पीस खाया और बोलीं; "मानु जी आपकी पसंद का जवाब नहीं! हर चीज में आपकी पसंद awesome है!" मैंने बस उन्हें Thank You कहा और फिर उनके डोसा खत्म होने के बाद वापस आ कर बैठ गए| चूँकि हमें आने में थोड़ा समय लगा था तो सर पूछने लगे; "कहाँ रूक गए थे तुम दोनों?" मेरे कुछ बोलने से पहले ही मैडम बोल पड़ीं; "डोसा खा रहे थे!" अब ये सुन कर सर चुप हो गए| खेर दूल्हे की बारात आई और तभी खाना खुल गया और सभी लोग लाइन में लग गए| सर सबसे पहले और उनके पीछे अनु मैडम, फिर मैं और मेरे पीछे ऋतू| आज पहली बार ऋतू इतनी बड़ी और महंगी शादी में आई थी और खाने के लिए जो चीजें रखी थीं वो उसके नई थी, उसने वो कभी चखी भी नहीं थी| ऋतू ने कहा की उसे दाल-चावल खाने हैं तो मैंने उसे हँसते हुए समझाया की वो सब यहाँ नहीं मिलता| मैंने उसे पहले दाल महारानी, पनीर लबाबदार और 2 रोटी दिलवाई और मैंने अपने लिए चिकन और नान लिया| हम वापस बैठ कर खा रहे थे, मैडम ने भी चिकन लिया था और सर ने वेज लिया था| "तुम सारे नॉन-वेज यहाँ बैठो मैं और
रितिका कहीं और बैठेंगे|" अब ये सुन कर मुझे बुरा लगा क्योंकि मैं नहीं चाहता था की ऋतू कहीं और जाए| इसका जवाब खुद ऋतू ने ही दिया; "पर सर सारे टेबल फुल हैं! " ये सुन कर मैडम के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई पर उन्होंने जैसे-तैसे अपनी हँसी छुपाई| अब मैडम ने मुझे इशारा किया और मैं उनका सिहारा समझ गया| हम दोनों ने एक-एक लेग पीस उठाया और जंगलियों की तरह खाने लगे| हमें ऐसा करते हुए देख सर मुँह बिदकाने लगे और बोले; "ढंग से खाओ! ये क्या जंगलियों की तरह खा रहे हो?" इतना कह कर वो उठ के चले गए और इधर मैं, मैडम और ऋतू हँसने लगे| मैडम की नजर आखिर रिंग पर चली गई और उन्होंने ऋतू से पूछ लिया; "रितिका ये रिंग आपको किसने दी?" अब ये सुनते ही मैंने अपनी आँखें फेर ली और ऐसे दिखाया जैसे मैंने सुना ही ना हो| "वो mam ......" इसके आगे वो कुछ नहीं बोली और शर्माने लगी| "अच्छा जी! उसने तुम्हें प्रोपोज़ कर दिया? और तुमने हाँ भी कर दी?" मैडम ने थोड़ा जोर से बोला ताकि मैं भी उनकी बात सुन लूँ| "प्रोपोज़? किसने किसे किया?" मैंने जान बुझ कर ऐसे जताया जैसे मुझे कुछ पता ही नहीं| "मानु जी! आपका पत्ता तो कट गया!" मैडम ने मेरे मज़े लेते हुए कहा| मैं जान बुझ कर जोर से हँसा ताकि उन्हें ये इत्मीनान हो जाए की मेरे और ऋतू के बीच में कुछ नहीं चल रहा|
खाने के बाद आखिर दुल्हन का आगमन हुआ, दुल्हन के जोड़े में राखी बहुत ही प्यारी लग रही थी| फिर शुरू हुआ नाच गाने का मौका और डी.
जे ने एक के बाद एक गाना बजा कर माहौल में जान डाल डी| मैडम ने सर से नाचने को कहा तो उन्होंने मना कर दिया| मैं उठ के खड़ा हुआ और ऋतू और मैडम को अपन साथ जबरदस्ती डांस के लिए ले गया और हम तीनों ने बड़े जोर-शोरों से नाचा| सर से हमारी ये ख़ुशी देखि नहीं गई और उन्होंने हमें इशारे से हमें वापस बुलाया और कहा की अब हमें चलना चाहिए| निकलने से पहले हमें शगुन तो देना था इसलिए हम सारे स्टेज के ऊपर चढ़ गए| दूल्हे से मैंने हाथ मिलाया और फिर राखी से मैंने हाथ जोड़ कर नमस्ते की पर वो हमेशा की तरह ही मुझसे गले लग गई| उसके पति को थोड़ा अटपटा सा लगा पर उसने कहा कुछ नहीं| इधर राखी ने खुद ही माहौल को हल्का करने के लिए कहा; "मानु जी इतने हैंडसम लग रहे हो की मैं तो सोच रही हूँ की दूल्हा चेंज कर लूँ|" ये सुन कर सारे हँस दिए और इधर राखी का दूल्हा भी राखी के मज़े लेने लगा और बोला; "सही है! तू अपने मानु जी से शादी कर ले और मैं उनकी गर्लफ्रेंड से!" ये सुन कर मैं और ऋतू दोनों एक दूसरे को देखने लगे और बाकी सब हँसने लगे| मैं और ऋतू ये सोच रहे थे की ये हरामखोर अपनी शादी छोड़ कर हमारे पीछे पड़े हैं!
खेर शगुन दे कर, और फोटो खिचवा के हम जाने लगे तो राखी ने सब को रोक दिया और सर से बोली; "सर अभी तो 12 ही बजे हैं! प्लीज थोड़ी देर और रुक जाइये!" उसका दूल्हा भी बोल पड़ा; "सर अभी तो ड्रिंक्स भी चालु नहीं हुई हैं!" अब फ्री की ड्रिंक्स और मेरे सर उसे छोड़ दें, ऐसा तो हो ही नहीं सकता|
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ड्रिंक्स का राउंड शुरू हुआ पर ना तो ऋतू ने पी और न ही मैडम ने| मैं भी नहीं पीना चाहता था पर हमारे ऑफिस के सारे male colleagues आ कर बैठ गए| शुक्ल जी बोले; "अरे भाई मानु ऑफिस में तो तुम्हारा ग्रुप दूसरा सही पर यहाँ तो हमारे साथ शामिल हो जाओ|" अब उनकी बात सुन कर मुझे मजबूरन उनके साथ बैठना पड़ा और इधर सर ने व्हिस्की आर्डर कर दी| वेटर 5 गिलास व्हिस्की के लार्ज वाले ले आया| लार्ज पेग देख कर ऋतू हैरान हो गई और मन ही मन डरने लगी की पता नहीं आज क्या होगा| पर वो लार्ज पेग पीने के बाद मेरा सिस्टम उतना नहीं हिला जितना की आमतौर पर लोगों का हिल जाता था| सिद्धार्थ (मेरा colleague) का तो एक पेग में ही बंटाधार हो गया और उसने साफ़ मना कर दिया|
शुक्ल जी, मैं, अरुण (मेरा colleague) और सर अब भी टिके हुए थे| हम चारों पर ही जैसे असर नहीं हुआ था, शुक्ल जी ने वेटर को बुलाया और उसे देसी लाने को कहा| वेटर ने साफ़ मना कर दिया की उनके पास देसी नहीं है| "बेटा हमें इन महंगी शराबों से नहीं चढ़ती, हमें तो देसी चाहिए| तू ये ले पैसे, एक बोतल ले आ और बाकी पैसे तू रख ले|" शुक्ल जी का ये बर्ताव देख कर मैडम और ऋतू का मुँह बन गया पर सर उनकी तारीफ करने लगे| "सॉरी! शुक्ल जी मैं अब और नहीं पीयूँगा|" मैंने कहा पर शुक्ल जी तो आज फुल मूड में थे| "अरे भाई! क्या तुम एक देसी से घबरा गए? मर्द बनो!" शुक्ल जी की बात सुन
कर ऋतू और अनु मैडम मेरे बचाव में एक साथ कूद पड़े| "शराब पीने से कब से मर्दानगी आने लगी?" मैडम ने कहा| "रहने दीजिये न सर फिर घर भी तो जाना है|" ऋतू बोली पर तभी सर बोल पड़े; "अरे भाई! कौन सा रोज-रोज पीते हैं| आज इतना अच्छा दिन है और रही बात घर छोड़ने की तो मैं छोड़ दूँगा|" अब मैं अगर पीने से पीछे हट जाता तो शुक्ल जी और बाकी के सभी लोग मुझे जिंदगी भर मैडम और ऋतू के नाम से छेड़ते रहते इसलिए मैं भी कूद पड़ा; "चलो देखते है शुक्ल जी आपकी देसी कितनी दमदार है|" ये सुन कर तो शुक्ल जी हैरान हो गए, आखिर देसी आई और मैंने जान-बुझ कर लार्ज पेग बनाये| मैं समझ गया था की ये सब शुक्ल जी का ही प्लान है ताकि मैं पी कर लुढक़ जाऊँ और वो मुझे उम्र भर इस बात का ताना देते रहे| पर वो नहीं जानते थे की मानु का कोटा बहुत बड़ा है! देसी के पहले पेग के बाद ही अरुण और सर ने हाथ खड़े कर दिए और अब बस मैं और शुक्ल जी ही बचे थे| बाकी बची आधी बोतल को मैंने बराबर-बराबर दोनों के गिलास में डाल दिया| "ऋतू ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे रोकना चाहा पर मुझपर तो शराब का सुरूर छाने लगा था| मैंने ऋतू की तरफ देखा और ऐसे दिखाया जैसे मैं अभी भी पूरे होश में हूँ| इधर डी.जे. ने भी हमारा ये कॉम्पिटिशन होते हुए देख लिया और उसने गाना लगा दिया; दारु बदनाम कर दी! अब ये सुनते ही शुक्ल जी फुल जोश में आ गए और खड़े हो गए और बाकी बची पूरी दारु एक साँस में पी गए|
ये देख कर दूल्हा-दुल्हन और बाकी सब वहीँ आ गए की यहाँ कौन सी प्रतियोगिता हो रही है! सारे के सारे हमें घेर कर खड़े हो गए पर ये क्या शुक्ल जी तो 5 मिनट बाद ही ढेर हो गए! अब बचा सिर्फ मैं, मैंने भी जोश में आते हुए पूरी की पूरी दारु एक साँस में गटक ली! सब के सब ये सोचने लगे की मैं अब गिरा..अब गिरा...पर मैं टिका रहा| गाने की आवाज और तेज हो गई और डी.जे. माइक पर जोर से चिल्लाया; "Give a big hand for this gentleman!” सारे तालियाँ बजाने लगे और मैंने भी सर झुका कर सबका अभिवादन स्वीकार किया| उस समय मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मुझे कोई अवार्ड मिल रहा हो! पर ठीक तभी मेरे बॉस ने एक चाल चली, उन्होंने डी.जे.
से माइक लिया और मेरे पास ले कर आ गए और बोले; "मानु आज तो इस मौके पर तुम्हारी शायरी बनती है|" शायरी का नाम सुनते ही सब ने शोर मचाना शुरू कर दिया| राखी ने भी बड़े प्यार से रिक्वेस्ट की और सर ने इसी का फायदा उठाते हुए मुझ पर और दबाव डाल दिया; "भाई अब तो दुल्हन ने भी रिक्वेस्ट कर डी| अब तो सुना दो, कम से कम उसका दिल तो मत तोड़ो|" अब मेरी हालत ऐसी थी की शराब दिमाग पर चढ़ चुकी थी, मैं ये तो जानता था की मैं कहाँ हूँ पर क्या शेर बोलना है उस पर मेरा काबू नहीं था| अब दिल और जुबान के तार एक साथ जुड़ गए और मैंने अपनी आँख बंद की और और बोला;
हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में,
ज़रूरी बात कहनी हो कोई वादा निभाना हो,
उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो,
हमेशा देर कर देता हूँ मैं,
मदद करनी हो उस की यार की ढांढस बंधाना हो,
बहुत देरीना रास्तों पर किसी से मिलने जाना हो,
हमेशा देर कर देता हूँ मैं,
बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो,
किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो,
हमेशा देर कर देता हूँ मैं,
किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो,
हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो,
हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में.....
ये गजल किस के लिए थी वो सब समझ चुके थे और माहौल को हल्का करते हुए राखी का दूल्हा बोला; "मानु जी! वैसे अभी देर नहीं हुई है!" मैं बस मुस्कुरा दिया और मैं जा कर उसके गले लगा और उसे बोला; ‘You’re a lucky guy, she’s a keeper! Best wishes from me and wish you a very happy married life!” मैंने उसे दिल से बधाई दी और माहौल हल्का हो गया| दूल्हा-दुल्हन के माँ-बाप को ये बाद जर्रूर लगी होगी इसलिए मैंने बस हाथ जोड़कर माफ़ी मांगी और मैं निकल आया| मेरे पीछे-पीछे ही सर मैडम और ऋतू भी आ गए| मैंने कैब बुला ली थी और सर और मैडम तो अपनी कार से ही जाने वाले थे| मैंने उन्हें good night बोला और हम दोनों चल दिए| कैब में बैठ कर हम दोनों खामोश थे, अब मुझे अपनी सफाई देनी थी पर जब दिमाग और जुबान का कनेक्शन टूट चूका था तो अब सिर्फ सच ही बाहर आना था| "ऋतू...तुझे कुछ कहना नहीं है?" मैंने ऋतू से बात शुरू करते हुए पूछा| "कहना नहीं पूछना है|" ऋतू ने मेरी तरफ मुँह करते हुए कहा और फिर अपने दोनों हाथों से मेरे चेहरे को थाम लिया| नशे के कारन मेरी आँखें थोड़ी बंद होने लगी थी पर ऋतू ने मुझे थोड़ा झिंझोड़ा और मैं कुछ होश में आया| "आप अब भी उससे प्यार करते हो?" ऋतू ने मुझसे पूछा पर आज जो भी जवाब आना था वो दिल से ही आना था| "नहीं! मैं....बस....तुमसे...
प्यार करता हूँ|" मैंने जवाब दिया और मेरा जवाब सुन कर ऋतू कस कर मेरे सीने से लग गई| मैंने भी आँखें बंद कर लीं और दिल को इत्मीनान हो गया की ऋतू और मेरे बीच में अब कोई भी गलतफैमी नहीं बची| कुछ देर ऐसे ही मेरे सीने से लगे हुए रहने के बाद ऋतू ने पूछा; "सर को सब पता था ना?" पर मैं तो जैसे सो ने लगा था पर ऋतू ने फिर मुझे नींद से उठाते हुए झिंझोड़ा और तब मेरे मुँह से टूटे-फूटे शब्द निकलने लगे; "मैंने....कभी...उन्हें नहीं....बताया|" पर ऋतू को तो अब सारी बात सुननी थी| ऋतू ने अपने पर्स से एक सेंटर शॉक निकाली और मेरे मुँह में डाल दी| दाँतों तले जैसे ही मैंने उस च्युइंग गम का दबाया की खटास के झटके से मेरी आँख खुल गई| मैंने अजीब सा मुँह बनाते हुए ऋतू को देखा, ठीक वैसा ही मुँह जैसे की आप किसी नन्हे से बच्चे को नीम्बू चटा दो| ऋतू खिलखिला कर हँस दी और फिर बोली; "अब बताओ, सर को पता था की आप राखी से प्यार करते थे?"
मैंने कभी उन्हें इस बारे में नहीं बताया, बल्कि उन्हें क्या किसी को नहीं बताया| जब मैंने ऑफिस ज्वाइन किया था तो मेरे आने से कुछ महीने पहले ही राखी ने ज्वाइन किया था| हम दोनों के बीच में कभी कोई बात नहीं हुई, जो भी बात हुई वो काम से रिलेटेड थी| अब चूँकि मैं नया जोइनी था और थोड़ा नौसिखिया तो सर ने मुझे और राखी को एक साथ एक कंपनी का डाटा दे दिया| लंच ब्रेक में भी हम दोनों साथ ही बैठे होते पर बातें बहुत कम ही होती| चाय पीने के समय मैं अकेला ही जाता और एक दिन राखी ने मुझे सिगरेट पीते हुए देख लिया और तब से हमारी थोड़ी बहुत बात शुरू हुई| बातें बड़ी साधारण ही होती, थोड़ी बहुत कॉलेज की बातें बस! अब ऑफिस के सारे मेल एम्प्लाइज को तो तुम जानती हो उन हरामियों ने हम दोनों के बारे में बातें करना शुरू कर दिया| शायद सर ने सुन लिया और उन्हें ये लगा की हम दोनों का कोई चक्कर चल रहा है| इसीलिए उन्होंने हम दोनों को अलग-अलग डाटा दे कर दूर कर दिया| काम का लोड ज्यादा था तो अब हमारी बातें सिर्फ लंच टाइम में होती या कभी कभार वो मुझे चाय पीते हुए मिल जाती|" ऋतू मेरी बातें बड़े इत्मीनान से सुन रही थी, और जब मैंने बोलना बंद किया तो वो बोली; "ये सब शुक्ल जी और सर ने मिल के किया है! ये उन्हीं का प्लान था की कैसे आपको बदनाम करें! पहले शुक्ल जी ने आपको जबरदस्ती चढ़ा दिया की शराब पीनी है और लास्ट का दांव सर ने चला| छी! कितने गंदे लोग हैं!" ऋतू ने गुस्से से तिलमिलाते हुए कहा|
"Welcome to the corporate culture!!! यहाँ कोई भी किसी को तरक्की करता हुआ देख कर खुश नहीं होता| अब मुझे सैलरी में रेज मिला तो शुक्ल जी की किलस गई!" मैंने कहा| बातों-बातों में ऋतू का हॉस्टल आ गया और मैंने उसे गेट पर छोड़ा और वापस उसी कैब में अपने घर निकल गया| घर आया ही था की दो मैसेज फ़ोन में आये, पहला ऋतू का की वो हॉस्टल पहुँच गई और आंटी जी ने उसे कुछ नहीं कहा और
दूसरा अनु मैडम का; "मानु जी! रियली सॉरी! आज जो कुछ हुआ उसके लिए मैं इनकी तरफ से माफ़ी माँगती हूँ| अभी इन्होने मुझे अपना सारा घटिया प्लान बताया!" एक पल को तो मन किया की कल ही जा कर अपना रेसिग्नेशन बॉस के मुँह पर मार आता हूँ पर फिर ये सोच कर चुप हो गया की अभी कुछ महीनों के लिए ऋतू के साथ इस प्रोजेक्ट पर और काम कर लेता हूँ बाद में छोड़ दूँगा| यही सोचते हुए मुझे कब नींद आई पता ही नहीं चला|
update 33
सुबह बहुत देर से उठा करीब आठ बजे होंगे, जल्दी-जल्दी तैयार हुआ और ऑफिस पहुँचा| जाहिर है ऑफिस पहुँचने में थोड़ी देर हो गई पर आज बॉस ने मुझे कुछ नहीं कहा| बाकी दिन जब मैं लेट हो जाता तो बॉस कुछ न कुछ सुना देता था पर आज चुप था| जब मैं केबिन में गुड मॉर्निंग करने घुसा तब भी बस गुड मॉर्निंग का जवाब दिया पर कोई भी फाइल उठा कर मुझे नहीं दी| मैं भी वापस आ कर अपनी डेस्क पर बैठ गया और अपना सिस्टम चालु किया, सोचा की मैडम वाले प्रोजेक्ट पर ही थोड़ा काम कर लेता हूँ| तभी मेरी नजर शुक्ल जी पर पड़ी, और दिन तो उनके टेबल पर एक-आधी ही फाइल होती थी पर आज तो ढेर सारी थी! मैं समझ गया की मेरी फाइल्स भी सर ने उन्हें दे दी है तो अब बारी मेरी थी उनके मज़े लेने की! मैं उठा और उनके टेबल पर पहुँच गया;
मैं: अरे सिद्धार्थ भाई, आपने शुक्ल जी को ब्लैक कॉफ़ी नहीं मँगवा के दी? उनका हैंगओवर कैसे उतरेगा?
ये सुनते ही अरुण और सिद्धार्थ हँसने लगे अब शुक्ल जी को भी ढोंग करते हुए झूठी हँसी हसनी पड़ी|
मैं: क्या शुक्ल जी आप मेरे जैसे बच्चे से हार गए? वो भी देसी पीने में? बॉस से हारे होते तो मैं फिर भी मान लेता!
शुक्ल: अरे भाई....वो ....दरअसल ...
खाली पेट थे ना?
मैं: खाली पेट? वो भी शादी में? काहे?
अरुण: अरे शुक्ल जी काहे झूठ बोल रहे हो? सबसे ज्यादा खाना तो आप ही दबाये हो! (ये सुनते ही हम सारे हँसने लगे|)
सिद्धार्थ: शुक्ल जी ने पूरे शगुन के पैसे वसूल किये हैं|
मैं: शुक्ल जी महराज धन्य हो आप! मुझे लुढ़काने के चक्कर में खुद लुढ़क गए!
शुक्ल: बिटवा थोड़ा ज्यादा उड़ रहे हो!
उन्होंने मुझे टोंट मारना चाहा पर उनके आगे बोलने से पहले ही मैं बरस पड़ा;
मैं: मैं कहाँ उड़ रहा हूँ जी! मुझे उड़ाने का प्लान तो आप लोग बनाये थे, पर आप जानते नहीं हो मुझे ठीक से! जितनी आपकी उम्र है उतने घाटों का पानी पी चूका हूँ| अगली बार खुंदस निकालनी हो तो थोड़ा ढंग का प्लान बनाना|
मेरी आवाज ऊँची हो चली थी जो बॉस ने भी सुनी पर वो सिर्फ मुझे देख कर ही चुप हो गए| ठीक उसी समय मैडम एंटर हुईं और उन्होंने शायद मेरी बात सुन ली थी इसलिए अपने दाहिने हाथ की छोटी ऊँगली से मेरे हाथ को चलते हुए पकड़ा और मुझे अपने साथ अपने केबिन की तरफ ले आईं और बोलीं; "मानु जी क्यों अपना मुँह गन्दा करते हो? ये छोटे लोग हैं और इनकी सोच भी छोटी है, किसी की तरक्की इनसे देखि नहीं जाती|" मैंने मैडम की बात का जवाब नहीं दिया बल्कि मुड़ के अपने डेस्क की तरफ जा रहा था की उन्हें लगा जैसे मैं उनसे नाराज हूँ| मैडम मेरे टेबल के नजदीक आईं और मुझसे पूछने लगीं; "मुझसे नाराज हो?"
"नहीं तो mam! आपसे भला किस बात की नाराजगी?! मुझे बदनाम करने का पालन आपने थोड़े ही बनाया था|" मैंने तपाक से जवाब दिया|
"वैसे मानु जी! हीरे पर धुल गिराने से उस की चमक कम नहीं होती!" मैं मैडम के बात का मतलब समझ गया इसलिए मैंने आगे उनसे इस बारे में कुछ नहीं कहा| मैडम वापस अपने केबिन में चलीं गईं और मैं प्रोजेक्ट के काम में लग गया| कुछ देर बाद मैडम आईं और बोलीं; "मानु जी आप मुझे हज़रतगंज छोड़ दोगे? वहाँ GST ऑफिस में मुझे कुछ काम है|"
"Mam आप मुझे बोल दीजिये मैं चला जाता हूँ|" मैंने कहा|
"नहीं मैं ही जाऊँगी, यहाँ रहूँगी तो इनकी (बॉस की) शक्ल देखनी पड़ेगी|" मैडम ने मुँह बनाते हुए कहा| पर मुझे दिक्कत ये थी की बॉस का क्या सोचेंगे पर तभी मैडम बोलीं; "क्या सोच रहे हो?"
अब मैं क्या बोलता, मैं था और मैडम को चलने के लिए कहा| मैडम अपने केबिन में कुछ फाइल्स लेने गईं और मैं नीचे उतर आया, पार्किंग से बाइक निकाल के बाहर आया और इतने में मैडम भी नीचे आ गईं| मैडम ने पिट्ठू बैग टाँगा हुआ था, वो आज बाइक पर दोनों तरफ टांगें कर के बैठ गईं और उनके दोनों हाथ मेरे सीने से आ चिपके| आज तो उन्होंने ब्रा भी नहीं पहनी थी और नंगे स्तन बस एक कुर्ते के पीछे से मेरी कमीज में गड़े हुए थे| उनके इस स्पर्श से मेरे जिस्म में करंट दौड़ गया, मेरे लिए ये बहुत अनकम्फर्टेबले हो रहा था पर हिम्मत नहीं हो रही थी की मैडम को बोल सकूँ| मैं जानबूझ कर आगे को झुका ये
ड्रामा करने को की मैं बुलेट के इंजन को छू कर कुछ ढूँढ रहा हूँ| इससे मैडम की पकड़ थोड़ी ढीली हो गई और हम दोनों के बीच थोड़ा सा गैप आ गया| मैडम भी समझ गईं की मैं नाटक कर रहा हूँ इसलिए उन्होंने खुद से "सॉरी!!!" बोला| मैं उन्हें ज्यादा ऑक्वर्ड फील नहीं करवाना चाहता था इसलिए मैंने बाइक स्टार्ट की और हम हज़रतगंज के लिए निकले| पूरे रास्ते मैडम ने मुझसे कोई बात नहीं की, आधे घंटे का रास्ता चुप-चाप निकला| GST ऑफिस पहुँच कर मैडम ने कहा की मैं ऑफिस वापस चला जाऊँ| पर वो आज बहुत उदास महसूस कर रहीं थीं, अब उनका दोस्त था तो उन्हें ऐसे अकेला छोड़ना सही नहीं लगा| "Mam आपकी टुंडे कबाब की ट्रीट बाकी है! आज खाएं?" मेरी बात सुनते ही मैडम की चेहरे पर ख़ुशी लौट आई| उन्होंने बताया की उन्हें कम से कम आधे घंटे का काम है और तब तक मैंने भी सोचा की अपना एक काम निपटा लूँ, इसलिए मैंने उनसे इज्जाजत मांगी और निकल आया| जेब से उन अंकल जी का कार्ड निकाला जिन्होंने कल मुझे वो रिंग दी थी| एड्रेस आस-पास का ही था तो मैं उनकी दूकान जा पहुँचा, दूकान क्या वो तो शोरूम था! अब मुझे लगा की बीटा जितनी सेविंग थी सब गई! एंकल जी कॅश काउंटर पर खड़े थे और मुझे देखते ही मेरे पास आये और मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे काउच पर बिठा दिया और आ के मेरे बगल में ही बैठ गए| मेरे बारे में पूछा की मैं कहाँ का रहने वाला हूँ, यहाँ कब से हूँ, क्या जॉब करता हूँ वगैरह-वगैरह| मैंने भी उन्हें सब बता दिया और फिर बात आई रिंग की कीमत की! "बेटा मैं अब भी कह रहा हूँ की तुम्हें पैसे देने की कोई जर्रूरत नहीं!" अंकल जी ने बड़े प्यार से कहा|
"अंकल जी मैं बड़ा गैरतमंद इंसान हूँ! आपसे इस तरह से इतनी महंगी चीज लेना ठीक नहीं! फिर मैं नहीं चाहता की आपको मेरी वजह से नुक्सान हो!" मैंने भी बड़े प्यार से उन्हें अपनी मजबूरी समझाई|
"ठीक है बेटा! वो रिंग ज्यादा महंगी नहीं थी, वाइट सिल्वर की थी, वो दरसल किसी और क्लाइंट के लिए बनाई थी पर उस रात को तुम-दोनों को देख कर मुझे मेरी जवानी के दिन याद आ गए| अब तुमसे पैसे लेने को दिल नहीं करता पर तुम बहुत गैरतमंद हो इसलिए तुम मुझे बस लगत दे दो: 7,000/-, चाहो तो बाद में दे देना इतनी भी कोई जल्दी नहीं है|"
"अंकल जी मैं कार्ड लाया था तो ....
आपके पास मशीन हो तो?!" मैंने थोड़ा डरते हुए पूछा की खाएं वो कुछ गलत न समझें पर वो निहायती शरीफ थे उन्होंने तुरंत मशीन मंगवाई और पेमेंट होने के बाद मुझे बिल भी देने लगे तो मैंने मन कर दिया| उनसे बिल ले कर मैं उनकी बेज्जत्ती नहीं करना चाहता था| "तो बेटा शादी कब कर रहे हो?" अंकल ने पूछा|
"जल्द ही अंकल जी!" इतना कह कर मैंने उनसे विदा ली और वापस GST ऑफिस के बाहर पहुँचा| मैडम को बिठा कर सीधा अमीनाबाद पहुँचा और हमने टुंडे कबाब खाये| पर मैडम को अभी भी भूख लगी थी और वो कहने लगीं की किसी रेस्टुरेंट चलते हैं जहाँ बैठ कर खाना खा सकें| हम दोनों एक रेस्टुरेंट में आये और बैठ गए, मैडम का मुँह अब पहले की तरह खिला-खिला था इसलिए खाना भी उन्हीं ने आर्डर किया|
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एक अनोखा बंधन: पुनः प्रारम्भ
update 34
खाने में मैडम ने बस एक थाली ही आर्डर की थी, दरअसल उन्हें मुझसे कुछ बात करनी थी जो खड़े-खड़े कबाब खाते हुए मुमकिन नहीं थी| आर्डर आने से पहले ही मदमा ने अपनी बात शुरू की;
अनु मैडम: मैं अपनी इस शादी में पिछले २ साल से घुट रहीं हूँ! कॉलेज खत्म होने के बाद मेरा मन शादी करने का कतई नहीं था, बल्कि मैं तो घूमना-फिरना चाहती थी पर मेरे परिवार वालों की सोच बड़ी रूढ़िवादी थी, मेरा घूमना-फिरना उन्हें कतई पसंद नहीं था इसलिए मेरी शादी जबरदस्ती कर दी गई| कुमार (मेरे बॉस का मिडिल नाम) बहुत बोर और लालची इंसान है, उसके दिमाग में हर वक़्त पैसे ही पैसा घूमता है| दहेज़ के लालच में शादी की और इतने सालों में हम ने कभी प्यार के हसीन पल साथ नहीं बिताये! अपना अकेलापन दूर करने को मैंने पीना शुरू कर दिया और खुद उसी मायूसी में घुटती रही| ये घुटन दिन पर दिन बढ़ने लगी थी और मैं सोचने लगी थी की सुसाइड कर लूँ, पर फिर वो मुंबई वाला ट्रिप हुआ और मुझे तुम्हारे रूप में एक अच्छा दोस्त मिल गया|
इतने में वेटर एक थाली ले कर आ गया|
मैं: Mam आपने सर से इस बारे में बात की? I mean if you tell him, he might change himself …… (मैडम मेरी बात काटते हुए बोलीं)
अनु मैडम: I did but he’s too damn adamant to accept his behavior and instead blames me for it and expects me to change! This relationship is beyond repairable …and I’m gonna end it soon! I can’t live with this asshole anymore!
अब ये सुन कर मुझे बुरा लगने लगा और मैं कुर्सी पर पीठ टिका कर बैठ गया, मैडम ने पूरी का एक कौर खाया और मेरी तरफ देखते हुए बोलीं;
अनु मैडम: Don’t blame yourself for it, you’re not responsible for any of this! I told you all this cause I wanted to ask you a question?
अब ये सुन कर मेरी फटी पड़ी थी, मुझे लग रहा था की मैडम मुझे कहीं I Love You न बोल दें!
अनु मैडम: Do you support me in this decision …... as a friend?
मैं: I do mam! …..
As a friend I do!
अनु मैडम: Thank you! In case I need to crash a day or two, I’ll let you know!
ये कहते हुए मैडम हँसने लगीं और मैं भी झूठी हँसी हँसने लगा| मन ख़राब था पर मैं अपने चेहरे पर नकली हँसी बनाये हुए था, मैं नहीं चाहता था की मैडम का घर टूटे! हम अभी बाइके पर बैठ ही थे की किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और मैंने पलट के देखा तो ये मोहिनी थी!
"कहाँ घूम रहे हो?" उसने हँस कर पूछा| पर मेरे कुछ बोलने से पहले ही वो बोल पड़ी; "अच्छा जी! गर्लफ्रेंड घुमा रहे हो!!!!" उसकी बात सुन कर मैडम हँस पड़ीं और मैंने उसे प्यार भरे गुस्से से डांटते हुए कहा; "पागल! Office Mam हैं मेरी!"
"ओह..सॉरी...सॉरी..सॉरी..!!!" मोहिनी ने कान पकड़ते हुए कहा| "Its ok dear !!!" मैडम ने भी हँसते हुए कहा|
"तो यहाँ क्या कबाब खाने आये थे आप लोग?" मोहिनी ने पूछा|
"हाँ जी! GST ऑफिस से काम निपटा कर सोचा की चलो कबाब ही खा लें|" मैडम ने जवाब दिया|
"आप यहाँ क्या कर रही हो? बॉयफ्रेंड का इन्तेजार??" मैंने मोहिनी को छेड़ते हुए कहा|
"अरे कहाँ बॉयफ्रेंड! सारे अच्छे लड़के तो आपकी तरह ब्रह्मचारी हो गए हैं!" मोहिनी ने पलट कर मुझे ही छेड़ दिया|
"किसने कहा मैं ब्रह्मचारी हूँ? इतने साल टूशन पढ़ने के टाइम तो कभी मुझे कुछ कहा नहीं? बल्कि तब तो मेरे मजे लेती थी?!" मैंने कहा और मेरी बात सुन कर मैडम हैरानी से मुझे देखने लगी|
"अरे तब माँ होती थी ना! पर अब आपके पास टाइम ही नहीं है!" मोहिनी ने कहा|
हमारी इस हँसी-ठिठोली के मजे मैडम ने बहुत लिए और वो जी भर के हँस रही थी| फिर मुझे याद आया की कहीं मोहिनीं ऋतू के बारे में कहीं न बक दे, इसलिए मैंने उससे विदा ली|
मैडम और मैं बस हलकी-फुलकी बातें करते हुए ऑफिस पहुँचे, मैंने अपना बैग उठा कर सर को; "मैं जा रहा हूँ|" बोल कर निकल गया| सीधा अपनी जानेमन से मिलने उसके कॉलेज वाली लाल बत्ती पर उसका इन्तेजार करने लगा| ऋतू हमेशा की तरह मुस्कुराती हुई आई और पीछे बैठ गई| हम एक कैफ़े में पहुँचे और फिर मैंने उसे आज की सारी घटना बता दी| मेरी बात सुन कर उसे जरा भी हैरानी नहीं हुई और वो भी पूरे जोश में मैडम का सपोर्ट करते हुए बोली; "Mam ने जो भी कहा वो सही कहा! खुश रहें का हक़ सब को है, अब अगर बॉस उन्हें खुश नहीं रख पाते तो वो अपना जीवन क्यों बर्बाद करें? और इस सब में आपकी बिलकुल भी गलती नहीं है, आप नहीं होते तो मैडम सुसाइड कर लेतीं! भगवान् ने आपको उनकी जिंदगी में भेजा ही इसलिए था की आप उन्हें एक अच्छे दोस्त की तरह संभाल सकें!" मैं आगे कुछ बोल न सका, ऋतू का भरोसा खुल कर मेरे सामने आ रहा था| "अच्छा एक जरूरी बात! परसों काम्या का जन्मदिन है और उसने हम दोनों को रात की पार्टी में इन्वाइट किया है| इसलिए आपको अच्छे से तैयार हो कर आना है|" ऋतू ने जोश में आते हुए कहा|
"आजकल पार्टी कुछ ज्यादा नहीं हो रही? मेरी बर्थडे पार्टी, फिर राखी की शादी और अब ये काम्या का बर्थडे?! थोड़ा पढ़ाई में भी ध्यान दो!
वैसे आंटी जी को क्या बोलोगी?" मैंने ऋतू को थोड़ा डाँटते हुए कहा|
"उन्हें मैंने पहले ही बता दिया है की घर पर पूजा है इसलिए आप और मैं 3 दिन के लिए जा रहे हैं|" ऋतू ने बड़ी सरलता से कहा|
"पागल हो क्या? तीन दिन? कहाँ है ये पार्टी?" मैंने हैरानी से पूछा|
"जयपुर!!!" ऋतू ने उत्साह से भरते हुए कहा| मैं अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से ऋतू को घूरने लगा की ये लड़की पागल तो नहीं हो गई|
"ऋतू तुझे हो गया है? तेरे कुछ ज्यादा पर निकल आये हैं? कहाँ तो गाँव में चुप-चाप रहने वाली लड़की आज शहर की फूलझड़ी बन गई है!" मैंने ऋतू को थोड़ा डाँटते हुए कहा| ये सुन कर ऋतू का सारा उत्साह फुर्र हो गया और उसकी गर्दन झुक गई|
"गाँव में मैं 'जी' कहाँ रही थी? वहाँ जो भी खुशियां मिली वो सिर्फ आपने दी, वो खुशियाँ बस तरीकों के साथ आती थी| एक लिमिटेड टाइम के लिए, कुछ भी करने से पहले दस बार सोचना की कहीं घर वाले नाराज न हो जाएँ और मेरी शादी न कर दें! पर यहाँ आ कर मुझे पता चला की लाइफ को जिया कैसे जाता है! आप अगर मुझे यहाँ ना लाते तो मैं वही गाँव की गंवार बन के रह जाती| मानती हूँ की कई बार मैं अपनी सारी हदें पार कर देती हूँ, शायद इसलिए की ये खुशियाँ मेरे लिए due थीं और बड़ी लेट मिलीं|" ऋतू ने सर झुकाये हुए ही दबी आवाज में कहा| मैं ऋतू का दर्द समझ सकता था पर ये जो Wild हरकतें वो कर रही थी वो हमारे प्लान पर पानी फेर देतीं| "ऋतू देख मैं समझ सकता हूँ पर तू जिस स्पीड पर भाग रही है वो हमारे आने वाले जीवन के लिए खतरनाक है! अगर घर में बात जारा सी भी लीक हो गई तो बवाल खड़ा हो जायेगा|" मैंने ऋतू को समझाया| ऋतू ने बस सर झुकाये हुए ही हाँ में गर्दन हिलाई और मैं उठ कर उसके बगल में बैठ गया और उसे अपने सीने से लगा लिया| 5 बजने वाले थे तो मैं उसे ले कर निकल पड़ा और उसे हॉस्टल छोड़ा और फिर अपने घर आ गया|
रात के करीब दस बजे होंगे और मैं अंडे की भुर्जी बना रहा था की मेरे दरवाजे पर दस्तक हुई| मैंने दरवाजा खोला तो सामने काम्या खड़ी थी, मुझे देखते ही वो "Hi!!!" बोली| मैं उसे यहाँ देख कर भौंचक्कारह गया और हकलाते हुए "H ...H ...
Hi!!!" निकला| “Can I come in?” काम्या ने पूछा तो मैंने दरवाजे पर से हाथ हटाया और उसे अंदर आने दिया और खुद दरवाजे पर ही खड़ा रहा| वो अंदर आ कर मेरे घर को देखने लगी और तब उसका ध्यान अंडा भुर्जी पर गया और उसने फटाफट किचन सिंक में हाथ धोये और खुद ही एक प्लेट में अपने लिए भुर्जी निकाल ली और ब्रेड का पैकेट खोलने वाली थी तो मैंने उसे बताया की टिफ़िन में परांठा है| उसने फ़ौरन वो निकाला और बिना कुछ आगे बोले खाने लगी| मैं चौखट से अपनी पीठ टिका कर खड़ा हो गया और उसे खाते हुए देखने लगा| आधा परांठा खाने के बाद उसे याद आया की वो किस काम के लिए आई थी; "मानु जी! प्लीज चलो ना मेरे बर्थडे पार्टी पर जयपुर? आप नहीं जाओगे तो रितिका भी नहीं जायेगी!"
"सॉरी जी! पर ऑफिस से छुट्टी नहीं मिलेगी|" मैंने कहा पर वो आज पूरा मन बना कर आई थी|
काम्या: ओह come on! ये बस एक couple get together है! आप दोनों के बिना हमें कैसे मजा आएगा?
मैं: No offence, but I don’t even know you! I mean except that you’re her friend?
काम्या: That’s the best part, you and me… I mean… we can get to know each other!
मुझे काम्या की बात बहुत अजीब लगी!
मैं: I’m sorry, बॉस छुट्टी नहीं देगा|
काम्या: अरे ऐसे कैसे? इतनी मेहनती आदमी को छुट्टी नहीं मिलेगी तो कैसे चलेगा? मैं बात करती हूँ आपके बॉस से!" काम्या ने भुर्जी खाते हुए कहा|
मैं: Oh please! Don’t be a kid!
काम्या: ओह! समझी.... आप जानबूझ कर जाना नहीं चाहते! ठीक है मैं यहाँ से तब तक नहीं हिलूँगी जब तक आप हाँ नहीं कहते|
मैं: As you wish!
मैंने सोचा की ये कर भी क्या लेगी, कुछ देर बाद तो इसे जाना ही होगा वरना अपने घर में क्या बोलेगी? मैंने इधर ऋतू को फ़ोन मिलाया पर उसने उठाया नहीं, शायद वो सो चुकी थी| आधे घंटे तक मैं चौखट से अपनी पीठ टिकाये खड़ा रहा और काम्या मेरे पलंग पर आलथी-पालथी मारे बैठी रही|
काम्या: मानु जी! मुझे घर भी जाना है! प्लीज मान जाओ, मेरे लिए न सही पर ऋतू के लिए| उस बेचारी ने कभी जयपुर नहीं देखा वो थोड़ा घूम लेगी तो आपका क्या जायेगा? मैं उसे साथ ले जाती पर वो सिर्फ आपके साथ जाना जाती है|
अब मैं सोच में पड़ गया की ये खतरा कैसे उठाऊँ? घर पर ये बात खुलती तो काण्ड होना तय था! तभी ऋतू का फ़ोन आया और उसने मुझे फ़ोन स्पीकर पर करने को कहा; " काम्या? तेरी हिम्मत कैसे हुई उनको तंग करने की? मैंने तुझे बोला था न की हम नहीं जा रहे तू चली जा? फिर तू इतनी रात गए वहाँ क्या कर रही है?" ऋतू काम्या पर बरस पड़ी|
"ऋतू बस! ....
शांत हो जा! हम दोनों जा रहे हैं|" मेरी बात सुन कर काम्या खुश हो गई तो ऋतू खामोश हो गई| मैंने फ़ोन स्पीकर मोड से हटाया और अपने कान से लगाया| "अपनी जानेमन की ख़ुशी के लिए कुछ भी!" ऋतू को अब भी यक़ीन नहीं हो रहा था; "उस इडियट ने तो आपको तंग नहीं किया ना? मैंने उसे आपके पास जाने को नहीं बोला, मुझे तो पता भी नहीं था की वो आपके घर पर आई हुई है| अभी उसका मैसेज पढ़ा की वो आपके घर पर आपको मानाने आई है और आप मान नहीं रहे| इसलिए मैंने अभी कॉल किया!"
"जान! मैं किसी दबाव में नहीं कह रहा, बस इस पागल लड़की की बात से एहसास हुआ की मैं तुम्हारे साथ कितनी ज्यादती कर रहा था|" मैंने कहा और मेरे काम्या को पागल लड़की कहने पर वो हँस दी!
"पर घर का क्या?" ऋतू ने चिंता जताई|
"क्यों तुमने तो पहले ही बहाना ढूँढ रखा है?!" मैंने थोड़ा प्यार भरा टोंट मारा| "थैंक यू जानू! I love you!!!" ऋतू की ख़ुशी लौट आई और मुझे नहीं लगता की वो उस रात सोइ भी होगी! इधर रात के पोन ग्यारह हो रहे थे और अभी इस पागल लड़की को घर भी जाना था| "चलो आपको घर छोड़ दूँ|" मैंने ऋतू का फ़ोन काटते ही काम्या से कहा| “Thank you… Thank you… Thank you… Thank you… Thank you” कहते हुए वो मेरे नजदीक आ गई और मेरे गले लग गई पर मैंने उसे छुआ भी नहीं| "अच्छा बस मैडम! चलिए!" इतना कह कर मैंने खुद को उससे छुड़वाया और उसे घर छोड़ने निकला| मेरे घर से उसका घर करीब 20 मिनट दूर था, अब रात में कहीं कुत्ते पीछे न पड़ जाएँ इसलिए मैंने बाइके निकाली और उसे उसके घर के सामने छोड़ा| वो मुझे बाय बोल कर उछलती-कूदती हुई चली गई| मैं भी घर लौट आया और ब्रेड और ठंडी भुर्जी खा कर सो गया|
update 35
अगले दिन मैं उठ कर, नाहा धो कर ऑफिस पहुँचा और बॉस के सामने अपनी छुट्टी की अर्जी रख दी| "सर मुझे 4 दिन की छुट्टी चाहिए, घर पर पूजा-पाठ है! मैं मंडे ज्वाइन कर लूँगा|" सर ने मुझे देखे बिना ही ठीक है कह दिया, मैं भी वापस बाहर आ कर डेस्क पर पहले से ही रखी फाइल्स निपटाने लगा| लंच टाइम मैं उठ कर बाहर जा रहा था की अनु मैडम आ गईं और मुझसे बोलीं; "मानु जी! आपके सर ने बताया की आप कल गाँव जा रहे हो? कोई इमरजेंसी तो नहीं?"
"नहीं mam, वो घर में पूजा है इसलिए जा रहा हूँ| And sorry इस संडे प्रोजेक्ट पर काम नहीं कर पाउँगा, मैं संडे शाम तक लौटूँगा| आज मैं PPTs फाइनल कर दूँगा और वो आपने उन्हें पिछले पाँच साल के फाइनेंसियल स्टेटमेंट्स मँगवा लिए?" पर मैडम का तो जैसे मेरी बातों पर ध्यान ही नहीं था, उनकी आँखें मुझ पर टिकी थीं पर ध्यान कहीं और था! मैं ने हवा में मैडम के चेहरे के सामने हाथ हिला कर मैडम की तन्द्रा भंग करते हुए पूछा; "क्या हुआ mam?" उन्होंने बस कुछ नहीं कहा और वो अपने केबिन की तरफ चली गईं मैं भी कुछ सोचते हुए नीचे आ गया और चाय पी रहा था| मैंने जेब से फ़ोन निकाला और घर फ़ोन किया ये जानने के लिए की वहाँ सब कुछ कैसा है? कहीं पता चले की वहाँ से कोई शहर आ टपके और
काण्ड हो जाए! पिताजी ने फ़ोन उठाया तो वो मुझ पर ही बरस पड़े; "तुम दोनों के पास इतना भी समय नहीं की घर आ जाओ? पढ़ाई और काम-धंधे में इतने व्यस्त हो की घर की कोई चिंता ही नहीं? पहले तो हफ्ते में दो दिन के लिए तुम्हारी शक्ल दिख जाती थी अब तो महीने होंको आये तुम्हें देखे हुए? तुम लोगों की सूरत तो छोडो आवाज सुनने को कान तरस गए और तुम लोग हो की बस अपनी मस्ती में मस्त हो! इसीलिए तुम दोनों को शहर भेजा था?" पिताजी की बात जायज थी पर यहाँ ऋतू और मेरे काम के कारन हम गाँव नहीं जा आ रहे थे|
"पिताजी आपसे हाथ जोड़ कर माफ़ी माँगता हूँ! मैं या ऋतू आप सब की दी हुई आजादी का गलत फायदा नहीं उठा रहे, दरअसल मेरे ऑफिस में आज कल एक नया प्रोजेक्ट चल रहा है और इसलिए मैं सैटरडे-संडे ओवरटाइम कर रहा हूँ| कुछ महीनों में वो खत्म हो जायेगा तो मैं फिर से सैटरडे-संडे आ जाऊँगा| बल्कि मैं इस संडे ऑफिस के कुछ काम से आ रहा हूँ और ऋतू को घर छोड़ जाऊँगा, उसके कॉलेज की छुट्टियाँ हैं| मैं ताऊ जी से भी माफ़ी मांग लूँगा, पर अफ्ले आप तो माफ़ कर दीजिये|" मेरी सेंटीमेंटल बातें सुन कर पिताजी को तसल्ली हुई और उनका गुस्सा शांत हो गया| अभी मैंने कॉल रखा ही था की ऋतू का फ़ोन आ गया|
"जानू! मुझे बहुत डर लग रहा है! अगर हमारे पीछे से घर से कोई यहाँ आ गया तो?" ऋतू ने डरते हुए कहा|
"ये सब पहले नहीं सोचा था?" मैंने ऋतू को ताना मरते हुए कहा| "मैं तो साफ़ कह दूँगा की ये लड़की (ऋतू) मुझे बरगला कर ले गई थी!" मेरी बात सुनते ही ऋतू के मुंह से "Hwwwwwwwwwwww!!! " निकला और में जोर से हँस दिया| मिनट भर तक पेट पकड़ के हँसने के बाद मैं बोला; "तू चिंता मत कर, मैंने अभी घर कॉल किया था और घरवाले अभूत गुस्सा हो रहे थे| बड़ी मुश्किल से मैंने पिताजी को समझाया है और वादा किया है की इस संडे तुझे घर छोड़ दूँगा कुछ दिनों के लिए, क्योंकि तेरे कॉलेज की छुट्टी है|" ये सुनते ही ऋतू बोली; "ये अच्छा है! मुझे ही फंसा दो आप?! मैं वहाँ अकेली इतने दिन आपके बिना क्या करुँगी?!"
"जयपुर का प्लान किसने बनाया था?" मैंने पूछा और ऋतू समझ गई की ये उसकी गलती की सज़ा है| "अगली बार अगर इस तरह का पन्गा खड़ा किया न तो देख ले फिर?!" मैंने ऋतू को सचेत करते हुए कहा|
"I promise अगलीबार कुछ भी करने से पहले आप से पूछूँगी| वैसे आज कितने बजे मिल रहे हैं?"
"आज मुश्किल है, प्रोजेक्ट की PPTs पूरी करनी है वरना मैडम अकेले कैसे करेंगी और हाँ....
याद से मैडम को कल फ़ोन कर के बता देना की तुम इस संडे नहीं आने वाली और प्लीज ये मत कहना की घर पर पूजा है! वो बहाना मैंने मारा है|" मेरी बात खत्म हुई और ऋतू वापस कॉलेज लेक्चर अटेंड करने चली गई| मैं भी चाय पी कर वापस आ गया और डेस्कटॉप पर काम करने लगा| उस दिन मैडम से मेरी बात सिर्फ मेल पर ही हो रही थी क्योंकि मैडम लंच के बाद निकल गईं थी| अगले दिन सुबह जब मैं ऑफिस पहुँचा तो बॉस और मैडम को लगा की मेरा जाना कैंसिल हो गया; "जी शाम की बस है और वो PPT वाला काम फाइनल करना था इसलिए आ गया|" इतना कह कर मैं कल वाली PPTs में मैडम के बातये हुए करेक्शन कर रहा था| लंच के बाद मैं सर को बोल कर निकल गया, मैडम पहले ही जा चुकी थीं| मैं घर पहुँच कर तैयार हो कर एक बैग में अपने कुछ कपडे ले कर निकला और ऋतू के हॉस्टल पहुँचा| आंटी जी चूँकि वहीँ थीं तो उन्होंने जबरदस्ती रोक लिया और चाय पिलाई और पूछने लगी; "क्या घर में सत्य नारायण की पूजा है?" अब मैं बड़ा ही धार्मिक आदमी हूँ इसलिए मैं जान बुझ कर चुप रहा और ऋतू की तरफ देखते हुए मैंने चाय का कप अपने होठों से लगा लिया; "जी आंटी जी!" ऋतू बोली| चाय पी कर हम निकले और एक ऑटो में बैठ गए| "भगवान् के नाम से झूठ बोला है तूने, इस पाप की भागीदार तू ही है|" मैंने ऋतू को छेड़ते हुए कहा| "कोई नहीं जी! आपके प्यार के लिए ये पाप भी सर आँखों पर|" ऋतू ने जवाब दिया|
हम दोनों ही बस स्टॉप पहुँच गए पर काम्या और उसका बंदा अभी तक नहीं आये थे| बस आने में अभी करीब आधा घंटा था और मैं और ऋतू आराम से बैठे बातें कर रहे थे| इतने में मैडम का फ़ोन आया और मैं उनका कॉल लेने के लिए बाहर आ गया और हमारी बातें कुछ मेल वगैरह की हो रही थीं| तभी काम्या और उसका बंदा आ गए और सीधा ऋतू के पास बैठ गए| मेरी नजर अभी उन पर नहीं पड़ी थी, इतने में मेरी तरफ एक लड़का चलता हुआ आया| आँखों पर काला चस्म, लेदर जैकेट और मुँह में च्युइंग गम खाते हुए वो मेरे पास रूक गया| मैंने मैडम से एक मिनट होल्ड करने को कहा, उनका कॉल होल्ड पर डालते हुए उसकी तरफ देखते हुए सवालियां नजरों से देखने लगा और तभी वो खुद बोल पड़ा; "Hi! I'm Rohit!" उसने हाथ मिलाने को आगे बढ़ाया पर मैं अब भी सोच में था की ये कौन है? मेरी उलझन समझ कर वो खुद बोला; "I'm Kamya's boyfriend!" ये सुन कर मैं उसे ऊपर से नीचे फिर से देखने लगा और उसे कहा; "Just a sec! Mam I’ll call you back.” और मैंने मैडम का कॉल काटा और उस अजीब से चूतिये को देख कर मेरी हँसी बाहर आने को बेचैन हो गई| ठण्ड अभी शुरू नहीं हुई थी ये चुटिया लेदर जैकेट पहन के आया था| "You must be Manu?! Ritika’s boyfriend.
” उसने बड़े अमेरिकन एक्सेंट के साथ कहा और मेरी हँसी मेरे चेहरे पर झलकने लगी पर मैंने वो फिर भी जैसे-तैसे दबाई और हाँ में सर हिलाया| इतने में काम्या आगई और उसके कंधे पर हाथ रख कर खड़ी हो गई और बड़ी अकड़ से मेरी तरफ देखने लगी; "How did you like him?” मैं जानता था की मैंने कुछ कहने के लिए मुँह खोला तो मेरे मुँह से हँसी निकल जायेगी इसलिए मैंने बस थम्ब्स अप का निशाँ दिखाया और जाने लगा| तभी रोहित मुझे रोकते हुए बोला; "I’m going to get some mineral water, would you like some?” मैंने बस ना में सर हिलाया और ऋतू के पास आ कर बैठ गया| ऋतू ने मेरी तरफ देखा और पूछा; "कैसा लगा रोहित?"
"नजाने क्या मजबूरी रही होगी काम्या की!" मेरे मुँह से बस इतना निकला की ऋतू और मैं दहाड़े मार के हँसने लगे| वहाँ बैठे सारे लोग हमें देख रहे थे और तभी काम्या भी आ गई| उसे देख हमें और भी हँसी आ रही थी और वो बेचारी अनजान हमसे हँसी का कारन पूछ रही थी| ऋतू ने बात घुमा दी और ये बोल दिया की ऑफिस की बात थी! थोड़ी देर में रोहित पानी की बोतल ले आया और हमारे सामने बैठ गया| तभी उसकी नजर ऋतू की रिंग पर गई और उसने पूछ ही लिया, अपनी अमेरिकन एक्सेंट में; "That's a nice ring, who gave you?" ऋतू के जवाब देने से पहले ही काम्या ने उसकी पीठ पर थपकी दी और बोली; "Duffer मानु जी ने दी और किस की हिम्मत है जो रितिका को रिंग देगा?" इतना कहते हुए काम्या ने कॉलेज के पहले दिन वाला काण्ड दोहरा दिया जिसे सुन कर रोहित चुप हो गया| बेचारा complex फील करने लगा तो मैंने सोचा की कोई और टॉपिक छेड़ा जाए; "So guys what’s the plan? Where are we staying and what are we doing?”
“Chill bro! I got it!” रोहित ने कूल बनते हुए कहा|
“Oh really? But can you share it with us?” मैंने कहा तो रोहित बड़े ऐटिटूड में बोला; "Once we reach Jaipur we’re gonna check into a hotel, rest and head out for party at night!”
“Okay! But what’s the name of the hotel we’re checking into? And what’re we doing for 3 days?” मैंने रोहित की गलती निकालते हुए पूछा|
"Sex …Sex….
Sex” उसने बड़े casually जवाब दिया, पर ये सुन कर रितिका और काम्या गुस्से में उसे देखने लगीं|
“What? I thought we’re going for sex?” ये सुनते ही काम्या ने अपना पर्स उठाया और उस के मुँह पर मारा| “भोसड़ी के मेरा बर्थडे मानाने जा रहा है या हनीमून?" काम्या के मुँह से गाली सुनते ही मेरी तगड़ी वाली हँसी छूट गई और ऋतू आँख फाड़े मुझे देखने लगी|
“Yaar I was joking!” रोहित ने हँसते हुए कहा पर काम्या का गुस्सा खत्म नहीं हुआ; "साले तुझे बोला था न रितिका के सामने जुबान संभाल के बात करिओ, पर नहीं तूने तो अपनी गांड मरवानी है! सारे बनाये हुए इम्प्रैशन की माँ चोद दी तूने बहनचोद!" "तू कभी नहीं सुधरेगी!" ऋतू ने काम्या को गुस्से से देखते हुए अपने दाँत पीसते हुए कहा| मेरा हँसनाबंद हो चूका था, अब मुझे सब समझ आने लगा था| कॉलेज ज्वाइन करने से पहले मैंने ऋतू को समझाया था की अपने दोस्त सोच समझ कर बनाना| नशेड़ी,गंजेड़ियों, लौंडियाबाजों से दूर रहना और अगर लड़की से दोस्ती की तो कम से कम वो गाली न देती हो! काम्या गाली देती थी और ऋतू मुझसे ये बात छुपाना चाहती थी| मैंने ऋतू की तरफ देखा और दबी हुई आवाज में कहा; "Seriously??!" ऋतू ने कान पकडे और मुझे सॉरी कहा पर अब कुछ हो भी क्या सकता था|
"Jokes apart, होटल कौन सा बुक हुआ है?" मैंने पूछा|
"वहाँ पहुँच कर देखते हैं!" रोहित अब भी बड़ा निश्चिन्त था| माने आगे कुछ नहीं कहा और चुप-चाप अपना फ़ोन निकाला और Oyo पर दो रूम बुक किये| फिर फ़ोन दोनों की तरफ घुमाया और उन्हें दिखाते हुए बोला; "Rooms बुक हो गये हैं|"
"देख साले और सीख मानु जी से!" काम्या ने रोहित को घुसा मारते हुए कहा| बस के आने कस टाइम हो चूका था और गनीमत है की उसकी टिकट्स काम्या ने बुक करा दी थी| Volvo Super Deluxe आ कर खड़ी हुई और हम चारों अपनी-अपनी सीट्स पर बैठ गए| काम्या और रोहित ठीक हमारे सामने वाली सीट्स पर थे|खिड़की पर ऋतू बैठी थी, मैं aisle सीट में और उधर रोहित खिड़की पर और काम्या aisle सीट पर| 10 मिनट बाद ही बस चल पड़ी और रोहित ने मुझे देखते हुए अपना हाथ काम्या के कन्धों पर रख दिया| पर मुझे कोई दिखावा करने की जर्रूरत नहीं थी, ऋतू खुद ही मेरे कंधे पर सर रख चुकी थी और अपने दोनों हाथों से उसने मेरे दाएँ हाथ को पकड़ लिया| “Did you plan all this?” मैंने ऋतू से बड़े प्यार से पूछा| पर वो मेरी बात समझ नहीं पाई और बोली; "मैं कुछ समझी नहीं?"
"काम्या को मेरे घर मुझे मानाने के लिए भेजना?"
"बिलकुल नहीं!" ऋतू ने चौंकते हुए कहा|
"तो फिर वो मेरे घर कैसे आई? किसने एड्रेस दिया उसे मेरा?"
"उसने बाजार में आपको कई बार देखा था और एक आध-बार वो आपके घर के पास से गुजरी तब उसने आपको घर में घुसते-निकलते हुए देखा था| जब मैंने उसे आपसे इंट्रोडस करवाया था तब बाद में उसने बताया की वो तो आपको जानती है, मेरा मतलब की आप कहाँ रहते हो ये जानती है!"
"अच्छा जी?!" मैंने ऋतू को चिढ़ाते हुए कहा और ऋतू फिर से मेरे सीने पर सर
रख कर बैठ गई|
update 36
मुझे नींद का झौंका आ रहा था और ऋतू अपने बाएं हाथ से मेरे दाएँ हाथ को लॉक कर मेरे कंधे पर सर रख बैठी थी| उसकी ख़ुशी उसके चेहरे से झलक रही थी और दूसरी तरफ रोहित और काम्या जी भर के शो करने में लगे थे, एक दूसरे को छेड़ रहे थे, हँसी-ठिठोली कर रहे थे| पर ऋतू बहुत शांत थी और मन ही मन जैसे इस सब के लिए भगवान् को शुक्रिया कर रही थी| अभी मेरी आँख बंद ही हुई थी की उसने मुझे जगा दिया और बोली' "जानू! मुझे भूख लग रही है!" मैंने घडी देखि तो अभी शाम के 6 बजे थे, फिर उसे ऊपर रखे हुए चिप्स और थम्ब्स अप निकाल के दी| मैं हाथ मोड़ के बैठ गया, ऋतू ने पहला चिप्स मुझे खिलाया और फिर खुद खाने लगी| इतने में काम्या का ध्यान हमारी तरफ आया तो वो भी खाने के लिए उसी चिप्स के पैकेट पर टूट पड़ी| "मानु जी आप मेरी सीट पर बैठ जाओ|" काम्या बोली|
"हेल्लो मैडम! मैं आपके बॉयफ्रेंड के साथ बैठने यहाँ नहीं आया|" मैंने मजाक करते हुए कहा| तभी रितिका ने अपना चिप्स का पैकेट उसे दे दिया; "ये ले खा मोटी!" ये सुन कर हम चारों हँस पड़े| इतने में अनु मैडम का फ़ोन आ गया; "तो मानु जी बस मिल गई?"
"जी Mam मिल गई, इनफैक्ट मैं बस में ही हूँ| Sorry उस टाइम आपसे बात नहीं कर पाया|"
"अरे कोई बात नहीं, वो दरसल मैं कंपनी को मेल किया था तो उसने सारा डाटा भेज दिया है| सैटरडे रितिका आएगी तो मैं उसके साथ बैठ कर काम खत्म करती हूँ|" मैडम की बात सुन कर मैं ऋतू की तरफ हैरानी से देखने लगा| ऋतू ने अभी तक मैडम को नहीं बताया था की वो सैटरडे-संडे नहीं आ पायेगी! मैडम से बस इतनी ही बात हुई और फिर उन्होंने फ़ोन काट दिया| "ऋतू तूने मैडम को कॉल करके नहीं बताया?" मैंने ऋतू से पूछा तो वो अपनी जीभ दाँतों तले दबाते हुए बोली; "भूल गई! सॉरी! अभी कॉल करती हूँ|"
"पागल न बन! कल सुबह कॉल करिओ और बहाना अच्छा मारिओ वरना मैडम जबरदस्ती बुला लेंगी|" मैंने ऋतू को समझाया| खेर रात आठ बजे बस ने एक हॉल्ट लिया और खाना-पीना हुआ| मैं बस की यात्रा में कुछ ज्यादा खाता-पीता नहीं, चिप्स या बिस्किट और कोल्ड ड्रिंक्स, इससे ज्यादा कुछ नहीं लेता| काम्या और रोहित ने तो डाब कर पेला और पेट भर खाना खाया| ऋतू ने भी बस दो रोटी खाई और मुझे भी खाने को कहा पर मैंने मना कर दिया| रात के दस बजे होंगे, सारी लाइट्स ऑफ हो गईं और काम्या और रोहित का बस सेक्स चालु हो गया| दोनों एक दूसरे को चूमना शुरू कर चुके थे, ऋतू ये सब देख रही थी और मेरी नजर ऋतू पर थी| ऋतू बेचैन होने लगी थी पर जानती थी की हम बस में हैं और यहाँ कुछ भी करना पॉसिबल नहीं है| ऋतू ने अपने बाएँ हाथ को मेरी कमर में डाला और मेरी तरफ झुक कर मेरे सीने पर अपना सर रख लिया| उसका दाहिना हाथ मेरे पेट पर था और ध्यान अब भी काम्या और रोहित के चूमने पर था| वो दोनों ज्यादा तो कुछ नहीं कर रहे थे बस एक दूसरे को Kiss ही कर रहे थे और इतने से ही ऋतू की
सांसें भारी होने लगी थीं| जिस दिन मैंने ऋतू का गुस्से से डाँटा था उस दिन से मैंने उसे जरा भी नहीं छुआ था और उसकी ये बेताबी फिर से बाहर आने लगी थी| माने झुक कर ऋतू के सर को चूमा ताकि वो अपने जज्बातों को काबू में कर ले| पर मेरा ये kiss ऐसा था मानो जैसे किसी ने गर्म तवे पर पानी का छींटा मारा हो| मेरे ऋतू के सर पर kiss करते ही वो मेरी आंखों में प्यास भरी आँखों से देखने लगी| वो आँखों ही आँखों में मुझसे मिन्नत करने लगी| मानो जैसे कह रही हो की बस एक Kiss! उसकी मासूम आँखों को देख कर मैं पिघलने लगा और झुक कर उसके अधरों पर अपने होठों को रख दिया| मैंने अपना मुँह थोड़ा सा खोला और उसके नीचले होंठ को धीरे से अपने मुँह में भर लिया और चूसने लगा| ऋतू का दायाँ हाथ मरे बाएँ गाल पर आ चूका था| ऋतू ने अपनी रस भरी जीभ मेरे मुँह में दाखिल कर दी थी और वो मेरी जीभ से समागम करने लगी थी| मैंने अपने दोनों हाथों से ऋतू के मुँह को थाम लिया था, और उसकी जीभ को अपने मुँह में चूसने लगा था| कुछ सेकंड बाद मैंने उसकी जीभ छोड़ दी और अपनी जीभ को धीरे से उसके मुँह में सरका दिया| मेरी जीभ का गर्म जोशी से स्वागत हुआ, रितिका के होठों ने उसे अपने दबाव से पकड़ लिया और ऋतू उसे चूसने लगी| इसी तरह हम दोनों बारी-बारी से एक दूसरे के होठों को चूस रहे थे और ये सब हम बिना किसी आवाज के और धीरे-धीरे कर रहे थे| जब हम रुके और अलग हुए तो हमारे रस की एक तार हम दोनों के होठों के बीच थी| हम दोनों उस कुछ देर के लिए ये भी भूल चुके थे की हम घर पर नहीं बल्कि बस में हैं| जब हम अलग हुए तो ऋतू की नजर बगल वाली सीट जिस पर काम्या और रोहित बैठे थे उस पर पड़ी और वो एक दम से शर्मा कर मेरे सीने पर दोनों हाथों से अपना मुँह छुपा कर बैठ गई| मैंने जब उस तरफ देखा तो पाया की वो दोनों हमें ही देख रहे थे! हमारे kiss से अगर कोई संतुष्ट था तो वो थे काम्या और रोहित! हैरानी बात ये थी की मैं बिलकुल नहीं शरमाया बल्कि मुझे तो जैसे गर्व महसूस हो रहा था| ऐसा लगा जैसे मैं कोई टीचर हूँ और उन दोनों को Kiss करना सीखा रहा हूँ| मैंने अपने दोनों हाथों से ऋतू को अपने सीने से चिपकाया और हाथों को लॉक कर ऐसे जताया की वो मेरे पहलु में सुरक्षित है| मेरे ऐसा करने से ऋतू भी संतुष्ट हो गई की वो सुरक्षित है और उसने अपने दोनों हाथों से मुझे कस कर जकड़ लिया| कुछ देर बाद काम्या और रोहित एक दूसरे से कुछ खुसर-फुसर करते हुए सो गए| मुझे ऐसा लगा जैसे काम्या रोहित से कह रही हो की; "सीख मानु जी से कुछ! कितना passionately kiss करते हैं वो रितिका को?" और वो बेचारा जल-भुन के रह गया|
खेर सब सो चुके थे और एक अकेला मैं ही जाग रहा था| हाईवे में हवा से बातें करती हुई बस, वो साईरन बजाते हुए ट्रकों का गुजरना वो जगमगाती हुई ढाबों की लाइट्स, वो दूर कहीं किसी के घर की लाइट्स आदि को देखना| मुझे यही देखने में बड़ा
मजा आ रहा था और मैं अपनी सोच में गुम था| बारह बजे ऋतू जाएगी और उसने मुझे इस तरह से जाएगा हुआ पाया तो पूछने लगी; "जानू! क्या हुआ? आप जाग क्यों रहे हो?"
"कुछ नहीं जान! मैं रात को बस में सोता नहीं हूँ, ये शान्ति और लाइट्स देखना मुझे अच्छा लगता है|" मैंने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा|
"एक बात कहूँ जानू? आपको पता है मुझे अभी कैसा लग रहा है?"
"कैसा?" मैंने पूछा|
"ऐसा लग रहा है जैसे हम दोनों घर से भाग रहे हैं और कल से हमारी एक नयी जिंदगी शुरू होगी| जहाँ हमें इन समाज के बंधनों की कोई जर्रूरत या परवाह नहीं होगी| कोई रोक-टोक नहीं! हम आजाद परींदे होंगे! वो फिल्मों वाली फीलिंग आ रही है, जिसमें हीरो अपनी हेरोइन को इसी तरह अपने पहलु में छुपाये घर से भगा कर ले जा रहा हो|"
"हम्म... वो दिन भी आएगा मेरी जान! अब आप सो जाओ!" मैंने ऋतू के सर को चूमते हुए कहा|
"हम जयपुर कब पहुँचेंगे?" ऋतू ने फिर से मेरे सीने पर सर रखते हुए पूछा|
"सुबह 4 बजे!"
'तो आप भी सो जाओ थोड़ी देर|" ऋतू ने मुझे उसकी गोद में सर रख कर सोने का निमंत्रण देते हुए कहा|
"आप सो जाओ जान! मुझे ये लाइट्स देखने में आनंद आ रहा है|"
"ठीक है तो मैं भी आपके साथ जागूँगी| मैं भी तो देखूँ की आप किस आनंद की बात कर रहे हो|" पर ऋतू कुछ देर ही मैं बोर हो गई और मेरे कंधे पर सर रख कर सो गई| मैंने धीरे से अपनी जेब से फ़ोन निकाला और अपनी एक सेल्फी ली| ऋतू मेरे कंधे पर सर रख कर सोते हुए बड़ी प्यारी लग रही थी| फिर मैं फ़ोन से स्लो मोशन वीडियो बनाने लगा, फिर फ़ोन से हेडफोन्स लगाए और गाने सुनने लगा, इसी तरह से मैंने सारी रात पार की| सुबह पौने चार बजे मैंने ऋतू को उठा दिया और काम्या और रोहित को भी उठा दिया| ठीक 4 बजे हमारा स्टैंड आ गया| अपना सामान ले कर हम चारों उतरे और मैंने फटफट ऑटो किया, अब बैठने की बारी आई तो काम्या बोली; "रोहित तू आगे बैठ जा!" आगे का मतलब था ड्राइवर के साथ और ये सुन कर वो काम्या की तरफ सावलिया नजरों से देखने लगा| मुझे हँसी तो बहुत आई पर मैं कुछ नहीं बोला और हम तीनों पीछे बैठ गए| मैंने नेविगेशन ऑन कर दी थी की कहीं ऑटो वाला होशियारी न करे और मैं ऑटो वाले को ऐसे बता रहा था जैसे मैं इस इलाके से परिचित हूँ| वो भी मुझसे पूछ रहा था की; "बाबू आप यहीं के रहने वाले हो?" मैंने भी जवाब में हाँ कहा और उसे आगे ज्यादा बात करने का मौका नहीं दिया| पर रोहित तो चूतिया ही निकला वो पूछने लगा; "मानु आप जयपुर के हो?" अब उसकी बात सुन कर मैं काम्या की तरफ देखने लगा और वो अपना सर पीटते हुए बोली; "He's bluffing you moron!" तब जा कर उसे समझ आया और वो चुप कर गया| होटल पहुँच कर मैंने अपनी रिजर्वेशन दिखाई और हम अपने-अपने कमरे में आ गए| सामान रख कर मेरा जासूसी दिमाग चालु हो गया और मैं अपना और ऋतू का फ़ोन ले कर कमरे घूमन शुरू कर दिया| ये Oyo का होटल था और हल ही में इसके बारे में छपा था की
यहाँ पर रूम्स के अंदर हिडन कैमरा लगे होते हैं| ऋतू बड़ी हैरानी से मुझे ये जासूसी करते हुए देख रही थी और जब मेरी तहक़ीक़ात पूरी हो गई तो वो बोली; "ये आप क्या कर रहे थे?" तब मैंने ऋतू को सारी बात बताई और वो कहने लगी की हम कहीं और चलते हैं| "जान! किस होटल में कैमरा लगा है ये किसी को नहीं पता, पर अपनी तरफ से चेक कर लेना बेहतर है| इस कमरे में कहीं कोई कैमरा नहीं है| So relax! okay?!" मेरी बात से ऋतू आश्वस्त हो गई और हम अपने कपडे बदल कर लेट गए|
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मुझे लग रहा था की ऋतू सेक्स के लिए आतुर हो गई पर उसके ठीक उलट वो तो बस मेरे सीने पर सर रख कर, अपने बाएँ हाथ से मुझे जकड़ और अपनी बायीं टाँग मेरे पेट पर रख कर सो गई| मैंने ऋतू के सर को चूमा और मैं भी सो गया| सुबह 10 बजे मेरी आँख खुली और ऋतू अब भी मेरे से उसी तरह चिपकी हुई थी| मैं उठने लगा तो उसकी भी आँख खुल गई पर फिर भी लेटी रही| में फ्रेश हो कर आपस आ गया और तब तक ऋतू भी उठ गई थी और टी.वी चालु कर रही थी| मुझे देखते ही वो आ कर मेरे से लिपट गई; "जानू! आज कौन सा आपको ऑफिस जाना है जो उठ गए?" मैंने प्यार से ऋतू के सर को चूमा और कहा; "क्या करें? आदत है उठने की और वैसे भी भूख लग आई थी|" फिर मैंने अपने और ऋतू के लिए नाश्ता मँगवाया जो की कॉम्प्लिमेंट्री था| नाश्ता खा कर ऋतू फिर से बिस्तर में बैठ गई पर मैं तैयार होने लगा| मुझे ऐसे तैयार होता हुआ देख वो बोली; "कहाँ जा रहे हो आप?"
"यहाँ कमरे में सोने थोड़े ही आये हैं? चलो रेडी हो जाओ यहाँ इतनी सारी जगह है घूमने की और हाँ याद है अनु मैडम को भी इन्फॉर्म कर दो|" तभी दरवाजे पर दस्तक हुई, मैंने दरवाजा खोला और काम्य अंदर आ गई| "आप कहीं जा रहे हो मानु जी?" उसने पूछा|
"मैं तो आप दोनों को जगाने आ रहा था, की कहीं घूम कर आते हैं|" मेरी बात सुन कर काम्या खुश हो गई और रेडी होने चली गई| इधर ऋतू ने भी तैयार होना शुरू कर दिया| आज ऋतू ने पहलीबार जीन्स और एक टॉप पहना था और उसे जब देखा तो मेरी आँखें उस पर से हट ही नहीं रही थी|
"क्या कहूँ तेरी सूरत-ए-तारीफ में मेरे हमदम,
अल्फाज खत्म हो गए हैं तेरी अदाएं देख-देख के!"
ये शेर सुनते ही ऋतू भागती हुई आई और मेरे गले लग गई, शर्म से गाल लाल हो चुके थे| हम ऐसे ही दूसरे में खोये हुए थे, काम्या की आवाज ने हमें वापस रियलिटी में खींच लिया| "ओ लव-बर्ड्स चलो" उसने हँसते हुए कहा| हाथों में हाथ लिए मैं और ऋतू कमरा लॉक कर के होटल से निकले और हमने ऑटो किया, सबसे पहले हम हवा महल पहुंचे और उसके पास वाली मार्केट में घूमने लगे| काम्या तो वहाँ की दुकानें देख कर शॉपिंग करने को कूद पड़ी और ऋतू को भी अपने साथ खींच के ले गई| दोनों एक पटरी वाले के पास झुमके देख रहे थे और मैं अपनी जेब में हाथ डाले खड़ा उन्हें देख रहा था| अचानक से काम्या ने एक झुमका ऋतू को दिया और try करने को कहा पर ऋतू ने मना कर दिया| मुझसे नजर
बचा कर उसने खुसफुसाती हुए काम्या से कहा; "मेरी सैलरी जीन्स और टॉप में खत्म हो गई... तू ले ले!" काम्या भी खुसफुसाती हुए कहने लगी; "अरे मुझे बाद में दे दियो!" पर ऋतू नहीं मानी और उसने वो झुमका काम्या को वापस दे दिया| काम्या बहुत होशियार थी उसने हाथ हिला कर मुझे अपने पास बुलाया और वो झुमके का पैकेट मुझे दिया और इशारे से कहा की मैं ऋतू को खरीद कर दूँ| मैंने वो झुमके को पैकेट को गौर से देखा और वापस नीचे रख दिया, मेरा ऐसा करने से काम्या का मुँह बन गया| वो सोचने लगी की कितना कंजूस बॉयफ्रेंड है रितिका का, पर अगले ही पल मैंने एक रॉयल ब्लू कलर का झुमका उठाया और उसे ऋतू को try करने को कहा| मेरा ऐसा करने से काम्या की ख़ुशी लौट आई पर ऋतू ने ना में सर हिला कर मना कर दिया| "अच्छा लगेगा अगर मैं यहाँ तुझे एक खींच कर चमाट मार दूँ?" मैंने ऋतू को थोड़ा प्यार से डराते हुए कहा| उसने चुप चाप वो झुमके मुझे पहन के दिखाए और जब उसने खुद को आईने में देखा तो ख़ुशी से उछाल पड़ी और आ कर मेरे सीने से लग गई| काम्या ने भी इसका फायदा उठाया और हम दोनों की तस्वीर खींच ली! भरी-पूरी मार्किट में एक प्रेमी जोड़ा सब कुछ भूल कर बस एक दूसरे के गले लगा हुआ है| हम तो जैसे अलग होना ही नहीं चाहते थे पर इस चमन चूतिये रोहित ने एक्ससिटेमेंट में शोर मचा दिया और हम दोनों अलग हो गए| मैंने अपना वॉलेट निकाला और ऋतू को 1000/- रुपये दे दिए इतने में रोहित ने मुझे स्मोक करने का इशारा किया| ऋतू ने ये देख लिया और हाँ में सर हिला कर मुझे इजाज़त दी|
"दो गोल्ड फ्लैक|" रोहित ने कहा तो मैंने उसे मना कर दिया और अपने लिए एक अल्ट्रा ली, मुझे अल्ट्रा फूँकते देख उसे मेरी रईसी भा गई| 2 मिनट बाद ही ऋतू और कमाया दोनों ही हमारे पास आ गईं| रोहित ने सिगरेट काम्या की तरफ बढ़ाई और उनसे काश लेते हुए ऋतू को भी पीने का इशारा किया| ऋतू मेरी तरफ देखने लगी और मैंने नहीं में सर हिलाया और उसे सिगरेट नहीं दी| "तू स्मोक करती है?" मैंने ऋतू से पूछा तो उसने ना में सर हिलाया| "खा मेरी कसम!" मैंने कहा तो ऋतू ने झट से मेरी कसम खाई और बोली; "मैंने आज तक कभी सिगरेट नहीं पि आपके साथ उस दिन पार्टी में जो पिया था उसके बाद कुछ भी नहीं पिया या खाया|"
"Give her some freedom man!" रोहित ने बीच में बोलते हुए कहा|
"She has all the freedom she wants but smoking isn’t allowed!” मैंने हुक्म से बोला|
"That's not fair! You smoke too!" काम्या बोली|
"Because I gave him permission!" ऋतू बोली और ये सुन कर वो दोनों चुप हो गए| सिगरेट खत्म हो चुकी थी तो हम पैदल चलते हुए हवा महल पहुँचे और वहाँ टिकट ले कर घूमे, ऊपर चढ़ कर हमने बहुत सी पिक्चर खींची! 3 बजे हम वहाँ से निकले और खाना खाने एक रेस्टुरेंट में बैठ गए| खाना आज ऋतू ने आर्डर किया, दाल बाटी, राजस्थानी कढ़ी, बाजरे की रोटी, गट्टे का पुलाव और मीठे में घेवर| "रिसर्च कर के आई हो?" मैंने ऋतू की तारीफ करते हुए कहा और वो
मुस्कुराते हुए बोली; "आपसे सीखा है|" खाना खा कर हम उठे थे की अनु मैडम का फ़ोन आ गया; "मानु जी! आप क्या गए यहाँ तो सब के सब मुझे अकेला छोड़ के चले गए?" ये सुन कर मैं थोड़ा हैरान हुआ और समझ नहीं आया की मैडम का कहने का मतलब क्या है; "मैं कुछ समझा नहीं mam?"
"अरे रितिका भी छुट्टी मार रही है! उसके घर पर किसी की डेथ हो गई है|" ये सुनते ही मेरी आँखें बड़ी हो गई और मैं हैरानी से ऋतू को देखने लगा|
"ओह! Mam किसकी डेथ हो गई कुछ बतया रितिका जी ने?" मैंने ऋतू की तरफ देखते हुए कहा और तब वो समझी की क्या माजरा है| "उसके नाना जी की डेथ हो गई, बेचारे उम्रदराज जो थे!" मैं चुप रहा और मुझे ऋतू का बहाना सुन कर हँसी भी आ रही थी और गुस्सा भी| ऋतू के नाना की मृत्यु कुछ साल पहले ही हो चुकी थी और मुझे बुरा लगा की उसने ऐसा झूठ बोला| खेर मैडम ने कुछ काम जे जुडी बातें की और फिर उन्होंने बाय बोल कर कॉल रख दिया| "तुझे मारने के लिए कोई और नहीं मिला?" मैंने ऋतू से हँसते हुए पूछा| ये सुन कर काम्या पूछने लगी तो ऋतू ने खुद ही सारी बात बताई| ये उन कर वो और रोहित दोनों हँसने लगे पर ऋतू जानती की मुझे उसकी ये बात बुरी लगी है|
खेर हम होटल लौटे और रात को पब जाने का प्लान बना था| मैंने अपने कपडे उतारे और अंडर गारमेंट्स में ही लेट गया| ऋतू ने भी अपने कपडे बदले और पलंग पर चढ़ गई| फिर अपने दोनों कान पकडे और घुटनों के बल बैठ गई; "जानू! I’m really sorry! मैं ऐसा झूठ नहीं बोलना चाहती थी, पर मुझे कोई और बहाना नहीं सूझा| I’m really sorry!” मैंने अपनी बाहें खोल दीं और ऋतू आ कर मेरे सीने से चिपक गई| मैंने उसे माफ़ कर दिया, पर काम्या की दोस्ती में ऋतू कुछ ज्यादा ही बिगड़ने लगी थी| कल रात जागने की वजह से मुझे नींद आ रही थी और हम ऐसे ही सो गए| शाम के 7 बजे होंगे की काम्या हमें उठाने आई| ऋतू दरवाजा खोलने गई और मैं बाथरूम जा रहा था| काम्या ने मुझे कच्छे में बाथरूम घुसते देख लिया और वो ऋतू को छेड़ने लगी| हम तैयार हो कर निकले तो ऋतू और काम्या को भूख लगी थी और उन्हें चाहिए था खाना| रोहित ने उन्हें समझाया की जो खाना है वो पब में ही खाना है| हम पब पहुँचे और रोहित ने हमारे लिए एक बूथ ले लिया| लड़कियों ने खाना मंगाया और रोहित ने ड्रिंक्स मेनू मेरी तरफ बढ़ा दिया| वो जानता था की मेरी पसंद बढ़िया है! अपने, ऋतू और काम्या के लिए हेनिकेन्स मंगवाई और रोहित को शो-ऑफ करना था तो उसने अपने लिए कोरोना मंगाई! म्यूजिक अभी बहुत स्लो था, लोग भी ज्यादा नहीं थे| तो बियर पीते हुए बातें शुरू हुईं;
रोहित: So how did you guys meet?
अब इस बारे में ऋतू मुझे पहले ही बता चुकी थी की उसने काम्या को क्या झूठ बोला है| मैंने भी ऋतू की बात को दोहरा दिया;
मैं: We met in a bus.
काम्य: Oh come on maanu ji! I’ll tell you the whole story. So actually it was a sunday morning and she was on her way to somewhere. She was sitting alone on the bus stand and that’s the first time he (manu) saw her. Then the bus came and they both took a seat but not together but at some distance.
Manu ji was sitting a seat ahead of her and she was busy looking outside. Then an old auncle came and he (manu) offered his seat to them and stood. That’s the first time she saw him and they were constantly seeing eachothers. They got down at the same bust stand and he (manu) said ‘hi’ to her and she just smiled. Then they simply moved into different directions.
रोहित: What the hell? Why didn’t you guys talk? Didn’t even exchanged numbers?
काम्या: Story’s not over, you duffer! Then after few days they met again on the same bust stand and this time they were sitting next to each other on the bus. He (manu) started the conversation otherwise this dumbo (ritu) wouldn’t have uttered a word. And that’s how they came close!
ऋतू ये सब मुस्कुराती हुई मेरे बाएँ कंधे पर सर रख कर सुन रही थी| सच में बड़ी डिटेल में कहानी बना कर सुनाई थी उसने काम्या को|
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धीरे-धीरे म्यूजिक लाउड हो रहा था और नौजवान लोगों का ताँता लगना शुरू हो गया था| बातें करते-करते कब चारों ने तीन-तीन बियर की बोतल ख़त्म कर दी पता ही नहीं चला| चूँकि हेनिकेन्स बड़ी स्मूथ बियर होती है तो हम चारों में से कोई भी नशे में नहीं था| एक हल्का सा सुरूर जर्रूर था| अभी सिर्फ 10 ही बजे थे और डी.जे ने अंग्रेजी गाने बजाने शुरू कर दिए थे और हमारे रोहित को बस एक ही सिंगर का नाम था और एक ही गाना पसंद था| वो गाना था जस्टिन बिबेर का; 'बेबी'| इन्होने अपनी फरमाइश कर दी और डी.जे. भाई ने बजा दिया... गाना! ये भाईसाहब अकेले थे जो खड़े हो कर झूम रहे थे! ऋतू ने मुझे कोहनी मारी और दिखाया की बाकी सब रोहित पर हँस रहे थे! हंसी तो मुझे भी आ रही थी पर मैं जैसे-तैसे हँसी झेल गया| इधर काम्या ने गुस्से में अपने लिए स्कॉच मँगा ली, मैं समझ गया की आज रायता जर्रूर फैलना है| अब स्कॉच देख कर ऋतू ने मेरी देखा, अब उसे मन नहीं कर सका| मैंने हम दोनों के लिए भी स्कॉच मंगाई पर ऋतू के 30ml को अपनी ड्रिंक में डाल कर 10 ml कर दिया! वो प्यार भरे गुस्से से मुझे देखते हुए बोली; That's not fair!" मैंने प्यार से उसके गाल को चूमा और कहा; "अब हो गया न फेयर?" ऋतू खुश हो गई और पूरा ड्रिंक एक बार में गटक गई| मैं हैरानी से उसे देखता रह गया पर उसके चेहरे पर प्राउड वाली फीलिंग थी| मानो जैसे इस तरह एक घूँट में सारा ड्रिंक पी कर उसने कोई तीर मारा हो| मुझे उसके ऐसा करने पर प्यार आ गया और ऋतू मेरे सीने से सर लगा कर बैठी रही|
इधर काम्या हम दोनों को देख-देख कर जल रही थी| उसने आधा ड्रिंक पिया, खड़ी हो कर डांस फ्लोर पर चली गई और रोहित के साथ नाचने लगी| मैं और ऋतू अब भी ऐसे ही बैठे थे और मैं धीरे-धीरे ड्रिंक कर रहा था| ऋतू बहुत शांत थी और स्कॉच का हल्का-हल्का असर उस पर आने लगा था| "जानू! आज मैं भी चिकन विंग्स खाऊँ?" उसने पूछा तो मैंने सीधा वेटर को बुलाया और चिकन विंग्स आर्डर कर दिए| इधर काम्या और रोहित तक कर वापस आ कर बैठ गए| रोहित ने भी अपने लिए स्कॉच मँगाई और धीरे-धीरे पीने लगा| 10 मिनट बाद चिकन विंग्स आ गए और सबसे पहले ऋतू ने एक पीस उठाया| मैंने ऋतू वाले पीस पर आधा निम्बू और निचोड़ दिया| पहली बाईट लेते ही ऋतू को मजा आ गया| निम्बू की खटास थी तो ऋतू को उबकाई नहीं आई वर्ण मुझे डर था कहीं वो उलटी न कर दे| "Wow! Its so yummy!
मैंने अपने जीवन ले 19 साल बिना इसे खाय कैसे निकाल दिए?" ऋतू ने चटकारा लेते हुए कहा| ऋतू को चिकन खता देख काम्या आँखें फाड़े देख रही थी| | "मानु जी! आपने क्या जादू कर दिया रितिका पर? जिसे नॉन-वेग देख कर उलटी आती थी वो आज चिकन खा रही है|" काम्या ने मुझसे पूछा| "मैंने कुछ नहीं किया. मैडम जी को आज खुद खाने का मन किया|" मैंने सफाई देते हुए कहा| खेर हम तीनों का ड्रिंक खत्म हो चूका था और किसी ने डी.जे. से रोमांटिक गाने की फरमाइश कर दी| "दिल दियां गल्लां" जैसे ही बजा काम्या मुझे और ऋतू को खींच कर डांस फ्लोर पर ले आई| ऋतू को स्कॉच की थोड़ी-थोड़ी खुमारी चढ़ने लगी थी और डांस फ्लोर पर सभी कपल्स को देख उसने भी ठीक वैसे ही डांस करना शुरू कर दिया| शुरुआत में ऋतू मेरी तरफ मुँह कर के खड़ी थी और मेरे दोनों हाथ उसके कमर पर थे, ऋतू के भी दोनों हाथ मेरे दोनों कन्धों पर थे| हम दोनों बस धीरे-धीरे दाएँ से बाएँ हिल रहे थे|
मैं ऋतू की आँखों में खुमारी साफ़ देख पा रहा था और ऋतू मेरी आँखों में अपने लिए प्यार|
"दिल दियां गल्लां
करांगे नाल नाल बह के
आँख नाले आँख नू मिला के
दिल दियां गल्लां…"
मैं और दोनों ही गाने को लिप सिंक कर रहे थे और एक दूसरे की आँखों में खो गए थे| उस पूरे गाने के दौरान ना तो हमें किसी की परवाह थी न खबर| बस एक ऋतू और एक मैं.....
डी.जे. ने गाना खत्म होने के बाद जो गाना लगाया उससे तो माहौल और भी रोमैंटिक हो गया| अगला गाना था; All of me - John Legends का| गाना चेंज होते ही मैंने और ऋतू ने अपने डांस स्टाइल भी चेंज कर दिया|
मेरा बायाँ हाथ ऋतू की कमर पर था और उसका दाहिना हाथ मेरी कमर पर था| मेरे दाहिने हाथ में ऋतू का बायाँ हाथ था और अब हम अपने पैरों को लेफ्ट-राइट के साथ आगे-पीछे भी कर रहे थे| ऋतू इस गाने के बोल नहीं जानती थी इसलिए वो बस मेरी आँखों में देख रही थी| पर मैं गाने के सारे बोल जानता था और मैं वो गाते हुए ऋतू की आँखों में देख रहा था| गाने में जब ये लाइन्स आई;
Cause all of me
Loves all of you
Love your curves and all your edges
All your perfect imperfections
Give your all to me
I'll give my all to you
You're my end and my beginning
Even when I lose I'm winning
'Cause I give you all, all of me
And you give me all, all of you
मेरा हाथ ऋतू की गर्दन से लेकर कमर और फिर उसके कूल्हे तक गाने के बोल के साथ फिसलते हुए आ गया था| ऋतू उस गाने को समझते हुए अपने पंजों पर खड़ी हो गई मुझे Kiss करने को और मैं भी उस गाने में इतना खो गया था की मैंने ऋतू के होठों को पहले चूमा और फिर हमने फ्रेंच kiss की पर बहुत ही स्लो! हमें इस तरह किश करते हुए देख वहां सारे लौंडों और काम्या ने हल्ला मचा दिया| डी.जे. ने भी माइक पर अन्नोउंस कर दिया; "Give it up for this beautiful couple.
" ये सुन कर सब ने चिल्लाना शुरू कर दिया पर मैं और ऋतू उसी तरह passionately एक दूसरे को kiss करते रहे| 10 सेकंड बाद जब दोनों पर नशा कुछ कम हुआ और याद आया की हम बाहर हैं तो ऋतू शर्मा गई और मेरा हाथ पकड़ के मुझे खींच के वापस बूथ पर ले आई| वहाँ बैठते ही उसने अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपा लिया और मेरे सीने से लग गई| मैं ऋतू के सर को चूमने लगा और उससे पूछा; "बियर चाहिए?" ऋतू ने बिना मेरी तरफ देखे हाँ में सर हिलाया| मैंने उसके लिए बियर और अपने लिए 60ml स्कॉच मँगाई! तभी काम्या और रोहित भी आ गए और काम्या ऋतू को गुदगुदी करते हुए छेड़ने लगी, ऋतू खिलखिला के हँसने लगी| रोहित ने भी अपने और काम्या के लिए ड्रिंक्स आर्डर की और खाने के लिए ड्रम्स ऑफ़ हेवन आर्डर किये| हम सब का आर्डर साथ ही आया, ड्रम्स ऑफ़ हेवन देख कर ऋतू मुझसे पूछने लगी की ये क्या है; "चिल्ली पोटैटो वाली सॉस में चिकन विंग्स को बनाया है बस|" ये सुनते ही ऋतू ने पीस उठा लिया और खुद ही उस पर नीम्बू निचोड़ा और बाईट ली| स्वाद उसे तो बहुत आया और बच्चों की तरह मुँह बनाने लगी| उसे इस तरह देख कर मैं बहुत खुश था और दुआ कर रहा था की हमारी इन खुशियों की किसी की नजर न लगे|
मैं उठ कर वाशरूम चला गया और वापस आया तब मुझे छत पर जाती हुई सीढ़ियाँ नजर आईं| मैं ने पहले तो एक बड़ा घूँट स्कॉच का पिया और फिर ऋतू का हाथ पकड़ के उसे खींच के उस तरफ चल दिया| काम्या और रोहित भी मुझे देख रहे थे की मैं और ऋतू कहाँ जा रहे हैं| हम दोनों सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर पहुँचे तो वहाँ सारे कपल बैठे थे और नीचे के उलट यहाँ माहौल बिलकुल शांत था| वहाँ पर एक जगह थी जहाँ पर शीशे की एक रेलिंग थी और मैं और ऋतू वहीँ खड़े हो गए| रात की ठंडी-ठंडी हवा हमारे माथे को छू कर सुकून दे रही थी| ऋतू मेरे सामने खड़ी थी और मेरी बाहें उसके सीने पर लॉक थी| ऋतू ने अपने दोनों हाथों से मेरे बाजुओं को पकड़ रखा था| हम दोनों ही खामोश खड़े थे और सड़क पर आते-जाते ट्रैफिक को देख रहे थे| दस मिनट बाद रोहित हमें नीचे बुलाने आया, नीचे आ कर देखा तो काम्या डांस फ्लोर में नाच रही थी और उसने हमे फिर से अपने साथ डांस करने के लिए खींच लिया| तभी डी.जे.ने गाना लगाया; "Mercy" - बादशाह वाला और हम चारों पागलों की तरह नाचने लगे| 'Have mercy on me' वाली लाइन पर रोहित काम्या को कान पकड़ के गाने लगता| मैंने घडी पर नजर डाली तो रात के बारह बज गए थे, तो मैं वहाँ से धीरे से निकला और डी.जे को बताया की काम्या का बर्थडे है| “guys, we have a birthday girl in the house!” डी.जे.
ने अनाउंसमेंट की और सब जोर से "Happy Birthday!!!" चिल्लाने लगे| पहले रोहित ने गले लग कर और kiss कर के काम्या को happy birthday बोला, उसके बाद ऋतू ने गले लग कर उसे birthday wish किया| अब मेरी बारी थी तो वो खुद ही आ कर मेरे गले लग गई और मैंने भी उसे Happy Birthday wish किया| हम चारों बूथ में बैठने जा रहे थे की रोहित हम तीनों को अपने साथ बार काउंटर पर ले आया और उसने चार शॉट्स आर्डर किये| बारटेंडर ने उन ग्लासों में वोडका डाली और फिर चारों गिलास में उसने 1-1 गोली डाल दी जो एक दम से घुल गई| "ये क्या है?" मैंने रोहित से पूछा तो उसने बोला; "एन्जॉय!!!" और उसने शॉट मारा, फिर काम्या ने मारा और इससे पहले की मैं ऋतू को रोकता उसने भी शॉट मारा और अब तीनों मुझे भी जबरदस्ती उकसाने लगे और मैंने भी शॉट मारा| पर रोहित बाज नहीं आया उसने फिर से रिपीट करवा दिया पर इस बार बारटेंडर ने सिर्फ मेरे और रोहित के गिलास में वो गोली डाली| इस बार में भी जोश में आ गया और चारों ने एक साथ शॉट मारा| मैंने वेटर को हाथ से इशारा कर के बिल मंगवाया और हम चारों अपने बूथ में बैठ गए| वहाँ अब भी मेरी आधी ड्रिंक राखी थी, जिसे ऋतू ने एक दम से उठाया और थोड़ा ही पी पाई थी की मैंने उसके हाथ से ड्रिंक ले ली और खुद एक साँस में खींच गया| वेटर बिल ले कर आया तो वो 10 हजार का निकला! बिल सुन कर तो ऋतू के कान खड़े हो गए पर बिल काम्या, मैंने और रोहित ने मिल कर बाँट लिया|
update 39
बिल पे हो चूका था पर हम चारों पर दारु की खुमारी चढ़ चुकी थी| उठने को जैसे जी ही नहीं चाह रहा था, कोई घर छोड़ दे बस यही दुहाई कर रहे थे सारे और ठहाके मार के हँस रहे थे| पाँच मिनट बैठे रहने के बाद मेरे दिल की धड़कन अचानक से तेज हो गई| अंदर एक अजीब सी फीलिंग हो रही थी| माथे पर पसीना आ गया और मैं हैरानी से ऋतू की तरफ देखने लगा| उसने वेटर से अपने लिए पानी मंगाया, प्यास से उसका गला सूख रहा था| इधर मेरे जिस्म में तूफ़ान खड़ा हो चूका था| लंड अचानक से अकड़ चूका था और मैं अपने आप ही ऋतू की तरफ झुक रहा था| मेरा मन अब उसे कस कर kiss करने को कह रहा था| इससे पहले की मैं उसे kiss करता काम्या ने मेरा हाथ पकड़ के मुझे डांस फ्लोर पर खींच लिया| उस समय गाना चल रहा था; "तेरे लक दा हुलारा" और काम्या मेरे से चिपक गई और मुझे बहकाने के लिए अपने दोनों हाथों को मेरी गर्दन में डाल कर कस लिया| वो मुझे किश करने ही वाली थी की मैंने उसकी कमर को पकड़ा और उसे खुद से दूर कर दिया और मुड़ कर जाने लगा| पर उसने मेरा हाथ थाम लिया और अपने दाहिने हाथ से अपने कान को पकड़ के सॉरी कहने लगी| मेंरूक गया और तभी ऋतू आ गई और उसने मेरे करीब आ कर नाचना शुरू कर दिया| मैंने अपने दोनों हाथों से उसकी कमर को पकड़ लिया और खुद से चिपका लिया| गर्दन झुका कर उसके निचले होंठ को अपने मुँह में भर लिया और चूसने लगा| ऋतू ने अभी अपनी दोनों बाहें मेरी पीठ पर चलानी शुरू कर दी| हम
दोनों ही बेकाबू होने लगे थे और उधर हमारे आस-पास जो भी लोग थे सब चीख रहे थे; "Guys get a room!" पर हम दोनों पर इसका कोई असर ही नहीं पड़ रहा था| काम्या ने हम दोनों का हाथ पकड़ा और बाहर की तरफ खींचने लगी| अब एक तो शराब का नशा और ऊपर से जिस्म की आग! किसी तरह हम चारों लड़खड़ाते हुए बाहर आये और रोहित बुरी तरह चीखने लगा; "ओये!! ऑटो!!! बहनचोद!" अब उसकी इस हालत को देख कोई भी रूक नहीं रहा था| इधर काम्या की उलटी शुरू हो गई और वो एक नाली के पास झुकी उलटी करने लगी| ऋतू से भी खड़ा हो पाना मुश्किल हो चूका था, मैं लड़खड़ाते हुए रोहित के पास आया और उसके इस तरह गाली देने से कोई ऑटो रूक नहीं रहा था तो मुझे उस पर गुस्से आ गया|| मैंने उसकी गुद्दी पर एक चमाट मारी; "भोसड़ी के! ऐसे गाली देगा तो कौन रुकेगा?" मैंने जेब से फ़ोन निकाला पर उसमें साला कुछ ठीक से दिखे ही ना! फिर भी जैसे-तैसे उबर अप्प खोला अब ये ऍप बहनचोद अपडेट मांग रही थी और मेरा गुस्सा और बढ़ता जा रहा था| मेरा मन था की हम जल्दी से होटल पहुँचे और मैं ऋतू को बिस्तर पर पटक कर उस पर चढ़ जाऊँ! जब तक ऍप अपडेट हुआ मैं जी भर के गाली बकता रहा; "मादरचोद चल जा! अभी गांड मरानी है तुझे अपनी?" दो मिनट लिए उस ऍप ने अपडेट होने में और फिर बड़ी मुश्किल से राइड बुक हुई| मैंने फ़ोन जेब में डाला और वापस ऋतू के पास जाने को मुड़ा, मैंने रोहित का कॉलर पकड़ा और खींच कर उसे दोनों के पास ले आया| काम्या की उलटी अब बंद हो चुकी थी और वो और ऋतू एक खम्बे का सहारा ले कर खड़े थे| ऋतू तो मुझे देखते ही बेकाबू हो गई और लड़खड़ाते हुए मेरे पास आई और फिर से मेरे सीने से लग गई| इधर मेरा लंड बेकाबू होने लगा था, मैंने ऋतू को अपनी गोद में उठाया| ऋतू ने अपनी दोनों टांगें मेरी कमर के इर्द-गिर्द लपेट ली और मेरे ऊपर वाले होंठ को अपने मुँह में भर के चूसने लगी| मैं भी बेतहाशा उसके होंठों को चूस रहा था और अपनी जीभ उसके मुँह में डाल दी| हमारी देखा-देखि काम्या को भी जोश आ गया और वो रोहित से चिपक गई और दोनों बुरी तरह Kiss करने लगे| इधर हमारी कैब आ गई और ड्राइवर ने कॉल किया| "सर मैं लोकेशन पर हूँ, आप कहाँ हैं?" ड्राइवर ने पूछा|
"एक मिनट!" इतना बोलते हुए मैं ऋतू को इसी तरह गोद में लिए बाहर आया और पीछे ही काम्या और रोहित भी आये| मैंने पीछे का दरवाजा खोला और सब से पहले काम्या घुसी और फिर मैं जैसे-तैसे ऋतू को गोद में लिए बैठ गया| रोहित आगे बैठा था पर ड्राइवर की नजर मेरे पर थी| "चलो भैया" मैंने उसे कहा तो वो आगे चला| इधर काम्या मेरे नजदीक आ कर बैठ गई और अपना सर मेरे कंधे पर रख दिया| ऋतू पर तो सेक्स सवार हो चूका था और वो मेरी गर्दन के बायीं तरफ चूम रही थी| काम्या भी बहकने लगी थी और वो मेरी गर्दन के दाएं तरफ चूमना चाहती थी पर मैंने उसे ऊँगली से इशारा कर के मना कर दिया| मेरे दोनों हाथ ऋतू की पीठ पर चल रहे थे और लंड नीचे से
ऋतू की गांड पर दस्तक दे रहा था| मैंने भी ऋतू की गर्दन की बायीं तरफ धीरे से काट लिया और ऋतू बस सिसक रह गई| होटल पहुँचने तक मैं बस उसकी गर्दन को चूमता रहा और ऋतू भी मेरी गर्दन को चूम रही थी| मुझे तो फिर भी थोड़ी शर्म थी की मेरे अलावा वहाँ तीन और लोग हैं पर ऋतू पूरी तरह बेकाबू थी और वो धीरे-धीरे मेरी गर्दन को चूमे जा रही थी| ट्रैफिक नहीं था तो हम जल्दी ही होटल पहुँच गए, ड्राइवर ने रोहित को हिला कर जगाया| काम्या दूसरी तरफ से उतरी और ऋतू भी मेरी गोद से उत्तरी और मैंने ड्राइवर को पैसे दिए और थोड़े एक्स्ट्रा भी दे दिए! लॉबी से कमरे तक हम चारों लड़खड़ाते हुए चल के पहुँचे|
रोहित और काम्या का कमरा पहले था और मेरा और रितिका कमरा आखिर में था| अंदर घुसते ही मैंने दरवाजे की चिटकनी लगाईं और ऋतू मुझ पर टूट पड़ी| वो फिर से मेरी गोद में चढ़ गई और सीधा अपनी जीभ मेरे मुंह में डाल दी| ऋतू को अपने दोनों हाथों से थामे मैंने उसे बिस्तर पर ला कर पटक दिया| उसकी आँखों में देखते हुए मैंने अपनी कमीज के बटन जल्दी-जल्दी खोलने शुरू किये, फिर पैंट भी निकाल के फेंक दी और पूरा नंगा हो कर ऋतू के कपडे उतारने का वेट करने लगा| ऋतू ने भी फटाफट अपना ओप उतार फेंका, फिर अपनी ब्रा भी निकाल फेंकी| उसने अपनी जीन्स के बटन खोले और मैंने उसकी जीन्स खींच के निकाल दी और उस पर कूद पड़ा| ऋतू का जिस मेरी दोनों टांगों के बीच था और मैं उसके चेहरे को थामे उसके होंठ चूसने लगा| मेरे पास सब्र करने का बिलकुल समय नहीं था, इसलिए मेंने अगला हमला ऋतू की गर्दन पर किया| अपने दाँतों को ऋतू की गर्दन पर गाड़ के मैंने उसे जोर से काट लिया| "आअह!" कहते हुए ऋतू ने अभी अपने नाखून मेरी पीठ में गाड़ दिए| दर्द से ऋतू सीसिया रही थी पर मुझे तो जैसे उसके दर्द की कोई परवाह ही नहीं थी| मैं नीचे को आया और उसके बाएँ स्तन को अपने मुंह में भर कर अपने दाँत गड़ा दिए| अपने बाएं हाथ से मैंने ऋतू के दाएँ स्तन को मुट्ठी में भर कर उसे निचोड़ने लगा और उसके बाएँ स्तन को दाँतों से काट और चूसने लगा| मेरी उँगलियाँ ऋतू के दाएँ स्तन पर छप चुकीं थीं और मेरे दाँतों ने ऋतू के बाएँ स्तन को लाल कर दिया था| मैं नीचे आया तो पाया की उसकी पैंटी अब भी उसकी बुर को ढके हुए है| मैंने अपने दाएँ हाथ से उसकी कच्ची को पकड़ के खींचा पर वो फटी नहीं, मुझे गुस्सा आया और मैं ने जोर से उसकी पैंटी खींच कर निकाल फेंकी| ऋतू की पहले से गीली बुर मेरे आँखों के सामने थी, मैं जितना मुंह खोल सकता था उतना खोला और जीभ निकाल कर ऋतू की बुर को अपनी जीभ से ढक दिया| गर्म जीभ का स्पर्श मिलते ही ऋतू कसमसाने लगी| उसने अपने दोनों हाथों की उँगलियों से मेरे बाल पकड़ लिए और मेरे मुंह को अपनी बुर पर दबाने लगी| मैंने भी जीभ से पहले ऋतू के क्लीट को छेड़ा और फिर उसके बुर के कपालों को चूसने लगा| पर
नीचे मेरे लंड की हालत बहुत खराब थी| खून का बहाव मेरे लंड पर बहुत तेज था और मेरे लंड में जलन होने लगी थी| लघभग १ मिनट की बुर चुसाई और फिर मैं ऋतू के ऊपर आ गया और अपने दाहिने हाथ से अपने लंड को पकड़ के ऋतू की बुर पर दबाने लगा| अभी सिर्फ लंड का सुपाड़ा ही अंदर गया था की ऋतू अपनी गर्दन को दाएँ-बाएँ पटकने लगी| पर मैं इस बार उसके दर्द की परवाह नहीं कर रहा था और धीरे-धीरे अपना लंड दबाते हुए उसकी बुर में पेल दिया| लंड धीरे-धीरे पूरा अंदर चला गया और ऋतू की बच्चेदानी से टकराया| अब मेरे लंड को आराम मिल रहा था और मैं कुछ देर ऐसे ही ऋतू पर पड़ा रहा| इसी टाइम में ऋतू की बुर ने भी खुद को मेरे लंड के अनुसार एडजस्ट कर लिया| दो मिनट बाद ही मेरे लंड में ताक़त आ गई और मैंने धक्के मारने शुरू कर दिए| आज मेरे धक्कों में पहले के मुक़ाबले बहुत तीव्रता थी और हार ढ़ाके के साथ ऋतू के स्तन हिल रहे थे| ऋतू ने अपने दोनों हाथों के नाखून मेरी पीठ में गाड़ दिए थे जिससे मेरी गति और तेज हो चली थी| दस मिनट तक मैंने कस कर ऋतू को निचोड़ डाला था और हम दोनों ही पसीने से तर थे पर दोनों में से कोई भी अभी तक झडा नहीं था| मैं बिना अपना लंड ऋतू की बुर से निकाले ऋतू के बगल में लेट गया और उसे अपने ऊपर खींच लिया| ऋतू ने अपने हाथों से अपने बाल बांधे और तेजी से मेरे लंड पर उछलने लगी| पाँच मिनट में वो तक गई और मेरे सीने पर सर रख कर साँस लेने लग गई, पर उसके रूकते ही जैसे मेरे लंड ने उसकी बुर में फड़कना शुरू कर दिया था| मैंने अपने दोनों कूल्हे हवा में उठाये और नीचे से धक्के लगाने शुरू कर दिए| ऋतू के स्तन थोड़े लटक गए थे और वो मेरे हर धक्के के साथ हिल रहे थे| पाँच मिनट से ज्यादा मैं भी इस पोजीशन पर नहीं टिक पाया और तक कर अपने कूल्हे नीचे टिका दिए| हैरानी की बात ये थी की ऋतू और मैं दोनों अब भी टिके थे!
अब माने ऋतू को अपने ऊपर से धकेल के दूसरी तरफ फेंक दिया और मैं बिस्तर से उठ खड़ा हुआ| जिस तरफ ऋतू के पाँव थे मैं उस तरफ पहुँचा और उसके पाँव पकड़ के उसे नीचे की तरफ खींचा| ऋतू उठ के बैठ गई और उसकी नजरों के सामने मेरा लंड लहरा रहा था| लंड थोड़ा चमक रहा था क्योंकि उस पर ऋतू के बुर का रस लगा हुआ था, मुझे आगे ऋतू को कुछ कहना नहीं पड़ा और उसने गप्प से मेरा लंड अपने मुँह में भर लिया| कुछ ही सेकंड में उसने अपने मुँह में थूक इकठ्ठा कर लिया और मेरा पूरा लंड उसके गर्म थूक से नहा गया| ऋतू ने धीरे-धीरे मेरे लंड को निगलना शुरू कर दिया| उसके मुँह की गर्माहट मेरे लंड में हो रहे दर्द को आराम दे रही थी और मेरे हाथ अपने हाथ उसके सर पर आ चुके थे| धीरे-धीरे ऋतू मेरा पूरा लंड अपने मुँह में ले गई और ये देख कर मेरी आँखों के आगे सुकून से भरा अँधेरा छा गया| अब ऋतू ने धीरे-धीरे अपने मुँह को मेरे लंड पर आगे-पीछे करना शुरू कर दिया| मुझे बहुत मज़ा आ रहा
था और मैं आँखें बंद किये इस मजे का आनंद ले रहा था| मुझे तो अपनी कमर भी नहीं हिलानी पद रही थी क्योंकि ऋतू इतनी शिद्दत से मेरे लंड को चूस रही थी| पाँच मिनट तक मैं उसके मुँह का आनंद अपने लंड पर लेता रहा| फिर मैंने खुद ही लंड बाहर निकाला और ऋतू को ऊँगली के इशारे से पलटने को कहा| ऋतू पलंग के ऊपर अपने घुटने मोड़ कर घोड़ी बन गई! मैंने अपने दाहिने हाथ की चार उँगलियों पर खूब सारा थूक निकाला और ऋतू की बुर में सारी उँगलियाँ एक साथ घुसा दि| ऋतू की बुर अंदर से गीली हो चुकी थी और मैंने अपने दोनों हाथों से ऋतू के दोनों चूतड़ों को पकड़ के एक दूसरे से दूर किया और उसकी बुर के छेद पर अपना लंड टिका दिया| मैंने एक जोरदसार शॉट मारा और पूरा लंड अंदर तक चीरता हुआ चला गया; "आह...हहहह…ममम...आअअ अ अ अ अ अ अ अ अह्ह्म्म मम ममममम" कर के ऋतू करहाने लगी| उसकी करहाने की आवाज सुन के मुझे थोड़ा होश आया और मैंने दायीं तरफ टेढ़ा हो कर उसके चेहरे की तरफ देखा तो वो गर्दन नीचे झुका कर सिस्क रही थी| मेरा लंड तो पहले ही पूरा का पूरा उसकी बुर में समां चूका था तो मैंने उसकी पीठ पर झुक कर उसके दोनों स्तनों को पकड़ लिया और अपने दोनों हाथ से मींजने लगा| मेरा ऐसा करने से दस सेकंड में ही ऋतू का दर्द कम हो गया और उसने अपने कूल्हों को पीछे धकेलना शुरू कर दिया| मैं उसका सिग्नल समझ गया और अपना लंड धीरे से बाहर निकाला और फिर धीरे से अंदर पेल दिया| 2-3 मिनट तक मैं ऐसे ही धीरे-धीरे धक्के मारता रहा पर ऋतू ने खुद कहा; "जानू!....स.स.स.स.स.स.स... तेज...और तेज!" उसकी बात मानते हुए मैंने अपनी रेल गाडी तेज कर दी और लंड तेजी से अंदर पेलना शुरू कर दिया| मेरे धक्कों की रफ़्तार बहुत तेज हो गई थी; "अ.स.स.स.स.स्सा..अ.अ.अ.अ.हहह...नं.म.म.." की आवाज पूरे कमरे में गूँजने लगी थी| 10 मिनट की ताबड़तोड़ चुदाई और अब ऋतू की हालत खराब होने लगी थी| उसकी टांगें कांपने लगी थी और मेरे अगले धक्के के साथ ही वो बिस्तर पर पस्त हो कर गिर पड़ी| मेरा लंड उसकी बुर से फिसल कर बाहर आ गया था पर लंड की कसावट कम नहीं हुई थी| मैं बिस्तर वापस चढ़ा और ऋतू को पलट कर सीधा किया, वो बुरी तरह हाँफ रही थी पर झड़ी वो भी नहीं थी| पर मेरा लंड इतना अकड़ चूका था की उसका दर्द कम ही नहीं हो रहा था| मैं ऋतू की टांगें चौड़ी की और अपना लंड फिर से उसकी बुर में पेल दिया| अपनी कमर को फुल स्पीड से आगे-पीछे कर रहा था| मेरा लंड तो जैसे ऋतू की बुर में अपनी जगह बना चूका था और बड़ी आसानी से अंदर-बाहर हो रहा था| अगले 20 मिनट मैंने ऋतू की फुल स्पीड चुदाई की, ऋतू के मुँह से तो जैसे शब्द निकलने ही बंद हो गए थे| वो मेरे हर झटके के साथ बस हिल भर रही थी| 20 मिनट बाद ऋतू के अंदर का ज्वालमुखी फटा; "आह..हहह...ननन...मममम...
" करहाते हुए वो उठ के मेरे सीने से चिपक गई ताकि मैं और झटके ना मारु| पूरे एक मिनट तक वो चिपकी रही मुझसे और उसकी बुर से सारा रस बिस्तर पर टपक रहा था| पसीने से तरबतर हम दोनों एक दूसरे से चिपटे रहे, झड़ने के एक मिनट बाद ऋतू धड़ाम से वापस गिर गई| पर मेरे लंड को चैन नहीं मिला था, मैंने इतनी तेजी से झटके मारने शुरू किये की पूरा पलंग हिलने लगा था और 10 मिनट बाद मैं भी उस की बुर में झाड़ गया और पस्त हो कर बगल में गिर गया| साँस इतनी तेज चल रही थी की पूछो मत, पसीने से हाल बुरा था और बेचारी ऋतू में तो जान ही नहीं बची थी वो तो बेसुध हो चुकी थी|
घडी में 3:30 बजे थे, मतलब हम करीबन 1 घंटे भर से ताबड़तोड़ सेक्स कर रहे थे! अब तो इतनी भी जान नहीं थी की उठ के अपना लंड साफ़ कर सकूँ| आँखें कब बंद हुईं और कब सुबह हुई कुछ पता नहीं चला| सुबह 11 बजे नींद खुली जब भूख से पेट में 'गुर्रर' होने लगी| मैं उठा पर सर बहुत भारी था और आँखें तो जैसे खुल ही नहीं रही थी| मैंने उठ के ऋतू को देखा तो वो अब भी दोनों टांगें चौड़ी कर के पड़ी थी जैसे रात को मैंने उसे आखरी बार देखा था| मैंने उसका साँस चेक किया तो पाया की वो जिन्दा है!
update 40
मैं उसकी तरफ करवट ले कर लेट गया, अपनी उँगलियों से ऋतू के बाएँ गाल को सहलाने लगा| उँगलियाँ सहलाते हुए मैं उसकी गर्दन तक ले आया और फिर धीरे-धीरे उस के स्तनों के ऊपर| ऋतू के दोनों स्तन लाल थे, मैंने आगे बढ़ कर ऋतू के दाएँ स्तन को मुंह में ले लिया और धीरे-धीरे प्यार से उसे चूसने लगा| मैं बहुत आहिस्ते-आहिस्ते ऋतू के स्तन को निचोड़ कर पी रहा था और अब ऋतू के जिस्म में हरकत शुरू हो गई थी| "उम्..ममम...हम्म्म...अह्ह..
!!!" कराहते हुए उसने अपने दाएँ हाथ को मेरे सर पर रख दिया और अपनी उँगलियाँ मेरे बालों में फिरानी शुरू कर दी| मैं रूका और ऋतू की तरफ देखने लगा, उसकी आँखें अभी भी बंद थी| मैं ऊपर की तरफ आया और उसकी पलकों को धीरे से चूम लिया| फिर नीचे को आया और उसके अध् खुले अधरों को चूम लिया, तब जा कर ऋतू की आँख धीरे-धीरे खुली| ऋतू बहुत धीरे से बुदबुदाते हुए बोली; "जानू!" मुझे तो ऐसा लगा जैसे उसमें शक्ति ही नहीं बची कुछ बोलने की| मैं अपने बाएं कान को उसके होठों के पास ले गया, तब ऋतू बुदबुदाते हुए बोली; "जानू! सर दुःख रहा है! बदन टूट रहा है|" मैं समझ गया की मुझे क्या करना है| मैं उठ के खड़ा हुआ और ऋतू को अपनी गोद में उठाया और उसे बाथरूम में ले आया| कमोड पर ऋतू को बिठाया और गर्म पानी का शावर चालु किया| जैसे ही गर्म पानी की बूँदें हमारे शरीर पर पड़ीं, जिस्म को चैन आया| ऋतू अब भी आँखें बंद किये हुए गर्दन पीछे किये हुए बैठी थी| पानी की बूँदें उसके चेरे से होती हुई उसके स्तन पर गिर रही थीं| धीरे-धीरे ऋतू की आँखें खुलीं और मुझे खुद को इस तरह देखते हुए वो शर्मा गई और मुस्कुराते हुए दूसरी तरफ मुँह कर लिया| मैंने अपने दाहिने हाथ से ऋतू की ठुड्डी को पकड़ के अपनी तरफ घुमाया, ऋतू ने अपनी आँखें मूँद ली थी और मुझे उस पर बहुत प्यार आ रहा था|
शर्म भी इक तरह की चोरी है…
वो बदन को चुराए बैठे हैं…
ये शेर सुन कर ऋतू ने आँखें खोलीं और बैठे-बैठे ही मेरी कमर को अपने हाथ से थाम लिया| "अच्छा मेरी जानेमन! अब आपको कैसा लग रहा है?" मैंने ऋतू से पूछा तो वो मेरा हाथ पकड़ कर खड़ी हुई और बोली; "बेहतर लग रहा है|" मैंने साबुन उठाया और अपने और ऋतू के ऊपर वाले बदन पर लगाया, नीचे लगाने के लिए जब मैं झुका तो उसने मुझे रोक लिया और खुद अपने और मेरी टांगों में साबुन लगाया| फिर उसने साबुन से मेरे लंड को साफ़ किया और फिर अपनी बुर को| अच्छे से नाहा-धो कर हम दोनों बाहर आये और अब काफी तरो-ताजा महसूस कर रहे थे| ऋतू की नजर जब बिस्तर पर पड़ी तो उसे जैसे रात का एक-एक वाक्य याद आ गया और वो खुद हैरानी से मुझे देखने लगी| उसे और मुझे खुद यक़ीन नहीं हो रहा था की कल रात को हम दोनों को आखिर हुआ क्या था जो हम सेक्स के लिए इस तरह पागल हो गए थे|
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई, मैंने दरवाजा खोला तो बाहर काम्या और रोहित खड़े थे| हालाँकि मैंने उनका रास्ता रोका हुआ था पर फिर भी काम्या मजाक-मजाक में मुझे अंदर की तरफ धकेलते हुए अंदर आ गई और बिस्तर की हालत देख कर अपने दाएँ हाथ से अपने माथे को पीटा| पीछे से रोहित भी अंदर आ गया और मेरी पीठ थपथपाने लगा| मैं हैरानी से उसकी तरफ देख रहा था की तभी काम्या बोली; "मानु जी! आप तो सच्ची बड़े बेदर्दी हो! मेरी फूल सी दोस्त की रात भर में हालत ख़राब कर दी आपने?"
"इसका क्रेडिट मुझे जाता है?" रोहित बड़े गर्व से बोला और हम
तीनों उसकी तरफ देखने लगे|
"क्या मतलब?" काम्या बोली|
"मैंने बारटेंडर से XXX सेक्स ऑन दा रॉक्स बनाने को कहा था, उसने हमारी ड्रिंक्स में वायग्रा डाल दी थी|" उसने हँसते हुए कहा, अब ये सुन कर तो मैंने अपना सर पीट लिया और मैं सोफे पर बैठ गया| "मेरी और आपकी ड्रिंक्स में तो डबल डोज था!" उसने ठहाका मारते हुए कहा|
"तेरा दिमाग ख़राब है बहनचोद!" मैंने उसे डाँटते हुए कहा| "चूतिया हो गया है क्या? वियाग्रा कभी ड्रिंक्स के साथ लेते हैं? वो भी डबल डोज़?" मैंने उसे गुस्सा करते हुए कहा|
"सॉरी ब्रो! मैं तो बस मजे के लिए...."
"अबे काहे के मजे? तेरे मजे के चक्कर में बेचारी ऋतू बेहोश हो गई थी! साले उसे कुछ हो जाता न तो सोच नहीं सकता की मैं तेरा क्या हाल करता!" मैंने सोफे से उठते हुए रोहित को आँखें दिखाते हुए कहा| तभी काम्या मेरे पास आई और हाथ जोड़कर माफ़ी माँगते हुए बोली; "मानु जी! माफ़ कर दो! मैं इसकी तरफ से आपसे माफ़ी मांगती हूँ|" अब चूँकि आज उसका जन्मदिन था तो मैंने बस हाँ में गर्दन हिलाई और ऋतू की तरफ देखा जो डर के मारे गर्दन झुका कर खड़ी थी|
मैं चल कर ऋतू के पास पहुँचा और उसे गले लगा लिया, उसे बुरा लग रहा था की उसने ऐसे नासमझ दोस्त बनाये जिस के कारन आज मुझे इतना गुस्सा आया| "सॉरी मानु जी! मेरा कोई गलत मकसद नहीं था.....I’m extremely sorry!” ऋतू की वजह से मैंने बात को ज्यादा नहीं खींचा और उसे माफ़ कर दिया| “Let’s order some black coffee; this headache is killing me!” सब ने ब्लैक कॉफ़ी के लिए हाँमि भरी और मैंने साथ में आलू के परांठे भी मंगाए| अब चूँकि हमारा कमरा पहले से ही तहस-नहस था तो हम अपना खाना ले कर काम्या वाले कमरे में चले गए| उनका कमरा हमारे कमरे के ठीक उलट था, वहाँ तो सब कुछ ठीक-ठाक था| लग ही नहीं रहा था की वहाँ कोई चुदाई हुई है! खेर मैंने इस बारे में कुछ नहीं कहा और सोफे पर बैठ के नाश्ता करने लगा| ऋतू ने टी.वी.
पर गाने लगा दिए और हम चुप-चाप बैठ के खाने लगे| खाने के बाद अनु मैडम का फ़ोन आया और मैं उनका कॉल लेने के लिए बाहर चला गया| आज मैडम का मूड बिलकुल ऑफ था और वो काफी मायूस लग रही थीं| मैंने पूछा भी पर उन्होंने टाल दिया और बात घुमा दी| मैंने उन्हें कुछ मेल फॉरवर्ड किये और एक लास्ट मेल में उन्हें CC करते हुए अंदर आया| मेरी नजर अब भी फ़ोन में थी और जब मैं अंदर घुसा तो काम्या बोली; "क्या मानु जी? यहाँ भी काम? यहाँ तो हम एन्जॉय करने आये हैं|"
"ऑफिस का एक प्रोजेक्ट है, बीच में छोड़ के आया हूँ और ऊपर से ऋतू भी यहीं है! इसलिए कुछ मेल्स फॉरवर्ड करने थे!" मैंने कहा और फ़ोन जेब में रख कर वापस बैठ गया| "तो आज कहाँ का प्रोग्राम है?" काम्या ने मुझसे पुछा?
"यहाँ पर किले हैं देखने के लिए, जंतर मंतर है और हाँ जल महल भी है|" मैंने कहा तो काम्या बोली; "किले देखने कल चलेंगे! कल रात की थकावट अब भी है|" हम तैयार हो के निकले और पहले जंतर-मंतर गए| आगे-आगे मैं और ऋतू थे एक दूसरे का हाथ थामे और पीछे रोहित और काम्या| अचानक से काम्या आई और ऋतु के कंधे पर हाथ रख कर उसे मेरे से दूर ले गई| दोनों एक तरफ जा कर सेल्फी खींचने लगीं| मैं अकेला था तो मैं चुपचाप चल रहा था और वहाँ जो कुछ लिखा था उसे पढ़ रहा था| तभी पीछे से रोहित आ गया और मुझे कंपनी देते हुए वो भी पढ़ने लगा| दोनों लडकियां फोटो खींचते हुए बातें कर रहीं थी और मैं और रोहित बेंच पर चुपचाप बैठे थे|
काम्या: रितिका....तू और मैं बेस्ट फ्रेंड्स हैं ना?
ऋतू: हाँ पर क्यों पुछा?
काम्या: देख तू ने मेरे लिए इतना कुछ किया, अपने बॉयफ्रेंड के साथ यहाँ मेरा बर्थडे सेलिब्रेट करने आई और....और वो भी कितना अंडरस्टैंडिंग है! तेरी कितनी केयर करता है, तुझे कितना प्यार करता है!
ऋतू: क्यों रोहित तुझे प्यार नहीं करता?
काम्या: वो तो साला चूतिया है! कल देख कितना अच्छा मौका था, हरामखोर ने दो-दो वायग्रा खाईं पर साले ने कुछ किया ही नहीं?! कुत्ता मेरे से पहले ही झाड़ गया और मैं बेचारी तड़पती रही! जब दुबारा इसका खड़ा हुआ तब मुझे उठाने आया तो मैंने भी इसकी गांड पर लात मार दी, भोसड़ी का लंड हिला कर सो गया रात को! पर तेरे तो मजे हैं! पूरी रात मानु जी ने तेरी जी तोड़ कुटाई की! तेरा तो जीवन धन्य हो गया! काश की मुझे भी कोई ऐसा मिला होता!
ऋतू: अब मैं हूँ तो नसीब वाली पर तू मेरी किस्मत को नजर मत लगा! तू ऐसा कर छोड़ दे इस लड़के को!
काम्या: वही तो नहीं कर सकती ना! ये साला बहुत पैसे वाला है और ऊपर से मेरे कण्ट्रोल में है, मेरी उँगलियों पर नाचता है ये!
इतना कह कर काम्या कुछ सोचने लगी और फिर बोली;
काम्या: सुन? ..... आज मेरा बर्थडे है....
मैं अगर तुझसे कुछ माँगू तो तू मना तो नहीं करेगी?
ऋतू: यार मेरे पास है ही क्या तुझे देने को?
काम्या: नहीं तू दे सकती है|
ऋतू: अच्छा? चल बोल क्या चाहिए मेरी दोस्त को? (ऋतू ने काम्या के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा|)
काम्या: मुझे बस आज की रात मानु जी के साथ गुजारनी है|
ये सुनते ही ऋतू के जिस्म में आग लग गई| उसने जो हाथ अभी तक काम्या के कंधे पर रखा था वो झटके से हटाया और उसे जोर से धक्का देते हुए बोली;
ऋतू: तेरी हिम्मत कैसे हुई ऐसा कहने की?
काम्या: देख प्लीज...तू...
ऋतू: (बीच में बात काटते हुए) मुझे कुछ नहीं सुनना, तेरी गन्दी नियत मुझे आज पता चल गई| आज के बाद मुझे कभी अपनी शक्ल मत दिखाइओ और खबरदार जो तू उनके आस-पास भी भटकी तो, जान ले लूँगी तेरी!
काम्या: अरे सुन तो सही....
पर ऋतू रुकी नहीं और मुझे ढूंढते हुए तेजी से एग्जिट गेट पर पहुँच गई| मैं और रोहित वहीँ खड़े थे और बात कर रहे थे| मेरी नजर अब तक ऋतू पर नहीं पड़ी थी;
रोहित: ब्रो... help me .... काम्या मुझसे पटती ही नहीं! कल रात भी मैंने उसी के चक्कर में सब को वायग्रा खिलाई थी पर साली ने मुझे रात में छूने भी नहीं दिया| कुछ तो बताओ मैं क्या करूँ?
मैं: देख ... पहली बात तो ये जो तू अमेरिकन एक्सेंट बकता है इसे बंद कर, तू कतई इसमें चूतिया लगता है! देसी है देसी बन! उसे ये तेरा अमेरिकन गैंगस्टर लुक नहीं चाहिए... मॉडर्न होना ठीक है पर इतना भी नहीं की चूतिये दिखो|
अभ हमारी इतनी ही बात हुई थी की रोती-बिलखती ऋतू मेरे पास आई और मैं उसे इस तरह रोता हुआ देख समझ नहीं पाया की वो रो क्यों रही है; "चलो आप! हम अभी घर जा रहे हैं|" इतना कह कर वो मुझे खींच कर बाहर ले आई| मैंने कई बार उससे पूछा की बात क्या है पर वो कुछ नहीं बोली और हम सीधा होटल पहुँचे| कमरे में घुसते ही उसने सामान समेटना शुरू कर दिया| "जान! बताओ तो सही हुआ क्या?" मैंने ऋतू से प्यार से पुछा|
ये सुनते ही ऋतू गुस्से में बोली; "वो कुतिया कह रही थी की उसे आपके साथ सोना है!" ये सुनते ही मुझे भी बहुत गुस्सा आया और इससे पहले की मैं कुछ बोलता ऋतू ही बोल पड़ी; "गलती सारी मेरी ही थी, मुझे भी पता नहीं किस कुत्ते ने काटा था की मैंने इसे अपना दोस्त बनाया| आपने इतना समझाया था की दोस्त चुन कर बनाना और मुझे यही कामिनी मिली| ये तो गनीमत है की मैंने इसे हमारे बारे में कुछ भी सच नहीं बताया वर्ण ये तो मुझे आज ब्लैकमेल कर के आपके साथ सब कर लेती| अच्छा हुआ जो मुझे इस हरामजादी के रंग पहले ही पता चल गए|" इतना कहते हुए ऋतू पलंग पर बैठ गई और अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपा कर रोने लगी| मैं ऋतू के सामने घुटनों के बल खड़ा हुआ और उसे चुप कराया| "बस मेरी जान! चलो कपडे पैक करो हम अभी चेकआउट करते हैं|" हम अभी लॉबी में पहुँचे थे की वहाँ रोहित और काम्या मिल गए| काम्या ने रोहित से कुछ भी नहीं कहा था, मेरे हाथ में बैग
देखते ही वो समझ गई की क्या माजरा है| उसने फिर से ऋतू को रोकने की कोशिश की, इधर मैं रिसेप्शन पर अपने रूम का चेकआउट करवा रहा था| "क्या हुआ ब्रो?" रोहित ने पुछा|
"Go and ask Kamya!" मैंने कहा|
"She's not telling me shit!" उसने जवाब दिया पर मैं आगे कुछ नहीं बोला और अपने रूम की सारी पेमेंट कर दी| उधर काम्या ने ऋतू का हाथ पकड़ा हुआ था और उसे रोक रही थी; "यार बात तो सुन!" काम्या ने मिन्नत करते हुए कहा| ऋतू ने बड़े जोर से उसका हाथ झटक दिया और बोली; "Stay away from me!" इतना कह कर वो तेजी से चल के मेरे पास आई| रिसेप्शन पर जो कोई था वो सब उन दोनों को ही देख रहे थे| बाहर से ऑटो किया और हम बस स्टैंड पहुँचे पर पूरे रास्ते ऋतू ने मेरा दाहिना हाथ थामा हुआ था, उसका सर मेरे कंधे पर था| बस स्टैंड पहुँच कर पता चला की अगली बस एक घंटे बाद की है, अब भूख लग आई थी पर ऋतू बहुत-बहुत उदास थी| जब मैंने उससे कहा की मैं कुछ खाने को लाता हूँ तो वो इस कदर घबरा गई जैसे मैं उसे छोड़के काम्या के पास जा रहा हूँ| ऋतू मेरे सीने पर सर रख कर बैठी रही और मैं बस उसके सर पर हाथ फेरता रहा| बस आई और हम दोनों बैठ गए, ऋतू ने अपना फ़ोन निकाला और काम्या और रोहित का नंबर ब्लॉक कर दिया| उसके साथ खींची हर फोटो को उसने डिलीट कर दिया, ऐसा करने से उसे ऐसा लग रहा था मानो की उसने काम्या को अपनी जिंदगी से निकाल फेंका है|
update 41
बस आधे रास्ते पहुँची थी, रात के 8 बजे थे तो मैं ऋतू को अपने साथ ले कर नीचे उतरा और उसे खाने को कुछ कहा| उसके लिए मैंने परांठे मंगाए और मैंने बस एक चिप्स का पैकेट लिया| खाना खा कर हम वापस अपनी सीट पर बैठ गए, ऋतू ने अपना सर मेरे सेने पर रख दिया था और अपनी बाहें मेरी कमर के इर्द-गिर्द कस ली थीं|
मैं: जान! क्यों परेशान हो आप? मैं आपके पास हूँ ना?
ऋतू: आपको खो देने से डर लगता है|
मैं: ऐसा कभी नहीं होगा|
अब मुझे कैसे भी कर के ऋतू की बेचैनी मिटानी थी;
मैं: अच्छा एक बात तो बताओ आप ये रिंग हमेशा पहने रहते हो?
ऋतू: सिर्फ हॉस्टल के अंदर नहीं पहनती वरना आंटी जी पूछती|
ऋतू ने बड़े बेमन से जवाब दिया|
मैं: Hey! .... जान! अच्छा एक बात बताओ?
ऋतू: हम्म
मैं: शादी कब करनी है?
ये सुनते ही ऋतू की आँखें चमक उठीं और वो मेरी तरफ आस भरी नजरों से देखने लगी|
ऋतू: आप .... सच?
मैं: मैंने आपको प्रोपोज़ कर दिया और तो और हम दोनों ...you know ...
बहुत क्लोज आ चुके हैं तो अब बस शादी करना ही रह गया है|
ऋतू: (खुश होते हुए) मेरे फर्स्ट ईयर के पेपर हो जाएँ फिर|
मैंने ऋतू के माथे को चूम लिया और अब ऋतू की खुशियाँ लौट आईं थी| मैंने ऋतू से उसका दिल खुश करने को कह तो दिया था पर ये डगर बहुत कठिन थी| मेरे दिमाग बस यही सोच रहा था की कहीं से मुझे कोई ट्रांसफर का ऑप्शन मिल जाए ताकि मैं ऋतू का कॉलेज कॉरेस्पोंडेंस/ ओपन में ट्रांसफर कर दूँ जिससे उसकी पढ़ाई बर्बाद ना हो| आखरी ऑप्शन ये था की मैं उसकी पढ़ाई छुड़ा दूँ और जब हम दोनों शादी कर के सेटल हो जाएँ तब वो फिर से अपनी पढ़ाई शुरू करे, पर उसमें दिक्कत ये थी की उसे फर्स्ट ईयर से शुरू करना पड़ता| यही सब सोचते हुए मैं जगा रहा और रात के सन्नाटे में गाड़ियों को दौड़ते हुए देखता रहा| रात 2 बजे बस ने हमें लखनऊ उतारा, मैंने कैब बुक की और हम घर आ गए| मैंने सामान रखा और ऋतू बाथरूम में घुस गई| इधर मुझे भूख लग रही थी तो मैंने मैगी बनाई और तभी ऋतू बाहर आ गई| "मैं भी खाऊँगी!" कहते हुए ऋतू ने मुझे पीछे से कस कर जकड़ लिया| उसने अभी मेरी एक टी-शर्ट पहनी थी और नीचे एक पैंटी थी बस! मैंने अभी कपडे नहीं उतारे थे, ऋतू ने पीछे से खड़े-खड़े ही मेरी कमीज के बटन खोलने शुरू कर दिए| फिर वो अपना हाथ नीचे ले गई और मेरी पैंट की बेल्ट खोलने लगी| धीरे-धीरे उसे भी खोल दिया, अब उसने ज़िप खोली और फिर बटन खोला| पैंट सरक कर नीचे जा गिरी, मैं ऋतू का ये उतावलापन देख रहा था और मुस्कुरा रहा था| आखरी में उसने मेरी कमीज भी निकाल दी और अब बस एक बनियान और कच्छा ही बचा था| उसका ये उतावलापन मेरे अंदर भी आग लगा चूका था, मैंने गैस बंद की और ऋतू को गोद में उठा कर उसे बिस्तर पर लिटाया| अपनी बनियान निकाल फेंकी और ऋतू के ऊपर छा गया| ऋतू ने अपने दोनों हाथों से मेरे चेहरे को पकड़ा और मेरे होठों को अपने होठों से मिला दिया| मैंने अपनी जीभ उसके में में प्रवेश कराई थी की उसने मुझे धक्का दिया और खुद मेरे पेट पर बैठ गई| अपने निचले होंठ और जीभ के साथ उसने मेरे ऊपर वाले होंठ को अपने मुँह भर लिया| इधर मैंने उसकी टी-शर्ट के अंदर हाथ दाल दिया और उसके स्तनों को धीरे-धीरे मींजने लगा| वो मुलायम एहसास आज मुझे पहली बार इतना सुखदाई लग रहा था, मन कर रहा था की कस कर उन्हें दबोच लूँ और उमेठ लूँ पर आज मैं अपने प्यार को दर्द नहीं प्यार देना चाहता था| दो मिनट में ही ऋतू की बुर गीली हो गई और मुझे उसका गीलापन अपने पेट पर उसकी पैंटी से महसूस होने लगा| वो अब भी बिना रुके मेरे होठों का रस पान करने में व्यस्त थी, उसके हाथों का दबाव मेरे चेहरे पर बढ़ने लगा था| मैंने ऋतू को धीरे-धीरे अपने मुँह से दूर करना चाहा पर वो तो जैसे मेरे होठों को छोड़ना ही नहीं चाहती थी| बड़ी मुश्किल से मैंने उससे अपने होंठ छुड़ाए और उसकी आँखों में देखा तो मुझे एक ललक नजर आई| उस ललक
को देख मेरा मन बेकाबू होने लगा और इधर ऋतू के जिस्म में तो सेक्स की आग दहक चुकी थी| उसने खड़े हो कर अपनी पैंटी निकाल फेंकी और धीरे-धीरे मेरे लंड पर बैठने लगी| पहले के मुकाबले आज लंड धीरे-धीरे अंदर फिसलता जा रहा था, ऋतू जरा भी नहीं झिझकी और धीरे-धीरे और पूरा का पूरा लंड उसने अपनी बुर में उतार लिया| शायद कल की जबरदस्त चुदाई के बाद उसकी बुर मेरे लंड की आदि हो चुकी थी! पूरा लंड जड़ तक समां चूका था और ऋतू बस गर्दन पीछे किये चुप-चाप बैठी थी| दस सेकंड बाद उसने अपनी कमर को क्लॉकवाइज़ घूमना शुरू कर दिया| अब ये मेरे लिए पहली बार था, अंदर से ऐसा लग रहा था जैसे मेरा लंड ऋतू की बुर की दीवारों से हर जगह से टकरा रहा है| फिर पांच सेकंड बाद ऋतू ने अपनी कमर को एंटी-क्लॉकवाइज़ घुमाना शुरू कर दिया| मुझे अब इसमें भी मजा आने लगा था| फिर ऋतू रुकी और मेरा दोनों हाथ पकड़ के सहारा लिया और उकडून हो कर बैठ गई और मेरे लंड पर उठक-बैठक शुरू कर दी| लंड पूरा बाहर आता, बस टिप ही अंदर रहती और फिर ऋतू झटके से नीचे बैठती जिससे पूरा का पूरा लंड एक बार में सट से अंदर घुसता| पर बेचारी दो मिनट भी उठक-बैठक नहीं कर पाई और मेरी छाती पर सर रख कर लेट गई| मैंने अपने दोनों हाथो को उसकी कमर पर कसा और अपने कूल्हे हवा में उठाये और जोर-जोर से धक्के नीचे से लगाने शुरू कर दिए| "ससस..आह...हहह.ह.ह.ह.हह.ह.मम..म..उन्हक!" ऋतू की आवाजें कमरे में गूंजने लगी| जब ऋतू मेरे लंड पर उठक-बैठक कर रही थी तब उसके मुँह से कोई आवाज नहीं निकल रही थी क्योंकि वो बहुत धीरे-धीरे कर रही थी पर अभी जब मैंने तेजी से उसकी बुर चुदाई की तो वो सिस्याने लगी थी| पांच मिनट तक पिस्टन की तरह मेरा लंड ऋतू की बुर में अंदर-बाहर होने लगा था| ऋतू ने अपने दाँतों को मेरी कालर बोन में धंसा दिया था| मैंने आसन बदला और ऋतू के नीचे ले आया और खुद पलंग से नीचे उतर कर खड़ा हो गया| मैंने ऋतू को खींचा उसकी दोनों टांगों के बीच खड़ा हुआ और ऋतू की कमर बिलकुल बसिटर के किनारे तक ले आया| फिर धीरे से अपना लंड उसकी बुर से भिड़ा दिया और धीरे-धीरे अंदर दबाने लगा| लंड पूरा का पूरा अंदर चला गया और मैं ऋतू के ऊपर झुक गया| उसके होठों को चूमा और उसकी आँखों में देखने लगा पर पता नहीं कैसे ऋतू समझ गई की मैं क्या चाहता हूँ| "जानू! फुल स्पीड!" इतना कह कर वो मुस्कुरा दी और उसकी ये बात मेरे लिए उस हरी झंडी की तरह थी जो किसी रेस कार को दिखाई जाती है| उसके बाद तो मैंने जो ताक़त लगा कर ऋतू की बुर में लंड अंदर-बाहर पेला की उसका पूरा जिस्म हिल गया था| ऋतू के हाथ बिस्तर को पकड़ना चाहते थे की कहीं वो गिर ना जाये पर मेरी रफ़्तार इतनी तेज थी की वो कुछ पकड़ ही नहीं पाई और अगले दस मिनट बाद पहले वो झड़ी और फिर मैं| झड़ते ही मैं ऋतू पर जा गिरा और उसने अपनी टांगों को मेरी कमर पर कस लिया, साथ ही अपने हाथों से
मेरी गर्दन को लॉक कर दिया| कल रात के बाद ये दूसरा मौका था जब ऋतू ने मेरा साथ इतनी देर तक दिया था| करीब पाँच मिनट बाद जब दोनों की साँसे दुरुस्त हुईं तो हम अलग हुए और अलग होते ही लंड ऋतू की बुर से फिसल आया| लंड के साथ ही ऋतू के बुर में जमी मलाई भी नीचे टपकने लगी| मैं भी ऋतू की बगल में उसी की तरह टांगें लटकाये हुए लेट गया| पहले ऋतू उठी और जा कर बाथरूम में मुँह-हाथ धो कर आई और फिर मैं उठा| हमने किचन काउंटर पर खड़े-खड़े ही सूख कर अकड़ चुकी मैगी खाई| ऋतू ने बर्तन धोने चाहे तो मैंने उसे मना कर दिया, उसने फर्श पर से हमारी मलाई साफ़ की और हम दोनों बिस्तर पर लेट गए| सुबह के 4 बजे थे और अब नींद बहुत जोर से आ रही थी| मैं और ऋतू एक दूसरे से चिपक कर सो गए|
सुबह के 6 बजे ऋतू बाथरूम जाने को उठी और मेरी भी नींद तभी खुली पर मन नहीं किया की उठूँ| इसलिए मैं सीधा हो कर लेट गया, जब ऋतू बाथरूम से निकली तो उसकी नजर मेरे मुरझाये हुए लंड पर पड़ी| वो बिस्तर पर चढ़ी और मेरी टांगों के पास बैठ गई| मेरी आँख लग गई थी पर जैसे ही ऋतू ने मेरे लंड को अपने मुँह में लिया मैं चौंक कर उठा और ऋतू को देखा तो वो आज बड़ी शिद्दत से मेरे लंड को चूस रही थी| मेरे सुपाडे को वो ऐसे चूस रही थी जैसे की वो कोई टॉफी हो| अपनी जीभ से वो मेरे पूरे सुपाडे को चाट रही थी और उसके ऐसा करने से मेरे जिस्म के सारे रोएं खड़े हो चुके थे| मैंने अपने हाथों को ऋतू के सर पर रख दिया और उसे नीचे दबाने लगा| ऋतू समझ गई और उसने मेरे लंड को धीरे-धीरे अपने मुँह में उतारना शुरू कर दिया| 5 सेकंड में ही मेरा पूरा लंड उसके मुँह में उतर गया और ऋतू ऐसे ही रुकी रही| मेरी तो हालत खराब हो गई, उसकी गर्म सांसें और मुँह की गर्माहट मेरे लंड को आराम दे रही थी| अब ऋतू घुटनों के बल बैठी और अपने मुँह को मेरे लंड के ऊपर अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया| वो जब मुँहनीचे लाती तो लंड जड़ तक उसके गले में उतर जाता और फिर जब वो अपने मुँह को ऊपर उठाती तो बिलकुल सुपाडे के अंत तक अपने होठों को ले जाती| उसकी इस चुसाई के आगे मैं बस पॉँच मिनट ही टिक पाया और अपना गाढ़ा-गाढ़ा वीर्य उसके मुँह में उगल दिया| मुझे हैरानी तो तब हुई जब वो मेरा सारा का सारा वीर्य पी गई और मैं आँखें फाड़े उसे देख रहा था| वो मुझे देख कर मुस्कुराई और फिर बाथरूम चली गई, मैं उठ कर बैठ गया और दिवार से टेक लगा कर बैठ गया, सुबह से ऋतू के इस बर्ताव से मेरे जिस्म में खलबली मच चुकी थी| ऋतू ठीक वैसे ही सेक्स में मेरा साथ दे रही थी जैसा मैं चाहता था| जब ऋतू मुँह धो कर आई तो मेरी जाँघ पर सर रख कर लेट गई;
मैं: जान! एक बात तो बताओ? ये सब कहाँ से सीखा आपने?
ऋतू: (जान बुझ कर अनजान बनते हुए|) क्या?
मैं: (उसकी शरारत समझते हुए|) ये जो आपने गुड मॉर्निंग कराई अभी मेरी वो? और जो आप इतनी देर तक मेरे साथ टिके रहे वो? आपका सेक्स में खुल कर
पार्टिसिपेट करना वो सब?
ऋतू: लास्ट टाइम आपने मुझे डाँटा था ना, तो मुझे एहसास हुआ की अगर मैं आपको खुश न रख सकूँ तो लानत है मेरे खुद को आपकी पत्नी कहने पर| इसलिए उस कुटिया से मैंने बात की और उसे कहा की मैं अपने बॉयफ्रेंड को sexually खुश नहीं कर पाती| तो उसने मुझे बहुत साड़ी पोर्न वीडियो दिखाई, इतनी तो शायद आपने नहीं देखि होगी! पर आलतू-फ़ालतू वीडियो नहीं ...कुछ वीडियो X - Art की थी, कुछ Fellatio वाली...कुछ कामसूत्र वाली और एक तो वो थी जिसमें एक टीचर कुछ कपल्स को एक साथ बिठा कर सिखाती है की अपने पार्टनर को खुश कैसे करते हैं|
ये सब बताते हुए ऋतू बहुत उत्साहित थी और मैं उसके इस भोलेपन को देख मुस्कुरा रहा था|
ऋतू: बाकी रहा मेरा वो सेल्फ कण्ट्रोल....तो उसके लिए मैंने बहुत एफर्ट किये! मस्टरबैशन बंद किया... थोड़ा योग भी किया...
ये कहते हुए वो हँसने लगी और मेरी भी हँसी निकल गई| सच्ची ऋतू बहुत ही भोलेपन से बात करती थी...
ऋतू: मैंने न....वो.... Kinky वाली वीडियो भी देखि.... बहुत मजा आया.... पर वो सब शादी के बाद!
इतने कह कर वो शर्मा गई और मेरी नाभि से अपना चेहरा छुपा लिया और कस के लिप्त गई| मैं उसके सर पर हाथ फेरने लगा और हम दोनों ऐसे ही सो गए| हम 11 बजे उठे और अब बड़ी जोर से भूख लगी थी| मैंने ऋतू से पूछा की क्या वो भुर्जी खायेगी तो उसने हाँ कहा और नहाने चली गई| अब चूँकि उसने कभी अंडा पकाया नहीं था इसलिए मैंने ही भुर्जी बनाई| जब ऋतू नहा कर आई तो पूरे कमरे में भुर्जी की खुशबु भर गई थी, ऋतू ने अभ भी मेरी एक टी-शर्ट पहनी हुई थी और नीचे अपनी पैंटी| वो चल कर मेरे पास आई और मैंने उसे ब्रेड से एक कौर खिलाया| पहला कौर खाते ही उसकी आँखें चौड़ी हो गईं और वो बोली; "Wow!!!" उसकी ख़ुशी छुपाये नहीं छुप रही थी| "मैंने उस दिन कहा था ना की मेरे हाथ की भुर्जी खाओगी तो याद करोगी!" मैंने ऋतू को वो दिन याद दिलाया| "आज से आप जो कहोगे वो हर बात मानूँगी|" ऋतू ने कान पकड़ते हुए कहा| फिर हमने डट के भुर्जी खाई और लैपटॉप में मूवी देखने लगे| शाम हुई तो ऋतू ने चाय बनाई और मैं उसे ले कर छत पर आ गया| छत पर टंकियों के पीछे थोड़ी जगह थी जहाँ मैं हमेशा बैठा करता था| वहाँ से सारा शहर दिखता था और रात होने के बाद तो घरों की छोटी-छोटी टिमटिमाती रौशनी देख के मैं वहीँ चुप-चाप बैठ जाय करता था| अंधेरा होना शुरू हुआ था और हम दोनों वहाँ बैठे थे, ऋतू का सर मेरे कंधे पर था और वो भी चुप-चाप थी| "हम बैंगलोर में भी ऐसा ही घर लेंगे जहाँ से सारा शहर दिखता हो| एक बालकनी जिसमें छोटे-छोटे फूल होंगे, रोज वहीँ बैठ कर हम चाय पीयेंगे| जब कभी लाइट नहीं होगी तो हम वहीँ सो जाएंगे, एक छोटा सा डाइनिंग टेबल जहाँ रोज सुबह मैं आपको नाश्ता ख़िलाऊँगी, हमारा बैडरूम जिसमें एक रोशनदान हो और सुबह की पहली किरण आती हो| हमारे प्यार की निशानी के लिए एक पालना...
" ऋतू बैठे-बैठे हमारे आने वाले जीवन के बारे में सब सोच चुकी थी और सब कुछ प्लान कर चुकी थी|
"वैसे तुम्हे लड़का चाहिए या लड़की?" मैंने पूछा|
"लड़का... और आपको?" ऋतू ने मुझसे पुछा|
"लड़की.. जिसका नाम होगा 'नेहा'|" मैंने गर्व से कहा|
"और लड़के का नाम?"
"आयुष"
"आपने तो सब पहले से ही सोच रखा है?" ऋतू ने खुश होते हुए कहा|
हम दोनों वहीँ बैठे रहे और जब रात के नौ बजे तब नीचे आये| ऋतू ने रात का खाना बनाया और ठीक ग्यारह बजे हम खाना खाने बैठ गए| ऋतू मुझे अपने हाथ से खिला रही थी, पर जब मैंने उसे खिलाना चाहा तो उसने 1-2 कौर ही खाये| खाने के बाद उसने बर्तन धोये और हम लैपटॉप पर मूवी देखने लगे| मूवी में एक हॉट सीन आया और उसे देख कर ऋतू गर्म होने लगी| उसका हाथ अपने आप ही मेरे लंड पर आ गया और वो मेरे बरमूडा के ऊपर से ही उसे मसलने लगी| ऋतू के छूने से ही मेरे जिस्म में जैसे हलचल शुरू हो चुकी थी| पहले तो मैं खुद को अच्छे से कण्ट्रोल कर लिया करता था पर पिछले दो दिनों से मेरा खुद पर काबू छूटने लगा था| मैंने लैपटॉप पर मूवी बंद कर दी और गाना चला दिया; "दिल ये बेचैन वे!" ऋतू मुस्कुरा दी और मुझे नीचे धकेल कर मेरे ऊपर चढ़ गई और मेरे होठों को अपने मुँह में ले कर चूसने लगी| आज वो बहुत धीरे-धीरे मेरे होठों को चूस रही थी और इधर मेरी धड़कनें बेकाबू होने लगी थीं| मुझसे ऋतू का ये स्लो ट्रीटमेंट बरदाश्त नहीं हो रहा था, इसलिए मैंने उसे पलट कर अपने नीचे किया| फिर नीचे को बढ़ने लगा पर ऋतू ने मुझे नीचे नहीं जाने दिया, उसने ना में गर्दन हिलाई और मुझे उसकी बुर को चूसने नहीं दिया| मेरा बरमूडा उसने नीचे किया पर पूरा निकाला नहीं, लंड हाथ में पकड़ उसने अपनी पैंटी सामने से थोड़ा सरकाई और मेरे लंड पकड़ कर उसने अपनी बुर से स्पर्श करा दिया| मैंने अपनी कमर पीछे को की और धीरे से एक झटका मारा और मेरा सुपाड़ा ऋतू की बुर में दाखिल हो गया| ऋतू ने अपने दोनों हाथों से मेरे कन्धों को पकड़ लिया, मैंने फिर से कमर पीछे की और अपना लंड जितना अंदर डाला था वो बाहर निकाल कर फिर से अंदर पेल दिया| इस बार लंड आधा अंदर चला गया, ऋतू के मुँह से सिसकारी निकली; "सससससस स.स..आअह!!!" मैंने एक आखरी झटका मारा और पूरा लंड अंदर चला गया ठीक उसी समय गाने की लाइन आई;
सावन ने आज तो, मुझको भिगो दिया...
हाय मेरी लाज ने, मुझको डुबो दिया...
सावन ने आज तो, मुझको भिगो दिया...
हाय मेरी लाज ने, मुझको डुबो दिया...
ऐसी लगी झड़ी, सोचूँ मैं ये खड़ी...
कुछ मैंने खो दिया, क्या मैंने खो दिया...
चुप क्यूँ है बोल तू...
संग मेरे डोल तू...
मेरी चाल से चाल मिला...
ताल से ताल मिला...
ताल से ताल मिला...
इस दौरान में बस ऋतू को टकटकी बांधे देखता रहा और ऐसा महसूस करने लगा जैसे वो अपने दिल की बात कह रही हो| ऋतू ने जब नीचे से अपनी कमर हिलाई तब जा कर मैंने अपने धक्कों की रफ़्तार पकड़ी| कुछ ही देर में मेरे हिस्से की लाइन आ गई;
माना अनजान है, तू मेरे वास्ते...
माना अनजान हूँ, मैं तेरे वास्ते...
मैं तुझको जान लूं, तू मुझको जान ले....
आ दिल के पास आ, इस दिल के रास्ते...
जो तेरा हाल है...
वो मेरा हाल है...
इस हाल से हाल मिला...
ताल से ताल मिला हो, हो, हो...
इन लाइन्स को सुन ऋतू बस मुस्कुरा दी और मैंने इस बार बहुत तेज गति से उसकी बुर में लंड पेलना शुरू कर दिया| अगले दस मिनट तक एक जोरदार तूफ़ान उठा जिसने हम दोनों के जिस्मों को निचोड़ना शुरू कर दिया और जब वो तूफ़ान थमा तो हम दोनों एक साथ झड़ गए| ऋतू की बुर एक बार फिर मेरे वीर्य से भर गई और मैं उस पर से हैट कर दूसरी तरफ लेट गया| ऋतू ने मेरी तरफ करवट की और अपना दायाँ हाथ मेरे सीने पर रख कर सो गई| नींद तो मुझे भी आने लगी थी और फिर एक खुमारी सी छाई जिससे मैं भी चैन से सो गया|
update 42
आज शनिवार का दिन था, सुबह मैं जल्दी उठ गया पर ऋतू अब भी मुझसे चिपकी हुई थी| मैंने घडी देखि तो सुबह के 6 बजे थे, मैंने धीरे से अपने आप को ऋतू से छुड़ाना चाहा तो ऋतू भी जाग गई| "सॉरी जान!" मैंने उसे जगाने के लिए माफ़ी मांगी तो मुस्कुराने लगी, उसकी मुस्कराहट देख मेरी मॉर्निंग और भी गुड हो गई| मैंने उसके माथे को चूमा और उठ के बाथरूम में घुस गया| जब वापस आया तो ऋतू चाय बना रही थी, चाय छान कर उसने मुझे बड़े प्यार से मुस्कुराते हुए दी और फिर खुद बाथरूम चली गई| फ्रेश हो कर आई तो मैं अब भी कप थामे उसके आने का इंतजार कर रहा था| वो भी समझ गई और हम दोनों अपनी-अपनी चाय लिए खिड़की के पास खड़े हो गए| ऋतू मेरे आगे थी, और हम दोनों के दाहिने हाथों में हमारे कप थे| मेरा बायाँ हाथ ऋतू के पेट पर था और ऋतू ने भी अपने बाएँ हाथ से मेरे हाथ को पकड़ रखा था| "काश की हम हर रोज इसी तरह खड़ा हो कर चाय पीते?" ऋतू बोली, मैंने ऋतू के सर को पीछे से चूम लिया| "वो दिन भी आएगा|" मैंने जवाब दिया तो ऋतू ने उत्सुकता वश पूछा; "कब?" अब मैं इसका जवाब नहीं जानता था पर फिर भी मैंने ऋतू को आस बंधाते हुए कहा; "जल्द" इसके आगे उसने और कुछ नहीं कहा और हम दोनों इसी तरह खड़े खिड़की से बाहर पेड़ों को देखते रहे| आज बरसों बाद मुझे सुबह की ठंडी हवा सुकून दे रही थी|
कुछ देर ऐसे ही खड़े रहने के बाद मुझे याद आया की हमें तो गाँव भी जाना है? "ऋतू...
आज गाँव चलें?" मैंने ऋतू से संकुचाते हुए पुछा| तो वो मेरी तरफ पलटी और ऐसे देखने लगी जैसे की मैंने उससे कहा हो की मैं सरहद पर जा रहा हूँ?! "घर वालों को शक न हो इसलिए कह रहा हूँ|" मैंने ऋतू के दाएँ गाल पर आई उसकी लट को ऊँगली से हटाते हुए कहा| "आपसे दूर जाने को मन नहीं करता|" ऋतू ने सर झुकाते हुए कहा| मैंने ऋतू को कस कर अपने सीने से लगा लिया; "मेरी जानेमन! बस कुछ दिनों की तो बात है| फिर मैं आपके साथ आज का दिन और कल का दिन वहीँ रुकूँगा और सोमवार को मैं वापस आ जाऊँगा|"
"और मेरा क्या? मुझे कब 'लिवाने' आओगे?" ऋतू ने मेरे सीने से अलग होते हुए शर्माते हुए पुछा| पर जब उसने 'लिवाने' शब्द का इस्तेमाल किया तो मेरे चहरे पर मुस्कुराहट आ गई|
"बुधवार को अपनी दुल्हनिया को लिवाने आएंगे उसके साजना|" मेरा जवाब सुन ऋतू बुरी तरह शर्मा गई और कस कर मेरे सीने से चिपक गई|
"एक बात पूछूँ? अगर सब कुछ नार्मल होता, I mean ... की हम एक परिवार के ना होते, तो आप मेरा हाथ घरवालों से कैसे माँगते?" ऋतू का सवाल सुन में कुछ सोच में पड़ गया| फिर मुझे कुछ याद आया और मैंने फ़ोन में एक वीडियो प्ले की, फिर ऋतू के सामने अपने एक घुटने पर बैठ गया;
Saturday morning jumped out of bed and put on my best suit
Got in my car and raced like a jet, all the way to you
Knocked on your door with heart in my hand
To ask you a question
'Cause I know that you're an old fashioned man yeah yeah
Can I have your daughter for the rest of my life? Say yes, say yes
'Cause I need to know
You say I'll never get your blessing till the day I die
Tough luck my friend but the answer is no!
Why you gotta be so rude?
Don't you know I'm human too
Why you gotta be so rude
I'm gonna marry her anyway
(Marry that girl) Marry her anyway
(Marry that girl) Yeah no matter what you say
(Marry that girl) And we'll be a family
ये सुनते ही ऋतू खिलखिला कर हँस पड़ी| पर गाने की जब अगली लाइन्स आईं तो ऋतू आँखें फाड़े मुझे देखने लगी;
I hate to do this, you leave no choice
I can't live without her
Love me or hate me we will be boys
Standing at that alter
Or we will run away
To another galaxy you know
You know she's in love with me
She will go anywhere I go
Can I have your daughter for the rest of my life? Say yes, say yes
'Cause I need to know
You say I'll never get your blessing till the day I die
Tough luck my friend cause the answer's still no!
Why you gotta be so rude?
Don't you know I'm human too
Why you gotta be so rude
I'm gonna marry her anyway
(Marry that girl) Marry her anyway
(Marry that girl) Yeah no matter what you say
(Marry that girl) And we'll be a family…..
ये सुन कर ऋतू ने मुझे गले लगा लिया, मेरा मुँह उसके पेट पर था और उसका हाथ मेरे बालों में था| "मैं सच में बहुत खुशकिस्मत हूँ की मुझे आपके जितना चाहने वाला मिला|" ऋतू ने मेरे बालों में उँगलियाँ फेरते हुए कहा|
कुछ देर बाद हम नाश्ता कर के तैयार हुए और मेरी प्यारी बुलेट रानी पर सवार हो कर गाँव की तरफ निकल लिए| ठीक दोपहर के खाने पर पहुँचे और हमें वहाँ देख कर किसी को कुछ ख़ास ख़ुशी नहीं हुई| "तुम दोनों को शहर की हवा लग गई है|" ताऊजी ने गुस्से में गरजते हुए कहा| कुछ देर पहले मेरी जान जो बहुत खुश थी वो अचानक ही सहम गई| "ऋतू...
तू अंदर जा|" मैंने ऋतू को अंदर भेजा| "उसे क्यों अंदर भेज रहा है?" ताऊ जी ने गरजते हुए कहा|
"ऑफिस में वर्क लोड इतना बढ़ गया है की मैं ही गाँव नहीं आ पा रहा था तो वो बेचारी अकेले तो गाँव आ नहीं सकती ना?" मैंने अपनी सफाई दी|
"आग लगे तेरी नौकरी को|" ताई जी ने गुस्से से चिल्लाते हुए कहा|
"तुझे कहा था न की छोड़ दे ये नौकरी और खेती संभाल, पर नहीं तुझे तो उड़ना है|" पिताजी ने भी आगे आते हुए ताना मारा| मेरा गुस्सा अब फूटने को था पर तभी अनु मैडम का फ़ोन आया; "Mam मैं आपको दो मिनट में कॉल करता हूँ|" अभी मैंने कॉल काटा भी नहीं था की ताऊजी चिल्ला कर बोले; "मिनट भर हुआ नहीं घर में घुसे और तेरे फ़ोन आने चालु हो गए? ऐसी कौन सी तनख्वा देते है तुझे?" मैडम ने सब सुन लिया था और खुद ही फ़ोन काट दिया| अब घर में तो कोई नहीं जानता था की मेरी तनख्वा बढ़ गई है इसलिए मैं बस अपने गुस्से पर काबू करना चाहता था|
"मैं पूछती हूँ तुझे कमी क्या है इस घर में? सब कुछ तो है हमारे पास| सारी उम्र बैठ कर खा सकता है, फिर क्यों तू दूसरों के यहाँ नौकरी करता है?" माँ ने कहा|
"बस बहु बहुत होगया इसका! इसी साल तेरी शादी कर देते हैं|" ताऊ जी ने अपना फरमान सुनाते हुए कहा|
"आपने वादा किया था ताऊ जी!" मैंने उन्हें उनका वादा याद दिलाया|
"तूने तीन साल मांगे थे और वो इस साल पूरे होते हैं| अगले साल जनवरी में ही तेरी शादी होगी और ये मैं तुझसे पूछ नहीं रहा बल्कि बता रहा हूँ|" ताऊ जी ने आखरी फैसला सुना दिया| अब मुझे कुछ तो बहाना मारना था ताकि इस शादी की लटक रही तलवार से अपनी गर्दन बचा सकूँ|
मैं: मुझे शहर में घर लेना है!
मैं बस इतना कह कर चुप हो गया और मेरी बात सुन के सब के सब आँखें फाड़े मुझे देखने लगे|
ताऊ जी: क्या?
मैं: मैं शादी के बाद यहाँ रहना नहीं चाहता| मैं नहीं चाहता की मेरा बच्चा उसी स्कूल में जमीन पर बैठ के पढ़े जहाँ मैं पढ़ा था! यहाँ अगर इंसान बीमार हो जाए तो इलाज के लिए एक घंटे दूर बाजार जाना पड़ता है| न इंटरनेट है न ही ठीक से बिजली आती है, ऐसी जगह मैं अपनी नै जिंदगी शुरू नहीं करना चाहता| शहर में सब सुख सुविधा है, पर यहाँ सिर्फ बीहड़ है| घर में अगर बाइक न हो तो कहीं भी जाने के लिए सड़क तक पैदल जाना पड़ता है....
ताऊ जी: (बात काटते हुए) ये क्या बोल रहा है तू?
मैं: ताऊ जी, अपने परिवार के बारे में सोचना गलत तो नहीं? आज कल की नै पीढ़ी इस तरह बंध कर नहीं रह सकती| अगर हम गरीब होते और ये सुख-सुविधा नहीं खरीद सकते तो मैं आपसे कुछ नहीं कहता पर हम गरीब तो नहीं?
मेरी बात सुन कर ताऊ जी चुप हो गए पर ताई जी तमतमाते हुए बोलीं;
ताई जी: तो तू क्या चाहता है हम सब खेती-किसानी बेच के तेरे साथ शहर चलें?
मैं: बिलकुल नहीं...
मैं बस इतना चाहता हूँ की मैं शहर में अपना घर ले सकूँ, अपनी बीवी-बच्चों के साथ वहां रह सकूँ और उन्हें वो सब सुख सुवुधा दूँ जिसके लिए मुझे घर से दूर जाना पड़ा था|
माँ: तो तू शादी के बाद वहीँ रहेगा? हमें छोड़ के?
मैं: नहीं माँ! बच्चों की छुट्टियों में मैं यहाँ आता रहूँगा और आप सब भी हमसे मिलने वहीँ आ कर मेरे घर में रहना|
ताऊ जी: बस बहुत हो गया! बता कितने पैसे चाहिए तुझे? 10 लाख? 20 लाख? छोटे (मेरे पिताजी) वो नहर वाली जमीन....
मैं: (बात काटते हुए) 55 लाख चाहिए मुझे!
ये सुन कर तो ताऊ जी सन्न रह गए!
मैं: मैं आपसे ये पैसे मांग नहीं रहा| मैं अपने पैसों से घर लेना चाहता हूँ, मेरी अपनी मेहनत की कमाई से!
ताऊ जी: अच्छा? तेरी वो चुल्लू भर कमाई से घर खरीदने की सोचेगा तो जिंदगी भर नहीं खरीद पाएगा|
मैं: ताऊ जी मुझे बस दो साल का समय लगेगा ताकि मैं कुछ पैसे जोड़ लूँ, उसके बाद बाकी सारा पैसा में लोन लूँगा|
ताऊ जी: क्या?
पिताजी: तेरा दिमाग ख़राब हो गया है?
मैं: नहीं... मुझे अपने पाँव पर खड़ा होना है|
पिताजी; तो ये सब जो जमीन जायदाद है वो किसकी है?
मैं: मेरी तो नहीं? मैंने उसे कमाया नहीं है! मुझे मेरे पैसे का घर चाहिए!
पिताजी और ताऊ जी आगे कुछ नहीं बोले|
मैं: मैं शादी से मना नहीं कर रहा, बस आपसे दो साल का समय और माँग रहा हूँ|
ताऊ जी: ठीक है! पर ये आखरी बार है जब हम तुझे समय दे रहे हैं, अगली बार तू हमें कुछ नहीं बोलेगा और कोई बहाना नहीं करेगा|
मैं: जी
इतना कह कर ताऊ जी और सब खाना खाने बैठ गए| उस समय मुझे ऐसा लगा जैसे की उन्हें मेरे ऊपर गर्व है की मैं खुद कुछ बनना चाहता हूँ| खाना खाने के समय मैं बस ऋतू को देख रहा था जो सर झुकाये बेमन से खाना खा रही थी| मेरा मन तो किया की मैं उसे जा के अपने हाथ से खाना खिलाऊँ पर मजबूर था! खेर खाना खा कर मैं अपने कमरे में आ गया और लैपटॉप पर कुछ ढूँढ रहा था| तभी ऋतू मेरे सामने से अपने कमरे की तरफ बिना कुछ बोले चली गई| मैं उठा और जा के देखा तो वो जमीन पर बैठी सर झुका कर रो रही थी| उसे रोता हुआ देख दिल दुख मैंने जा के जमीन से उसे उठा कर बिस्तर पर बिठाया, ऋतू आ कर मेरे सीने से लग गई और रोने लगी| "बस-बस! कोई शादी नहीं हो रही! मुझे जो भी बहाना सूझा वो मैंने बना दिया और देख सब मान भी गए, फिर क्यों रो रही है?" मैंने ऋतू के आँसूँ पोछते हुए पुछा| पर उसके मन में डर बैठ गया था जिसे निकालने के लिए मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता था| घर पर सभी लोगों की मौजूदगी थी और ऐसे में हम दोनों का इस तरह चिपके रहना मुसीबत खड़ी कर सकता था| मैंने एक आखरी कोशिश की; "तुझे मुझ पर भरोसा है?" ऋतू ने हाँ में सर हिलाया| "तो बस मुझ पर भरोसा रख, मैं कोई शादी-वादी नहीं करने वाले| इन लोगों ने ज्यादा जोर-जबरदस्ती की तो हम उसी वक़्त भाग जायेंगे|" अब ये सुन कर ऋतू को तसल्ली हुई और उसका रोना बंद हुआ| मैंने ऋतू
के माथे को चूमा और बाहर आ गया| फिर याद आया की मैंने मैडम को फ़ोन करना है तो उन्हें कॉल मिला कर मैं छत पर आ गया| घंटी बजती रही पर मैडम ने फ़ोन नहीं उठाया, मुझे लगा शायद बीजी होंगी इसलिए मैंने कॉल काटा और घर से बाहर टहलने को निकल गया| जब शाम को वापस आया तो ऋतू अब सामन्य दिखी, सब ने बैठ के चाय पी और उस पूरे दौरान मैं चुप रहा| कुछ देर बाद ताऊ जी बोले; "तूने वहाँ कोई जमीन देखि है?"
"जी ...देखि है... करीब 250 गज है|" मैंने झूठ बोला|
"कितने की है?" ताऊ जी ने चाय का घूँट पीते हुए पुछा|
"जी...वो... 35 लाख की है| घर बनवाई और बाकी के काम जोड़-जाड कर 15 लाख ऊपर से लगेगा|" मैंने बात बनाते हुए कहा| वो चुप हो गए और चाय पी कर पिताजी को अपने साथ ले कर चले गए| आंगन में बस मैं, ताई जी, माँ और भाभी ही बचे थे, ऋतू रसोई में बर्तन धो रही थी| "ऋतू तेरी पढ़ाई कैसी चल रही है?" मैंने पुछा तो वो रसोई से बाहर आई और बोली; "ठीक चल रही है|" फिर मैंने उसे एकाउंट्स की किताब लेन को कहा तो वो चुप-चाप ऊपर के कमरे से अपनी किताब ले आई| मैं उसे जानबूझ कर सब के सामने पढ़ाने लगा ताकि सब को लगे की हम दोनों शहर में एक दूसरे से नहीं मिलते| आखिर ताई जी ने पूछ ही लिया; "इतना भी क्या काम रहता है तुझे की तुझसे अपनी प्यारी भतीजी से मिला नहीं जाता?"
"बैंगलोर का एक प्रोजेक्ट है, उसकी वजह से संडे को भी ऑफिस जाता हूँ| इसलिए टाइम नहीं मिलता की ऋतू के हॉस्टल जा सकूँ|" मैंने जवाब दिया तो ताई जी चुप हो गईं| कुछ देर पढ़ने के बाद ऋतू खुद ही खाना बनाए की तैयारी करने लगी| मुझे इत्मीनान हो गया की ऋतू पढ़ाई भी करती है ना की सारा टाइम मुझे खुश करने के लिए पोर्न देखती है| रात को खाने के बाद मैं छत पर टहल रहा था की ऋतू आ गई, उसके हाथ में एक कटोरी थी और कटोरी में गुड़! "आपने मुझसे एक वादा किया था न?" उसने पुछा पर मैं सोच में पड़ गया की वो कौनसे वादे की बात कर रही है| "सिगरेट और शराब नहीं पीने का?" जब ऋतू ने ये कहा तब मुझे याद आया और मैंने हाँ में सर हिलाया| "तो आज से सब बंद! Promise me???" ऋतू ने कहा तो मैंने उसे विश्वास दिलाते हुए कहा; "I Promise की आज से शराब या सिगरेट को हाथ नहीं लगाऊँगा|" ऋतू मुस्कुराई और नीचे चली गई| कुछ देर बाद संकेत तिवारी आया और माँ ने मुझे नीचे बुलाया| उसके घर पर पतुरिया का प्रोग्राम था और वो मुझे बुलाने आया था| "चल यार घर पर प्रोग्राम है और तू यहाँ घर पर बैठा है? कम से कम मुझे बता तो देता की तू आया हुआ है?" मुझे माँ को कुछ कहने की जर्रूरत ही नहीं पड़ी और मैं उसके साथ चला गया| वहाँ पहुँच कर सबसे आगे की चारपाई पर हम दोनों बैठ गए और गाना-बजाना चल रहा था| सारे गाने डबल मीनिंग वाले थे और वहाँ खड़े लौंडे सब चिल्ला रहे थे और पैसे उड़ा रहे थे| वो औरत नाचती हुई आई और मुझे खींच के स्टेज पर ले जाने लगी तो मैंने उसके हाथ से अपना हाथ छुड़ा लिया और संकेत को आगे कर दिया|
संकेत ने अपने मुँह में एक 500 का नोट दबाया और अपनी गर्दन उसके मुँह के आगे कर दी, उस औरत ने अपने होठों से संकेत के मुँह से वो नोट छुड़ाया और संकेत उसे अपनी बाँहों में कस कर नाचने लगा| वो जानती थी की यही मालिक है इसलिए वो उसे ज्यादा से ज्यादा खुश कर रही थी, कभी अपनी कमर यहाँ लचकाती तो कभी वहाँ| अपने चुचों से दुपट्टा उतारा और संकेत की तरफ फेंक दिया| उसकी बड़ी-बड़ी चूचियों की घाटी साफ़-साफ़ नजर आ रही थी और हो-हल्ला शुरू हो गया था| खेर इसी तरह मैं वहाँ बैठा रहा और रात 1 बजे तक ये प्रोग्राम चलता रहा| इस पूरे दौरान मैं ऋतू के बारे में सोच रहा था और मेरा लंड बिलकुल अकड़ चूका था| जब प्रोग्राम खत्म हुआ तो संकेत ने गांजा भर के चिलम मेरी तरफ बधाई| उस चिलम को देखते ही मेरा मन करने लगा की एक कश मार लूँ पर ऋतू को वादा जो किया था इसलिए मैंने उसे मना कर दिया| "ओह बहनचोद! तू इसे मना कर रहा है? तबियत तो ठीक है ना तेरी?" संकेत ने पुछा| "ना यार मन नहीं है!" इतना कह कर मैं घर जाने को उठ खड़ा हुआ| दरवाजा खटखटाया तो भाभी ने दरवाजा खोला; "देख आये पतुरिया का नाच?" भाभी ने मुझे छेड़ते हुए कहा, पर मैंने कोई जवाब नहीं दिया और चुपचाप अपने कमरे में आ कर लेट गया| ऋतू सो चुकी थी पर मुझे आज उसके बिना नींद नहीं आ रही थी| मन कर रहा था की जा कर उसके जिस्म से चिपक जाऊँ पर डरता था की घर में काण्ड ना हो जाए| पूरी रात बस करवटों में निकल गई और सुबह ऊँघता हुआ उठा| ऋतू ने जब मुझे देखा तो प्यार से बोली; "जानू! नींद नहीं आई आपको?" मैंने ना में गर्दन हिलाई और कहा; "कैसे आती? मेरी जानेमन मुझसे दूर थी!" ये सुनते ही वो शर्मा गई और मुझे गले लग्न चाहा पर तभी भाभी आ गई; "और सो लो थोड़ा? पतुरिया को याद कर-कर के सोये तो होंगे नहीं?" ये सुनते ही ऋतू गुस्सा हो गई; "भाभी थोड़ी तो शर्म किया करो?! देखते नहीं ऋतू खड़ी है?" मैंने उन्हें झाड़ते हुए कहा|
"बच्ची थोड़े ही है?" उन्होंने कहा और चली गईं| ऋतू भी उनके पीछे-पीछे जाने लगी, माने दौड़ कर उसका हाथ पकड़ लिया और उसे अपने कमरे में खींच लिया| "मेरे होते हुए आप पतुरिया देखने गए?" ऋतू ने गुस्से से कहा|
"जान! मुझे नहीं पता था की वो कहाँ बुला रहा है? यक़ीन मानो मैंने कुछ नहीं किया ना ही उसे छुआ, वो मुझे खींच कर ले जा रही थी पर मैंने संकेत को आगे कर दी| उसने तो मुझे चिलम भी ऑफर की थी पर मैंने तुम्हारे वादे की खातिर उसे मना कर दिया|" मैंने ऋतू से ऐसे कहा जैसे की एक छोटा बच्चा अपनी सफाई देता है| ये सुन कर ऋतू खिलखिला कर हँस पड़ी और मेरे दोनों गाल पकड़ के खींचते हुए बोली; "I know ...
I was joking!!!" हँसती-खेलती हुई वो नीचे चली गई| मैं भी नहा धो कर अपना लैपटॉप ले कर नीचे आ गया और आंगन में बैठ कुछ PPTs पर काम करने लगा| अम्मा और माँ मुझे काम करता हुआ देख रहे थे और पहला ताना माँ ने ही मारा; "दो दिन के लिए घर आया है, कम से कम यहाँ तो इस डिब्बे को बंद कर दे!"
अब इससे पहले ताई जी मुझे ताना मारें मैंने लैपटॉप बंद किया और उनके पास जा कर बैठ गया| माँ और ताई जी बैठीं मटर छील रही थीं और मैं भी वहीँ बैठ गया और मटर छीलने लगा| मुझे देख कर भाभी जोर से हँस पड़ीं और उनकी देखा-देखि सब हँस पड़े| "क्या हुआ? आपने ही कहा था की डिब्बा बंद कर दो, तो सोचा की आपकी मदद ही कर दूँ|" ये सुन कर ताई जी बोलीं; "ये काम करने को नहीं बोला, ये बता वहाँ तू अकेला खाना कैसे बनाता है?" मैं पहले तो थोड़ा हैरान हुआ क्योंकि आज तक कभी मुझसे इस तरह की बात नहीं की गई थी| "रात को सात बजे तक पहुँचता हूँ, फिर राइस कुकर में चावल और स्टील वाले में दाल डाल कर गैस पर चढ़ा देता हूँ| एक साथ दोनों तैयार हो जाते हैं, फिर चॉपर में प्याज-टमाटर और हरी मिर्च डाल कर के 5-7 बार खींचता हूँ और फटफट तड़का मारा... खाना तैयार| जब ज्यादा लेट हो जाता हूँ तो बाहर से मँगा लेता हूँ|" मैंने कहा|
"ये चापर क्या होता है?" माँ ने पुछा तो मैंने उन्हें बता दिया; "एक कटोरी जैसे बर्तनहोता है उसमें दो ब्लेड लगे होते हैं, उसके ऊपर एक हैंडल होता है और उसे खींचने से नीचे ब्लेड घूमता है| अगली बार आऊँगा तब आपको ला कर दिखा देता हूँ|" तभी ऋतू बोल पड़ी; "आज आप ही खाना बना कर खिला दो सब को!" पर ताई जी को ये बात नहीं जचि और वो ऋतू पर बिगड़ पड़ीं; "पागल हो गई तू? इतने महीनों बाद आया है और तू इससे चूल्हा-चौका करवाएगी?" ऋतू ने अपना सर झुका लिया|
"ताई जी, आज तो आपको ऐसा खाना खिलाऊंगा की आप उँगलियाँ चाट जाओगे!" मैंने जोश में आते हुए ऋतू का बचाव किया| मैंने हाथ-मुँह धोये और रसोई में घुस गया, सबसे पहले मैंने फ़ोन में गाना लगाया: "ना जा न जा" और ऋतू का हाथ सब के सामने पकड़ा और उसके दाहिने हाथ की ऊँगली पकड़ कर उसे गोल घुमा दिया| ऋतू इस सबसे बेखबर थी और मेरे अचानक उसे गोल घुमाने से वो गोल घूम गई|
उस एक पल के लिए मैं सब कुछ भूल गया था, मुझे बस ऋतू के उदास चेहरे को खुशियों से भरना था| ऋतू डांस करने में बहुत झिझक रही थी पर मैं ही उसे जबरदस्ती नचा रहा था| चूँकि वहाँ सिवाय औरतों के कोई नहीं था तो इसलिए कोई कुछ बोला नहीं| जब गाना खत्म हुआ तो ताई जी बोलीं; "देख रही है छोटी (माँ) तू, गाँव में जिस लड़के की आवाज नहीं निकलती थी वो शहर जा आकर नाचने भी लगा है|" मैंने ऋतू की तरफ एक टमाटर उछाला जिसे उसने बड़ी मुश्किल से पकड़ा और मैंने उसे काट के देने को कहा| तभी भाभी बोल पड़ी; "देखो ना चची कितने बेशर्म हो गया है मानु, ऋतू को नचा रहा है!" अब ये बात मुझे बहुत चुभी; "अपनी माँ और ताई जी के सामने नचा रहा
हूँ बाहर सड़क पर तो नहीं नचा रहा|" ये सुन कर भाभी का मुँह बन गया और माँ कहने लगी; "कोई बात नहीं बहु, कम से कम इसके आने से घर में थोड़ी रौनक तो आ गई|"
"तू एक बात बता मानु, तू अपनी भाभी से चिढ़ा क्यों रहता है?" ताई जी ने पुछा|
"ताई जी ये जब देखो ऋतू के पीछे पड़ीं रहती हैं, मैंने आज तक इन्हें कभी हँस कर ऋतू से बात करते नहीं देखा| हमेशा उसे ताना मरती रहतीं हैं, उससे प्यार से बात करें तो मैं भी इनसे हँस कर बात करूँ| अगर उसे नचा सकता हूँ तो इनको भी थोड़ा नचा दूँगा|" मैंने माहौल को थोड़ा हल्का करने के लिए कहा| फिर मैं खाना बनाने में लग गया और सारा सब्जी काटने का काम ऋतू से करवाया; "अगर सारी चोप्पिंग मुझसे करानी थी तो खाना मैं ही बना लेती|' ऋतू ने प्यार से मुझे ताना मारते हुए कहा|
"खाना तो बना लेती पर मेरे हाथ का स्वाद कैसे आता?" मैंने ऋतू को आँख मारते हुए कहा| जब सब दोपहर को खाने बैठे तो खाना वाक़ई में सब को पसंद आया पर पिताजी और ताऊ जी ने कुछ कहा नहीं, हाँ बस ताई जी और माँ ने खाने की तारीफ की थी| भाभी बोलीं; "चलो भाई एक बात तो तय हुई, शादी के बाद मानु अपनी लुगाई को खुश बहुत रखेगा|" ये सुन ऋतू मुस्कुराई जैसे खुद पर फक्र कर रही हो| शाम होने तक मैं सभी के पास बैठा रहा, 7 बजे लाइट चली गई और फ़ोन की बैटरी भी डिस्चार्ज हो गई और लैपटॉप तो मैं चार्जर पर लगाना ही भूल गया था| रात का खाना भी मैंने ही बनाया और इस बार पिताजी बोल ही पड़े; "घर में तू तीसरा आदमी है जिसे खाना बनाना आता है| याद है भाईसाहब जब हम छोटे होते थे तब खेतों में आलू का भरता बनाते थे|" ताऊजी मुस्कुराये और उन्होंने अपने बचपन की कहानी सुनाई; "मैं और तेरा बाप माँ के गुजरने के बाद चूल्हा-चौका संभालते थे| कभी-कभी कहते में पहरिदारी करनी होती थी तो घर से रोटी बना कर ले जाते और खेत में कांडों की आग में आलू भूनते और फिर उसमें घर का नून मिला कर रोटी के संग खाते थे|" सब के सब उनकी बातें बड़े गौर से सुन रहा थे, चन्दर ने तो आज तक रसोई में घुस के एक गिलास पानी तक नहीं लिया था| खेर खाना खा कर मैं और ऋतू छत पर बैठे थे क्योंकि लाइट अभी तक नहीं आये थे| तभी सब अपने-अपने बिस्तर ले कर ऊपर आ गए| एक कोने में सारे आदमी लेट गए और दूसरे कोने में सारी औरतें लेट गईं| मेरा बड़ा मन कर रहा था की ऋतू को कस कर अपनी बाहों में प्यार करूँ पर सब के रहते ये नामुमकिन था| करवटें बदलते हुए सो गया और सुबह जल्दी उठ गया| पांच बजे नाहा धो कर तैयार होगया| ठीक 6 बजे में निकलने लगा क्योंकि मुझे सीधा ऑफिस जाना था तो ऋतू ने मेरे लिए दोपहर का खाना पैक कर दिया| बुधवार को ऋतू को 'लिवाने' का वादा कर मैं घर से निकला, आँखों में उसकी वही हँसती हुई तस्वीर थी| सीधा उसी ढाबे पर रुका और अपना फ़ोन चार्जिंग पर लगाया क्योंकि घर में लाइट तो आई नहीं थी| चाय पी कर वहाँ से निकला, घडी में 9 बजे थे
की मैडम के ताबड़तोड़ कॉल आने लगे| मैंने बाइक साइड खड़ी की और फ़ोन चेक किया तो मैडम के कल से अभी तक 50 कॉल आये थे| इससे पहले की मैं कॉल करता उनका ही फ़ोन आ गया; "मानु जी!!!! आप कहाँ हो?" उन्होंने घबराते हुए कहा| "Mam रास्ते में हूँ..." आगे मैं कुछ बोल पाता उससे पहले ही मैडम ने कहा: "आप सीधा फॅमिली कोर्ट आना, कोर्ट नंबर 5!!!" इतना कह कर उन्होंने फ़ोन काट दिया| ये सुन कर मैं परेशान हो गया की भला उन्होंने मुझे कोर्ट क्यों बुलाया है? माने उन्हें दुबारा कॉल मिलाया तो फ़ोन स्विच ऑफ बता रहा था| अब मरते क्या न करते मैं कोर्ट की तरफ चल दिया|
update 43
बेमन से फॅमिली कोर्ट पहुंचा और मन में हो रही उथल-पुथल को काबू करते हुए मैं कोर्ट नंबर 5 ढूँढने लगा| बहुत पूछने पर पता चला ये तो मेडिएशन वाला कोर्ट है, और उसके बाहर ही मुझे सर और अनु मैडम दिखे| दोनों के घरवाले और वकील वहाँ खड़े थे और सब मुझे ही देख रहे थे| मुझे तो समझ ही नहीं आया की में क्या कहूँ और किसके पास जाऊँ? ये तो मैं समझ ही चूका था की दोनों यहाँ डाइवोर्स के लिए आये हैं पर जाऊँ किसके पास? तभी अनु मैडम मेरे पास आईं और मुझे अपने माँ-पिताजी से मिलवाया; "डैड ये हैं मानु जी|" मैंने हाथ जोड़ कर उन्हें नमस्ते की और साथ ही उनकी वाइफ मतलब अनु मैडम की माँ को भी नमस्ते कहा पर दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला| इधर सर के घरवाले मुझे बड़ी कोफ़्त की नजर से देख रहे थे और कुछ बोलने ही वाले थे की अंदर कमरे में सब को बुलाया गया| मैडम ने मुझे भी अपने साथ बुलाया, अंदर एक लम्बा सा कॉन्फ्रेंस टेबल था, जिसके एक तरफ दो लोग बैठे थे, शायद वो मीडिएटर थे| उनके दाहिने तरफ सर, उनका वकील और उनके परिवार वाले बैठ गए, दूसरी तरफ मैडम, उनकी वकील और उनके माता-पिता बैठ गए, मैं लास्ट वाली कुर्सी पर बैठ गया| सबसे पहले सर के वकील ने मेरी तरफ ऊँगली करते हुए कहा; "ये लड़का जिसका नाम मानु है, इसका मेरी मुवकिल की पत्नी से नाजायज संबंध है|" ये सुनते ही मेरे जिस्म में आग लग गई और मैं एक दम से उठ खड़ा हुआ और जोर से बोला; "ये क्या बकवास है? आपकी हिम्मत कैसे हुई मुझ पर ऐसा गन्दा इल्जाम लगाने की?" मेरी आवाज सुन कर अनु मैडम की वकील बोल पड़ी; "मानु .. प्लीज आप चुप हो जाओ|" मैं बाहर जाने लगा तो मैडम ने दबे होठों से 'प्लीज' कहा इसलिए मैं गुस्से में बैठ गया| "सिर्फ यही नहीं ये लड़का इनके (अनु मैडम) साथ मुंबई भी गया था, वो भी अकेला!" सर का वकील बोला अब ये तो मेरे लिए सुन्ना मुश्किल था इसलिए मैं तमतमाते हुए बोला; "मुंबई जाने का प्लान इन्होने (सर ने) ही बनाया था और टिकट्स अपनी और मेरे नाम की बुक की थीं, जब मैं स्टेशन पहुंचा तो वहां जा के पता चला की इनकी जगह Mam जा रहीं हैं| इसमें मैं क्या करता?" मेरा जवाब सुनते ही सर मुझे घूर के देखने लगे और ये मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ; "क्या घूर रहा है? I’m not your employee anymore! I Quit!!!” "मानु..
.प्लीज चुप हो जाओ!" मैडम की वकील ने मिन्नत करते हुए कहा|
"बहुत पर निकल आये हैं तेरे? तू क्या Quit करेगा साले मैं तुझे निकालता हूँ जॉब से और देखता हूँ कैसे तुझे कोई जॉब देगा|" सर ने मुझे धमकाते हुए कहा|
"तू मुझे निकालेगा? मेरी जॉब में रोड अटकाएगा? रुक तू बताता हूँ तुझे! जाता हूँ मैं इनकम टैक्स ऑफिस में और बताता हूँ जो तू शुक्ल से फ़र्ज़ी बिल भरवाता है, अपने ही क्लाइंट्स को ओवरचार्ज करता है| एक-एक का रिकॉर्ड है मेरे पास और जो तू ने इन्वेस्टर्स से अपनी मनमानी कंपनी में पैसे लगवाया है न उन्हें भी मैं जा के बता के आता हूँ| ना तू मुझे इसी कोर्ट के चक्कर काटता हुआ मिला ना तो बताइओ|" मैं सर को करारा जवाब दिया जिससे उनकी बोलती बंद हो गई| मैडम की वकील साहिबा उठीं और मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे चुप-चाप बैठने को कहा| अब तो उन्हें बोलने के लिए और भी पॉइंट मिल गया था|
सर के वकील ने कुछ फोटोज जज साहब को दिखाईं, ये फोटोज वो थी जब मैंने मैडम को उस दिन बाइक पर GSTऑफिस तक छोड़ा था और हम जब गलौटी कबाब खा रहे थे| जज साहब ने वो तसवीरें मैडम के वकील को दिखाईं और वो तसवीरें मैडम ने भी देखि| "इससे क्या साबित होता है? क्या एक लड़का एक लड़की को लिफ्ट नहीं दे सकता? या उसके साथ कुछ खा नहीं सकता?" मैडम की वकील ने पुछा|
"अपनी मैडम को कौन लिफ्ट देता है? और ऑफिस hours में चाट कौन खाता है?" सर के वकील ने पुछा|
"तो कानून की कौन सी किताब में लिखा है की आप बॉस की बीवी को लिफ्ट नहीं दे सकते? चाट खाने का भी कोई टाइम-टेबल होता है? कैसी छोटी सोच रखते हैं आप?" वकील साहिबा ने पुछा|
"उस दिन मैंने ही मानु जी से कहा था की वो मुझे GSTऑफिस छोड़ दें और चूँकि लंच टाइम हो गया था तो हम 'कबाब' खा रहे थे| मुझे नहीं पता था की कुमार (सर) ने मेरे पीछे जासूस छोड़ रखे हैं!" मैडम ने सफाई दी| इसी बीच मैंने टेबल पर से एक कोरा कागज उठाया और अपना रेसिग्नेशन लेटर लिखने लगा;
Date: 21/09/2019
Mr. Kumar,
I’m writing you to inform of my resignation effective immediately. The time spent working for you has been a colossal waste of my time.
Your business is the most corrupt and fraud company I can imagine, and it is absolutely amazing that it continues to hang on!
Please send my final paycheck at my home address mentioned below:
House no. XXX
XXXX Colony
XXXXXXXXXX
Manu
मैडम की वकील साहिबा कुछ कहने ही वालीं थीं की मैंने अपना रेसिग्नेशन लेटर सर की तरफ सरका दिया, सब के सब उसी कागज की तरफ देखने लगे| मैंने अपने पेन का कैप बंद किया और अपनी जेब में रख लिया| "ये क्या है?" सर के वकील ने जानबूझ कर पुछा|
"मेरा रेसिग्नेशन लेटर!" मैंने जवाब दिया तो सब के सब मुड़ के मेरी तरफ देखने लगे|
"ये तुम बाद में भी तो दे सकते हो?" सर का वकील बोला|
"मैं दुबारा इनकी शक्ल नहीं देखना चाहता, इसलिए यहीं दे रहा हूँ| मेरी फाइनल पेमेंट का चेक मुझे भिजवा दीजियेगा|" मैंने सर की तरफ देखते हुए कहा|
"Mr.
Manu behave yourself!" जज साहब ने मुझे चेतावनी देते हुए कहा और मैं भी चुप हो गया| "देख रहे है जज साहब, इस लड़के को रत्ती भर भी तमीज नहीं की कोर्ट में कैसे बेहवे किया जाता है!" सर के वकील ने तंज कस्ते हुए कहा|
"ये उसका रोज का काम नहीं है, पहली बार आया है कोर्ट में|" मैडम के वकील साहिबा ने मेरा बचाव करते हुए कहा| "जज साहब मैं आपका ध्यान इन कॉल लिस्ट्स की तरफ लाना चाहती हूँ|" ये कहते हुए उन्होंने जज साहब को एक कॉल लिस्ट की कॉपी दी और दूसरी कॉपी उन्होंने सर के वकील की तरफ बढ़ा दी| "इसमें जो नंबर मार्क कर रखा है ये किसका है? किस्से ये घंटों तक बातें करते हैं?" वकील साहिबा ने पुछा|
"वो...क..कुछ बिज़नेस रिलेटेड कॉल था|" सर ने हिचकते हुए जवाब दिया| ये सुन कर मैडम बरस पड़ीं; "झूठ तो बोलो मत! रात के एक बजे कौन इतनी लम्बी-लम्बी बातें करता है? जज साहब ये नंबर इनकी 'प्रियतमा' का है| जिसका नाम है जास्मिन! शादी से पहले का इनका प्यार!" अब ये सुनते ही दोनों परिवारों की आँखें चौड़ी हो गईं| | वकील साहिबा ने फाइल से जास्मिन की पिक्चर निकाल कर सर से पुछा की ये कौन है? उन्होंने बस उस लड़की को पहचाना पर अपने रिश्ते से साफ़ मना करते रहे| "इस नंबर पर कॉल करो और हम सब से बात कराओ|" जज साहब ने सर को डराया तो उन्होंने बात काबुली की वो जास्मिन से बात करते हैं पर उनके वकील ने सर का एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की बात नहीं कबूली| "जज साहब! हमारी शादी को 4 साल हो चुके हैं, पर इन चार सालों में एक पल के लिए भी मुझे इनका साथ या प्यार नहीं मिला| मिलता भी कैसे? इनके मन मंदिर में तो जास्मिन बसी थी, शादी की रात ही इन्होने मुझे अपने और जास्मिन के बारे में बताया| उस दिन से ले कर आज तक प्यार के दो पल मुझे नसीब नहीं हुए, ऐसा नहीं है की मैंने कोई कोशिश नहीं की! पर ये हमेशा ही मुझसे दूर रहते थे, हमेशा फ़ोन पर या ऑफिस के काम में बिजी रहते| मुझे भी इन्होने जबरदस्ती ऑफिस में बुलाना शुरू कर दिया और काम में बिजी कर दिया ताकि मेरा ध्यान इन पर ना जाये| वो लड़की जास्मिन... उसने आज तक इनके लिए शादी नहीं की और मुझे पूरा यक़ीन है की इन दोनों एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर है क्योंकि ......
we haven't consummated this marriage!!!" ये कहते हुए मैडम रो पड़ीं|
पर अभी मैडम की बात पूरी नहीं हुई थी उन्होंने गुस्से से चिल्लाते हुए सर से कहा; "तुम्हारा मन इतना मैला है की तुमने दो दोस्तों की दोस्ती को गाली दी है! मैं और मानु जी बस अच्छे दोस्त हैं और दोस्ती कोई जुर्म नहीं!" जज साहब ने उन्हें शांत होने को कहा और पानी पीने को कहा|
"जज साहब हमारी माँग बस ये है की एक तो आप प्लीज मानु जी का नाम इस केस से clear कर दीजिये क्योंकि उनके खिलाफ कुमार के पास कोई भी conclusive evidence नहीं है| दूसरा मेरी मुवकिल को उचित मुआवजा मिले, वो चार साल जो इन्होने mental torture सहा है और ऑफिस में जो काम किया है उसके एवज में! तीसरा आप प्लीज इस डाइवोर्स को जल्द से जल्द फाइनल कीजिये क्योंकि मेरी मुवकिल बहुत मेन्टल स्त्री में हैं| बस इससे ज्यादा हमारी और कोई माँग नहीं है|" मैडम की वकील साहिबा ने कहा|
"देखिये मानु का नाम तो हम clear कर देते हैं पर इतनी जल्दी हम मुआवजे का फैसला नहीं कर सकते, पहले तो ये जास्मिन को यहाँ ले कर आइये उसके बाद हम फैसला करेंगे|" जज साहब ने अपना फैसला सुनाया और अगली डेट दे दी| सब के सब बाहर आगये पर मेरा तो खून खोल रहा था पर खुद को काबू कर के मैं अकेला खड़ा था और बस खुंदक भरी नजरों से सर को देख रहा था| मैं अगर कुछ भी बोलता या कहता तो मैडम के लिए बात बिगड़ सकती थी| तभी सर की माँ मेरे पास आईं; "तू ने हमारे परिवार की खुशियों में आग लगाईं है|" इससे पहले मैं कुछ जवाब देता मैडम ने तेजी से मेरे पास आईं और उन पर बरस पड़ीं; "कुछ नहीं किया इन्होने, आप को अपने बेटे की गलती नजर नहीं आती? मैंने जो अंदर कहा वो आपको समझ में नहीं आया ना? आपके बेटे ने शादी के बाद से मुझे छुआ तक नहीं है, यक़ीन नहीं आता तो चलो कौन सा टेस्ट करवाना है मेरा करवा लो!" मैडम गुस्से में चिल्लाते हुए बोलीं और ये सुन कर सर की माँ का सर झुक गया और वो कुछ नहीं बोलीं| इधर मैडम के आँसूँ निकल आये थे मैंने आगे बढ़ कर उन्हें संभालना चाहा पर उनके माता-पिता आगे आगये और उनके कंधे पर हाथ रख कर उनको चुप करने लगे| मैडम ने मेरे हाथों को नोटिस कर लिया था जो उन्हें संभालने को आगे बढे थे पर वो कुछ बोलीं नहीं, क्योंकि उनका कुछ भी कहना या करना उनका केस बिगाड़ सकता था|
मैडम ने अपने आँसु पोछे; "सॉरी मानु! मेरी वजह से तुम्हें कोर्ट तक आना पड़ा| पिछली हियरिंग में जज साहब ने मेडिएशन के लिए बुलाया था और कुमार के वकील ने तुम्हारा नाम लिया था इसलिए तुम्हें परेशान किया|"
"Its okay mam!!! Just lemme know if you need my help.
" अब मैं इससे ज्यादा और क्या कहता इसलिए मैं बस वहाँ से चल दिया| मैं कुछ दूर आया था की मुझे रोहित मिल गया| रोहित कोर्ट में किसी वकील के पास असिस्टेंट था, उसने मुझसे वहाँ आने का कारन पुछा तो मैंने ये कह कर बात टाल दी की वो मैडम का केस था, इतना कह कर मैं बाहर आ गया| अब मुझ पर नई जॉब ढूँढने का प्रेशर बन गया था| मैं सीधा घर आया और पहले बैठ कर चैन से सांस ली और सोचने लगा की आगे क्या करूँ? बैंक कितने पैसे बचे हैं ये चेक किया और फिर हिसाब लगाने लगा की कितने दिन इन पैसों से गुजारा होगा| शुक्र है की मेरी बुलेट की EMI खत्म हो चुकी थी! मैं इंटरनेट पर जॉब सर्च करने लगा| इधर मेरे पास जो ऋतू का फ़ोन था वो बज उठा| ऋतू जब भी गाँव जाती थी तो अपना फ़ोन मुझे दे देती थी ताकि वहाँ किसी को पता ना चल जाए| ये किसी और का नहीं बल्कि काम्या का फ़ोन था, पर मेरे उठाने से पहले ही वो स्विच ऑफ हो गया| ऋतू जाने से पहले फ़ोन स्विच ऑफ करना भूल गई थी इसलिए बैटरी डिस्चार्ज हो गई| तब मुझे याद आया की मुझे ऋतू के ये सब बता देना चाहिए पर बताऊँ कैसे? मैंने माँ के फ़ोन पर कॉल किया तो उन्होंने फ़ोन नहीं उठाया| अब मैं और कुछ भी नहीं कर सकता था, न ही घर पर बता सकता था की मैं जॉब छोड़ रहा हूँ वरना वो सब मुझे घर बिठा देते| वो पूरा दिन मैं बस ऑनलाइन जॉब ढूँढता रहा और ऑनलाइन अपने रिज्यूमे पोस्ट करता रहा| रात में एक लिस्ट बनायीं जहाँ सुबह इंटरव्यू के लिए जाना था| टेंशन एक दम से मेरे ऊपर सवार हुआ की मन किया की एक सिगरेट पी लूँ पर ऋतू को किया हुआ वादा याद आ गया| ब्रेड-बटर खा कर सो गया और सुबह जल्दी से तैयार हो गया, हयात नगर में एक छोटे ऑफिस के लिए निकला| वहाँ पहुँच कर देखा तो दो कमरों का एक ओफिस जहाँ सैलरी के नाम पर मुझे बस दस हजार मिलने थे| अब 8,000/- का रेंट भरने के बाद बचता क्या ख़ाक! वहाँ से मायूस लौटा और बिस्तर पर लेट गया| अगले दिन उठा और कुछ प्लेसमेंट एजेंसी गया और वहाँ अपने रिज्यूमे दिया और फिर वापस आया, पर अब दिल बेचैन होने लगा था| ऋतू की बहुत याद आ रही थी और साथ ही ये एहसास हुआ की शादी के बाद मेरी जिम्मेदारियाँ और भी बढ़ जाएँगी| ये सोच-सोच कर मैं टेंशन में डूब गया, गुम-सुम बैठा मायूस होगया| दिल ने बहुत हिम्मत बटोरी और होंसला दिया की इस तरह हार मान ली तो ऋतू का क्या होगा| मुझे पॉजिटिव रहना चाहिए इसी जोश से मैं उठा और नाहा-धो कर तैयार हो गया और ऋतू को लेने घर के निकल पड़ा|
घर पहुँचते-पहुँचते रात हो गई, ठीक दस बजे मेरी बुलेट की आवाज सुन कर ऋतू दौड़ी-दौड़ी आई और उसने दरवाजा खोला| उसे देखते ही मेरी साड़ी टेंशन्स फुर्र हो गईं, मैंने आँखों के इशारे से उससे पुछा की सब कहाँ हैं तो उसने कहा की सब सो लेट गए| मैंने तुरंत बाइक दिवार के सहारे खड़ी की और जा कर ऋतू को अपने सीन से लगा लिया| ऋतू भी कस कर मुझसे लिपट गई; "आपको बहुत मिस
किया मैंने!" ऋतू ने खुसफुसाते हुए कहा| "मैंने भी...." बस इससे ज्यादा कहने को मन नहीं किया| हम अलग हुए और मैंने जा कर बाइक को स्टैंड पर लगाया और लॉक कर के अंदर आया| ऋतू ने दरवाजा बंद किया और बिना कहे ही खाना परोस कर ले आई| वो जानती थी की मैंने खाना नहीं खाया है, मैंने आंगन में पड़ी चारपाई खींची और रसोई के पास ले आया| ऋतू कुर्सी पर बैठी थी और मैं चारपाई पर बैठा था, खाने में ऋतू ने मेरे पसंद के दाल-चावल और करेले बनाये थे| वो अपने हाथों से मुझे खिलाने लगी, मुझे खिलाने में उसे जो आनंद आरहा था ठीक वैसे ही आनंद मुझे उसके हाथ से खाने में आ रहा था| "तुमने खाया?" मैंने पुछा तो ऋतू ने बस सर हाँ में हिलाया| मैं समझ गया था की घर में सब के डर के मारे उसने खाना खा लिया होगा| पूरा खाना खा कर ऋतू बर्तन रखने गई तो थोड़ी आवाज हुई जिससे ताई जी उठ गईं और मुझे आंगन में बैठा देख कर पूछने लगी; "तू कब आया?" मैंने बताया की अभी 20 मिनट हुए आये हुए| उन्होंने ऋतू को आवाज मारी और ऋतू रसोई से निकली; "लड़के को खाना दे|" तो मैंने खुद ही कहा; "खाना खा लिया ताई जी|" ये सुन कर ताई जी बोलीं; "चलो इतनी तो अक्ल आ गई इसमें (ऋतू में)| चल अब आराम कर|" इतना कह कर ताई जी सोने चली गईं, मैं और ऋतू नजरें बचाते हुए हाथ में हाथ डाले ऊपर आ गए| चूँकि मेरा कमरा पहले आता था तो मैं ने ऋतू को पकड़ के अंदर खींच लिया| मेरे कुछ कहने या करने से पहले ही ऋतू अपने पंजों के बल खड़ी हुई और मेरे होठों को चूम लिया| मैंने अपने दोनों होठों से ऋतू के निचले होंठ को मुँह में भर लिया और उसे चूसने लगा| अभी हम kiss करते हुए दो मिनट ही हुए की मुझे लगा की कोई आ रहा है तो मैं और ऋतू दोनों अलग हो गए पर प्यास हमारे चेहरे से झलक रही थी| बेमन से ऋतू अपने कमरे में गई और मैं भी बिना कपडे बदले बिस्तर पर लेट गया| नींद थी की आने का नाम ही ले रही थी, मैं आधे घंटे बाद उठा और ऋतू के कमरे के बाहर खड़ा हो गया| पर कमरा अंदर से बंद था, एक बार को तो मन किया की दरवाजा खटखटाऊँ पर फिर रूक गया ये सोच कर की ऋतू ने दिन भर बहुत काम किया होगा और बेचारी तक कर सो रही होगी| मैं छत पर चला गया और एक किनारे जमीन पर बैठ गया और रात के सन्नाटे में सर झुकाये सोचने लगा| रात बड़े काँटों भरी निकली ...
सुबह की पहली किरण के साथ ही मैं उठ गया और नीचे आकर फ्रेश हो गया| नहाने के समय मैं सोच रहा था की मैं ऋतू को ये सब कैसे बताऊँ? वो ये सुन कर परेशान हो जाती पर उससे छुपाना भी ठीक नहीं था| सात बजे तक मैंने और घर के सभी लोगों ने खाना खा लिया था और हम दोनों शहर के लिए निकल पड़े| हमेशा की तरह घर से कुछ दूर आते ही ऋतू मुझसे चिपक कर बैठ गई और अपने ख़्वाबों की दुनिया में खो गई| हमेशा ही की तरह हम उस ढाबे पर रुके और चाय पीने बैठ गए| तब मैंने ऋतू को सारी बातें बता दी और वो अवाक सी मेरी बातें सुनती रही| मेरे जॉब छोड़ने के डिसिशन से वो सहमत थी पर नै जॉब मिलने के बारे में सोच वो भी काफी टेंशन में थी| "जान! छोडो ये टेंशन ओके? अब ये बताओ की आज शाम का क्या प्लान है?" मैंने बात घुमाते हुए कहा पर ऋतू का मन जैसे उचाट होगया था|
फिर कुछ सोचते हुए बोली; "आपके पास अभी कितने पैसे हैं बैंक में?"
"35,000/-" मैंने कहा|
"ठीक है, आज से फ़िज़ूल खर्चे बंद! बाहर से खाना-खाना बंद, आप को बनाने में दिक्कत होती है तो मुझे कहो मैं आ कर बना दिया करूँगी| बाइक पर घूमना बंद! मुझसे मिलने आओगे तो बस से आना! मेरे लिए आप कोई भी खरीदारी नहीं करोगे! जब तक आपको अच्छी जॉब नहीं मिलती तब तक ये राशनिंग चलेगी|" ऋतू ने किसी घरवाली की तरह अपना हुक्म सुना दिया| मैंने भी मुस्कुराते हुए सर झुका कर उसकी हर बात मान ली| चाय पी कर हम उठे और वापस शहर की तरफ चल दिए| पहले ऋतू को कॉलेज ड्राप किया और फिर घर आ गया| घर में घुसा ही था की मैडम का फ़ोन आ गया| उन्होंने मुझे मिलने के लिए एक कैफ़े में बुलाया और साथ अपना लैपटॉप भी लाने को कहा| मैंने अपना लैपटॉप बैग उठाया और पैदल ही चल दिया, वो कैफ़े मेरे घर से करीब 20 मिनट दूर था तो सोचा पैदल ही चलूँ| वहाँ पहुँचा तो मैडम ने हाथ हिला कर मुझे एक टेबल पर बुलाया| मेरे बैठते ही उन्होंने मेरे लिए एक कॉफ़ी आर्डर कर दी| "वो डेड लाइन नजदीक आ रही है और अब तो कोई है भी नहीं मेरी मदद करने वाला, तो प्लीज मेरी मदद कर दो|"
"ok mam!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा तो मैडम बोलीं; "अब काहे की mam?! अब ना तो मैं बॉस हूँ और न तुम एम्प्लोयी, मैंने यहाँ तुम्हें फ्रेंड के नाते बुलाया है| Call me अनु!" अब ये सुन कर तो मैं चुप हो गया और मैडम मेरी झिझक भाँप गईं; "Come on yaar!"
"इतने सालों से आपको Mam कह रहा हूँ की आपको अनु कहना अजीब लग रहा है!" मैंने कहा|
"पर अब इस फॉर्मेलिटी का क्या फायदा? हम अच्छे दोस्त हैं और वही काफी है, ख़ामख़ा उसमें फॉर्मेलिटी दिखाना भी तो ठीक नहीं?!"
"ठीक है अनु जी!" मैंने बड़ी मुश्किल से शर्माते हुए कहा|
"अनु जी नहीं...
सिर्फ अनु! और मैं भी अब से तुम्हें मानु कहूँगी! और प्लीज अब से मेरे साथ दोस्तों जैसा व्यवहार करना|" मैडम ने मुस्कुराते हुए कहा| ओह! I mean अनु ने मुस्कुराते हुए कहा!
शाम तक हम दोनों वहीँ कैफ़े में बैठे रहे और काम करते रहे| दोपहर को खाने के समय अनु ने ग्रिल्ड सैंडविच और कॉफ़ी मंगाई और अब बस प्रेजेंटेशन का काम बचा था| मैं चलने को हुआ तो अनु ने मेरा हाथ पकड़ के रोक लिया; " तुम्हें पता है, डाइवोर्स को ले कर किसी ने भी मुझे सपोर्ट नहीं किया| मेरे अपने मोम-डैड ने भी ये कहा की जैसे चल रहा है वैसे चलने दे! बस एक तुम थे जिसने मुझे उस दिन सपोर्ट किया| मेरे लिए तुम कोर्ट तक आये और वहाँ तुम पर कितना घिनोना इल्जाम भी लगाया गया .... You even quit your job because of me!" इतना कह अनु रोने लगीं तो मैंने उन्हें सांत्वना देने के लिए उनके कंधे को छुआ और धीरे से दबा कर उन्हें ढाँढस बंधाने लगा| "अगर अब भी रोना ही है तो डाइवोर्स के लिए क्यों लड़ रहे हो? रो तो आप पहले भी रहे थे ना?" ये सुन कर उन्होंने अपने आँसु पोछे और मेरी तरफ एक recommendation letter बढ़ा दिया| मैंने उसे पढ़ा और उनसे पूछ बैठा; "आपने ये कब...आपकी अपनी कंपनी?"
"उस दिन जब तुम मुझे GST ऑफिस छोड़ने गए थे उस दिन मैं अपनी कंपनी के GST नंबर के लिए अप्लाई किया था| कुमार के साथ काम कर के इतना तो सीख ही गई थी की पैसे की क्या एहमियत होती है और इस प्रोजेक्ट ने मुझे काफी self confidence दे दिया| अब तुम अपने रिज्यूमे में मेरी कंपनी का नाम लिख दो और ये recommendation letter शायद तुम्हारे काम आ जाये|"
"थैंक यू!!!" मैं बस इतना ही कह पाया|
"काहे का थैंक यू? जॉब मिलने के बाद पार्टी चाहिए!" अनु ने हँसते हुए कहा| मैं भी हँस दिया और फिर वहाँ से सीधा ऋतू से मिलने कॉलेज निकला| ऋतू गुस्से से लाल बाहर निकली और उसके पीछे ही काम्या भी आती हुई दिखाई दी| गेट पर पहुँच कर ऋतू मेरे पास आई और काम्य दूसरी तरफ जाने लगी तभी ऋतू चिल्लाते हुए उससे बोली; "दुबारा मेरे आस-पास भी दिखाई दी ना तो तेरी चमड़ी उधेड़ दूँगी!" ये सुन कर मैं हैरान था की अब इन दोनों को क्या हो गया उस दिन का गुस्सा अब तक निकल रहा है?! "क्या हुआ?" मैंने ऋतू से पुछा| "ये हरामजादी मुझसे हमदर्दी करने के लिए आई और बोली की आपका अनु मैडम से अफेयर चल रहा है और आपके कारन उनका डाइवोर्स हो रहा है| कुतिया ...छिनाल साली!" अब ये सुन कर मैं समझ गया की ये लगाईं-बुझाई सब रोहित की है| "बस अभी शांत हो जा...
कल बता हूँ मैं इसे!" मैंने ऋतू को शांत किया, उस ले कर चाय की एक दूकान पर आ गया और उसे चाय पिलाई ताकि उसका गुस्सा शांत हो| फिर मैंने उसे आज के बारे में सब बताया| जो बात मुझे महसूस हुई वो ये थी की उसे अनु बिलकुल पसंद नहीं, क्योंकि ऋतू के अनुसार मन ही मन वो ही मेरी नौकरी छोड़ने के लिए जिम्मेदार थीं| मैं भी चुप रहा क्योंकि मैं खुद नहीं जानता था की जो हो रहा है वो किसका कसूर है! अनु को डाइवोर्स चाहिए था वो तो ठीक है पर मेरा नाम उसमें क्यों घसींटा गया? ना तो मैंने उनसे दोस्ती करने की पहल की थी ना ही उनके नजदीक जाने की कोई कोशिश की थी| खेर ऋतू से कुछ बातें कर मैंने उसे हॉस्टल छोड़ा और खुद घर लौटा और खाना बनाने की तैयारी कर रहा था| पर एक तरह की बेचैनी थी, ऋतू के साथ को मिस कर रहा था|
update 44
दो दिन बीते और इन दो दिनों में मेरा और ऋतू का मिलना बदस्तूर जारी रहा| रात को ऋतू फ़ोन कर के पूछती की कल सुबह आप कहाँ इंटरव्यू देने जा रहे हो और अगले दिन सुबह मुझे Best of Luck wish करती, दोपहर को ये पूछती की इंटरव्यू कैसा रहा और शाम को हम मिलते| शुक्रवार को जब मैं उससे मिल कर लौटा तो रात को ऋतू का फ़ोन आया और मुझसे उसने शनिवार का प्लान पुछा| पर उस दिन मेरा कोई इंटरव्यू नहीं था इसलिए मैं घर पर ही रहने वाला था| मुझसे शाम का मिलने का वादा लिया और ऋतू खाना खाने चली गई| मैं भी अपना खाना बनाने में लग गया| बीते कुछ दिनों में कम से कम मैं खाना ढंग से खा रहा था, वरना तो रोज कच्चा-पक्का बना कर खा लिया करता था, बस एक बात थी, रात में बड़ी बेचैनी रहती थी! अगली सुबह मैं देर से उठा क्योंकि रात भर नींद ही नहीं आई| सुबह के दस बज होंगे की दरवाजे पर दस्तक हुई, मैं उठा और दरवाजा खोला| अभी ठीक से देख भी नहीं पाया था की ऋतू एक दम से अंदर आई और मेरे सीने से कस कर लिपट गई| उसके गर्म एहसास ने मेरी नींद भगा दी और मैं भी उसे कस कर गले लगा कर उसके सर को चूमने लगा| आखिर ऋतू मुझसे अलग हुई और दरवाजा बंद किया; "आप बैठो मैं चाय बनाती हूँ|" ये कह कर वो चाय बनाने लगी| चाय के साथ-साथ वो पोहा भी ले कर आई, ये पोहा उसने नाश्ते में न खा कर मेरे लिए लाई थी| "तो कोई कॉल आया?" ऋतू ने पुछा, उसका मतलब था की मैंने जहाँ-जहाँ इंटरव्यू दिए हैं वहां से कोई कॉल आया| "नहीं.... हाँ एक ऑफर आया है|" ये सुनते ही ऋतू खुश हो गई| "कितनी पे है?" उसने उत्साह से पुछा|
"35K ...
मतलब 35,000/-" अब मेरे मुँह से ये सुन कर ऋतू की खुशियों का ठिकाना नहीं रहा| पर जब मैंने आगे; "पर यहाँ नहीं बरैली जाना होगा!" कहा तो वो उदास हो गई| "मेरी जान! मैं नहीं जा रहा अपनी जानेमन को छोड़ कर|" मेरी बात से उसे तसल्ली हुई पर ख़ुशी नहीं| "चले जाओ ना! 35K कम नहीं होते!" ऋतू ने अपने मन को मारते हुए कहा| "सच में चला जाऊँ?" मैंने थोड़ा मस्ती करने के इरादे से कहा, ऋतू ने बस जवाब में सर हिला दिया| "पक्का?" मैंने फिर मस्ती करते हुए पुछा| "हाँ!!!! कौन सा हमेशा के लिए जाना है? 2 साल की ही तो बात है, फिर तो हम दोनों शादी कर लेंगे|" ऋतू ने बेमन से जवाब दिया और पूरी कोशिश की कि अपने मुँह पर नकली मुखौटा लगा ले| ऋतू उस समय मेरे सामने कुर्सी पर बैठी थी और मैं उसके सामने पलंग पर बैठा था| मैं उठा और जा के ऋतू को पीछे से अपने बाजुओं से जकड़ लिया और ऋतू के कान में होले से खुसफुसाया; "तुम्हें पता है पिछले कुछ दिनों से मुझे तुम्हारी 'लत' पड़ गई है| रात को बस तुम्हें ही याद करता रहता हूँ और तुम्हारी ही कमी महसूस करता हूँ, करवटें बदलता रहता हूँ| ऐसा क्या जादू कर दिया तुमने मुझ पर?" ये कहते हुए मैंने ऋतू के दाएँ गाल को चूम लिया| ऋतू उठ खड़ी हुई, मुझे बिस्तर तक खींच कर ले गई और मुझे अपने ऊपर झटके से खींच लिया| हम दोनों ही बिस्तर पर जा गिरे, नीचे ऋतू और उसके ऊपर मैं| हम दोनों ही की आँखों में प्यास झलक रही थी| मैंने ऋतू की होठों को अपनी गिरफ्त में लिया और उनको चूसने लगा और इधर ऋतू के दोनों हाथ मेरी टी-शर्ट उतारने के लिए मेरी पीठ पर चल रहे थे| तभी अचानक से अनु का फ़ोन बज उठा, मैंने ऋतू को होठों को छोड़ा और स्क्रीन पर किसका नाम है ये देखा| मैंने कॉल साइलेंट किया और ऋतू की आँखों में देखा तो उसमें एक चिंगारी नजर आई| ऋतू ने करवट ले कर मुझे अपने बगल में गिरा दिया और खुद मेरे ऊपर चढ़ गई| उसने बहुत तेजी से मेरे होठों पर हमला किया और उसे चूसने लगी| आज उसका मुझे kiss करना बहुत आक्रामक था| मैं अपने दोनों हाथों से ऋतू का चेहरा थामना था पर ऋतू बार-बार अपनी गर्दन कुछ इस तरह हिला रही थी की मैं उसे थामने में असफल हो रहा था| उसका निशाने पर मेरे होंठ जिसे आज वो चूस के निचोड़ लेना चाहती थी| फिर अगले ऋतू मुझ पर से उतरी और अपने पटिआला का नाडा खोला और वो सरक कर नीचे जा गिरा, फिर उसने अपनी पैंटी निकाली और फटाफट मेरे लोअर को खींचा और उसे बिना पूरा निकाले बस लंड को बाहर निकाला| मैं उसे ये सब करता हुआ देख रहा था, वो फिर से मेरे ऊपर चढ़ गई और मेरे लंड को पकड़ के अपनी बुर पर टिकाया| धीरे-धीरे वो उस पर अपना वजन डालते हुए उसे अपनी बुर में समा ने लगी| दर्द की लकीरें उसके माथे पर छाईं थीं पर ऋतू अपने होठों को दबा के दर्द को अपने मुँह में होते नीचे आ रही थी| जैसे ही पूरा लंड अंदर पहुँचा की ऋतू की आँखें दर्द से बंद हो गईं, उसने अपने दोनों होठों
अब भी अपने मुँह में दबा रखे थे और अपनी चीख मुँह में दफन कर चुकी थी| लगभ मिनट भर लगा उसे मेरे कांड को अपनी बुर में एडजस्ट करने में और फिर अपने दोनों हाथ मेरी छाती पर टिका ऋतू ने ऊपर-नीचे होना शुरू किया| अगले पल ही उसकी स्पीड तेज हो चुकी थी और उसकी बुर अंदर ही अंदर मेरे लंड को जैसे चूसने लगी थी| मैं ऋतू की बुर का दबाव अपने लंड पर साफ़ महसूस कर रहा था, मेरा पूरा जिस्म एक डीएम से गर्म हो गया था मानो जैसे की उसकी बुर मेरे लंड के जरिये मेरी आत्मा को चूस रही हो| पाँच मिनट तक ऋतू जितना हो सके उतनी तेजी से मेरे लंड पर कूद रही थी और उसे निचोड़ रही थी| फिर अगले ही पल वो मुझ पर लेट गई और अपना सर मेरी छाती पर रख दिया| मैंने उसे नीचे किया, अपने घुटने बिस्तर पर टिकाये और तेजी से कमर हिलाना शुरू कर दिया| हर धक्के के साथ मेरी स्पीड बढ़ने लगी, ऋतू ने अपने दोनों हाथों से मेरा चेहरा थाम लिया और मेरी आँखों में देखने लगी| आज मैं पहली बार उसकी आँखों में एक आग देख पा रहा था, मुझे ऐसे लगने लगा जैसे वो यही आग मेरे जिस्म लगाना चाहती हो| ऋतू बिना पलकें झपके मेरी आँखों में देख रही थी, उसके मुँह से कोई सिसकारी नहीं निकल रही थी बस एक टक वो मेरी आँखों में झाँकने में लगी थी| हर धक्के के साथ उसका जिस्म हिल रहा था और नीचे उसकी बुर भी पूरी प्रतिक्रिया दे रही थी पर ऋतू की आँखें मेरी आँखों में गड़ी थी| पाँच मिनट होने को आये थे और अब ऋतू छूटने की कगार पर थी, तभी उसने अपनी पकड़ मेरे चेहरे पर कड़ी कर दी और मेरी आँखों में गुस्से से चिल्लाती हुई बोली; “You’re bloody mine!” इतना कहते हुए वो झड़ गई, उसके हाथों से मेरा चेहरा आजाद हुआ और इधर आखरी झटका मारता हुआ मैं भी उसकी बुर में झड़ गया और ऋतू के ऊपर से लुढ़क कर बगल में गिर गया|
सासें दुरुस्त होने तक मेरे दिमाग बस ऋतू के वो शब्द ही घूम रहे थे, मैं समझ गया था की उसके मन में अब भी मुझे ले कर insecurity थी! पर मेरे कुछ कहने से पहले ही ऋतू मेरी तरफ पलटी और अपना सर मेरी छाती पर रखते हुए बोली; "जानू....
" पर मैं ने उसकी बात काट दी और उसे खुद से दूर धकेला और उसके ऊपर आ गया| अब मेरी आँखों में भी वही आग थी जो कुछ पल उसकी आँखों में थी| "एक बार बोलूँगा उसे ध्यान से सुन और अपनी दिल और दिमाग में बिठा ले! मैं सिर्फ तेरा हूँ और तू सिर्फ मेरी है, हमारे बीच कोई नहीं आ सकता! समझ आया? आज के बाद फिर कभी तूने insecure फील किया ना तो खायेगी मेरे हाथ से!" मैंने गुस्से से अपने दाँत पीसते हुए कहा और जवाब में ऋतू ने अपनी दोनों बाहें मेरे गले में डाल दीं और मैंने उसे एक जोरदार Kiss किया! ये Kiss इस बात को दर्शा रहा था की मेरा उसके लिए प्यार अटूट है और चाहे कुछ भी होजाये ये प्यार कभी कम नहीं होगा| Kiss कर के में ऋतू के ऊपर से हटा और बाथरूम चला गया, मुँह-हाथ धो कर बाहर आया तो ऋतू खिड़की के सामने अपनी दोनों टांगें अपनी छाती से मोड बैठी बाहर देख रही थी| मैं उसके साथ खड़ा हो कर बाहर देखने लगा और ऋतू ने अपने बाएँ हाथ को मेरी कमर के इर्द-गिर्द लपेट कर मुझे अपने और नजदीक खींच लिया| “Go wash yourself!” मैंने कहा तो ऋतू उठी और मेरे सीने पर Kiss करके बाथरूम चली गई और मैं बाएँ हाथ से खिड़की को पकडे बाहर देखने लगा| ऋतू पीछे से आई और अपने गीले हाथों को मेरी छाती को जकड़ते हुए मुझसे सट कर खड़ी हो गई| मैं उसे अपने साथ बिस्तर पर ले गया और खींच कर उसे अपना ऊपर गिरा लिया, और हम ऐसे ही लेटे रहे| पूरी रात जिसने बड़ी मुश्किल से काटी हो उसके लिए तो ये पल खुशियों से भरा होगा| मुझे कब नींद आ गई कुछ होश नहीं रहा जब उठा तो कमरे में देसी घी की खुशबु फैली हुई थी| दाल रोटी खा कर हम दोनों खिड़की के सामने जमीन पर बैठे थे| ऋतू अपनी पीठ मेरे सीने से लगा कर बैठी थी;
ऋतू: आप वो बरैली वाली जॉब कर लो|
मैं: जान! आप जानते हो बरैली यहाँ से पाँच घंटे दूर है! फिर हम रोज-रोज नहीं मिल पाएंगे, सिर्फ एक संडे ही मिलेगा और उस दिन भी घर जाना पड़ गया तो?
ऋतू: थोड़ा एडजस्ट कर लेते हैं?
मैं: जान! एक आध दिन की बात नहीं है? यहाँ पर जॉब ओपनिंग कब खुलेगी कुछ पता नहीं है? और ये बताओ तब तक मेरे बिना आप रह लोगे?
ऋतू ये सुन कर खामोश हो गई!
मैं: मैं तो नहीं रह सकता आपके बिना| पता है पिछले कुछ दिनों से मेरा क्या हाल है आपके बिना? दिन तो जैसे-तैसे गुजर जाता है पर रात है की कमबख्त खत्म ही नहीं होती| मेरा दिल आपके जिस्म की गर्माहट पाने के लिए बेचैन रहता है| क्या जादू कर दिया तुमने मुझ पर?
ऋतू: ये मेरे प्यार का भूत है जो आपके जिस्म से चिपका हुआ है!
ऋतू ने हँसते हुए कहा| पर कुछ देर चुप रहने के बाद वो मुस्कुराते हुए बोली;
ऋतू: जानू दशेहरा आने वाला है|
मैं: हाँ तो?
ऋतू: फिर करवाचौथ आएगा....
इतना कह के ऋतू चुप हो गई और उसके पेट में तितलियाँ उड़ने लगीं| मैं समझ गया की उसका मतलब क्या है;
मैं: तो क्या चाहिए मेरी जानू को करवाचौथ पर? (मैंने ऋतू को कस कर अपनी बाहों में जकड़ते हुए कहा|)
ऋतू: बस आप!
मैं: मैं तो तुम्हारा हो चूका हूँ ना?
ऋतू: वो पूरा दिन मैं आपके साथ बिताऊँगी और उस दीं उपवास भी रखूँगी|
मैं: जो हुक्म बेगम साहिबा!
ये सुनते ही ऋतू खिलखिला कर हँस पड़ी| उसकी ये खिलखिलाती हँसी मुझे बहुत पसंद थी और में आँख मूंदें उसकी इस हँसी को अपनी रूह में उतारने लगा| पर अगले ही पल वो चुप हो गई और मेरी तरफ आलथी-पालथी मार के बैठ गई और मेरी आँखों में देखते हुए बोली;
ऋतू: I’m sorry जानू! मैंने उस टाइम आपको ..... वो सब कहा!
मैं: हम्म्म... कोई बात नहीं| I know तू मुझे ले कर कितना possessive है but तेरी insecurity मुझे बहुत गुस्सा दिलाती है|
ऋतू: मैं क्या करूँ? बहुत मुश्किल से मैंने अपनी इस insecurity को काबू किया था पर कुतिया (काम्या) की वजह से सब कुछ खराब हो गया! मुझे आप पर भरोसा है पर मुझे ये डर लगता है की अनु मैडम आपको मुझसे छीन लेगी| अब तो आपने उन्हें अनु भी कहना शुरू कर दिया! आपको पता है मुझे कितनी जलन होती है जब आप उसे अनु कहते हो? प्लीज मेरे लिए उससे मिलना बंद कर दो? मैंने आप से जो भी माँगा है आपने वो दिया है, प्लीज ये एक आखरी बार... प्लीज... मैं आगे से आपसे कुछ नहीं माँगूगी|
ऋतू ने रोते-रोते सब कहा और फिर आकर मेरे सीने से लग गई और रोती रही|
मैं: अनु के साथ बस एक आखरी प्रेजेंटेशन बाकी है उसके बाद वो अपने रास्ते और मैं अपने रास्ते|
ऋतू: उसके बाद आप उससे नहीं मिलोगे ना?
मैं: नहीं
ऋतू: Thank you!
तब जा कर ऋतू का रोना बंद हो गया| जब सुबह ऋतू ने मुझसे 'You’re bloody mine!' कहा था मैं तब ही समझ चूका था की उसकी insecurity कभी खत्म नहीं होगी| मैं चाहे उसे कितना भी समझा लूँ वो नहीं समझेगी और फिर कहीं वो कुछ उल्टा-सीधा न कर दे इसलिए मैंने उसकी बात मान ली थी| इतना प्यार करता था ऋतू से की उसके लिए एक दोस्ती कुर्बान करने जा रहा था! शाम को ठीक 6 बजे मैंने ऋतू को उसके हॉस्टल छोड़ा और घर आ गया| घर घुसते ही अनु का फ़ोन आ गया, उन्होंने मुझे प्रेजेंटेशन देने के लिए समय माँगा| मंडे का दिन फाइनल प्रेजेंटेशन था और उन्होंने मुझे ठीक ग्यारह बजे उसी कैफ़े में बुलाया| इधर मेरी मेल पर मुझे एक इंटरव्यू के लिए मंडे को बारह बजे बुलाया गया| इसलिए मैंने अनु को फ़ोन कर के प्रेजेंटेशन 10 बजे reschedule करवाई और वो मान भी गईं|
update 45
अगले दिन संडे था, मैं जानता था की ऋतू आज भी आएगी, मैं जल्दी उठा और नहा-धो के तैयार होगया और उसका इंतजार करने लगा| ठीक दस बजे दरवाजे पर दस्तक हुई और मैंने भाग कर दरवाजा खोला| सामने वही ऋतू का खिल-खिलाता चेहरा और उसके हाथ में एक थैली जिसमें अंडे थे! ऋतू सबसे पहले मेरे गले लगी और फिर हम ऐसे ही गले लगे हुए अंदर आये और
दरवाजा बंद किया| फिर ऋतू ने अंडे संभाल कर किचन काउंटर पर रख दिए; "आज आप मुझे ऑमलेट बनाना सिखाओगे!" उसने बड़ी अदा से कहा| मैंने ऋतू को पलटा और उसका मुँह किचन काउंटर की तरफ किया, इशारे से उसे प्याज उठाने को कहा और इस मौके का फायदा उठा कर उसकी कमर से होते हुए उसके पेट पर अपने हाथों को लॉक कर के अपने जिस्म से चिपका लिया| ऋतू की गर्दन को चूमते हुए मैंने उसे प्याज छीलने को कहा, फिर उसके गर्दन की दायीं तरफ चूमा और उसे प्याज काटने को कहा| प्याज काटते समय दोनों ही की आँखें भर आईं थीं! आँखों से जब पानी आने लगा तो हम दोनों हँस दिए और मैंने ऋतू को अपनी गिरफ्त से आजाद कर दिया| जैसे ही मैं जाने को मुड़ा तो ऋतू ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोली: "मुझे छोड़ कर कहाँ जा रहे हो आप?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा; "अपनी जानेमन को छोड़ कर कहा जाऊँगा?!" तो वो बोली; "जैसे पकड़ के खड़े थे वैसे ही खड़े रहो!" अब उसका आदेश मैं कैसे मना कर सकता था| मैं फिर से ऋतू के पीछे चिपक कर खड़ा हो गया और अपने हाथ फिर से उसके पेट पर लॉक कर लिए| प्याज कट गए थे अब मैंने उसे हरी मिर्च काटने को कहा; "कितनी मिर्च काटूँ?" ऋतू ने पुछा तो मैंने उसके दाएँ गाल से अपने गाल मिला दिए और कहा; "पिछले कुछ दिनों से जितनी तू स्पाइसी (spicy) हो गई है उतनी मिर्च काट!" ये सुन कर ऋतू धीरे से हँस पड़ी और उसने 3 मिर्चें काटी| अब बारी थी अंडे तोड़ने की जो ऋतू को बिलकुल नहीं आता था| मैंने पास ही पड़ी कटोरी खींची और स्पून स्टैंड से एक फोर्क निकाला| फिर मैंने पीछे खड़े-खड़े ऋतू को अंडा कैसे तोडना है वो सिखाया| फोर्क से धीरे से 'टक' कर के अंडे के बीचों बीच मारा और फिर अपने दोनों अंगूठों की मदद से अंडा तोड़ के कटोरी में डाल दिया| जब अंडे की जर्दी वाला हिस्सा ऋतू ने देखा तो उसके मुँह में पानी आ गया| "जान! अभी ये कच्चा है, स्मेल आएगी पाक जाने दो फिर खाना|" फिर ऋतू को अंडा फटने को कहा| पास ही पड़े कपडे से मैंने अपने हाथ पोंछें और फिर से ऋतू को पेट पर अपने हाथों को लॉक किया| अब माने ऋतू की गर्दन के हर हिस्से को चूमना शुरू कर दिया| हर बार मेरे गीले होंठ उसे छूटे तो वो सिंहर जाती और उसके मुँह से सिसकारी फूटने लगती| अंडा फिट गया था अब उसमें प्याज और मिर्च मिला के ऋतू ने पुछा की अब और इसमें क्या डालना है> मैंने उसे नमक डालने को कहा तो वो पूछने लगी की कितना डालूँ तो इसके जवाब में मैंने ऋतू के दाएँ गाल को पाने मुँह में भर उसे चूसा और छोड़ दिया| "बस इतना डाल!" ऋतू शर्मा गई और उसने थोड़ा नमक डाला| मैंने ऊपर शेल्फ पर पड़ी ऑरेगैनो सीज़निंग उठाई और एक चुटकी उसमें डाल दी| अब मैंने ऋतू को अपनी गिरफ्त से आजाद किया और गैस जलाई और उस पर फ्राइंग पैन रखा| ऋतू साइड में खड़ी मुझे देखने लगी, फिर मैंने उससे मख्हन लाने को कहा और वो फ्रिज से मक्खन ले आई| मक्खन फ्राइंग पैन में डाला तो वो
तुरंत ही पिघल गया, अब मैंने ऋतू से कहा की वो गौर से देखे, तो ऋतू किचन काउंटर पर बैठ गई| अंडे वाला घोल मैंने जैसे ही डाला उसकी खुशबु पूरे घर में फैलने लगी| जब पलटने की बारी आई तो मैंने फ्राइंग पैन को हैंडल से पकड़ा और उसे आगे-पीछे हिलाने लगा| फिर एक झटका दे कर मैंने पूरा ऑमलेट पलटा, थोड़ा बहुत छिटक कर नीचे गिर गया पर ऋतू इस प्रोफेशनल तरीके को देख खुश हो गई और उसे भी सिखाने को कहने लगी| ऑमलेट बन कर तैयार था; "पर ये तो मैं ही खा जाऊँगी? आप क्या खाओगे?" ऋतू ने किसी छोटे बच्चे की तरह कहा| "फ्रेंच टोस्ट खाओगी?" मैंने ऋतू से पुछा|
"वो क्या होता है?" ऋतू ने ऑमलेट की एक बाईट लेते हुए कहा| मैंने उसे ब्रेड और दूध ले के आने को कहा| ऋतू सब ले कर आ गई और फिर से काउंटर पर बैठ कर ऑमलेट खाने लगी| मैंने दूध और अंडे को मिक्स किया और उसमें हलकी सी चीनी और नमक-मिर्च मिला कर ब्रेड उसमें डूबा कर फ्राइंग पैन पर डाला| मीठी सी सुगंध आते ही ऋतू आँखें बंद कर के सूंघने लगी| "Wow!!!" ये कहते हुए उसकी आँखें चमक उठी! आधा ऑमलेट उसने मेरे लिए छोड़ दिया और मुँह में पानी भरे वो टोस्ट के बनने का इंतजार करने लगी|
टोस्ट रेडी होते ही मैंने उसे दिया तो उसने जल्दी-जल्दी से उस की एक बाईट ली; "मममम.....!!!" फिर उसने मेरे कंधे को पकड़ के अपने पास खींचा और मेरे दाएँ गाल को चूम लिया| "इतना अच्छा खाना बनाते हो आप? फिर बेकार में बाहर से क्यों खाना? आज से आप ही खाना बनाओगे!" ऋतू ने कहा|
"तुम साथ हो इसलिए इतना अच्छा खाना बन रहा है!" मैंने अगला टोस्ट फ्राइंग पैन में डालते हुए कहा|
"सच? तो शादी के बाद भी आप ही खाना बनोगे ना?" ऋतू ने मुझे ऑमलेट खिलाते हुए कहा|
"Why not?!!!"
"अच्छा जानू एक बात पूछूँ?"
"हाँ जी पूछो!" मैंने बहुत प्यार से कहा|
"मुझे ये प्रेगनेंसी वाली गोलियां कब टक खानी है?"
"जब तक हम शादी हो कर सेटल नहीं हो जाते तब टक!" मैंने एक और टोस्ट ऋतू की प्लेट में रखते हुए कहा|
"पर शादी के कितने महीने बाद?" ऋतू ने अपनी ऊँगली दाँतों तले दबाते हुए कहा| मैंने गैस बंद की और दोनों हाथों से उसके दोनों गाल खींचते हुए पुछा; "बहुत जल्दी है तुझे माँ बनने की?"
"हम्म...उससे ज्यादा जल्दी आपको पापा बनाने की है!"
"जब तक चीजें सेटल नहीं होती तब तक तो कुछ नहीं! I know .... painful है...
बूत कोई और चारा भी नहीं! घर से भाग कर नई जिंदगी शुरू करना इतना आसान नहीं|" इसके आगे मैं कुछ नहीं बोलै क्योंकि फिर ऋतू का मन खराब हो जाता| उसने भी आगे कुछ नहीं कहा, शायद वो समझ गई थी की बिना नौकरी के अभी ये हाल है तो शादी के बाद तो मेरी जिमेदारी बढ़ जाएगी! खेर हमने किचन में ही खड़े-खड़े नाश्ता किया और फिर कमरे में आ कर बैठ गए| मैंने ऋतू को चाय बनाने को कहा और मैं बाथरूम में घुस गया| तभी अचानक दरवाजे पर नॉक हुई और इससे पहले की मैं बाथरूम से निकल कर दरवाजा खोलता ऋतू ने ही दरवाजा खोल दिया|
सामने अरुण और सिद्धार्थ खड़े थे और उन्हें देखते ही ऋतू की सिटी-पिट्टी गुल हो गई| वो दोनों भी एक दूसरे को हैरानी से देखने लगे? इतने में मैं बाथरूम से बाहर आया और उन दोनों को अपने सामने दरवाजे पर खड़ा पाया और मुँह से दबी हुई आवाज में निकला; "oh shit!" ऋतू ने दोनों को नमस्ते कही और अंदर आने को कहा| दोनों अंदर आये तो ऋतू ने अपनई जीभ दांतों तले दबाई और होंठ हिलाते हुए मुझे सॉरी कहा| इधर अरुण और सिद्धार्थ मुझे देख कर हँस रहे थे, हाथ मिला कर हम गले मिले और दोनों बैठ गए| सिद्धार्थ ने मेरी तरफ एक कागज़ का एनवेलप बढ़ाया, मैंने वो खोल कर देखा तो उसमें मेरी सैलरी का चेक था| "ये सर ने दिया है!" सिद्धार्थ ने कहा और मैंने भी वो एनवेलप देख कर टेबल पर रख दिया|
"और बताओ क्या हाल-चाल?" मैंने पुछा|
"सब बढ़िया, पर तूने क्यों जॉब छोड़ दी?" अरुण ने पुछा|
"कुमार ने कुछ बोला नहीं?" मैंने पुछा तो दोनों ने ना में सर हिलाया| मैं बस मुस्कुराया और कहा; "यार ...उस साले की वजह से छोड़ी!" मैंने बात को हलके में लेते हुए कहा| इधर ऋतू पलट कर किचन में जाने लगी तो सिद्धार्थ ने मजाक करते हुए पुछा; "अरे रितिका जी! आप यहाँ कैसे?" ऋतू पलटी और शर्म से उसके गाल लाल थे! वो बस मुस्कुराने लगी और मेरी तरफ देखने लगी|
"यार जैसे तुम दोनों को मेरी जॉब का पता चला और तुम मुझसे मिलने आ गए वैसे ही जब 'इनको' पता चला की मैंने जॉब छोड़ दी है तो मुझे मिलने आ गईं!"
"अच्छा???" अरुण ने मेरी टांग खींचते हुए कहा| "पर हमें तो तेरा घर पता था, रितिका जी को कैसे पता चला?" अरुण ने अपनी खिंचाई जारी रखी|
"वो...एक दिन देख लिया था 'इन्होने' मुझे|" मैंने फिर से सफाई दी|
"अबे जा साले!" सिद्धार्थ ने कहा|
"नहीं सिद्धार्थ जी ... वो मेरी एक फ्रेंड यहीं नजदीक रहती है ...उसी से मिलने एक दिन आई थी... तब मैंने ... 'इन्हें'...
मतलब मानु जी को देखा!" ऋतू ने जैसे-तैसे बात संभालते हुए कहा|
"इन्हें ??? क्या बात है?" अरुण ने अब ऋतू को चिढ़ाने के लिए कहा और ये सुन हम तीनों हँस पड़े और ऋतू ने शर्म से गर्दन झुका ली|
"शादी-वादी तो नहीं कर लिए हो?" सिद्धर्थ ने मजाक-मजाक में कहा और हम तीनों हँसने लगे|
"यार शादी करते तो तुम दोनों को नहीं बताते? गवाही तो तुम दोनों ही देते!" मैंने ऋतू ला बचाव करते हुए कहा पर ये सुन कर पूरे कमरे में हँसी गूंजने लगे| ऋतू भी अब हमारे साथ हँसने लगी थी और अब साड़ी बात खुल ही चुकी थी तो उसे एक्सेप्ट करने के अलावा किया भी क्या जा सकता था| अरुण और सिद्धार्थ भले ही मेरे colleagues थे पर दिल के बहुत अच्छे थे| ऑफिस में कभी भी हमारे बीच किसी भी तरह की होड़ या तीखी बहस नहीं होती थी| Colleagues कम और अच्छे दोस्त ज्यादा थे मेरे! आखिर ऋतू किचन में जा के सब के लिए चाय बनाने लगी|
"तो कब से चल रहा है ये?" अरुण ने पुछा|
"यार जब पहलीबार ऋतू को देखा तो बस.....हाय!" मैंने आवाज ऊँचीं कर के कहा ताकि ऋतू सुन ले|
"चल अच्छी बात है यार! congratulations!!!" अरुण ने कहा|
"भाई हमें तो कॉन्फिडेंस में ले लेता! हम कौनसा किसी को बता देते?" सिद्धार्थ ने मुझे मेरी गलती की याद दिलाई|
"यार बताने वाला हुआ था और फिर ये सब हो गया|" मैंने कहा इतने में ऋतू चाय बना कर ले आई और उसने अरुण और सिद्धार्थ को दी|
"पर तूने जॉब छोड़ी क्यों?" सिद्धार्थ ने जोर दे कर पुछा पर मैं इस टॉपिक को अवॉयड कर रहा है|
"आपके बॉस ने इन पर इल्जाम लगा दिया की इनका उनकी बीवी के साथ नाजायज संबंध है!" ऋतू ने तपाक से बोला और ये सुन दोनों उसे आँखें फाड़े देखने लगे|
"क्या बकवास है ये?" अरुण ने कहा|
"तेरा और मैडम के साथ एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर? पागल हो गया है क्या वो साला?" सिद्धार्थ बोला|
"कोर्ट में केस है और जब ये बात उस दिन इन्हें पता चली तो इन्होने उसी वक़्त अपना रेसिग्नेशन दे दिया|" ऋतू बोली|
"ये तो बहुत बड़ी चिरांद निकला!" सिद्धार्थ ने सर पीटते हुए कहा|
"सिद्धार्थ जी आपके बॉस ने खुद गर्लफ्रेंड फंसा रखी है और इल्जाम इन पर लगाते हैं|" ऋतू ने चाय का कप रखते हुए कहा| ये सुन कर दोनों सन्न थे! "आप दोनों अपना ध्यान रखना कहीं वो आपको ही न फँसा दे! सब कुछ पहले से प्लान था, पहले वो मुंबई के ट्रिप का बहाना, फिर वो राखी की शादी का काण्ड और फिर बाकी की रही सही कस्र अनु मैडम ने पूरी कर दी!" ऋतू ने गुस्से से कहा|
"ऋतू मैडम ने क्या किया?" अरुण ने पुछा, तो मैं समझ गया की ऋतू अब उस दिन होटल की साड़ी बात बक देगी| इसलिए मैंने ही बात संभाली;
"कुछ दिन पहले मैडम ने मुझसे लिफ्ट मांगी थी, उन्हें GST ऑफिस जाना था| वहाँ से उन्होंने कहा की कबाब खाते हैं, अब कुमार ने हमारे पीछे जासूस छोड़ रखे थे जिसने हमें देख लिया और फोटो खींच ली|"
मेरी बात सुन कर दोनों हैरान थे और उन्हें कहीं भी मेरी गलती नहीं
लगी, खेर थोड़ा हँसी मजाक हुआ और चाय पी कर वो दोनों निकलने को हुए|
"अच्छा भाभी जी! चलते हैं, ये तो शुक्र है की आप यहाँ थे वरना ये साला तो कभी हमें चाय तक नहीं पूछता|" सिद्धार्थ ने मजाक करते हुए कहा| उसके मुँह से 'भाभी जी' सुन कर ऋतू की खुशियों का कोई ठिकाना नहीं था|
"चल भाई लव बर्ड्स को अकेला छोड़ देते हैं वरना मन ही मन दोनों गाली देते होंगे!" अरुण ने भी टांग खींचते हुए कहा| मैं दोनों के गले मिला और उन्हें छोड़ने नीचे उतरा| नीचे आ कर तो दोनों ने मेरी जम कर खिंचाई की ये बोल-बोल कर की लड़की पटा ली और हमें बताया भी नहीं| उन्हें छोड़ कर मैं ऊपर आया तो ऋतू चाय के बर्तन धो रही थी| मैंने दरवाजा बंद कर ऋतू को फिर पीछे से अपनी बाहों में भर लिया| "जानू! ये भाभी शब्द सुनने में बहुत अच्छा लगता है|" ऋतू ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा| मेरे हाथ ऋतू के सीने तक पहुँच गए और उसके स्तन मेरी मुट्ठी में आ गए| मैंने उन्हें धीरे-धीरे मसलना शुरू कर दिया| "अब तो जल्दी से मुझे अपने दोस्तों की भाभी बना दो ना?" ऋतू ने कसमसाते हुए कहा|
"पहले तुम्हें ढंग से बीवी तो बना लूँ|" मैंने ऋतू की गर्दन पर धीरे से काटा| "ससससस...आह!हह..!!!" इस आवाज के साथ ही ऋतू ने जल्दी से हाथ धोये और मेरी तरफ पलट गई| "आप ना? बहुत शरारती हो!" ये कहते हुए ऋतू मुझसे चिपट गई| मैंने ऋतू को अपनी गोद में उठाया और उसे पलंग पर लिटा दिया, मैं उसके ऊपर आ कर उसे kiss करने वाला था की ऋतू ने अपने सीधे हाथ की ऊँगली मेरे होंठों पर रख दी| "सॉरी जान! आज सुबह से मेरे पीरियड्स शुरू हो गए!| ऋतू ने मायूस होते हुए कहा| मैंने झुक कर उसकी नाक से अपनी नाक लड़ाई और उसके माथे को चूमा| मैं उठा और फ्रिज से डेरी मिल्क चॉकलेट निकाली और उसे दी| "ये क्यों? ऋतू ने पुछा| "यार मैंने इंटरनेट पर पढ़ा था की पीरियड्स के टाइम लड़कियों को चॉकलेट और आइस-क्रीम बहुत पसंद होती है|"
"अच्छा? और क्या-क्या पढ़ा आपने?"
"ये ही की इन दिनों लड़कियां बहुत चिड़चिड़ी हो जाती हैं|" मैंने ऋतू को चिढ़ाते हुए कहा|
"मैं कब हुई चिड़चिड़ी?" ये कह कर ऋतू मुझसे रूठ गई और दूसरी तरफ मुँह कर लिया| मैंने उसकी ठुड्डी पकड़ के अपनी तरफ घुमाई और कहा; "हो गई ना नाराज?" ये सुन कर ऋतू मुस्कुरा दी|
"आपने कब से ये सब पढ़ना शुरू कर दिया? पीरियड्स मुझे पहली बार थोड़े ही हुए हैं?" ऋतू ने चॉकलेट की बाईट लेते हुए कहा|
"बाप बनना है तो इन चीजों का ख्याल तो रखना ही होगा ना? पहले मैं इतना इंटरेस्ट नहीं लेता था पर जब से घर बैठा हूँ तो रात को यही सब पढता रहता हूँ|" मैंने कहा|
"प्रेगनेंसी मैं हैंडल कर लूँगी! आप बाकी सब देखो?" ऋतू ने पूरे आत्मविश्वास से कहा|
"बाकी सब भी देख रहा हूँ|" ये कहते हुए मैंने अपनी डायरी निकाली और उसमें मैंने बैंगलोर में सेटल होने से जुडी साड़ी चीजें लिखी थीं| नए घर बसाने का सारा जिक्र था उसमें, बर्तन-भांडे
से ले कर परदे, बेडशीट सब कुछ| अपने लैपटॉप पर मैंने प्रॉपर्टी वाले जो लिंक बुकमार्क कर रखे तो वो सब मैं ऋतू की दिखाने लगा| घर का 360 डिग्री व्यू था और मैं ऋतू को सब बता रहा था की कौन सा हमारा कमरा होगा और कौन सा किचन होगा| किस फ्लैट का कितना भाड़ा है और कितना डिपाजिट लगेगा सब कुछ लिखा था| ऋतू मेरी सारी प्लानिंग देख कर हैरान थी और ये सब सुन कर उसकी आँखें भर आईं| "Hey!!! क्या हुआ जान?" मैंने ऋतू के चेहरे को अपने हाथों में थामते हुए कहा| "आज मुझे मेरे सपनों का संसार दिखाई दिया.... Thank you!!!" मैंने ऋतू को अपने सीने से लगा लिया और उसे रोने नहीं दिया| "अच्छा दशहरे की छुट्टियाँ कब से हैं?" मैंने बात बदलते हुए कहा ताकि ऋतू का ध्यान हटे और वो और न रोये| "next to next week से! Friday अगर छुट्टी कर लूँ तो फिर सीधा मंडे को कॉलेज ज्वाइन करुँगी|" ऋतू ने अपने आँसूँ पोछते हुए कहा| दशहरे का कुछ ख़ास प्लान नहीं था बस घर जाना था, हालाँकि ऋतू मना कर रही थी घर जाने से और कह रही थी की दशहरे हम शेहरा में एक साथ मनाते है पर मैंने उसे समझाया की ऐसे घर नहीं जाने से वो लोग कभी भी यहाँ टपक सकते हैं और फिर सारा रायता फ़ैल जायेगा| ऋतू को बात समझ आ गई और उसने बात मान ली| दोपहर को खाना मैंने और ऋतू ने मिल कर बनाया और हमारी मस्ती चलती रही, मैं ऋतू को और वो मुझे बार-बार छूती रहती| खाना खा कर मैंने उसे कल की प्रेजेंटेशन के बारे में याद दिलाया तो उसने फिर से मुझे याद दिलाते हुए कहा; "कल लास्ट टाइम है!" मैंने बस हाँ में सर हिलाया और फिर 5 बजे उसे हॉस्टल छोड़ आया| घर आ कर दोपहर का खाना गर्म कर खाया, ऋतू से कुछ देर चैट की और फिर ‘प्यासा’ ही सो गया!
update 46
अगली सुबह मैं उठ कर तैयार हुआ और सबसे पहले कैफ़े पहुँचा और वहां अनु पहले से ही मेरा इंतजार कर रही थी| हम बिलकुल कोने में बैठे थे ताकि प्रेजेंटेशन के दौरान कोई हमें डिस्टर्ब न दे| वीडियो कॉल पर प्रेजेंटेशन शुरू हुआ और जल्दी ही सारा काम निपट गया| अनु ने प्रेजेंटेशन के बाद थैंक यू कहा और साथ ही ये भी बताया की वो कल बैंगलोर जा रहीं हैं| मैंने उसने आगे और कुछ नहीं पुछा और जल्दी-जल्दी सीधा इंटरव्यू के लिए निकल गया| इंटरव्यू सक्सेसफुल नहीं था क्योंकि वहाँ कोई अपनी जान-पहचान निकला लाया था! मैं हारा हुआ घर आया और लेट गया, मन में यही बात आ रही थी की 5 दिन में तू ने हार मान ली तो इतनी बड़ी लड़ाई कैसे लड़ेगा? आँखें बंद किये हुए कुछ देर लेटा रहा और फिर अचानक से मुझे भगवान् का ख्याल आया| जब कोई रास्ता दिखाई नहीं देता तो एक भगवान् के घर का ही रास्ता दिखाई देने लगता है, में उठा और मंदिर जा पहुँचा| वहां बैठे-बैठे मन ही मन में मैंने अपने दिल की साड़ी बात भगवान् से कह दी, कोई जवाब तो नहीं मिला पर मन हल्का हो गया| ऐसा लगने लगा जैसे की कोई कह रहा हो की कोशिश करता रह कभी न कभी तो कामयाबी मिल
जाएगी| मंदिर की शान्ति से मन काबू में आने लगा था इसलिए शाम तक मैं मंदिर में ही बैठा रहा| ठीक 4 बजे मैं ऋतू के कॉलेज के लिए निकला, जब ऋतू ने मेरे मस्तक पर टिका देखा तो वो असमंजस में पड़ गई और फिर एक दम से उदास हो गई| हम चलते-चलते एक पार्क में पहुँचे और तब मैंने बात शुरू की; "क्या हुआ? अभी तो तेरे मुँह खिला-खिला था, अचानक से उदास कैसे हो गई?" ऋतू ने गर्दन झुकाये हुए कहा; "आपने अनु से शादी कर ली ना?" ये सुन कर मैं बहुत तेज ठहाका मार के हँसने लगा| उसके इस बचपने पर मुझे बहुत हँसी आ रही थी और उधर ऋतू मुझे हँसता हुआ देख कर हैरान थी| ऋतू गुस्से में मुड़ के जाने लगी तो मैंने पहले बड़ी मुश्किल से अपनी हँसी काबू में की और ऋतू के सामने जा के खड़ा हो गया| "तू पागल हो गई है क्या? मैं अनु से शादी क्यों करूँगा? प्यार तो मैं तुझसे करता हूँ! मैं मंदिर गया था..." इसके आगे मैंने ऋतू से कुछ नहीं कहा और उसके चेहरे को हाथों में थामे उसकी आँखों में देखने लगा| ऋतू भी मेरी आँखों में सच देख पा रही थी और उसे यक़ीन हो गया था की मैं झूठ नहीं बोल रहा| वो आके मेरे सीने से लग गई, और मैं उसके सर पर हाथ फेरता रहा|
कुछ देर में जब उसके जज्बात उसके काबू में आये तो उसने पुछा; "आप मंदिर क्यों गए थे?" अब मैं इस बात को उससे छुपाना चाहता था की मैं मंदिर इसलिए गया था क्योंकि मैं इंटरव्यू के बाद हारा हुआ महसूस कर रहा था| "बस ऐसे ही!" मैंने बात को वहीँ खत्म कर दिया| "आपका इंटरव्यू कैसा था?" ऋतू ने अपने बैग से टिफ़िन निकालते हुए कहा| "Not good! किसी का आलरेडी जुगाड़ फिट था!" मैंने ऋतू से नजर चुराते हुए कहा| ऋतू अब सब समझ गई थी की मैं क्यों मंदिर गया था| उसने मेरे ठुड्डी पकड़ी और अपनी तरफ घुमाई और मेरी आँखों में आँखें डालते हुए बोली; "मैं हूँ ना आपके पास, तो क्यों चिंता करते हो?" उसका ये कहना ही मेरे लिए बहुत था| मेरा आत्मविश्वास अब दुगना हो गया था और माहौल हल्का करने के लिए मैंने थोड़ा हँसी-मजाक शुरू कर दिया| वो पूरा हफ्ता मैं या तो इंटरव्यू देने के लिए ऑफिसेस के चक्कर काटा या फिर जॉब कंसल्टेंसी वालों के यहाँ जाता था| जहाँ कहीं जॉब मिली भी तो पाय इतनी नहीं थी जितनी मैं चाहता था| पर फिर मुझे कुछ-कुछ समझ आने लगा, दिवाली आने में 1 महीना रह गया था तो ऐसे मैं कौन सा मालिक एक एक्स्ट्रा आदमी को hire कर बोनस देना चाहेगा, इसीलिए vacancy कम निकल रहीं हैं| मैंने ये सोच कर संतोष कर लिया की दिवाली के बाद तो नौकरी मिल ही जाएगी| सहबीवार का दिन था और ऋतू सुबह-सुबह ही आ धमकी! मैं तो पहले से ही जानता था की वो आने वाली है इसलिए मैं खिड़की के सामने बैठा चाय पी रहा था| दरवाजा खुला था, इसलिए ऋतू चुपके से अंदर आई और मेरी आँखों पर अपने कोमल हाथ रख दिए ये सोच कर की मैं कहूँगा की कौन है? मैं तो पहले से ही जानता था की ये ऋतू है क्योंकि उसकी परफ्यूम की
जानी-पहचानी महक मुझे पहले ही आ गई थी| अब समय था उसे जलाने का; "अरे रिंकी भाभी?!" मैंने जान बूझ कर ये नाम लिया, ये नाम किसी और का नहीं बल्कि मेरे मकान मालिक अंकल की बहु का नाम था| ये सुनते ही ऋतू गुस्से से तमतमा गई और उसने मेरी आँखों से हाथ हटाए और मेरे सामने गुस्से से खड़ी हो गई; "रिंकू भाभी के साथ आपका चक्कर है? वो आपके घर में कभी भी बिना बातये घुस आती है और आपको ऐसे छूती है? ये सारी औरतें आपके पीछे क्यों पड़ीं हैं? एक अनु मैडम कम थी जो ये रिंकू भाभी भी आपके पीछे पड़ गईं? और आप.... आप बोल नहीं सकते की आप किसी से प्यार करते हो? मैं....मैं....."
"अरे..अरे..अरे... यार मजाक कर रहा था, तू क्यों इतनी जल्दी भड़क जाती है?" मैंने ऋतू को मनाते हुए कहा|
"भड़कूं नहीं? आपके मुँह से किसी भी लड़की का नाम सुनते ही मेरे जिस्म में आग लग जाती है! आपको मजाक करने के लिए कोई और टॉपिक नहीं मिलता?" ऋतू ने गुस्से से कहा|
'अच्छा सॉरी! आज के बाद ऐसा कभी मजाक नहीं करूँगा!" मैंने कान पकड़ते हुए कहा| मेरे ऐसा करने से ऋतू का दिल एक दम से पिघल गया और वो आ कर मुझसे चिपक गई|
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई, मैं और ऋतू अलग हुए और एक दूसरे को देखने लगे| मैं दरवाजे के पास आया और मैजिक ऑय से देखा तो बाहर मोहिनी खड़ी थी| मैंने इशारे से ऋतू को बाथरूम में छुपने को कहा| जैसे ही ऋतू अंदर घुसी और बाथरूम का दरवाजा सटाया मैंने मैन डोर खोला| "बड़ी देर लगा दी दरवाजा खोलने में? कोई लड़की-वड़की छुपा राखी है?" मोहिनीं ने हँसते हुए कहा|
"नंगा था ... कपड़े पहन रहा था|" मैंने भी उसी तरह से जवाब दिया|
"तो मुझसे कैसी शर्म?" मोहिनी ने फिर से मुझे छेड़ते हुए कहा|
"ओ मैडम जी! आपने कब देख लिया मुझे नंगा?" मैंने थोड़ा हैरानी से कहा|
''अरे मजाक कर रही थी! काहे सीरियस हो जाते हो आप?"
"यही मजाक करना आता है? कउनो और मजाक नहीं कर सकती?" मैं जानता था की ऋतू अंदर बाथरूम से हमारी सारी बात सुन रही है इसलिए अभी कुछ देर पहले कही उसकी बात उसे सुनाते हुए मैंने कहा| इधर मोहिनी खिलखिला कर हँस रही थी, कारन ये की हम दोनों कई बार एक दूसरे से इसी तरह देहाती भाषा में बात करते थे!
"चलो जल्दी से तैयार हो जाओ?"
"क्यों?" मैंने पुछा और यही सवाल ऋतू के मन में भी चल रहा था|
"माँ ने बुलाया है आपको, लंच पर|"
"क्यों आज कोई ख़ास दिन है?" मैंने पुछा|
"वो..आज ...
मेरा बर्थडे है!" मोहिनी ने मुस्कुराते हुए कहा|
"अरे सॉरी यार! हैप्पी बर्थडे! सॉरी मैं भूल गया था!" मैंने माफ़ी माँगते हुए उसे wish किया|
"मेरा बर्थडे याद करके रखते हो?"
:यार कॉलेज के कुछ 'ख़ास' लोगों का जन्मदिन याद है|" मेरे ये कहने के बाद मुझे एहसास हुआ की ऋतू ये सब सुन रही होगी और अभी मुझसे फिर लड़ेगी इसलिए मैंने अपनी इस बात में आगे बात जोड़ दी; "जैसे मुन्ना, सोमू भैया और मेरे ऑफिस के colleagues के|"
"पर wish तो कभी किया नहीं?" मोहिनी ने सवाल किया|
"कैसे करता? मेरे पास नंबर तो था नहीं, बाकियों को व्हाटस ऍप पर wish कर दिया करता था|" मैंने अपनी सफाई दी, जबकि मेरा उसका बर्थडे याद रखने का कारन मेरा उसके लिए प्यार था जो मैं उससे फर्स्ट ईयर में किया करता था| पर जब मुझे संकेत ने ऋतू की माँ वाले काण्ड के बारे में बताया था तब से मैंने खुद को जैसे-तैसे समझा लिया था की मैं मोहिनी से प्यार नहीं कर सकता| फिर ऋतू मिल गई और मेरे मन में मोहिनी के प्यार की कब्र बन गई|
"चलो कोई बात नहीं, इस बार तो wish कर दिया आपने| चलो चलते हैं... (कुछ सोचते हुए) अच्छा एक बात बताओ रितिका सुबह बोल के गई थी की कॉलेज जा रही है पर मुझे तो वो वहाँ मिली नहीं! आपको पता है कहाँ गई है?" मोहनी ने पुछा| मैं जानता था की ऋतू मेरे ही बाथरूम में छुपी है पर ये मैं उसे कैसे बता सकता था|
"पता नहीं... कहीं दोस्तों के साथ बंक तो नहीं कर रही?" मैंने अनजान बनते हुए कहा|
"हो सकता है, उसके पास फ़ोन भी नहीं की उसे कॉल कर के बुला लूँ| आप अपने घर में कह दो ना की उसे एक फ़ोन दिलवा दें ताकि कभी जर्रूरत हो तो उसे कॉल कर लूँ|"
"आ जाएगी जहाँ भी होगी, लंच तक! आप ऐसा करो आप चलो मुझे एक जर्रूरी काम है वो निपटा कर मैं आता हूँ|" मैंने बहाना मारा ताकि मोहिनी निकले|
"ठीक है पर लेट मत होना|" इतना कह कर वो चली गई, मैंने दरवाजा बंद किया और ऋतू फिर से गुस्से में बाहर आई और अपनी कमर पर दोनों हाथ रख कर मुझे घूरने लगी|
"सॉरी बाबा ...सॉरी!!!' मैंने कान पकड़ते हुए कहा पर उसका गुस्सा शांत नहीं हुआ, वो किचन में घुसी और चम्मच और गिलास उठा के फेंकने शुरू कर दिए| "अरे यार ...सॉरी! ...सॉरी!!!!" पर उसने बर्तन मेरी ओर फेकने जारी रखे, हैरानी की बात है की एक भी बर्तन मुझे लगा नहीं| मैं धीरे-धीरे उसके नजदीक पहुँचा तभी उसके हाथ में बेलन आ गया| मुझे मारने के लिए उसने बेलन उठाया की तभी कुछ सोचने लगी ओर वो वापस किचन काउंटर पर छोड़ दिया ओर मेरे पास आ कर प्यार से अपने मुक्के मेरे सीने में मारने शरू कर दिए|
अउ..अउ..अउ..
आह!" मैंने झूठ-मूठ का करहाना शुरू किया पर वो रुकी नहीं| मैंने उसे गोद में उठाया ओर पलंग पर ले आया, पर उसने मेरी छाती पर अब भी मुक्के मारने चालु रखे| मैंने दोनों हाथों से उसके दोनों हाथों को पकड़ कर अलग-अलग किया ओर उसके ऊपर झुक कर उसके होठों को चूमा, तब जा कर उसका गुस्सा शांत हुआ| "बाबू! ये बहुत पुरानी बात है, कॉलेज फर्स्ट ईयर की! पर जब से तुमसे प्यार हुआ मैं सब कुछ भूल गया था, तुम्हारी कसम! अब प्लीज गुस्सा थूक दो!" मैंने बहुत प्यार से कहा ओर ऋतू के हाथ छोड़ दिए| मैं उसके ऊपर से उठने लगा तो ऋतू ने मेरे टी-शर्ट के कालर को पकड़ा ओर अपने ऊपर खींच लिया; "ज्यादा न पुरानी बातें याद ना किया कीजिये, नहीं सच कर रही हूँ जान दे दूंगी मैं!"
"अरे बाप रे बाप! ई व्यवस्था!" मैंने भोजपुरी में कहा तो ऋतू की हँसी छूट गई| "अच्छा जान! चलो उठो ओर चलें आपके हॉस्टल!"
हम दोनों उठे और मैंने कपडे बदले और दोनों बस से हॉस्टल पहुँचे| चौराहे पर पहुँच कर मैंने ऋतू से जाने को कहा और मैं मार्किट की तरफ निकल गया| जन्मदिन पर खाली हाथ जाना सही नहीं लगा, अब अगर तौह्फे के लिए फूल लिए तो ऋतू जान खा जाएगी इसलिए मैंने एक पेन खरीदा और उसे गिफ्ट-व्रैप करा कर हॉस्टल पहुँचा| ऋतू ने दरवाजा खोला और हँसते हुए 'नमस्ते' कहा| अब आखिर सब के समने ये भी तो जताना था की हम दोनों एक साथ नहीं थे! मैंने आंटी जी के पाँव छुए और उन्होंने मुझे बैठे को कहा| वो भी मेरे पास ही बैठ गईं और घर के हाल-चाल पूछने लगीं| "और बताओ जॉब कैसी चल रही है?" आंटी जी ने पुछा, मैंने बात को गोलमोल करना चाहा की तभी ऋतू बोल पड़ी; "आंटी जी जॉब तो छोड़ दी इन्होने!" अब ये सुनते ही आंटी जी मेरी तरफ देखने लगीं; "वो आंटी जी वर्क लोड बहुत बढ़ गया था ऊपर से सैलरी ढंग की देते नहीं थे!" मैंने झूठ बोला और आंटी ने मेरी बात मान भी ली| "सही किया बेटा, मेरे हिसाब से तो सरकारी नौकरी ही बढ़िया है| काम कम और सैलरी ज्यादा!" मैं ये सुन कर मुस्कुरा दिया क्योंकि मेरी ऐसी आदत थी नहीं, मुझे तो मेरी मेहनत की कमाई हुई रोटी ही भाति थी! कुछ देर बाद मोहिनी आ गई और मैंने उसे उसका तौहफा दिया तो उसने झट से तौहफा ले लिया| आंटी जी ने बड़ा कहा की बेटा क्या जर्रूरत थी तो मैंने बस इतना ही कहा की आंटी जी बस एक पेन ही तो है, वो बात अलग है की वो पेन पार्कर का था! ऋतू शांत रही और कुछ नहीं बोली, अब मैं चलने को हुआ तो मोहिनी कहने लगी की वो मुझे ड्राप कर देगी| मैंने बहुत मना किया पर आंटी जी ने भी कहा की कोई नहीं छोड़ आ| मैं उसकी स्कूटी पर पीछे बैठ गया और दोनों हाथों से पीछे के हैंडल को पकड़ लिया| हम रेड लाइट पर रुके तो मोहिनी पीछे मुड़ी और बोली; थैंक यू!" मैंने बस its alright कहा और तभी ग्रीन लाइट हो गई| फिर पूरे रस्ते वो कुछ न कुछ बोलती रही, उसे अब भी पता नहीं था की मैंने जॉब छोड़ दी है| जब घर आया तो मोहिनी बोली;
"सॉरी इस बार आपको घर का खाना खिलाया! नेक्स्ट टाइम मैं पार्टी दूँगी!"
"कोई नहीं!" मैं बाय बोल कर जाने लगा तो वो खुद ही बोलने लगी; "माँ ना... सच्ची बहुत रोक-टोक रखती है मुझ पर! ऑफिस से घर और घर से ऑफिस, जरा सी लेट हो जाऊँ तो जान खा जाती है मेरी| मैंने कहा मैं बाहर ट्रीट दूँगी तो कहने लगी किसको ट्रीट देनी है? अब अगर ऑफिस वालों का नाम लेती तो वो मना कर देती इसलिए मैंने आपका नाम ले लिया| आपका नाम सुनते ही उन्होंने कहा की मानु को यहीं बुला ले बहुत दिनों से उससे मुलाक़ात नहीं हुई, इसलिए आप को आज के लंच का न्योता दिया| इतनी रोक-टोक तो वो रितिका पर भी नहीं रखती!"
"उनकी गलती नहीं है, ये जो आपका मुँहफट पना है न इसी के चलते वो ऐसा करती हैं| रही ऋतू की बात तो वो हमेशा ही शांत रहती है, कम बोलती है और अपने काम से काम रखती है और कुछ-कुछ मेरी वजह से भी आंटी जी उस पर lenient हैं, इसलिए उसे ज्यादा रोकती-टोकती नहीं!" मैंने आंटी की तरफदारी की|
"अच्छा तो मैं भी रितिका की तरह गाय बन जाऊँ?" मोहिनी ने हँसते हुए कहा|
"नहीं बन सकती! वो बानी ही अलग मिटटी के सांचे की है और फिर ऊपर वाले ने ही वो साँचा तोड़ दिया!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा| मैंने ऋतू की तारीफ कुछ इस ढंग से की ताकि मोहिनी उसे समझ ही न पाए की मैंने तारीफ की है या उसका मजाक उड़ाया है| मैं ऊपर आ गया और मोहनी अपनी स्कूटी मोड़ के चली गई| कुछ देर बाद ऋतू का मैसेज आया पर उसने गिफ्ट के बारे में कुछ नहीं कहा| वो समझ गई थी की मैंने वो गिफ्ट बस खानापूरी के लिए दिया था| थोड़ी इधर-उधर की बातें हुईं फिर मैं घर के कुछ काम करने लगा| वो दिन बस ऐसे ही निकल गया और फिर आया संडे और मैं नाहा-धो के पूजा कर के तैयार था| ऋतू भी समय से आ गई और आते ही मेरे सीने से चिपक गई| पर आज मैंने उसे नहीं छुआ और वो तुरंत ये बदलाव ताड़ गई| "क्या हुआ? नाराज हो?" उसने मेरी ठुड्डी पकड़ते हुए कहा| नहीं तो....
आज से व्रत हैं!" ये सुनते ही ऋतू मुझसे छिटक कर कड़ी हो गई और अपनी जीभ दाँतों तले दबा कर सॉरी बोली| दरअसल मैं हर साल नवरात्रों में व्रत रखता था और पूरे रखता था| "तब तो मैं आपको छू भी नहीं सकती?!" ऋतू ने पुछा| "दिल साफ़ हो तो छू सकती हो, पर वासना भरी हो तो नहीं!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा तो जवाब में ऋतू बोली; "आपको देखते ही मेरे जिस्म में आग लग जाती है| उसे बूझाने ही तो मैं आपके करीब आती हूँ, पर हाय रे मेरी किस्मत! आप तो विश्वामित्र बन गए पर कोई बात नहीं ये मेनका आपकी तपस्या भंग अवश्य कर देगी!"
"बड़ा ज्ञान है तुझे? पर मेरे साथ ऐसा कुछ करने की कोशिश भी मत करना| मार खायेगी मेरे से!" मैंने ऋतू को चेतावनी दी| उसने बस हाँ में गर्दन हिलाई, वो जानती थी की व्रत के दिनों में मैं बहुत सख्त नियमों का प्लान करता हूँ| हालाँकि मेरे लिए भी इस बार बहुत मुश्किल था ऋतू के सामने होते हुए उससे दूर रहना| अब उस दिन चूँकि मैं कुछ खाने वाला नहीं था तो ऋतू ने भी कुछ खाने से मना कर दिया| मैंने फिर भी उसके लिए फ्रूट चाट बना दी और दोनों बिस्तर पर बैठे मूवी देखते रहे| वो पूरा हफ्ता वही रूटीन चलता रहा, जॉब ढूँढना, शाम को ऋतू से मिलना और फिर घर आ कर सो जाना| बुधवार को ही घर से बालवा आ गया और गुरूवार की शाम मैं और ऋतू गाँव चले गए| घर में सब जानते थे की मेरा व्रत है तो माँ ने मेरे लिए दूध बनाया था जिसे पी कर मैं सो गया| शनिवार को घर में पूजा हुई और मेरा व्रत पूर्ण हुआ, फिर दबा के हलवा-पूरी खाई| शाम को मैं छत पर बैठा था की ऋतू आ गई; "अच्छा अब तो आपको छूने की इज्जाजत है मुझे?"
"घर में सब मौजूद हैं तो ज्यादा मेरे पास भटकना भी मत|" मैंने कहा तो ऋतू मुँह फुला कर चली गई| मैं जानता था की मुझे उसे कैसे मनाना है पर आज नहीं कल!
update 47
शाम से ले कर रात तक ऋतू मुझसे बात नहीं कर रही थी और मुँह फुला कर घूम रही थी| मैंने एक दो बार उससे बात करनी चाही तो वो बिदक कर चली गई| खाना परोस कर मुझे देने के टाइम भी वो अपनी आँखों से मुझे अपना गुस्सा दिखा रही थी| खाना खाने के बाद वो बर्तन धो रही थी, और उसके बर्तन धोना खत्म होगया था| वो उठने लगी तभी मैंने अपना जूठा गिलास उसे दिया तो वो बुदबुदाते हुए बोली; "अब घर में आपको सब नहीं दिख रहे जो मुझे गिलास दे रहे हो?" मैं बस मुस्कुराया और वापस आंगन में सबके साथ बैठ गया| रात को सब एक-एक कर अपने कमरों में चले गए बस मैं, भाभी और ऋतू ही रह गए थे| भाभी का कमरा नीचे था तो वो मेरे सामने से इठलाते हुए गईं जो की ऋतू ने देख लिया और गुस्से में तमतमाते हुए गिलास नीचे फेंका| भाभी ने उसे ऐसा करते हुए नहीं देखा बस आवाज सुन के उस पर चिल्लाईं; "हाथ में खून है की नहीं!" ऋतू कुछ नहीं बोली और मेरे सामने से होती हुई सीढ़ी चढ़ने लगी| मैं मिनट भर आंगन में टहलता रहा और फिर ऊपर अपने कमरे की तरफ चल दिया| मैं अपने
कमरे में ना घुस कर ऋतू के कमरे के दरवाजे पर खड़ा हो कर उसे पलंग पर सर झुकाए बैठा देखने लगा| मैं दो कदम अंदर आया और बोला; "यार मैं सोच रहा हूँ की शादी के बाद अपने हाथ पर लिखवा लूँ: 'ऋतू का आदमी!'" ये सुन कर ऋतू हँस पड़ी फिर अगले ही पल कोशिश करने लगी की मुझे फिर से अपना गुस्सा दिखाए पर उस का चेहरा उसे ऐसा करने नहीं दे रहा था| वो हँसना चाह रही थी पर अपना गुस्सा भी दिखाना चाहती थी| वो उठी और आ कर मेरे सीने से लग गई; "आपको पता है मैं बार-बार आपके सीने से क्यों लगती हूँ?"
"हाँ...बहुत बार बताया है तुमने!" मैंने कहा|
"आपके सीने की आँच से मेरे दिल में हो रही उथल-पुथल शांत हो जाती है| जिस गर्मी के लिए मैं तड़पती हूँ वो बस यहीं मिलती है|" ऋतू ने फिर से दोहराते हुए कहा|
"चलो अब सो जाओ! सुबह से काम कर कर के तक गए होंगे!" मैंने ऋतू को खुद से दूर करते हुए कहा|
"ना..आपके सीने से लगते ही सारी थकावट दूर हो जाती है|" ऋतू फिर से मेरी छाती से चिपक गई| अब मुझे कैसे भी कर के उसे खुद से दूर करना था वरना अगर कोई आ जाता तो बखेड़ा खड़ा हो सकता था|
"माँ.. आप?!!!" मैंने झूठ बोला जिससे ऋतू मुझसे एक दम से छिटक कर दूर हो गई| पर जब उसने दरवाजे की तरफ देखा और वहाँ किसी को नहीं पाया तो वो गुस्सा हो गई| "सॉरी जान! पर कोई हमें देख लेगा तो बखेड़ा खड़ा हो जायेगा|" मैंने उसे मनाते हुए कहा पर वो दूसरी तरफ मुँह कर खड़ी हो गई| मैं पलट के जाने लगा तो वो बोली; "दरवाजा बंद कर के सोना! माँ प्यासी शेरनी की तरह आपका इंतजार कर रही है|" मैंने पलट कर देखा तो ऋतू की आँखों में जलन साफ़ झलक रही थी| मैं उसे गले लगाने को जैसे ही आगे बढ़ा की ऋतू एक दम से पलट गई| मुझे डर था की कहीं कोई आ ना जाये इसलिए मैं अपने कमरे में आ गया और दरवाजा बंद कर लिया और लेट गया| मुझे पता था की अगली सुबह मुझे क्या करना है?
सुबह फटाफट उठा और नाहा-धो के तैयार हो गया| सब आंगन में बैठे चाय पी रहे थे की मैंने बात शुरू की;
मैं: ताऊ जी शाम को सारे रावण दहन देखने चलें?
ताऊ जी: सारे क्यों? तुझे जाना है तो जा, यहाँ अपनी छत से सब नजर आता है|
मैं: पर राम-लीला भी तो देखनी है!
ताऊ जी: नहीं..
कोई जर्रूरत नहीं! वहाँ भीड़-भाड़ में कौन जाएगा!
मैं: हमारे लिए भीड़-भाड़ कैसी? आपको बस मुखिया को एक फ़ोन करना है और राम-लीला की आगे वाली लाइन में सीट मिल जाएगी!
पिताजी: इतने से काम के लिए कौन एहसान ले?
मैं: ठीक है एक मुखिया थोड़े ही है?
मैंने अपना फ़ोन निकाला और संकेत को फ़ोन किया;
मैं: सुन यार वो राम-लीला की आगे वाली 8 सीटें चाहिए!
संकेत: अबे तू वहाँ आ कर मुझे कॉल कर डीओ सीटें मिल जाएँगी|
मैंने फ़ोन रखा और ताऊ जी और पिताजी मेरी तरफ हैरानी से देख रहे थे|
मैं: होगया जी सीटों का इंतजाम, अब तो सारे चलें?
ताऊ जी: बड़े जुगाड़ लगाने लगा है तू?
पिताजी: शहर में भी यही करता होगा?
मैं आगे कुछ नहीं बोला और चुप-चाप चाय पीने लगा| चूँकि हम अयोध्या वासी हैं तो दशहरे पर बहुत धूम-धाम होती है| हमारे गाँव के मुखिया हर साल इन दिनों में रामलीला का आयोजन जोर-शोर से करते हैं| रावण का एक बहुत बड़ा पुतला बना कर फूँका जाता है, पर हमारे घर का हाल ये था की कोई भी सम्मिलित नहीं होता था| मैं जब छोटा था तब ऋतू को अपने साथ ले जाया करता था और वो भी जैसे ही रावण के पुतले में आग लगती तो भाग कड़ी होती! बाकी बचीं घर की औरतें तो वो छत पर कड़ी हो जातीं और पटाखों का शोर सुन लिया करती| इस बार मैंने पहल की थी तो ताऊ जी मान ही गए, ताई जी. माँ और भाभी खुश थीं और मैं इसलिए खुश था की मेरा ऋतू को मनाने का प्लान कामयाब होने वाला था| शाम 4 बजे सारे मैदान में पहुँच गए जो की घर से करीब 10 मिनट ही दूर था| मैंने संकेत को इशारे से बुलाया तो उसने पिताजी, ताऊ जी और चन्दर को आगे की लाइन में बिठा दिया| मुझे, ऋतू, भाभी, माँ और ताई जी को उसने पीछे वाली लाइन में बिठा दिया अपनी बीवी और माँ के साथ| इस बार के दशहरे की तैयारी उसी के परिवार ने की थी इसलिए वहाँ सिर्फ उसी का हुक्म चल रहा था| रामलीला शुरू हुई और मैंने सब की नजर बचाते हुए ऋतू का हाथ पकड़ लिया| पहले तो ऋतू हैरान हुई पर जब उसे एहसास हुआ की ये मेरा हाथ है तो वो मुस्कुरा दी और फिर से रामलीला देखने लगी| मैं धीरे-धीरे उसके हाथ को दबाता रहा और उसे इसमें बहुत आनंद आ रहा था| हम दोनों रामलीला के खत्म होने के दौरान ऐसे ही चुप-चाप एक दूसरे के हाथ को बारी-बारी दबाते रहे| जब रामलीला खत्म हुई तो बारी है रावण दहन की तो सभी उठ के उस तरफ चल दिए| पर घरवाले सभी वहीँ खड़े हो गए जहाँ हम बैठे थे, इधर ऋतू को उसकी कुछ सहेलियाँ मिल गईं और वो उनके साथ थोड़ा नजदीक चली गई जहाँ बाकी सब गाँव वाले थे| मैं ऋतू के पीछे धीरे-धीरे उसी तरफ बढ़ने लगा, "रितिका तू तो शहर जा कर मोटी हो गई है!" ऋतू की एक दोस्त ने कहा| "चल हट!" रितिका ने उस लड़की को कंधा मरते हुए कहा| "सच कह रही हूँ, ये देख कितना बड़े हो गए हैं तेरे!" ये कहते हुए उसने ऋतू के कूल्हों को सहलाया| "तेरी चूचियाँ भी पहले से बढ़ गईं हैं...
और तेरे होंठ! क्या करती है तू वहाँ शहर में? कोई यार ढूँढ लिया क्या?" ऋतू ने गुस्से से दोनों को कंधे पर घुसा मारा| "ज्यादा बकवास ना कर मुँह नोच लूँगी दोनों का!" तीनों खड़े-खड़े हँस रहे और उनकी बात सुन कर मैं भी मन ही मन हँस रहा था| जैसे ही दहन शुरू हुआ और पटाखों की आवाज तक हुई मैंने ऋतू का हाथ पीछे से पकड़ा और उसे खींच कर ले जाने लगा| ऋतू पहले तो थोड़ा हैरान थी की आखिर कौन उसे खींच रहा है पर जब उसने मुझे देखा तो मेरे साथ चल पड़ी| भीड़ में कुछ भगदड़ मची क्योंकि सब लोग बहुत नजदीक खड़े थे और ऐसे में जिस किसी ने भी हमें वहाँ से जाते देखा वो यही सोच रहा होगा की ये दोनों शोर सुन कर जा रहे हैं|
मैं ऋतू को घर की बजाये दूर संकेत के खेतों में ले गया, वहाँ संकेत के खेतों में एक कमरा बना था जहाँ वो अपना माल छुपा कर रखता था| उस कमरे में आते ही मैंने दरवाजा बंद कर दिया और कमरे में घुप अँधेरा छ गया| मैंने फ़ोन की टोर्च जला कर उसे चारपाई पर रख दिया और ऋतू के चेहरे को थाम कर उसके होठों को बेतहाशा चूमने लगा| समय कम था, इसलिए मैं जमीन पर घुटनों के बल बैठा गया और ऋतू को अभी भी दरवाजे के बगल में खड़ा रखा| उसके कुर्ते में हाथ डाल कर उसकी पजामी का नाडा खोला और उसे जल्दी से नीचे सरकाया फिर ऋतू की बुर पर अपने होंठ रखे| पर तभी उसकी कच्छी बीच में आ गई! मैंने जल्दी से उसे भी नीचे सरकाया और अपनी लपलपाती हुई जीभ से ऋतू की बुर को चाटा| मिनट भर में ही उसकी बुर पनिया गई और उसने मुझे ऊपर खींच कर खड़ा किया| मैंने उसे गोद में उठाया और चारपाई पर लिटा दिया| में ऋतू के ऊपर छा गया, दोनों की सांसें धोकनी की तरह चल रही थीं| मैंने और देर न करते हुए अपने लंड को ऋतू की बुर में ठेल दिया| लंड सरसराता हुआ आधा अंदर चला गया और इधर ऋतू ने जोश में आते हुए अपने दोनों हाथों से मुझे अपने जिस्म से चिपका लिया| मैंने नीचे से कमर को और ऊपर ठेला और पूरा का पूरा लंड जड़ समेत उसकी बुर में उतार दिया| ऋतू ने मेरे चेहरे को अपने हाथों में थामा और मेरे होठों को अपने मुँह में भर कर चूसने लगी| मैंने नीचे से तेज-तेज झटके मारने शुरू किये और 7-8 मिनट में ही दोनों का छूट गया! साँसों को दुरसुत कर दोनों खड़े हुए और अपने-अपने कपडे ठीक किये| ऋतू और मैं दोनों तृप्त हो चुके थे, उसके चेहरे पर वही ख़ुशी लौट आई थी| बाहर निकलने से पहले उसने फिर से मुझे अपनी बाहों में कैद किया और मेरे होंठों को अपने मुँह में भर के चूसने लगी| मुझे फिर से जोश आया और मैंने उसे अपनी गोद में उठा लिया और दिवार से तेल लगा कर उसके निचले होंठ को अपने मुँह में भर के चूसने लगा| मैंने अपनी जीभ उसके मुँह में डाल दी और ऋतू उसे चूसने लगी, तभी मेरा फ़ोन वाइब्रेट करने लगा तो हम दोनों अलग हुए पर दोनों की साँसे फिर से तेज हो चली थीं, प्यार की आग फिर भड़क गई थी| पर समय नहीं था इसलिए
मैंने ऋतू से कहा; "आज रात!" इतना सुनते ही ऋतू खुश हो गई| मैंने दरवाजा खोला और बाहर आ कर देखा की कोई है तो नहीं, फिर ऋतू को बाहर आने का इशारा किया| ऋतू को घर की तरफ चल दी और मैं दूसरे रास्ते से घूमता हुआ घर पहुँचा| घर पर सब आ चुके थे और बाहर अभी भी थोड़ी आतिशबाजी जारी थी| 'कहाँ रह गया था तू?" माँ ने पुछा| "वो में संकेत के साथ था|" इतना कह कर मैं आंगन में मुँह-हाथ धोने लगा तो नजर ऋतू पर गई जो अब बहुत खुश थी! रात को खाना खाने के समय भी ऋतू के चेहरे से उसकी ख़ुशी टप-टप टपक रही थी जो वहाँ किसी से देखि ना गई;
भाभी: तू बड़ी खुश है आज?
ये सुनते ही ऋतू की ख़ुशी काफूर हो गई|
मैं: इतने दिनों बाद अपनी सहेलियों के साथ समय बिताया है, खुश तो होना ही है!
मैंने ऋतू का बचाव किया, पर भाभी को ये जरा भी नहीं जचा और इससे पहले की वो कुछ बोलती ताई जी बोल पड़ी;
ताई जी: इस बार का दशहेरा यादगार था! वैसे तुम दोनों कहाँ गायब हो गए थे?
भाभी: हाँ...मैंने फ़ोन भी किया पर तुमने उठाया ही नहीं?
ताई जी ने मुझसे और ऋतू से पुछा, अब बेचारी ऋतू सोच में पड़ गई की बोले तो बोले क्या? ऊपर से भाभी के कॉल वाली बात से तो ऋतू सुलगने लगी थी, इसलिए मुझे ही बचाव करना पड़ा;
मैं: ऋतू तो अपनी सहेलियों के साथ आगे चली गई थी और मैं संकेत के साथ था| भाभी का फ़ोन आया था पर शोर-शराबे में सुनाई ही नहीं दिया!
ताई जी: अच्छा... वैसे मुन्ना तूने आज बड़े सालों बाद रामलीला दिखाई|
अब ताई जी क्या जाने की मेरा असली प्लान क्या था इसलिए मैं बस मुस्कुरा दिया| खाना खाने के बाद मैं छत पर टहल रहा था, तभी ऋतू ऊपर आई और मुझसे कुछ दूरी पर खड़ी हो गई; "आज रात का वादा याद है ना?" ऋतू ने मुझे मेरा किया वादा याद दिलाया, मन तो कर रहा था की थोड़ा और मजाक करूँ ये कह के की कौन सा वादा पर जानता था की ये सुन कर ऋतू बिदक जाएगी! मैंने बस हाँ में सर हिलाया और फिर ऋतू मुस्कुराती हुई नीचे चली गई| अभी सब लोग आंगन में ही बैठे थे की पिताजी ने मुझे नीचे से आवाज दे कर बुलाया| मैं नीचे आया तो कुछ जर्रूरी बातें हुई जमीन को ले कर और फिर मुझसे पुछा गया की मैं वापस कब जा रहा हूँ? "कल सुबह" मैंने बस इतना कहा और फिर सब अपने-अपने कमरों में जाने को चल दिए| मैं भी अपने कमरे में आ गया और कुछ देर बाद ऋतू भी ऊपर आ गई| वो मेरे दरवाजे की चौखट पर हाथ रख खड़ी हो गई; "बारह बजे मैं आपका इंतजार करूँगी!" मैंने बस मुस्कुरा कर हाँ कहा और वो अपने कमरे में चली गई और मुझे उसके दरवाजा बंद करने की आवाज आई| रात बारह बजे तक मैं जागा रहा और फ़ोन में कुछ मैसेज देखने लगा| ठीक बारह बजे मैं उठा और ऋतू के कमरे का दरवाजा धीरे से खोला, ऋतू पलंग पर ऐसे बैठी थी:
ऋतू मुस्कुराती हुई मेरा ही इंतजार कर रही थी, उसके कमरे में एक लाल रंग का जीरो वाट का बल्ब जल रहा था| उसे ऐसे देखते ही मैं एक पल के लिए दरवाजे पर ही रूक गया
और चौखट से सर लगा कर उसे निहारने लगा| मैं धीरे से उसके नजदीक पहुँचा पर नजरें उस पर से हट ही नहीं रही थी| ऋतू ने अपना दायाँ हाथ बढ़ा कर मुझे अपने पास बुलाना चाहा| मैंने उसका हाथ थाम लिया और फिर उसके पास पलंग पर बैठ गया| मैंने ऋतू के चेहरे को थामा और उसे kiss करने ही जा रहा था की नीचे से मुझे बड़ी जोर की खाँसने की आवाज आई| ये आवाज ताऊ जी की थी जिसे सुनते ही हम दोनों के तोते उड़ गए! मैं छिटक कर ऋतू के पलंग से खड़ा हुआ और ऋतू भी बहुत घबरा गई थी और मेरी तरफ डर के मारे देख रही थी| मैंने उसे ऊँगली से छुपा रहने का इशारा किया और धीरे से दरवाजे की तरफ बढ़ा, बाहर झाँका तो वहाँ कोई नहीं था| मैंने चैन की साँस ली, फिर थोड़ी हिम्मत दिखाते हुए मैंने नीचे आंगन में झाँका तो पाया की ताऊ जी बाथरूम में घुस रहे थे| मैं वापस ऋतू के कमरे में आया और उसे बताया की ताऊ जी बाथरूम में घुसे हैं| अब ये तो साफ़ था की अब कुछ नहीं हो सकता इसलिए मैं दबे पाँव अपने कमरे में आ गया और लेट गया|
update 48
रात के एक बजे थे और मुझे झपकी लगी थी की ऋतू मेरे कमरे में आई और और झुक कर मेरे होठों को चूसने लगी| मैंने तुरंत आँख खोली और जब नजरें ऋतू पर पड़ीं तो मैं निश्चिंत हो गया और उसके होठों को चूसने लगा| दरअसल मैं दरवाजा बंद करना भूल गया था, इसलिए ऋतू चुप-चाप अंदर आ गई थी| इधर आग दोनों के जिस्म में भड़क चुकी थी पर कुछ भी करना खतरे से खाली नहीं था! मैंने ऋतू को रोका और उठ बैठा; "जान! मेरा भी बहुत मन है पर यहाँ घर पर कुछ भी करना ठीक नहीं है! कल कॉलेज की छुट्टी कर ले और फिर वो पूरा दिन हम दोनों एक साथ होंगे!" ये सुन कर ऋतू का मुंह फीका पड़ गया और वो मुड़ कर जाने लगी| अब मुझसे उसका ये उदास चेहरा देखा नहीं गया, मैं पलंग से उतरा और ऋतू का हाथ पकड़ कर खींच कर उसे छत पर ले गया| छत की पैरापेट वाल थोड़ी ऊँची थी, करीब 4 फुट की होगी, मैं वहाँ नीचे बैठ गया और ऋतू को भी अपने पास बिठा लिया| हम दोनों कुछ इस तरह बैठे थे की अगर कोई ऊपर चढ़ कर आता तो हमें साफ़ दिखाई दे जाता पर वो हमें नहीं देख पाता| उससे हमें इतना समय तो मिल जाता की हम एक दूसरे से अलग हो कर बैठ जाएँ| हाँ वो इंसान जब छत पर आ जाता तो ये सवाल जर्रूर आता की तुम दोनों छत पर अकेले क्या कर रहे हो? ये वो एक सवाल था जिसका हमारे पास कोई जवाब नहीं होता, पर जब प्यार किया है तो रिस्क तो लेना ही पड़ता है| सवाल के जवाब में झूठ बोलने के अलावा कोई और चारा नहीं था हमारे पास| खेर नीचे बैठा था और अपनी दोनों टांगें 'V' के अकार में खोल रखी थी| मैंने ऋतू को ठीक बीच में बैठने को कहा, ऋतू बैठ गई और अपना सर मेरे सीने से टिका दिया| हम दोनों ही आसमान में देख रहे थे| चांदनी रात में टीम-टिमाते तारे देखने का मजा ही कुछ और था, ऊपर से चारों तरफ सन्नाटा और हलकी-हलकी हवा ने समा बाँध रखा था|
ऋतू: जानू! आपको पता है आज क्या
हुआ?
मैं: क्या हुआ? (मैंने ऋतू के गाल को चूमते हुए कहा)
ऋतू: ससस... मेरी सहेलियाँ कह रही थी की मैं मोटी हो गई हूँ? मेरी Ass, मेरी Breast और मेरे Lips मोटे हो गए हैं, और ये सब आपकी वजह से हुआ है?
मैं: शिकायत कर रही हो या कॉम्पलिमेंट दे रही हो?
ऋतू: कॉम्पलिमेंट
मैं: I feel you're ready to be a mother!
ऋतू: सच? तो कब बंद करूँ वो प्रेगनेंसी वाली गोली लेना? (उसने मजाक में कहा|)
मैं: पागल! (मैंने ऋतू के दूसरे को गाल को चूमते हुए कहा|)
ऋतू: ससस... सच्ची जानू! आपने मेरे बदन को तराशने में बड़ी मेहनत की है!
मैं: हम्म्म... (मैं ऋतू की जुल्फों की महक सूंघते हुए बोला|)
अब ऋतू ने अपने दाहिने हाथ को मेरी जाँघ पर रख उसे सहलाने लगी जिसका सीधा असर मेरे लंड महराज पर हुआ| उन्हें फूल कर खड़ा होने में सेकंड नहीं लगा और वो ऋतू की कमर पर अपनी दस्तक देने लगे| ऋतू मेरी तरफ घूमी और प्यासी नजरों से मुझे देखने लगी, पर वहाँ कुछ भी कर पाना बहुत बड़ा रिस्क था! पर प्यास तो लगी थी, और उसे बुझाना तो था ही! मैंने ऋतू को ऐसे ही बैठे रहने को कहा और मैंने अपने दोनों हाथों से उसकी पजामी के नाड़े को खोलना शुरू कर दिया| नाडा खोल कर मैंने अपना दाहिना हाथ अंदर डाला तो पाया की ऋतू ने पैंटी नहीं पहनी, मतलब वो पहले से ही तैयारी कर के बैठी थी! मैंने अपनी बीच वाली ऊँगली को ऋतू की बुर में सरकाया तो पाया की वो तो पहले से ही गीली है| "मेरी जान को प्यार चाहिए?" मैंने पुछा तो ऋतू ने सीसियाते हुए 'हाँ' कहा| मैंने अपनी ऊँगली से ऋतू की बुर की फांकों को सहलाना शुरू कर दिया और ऋतू ने अपने आप को मेरी छाती से दबाना शुरू कर दिया| मैंने अपनी तीनों उँगलियों से ऋतू की बुर की फाँकों को धीरे-धीरे मनसलना शरू कर दिया, और ऋतू का कसमसाना शुरू हो गया| मैंने अपनी दो उँगलियाँ उसके बुर में डाली और उन्हें ऋतू की बुर में गोल-गोल घुमाने लगा| अब ऋतू ने अपनी कमर को मेरे लंड पर और दबाना शुरू कर दिया| "जानू...ससस....!!!! आपको नहीं पता ये नौ दिन मैंने कैसे तड़प-तड़प के निकाले हैं!" मुझे ऋतू की प्यास का अंदाज हो चला था तो मैंने अपनी दोनों उँगलियाँ उसकी बुर में तेजी से अंदर-बाहर करनी शुरू कर दी| "उम्ममम ...ससस... और कितना ...स..ससस...तड़पाओगे?" ऋतू ने धीमी आवाज में सिसकते हुए कहा| "जान! प्लीज आज रात इसी से काम चला लो कल शहर पहुँच कर कपडे फाड़ के सेक्स करेंगे!" मैंने अब भी ऋतू की बुर में अपनी ऊँगली अंदर-बाहर किये जा रहा था, ऋतू की आँखें बंद हो चलीं थी और उसके दोनों हाथ मेरी जाँघ पर थे| "ससस...जानू!! ....ससस...पिछले कुछ दिनों से में डरी हुई थी...स्स्स्साहह... मुझे लगा ....
मेरे जिस्म का जादू आप पर से उतर गया!" ऋतू के मुँह से अनायास शब्दों ने मेरा ध्यान खींचा, अब मुझे जानना था की ऋतू किस जादू की बात कर रही है इसलिए मैंने और तेजी से उसकी बुर की चुदाई अपनी उँगलियों से शुरू कर दी!| ऋतू इस आनंद से फिसल कर आगे की ओर जाने लगी तो मैंने अपने बाएँ हाथ को उसके पेट पर रखा और उसे आगे फिसलने नहीं दिया| "ममममममम.... उस सससस....हरामजादी .....ने मुझे एक बात सिखाई थी.... की अपने बंदे को अपने काबू में रखना है तो उसे अपनी चूत से बाँध कर रख! आअह..सससस...." अब मुझे सब कुछ समझ आने लगा था! ऋतू का अचानक से सेक्स में इतना 'निपुण' हो जाना सिर्फ उसकी insecurity को छुपाने के लिए एक पर्दा था| मैं उसे छोड़ कर किसी और के पास ना जाऊँ इसलिए ऋतू इस तरह मुझसे चिपकी रहती थी| मैंने उसे इतनी बार भरोसा दिलाया, कसमें खाईं पर उसे क्यों यक़ीन नहीं होता की मैं बस उसका हूँ| उसका ये possessive होना अब सारी हदें पार कर रहा है, अगर इसने अपनी जलन और insecurity के चलते किसी के सामने कुछ बक दिया तो? वो दिन हम दोनों का अंत होगा! पर आखिर कारन क्या है की ऋतू इस कदर insecure है? मैंने ऐसा क्या कर दिया की उसे ये insecurity होती है? Wait a minute ..... ये मुझसे प्यार भी करती है या फिर ये सिर्फ इसकी सेक्स की भूख है?!! मैं यही सब सोच रहा था और अपनी उँगलियों को ऋतू की बुर में तेजी से अंदर-बाहर किये जा रहा था| अब ऋतू छूटने वाली थी और उसने अपने नाखून मेरी जाँघ में गाड़ दिए थे जिससे मैं अपने ख्यालों से बाहर आया और अगले ही पल ऋतू झड़ गई और निढाल हो कर मेरी छाती पर सर रखे हुए लेटी रही|
ये तो साफ़ था की मैं चाहे कुछ भी कह लूँ या भले ही अपना दिल निकाल कर ऋतू के सामने रख दूँ ये मानने वाली नहीं है| अगर इससे प्यार न करता तो अब तक इसे छोड़ देता पर साला अब करूँ क्या ये नहीं पता! ऊपर से मैं भी चूतिया हो चला था जो ऋतू के चक्कर में एक से बढ़कर एक चूतियापे करने लगा था? क्या जर्रूरत थी तुझे बहनचोद यहाँ छत पर खुले में ये सब करने की? पर अगर ये ना करता तो मुझे ये सब कैसे पता चलता? तुझे जरा भी डर नहीं लगा की तू इस तरह ऋतू को अपने लंड से चिपटाये पड़ा है? भूल गया वो खेत के बीचों बीच पेड़ की डाल पर लटक रहे भाभी और उनके प्रेमी की अस्थियाँ? वहीँ जा कर मरना है तुझे? और ये क्या तूने ऋतू को अपने सर पर चढ़ा रखा है? बहनचोद उसकी हर एक ख्वाइश पागलों की तरह पूरी करता है और बदले में उसे ही तेरे ऊपर विश्वास नहीं! ये कैसा प्यार है?
ऋतू की सांसें दुरुस्त होने तक मेरा ही दिमाग मेरे दिल को गरिया रहा था| "जानू! क्या सोच रहे हो?" ऋतू ने मुझे झिंझोड़ा तो मैं अपने 'मन की अदालत' से बाहर आया| मैंने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया बल्कि अपनी टांगें मोड़ कर ऋतू के इर्द-गिर्द से हटाईं और उठ खड़ा हुआ| ऋतू फटाफट कड़ी हुई और मेरा हाथ पकड़ के रोक लिया; "क्या हुआ? कहाँ जा रहे हो?" मैं अब भी कोई जवाब नहीं दिया और
उसके हाथों की गिरफ्त से अपना हाथ छुड़ाया और आंगन में आ गया| ऋतू छत पर से नीचे झाँकने लगी और फिर उसे मैं बाथरूम में जाता हुआ नजर आया| ऋतू छत पर कड़ी नीचे देखती रही और इंतजार करने लगी की मैं बाथरूम से कब निकलूँगा| मैंने निकल कर ऊपर देखा तो वो अब भी वहीँ खड़ी थी और मेरे ऊपर आने का इंतजार कर रही थी| मैं अगर उस समय ऊपर जाता तो वो मुझसे पूछती की मेरे उखड़ जाने का कारन क्या है और तब मेरा कुछ भी कहना बवाल खड़ा कर देता, ऐसा बवाल जिसे सुन आज काण्ड होना तय था| इसलिए में आंगन में पड़ी चारपाई पर ही लेट गया पर ऋतू अपनी जगह से टस से मस ना हुई और टकटकी बांधे मुझे देखती रही| मैंने अपनी आँखें बंद की और सोने की कोशिश करने लगा, जो बात मेरे दिम्माग में चल रही थी वो ये थी की मुझे अपने दिल पर काबू रखना होगा वरना ऋतू मुझे कहीं फिर से अपनी जिस्म के जरिये पिघला ना ले| पिछले नौ दिनों से जो हम दोनों के बीच जिस्मानी दूरियाँ आई थी उससे कुछ तो काम आसान होगया था पर आज उस कर्म वाले काण्ड ने फिर से उस दबी हुई आग को हवा दे दी थी| शायद इस तरह उससे दूरियाँ बनाने से ऋतू को कुछ अक्ल आये, अब क्योंकि उसकी हर ख़ुशी पूरी करने के चक्कर में मैं अपनी और नहीं लगवाना चाहता था| शादी के बाद चाहे वो मुझसे जो करवा ले पर उससे पहले तो हम दोनों को maturity दिखानी होगी| पर दिमाग जानता था की कुछ होने वाला नहीं है...काण्ड तो होना ही है! इधर ऋतू की हिम्मत नहीं हो रही थी की वो नीचे आ कर मुझसे पूछ सके की मैं क्यों उसके साथ ऐसा बर्ताव कर रहा हूँ? वो पैरापिट वाल पर अपनी कोहनियाँ टिकाये मुझे बस देखती रही! वो पूरी रात मैं बस करवटें बदलता रहा और बार-बार ऋतू को खुद को देखते हुए notice करता रहा| सुबह हुई तो ताई जी उठ के आंगन में आईं; "अरे मुन्ना? तू यहाँ क्या कर रहा है?" उन्होंने पुछा| उन्हें देखते ही ऋतू नीचे आ गई; "ताई जी..
वो रात को पेट ख़राब हो गया था इसलिए मैं नीचे ही लेट गया|" मैंने झूठ बोला| ताई जी मेरे पास बैठ गईं और ऋतू बाथरूम में नहाने घुस गई और फ्रेश हो कर चाय बनाने लगी| मैं भी उठा और नहा धो के तैयार हो गया और अब तो घर वाले सब बरी-बारी नाहा के नाश्ते के लिए तैयार बैठे थे| "मानु, चन्दर तुम लोगों के साथ जायेगा|" ताऊ जी ने कहा और मैंने बस 'जी' कहा| पर ये सुनते ही ऋतू को बहुत गुस्सा आया, वो सोच रही थी की वो शहर जा कर मुझसे कल रात के उखड़ेपन का कारन पूछेगी पर चन्दर भैया के साथ जाने से उसके प्लान पर पानी फिर गया था| पर मुझे तो जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ा था, नाश्ता कर के हम तीनों निकले और बस स्टैंड तक पैदल चल दिए| ऋतू पीछे थी और आगे-आगे मैं और चन्दर भैया थे| वो अपनी बातें किये जा रहे थे और मैं बस हाँ-हुनकुर ही कर रहा था| बस आई और हम तीनों चढ़ गए, ऋतू तो एक अम्मा के साथ बैठ गई| हम दोनों खड़े रहे और कुछ देर बाद हमें सीट मिल गई| मुझे नींद आ रही थी तो मैं खिड़की से सर लगा कर सो गया पर ऋतू के मन में उथल-पुथल मची थी| बस स्टैंड पहुँच कर चन्दर को तहसीलदार के जाना था और उसे वहाँ का कुछ पता नहीं था तो हमने एक ऑटो किया और उसमें बैठ गए| सबसे पहले ऋतू हुई, फिर मैं और आखरी में चन्दर घुसा| मैं ऋतू की तरफ ना देखकर सामने देख रहा था, अब ऋतू मुझसे बात करने को मृ जा रही थी पर अपने बाप के डर के मारे कुछ कह नहीं पा रही थी| ऋतू ने चुपके से मेरा दाहिना हाथ पकड़ लिया पर मैंने किसी तरह हाथ छुड़ा लिया और चन्दर से बात करने लगा| पहले ऋतू का कॉलेज आया और उसे वहाँ उतारने लगे तो लगा जैसे वो जाना ही ना चाहती हो! "जा ना?" मैंने कहा तो ऋतू सर झुकाये कॉलेज के गेट की तरफ चली गई और हमारा ऑटो तहसीलदार के ऑफिस की तरफ चल दिया| चन्दर भैया को वहाँ छोड़ कर मैं घर आ गया और मेल देखने लगा की शायद कोई जॉब ओपनिंग आई हो| एक मेल आई थी तो मैं वहाँ इंटरव्यू के लिए चल दिया| शाम को 4 बजे घर पहुँचा और आ कर ऐसे ही लेट गया| ठीक 5 बजे दरवाजे पर दस्तक हुई और मैंने जब दरवाजा खोला तो सामने ऋतू खड़ी थी|
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ऋतू बिना कुछ कहे अंदर आई और दरवाजा उसने लात मार कर मेरी आँखों में देखते हुए बंद किया| फिर अगले ही पल उसकी आँखें छल-छला गईं और उसने मेरी कमीज का कालर पकड़ लिया और मुझे पीछे धकेलने लगी| "क्या कर दिया मैंने जो आप मुझसे इस तरह उखड़े हुए हो? कल रात से ना कुछ बोल रहे हो न कुछ बात कर रहे हो? ऐसा क्या कर दिया मैंने? कम से कम मुझे मेरा गुनाह तो बताओ? आपके अलावा मेरा है कौन और आप हो की मुझसे इस तरह पेश आ रहे हो?" ऋतू एक साँस में रोते-रोते बोल गई पर उसका मुझे पीछे धकेलना अब भी जारी था| मैंने पहले खुद को पीछे जाने से रोका और फिर झटके से उसके हाथों से अपना कालर छुड़ाया और बोला; "गलती पूछ रही है अपनी? तूने मुझे समझ क्या रखा है? तुझे क्या लगता है की तू मुझे अपने जिस्म की
गर्मी से पिघला लेगी? तुझे इतना समझाया, इतनी कसमें खाईं की मैं तुझसे प्यार करता हूँ और सिर्फ तेरा हूँ पर तेरी ये fucking insecurity खत्म होने का नाम ही नहीं लेती? इसी लिए जयपुर से आने के बाद मुझसे इतना चिपक रही थी ना? मैं तो साला तेरे चक्कर में पागल हो गया था, तुझे गाँव छोड़ के उल्लू की तरह जागता रहता था| तेरे जिस्म ने तो मुझे कहीं का नहीं छोड़ा था, वो तो शुक्र है की मैंने व्रत रखे और खुद पर काबू पाया वरना मैं भी तेरी तरह हरकतें करता! क्या-क्या नहीं किया मैंने तेरे प्यार में और तुझे ये सब मज़ाक लग रहा है? तुझे मनाने के लिए क्या-क्या नहीं किया मैंने? इतना जोखिम उठा कर कल पहले तुझे खेतों में ले गया और फिर पहले तेरे कमरे में आना और वो रात को छत पर बैठना? पर तुझे तो बस अपने जिस्म की आग बुझानी है मुझसे! एक दिन अगर तुझे मैं ना छुओं तो तेरे बदन में आग लग जाती है! तुझे पता भी है की तू अपनी इस जलन के मारे कब क्या बोल देती है की तुझे खुद नहीं पता होता| क्या जर्रूरत थी तुझे आंटी जी से कहने की कि मेरी जॉब चली गई? अगर मैं बात नहीं पलटता तू तो वहाँ सब कुछ बक देती!
काम्य को तू जानती है ना, वो मुँहफ़ट है पर दिल की साफ़ है| वो जानबूझ कर मुझसे मज़ाक करती है और ये सुन कर तुझे किस बात का गुस्सा आता है? भाभी को भी तू अच्छे से जानती है ना? उसके मन में क्या-क्या है वो सब जानती है तू और तूने ही मुझे उनके बारे में आगाह किया था पर आज तक मैंने कभी उनकी तरफ आँख उठा के नहीं देखा| जब मैं बिमारी में गाँव गया था तो उसने क्या-क्या नहीं किया मुझे उकसाने के लिए| पर तेरे प्यार की वजह से मैं नहीं बहका, इससे ज्यादा तुझे और क्या चाहिए?
देख मैं तुझे आज एक बात आखरी बार बोल देता हूँ, आज के बाद अगर मुझे ये तेरी insecurity दिखाई दी तो this will be the end of our relationship!” मेरी बातें सुन ऋतू फफक के रोने लगी और अपने घुटनों के बल बैठ गई और हाथ जोड़ कर मिन्नत करते हुए बोली; "मुझे माफ़ कर दो! प्लीज ....मेरा आपके अलावा और कोई नहीं! ये सच है की मैं insecure हूँ आपको ले कर पर ये भी सच है की मैं आपसे सच्चा प्यार करती हूँ| मैंने आपसे प्यार सेक्स के लिए नहीं किया, बल्कि इसलिए किया क्योंकि इस दुनिया में सिर्फ एक आप हो जो मुझसे प्यार करते हो|"
"तो तुझे ये बात समझ में क्यों नहीं आती की मैं सिर्फ तुझसे प्यार करता हूँ? मैंने आज तक तेरे सामने कभी किसी से flirt नहीं किया तो ये काहे बात की insecurity है?! तुझे ऐसा क्यों लगता है की तुझ में कुछ कमी है? मैं तुझे छोड़ कर किसके पास जाऊँगा? बोल???"
"मुझे नहीं पता...बस डर लगता है की कोई आपको मुझसे छीन लेगा!" ऋतू ने अपने दोनों हाथों को मेरी कमर के इर्द-गिर्द लपेट लिया|
"कोई और नहीं....तू खुद ही मुझे अपने से दूर कर देगी|" मैंने खुद को उसकी गिरफ्त से आजाद करते हुए कहा|
"नहीं ...
प्लीज ऐसा मत कहिये!"
"तुझे पता है मैं कितनी परेशानियों से जूझ रहा हूँ? कितनी जिम्मेदारियाँ मेरे सर पर हैं? जॉब नहीं है, सेविंग्स नहीं हैं और दो साल बाद हमें भाग कर शादी करनी है! क्या-क्या मैनेज करूँ मैं? मैंने तुझसे आजतक कुछ माँगा है? नहीं ना? फिर? "
"एक लास्ट चांस दे दो! I promise ... अब ऐसा कुछ भी नहीं करूँगी! I promise ...!!!" ऋतू ने अपने आँसू पोछे और सुबकते हुए कहा| पर में जानता था की इसके मन की ये सोच कभी नहीं जा सकती| पर सिवाए कोशिश करने के मैं कुछ कर भी नहीं सकता था, प्यार जो करता था उस डफर से! मैं उसके सामन घुटनों पर बैठा और अपने बाएं हाथ से उसके बाल पकडे और उन्हें जोर से खींचा की ऋतू की गर्दन ऊपर को तन गई और उसकी नजरें ठीक मेरे चेहरे पर थीं;
"मैं बस तेरा हूँ...समझी?" ऋतू ने सुन कर हाँ में सर हिलाया पर मैं उससे 'हाँ' सुनने की उम्मीद कर रहा था, उसके कुछ न बोलने और सिर्फ सर हिलाने से मुझे गुस्सा आया और मैंने उसके बाएँ गाल पर एक चपत लगाईं और अपना सवाल दुबारा पुछा; "मैंने कुछ पुछा तुझसे? मैं सिर्फ तेरा हूँ.... बोल हाँ?" तब जा कर ऋतू के मुँह से हाँ निकला|
"तू सिर्फ मेरी है!" मैंने कहा|
"ह...हाँ!" ऋतू ने डर के मारे कहा|
"मैं किस्से प्यार करता हूँ?" मैंने ऋतू के गाल पर एक चपत लगाते हुए पुछा|
"म....मु...मुझसे!"
"तू किससे प्यार करती है?"
"आपसे!"
"और हम दोनों के बीच में कभी कोई नहीं आ सकता!" ऋतू ने ये सुन कर हाँ में गर्दन हिलाई पर मुझे ये जवाब नहीं सुनना था तो मैंने फिर से उसके गाल पर एक चपत लगाईं और तब जा कर ऋतू को समझ आया की मैं क्या सुनना चाहता हूँ|
"ह...हम दोनों के बीच...कोई नहीं आ सकता!" ऋतू ने घबराते हुए कहा|
ऋतू की आँखें रोने से लाल हो चुकी थीं और अब मुझे उस पर तरस आने लगा था, इसलिए मैंने उसके बाल छोड़ दिए और अपनी दोनों बाहें खोल दी| ऋतु घुटनों के बल ही मेरे सीने से लिपट गई और फिर से रोने लगी| मैंने ऋतू के बालों में हाथ फेरना शुरू किया ताकि उसका रोना काबू में आये; "बस ...बस...
हो गया! और नहीं रोना!" ये सुन ऋतू ने धीरे-धीरे खुद पर काबू किया और रोना बंद किया| मैंने उसे अपने सीने से अलग किया और उसके आँसू पोछे फिर मैं खड़ा हुआ और उसे भी सहारा दे कर खड़ा किया| "जाके मुँह धो के आ फिर मैं तुझे हॉस्टल छोड़ देता हूँ|" ऋतू मुँह-धू कर आई और फिर से मेरे गले लग गई; "आपने मुझे माफ़ कर दिया ना?" मैंने उसके जवाब में बस हाँ कहा और फिर उसे खुद से दूर किया और दरवाजा खोल कर बाहर उसके आने का इंतजार करने लगा| ऋतू बेमन से बाहर आई और शायद उसके मन में अब भी यही ख़याल चल रहा था की मैंने उसे माफ़ नहीं किया है| मैंने पहले उसे उसका फ़ोन वापस किया और फिर नीचे से ऑटो कर उसे हॉस्टल छोड़ा| घर पहुँचा ही था की मेरा फ़ोन बज उठा, ये किसी और का नहीं बल्कि ऋतू का ही था| उसने मोहिनी के फ़ोन से मुझे कॉल किया था, ये सोच कर की मैं शायद उसका कॉल न उठाऊँ| मैंने कॉल उठाया" जानू! आपकी एक मदद चाहिए!"
"हाँ बोल|" मैंने सोचा कहीं कोई गंभीर बात तो नहीं? पर अगर ऐसा कुछ होता तो वो उस वक़्त क्यों नहीं बोली जब वो यहाँ थी? "वो कॉलेज के असाइनमेंट्स में एक प्रोजेक्ट मिला था| बाकी साब तो हो गया बस एक वही प्रोजेक्ट बचा है|तो कल आप मेरा प्रोजेक्ट शुरू कर व दोगे?" मैं समझ गया की ये कॉल बस उसका ये चेक करना था की मैंने उसे माफ़ किया है या नहीं? "कल शाम 5 बजे मुझे राम होटल पर मिल|" अभी बात हो ही रही थी की मुझे पीछे से मोहिनी की आवाज आई; "रितिका तेरी बात हो जाए तो मुझे फ़ोन दियो|" ऋतू ने बड़े प्यार से कहा; "मेरी बात हो गई दीदी!" और उसने फ़ोन मोहिनी को दे दिया| "मानु जी! मैं तो आपको अपना दोस्त समझती थी और अपने ही मुझे पराया कर दिया?"
"अरे! मैंने क्या कर दिया?" मैंने चौंकते हुए कहा|
"आप ने अपनी जॉब के बारे में क्यों नहीं बताया?" मोहिनी ने सवाल दागा|
"अरे...वो...याद नहीं रहा?" मैंने बहाना मारा|
"क्या याद नहीं रहा? वो तो माँ ने मुझे बताया तब जाके मुझे पता चला| मैं देखती हूँ कुछ अगर होता है तो आपको बताती हूँ|"
"थैंक यू" मैंने कहा| बस इसके बाद उसने मुझसे कहा की मैं उसे अपना रिज्यूमे भेज दूँ और वो एक बार अपनी कंपनी में बात कर लेगी| रात को बिना कुछ खाये-पीये ही लेट गया, आज जो मैं कहा और किया वो मुझे सही तो लग रहा था पर शायद मेरा ऋतू के साथ किया व्यवहार मुझे ठीक नहीं लग रहा था| मेरा उस पर गुस्सा निकालना ठीक नहीं था....
शायद! खेर अगली सुबह उठा पर आज मुझे कहीं भी नहीं जाना था तो मैं घर के काम निपटाने लगा, झाड़ू-पोछा कर के घर बिलकुल चकाचक साफ़ किया फिर खाना खाया और फिर से सो गया| शाम को पाँच बजे मैं राम होटल पहुँचा तो देखा की ऋतू वहां पहले से ही खड़ी है| हम दोनों पहले की ही तरह मिले और फिर उसने मुझे प्रोजेक्ट के बारे में बताया और हम दोनों उसी में लग गए| घण्टे भर तक हम उसी पर डिसकस करते रहे और थोड़ा हंसी मजाक भी हुआ जैसे पहले होता था| आगे कुछ दिनों तक इसी तरह चलता रहा, हमारा प्यार भरा रिश्ता वापस से पटरी पर आ गया था पर ऋतू अब मुझे नार्मल लग रही थी, मतलब अब उसका वो possessiveness और insecure होना कम हो गया था| मुझे नहीं पता की सच में वो खुद को काबू कर रही थी या फिर नाटक, मैंने यही सोच कर संतोष कर लिया की कम से कम अब वो पहले की तरह तो behave नहीं कर रही|
करवाचौथ से दो दिन पहले की बात थी और ऋतू मुझे कुछ याद दिलाना चाहती थी, पर झिझक रही थी की कहीं मैं उस पर बरस न पडूँ| मैंने फ़ोन निकाला और घर फ़ोन किया; "नमस्ते पिताजी! एक बात पूछनी थी, दरअसल ऑफिस में काम थोड़ा ज्यादा है और बॉस ज्यादा छुट्टी नहीं देगा| तो अगर मैं करवाचौथ की बजाये दिवाली पर छुट्टी ले कर आ जाऊँ तो ठीक रहेगा?" मैंने जान बूझ कर बात बनाते हुए कहा, कारन साफ़ था की कहीं कोई यहाँ ऋतू को लेने ना टपक पड़े| "तूने वैसे भी करवाचौथ पर आ कर क्या करना था? शादी तो तूने की नहीं! पर दिवाली पर अगर यहाँ नहीं आया तो देख लिओ!" पिताजी ने मुझे सुनाते हुए कहा| "जी जर्रूर! दिवाली तो अपने परिवार के साथ ही मनाऊँगा!" बस इतना कह कर मैंने फ़ोन रखा| ऋतू जो ये बातें सुन रही थी सब समझ गई और उसका चेहरा ख़ुशी से जगमगा उठा| "कल सुबह मैं लेने आऊँगा, तैयार रहना!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा और ये सुनके ऋतू इतना चिहुँकि की मुझे गले लगना चाहा, पर फिर खुद ही रूक गई क्योंकि हम बाहर पार्क में बैठे थे| मैंने मन ही मन सोचा की शायद ऋतू को अक्ल आ गई है!
अगली सुबह मैं जल्दी उठा और अपनी बुलेट रानी की अच्छे से धुलाई की, आयल चेक किया और फिर नाहा-धो कर ऋतू को लेने चल दिया| ऋतू पहले से ही अपना बैग टाँगे गेट पर खड़ी थी| मेरी बाइक ठीक हॉस्टल के सामने रुकी और वो मुस्कुराती हुई आ कर पीछे बैठ गई| मैंने बाइक सीधा हाईवे की तरफ मोड़ दी और ऋतू हैरानी से देखने लगी; "हम घर नहीं जा रहे?" उसने पीछे बैठे हुए पुछा| तो मैंने ना में गर्दन हिलाई और इधर ऋतू का मुँह फीका पड़ गया, उसे लगा की हम गाँव जा रहे हैं| एक घंटे बाद मैंने हाईवे से गाडी स्टेट हाईवे 13 पर गाडी मोदी तो ऋतू फिर हैरान हो गई की हम जा कहाँ रहे हैं? आखिर आधे घंटे बाद जब बाइक रुकी तो हम एक शानदार साडी की दूकान के सामने खड़े थे| ऋतू बाइक से उत्तरी और सब समझ गई और मेरी तरफ हैरानी से देखने लगी; "जानू! आप....
थैंक यू!" वो कुछ कहने वाली थी पर फिर रूक गई| मैंने बाइक पार्क की और हम दूकान में घुसे और वहाँ आज बहुत भीड़भाड़ थी| ये दूकान मेरे कॉलेज के दोस्त की थी और मैं यहाँ से कई बार ताई जी और माँ के लिए साडी ले गया था| मुझे देखते ही अंशुल (मेरा दोस्त) काउंटर छोड़ कर आया और हम दोनों गले मिले| "अरे भाभी जी! आइये-आइये!" उसने ऋतू से हँसते हुए कहा| "यार अभी शादी नहीं हुई है, होने वाली है!" मैंने कहा| "तभी मैं सोचूँ की तूने शादी कर ली और मुझे बुलाया भी नहीं!" ये सुन कर हम तीनों हँसने लगे, अंशुल ने अपने एक लड़के को आवाज दी: "भाई और भाभी को साड़ियाँ दिखा और रेट स्पेशल वाले लगाना|"
"यार एक हेल्प और कर दे, स्टिचिंग कल तक करवा दे यार जो एक्स्ट्रा लगेगा मैं दे दूँगा!" मैंने कहा और वो ये सुन कर मुस्कुरा दिया|
"हुस्ना भाभी के पास माप दिलवा दिओ और बोलिओ अंशुल भैया के भाई हैं|" मैंने उसे थैंक्स कहा, फिर वो वापस कॅश काउंटर पर बैठ गया और हम दोनों को वो लड़का साड़ियाँ दिखाने लगा| आज पहलीबार था की ऋतू अपने लिए साडी ले रही थी और बार-बार मुझसे पूछ रही थी की ये ठीक है? आखिर मैंने उसके लिए साडी पसंद की और फिर हम माप देने के लिए उस लड़के के साथ चल दिए| हुस्ना आपा बड़ी खुश मिज़ाज थीं और उन्होंने बड़ी बारीकी से माप लिया और ब्लाउज के कट के बारे में भी ऋतू को अच्छे से समझाया| जब मैंने पैसे पूछे तो उन्होंने 2,000/- बोले जिसे सुनते ही ऋतू मेरी तरफ देखने लगी| पैसे ज्यादा थे पर साडी भी तो कल मिल रही थी| मैंने जेब से पैसे निकाल के उन्हें दिए और कल 12 बजे का टाइम फिक्स हुआ! हम वापस दूकान आये और कॅश काउंटर पर अंशुल ने जबरदस्ती हमें बिठा लिया और चाय मँगा दी| मैंने जब उससे पैसे पूछे तो उसने 2,500/- कहा, जब की साडी पर 3,500/- लिखा था| वो हमेशा जी मुझे होलसेल रेट दिया करता था, पर ऋतू के लिए तो ये भी बहुत था वो फिर से मेरी तरफ देखने लगी| मैंने पेमेंट कर दी और हम बाहर आ गए; "जानू! आपने इतने पैसे क्यों खर्च किये?" ऋतू ने पुछा तो मैंने उसके दोनों गाल उमेठते हुए कहा; "क्योंकि ये मेरी जान का पहला करवाचौथ है! इसे स्पेशल तो होना ही है?" ऋतू की आँखें भर आईं थी, मैंने उसके आँसू पोछे और हम घर के लिए निकल पड़े| घर के पास ही बाजार था वहाँ मुझे मेहँदी लगाने वाली औरतें दिखीं तो मैंने ऋतू को मेहँदी लगवाने को कहा| मेहँदी लगवाने के नाम से ही वो खुश हो गई और फिर उसने अपने पसंद की मेहँदी लगवाई और मुझे दिखाने लगी| आखिर हम घर आ गए और अब भूख बड़ी जोर से लगी थी| इस सब में मैं कुछ खाने को लेना ही भूल गया, मैंने कहा की मैं खाना ले कर आता हूँ तो ऋतू मना करने लगी; "मेरा मन आज मैगी खाने का है|" ऋतू बोली और मैं समझ गया की वो क्यों मना कर रही है, मैं और पैसे खर्चा न करूँ इसलिए| मैंने मैगी बनाई और ऋतू को अपने हाथ से खिलाया क्योंकि उसके तो हाथों में मेहँदी लगी थी|
खाना
खाने के बाद मैंने लैपटॉप पर एक पिक्चर लगा दी, ऋतू ने कहा की हम नीचे फर्श पर बैठें| मैं नीचे बैठा और अपनी दोनों टांगें V के अकार में खोलीं और ऋतू मुझसे सट कर बीच में बैठ गई| लैपटॉप सेंटर टेबल पर रखा था, ऋतू ने अपना सर मेरी छाती पर रख दिया, अपने दोनों हाथ मेरी टांगों पर खोल कर रखे और सामने मुँह कर के पिक्चर देखने लगी| पिक्चर देखते-देखते ऋतू को नींद का झोंका आने लगा और उसकी गर्दन इधर-उधर गिरने लगी, मैंने अपने दोनों हाथों को ऋतू की गर्दन के इर्द-गिर्द से घुमाते हुए उसके होठों के सामने लॉक कर दिया| ऋतू ने मेरे हाथ को चूमा और फिर मेरी दाहिने बाजू का सहारा लेते हुए सो गई| शाम होने को आई थी और अब चाय बनाने का समय था, पर ऋतू नेबड़ी मासूमियत से अपने हाथ मुझे दिखाते हुए तुतला कर कहा: "जानू! मेरे हाथों में तो मेहँदी लगी है! आप ही बना दो ना!" उसके इस बचपने पर ही तो मैं फ़िदा था! मैंने मुस्कुराते हुए चाय बनाई और अब बारी थी उसे चाय पिलाने की| हम दोनों फिर से वैसे ही बैठ गए और मैंने फूँक मार के उसे चाय पिलाई| सात बज गए पर ऋतू जानबूझ कर अब भी अपने हाथ नहीं धो रही थी, उसे मुझसे काम कराने में मजा आ रहा था| जब मैंने उससे पुछा की रात में क्या बनाऊँ तब वो हँसने लगी और बाथरूम में जा कर हाथ धोये और नहा कर आ गई| "आप हटिये, मैं बनाती हूँ!" पर मेरी नजरें उसके हाथों पर थीं जिन पर मेहँदी फ़ब रही थी| मैंने उसके दोनों हाथों को पकड़ा और उन्हें चूम लिया| ऋतू शर्मा गई और फिर ऋतू ने भिंडी की सब्जी और उर्द दाल बनाई| खाना तैयार हुआ और हम दोनों बैठ गए खाने, पर इस बार खाना ऋतू ने मुझे खिलाया| पेट भर के खाना खाया और अब बारी थी सोने की पर ऋतू बस अपने मेहँदी वाले हाथ देखने में मग्न थी| "क्या देख रही है?" मैंने मुस्कुराते हुए पुछा| उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे अपने पास बिठा लिया, फिर अपने दोनों हाथों को मेरी गर्दन के इर्द-गिर्द लपेट कर मेरे कंधे पर सर रखते हुए बोली; "आज मैं बहुत खुश हूँ! आपने बिना मेरे मांगे मेरी हर इच्छा पूरी कर दी! मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था की मुझे आज का दिन देखना नसीब होगा! साडी खरीदना... मेहंदी लगवाना...
ये सब मेरे लिए लिए एक सपने जैसा है| थैंक यू! Thank you for making this day so memorable!" मैंने ऋतू के सर को चूमा और हम दोनों लेट गए, पर आज कमरे का वातावरण बहुत शांत था| पहले ऋतू लेटते ही जैसे अपना आपा खो देती थी और मुझसे चिपक कर चूमना शुरू कर देती थी| पर आज वो बस मुझसे कस कर लिपटी रही और सो गई| मैं इस उम्मीद में की ऋतू कोई पहल करेगी कुछ देर जागता रहा पर जब मुझे लगा वो सो चुकी है तो मैं भी चैन से सो गया|
अगली सुबह ऋतू पहले ही जाग चुकी थी और बाथरूम में नहा रही थी| मैं उठा और खिड़की से पीठ टिका कर हाथ बंधे ऋतू के बाहर निकलने का इंतजार करने लगा| 10 मिनट बाद ऋतू निकली, टॉवल अपने स्तनों के ऊपर लपेटे हुए और उसके गीले बाल जिन से अब भी पानी की बूँदें टपक रही थी| साबुन और शैम्पू की खुशबू पूरे कमरे में भर गई थी और मैं बस ऋतू को देखे जा रहा था| मुझे खुद को देखते हुए ऋतू थोड़ा शर्मा गई और शर्म से उसके गाल लाल हो गए| "क्या देख रहे हो आप?" उसने नजरें झुकाते हुए पुछा| "यार या तो शायद मैंने कभी गौर नहीं किया या फिर वाक़ई में आज तुम्हें पहली बार इस तरह देख रहा हूँ! मन कर रहा है की तुम्हें अपनी बाहों में कस लूँ और चूम लूँ!" मैंने कहा तो ऋतू हँसने लगी; "रात भर का सब्र कर लो, उसके बाद तो मैं आपकी ही हूँ!" "हाय! रात भर का सब्र कैसे होगा!" मैंने कहाँ और ऋतू की तरफ बढ़ने लगा, पर मैंने उसे छुआ नहीं बल्कि बाथरूम में घुस गया| ऋतू उम्मीद कर रही थी की मैं उसे अपनी बाहों में भर लूँगा पर जब मैं उसकी बगल से गुजर गया तो वो थोड़ा हैरान हुई| जब मैं नहा कर निकला तो ऋतू अपने बाल सूखा रही थी, मैं बाहर आया और ऋतू से बोला; "जल्दी से तैयार हो जाओ!"
"क्यों? अब कहाँ जाना है?" ऋतू ने रुकते हुए पुछा|
"पार्लर" ये सुन के ऋतू आँखें फाड़े मुझे देखने लगी!
"पर ...वहाँ...." आगे उसे समज ही नहीं आया की क्या बोलना है|
"अरे बाबा! आज के दिन औरतें पार्लर जाती हैं और पता नहीं क्या-क्या करवाती हैं, तो तुम्हें भी तो करवाना होगा न?!" ऋतू ने तो जैसे सोचा ही नहीं था की उसे ऐसा भी करना होगा|
"पर ...मुझे तो पता नहीं...वहाँ क्या..." ऋतू ने दरी हुई आवाज में कहा क्योंकि वो आजतक कभी पार्लर नहीं गई थी| हमारे गाँव में तो कोई पार्लर था नहीं जो उसे ये सब पता होता|
"जान! वहाँ कोई एक्सपेरिमेंट नहीं होता जो तू घबरा रही है! जो सजने का काम तू घर पर करती है वही वो लोग करेंगे|" अब पता तो मुझे भी ज्यादा नहीं था तो क्या कहता|
"तो मैं यहीं पर तैयार हो जाऊँगी, वहाँ जा कर पैसे फूँकने की क्या जर्रूरत है?"
मैंने थोड़ा गुस्सा करते हुए कहा| "अच्छा? कहाँ है तेरे मेक-अप का सामान? ये एक नेल पोलिश....और ये एक फेसवाश....ओह वेट ये...ये फेस क्रीम...बस?! फाउंडेशन कहाँ है? और...वो क्या बोलते हैं उसे...
मस्कारा कहाँ है?" ये एक दो नाम ऐसे थे जो मैंने कहीं सुने थे तो मैंने उन्हीं को दोहरा दिया| ये सुन कर तो ऋतू भी सोच में पड़ गई क्योंकि उसके पास कोई सामान था ही नहीं, वो मुझे सिंपल ही बहुत अच्छी लगती थी पर आज तो उसका पहला करवाचौथ था तो सजना-सवर्ना तो बनता था|
"पर वहाँ जा कर मैं बोलूं क्या? की मुझे क्या करवाना है? मुझे तो नाम तक नहीं पता की वो क्या-क्या करते हैं|" ऋतू ने पलंग पर बैठते हुए कहा|
'वहाँ जा कर पूछना की Pythagoras थ्योरम क्या होती है?" मैंने थोड़ा मजाक करते हुए कहा|
"वो तो मुझे आती है, a2 + b2 = c2“ ये कहते हुए ऋतू हँसने लगी|
"तू ऐसे नहीं मानेगी ना? रुक अभी बताता हूँ तुझे मैं|" इतना कह कर मैं ऋतू को पकड़ने को उसके पीछे भागा और हम दोनों पूरे घर में भागने लगे| मैं चाहता तो ऋतू को एक झटके में पकड़ सकता था पर उसके साथ ये खेल खलेने में मजा आ रहा था| वो कभी पलंग पर चढ़ जाती तो कभी दूसरे कोने में जा कर मुझे dodge करने की कोशिश करती| आखिर मैंने उस का हाथ पकड़ लिया और उसे बिस्तर पर बिठा दिया और उसके सामने मैं अपने घुटनों पर बैठ गया; "देख...पार्लर जा और वहाँ जा कर manicure, pedicure, bleaching, facial, threading वगैरह-वगेरा करवा| फिर भी कुछ समझ ना आये तो अपना दिमाग इस्तेमाल कर और जो भी तुझे वहाँ पर all - in one पैक मिले उसे करवा ले| वहाँ जो भी आंटी या दीदी होंगी उनसे पूछ लिओ और ये जो तेरे फ़ोन में गूगल बाबा हैं इनमें सर्च कर ले| अब मैं तेरे आगे हाथ जोड़ता हूँ प्लीज चली जा!" मैंने ऋतू के आगे हाथ जोड़े और वो ये देख कर खिलखिलाकर हँस पड़ी| "ठीक है जी! पर पार्लर तक तो छोड़ दो, मुझे थोड़े पता है यहाँ पार्लर कहाँ है|" ऋतू ने हार मानते हुए कहा|
"इतने दिनों से या आती है तुझे ये नहीं पता की पार्लर कहाँ है?" मैंने ऋतू को प्यार से डाँटा|
"आपके लिए चाय बना देती हूँ फिर चलते हैं|" ऋतू ने कहा पर मेरा प्लान तो उसके साथ व्रत रखने का था|
"बिलकुल नहीं! मेरी बीवी भूखी-प्यासी बैठी है और मैं खाना खाऊँ?" मेरे मुँह से बीवी सुनते ही ऋतू का चेहरे ख़ुशी से दमकने लगा|
"आप प्लीज फास्टिंग मत करो! ये फ़ास्ट तो औरतें अपने पति की लम्बी उम्र के लिए करती हैं, ना की आदमी!"
"यार ये क्या बात हुई? मैं इतनी लम्बी उम्र ले कर क्या करूँगा अगर तुम ही साथ न हुई तो? बैलेंस बना कर रखना चाहिए ना?" मेरे तर्क के आगे उसका तर्क बेकार साबित हुआ पर फिर भी ऋतू ने बड़ी कोशिश की पर मैं नहीं माना और मैं भी ये व्रत करने लगा| ऋतू को पार्लर छोड़ा और मैं उसकी साडी लेने चल दिया|
हुस्ना आपा का शुक्रिया किया की उन्होंने इतने कम समय में काम पूरा किया और फिर वापस निकल ही रहा था की अंशुल मिल गया| उससे कुछ बातें हुई और मुझे वापस आने में देर हो गई| दोपहर के 3 बजे थे और ऋतू का फ़ोन बज उठा| "जान! मैं बाहर ही खड़ा हूँ|" ये सुनकर ही ऋतू ने फ़ोन काट दिया और जब वो बाहर निकली तो मैं उसे बस देखता ही रह गया| उसके
चेहरे की दमक 1000 गुना बढ़ गई थी, होठों पर गहरे लाल रंग की लिपस्टिक देख मन बावरा होने लगा था| आज पहलीबार उसने eyeliner लगाया था जिससे उसकी आँखें और भी कातिलाना हो गई थी| उसकी भवें चाक़ू की धार जैसी पतली थीं और मैं तो हाथ बाँधे बस उसे देखता रहा| ऋतू शर्म से लाल हो चुकी थी और ये लालिमा उसके चेहरे पर चार-चाँद लगा रही थी| "जल्दी से घर चलिए!" ऋतू ने नजरें झुकाये हुए ही कहा|
"ना ...पहले मुझे I love you कहो और एक kiss दो!" मैंने ऋतू के सामने शर्त रखी|
"प्लीज ...चलो न...घर जा कर सब कुछ कर लेना...पर अभी तो चलो! मुझे बहुत शर्म आ रही है!"
"ना...मेरी गाडी बिना I love you और 'Kissi' के स्टार्ट नहीं होगी|" माने अपनी बुलेट रानी पर हाथ रखते हुए कहा|
"सब हमें ही देख रहे हैं!" ऋतू ने खुसफुसाते हुए कहा|
"तो? यहाँ तुम्हें जानने वाला कोई नहीं है| Kissi चाहिए मुझे!" मैंने अपने दाएँ गाल पर ऊँगली से इशारा करते हुए कहा| ऋतू जानती थी की मैं मानने वाला नहीं हूँ इसलिए हार मानते हुए उसने थोड़ा उचकते हुए मेरे गाल को जल्दी से चूम लिया और शर्म के मारे मेरे सीने में अपना चेहरा छुपा लिया| "अच्छा बस! इतनी मेहनत लगी है इस चाँद से चेहरे को निखारने में, इसे खराब ना कर|" मैंने ऋतू को खुद से अलग किया| हम वापस बाइक से घर पहुँचे और बाइक से उतरते ही ऋतू भाग कर घर में घुस गई| मैं बस हँस के रह गया, बाइक खड़ी कर मैं ऊपर आया तो ऋतू शीशे में खुद को निहार रही थी उसे खुद यक़ीन नहीं हो रहा था की वो इतनी सुंदर है| "1,200/- लग गए! पर सच में जानू मैंने कभी सोचा नहीं था की मैं इतनी सूंदर हूँ!" ऋतू ने कहा| "अब तो मुझे insecurity होने लगी है!" मैंने हँसते हुए कहा और ऋतू भी ये सुन कर खिलखिलाकर हँसने लगी| मैंने ऋतू को उसकी साडी दी और तैयार होने को कहा क्योंकि हमें मंदिर जाना था जहाँ की कथा होनी थी| इधर मैं भी तैयार होने लगा, पर जब ऋतू पूरी तरह से तैयार हो कर आई तो मेरे चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी|
दो मिनट तक जब मैं कुछ नहीं बोला तो ऋतू ने ही मेरा ध्यान भंग किया; "जानू???" उसके बुलाते ही मेरे मुँह से ये शेर निकला;
"उस हसीन चेहरे की क्या बात है
हर दिल अज़ीज़, कुछ ऐसी उसमें बात है
है कुछ ऐसी कशिश उस चेहरे में
के एक झलक के लिए सारी दुनिया बर्बाद है|"
ये सुनते ही ऋतू को उसकी खूबसूरती का एहसास हुआ और शर्म से उसके गाल फिर लाल हो गए| पर आज मेरा मेरे ही दिल पर काबू नहीं था आज तो उसने बगावत कर दी थी;
"जब चलती है गुलशन में बहार आती है
बातों में जादू और मुस्कराहट बेमिसाल है
उसके अंग अंग की खुश्बू मेरे दिल को लुभाती है
यारो यही लड़की मेरे सपनो की रानी है|"
एक शेर तो जैसे आज उसके हुस्न के लिए काफी नहीं था|
"नज़र जब तुमसे मिलती है मैं खुद को भूल जाता हूँ
बस इक धड़कन धड़कती है मैं खुद को भूल जाता हूँ
मगर जब भी मैं तुमसे मिलता हूँ मैं खुद को भूल जाता हूँ|"
आज तो वो शायर बाहर आ रहा
था जो आशिक़ी की हर हद को फाँद सकता था|
"तेरे हुस्न का दीवाना तो हर कोई होगा लेकिन मेरे जैसी दीवानगी हर किसी में नहीं होगी।"
मेरी एक के बाद एक शायरी सुन ऋतू का शर्म के मारे बुरा हाल था, उसके गाल और कान पूरे लाल हो गए थे| वो बस नजरें झुकाये सब सुन रही थी और अपने आप को मेरी बाहों में बहक जाने से रोक रही थी| वो कुछ सोचती हुई मेरे नजदीक आई और मेरी आँखों में देखते हुए बोली; "हमे कहाँ मालूम था की ख़ूबसूरती क्या होती है? आज आपने हमारी तारीफ कर हमें हसीन बना दिया|" उसके इस शेर पर मेरा मन किया की उसके हसीन लबों को चूम लूँ पर फिर खुद पर काबू पाया| "पहली बार के लिए शेर अच्छा था!" मैंने ऋतू के शेर की तारीफ करते हुए कहा| मैंने ऋतू का दाहिना हाथ पकड़ा और टेबल पर से चूड़ियाँ उठा कर उसे पहनाने लगा, साइज थोड़ा बड़ा था पर चूँकि imitation जेवेलरी थी तो वो फिर भी अच्छी लग रही थी| "ये तो मैं लेना भूल ही गई थी!" ऋतू ने कहा पर मैंने तो इस दिन की प्लानिंग पहले से ही कर रखी थी| बस एक चीज बची थी वो था सिन्दूर! मैंने आते समय वो भी ले लिया था, डिब्बी से एक चुटकी सिन्दूर निकाल के मैंने ऋतू की मांग में भरा तो ऋतू ने अपनी आँखें बंद कर लीन और आसूँ के एक बूँद निकल कर नीचे जा गिरी| "Hey??? क्या हुआ मेरी जान?" ऋतू ने खुद को रोने से रोका और फिर बोली; "आज से मैं आपकी permanent wife बन चुकी हूँ!" उसने थोड़ा माहौल हल्का करने के लिए कहा| पर मैं उसका मतलब समझ गया था, उसका मतलब था की आज से हम दोनों का प्यार पुख्ता रूप ले चूका है और अब हम पति-पत्नी बन चुके हैं| "No...
there's something missing!" मेरे मुँह से ये सुन ऋतू सोच में पड़ गई, पर जब मैंने जेब से उसके लिए लिया हुआ मंगलसूत्र निकाला तो वो सब समझ गई| "ये तो नया है! वो पुराना कहाँ गया?" ऋतू ने पुछा| "जान वो तो नकली था! ये असली वाला है|" ये सुन कर ऋतू चौंक गई और अपने होठों पर हाथ रखते हुए बोली; "ये सोने का है? पर पैसे?" मैं जवाब देने से पहले ही ऋतू के पीछे आया और उसे अपने हाथों से मंगलसूत्र पहनाते हुए कहा; "मेरी जान से तो महँगा नहीं हो सकता ना?" ऋतू ये सुन कर चुप हो गई और आगे कुछ नहीं बोली, वो जानती थी की आगे अगर कुछ बोली तो मैं नाराज हो जाऊँगा| वो फिर से मुस्कुराने लगी; "Technically now we're husband and wife!!!" ये सुन कर ऋतू बहुत-बहुत खुश हुई और हम दोनों का कतई मन नहीं था की ये समां कभी खत्म हो पर पूजा के लिए तो जाना ही था!
ख़ुशी-ख़ुशी ऋतू ने पूजा का सारा सामान एक बड़ी थाली में इकठ्ठा किया और हम घर से निकले| किसी संस्था ने एक मंदिर के बाहर बहुत बड़ा पंडाल लगाया था और वहीँ पर पूजा होनी थी| हम दोनों भी वहाँ पहुँच गए, वहीँ पर हमें रिंकी भाभी मिलीं जिससे ऋतू को एक कंपनी मिल गई| पूरे विधि-विधान से पूजा और कथा हुई और रात 8 बजे हम घर लौटे| अब एक दिक्कत थी, वो ये की चंद्र उदय होने के समय बिल्डिंग की सभी औरतें और आदमी वहाँ इकठ्ठा होने वाले थे और ऐसे में हम दोनों का वहाँ जाना शायद किसी न किसी को खलता| मैं अभी ये सोच ही रहा था की रिंकी भाभी ने दरवाजा खटखटाया; "अरे रितिका तू यहाँ क्या कर रही है, चल जल्दी से ऊपर|" अब ऋतू तो कब से ऊपर जाना चाहती थी पर मैंने ही उसे मना कर दिया था; "भाभी वो... अभी वहाँ सब होंगे तो....
हम दोनों को देख कर कहीं कुछ ऐसा वैसा बोल दिया तो मुझे गुस्सा आ जायेगा!" मैंने अपनी चिंता जताई|
"कोई कुछ नहीं कहेगा, मैं बोल दूँगी ये मेरी बहन है और तुम तो मेरे छोटे देवर जैसे हो| पापा भी ऊपर ही हैं कोई कुछ बोला तो जानते हो ना पापा कैसे बरस पड़ते हैं?" भाभी की बात सुन कर मन को चैन आया की सुभाष अंकल तो सब जानते ही हैं की हम दोनों की शादी होने वाली है| इसलिए हम तीनों ऊपर आ गए और यहाँ तो लोगों का ताँता लगा हुआ है| एक-एक कर सब हम दोनों से मिले, इधर ऋतू ने जा कर सुभाष अंकल जी के पेअर छुए और उनका आशीर्वाद लिया| काफी लोगों से तो मैं आज पहली बार मिल रहा था इसका कारन था की मेरे पास कभी किसी से घुलने-मिलने का समय ही नहीं होता था| ऋतू के कॉलेज से पहले भी मैं घर पर बहुत कम ही रहता था, अकेले रहने से तो बाहर घूमना अच्छा था इसलिए मैं अक्सर फ्री टाइम में खाने-पीने निकल जाता और रात को आ कर सो जाया करता था| आज जब सब से मिला तो सब यही कह रहे थे की एक ही बिल्डिंग में रह कर कभी मिले नहीं| इधर ऋतू भाभी के साथ बाकी सब से मिलने में व्यस्त थी, भाभी सब को यही कह रही थी की हम दोनों की शादी होने वाली है और ये ऋतू का पहला करवाचौथ है| सब हैरान थे की भला ये क्या बात हुई की शादी के पहले ही करवाचौथ तो भाभी ही बीच-बचाव करते हुए बोली; "जब दिल मिल गए हैं तो ये रस्में निभानी ही चाहिए|"
खेर आखिर कर चाँद निकल ही आया और सब आदमी अपनी-अपनी बीवियों के पास जा कर खड़े हो गए| आज पहलीबार था की हम दोनों यूँ सबके सामने प्रेमी नहीं बल्कि पति-पत्नी बन के विधि-विधान से पूजा कर रहे हैं| शर्म से ऋतू पूरी लाल हो चुकी थी और इधर थोड़ी-थोड़ी शर्म मुझे भी आने लगी थी| ऋतू ने जल रहे दीपक को छन्नी में रख के पहले चाँद को देखा और फिर मुझे देखने लगी| उस छन्नी से मुझे देखते ही उसकी आँखें बड़ी होगी ऐसा लगा जैसे वो मुझे अपनी ही आँखों में बसा लेना चाहती हो| उस एक पल के लिए हम दोनों बस एक दूसरे को देखे जा रहे थे, बाकी वहाँ कौन क्या कर रहा है उससे हमें कोई सरोकार नहीं था| आखिर भाभी ने हँसते हुए ही हम दोनों की तन्द्रा भंग की; "ओ मैडम! देखती रहोगी की आगे पूजा भी करोगी?" तब जा कर हम दोनों का ध्यान भंग हुआ, मैं तो मुस्कुरा रहा था और ऋतू शर्म से लाल हो गई! भाभी के बताये हुए तरीके से उसने पूजा की और अंत में मेरे पाँव छुए| अब ये पहली बार था की ऋतू मेरे पाँव छू रही थी और मुझे समझ नहीं आया की मैं उसे क्या आशीर्वाद दूँ? मैंने बस अपना हाथ उसके सर पर रख दिया और दिल ही दिल में कामना करने लगा की मैं उसे एक अच्छा और सुखद जीवन दूँ| बाकी सब लोग अपनी पत्नियों को पानी पिला रहे थे तो मैंने भी पानी का गिलास उठा कर ऋतू को पानी पिलाया और उसके बाद उसने भी मुझे पानी पिलाया| अब ये देख कर भाभी फिर से दोनों की टांग खींचने आ गई; "अच्छा जी!!! मानु ने भी व्रत रखा था?
वाह भाई वाह!" जिस किसी ने भी ये सुना वो हँसने लगा, सुभाष अंकल बोले; "बेटा यूँ ही हँसते-खेलते रहो और जल्दी से शादी कर लो|"
"बस अंकल जी 2 साल और फिर तो शादी ...!!!" मैंने भी हँसते हुए कहा| ऋतू का शर्माना जारी था.... सारे लोग एक-एक कर नीचे आ गए|
update 50
नीचे आ कर मैंने सबसे पहले ऋतू के लिए दूध बनाया, ये पहलीबार था की उसने ऐसा व्रत रखा हो और मुझ उसके स्वास्थ्य की बहुत चिंता थी| ऋतू ने बहुत मना किया की इसकी कोई जर्रूरत नहीं पर मैंने फिर भी उसे जबरदस्ती दूध पिला दिया| "आप भी पियो न, व्रत तो आपने भी रखा था ना?" ऋतू ने कहा| "जान! मैं अभी अगर दूध पी लूँगा तो खाना नहीं खाऊँगा, इसलिए मेरी चिंता मत कर| अब ये बता की खाना क्या खाओगी?" मैंने खाना आर्डर करने के इरादे से कहा पर ऋतू एक दम से उठ कड़ी हुई; "कोई आर्डर-वॉर्डर करने की जर्रूरत नहीं है, मैं बनाऊँगी खाना!" ऋतू ने लाजवाब खाना बनाया और फिर हमेशा की तरह हमने एक दूसरे को अपने हाथों से खिलाया| अब बारी थी सोने की और ऋतू को सुबह से देख कर ही मेरा मन मचल रहा था| कुछ यही हाल ऋतू का भी था जो कब से मेरी बाहों में सिमट जाना चाहती थी|
ऋतू अपनी साडी उतारने लगी, उसका ध्यान मेरी तरफ नहीं था पर मेरी आँखें तो उसके बदन से चिपकी हुई थीं| ऋतू ने साडी उतारी और उसे फोल्ड करने लगी, पेटीकोट और ब्लाउज में आज वो खर ढा रही थी| मुझसे रुका न गया तो मैं उठा और जा कर उसके पीछे उससे सट कर खड़ा हो गया| मेरे जिस्म का एहसास पाते ही ऋतू सिंहर गई और उसके हाथ साडी फोल्ड करते हुए रूक गए| मैंने अपन दोनों हाथों से ऋतू की कमर को थामा और उसकी गर्दन को चूमा और फिर जैसे मुझे कुछ याद आया और मैं ऋतू को छोड़ कर किचन में गया| इधर ऋतू हैरान-परेशान से खड़ी अपने सवालों का जवाब ढूँढने लगी, की आखिर क्यों मैं उसे ऐसे छोड़ कर किचन में चला गया| मैं जब किचन से लौटा तो मेरे हाथ में एक पानी का गिलास था और ऋतू की आँखों में सवाल| "आज दवाई नहीं ली ना?" मैंने ऋतू को उसकी प्रेगनेंसी वाली दवाई की याद दिलाई और उसने फटाफट अपने बैग से दवाई निकाली और पानी के साथ खा ली| अब और कोई भी काम नहीं बचा था, ऋतू ने साडी आधी ही फोल्ड की थी और जब वो उसे दुबारा फोल्ड करने को झुकी तो मैंने उसका हाथ पकड़ के झटके से अपनी तरफ खींचा| ऋतू सीधा मेरे सीने से आ लगी और अपन असर मेरे सीने में छुपा लिया| अब तो मेरे लिए सब्र कर पाना मुश्किल था, मैंने ऋतू को गोद में उठाया और उसे पलंग पर लिटा दिया| ऋतू ने भी फटाफट अपना ब्लाउज खोलना शुरू किया और इधर मैंने उसके पेटीकोट का नाडा खोल दिया| ब्लाउज ऋतू ने निकाला तो उसका पेटीकोट मैंने निकाल कर कुर्सी पर रख दिया| अब ऋतू सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी और मैं अभी भी पूरे कपड़ों में था, मैंने एक-एक कर सारे कपडे निकाल कर कुर्सी पर रखे| ऋतू उठ के बैठी और अपनी ब्रा का हुक खोल उसे निकाल दिया, अभी
मैं ये कपडे कुर्सी पर रख ही रहा था की ऋतू ने मेरे कच्छे के ऊपर से मेरे लंड को चूम लिया और अपनी दोनों हाथों की उँगलियों को मेरे कच्छे की इलास्टिक में फँसा कर नीचे सरका दिया| आगे का काम मैंने खुद ही किया और कच्छा निकाल कर कुर्सी पर रख दिया|
"क्या बात है जानू! आज तो सारे कपडे आप कुर्सी पर रख रहे हो?"
"कल मेरी जान को उठा के ना रखने पड़े इसलिए कुर्सी पर रख रहा हूँ|" ये कहते हुए मैं ऋतू की बगल में लेट गया| ऋतू ने एकदम से मेरी तरफ करवट ली और मेरे होठों को Kiss करने लगी| "आज पार्लर के बाहर आप बहुत naughty हो गये थे?" ऋतू ने मेरे ऊपर वाले होंठ को चूमते हुए कहा| "पहले तुम naughty हो जाए करती थी अब मैं हो जाता हूँ!" मैंने जवाब दिया और ऋतू को अपनी बुर मेरे मुँह पर रख कर बैठने को कहा| ऋतू बैठी तो सही पर उसका मुँह मेरे लंड की तरफ था और इससे पहले की मैं उसकी बुर को अपनी जीभ से छु पाता वो आगे को झुक गई और तब मुझे एहसास हुआ की ऋतू ने अब भी पैंटी पहनी हुई थी| हम दोनों इतना बेसब्र हो गए थे की ऋतू की पैंटी उतारने के बारे में भूल गए थे| मेरा मन आज उसकी बुर का स्वाद चखने का था, ऐसा लग रहा था जैसे एक अरसा हुआ उसकी बुर का स्वाद चखे! मैंने ऋतू को सीधा बैठने को कहा, तो वो अपनी बुर मेरे मुँह पर टिका कर बैठ गई|
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फिर मैंने उसे अपनी पैंटी को उसके बुर के छेद के ऊपर से हटाने को कहा ताकि मैं उसे अच्छे से चाट सकूँ| ऋतू ने अपने दाहिने हाथ के अंगूठे से अपनी पैंटी को इस कदर साइड किया की मुझे ऋतू के बुर के द्वार साफ़ नजर आये| मैंने अपनी जीब निकाल कर ऋतू की बुर को चाटना शुरू किया, "ससससस...आह...सस्म्ममं मममम मममम" की आवाज मेरे कमरे में गूँजने लगी| मस्ती आकर ऋतू ने अपनी बुर को मेरे मुँह पर आगे-पीछे रगड़ना शुरू कर दिया| उसके ऐसा करने से मेरे होठों और उसकी बुर की पंखड़ियों में घर्षण पैदा होता और ऋतू सिस्याने लगती! अगले पांच मिनट तक ऋतू अपनी बुर को इसी तरह अपनी बुर को मेरे मुँह पर घिसती रही पर अब भी एक अड़चन थी|
ऋतू अब भी अपनी पैंटी पकड़ के बैठी थी जिससे उसे वो स्पीड हासिल नहीं हो रही थी जो वो चाहती थी, ऋतू उठी और गुस्से से अपनी पैंटी निकाल फेंकी और दुबारा मेरे मुँह पर बैठ गई| इस बार आसन दूसरा ग्रहण किया, इस बार वो मेरी तरफ मुँह कर के बैठी, उसका दायाँ हाथ मेरे मस्तक पर था और बाएं हाथ को उसने मेरे पेट पर रख कर सहारा लिया ताकि वो गिर ना जाए|
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मैंने अपनी जीभ निकल के ऋतू की बुर के अंदर प्रवेश कराई की ऋतू की सिसकारी निकल पड़ी और उसने अपनी कमर को पहले की तरह आगे-पीछे चलाना शुरू कर दिया| ऐसा लग रहा था जैसे मेरी जीभ मेरे लंड का काम कर रही है और ऋतू की बुर छोड़ रही है| ऋतू की नजर मेरे चेहरे पर टिकी थी और वो ये देख रही थी की मुझे इसमें कितना मज़ा आ रहा है| दस मिनट तक ऋतू बिना रुके लय बद्ध तरीके से अपनी कमर को मेरे होठों पर आगे-पीछे करती रही और मैं उसकी बुर को किसी आइस-क्रीम की तरह चाटता रहा| "ससाह...ममः...मममममम...अअअअअअअअ ...!!!" कर के ऋतू ने पानी छोड़ा जो बहता हुआ मेरे मुँह में भर गया|
ऋतू मेरे ऊपर से लुढ़क कर लेट गई, इधर मेरा लंड पूरी तैयारी में खड़ा था और इंतजार कर रहा था की उसका नंबर कब आएगा? ऋतू कुछ तक गई थी इसलिए वो अपनी साँसों को काबू कर रही थी पर उसकी नजर मेरे लंड पर थी| मैंने अपने लंड को पकड़ा और उसे हिला कर उसे उसके दर्द का एहसास दिलाया| थोड़ा प्यार तो उस बिचारे को भी चाहिए था.....
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ऋतू को भी मेरे लंड पर तरस आ गया, या ये कहे की उसके मुँह में पानी आ गया| वो उठ के बैठी मेरे लंड को अपने मुट्ठी में पकड़ के उसका अच्छे से दीदार करने लगी| उसके हाथ लगते ही प्री-कम की एक बूँद लंड के छेद से बाहर आई, ऋतू ने लंड की चमड़ी पकड़ के उसे एक बार ऊपर-नीचे किया तो उस प्री-कम की बूँद ने पूरे लंड को गीला कर दिया|
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ऋतू ने अपने गर्म-गर्म साँस का भभका मेरे लंड पर मारा तो उसमें खून का प्रवाह तेज हो गया| ऋतू ने आधा लंड अपने मुँह भरा और अपने मुँह को मेरे लंड पर ऊपर-नीचे करना शुरू कर दिया| धीरे-धीरे ऋतू मेरे लंड को जितना हो सके उतना अपने मुँह में और अंदर लेती जा रही थी| फिर कुछ पलों के लिए ऋतू ने जोश में आ कर मेरा पूरा लंड अपने गले तक उतार लिया और कुछ सेकण्ड्स के लिए रूक गई| जब उसे लगा की उसकी सांस रूक रही है तो उसने पूरा लंड अपने मुँह से निकाला| मेरा पूरा लंड उसके थूक से सन गया था और चमकने लगा था| पर उसका मन अभी भरा नहीं था, ऋतू ने अपने हाथ से चमड़ी को आगे-पीछे किया और फिर अपनी जीभ से पूरे लंड को जड़ से ले कर छोर तक चाटने लगी| अगले पल उसने वो किया जिसकी उम्मीद मैंने कभी नहीं की थी, उसने झुक कर मेरे टट्टों (अंडकोष) को अपने मुँह में भर के चूसा! मैं आँखें फाड़े उसे देखने लगा और ऋतू बस मेरी तरफ देख कर मुस्कुरा दी| ऋतू ने फिर से मेरे लंड को अपने मुँह में लिया और अपने मुँह को फिर से ऊपर-नीचे करते हुए लंड चूसने लगी| आज तो मुझे बहुत मजा आ रहा था और लग रहा था की मैं छूट जाऊँगा इसलिए मैंने ऋतू को रोका और लिटा दिया, उसकी टांगों को चौड़ा कर मैं बीच में आ गया| लंड को उसकी बुर पर सेट किया और एक झटका मार के अंदर ठेल दिया| चूँकि मेरा लंड पहले से ही ऋतू के थूक और लार से भीगा हुआ था इसलिए मुझे ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी| एक धक्का और आधे से
ज्यादा लंड अंदर पहुँच गया!
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ऋतू की बुर अंदर से बहुत गीली हो चुकी थी और वो मेरा पूरा लंड खाना चाहती थी| इसलिए अगले धक्के से पूरा लंड अंदर चला गया "आह! ममममम ममममममममम ...ससस..!!!" अंदर की गर्माहट पा कर लंड प्रफुल्लित हो उठा और मैंने अब अपने लंड को जड़ तक अंदर पेलना शुरू कर दिया| जब लंड अंदर पूरा पहुँचता तो ऋतू की बुर अंदर से टाइट हो जाती और लंड बाहर निकालते ही उसकी बुर अंदर से ढीली हो जाती| अगले पाँच मिनट तक मैं इसी तरह ऋतू की बुर चुदाई करता रहा| ऋतू की आँखों में मुझे कभी न खत्म होने वाली प्यास नजर आ रही थी इसलिए मैं उस पर झुका और उसके होठों को Kiss किया, मैंने वापस खड़ा होना चाहा पर ऋतू ने अपने अपनी एक बाँह को मेरे गले में डाल दिया और मुझे अपने ऊपर ही झुकाये रखा|
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मैं उसके ऊपर झुके हुए ही अपनी कमर को चलाता रहा और ऋतू की बुर से पूछ-पूछ की आवाज आती रही| "स्सम्म्म हहहह ...मामामा..आह!" कहते हुए ऋतू उन्माद से भरने लगी! उसकी बुर में घर्षण बढ़ चूका था और वो किसी भी वक़्त छूट सकती थी पर मुझे अभी और समय चाहिए था, इतने दिनों से जो प्यासा था! मैं रूका और ऋतू को पलट के उसे घुटनों के बल आगे को झुका दिया| ऋतू के घुटने मुड़ के उसकी छाती से दबे हुए थे, मैंने पीछे से ऋतू के कूल्हों को पकड़ के उसके बुर के सुराख को उजागर किया और अपना लंड अंदर पेल दिया!
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हमला इतना तीव्र था की ऋतू दर्द से तड़प उठी; "अअअअअअअहहहहहहहह !!!" चिल्लाते हुए उसने बिस्तर की चादर को अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया| मेरा पूरा लंड ऋतू की बुर में उतर चूका था इसलिए मैंने बिना रुके धक्के मारने शुरू कर दिए| हर धक्के से ऋतू का जिस्म कांपने लगा था और आनंद और दर्द के मिले जुले एहसास ने उसे छूटने के कगार पर पहुँचा दिया| मैं भी स्खलित होने के बहुत नजदीक था इसलिए मेरे धक्कों की गति और बढ़ गई थी! अगले कुछ पलों में पहले मैं और फिर ऋतू एक साथ स्खलित हुए और एक दूसरे से अलग हो कर पस्त हो गए| सांसें दुरुस्त हुई तो मैंने ऋतू को देखा, उसके चेहरे पर संतुष्टि की ख़ुशी दिखी| "कभी-कभी जान निकाल देते हो आप!" ऋतू ने प्यार भरी शिक़ायत की तो जवाब मैंने अपने दोनों कान पकडे और उसे सॉरी कहा| "पर मज़ा भी तभी आता है!" ऋतू ने शर्माते हुए कहा| मैंने उठ के ऋतू को अपने ऊपर खींच लिया और उसके गालों को चूमा और हम दोनों ऐसे ही सो गए|
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अगली सुबह हुई तो हम अब भी उसी तरह लेटे हुए थे| ऋतू की आँख खुली और उसने मेरी गर्दन को चूमा तब मेरी आँख खुली| मैंने ऋतू के सर को चूमा और तब ऋतू उठ के बाथरूम में घुस गई| मैं भी अंगड़ाई लेता हुआ उठा और अपना फ़ोन देखा तो उसमें एक मेल आई थी| मुझे एक इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था, मेरे पास बस दो घंटों का समय था इसलिए जैसे ही ऋतू बाथरूम से निकली मैं तुरंत बाथरूम में घुस गया| 10 मिनट में नहा कर बाहर आया,
ऋतू मेरी टी-शर्ट पहने हुए चाय बना रही थी| "जान! प्लीज जल्दी से कपडे पहनो, I've an interview to catch!" ये सुनते ही ऋतू ने फटाफट चाय बनाई और मेरे लिए टोस्ट भी बना दिए| मैंने कपडे पहने और खड़े-खड़े ही नाश्ता किया और दोनों साथ निकले, ऋतू को मैंने हॉस्टल छोड़ा; "Best of luck!!!" ऋतू ने कहा और मैंने मुस्कुरा कर थैंक यू कहा| फिर मैं इंटरव्यू के लिए पहुँच गया, वहाँ गिनती के लोग थे और जब मेरा नंबर आया तो उन्होंने मेरा रिज्यूमे देखा और फाइनली मैं सेलेक्ट हो गया! आज जितनी ख़ुशी मुझे पहले कभी नहीं हुई थी! मैंने तुरंत ऋतू को कॉल किया और उसे कॉलेज के बाहर बुलाया, वो भी मेरी आवाज से मेरी ख़ुशी समझ चुकी थी| मैं ख़ुशी से इतना बावरा हो गया था की मुझे कोई होश नहीं था| जैसे ही ऋतू कॉलेज के गेट से बाहर आई मैंने उसे गोद में उठा लिया और गोल-गोल घूमने लगा| "I'm so happy!" कहते हुए मैंने ऋतू को नीचे उतारा, कॉलेज का गार्ड मुझे ऐसा करते हुए देख रहा था| जब मेरा ध्यान उस पर गया तो मैंने ऋतू का हाथ पकड़ा और उसे खींच कर पार्क की तरफ भागा| ऋतू भी मेरे साथ ऐसे भाग रही थी जैसे मैं उसे literally घर से भगा कर ले जा रहा हूँ| आस-पास जो भी कोई था वो हम दोनों को इस तरह भागते हुए देख रहा था| आखिर हम पार्क पहुँचे और वहाँ बेंच पर बैठ कर अपनी साँसों को काबू करने लगे|
"I ..... got the job!" मैंने उखड़ी-उखड़ी साँसों को काबू में करते हुए कहा| इतना सुनना था की ऋतू मेरी तरफ मुड़ी और कस कर मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया| "40K per month, Saturday is half day!"
"Thank God!" ऋतू ने भगवान् को शुक्रिया करते हुए कहा|
"हाँ बस एक दिक्कत है, हेड ऑफिस उन्नाओ में है| तो हफ्ते में एक दिन up-down करना पड़ेगा|" मैंने कहा|
"कोई बात नहीं!" एक-आध दिन सब्र कर लेंगे!" ऋतू ने मुस्कुराते हुए कहा|
"जान! सब कुछ सेट हो गया है अब! 40K ... उफ्फ्फ!! मुझे तो यक़ीन नहीं हो रहा!”
"तो चलो एक बार हिसाब कर लेते हैं की आपके क्या-क्या expenses हैं?" ऋतू ने बैग से कॉपी पेन निकालते हुए कहा| ये हरकत बचकानी थी पर मैं तो पहले से ही सब हिसाब किये बैठा था| मैंने अपना फ़ोन निकला और ऋतू को एक मैसेज भेजा जिसमें सारा हिसाब पहले से ही लिखा था| जब ऋतू ने वो पढ़ा तो वो हैरानी से मुझे देखने लगी:
1. घर का किराया: 8,500/- (इस महीने से बढ़ रहा है|)
2. राशन (मैक्सिमम): 3,000/-
3. बाइक की मेंटेनेंस: 3,000/- जिसमें 1,000/- reimburse होगा|
4.
अतिरीक्त खर्चा: 4,000/- (provision for any unexpected expense)
हर महीने बचत: (कम से कम) 22,500/- इस हिसाब से 31 महीने (ऋतू के थर्ड ईयर के पेपर देने तक) के हुए 6,97,500/-
ऋतू ने जब 6 लाख की फिगर देखि तो उसकी आँखें छलक आईं; "जान ये फिगर और भी बढ़ेगी क्योंकि ये जो मैंने अतिरिक्त खर्चा रखा है ये भी कभी न कभी बचेगा! तो कम से कम ये मान कर चलो की हमारे पास 7 लाख होंगे! इतने पैसों से हम नई जिंदगी आराम से शुरू कर सकते हैं| अगर मैंने इन पैसों की FD करा दी तो ब्याज और भी मिलेगा!” उस समय मेरे दिमाग में जो अकाउंटेंट वाला दिमाग था वो बोलने लगा था और साड़ी प्लानिंग कर के बैठा था| ऋतू रोती हुई मुझसे लिपट गई; "जानू! मुझसे in 31 महीनों का सब्र नहीं होता!"
"जान! मैं हूँ ना तेरे साथ, ये 31 महीने मैं अपने प्यार से भर दूँगा!" मैंने ऋतू के सर को चूमते हुए कहा|
"जोइनिंग कब से है?" ऋतू ने पुछा|
"नेक्स्ट मंथ से! शुरू में तुम्हें थोड़ी दिक्कत होगी, क्योंकि काम समझने में थोड़ा टाइम लगेगा|"
"कोई बात नहीं! कम से कम आधा सैटरडे और पूरा संडे तो होगा हमारे पास!" ऋतू ने मुस्कुराते हुए कहा|
अब ये ख़ुशी सेलिब्रेट करनी तो बनती थी, इसलिए हम दोनों पिक्चर देखने गए और पिक्चर के बाद मैंने खुद हॉस्टल आंटी जी को फ़ोन कर दिया ये बोल कर की ऋतू मेरे साथ है और मैं उसे डिनर के बाद छोड़ दूँगा| हमने अच्छे से डिनर किया और फिर मैंने एक मिठाई का डिब्बा लिया और ऋतू को हॉस्टल छोड़ने चल दिया| वहाँ पहुँच के आंटी जी के पाँव छुए और उनका मुँह मीठा कराया की मेरी जॉब लग गई है| तभी मोहिनी भी आ गई और वो भी खुश हुई की मेरी नौकरी लग गई है और पूरा का पूरा मिठाई का डिब्बा ले कर खाने लगी| खेर इसी तरह दिन गुजरने लगे और दिवाली का दिन भी जल्द ही आ गया| मैं ऋतू को हॉस्टल से लेकर सीधा अंशुल की दूकान पर पहुँचा और माँ, ताई जी और भाभी के लिए साड़ियां खरीदी| एक साडी मैंने ऋतू के लिए भी खरीदी पर किसी तरह नजर बचा कर ताकि वो देख न ले, ताऊ जी, पिताजी और चन्दर के लिए सूट का कपडा लिया| वैसे तो मैं चन्दर और भाभी केलिए कुछ लेना नहीं चाहता था पर मजबूरी थी वरना सब कहते की इनके लिए क्यों कुछ नहीं लाया| ख़ुशी-ख़ुशी हम दोनों घर पहुँचे तो देखा घर का रंग-रोगन कराया जा चूका था| ऋतू तो सीधा घर घुस गई और मेंबीके कड़ी कर पिताजी से मिला और उनके पाँव हाथ लगाए| फिर उन्हें और ताऊ जी को ले कर मैं आँगन में आ गया और चारपाई पर बिठा दिया| "ऋतू, दरवाजा बंद कर दे!" मैंने ऋतू से कहा और फिर सभी को आवाज दे कर मैंने आंगन में बिठा दिया, एक-एक कर सब को उनके तौह्फे दिए तो सभी खुश हुए, सबसे ज्यादा अगर कोई खुश हुआ तो वो थी ऋतू जब मैंने उसे सबके सामने साडी दी| घर में उसने आज तक कभी साडी नहीं पहनी थी पर ये बात हमेशा की तरह भाभी को खटकी; "इसे साडी पहनना भी आता है?" उन्होंने कहा तो मुझे बड़ी मिर्ची लगी और मैंने उन्हें सुनाते हुए कहा; "आप
कौन सा माँ के पेट से सीख कर आये थे? इसी दुनिया में सीखा ना? आप चिंता ना करो ऋतू आपको तंग नहीं करेगी की उसे साडी पहना दो, ताई जी हैं और माँ हैं वो सीखा देंगी|" अब ये बात भाभी को चुभी पर ताई जी ने बीच में पद कर बात आगे बढ़ने नहीं दी वरना ताऊजी से डाँट पड़ती! "ये बता की तुम दोनों ने कुछ खाया भी था?" ताई जी पुछा| मैंने बीएस ना में गर्दन हिलाई तो ताई जी ने खुद देसी घी के परांठे बनाये और मैंने डट के खाये!
चूँकि आज धनतेरस थी तो शाम को खरीदारी करने जाना था, हर साल पिताजी और ताऊ जी जाय करते थे पर इस बार मैं बोला; "ताऊ जी सारे चलें?" अब ये सुन कर वो हैरानी से मेरी तरफ देखने लगे| अब बाजार घर के इतने नजदीक तो नहीं था की सारे एक साथ पैदल चले जाएँ| बाइक से ही मुझे आधा घंटा लगता था, जब कोई कुछ नहीं बोला तो मुझे ही रास्ता सुझाना था| "चन्दर भैया आपका वो दोस्त है ना ...क्या नाम है...अशोक! उसे बुला लो ना?" ये सुनते ही वो मुस्कुरा दिए और फ़ोन निकाल कर उसे आने को कहा| अशोक का भाई मेरा दोस्त था और शादी-ब्याह में वो अपने ट्रेक्टर-ट्राली बारातियों के लाने-लेजाने के लिए किराये पर देते थे| "तू ज्यादा होशियार नहीं हो गया?" पिताजी ने प्यार से मेरे कान पकड़ते हुए कहा| ताऊ जी हँस दिए और उन्होंने सब को तैयार होने का आदेश दे दिया| सब तैयार हुए पर अब भी एक दिक्कत थी, वो ये की ट्रेक्टर चलाएगा कौन? चन्दर को तो आता नहीं था, इसलिए मैंने ही पहल की| जब स्कूल में पढता था तब कभी-कभी मस्ती किया करता था और हम दो-चार दोस्त मिल कर अशोक भैया का ट्रेक्टर खेतों में घुमाया करते थे| "तुझे ट्रेक्टर चलाना आता है?" ताऊ जी ने पुछा| मैंने हाँ में गर्दन हिलाई; "अरे तो पहले क्यों नहीं बताया? हम बेकार में ही दूसरों को इसके पैसे देते थे, इतने में तो नया ट्रेक्टर आ जाता|" ताऊ जी बोले| "पर मानु भैया घर पर होंगे तब तो?" पीछे से भाभी की आवाज आई अब मन तो किया की उन्हें कुछ सुना दूँ पर चुप रहा ये सोच कर की आज त्यौहार का दिन है क्यों खामखा सब का मूड ख़राब करूँ|
मैं ड्राइविंग सीट पर बैठा था और मेरे दाहिने हाथ पर ताऊ जी बैठ थे, बाईं तरफ पिताजी बैठ थे और बाकी सब एक-एक कर पीछे ट्राली में बैठ गए| इतने दिनों बाद ट्रेक्टर चला रहा था तो शुरू में बहुत धीरे-धीरे चलाया, फिर जैसे ही मैं रोड पकड़ा तो जो भगाया की एक बार को तो ताऊ जी बोल ही पड़े; "बेटा! धीरे!" तब जाके मैंने स्पीड कम की और हम सही सलामत बाजार पहुँच गए! बाजार में पिताजी के जान पहचान की एक दूकान थी और मैंने वहीँ ट्रेक्टर रोका और एक-एक कर सब उतरने लगे| सबसे आखरी में ऋतू रह गई थी और मुझे आज कुछ ज्यादा ही रोमांस चढ़ रहा था| जब वो उतरने लगी तो मैंने जानबूझ कर उसे कमर से पकड़ लिया और नीचे उतारा| हालाँकि इसकी कोई जर्रूरत नहीं थी पर आशिक़ी आज कुछ ज्यादा ही सवार थी, भाभी ने मुझे ऐसे करते हुए देखा
तो बोली; "हाय! कभी मुझे भी उतार दो ऐसे!" ये सुनते ही ऋतू को मुँह फीका पड़ गया| "आप बहुत मोटे हो!!! आपको उठाने जाऊँगा तो मेरी कमर अकड़ जाएगी!" ये सुन कर माँ और ताई जी हँसने लगे और बेचारी भाभी शर्म से नीचे देखने लगी| पिताजी, चन्दर और ताऊ जी तो आगे चल दिए और इधर माँ, ताई जी, भाभी और ऋतू को साड़ियों का माप देना था, तो उनके साथ रहने की जिम्मेदारी मुझे दे दी गई| पिताजी एंड पार्टी तो अपने जान पहचान वाले दूकान दारों से मिलने लगे तो मैंने सोचा की हम सारे कुछ खा-पी लेते हैं| पर पहले माप देना था, सब एक-एक कर अपना माप लिखवा रहे थे और मैं बाहर खड़ा था और अरुण-सिद्धार्थ के मैसेज पढ़ रहा था|
माप दे कर सबसे पहले ताई जी आईं और उन्होंने पुछा की ताऊ जी कहाँ हैं तो मैंने कह दिया वो तो आगे चले गए सब से मिलने| "तो बेटा उन्हें फ़ोन कर|" ताई जी ने कहा| "छोडो ना ताई जी, चलो चल के कुछ खाते हैं|" तै जी मुस्कुरा दी और मेरे सर पर हाथ फेरते हुए बोलीं; "बाकियों को आने दे, फिर चलते हैं|" इतने में माँ आ गई और ताई जी ने हँसते उन्हें कहा; "तेरा लड़का समझदार होगया है| इसके लिए समझदार बहु लानी होगी|" मैं ये सुन कर हँस पड़ा, क्योंकि मैं जानता था की मेरी पसंद थोड़ी नसमझ है! पीछे से भाभी और ऋतू भी आ गए| फिर हम एक जगह बैठ के चाट खाने लगे, तभी चन्दर भैया हमें ढूँढ़ते हुए आ गए और हमें मज़े से चाट खाते हुए देख बोले; "वहाँ पिताजी आप सब को ढूँढ रहे हैं और आप सारे यहाँ बैठे चाट खा रहे हो?"
"अरे भूख लगी है तो कुछ खाये नहीं?!" ताई जी चन्दर को डाँटते हुए कहा| इतने में हम सबका खाना हो गया और हम सारे के सारे उठ के चल दिए, ताऊ जी ने जब पुछा तो ताई जी ने कह दिया की भूख लगी थी तो कुछ खा रहे थे| ताऊ जी ने फिर कुछ नहीं कहा और हमने खरीदारी की| पर इस बार ताई जी बहुत ज्यादा ही खुश थीं इसलिए वो माँ, भाभी और ऋतू को ले कर एक सुनार की दूकान में घुस गईं| ये हमारी खानदानी जान पहचान की दूकान थी तो सारा परिवार अंदर जा कर बैठ गया| हम सब की बड़ी आव-भगत हुई और मालिक ने खुद सब औरतों को जेवर दिखाए| ऋतू बेचारी चुप-चाप पीछे बैठी थी, इस डर से की कहीं कोई उसे डाँट ना दे| पर डाँट तो उसे फिर भी पड़ी, प्यार भरी डाँट! "रितिका! तू वहाँ पीछे क्या कर रही है? यहाँ तेरे लिए ही आये हैं और तू है की पीछे बैठी है? चल जल्दी आ और बता कौनसी अच्छी है तेरे लिए?" ये सुन कर ऋतू का सीना गर्व से चौड़ा हो गया| वो उठ के आगे आई और बोली; "दादी ... आप ही बताइये...मुझे तो कुछ पता नहीं!" ताई जी ने उसे माँ और अपने बीच बिठाया और उसे समझाते हुए बालियाँ पहनने को कहा| उसने एक-एक कर सब पहनी पर वो अब भी confuse थी तो मुझे उसकी मदद करनी थी...
पर कैसे? मैं इधर-उधर देखने लगा फिर सामने नजर शीशे पर पड़ी| ऋतू की नजर अब भी सामने आईने पर नहीं थी बल्कि वो ताई जी और माँ की बात सुनने में व्यस्त थी, मैं बीएस इंतजार करने लगा की ऋतू उस आईने में देखे ताकि मैं उसे बता सकूँ की कौन सी बाली बढिये है| आखिर में उसने देख ही लिया, उसके दोनों हाथों में एक-एक डिज़ाइन था| मैंने उसे आँख के इशारे से बाएँ वाले को try करने को कहा, पर वो मुझे इतना नहीं जचा तो मैंने गर्दन के इशारे से दूसरे try करने को कहा| ये वाला मुझे बहुत पसंद आया तो मैंने हाँ में गर्दन हिला कर अपनी स्वीकृति दी! माँ ने मुझे ऋतू की मदद करते हुए देख लिया और बोल पड़ीं; "क्या बात है? तेरी पसंद बड़ी अच्छी है इन चीजों में?" माँ ने मजाक करते हुए कहा पर पता नहीं कैसे मेरे मुँह से निकला; "माँ कल को शादी होगी तो बीवी को इन सब चीजों में मदद करनी पड़ेगी ना? इसलिए अभी से प्रैक्टिस कर रहा हूँ!" ये सुनते ही सारे लोग जो भी वहाँ थे सब हँस पड़े| ऋतू के गाल भी शर्म से लाल हो गए थे क्योंकि वो समझ गई थी की ये बात मैंने उसी के लिए कही है| हँसते-खेलते हम घर लौटे और रात को खाने के बाद ताऊ जी, चन्दर और पिताजी सोने चले गए| मैं अब भी आंगन में बैठा था, ताई जी और सभी औरतें खाना खा रहीं थीं| थकावट हो रही थी सो मैं अपने कमरे में आ कर सो गया, रात को ऋतू ने मेरा दरवाजा खटखटाया पर मैं बहुत गहरी नींद में था इसलिए मुझे पता नहीं चला| अगली सुबह जब मैंने ऋतू से Good morning कहा तो वो मुँह फूला कर रसोई में चली गई| मैं सोचता रह गया की अब मैंने क्या कर दिया? जब वो चाय देने आई तो बोली; "मुझे कल रात को आपसे कितनी बातें करनी थी, पर आपको तो सोना है!" ये सुन कर मेरे मुँह से 'oops' निकला! पर आगे कुछ कहने से पहले ही वो चली गई, इधर पिताजी आये और मुझे अपने साथ चलने को कहा| मैंने अपनी बुलेट उठाई और पिताजी के साथ निकल पड़ा, दिन भर पिताजी ने जाने किस-किस को मिठाई देनी थी? कितनों के यहाँ बैठ के चाय पि शाम को घर आते-आते पेट में गैस भर गई! घर आते ही मैं पिताजी से बोला: "कान पकड़ता हूँ पिताजी! आज के बाद मैं आपके साथ दिवाली पर किसी के घर नहीं जाऊँगा!" ये सुन कर सारे हँस पड़े| "क्यों?" पिताजी ने अनजान बनते हुए पुछा; "इतनी चाय...
इतनी चाय! मैंने ऑफिस में कभी इतनी चाय नहीं पि जितनी आपके जानने वालों ने पिला दी! मुझे तो चाय से नफरत हो गई|" तभी ऋतू जान बूझ कर एक कप में पानी ले कर आई और मुझे ऐसा लगा जैसे उसमें चाय हो, मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा; "ले जा इस कप को मेरे सामने से नहीं तो आज बहुत मारूँगा तुझे!" ये सुन कर ऋतू और सभी लोग खिल-खिला कर हँस पड़े! रात को खाना खाने की बिलकुल इच्छा नहीं थी, इसलिए मैं ऊपर छत पर चूरन खा रहा था|
सब के खाना खाने तक मुझे नींद आ गई और मैं छत पर ही पैरापेट वॉल से टेक लगा कर सो गया| ऋतू ने आ कर मुझे जगाया तब मेरी नींद खुली, मैंने अंगड़ाई लेते हुए उसे देखा; "आप यहाँ क्यों सो रहे हो?" उसने पुछा|
"कल बिना बात किये सो गया था ना, इसलिए मैं यहाँ तेरा इंतजार कर रहा था| पता नहीं कब नींद आ गई! अब बता क्या बात करनी थी?"
"कल बात करेंगे, अभी आप सो जाओ|" ऋतू ने कहा तो मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे अपने सामने आलथी-पालथी मार के बैठने को कहा|
"कल दिवाली है और कल टाइम नहीं मिलेगा, बोल अब!" मैंने कहा|
"कल.... मेरे पास शब्द नहीं....दादी ने मेरे लिए पहली बार बालियाँ खरीदी ....सब आपकी वजह से!!!" ऋतू का गला भर आया था इसलिए उसने बस टूटे-फूटे शब्द कहे|
"अरे पागल! मैंने कुछ नहीं किया! देर से ही सही ये खुशियाँ तुझे मिलनी थी और तुझे तो खुश होना चाहिए ना की रोना चाहिए!" मैंने उठ के ऋतू के आँसू पोछे|
"नहीं.... इस घर में एक बस आप हो जो मुझे इतना प्यार करते हो, हर बात पर मेरा बचाव करते हो| आपके इसी बर्ताव के कारन दादी का और बाकी सब का दिल मेरे लिए पसीजा है| आप अगर नहीं होते तो कोई मेरे बारे में कभी नहीं सोचता, पहले सब यही चाहते थे की मेरी शादी हो जाए और मैं इस घर से निकल जाऊँ पर आपके प्यार के कारन अब सब मुझे इस घर का हिस्सा समझने लगे हैं|" ऋतू ने अब रोना शुरू कर दिया था|
"अच्छा मेरी माँ! अब बस चुप हो जा!" मैंने ऋतू को अपने सीने से चिपका लिया तब जा कर उसका रोना बंद हुआ|
"तू ना...
जितना हँसती नहीं उससे ज्यादा तो रोती है| Global water crisis solve करना है क्या तूने?" मैंने मजाक में कहा तो ऋतू की हँसी निकल गई| इस तरह हँसते हुए मैंने उसे उसके कमरे के बाहर छोड़ा और मैं अपने कमरे में घुस गया| सुबह हुई और मैं जल्दी उठ गया, एक तो भूख लगी थी और दूसरा आज सुबह काम थोड़े ज्यादा बचे थे| सारा काम निपटा के आते-आते दोपहर हो गई और फिर सब ने एक साथ खाना खाया और रात की पूजा के लिए तैयारियाँ शुरू हो गई| वही लालची पंडित आया और हम सब पूजा के लिए बैठ गए| सबसे आगे माँ-पिताजी और ताई जी-ताऊ जी थे, उनके पीछे चन्दर भैया-भाभी और उनकी बगल में मैं और ऋतू बैठे थे| पूजा सम्पन्न हुई और पंडित अपनी दक्षिणा ले कर चला गया, इधर मैंने और ऋतू ने पूरी छत मोमबत्तियों से सजा दी और सारा घर जगमग होगया| नीचे आ कर सब ने खाना खाया और फिर सब छत पर आ गए और आतिशबाजी देखने लगे| मैं नीचे से सब के लिए फूलझड़ी और अनार ले आया, फूलझड़ियां मैंने ऋतू, माँ, ताई जी और भाभी को जला कर दी तथा अनार जलाने का काम चन्दर और मैं कर रहे थे| "मानु भैया अगर बम ले आते तो और मजा आता|" चन्दर ने कहा तो ताऊ जी ने मना कर दिया; "बिलकुल नहीं! वो बहुत आवाज करते हैं, यही काफी है!" चन्दर भैया अपना मुँह झुका कर अनार जलाने लगे| रात के नौ बजे थे और सब थके हुए थे इसलिए जल्दी ही सो गए| रात ब्रह बजे मैं उठा क्योंकि मुझे िठाइ खानी थी, तो मैं दबे पाँव नीचे आया और मिठाई का डिब्बा खोल कर मिठाई खाने ही जा रहा था की ऋतू आ गई| दोनों हाथ कमर पर रखे वो प्यार भरे गुस्से से मुझे देखती रही| मुझे उसे ऐसा देख कर कॉलेज की टीचर की याद आ गई और हँस पड़ा| "टीचर जी! सॉरी!" मैंने कान पकड़ते हुए कहा तो ऋतू मुस्कुराती हुई मेरे पास आई और मिठाई के डिब्बे से मिठाई निकाल कर खाने लगी| अब तो हम दोनों मुस्कुरा रहे थे और मिठाई खा रहे थे, दोनों ने मिल कर आधा डिब्बा साफ़ कर दिया और फिर पानी पी कर दोनों ऊपर आ गए| मैंने झट से ऋतू का हाथ पकड़ा और उसे अपने कमरे में खींच लिया| दरवाजे के साथ वाली दिवार से उसे सटा कर खड़ा किया और उसके गुलाबी होठों को मुँह में भर कर चूसने लगा| ऋतू ने तुरंत अपने हाथ मेरी पीठ पर फिराने शुरू कर दिए| मेरा मन तो उसके निचले होंठ को पीने पर टिका था इधर ऋतू का जिस्म जलने लगा था, उसका हाथ अब मेरे लंड पर आ गया और वो उसे दबाने लगी| अब उस समय सेक्स करना बहुत बड़ा रिस्क था इसलिए मैं रुक गया; "जान! ये नहीं प्लीज! शहर जा कर!" ऋतू का दिल टूट गया और उसने अपना हाथ मेरे लैंड के ऊपर से हटा लिया| मैं मजबूर था इसलिए मैंने उसे बस "प्लीज!!!" कहा तो शायद वो समझ गई और धीमे से मुस्कुराई! अब आगे अगर मैं उसे kiss करता तो फिर वही आग सुलग जाती इसलिए मैं रूक गया और उसे good night कहा| मैं समझ गया था की ऋतू को बुरा लगा है पर उसने अगले ही पल पलट कर पंजों पर खड़े होते हुए मेरे होठों को चूम लिया और खिल-खिलाती
हुई अपने कमरे में भाग गई, मैं भी खड़ा-खड़ा कुछ पल मुस्कुराता रहा और फिर सो गया|
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अगली सुबह मैं उठा और जैसे ही नीचे आया की ऋतू ने मुझे चिढ़ाना शुरू कर दिया| "दादी जी...आपको पता है, रात को एक चोर आया था और देखो आधी मिठाई साफ़ कर दी!" ये सुन कर सारे लोग हँसने लगे और मैं भी मुस्कुराता हुआ चारपाई पर बैठ गया| "ताई जी, चोर अकेला नहीं था! एक चोरनी भी थी उसके साथ!" ये सुन के तो सब ने ठहाका मार के हँसना शुरू कर दिया| "तुम दोनों की बचपन की आदत गई नहीं?" माँ ने मेरे कान पकड़ते हुए कहा| "ये दोनों जब छोटे थे तब ऐसे ही रात को रसोई में घुस जाते थे और मिठाई चुरा कर खाते थे!" माँ ने कहा| तभी भाभी बोली; "अरे! तो घर में चोरी कौन करता है? मांग कर खा लेते?" ये बात सब को बुरी लगी क्योंकि वहां तो बीएस मजाक चल रहा था, ताई जी को गुस्सा आया और वो भाभी को झिड़कते हुए बोलीं; "भक! ज्यादा बकवास की ना तो मारब एक कंटाप!"
"चुप कर जा हरामजादी!" चन्दर भैया ने भी उन्हें झिड़क दिया और भाभी मुँह फूला कर चली गईं! पता नहीं क्यों पर भाभी से इस परिवार की ख़ुशी देखि नहीं जाती थी और मुझसे तो उनका 36 का आंकड़ा था! पर फिर वो क्यों मुझे अपने जिस्म की नुमाइश किया करती थीं? ये ऐसा सवाल था जिसका जवाब जानने में मुझे कटाई रूचि नहीं थी, इसलिए मैं बस इस सवाल से बचता रहता था|
शाम को मंदिर में पूजा थी सो सब वहाँ चले गए, मुझे तो रास्ते में संकेत मिल गया तो मैं उससे बात करने में लग गया| उससे मिल कर मैं मंदिर पहुँचा पर वहाँ तो बहुत भीड़ थी, इसलिए मैं बाहर ही खड़ा रहा| रात को खाने के बाद मैं छत पर थल रहा था की ऋतू मिठाई का डिब्बा ले कर आ गई और मुझे डिब्बा खोल कर देते हुए गंभीर हो गई| "क्या हुआ?" मैंने पुछा तो वो सर झुकाये हुए बोली; "कल भाई-दूज है, घर में सब कह रहे थे की चूँकि मेरा कोई भाई नहीं इसलिए कल आपको तिलक....
" इतना कहते हुए वो रुक गई! अब ये सुन कर तो मैं सन्न रह गया! मैं अपना सर पकड़ के खड़ा ऋतू को देखता रहा की शायद वो आगे कुछ और बोले पर वो सर झुकाये खामोश खड़ी रही| मैं नीचे जा कर भी कुछ नहीं कह सकता था वरना सब उसका 'सही' मतलब निकालते! 'सही' मेरे अनुसार होता, उनके अनुसार तो ये 'गलत' ही होता! मैं बिना ऋतू को कुछ कहे नीचे आ गया और फिर घर से बाहर निकल गया| कुछ देर बाद मैं घर आया तो माँ ने पुछा की कहाँ गया था, तो मैंने झूठ बोल दिया की ऐसे ही टहलने गया था| कुछ देर बाद मुझे संकेत का फ़ोन आया और मैं उससे जूठ-मूठ की बात करने लगा| मैंने घर में सब को ऐसे दिखाया जैसे की मेरा ऑफिस से कॉल आया हो और मैं झूठ-मूठ की बात करते हुए कल सुबह ही निकलने का प्लान बनाने लगा| बात खत्म हुई तो मुझे कैसे भी ये बात घर में सब को बतानी थी पर ये भी ध्यान रखना था की कहीं भाई-दूज के चक्कर में फँस जाऊँ| "पिताजी कल कुछ ऑफिस के काम से मुझे बरेली निकलना होगा|" मैं झूठ बोला|
"कुछ दिन के लिए आता है और उसमें भी ये तेरे ऑफिस वाले तेरा पीछा नहीं छोड़ते!" पिताजी ने थोड़ा डाँटते हुए कहा|
"दरअसल पिताजी प्रमोशन का सवाल है, इसलिए जा रहा हूँ| कल सुबह जल्दी निकल जाऊँगा और रात तक लौट आऊँगा|" इतना कह कर मैं अपने कमरे में भाग लिया ताकि कहीं वो ये ना कह दें की सुबह तिलक लगवा के निकलिओ! कमरे में आते ही मैंने दरवाजा बंद किया और औंधे मुँह बिस्तर पर लेट गया| मुझे कैसे भी कर के खुद को इस भाई-दूज के दिन से बचाना था| सुबह मैं 3 बजे उठ गया, अभी तक ऋतू नहीं उठी थी| मैं फटाफट नहाया और तैयार हो कर नीचे आ गया| सुबह के चार बजे थे और अभी सिर्फ ताई जी जगी थीं, मुझे तैयार देख कर वो समझ गईं और चाय बनाने जाने लगी तो मैंने उन्हें मना कर दिया, इस डर से की कहीं ऋतू जाग गई तो फिर फँस जाऊँगा| घर से तो निकल लिया पर अब समय भी तो काटना था, इसलिए में सीधा मंदिर चला गया और वहाँ जा कर बैठ गया| 5 घंटे बाद मुझे संकेत का फ़ोन आया और उसने मुझे बजार से पिक करने बुलाया, मैं बुलेट रानी के संग बाजार पहुँचा और संकेत को पिक किया| सकते को दरसल कुछ काम से लखनऊ जाना था तो मैंने उसे ये झूठ बोल दिया की पिताजी कुछ काम से मुझे रिश्तेदारों के भेज रहे हैं, अब मैं वहाँ गया तो फिर वही शादी का रोना होगा| ये था तो बकवास बहाना पर संकेत को जरा भी शक नहीं हुआ| पूरा दिन उसके साथ ऐसे ही घुमते-फिरते बीता बीएस फायदा ये हुआ की मुझे खेती-बाड़ी के काम के बारे में कुछ सीखने को मिल गया की बीज कहाँ से लेते हैं, यूरिया कौन सा अच्छा होता है और मंडी कहाँ है, आदि| शाम हुई तो संकेत ने कहा की चल दारु पीते हैं, पर मैं तो वचन बद्ध था! तो मैंने उसे ये बोल कर टाल दिया की मैं त्योहारों में दारु नहीं पीता! पर उसे तो पीनी थी, वो भंड हो के पीने लगा और रात 11 बजे तक पीता रहा| पीने के बाद उसे याद आई उसके जुगाड़ की! तो
उसने मुझे उसकी गर्लफ्रेंड के घर ले चलने को कहा| ये कोई लड़की नहीं बल्कि एक विधवा भाभी थी जो उसी के रिश्ते में थी| नैन-नक्श से तो बड़ी कातिल थी और उसकी जवानी उबाले मार रही थी| जब बाइक उसके घर रुकी तो वो बाहर आई और हम दोनों को देख कर जैसे खुश हो गई| उसे लगा की आज तो उसे दो-दो लंड मिलने वाले हैं, पर भैया हम तो पहले से ही ऋतू के हो चुके थे! मैंने जैसे-तैसे संकेत को उतारा और अंदर ले गया, बिस्तर पर छोड़ कर मैं पलट के बाहर आने लगा तो भाभी बोली; "आपका नाम मानु है ना? संकेत ने आपके बारे में बहुत बताया है|" अब मैं उनसे बात करने के मूड में कतई नहीं था इसलिए मैं बिना कुछ कहे साइड से निकलने लगा; "रुक जाओ ना आज रात!" भाभी ने बड़ी अदा से कहा पर मैंने अपना भोला सा चेहरा बनाया और कहा: "भाभी घर जाना है, सब राह देख रहे होंगे|"
"अरे तो कौन सा तुम्हारी लुगाई है जिसके पास जाने को उतावले हो रहे हो? तनिक रूक जाओ आज रात, कुछ बात करेंगे!" भाभी इठलाते हुए बोलीं|
"अरे दो प्रेमियों के बीच मेरा क्या काम? खामखा कबाब में 'हड्डा' लगूँगा|"
"अरे काहे के प्रेमी! ई सार बस साडी उठात है और चढ़ी जात है!" भाभी ने संकेत पर गुस्सा निकालते हुए कहा|
"अब जउन बोओ है, सो काटो! इतना कह कर मैंने बाइक स्टार्ट की और घर के लिए निकल पड़ा| मेरे घर पहुँचते-पहुँचते 1 बज गया था, सब सो चुके थे एक बस मेरी प्यारी जान थी जो जाग रही थी| रात के सन्नाटे में बुलेट की आवाज सुन उसने दरवाजा खोला| मैं अंदर आया तो उसने उदास मुखड़े से पुछा: "आपने खाना खाया?" तो मैंने हाँ कहा, फिर इस डर से की कहीं कोई जाग ना जाये मैं चुपचाप ऊपर आ गया और अपने कपडे उतारने लगा| तभी ऋतू ऊपर आ गई और मेरे लिए दूध ले आई, ये दूध वो मेरी परीक्षा लेने के लिए लाइ थी! दरअसल मेरे कपड़ों से दारु की महक आ रही थी और ऋतू को मुझसे ये सीधा पूछने में डर लग रहा था| मैं समझ गया की क्या माजरा है इसलिए मैंने दूध का गिलास उठाया और ऋतू को दिखते हुए गटागट पी गया| ऋतू को तसल्ली हो गई की मैंने शराब नहीं पि है| "जानू!.... एक बात कहूँ? आप नाराज तो नहीं होंगे?" ऋतू ने सर झुकाये हुए कहा| माने बस हाँ में सर हिलाया और ऋतू को अपनी अनुमति दी| "मैं कल ....आपसे मजाक किया था .....की भाई-दूज के लिए .....
" ऋतू इतना बोल कर चुप हो गई| ये सुन कर मुझे बहुत हँसी आई! पर अब मेरी बारी थी ऋतू से मजाक करने की| मैंने गुस्से से ऋतू को देखा, पर उसकी गर्दन झुकी हुई थी तो वो मेरा गुस्से से तमतमाता हुआ चेहरा देख नहीं पाई| मैंने उसकी ठुड्डी पकड़ कर ऊपर की और तब उसकी नजर मेरी गुस्से से लाल आँखों पर पड़ी; "तू पागल है क्या? तेरी वजह से में दिनभर मारा-मारा फिरता रहा! तुझे मजाक करने के लिए यही टॉपिक मिला था?" मैंने गुस्से से दबी हुई आवाज में दाँत पीसते हुए कहा| ऋतू बेचारी शं गई और लघभग रोने ही वाली थी की मैंने हँसते हुए अपनी छाती से चिका लिया और उसके सर को सहलाते हुए कहा; "जान! मैं मजाक कर रहा था! आप मुझसे मज़ाक कर सकते हो तो मैं नहीं कर सकता?" ये सुन कर ऋतू को इत्मीनान हुआ की अभी मैं सिर्फ मज़ाक कर रहा था| "जानू! आप न बड़े खराब हो! मेरी तो जान ही निकाल दी थी आपने? दो मिनट आप और ये ड्रामा करते ना तो सच्ची में मैं रोने लगती!" ऋतू ने थोड़ा सिसकते हुए कहा| मैंने ऋतू के सर को चूमा और उसे जा कर सोने को कहा|
अगली सुबह हमें शहर वापस जाना था तो दोनों समय से उठ गए और नाहा-धो के नाश्ता कर के निकल लिए| कुछ दूर जाते ही ऋतू ने अपना बैठने का पोज़ बदल लिया और मुझसे कस कर चिपक गई| दोनों ही के मन में तरंगें उठ रहीं थी, क्योंकि शहर पहुँचते ही दोनों एक दूसरे में खो जाना चाहते थे| मैंने बाइक ढाबे के पास स्लो की तो ऋतू बोली; "प्लीज मत रुको! सीधा घर चलते हैं!" उसकी बात सुन के उसकी बेसब्री साफ़ जाहिर हो रही थी| मन तो मेरा भी उसे पाने को व्याकुल था, इसलिए मैंने बाइक फिर से हाईवे पर दौड़ा दी! घर पहुँच कर मैं बाइक कड़ी कर रहा था और ऋतू फटाफट ऊपर भागी, दरअसल उसे बाथरूम जाना था! मैं ऊपर पहुँचा तो ऋतू बाथरूम से निकल रही थी, मैंने दरवाजा बंद किया और हाथ धो ने के लिए बाथरूम जाने लगा| "कहाँ जा रहे हो?" ऋतू ने पुछा और मेरा हाथ पकड़ के मुझे बिस्तर पर खींच लिया| "जान! हाथ-मुँह तो धो लूँ?" मैंने कहा पर ऋतू के बदन की आग भड़कने लगी थी| "क्या करना है हाथ-मुँह धो के? बाद में अच्छे से नहा लेना, अभी तो आप मेरे पास रहो! बहुत तड़पाया है आपने!"
मैं ने ऋतू को पलट कर अपने नीचे किया और उसके ऊपर आ कर उसके थर-थर्राते होटों को देखा| मैंने नीचे झुक कर उन्हें चूमना शुरू किया और ऋतू ने मेरा पूरा सहयोग दिया|
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हम दोनों अभी होठों से एक दूसरे के दिल की आग को भड़का रहे थे की ऋतू का फ़ोन बड़ी जोर से बज उठा| ऋतू को तो जैसे उस फ़ोन की कोई परवाह ही नहीं थी पर मेरे लिए उस फ़ोन की रिंगटोन बड़ी कष्टदाई थी! मैं ऋतू के ऊपर से उठ गया और ऋतू का फ़ोन उठा के उसे दिया| "क्या जानू? बजने देना था न?" ऋतू ने नाराज होते हुए कहा| "यार मुझसे ये शोर बर्दाश्त नहीं होता! इसे जल्दी से निपटा तब तक मैं हाथ-मुँह धो लेता हूँ|" मैं इतना कह कर बाथरूम में घुस गया और इधर गुस्से में कॉल करने वाली पर बिगड़ गई! "तुझे ये नंबर दिया किसने? उस कुटिया की तो.....!!! हाँ ...ठीक है....बोला ना आ रही हूँ! तू फ़ोन रख!" मैं बाहर आया तो देखा ऋतू गुस्से में तमतमा रही है| "क्या हुआ?" मैंने पुछा तो ऋतू गुस्से में बोली; "उस हरामज़ादी ने मेरा नंबर सब लड़कियों को बाँट दिया! ऊपर से प्रोफेसर ने आज असाइनमेंट्स सबमिट करने की लास्ट डेट कर दी है! नहीं जमा करने पर पेनल्टी लगा रहे है!"
"पर तेरे तो सारे असाइनमेंट्स पूरे हैं? फिर क्यों गुस्सा हो रही है?"
"पर मुझे आज का दिन आपके साथ बिताना करना था! कल से आपका ऑफिस है, फिर हम कब मिलेंगे?" मैंने अपनी बाहें खोलीं और ऋतू एक दम से मेरे गले लग गई, मैंने उसके सर को चूमते हुए कहा; "जान! मैं चाँद पर नहीं जा रहा की तुम से मिलने आ न सकूँ?! शुरू-शुरू थोड़ी दिक्कत होगी, पर तुम जानती हो ना मैंने तुम्हें कभी नाराज नहीं करता? फिर क्यों चिंता करती हो?"
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हम दोनों ऐसे ही एक दूसरे से लिपटे कुछ देर खड़े रहे और फिर मैंने ऋतू को उसके हॉस्टल ड्राप किया| "आप प्लीज कहीं जाना मत, मैं अपने असाइनमेंट्स ले कर आती हूँ|" ये कह कर ऋतू हॉस्टल में भगति हुई घुसी और फिर अपना बैग ले कर आ गई| फिर मैंने उसे उसके कॉलेज छोड़ा और मैं अपने घर वापस आ गया| चूँकि अगले दिन ऑफिस था तो मैंने अपने कपडे वगैरह सब प्रेस कर के तैयार किये, बैग धो कर रेडी किया, थोड़ी बहुत घर की साफ़-सफाई की और दोपहर और रात का खाना बना लिया| शाम 4 बजे मैं ऋतू से मिलने निकल पड़ा, ठीक 5 बजे मैं उसके कॉलेज के गेट के सामने खड़ा था| तभी वहाँ रोहित आ गया और आ कर मेरे पास खड़ा हो गया| उसे देखते ही मुझे याद आ गया की साले ने जो काम्या से चुगली की थी!
मैं: तूने काम्या से क्या कहा था मेरे बारे में?
रोहित: क...क्या बोल रहे हो आप?
मैं: क्या बोल रहा था तू की मेरा किसी मैडम के साथ अफेयर चल रहा है और मेरे कारन उनका डाइवोर्स हो गया?
रोहित: न....नहीं तो!
मैं: अगर बोला है तो कबूल करने का गूदा भी रख! (मैंने आवाज ऊँची करते हुए कहा|)
रोहित: ब्रो...वो मैंने तो बस...
मैं: अबे तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरे बारे में ऐसी बात करने की? तूने मुझसे पुछा भी था की ये बात सच है या नहीं? लौंडा है तो जनानियों जैसी हरकत न कर! कहने को मैं भी कह सकता हूँ जो तेरी गर्लफ्रेंड ने जयपुर में रायता फैलाया था! (मैंने गुस्से से ऋतू के एक दम नजदीक जाते हुए कहा|)
रोहित: तेरा बहुत ज्यादा हो रहा है अब?
रोहित ने अपनी अकड़ दिखाते हुए कहा और ये सुन कर मेरा पारा और भी चढ़ गया| मैंने उसका कालर पकड़ लिया|
मैं: अपनी ये गर्मी मुझे मत दिखा, जा कर अपनी गर्लफ्रेंड को दिखा जिसकी आग तू बूझा नहीं पाता और वो इधर-उधर मुँह मारना चाहती है| उस दिन जयपुर में उसने ऋतू से कहा था की वो एक रात मेरे साथ गुजारना चाहती है, तभी तो ऋतू गुस्से में निकल पड़ी थी|
रोहित: य...ये झूठ है!
तभी पीछे से ऋतू आ गई;
ऋतू: ये सच है! तेरे साथ तो वो बस पैसों के लिए घूमती है| पैसों के बिना तो वो तेरे जैसों को घास ना डाले!
ऋतू ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और मैंने थोड़ा धक्का देते हुए उसका कालर छोड़ा|
मैं: आज के बाद दुबारा हम दोनों के बारे में कुछ बकवास की ना तो तेरे लिए अच्छा नहीं होगा!
इतना कह कर मैंने बुलेट को जोर से किक मारी और उसे बिना बोले ही चेतावनी दी! फिर हम दोनों अपनी पसंदीदा जगह पर आ गए और चाय पीने लगे| पता नहीं क्यों पर ऋतू को खुद पर गर्व महसूस हो रहा था और वो मंद-मंद मुस्कुरा रही थी| जब मैंने कारन पुछा तो वो बोली; "आज जब मैंने आपके कंधे पर हाथ रखा तो आपने उसे छोड़ दिया| आज मुझे पहली बार लगा जैसे मैं आपको कण्ट्रोल कर सकती हूँ!" ये सुन कर मैं मुस्कुरा दिया, क्योंकि मैंने रोहित को इसलिए छोड़ा था क्योंकि मैं वहाँ कोई तमाशा खड़ा नहीं करना चाहता था| पर मैं चुप रहा ये सोच के की ऋतू को इस खुशफैमी में रहने दिया जाए! अगले दिन मैं समय से उठा और तैयार हो कर दस मिनट पहले ही ऑफिस पहुँच गया| सबसे मेरा इंट्रो हुआ और यहाँ का स्टाफ मेरी उम्र वाला था, कोई भी शादीशुदा आदमी या लड़की मुझे यहाँ नहीं दिखाई दी| एकाउंट्स में मेरे साथ एक लड़का और था, पहले दिन तो काम समझते-समझते निकल गया| लंच टाइम में ऋतू का फ़ोन आया और मैं उससे बात करते हुए बाहर आ गया| शाम को मिलना मुश्किल था पर मैंने उसे कहा की मैं हॉस्टल आऊँगा उसे पढ़ाने के बहाने, तो ऋतू खुश हो गई| शाम को साढ़े पाँच मैं निकला और ऋतू के हॉस्टल पहुँचा| आंटी जी के पाँव हाथ लगाए और फिर ऋतू अपनी किताब ले कर आ गई और मैं उसे पढ़ाने लगा, वो पढ़ाना कम और अपनी आँखें ठंडी करना ज्यादा था| फिर मैं घर लौटा और खाना खा कर सो गया|
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ये पूरा हफ्ता मेरा और ऋतू का मिलना कुछ कम हो गया, ऑफिस से मुझे दो बार बरैली जाना पड़ा और डेढ़ घंटे की ये ड्राइव वो भी एक तरफ की बड़ी कष्टदाई होती थी| अब रोजो-रोज ऋतू से मिलने हॉस्टल भी नहीं जा सकता था, इसलिए अब हमारे लिए बस वीडियो कॉल ही एक सहारा था| एक
दूसरे को बस वीडियो कॉल में ही देख लिया करते और दिल को सुकून मिल जाता| सैटरडे आया तो ऋतू उम्मीद करने लगी थी की आज मैं हाफ डे में आऊँगा पर ये क्या उस दिन बॉस ने मुझे फिर बरैली जाने को कहा| मेरा बॉस खड़ूस तो था पर इज्जत से बात करता था, उसका दिया हर काम मैं निपटा देता था तो वो मुझसे खुश था| जब मैंने ऋतू से कहा की मैं आज नहीं आ पाऊँगा तो वो उदास हो गई पर मैंने उसे संडे का प्लान पक्का करने को कहा, तब जा कर ऋतू मानी| उस रात जब मैं घर पहुँचा तो ऋतू ने कॉल किया: "कल पक्का है ना? कहीं आप फिर से तो कंपनी के काम से कहीं नहीं जा रहे ना?"
"जान! कल बस मैं और तुम! कोई काम नहीं, कोई ऑफिस नहीं!" मेरी बात सुन कर ऋतू को इत्मीनान हुआ उसके आगे बात हो पाती उससे पहले ही किसी ने उसे बाथरूम के बाहर से पुकारा इसलिए ऋतू फ़ोन काट कर चली गई| मैंने भी खाना खाया और जल्दी सो गया, सुबह उठा और ब्रश किया, चूँकि ठंड शुरू हो चुकी थी इसलिए मन नहीं किया की नहाऊँ! ठीक नौ बजे ऋतू ने दरवाजा खटखटाया, ये दस्तक सुनते ही दिल में मौजें उठने लगी| माने दरवाजा खोला, ऋतू का हाथ पकड़ के उसे अंदर खींचा और दरवाजा जोर से बंद कर दिया| ऋतू को दरवाजे से ही सटा कर खड़ा किया और उसके होठों पर ताबड़तोड़ चूमना-चूसना शुरू कर दिया| ऋतू भी कामुक हो गई और उसने भी मेरी Kiss का जवाब अपनी Kiss से देना शुरू कर दिया| दो मिनट बाद ही हम दोनों का वहाँ खड़े रहना दूभर हो गया और मैं ऋतू को खींच कर बिस्तर पर ले आया| उसे धक्का देने से पहले उसके सारे कपडे उतारे, बस उसकी ब्रा और पेंटी ही बची थी| फिर उसे धक्का दे कर बिस्तर पर गिराया और मैं उसके जिस्म पर टूट पड़ा| उसके सारे नंगे जिस्म को मैंने चूमना शुरू कर दिया और इधर ऋतू का सीसियाना शुरू हो गया| मेरे हर बार उसके जिस्म को होंठों से छूने भर से उसकी; "सससस" निकल जाती| टांगों से होता हुआ मैं उसके पेट और फिर उसके स्तनों के बीच की घाटी पर पहुँचा तो ऋतू ने अपने दोनों हाथों से मेरे गालों को पकड़ा और अपने होठों के ऊपर खींच लिया| हम फिर से बेतहाशा एक दूसरे को चूमने लगे, एक दूसरे के होठों को चूसने लगे| हमारी जीभ एक दूसरे से लड़ाई करने लगी थीं, और नीचे मेरे लंड ने ऋतू की बुर के ऊपर चुभना शुरू करा दिया था|
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ऋतू ने अपने दोनों हाथों को मेरे सीने पर रख कर मुझे अपने ऊपर से बगल में धकेल दिया, वो उठ के बैठी और मेरे कच्छे को निकाल कर फेंक दिया| फिर आलथी-पालथी मार के मेरे लंड के पास बैठ गई और अपने दाहिने हाथ से उसने लंड की चमड़ी को नीचे किया, प्री-कम से गीला मेरा सुपाड़ा ऋतू की आँखों के सामने चमचमाने लगा| पर आज उसके मन में कुछ और था, ऋतू ने मेरे लंड को चूसा नहीं बल्कि आज तो वो उसके साथ खेलने के मूड में थी| उसने अपने दोनों हाथों की उँगलियों से मेरे लंड को पकड़ा और सिर्फ लंड के सुपाड़ी को अपने मुँह में ले कर उसे चूसने लगी| मुझे ऐसा लगा मानो वो मेरे सुपाडे को टॉफ़ी समझ रही हो! उसका ऐसा करने से मेरी सिसकारियां कमरे में गूंजने लगी; "सससससस....आह!!!" मेरी सिकारियाँ सुन ऋतू को जैसे और मजा आने लगा और ऋतू ने अपने जीभ से मेरे सुपाडे की नोक को कुरेदना शुरू कर दिया| अब तो मेरा मजा दुगना हो गया था और मैं स्वतः ही अपनी कमर नीचे से उचकाने लगा ताकि मेरा लंड पूरा का पूरा ऋतू के मुँह में चला जाए|
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पर ना जी ना! ऋतू तो सोच कर आई थी की वो आज मुझे ऐसा कतई नहीं करने देगी| पर लंड को तो गर्मी चाहिए थी, ऋतू के मुँह से ना सही तो उसकी बुर से ही सही! मैंने ऋतू के मुँह से अपना लंड छुड़ाया और उसे लेटने को कहा|
ऋतू मेरी जगह लेट गई और मैं उसकी टांगों के बीच आ गया, अब मैंने सोचा जितना ऋतू ने मुझे तड़पाया है उतना उसे भी तो तड़पाया जाए! इसलिए मैंने ऋतू की टांगें चौड़ी कीं और लंड को उसकी बुर पर मिनट भर रगड़ने लगा| ऋतू बेचारी सोच रही थी की अब ये अंदर जायेगा...अब अंदर जायेगा...पर मैं बस रगड़-रगड़ के उसके मजे ले रहा था| “ऊँह..उन्हह ..
उम्!!!" ऋतू प्यार भरे गुस्से बोली और मैं उठ कर बिस्तर से नीचे आ गया| ऋतू एक दम से अवाक मुँह फाड़े मुझे देखती रही और सोचने लगी की मैं क्यों नाराज हो गया? पर अगले ही पल मैंने उसे पकड़ के खींचा और बिस्तर से उठा के उसे कुर्सी पर बिठा दिया| फिर मुस्कुराते हुए उसकी टांगें चौड़ी कीं और अपना लंड उसके बुर में ठेल दिया|
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ऋतू की बुर इतनी पनियाई हुई थी की एक ही धक्के में पूरा लंड अंदर पहुँच गया, पर ऋतू चूँकि इस धक्के के लिए मेंटली प्रेपरेड़ नहीं थी तो उसकी 'आह!' निकल गई| शुरू-शुरू में मैंने पूरे धक्के मारे, जिससे मेरा लंड पूरा का पूरा उसकी बुर में उत्तर जाता और फिर पूरा बाहर आता| पर शायद इतने दिन से हमने सेक्स नहीं किया था तो ऋतू को इसकी आदत नहीं रही थी इसलिए वो कुछ ज्यादा ही कराह रही थी| जबकि मेरा मानना ये था की अब तक तो ऋतू की बुर को मेरे लंड का आदि हो जाना चाहिए था! पर मैं फिर भी लगा रहा और करीब 5 मिनट बाद ही ऋतू ने पानी छोड़ दिया, अब मेरा लंड अंदर अच्छे से विचरण कर सकता था और मैंने जोर-जोर से धक्के मारने शरू किये, पूरी कुर्सी मेरे धक्कों से हिलने लगी थी और ऋतू अपने दूसरे चरम-आनंद पर खुसंह गई थी! अगले धक्के के साथ हम दोनों साथ ही फारिग हुए और अपना साड़ी पानी उसकी बुर में भर कर मैं पलंग पर बैठ गया| कुर्सी पर टांगें चौड़ी कर के बैठी ऋतू की बुर से हम दोनों का रस टप-टप कर गिरने लगा और ऋतू इससे बेखबर अपनी साँसों पर काबू पाने लगी|
कुछ देर बाद मैं उठा और बाथरूम में फ्रेश होने लगा, इधर ऋतू ने चाय-नाश्ता बनाना शुरू कर दिया था| मेरे नहा के आते-आते ऋतू ने नाश्ता तैयार कर दिया था और फिर हमने बैठ के एक साथ नाश्ता किया| नाश्ते के बाद ऋतू ने बर्तन सिंक में रखे और मुझे खींच कर बिस्तर पर बिठा लिया; "जानू! मैं है ना....वो...मुझे है न....कुछ...मेकअप का समान खरीदना था...जैसे वो...मस्कारा ...ऑय लाइनर...काजल...और वो..एक टैंक टॉप (शर्माते हुए)....और...एक जीन्स....एक स्लीवलेस वाला टॉप...!!" ऋतू ने अपनी ये फरमाइश किसी बच्चे की तरह की|
"मेले जान को मॉडर्न दिखना है?!" मैंने तुतलाते हुए ऋतू से पुछा तो जवाब में ऋतू ने शर्म से गर्दन हाँ में हिला दी| "अच्छा...तो अभी ना...मेरे पास न...ज्यादा पैसे नहीं हैं! नेक्स्ट मंथ सैलरी आएगी ना ...तब आप ले लेना...
ओके?" मेने भी ऋतू की तरह बच्चा बनते हुए सब कहा, ये सब सुन कर ऋतू मुस्कुराने लगी और फिर मेरे गले लग गई| "तो जानू! हम फ़ोन पर प्रोडक्ट्स देखें?" ऋतू ने पुछा तो मैंने फटाफट अपना फ़ोन निकाला और हम अमेज़न पर उसकी पसंद के प्रोडक्ट्स देखने लगे और सब के सब कार्ट में add कर दिए| अगले महीने सैलरी आते ही मैं वो आर्डर करने वाला था| हम दोनों ऐसी ही कुछ और प्रोडक्ट्स देख रहे थे की ऋतू का फ़ोन बज उठा और जो नाम और नंबर स्क्रीन पर फ़्लैश हो रहा था उसे देख वो तमतमा गई; "क्या है? मना किया था न की मुझे कॉल मत करिओ, फिर क्यों कॉल किया तूने?.... मैंने क्या किया? सब तेरी करनी है!.... बहुत खुजली थी ना तुझे? अब भुगत!!! ....अच्छा? क्यों न कहूँ? तू क्यों मरी जा रही है उसके लिए, तेरे लिए बंदे फंसाना कोई मुश्किल काम है?! पहले उसके साथ सोइ थी अब किसी और के साथ सो जा!!!" इतना कह कर ऋतू ने फ़ोन काट दिया| अब मुझे थोड़ा-थोड़ा तो समझ आ गया था की ये कौन है और क्या बात आ रही है, तो मैंने इस बात का ना कुरेदना ही ठीक समझा|
पर ऋतू को ये बात कहनी थी; "काम्या का फ़ोन था! कह रही थी की तूने क्यों रोहित को सब बोल दिया? उस कामिनी को दर्द हो रहा है की अच्छा ख़ासा बकरा उसके हाथ से निकल गया| हरामजादी!"
"बस मैडम! आपके मुँह से गालियाँ अच्छी नहीं लगती!" मैंने ऋतू को टोका!
"सॉरी जी! पर उसका नाम सुनते ही मुझे अभूत गुस्सा आता है!"
"अच्छा छोड़ उसे, और सुन मुझे इस coming week में रोज बरैली जाना है इसलिए अब नेक्स्ट मुलाक़ात संडे को ही होगी!" मैंने कहा|
"Hawwwwwwww !!!! फिर .....
???" ऋतू एक दम से उदास हो गई|
"जान! थोड़ा टाइम दो मुझे ताकि ये नई जॉब संभाल सकूँ!" मैंने ऋतू के गाल को सहलाते हुए कहा|
"हम्म!" ऋतू ने मुस्कुराते हुए कहा|
उस दिन के बाद पूरे एक महीने तक हमारा मिलना बस संडे तक के लिए सीमित हो गया| हम फ़ोन पर रोज बात किया करते, और रात में सोने से पहले ऋतू मुझसे बाथरूम में छुपकर वीडियो कॉल पर बात करती| फिर जब हम संडे को मिलते तो पूरे हफ्ते की कसर निकाल देते| हम एक दूसरे को बेतहाशा चूमते और प्यार करते मानो जैसे जन्मों के प्यासे हों! आखिर सैलरी वाला दिन आ गया और मैं उस दिन अपनी सैलरी अकाउंट में देख कर बहुत खुश हुआ| मैंने बिना ऋतू को बताये उसके सेलेक्ट किये हुए सारे सामान का आर्डर दे दिया और संडे को उसकी डिलीवरी भी होनी थी| ऋतू इस सब से अनजान थी और जब वो संडे को आई तो प्यासी हो कर मुझ पर टूट पड़ी पर मैं जानता था की आज हमें एक दूसरे को प्यार करने का समय नहीं मिलेगा| इसलिए मैंने उसे रोकते हुए कहा; "जान! आज नहीं!" ये सुन कर ऋतू परेशान हो गई और बोली; "क्यों क्या हुआ? आपकी तबियत तो ठीक है ना?"
"मैं ठीक हूँ जान! बस आज कोई आने वाला है|" मैंने बात बनाते हुए कहा|
"कौन आ रहा है? और आपने क्यों बुलाया उसे? एक तो दिन मिलता है उस दिन भी आपके दोस्त हमें अकेला नहीं छोड़ते?" ऋतू ने नाराज होते हुए कहा| ठीक उसी वक़्त दरवाजे पर दस्तक हुई और ऋतू का गुस्सा आसमान छूने लगा, मैंने उसे दरवाजा खोलने को कहा तो ऋतू ने गुस्से से दरवाजा खोला" सामने डिलीवरी बॉय खड़ा था और उसने कहा; "रितिका जी का आर्डर है!" ये सुनते ही ऋतू का गुस्सा काफूर हो गया और उसने हँसते हुए डिलीवरी ली और दरवाजा बंद कर के मेरे पास आ गई और गले लग गई| "थैंक यू जानू!!!" कहते हुए ऋतू ने पंजों पर खड़े होते हुए मेरे होठों को चूम लिया| एक-एक कर तीन लोग और आये....
फाइनली ऋतू का सारा सामान आ गया| अब ऋतू उन सबको पहन कर मुझे दिखाने को आतुर हो गई|
सबसे पहले उसने टी-शर्ट और जीन्स पहनी, आज लाइफ में पहलीबार वो जीन्स पहन रही थी| जीन्स बहुत टाइट थी जिसके कारन उसका पिछवाड़ा बहुत ज्यादा उभर कर दिख रहा था| उसे देखते ही मेरे मुँह से निकला; "दंगे करवाएँगी क्या आप?"
ये सुन कर जब ऋतू का ध्यान अपनी उभरी हुई गांड पर गया तो वो बुरी तरह शर्मा गई! "इसे return कर दो!" ऋतू ने शर्माते हुए कहा और मैंने भी उसकी बात मान ली क्योंकि ये जीन्स उसके लिए कुछ ज्यादा ही कामुक थी! बाकी बचे हुए टॉप्स उसने एक-एक कर पहने और मुझे दिखाने लगी|
वो सब अच्छे थे पर जो उसने स्लीवलेस पहना तो मेरी आँखें उस पर गड़ गईं| ऋतू ने आज पहली बार स्लीवलेस पहना था और मैं उसे बस देखे ही जा रहा था| "आपको ये वाली पसंद आई ना?" उसने पुछा और मैंने हाँ में गर्दन हिलाते हुए मुस्कुरा दिया|
मुझे ये जान कर ख़ुशी हुई की ऋतू अब अपनी खूबसूरती को पहचानने लगी है पर एक अजीब सा एहसास भी दिल में होने लगा था, वो ये की मेरी गाँव की भोली-भाली ऋतू जिसे मैं बहुत प्यार किया करता था वो अब शहरी रंग में रंगने लगी है! चलो अच्छा है.... जमाने के साथ बदलना ही चाहिए! ये सोच कर मैंने इत्मीनान कर लिया....
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दिन बीतते गए और क्रिसमस का दिन आया, पर ऑफिस की छुट्टी तो थी नहीं और ना ही मैं छुट्टी ले सकता था| हरसाल मैं आज के दिन चर्च जाया करता था और वहाँ mass अटेंड किया करता था| वापसी में वहाँ से केक खरीद लेता और फिर घर आ जाता था| अब अकेला इंसान था तो टाइम पास हो जाता था और इसी बहाने गॉड जी से भी मन ही मन कुछ बातें कर लिया करता था| पर इस बार मेरे पास Pray करने का कारन था, मैं ऑफिस से सीधा ऋतू के पास हॉस्टल पहुँचा| आज आंटी जी घर पर ही थीं, मैंने उनसे ऋतू को थोड़ी देर ले जाने को कहा तो उन्होंने पुछा की कहाँ जा रहे हो? तो मैंने उन्हें सच बता दिया; "वो आंटी जी दरअसल मैं हरसाल क्रिसमस पर चर्च जाता हूँ, सोचा इस बार ऋतू को भी ले जाऊँ?" ये सुन कर आंटी अचरज करने लगीं; "चर्च? पर क्यों?" उनका इशारे मेरे धर्म से था; "आंटी जी मैं सब धर्मों को मानता हूँ| भगवान् तो एक ही हैं ना?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा तो आंटी जी ने हाँ में सर हिला दिया| उन्होंने ऋतू को आवाज दी और ऋतू मुझे देखते ही खिल गई| "चल जल्दी से तैयार हो जा, चर्च जाना है!" मैंने कहा तो ऋतू तुरंत तैयार होने चली गई| "मैं आधे-पौने घंटे में ऋतू को छोड़ जाऊँगा|" मैंने आंटी जी से कहा| "कोई बात नहीं बेटा! तेरे साथ जा रही है इसलिए जाने दे रही हूँ!" आंटी जी ने मुस्कुराते हुए कहा| ऋतू तुरंत तैयार हो कर आ गई और हम दोनों चर्च की तरफ चल दिए| जब मैंने बाइक चर्च के पास रोकी और उसे उतरने को कहा तो ऋतू भी अचरज से मुझे देखने लगी| "मुझे तो लगा की आपने ये झूठ सिर्फ इसलिए बोलै ताकि हम बाहर मिल सकें? पर
आप तो सच में चर्च ले आये!"
"तुम्हें पता नहीं है पर कॉलेज के दिनों से मैं साल में एक बार आज ही के दिन यहाँ आता हूँ| याद है तेरा वो दसवीं का रिजल्ट वाला काण्ड? तेरा रिजल्ट आने से पहले ही मैं जानता था की कोई तुझे आगे पढ़ने नहीं देंगे, तब यहीं मैंने तेरे लिए Pray किया था की तुझे आगे अच्छे से पढ़ने को मिले और देख दुआ क़बूल भी हुई| आज के दिन तुझे साथ इसलिए लाया हूँ ताकि आज तू भी गॉड को शुक्रिया अदा कर दे|"
ऋतू का चेहरा ख़ुशी से दमकने लगा, उसने अपने दुपट्टे से अपना सर ढका जैसे की वहाँ सब लड़कियों और औरतों ने ढक रखा था और हम चर्च में घुसे| ऋतू को कुछ नहीं पता था की वहाँ कैसे पूजा की जाती थी, इसलिए अंदर जाने से पहले ही वो चर्च के बाहर अपनी चप्पल उतारने लगी| पर मैंने उसे मना किया और हम दोनों ही अंदर घुसे, अब ऋतू को बस मुझे देख रही थी| हम दोनों वहाँ सबसे पीछे वाली लाइन में सब के साथ बैठ गए| आगे की तरफ था स्टैंड था जहाँ लोग अपने घुटने मोड़ कर टिका कर pray करते थे| ऋतू मुझे देखते हुए वैसे ही करने लगी, पता नहीं कैसे पर उस दिन वहाँ उस तरह बैठे हुए Pray करते हुए मेरी आँख से आँसू बह निकले| ऋतू ये देख रही थी पर वो उस समय खामोश रही, Pray कर के हम दोनों बाहर आये और मैंने वहाँ से Candles खरीदीं और बाहर Mother Mary के पास जलाने लगा, ऋतू ने भी ठीक वैसे ही किया| जब हम बाहर आये तो वहाँ से मैंने cake खरीदा और ऋतू को खाने को दिया|
आज पहलीबार ऋतू ने ऐसा केक खाया था और उसे ये बहुत टेस्टी भी लगा था| "एक और करना था तुझे यहाँ लाने का, वो ये की तुझे आज तक पता नहीं होगा की क्रिसमस पर होता क्या है? पर आज तुझे एटलीस्ट आईडिया होगया की आज के दिन की relevance क्या है?"
"आज तक मैंने क्रिसमस ट्री मैंने सिर्फ किताब में देखा था पर आज पता चला की वो कितना सुंदर होता है! चर्च को किस तरह सजाया जाता है और वो जो वहाँ बच्चों ने जीसस क्राइस्ट के बचपन को दिखने के लिए खिलौने सजाया था उसे देख कर मुझे मेरे बचपन की याद आ गई जब मैं गुड़ियों के साथ खेलती थी|"
"चलो अब तुझे हॉस्टल छोड़ दूँ|" ये कहते हुए मैंने जैसे ही बाइक स्टार्ट की तो ऋतू बोली: "थोड़ी देर और रुकते हैं ना?"
"यार मैंने आंटी जी को बोला था की मैं आधे-पौने घंटे में आ जाऊँगा, ज्यादा देर रुकना ठीक नहीं| कहीं आंटी जी कुछ सोचने लगीं तो?
"आपके बारे में उनके मुँह से सिर्फ तारीफ ही निकलती है| इतने महीनों में मैंने बस ये ही सुना है की मानु बेटा ऐसा है मानु बेटा वैसा है, ईमानदार है, मेहनती है और पता नहीं क्या-क्या! कई बार तो लगता है की वो आपको दमाद बनाने के चक्कर में हैं| पर मोहिनी दीदी का शायद कोई चक्कर चल रहा है, तभी तो वो हर बार अपनी शादी की बात टाल जातीं हैं| कुछ दिन पहले तो वो शराब पी कर आईं थीं, मैंने दरवाजा खोला और वो चुप-चाप अपने कमरे में जा कर सो गईं|"
"उसे आंटी जी से प्रॉब्लम है, आंटी जी उस
पर रोक-टोक लगतीं हैं और इसे तो अपनी लाइफ एन्जॉय करनी है|"
हम दोनों ऐसे ही बात करते हुए हॉस्टल पहुंचे और मैं अंदर आ गया और आंटी जी को केक दिया| हैरानी की बात ये थी की जहाँ वो कुछ देर पहले कह रहीं थीं की मैं क्यों क्रिसमस पर चर्च जा रहा हूँ वहीँ अब बड़े चाव से केक खा रही थीं| तभी मोहिनी भी आ गई; "अरे मानु जी आप?! और केक!!!!! वाओ!!! ये आप ही लाये होंगे.... माँ तो...." वो आगे आंटी जी के डर से कुछ नहीं बोली और केक खाने लगी|
"मानु जी एक बात सच-सच बताना, आप मुझ से ही रोज-रोज मिलने के लिए बहाना कर के आते हो ना?" मोहिनी बोली| उस समय आंटी जी किचन में थी और हम तीनों बैठक में बैठे केक खा रहे थे| उसके ये कहते ही मुझे खाँसी आ गई और ऋतू को शायद गुस्सा आने लगा था|
ऋतू भाग कर गई और मेरे लिए पानी ले आई| एक घूँट पानी पीने के बाद मैं बोला; "यार क्या कुछ भी बोल देते हो आप? इसने (ऋतू ने) अगर घर में बता दिया ना तो गाँव वाले भला ले कर यहाँ आ जायेंगे| बतया था न आपको हमारे गाँव में प्यार करना पाप है!" ये सुन कर मोहिनी चुप हो गई| तभी आंटी जी खाना परोस कर ले आईं और बिना खाये उन्होंने जाने नहीं दिया| चलो इसी बहाने घर जा कर खाना बनाने से तो छुट्टी मिली! कुछ दिन और बीते और 29 दिसंबर आ गया, ऑफिस वाले लड़कों ने पार्टी का प्लान बनाया और मुझे भी उसमें शामिल होना था| सब लड़के अपनी-अपनी बीवियों या गर्लफ्रेंड के साथ आने वाले थे तो जाहिर था की मैं भी ऋतू के ले जाने वाला था| इसी बहाने ऋतू को आज पता चल जाता की New year की पार्टी में क्या होता है?!
मैंने ऋतू को सारा प्लान समझा दिया, 30 दिसंबर की शाम को मैं ऋतू के कॉलेज पहुँचा और उसे वहाँ से पिक कर के घर ले आया| उस दिन सुभाष अंकल के घर जन्मदिन की पार्टी थी तो मैं और ऋतू उसमें शरीक हो गए, पार्टी के बाद हम घर आये और एक दुसरे पर टूट पड़े|
दरवाजा बंद होते ही ऋतू मेरी गोद में चढ़ गई और उसका निशाना मेरे होंठ थे| मैंने भी ऋतू के कूल्हों को कस कर पकड़ लिया और खुद से चिपका लिया| मैं उसके होठों को चूसते हुए पलंग पर आया और उसे अपनी गोद से उतार कर बिस्तर पर पटक दिया| मैंने फटाफट अपने कपडे निकाल फेंके और ऋतू ने भी लेटे-लेटे अपने कपडे उतार दिए| मैं उस पर चढ़ने लगा तो ऋतू ने अपने हाथ के इशारे से मुझे रोक दिया| वो उठ कर बिस्तर पर खड़ी हुई, अपने थूक से चुपड़ी उँगलियाँ अपनी बुर पर मलने लगी| फिर अगले ही पल वो मेरी गोद में चढ़ गई| मैंने बाएँ हाथ को उसके कूल्हे के नीचे ले जा कर उसे सपोर्ट दिया और दाएँ हाथ से अपने लंड को पकड़ के उसकी बुर से सटा दिया| मेरे झटका मारने से पहले ही ऋतू ने अपनी बुर मेरे लंड पर दबानी शुरू कर दी| कुछ ही सेकंड में लंड पूरा का पूरा ऋतू की बुर में समा गया पर मुझसे नीचे से झटके लगाना मुश्किल हो रहा था| मैं बिस्तर की तरफ पीठ कर के खड़ा हो गया, जिससे ऋतू को अपने पंजे टिकाने का सहारा
मिल गया| ऋतू ने अपने पंजों को गद्दे से टिकाया और अपनी बाहों को मेरे गर्दन से लपेटे उसने अपनी बुर उछालनी शुरू की| अब मेरा लंड बड़े आराम से सटा-सट अंदर बाहर होने लगा| हम दोनों ही लय से लय मिलाते हुए अपनी कमर आगे-पीछे हिला रहे थे| ऋतू की बुर पनियाती चली गई और मेरा लंड अंदर बड़े आराम से फिसलने लगा था| “आईईईईईईई ....आहनननननन...धीरे....जानू....!!!!” ऋतू कराही|
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मेरी गति इस कदर तेज थी की ऋतू के लिए सहन कर पाना मुश्किल हो गया था, वो ज्यादा देर टिक न पाई और झड़ने लगी; “सससस...आह!...मााााााााााा ...हम्म्म.....नननन” पर मैं अभी और देर तक उसे भोगना चाहता था| मैंने उसे अपनी गोद से उतारा और उसे पलट दिया| मैं उसके पीछे आ कर खड़ा हो गया, ऋतू को आगे की तरफ झुकाया जिससे उसकी बुर उभर कर पीछे आ गई| मैंने पहले तो दोनों हाथों को ऋतू के love handles पर जमा दिया और फिर अपना लंड पीछे से ऋतू की बुर में पेल दिया और तेजी से झटके मारने लगा| मेरी गति इतनी तेज थी की हर झटके से ऋतू का बुरा जिस्म बुरी तरह हिलने लगा था, उसके स्तन तेजी से झूलने लगे थे|
ऋतू से ये सब बर्दाश्त कर पाना मुश्किल था क्योंकि उसके झड़ने के बाद मैंने उसे जरा सा समय भी नहीं दिया था की वो अपनी सांसें तक दुरुस्त कर ले| ऋतू अब मेरी पकड़ से छूटने के लिए कुलबुलाने लगी थी| "ससस...जााााााााााााााााााााआनननन नननननननुउउउऊऊऊऊऊऊऊऊऊ..... प्लीज...ईइइइइइ ...रुक्खक्क....!!!" इससे आगे उससे बोला ही नहीं गया! अपने आखरी झटके के साथ मैंने अपना वीर्य ऋतू की बुर में भर दिया और लंड बाहर खींच कर मैं पीछे कुर्सी पर फैल गया| ऋतू भी औंधे मुँह बिस्तर पर गिर गई और अपनी साँसों पर काबू करने लगी| दोनों ही पिछले कुछ दिनों से बहुत प्यासे थे तो ये तूफ़ान आना तो तय था, पर इस तूफ़ान के शांत होने के बाद जब मैं उठा तो ऋतू ने कराहते हुए कहा; "आह! हहहहमममम... जानू! मेरी कमर!!!!" तब मुझे एहसास हुआ की ऋतू की कमर में मोच आ चुकी है| मैंने किसी तरह से ऋतू को सीधा कर के उसे बिठाया; "सॉरी...सॉरी....सॉरी....सॉरी यार ...." मैंने कान पकड़ते हुए ऋतू से कहा, पर वो मुस्कुराते हुए बोली; "जान निकाल दी थी आपने मेरी! पर..........
मजा बहुत आया!!!!" ये कहते हुए ऋतू की हँसी निकल गई| मैंने तुरंत पानी गर्म करने को रखा और ऋतू की पीठ पर लगाने के लिए Iodex निकाली| ऋतू को बाथरूम जाना था तो उसे बड़ी मुश्किल से मैंने सहारा दे कर खड़ा किया और उसे बाथरूम ले गया| सहारा दे कर मैंने ऋतू को कमोड पर बिठाया, पिशाब की पहली धार के साथ मेरा और ऋतू का माल बाहर आया और फिर ऋतू की बुर हलकी हुई| मैंने पानी से खुद उसकी बुर को धीरे-धीरे साफ़ किया, पर ऋतू की बुर को छूते ही ऋतू ने सिसीकी ली; "स्स्स्सस्साः!!!" ऋतू मुस्कुराती हुई मुझे अपनी आँखों से इशारे करने लगी की उसे अब अंदर जाना है|
मैंने उसे इस बार गोद में उठाया पर बहुत संभाल कर! मैंने ऋतू को बहुत आहिस्ते से बिस्तर पर लिटाया और उसे पेट के बल लेटने को कहा| फिर मैंने उसकी कमर पर Iodex लगाई और गर्म पानी की बोतल रख कर उसे सेंक देने लगा| कमरे में ब्लोअर चल रहा था जिससे कमरे गर्म था| मैं ऋतू की बगल में लेट गया और हम दोनों के ऊपर रजाई डाल ली| ऋतू ने औंधे लेटे हुए ही मेरी तरफ गर्दन घुमा ली, माने भी ऋतू की तरफ करवट ले ली; "So सॉरी जान!" ऋतू ने प्यार से अपने निचले होंठ को दांतों तले दबाते हुए कहा; "इस कमर दर्द को छोड़ दो तो मजा बहुत आया!"
"तू सच में पागल है!" मैंने ऋतू के गाल को चूमा और हम दोनों सो गए|
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अगली सुबह मैं जल्दी उठ गया क्योंकि मुझे ऑफिस जाना था| मैं उठ कर तैयार होने लगा तो ऋतू आँख मलते-मलते उठी: "आप कहाँ जा रहे हो?"
"ऑफिस और कहाँ?"
"आह! पर आज तो 31st है? आज तो छुट्टी होती है?" ऋतू ने सम्भल कर बैठते हुए कहा|
"जान आज कोई सरकारी छुट्टी नहीं है? ये सब छोडो और ये बताओ की तुम्हारा कमर का दर्द कैसा है?"
"पहले से ठीक है....
मैं चाय बना देती हूँ|" ऋतू उठी पर चाय तो पहले से ही तैयार थी, बस उसे कप में छानना था| ऋतू ने चाय छनि और मुझे कप दे कर फ्रेश होने चली गई| मैं कपडे पहनने लगा तो उसने नाश्ता बनाना शुरू कर दिया| "अरे छोडो ये नाश्ता!" मैंने कहा|
"रोज आप बिना खाये ऑफिस जाते हो?" ऋतू ने हैरानी से पुछा|
"हाँ! कभी-कभी कुछ बना लेता हूँ|"
"तभी इतने कमजोर हो रहे हो! आप बैठो मैं नाश्ता बनाती हूँ|" ये कह कर ऋतू बेसन घोलना शुरू किया| पर मैं कहाँ चैन लेने वाला था, मैंने ऋतू को पीछे से जा कर पकड़ लिया और अपनी ठुड्डी को में ऋतू की गर्दन पर रखे हुए उसके गाल को चूम रहा था| ऋतू ने फटाफट ब्रेड पकोड़े बनाये और मैंने ऐसे ही खड़े-खड़े उसे भी खिलाये और खुद भी खाये| नाश्ता क्र के चलने को हुआ तो ऋतू बोली; "आप कुछ भूल नहीं रहे?" मैंने फटाफट अपना रुमाल, पर्स और मोबाइल चेक किया पर वो मुझे प्यार भरे गुस्से से घूरने लगी| "ओह! सॉरी!" मैंने ऋतू को अपने आगोश में लिए और उसके होंठों को चूम लिया| ऋतू ने तुरंत अपने हाथों को मेरी गर्दन पर लॉक कर दिया और मेरे होठों को चूसने लगी| मेरा उस वक़्त बहुत मन था की मैं उसे गोद में उठा लूँ और बिस्तर पर लिटा कर खूब प्यार करूँ, पर जानता था की उसकी कमर का दर्द उसे और परेशान करेगा| दो मिनट तक इस प्यार भरे चुंबन के बाद तो जैसे मन ही नहीं था की कहीं जाऊँ की तभी फ़ोन बज उठा| मेरा colleague मेरा बस स्टैंड पर इंतजार कर रहा था, जैसे मैंने जाने के लिए मुदा की ऋतू ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोली; "जानू! वो....
मुझे कुछ पैसे चाहिए थे!" मैंने फ़ौरन बटुए में हाथ डाला और ऋतू की तरफ देखते हुए पुछा; "कितने?" ऋतू झट से बोली; "1,000/-" और मैंने उसे 2,000/- दे दिए और फटाफट निकल गया|
ऑफिस पहुँच कर मैंने ऋतू को कॉल किया और उसे volini spray लगा कर गर्म पानी का सेक करने को कहा वर्ण हम रात को पार्टी में नहीं जा पाते| वो दिन कैसे बीता कुछ पता ही नहीं चला, शाम को जब निकलने का समय हुआ तो सारे लड़के बाहर इकठ्ठा हो गए| सर ने सब का जमावड़ा देखा तो वो भी वहीँ आ गए और पूछने लगे की हम सब यहाँ खड़े क्या कर रहे हैं| हम सब में जो सबसे ज्यादा 'चटक चूतिया' था वो बोला; "सर वो रात को हम सारे पार्टी कर रहे थे तो उसी की बात हो रही थी की कहाँ जाना है?" अब हमारे सर ठहरे चटोरे तो वो कहने लगे की ब्रेक पॉइंट ढाबा चलते हैं| अब सब उस चूतिये को मन ही मन गाली देने लगे, कहाँ तो सब सोच रहे थे की पब जायेंगे मस्ती करेंगे और कहाँ सर ने ढाबे जाने का सुझाव दे दिया| "सर BBQ Nation चलते हैं, पैर हेड 1,500/- आएगा और अनलिमिटेड खाना मिलेगा|” मैंने कहा| अब सब का मन फीका हो गया क्योंकि वो सब दारु पीना चाहते थे और सब मेरी ही तरफ देख रहे थे| मैंने आँख मारते हुए हाँ में गर्दन हिलाई तो वो समझ गए अब उसी चटक चूतिये की ड्यूटी लगाईं गई की वो हम सब के लिए टेबल बुक करेगा| सब के दबाव में आ कर उसने हाँ कर दी और ऑफिस से सीधा वहीँ चला गया और बाकी सब अपने-अपने घर चल दिए| मैं अभी आधे रस्ते पहुँचा था की ऋतू का फ़ोन आ गया, वो पूछने लगी की मैं कबतक आ रहा हूँ? मैंने उसे कहा की मैं अभी रास्ते में हूँ तो उसने कॉल काट दिया| मैंने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और बाइक स्टार्ट कर फिर से चल पड़ा| जैसे ही मैं घर पहुँचा और दरवाजा खटखटाने लगा की दरवाजा अपने आप खुल गया, मैं धीरे से अंदर आया और सोचा शायद की कहीं ऋतू दरवाजा बंद करना तो नहीं भूल गई?! पर जब नजर सामने खिड़की पर पड़ी तो मैं अपनी आँख झपकना ही भूल गया|
अब मुझे समझ आ गया की ऋतू ने वो पैसे क्यों मांगे थे? ऋतू इठला कर चलते हुए मेरे पास आई और बोली; "क्या देख रहे हो जानू?!" मेरे मुंह से बस; "WOW!!!" निकला और ऋतू मुस्कुराने लगी| "ये मैंने उसी दिन आर्डर किया था जब आपने मुझे बताया था की 31st को पार्टी में जाना है| आज अगर मुझे देख कर आपके सारे colleagues आपसे जलने ना लगें तो कहना?" मैं हैरानी से ऋतू की बात सुनता रहा, कहाँ तो ये लड़की इतनी शर्मीली थी और कहाँ ये आज इस कदर मॉडर्न हो गई है? मुझे ऋतू वाक़ई में सूंदर लग रही थी पर मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी की वो इस कदर के कपड़े भी पहन सकती है| मैं अपने ख्यालों में गुम था की ऋतू ने मुझे वो शादी वाला ब्लैज़र और शर्ट उठा के दी; "और ये आप पहनोगे? मेरे hubby को देख आज उन सारी लड़कियों की जलनी चाहिए|" अब मरते न क्या करते मुझे वो पहनना ही पड़ा क्योंकि अगर मैं प्लैन कपडे पहनता तो सब कहते हूर के संग लंगूर! मैं जानता था की कल
ऑफिस में मेरी बहुत खिचाई होगी! पर ऋतू ये भूल गई थी की ये दिसंबर का महीना है और बाहर ठंड है, उसने इस ड्रेस के चलते कोई गाउन तो आर्डर किया नहीं था! "मैडम जी! बहार की ठंडी हवा में ये पहन के जाओगी तो 'कुक्कड़' बन जाओगी!" ये सुन कर ऋतू सोच में पड़ गई| मैंने फ़ोन निकाला और कैब बुक करी और अपना ब्लैज़र उसे उतार के दिया| "पर ये इसके साथ कैसे चलेगा?" ऋतू ने मायूस होते हुए कहा| "अरे बुद्धू! ये बस कैब आने तक अपने कन्धों पर रख ले और वहाँ पहुँच कर मुझे दे दिओ, वापसी में फिर ऐसे ही करेंगे|" ये सुन कर उसका चेहरा फिर से खिल गया|
आखिर कैब आई और हम BBQ Nation पहुँचे और जैसा की होना चाहिए था सब ऋतू को देख कर ताड़ने लगे| सब के सब मुझे आँखों से इशारे कर के पूछने लगे की ये कौन है? "My girlfriend ऋतू!" ये कहते हुए मैंने उसका इंट्रो एक-एक कर सबसे कराया| तभी पीछे से सर और मैडम आये और उन्होंने भी ऋतू से Hi-Hello की! वहाँ पर कोई बड़ा फॅमिली टेबल नहीं था बल्कि चार लोगों के लिए बैठने वाले छोटे बूथ थे| मैंने फटाफट ऋतू का हाथ पकड़ा और खाली बूथ में बैठ गया, सब ने फटफट बूथ पकडे और सर के साथ उसी चटक चूतिये को अपनी बंदी के साथ बैठना पड़ा| सारे लौंडे अपनी-अपनी बंदियों को साथ बैठ गए, मेरे सामने वही लड़का बैठा जो मेरे साथ एकाउंट्स में था| उस हरामी की नजर ऋतू पर उसकी बंदी की नजर मुझ पर थी| मेरा बायाँ हाथ और ऋतू का दायाँ हाथ टेबल के नीचे था और हम एक दूसरे के हाथ को सहला रहे थे| खाने के लिए जब वेटर आया तो उसने हम से पुछा की हम Veg या Non-Veg लेंगे? हमने तीन Non-Veg और एक Veg का आर्डर दिया| फिर दूसरा बंदा एक मिनी तंदूर ले कर आया और हमारे सामने टेबल के बीचों बीच बने छेड़ में फिट कर दिया| ये ऋतू के लिए फर्स्ट टाइम था और वो हैरानी से देख रही थी| फिर एक-एक कर 'सीकें' लगनी शुरू हो गईं फिर मैं और वो लड़का बारी-बारी से उन सीकों को रोल करते और उस पर चटनी लगाने लगे| मैंने वहाँ रखे झंडे को ऊँचा कर दिया; "ये क्यों किया?" ऋतू ने पुछा| "अब जबतक हम इस झंडे को नीचे नहीं करते ये लोग तंदूरी आइटम serve करते रहेंगे|" ये सुन कर मेरे सामने बैठी लड़की बोली; "मतलब हम अनलिमिटेड खा सकते हैं?"
"हाँ जी! पर इसी से पेट न भर लीजियेगा, वहाँ main कोर्स का बुफे लगा है और वो भी अनलिमिटेड है|" ये सुन कर वो लड़की और ऋतू एक को देखने लगे और उनके चेहरे से वही लड़कियों ख़ुशी झलकने लगी| ये वही ख़ुशी है जो लड़कियों को फ्री के खाने को देख कर होती है| वेटर फिर से आया और ड्रिंक्स के लिए पूछने लगा पर मैंने मना कर दिया| उन दोनों ने बहुत फाॅर्स किया पर मैं और ऋतू अड़े रहे की हम नहीं पीयेंगे| शायद ऋतू जान गई थी की मेरा खींचाव नशे की तरफ कुछ ज्यादा है! मैं अपनी लिमिट जानता था पर पिछले कुछ महीनों में ये दारु मेरी आदत बनने लगी थी| वैसे भी 31st को ड्रिंक्स बहुत ज्यादा ही महंगी थीं तो ना पीना ही economical था! खेर अच्छे से दबा कर
खाना पीना हुआ और समय हुआ विदा लेने का तो सब को Happy New Year कह कर हम दोनों कैब कर के घर लौट आये| रात के ग्यारह बजे थे और हम अपने कपडे बदल रहे थे| ऋतू ने हमेशा की तरह मेरी टी-शर्ट पहनी और नीचे उसने सिर्फ अपनी पैंटी पहन राखी थी, मैं पजामा और टी-शर्ट पहन कर रजाई में घुस गया| फिर मुझे याद आया की ऋतू को दवाई लगा देता हूँ तो मैं वापस उठा और ऋतू की कमर पर Iodex लगा दिया| ऋतू सेधी लेटी थी पीठ के बल, और मैं उसकी तरफ करवट ले कर लेटा था| ऋतू ने मेरा बायाँ हाथ अपने हाथ में पकड़ रखा था और वो छत की तरफ देखते हुए कुछ सोच रही थी|
"क्या हुआ? क्या सोच रही है?" मैंने ऋतू से पुछा|
"गाँव में रहते हुए ना तो कभी मुझे ये पता था की क्रिसमस क्या होता है और ना ही की 31st दिसंबर की पार्टी क्या होती है! आप की वजह से मैं यहाँ आई और ये सब देखने को मिला, एक नई जिंदगी जीने का मौका मिला| वरना अब तक तो मेरी शादी हो गई होती और मैं वहां तिल-तिल मर रही होती!"
"बस! नए साल का आगाज इस तरह रोते हुए नहीं करना!" ये कहते हुए मैंने ऋतू के गाल को चूम लिया| ऋतू मेरी तरफ पलटने लगी तो उसकी कमर का दर्द उसे परेशान करने लगा, मैं उठ कर पानी गर्म करना चाहता था पर ऋतू ने मुझे रोक दिया और मेरा सर अपने सीने पर रख कर मेरे बालों में उँगलियाँ फेरने लगी| मैं ऋतू के दिल की बेकाबू धड़कनें सुन पा रहा था और उसके मन में उठ रहे प्यार को महसूस कर पा रहा था| "कल सुबह पहले डॉक्टर के चलेंगे फिर मैं तुम्हें कॉलेज छोड़ दूँगा और वहाँ से मैं ऑफिस निकल जाऊँगा|" मैंने कहा और ऋतू ने बस 'हम्म्म' कहा| घडी ने टिक-टिक कर रात के बारह बजाये और मैं उठ कर बैठा, पर ऋतू की आँखें बंद थी| मैंने झुक कर ऋतू के होठों को बड़ा लम्बा kiss किया और कहा; "Happy New Year मेरी जान!" ऋतू ने अपने दोनों हाथ मेरी गर्दन के पीछे ले जाकर लॉक कर दिया और मुस्कुराते हुए बोली; "Happy New Year जानू! I Love You!!!" पर उसे मेरा जवाब सुनने की जर्रूरत नहीं थी, उसने मुझे अपने ऊपर झुका लिया और मेरे होठों को अपने मुँह में भर कर चूसने लगी|
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हम इसी तरह एक दूसरे को चूमते हुए सो गए| सुबह उठ कर मैंने ऋतू के माथे को चूमा और उसे नए साल की नई सुबह की मुबारकबाद दी| ऋतू अब भी लेटी हुई थी, मैंने उठ कर सबसे पहले उसके लिए bed tea बनाई और फिर उसे प्यार से जगाया| ऋतू आँखें मलते हुए उठी और उसने जब मेरे हाथ में चाय का कप देखा तो मुस्कुराने लगी| "मुझे लगा था की ये सब आप शादी के बाद करोगे!" ऋतू ने कहा| "अरे हम तो साल के पहले दिन से ही आपके गुलाम हो गए!" मैंने हँसते हुए कहा| "इस गुलाम को तो मैं अपने दिल में बसा कर रखूँगी!" ऋतू ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा| ऋतू उठ कर फ्रेश होने चली गई और मैं उसके लिए ऑमलेट बनाने लगा| ऋतू ऑमलेट की खुशबु सूंघ कर फटाफट बाहर आ गई और कुर्सी पर बैठ गई| मैंने उसे गर्म-गर्म ऑमलेट परोस कर दिया और उसके सर को चूम कर मैं बाथरूम फ्रेश होने चला गया| तैयार हो कर, खा-पी कर हम दोनों निकले| मैंने बाहर से ऑटो किया और पहले ऋतू को एक डॉक्टर के पास ले गया| डॉक्टर ने बताया की कोई गंभीर बात नहीं है, मोच ही है पर चूँकि सर्दी है इसलिए ज्यादा दर्द कर रही है| उसने एक पैन किलर दी और गर्म पानी की सिकाई करने को कहा| फिर ऋतू को मैंने उसके कॉलेज छोड़ा और मैं ऑफिस निकल गया| ऑफिस मैं पहले ही कॉल कर के बता चूका था की में थोड़ा लेट होजाऊंगा इसलिए बॉस ने कुछ नहीं कहा|
समय बीतने लगा और मार्च आ गया... कुछ दिन बाद कॉलेज का एनुअल डे था! ऋतू को जैसे ही ये पता चला उसने मुझे तुरंत फ़ोन किया; "जानू! नेक्स्ट वीक हमारा एनुअल डे है!" मैंने थोड़ा मजाक करते हुए कहा; "हमारा एनुअल डे?" ये सुन कर रितु की भी हँसी निकल गई; "मेरा मतलब...कॉलेज का एनुअल डे! तो नेक्स्ट वीक आप छुट्टी ले लेना|" अब चूँकि मैंने अभी तक एक भी छुट्टी नहीं ली थी तो मुझे पता था की बॉस छुट्टी दे देंगे, उसी दिन मैंने शाम को सर से बात की तो उन्होंने हाँ कह दिया| इधर ऋतू ने अपने लिए और मेरे लिए ड्रेस सेलेक्ट करना शुरू कर दिया और मुझे मैसेज करना शुरू कर दिया| ऑफिस में हर कुछ मिनट मेरा फ़ोन बजता रहता और सब कहते की 'क्या बात है? गर्लफ्रेंड बड़ी बेचैन हो रही है|' ऋतू ने अपनी ड्रेस फाइनल करने से पहले मेरे कपडे फाइनल कर दिए और मुझे बता कर आर्डर भी कर दिए| उसने अपना आर्डर अपने फ़ोन से किया ताकि मुझे पता न चल जाए की उसने क्या आर्डर किया है, हाँ डिलीवरी एड्रेस मेरा घर ही था| संडे को उसका आर्डर डिलीवर हुआ पर मेरे वाले में और टाइम लगना था| ऋतू ने मुझे अपने कपडे दिखाए भी नहीं और शाम को अपने साथ हॉस्टल ले गई|
आखिर एनुअल डे का दिन आ ही गया, मैं रेडी हो कर ऋतू के हॉस्टल पहुँचा क्योंकि मुझे उसे वहीँ से पिक करना था| ऋतू जब मेरे सामने आई तो मैं हाथ बाँधे प्यार से उसे देखने लगा|
उसकी वो लट जो उसके चेहरे पर आ गई थी, वो उसकी साडी....
हाय मन करने लगा की ऋतू को अभी मंदिर ले जाऊँ और उससे अभी शादी कर लूँ| इधर ऋतू की नजर मुझ पर जम गई थी और मुँह खोले मुझे देखते हुए नजदीक आई|
“यार अभी मेरे साथ भागना है?" मैंने ऋतू से पुछा तो उसने एक दम से अपनी मुंडी हाँ में हिलाई, उसका ये उतावलापन देख मैं हँसने लगा| "आज तो आप मुझे जहाँ कहो वहाँ चलने को तैयार हूँ?" ऋतू ने इतराते हुए कहा| ऋतू को पीछे बिठा कर आज मनो ऐसा लग रहा था की एक नव-विवाहित जोड़ा किसी शादी में जा रहा हो| जैसे ही हम कॉलेज के नजदीक पहुँचे तो हमें loud music की आवाज आने लगी| बाइक पार्क कर के हम दोनों अंदर आये तो मेरी नजर सबसे पहले सोमू भैया पर पड़ी| सबसे पहले उनसे जा कर गले लगे और HI-Hello हुई! उन्हीं के पास मेरे साथ के सभी दोस्त मिले और तब मुझे ध्यान आया की यहाँ तो मोहिनी भी आई होगी! मैं मन ही मन तैयारी करने लगा की उससे क्या कहूँगा? ऋतू को समझ नहीं आया की मैं अचानक से इतना गंभीर क्यों हो गया| फिर वही हुआ जिसका मुझे डर था, मोहिनी जो की हम दोनों से पहले ही आ चुकी थी वो अंशुल के मुँह से मेरे और ऋतू के बारे में सब सुन चुकी थी, हमारी ही तरफ चल कर आ रही थी|
ऋतू अब भी समझ नहीं पाई थी की भला मैं क्यों परेशान हूँ?!
update 56
आज पहलीबार मैं किसी शक़्स के चेहरे को नहीं पढ़ पा रहा था! शायद ये घबराहट थी या फिर ऋतू को खो देने का डर! मोहिनी मेरे सामने आकर खड़ी हुई और कुछ बोलने को हुई पर उसे एहसास हुआ की हमारे इर्द-गिर्द बहुत से लोग हैं इसलिए उसने मेरा और ऋतू का हाथ पकड़ा और हमें एक कोने में ले आई| अभी उसने कुछ कहा नहीं था और इधर मेरा दिल कह रहा था की आज रात ही मैं ऋतू भगा कर ले जाऊँगा|
"मानु जी! ये सच है की आप रितिका से प्यार करते हो?" मोहिनी की बात सुन ऋतू घबरा गई और जल्दीबाजी में बीच-बचाव करने को कूद पड़ी|
"हाँ दीदी...ये...
ये तो सब जानते हैं!"
"मैं उस प्यार की बात नहीं कर रही?" मोहिनी ने गंभीर होते हुए कहा| मोहिनी का ये रूप देख ऋतू का सर झुक गया तो मैंने एक गहरी साँस ली और पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा; "हाँ! बहुत प्यार करता हूँ मैं ऋतू से?"
"ये जानते हुए की आपका उससे रिश्ता क्या है?" मोहिनी की आँखों मुझे अब एक चिंगारी नजर आने लगी थी|
"खून के रिश्ते से बड़ा प्यार का रिश्ता होता है!" मैंने कहा|
"और आगे क्या करोगे?" मोहिनी ने पुछा|
"शादी और क्या?!" मैंने सरलता से जवाब दिया|
"Really? भाग कर? क्योंकि यहाँ तो ये सुनने के बाद आप दोनों को कोई जिन्दा नहीं छोड़ेगे|" मोहिनी ने ताना मारते हुए कहा|
"हम दोनों यहाँ से दूर अपनी नई जिंदगी बसायेंगे|" ऋतू ने भी आत्मविश्वास दिखते हुए कहा|
"रहोगे तो इसी दुनिया में ना? भूल गए आपने ही बताया था की आपके गाँव वाले प्रेमियों को जिन्दा जला देते हैं!" मोहिनी ने ऋतू को डाँटते हुए कहा|
"सब याद है, वो ऋतू की ही माँ थी जिन्हें खेत के बीचों बीच जिन्दा जला दिया गया था|" मैंने मोहिनी की आँखों में देखते हुए कहा| अब ये सुन कर तो मोहिनी के होश ही उड़ गए!
"क्या? और फिर भी आप?" मोहिनी ने हैरान होते हुए कहा|
"प्यार होना था, हो गया कोई इसे माने चाहे ना माने हम तो इस प्यार पर विश्वास करते हैं ना?! जानता हूँ ये लड़ाई बहुत लम्बी है और शायद भागते-भागते जमीन भी कम पड़े पर हम अलग होने से रहे! ज्यादा से ज्यादा हमें मार ही देंगे ना? इससे ज्यादा तो कुछ नहीं कर सकते?"
"आपको ये इतना आसान लग रहा है? दिमाग-विभाग है या इसके (ऋतू के) प्यार में पड़ कर सब खो दिया आपने? तुझमें (ऋतू में) अक्ल नहीं है क्या? क्यों अपनी अच्छी खासी जिंदगी ख़राब करना चाहते हो? क्या अच्छा लगता है तुम्हें एक दूसरे में? सेक्स करो खत्म करो! ये शादी-वादी का क्या चक्कर है?!" मोहिनी की ये बात मुझे बहुत बुरी लगी, ऐसा लगा मानो उसने मेरे प्यार को गाली दी हो| मैंने उसकी कलाई पकड़ी और उसे गुस्से से दिवार के सहारे खड़ा करते हुए उसकी आँखों में आँखें डालते हुए कहा; "तुझे क्या लगता है की मैं इसके जिस्म का भूखा हूँ? या फिर ये सिर्फ मेरे साथ सेक्स करना चाहती है और इसलिए हम शादी कर रहे हैं? शादी हम इसलिए नहीं कर रहे ताकि दिन रात बस सेक्स कर सकें, शादी हम इसलिए कर रहे हैं ताकि ताउम्र हम एक दूसरे के साथ गुजार सकें| अपना परिवार बसा सकें, जहाँ हमें एक साथ देख कर कोई हमारे रिश्ते को नहीं प्यार की तारीफ करे| अगर सेक्स ही करना होता तो ये प्यार नहीं वासना होती! हमारे अंदर वासना कतई नहीं, सिर्फ एक दूसरे के लिए प्यार है|
हम दोनों एक घर में पैदा हुए क्या ये मेरी गलती है? या फिर ये मेरी भतीजी बन कर पैदा हुई ये इसकी गलती है? हम अपनी मर्जी से अपने माँ-बाप नहीं चुनते और अगर चुन सकते तो कभी एक परिवार में पैदा नहीं होते| I don't give a fuck what this society thinks of this relationship, what
matters to me is what she thinks of this relationship and she’s bloody danm proud of it. Throughout her childhood she has suffered a lot, you have no idea what it feels to be the unwanted child in a family. जब ये अपना दर्द भरा बचपन काट रही थी तब तो किसी ने आ कर इसके दिल पर मरहम नहीं लगाया ना? अगर मेरे प्यार से इसके जख्मों को आराम मिलता है तो दुनिया को कोई हक़ नहीं की वो हमें अलग करे| मेरा प्यार सच्चा है और तुझे कोई हक़ नहीं की मेरे प्यार को गाली दे!” मेरी बातें सुन कर मोहिनी हैरान थी और जब वो बोली तो बातें बहुत हद्द तक साफ़ हो गईं| “I’m sorry! मेरा वो उदेश्य नहीं था.....मैं बस जानना चाहती थी की आप कितना प्यार करते हो ऋतू को| I’m happy for you guys!” मोहिनी ने मुस्कुराते हुए कहा और फिर ऋतू का हाथ पकड़ कर उसे अपने गले लगा लिया| ऋतू रउवाँसी हो गई थी और उसे ये चिंता सता रही थी की अगर ये राज मोहिनी ने खोल दिया तो क्या होगा? पर उसकी चिंता का निवारण मोहिनी ने खुद ही कर दिया; "रितिका रो मत! Your secret is safe with me. पर हाँ शादी में जर्रूर बुलाना!” मोहिनी ने हँसते हुए कहा| ऋतू की आँख से आँसू की एक धार बह निकली थी, मोहिनी ने खुद उसके आँसू पोछे और उसे वाशरूम जाने को कहा| ऋतू के जाने के बाद मोहिनी बोली; "वैसे मैंने आज एक बहुत बड़ा सबक सीखा है! अगर किसी से प्यार करो तो उसे बता देना चाहिए, ज्यादा इंतजार करने से वो शक़्स आपसे बहुत दूर चला जाता है!" वो इतना कह कर जाने लगी, मुझे ऐसा लगा जैसे उसके अंदर कोई दर्द छुपा है और वो उसे छुपा रही है| मैंने उसका हाथ थामा और उसे अपनी तरफ घुमाया तो पाया की उसकी आँखें नम हैं! मुझे उससे पूछना नहीं पड़ा की उसकी बात का मतलब क्या है क्योंकि उसके आँसू सब ब्यान कर रहे थे| पर मोहिनी अपने मन में कुछ रखना नहीं चाहती थी इसलिए बोल पड़ी; "कॉलेज के लास्ट ईयर मुझे आपसे प्यार हुआ पर कहने की हिम्मत नहीं पड़ी| फिर हमारा साथ छूट गया और शायद मैं भी आपको भूल गई थी, फिर उस दिन आपने मेरे दिल में दुबारा एंट्री ली और क्या एंट्री ली! वो सोया हुआ प्यार फिर जाग गया पर फिर हिम्मत नहीं हुई आपसे कहने की और जब कहना चाहा तो आपने ये बोल कर डरा दिया की आपके गाँव में डॉम प्यार करने वालों को मार दिया जाता है| जैसे-तैसे खुद को संभाल लिया ये सोच कर क्या पता की आगे चल कर हालात सुध जाएं और तब मैं आपसे अपने प्यार का इजहार करूँ! पर सच्ची मैंने बहुत देर कर दी!!!"
"प्यार तो फर्स्ट ईयर से मैं तुम्हें करता था पर लगता था की तुम्हारा कोई बॉयफ्रेंड होगा ही| फिर जब टूशन पढ़ाने आया तो पता चला की तुम तो वेल्ली हो पर कुछ कह पाता उससे पहले ही मुझे मेरे ही घर की ये बात पता लगी और फिर रही सही हिम्मत भी टूट गई! फिर ऋतू से प्यार हुआ और मैंने ये रिस्क लेने की सोची!" मैंने मोहिनी को सब सच बता दिया|
"तो ये सब आपके गाँव वालों की वजह से हुआ! कोई बात नहीं ....
शायद मेरे नसीब में प्यार था ही नहीं!" मोहिनी ने नकली हँसी हँसते हुए कहा| मेरे आगे कुछ कहने से पहले ही ऋतू आ गई और ठीक उसी समय स्टेज पर से सोमू भैया ने मेरे नाम की अनाउंसमेंट की और मुझे स्टेज पर बुलाया| हम तीनों स्टेज की तरफ चल दिए; "भाई आज तक हमारे वो गुमनाम शायर जिन्होंने आजतक हमारे कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर टोपर की शोभा बधाई है उनसे दरख्वास्त करूँगा की वो कुछ लाइन आपको सुनायें| मैं स्टेज पर चढ़ा और सोमू के कान के पास जा कर बोलै; "कहाँ फँसा दिया भैया आपने!" मैंने ये ध्यान नहीं दिया की उनके हाथ में जो माइक है वो ऑन है| जब सब ने मेरी ये बात सुनी तो सब लोग हँसने लगे|
"दोस्तों एक शायर की चंद लाइन्स याद आती हैं.....
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं कहीं आसमान नहीं मिलता
तमाम शहर में ऐसा नहीं खुलूस न हो
जहाँ उम्मीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता
कहाँ चराग़ जलाएं कहाँ गुलाब रखें
छतें तो मिलती हैं लेकिन माकन नहीं मिलता
ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं
ज़बान मिली है मगर हम-ज़बान नहीं मिलता
चराग़ जलते ही बिनाई बुझने लगती है
खुद अपने घर में ही घर का निशान नहीं मिलता "
ये लाइन्स सिर्फ और सिर्फ मोहिनी के लिए थीं ताकि उसे उसकी कही बात का जवाब मिल जाये| तालियों की गड़गड़ाहट और सीटियों से सब ने अपनी ख़ुशी जाहिर की| मैं स्टेज से उतरा और अब मेरा मन शांत था और कोई डर नहीं था पर शायद ऋतू को अब भी घबराहट थी| मैं उसके और मोहिनी के पास पहुंचा और तभी मोहिनी हम दोनों को छोड़ कर अपनी किसी दोस्त के पास चली गई| "वो किसी से कुछ नहीं कहेगी! मुँह-फ़ट है पर चुगली करना उसकी आदत नहीं|" मैंने कहा और फिर ऋतू को सारी बात बता दी| वो सब सुन कर उसे इत्मीनान हुआ और वो मुस्कुरा दी| कुछ देर में गाने फिर से बजने लगे, हम दोनों एक चाट वाले स्टाल के पास खड़े थे की तभी वहाँ राहुल नाम का एक लड़का आया| ये ऋतू की क्लास में कुछ महीने पहले ही ट्रांसफर ले कर आया था| साल के बीचों बीच आया है मतलब जर्रूर कोई नामी बाप की औलाद होगा| पहनावा उसका बिलकुल अमीरों जैसा पर वो रोहित की तरह चूतिया नहीं था| स्टाइलिश था और जब से हम आये थे उसकी नजर ऋतू पर ही टिकी थी| राहुल ने आते ही ऋतू से पुछा; "Shall we dance?" पर ऋतू ने एक दम से जवाब दिया; "नहीं!" वो हैरानी से उसकी तरफ देखने लगा और इससे पहले की कुछ बोलता ऋतू ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे डांस फ्लोर पर ले आई|
"क्या हुआ?" मैंने पुछा|
"I Hate that guy! ये उसी मंत्री का बेटा है जो उस दिन हमारे घर पर आया था|" ऋतू ने चिढ़ते हुए कहा| अब पहले से ही उसका मूड थोड़ा ऑफ था और मैं उसे और ख़राब नहीं करना चाहता था| मैंने ऋतू को उसकी कमर से पकड़ा और अपने जिस्म से सटा कर थिरकने लगा|
"जानू! अगर दीदी (मोहिनी) ने आपसे पहले इजहार किया होता तो?" ऋतू ने पुछा| अब मैं उससे इस बारे में बात नहीं करना चाहता था,
शायद ऋतू खुद समझ गई; "तो आज आप उनके साथ होते .... और मैं अपनी किस्मत को कोस रही थी!" मैंने ऋतू के सर को चूमा और कहा; "जान! हमारी किस्मत में एक होना लिखा था, इसलिए आज हम यहाँ हैं|" ऋतू को मेरी बात से इत्मीनान हुआ और अब वो फिर से मुस्कुराने लगी| उस दिन मुझे इस बात का एहसास हुआ की मेरे अंदर इस जमाने से लड़ने की कितनी शक्ति है और ऋतू भी जान गई की मैं उससे कितना प्यार करता हूँ| प्रोग्राम खत्म हुआ तो मैं और ऋतू बाहर आये और अभी मैं बाइक को किक कर ने वाला था की ऋतू के कुछ दोस्त आये और मुझे Hi बोल कर उससे कुछ बात करने लगे| उनकी बात होने तक मैंने बाइक घुमा ली थी, फिर ऋतू को हॉस्टल छोड़ कर मैं अपने घर आ गया|
समय का चक्का घूमने लगा और ऋतू के exams आ गए, मुझे कहने की जर्रूरत नहीं की उसने फर्स्ट ईयर में टॉप किया| घर वाले उसकी इस उपलब्धि से बहुत खुश थे और रिजल्ट ले कर हम घर पहुँचे तो उसे इस बार बहुत प्यार मिला| परिवार के प्यार की खुशियाँ देर से ही सही पर उसे अब मिलने लगीं थीं|
रिजल्ट की ख़ुशी मना कर मैं और ऋतू शहर वापस जा रहे थे की रास्ते में मेरी बाइक ख़राब हो गई| बाइक को धक्का लगाते-लगाते हम एक मैकेनिक तक पहुँचे और मैं वहाँ उससे बाइक बनवाने लगा की ऋतू बोर हो रही थी और ऐसे ही चलते-चलते कुछ आगे चली गई| वहाँ उसने एक झोपडी देखि जहाँ एक बच्चा धुल में खेल रहा था| उसके पास ही उसकी माँ बैठी थी जो सर झुका कर कुछ सोच रही थी| उसका ध्यान जरा भी अपने बच्चे पर नहीं था, उसका पति कहीं मजदूरी करने गया था, चूल्हा ठंडा था और शायद उन बेचारों के पास खाने को भी कुछ नहीं था| ऋतू वहीँ कड़ी उस बच्चे और उसकी माँ को देख रही थी, माँ की उम्र ऋतू से कुछ 1-2 साल ही ज्यादा थी और बच्चा करीब 1 साल का होगा| बाइक ठीक होने के बाद मैं ऋतू को ढूँढता हुआ आया तो मैंने देखा की ऋतू वहाँ उस बच्चे की माँ से बात कर रही है| मुझे वहाँ खड़ा देख उसने मुझसे पैसे मांगे और उस औरत को देने लगी| कुछ न-नुकुर के बाद उसने पैसे ले लिए उसके बाद जब ऋतू मेरे पास चल के आई तो उसकी आँखें नम थी| वो मेरा हाथ पकड़ कर मुझे कुछ दूर लाई और आ कर मेरे गले लग गई| आज पहली बार उसने गरीबी देखि थी, गाँव में उसका घर से निकलना कम होता था और जो गरीबी उसने गाँव में देखि थी वो थी मिटटी के घर और हमारे खेतों में काम करने वाले मजदूर!! ऋतू के लिए तो जिसका घर मिटटी का है या जो दूसरों के खेतों में काम करता है वही गरीब और जिसका घर पक्का बना है या जो अपने खेतों में दूसरों से काम करवाता है वो अमीर| शहर आ कर उसने जब लोगों को भीख मांगते हुए देखा तो उसने सोचा की शायद ये गरीबी होती है पर जब उसे पता चला की इनमें से ज्यादातर एक 'रैकेट' का हिस्सा हैं तो उसके मन के विचार बदलने लगे| भला कोई काम न कर के जानबूझ कर भीक मांगे तो वो काहे का गरीब? पर आज जब उसने उस औरत से उसकी कहानी सुनी तो उसे
एहसास हुआ की गरीबी क्या होती हैं!
उसका नाम फुलवा है, वो एक बंजारन है| उसे एक दूसरे कबीले के लड़के से प्यार हुआ और जब उसने ये बात अपने घर में बताई तो उन्होंने उसे और उस लड़के को कबीले से निकाल दिया| तब से दोनों दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं, इसी बीच उसका ये बेटा पैदा हुआ और अब इन दोनों की जिंदगी तबह हो गई| उसका पति काम के तलाश में रोज निकलता है और शाम को खाली हाथ लौटता है| क्या प्यार करने वालों के साथ ऐसा ही होता है? क्यों ये लोग उन्हें चैन से जीने नहीं देते? और हमारा क्या होगा? अगर हमारे साथ ऐसा हुआ तो?" ऋतू ने रोते-रोते पुछा|
"हमारे साथ ऐसा कुछ नहीं होगा! मैंने सब कुछ प्लान कर रखा है| मैं ये जॉब क्यों कर रहा हूँ? इसीलिए ना की जब हम घर से भागें तो हम एक नई जिंदगी शुरू कर सकें| हाँ मैं मानता हूँ की ये इतना आसान नहीं होगा पर failure is not an option for us! We've to fight till the last breath and we will succeed! तुझे बस मुझ पर विश्वास रखना है|" मैंने पूरे आत्मविश्वास से कहा| उस टाइम तो ऋतू ने मेरी बात मान ली पर अब उसके मन में ये चिंता पैदा हो चुकी थी|
update 57
उस दिन के बाद से ऋतू में अचानक ही बहुत बदलाव आने लगे, उसने बिना मुझे पूछे-बताये एक जॉब ढूँढी और संडे को मुझे चौंकाते हुए बोली; "जानू! मैंने एक पार्ट टाइम जॉब ढूँढ ली है! नेक्स्ट सैटरडे से ज्वाइन कर रही हूँ|" अब ये सुन कर मैं चौंक गया; "क्या? क्या जर्रूरत है तुझे जॉब करने की?"
"जर्रूरत है....
बहुत जर्रूरत है!" ऋतू ने कुछ सोचते हुए कहा|
"किस बात की जर्रूरत है?" मैंने ऋतू से प्यार से पुछा|
"आप कहते हो ना की हमें फ्यूचर के बारे में सोचना चाहिए, तो मैं भी वही कर रही हूँ| इस पार्ट टाइम जॉब से मुझे ऑफिस का एक्सपीरियंस मिलेगा, कल को जब मैं फुल टाइम जॉब के लिए जाऊँगी तो ये एक्सपीरियंस वहाँ मेरे काम आएगा|" जो वो कह रही थी वो सही भी था|
"पर कॉलेज और जॉब कैसे मैनेज करेगी?" मैंने चिंता जताते हुए कहा|
"वो सब मैं देख लूँगी! आपको कोई शिकायत नहीं मिलेगी|" ऋतू ने आत्मविश्वास से कहा|
"अच्छा एक बात बता, तेरे जॉब ज्वाइन करने के बाद हम सैटरडे-संडे कैसे मिलेंगे?" मैंने पुछा| ऋतू के पास मेरी इस बात का कोई जवाब नहीं था!
“We’ll figure out something?” ऋतू बोली|
“NO YOU’VE TO FIGURE OUT SOMETHING!” मैंने हँसते हुए सारी बात ऋतू पर डाल दी, ऋतू भी मुस्कुराने लगी और उसने जिम्मेदारी ले ली|
मैंने ऋतू का माथा चूमा और उसने मुझे कस कर अपनी बाहों में जकड़ लिया| मैं खुश था की वो अब जिम्मेदारी उठाना चाहती है, पर वो ये नैन जानती थी की ये फैसला इतना आसान नहीं जितना वो सोच रही है| पिछलीबार जब उसने अनु मैडम का प्रोजेक्ट ज्वाइन किया था तब वहाँ मैं भी काम करता था और ऋतू के लिए मैं सहारा था, पर नए ऑफिस में नए लोगों के साथ एडजस्ट करना इतना आसान नहीं था| कम से कम ऋतू के लिए तो बिलकुल आसान नहीं होगा, मैं चाहता तो ये बात मैं ऋतू को समझा सकता था पर वो शायद इस बात को नहीं मानती| जब खुद एक्सपीरियंस करेगी तब मानेगी!
उसके ऑफिस का पहले दिन मैं उसे खुद छोड़ने गया, main gate पर उसे 'all the best' कहा और ऋतू मुस्कुराते हुए अंदर चली गई| उस दिन ऋतू ने मुझे 100 बार फ़ोन किया, कुछ न कुछ पूछने के लिए| वो बहुत nervous थी और छोटी-छोटी चीजें जैसे की file कैसे save करते हैं पूछने लगी| मैं उसकी nervousness समझ सकता था और मैं उससे आज बहुत ज्यादा ही प्यार से बात कर रहा था| 4-5 दिन लगे ऋतू की nervousness खत्म होने में, पर अब हमारा सैटरडे-संडे मिलने का प्रोग्राम कम होने लगा था| ऋतू कई बार weekdays में भी ऑफिस जाने लगी थी, हमारा प्यार बस फ़ोन कॉल और वीडियो कॉल तक ही सिमट कर रह गया था| अब इसका कोई न कोई इलाज तो निकालना ही था तो मैंने सर से रिक्वेस्ट की ओवरटाइम करने की| पर उन्होंने साफ़ मना कर दिया|
इधर महीना भर हुआ की ऋतू का मन मुझे मिलने के लिए बेचैन होने लगा था| एक दिन की बात थी हम दोनों रात को वीडियो कॉल कर रहे थे, ऋतू अचानक से रो पड़ी| "जानू! मुझसे नहीं हो रहा ये सब! आपके बिना मेरा हाल बहुत बुरा है... काम करने का मन नहीं कर रहा| मैं सच में idiot हूँ, आपने कहा था की हम नहीं मिल पाएंगे पर फिर भी मैंने जिद्द की! प्लीज जानू!....मुझे ये जॉब नहीं करनी....प्लीज......"
"अरे जान तो छोड़ दो ना!" मैंने कहा|
"पर....
?" ऋतू कुछ सोच में पड़ गई|
"यार कोई भी बहाना बना दे और रिजाइन कर दे!" मैंने सरलता से कहा और ऋतू का चेहरा फिर से खिल गया| अगले ही दिन उसने ऑफिस में ये कह दिया की उसकी शादी तय हो गई है और इसलिए उसे जॉब छोड़ने पड़ रही है| शाम को जब उसने मुझे ये बात बताई तो मुझे बड़ी हँसी आई| चलो ऋतू को ये बात समझ आ गई की जिंदगी में कोई भी फैसला लेने से पहले उसके Pros and Cons सोच लेने चाहिए| उस दिन के बाद से ऋतू ने अपना ध्यान पढ़ाई में लगा दिया, सैटरडे-संडे हम दोनों के लिए होते थे| इस डेढ़ दिन में हम एक दूसरे को खूब प्यार करते और दिन बस एक दूसरे की बाहों में ही बीतता| दिन-महीने बीते और फिर ऋतू का जन्मदिन आ गया और मैं तो छुट्टी के लिए पहले से ही बोल चूका था इसलिए कोई दिक्कत नहीं हुई| इस बार हम लॉन्ग ड्राइव पर निकले और फिर बाहर ही खाना-पीना हुआ, फिर घर वालों से बात कराई और सब ने इस बार बड़े प्यार से उसे आशीर्वाद दिया| अगले दिन चूँकि ऑफिस था तो इसलिए हम वो रात साथ नहीं गुजार पाए पर ऋतू को इसका जरा भी गिला नहीं था क्योंकि उसने पूरा दिन बहुत एन्जॉय किया था|
कुछ महीने और बीते फिर मेरा जन्मदिन आया और इस दिन की तैयारी ऋतू ने करनी थी| रात को ठीक बारह बज कर एक मिनट पर उसने मुझे कॉल किया और birthday wish किया, फिर अगली सुबह मैं उसे लेने पहुँचा और ऋतू ने सीधा शॉपिंग जाने को कहा| ऋतू ने अपनी पूरी एक महीने की सैलरी बचाई थी, थी तो वो चिल्लर ही पर उसका मन था मेरे लिए कुछ खरीदने को इसलिए हम दोनों मॉल आ गए| Shirts की प्राइस देख कर ऋतू को उसकी सैलरी पर हँसी आ गई और वो बोली; "इतने में तो मुश्किल से एक शर्ट-पैंट आएगी|"
"वो भी नहीं आएगी!" मैंने हँसते हुए कहा| ऋतू ने पर्स से एक लॉलीपॉप निकाली और उसे चूसते हुए बोली; "हाँ पर एक तरीका है? आप मुझे उधार दे दो, मैं आपको 'In Kind' वापस कर दूँगी!" ऋतू ने मुझे आँख मारते हुए कहा|
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मैं ऋतु का मतलब समझ गया की घर जा कर मुझे In Kind में क्या मिलेगा| उसने मुझे 2 शर्ट और पैंट दिन तरय करने को, इधर मेरा ध्यान उसके लॉलीपॉप चूसते होठों से हट ही नहीं रहा था| ऋतू भी समझ गई थी की मैं क्या देख रहा हूँ, उसने जबरदस्ती मुझे trial room में धकेल दिया और शर्ट try कर के दिखाने को कहा| मैंने पहले एक शर्ट और पैंट try कर के ऋतू को दिखाई तो वो लॉलीपॉप चूसते हुए नॉटी तरीक से बोली; "हाय!!!!" अब मुझसे उसका ये रूप बर्दाश्त नहीं हो रहा था| मैंने इधर-उधर देखा की कोई हमें देख तो नहीं रहा और फिर ऋतू का हाथ पकड़ कर उसे अंदर खींच लिया| ऋतू ने अपने मन से लॉलीपॉप निकाल दी और मैंने अपने दोनों हाथों से उसका चेहरा थामा और उसके गुलाबी होठों को चूम लिया| ऋतू के मुंह से मुझे स्ट्रॉबेर्री की खुशबु आ रही थी| मैंने अपनी जीभ को ऋतू के मुंह में दाखिल किया और स्ट्रॉबेर्री फ्लेवर को चखने लगा| पर मेरा लंड नीचे बेकाबू होने लगा और उसमें दर्द हो रहा था| ऋतू का हाथ अपने आप ही उस पर आ गया और वो उकडून हो कर नीचे बैठ गई| उसने पैंट की ज़िप खोली और मैंने पैंट का बटन खोला| फिर ऋतू ने अपनी पतली-पतली उँगलियों से मेरे लंड को कच्छे से आजाद किया और चमड़ी पीछे खींच कर सुपाडे को मुँह में भर लिया| जैसे ही सुपाडे ने ऋतू के मुँह में प्रवेश किया और वो ऋतू के ऊपर वाले तालु से टकराया मेरी सिसकारी निकल गई; "स्स्सस्स्स्स....ऋतू!!!" और इधर ऋतू ने अपने मुँह को आगे-पीछे करना शुरू कर दिया| मैं अपने दोनों हाथ पीछे बांधे अपनी कमर आगे-पीछे करने लगा| मैं और ऋतू बिलकुल एक लय के साथ काम में लगे थे| जब ऋतू अपना मुँह पीछे खींचती ठीक उसी समय मैं अपनी कमर पीछे खींचता और फिर जैसे ही ऋतू अपना मुँह आगे लाती मैं भी अपनी कमर उसके मुँह की तरफ धकेल देता| फिर ऋतू को क्या सूझा की उसने मेरा लंड अपने मुँह से निकाला और उसके हाथ में जो लॉलीपॉप थी उसे चूसने लगी| फिर अगले ही पल उस लॉलीपॉप को निकाल उसने फिर से मेरा लंड अपने मुँह में भर लिया| अब वो मेरे लंड को चूसने लगी जैसे की वो लॉलीपॉप हो, अब मेरी हालत ख़राब होने लगी थी| मैंने अपना लंड उसके मुँह से निकला और हिलाते हुए अपना सारा माल उसके मुँह में उतार दिया|
(कृपया GIF play करने के लिए पिक्चर पर क्लिक करें|)
घी सा गाढ़ा मेरा माल उसकी जीभ पर निकला और साथ-साथ थोड़ा उसके होठों और नाक पर फ़ैल गया| ऋतू सब चाट कर पी गई और फिर अपने पर्स से टिश्यू निकाल कर अपना मुँह साफ़ किया|
"Now we're even!" ऋतू ने मुस्कुराते हुए कहा| मैंने ऋतू के गाल पर प्यार से चपत लगाईं और फिर वो मेरे गले लग गई| अपने कपडे दुरुस्त कर हम दोनों बाहर आये, वो तो शुक्र है किसी ने हमें देखा नहीं| वो शर्ट और पैंट खरीद कर हम दोनों घर आ गए|
घर पहुँचे ही थे की ऋतू ने किसी को फ़ोन कर के बुला लिया| "कुछ नहीं, बस आपके लिए एक सरप्राइज है!" ऋतू ने मुझसे पर्स
लिया और उसमें से 500 रूपए निकाल कर पर्स वापस दे दिया| इतने में घर से फ़ोन आ गया और सब ने बड़े बधाइयाँ दी और ऊपर से ताई जी ने शादी की भी बात छेड़ दी! जैसे-तैसे उन्हें टाल कर मैंने कॉल काटा की दरवाजे पर दस्तक हुई| ऋतू ने खुद दरवाजा खोला और पैसे दे कर कुछ बॉक्स जैसा ले लिया| फिर उस बॉक्स को टेबल पर रख कर बोली; "Happy Birthday जानू!" उस बॉक्स में केक था और केक पर भी हैप्पी बर्थडे जानू लिखा था! मैंने कैंडल बुझा कर एक पीस काटा और ऋतू को खिलाया, ऋतू ने केक के ऊपर की क्रीम अपनी ऊँगली से निकाली और मेरे होठों पर लगा दी और उचक कर मेरी गोद में चढ़ कर मेरे होठों को चूसने लगी| केक का स्वाद अब मुझे ऋतू के मुँह से आ रहा था|
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ऋतू की बुर की हालत अब खराब होने लगी थी, मैंने ऋतू को नीचे उतारा और हम दोनों ने अपने-अपने कपडे निकाल फेंके! ऋतू पलंग पर अपनी टांगें खोल कर
बैठ गई और तब मुझे उसकी बुर से रस टपकता हुआ दिखाई दिया|
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इससे पहले की मैं आगे बढ़ कर वो रस चख पाता, ऋतू पलट गई और अपनी गांड मेरी ओर घुमा दी| अब उसकी गांड देख कर तो लंड नाचने लगा और ठुमके मार के मुझे उस तरफ चलने को कहने लगा| इधर ऋतू नीचे को झुक गई और अपनी गांड ओर ऊपर की तरफ उठा दी|
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अब तो मुझे उसकी गांड और भी बड़ी दिखने लगी| मैंने पीछे से अपना लंड उसकी बुर में पेल दिया ओर पूरे-पूरे धक्के मारने लगा| हर धक्के के साथ लंड जड़ समेत पूरा अंदर उतर जाता, मेरे हर धक्के से ऋतू की कराह निकलने लगी थी| "आह...जानू!...उम्म्म...आअह्ह्ह!!!!" दस मिनट की दमदार चुदाई और ऋतू के साथ मैं उसकी बुर में ही झड़ गया|
"थैंक यू जान! ये वाला बर्थडे सबसे बेस्ट था!" मैंने सांसें कण्ट्रोल करते हुए कहा| ऋतू उठी और मेरे पास आ कर मेरे ऊपर चढ़ कर लेट गई| हम घंटे भर तक ऐसे ही पड़े रहे और तब उठे जब पेट में 'गुर्र्ररर' की आवाज आई| ऋतू ने कुछ खाने के लिए आर्डर किया और हम दोनों मुँह-हाथ-लंड-बुर धो कर, कपडे पहन कर फिर से एक दूसरे के आगोश में बैठ गए| कुछ देर बाद ऋतू बोली; "जानू! आपकी 'अनु' का फ़ोन आया था?" मैं ये सुन कर थोड़ा हैरान हुआ क्योंकि वाक़ई में इतने महीनों में उन्होंने मुझे कोई कॉल/मैसेज नहीं किया था| मैं चुप रहा क्योंकि उस टाइम मैं क्या कहता?! "यही दोस्ती होती है क्या? जब उनकी इज्जत उस ट्रैन के डिब्बे में खतरे में थी तब आप उनके साथ थे ना? उनके डाइवोर्स के वक़्त में आप उनके साथ थे ना? उनके कारन ही आपका नाम कोर्ट केस में घसींटा गया और उन्हीं के कारन आपने वो जॉब छोड़ी और उन्होंने आज तक आपको कभी कॉल या मैसेज किया? वो तो बैंगलोर चली गईं और वहाँ मजे कर रहीं हैं, ते देखो...
" ये कहते हुए ऋतू ने अपने फ़ोन में उनकी फेसबुक प्रोफाइल दिखाई जिसमें वो कहीं घूमने गईं थीं और अपने दोस्तों के साथ 'चिल' कर रहीं थीं| "जब इंसान का काम निकल जाता है तो वो उस इंसान को भूल जाता है जो उसके बुरे वक़्त में उसके साथ था|" ऋतू ने बहुत गंभीर होते हुए मुझे कहा ऐसा लगा जैसे वो मुझे जिंदगी का पाठ पढ़ा रही हो! "यार! मैं मानता हूँ जो तुम कह रही हो वो सही है पर मैंने सिर्फ दोस्ती निभाई थी उसके बदले में अगर उन्होंने मुँह मोड़ लिया तो इसमें मेरी क्या गलती है?" मैंने कहा पर ऋतू आज मेरी क्लास लेने के चक्कर में थी; "इसका मतलब ये तो नहीं की लोग आपका फायदा उठाते रहे? Mr. कुमार को एक बलि का बकरा चाहिए था तो उन्होंने आपको चुना, इनको अपने पति से प्यार नहीं मिला तो आपसे दोस्ती कर ली और जब दोनों का काम निकल गया तो आप को छोड़ गए! ये कैसी दोस्ती?" ऋतू की बात सुन मैं मुस्कुरा दिए और मेरी ये मुस्कराहट देखते ही ऋतू पूछने लगी; "आप क्यों मुस्कुरा रहे हो?"
"जान! मैंने सिवाय तुम्हारे कभी किसी से कुछ expect ही नहीं किया! राखी, मोहिनी, अनु सब जानती थीं की आज मेरा जन्मदिन है पर मुझे इनके कॉल नहीं आने का जरा भी दुःख नहीं| हाँ तुमने जो कहा वो सही है और मैं मानता हूँ की मैं लोगों की कुछ ज्यादा ही मदद कर देता हूँ या ये कहूँ की मैं उन्हें ना नहीं कह पाता| आज से मैं खुद को चेंज करूँगा और किसी की भी मदद करने से पहले देख लूँगा की कहीं उसके चक्कर में मेरा नुक्सान ना हो जाये|" ये सुन कर तो जैसे ऋतू को लगा की उसका पढ़ाया हुआ सबक मेरे पल्ले पड़ गया और वो खुश हो गई| तभी खाना आ गया और हमने पेट भर के खाया और शाम को मैं ऋतू को हॉस्टल छोड़ आया|
कुछ दिन बीते और फिर पता चला की कुमार की कंपनी बंद हो गई और मेरे दो colleagues अरुण और सिद्धार्थ की जॉब छूट गई| सिद्धार्थ ने तो नई जॉब जुगाड़ से ढूँढ ली थी पर अरुण के पास अब भी जॉब नहीं थी| मैंने अपनी कंपनी में बात की और सर से उसकी थोड़ी सिफारिश की और सर मान गए पर उसे पोस्टिंग बरेली में मिली|
फिर एक दिन पता चला की मोहिनी की शादी तय हो गई है, शायद अब उसने Move on करने का तय किया था| उसकी शादी बड़े धूम-धाम से हुई, पता नहीं मुझे ऐसा लगा की कहीं मेरे सामने जाने से मोहिनी का जख्म हरा न हो जाए| पर चूँकि शादी का बुलावा हमारे पूरे घर को गया था तो मजबूरन मुझे भी सब के साथ जाना ही पड़ा| अब सब के सब सबसे पहले मेरे घर आने वाले थे तो एक दिन पहले मुझे और ऋतू को मिल कर ढंग से सफाई करनी पड़ी| ऋतू की सारी चीजें मैंने उसे दे दी, उसकी पैंटी, ब्रा, टॉप्स, एयरिंग्स, कंघी, मंगलसूत्र, चूड़ियाँ, साड़ियाँ सब! पूरे घर को इस कदर साफ़ किया की वहाँ ऋतू का एक DNA तक नहीं बचा| "हाय! मेरे जिस्म की पूरी महक आपने भगा दी!" ऋतू मुझे छेड़ते हुए बोली| मैंने ऋतू को बाहों में भरा और कहा; "घर से ही गई है ना? मेरे जिस्म से तो तेरी महक
नहीं गई ना?" ये सुन कर ऋतू शर्मा गई और मेरे सीने में अपना सर छुपा लिया| जब सब लोग घर आये तो चकाचक घर को देख कर सब ने बड़ी तारीफ की, माँ और ताई जी तो घूम-घूम कर निरक्षण करने लगीं की कहीं कोई गलती निकाल सकें| फिर वहाँ से सब ऋतू के हॉस्टल पहुँचे और वहाँ आंटी जी ने बड़े अच्छे से सब का स्वागत किया| वो पूरा दिन ना तो मैं मोहिनी से मिल पाया ना ही कोई मौका मिला था| रात को जब बरात आई और खाना-पीना हुआ उसके बाद सब लोग एक-एक कर अपनी फोटो खिंचवाने स्टेज पर चढ़ने लगे| अब हमें भी चढ़ना था और शगुन देना था, मैं सबसे आखिर में खड़ा था पर मोहिनी ने फोटो खींचने के बाद मुझे आवाज दे कर बुलाया; 'अरे मानु जी! आप कहाँ जा रहे हो? मेरे हस्बैंड से तो मिल लो?" ये कहते हुए उसने मेरा intro अपने हस्बैंड से करवाया| "ये हैं मेरे गुरु जी! कॉलेज में यही मुझे 'एकाउंट्स की शिक्षा देते थे!!!'" मोहिनी ने हँसते हुए कहा| उसके पति को लगा की मैं उसका टीचर हूँ; "यार इतना भी बुड्ढा मत बना, अभी तो मेरी शादी भी नहीं हुई?" ये सुन कर हम तीनों हँस दिए|
"Anything special that I should know?" मोहिनी के पति ने पुछा|
"बहुत बोलती है ये... प्लीज इसे बोलने मत देना वरना ये ऐसा रेडियो है जो शुरू हो जाए तो बंद नहीं होता|" मैंने मोहिनी का मजाक उड़ाते हुए कहा| मोहिनी ने मुझे प्यार से एक घूँसा मारा| "देख लिया मारती भी है! Insurance करवाया है ना अपना? कहीं टूट-फूट जाओ तो!" हम तीनों खूब हांसे और मुझे ये जान कर ख़ुशी हुई की मोहिनी इस शादी से बहुत खुश है| पूरी शादी में ऋतू मुझसे दूर रही थी और माँ और ताई जी के साथ बैठी रहती| एक पल के लिए तो मैं भी सोच में पड़ गया की इतनी समझदार कैसे हो गई?
update 58
शादी अच्छे से निपट गई और घर वाले अगले दिन वापस गाँव चले गए| फिर वही त्योहारों की झड़ी और इस बार घर वालों ने जबरदस्ती हमें घर पर बुला लिया तो सारे त्यौहार उन्हीं के साथ हँसी-ख़ुशी मनाये गए| अब घर पर थे तो अकेले में बैठने का समय नहीं मिलता था, इसलिए मैं कई बार देर रात को ऋतू के पास जा कर बैठ जाता और वो कुछ देर हम एक साथ बैठ कर बिताते| घर से बजार जाने के समय मैं कोई बहाना बना देता और ऋतू को साथ ले जाता| दिवाली की रात हम सारे एक साथ बैठे थे तो ताऊ जी ने मुझे अपने पास बैठने को बुलाया;
ताऊ जी: वैसे मुझे तेरी तारीफ तेरे सामने नहीं करनी चाहिए पर मुझे तुझ पर बहुत गर्व है| इस पूरे परिवार में एक तू है जो अपनी सारी जिम्मेदारियाँ उठाता है| मुझे तुझ में मेरा अक्स दिखता है....
!
ये कहते हुए ताऊ जी की आँखें नम हो गईं|
पिताजी: भाई साहब सही कहा आपने| पिताजी के गुजरने के बाद सब कुछ आप ने ही तो संभाला था|
ताऊ जी: मानु बेटा, जब तूने घर लेने की बात कही तो मैं बता नहीं सकता की मुझे कितना गर्व हुआ तुझ पर| तू अपनी मेहनत के पैसों से अपना घर लेना चाहता है, सच हमारे पूरे खानदान में कभी किसी ने ऐसा नहीं सोचा|
मेरी तारीफ ना तो चन्दर भैया के गले उतर रही थी और ना ही भाभी के और वो जैसे-तैसे नकली मुस्कराहट लिए बैठे थे| पर मेरे माता-पिता, ताई जी और ख़ास कर ऋतू का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था|
पिताजी: बेटा थोड़ा समय निकाल कर खेती-किसानी भी सीख ले ताकि बाद में तुम और चन्दर ये सब अच्छे से संभाल सकें| तेरी और रितिका की शादी हो जाए तो हम सब तुझे और चन्दर को सब दे कर यात्रा पर चले जायेंगे|
ताई जी: बेटा मान भी जा हमारी बात और कर ले शादी!
मैं: माफ़ करना ताई जी मैं कोई जिद्द नहीं कर रहा बस घर खरीदने तक का समय माँग रहा हूँ|
ताऊ जी: ठीक है बेटा!
तो इस तरह मुझे पता चला की आखिर घर वाले क्यों मुझे अचानक इतनी छूट देने लगे थे| अगले दिन मैं और ऋतू वापस चेहर लौट आये और फिर दिन बीतने लगे| क्रिसमस पर हम दोनों सुबह चर्च गए और वो पूरा दिन हम ने घूमते हुए निकाला| पर अगले दिन घर से खबर आई की ताऊ जी की तबियत ख़राब है, ये सुन कर ऋतू ने कहा की उसे घर जाना है| उसकी अटेंडेंस का कोई चक्कर नहीं था तो मैं उसे घर छोड़ आया| उसके यहाँ ना होने के कारन मैंने 31st दिसंबर नहीं मनाया और घर पर ही रहा| जब मैं उसे लेने घर पहुँचा तो ऋतू बोली; "जानू! जब से मैं पैदा हुई हूँ तब से हमने कभी होली नहीं मनाई|"
"जान! दरअसल वो ....
'काण्ड' होली से कुछ दिन पहले ही हुआ था| इसलिए आज तक इस घर में कभी होली नहीं मनाई गई| पर कोई बात नहीं मैं बात करता हूँ की अगर ताऊ जी मान जाएँ|"
"ठीक है! पर अभी नहीं, अभी उनकी तबियत थोड़ी सी ठीक हुई है और वैसे भी अभी तो दो महीने पड़े हैं|" ऋतू ने कहा| ताऊ जी की तबियत ठीक होने लगी थी इस लिए उन्होंने खुद ऋतू को वापस जाने को कहा था|
जनवरी खत्म हुआ और फिर कॉलेज का एनुअल डे आ गया| पर मुझे दो दिन के लिए बरेली जाना था, जब मैंने ये बात ऋतू को बताई तो वो रूठ गई और कहने लगी की वो भी नहीं जायेगी| मैंने बड़ी मुश्किल से उसे जाने को राजी किया ये कह कर की; "ये कॉलेज के दिन फिर दुबारा नहीं आएंगे|" ऋतू मान गई और मैंने ही उसके लिए एक शानदार ड्रेस सेलेक्ट की| ऋतू ये नहीं जानती थी की मेरा प्लान क्या है! अरुण चूँकि पहले से ही बरेली में था तो मैंने उससे मदद मांगी की वो काम संभाल ले और मैं एक ही दिन में अपना बचा हुआ काम उसे सौंप कर वापस आ गया| एनुअल डे वाले दिन ऋतू कॉलेज पहुँच गई थी, मैंने गेट पर से उसे फ़ोन किया और पुछा की वो गई या नहीं? ऋतू ने बताया की वो पहुँच गई है| ये सुनने के बाद ही मैं कॉलेज में एंटर हुआ और ऋतू को ढूंढता हुआ उसके पीछे खड़ा हो गया| मैंने उसकी आँखिन मूँद लीं और वो एक दम से हड़बड़ा गई और कहने लगी; "प्लीज... कौन है?... प्लीज…छोड़ो मुझे!" मैंने उसकी आँखों पर से अपने हाथ उठाये और वो मुझे देख कर हैरान हो गई|
हैरान तो मैं भी हुआ क्योंकि ऋतू आज लग ही इतनी खूबसूरत रही थी
और मैं उम्मीद करने लगा की वो आ कर मेरे गले लग जाएगी पर ऐसा नहीं हुआ| मुझे लगा शायद ऋतू शर्मा रही है पर तभी राहुल अपने दोनों हाथों में कोल्ड-ड्रिंक लिए वहाँ आ गया| उसने एक कोल्ड ड्रिंक ऋतू की तरफ बढ़ाई और ऋतू ने संकुचाते हुए वो कोल्ड-ड्रिंक ले ली| मुझे देख कर राहुल बोला; "Hi!" पर मैंने उसकी बात को अनसुना कर दिया|
तभी ऋतू ने मेरा हाथ पकड़ा और राहुल को 'excuse us' बोल कर मुझे एक तरफ ले आई|
"आज तो बड़े dashing लग रहे हो आप?" ऋतू बोली|
"थैंक यू ... but .... I thought you didn’t like him!” मैंने कहा क्योंकि फर्स्ट ईयर के एनुअल डे पर ऋतू ने यही कहा था|
“I…realized that we should’nt blame children because of their parents. It wasn’t his fault?” ऋतू ने सोचते हुए कहा|
“Fair enough….
Anyway you’re looking faboulous today!” मैंने ऋतू को कॉम्पलिमेंट देते हुए कहा|
“Thank you! वैसे आपने तो कहा था की आपको बहुत काम है और आप नहीं आने वाले?" ऋतू ने मुझसे शिकायत करते हुए कहा|
"भाई अपनी जानेमन को मैं भला कैसे उदास करता?" मैंने ऋतू का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा|
"मैंने सोच लिया था की मैं आप से बात नहीं करुँगी!" ऋतू ने कहा|
"इसीलिए तो भाग आया!" मैंने हँसते हुए कहा और ऋतू भी ये सुन कर मुस्कुरा दी| इस बार कुछ डांस पर्फॉर्मन्सेस थीं तो मैं और ऋतू खड़े वो देखने लगे और लाउड म्यूजिक के शोर में एन्जॉय करने लगे| ऋतू की कुछ सहेलियाँ आई और वो भी हमारे साथ खड़ी हो कर देखने लगीं| ये देख कर मैंने सोचा की चलो ऋतू ने नए दोस्त बना लिए हैं. काम्य के जाने के बाद ऋतू की जिंदगी में दोस्त ही नहीं थे!
खेर दिन बीते और होली आ गई....
हर साल की तरह इस साल भी हम दोनों होली से एक दिन पहले ही घर आ गए| शाम को होलिका दहन था, जिसके बाद सब घर लौट आये| रात का खाना बन रहा था और आंगन में मैं, चन्दर भय, पिताजी और ताऊ जी बैठे थे|
मैं: ताऊ जी...आप बुरा ना मानें तो आपसे कुछ माँगूँ? (मैंने डरते हुए कहा|)
ताऊ जी: हाँ-हाँ बोल!
मैं: ताऊ जी ... इस बार होली घर पर मनाएँ?
मेरे ये बोलते ही घर भर में सन्नाटा पसर गया, कोई कुछ नहीं बोल रहा था और मैं मन ही मन सोचने लगा की मैंने कुछ ज्यादा ही माँग लिया क्या? ताऊ जी उठे और छत पर चले गए और पिताजी मुझे घूर कर देखने लगे और फिर वो भी ताऊ जी के पीछे छत पर चले गए| कुछ देर बाद मुझे ताऊ जी ने ऊपर से आवाज दी, मैं सोचने लगा की कुछ ज्यादा ही फायदा उठा लिया मैंने घर वालों की छूट का| छार पर पहुँच कर मैं पीछे हाथ बांधे खड़ा हो गया|
ताऊ जी: तुझे पता है की हम क्यों होली नहीं मनाते?
मैंने सर झुकाये हुए ना में गर्दन हिलाई, कारन ये की अगर मैं ये कहता की मुझे पता है तो वो मुझसे पूछते की किस ने बताया और फिर संकेत और उसके परिवार के साथ हमारे रिश्ते बिगड़ जाते|
ताऊ जी: तुझे नहीं पता, चन्दर की पहली बीवी रितिका जिससे हुई वो किसी दूसरे लड़के के साथ घर से भाग गई थी| उस टाइम बहुत बवाल हुआ था, गाँव में हमारी बहुत थू-थू हुई| उस समय गाँव के मुखिया जो आजकल हमारे मंत्री साहब है उन्होंने ......फरमान सुनाया की दोनों को मार दिया जाए| इसलिए हम ....
होली नहीं मनाते| (ताऊ जी ने मुझे censored बात बताई|
मैं: तो ताऊ जी हम बाकी त्यौहार क्यों मनाते हैं?
पिताजी: ये घटना होली के आस-पास हुई थी इसलिए हम होली नहीं मनाते| (पिताजी ने ताऊ जी की बात ही दोहराई और 'होली नहीं मनाते' पर बहुत जोर दिया|)
मैं: जो हुआ वो बहुत साल पहले हुआ ना? अब तो सब उसे भूल भी गए हैं! गाँव में ऐसा कौन है जो हमारी इज्जत नहीं करता? हम कब तक इस तरह दब कर रहेंगे? ज़माना बदल रहा है और कल को मेरी शादी होगी तो क्या तब भी हम होली नहीं मनाएँगे?
शायद मेरी बात ताऊ जी को सही लगी इसलिए उन्होंने खुद ही कहा;
ताऊ जी: ठीक है...लड़का ठीक कह रहा है| कब तक हम उन पुरानी बातों की सजा बच्चों को देंगे| तू कल जा कर बजार से रंग ले आ|
मैं उस समय इतने उत्साह में था की बोल पड़ा; "जी कलर तो मैं शहर से लाया था|" ये सुन कर ताऊ जी हंस दिए और मुझे पिताजी से डाँट नहीं पड़ी|
मुझे उस रात एक बात क्लियर हो गई की मुझ पर और ऋतू पर जो बचपन से बंदिशें लगाईं गईं थीं वो भाभी (ऋतू की असली माँ) की वजह से थी| ऋतू को तो उसकी माँ के कर्मों की सजा दी गई थी| उसकी माँ के कारन ही ऋतू को बचपन में कोई प्यार नहीं मिला| घर वालों को डर था की कहीं हम दोनों ने भी कुछ ऐसा काण्ड कर दिया तो? पर काण्ड तो होना तय था, क्योंकि ताऊ जी के सख्त नियम कानूनों के कारन ही मैं और ऋतू इतना नजदीक आये थे|
खेर जब ताऊ जी का फरमान घर में सुनाया गया तो सबसे ज्यादा ऋतू ही खुश थी| इधर भाभी को मुझसे मजे लेने थे; "मेरी शादी के बाद इस बार मेरी पहली होली है, तो मानु भैया मुझे लगाने को कौन से रंग लाये हो?"
"काला" मैंने कहा और जोर से हँसने लगा| ऋतू भी अपना मुँह छुपा कर हँसने लगी, ताई जी की भी हंसी निकल गई और माँ ने हँसते हुए मुझे मारने के लिए हाथ उठाया पर मारा नहीं|
"तो मानु भैया, पहले से प्लानिंग कर के आये थे लगता है?" चन्दर ने खीजते हुए कहा|
"मैंने कोई प्लानिंग नहीं बल्कि रिक्वेस्ट की है ताऊ जी से, जो उन्होंने मानी भी है| कलर्स तो मैं इसलिए लाया था की अगर ताऊ जी मान गए तो होली खेलेंगे वरना इन से हम दिवाली पर रंगोली बनाते|" ये सुन कर वो चुप हो गए| अब मुझे कोई और बात छेड़नी थी ताकि माहौल में कोई तनाव न बने| "ताई जी ये कलर्स प्रकर्तिक हैं, इनमें जरा सा भी केमिकल इस्तेमाल नहीं हुआ है| हमारे त्वचा के लिए ये बहुत अच्छे हैं|" मैंने कलर्स की बढ़ाई करते हुए कहा|
"हे राम! इसमें भी मिलावट होने लगी?" ताई जी ने हैरान होते हुए कहा|
"दादी जी आजकल सब चीजों में मिलावट होती है, खाने की हो या पहनने की|" ऋतू ने अपना 'एक्सपर्ट ओपिनियन' देते हुए कहा|
"सच्ची ज़माना बड़ा बदल गया, लालच में इंसान अँधा होने लगा है|" माँ ने कहा| घर की औरतों को बात करने को एक टॉपिक मिल गया था इसलिए मैं चुप-चाप वहाँ से खिसक लिया| मैं छत पर बैठ कर सब को होली के मैसेज फॉरवर्ड कर रहा था की चन्दर
ऊपर आ गया और मुझसे बोला; "अरे रंग तो ले आये! भांग का क्या?"
"ताऊ जी को पता चल गया ना तो कुटाई होगी दोनों की!" मैंने कहा|
"अरे कुछ नहीं होगा? सब को पिला देते हैं थोड़ी-थोड़ी!" चन्दर ने खीसें निपोरते हुए कहा|
"दिमाग खराब है?" मैंने थोड़ा गुस्सा करते हुए कहा|
"अच्छा अगर पिताजी ने हाँ कर दी फिर तो पीयेगा ना?" चन्दर ने कुछ सोचते हुए कहा|
मैंने मना कर दिया क्योंकि एक तो मैं ऋतू को वादा कर चूका था और दूसरा कॉलेज में एक बार पी थी और हम चार लौंडों ने जो काण्ड किया था की क्या बताऊँ| पर चन्दर के गंदे दिमाग में एक गंदा विचार जन्म ले चूका था|
अगले दिन सब जल्दी उठे और जैसे मैं नीचे आया तो सब से पहले ताऊ जी ने मेरे माथे पर तिलक लगाया और मैंने उनके पाँव छुए| फिर पिताजी, उसके बाद ताई जी और फिर माँ ने भी मुझे तिलक लगाया और मैंने उनके पाँव छुए| चन्दर भैया घर से गायब थे तो भाभी ही मुट्ठी में गुलाल लिए मेरे सामने खड़ी हो गई, पर इससे पहले वो मुझे रंग लगाती ऋतू एक दम से बीच में आ गई और फ़टाफ़ट मेरे दोनों गाल उसने गुलाल से चुपड़ दिए| वो तो शुक्र है की मैंने आँख बंद कर ली थी वरना आँखों में भी गुलाल चला जाता| मुझे गुलाल लगा कर वो छत पर भाग गई, मैंने थाली से गुलाल उठाया और छत की तरफ भागा| ऋतू के पास भागने की जगह नहीं बची थी तो वो छत के एक किनारे खड़ी हुई बीएस 'सॉरी..सॉरी...सॉरी' की रट लगाए हुए थी| मैं बहुत धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा और दोनों हाथों को उसके नरम-नरम गालों पर रगड़ कर गुलाल लगाने लगा| मेरे छू भर लेने से ऋतू कसमसाने लगी थी और उसकी नजरें नीचे झुकी हुई थीं| छत पर कोई नहीं था तो मेरे पास अच्छा मौका था ऋतू को अपनी बाहों में कस लेने का| मैंने मौके का पूरा फायदा उठाया और ऋतू को अपनी बाहों में भर लिया| ऋतू की सांसें भारी होने लगी थी और वो मेरी बाहों से आजाद होने को मचलने लगी| तेजी से सांस लेते हुए ऋतू मुझसे अलग हुई, मानो जैसे की उसके अंदर कोई आग भड़क उठी हो जिससे उसे जलने का खतरा हो| मैं ऋतू की तेज सांसें देख रहा था की तभी भाभी ऊपर आ गईं; "अरे मानु भैया! हम से भी गुलाल लगवा लो!" पर मेरा मुँह तो ऋतू ने पहले ही रंग दिया था तो भाभी के लगाने के लिए कोई जगह ही नहीं बची थी| "तुम्हारे ऊपर तो रितिका का रंग चढ़ा हुआ है, अब भला मैं कहाँ रंग लगाऊँ?" भाभी ने मेरी टाँग खींचते हुए कहा|
"माँ ...
गर्दन पर लगा दो?" ऋतू हंसती हुई बोली और ये सुन कर भाभी को मौका मिल गया मुझे छूने का| उन्होंने मेरी टी-शर्ट के गर्दन में एकदम से हाथ डाला और उसे मेरे छाती के निप्पलों की तरफ ले जाने लगी| मुझे ये बहुत अटपटा लगा और मैंने उनका हाथ निकाल दिया| भाभी समझ गई की मुझे बुरा लगा है और ऋतू भी ये सब साफ़-साफ़ देख पा रही थी| मैं उस वक़्त कहने वाला हुआ था की ये क्या बेहूदगी है पर ऋतू सामने खड़ी थी इसलिए कुछ नहीं बोला| मैं वापस नीचे जाने लगा तो भाभी पीछे से बोली; "अरे कहाँ जा रहे हो? मुझे तो रंग लगा दो? आज का दिन तो भाभी देवर से सबसे ज्यादा मस्ती करती है और तुम हो की भागे जा रहे हो?" मैंने उनकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और संकेत से मिलने निकल पड़ा| उसके खेत में जमावड़ा लगा हुआ था और वहां सब ठंडाई पी रहे थे और पकोड़े खा रहे थे| मुझे देखते ही वो लड़खड़ाता हुआ आया और गले लगा फिर तिलक लगा कर मुझे जबरदस्ती ठंडाई पीने को कहा| अब उसमें मिली थी भाँग और मैं ठहरा वचन बद्ध! इसलिए फिर से घरवालों के डर का बहाना मार दिया| कुछ देर बाद ताऊ जी और पिताजी भी आ गए और वो ये देख कर खुश हुए की मैंने भाँग नहीं पि! पर ताऊ जी और पिताजी ने एक-एक गिलास ठंडाई पि और फिर हम तीनों घर आ गए| चन्दर का अब भी कुछ नहीं पता था| घर पहुँच कर सबसे पहले भाभी मुझे देखते हुए बोली; "सारे गाँव से होली खेल लिए पर अपनी इकलौती भाभी से तो खेले ही नहीं?"
"छत पर ऋतू के सामने मेरी पूरी गर्दन रंग दी आपने और कितनी होली खेलनी है आपको?" मैंने जवाब दिया| फिर मैंने अचानक से झुक कर उनके पाँव छूए और भाभी बुदबुदाते हुए बोली; "पाँव की जगह कुछ और छूते तो मुझे और अच्छा लगता!" मैं उनका मतलब समझ गया पर पिताजी के सामने कहूँ कैसे? इसलिए मैं नहाने के लिए जाने को आंगन की तरफ मुड़ा तो भाभी ने लोटे में घोल रखा रंग पीछे से मेरे सर पर फेंका| ठंडा-ठंडा पानी जैसे शरीर को लगा तो मेरी झुरझुरी छूट गई| "अब तो गए आप?" कहते हुए मैंने ताव में उनके पीछे भागा, भाभी खुद को बचाने को इधर-उधर भागना चाहती थी पर मैंने उनका रास्ता रोका हुआ था| इतने में उन्होंने ऋतू का हाथ पकड़ा और उसे मेरी तरफ धकेला, मैंने ऋतू के कंधे पर हाथ रख कर उसे साइड किया और भाभी का दाहिना हाथ पकड़ लिया और उन्हें झटके से खींचा| भाभी को गिरने को हुईं तो मैंने उन्हें गिरने नहीं दिया और गोद में उठा लिया| उनका वजन सच्ची बहुत जयदा था ऊपर से वो मुझसे छूटने के लिए अपने पाँव चला रही थीं तो मेरे लिए उन्हें उठाना और मुश्किल हो गया था| आंगन में एक टब में कुछ कपडे भीग रहे थे मैंने उन्हें ले जा कर उसी टब में छोड़ दिया| जैसे ही भाभी को ठन्डे पानी का एहसास अपनी गांड और कमर पर हुआ वो चीख पड़ी; "हाय दैय्या! मानु तुम सच्ची बड़े खराब हो! मर गई रे!" उन्हें ऐसे तड़पता देख मैं और ऋतू जोर-जोर से हँसने लगे और भाभी की चीख सुन माँ
और ताई जी भी उन्हें टब में ऐसे छटपटाते हुए देख हँसने लगे| इससे पहले की माँ कुछ कहती मैंने खुद ही उन्हें साड़ी बात बता दी; "शुरू इन्होने किया था मेरे ऊपर रंग डाल कर, मैंने तो बस इनके खेल अंजाम दिया है|" इधर भाभी उठने के लिए कोशिश कर रहीं थीं पर उनकी बड़ी गांड जैसे टब में फँस गई थी| आखिर मैंने और ऋतू ने मिल कर उन्हें खड़ा किया और भाभी की चेहरे पर मुस्कराहट आ गई क्योंकि आज जिंदगी में पहली बार मैंने उन्हें इस कदर छुआ था|
मैंने उनकी इस मुस्कराहट को नजरअंदाज किया और अपने कपडे ले कर नहाने घुस गया| करीब पाँच मिनट हुए होंगे की चन्दर घर आया और उसके हाथ में मिठाई का डिब्बा था| उसने सब को डिब्बे से लड्डू निकाल कर दिए और मुझे भी आवाज दी की मैं भी खा लूँ पर मैं तो बाथरूम में था तो माने कह दिया की आप रख दो मैं नहा कर खा लूँगा| मेरे नहा के आने तक सबने लड्डू खा लिए थे और पूरा डिब्बा साफ़ था| जैसे ही मैं नहा के बाहर आया तो पूरे घर में सन्नाटा पसरा हुआ था.... आंगन में चारपाई पर ताई जी और माँ लेटे हुए थे, भाभी शायद अपने कमरे में थीं और ऋतू रसोई के जमीन पर बैठी थी और दिवार से सर लगा कर बैठी थी| ताऊ जी और पिताजी अपने-अपने कमरे में थे और चन्दर आंगन में जमीन पर पड़ा था| सब की आँखें खुलीं हुईं थीं पर कोई कुछ बोल नहीं रहा था| ये देखते ही मेरी हालत खराब हो गई, मुझे लगा कहीं सब को कुछ हो तो नहीं गया? मैंने एक-एक कर सब को हिलाया तो सब मुझे बड़ी हैरानी से देखने लगे| अब मुझे शक हुआ की जर्रूर सब ने भाँग खाई है और खिलाई भी उस कुत्ते चन्दर ने है!!! मैं पिताजी के कमरे में गया तो उन्हें भी बैठे हुए पाया और उन्हें जब मैंने हिलाया तो वो शब्दों को बहुत खींच-खींच कर बोले; "इसमें.....भांग.....थी.....!!!" अब मैं समझ गया की चन्दर बहन के लोडे ने भाँग के लड्डू सब को खिला दिए हैं! मैंने पिताजी को सहारा दे कर लिटाया और वो कुछ बुदबुदाने लगे थे| मैं ताऊ जी के कमरे में आया तो वो पता नहीं क्यों रो रहे थे, मैं जानता था की इस हालत में मैं उन्हें कुछ कह भी दूँ टब भी उनका रोना बंद नहीं होगा| मैंने उन्हें भी पुचकारते हुए लिटा दिया| इधर जब मैं वापस आंगन में आया तो माँ और ताई जी की आँख लग गई थी और चन्दर भी आँख मूंदें जमीन पर पड़ा था| मैंने भाभी के कमरे में झाँका तो वहां तो अजब काण्ड चल रहा था, वो अपनी बुर को पेटीकोट के ऊपर से खुजा रही थीं और मुँह से पता नहीं क्या बड़बड़ा रही थीं| मैंने फटाफट उनके कमरे का दरवाजा बंद किया और कुण्डी लगा कर मैं ऋतू के पास आया, तो पता नहीं वो उँगलियों पर क्या गईं रही थी? मैंने उसे हिलाया तो उसने मेरी तरफ देखा और फिर पागलों की तरह अपनी उँगलियाँ गिनने लगी| "जानू! I Love ......
"इतना बोलते हुए वो रुक गई| अब मेरी फटी की अगर किसी ने सुन लिया तो आज ही हम दोनों को जला कर यहीं आंगन में दफन कर देंगे| मैंने उसे गोद में उठाया और ऊपर उसके कमरे में ला कर लिटाया| मैं उसे लिटा के जाने लगा तो उसने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया और Pout की आकृति बना कर मुझे Kiss करना चाहा| मैं उसके हाथ से अपना हाथ छुड़ा रहा था क्योंकि मैं जानता था की अगर कोई ऊपर आ गया तो हम दोनों को देख कर सब का नशा एक झटके में टूट जायेगा! पर ऋतू पर तो प्यार का भूत सवार हो गया था| पता नहीं उसे आज मेरे अंदर किसकी शक्ल दिख रही थी की वो मुझे बस अपने ऊपर खींच रही थी| "ऋतू मान जा...हम घर पर हैं! कोई आ जाएगा!" मैंने कहा पर उसने मेरी एक न सुनी और अपने दोनों हाथों के नाखून मेरे हाथों में गाड़ते हुए कस कर पकड़ लिए| ऋतू के गुलाबी होंठ मुझे अपनी तरफ खींच रहे थे और अब मेरा सब्र भी जवाब देने लगा था| मैंने हार मानते हुए उसके होठों को अपने होठं से छुआ पर इससे पहले की मैं अपनी गर्दन ऊपर कर उठता ऋतू ने झट से अपने दोनों हाथों को मेरी गर्दन के पीछे लॉक कर दिया और अपने होठों से मेरे होंठ ढक दिए| ऋतू पर नशा पूरे शबाब था और वो बुरी तरह से मेरे होंठ चूसने लगी| मेरे हाथ उसके जिस्म की बजाये बिस्तर पर ठीके थे और मैं अब भी उसकी गिरफ्त से छूटने को अपना जिस्म पीछे खींच रहा था|
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मुझे डर लग रहा था की अगर कोई ऊपर आ गया तो, इसलिए मैंने जोर लगाया और ऋतू के होठों की गिरफ्त से अलग हुआ| पर ये क्या ऋतू ने "I Love You" रटना शुरू कर दिया| वो तो अपनी आँख भी नहीं झपक रही थी बस लेटे हुए मुझे देख रही थी और I Love You की माला रट रही थी| मैंने उस के कमरे को बाहर से कुण्डी लगाईं और रसोई में गया और वहाँ से कटोरी में आम का अचार निकाल लाया| ऋतू के कमरे की कुण्डी खोली तो छत पर देखते हुए अब भी I Love You बड़बड़ा रही थी| मैंने कटोरी से एक आम के अचार का पीस उठाया और ऋतू के सिरहाने बैठ गया| मुझे अपने पास देखते ही उसने मुझे अपनी बाहों में कस लिया| मैंने आम का पीस उसकी तरफ बढ़ाया तो अपने होंठ एक दम से बंद कर लिए| पर मैंने भी थोड़ा उस्तादी दिखाते हुए पीस वापस कटोरी में रखा और अपनी ऊँगली ऋतू को चटा दी| ऊँगली में थोड़ा अचार का मसाला लगा था, ऋतू ने खटास के कारन अपना मुँह खोला और मैंने फटाफट अचार का टुकड़ा उसके मुँह में डाल दिया| ऋतू एक दम से मुँह बनाते हुए उठ बैठी और उसने वो अचार का पीस उगल दिया| मुझे उसका ऐसा मुँह बनाते हुए देख बहुत हँसी आई पर वो मेरी तरफ सड़ा हुआ मुँह बना कर देखने लगी| "सो जा अब!" मैंने ऋतू को कहा और उठ कर नीचे आ गया| बारी-बारी कर के सब को अचार चटाया और सब के सब ऋतू की ही तरह मुँह बना रहे थे और मुझे बहुत हँसी आ रही थी| सबसे आखिर में मैंने चन्दर को अचार चटाया तो उस पर जैसे फर्क ही नहीं पड़ा, वो तो अब भी बेसुध से पड़ा था| अब मैं इससे ज्यादा कुछ कर नहीं सकता था
तो उसे ऐसे ही छोड़ दिया| बाकी सब के सब नशा होने के कारन सो रहे थे, इधर मुझे भूख लग गई थी| वो तो शुक्र है की घर पर पकोड़े बने थे जिन्हें खा कर मैं अपने कमरे में आ कर सो गया|
शाम को चार बजे उठा तो पाया की घर वाले अब भी सो रहे हैं| मैंने अपने लिए चाय बनाई और फिर रात के लिए खाना बनाने लगा| मैं यही सोच रहा था की बहनचोद चन्दर ने ऐसी कौन सी भाँग खिला दी की सब के सब सो रहे हैं? पर फिर जब मुझे अपने कॉलेज वाला किस्सा याद आया तो मुझे याद आया की जब पहली बार मैंने भाँग खाई थी तो मैंने सुबह तक क्या काण्ड किया था! खेर खाना बन गया था और मेरे उठाने के बाद भी कोई नहीं उठा था| सब के सब कुनमुना रहे थे बस| एक बात तो तय थी की कल चन्दर की सुताई होना तय है!
मैंने अपना खाना खाया और ऊपर आ गया, रात के 1 बजे होंगे की मुझ नीचे से आवाज आई; "मानु!" मैं फटाफट नीचे आया तो देखा ताई जी और माँ चारपाई पर सर झुकाये बैठे हैं| मैंने उन्हें पानी दिया और फुसफुसाते हुए पुछा; "ताई जी भूख लगी है?" उन्होंने हाँ में सर हिलाया तो मैं माँ और उनके लिए खाना परोस लाया| फिर मैंने पिताजी और ताऊ जी को उठाया और उन्हें भी खाना परोस कर दिया| इधर ऋतू भी नीचे आ गई और उसे देखते ही मैं मुस्कुराया और उसे माँ के पास बैठने को कहा| उसका खाना ले कर उसे दिया और मैं सीढ़ियों पर बैठ गया| तभी भाभी ने दरवाजा खटखटाया, क्योंकि उनके कमरे का दरवाजा मैंने बंद कर दिया था इस डर से की कहीं ताऊ जी और पिताजी उठ गए और उन्हें ऐसी आपत्तिजनक हालत में देख लिया तो! भाभी बाहर आईं और सीधा बाथरूम में घुस गईं| वो वपस आईं तो उन्हें भी मैंने ही खाना परोस के दिया| सब ने फटाफट खाना खाया और कोई एक शब्द भी नहीं बोला| खाना खाने के बाद ताऊ जी अपने कमरे से बाहर आये और उन्होंने चन्दर को जमीन पर पड़े हुए देखा तो उनका खून खौल गया| उन्होंने ठन्डे पानी की एक बाल्टी उठाई और पूरा का पूरा पानी उस पर उड़ेल दिया| इतना पानी अपने ऊपर पड़ते ही चन्दर बुदबुदाता हुआ उठा और ताऊ जी ने उसे एक खींच कर थप्पड़ मारा| चन्दर जमीन पर फिर से जा गिरा; "हरामजादे! तेरी हिम्मत कैसे हुई सब को भाँग के लड्डू खिलाने की? वो तो मानु यहाँ था तो उसने सब को संभाल लिया वरना यहाँ कोई घुस कर क्या-क्या कर के चला जाता किसी को पता ही नहीं चलता| तुझे जरा भी अक्ल नहीं है की घर में औरतें हैं, तेरी बीवी है, बच्ची है?” पर चन्दर को तो जैसे फर्क ही नहीं पड़ रहा था| मैंने भाभी को कहा की इन्हें अंदर ले कर जाओ, तो भाभी ने उन्हें सहारा दे कर उठाया और कमरे में ले गईं| इधर पिताजी ताऊ जी की गर्जन सुन कर बाहर आये और मुझे इशारे से अपने पास बुलाया| मैं उनके पास गया और पिताजी का शायद सर घूम रहा था इसलिए मैंने उन्हें सहारा दे कर बैठक में बिठा दिया| सब के सब बैठक में आ कर बैठ गए और मुझसे पूछने लगे की आखिर हुआ क्या था? मैंने
उन्हें सारी बात विस्तार से बता दी और अचार वाली बात पर सारे हँसने लगे| पर तभी पिताजी ने पुछा; "तुझे कैसे पता की अचार चटाना है?" अब ये सुन कर मैं फँस गया था| पहले तो सोचा की झूठ बोल दूँ, फिर मैंने सोचा की मेरा किस्सा सुन कर सब हंस पड़ेंगे और घर का माहौल हल्का हो जायेगा इसलिए मैंने अपना किस्सा सुनाना शुरू किया|
"कॉलेज फर्स्ट ईयर था और होली पर घर नहीं आ पाया था क्योंकि असाइनमेंट्स पूरे नहीं हुए थे| होली के दिन सुबह दोस्त लोग आ गए और मुझे अपने साथ कॉलेज ले आये जहाँ हमने खूब होली खेली! फिर दोपहर को हम वापस हॉस्टल पहुँचे और नाहा धो कर खाना खाने आ गए| आज हॉस्टल में पकोड़े बने थे जो सब ने पेट भर कर खाये| जब वापस कमरे में आये तो मेरा एक दोस्त कहीं से भाँग की गोलियाँ ले आया था| उसने सब को जबरदस्ती खाने को दी ये कह कर की ये भगवान का प्रसाद है| अब प्रसाद को ना कैसे कहते, जब सब ने एक-एक गोली खा ली तो वो सच बोला की ये भाँग की गोली है| हम टोटल 4 दोस्त थे, अमन, मनीष और कुणाल| कुणाल को छोड़ कर बाकी तीनों डर गए थे की अब तो हम गए, पता नहीं ये भाँग का नशा क्या करवाएगा| हम ने सुना था की भाँग का नशा बहुत गन्दा होता है और आज जब पहलीबार खाई तो डर हावी हो गया| पर 15 मिनट तक जब किसी ने कोई उत-पटांग हरकत नहीं की तो हम तीनों ने चैन की साँस ली! हमें लगा की किसी ने बेवकूफ बना कर कुणाल को मीठी गोलियाँ भाँग की गोलियाँ बोल कर पकड़ा दीं| ये कहते हुए अमन ने हँसना शुरू किया और उसकी देखा-देखि मैं और मनीष भी हँसने लगा| कुणाल को ताव आया की हम तीनों उसे बेवकूफ कह रहे हैं तो उसने हमें चुनौती दी; 'हिम्मत है तो एक-एक और खा के दिखाओ|' हम तीनों ने भी जोश-जोश में एक-एक गोली और खा ली| और फिर से उस पर हँसने लगे| हम तीनों ये नहीं जानते थे की भाँग का असर हम पर शुरू हो चूका था, तभी तो हम हँसे जा रहे थे| उधर कुणाल बिचारा छोटे बच्चे की तरह रोने लगा था और उसे देख कर हम तीनों पेट पकड़ कर हँस रहे थे| 15 मिनट तक हँसते-हँसते पेट दर्द होने लगा था और बड़ी मुश्किल से हँसी रोकी और तब मनीष ने सब को डरा दिया ये कह कर की हमें भाँग चढ़ गई है| अब ये सुन कर हम चारों एक दूसरे की शक्ल देख रहे थे की अब हम क्या करेंगे? अमन तो इतना डर गया था की कहने लगा मुझे हॉस्पिटल ले चलो, मैं मरने वाला हूँ| तो कुणाल बोला की कुछ नहीं होगा थोड़ी देर सो ले ठीक हो जायेगा, पर मनीष को बेचैनी सोने नहीं दे रही थी| इधर मनीष को गर्मी लगने लगी और वो सारे कपडे उतार कर नंगा हो गया और उसने पंखा चला दिया| मुझे भी डर लगने लगा की कहीं मैं मर गया तो? इसलिए मैंने सोचा की ये हॉस्पिटल जाएँ चाहे नहीं मैं तो जा रहा हूँ| अभी मैं दरवाजे के पास पहुँचा ही था की कुणाल ने हँसते हुए रोक लिया और बोला; 'कहाँ जा रहा है? बड़ी हँसी आ रही थी ना तुझे? और खायेगा?' मैं उस हाथ जोड़ कर मिन्नत करने लगा की
भाई माफ़ कर दे, आज के बाद कभी नहीं खाऊँगा ये भाँग का गोला! मैं जैसे-तैसे बाहर आया और घडी देखि ये सोच कर की कहीं हॉस्पिटल बंद तो नहीं हो गया? उस वक़्त बजे थे रात के 2, यानी हम चारों शाम के 4 बजे से रात के दो बजे तक ये ड्रामा कर रहे थे| अब हमारा कमरा था चौथी मंजिल पर, इसलिए मैं हमारे कमरे के दरवाजे के सामने लिफ्ट और सीढ़ियों के बीच खड़ा हो कर सोचने लगा की नीचे जाऊँ तो जाऊँ कैसे? अगर लिफ्ट से गया और दरवाजा नहीं खुला तो मैं तो अंदर मर जाऊँगा? और सीढ़ियों से गया तो पता नहीं कितने दिन लगे नीचे उतरने में? मैं खड़ा-खड़ा यही सोच रहा था की हमारे हॉस्टल के वार्डन का लड़का आ गया और मुझे ऐसे सोचते हुए देख कर मुझे झिंझोड़ते हुए पुछा की मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ? मैंने उसे बताया की मैं हिसाब लगा रहा हूँ की सिढीयोंसे जाना सही है या लिफ्ट से? ये सुन कर वो बुरी तरह हँसने लगा| क्योंकि वहाँ लिफ्ट थी ही नहीं और जिसे मैं लिफ्ट समझ रहा था वो एक पुरानी शाफ़्ट थी जिसमें बाथरूम की पाइपें लगी थी| पर मैं अब भी नहीं समझ पाया था की हुआ क्या है और ये क्यों हँस रहा है? वो मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे कमरे में ले आया और अंदर का सीन देख कर हैरान हो गया| मनीष पूरा नंगा था और उसने अपने गले में तौलिया बाँध रखा था जैसे की वो सुपरमैन हो और एक पलंग से दूसरे पर कूद रहा था| अमन बिचारा एक कोने में बैठा अपना सर दिवार में मार रहा था और बुदबुदाए जा रहा था; 'अब नहीं खाऊँगा....अब नहीं खाऊँगा....अब नहीं खाऊँगा...
' कुणाल फर्श पर उल्टा पड़ा था और चूँकि उसे मछलियां बहुत पसंद थी तो वो खुद को मछली समझ कर फड़फड़ा रहा था और मैं रात के 2 बजे से सुबह के 6 बजे तक बाहर खड़ा हो कर हिसाब लगा रहा था की सीढ़यों से जाऊँ या फिर लिफ्ट से!
उसी लड़के ने एक-एक कर हमें आम चटाया और हमारा नशा उतारा| इसलिए उस दिन से कान पकडे की कभी भाँग नहीं खाऊँगा|"
मेरी पूरी राम-कहानी सुन कर सारे घर वाले खूब हँसे और शुक्र है की किसी ने मुझे भाँग खाने के लिए डाँटा नहीं! बात करते-करते सुबह के चार बज गए थे इसलिए ताऊ जी ने कहा की सब कुछ देर आराम कर लें पर मुझे तो सुबह ही निकलना था| पर ताऊ जी ने कहा की आराम कर लो और 7 बजे उठ जाना, इसलिए सारे लोग सो गए और सुबह सात बजे जब मैं उठा तो ताई जी, भाभी और माँ रसोई में नाश्ता बना रहे थे| फ्रेश हो कर नाश्ता किया और ताई जी ने रास्ते के लिए भी बाँध दिया की भूख लगे तो खा लेना| शहर हम 11 बजे पहुँचे और पहले ऋतू को कॉलेज छोड़ मैं ऑफिस पहुँचा| सर ने थोड़ा डाँटा पर मैंने जाने दिया क्योंकि आधा दिन लेट था मैं! दिन गुजरते गए और ऋतू के Exams आ गए और उसने फिर से क्लास में टॉप किया! ये ख़ुशी सेलिब्रेट करना तो बनता था, तो संडे को मैं उसे लंच पर ले जाना चाहता था पर उसके कॉलेज के दोस्त भी साथ हो लिए और सब ने कॉन्ट्री कर के लंच किया|
कुछ महीने और बीते और ऋतू का जन्मदिन आया, मैंने उसे पहले ही बता दिया था की एक दिन पहले ही मैं उसे लेने आऊंगा पर ऋतू कहने लगी की उसके असाइनमेंट्स पेंडिंग हैं और अपने दोस्तों के साथ उसने कुछ क्लास बंक की थीं तो वो भी कवर करना है उसे! तो मेरा प्लान फुस्स हो गया! पर वो बोली की शाम को उसके सारे दोस्त उसके पीछे पड़े हैं की उन्हें ट्रीट चाहिए तो हम शाम को मिलते हैं| अब कहाँ तो मैं सोच रहा था की उसका बर्थडे हम अकेले सेलिब्रेट कर्नेगे और कहाँ उसके दोस्त बीच में आ गए| पर मैं ये सोच कर चुप रहा की कॉलेज के दोस्त कभी-कभी करीब होते हैं और मुझे ऋतू को थोड़ी आजादी देनी चाहिए वरना उसे लगेगा की मैं Possessive हो रहा हूँ! अब मैं भी इस दौर से गुजरा था इसलिए दिमाग का इस्तेमाल किया और ऋतू के बर्थडे को खराब नहीं किया, बल्कि उसी जोश और उमंग से मनाया जैसे मनाना चाहिए| ऋतू के चेहरे की ख़ुशी सब कुछ बयान कर रही थी और मेरे लिए वही काफी था| दिन बीतने लगे और ऋतू के कॉलेज के दोस्तों ने कोई ट्रिप प्लान कर लिया, मुझे लगा की शायद मुझे भी जाना है पर मुझे तो इन्विते ही नहीं किया गया क्योंकि वैसे भी मैं कॉलेज वाला नहीं था| ऋतू ने मुझसे मिन्नत करते हुए जाने की इज्जाजत मांगी तो मैंने उसे मना नहीं किया| इस ट्रिप पर बनने वाली यादें उसे उम्र भर याद रहेंगी| जितने दिन वो नहीं थी उतने दिन मैं रोज उसे सुबह-शाम फ़ोन करता और उसका हाल-चाल लेता रहता| जब वो वापस आई तो बहुत खुश थी और मुझे उसने ट्रिप की सारी pictures दिखाईं और
वो संडे मेरा बस ऋतू की ट्रिप की बातें सुनते हुए निकला| दिन बीत रहे थे और काम की वजह से कई बार मुझे सैटरडे को बरेली जाना पड़ता और इसलिए हम सैटरडे को मिल नहीं पाते पर संडे मेरा सिर्फ और सिर्फ ऋतू के लिए था| उस दिन वो आती तो मेरे लिए खाना बनाती और कॉलेज की सारी बातें बताती और कई बार तो हम संडे को पढ़ाई भी करते!
update 59
दिन बीते...महीने बीते...और सब कुछ सही चल रहा था...... कम से कम मुझे तो यही लग रहा था! मेरे अकाउंट में लाख रुपये कॅश और बाकी के 4 लाख की मैंने FD करा दी थी जो अगले साल मार्च में mature होने वाली थी| इधर मैंने बैंगलोर में लोकैलिटी फाइनल कर ली थी, ऋतू के डाक्यूमेंट्स जैसे PAN Card, Aadhaar Card और Election Card सब मेरे ही एड्रेस से तैयार हो गए थे| ऋतू का बैंक अकाउंट भी खोला जा चूका था जिसके बारे में मेरे और ऋतू के आलावा किसी को कोई भनक नहीं थी| हमारे गायब होते ही सब मेरा अकाउंट चेक करते पर किसी को तो पता नहीं की ऋतू का भी कोई बैंक अकाउंट है! मुझे बस भागने से कुछ दिन पहले अपने अकाउंट से सारे पैसे निकाल कर ऋतू के बैंक में कॅश जमा करने थे| बस एक ही काम बचा था वो था ट्रैन की टिकट, जिसे मैंने पहले बुक नहीं कर सकता था| कारन ये की जिस दिन हम भागते उस दिन के चार्ट में हमारा नाम होता और सब को पता चल जाता की ये दोनों कहाँ भागे हैं| इसलिए जिस दिन भागना था उससे एक दिन पहले मुझे तत्काल टिकट लेनी थी, वो भी कुछ इस तरह की लखनऊ से वाराणसी पहुँचने के बाद आधे घंटे के अंदर ही दूसरी ट्रैन चाहिए थी जो हमें मुंबई उतारती और वहाँ से फिर आधे घंटे में दूसरी टिकट जो बैंगलोर छोड़ती! मैंने एक बैक-आप प्लान भी बना रखा था की अगर ट्रैन लेट हो गई तो हमें बस लेनी होगी| लखनऊ में कहाँ से ट्रैन पकड़नी थी वी जगह भी तय थी, स्टेशन से ट्रैन पकड़ना खतरनाक था क्योंकि सब सबसे पहले हमें ढूंढते हुए वहीँ आते| इसलिए मैंने रेलवे फाटक देख रखा था, इस फाटक पर हमेशा जाम रहता था और हरबार ट्रैन यहाँ स्लो होती और फिर करीब मिनट भर बाद ही आगे जाती थी| किसी भी हालत में कोई भी हमें ढूंढता हुआ यहाँ नहीं आ सकता था! मतलब प्लान बिलकुल सेट था और मैंने उसमें कोई भी लूपहोल नहीं छोड़ा था!!!!
खेर ये तो रही प्लान की बात, पर अब तो मेरा जन्मदिन आ ने वाला था और क्योंकि इस बार जन्मदिन वीकडे पर पड़ना था तो मैंने पहले ही छुट्टी ले ली थी| प्लान तो था की ऋतू को में एक दिन पहले ही उसके हॉस्टल से ले आऊंगा पर जब उसने बताया की उसके असाइनमेंट्स पेंडिंग हैं और कुछ lectures भी हैं तो मैंने उससे कहा की अगले दिन वो हाल्फ डे में इधर भाग आये|
दो तारिक आई, मेरा जन्मदिन अगले दिन था और घडी में रात के साढ़े बारह बजने को आये थे पर अभी तक ऋतू ने मुझे कॉल करके wish नहीं किया था| हर साल वो ठीक बारह बज कर एक मिनट पर मुझे काल किया करती थी पर इस बार इतनी लेट कैसे हो गई?! फिर मैंने
सोचा की शायद कॉलेज से थक कर आयी होगी और सो गई होगी, कोई बात नहीं कल wish कर देगी ये सोचते हुए मैंने फ़ोन को तकिये के नीचे रख दिया और तभी मेरे फ़ोन पर बर्थडे के wish वाला मैसेज आया जिसे देख कर मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई और मैंने जवाब में उसे ढेर सारी चुम्मियों वाली स्माइली के साथ थैंक यू का मैसेज भेजा पर उसके बाद वो ऑफलाइन हो गई, मैंने बात को दरगुज़र किया और मुस्कुराते हुए सो गया| सुबह से ऑफिस के सभी दोस्तों के मैसेज आने लगे थे, घर से भी फ़ोन पर बधाइयाँ आने लगी थी| ऋतू के आने तक मैं बस यही सोच रहा था की घर से भागने से पहले ये मेरा आखरी जन्मदिन होगा और फिर अगले जन्मदिन पर मैं और ऋतू एक साथ बैंगलोर में अपनी नई जिंदगी शुरू कर रहे होंगे|
अरुण और सिद्धार्थ ने इस बार जर्रूर कहा था की पार्टी करते हैं पर मैंने उन्हें ये कह कर टाल दिया की अगर ऋतू को पार्टी दिए बिना तुम्हारे साथ पार्टी की तो वो नराज हो जाएगी| दोनों ने मिल कर मेरा बड़ा मजाक उड़ाया की देखो शादी से पहले ये हाल है तो शादी के बाद क्या होगा?!
खेर मैं फ्रेश हो कर नाश्ता बना रहा था की तभी ऋतू का मैसेज आया की वो बारह बजे आएगी और मैं इस ख़ुशी में अपने फोन पर गाने लगा कर कुछ ख़ास बनाने की तैयारी करने लगा और नाचता हुआ इधर से उधर घर में घूम रहा था| साढ़े बारह बजे दरवाजे पर दस्तक हुई, तो मैंने मुस्कुराते हुए दरवाजा खोला और ऋतू को प्यार से घर के अंदर आने का निमंत्रण दिया| ऋतू भी अंदर आ गई और उसने मेरे फ़ोन में बज रहे गानों को एकदम से बंद कर दिया, मैंने आगे बढ़ कर उसे गले लगाना चाहा तो उसने अपने हाथ को मेरी छाती पर रख के रोक दिया| मुझे उसका ये व्यवहार बड़ा अजीब लगा पर जब उसके चेहरे पर नजर गई तो वो बहुत सीरियस थी|
"आपसे कुछ बात करनी है|" इतना कह कर उसने मेरे दोनों हाथ पकड़ कर मुझे पलंग पर बिठाते हुए कहा| वो ठीक मेरे सामने खड़ी हो गई और मेरी आँखों में देखते हुए बोली;
ऋतू: मैंने बहुत सोचा… ह....हमारा ये....घर से भागने .....का प्लान सही नहीं!
ऋतू ने बहुत डरते-डरते कहा, पहले तो मुझे बहुत गुस्सा आया पर फिर मुझे एहसास हुआ की जब हम कोई खतरनाक कदम उठाते हैं तो दिल में एक डर होता है और मुझे ऋतू के इसी डर का निवारण करना होगा|
मैं: अच्छा पहले ये बता की तुझे क्यों लगता है की ये फैसला गलत है? (मैंने बहुत प्यार से पुछा|)
ऋतू: कोई स्टेबल लाइफ नहीं होगी हमारी.... दरबदर की ठोकरें खाना... और फिर हर पल डर के साये में जीना....
मैं: जान! थोड़ा स्ट्रगल है पर वो हम मिल कर एक साथ करेंगे! लाइफ में हर इंसान को थोड़ा-बहुत स्ट्रगल तो करना ही पड़ता है ना? फिर तु अकेली नहीं हो, मैं हूँ ना तुम्हारे साथ|
ऋतू: पर मुझसे ये स्ट्रगल नहीं होगा! एक महीने की जॉब में मेरा मन ऊब गया और मैं ही जानती हूँ की ये पार्ट टाइम जॉब मैंने कैसे किया, तो फुल टाइम जॉब कैसे करुँगी?
मैं: तुझे कोई जॉब करने की जर्रूरत नहीं है| मैंने तुम्हें जब शादी के लिए उस दिन प्रोपोज़ किया था, तब तुमसे वादा किया था की मैं तुझे पलकों पर बिठा कर रखूँगा, कभी कोई तकलीफ नहीं होने दूँगा! ये देख 4 लाख की FD और आज की डेट में मेरे पास 1 लाख रुपया कॅश में है, हमारे भागने तक अकाउंट में कम से कम 7 लाख होंगे! इतने पैसों से हम नै जिंदगी शुरू कर सकते हैं!
मैंने ऋतू को FD की रिसीप्ट और बैंक की पास बुक दिखाई पर उसे तसल्ली अब भी नहीं हुई थी|
मैं: अच्छा ये देख, बैंगलोर में हमें किस लोकैलिटी में रखना है, वहाँ तक कैसे पहुँचना है और job ऑफर्स सब लिखे हैं इसमें|
ये कहते हुए मैंने ऋतू को अपनी डेरी दिखाई जिसमें मैंने सब कुछ फाइनल कर के रेडी कर रखा था| पर मुझे ये जानकर हैरानी हुई की ऋतू का डायरी देखने में जरा भी इंटरेस्ट नहीं था| मतलब की बात कुछ और थी और अभी तक वो बस बहाने बना रही थी|
मैं: देख ऋतू, तो कुछ छुपा रही है मुझसे| यूँ बहाने मत बना और सच-सच बता की बात क्या है? (मैंने ऋतू के चेहरे को अपने दोनों हाथों में थामते हुए कहा|)
ऋतू की नजरें झुक गेन और उसने सच बोलने में पूरी शक्ति लगा दी;
ऋतू: मैं किसी और को चाहने लगी हूँ?
अब ये सुनते ही मेरा खून खोल गया और मैंने ऋतू के चेहरे पर से अपने हाथ हटाए और एक जोरदार तमाचा उसके बाएँ गाल पर मारा|
मैं: कौन है वो हरामी?
मैंने गरजते हुए कहा, पर ऋतू डर के मारे सर झुकाये रोने लगी और कुछ नहीं बोली| मैंने ऋतू के दोनों कन्धों को पकड़ कर उसे झिंझोड़ा और उससे दुबारा पुछा;
मैं: बोल कौन है वो?
ऋतू सहम गई और डरते हुए बोली;
ऋतू: र....
राहुल
ये नाम सुन कर मैंने उसके कन्धों को अपनी पकड़ से आजाद कर दिया और सर झुका कर बैठ गया| मेरा मन मान ही नहीं रहा था की ये सब हो रहा है! तभी ऋतू ने हिम्मत बटोरी और बोली;
ऋतू: वो भी मुझसे बहुत प्यार करता है और शादी करना चाहता है!
ये सुन कर मैंने ऋतू की आँखों में देखा तो मुझे उसकी आँखों में वही आत्मविश्वास नजर आया जो उस दिन दिखा था जब ऋतू ने मुझसे अपने प्यार का इजहार किया था| मेरी आँखों में आँसू आ गए थे क्योंकि मेरे सारे सपने चकना चूर हो चुके थे और रह-रह कर मेरे दिल में गुस्सा भरने लगा था, ऐसा गुस्सा जो कभी भी फुट सकता था| पर ऋतू इस बात से अनजान और मेरी आँखों में आँसू देख उसमें हिम्मत आने लगी थी, आज तो जैसे उसने इस रिश्ते को हमेशा से खत्म कर देने की कसम खा ली थी इसलिए वो आगे बोली; "कॉलेज ट्रिप पर हम बहुत नजदीक आ गए! उसने मुझसे ना केवल अपने प्यार का इजहार किया बल्कि मुझे शादी के लिए भी प्रोपोज़ किया! मैं उसे मना नहीं कर पाई क्योंकि वो मुझे एक स्टेबल लाइफ दे सकता है! फिर आप ये भी तो देखो की आपकी और मेरी age में कितना फासला है?!
ऋतू को एहसास नहीं हुआ की जोश-जोश में वो असली सच बोल गई जिसे सुनते ही मेरा गुस्सा फुट पड़ा और मैंने एक जोरदार झापड़ उसके गाल पर मारा और उसे जमीन पर धकेल दिया| मैं बहुत जोर से उस पर चिल्लाया; "ये था ना तेरा प्यार? तुझे सिर्फ ऐशों-आराम की जिंदगी जीनी थी ना? मन भर गया न तेरा मुझसे? तो साफ़-साफ़ बोल देती ये उम्र का फासला कहाँ से आगया? ये तब याद नहीं आया था जब मुझसे पहली बार अपने प्यार का इज़हार किया था तूने? Fuck बहनचोद! मैं ही चूतिया था जो तेरे चक्कर में पड़ गया|” ऋतू का बायाँ हाथ उसके गाल पर था और वो सर झुकाये वहीँ खड़ी थी, पर उसे देख कर मेरा गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था| मैंने एक आखरी बार कोशिश की और अपने दोनों हाथों से उसके चेहरे को थामा, उसकी आँखों में झांकते हुए कहा: "प्लीज बोल दे तू मजाक कर रही थी? प्लीज .... प्लीज .... मैं तेरे आगे हाथ जोड़ता हूँ|" पर उसकी आँखों में आँसूँ बाह निकले थे और उसकी आंखें सब सच बता रहीं थी की अब तक जिस दिल पर मेरा नाम लिखा था उसे तो वो कब का अपने जिस्म से निकाल कर कचरे में डाल चुकी है| "तू...तू जानती है वो लड़का किसका बेटा है? और उसके बाप ने तेरे....." मेरे आगे कहने से पहले ही ऋतू ने हाँ में सर हिलाया और अपने आँसूँ पोछते हुए बोली; "जानती हूँ...
उसके पापा ने पंचायत में मेरी माँ को मौत की सजा सुनाई थी|"
"और ये जानते हुए भी तू उससे प्यार करती है?"
"गलती मेरी माँ की थी, उसने शादीशुदा होते हुए भी किसी और से प्यार किया|" ऋतू ने सर झुकाये हुए कहा, जैसे की उसे अपनी माँ के किये पर शर्म आ रही थी|
"गलती? और जो तूने की वो क्या थी?" मेरा मतलब हम दोनों के प्यार से था|
"उसी गलती को तो सुधारना चाहती हूँ|" उसका जवाब सुनते ही मेरे तन बदन में आग लग गई और मैंने उसके गाल पर एक और तमाचा जड़ दिया| "तो ये प्यार तेरे लिए गलती था? उस टाइम तो तू मरने के लिए तैयार थी और अब तुझे वही प्यार गलती लग रहा है?" ऋतू फिर चुप हो गई थी| अब मेरे अंदर कुछ भी नहीं बचा था, मैं हार मानते हुए अपने घुटनों के बल आ गिरा और अपने दोनों हाथों से अपने सर को पकड़ा| मेरी आँखों से खून के आँसूँ बह निकले थे; "क्यों? .... क्यों किया तूने ऐसा मेरे साथ? क्यों मुझ जैसे पत्थर दिल को प्यार करने पर मजबूर किया और जब तेरा दिल भर गया तो मुझे छोड़ दिया| मैंने मना किया था...कहा था ....पर..." मैंने फूटफूटकर रोते हुए कहा| ऋतू खड़ी होकर मेरे पास आई मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बोली; "हम अच्छे दोस्त तो रह सकते हैं?" ये सुनते ही मैंने उसका हाथ झिड़क दिया; "Fuck you and fuck your dosti! Now get the fuck out of my house! And I curse you…. I curse you that you’ll be never be happy… you’ll suffer… so bad that every day… every fucking day will be like hell for you! You’ll beg for this misery to end but it’ll get worse ….worse till everything you love is lost forever!” इतना सुन के ऋतू रोती-बिलखती हुई दरवाजा जोर से बंद कर के चली गई| उसके जाने के बाद तो जैसे मेरे जिस्म में अब जान ही नहीं बची थी और मैं निढाल होकर उसी जमीन पर गिर पड़ा और रोता रहा| रह-रह कर ऋतू की सारी बातें याद आने लगी जिससे दिमाग में और गुस्सा आता और गुस्से में आ कर मैं जमीन में मुक्के मारने लगता पर मेरे दिल का दर्द बढ़ता ही जा रहा था| शाम 5 बजे तक मैं जमीन पर पड़ा हुआ यूँ ही रोता रहा, पर जब फिर भी दिल का दर्द कम नहीं हुआ तो मैं उठा और अपने दिल के दर्द को कम करने के लिए दारु लेने निकल पड़ा|
जेब में जितने पैसे थे सबकी दारु खरीद ली और घर लौट आया| जैसे ही दारु की बोतल खोलने लगा तो वो दिन याद आया जब ऋतू से वादा किया था की मैं कभी शराब को हाथ नहीं लगाऊँगा| जैसे ही ऋतू की याद आई अंदर गुस्सा भरने लगा और जोश में आ कर मैंने बोतल सीधा मुँह से लगाईं और एक बड़ा घूँट भरा, जैसे ही घूँट गले से निकला तो गाला जलने लगा| पर ये जलन उस दर्द से तो कम थी जो दिल में हो रहा था| अगला घूँट भरा तो वो दिन याद आने लगा जब ऋतू से मैंने अपने दिल की बात की कही, वो हमारा रोज फ़ोन पर बात करना ... उसका बार-बार मेरी बाहों में सिमट जाना.... उसका बार-बार मुझे Kiss करना और बेकाबू हो जाना....
वो हर एक पल जो मैंने उसके साथ बिताया था उसे याद कर के मैं पूरी की पूरी बोतल गटक गया और फिर बेसुध वहीँ जमीन पर लेट गया| मुझे कोई होश-खबर नहीं थी की मैं कहाँ पड़ा हूँ, सुबह कब हुई पता ही नहीं चला| सुबह के ग्यारह बजे मेरे फ़ोन की घंटी ताबड़तोड़ बजने लगी और मैं कुनमुनाता हुआ उठा और बिना देखे ही फ़ोन अपने कान पर लगा लिया;
मैं: हम्म्म...
बॉस: कहाँ पर है?
मैं: ममम...
बॉस: ग्यारह बज रहे हैं! तू अभी तक घर पर पड़ा है? शर्मा जी की फाइल कौन देगा? जल्दी ऑफिस आ!
ये सुनकर मुझे थोड़ा होश आया पर सर दर्द से फटा जा रहा था और बॉस की जोरदार आवाज कानों में दर्द करने लगी थी, इसलिए मैंने उनका फ़ोन ऐसे ही जमीन पर रख दिया और अपनी ताक़त बटोर के उठने को हुआ तो लड़खड़ा गया| फिर मैंने दुबारा उठने की कोशिश नहीं की और फिर से सो गया| करीब 1 बजे फिर से बॉस का फ़ोन आया पर मैं ने फ़ोन नहीं उठाया और फ़ोन ही बंद कर दिया| उस समय मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा था बस मुझे नशे में सोना था और ये भी होश नहीं था की मैं फर्श पर ही नींद में मूत रहा हूँ| 5 बजे आँख खुली और मैं उठा, कमर से नीचे के सारे कपडे मेरे ही मूत से गीले थे| मैं उठा और जैसे-तैसे खड़ा हुआ और बाथरूम में गया और अपने सारे कपडे उतार दिए और बाल्टी में फेंक दिए और नंगा ही कमरे में आया| अलमारी की तरफ गया और उसमें से एक कच्छा निकाला और एक बनियान निकाली और उसे पहन के किचन से वाइपर उठा के फर्श पर पड़े अपने पिशाब को बाथरूम की तरफ खींच दिया और वाइपर वहीँ पटक दिया| कमरे की खिड़कियाँ खोली और तभी याद आया की ऋतू वहीँ खड़ी हो कर बहार झाँका करती थी| फिर से मन में गुस्सा भरने लगा और शराब की दूसरी बोतल निकाली पर इससे पहले की उसे खोलता बाजु वाले अंकल ने घंटी बजाई| मैंने दरवाजा खोला तो उन्होंने मुझसे अपने घर की चाभी माँगी और मेरी हालत देख कर समझ गए की मैंने बहुत पी रखी है| उनहोने कुछ नहीं कहा बस 'एन्जॉय' कहते हुए निकल गए| मैंने दरवाजा ऐसे ही भेड़ दिया पर दरवाजा लॉक नहीं हुआ| मैं आकर उसी खिड़की के सामने जमीन पर बैठ गया, पीठ दिवार से लगा कर दारु की बोतल खोली और सीधा ही उसे अपने होठों से लगाया और एक बड़ा से घूँट पी गया| आज मुझे उतनी जलन नहीं हुई जितनी कल हुई थी| पास ही फ़ोन पड़ा था उसे उठाया, फिर याद आया की सुबह बॉस ने कॉल किया था और फिर फ़ोन वापस स्विच ऑफ ही छोड़ दिया| अगला घूँट पीते ही दरवाजा खुला और मेरे ऑफिस का कॉलीग अरुण अंदर आया और मुझे जमीन पर बैठे दारु पीते देख बोला; "अबे साले! बॉस की वहाँ जली हुई है तेरी वजह से और तू यहाँ दारु पी रहा है?" मैंने उसकी तरफ देखा पर बोला कुछ नहीं बस दारु का एक और घूँट पिया| "अबे दिमाग ख़राब हो गया है क्या तेरा?" उसने मुझे झिंझोड़ते हुए कहा पर मैं अब भी कुछ नहीं बोल रहा था बस एक-एक घूँट कर के दारु पिए जा रहा था| अरुण मुझे बहुत अच्छे से जानता था की मैं
कभी इतनी नहीं पीता, हमेशा लिमिट पि है मैंने और आज इस तरह मुझे बिना रुके पीता हुआ देख वो भी परेशान होगया| मेरे हाथ से बोतल छीन ली और बोला; "अबे रुक जा! बहनचोद पिए जा रहा है, बता तो सही क्या हुआ?" मैंने अब भी उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया बस उससे बोतल लेने लगा तो उसने बोतल नहीं दी और दूर खिड़की के पास खड़ा हो कर पूछने लगा| जब मैं कुछ नहीं बोला तो वो समझ गया की ये दिल का मामला है| इधर मैं भी ढीठ था तो मैं उठ के उससे जबरदस्ती बोतल छीन के ले आया और वापस नीचे बैठ के पीने लगा| "यार पागल मत बन! उस लड़की के चक़्कर में ऐसा मत कर! बीमार पढ़ जायेगा|"उसने फिर से मेरे हाथ से बोतल खींचनी चाही तो मैं बुदबुदाते हुए बोला: "मरूँगा तो नहीं ना?"
"पागल हो गया है तू?" उसने गुस्से से मुझे डाँटते हुए कहा| "ये सब छोड़... ये बता ... माल है तेरे पास?" मैंने अरुण से पूछा तो वो गुस्सा करने लगा| "यार है तो दे दे वरना मैं बहार से ले आता हूँ|" ये कह कर मैं उठा तो अरुण ने मुझे संभाला| वो जानता था ऐसी हालत में मैं बाहर गया तो पक्का कुछ न कुछ काण्ड हो जायेगा| "ये ले" इतना कह कर उसने मुझे एक गांजे की पुड़िया दी और मैंने उसी से सिगरेट माँगी और लग गया उसे भरने| पहला कश लेते ही मैं आँखें बंद कर के सर दिवार से लगा कर बैठ गया| "बॉस को कह दियो की मैं तुझे घर पर नहीं मिला|" मैंने आँखें बंद किये हुए ही कहा|
"अबे तेरी सटक गई है क्या? साले एक लड़की के चक्कर में आ कर कुत्ते जैसे हालत कर ली तूने अपनी! बहनचोद पूरे घर से बदबू आ रही है और तू चढ्ढी में बैठा शराब पिए जा रहा है? अबे होश में आ साले चूतिये?!" वो सब गुस्से में कहता रहा पर मेरे कान तो ये सब सुनना ही नहीं चाहते थे, वो तो बस उसी की आवाज सुन्ना चाहते थे जिसने मेरा दिल तोडा था| अगर अभी वो आ कर एक बार मुझे I love you कह दे तो मैं उसे फिरसे सीने से लगा लूँगा और उसके सारे गुनाह माफ़ कर दूँगा, पर नहीं.... उसे तो अब कोई और प्यारा था! जब अरुण का भाषण खत्म हुआ तो उसने मेरे हाथ से सिगरेट ले ली और कश लेने लगा; "तू साले....
छोड़ बहनचोद! अच्छा ये बता कुछ खाया तूने?" मैंने अभी भी उसकी बात का जवाब नहीं दिया और वो दिन याद किया जब वो मेरे कॉल न करने से नाराज हो जाया करती थी और मैं उसे कॉल कर के पूछता था की कुछ खाया?" ये याद करते हुए मेरी आँख से आँसूँ बह निकले, उन्हें देखते ही अरुण को मेरे दिल के दर्द का एहसास हुआ और उसने मेरे कंधे पर थपथपाया और मुझे ढांढस बँधाने लगा|मैंने अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया और बोला; "थैंक्स भाई!!!" फिर अपने आँसूँ पोछे; "अब तू घर जा, भाभी चिंता कर रही होंगी| कल मैं ऑफिस आ जाऊँगा|" उसे मेरी बात पर भरोसा हो गया पर जाते-जाते भी वो मेरे लिए खाना आर्डर कर गया|
अगली सुबह उठा और सबसे पहले माल फूँका! फिर मुँह धोया और अपनी लाश को ढोता हुआ ऑफिस आया| मुझे देखते ही बॉस ने इतना सुनाया की पूछो मत पर मैंने उसकी किसी बात का जवाब नहीं दिया| जवाब देता भी कैसे गांजे के नशे से मेरा होश गायब था और मैं बस सर झुकाये सब सुनने का दिखावा कर रहा था| जब उसका गुस्सा हो गया तो वो अपने केबिन में चला गया और मैं अपने टेबल पर आ कर बैठ गया| अरुण मेरे पास आया और मेरे कंधे पर हाथ रखा, जब मैंने सर उठाया तो मेरी आँखों की लाली देख कर वो समझ गया की मैंने गांजा पी रखा है और वो हँस दिया, उसे हँसता देख मेरी भी हँसी निकल गई| खेर इसी तरह दिन निकलने लगे, रोज बॉस की गालियाँ सुनना और फिर घर आकर दारु पीना और सो जाना| हर शुक्रवार घर से फ़ोन आता की मैं ऋतू को ले कर घर आ जाऊँ पर मैं कोई न कोई बहाना बना के बात टाल देता|
पूरा एक महीना निकल गया और अब हालातों ने मुझे एक मुश्किल दोराहे पर ला कर खड़ा कर दिया| फ़ोन बजा जब देखा तो पिताजी का नंबर था और उन्होंने मुझे और ऋतू को कल घर बुलाया था| ऋतू की शादी के लिए मंत्री साहब के लड़के का रिश्ता आया था| ये सुन कर खून तो बहुत उबला पर मैं कुछ कह नहीं सका| "आप ऋतू.............
रितिका के हॉस्टल फोन कर दो वो मुझे कॉल कर लेगी|" इतना कह कर मैंने कॉल काट दिया| मैं ऑफिस की छत पर चला गया और सिगरेट जला कर फूँकता रहा और ये सोचता रहा की कल कैसे उस बेवफा की शक्ल बर्दाश्त करूँगा! रात को रितिका का कॉल आया और उसका नंबर स्क्रीन पर फ़्लैश होते ही गुस्सा बाहर आ गया| पर मुझे अपना गुस्सा थोड़ा काबू करना था; "कल सुबह दस बजे बस स्टैंड|" इतना कह कर मैंने फ़ोन काट दिया| उस रात 2 बजे तक मैं पीता रहा और मन ही मन उसे कोसता रहा और सुबह मेरी आँख ही नहीं खुली| सुबह 10:30 बजे रितिका के धड़ाधड़ कॉल आये तब नींद खुली पर आँखें अब भी नहीं खुल रही थी|मैंने बिना देखे ही फ़ोन अपने कान पर लगा दिया; "आप कहाँ हो?" ये जानी पहचानी आवाज सुन कर आँख खुली और याद आया की मुझे तो दस बजे बस स्टैंड पहुँचना था| "आ रहा हूँ!" इतना कह कर मैंने फोन काटा और बिना मुँह धोये ही निकल गया| बाल बिखरे हुए, दाढ़ी बढ़ी हुई और जिस्म से ही दारु की तेज महक आ रही थी| जब मैं बस स्टैंड पहुँचा तो मुझे ऋतू इंतजार करती हुई दिखी, आज पूरे एक महीने बाद देख रहा था और मन में जिस प्यार को मैं दफना चूका था वो अब उभर आया था| मैंने जेब से फ्लास्क निकला और दारु का एक घूँट पिया और फिर रितिका की तरफ चलने लगा| रितिका की नजर जब मुझ पर पड़ी तो वो आँखें फाड़े बस मुझे ही देखे जा रही थी| आज तक उसने मुझे जब भी देखा था तो clean shaven और well dressed देखा था और आज मुझे इस कदर देख उसका अचरज करना लाजमी था| उसके पास आ कर मैं रुका और जेब में हाथ डाल कर सिगरेट निकाली और जला कर उसका धुआँ उसके मुँह पर फूँका! वो थोड़ा खांसते हुए बोली; "आपने तो कसम खाई थी की आप कभी दारु और सिगरेट को हाथ नहीं लगाओगे?"
"तुमने भी तो कसम खाई थी की मेरा साथ कभी नहीं छोड़ोगी?! But here we are!" ये कह कर मैंने उसे ताना मारा और फिर नजरें इधर-उधर घुमाने लगा| मैं टिकट काउंटर पर पहुँचा तो पता चला की आखरी बस जा चुकी है जो शायद रितिका भी जानती थी| बस एक लेडीज स्पेशल बस थी जो अभी आने वाली थी, मैंने मन ही मन सोचा की इसे अकेले ही भेज देता हूँ| इसलिए मैं टहलता हुआ वापस उसके पास आया; "लेडीज स्पेशल बस आने वाली है, उसमें चली जा! मैं घर फोन कर देता हूँ कोई आ कर ले जाएगा|"
"अकेले...पर ...मैं तो....
" वो नजरें झुकाये डरते हुए बोलने लगी|
"तो बुला ले अपने 'राहुल' को! वो छोड़ देगा तुझे गाँव|" मेरा फिर से ताना सुन कर वो चुप हो गई और तभी मुझे लालू नजर आया| ये लालू उन्ही कल्लू भैया का छोटा भाई था और वो मुझे अच्छे से जानता था| उसने मुझे देखते ही हाथ दिखा कर रुकने को कहा और मेरे पास ही बाइक दौड़ाता हुआ आ गया|
लालू: अरे साब! आप यहाँ कैसे?
मैं: बस गाँव जा रहा था, पर बस निकल गई|
लालू: अरे तो क्या हुआ साब, ये रही बस मैं भी उसी रास्ते जा रहा हूँ|
लालू एक प्राइवेट बस का कंडक्टर था और अपने भाई की ही तरह मेरी बहुत इज्जत करता था| रितिका ने हम दोनों की सारी बातें सुन ली थी और वो थोड़ा हैरान भी थी की मैं कैसे लालू को जानता था| मैंने उसे बैठने का इशारा किया और खुद बाहर ही रुक गया और दूकान से एक परफ्यूम की बोतल ली और एक काला चस्मा| घर पर कोई नहीं जानता था की मैं दारु पीता हूँ और इस हालत में घर जाता तो काण्ड होना तय था| मैंने परफूम अच्छे से लगाया और लालू से माल माँगा उसने भी मुस्कुराते हुए अपनी भरी हुई सिगरेट मुझे दे दी और बदले में मैंने उसे पैसे दे दिए| बस के पीछे खड़ा मैं चुप-चाप सिगरेट पीता रहा और जब बस भर गई तो मैं बस में चढ़ गया|ऋतू खिडक़ीवाली सीट पर बैठी थी और उसकी साथ वाली सीट खाली थी पर मैं वहाँ नहीं बैठा बल्कि लास्ट वाली सीट पर पहुँच गया जो अभी भी खाली थी| मैंने उस पर पाँव पसार के लेट गया और सोने लगा| गांजे ने दिमाग तो पहले ही सन्न कर दिया था| एक बजा होगा और मुझे मूत आ रहा था तो मैं उठ कर बैठ गया| बस रुकने वाली थी और मैं ने उठ कर देखा तो अब भी ऋतू के बगल वाली सीट खाली ही थी| इतने में एक लड़का जो मेरे दाईं तरफ बैठा था वो उठा और जा कर रितिका के साथ बैठ गया और उसके साथ बदसलूकी करने लगा| वो जानबूझ कर उससे चिपक कर बैठा था और जबरदस्ती उससे बात करने लगा| रितिका उसके साथ बहुत uncomfortable थी और बार-बार उससे कह रही थी की; "मुझे आपसे बात नहीं करनी!" पर वो हरामी बाज़ ही नहीं आ रहा था|
मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ा और उस लड़के की गद्दी पर जोरदार थप्पड़ मारा| मेरा थप्पड़ लगते ही वो पलट के मुझे देखने लगा, मैंने ऊँगली के इशारे से उसे उठने को कहा: "निकल बहनचोद!" मैंने गरजते हुए कहा और ये सुनते ही लालू पीछे की तरफ देखने लगा और उसे समझते देर न लगी की माजरा क्या है| उसने एक कंटाप उस लड़के के मारा और लात मार के बस से उतार दिया और चिल्लाता हुआ बोला; "भोसड़ी के दुबारा अगर दिख गया न तो गंडिया काट डालब!" ऋतू की आँखें भर आईं थीं और उसने मेरी तरफ देखा और 'थैंक यू' कहना चाहा पर मैंने उससे नजर ऐसे फेर ली जैसे की वो यहाँ थी ही नहीं! मैं आगे चला गया और कंडक्टर के बाजू वाली सीट पर बैठ गया| नशे का झोंका आ रहा था और मुझे नींद आ रही थी तो मैं बैठे-बैठे ही सोने लगा| दस मिनट बाद बस रुकी और मैं मूत कर आ गया और वापिस पीछे की सीट पर
लेट गया| जब हमारा बस स्टैंड आया तो लालू मुझे जगाने आया और वापस जाते समय रितिका से माफ़ी माँगने लगा; "दीदी...वो माफ़ करना आपको उस हरामी की वजह से तकलीफ हुई|" रितिका ये सुन के सन्न रह गई और मेरी तरफ देखने लगी पर मैंने कुछ नहीं कहा और बस से नीचे उतर आया| बस स्टैंड से हम दोनों गज भर की दूरी पर चल रहे थे, मैंने जेब से फ्लास्क निकला और शराब पीने लगा| मन में बहुत दुःख था और घर जाने से मैं कतरा रहा था| दरअसल मैं रितिका का रिश्ता अपने सामने होते हुए नहीं देखना चाहता था और इसीलिए जब घर दूर से नजर आने लगा तो मैंने रितिका से अकेले जाने को कहा| "आप घर नहीं...." वो बस इतना ही बोल पाई की में बोल पड़ा; "घर में बोल दिओ कल मेरा ऑफिस था इसलिए मैं यहीं से चला गया|" इतना कह कर मैं पलट कर वापस बस स्टैंड की तरफ चल पड़ा| रितिका मेरे दर्द को महसूस कर रही थी पर उसने कहा कुछ नहीं और चुप-चाप सर झुकाये घर चली गई| मैं बस स्टैंड पहुँचा और वहाँ बैठा बस का इंतजार करने लगा, अगली बस आने में आधा घंटा था तो मैं वहीँ लेट गया और कैसे भी कर के अपने दर्द को कम करने की सोचने लगा| रितिका की शादी में मैं खुद को कैसे सम्भालूंगा बस यही सोच रहा था की बस आ गई और मैं फिर से सबसे पीछे वाली सीट पकड़ के लेट गया| तभी घर से फ़ोन आया और पिताजी चिल्लाने लगे की मैं घर क्यों नहीं आया, मैंने फ़ोन उठा कर सीट पर दूसरी तरफ रख दिया और खुद खिड़की की से बाहर देखने लगा| जब मैंने फ़ोन देखा तो कॉल काट चूका था पर इसका मुझे जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ा, मैंने फिर से जेब से फ्लास्क निकाली और आखरी घूँट पिया और शहर आने का इंतजार करने लगा| सात बजे हम शहर पहुँचे और उतारते ही पेट में दारु की ललक जाग गई| ठेके से दारु ली और एक सब्जी वाले से ककड़ी ली और घर आ गया और पीने लगा| आज रितिका की शक्ल देख कर कोफ़्त हो रही थी पर मुझे मेरी समस्या का अब तक कोई रास्ता नहीं मिला था| जमाने से तो विश्वास उठ चूका था मेरा, मेरा दिमाग कह रहा था की सब के सब मतलबी हैं यहाँ! सब मुझसे कुछ न कुछ चाहते थे, मोहिनी पढ़ना चाहती थी तो राखी ऑफिस के काम में मेरी हेल्प और तो और अनु मैडम ने भी मेरे जरिये अपना डाइवोर्स ले लिया था| ये डाइवोर्स Final वाली बात मुझे अरुण ने ही बताई थी और अब ये सब बातें मुझे कचोटने लगी थीं| क्या मैं इस दुनिया में सिर्फ दूसरों के लिए जीने आया हूँ? क्या मुझे मेरी ख़ुशी का कोई हक़ नहीं? क्या माँगा था मैंने जो भगवान से दिया न गया? बस एक रितिका का प्यार ही तो माँगा था और उसने भी मुझे धोका दे दिया! ये सब सोचते-सोचते मेरी आँख से आँसू बहने लगे और मैं अपनी आँख से बहे हर एक कतरे के बदले शराब को अपने जिस्म में उतारता चला गया| कब नींद आई मुझे कुछ होश नहीं था, आँख तब खुली जब सुबह का अलार्म तेजी से बज उठा|
update 60
मैं कुनमुनाया और अलार्म बंद कर दिया पर ठीक पांच मिनट बाद
फिर अलार्म बजा और मैं बड़े गुस्से के साथ उठा और जमीन पर फिर से बैठ गया| खिड़की से आ रही ठंडी हवा और उजाले ने मेरी नींद थोड़ी तोड़ दी थी| मेरा मन अब ये जॉब करने का बिलकुल नहीं था, क्योंकि अब मुझे इसकी कोई जर्रूरत नजर नहीं आ रही थी| ऊपर से ये घर जिसमें रितिका के लिए मेरा प्यार बस्ता था अब मुझे अंदर ही अंदर खाने लगा था| मैं उठा और नहाने चला गया, फिर बाहर आते ही मैंने लैपटॉप पर रेंट पर मकान देखने शुरू किये और तब मुझे याद आया की कहाँ तो मैं अपने और रितिका के लिए बैंगलोर में मकान ढूँढ रहा था और कहाँ लखनऊ में ढूंढने लगा| मन में एक खेज सी उठी .....
लिस्ट में जो नाम सबसे ऊपर था उसी पर कॉल किया और अपनी requirement और budget उसे बता दिया, उसने ग्यारह बजे मुझे मिलने बुलाया| मैंने तुरंत बॉस को फ़ोन किया की मुझे घर शिफ्ट करना है इसलिए मैं आज नहीं आ पाउँगा, ये बोल कर मैं दलाल के पास चल दिया| एक-एक कर उसने मुझे 3-4 options दिखाए पर मुझे जो जच्चा वो था ठेके के पास| एक gated society थी और रेंट 15,000/- था| 2 BHK था बस ऑफिस से बहुत दूर था, पर हाईवे के पास था| वैसे भी मुझे कौन सा ऑफिस जाना था अब, मुझे तो जल्द से जल्द उस घर से निकलना था जहाँ अब मेरा दम घुटने लगा था| मकान मालिक ने मुझसे मेरे काम-धंधे के बारे में पुछा तो मैंने उसे सब कुछ बता दिया और अपने documents भी दिखा दिए| सब बात फाइनल कर मैं ने उनकी बैंक डिटेल्स ले ली और उसी वक़्त उन्हें साड़ी पेमेंट कर दी| दलाल ने सारे कागज बनवाने थे, मैं सीधा घर आया और दो suitcase में अपना समान भरा और घर की चाभी सुभाष अंकल जी को देने चल दिया| उन्हें मैंने ये कहा की मेरी पोस्टिंग अब बरेली में जयदा रहती है इसलिए मैंने नया घर हाईवे के पास लिया है ताकि आने-जाने में आसानी हो| घर की ad मैंने ऑनलाइन डाल दी है और नंबर उन्हीं का डाला है| तो वो खुश हुए की उन्हें नया किरायदार ढूंढने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी|
अपनी बुलेट रानी पर पीछे सारा समान बाँध कर मैं नए फ्लैट पर आ गया और समान रख कर सीधा कुछ समान खरीदने निकल पड़ा| Glass का एक सेट, दारु की बोतल और कुछ चखना ले कर मैं घर लौट आया| अभी मैंने सोचा ही था की मैं पीना शुरू करूँ की दलाल और मकान मालिक कागज ले कर आ गए| उन्होंने देख लिया की बिस्तर पर शराब की बोतल राखी है पर किसी ने कुछ नहीं कहा, क्योंकि उनका मुँह-माँगा रेंट जो दे रहा था| कागज साइन कर के उन्होंने एक काम करने वाली दीदी से मिलवाया जो सब के यहाँ झाड़ू-पोछा और बाकी के काम करती थीं| मेरे लिए तो ये ऐसा था जैसे अंधे को आँखें मिल गई हों| मैंने उनसे सारे काम की बात कर ली, झाड़ू-पोछा, कपडे, बर्तन और दिन में एक बार खाना बनाना| उन्होंने डरते हुए 5,000/- कहा और मैं जानता था की ये कम है पर मैंने इस डर से कुछ नहीं कहा की कहीं मकान मालिक इससे commission में पैसे ना लेता हो| मैंने सोचा जब ये काम करने आएँगी तो मैं
इन्हें पैसे बढ़ा कर दे दूँगा| मकान मालिक ने जाते-जाते बस इतना कहा; "बेटा प्लीज कोई बखेड़ा खड़ा मत करना|" मैं उनका मतलब समझ गया| "अंकल जी मैं बहुत शांत स्वभाव का आदमी हूँ, यहाँ किसी से मेरी कोई बात-चीत नहीं होगी और न ही आपको कोई शिकायत आएगी|" मैंने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा| दीदी भी कह गईं की वो कल सुबह 7 बजे आएँगी, अब मुझे तंग करने वाला कोई नहीं था| मैंने अपना पेग बनाया और बालकनी में फर्श पर बैठ गया और सड़क को देखते-देखते घूँट भरने लगा| आज पता नहीं पर मेरा मन कह रहा था की शायद....शायद कुछ अच्छा हो जाए!
पर नहीं जी..... ऊपर वाला तो मुझसे आज कल बहुत खफा था| पास में पड़ा फ़ोन जिमें अभी नुसरत फ़तेह अली का गाना बज रहा था वो अचानक से बंद हुआ और पिताजी का कॉल आ गया|
मैं: जी
पिताजी: बेटा रितिका का रिश्ते पक्का हो गया है, दिवाली के दूसरे दिन ही शादी है!
पिताजी ने हँसते हुए कहा और ये सुन कर मेरा हाल बेहाल था! आँख से एक कटरा एक आँसूँ निकला और बहता हुआ मेरी गोद में गिरा| जिसके दिल पर मेरा नाम लिखा था आज वो किसी और के नाम की मेहँदी रचवाने वाली थी! जो कल तक मेरा नाम लिया करती थी वो अब किसी और की होने जा रही थी| मैं अपने इन्हीं ख्यालों में गुम था और इधर पिताजी उम्मीद कर रहे थे की मैं ख़ुशी से उछाल जाऊँगा|
पिताजी: हेल्लो? मानु? हेल्लो?
मैं: हाँ जी! इधर ही हूँ मैं|
पिताजी: बेटा हम लोगों को तुझसे बात करनी है तू कल के आ जा|
अब में घर जा कर उस बेवफा की सूरत नहीं देखना चाहता था, उससे मेरा गम बढ़ना ही था कम नहीं होना था!
मैं: जी...वो....मैं नहीं आ पाऊँगा| आप बताइये की क्या काम था?
पिताजी: बेटा इतनी ख़ुशी की बात है और तू वहाँ अकेला है? देख भाई साहब भी कह रहे थे की तू कल आ जा वरना हम तुझे लेने आ जाते हैं|
मैं: मैं लखनऊ में नहीं हूँ! मैं.....नॉएडा में हूँ!
पिताजी: क्या? पर क्यों?
मैं: जी वो काम....काम के सिलिसिले में आना पड़ा|
पिताजी: तो कब वापस आ रहा है?
मैं: जी टाइम लगेगा.... 20-25 दिन....
उस टाइम मेरे मुँह में जो झूठ आ रहा था मैं वो सब बोले जा रहा था| मेरी शायद ये बात ताऊ जी भी सुन रहे थे इसलिए अगली आवाज उनकी थी जो बहुत गुस्से में थी;
ताऊ जी: मानु! रितिका के लिए इतना अच्छा रिश्ता आया है और तू बहाने बनाने में लगा है! मैं कहे देता हूँ की ये रिश्ता हाथ से जाना नहीं चाहिए, मंत्री जी सामने से रिश्ता ले कर आये हैं! रितिका की शादी से पहले मैं चाहता हूँ की तेरी शादी हो जाए| अच्छा लगता है की चाचा कुंवारा बैठा है और भतीजी की शादी हो रही है?! कल पहुँच यहाँ!
मैं: ताऊ जी मैं आपको पहले ही कह चूका ही की मुझे अभी शादी नहीं करनी तो फिर आप बार-बार मेरे पीछे क्यों पड़ जाते हैं? जिसका रिश्ता आया है उसकी चिंता करिये पहले! शादी के लिए वो मरी जा रही है मैं नहीं!
मैंने थोड़ा गुस्से में कहा क्योंकि कोई नहीं जानता था की मेरे दिल में क्या आग लगी है! हर किसी को अपनी करनी है तो करो, मैं भी अब वही करूँगा जो मुझे करना है|
ताऊ जी: जुबान लड़ाता है? तुझे जरा सी छूट क्या दी तू तो हमारे सर पर नाचने लगा?
मैं: आप को ये रिश्ता अपने हाथ से नहीं जाने देना ना तो आप करो उसकी शादी| मेरे लिए कौन सा प्रधान मंत्री का रिश्ता आया है जो आप एक दम से शादी-शादी करने लगे?
दारु का नशा अब मुझसे सब बुलवा रहा था|
पिताजी: (चिल्लाते हुए) तू होश में है? क्या बोले जा रहा है? नशा-वषा किया है क्या? ऐसे बदतमीजी से बात करेगा तू भाई साहब से?
मैं: मैं इतनी बार तो आप सब से कह चूका हूँ की मुझे अभी शादी नहीं करनी तो फिर हर 6 महीने बाद आप लोग क्यों मेरे पीछे पड़ जाते हैं? आपको समाज की क्यों इतनी चिंता है? शादी के बाद बीवी को खिलाऊँगा क्या? या ये दुनिया वाले रोज 3 टाइम का खाना देने आएंगे मुझे?
शायद ताऊ जी को मेरी बात समझ आई और वो नरम होते हुए बोलने लगे;
ताऊ जी: ठीक है, तुझे शादी नहीं करनी ना? पर अपनी भतीजी की शादी में तो आ जा!
उनकी नरमी देख मुझे मेरी गलती का एहसास हुआ की उन्होंने तो मेरा दिल नहीं तोडा ना?
मैं: ताऊ जी मुझे माफ़ कर देना, मुझे आपसे इस तरह बात नहीं करनी चाहिए थी! मैं अभी शहर में नहीं हूँ, नॉएडा आया हूँ काम के सिलसिले में| कम्पनी के कुछ लिकनेसेस का काम है, इसलिए उसमें टाइम लगेगा| रही रितिका की शादी की बात तो मैं आ जाऊँगा, आप निश्चिन्त रहिये| अभी तो तकरीबन 2 महीने हैं ना हमारे पास?
मैंने बड़ी हलीमी से बात की और ताऊ जी मान भी गए| फ़ोन कटते ही मैंने एक लार्ज पेग बनाया और उसे एक सांस में गटक गया| मैं कैसे उसकी शादी में जाऊँगा? कैसे उसे अपनी आँखों के सामने विदा होते हुए देखूंगा? काश ये सब देखने से पहले मैं मर जाता! ये सोचते-सोचते मैं पूरी बोतल पी गया पर कोई हल नहीं मिला| दिल और दिमाग को चैन नहीं मिल रहा था, अब तो दारु भी खत्म हो गई थी तो कुछ तो चाहिए था मुझे? मैं लड़खड़ाता हुआ उठा और गाँजा ढूँढने लगा, सारा
समान उथल-पुथल करने के बाद मुझे वो मेरी ही पैंट की जेब में मिला| ठीक से दिख भी नहीं रहा था, इसलिए बड़ी मुश्किल से उसे सिगरेट में भरा और पहला कश लेते ही मैं वापस जमीन पर बैठ गया| दारु की खाली बोतल में मुझे एक आखरी बूँद दिखाई दी, मैंने उसे मुँह से लगाया और वो आखरी बूँद भी पी गया| ऐसा लगा मानो सबसे जयदा स्वाद उसी आखरी बूँद में था| फटाफट मैंने सिगरेट पी ताकि उसका नशा मेरा दिमाग जल्दी से सुन्न कर दे और मैं चैन से सो सकूँ| हुआ भी वही अगले दस मिनट में ही मेरी आँख लग गई और फिर सुबह खुली जब दीदी ने बेल्ल बजा-बजा कर मेरी नींद तोड़ी| मैंने बड़ी मुश्किल से उठ कर दरवाजा खोला, दरवाजा खुलते ही दीदी को दारु का एक बहुत तेज भभका सूंघने को मिला| उन्होंने ने एक दम से अपनी नाक सिकोड़ ली और मुझे ये देख कर एहसास हुआ की मैंने क्या छीछालेदर किया है! मैं बिना कुछ कहे बाथरूम में घुसा और नहा-धो कर तैयार हुआ, अब घर में बर्तन तो थे नहीं की मुझे चाय मिलती| घर की सफाई हो चुकी थी और मुझे तैयार देख दीदी कहने लगीं की वो कपडे शाम को कर देंगी| मुझसे उन्होंने पुछा की मैं कितने बजे लौटूँगा तो मैंने उन्हें 6 बजे बोल दिया और फिर मैं ऑफिस के लिए निकल गया| आज मैंने सोच लिया था की सर को अपना रेसिग्नेशन दे दूँगा| ऑफिस आ कर जब मैंने जॉब छोड़ने की बात कही तो सर ने मुझे अपने सामने बिठाया और पुछा;
बॉस: पहले तो तू ये बता की ये क्या हालत बना राखी है अपनी? और क्यों ये जॉब छोड़ना चाहता है? कहीं कोई और जॉब मिल गई?
मैं: सर कुछ पर्सनल कारन हैं!
बॉस: जॉब छोड़ने के लिए पर्सनल करना है या फिर ये दाढ़ी उगाने की वजह पर्सनल है?
सर बार-बार कारन जानने के लिए कुरेदते रहे क्योंकि पिछले कुछ महीनों में उन्होंने under staffing की थी और एकाउंट्स में सिर्फ दो ही लोग बचे थे, यानी मैं और अरुण और हम दोनों ही पूरा एकाउंट्स का काम देख रहे थे, हेडोफ़्फ़िस का भी और यहाँ ब्राँच का भी| अब मुझे सर को कुछ न कुछ बहाना मारना था तो मैंने कहा;
मैं: सर मैं बोर हो गया हूँ! इतनी दूर से आना पड़ता है!
बॉस: अरे भाई अभी तो तुम्हारी उम्र ही क्या है जो बोर हो गए? अभी तो साड़ी उम्र पड़ी है! दूर से आना पड़ता है तो यहाँ कहीं नजदीक घर देख ले!
मैं: सर यहाँ कहाँ बजट में घर मिलेगा?
बॉस: तो अब तो मेट्रो शुरू हो गई उससे आ जाया कर!
पर मैं तो मन बना चूका था की मुझे जॉब छोड़नी है इसलिए सर ने कहा;
बॉस: ठीक है यार अब तेरा मन बन ही चूका है तो, पर देख एक महीना रुक जा और ये काम निपटा दे फिर बाकी का अरुण संभाल लेगा|
मैं: जी ठीक है पर सर सुबह के टाइम में थोड़ा relaxation दे दो! रात को आप जितनी देर बोलो उतनी देर बैठ जाऊँगा!
सर मान गए और मैंने सोचा की अब महीना तो शुरू हो ही चूका है तो रो-पीट कर दिन पार कर लेता हूँ! इधर जब ये खबर अरुण को पता चली तो उसने चुप-चाप सिद्धार्थ को फ़ोन कर दिया और शाम को
जबरदस्ती मेरे साथ मेरा घर देखने के बहाने से मेरे साथ आ गया| रास्ते में ही उसने सिद्धर्थ को भी पिक करने को कहा| जैसे ही सिद्धार्थ ने मेरी हालत देखि तो वो गाली देते हुए कहने लगा; "बहनचोद क्या हालत बना राखी है अपनी?" पर मेरे जवाब देने से पहले ही अरुण बोल पड़ा; "साहब आज कल मजनू हो गए हैं!" मैं बीएस झूठी हँसी हँस कर रह गया, दोनों को एक मिनट छोड़ कर मैं कुछ लेने चला गया, वापस आया तो मेरे पास चिप्स, नमकीन और सोडे की बोतल थी|
हम तीनों दारु लेते हुए घर आ गए, बालकनी में तीनों जमीन पर बैठ गए और मैंने तीनों के लिए small-small पेग बनाये| इधर सिद्धार्थ ने खाना आर्डर कर दिया, उन दोनों ने एक सिप ही ली थी और मैं एक साँस में गटक गया| "अबे साले! आराम से, तू तो कतई देवदास हो रखा!" सिद्धार्थ बोलै पर आगे बात होने से पहले ही दीदी आ गईं और मैंने दरवाजा खोला| वो चुप-चाप बाथरूम में कपडे धोने लगीं| अरुण ने बात शुरू करते हुए कहा; "जनाब नौकरी छोड़ रहे हैं!" ये सुनते ही सिद्धार्थ चौंक पड़ा और बोला; तू पागल हो गया क्या? एक लड़की के चक्कर में पड़ कर इतनी अच्छी नौकरी छोड़ रहा है? होश में आ और life में practical बन जा| देख तुझे मैं एक Sure shot तरीका बताता हूँ उस लड़की को भूलने का| घर के अंदर बैठेगा तो इसी तरह ऊल-जुलूल हरकतें करेगा, घर से बाहर निकल और पेल दे किसी लड़की को! मेरे ऑफिस में है एक लड़का मैं उससे किसी लड़की का नंबर माँगता हूँ, उससे मिल और घापा-घप्प कर और Move- On कर! वो भी लड़की तो move-on कर गई होगी तू क्यों उसके चक्कर में अपना नास (नाश) कर रहा है!
"देख भाई, तेरे ये आईडिया तू अपने पास रख| मेरा गम बीएस मैं ही जानता हूँ और उसका ये इलाज तो कतई नहीं है|" मैंने दूसरा पेग बनाते हुए कहा|
"अच्छा तू ये बता की हुआ क्या एक्साक्ट्ली?" अरुण ने पुछा|
"कुछ नहीं यार, उसे कोई और पसंद आ गया| पैसे वाला था और वो उसे अच्छी जिंदगी दे सकता था|" मैंने जयदा डिटेल ना देते हुए कहा|
"तो Gold Digger थी वो?" सिद्धार्थ ने पुछा|
"ऐसी थी तो नहीं पर ......छोड़ ना! तू देख आर्डर कहाँ पहुँचा|" मैंने बात बदलते हुए कहा क्योंकि अब मुझे रितिका के बारे में कोई बात नहीं करनी थी| सिद्धार्थ भी समझ गया और उसने आगे कुछ नहीं बोला पर अरुण पर शराब का नशा चढ़ने लगा था और अब उसके मन में 'भाई के लिए प्यार' जाग गया था|
"बहनचोद! साला अगर उसने तुझे छोड़ा है तो वो किसी की सगी नहीं हो सकती! साले 1...2...3...4...
5 साल से जानता हूँ तुझे!
अरुण ने उँगलियों पर गिनते हुए कहा और उसे ऐसा करता देख मैं और सिद्धार्थ हँस दिए|
"इसे और मत दे! साला रास्ते में ड्रामे छोड़ेगा और घर पर भाभी हमारी खाट खड़ी कर देगी!" सिद्धार्थ ने अरुण को और पेग देने से मना किया, मैंने उसका पेग हम-दोनों में आधा-आधा बाँटना चाहा तो उसने एक डीएम से पेग छीन लिया और गटक गया|
"ओ भोसड़ी के!" सिद्धार्थ चिल्लाया पर तब तक अरुण पेग पी चूका था और हम दोनों फिर से हँसने लगे| तभी खाना आ गया, मैं दरवाजा खोलने गया तो दीदी भी कपडे धो कर निकल आईं, अब उन्हें कपडे डालने थे बालकनी में और वहां तो हम महफ़िल जमा कर बैठे थे|
"दीदी रहने दो मैं दाल दूँगा बाद में! अच्छा आप नॉन-वेज खाते हो ना?" मैंने पुछा तो वो एक दम से हैरान हो गईं और हाँ में गर्दन हिलाई| मैंने उनके लिए भी एक प्लेट नूडल मंगाए थे जो मैंने उन्हें दे दिए| पहले तो वो मना करने लगीं फिर मैंने थोड़ी जबरदस्ती कर के उन्हें दे दिया| वो मुस्कुरा कर चली गईं और मैं हम तीनों के लिए खाना ले कर बालकनी में बैठ गया| एल्युमीनियम के डिब्बे में नूडल्स आये थे तो प्लेट की जर्रूरत नहीं थी| हम तीनों ने खाना शुरू किया पर अरुण मियाँ पर नशा फूल शबाब पे था; "साला लड़कियाँ होती ही ऐसी हैं? मेरे गऊ जैसे दोस्त को छोड़ कर चली गई.... तू...तू चिंता मत कर....मैं...बहनचोद....तेरी शादी कराऊँगा.... उससे भी अच्छी लड़की से.... रुक अभी तेरी भाभी को कॉल करता हूँ|" इतना कह कर वो फ़ोन मिलाने को हुआ तो मैंने उसके हाथ से फ़ोन छीन लिया|
"अबे चूतिया हो गया है क्या? चुप-चाप खाना खा|" मैंने कहा और आगे किसी को भी पीने नहीं दी| आज बहुत दिनों बाद मुझे खाना खाने में मजा आ रहा था| खाना खाने के बाद सिद्धार्थ बोला; "देख यार! मेरी बात मान जा और ये जॉब मत छोड़| मैं मानता हूँ तुझे थोड़ा टाइम लगेगा और तू उसे भूल जायेगा|" मैंने बस हाँ में सर हिलाया पर ये तो मेरा मन ही जानता था की मैं अंदर से बिखरने लगा हूँ|
घडी में अभी बस 10 बजे थे और अरुण भैया तो लौटने लगे थे और अब उन्हें घर छोड़ना अकेले सिद्धार्थ के बस की बात नहीं थी| मैंने कैब बुलाई और फिर हम ने मिलकर अरुण को कैब में बिठाया और पहले उसे घर छोड़ा और भाभी से माफ़ी भी मानगी की मेरे बर्थडे ट्रीट की वजह से भाई को थोड़ी जयदा हो गई| फिर सिद्धार्थ को छोड़ मैं उसी कैब में वापस आया और रस्ते में ठेके से एक और बोतल ली| घर आते ही मैं बालकनी में बैठ गया और फिर से उसी दर्द की आगोश में चला गया| लार्ज बना के जैसे ही होठों से लगाया तो रितिका की शक्ल याद आ गयी और उसी के साथ गुस्सा भी खूब आया| एक सांस में पूरा पेग खींच गया और फटाफट दूसरा पेग बनाया, तभी याद आया की माल भी तो तैयार है! मैंने जेब से फेमस मलना की क्रीम की छोटी सी पुड़िया निकाली और लग गया पूरा सेटअप बनाने| पूरी Heisenberg वाली फीलिंग आ रहे थी और मैं अपने इस
बचकाने ख्याल पर मुस्कुराने लगा| आज पहली बार था की मैं अपने ही इस तरह के बचकाने ख्याल पर हँस रहा था| पर मेरे मन ने मुझे ये ख़ुशी जयदा देर तक एन्जॉय नहीं करने दी और मुझे अचानक से रितिका का हँसता हुआ चेहरा याद आ गया, मैं ने तैयार सिगरेट वहीँ जमीन पर छोड़ दी क्योंकि मेरा मन मुझे इस गम से बाहर नहीं जाने देना चाहता था| मैं पेग ले कर उठा और बालकनी में खड़ा हो कर ऊपर आसमान में देखने लगा| एक पल के लिए आँख मूँदि तो रितिका मुझे शादी के जोड़े में दिखी और फिर मेरी आँख से आँसू बह निकले और एक कटरा मेरे ही पेग में गिरा| मैंने सोचा की चलो आज अपने आंसुओं का स्वाद भी चख के देखूँ! झूठ नहीं कहूँगा पर ये वो स्वाद था जिसने दिल को अंदर तक छू लिए था! पेग खत्म हुआ और मैं वापस आ कर निचे बैठ गया पर अब दिल बगावत करने लगा था, उसे अब बस ऋतू चाहिए थी! चाहे जो करना पड़े वो कर पर उसे अपने पास ले आ! और अगर तू इतना ही बुजदिल है की अपने प्यार को ऐसे छोड़ देगा तो धिक्कार है तुझ पर! मर जाना चाहिए तुझे!!! मन ने ये suicidal ख्याल पैदा करना शुरू कर दिए थे| ऋतू को अपने पास ला सकूँ ये मेरे लिए नामुमकिन था और मरना बहुत आसान था! तभी नजर कमरे में घूम रहे पंखे पर गई.....
update 61
पर जान देना इतना आसान नहीं होता...वरना कितने ही दिल जले आशिक़ मौत की नींद सो चुके होते! मैं कुछ लड़खड़ाता हुआ उठा और रस्सी ढूँढने लगा, नशे में होने के कारन सामने पड़ी हुई रस्सी भी नजर नहीं आ रही थी| जब आई तो उसे उठाया और फिर पंखे की तरफ फेंकी और फंदा बना कर पलंग पर चढ़ गया| गले में डालने ही वाला था की दिमाग ने आवाज दी; "अबे बुज़दिल! ऐसे मरेगा? दुनिया क्या कहेगी? मरना है तो ऐसे मर की रितिका की रूह तुझे देख-देख कर तड़पे!" ये बात दिल को लग गई और मैं बिस्तर से नीचे उतरा और वापस जमीन पर बैठ गया| समानेभरी सिगरेट भरी पड़ी थी, वो उठाई और पीने लगा| घडी में 12 बजे थे और नशे ने मुझे दर्द के आगोश से खींच कर अपने सीने से चिपका लिया था और मैं चैन की नींद सो गया| सुबह दीदी के आने के बाद आँख खुली और मैं आँख मलता हुआ बाथरूम में घुस गया, जब बाहर आया तो दीदी घर से चाय ले आईं थी| मैंने उन्हें Thank you कहा और उनसे कहा की वो मेरी मदद करें ताकि मैं कुछ घर का समान खरीद सकूँ| पुराना समान तो मैं पुराने वाले घर में छोड़ आया था| दीदी की मदद से ऑनलाइन कुछ बर्तन मँगाए और कुछ कपडे अपने लिए मंगाए| दीदी उठ कर कमरे में सफाई करने गईं तो उन्हें वहाँ पंखे से लटकी रस्सी दिखाई दी और वो चीखती हुईं बाहर आईं|
"आप खुदखुशी करने जा रहे थे साहब?" दीदी ने हैरानी से पुछा, तो मैंने बस ना में सर हिला दिया| "तो फिर ये रस्सी अंदर पंखे से झूला झूलने को लटकाई थी?!" दीदी ने थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए कहा, पर मेरे पास कोई जवाब नहीं था इसलिए मैं चुप रहा|
"क्यों अपनी जिंदगी बर्बाद करने पर तुले हो?" दीदी ने खड़े-खड़े मुझे
अपनापन दिखाते हुए कहा| मैं उस समय फर्श पर दिवार का सहारा ले कर बैठा था और वहीँ से बैठे-बैठे मैंने दीदी की आँखों में देखा और उनसे पुछा; "आपने कभी प्यार किया है?"
"जिससे शादी की उसी से प्यार करना सीख लिया|" दीदी ने बड़ी हलीमी से जवाब दिया, उनका जवाब सुन कर एहसास हुआ की मजबूरी में इंसान हालात से समझौता कर ही लेता है|
"फिर आप मेरा दुःख नहीं समझ सकते!" मैंने गहरी साँस छोड़ते हुए कहा|
"शराब पीने से ये दर्द कम होता है?" दीदी ने पुछा|
"कम तो नहीं होता पर उस दर्द को झेलने की ताक़त मिलती है और चैन से सो जाता हूँ!"
"कल आपका दोस्त कुछ कह रहा था ना की आप........." इसके आगे उनकी बोलने की हिम्मत नहीं हुई और उन्होंने अपना सर झुकाया और अपने सीन पर से साडी का पल्लू खींच कर नीचे गिरा दिया| उनका मतलब कल रात सिद्धार्थ की कही हुई बात की कोई लड़की पेल दे से था| इधर मेरी नजर जैसे ही उनके स्तनों पर पड़ी मैं तुरंत बोला:
"प्लीज ऐसा मत करो दीदी! मैं आपको सिर्फ जुबान से दीदी नहीं बोलता!" इतना सुनते ही दीदी जमीन पर घुटनों के बल बैठ गईं और अपना चेहरा अपने हाथों में छुपा लिया और रोने लगी| मैं अब भी अपनी जगह से हिला नहीं था, मेरा उन्हें सांत्वना देना और छूना मुझे ठीक नहीं लग रहा था| "साहब....." वो आगे कुछ बोलतीं उससे पहले ही मैं बात काटते हुए बोला; "दीदी आपसे छोटा हूँ कम से कम 'भैय्या' ही बोल दो!" ये सुन कर वो मेरी तरफ आँखों में आँसू लिए देखने लगी और अपनी बात पूरी की; "भैय्या.... मैंने आज तक ऐसा कुछ नहीं किया! पर आप से मिलने के बाद कुछ अपनापन महसूस हुआ और आपकी ये हालत मुझसे देखि नहीं गई इसलिए मैंने....." आगे वो शर्म के मारे कुछ नहीं बोलीं|
"दीदी प्लीज कभी किसी के भी मोह में आ कर फिर कभी अपनी इज्जत को यूँ न गिरा देना! मेरा दोस्त तो पागल है!" आगे मेरा कुछ कहने का मन नहीं हुआ क्योंकि उससे दीदी और शर्मिंदा हो जातीं| मैं तैयार हुआ और तब तक दीदी ने पूरा घर साफ़ कर दिया था और वो मेरे कल के बिखेरे हुए कपडे संभाल रहीं थी|
"दीदी वो...बर्तन तो कल आएंगे ...
आप कल से खाना बना देना!" इतना कह कर मैं ने अपना बैग उठाया, दीदी समझ गईं की मेरे जाने का समय है तो वो पहले निकलीं और मैं बाद में निकल गया| वो पूरा दिन ऐसे ही बीता और रात को 10 बजे मैं घर पहुँचा| फिर वही पेग बनाया और बालकनी में बैठ गया| पर आज Suicidal Tendencies पैदा नहीं हुईं क्योंकि दिमाग में कुछ और ही चल रहा था और जबतक सो नहीं गया तब तक पीता रहा| सुबह वही दीदी के आने के बाद उठा, वो आज भी मेरे लिए चाय ले आईं थी| चाय पीता हुआ मैं अभी भी सर झुकाये बैठा था, दीदी भी चुप-चाप अपना काम कर रही थीं| बात शुरू करते हुए मैंने पुछा; "दीदी आपके घर में कौन-कौन हैं?"
"मैं, मेरा पति और एक मुन्ना|" दीदी ने बड़ा संक्षेप में जवाब दिया, वो अब भी कल के वाक्या के लिए शर्मिंदा थीं|
"कितने साल का है मुन्ना?" मैंने बात को आगे बढ़ाने के लिए पुछा|
"साल भर का|" दीदी के जवाब से लगा की शायद वो और बात नहीं करना चाहतीं, इसलिए मैंने उठ खड़ा हुआ और बाथरूम जाने लगा| तभी दीदी को पता नहीं क्या सूझी वो आ कर मेरे गले लग गईं और बिफर पड़ीं; "भैया ....मुझे .... गलत ......न समझना|" उन्होंने रोते-रोते कहा| मैंने उन्हें अपने सीने से अलग किया और उनके आँसू पोछते हुए कहा; "दीदी मैं आपके जज्बात महसूस कर सकता हूँ और मैं आपके बारे में कुछ भी बुरा नहीं सोच रहा| जो हुआ उससे पता चला की आपका मेरे लिए कितना मोह है| अब भूल भी जाओ ये सब. जिंदगी इतनी बड़ी नहीं होती की इतनी छोटी-छोटी बातों को दिल से लगा कर रखो|" मेरी बात सुन कर उन्हें इत्मीनान हुआ और वो थोड़ा मुस्कुराईं और मैं बाथरूम में फ्रेश होने चला गया| मेरे रेडी होने तक उनका काम खत्म हो चूका था, मेरे बाहर आते ही वो बोल पड़ीं; "भैया आप सुबह पूछ रहे थे ना की मेरे बारे में पूछ रहे थे, मेरे पति सेठ जी के यहीं पर ड्राइवर हैं, माता-पिता की मृत्यु मेरे बचपन में ही हो गई थी| फिर मैं यहाँ अपनी मौसी के पास आ गई और उनके साथ रह कर मैंने घर-घर काम करना शुरू किया| दो साल पहले मेरी शादी हुई और शादी के बाद मेरे पति दुबई निकल गए पर कुछ ही महीनों में उनकी नौकरी चली गई| मौसी की जानकारी निकाल कर यहाँ नौकरी मिली और सेठ जी ने भी मुझे पूरी सोसाइटी का काम दे दिया| अब यहाँ के सारे घरों का काम मेरे जिम्मे है|" दीदी ने बड़े गर्व से कहा|
"सारी सोसाइटी का काम आप अकेली कर लेती हो?" मैंने मुस्कुराते हुए पुछा|
"यहाँ 20 फ्लैट हैं और अभी बस 10 में ही लोग रहते हैं| एक आपको छोड़ कर सब शादी-शुदा हैं और वहाँ पर सिर्फ झाडू-पोछा या कपडे धोने का ही काम होता है|"
"आप तो यहाँ सारा दिन होते होंगे ना? तो मुन्ना का ख्याल कौन रखता है?"
"भैया मैं तो यही रहती हूँ पीछे सेठ जी ने क्वार्टर बना रखे हैं| दिन में 20 चक्कर लगाती हूँ घर के ताकि देख सकूँ की मुन्ना क्या कर रहा है? कभी-कभी उसे भी साथ ले जाती हूँ|"
"तो मुझे भी मिलवाओ छोटे साहब से!" मैंने हँसते
हुए कहा|
"संडे को ले आऊँगी|" उन्होंने हँसते हुए कहा|
उसके बाद दीदी निकल गईं और मैं भी अपने काम पर चला गया| शाम का वही पीना और नशे से चूर सो जाना| ऐसे करते-करते संडे आ गया और आज मैं तो जैसे उस नन्हे से दोस्त से मिलने को तैयार था| सुबह जल्दी उठा और तैयार हो कर बैठ गया, शराब की सारी बोत्तलें एक तरफ छुपा दीं| दीदी आईं तो दरवाजा खुला हुआ था और वो मुझे तैयार देख कर हैरान हो गईं| उनकी गोद में मुन्ना था जो बड़ी हैरानी से मुझे देख रहा था| "मुन्ना ...देखो तेरे मामा|" दीदी ने हँसते हुए कहा|
पर वो बच्चा पता नहीं क्यों मुझे टकटकी बांधे देख रहा था, जैसे की अपने नन्हे से दिमाग में आंकलन कर रहा हो और जब उसे लगा की हाँ ये 'दाढ़ी वाला' आदमी सही है तो वो मेरी तरफ आने को अपने दोनों पँख खोल दिए| मैंने उस बच्चे को जैसे ही गोद में लिया वो सीधा मेरे सीने से लग गया| जिस सीने में नफरत की बर्फ जम गई थी वो आज इस बच्चे के प्यार से पिघलने लगी थी| मेरी आँखें अपने आप ही बंद होती गईं और मैं रितिका के प्यार को भूल सा गया.... या ये कहे की उस बच्चे ने अपने बदन की गर्मी से रितिका के लिए प्यार को कहीं दबा दिया था| उसका सर मेरे बाएँ कंधे पर था और वो अपने नन्हे-नन्हे हाथों से जैसे मुझे जकड़ना चाहता था| उसकी तेज चलती सांसें ...वो फूल जैसी खुशबु.... उनके नन्हे-नन्हे हाथों का स्पर्श.... उस छोटे से 'पाक़' दिल की धड़कन... वो फ़रिश्ते सी आभा.... इन सब ने मेरे मन में जीने की एक ख्वाइश पैदा कर दी थी| मन इतना खुश कभी नहीं हुआ था, की आज मुझे अपने अंदर एक नई ऊर्जा महसूस होने लगी थी| मन ने जैसे एक छोटी सी दुनिया बना ली थी जिसमें बस मैं और वो बच्चा था|
इस बात से बेखबर की दीदी मुस्कुराती हुई मुझे अपने बच्चे को सीने से लगाए देख रही हैं| मुझे होश तब आया जब उस बच्चे ने 'डा...डा..डा' कहना शुरू किया| मैंने आँखें खोलीं और दीदी को मेरी तरफ देख कर मुस्कुराते हुए पाया| मैंने उसे नीचे उतारा तो वो अपने चरों हाथों-पैरों पर रेंगता हुआ बालकनी की तरफ जाने लगा| "भैया सच्ची तुम मुन्ना के साथ कितने खुश थे! ऐसे ही खुश रहा करो!"
"तो फिर आप रोज मुन्ना को यहाँ ले आया करो|" मैंने मुस्कुराते हुए कहा और फिर मुन्ना के पीछे बालकनी की तरफ चल दिया| वो बालकनी के शीशे के सहारे खड़ा हुआ और नीचे देखने लगा| उसके चेहरे की ख़ुशी ब्यान करने लायक थी, उस नन्ही से जान को किसी बात की कोई चिंता नहीं थी, वो तो बस अपनी मस्ती में मस्त था! कितना बेबाक होता है ना बचपन! दीदी काम करने में व्यस्त हो गईं और मैं मुन्ना के साथ खेलने लगा| कभी वो रेंगता हुआ इधर-उधर भागता...
कभी हम दोनों ही सर से सर भिड़ा कर एक दूसरे को पीछे धकेलने की कोशिश करते, में जानबूझ कर गिर जाता और वो आ कर मेरे ऊपर चढ़ने की कोशिश करता| मैं उसे उठा कर अपने सीने पर बिठा लेता और उसके नन्हे-नन्हे हाथों से खुद को मुके पढ़वाता| कभी उसे गोद में ले कर पूरे कमरे में दौड़ता तो कभी उसे अपनी पीठ पर बिठा के उसे घोड़े की सवारी कराता| पूरा घर मुन्ना की किलकारियों से गूँज रहा था और आज इस घर में जैसे जानआ गई हो, छत-दीवारें सब खुश थे! काम खत्म कर दीदी मुन्ना को मेरे पास ही छोड़ कर चली गईं, फिर कुछ देर बाद आईं और तब तक दोपहर के खाने का समय हो गया था| उसे उन्होंने दूध पिलाया और मेरे लिए गर्म-गर्म रोटियाँ सेंकीं जो मैंने बड़े चाव से खाईं! आज तो खाने में ज्यादा स्वाद आ रहा था इसलिए मैं दो रोटी ज्यादा खा गया| मेरे खाने के बाद दीदी ने भी खाना खाया और वो काम करने चलीं गई| मुन्ना सो गया था तो मैं उसकी बगल ही लेट गया और उसे बड़ी हसरतें लिए देखने लगा और फिर से अपने छोटी सी ख़्वाबों की दुनिया में खो गया| मुन्ना के चेहरे पर कोई शिकन कोई चिंता नहीं थी, उसके वो पाक़ चेहरा मुझे सम्मोहित कर रहा था| कुछ घंटों बाद मुन्ना उठा तो मुझे देखते ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई| मैंने उसे गोद में लिया और फिर पूरे घर में घूमने लगा| उसने बालकनी में जाने का इशारा किया तो मैं उसे ले कर बालकनी में खड़ा हो गया और वो फिर से सब कुछ देख कर बोलने लगा| अब उसके मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे पर मेरा मन उसकी आवाजों को ही शब्दों का रूप देने लगा| मैंने भी उससे बात करना शुरू कर दिया जैसे की सच में मैं उसकी बात समझ पा रहा हूँ| घर का दरवाजा खुला ही था और जब दीदी ने मुझे पीछे से मुन्ना से बात करते हुए देखा तो वो बोलीं; "सारी बातें मामा से कर लेगा? कुछ कल के लिए भी छोड़ दे?" मैं उनकी तरफ घूमा और हँसने लगा| मैं समझ गया था की वो मुन्ना को लेने आईं है पर मन मुन्ना से चिपक गया था और उसे जाने नहीं देना चाहता था| बेमन से मैंने उन्हें मुन्ना की तरफ बढ़ाया पर वो तो फिर से मेरे सीने से चिपक गया| मैंने उसके माथे को चूमा और तुतलाते हुए उससे कहा; "बेटा देखो मम्मी आई हैं! अभी आप घर जाओ हम कल सुबह मिलेंगे!" पर उसका मन मुझसे अलग होने को नहीं था, ये देख दीदी भी मुस्कुरा दीं और बोलीं; "भैया सच ये आपसे बहुत घुल-मिल गया है| वरना ये किसी के पास जयदा देर नहीं ठहरता, मुझे देखते ही मेरे पास भाग आता है|" तभी उनका पति भी आ गया और उसने दीदी की बातें सुन भी लीं| अरे चल भी साहब को क्यों तंग कर रही है!" दीदी उसकी आवाज सुन चौंक गईं और मेरे हाथ से जबरदस्ती मुन्ना को लिया और घर चली गईं|
अब मैं फिर से घर में अकेला हो गया था, पर मन आज की खुशियों से खुश था इसलिए आज मैंने नहीं पीने का निर्णय लिया और खाना खा कर लेट गया| पर नींद आँखों से गायब थी, गला सूखने लगा और मन की
बेचैनी बढ़ने लगी| मैंने करवटें लेना शुरू किया ताकि सो सकूँ पर नींद कम्भख्त आई ही नहीं| कलेजे में जलन महसूस होने लगी जो दारू ही बुझा सकती थी| मैं एक दम से खड़ा हुआ और दारु की बोतल निकाली और उसे अपने होठों से लगा कर पीने लगा| पलंग पर पीठ टिका कर धीरे-धीरे सारी बोतल पी गया और तब जा कर नींद आई| एक बात अच्छी हुई थी, वो ये की मुन्ना के प्यार ने मुझे उस दर्द की जेल से बाहर निकाल लिया था| सुबह जल्दी ही आँख खुल गई, शायद मन में मुन्ना से मिलने की बेताबी थी! मैं फ्रेश हो कर कपडे बदल कर बैठ गया की तभी बैल बजी| मैंने दरवाजा खोला और मुझे देखते ही मुन्ना मेरी बाहों में आने को मचलने लगा| उसे गोद में लेते ही जैसी बरसों पुराणी प्यास बुझ गई और मैं उसे ले कर ख़ुशी-ख़ुशी बालकनी में आ गया और वहाँ कुर्सी पर बैठ उससे फिर से बातें करने लगा| फिर मैंने अपना फ़ोन उठाया और मुन्ना को कुछ कपडे दिखाने लगा और उससे 'नादानी' में पूछने लगा की उसे कौन सी ड्रेस पसंद है? अब वो बच्चा क्या जाने, वो तो बस फ़ोन से ही खेलने लगा| वो अपने नन्हे-नन्हे हाथों से फ़ोन को पकड़ने लगा| आखिर मैंने उसके लिए एक छोटा सा सूट आर्डर किया और Early Delivery select कर मैंने उसे अगले दिन ही मँगवा लिया| दीदी को इस बारे में कुछ पता नहीं था, इधर अरुण का फ़ोन आया और वो पूछने लगा की मैं कब आ रहा हूँ? अब मन मारते हुए मुझे ओफिस जाना पड़ा और मुझे जाते देख मुन्ना रोने लगा| दीदी ने उसे बड़े दुलार से चुप कराया और मैं उसके माथे को चूम कर ऑफिस निकला| मेरी ख़ुशी मेरे चेहरे से झलक रही थी जिसे देख मेरा दोस्त अरुण खुश था| सर दोपहर को ही निकल गए थे और मैं शाम को जल्दी भाग आया, सोसाइटी के गेट पर ही मुझे दीदी और मुन्ना मिल गए और मुझे देखते ही वो मेरी गोद में आने को छटपटाने लगा| दीदी ने हँसते हुए उसे मुझे दिया और खुद बजार चली गईं, इधर मैं गार्ड से कल का आर्डर किया हुआ पार्सल ले कर घर आ गया| मैंने मुन्ना को खुद वो कपडे पहनाये जो उसे बिलकुल परफेक्ट फिट आये, कहीं उसे नजर न लग जाए इसलिए मैंने उसे एक काला टीका लगाया| ये कला टीका मैंने तवे के पेंदे से कालक निकाल कर लगाया था| फिर उसे गोद में लिए हुए मैंने बहुत सारी फोटो खींची| कुछ देर बाद जब दीदी आईं तो अपने बच्चे को इन कपड़ों में देख उनकी आँखें नम हो गईं| उन्होंने अपनी आँख से काजल निकल कर उसे टिका लगाना चाहा तो देखा की मैं पहले ही उसे टिका लगा चूका था| "भैया ये टिका तुमने कैसे लगाया?" उन्होंने अपने आँसू पोछते हुए पुछा| "दीदी मुझे डर लग रहा था की कहीं मेरी ही नजर न लग जाए मुन्ना को तो मैंने तवे के पेंदे से कालक निकाल कर ये छोटा सा टिका लगा दिया|" मैंने जब ये कहा तो दीदी हँस दी|
"पर भैया ये तो बहुत महँगा होगा?"
"मेरे भांजे से तो महँगा नहीं ना?!" फिर मैं मुन्ना को ले कर बालकनी में बैठ गया| रात होने तक मुन्ना मेरे
साथ ही रहा, फिर दीदी उसे लेने आईं और मुन्ना फिर से नहीं जाने की जिद्द करने लगा| पर इस बार मैंने उसे बहुत प्यार से दुलार किया और उसे दीदी के हाथों में दे दिया| दीदी जाने लगी तो मैं हाथ हिला कर उसे बाय-बाय करने लगा और वो भी मुझे देख कर पाने नन्हे हाथ हिला कर बाय करने लगा| खाना खा कर लेता पर शराब ने मुझे सोने नहीं दिया, अब तो मेरे लिए ये आफत बन गई थी! मैंने सोच लिया की धीरे-धीरे इसे छोड़ दूँगा क्योंकि अब मेरे पास मुन्ना का प्यार था| पर उन दिनों मेरी किस्मत मुझसे बहुत खफा थी, क्यों ये मैं नहीं जानता पर मुझे लगने लगा था की जैसे वो ये चाहती ही नहीं की मैं खुश रहूँ! अगली सुबह मैं फटाफट उठा और फ्रेश हो कर दरवाजे पर नजरे टिकाये मुन्ना के आने का इंतजार करने लगा| आमतौर पर दीदी 7 बजे आ जाये करती थीं और अभी 9 बजने को आये थे उनका कोई अता-पता ही नहीं था| मन बेचैन हुआ और मैं उन्हें ढूँढता हुआ नीचे आया तो देखा की वहाँ पुलिस खड़ी है, गार्ड से पुछा तो उसने बताया की आज सुबह दीदी का पति उन्हें और मुन्ना को ले कर भाग गया| उसने रात को सेठजी के पैसे चुराए थे और उन्ही ने पुलिस बुलाई थी|
मुझे सेठ के पैसों से कोई सरोकार नहीं था मुझे तो मुन्ना के जाने का दुःख था! भारी मन से मैं ऊपर आया और दरवाजा जोर से बंद किया| शराब की बोतल निकाली और उसे मुँह से लगा कर गटागट पीने लगा| एक साँस में दारु खींचने के बाद मैंने बोतल खेंच कर जमीन पर मारी और वो चकना चूर हो गई, कांच सारे घर में फ़ैल गया था! मैं बहुत जोर से चिल्लाया; "आआआआआआआआआआआआआ!!" और फिर घुटनों के बल बैठ कर रोने लगा| "क्या दुश्मनी है तेरी मुझसे? मैंने कौन सा सोना-चांदी माँगा था तुझसे? तुने 'ऋतू' को मुझसे छीन लिया मैंने तुझे कुछ नहीं कहा, पर वो छोटा सा बच्चा जिससे प्यार करने लगा था उसे भी तूने मुझसे छीन लिया? जरा सी भी दया नहीं आई तेरे मन में? क्या पाप किया है मैंने जिसकी सजा तू मुझे दे रहा है? सच्चा प्यार किया था मैंने!!!! कम से कम उस बच्चे को तो मेरे जीवन में रहने दिया होता! दो दिन की ख़ुशी दे कर छीन ली, इससे अच्छा देता ही ना!" मैं गुस्से में फ़रियाद करने लगा|
update 62
अल्लाह तुझसे, बंदा पूछे..
राह तू दे दे जाना कहा है जाना
अल्लाह तुझसे, बंदा पूछे..
राह तू दे दे जाना कहा है जाना
जाना कहा है जाना
जाना कहा है जाना...
तय थे दिल को ग़म जहाँ पे
मिली क्यों खुशियां वहीँ पे
हाथों से अब फिसले जन्नत
हम तो रहे न कही के
होना जुदा अगर
है ही लिखा
यादों को उसकी
आके तू आग लगा जा
अल्लाह तुझसे, बंदा पूछे..
राह तू दे दे जाना कहा है जाना
अल्लाह तुझसे, बंदा पूछे
तेरी ही मर्ज़ी सारे जहाँ में
तोह ऐसा क्यों जतलाये
ख्वाबों को मेरे छीन कैसे
तू खुदा कहलाये
माँग बैठा
चाँद जो दिल
भूल की इतनी
देता है कोई सजा किया?
अल्लाह तुझसे, बंदा पूछे..
राह तू दे दे जाना कहा है जाना
जाना कहा है जाना…
जाना कहा है जाना
पर वहाँ मेरी फ़रियाद सुनने वाला कोई नहीं था, थी तो बस शराब जो मेरे दिल को चैन और रहत देती थी, एक वही तो थी जिसने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा था! कुछ देर बाद पोलिस और मकान मालिक घर आये और मेरी हालत देख कर पोलिस वाला कुछ पूछने ही वाला था की मकान मालिक बोला; "इंस्पेक्टर साहब ये तो अभी कुछ दिन पहले ही आया है| सीधा-साधा लड़का है!"
"हाँ वो तो इसे देख कर ही पता लग रहा है?! क्या नाम है?" पोलिस वाले ने पुछा| अब मैं इतना भी नशे में नहीं था; "मानु" मैंने बड़ा संक्षेप में जवाब दिया क्योंकि ज्यादा बोलता तो वो पता नहीं और कितने सवाल पूछता|
"तुम संजय या उसकी पत्नी को जानते थे?" उसने सवाल दागा|
"संजय से बस एक बार मिला था और उसकी पत्नी मेरे यहाँ काम करती थी|"
"उसका कोई फ़ोन नंबर है तुम्हारे पास?"
"जी नहीं!"
"दिन में क्यों पीते हो?"
"पर्सनल reason है!" ये सुन कर वो मुझे घूरता हुआ बाकियों से पूछताछ करने लगा| मैंने दरवाजा भेड़ा और बिस्तर पर लेट गया, इधर मेरा फ़ोन बज उठा| मैंने फ़ोन उठाया तो अरुण पूछने लगा की कब आ रहा है? मैंने बस इतना बोला की तबियत ठीक नहीं है और वो समझ गया की मैंने पी हुई है| शाम को वो धड़धड़ाता हुआ मेरे घर आ पहुँचा और जब मैंने दरवाजा खोला तो वो मेरी शक्ल देख कर समझ गया| मैं हॉल में बैठ गया और वो मेरे सामने बैठ गया, "भाई क्या हो गया है तुझे? दो दिन तो तू चक रहा था और अब फिर से वापस उदास हो गया? क्या हुआ?" मैंने कोई जवाब नहीं दिया बीएस सर झुकाये बैठा रहा| तभी उसकी नजर कमरे में बिखरे काँच पर पड़ी और वो बोला; "वो आई थी क्या यहाँ?" मैंने ना में सर हिलाया| "तो ये बोतल कैसे टूटी?" उसने पुछा और तब मुझे ध्यान आया की घर में काँच फैला हुआ है| वो खुद उठा और झाड़ू उठा कर साफ़ करने लगा, मुझे खुद पर बड़ा गुस्सा आया इसलिए मैंने उससे झाड़ू ले लिया और खुद झाड़ू लगाने लगा| "तू ने खाया कुछ?" अरुण ने पुछा तो माने फिर से ना में सर हिलाया और उसने खुद मेरे लिए खाना आर्डर किया| "देख तू कुछ दिन के लिए घर चला जा! मैं भी कुछ दिन के लिए गाँव जा रहा हूँ|" मैं उसकी बात समझ गया था, उसे चिंता थी की उसकी गैरहजरी में मैं यहाँ अकेला रहूँगा तो फिर से ये सब करता रहूँगा और तब मुझे टोकने वाला कोई नहीं होगा| "देखता हूँ!" मैं बस इतना बोला और वापस उसके सामने बैठ गया| "मेरी सास की तबियत खराब है, तेरी भाभी तो पहले ही वहाँ जा चुकी है पर वो अकेले संभाल नहीं पा रही इसलिए कुछ दिन की छुट्टी ले कर जा रहा हूँ|" अरुण ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा| "कुछ जयदा सीरियस तो नहीं?" मैंने पुछा और इस तरह से हमारी बात शुरू हुई| मैंने उसे अपनी बाइक की चाभी दी ताकि वो समय से घर पहुँच जाए वरना बस के सहारे रहता तो कल सुबह से पहले नहीं पहुँचता| "अरे! मैं बस से चला जाऊँगा|" अरुण ने चाबही मुझे वापस
देते हुए कहा| अब मुझे बात बनानी थी इसलिए मैंने कहा; "यार तू ले जा वरना यहाँ कहाँ खड़ी रखूँगा?" मेरी बात सुन कर उसे विश्वास हो गया की मैं भी घर जा रहा हूँ और उसने चाभी ले ली| फिर मैं उसे नीचे छोड़ने के बहाने गया और रात की दारु का जुगाड़ कर वापस आ गया| वापस आया तो खाना भी आ चूका था, अब किसका मन था खाने का पर उसे waste करने का मन नहीं किया| मैं वापस से बालकनी में बैठ गया और अपना खाना और पेग ले कर बैठ गया|
मेरे मन में अब जहर भर चूका था, प्यार का नामोनिशान दिल से मिट चूका था| मन ने ये मान लिया था की इस दुनिया में प्यार-मोहब्बत सब दिखावा है, बस जर्रूरत पूरी करने का नाम है! पर अभी मेरी परेशानियाँ खत्म नहीं हुई थी, रितिका की शादी होनी थी और मुझे घर जाना था| घर अगर नहीं गया तो सब मुझे ढूंढते हुए यहाँ आ जायेंगे और फिर पता नहीं क्या काण्ड हो! घर जा कर मैं ये भी नहीं कह सकता की मैं शादी में शरीक ही नहीं होना चाहता! क्योंकि फिर मुझे उसका कारन बताना पड़ता जो की रितिका के लिए घातक साबित होता| ये ख्याल आते ही दिमाग ने बदला लेने की सोची, "जा के घर में सब सच बोल दे!" मेरे दिमाग ने कहा पर फिर उसका परिणाम सोच कर मन ने मना कर दिया| भले ही मेरा दिमाग रितिका से नफरत करता था पर मन तो अभी अपनी ऋतू का इंतजार कर रहा था| दिमाग और दिल में जंग छिड़ चुकी थी और आखिर नफरत ही जीती! इस जीत को मनाने के लिए मैंने एक लार्ज पेग बनाया और उसे गटक गया| नफरत तो जीत गई पर मेरा दिल हार गया और अब वो अंदर से बिखर चूका था| बस एक लाश ही रह गई थी जिसमें बस दर्द ही दर्द बचा था और उस दर्द की बस एक ही दवा थी वो थी शराब! अब तो बस इसी में डूब जाने का मन था शायद ये ही मुझे किसी किनारे पहुँचा दे|
अगली सुबह में देर से उठा और ऑफिस पहुँचा क्योंकि अरुण के गैरहाजरी में काम देखने वाला कोई नहीं था| अगले दो दिन तक मैंने देर रात तक बैठ कर काम निपटाया और फिर तीसरे दिन मैंने सर से बात की; "सर I'm सॉरी पर मैं अब और ऑफिस नहीं आ सकता! टैक्स रिटर्न्स फाइनल हो चुकी हैं और अरुण वापस आ कर जमा कर देगा| इसलिए प्लीज मैं कल से नहीं आ पाउँगा|" सर ने बटहरी कोशिश की पर मैं नहीं माना और उसी वक़्त सर से अपनी बैलेंस पेमेंट का चेक ले कर पहले बैंक पहुँचा और उसे जमा किया फिर घर आ कर सो गया| जब उठा तो पहले नहाया और जब खुद को आज माने आईने में देखा तो मुझे यक़ीन ही नहीं हुआ की ये शक़्स कौन है? मैं आँखें बड़ी कर के हैरानी से खुद को ही आईने में देखने लगा| वो सीधा-साधा लड़का कहाँ खो गया? उसकी जगह ये कौन है जो आईने में मुझे ही घूर रहा है? मेरी दाढ़ी के बाल इतने बड़े हो गए थे की मैं अब बाबा लगने लगा था| सर के बाल झबरे से थे और जब नजर नीचे के बदन पर गई तो मुझे बड़ा जोर का झटका लगा| गर्दन से नीचे का जिस्म सूख चूका था और मैं हद्द से ज्यादा कमजोर दिख रहा था| मेरी पसलियाँ तक मुझे
दिखने लगीं थी! ये क्या हालत बना ली है मैंने अपनी? क्या यही होता है प्यार में? अच्छा-खासा इंसान इस कदर सूख जाता है?! अब मुझे समझ आने लगा था की क्यों मेरे दोस्त मुझे कहते थे की मैंने अपनी क्या हालत बना ली है?! दिमाग कहने लगा था की सुधर जा और ये बेवकूफियां बंद कर, वो कमबख्त तो तेरा दिल तोड़ चुकी है तू क्यों उसके प्यार के दर्द में खुद को खत्म करना चाहता है| पर अगले ही पल मन ने मुझे फिर से पीने का बहाना दे दिया, "अभी तो उसकी शादी भी होनी है? तब कैसे संभालेगा खुद को?" और मेरे लिए इतनी वजह काफी थी फिर से पीने के लिए| "पुराना वाला मानु अब मर चूका है!" ये कहते हुए मैंने किचन काउंटर से गिलास उठाया और उसमें शराब डाल कर पीने लगा| दोपहर से रात हुई और रात से सुबह.... पर मेरा पीना चालु रहा| जब नींद आ जाती तो सो जाता और जब आँख खुलती तो फिर से पीने लगता, इस तरह से करते-करते संडे आया|
सुबह मेरी नींद पेट में अचानक हुए भयंकर दर्द से खुली, मैं तड़पता हुआ सा उठा और उठ कर बैठना चाहा| बैठने के बाद मैं अपने पेट को पकड़ कर झुक कर बैठ गया की शायद पेट दर्द कम हो पर ऐसा नहीं हुआ| दर्द अब भी हो रहा था और धीरे-धीरे बढ़ने लगा था, मैं उठ खड़ा हुआ और किचन में जा कर पानी पीने लगा| मुझे लगा शायद पानी पीने से दर्द कम हो पर ऐसा नहीं हुआ| मैं जमीन पर लेट गया पर पेट से अब भी हाथ नहीं हटाया था| बल्कि मैं तो लेटे-लेटे ही अपने घुटनों को अपनी छाती से दबाना छह रहा था ताकि दर्द कम हो पर उससे दर्द और बढ़ रहा था| फिर अचानक से मुझे उबकाई आने लगी, मैं फटाफट उठा और बाथरूम में भागा और कमर पकड़ कर उल्टियाँ करने लगा| मुँह से सिर्फ और सिर्फ दारु ही बाहर आ रही थी, खाने के नाम पर सिर्फ चखना या खीरा-टमाटर ही अंदर गए थे जो दारु के साथ बाहर आ गए| करीब 10 मिनट मैं कमोड पर झुक कर खड़ा रहा ताकि और उलटी होनी है तो हो जाये| पर उलटी नहीं आई और अब पेट का दर्द धीरे-धीरे कम हो रहा था| मुँह-हाथ धो कर आ कर मैं जमीन पर बैठ गया, मेरे हाथ-पैर काँपने लगे थे और निगाह शराब की बोतल पर थी| पर दिमाग कह रहा था की और और पीयेगा तो मरेगा! उठ और डॉक्टर के चल| मैं उठा कपडे बदले और परफ्यूम छिड़क कर घर से निकला| ऑटो किया और डॉक्टर के पास पहुँचा, मेरा नम्बर आने तक मैं बैठा-बैठा ऊँघता रहा| जब आया तो डॉक्टर ने मुझसे बीमारी के बारे में पुछा| "सर आज सुबह मेरे पेट में बड़े जोर से दर्द हुआ, उसके कुछ देर बाद उल्टियाँ हुई और अब मेरे हाथ-पैर काँप रहे हैं!" उसने पुछा की मैं कितना ड्रिंक करता हूँ तो मैंने उन्हें सब सच बता दिया| उन्होंने कुछ टेस्ट्स लिखे और सामने वाले Lab में भेज दिया| वहाँ मेरा Ultrasound हुआ, ECG हुआ और X-ray भी हुआ और भी पता नहीं क्या-क्या ब्लड टेस्ट किये उन्होंने! मैं पूरे टाइम यही सोच रहा था की शरीर में कुछ है ही नहीं तो टेस्ट्स में आएगा क्या घंटा! पर जब रिपोर्ट्स
डॉक्टर ने देखि तो वो बहुत हैरान हुआ| "It’s a clear case of fatty liver! You’ll have to stop drinking otherwise you’re very close to develop Cirrhosis of Liver and things will get complicated from there. Your present condition can be controlled and improved.” डॉक्टर ने बहुत गंभीर होते हुए कहा| पर उसकी बात का अर्थ जो मेरे दिमाग ने निकला वो ये था की मैं जल्द ही मरने वाला हूँ पर कितनी जल्दी ये मुझे पूछना था! "Sir if you don’t mind me asking, how much time do I have?” ये सवाल सुन कर डॉक्टर को मेरे मानसिक स्थिति का अंदाजा हुआ और वो गरजते हुए बोला; "Are you out of your mind? This condition of yours can be contained, you’re not gonna die!”
“But what if I don’t stop drinking? Then I’m gonna die right?”
“Tell me why do you wanna die? Is that a solution to whatever crisis you’re going through? Death isn’t a solution, Life is!”
मैं खामोश हो गया क्योंकि उसके आगे मेरे कान कुछ सुनना नहीं चाहते थे| डॉक्टर को ये समझते देर न लगी की I'm going through depression! इसलिए वो अपनी कुर्सी से उठा और मेरी बगल वाली कुर्सी पर बैठ गया और मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए मुझे सांत्वना देने लगा|
“Do you have a family?” मैंने हाँ में सर हिलाया| “Call them here, you need their love and affection. You’ve to understand, you’re slipping into depression and its not good! You need proper medical care, don’t throw your life that easily!” मेरा दिमाग जानता था की डॉक्टर मेरे भले की कह रहा था पर रितिका की बेवफाई मुझे बस अन्धकार में ही रखना चाहती थी| "Thank you doctor!" इतना कह कर मैं उठ गया और उन्होंने मुझे मेरी केस फाइल दे दी| पर हॉस्पिटल से बाहर आते ही शराब की ललक जाग गई और मैं ऑटो पकड़ कर सीधा घर के पास वाले ठेके पर आ गया| वहाँ दारु ले ही रहा था की मेरी नजर एक बोर्ड पर पड़ी, कोई नया पब खुला था जिसका नाम 'मैखाना' था! ये नाम ही मेरे मन उस जगह के बारे में उत्सुकता जगाने के लिए काफी था, ऊपर से जब मैंने नीचे देखा तो वहाँ लिखा था 1 + 1 on IMFL Drinks after 8 PM अब ये पढ़ते ही मेरे मन में आया की आज रात तो कुछ नया ब्रांड try करते हैं! वहाँ से मेरा घर करीब 20 मिनट दूर था तो मैंने ऑटो किया और घर आ गया| अब शराब पीने लगा ही था की पिताजी का फ़ोन आ गया| "कब आ रहा है तू घर?' उन्होंने डाँटते हुए कहा| मैं आगे कुछ कहता उससे पहले ही उनका गुस्सा फुट पड़ा; "मुश्किल से महीना रह गया है, घर पर इतना काम है और तू है की घर तक नहीं भटकता? क्या तकलीफ है तुझे? यहाँ सब बहुत खफा हैं तुझसे!"
"पिताजी .... काम....
" आगे कुछ कहने से पहले ही वो फिर से बरस पड़े; "हरबार तेरी मनमानी नहीं चलेगी! तूने कहा तुझे नौकरी करनी है हमने तुझे जाने दिया, तूने कहा मुझे शादी नहीं करनी हम वहां भी मान गए पर अब घर में शादी है और तू वहाँ अपनी नौकरी पकड़ कर बैठ है? छोड़ दे अगर छुट्टी नहीं देता तेरा मालिक तो! बाद में दूसरी पकड़ लिओ!"
"पिताजी इतनी आसानी से नौकरी नहीं मिलती! ये मेरी दूसरी नौकरी है, पहली वाली मैंने छोड़ दी क्योंकि वो बॉस तनख्वा नहीं बढ़ाता था| मैंने आप को इसलिए नहीं बताया क्योंकि आप मुझे वापस बुला लेटे! अब नई नौकरी है तो इतनी जल्दी छुट्टी नहीं माँग सकता! मैं कल बात करता हूँ बॉस से और फिर आपको बताता हूँ|" मैंने बड़े आराम से जवाब दिया|
"ठीक है! पर जल्दी आ यहाँ बहुत सा काम है!" उन्होंने बस इतना कहा और फ़ोन काट दिया| अब माने बहाना तो बना दिया था पर कल क्या करूँगा यही सोचते-सोचते शाम हो गई, जो जाम मैंने पहले बनाया था उसे पीया और फिर गांजा फूंका और फिर बालकनी में बैठ गया| बैठे-बैठे आँख लग गई और जब खुली तो रात के नौ बज रहे थे| मुझे याद आया की आज तो 'मैखाने' जाना है, मैंने मुँह-हाथ धोया, कपडे पहने और परफ्यूम छिड़क कर ही पैदल वहाँ पहुँच गया| ज्यादा लोग नहीं आये थे, मैं सीधा बार स्टूल पर बैठा और बारटेंडर से 60 ml सिंगल माल्ट मांगी! वहाँ के म्यूजिक को सुन कर मुझे अच्छा लग रहा था, अकेले में शराब पी कर सड़ने से तो ये जगह सही लगी मुझे| मरना ही तो थोड़ा ऐश कर के मरो ना! ये ख्याल आते ही मैंने भी गाने को एन्जॉय करना शुरू कर दिया| एक-एक कर मैंने 10 ड्रिंक्स खत्म की और अब बजे थे रात के बारह और बारटेंडर ने और ड्रिंक सर्वे करने से मना कर दिया| कारन था की मैं बहुत ज्यादा ही नशे में था और मुझसे ठीक से खड़ा ही नहीं जा रहा था| बारटेंडर ने बाउंसर को बुलाया जिसने मुझे साहरा दे कर बाहर छोड़ा और खुद अंदर चला गया| मैं वहाँ ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा था और ऑटो का इंतजार कर रहा था पर कोई ऑटो आ ही नहीं रहा था और जो आया भी वो मेरी हालत देख कर रुका नहीं| अब मुझे एहसास हुआ की घर में पीने का फायदा क्या होता है, वहाँ पीने के बाद कहीं भी फ़ैल सकते हो! मैंने हिम्मत बटोरी और पैदल ही जाने का सोचा, पर अभी मुझे एक सड़क पार करनी थी जो मेरे लिए बहुत बड़ा चैलेंज था| रात का समय था और ट्रक के चलने का टाइम था इसलिए मैं धीरे-धीरे सड़क पार करने लगा| नशे में वो दस फूटा रोड भी किलोमीटर चौड़ी लग रही थी| आधा रास्ता पार किया की एक ट्रक के हॉर्न की जोरदार आवाज आई और मैं जहाँ खड़ा था वहीँ खड़ा हो गया| नशे में आपके बॉडी के रेफ्लेक्सेस काम नहीं करते इसलिए मैं रूक गया था, पर उस ट्रक वाले ने मेरे साइड से बचा कर अपना ट्रक निकाल लिया| आज तो मौत से बाल-बाल बचा था, पर मैं तो पलट के उसे ही गालियाँ देने लगा; "अबे! भोसड़ी के मार देता तो दुआ लगती मेरी बहनचोद साइड से
निकाल कर ले गया!" पर वो तो अपना ट्रक भगाता हुआ आगे निकल गया| मैं फिर से धीरे-धीरे अपना रास्ता पार करने लगा| जैसे-तैसे मैंने रास्ता पार किया और सड़क किनारे खड़ा हो गया, कोई ऑटो तो मिलने वाला था नहीं, न ही फ़ोन में बैटरी थी की कैब बुला लूँ और अब चल कर घर जाने की हिम्मत थी नहीं| मैंने देखा तो कुछ दूर पर एक टूटा हुआ बस-स्टैंड दिखा, सोचा वहीँ रात काट लेता हूँ और सुबह घर चला जाऊँगा| धीरे-धीरे वहाँ पहुँचा पर वहाँ लेटने की जगह नहीं थी बस बैठने भर को जगह थी| मैं अपनी पीठ टिका कर और सड़क की तरफ मुँह कर के बैठ गया और सोने लगा| वहाँ से जो कोई भी गाडी गुजरती उसकी हेडलाइट मेरे मुँह पर पड़ती, पर मैं गहरी नींद सो चूका था| कुछ देर बाद मेरे पास एक गाडी रुकी, गाडी से कोई निकला जिसने मेरा नाम पुकारा; "मानु!" पर मैं तो गहरी नींद में था तो मैंने कोई जवाब नहीं दिया| फिर वो शक़्स मेरे नजदीक आया और अपने फ़ोन की रौशनी मेरे मुँह पर मार कर मेरी पहचान करने लगा| जब उसे यक़ीन हुआ की मैं ही मानु हूँ तो उसने मुझे हिलना शुरू कर दिया| मेरे जिस्म से आती दारु की महक से वो सक्स समझ गया की मैं नशे में टुन हूँ| बड़ी मेहनत से उसने मुझे अपनी गाडी की पिछली सीट पर लिटाया और मेरे पाँव अंदर कर के वो शक़्स चल दिया|
अगली सुबह जब मेरी नींद खुली तो मेरी आँखों के सामने छत थी और मैंने खुद को एक कमरे में बिस्तर पर लेटा हुआ पाया| मैं जैसे ही उठा वो शक़्स जो मुझे उठा कर लाया था वो मेरे सामने था| "आप?" मेरे मुँह से इतना निकला की उन्होंने मेरी तरफ एक कॉफ़ी का मग बढ़ा दिया| ये शक़्स कोई और नहीं बल्कि अनु मैडम थीं|
update 63
"क्या हालत बना रखी है अपनी?" उन्होंने मुझे डाँटते हुए पुछा| पर मैं उन्हें अपने पास देख कर थोड़ा सकपका गया था, मेरा इस वक़्त उनके घर में होना ठीक नहीं था, इसलिए मैं उठा और कॉफ़ी का मग साइड में रखा और जाने लगा| उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और बोलीं; "कहाँ जा रहे हो? बैठो यहाँ और कॉफ़ी पियो!"
"Mam मेरा आपके घर रुकना सही नहीं है| आपके Parents क्या सोचेंगे?" इतना कह कर मैं फिर उठने लगा तो उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और बोलीं; "ये मेरी फ्रेंड का घर है| तुम जरा भी नहीं बदले अब भी बिलकुल जेंटलमैन हो!" उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा और कॉफ़ी वाला मग मुझे दुबारा पकड़ा दिया| मैं चुप-चाप कॉफ़ी पीने लगा और इधर वो कुछ सोचने लगीं की कुछ तो माजरा है जो मेरी ये हालत हो गई है!
'अच्छा अब बताओ क्या बात है? क्यों इस तरह अपनी हालत बना रखी है?" पर मैं खामोश रहा और कॉफ़ी पीने लगा| "ओह! Silent Treatment!!!! नाराज हो मुझसे?" Mam ने फिर से पुछा और मैंने ना में गर्दन हिला दी| फिर मैंने अपना फ़ोन ढूंढ़ने के लिए हाथ मारा तो उन्होंने मेरा 'Charged' फ़ोन मुझे दिया| "कभी फ़ोन भी charge कर लिया करो! या काम में इतने मशरूफ रहते हो की चार्ज करने का टाइम नहीं मिलता|" उन्होंने कहा और अचानक ही मेरे
मुँह से निकला; "जॉब छोड़ दी मैंने!" ये सुनते ही वो चौंक गईं और मुझसे पूछने लगीं; "क्यों?" मैं जाने के लिए उठ के खड़ा हुआ तो उन्होंने एक बार फिर मुझे जबरदस्ती बिठा दिया; "जॉब क्यों छोड़ी?" अब मैं उन्हें कुछ भी नहीं कहना चाहता था क्योंकि मेरी बात सुन कर वो मुझे अपनी हमदर्दी देना चाहती जो में कतई नहीं चाहता था| "मन नहीं था! ... बोर हो गया था!" मैंने झूठ बोला पर उन्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं हुआ, वो मेरे अंदर की झुंझलाहट समझ चुकीं थीं की अगर वो कुछ और पूछेंगी तो मैं उन्हीं पर बरस पडूँगा| इसलिए वो कुछ देर खामोश रहीं| मैं फिर उठा और जाने के लिए बाहर आया ही था की उन्होंने पीछे से कहा; "मुझे कॉल क्यों नहीं किया?" अब ये ऐसा सवाल था जिसके कारन मेरा गुस्सा बाहर आने को उबल पड़ा और मैं बड़ी तेजी से उनकी तरफ पलटा और चिल्लाने को हुआ ही था की मैंने अपने दाहिने हाथ की मुट्ठी तेज बंद की और खुद को चिल्लाने से रोका और दाँत पीसते हुए कहा; "आपने कॉल किया मुझे बैंगलोर जा कर?" ये सुन कर अनु mam का सर झुक गया| "और मैं कॉल करता भी तो किस नंबर पर?" ये कहते हुए मैंने उन्हें अपना व्हाटस अप्प खोल कर दिखाया जिस पर मेरे आखरी के दो happy Birthday वाले मैसेज अब भी उन्हें रिसीव नहीं हुए थे क्योंकि उन्होंने वहाँ जा कर अपना नंबर बदल लिया था| जब mam ने ये मैसेज देखे तो उनकी आँखों में आँसू छलक आये और उन्हें एहसास हुआ की उन्होंने मुझे मेरे बर्थडे तक पर wish नहीं किया था| दरअसल जब मैं उनके पति कुमार के ऑफिस में काम करता था तो मैं और राखी उन्हें उनके जन्मदिन पर Happy Birthday बोला करते थे और उनके बैंगलोर जाने के बाद भले ही मैंने उन्हें कोई कॉल करने की कोशिश नहीं की पर उनके बर्थडे वाले दिन उन्हें मैसेज जर्रूर कर दिया करता था| पहली बार जब मैसेज भेजा तो काफी दिन तक वो उन्होंने read नहीं किया| मैंने सोचा की शायद वो बिजी होंगी या नंबर चेंज कर लिया होगा| फिर भी मैंने उन्हें वो दूसरा मैसेज उन्हें भेजा था ये सोच कर की इतनी दोस्ती तो निभानी चाहिए|
"I’m sorry मानु! मैं वहाँ जा कर अपनी दुनिया में खो गई और तुम्हें कॉल करना ही भूल गई|" Mam ने सर झुकाये हुए कहा|
"Its okay mam...anyway thanks for ... what you did last night ......I hope I didn't misbehave last night.
" मैंने झूठी मुस्कराहट का नक़ाब पहन कर कहा और दरवाजे के पास जाने लगा तो mam ने आ कर मेरे कंधे पर हाथ रख कर फिर से रोक लिया| "ये mam - mam क्या लगा रखा है? पिछली बार मैंने तुम्हें कहा था न की मुझे अनु बोला करो!" mam ने मुस्कुराते हुए कहा|
"Mam दो साल में तो लोग शक़्लें भूल जाते हैं, मैं तो फिर भी आपको इज्जत दे कर mam बुला रहा हूँ!" मेरे तीर से पैने शब्द mam को आघात कर गए पर वो सर झुकाये सुनती रही| उन्हें ऐसे सर झुकाये देखा तो मुझे भी एहसास हुआ की मैंने उन्हें ज्यादा बोल दिया; "sorry!!!" इतना बोल कर मैं वपस जाने को निकला तो वो बोलीं; "चलो मैं तुम्हें drop कर देती हूँ|" इस बार उनके चेहरे पर वही मुस्कान थी जो अभी कुछ देर पहले थी|
"Its okay mam ... मैं चला जाऊँगा|"
"कैसे जाओगे? ऑटो करोगे ना?"
"हाँ"
"तो ऐसा करो वो पैसे मुझे दे देना|" mam ने फिर से मुस्कुराते हुए कहा| मैंने मजबूरन उनकी बात मान ली और उनके साथ गाडी में चल दिया| "दो दिन पहले मैं यहाँ अपने मम्मी-डैडी से मिलने आई थी, पर उन्होंने तो मुझे घर से ही निकाल दिया! अब कहाँ जाती, तो अपनी दोस्त को फ़ोन किया और उससे मदद मांगी| वो बोली की वो कुछ दिनों के लिए बाहर जा रही है और मैं उसकी गैरहाजरी में रह सकती हूँ| कल रात उसे एयरपोर्ट चूड कर आ रही थी जब तुम मुझे उस टूटे-फूटे बस स्टैंड पर बैठे नजर आये| पहले तो मुझे यक़ीन नहीं हुआ की ये तुम हो इसलिए मैंने दो-तीन बार गाडी की हेडलाइट तुम्हारे ऊपर मारी पर तुमने कोई रियेक्ट ही नहीं किया| हिम्मत जुटा कर तुम्हारे पास आई और तुम्हारा नाम लिया पर तुम तब भी कुछ नहीं बोले, फिर फ़ोन की flash light से चेक करने लगी की ये तुम ही हो या कोई और है! 5 मिनट लगा मुझे तुम्हारी इन घनी दाढ़ी और बालों के जंगल के बीच शक्ल पहचानने में, फिर बड़ी मुश्किल से तुम्हें गाडी तक लाई और फिर हम घर पहुँचे|"
"आपको इतना बड़ा रिस्क नहीं लेना चाहिए था|" मैंने कहा|
"कोई और होता तो नहीं लेती, पर वहाँ तुम थे और तुम्हें इस तरह छोड़ कर जाने को मन नहीं हुआ| " Mam ने नजरें चुराते हुए अपने मन की बात कह डाली थी| पर मेरा दिमाग उस टाइम जल्द से जल्द घर पहुँचना चाहता था ताकि मैं फिर से अपनी मेहबूबा को अपने होठों से लगा सकूँ! लगत-राइट करते हुए हम आखिर सोसाइटी के मैन गेट पर पहुँचे और मैन सीट बेल्ट निकाल कर जाने लगा तो mam बोलीं; "अरे! घर के नीचे से ही रफा-दफा करोगे?" अब ये सुन कर मैं फिर से बैठ गया और उनकी गाडी पार्क करवा कर घर ले आया| घर का दरवाजा खुलते ही उसमें बसी गांजे और दारु की महक mam को आई और उन्होंने जल्दी से बालकनी ढूँढी और दरवाजा खोल दिया ताकि फ्रेश हवा अंदर आये| मैन खड़ा हुआ उन्हें ऐसा करते हुए देख रहा था और मुझे इसका जरा भी अंदाजा नहीं था की घर में ऐसी महक भरी हुई है, क्योंकि मेरे लिए तो ये महक किसी इत्र की सुगंध के समान थी| जब mam ने मुझे अपनी तरफ देखते हुए पाया तो मैंने
उनसे नजर बचा कर अपना सर खुजलाना शुरू कर दिया| "यार! सच्ची तुम तो बड़े बेगैरत हो! मेहमान पहली बार घर आया है और तुम उसे चाय तक नहीं पूछते!" Mam ने प्यार भरी शिकायत की| मैन सर खुजलाता हुआ बाथरूम में गया और हाथ-मुँह धो कर उनके लिए चाय बनाने लग गया| इसी बीच mam ने घर का मोआईना करना शुरू कर दिया और मोआईना करते-करते वो मेरे कमरे में जा पहुँची जहाँ उन्हें मेरी मेडिकल रिपोर्ट सामने ही पड़ी मिली| उन्होंने वो सारी रिपोर्ट पढ़ डाली और उनकी आँखें नम हो गईं, तभी मैंने उन्हें किचन से आवाज दी; "mam चाय!" अनु mam ने अपने आँसू पोछे और वो बाहर आ गईं और अपने चेहरे पर हँसी का मुखौटा पहन कर बैठ गईं| "चाय तो बढ़िया बनाई है?" उन्होंने मेरी झूठी तारीफ की|
"बुराइयाँ कितनी भी बुरी हों, सच्ची होती हैं...
झूठी तारीफों से तो सच्ची होती हैं!" मेरे मुँह से ये सुन कर mam मेरी तरफ देखने लगीं और अपने दर्द को छुपाने के लिए बोलीं; "क्या मतलब?"
"मतलब ये की चाय में दूध तक नहीं और आप चाय अच्छी होने की तारीफ कर रही हैं!"
"चाय, शायरी, और तुम्हारी यादें
भाते बहुत हो, दिल जलाते बहुत हो" Mam के मुँह से ये सुन कर मैन आँखें फाड़े उन्हें देखने लगा की तभी उन्होंने बात घुमा दी; "अच्छा… एक अरसा हुआ लखनऊ घूमे हुए! चलो आज घूमते हैं!"
"Mam मैं तो यहीं रहता हूँ, बाहर से तो आप आये हो! आप घूमिये मैं तो यहाँ सब देख चूका हूँ, यहाँ के हर रंग से वाक़िफ़ हूँ!"
"Oh come on यार! मैं अकेली कहाँ जाऊँगी? तुम सब जगह जानते हो तो आज मेरे guide बन जाओ, घर बैठ कर ऊबने से तो बेहतर है|"
"Mam मेरा जरा भी मन नहीं है, मुझे बस सोना है!" मैंने मुँह बनाते हुए कहा पर वो मानने वाली तो थी नहीं!
"जब तक यहाँ हूँ तब तक तो मेरे साथ घूम लो, मेरे जाने के बाद जो मन करे वो करना|" मैंने मना करने के लिए जैसे ही मुँह खोला की वो जिद्द करते हुए बोली; "प्लीज...प्लीज...प्लीज....प्लीज...प्लीज....
प्लीज!!!" मैं सोच में पड़ गया क्योंकि मन मेरा शराब पीना चाहता था और दिमाग कह रहा था की बाहर चलते हैं| एक बार तो मन ने कहा की एक पेग पी और फिर mam के साथ चला जा पर दिमाग कह रहा था की ये ठीक नहीं होगा! आखिर बेमन से मैंने mam को बाहर बैठने को कहा और मैं नहाने चला गया| ठन्डे-ठन्डे पानी की बूँदें जब जिस्म पर पड़ी तो जिस्म में अजीब सी ऊर्जा का संचार हुआ एक पल के लिए लगा जैसे वही पुराना मानु ने जागने के लिए आँख खोली हैं पर दर्द ने उसे पिंजरे में कैद कर रखा था और उसे बाहर नहीं जाने देना चाहता था| मैं आज रगड़-रगड़ कर नहाया और आज फेस-वाश भी लगाया, साबुन की खुशबु से नहाया हुआ मैं बाहर निकला| मैंने बनियान और नीचे टॉवल लपेटा हुआ था और मेरे सामने Mam शर्ट-जीन्स ले कर खड़ी थीं| मुझे ये देख कर थोड़ी हैरानी हुई की mam ने मेरे लिए खुद कपडे निकाले थे पर मैंने उस बात पर जयदा ध्यान नहीं दिया क्योंकि मुझे अब जयदा चीजें affect नहीं करती थीं! मैं तैयार हुआ, दाढ़ी में कंघी मार कर उसे सीधा किया और बाल चूँकि बहुत लम्बे थे तो उन्हें पीछे की तरफ किया| जैसे ही बाहर आया तो Mam मुझे बड़े गौर से देख रहीं थी, उनका मुझे इस तरह देखने से पता नहीं कैसे मेरे चेहरे पर मुस्कराहट ले आया;
“My eyes were on him, when his shiny black hairs, thick black beard, beautiful brown eyes, red cheeks and the pleasant smile made me realize how colorful he was!”
Mam के मुँह से अपनी ये तारीफ सुन कर मैं चौंक गया था क्योंकि मेरी नजर में मैं अब वो मानु नहीं रहा था जो पहले हुआ करता था|
"धीरे-धीरे ज़रा ज़रा सा निखरने लगा हूँ मैं
लगता हैं उस बेवफ़ा के जख्मों से उबरने लगा हूँ मैं" मुझे नहीं पता उस समय क्या हुआ की ये शब्द मेरे मुँह से अपने आप ही निकले| Mam ने इन शब्दों को बड़े घ्यान से सुना था पर उन्होंने इसे कुरेदा नहीं, क्योंकि वो जानती थी की मैं उदास हो कर बैठ जाऊँगा और फिर कहीं नहीं जाऊँगा| उन्होंने ऐसे जताया जैसे की कुछ सुना ही ना हो और बोली; "चलो जल्दी!" मैंने भी उनकी बात का विश्वास कर लिया और उनके साथ चल दिया| "तो पहले थोड़ा नाश्ता हो जाए?" Mam ने कहा, पर मुझे भूख नहीं थी इसलिए मैंने सोचा वहाँ जा कर मैं खाने से मना कर दूँगा| Mam ने सीधा अमीनाबाद का रुख किया, गाडी पार्क की और टुंडे कबाबी खाने के लिए चल दीं| पूरे रस्ते वो पटर-पटर बोलती जा रही थीं, मेरा ध्यान आस-पास की दुकानों और लोगों पर बंट गया था| दूकान पहुँच कर मैं उनके लिए एक प्लेट टुंडे कबाबी और रुमाली रोटी लाया तो वो मेरी तरफ हैरानी से देखने लगीं और बोलीं: "ये तो मैं अकेली खा जाऊँगी! तुम्हारी प्लेट कहाँ है?"
"मेरा मन नहीं है...आप खाओ|" मैंने मना करते हुए कहा|
"ठीक है....
मैं भी नहीं खाऊँगी!" ऐसा कहते हुए उन्होंने एकदम से मुँह बना लिया|
"Mam प्लीज मत कीजिये ऐसा!" मैंने रिक्वेस्ट करते हुए कहा|
"अगर मुझे अकेले खाने होते तो मैं तुम्हें क्याहैं क्यों लाती? इंसान को कभी-कभी दूसरों की ख़ुशी के लिए भी कुछ करना चाहिए!" Mam ने उदास होते हुए कहा| "अच्छा एक बाईट तो ले लो|" इतना कहते हुए Mam ने अपनी प्लेट मेरी तरफ बढ़ा दी| मैंने हार मानते हुए एक बाईट ली और बाकी का उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी खाया|
"नेक्स्ट स्टॉप रेजीडेंसी!" ये कहते हुए Mam ने गाडी स्टार्ट की, पूरी ड्राइव के समय मैं बस इधर-उधर देखता रहा क्यों की मन में शराब की ललक भड़कने लगी थी| जब भी कोई ठेका दिखता तो मन करता की यहीं उतर जा और शराब ले आ, पर Mam के साथ होने की वजह से मैं खामोश रहा और अपनी ललक को पकड़ के उसे शांत करने लगा| शायद Mam भी मेरी बेचैनी भाँप गई थी इसलिए अब जब भी मेरी गर्दन ठेके की तरफ घूमती तो वो मेरा ध्यान भंग करने के लिए कुछ न कुछ बात शुरू कर देतीं| किसी तरह से हम रेजीडेंसी पहुँचे और वहाँ घूमने लगे और वहाँ भी mam चुप नहीं हुईं और मुझे अपने बैंगलोर के घर के बारे में बताने लगी| बैंगलोर का नाम सुनते ही मेरा मन दुखने लगा और एक बार फिर अनायास ही मेरे मुँह से कुछ शब्द निकले;
"इन अंधेरों से मुझे कहीं दूर जाना था...
तुम्हारे साथ मुझे अपना एक सुन्दर आशियाना बसना था..."
ये सुन कर mam एक दम से चुप हो गईं और मुझे भी एहसास हुआ की मुझे ये सब नहीं कहना चाहिए था| माने इधर-उधर देखना शुरू किया और मजबूरन बहाना बनाना पड़ा; "Mam ... भूख लगी है!" ये सुनते ही उनके चेहरे पर ख़ुशी आ गई; "नेक्स्ट स्टॉप इदरीस की बिरयानी!!!" दोपहर के दो बजे हम बिरयानी खाने पहुँचे और मैंने अपने लिए हाफ और मम के लिए फुल प्लेट बिरयानी ली| मेरा तो फटाफट खाना हो गया पर mam अभी भी खा रही थीं| मैं पानी की बोतल लेने गया और मेरे जाते ही वहाँ सिद्धार्थ अपने ऑफिस के colleague के साथ वहाँ आ गया|
सिद्धार्थ: Hi mam!!!
अनु Mam: Hi सिद्धार्थ, so good to see you! यहाँ लंच करने आये हो?
सिद्धार्थ: जी mam!!!
अनु Mam: और अब भी वहीँ काम कर रहे हो?
सिद्धार्थ: नहीं mam ...सर ने काम बंद कर दिया था, मैंने दूसरी जगह ज्वाइन कर लिया और मानु ने अपने ही ऑफिस में अरुण को लगा लिया|
अब तक सिद्धार्थ का colleague आर्डर करने जा चूका था और mam को उससे बात करने का समय मिल गया|
अनु Mam: सिद्धार्थ ... If you don’t ind me asking, मानु को क्या हुआ है? मैं उससे कल रात मिली और उसकी हालत मुझसे देखि नहीं जाती! वो बहुत बीमार है, Fatty liver, Depression, Abdomen pain, loss of appetite...I hope तुमने उसे देखा होगा? वो बहुत कमजोर हो चूका है!
सिद्धार्थ: Mam वो चूतिया हो गया है!
सिद्धार्थ ने गुस्से में कहा और फिर उसे एहसास हुआ की उसने mam के सामने ऐसा बोला इसलिए उसने उनसे माफ़ी मांगते हुए बात जारी रखी;
सिद्धार्थ: सॉरी mam .... मुझे ऐसा...
अनु Mam: Its okay सिद्धार्थ, I can understand! (mam ने सिद्धार्थ की बात काटते हुए कहा|)
सिद्धार्थ: He was in love with Ritika, अब पता नहीं दोनों के बीच में क्या हुआ? ये साला देवदास बन गया! मैंने और अरुण ने इसे बहुत समझाया पर किसी की नहीं सुनता, सारा दिन बस शराब पीटा रहता है, अच्छी खासी जॉब थी वो भी छोड़ दी! अब आप बता रहे हो की ये इतना बीमार है, अब ये किसी की नहीं सुनेगा तो पक्का मर जायेगा|
अनु Mam: तो उसके घर वाले?
सिद्धार्थ: उन्हें कुछ नहीं पता, ये घर ही नहीं जाता बस उनसे फ़ोन पर बात करता है| अरुण बता रह था की बीच में दो दिन ये बहुत खुश था पर उसके बाद फिर से वापस दारु, गाँजा!
इतने में मैं पानी की बोतल ले कर आ गया|
सिद्धार्थ: और देवदास?
ये सुनते ही मैं उसे आँखें दिखने लगा की mam के सामने तो मत बोल ऐसा| पर वो मेरे बहुत मजे लेता था;
सिद्धार्थ: तू mam के साथ आया है?
मैं: हाँ... आजकल मैं गाइड की नौकरी कर ली है|
मैंने माहौल को हल्का करते हुए कहा, पर वो तो mam के सामने मेरी पोल-पट्टी खोलने को उतारू था;
सिद्धार्थ: चलो अच्छा है, कम से कम तू अपने जेलखाने से तो बाहर निकला|
मैंने उसे फिर से आँख दिखाई तो वो चुप हो गया|
मैं: चलें mam?!
अनु mam: चलते हैं.... पहले जरा तुम्हारी रिपोर्ट तो ले लूँ सिद्धार्थ से!
पर तभी उसका colleague आ गया और सिद्धार्थ ने मुझे उससे introduce कराया;
सिद्धार्थ: ये है मेरा भाई जो साला इतना ढीढ है की मेरी एक नहीं सुनता!
ये सुन कर सारे हंस पड़े पर अभी उसका मुझे धमकाना खत्म नहीं हुआ था;
सिद्धार्थ: बेटा सुधर जा वरना अब तक मुँह से समझाता था, अब मार-मार के समझाऊँगा?"
मैं: छोटे भाई पर हाथ उठाएगा?
और फिर सारे हँस पड़े| Mam का खाना खत्म होने तक हँसी-मजाक चलता रहा और मैं भी उस हँसी-मजाक में हँसता रहा| काफी दिनों बाद मेरे चेहरे पर ख़ुशी दिखाई दे रही थी जिसे देख Mam और सिद्धार्थ दोनों खुश दिखे|
विदा ले कर मैं और mam चलने को हुए तो सिद्धार्थ ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और अचानक से मेरे गले लग गया| भावुक हो कर वो कुछ बोलने ही वाला था की mam ने पीछे से अपने होठों पर ऊँगली रख कर उसे चुप होने को कहा| सिद्धार्थ ने बात समझते हुए धीरे से मेरे कान में बुदबुदाते हुए कहा; "भाई ऐसे ही मुस्कुराता रहा कर! तेरी हँसी देखने को तरस गया था!" उसकी बात दिल को छू गई और मैं भी थोड़ा रुनवासा हो गया; "कोशिश करता हूँ यार!" फिर हम अलग हुए और वो ऑफिस की तरफ चल दिया और मैं अपने आँसुओं को पूछने के लिए रुम्मल ढूँढने लगा, तो एहसास हुआ की मेरी आँखों का पानी मर चूका है| दर्द तो होता है बस वो बाहर नहीं आता और अंदर ही अंदर मुझे खाता जा रहा है|
Mam ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे बिना कुछ बोले पार्किंग की तरफ ले जाने लगीं| मैं भी बिना कुछ बोले अपने जज्बातों को फिर से अपने सीने में दफन कर उनके साथ चल दिया| अब mam भी चुप और मैं भी चुप तो मुझे कुछ कर के उन्हें बुलवाना था
ताकि मेरे कारन उनका मन खराब न हो| "तो नेक्स्ट स्टॉप कहाँ का है mam?" मैंने पुछा तो वो कुछ सोचने लगी और बोलीं; "हज़रतगंज मार्किट!!!"
............और इस तरह हम शाम तक टहलते रहे, रात हुई और Mam ने जबरदस्ती डिनर भी करवाया और फिर हम वापस गाडी के पास आ रहे थे की मेरे पूरे जिस्म में बगावत छिड़ गई! मेरे हाथ-पेअर कांपने लगे थे और उन्हें बस अपनी दवा यानी की दारु चाहिए थी| मैं mam से अपनी ये हालत छुपाते हुए चल रहा था, गाडी में बैठ कर अभी कुछ दूर ही गए होंगे की mam को शक हो गया; "Are you alright?" उन्होंने पुछा तो मैंने ये कह कर टाल दिया की मैं बहुत थका हुआ हूँ| फिर आगे उन्होंने और कुछ कहा नहीं और मुझे सोसाइटी के गेट पर छोड़ा; "अच्छा मैं तो तुम्हें एक बात बताना ही भूल गई, Palmer Infotech याद है ना?”
मैंने हाँ में सर हिलाया| "मेरी उनसे एक प्रोजेक्ट पर बात चल रही थी जिसके सिलसिले में 'हमें' New York जाना है|"
"हम?" मैंने चौंकते हुए कहा|
"हाँ जी... हम! लास्ट प्रोजेक्ट पर तुमने ही तो सारा काम संभाला था!"
"पर mam...." मेरे आगे कुछ कहने से पहले ही उन्होंने मेरे सामने हाथ जोड़ दिए;
"मानु प्लीज मान जाओ! देखो मैं इतना बड़ा प्रोजेक्ट नहीं संभाल सकती!"
"mam .... मैं सोच कर कल बताता हूँ|"
"ok ... तो कल सुबह 10 बजे तैयार रहना!"
"क्यों?" मैंने फिर से चौंकते हुए पुछा|
"अरे यार! लखनऊ घुमाना है ना तुमने!" इतना कह कर वो हँसने लगी, मैं भी उनके इस बचपने पर हँस दिया और Good Night बोल कर घर आ गया| घर घुसते ही मैंने सबसे पहले बोतल खोली और उसे अपने मुँह से लगा कर पानी की तरह पीने लगा, आधी बोतल खींचने के बाद मैं अपनी पसंदीदा जगह, बालकनी में बैठ गया| अब मेरा जिस्म कांपना बंद हो चूका था और अब समय था अभी जो mam ने कहा उसके बारे में सोचने की| आज 31 अक्टूबर था, 25 नवंबर को दिवाली और 27 नवंबर को रितिका की शादी थी, मुझे कैसे न कैसे इस शादी में शरीक नहीं होना था! तो अगर मैं mam की बात मान लूँ तो मुझे विदेश जाना पड़ेगा और मैं इस शादी से बच जाऊँगा! ......
पर घर वाले मानेंगे? ये ख़याल आते ही मैं सोच में पड़ गया| इस बहाने के अलावा मेरे जहन में कोई और बहाना नहीं था, जो भी हो मुझे इसी बहाने को ढाल बना कर ये लड़ाई लड़नी थी| मन को अब थोड़ा चैन मिला था की अब मुझे इस शादी में तो शरीक नहीं होना होगा इसलिए उस रात मैंने कुछ ज्यादा ही पी| अगली सुबह किसी ने ताबड़तोड़ घंटियां बजा कर मेरी नींद तोड़ी! मैं गुस्से में उठा और दरवाजे पर पहुँचा तो वहाँ मैंने अनु mam को खड़ा पाया| उनके हाथों में एक सूटकेस था और कंधे पर उनका बैग, मुझे साइड करते हुए वो सीधा अंदर आ गईं और मैं इधर हैरानी से आँखें फाड़े उन्हें और उनके बैग को देख रहा था| "मेरी फ्रेंड और उसके हस्बैंड आज सुबह वापस आ गए तो मुझे मजबूरन वहाँ से निकलना पड़ा| अब यहाँ मैं तुम्हारे सिवा किसी को नहीं जानती तो अपना समान ले कर मैं यहीं आ गई|" मैं अब भी हैरान खड़ा था क्योंकि मैं नहीं चाहता था की मेरे इस place of solitude में फिर कोई आ कर अपना घोंसला बनाये और जाते-जाते फिर मुझे अकेला छोड़ जाए| "क्या देख रहे हो? मैंने तो पहले ही बोला था न की If I ever need a place to crash, I'll let you know! ओह! शायद मेरा यहाँ आना तुम्हें अच्छा नहीं लगा?" इतना कह कर वो जाने लगीं तो मैंने उनके सूटकेस का हैंडल पकड़ लिया| "आप मेरे वाले कमरे में रुक जाइये मैं दूसरे वाले में सो जाऊँगा|" फिर मैंने उनके हाथ से सूटकेस लिया और अपने कमरे में रखने चल दिया| मुझे जाते हुए देख कर mam पीछे से अपनी चतुराई पर हँस दीं उन्होंने बड़ी चालाकी से जूठ जो बोला था!
update 64
मैं अपना समान बटोरने लगा था की तभी mam अंदर आईं और बोलीं; "कपडे ही तो हैं? पड़े रहने दो....
हाँ अगर कुछ पोर्न वाली चीजें हैं तो अलग बात है!" Mam ने जिस धड़ल्ले से पोर्न कहा था उसे सुन कर मेरी हवा टाइट हो गई! मुझे ऐसे देख कर mam ने ठहाका मार के हँसना शुरू कर दिया, इसी बहाने से मेरी में हँसी निकल गई| मैंने अपने कपडे छोड़ दिए बस शराब की बोतले उठा कर बाहर निकलने लगा| मेरे हाथ में बोतल देख कर mam की हँसी गायब हो गई और उदासी फिर से उनके चेहरे पर लौट आई| पर मैं इस बात से अनजान दूसरे कमरे में आ गया, इस कमरे में बस एक गद्दा पड़ा था| मैंने सारी खाली बोतलें डस्टबिन में डालीं और दो खाली बोतलें अपने सिरहाने रखी| इधर mam ने किचन में खाने लायक चीजें देखनी शुरू कर दी, मैं अपने गद्दे पर चादर बिछा रहा था की mam दरवाजे पर अपनी कमर पर हाथ रख कर खड़ी हो गईं; "तुम कुछ खाते-वाते नहीं हो? किचन में चायपत्ती और कुछ नमकीन के आलावा कुछ है ही नहीं!" अब में उन्हें क्या कहता की मैं तो सिर्फ दारु पीता हूँ! 'चलो get ready, कुछ ग्रोसरी का समान लाते हैं|" अब मेरा मन घर से बाहर जाने का कतई नहीं था, तो मैंने अपने फ़ोन में app खोल कर उन्हें दे दिया और मैं करवट ले कर लेट गया| मैंने ये तक नहीं सोचा की उस फ़ोन में मेरी और रितिका की तसवीरें हैं! Mam फ़ोन ले कर बाहर चली गईं और ग्रोसरी का समान आर्डर कर दिया, फिर उन्होंने फ़ोन गैलरी में photos देखनी शुरू कर दी| मेरा फोन मैने आज तक कभी किसी को नहीं दिया था इसलिए फ़ोन में किसी भी app पर लॉक नहीं था| Mam ने सारी तसवीरें देखि, इधर जैसे ही मुझे होश आया की mam फोटोज न देख लें तो में फटाफट बाहर आया और देखा mam ग्रोसरी की पेमेंट वाले पेज पर पिन नंबर एंटर कर रहीं थी| मैं उनके पीछे चुप-चाप खड़ा रखा और जब उन्होंने पेमेंट कर दी तो मैंने उनसे फ़ोन माँगा| "क्यों डर रहे हो? फ़ोन में पोर्न छुपा रखा है क्या?" Mam ने मजाक करते हुए कहा तो फिर से मेरे चेहरे पर मुस्कराहट आ गई| मैं दुबारा सोने जाने लगा तो mam ने रोक लिया; "यार कितना सोओगे? रात में कहीं चौकीदारी करते हो? चलो बैठो यहाँ मैं चाय बनाती हूँ|" मैं चुप-चाप बालकनी में फर्श पर बैठ गया| ठंड का आगाज हो चूका था और हवा में अब हलकी-हलकी ठंडक महसूस की जा सकती थी और मैं इसी ठंडक को महसूस कर हल्का सा मुस्कुरा दिया| मैंने दोनों हाथों से कप पकड़ा और mam भी मेरे सामने ही अपनी चाय ले कर बैठ गईं| "तो क्या सोचा New York जाने के बारे में?" Mam ने चाय की चुस्की लेते हुए पुछा| ये याद आते ही मैं बहुत गंभीर हो गया और mam समझ गईं की मैं मना कर दूँगा, इसलिए mam का चेहरा मुरझा गया; "कब जाना है?" मैंने थोड़ा मुस्कुराते हुए कहा तो mam के चेहरे पर ख़ुशी फिर से लौट आई| "20 नवंबर को पहले बैंगलोर जाना है, वहाँ से मुझे अपना समान लेना है और फिर वहाँ से मुंबई और फिर फाइनल स्टॉप New York!" Mam ने excited होते हुए कहा और उनके चेहरे की ख़ुशी मुझे सुकून देने लगी थी| ऐसा लगा मानो किसी अपने को ख़ुशी दे रहा हूँ और उनकी ख़ुशी से
मुझे भी ख़ुशी होने लगी|
कुछ देर बाद ग्रोसरी का सारा समान आ गया, इतना समान अपने सामने मैं कई दिनों बाद देख रहा था| मैं उठ कर नहाने गया और mam ने किचन संभाल लिया, नहा के आते-आते उन्होंने नाश्ता बना लिया था| Mam ने एक प्लेट में आधा परांठा मुझे परोस कर दिया| "Mam मुझे भूख नहीं लगती, आप क्यों मेरे लिए तकलीफ उठा रहे हो! आप खाइये!"
"क्या भूख नहीं लगती? अपनी हालत देखि है? अच्छी खासी body थी और तुमने उसकी रैड मार दी है! कहीं मॉडलिंग करने जाना है जो weight loss कर रहे हो?!" Mam ने प्यार से मुझे डाँटा और एक बार फिर मेरी हँसी निकल गई| दरअसल ये Mam का game प्लान था, मुझे इस तरह छेड़ना और प्यार से डाँटना ताकि मैं थोड़ा मुस्कुराता रहूँ, पर मैं उनके इस game plan से अनविज्ञ था! मैंने परांठे का आधा हिस्सा Mam को दे दिया और बाकी का हिस्सा ले कर मैं वापस बालकनी में बैठ गया| Mam भी अपना परांठा ले कर मेरे पास बैठ गईं और मुझे Project के बारे में बताने लगी, इस बार मैं बड़े गौर से उनकी बातें सुन रहा था| "वैसे हम जा कितने दिन के लिए रहे हैं?" मैंने पुछा तो उन्होंने 20 दिन कहा और मैं उसी हिसाब से सोचने लगा की घर पर मुझे कितने दिन का बताना है| "और expenses?" मैंने पुछा क्योंकि मेरे पास सवा चार लाख बचे थे, और बाकी मैं शराब और नए फ्लैट के चक्कर में फूँक चूका था! "उसकी चिंता मत करो वो सब reimbursed हो जायेगा!"
इसके अलावा मैंने उनसे कुछ नहीं पुछा| नाश्ते के बाद हम इधर-उधर की बातें करते रहे और लैपटॉप पर कुछ डिस्कशन करने लगे| तभी mam के लैपटॉप की बैटरी डिस्चार्ज हो गई और उन्होंने मुझसे मेरा लैपटॉप माँगा और उस पर वो मुझे कुछ साइट्स दिखाने लगीं जिनके साथ उन्होंने थोड़ा-थोड़ा काम किया था| मैं दो मिनट के लिए गया तो mam ने मेरा लैपटॉप सारा चेक कर मारा और उन्हें वो सब bookmarks चेक कर लिए जो मैंने मार्क किये थे रेंट पर घर लेने के लिए, साथ ही उन्होंने job opening भी देख ली थीं और वो अब धीरे-धीरे सब समझने लगी थीं| जो वो नहीं समझ पाईं थी वो था मेरा और ऋतू का रिश्ता! मेरे वापस आने तक उन्होंने साड़ी windows close कर दी थी और उन्हें history से भी डिलीट कर दिया था! जब मैं वापस आया तो mam ने फिर से मेरी टाँग खींचते हुए कहा; "यार तुम तो बढ़िया वाली पोर्न देखते हो?" ये सुनते ही मैं चौंका क्योंकि कई महीनों से पोर्न देखा ही नहीं था| "नहीं तो! बड़े दिन हुए......
" इतना मुंह से निकला और मुझे एहसास हुआ की मैंने कुछ जयदा बोल दिया| Mam मेरा रिएक्शन देख कर जोर-जोर से हँसने लगी, उनकी देखा-देखि मेरी भी हँसी निकल गई| दोपहर हुई और Mam ने खाना बना दिया और मुझे आवाज दी, हम दोनों अपनी-अपनी प्लेट ले कर फिर वहीँ बैठ गए| मैंने बड़ी मुश्किल से एक रोटी खाई और जैसे ही मैं उठने को हुआ तो मम ने मेरा हाथ पकड़ कर वापस बिठा दिया| "हेल्लो मिस्टर इतनी मन मनाई नहीं चलेगी, चुप कर के दो रोटी और खाओ! सुबह भी आधा परांठा खाया है और अब बस एक रोटी?!" Mam ने फिर से प्यार से मुझे डाँटा|
"Mam क्या करूँ इतना प्यार भरा खाना खाने की आदत नहीं है!" मुझे नहीं पता की मेरे मुँह से ये क्यों निकला, शायद ये Mam का असर था जो मुझ पर अब दिखने लगा था|
"तो आदत डाल लो!" Mam ने हक़ जताते हुए कहा और मैं भौएं सिकोड़ कर हैरानी से उनकी तरफ देखने लगा| उनका ये कहना की आदत डाल लो का मतलब क्या था? तभी Mam ने मेरा ध्यान भंग करने को एक रोटी और परोस दी| चूँकि मैंने अभी पी नहीं थी इसलिए अब दिमाग बहुत ज्यादा अलर्ट था और आज सुबह से जो हो रहा था उसका आंकलन करने लगा था| मैं सर झुका कर चुप-चाप खान खाने लगा, Mam का खाना हो चूका था इसलिए वो मुझसे नजरें चुराती हुई चली गईं| मेरा दिल अब किसी और को अपने नजदीक नहीं आने देना चाहता था, फिर New York वाले trip के बाद उन्होंने बैंगलोर चले जाना था और मैंने फिर वापस यहीं लौट आना था तो फिर इतनी नजदीकियाँ क्यों? ये दूसरीबार था जब mam मेरे नजदीक आना चाहती थीं, पहली बार तब था जब हम मुंबई में थे और मैंने उन्हें अपने गाँव के रीती-रिवाज के डर की आड़ में उन्हें अपने नजदीक नहीं आने दिया था| इस बार भी मुझे फिर उसी डर का सहारा लेना था ताकि वो मेरे चक्कर में अपनी जिंदगी बर्बाद ना करें और मैं यहाँ अकेला चैन से घुट-घुट कर मरता रहूँ| मैंने सोचा अगली बार उन्होंने मुझे ऐसा कुछ कहा तो मैं उन्हें समझा दूँगा| अगर मुन्ना मेरी जिंदगी में नहीं आया होता तो शायद मैं mam की तरफ बह जाता पर मुन्ना के आने के बाद मैंने एक बहुत जरुरी सबक सीखा था! मैं अभी इसी उधेड़-बन में था की mam मेरी प्लेट लेने आ गई, पर मैंने उन्हें अपनी प्लेट नहीं दी बल्कि खुद उठा कर किचन में चल दिया| वहाँ से निकल कर मैंने देखा तो mam बालकनी में बैठीं थी और उनकी आँखें बंद थीं| मुझे लगा वो सो रही हैं, इसलिए मैं अपने कमरे में चला गया| कमरे में मेरे सिरहाने पड़ी बोतल पर ध्यान गया तो सोचा की एक घूँट पी लेता हूँ पर ख्याल आया की mam यहाँ हैं, ऐसे में मेरा पीना उन्हें uncomfortable महसूस करवाएगा| पर अब कुछ तो नशा चाहिए था, क्योंकि मेरे हाथ-पेअर थोड़ा कांपने लगे थे! इसलिए मैंने सिगेरट और माल उठाया और चुप-चाप छत पर आ गया| वहाँ बैठ कर मैंने मालभरा और तसल्ली से सिगरेट पी और वहीँ दिवार से पीठ लगा कर बैठ गया| शाम के 4 बजे मैं नीचे आया तो mam अब भी वैसे ही सो रही थीं
बस ठंड के कारण वो थोड़ा सिकुड़ीं हुई थीं| मैंने अंदर से एक चादर निकाली और उन पर डाल दी, फिर मैं चाय बनाने लगा| चाय की खुशबु सूंघ कर मम अंगड़ाई लेते हुए उठीं| जान क्यों पर उन्हें ऐसे अंगड़ाई लेते देख मुझे रितिका की याद आ गई| मैं दोनों हाथों में चाय का कप पकडे वहीँ रुक गया, अब तक mam ने मुझे देख लिया था इसलिए वो खुद आईं और मेरे हाथ से चाय का कप ले लिया|
शायद mam ये भाँप गई थीं की मैं उनकी दोपहर की बात का बुरा मान चूका हूँ, इसलिए हम दोनों में फिलहाल कोई बात नहीं हो रही थी| रात का खाना बनाने के बहाने से mam ने बात शुरू की; "मानु रात को खाने में क्या बनाऊँ?"
"बाहर से मंगा लेते हैं!" मैंने कहा और फ़ोन पर देखने लगा की उनके लिए क्या मँगाऊँ? पर mam बोलीं; "क्यों मेरे हाथ का खाना पसंद नहीं आया तुम्हें?"
"ऐसी बात नहीं है mam .... आप यहाँ खाना बनाने थोड़े ही आये हो!" मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा|
"पर मैंने लोबिया भिगो दिए थे!" Mam ने मुँह बनाते हुए कहा, ये सुनकर मैं जोर से हँस पड़ा| उन्हें समझ नहीं आया की मैं क्यों हँस रहा हूँ पर मुझे हँसता हुआ देख वो बहुत खुश थीं|
"Mam जब आपने पहले से लोबिया भिगो दिए थे तो आपने पुछा क्यों की क्या बनाऊँ?" ये सुन कर mam को पता चला की मैं क्यों हँस रहा था और अब उन्होंने अपना माथा पीटते हुए हँसना शुरू कर दिया|
"बिलकुल मम्मी की तरह!" इतना कहते हुए उनकी हँसी गायब हो गई और सर झुका कर वो उदास हो गईं| उनकी आँख से आँसू का एक कटरा जमीन पर पड़ा, मैं एक दम से उठा और उनके कंधे पर हाथ रख कर उन्हें सांत्वना देने लगा| फिर मैंने उनका हाथ पकड़ा और उन्हें कुर्सी पर बिठाया|
“क्या किसी इंसान को खुश होने का हक़ नहीं है? स्कूल से ले कर शादी तक मैंने वो हर एक चीज की जो मेरे मम्मी-डैडी ने चाही| Tenth के बाद मुझे साइंस लेनी थी पर मम्मी-डैडी ने कहा कॉमर्स ले लो, फिर मुझे DU जाना था तो मुझे करेकपॉन्डेंस में एडमिशन दिलवा दिया ये बोल कर की कौन सा तुझे जॉब करनी है! उसके बाद सीधा शादी के लिए मेरे सामने एक लड़का खड़ा कर दिया और कहा की ये तेरा जीवन साथी है| मैंने वो भी मान लिया पर वो ही अगर धोकेबाज निकला तो इसमें मेरा क्या कसूर है? वो मुझे कैसे कह सकते हैं की निभा ले?! जब मैंने मना किया और डाइवोर्स ले लिया तो मुझे disown कर दिया! इतनी जल्दी माँ-बाप अपने जिगर के टुकड़े को खुद से काट कर अलग कर देते हैं?" ये कहते हुए mam रोने लगीं, मुझसे उनका ये दुःख देखा नहीं गया तो मैं उनके साथ बैठ गया और उनके कंधे पर हाथ रख कर उन्हें शांत करने लगा| उन्होंने अपना मुँह मेरे कंधे से लगाया और रोने लगीं| मैं बस उनका कन्धा सहलाता रहा ताकि वो शांत हो जाएँ| मेरा मन कहने लगा था की हम दोनों ही चैन से जीना चाहते है, एक को माँ-बाप ने छोड़ दिया तो दूसरे को उसकी मेहबूबा ने छोड़ दिया| हालाँकि तराजू में mam का दुःख मेरे दुःख से की ज्यादा बड़ा
था पर कम से कम उन्होंने अपनी जिंदगी दुबारा शुरू तो कर ली थी और वहीँ मैं अपने गम में सड़ता जा रहा था|
कुछ देर बाद वो चुप हुईं और मेरे कंधे से अपना चेहरा हटाया, जहाँ उनका मुँह था वो जगह उनके आंसुओं से गीली हो गई थी| अब उन्हें हँसाने की जिम्मेदारी मेरी थी, पर जो इंसान खुद हँसना भूल गया हो वो भला दूसरों को क्या हसायेगा? "Mam माने आपको पहले भी कहा था न की आप के चेहरे पर हँसी अच्छी लगती है आँसू नहीं!" Mam ने तुरंत मेरी बात मान ली और अपने आँसू पोछ कर मुस्कुरा दी| फिर mam ने खाना बनाया और उनका दिल रखने के लिए मैंने दो रोटी खाईं, कुछ देर तक हम दोनों बालकनी में खड़े रहे और फिर सोने चले गए| बारह बजे तक मैंने सोने की बहुत कोशिश की, बड़ी करवटें ली पर नींद एक पल के लिए नहीं आई| Mam की मौजूदगी में मेरा दिमाग मुझे पीने नहीं दे रहा था पर मन बेचैन होने लगा था, हाथ-पाँव फिर से कांपने लगे थे और अब तो बस दारु चाहिए थी|
हार मान कर मैं उठा और सोचा की ज्यादा नहीं पीयूँगा, जैसे ही मैंने अपने सिरहाने देखा तो वहाँ से बोतलें गायब थीं| मैं समझ गया की ये mam ने ही हटाईं हैं, मैं गुस्से में बाहर आया और mam के कमरे में झाँका तो पाया वो सो रही हैं| किसी तरह मैंने गुस्सा कण्ट्रोल किया और किचन में बोतले ढूँढने लगा| अभी 24 घंटे हुए नहीं इन्हें आये और इन्होने मेरी जिंदगी में उथल-पुथल मचाना शुरू कर दिया| ये शराब की ललक थी जो मेरे दिमाग पर हावी हो कर बोल रही थी! मेरा दिमाग भी यही चाह रहा था की mam ने वो बोतलें फेंक दी हों ताकि आज मैं दारु पीने से बच जाऊँ, ये तो कम्बख्त मन तो जिसे दारु का सहारा चाहिए था! सबसे ऊपर की शेल्फ पर मुझे बोतल मिल ही गई और मैंने फटाफट गिलास में डाली और उसे पीने ही जा रहा था की पीछे से एक आवाज मेरे कान में पड़ी; "प्लीज.... मत पियो....
" इस आवाज में जो दर्द था उसने जाम को मेरे होठों से लगने नहीं दिया| मैंने सबसे पहले लाइट जलाई और पलट कर देखा तो mam आँखों में आँसू लिए मेरी तरफ देख रही थीं| उन्होंने ना में गर्दन हिलाई और मुझे पीने से मना करने लगी| ऐसा लगा जैसे बहुत हिम्मत कर के वो मुझे रोक रहीं हों, उनके हाव-भाव से मुझे डर भी साफ़ दिख रहा था| एक शराबी को दारु पीने से रोकना इतना आसान नहीं होता, क्योंकि शराब की ललक में वो कुछ नहीं सुनता और किसी को भी नुक्सान पहुँचा सकता है| पर मैं अभी उस हद्द तक नहीं गिरा था की उन पर हाथ उठाऊँ!
मैंने चुप-चाप गिलास किचन स्लैब पर रख दिया और सर झुका कर अपने अंदर उठ रही शराब पीनी की आग को शांत करने लगा| मेरा ऐसा करने का करना था mam के आँसू, जिन्होंने मेरे जलते हुए कलेजे पर राहत के कुछ छींटें मारे थे| Mam डर्टी हुई मेरे नजदीक आईं और मेरे कांपते हुए दाएं हाथ को पकड़ कर धीरे से मुझे हॉल की कुर्सी पर बिठाया| फिर मेरे सामने वो अपने घुटनों के बल बैठ गईं और आँखों में आँसू लिए हिम्मत बटोर कर बोलीं; "मानु....मैं जानती हूँ तुम रितिका को कितना प्यार करते थे!" ये सुनते ही मैंने हैरानी से उनकी आंखों में देखा, पर इससे पहले मेरे लब कोई सवाल पूछते उन्होंने ही सवाल का जवाब दे दिया; "मुझे सिद्धार्थ ने कल बताया| मैं नहीं जानती की क्यों तुम दोनों अलग हुए पर इतना जर्रूर जानती हूँ की उसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं हो सकती| वो ही तुम्हें समझ नहीं सकी, इतना प्यार करने वाला उसे कहाँ मिलेगा? पर वो तो move on कर गई ना? फिर तुम क्यों अपनी जान देना चाहते हो? मैंने तुम्हारी साड़ी मेडिकल रिपोर्ट्स पढ़ी हैं, तुम ने अगर पीना बंद नहीं किया तो मैं अपना सबसे प्यारा दोस्त खो दूँगी!" Mam ने मेरे दोनों गालों को अपने दोनों हाथों के बीच रखते हुए कहा| ये सब सुन कर मैं फिर से टूट गया; "Mam ...
अगर नहीं पीयूँगा तो वो और याद आएगी और मैं सो नहीं पाऊँगा| चैन से सो सकूँ इसलिए पीता हूँ!" मैंने ने रोते हुए कहा| ये सब मेरे दिमाग की उपज थी जो मुझे पीना नहीं छोड़ने देना चाहती थी और mam ये जानती थीं|
"तुम इतने भी कमजोर नहीं हो! ये तुम्हारे अंदर का डिप्रेशन है जो तुम्हें खुल कर साँस नहीं लेने दे रहा| फिर मैं हूँ ना यहाँ पर? I promise मैं तुम्हें इस बार छोड़ कर कहीं नहीं जाऊँगी| एक बार गलती कर चुकी हूँ पर दुबारा नहीं करुँगी! हम दोनों साथ-साथ ये लड़ाई लड़ेंगे और जीतेंगे भी|" Mam ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा और ना चाहते हुए भी मैं उनकी बातों पर विश्वास करने लगा| वैसे भी मेरे पास खोने के लिए बस मेरी एक जान ही रह गई थी!
Mam ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे उठा कर अपने साथ अपने कमरे में ले गईं, वो पलंग के सिरहाने बैठ गईं और मुझे उनकी गोद में सर रखने को कहा| मैं उस वक़्त अंदर से इतना कमजोर था की मुझे अब किसी का साथ चाहिए था जो मुझे इस दुःख के सागर से निकाल कर किनारे लाये| Mam की वो गोद मेरे लिए कश्ती थी, ऐसी कश्ती जिसका सहारा अगर मैं ना लिया तो मैं पक्का डूब जाऊँगा| जब इंसान डूबने को होता है तो उसकी fighting spirit सामने आती है जो उसे आखरी सांस तक लड़ने में मदद करती है और यही वो spirit थी जिसने मुझे mam की गोद में सर रखने को कहा| मैं भी उनकी गोद में सर रख कर सिकुड़ कर लेट गया| मेरी आँखें अब भी खुली थीं और वो सामने दिव्वार पर टिकी थी, दिल पिघलने लगा था और उसमें से आँसू का कतरा बहा और बिस्तर पर गिरा| Mam जिनकी नजर मुझ पर बनी हुई थी, उन्होंने मेरे आँसू पोछे और बोलीं; "मानु एक रिक्वेस्ट करूँ?"मैंने हाँ में सर हिलाया| "प्लीज मुझे मेरे नाम से बुलाया करो, तुम्हारे मुँह से 'Mam' सुनना मुझे अच्छा नहीं लगता|" मैंने फिर से हाँ में सर हिलाया|
'अनु' ने मेरे बालों में हाथ फेरना शुरू किया, ये एहसास मेरे लिए जादुई था| मन शांत हो गया था और आँखें भारी होने लगी थीं, धीरे-धीरे मैं नींद के आगोश में चला गया| पर जिस्म को नशे की आदत हो गई थी इसलिए तीन बजे मेरी आँख फिर खुल गई| कमरे में अँधेरा था और इधर मेरा गला शराब की दरक़ार करने लगा था, दिल की धड़कनें अचानक ही तेज हो गई थीं, हाथ-पेअर फिर से कांपने लगे थे अब बस दारु चाहिए थी ताकि मैं खुद को काबू में कर सकूँ| मैं धीरे से उठा और कमरे से बाहर आया और किचन स्लैब पर देखा जहाँ मेरा जाम मुझे देख रहा था और अपनी तरफ बुला रहा था| मेरे कदम अपने आप ही उस दिशा में बढ़ने लगे, काँपते हाथ अपने आप ही जाम को थाम कर उठा चुके थे पर कहते हैं ना की जब हम कोई गलत काम करते हैं तो हमारी अंतर्-आत्मा हमें एक बार रोकती जरूर है| मैं एक पल के लिए रुका और ममेरी अंतर्-आत्मा ने मुझे गाली देते हुए कह; "वहाँ अनु तुझे इस गम से निकालने के लिए इतना त्याग कर रही है और तू उसे ही धोका देने जा रहा है? भला तुझमें और रितिका
में फर्क ही क्या रहा?" ये ख़याल आते ही मुझे खुद से नफरत हुई, क्योंकि मेरे लिए सिर्फ और सिर्फ रितिका ही दोषी थी और मेरी इस हालत की जिम्मेदार भी वही थी! मेरा कुछ भी ऐसा करना जिसके कारन मैं उसके जैसा बन जाऊँ उससे अच्छा था की मर जाऊँ| मैंने वो गिलास किचन सिंक में खाली कर दिया, पता नहीं क्यों पर मुझे ऐसा लगा जैसे नाली में गिरती वो दारु मुझे गालियाँ दे रही हो और कह रही हो; "जब कोई नहीं था तेरे पास तब मैं थी! आज जब अनु आ गई तो तू मुझे नाली में बहा रहा है? जब ये भी छोड़ कर जायेगी तब मेरे पास ही आएगा तू!"
"कभी नहीं आऊँगा तेरे पास, मर जाऊँगा पर नहीं आऊँगा! बहुत तिल-तिल कर मर लिया अब फिर तुझे कभी अपने मुँह नहीं लगाऊँगा| तूने सिर्फ मुझे जलाया ही है, कोई एहसान नहीं किया मुझ पर! एक इंसान मुझे सहारा दे कर संभालना चाहता है और तू चाहती है मैं भी उसे धोका दूँ?" मैं जोश-जोश में ऊँची आवाज में बोल गया इस बात से अनजान की अनु ने पीछे खड़े हो कर ये सब देख और सुन लिया है| जब मैं पलटा तो अनु की आँखें भरी हुई थीं, उन्होंने मेरे काँपते हुए हाथों को पकड़ा और आ कर मेरे सीने से लग गईं और बोलीं; "Thank You!!!" इसके आगे वो कुछ नहीं बोलीं, फिर मुझे वापस पलंग पर ले गईं और मुझे अपने गोद में सर रख कर लेटने को कहा| एक बार फिर मैं उस प्यार की गर्माहट में लेट गया पर नींद आना इतना आसान नहीं था| "I’m proud of you!” ये कहते हुए उन्होंने मेरे माथे को चूमा और मेरे बालों में अपनी उँगलियाँ फेरने लगीं| अनु का ये kiss मेरे पूरे शरीर को झिंझोड़ गया, पुराण मानु अब जाग गया था और वो अब वापस आने को तैयार था! पर अंदर से मेरा पूरा जिस्म काँप रहा था और अनु बस मन ही मन प्रार्थना कर रही थीं की ये रात कैसे भी पार हो जाए ताकि वो कल सुबह मुझे हॉस्पिटल ले जा सकें| जागते हुए दोनों ने रात गुजारी और सुबह होते ही उन्होंने मुझे फ्रेश होने को कहा, उन्होंने चाय बनाई और नाश्ता भी बनाया| मेरा शरीर अब बुरी तरह कांपने लगा था, जिस्म से पसीना आने लगा था और मुझे थकावट भी बहुत लग रही थी| नहाने का जैसे कोई असर ही नहीं पड़ा था मुझ पर, मुझसे तो ठीक से बैठा भी नहीं जा रहा था| अनु ने बड़ी मुश्किल से मुझे नाश्ता कराया और कटोरी से धीरे-धीरे चाय पिलाई| घर से निकलना आफत हो गई थी ऐसा लगा जैसे की कोई भूत-बाधा वाला मरीज भगवान के डर से बाहर नहीं आना चाहता हो|
"एम्बुलेंस बुलाऊँ?" अनु ने पुछा तो मैंने ना में सर हिला दिया और कहा; "इतनी जल्दी हार नहीं मानूँगा! आप कैब बुला लो!" कैब आई और मैं सीढ़ियों पर बैठते-बैठते नीचे उतरा और आखिर हम हॉस्पिटल पहुँचे| अनु ने वहाँ इमरजेंसी में मुझे उसी फैक्टर से मिलवाया और वो मेरी ये हालत देख कर समझ गया| "See I told you!" उसने फटाफट जो औपचारिकताएं थी वो पूरी कीं और वही tests दुबारा दोहराये| रिपोर्ट आने तक उसने मुझे आराम करने को कहा और एक बेड दे दिया|
पर मैंने मना कर दिया; "सर I'm a fighter! अभी इस पर लेटने का समय नहीं आया| मैं बाहर वेट करता हूँ!" डॉक्टर और अनु मेरे अंदर ये पॉजिटिव चेंज देख कर बहुत खुश थे| रिपोर्ट्स आने के बाद डॉक्टर ने हमें वापस अंदर बुला लिया और बिठा कर बताने लगा; "मानु I’m afraid reports are not good! Your liver is damaged considerably….. you’ve Cirrhosis of Liver!!! YOU CAN’T GO BACK TO DRINKING OR ELSE YOU’RE GONNA DIE!” ये बात अनु के लिए बर्दाश्त कर पाना मुश्किल था इसलिए वो रो पड़ी| मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा; "Hey! I'm dying!" मैंने थोड़ा मजाक करते हुए कहा|
"Is she you’re wife?” डॉक्टर ने पुछा| तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा; "She's the one who’s keeping me alive!”
“Then mam its gonna be one hellova fight for you! As you can see the constant shivering, its because his body is addicted to the intoxication he’s been taking for such a long time. Now that he’s stopped, his body is craving for it! His body will reject any medication we give but you’ve to make sure he takes medicines on time. Also, very soon you’ll see the withdrawl symptoms! He’s goning to react and by react I mean he might become violent. Keep an eye on him cause I know HE WILL START DRINKING AGAIN! You’ve to keep alcohol away from him at any cost or you’ll loose your best friend! He also needs a therapist so he can ease the pressure on his head, he seems a very emotional person and he’ll eventually have a nervous breakdown! At that time do take care of him, the therapist will write some medication to ease his mental pressure and keep him in check. I’m writing some syrups and capsules for his liver as well as his apetite. Home cooked food only! No oily food, fast food or anything. Normal Home cooked food only. Also, he complained about sleep deprivation so I’m writing one sleeping pill, DO NOT INCREASE THE DOSAGE UNDER ANY CONDITION!” डॉक्टर ने बड़ी ही सख्त हिदायतें दी थीं और ये सुन कर ही पालन करने से डर लगने लगा था|
"कितना टाइम लगेगा इस में?" मैंने पुछा तो डॉक्टर ऐसे हैरान हुआ जैसे मैं कोई तुर्रमखाँ हूँ|
"It won’t be easy! If you follow my advice properly then atleast a year!” डॉक्टर ने गंभीर होते हुए कहा| पर मुझे अपने ऊपर पूरा विश्वास था की मैं ये कर लूँगा.....
Bloody Overconfidence!
update 65
पहला दिन
हॉस्पिटल से लौटते-लौटते शाम के 4 बज गए थे, अनु ने आते ही चाय बनानी शुरू कर दी और मैं उनसे बात करने लगा| जब से अनु आई थी वो बीएस घर में खाना ही बना रही थी, मुझे बड़ा बुरा लग रहा था की मेरी वजह से उन्हें ये तकलीफ उठानी पड़ रही है| मैंने सिक्योरिटी गार्ड को फ़ोन कर के कहा की वो कोई काम करने वाली भेज दे, अनु ने जब ये सुना तो वो बोली; "क्या जर्रूरत है? मैं कर रही हूँ ना सारा काम?"
"खाना बनाने तक तो ठीक है पर ये बर्तन धोना, झाड़ू-पोछा और कपडे धोना मुझे पसंद नहीं, ये काम कोई और कर लेगा| आप बस tasty-tasty खाना बनाओ!" मैंने हँसते हुए कहा|
"अच्छा मेरे हाथ का खाना इतना पसंद है? ठीक है तो फिर आज से एक रोटी एक्स्ट्रा खानी होगी!" अनु की बात सुन कर मैं अपनी ही बात में फँस गया था| मैं मुस्कुरा दिया और अपने कमरे में जा कर लेट गया| लेटे-लेटे मैं सोच रहा था की मुझे घर भी जाना है ताकि वहाँ जा कर मैं विदेश जाने का कारन बता कर शादी से अपनी जान बचा सकूँ! पर इस हालत में जाना, मतलब वो लोग मुझे कहीं जाने नहीं देंगे| दिन कम बचे थे और मुझे जल्द से जल्द ठीक होना था| रात को खाने के बाद अनु ने मुझे दवाई दी और मैं थोड़ा वॉक करने के बाद अपने कमरे में सोने जाने लगा| "वहाँ कहाँ जा रहे हो?" अनु ने पुछा, मैंने इशारे से उन्हें कहा की मैं सोने जा रहा हूँ| "नहीं....रात में तबियत खराब हुई तो?" अनु ने चिंता जताते हुए कहा|
"कुछ नहीं होगा? अगर तबियत खराब हुई तो मैं आपको उठा दूँगा|"
"तुम्हें क्या प्रॉब्लम है मेरे साथ इस कमरे में सोने में?" अनु ने अपनी कमर पर दोनों हाथ रखते हुए पुछा|
"यार! अच्छा नहीं लगता आप और मैं एक ही रूम में, एक ही बेड पर!"
"ओ हेल्लो मिस्टर! I'm single समझे! अपनी ये chivalry है न अपने पास रखो!" अनु ने मेरी टाँग खींचते हुए कहा|
"तभी तो दिक्कत है? आप सिंगल, मैं सिंगल फिर .... you know ...
शादी हुई होती तो बात अलग होती!" मैंने भी अनु की टाँग खींची!
"अच्छा? चलो अभी करते हैं शादी?" अनु ने मेरा हाथ पकड़ा और बाहर जाने के लिए तैयार हो गईं| हम दोनों ने इस बात पर खूब जोर से ठहाका लगाया! 5 मिनट तक non-stop हँसने के बाद अनु बोली; "चलो सो जाओ!" उन्होंने जबरदस्ती मुझे अपने कमरे में सोने के लिए कहा| मैं भी मान गया और जा कर एक तरफ करवट ले कर लेट गया और अनु दूसरी तरफ करवट ले कर लेट गईं| दवाई का असर था तो मैं कुछ देर के लिए बड़े इत्मीनान से सोया पर असर ज्यादा देर तक नहीं रहा और 2 बजे मेरी आँख खुल गई और उसके बाद करवटें बदलते-बदलते सुबह हुई|
दूसरा दिन
सुबह अनु ने उठते ही देखा की मैं आँखें खोले छत को देख रहा हूँ; "Good Morning! सोये नहीं रात भर?"
"दो बजे के बाद नींद नहीं आई, इसलिए जागता रहा|" मैंने उठ के बैठते हुए कहा| तभी अनु की नजर मेरे काँपते हुए हाथों पर पड़ी और उनकी चिंता झलकने लगी| मैं धीरे-धीरे उठा क्योंकि मुझे लग रहा था की कहीं चक्कर आ गया तो! फ्रेश हो कर मैं बालकनी में कुर्सी पर बैठ गया और अनु चाय बना कर ले आई| "अच्छा therapist के पास कब जाना है?" अनु ने पुछा| ये सुनते ही मेरी आंखें चौड़ी हो गईं, मैं जानता था की थेरेपिस्ट के पास जाने के बाद मुझे उसे सब बातें बतानी होंगी और ये सब बताना मेरे लिए आसान नहीं था| "प्लीज...मुझे थेरेपिस्ट के पास नहीं जाना!" मैंने मिन्नत करते हुए कहा| "पर क्यों?" अनु ने चिंता जताते हुए कहा|
"प्लीज...मैं नहीं जाऊँगा.... तुम जो कहोगी वो करूँगा पर वहाँ नहीं जाऊँगा|" मैं किसी भी हालत में ये सच किसी के सामने नहीं आने देना चाहता था क्योंकि ये सुन कर डॉक्टर और अनु दोनों ही मेरे बारे में गलत सोचते और मैं खुद को गलत साबित होने नहीं देना चाहता था| अब मुझमें इतनी ताक़त नहीं थी की मैं किसी को अपनी सफाई दूँ पर उनकी सोच मुझे जर्रूर चुभती!
"ठीक है...
मैं एक बार डॉक्टर से बात करती हूँ!"
नाश्ता बनाने का समय हुआ तो अनु ने एक पतला सा परांठा बनाया, जैसे ही उन्होंने मुझे परोस कर दिया मैंने तुरंत उसके दो टुकड़े किये और आधा टुकड़ा उठा लिया| पर अनु को मुझे डराने का स्वर्णिम मौका मिल चूका था, उन्होंने आँखें तर्रेर कर कहा; "थेरेपिस्ट के जाना है?" ये सुनते ही मैं डरने का नाटक करते हुए ना में सर हिलाने लगा| "तो फिर ये पूरा खाओ!" मैंने डरे सहमे से बच्चे की तरह वो बचा हुआ टुकड़ा उठा लिया, मेरा बचपना देख उन्हें बहुत हँसी आई| उनके चेहरे की हँसी मेरे दिल को छू गई, ऐसा लगा जैसे बरसों बाद उन्हें हँसता हुआ देख रहा हूँ| नाश्ते के बाद गार्ड एक काम करने वाली को ले आया और अनु ने चौधरी बनते हुए उससे सारी बात की और उसे आज से ही काम पर रख लिया| उसने काम शुरू कर दिया था और मुझे अचानक से दीदी और मुन्ना की याद आ गई| मैं एक पल के लिए खमोश हो गया और मुन्ना को याद करने लगा| उस नन्हे से बच्चे ने मुझे दो दिन में ही बहुत सी खुशियाँ दे दी थीं, पता नहीं वोकहान होगा और किस हाल में होगा? अनु ने जब मुझे गुमसुम देखा तो वो मेरे बगल में बैठ गईं और मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बोलीं; "क्या हुआ?" उनका इतना प्यार से बोलना था की मैंने उन्हें मुन्ना और दीदी के बारे में सब बता दिया| वो मेरा दुख समझ गईं और मुझे संत्वना देने लगी.... खेर दोपहर हुई और फिर वही उनका मुझे थेरेपिस्ट के नाम से डराना जारी रहा| शाम को उन्होंने बताया की डॉक्टर बोल रहा है की मुझे थेरेपिस्ट के पास जाना पड़ेगा| पर मेरे जिद्द करने पर वो कुछ सोचने लगीं और बोलीं की हफ्ते भर के लिए वो जो-जो कहें मुझे करना होगा, मेरे लिए तो थेरेपिस्ट के बजाए यही सही था| मैं तुरंत मान गया पर मुझे नहीं पता था की वो मुझसे क्या करवाने वाली हैं!
रात हुई और खाना खाने के बाद अनु ने मुझे अपने पास जमीन पर बैठने को कहा| वो मेरे पीछे कुर्सी ले कर बैठीं और मेरे दिल की अच्छे से मालिश की ताकि मुझे अच्छे से नींद आये| "बाल बड़े रखने हैं तो ठीक से बाँधा भी करो!" ये कहते हुए अनु ने मेरे बालों का bun बनाया|
बाल बहुत बड़े नहीं थे वरना और भी अच्छे लगते| खेर दवाई खा कर मैं अनु वाले कमरे में लेट गया| मैं इस वक़्त सीधा लेटा था की अनु ने झुक कर मेरे माथे को चूमा| कल की ही तरह ये Kiss मेरे पूरे शरीर को झिंझोड़ कर चला गया| "कल सुबह 6 बजे उठना है! कल से हम योग करेंगे!" ये कहते हुए अनु बिस्तर के अपने साइड सो गईं| पर रात के दो बजते ही मेरे नींद खुली और मेरे बेट में बहुत जोर से दर्द होने लगा| दर्द इतनी तेज बढ़ रहा था की ऐसा लग रहा था की मेरे प्राण अब निकले! मैं जितना हो सके उतना अपनी कराह को दबा कर सिकोड़ कर लेटा हुआ था| पर अनु को मेरे दर्द का एहसास हो ही गया और उन्होंने तुरंत कमरे की लाइट जला दी| मैं अपने घुटने अपने छाती से चिपकाए लेटा कसमसा
रहा था, माथे पर ढेर सारा पसीना, जिस्म में कंपकंपाहट! मेरी हालत देख कर अनु घबरा गई और किसी तरह खुद को संभाल कर मेरे माथे पर हाथ फेरने लगी| पसीने से उनके हाथ गीले हो गए, तो वो बाहर से एक टॉवल ले आईं और मेरे चेहरे से पसीने पोछने लगी और तभी उनकी आँखों से आँसू निकलने लगे| वो खुद को लाचार महसूस कर रही थी और चाह कर भी मेरा दर्द कम नहीं कर पा रहीं थी| उनका रोना मुझसे देखा नहीं गया तो मैंने उनसे पानी माँगा, वो दौड़ कर पानी ले आईं| दो घुट पानी पिया था की मुझे उबकाई आ गई, किसी तरह से मैं अपनी उबकाई को कण्ट्रोल करता हुआ बाथरूम पहुँचा और वहाँ मैं कमोड पकड़ कर बैठ गया और जो कुछ भी पेट में अन्न था वो सब बाहर निकाल दिया| मेरे उलटी करने के दौरान अनु मेरी पीठ सहला रही थी| पेट खाली हुआ थो कंपकपी और बढ़ गई| मुझे सहारा दे कर अनु ने मुझे वापस पलंग पर लिटाया; "मैं एम्बुलेंस बुलाती हूँ!" ये कहते हुए अनु फ़ोन नंबर ढूँढने लगी|
"नहीं.... !!! सुबह तक .... wait करो प्लीज!" मैंने कांपते हुए कहा| उस समय मुझे एहसास हुआ की मैं किस कदर कमजोर हो चूका हूँ| रितिका के चक्कर में मैं मौत के मुँह में पहुँच चूका हूँ| अनु उस वक़्त बहुत ज्यादा घबराई हुई थी, वो मेरे सिरहाने बैठ गई और मेरा सर अपनी गोद में रख लिया| पूरी रात वो मेरे सर पर हाथ फेरती रहीं, जिस कारन मेरी थोड़ी आँख लगी|
तीसरा दिन
सुबह 6 बजते ही मेरी आँख खुल गई क्योंकि अनु मेरा सर धीरे से अपनी गोद से हटा रही थीं| "चाय" मैंने कांपती हुई आवाज में कहा| अनु ने तुरंत चाय बनाई, मैंने बहुत ताक़त लगाई और bedpost से टेक लगा कर बैठा| अपने हाथों को देखा तो वो काँप रहे थे| अनु कप में हकाय लाइ और एक कप को पकड़ने के लिए हम दोनों ने अपने दोनों हाथ लगाए थे| चाय अंदर गई तो जिस्म को लगा की कुछ ताक़त आई है| मैं इतना तो समझ गया था की अगर मैंने खाना नहीं खाया तो मुझे IV चढ़ाना पड़ेगा इसलिए मैंने अनु से टोस्ट खाने को मांगे| ये सुन कर उन्हें थोड़ी तसल्ली हुई की मेरी तबियत में कुछ सुधार आ रहा है| नाश्ता करते-करते दस बज गए थे, मैं खुद ही बोला की हॉस्पिटल चलते हैं| बड़ी मुश्किल से हम हॉस्पिटल पहुँचे और जब डॉक्टर ने चेक किया तो उसने कहा; "मानु की बॉडी दवाइयाँ रिजेक्ट कर रहीं हैं, मैं दवाइयाँ बदल रहा हूँ| इसके खाने का भी ध्यान रखो हल्का खाना दो, सूप दो, खिचड़ी, फ्रूट्स ये सब दो| एक बार में नहीं खाता तो थोड़ा-थोड़ा दो!"
"डॉक्टर साहब प्लीज कोई भी दवाई दो पर कल वाला हादसा फिर से ना हो!" मैंने कहा|
"दवाई चेंज की है मैंने, hopefully अब नहीं होगा|" डॉक्टर ने और दवाइयाँ लिख दीं|
"सर इस कंपकंपी का भी कुछ कर दीजिये!" माने कहा|
"इसकी कोई दवाई नहीं है, ये तुम्हारा जिस्म जिसे तुमने नशे का आदि बना दिया था वो रियेक्ट कर रहा है| इसे ठीक होने में समय लगेगा!' तभी अनु ने इशारे से थेरेपी वाली बात छेड़ी और डॉक्टर ने मेरी
क्लास ले ली! "ये बताओ तुम्हें थेरेपी लेने से क्या प्रॉब्लम है?"
"सर मैं जिन बातों को भूलना चाहता हूँ वो डॉक्टर को फिर से बता कर उस दुःख को दुबारा face नहीं करना चाहता|" मैंने गंभीर होते हुए कहा|
"ये बातें फिलहाल दबीं हैं पर कभी न कभी ये बाहर आएंगी और फिर तुम्हें बहुत दर्द देंगी, फिर तुम दुबारा से पीना शुरू कर दोगे! इसलिए आज चले जाओ डॉक्टर अभी यहीं है|" डॉक्टर की बात थी तो सही पर मैं उन बातों को किसी के सामने दोहराना नहीं चाहता था और उससे बचने के लिए मैं बहाने बनाने लगा| कभी योग का बहाना करता तो कभी morning walk करने का बहाना करता| पर डॉक्टर पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा और मुझे मजबूरन थेरेपिस्ट के पास जाना पड़ा| पर मैंने भी होशियारी दिखाई और उसे ऋतू और मेरे रिश्ते की बात छोड़ कर सब बता दिया| उसे लगा की एक और आशिक़ आ गया और उसने मुझे 10 मिनट का लेक्चर दिया और कहा की मैं ज्यादा सोचूं न, जो हो चूका है उसे भूल जाऊँ, हँसी-ख़ुशी रहूँ, तबियत सुधरने के बाद एक healthy lifestyle जिऊँ और जल्दी से शादी कर लूँ| घर की जिम्मेदारियाँ पड़ेंगी तो ये सब धीरे-धीरे भूल जाऊँगा| चलो आज अनु को भी आधा सच जानने को मिल गया की आखिर हुआ क्या था!
हम घर आये तो एक बात जो मैंने नोटिस की वो थी की अनु को शादी की बात से कुछ ठेस पहुँची हो| शायद उन्हें अपनी शादी याद आ गई, खेर ये बचा हुआ दीं बहुत ही शान्ति से गुजरा| रात में वही कंपकंपी और फिर जागते हुए सुबह का इंतजार करना|
चौथा दिन
सुबह उठते ही मैंने अनु से कहा की वो मुझे योग करना सिखाये| अनु की योग में महारथ हासिल थी, उन्होंने चुन-चुन कर मुझे वो ही आसन कराये जो मेरे लिए करना आसान था| कोई भी exercise करने वाला आसन नहीं करवाया क्योंकि शरीर अभी भी बहुत कमजोर था| वो बीएस मुझे मेरी साँस पर नियंत्रण करना और फोकस करने के लिए अनु-विलोम सीखा रही थीं| योग के बाद हमने चाय पी और तभी उनका फ़ोन बज उठा| वो फ़ोन ले कर कमरे में चली गईं और मैं उठ कर बाथरूम जाने लगा की तभी मुझे इतना सुनाई दिया; "मैं अभी नहीं आ सकती, जो भी है अपने आप संभाल लो!" मैं उस टाइम कुछ नहीं बोला, नाश्ते के बाद हम बैठे थे और नौकरानी काम कर रही थी| मेरा ध्यान अब भी मेरे कांपते जिस्म पर था और मुझे अपनी इस हालत पर गुस्सा आ रहा था| "मेरी वजह से आप क्यों अपना बिज़नेस खराब कर रहे हो?" मैंने अनु की तरफ देखते हुए कहा और उन्हें समझ आ गया की मैंने उनकी बात सुन ली है|
"अभी मेरा तुम्हारे साथ रहना जर्रूरी है!"
"1-2 दिन की बात होती तो मैं कुछ नहीं कहता, पर इसे ठीक होने में बहुत टाइम लगेगा और तब तक आपका ऑफिस का काम कौन देखेगा? आप चले जाओ, मैं अपना ध्यान रखूँगा!" मैंने कहा|
"बोल दिया न नहीं!" इतने कहते हुए वो गुस्से में उठ कर चली गईं| मुझे भी इस बात पर बहुत गुस्सा आया, मैं जोश में उठा और अपने कमरे में जा कर लेट गया| मैं नहीं चाहता था की
कोई मेरी वजह से किसी भी तरह का नुक्सान सही और यहाँ तो अनु के बिज़नेस की बात थी तो मैं कैसे उन्हें ये नुक्सान सहते हुए देखता| मैंने अपने गद्दे के नीचे से सिगरेट का पैक निकाला और पीने लगा| अभी दो कश ही पीये थे की अनु धड़धड़ाते हुए अंदर आईं और मेरे हाथ से सिगरेट छीन कर फेंक दी| इतना काफी था मेरे अंदर के गुस्से को बाहर निकलने के लिए; "डॉक्टर ने सिगरेट पीने से तो मना नहीं किया ना?"
"इसकी भी आदत लगानी है? Liver तो खराब कर ही लिया है अब क्या Lungs भी खराब करने हैं?" उन्होंने गुस्से में कहा|
"कुछ तो रहने दो मेरी जिंदगी में? शराब छोड़ दी अब क्या ये सिगरेट भी छोड़ दूँ? तो जियूँ किसके लिए? ये उबला हुआ खाना खाने के लिए?" मैंने गुस्से से कहा|
"सिर्फ शराब और सिगरेट के लिए ही जीना है तुम्हें?" अनु ने पुछा| मेरे पास उनकी इस बात का कोई जवाब नहीं था, तो आँसू ही सच बोलने को बाहर आ गए|
"आप क्यों अपनी लाइफ मुझ जैसे लूज़रके लिए बर्बाद कर रहे हो? आपको तक़रीबन एक हफ्ता हो गया मेरी तीमारदारी करते हुए? क्यों कर रहे हो ये सब? क्या मिलेगा आपको ये सब कर के? छोड़ दो मुझे अकेला और मरने दो!" मैंने बिलखते हुए कहा| ये था वो Nervous Breakdown जो डॉक्टर ने कहा था की होगा| क्योंकि दिमाग को अब शराब पीने के लिए बहाना चाहिए था और इस समय उसने ये बहाना बनाया की अनु की लाइफ मेरे कारन खराब हो रही है| अनु भी जानती थी की वो मुझे चाहे कितना भी प्यार से समझा ले पर मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ेगा| उन्हें मुझे जीने के लिए एक वजह देनी थी, एक ऐसी वजह जिसके लिए मैं ये लड़ाई जारी रखूँ और फिर से अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊँ| उन्हें मुझे अपनी दोस्ती का एहसास दिलाना था, पर सख्ती से ताकि मेरे दिमाग में उनकी बात घुसे!
वो मेरे गद्दे पर घुटनों के बल बैठीं और मेरे टी-शर्ट के कालर को पकड़ा और मुझे बड़े जोर से झिंझोड़ा, फिर गरजते हुए मेरी आँसुओं से लाल आँखों में देखती हुई बोलीं; "Look at me! तुम्हारी जगह मैं पड़ी होती तो क्या मुझे छोड़ कर चले जाते?..... बोलो? ..... नहीं ना?.... फिर मैं कैसे छोड़ दूँ तुम्हें?! ..... तुम्हें जीना होगा....मेरे लिए....मेरी दोस्ती के लिए.....
तुम्हें ऐसे मरने नहीं दूँगी मैं! मेरी लाइफ में तुम वो अकेले इंसान हो जिसे मैंने अपना माना है और तुम मरने की बात करते हो? Now put on your big boy pants and start fighting! (मर्द बनो और इस लड़ाई को जारी रखो!)" अनु की ये बातें मेरे लिए ऐसी थीं जैसे काली गुफा में रौशनी की एक किरण, मैं धीरे-धीरे इस रौशनी की तरफ बढ़ ही रहा था की अनु ने मुझे एक बार फिर से झिंझोड़ा और पुछा; "समझे? Fight!!!!" मैंने हाँ में गर्दन हिलाई और तब जा कर उन्होंने मेरा कालर छोड़ा| कुछ टाइम तक वो मेरी तरफ प्यार से देखने लगीं जैसे मुझसे माफ़ी माँग रही हों की उन्होंने मेरे साथ सख्ती दिखाई और इधर मेरा पूरा जिस्म दहल गया था| अनु की आँखें नम हो चली थीं तो मैंने उनके आँसू पोछे और गद्दे के नीचे से सिगरेट का पैक उन्हें निकाल कर दे दिया| अनु ने वो पैक लिया और बिना कुछ बोले चली गईं और मैं दिवार से सर लगा कर बैठा रहा और अपने दिल को तसल्ली देता रहा और हिम्मत बटोरता रहा की अनु ने ने इतनी मेहनत की है मुझे ठीक करने में तो मैं इसे बर्बाद जाने नहीं दूँगा| कुछ देर बाद मैं खुद बाहर आया और देखा तो अनु किचन में खाना बना रही हैं| मैं चुप-चाप हॉल में बैठ गया की तभी उन्होंने कहा की मैं उनका लैपटॉप ऑन करूँ| मैंने वैसा ही किया और उन्होंने मुझे पासवर्ड बताया और Mail access करने को बोला| Mail में एक कंपनी का कुछ डाटा था जिसे उन्हें सॉर्ट करना था| आगे उन्हें कुछ नहीं कहना पड़ा और मैं खुद ही लग गया| इतने दिनों बाद माउस पकड़ कर बड़ा अजीब सा लग रहा था| दिक्कत ये थी की हाथ कांपने की वजह से माउस इधर-उधर क्लिक हो रहा था तो मैं उसे बड़े धीरे चला रहा था| जब टाइप करने की बारी आई तो लैपटॉप की keys ज्यादा press हो जाती| मुझे नहीं पता था की अनु मुझे इस तरह जूझते देख मुस्कुरा रही थीं| खाना बनने के बाद वो दोनों का खाना एक थाली में परोस कर लाईं| मैंने चुप-चाप लैपटॉप बंद कर दिया, थोड़ा डरा-सहमा था की कहीं अनु फिर से न डाँट दे| पर नहीं इस बार उन्होंने मुझे अपने हाथ से खाना खिलाना शुरू कर दिया| मुझे खिलने के बाद उन्होंने भी वही बेस्वाद खाना खाया| "आप क्यों ये खाना खा रहे हो? आप बीमार थोड़े हो?" मैंने कहा| "बहुत मोटी हो गई हूँ मैं, इसी बहाने मैं भी थोड़ा वजन कम कर लूँगी|" उन्होंने मजाक करते हुए कहा|
"कौन से Beauty Pageant में हिस्सा ले रहे हो?" मैंने उनका बहाना पकड़ते हुए कहा| "आप पहले ही मेरा इतना 'ख्याल' रख रहे हो ऊपर से ये बेस्वाद खाना भी खा रहे हो! प्लीज ऐसा मत करो!" मैंने रिक्वेस्ट करते हुए कहा|
"दो बार खाना मुझसे नहीं बनता!" अनु ने फिर से बहाना मारा|
"कोई दो बार खाना नहीं बनाना, दाल में तड़का लगाने से पहले मेरे लिए निकाल दो और तड़के वाली आप खा लो|" मैंने उन्हें solution दिया पर वो कहाँ मानने वाली थीं तो मुझे बात घुमा कर कहनी पड़ी; "ok! ऐसा करो मेरे मुंह का स्वाद बदलने के लिए मुझे 1-2 चम्मच तड़के वाली दाल दे दो|
फिर तो ठीक है? इतने से खाने से कुछ नहीं होगा!" बड़ी मुश्किल से वो मानी|
खेर खाना हुआ और उसके बाद हमने लैपटॉप पर ही एक मूवी देखि, मूवी देखते-देखते अनु सो गई| शाम को मैंने चाय बनाई और बड़ी मुश्किल से बनाई क्योंकि हाथ कांपते थे! रात को खाने के बाद मैंने फिर से बात शुरू की; "आप मेरे लिए इतना कर रहे हो की मेरे पास आपको शुक्रिया कहने को भी शब्द नहीं हैं|"
"लगता है सुबह वाली डाँट से अक्ल ठिकाने नहीं आई तुम्हारी?" उन्होंने फिर से चेहरे पर गुस्सा लाते हुए कहा|
"आ गई बाबा! पर एक बार बात तो सुन लो! काम ही पूजा होती है ना? तो आपका यूँ ऑफिस के काम ना करना ठीक है?" मैंने थोड़ा गंभीर होते हुए कहा|
"ठीक है...तुम्हें मेरे काम की इतनी ही चिंता है तो चलो मेरे साथ बैंगलोर! तुम मुझे वहाँ Join कर लो as an employee नहीं बल्कि as a business partner!" ये सुनते ही मैं चौंक गया?
"Business Partner? कैसे? ...impossible!"
"क्यों Impossible? तुम काम इतने अच्छे से जानते हो, वो Project याद है ना? वो सब तुम ने ही तो संभाला था| इस वक़्त मेरी टीम में बस दो ही लोग हैं और हम दोनों आसानी से काम कर सकते हैं|"
"पर Business Partner क्यों? Employee क्यों नहीं? मैंने पुछा|
"हेल्लो सैलरी कौन देगा? पहले ही दो लोगों को सैलरी देनी पद रही है ऊपर से तुम्हें तो सबसे ज्यादा सैलरी देनी पड़ेगी आखिर सबसे experienced हो तुम!" अनु ने हँसते हुए कहा|
"अच्छा? यार आप तो बड़े calculative निकले!" मैंने हँसते हुए कहा|
"Business संभालती हूँ तो इतना तो सीख गई हूँ, वैसे भी हम दोनों दोस्त हैं और ऑफिस में वो Employer - Employee का ड्रामा मुझसे नहीं होगा!" आखिर सच उनके मुँह से बाहर आ ही गया|
"Okay .... New York से आने के बाद मैं वहीं शिफ्ट हो जाऊँगा|" ये सुनते ही अनु खामोश हो गई|
"नहीं...हम New York नहीं जा रहे... अभी तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है!"
"हेल्लो...मैडम मुझे नहीं पता .... अगर New York नहीं जाना तो मैं कहीं नहीं जा रहा|" मैंने रूठते हुए कहा|
"But तुम्हारी तबियत...." अनु ने चिंता जताते हुए कहा पर मैंने उनकी बात काट दी;
"Come on यार! ऐसी opportunity कोई छोड़ता है क्या? हमारे पास अभी काफी टाइम है and I promise मैं ठीक हो जाऊँगा| मुझे भी थोड़ा change चाहिए! प्लीज....प्लीज...प्लीज...
" मेरा जबरदस्ती करने का कारन था की अनु ये golden opportunity waste करे| अगर मैं उन्हें ना मिला होता तो वो ये opportunity कभी miss नहीं करती, आखिर वो मान ही गईं और तुरंत Laptop से एक mail कर दिया|
अगली सुबह से मेरे अंदर बहुत से बदलाव आने लगे, जितनी भी नकारात्मकता थी वो सब अनु की care के कारन निकल चुकी थी और मेरी जिंदगी की नै शुरुआत हो चुकी थी| अब मैंने रोज सुबह समय पर उठना, योग करना और फिर अनु के साथ morning walk करना शुरू कर दिया था| खाने में मैं वही उबला हुआ खाना खा रहा था और साथ में फ्रूट्स और sprouts वगैरह खाने लगा था| अनु के ऑफिस का सारा काम मैंने laptop से करना शुरू कर दिया था| अनु का काम बस खाना बनाना और मुझे दवाई देने तक ही रह गया था| हाथ-पैर अब भी कांपते थे पर पहले जितने नहीं! कुछ दिन बाद अरुण और सिद्धर्थ मुझसे मिलने आये और अनु को वहाँ देख कर दोनों थोड़ा हैरान थे और शक करने लगे थे की हम दोनों का कुछ चल तो नहीं रहा पर मैंने उन्हें अनु की चोरी से सब सच बता दिया| वो खुश थे की मेरी सेहत में दिन पर दिन सुधार आ रहा था और दोनों ने अनु को बहुत-बहुत शुक्रिया किया| दिन कैसे गुजरे पता ही नहीं चला और 15 तरीक आ गई| इन बीते दिनों में घर से बहुत से फ़ोन आये और मुझे बहुत सी गालियाँ भी पड़ीं क्योंकि लगभग 3 महीने हो गए थे मुझे घर अपनी शक्ल दिखाए और ऊपर से शादी भी थी जिसके लिए मैंने एक ढेले का काम नहीं किया था| 16 तरीक को आने का वादा कर के मैं जाने को तैयार हुआ तो अनु ने कहा की वो भी साथ चलेंगी, पर उन्हें साथ ले जाना मतलब बवाल होना! इसलिए मैंने उन्हें समझाते हुए कहा; "बस एक दिन की बात है, मैं बस घर जा कर New York जाने की बात कर के अगले दिन आ जाऊँगा|" पर उन्हें चिंता ये थी की अगर वहाँ जा कर मैंने फिर से पी ली तो? "I Promise मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगा!" बड़ी मुश्किल से उन्हें समझा-बुझा कर मैं निकला पर अंदर ही अंदर रितिका की शक्ल देखने से दिल में टीस उठना और फिर खुद को फिर से गिरा देने का डर लग रहा था| पर कब तक मैं इसी तरह डरूँगा ये सोच कर दिल मज़बूत किया और बस में बैठ गया|
update 66
बस में बैठा ही था की अनु का फ़ोन आ गया, ये कॉल उन्होंने मेरा हाल-चाल पूछने को किया था| "यार अभी तो निकला हूँ, बस में बैठा हूँ....
आप चिंता मत करो!" पर उन्होंने मेरी एक ना सुनी और अगले 4 घंटे तक हम बात करते रहे| उनके पास जैसे बात करने के लिए आज सब कुछ था| जब और कुछ नहीं मिला तो उन्होंने Web सीरीज की ही बात छेड़ दी और मैं भी उनसे इस मुद्दे पर बड़े चाव से बात करने लगा| जैसे ही ग्यारह बजे तो मुझे नाश्ता करने को कहा, रास्ते के लिए उन्होंने थोड़ा नाश्ता बाँधा था वो मैंने खाया और मेरे साथ-साथ उन्होंने भी फ़ोन पर बात करते हुए खाया| जब बस एक जगह हॉल्ट पर रुकी तो मैंने केले खरीदे ताकि बाहर का खाने की बजाए फ्रूट्स खाऊँ| आखिर एक बजे मैं बस से उतरा और घर की तरफ चल दिया| मेरी दाढ़ी बढ़ी हुई, बालों का bun बना हुआ और दोनों हाथ जीन्स में घुसेड़ कर मैं बात करता हुआ चलता रहा| हाथ जीन्स की जेब में डालने का करण ये था की मैं अपने हाथों की कंपकंपी छुपा सकूँ, वरना घर वाले सब चिंता करते और मुझे वापस नहीं जाने देते|
अगर अनु ने फ़ोन कर के मुझे बातों में व्यस्त ना रखा होता तो घर की तरफ बढ़ते हुए मेरे मन में फिर वही दुखभरे ख्याल आने शुरू हो जाते| घर से दस कदम की दूरी पर मैंने उन्हें ये कह दिया की घर आ गया मैं आपको थोड़ी देर में कॉल करता हूँ| कॉल काटते ही मेरे अंदर गुस्सा भरने लगा, मैं मन ही मन मना रहा था की रितिका मेरे सामने ना आये वरना पता नहीं मेरे मुँह से क्या निकलेगा| शुक्र है की घर का दरवाजा खुला था, माँ और ताई जी आंगन में बैठीं थीं| घर दुबारा रंगा जा चूका था, टेंट वगैरह का समान घर के बाहर और आंगन में पड़ा था, देख कर साफ पता चलता था की ये शादी वाला घर है| जैसे ही माँ और ताई जी ने मुझे देखा तो दस सेकंड तक वो दोनों मुझे पहचानने की कोशिश में लगी रहीं| जब उन्हें तसल्ली हुई तो ताई जी ने डांटते हुए पुछा; "ये क्या हालत बना रखी है? बाबा-वाबा बन गया है क्या?" मैं कुछ कहता उसके पहले ही माँ भी बरस पड़ी; "सूख कर काँटा हुआ है, इतना भी क्या काम में व्यस्त रहता है की खाने-पीने का ध्यान नहीं रहता?"
"बीमार हो गया था!" मैंने बस इतना ही कहा क्योंकि मैं जो सोच रहा था उसके विपरीत मेरे साथ हो रहा था| मुझे लगा था मेरी ये हालत देख कर वो रोयेंगे, चिंता करेंगे पर यहाँ तो मुझे और डाँटा जा रहा है! माना मैंने इतने महीने घर न आने की गलती की पर मेरी ये हालत देख कर तो माँ का दिल पसीज जाना चाहिए था! "माँ, पिताजी और ताऊ जी कहाँ हैं?" मैंने पुछा|
"तुझसे तो शादी के काम करने के लिए छुट्टी ली नहीं जाती तो अब किसी को तो काम करना होगा ना? वो तो शुक्र है की रितिका को तू घर छोड़ गया था वरना चूल्हा-चौका भी हमें फूँकना पड़ता! न्योता बाँटने गए हैं, कल आएंगे!" माँ के मुँह से रितिका का नाम सुन कर मुझे बहुत गुस्सा आया और मैं पाँव पटकता हुआ ऊपर पाने कमरे में चला गया| मेरे पास एक पिट्ठू बैग था जिसे मैंने अपने बिस्तर पर रखा और मैं धुप में छत की तरफ जा रहा था की तभी अनु का
फ़ोन आ गया; "बात हो गई?"
"नहीं.... ताऊ जी और पिताजी घर से बाहर गए हैं! कल आएंगे उनसे बात कर के कल आ जाऊँगा|" मैंने मुंडेर पर बैठते हुए कहा|
"किसी से लड़ाई मत करना, आराम से बात करना और अगर जाने से मना करें तो कोई बात नहीं!" अनु ने प्यार से मुझे समझाते हुए कहा| मैंने उन्हें जान बुझ कर अभी जो हुआ उस बारे में नहीं बताया क्योंकि मैं उम्मीद कर रहा था की शायद ताऊ जी का दिल जर्रूर पसीज जाएगा| अभी मैं बात कर ही रहा था की रितिका मुझे मेरी तरफ आती हुई दिखाई दी, मैंने गुस्से से उसे देखा और हाथ के इशारे से वापस लौट जाने को कहा पर वो नहीं मानी और मेरी तरफ आती गई| "मैं आपको थोड़ी देर में कॉल करता हूँ!" इतना कह कर मैंने कॉल काटा|
"ये क्या हालत बना रखी है आपने?" ऋतू ने चिंता जताने का नाटक करते हुए कहा| शुरू से ही वो कभी इस तरह का नाटक नहीं कर पाई तो अब क्या कर पाती|
"ज्यादा नाटक मत चोद! मेरी इतनी ही फ़िक्र होती तो मुझे यूँ छोड़ नहीं देती!" मैंने उसे झाड़ते हुए कहा| पर उसके पर निकल आये थे इसलिए वो भी मेरे ऊपर बरसने लगी;
"अगर अपनी लाइफ के बारे में सोच कर एक डिसिशन लिया तो क्या गलत किया? तुम मुझे कभी स्टेबिलिटी नहीं दे सकते थे, राहुल दे सकता है!" आज उसने पहली बार मुझे आप की जगह 'तुम' कहा था और उसका ये कहना था की मेरा गुस्सा उबल पड़ा;
"तुझे पहले दिन से ही पता था की हमारे रिलेशनशिप में कितना खतरा है पर तब तो तुझे सिर्फ प्यार चाहिए था मुझसे?! अगर तूने मुझे ये बहाना दे कर छोड़ा होता और फिर घरवालों की मर्जी से शादी आकृति तो शायद कम खून जलता मेरा पर तूने मुझे सिर्फ और सिर्फ इसलिए छोड़ा क्योंकि तुझे एक अमीर घर का लड़का मिल गया जो तुझे दुनिया भर के ऐशों-आराम दे सकता है! तूने मुझे धोका सिर्फ और सिर्फ पैसों के लिए दिया है!" ये सच सुन कर वो चुप हो गई और सर झुका कर खड़े हो गई|
"अब बोल क्या लेने आई थी यहाँ?" मैंने गुस्से में पुछा|
मेरा गुस्सा देख उसका बुरा हाल था, फिर भी हिम्मत करते हुए वो बोली; "आप ...शादी तर प्लीज मत रुकना...कॉलेज से राहुल के दोस्त आएंगे और वो आपको देखेंगे तो....." रितिका ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी|
"मुझे यहाँ देख कर वो कहेंगे की ये तो चाचा-भतीजी हैं और कॉलेज में तो Lovers बन कर घुमते थे! Hawwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwww" मैंने ऋतू को टोंट मारते हुए कहा| "ओह! तूने उसे मेरे बारे में कुछ नहीं बताया ना?" मैंने रितिका का मजाक उड़ाते हुए कहा|
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"अगर चाहूँ तो मुझे मिनट नहीं लगेगा सब सच बोलने में और फिर वो खेत में खड़ा पेड़ दिख रहा है ना?!" मैंने उस पेड़ की तरफ ऊँगली करते हुए उसे फिर ताना मारा| "पर मैं तेरी तरह गिरा हुआ इंसान नहीं हूँ! तुझे क्या लगा मैं यहाँ तेरी शादी में 'चन्ना मेरेया' गाने आया हूँ?!" इतना कह कर मैं नीचे जाने को पलटा तो रितिका को यक़ीन हो गया की मैं उसकी शादी में शरीक नहीं हूँगा और उसने मुझे; "थैंक यू" कहा पर मेरे मन में तो उसके लिए सिर्फ नफरत थी जो गाली के रूप में बाहर आ ही गई; "FUCK OFF!!!" इतना कह कर मैं नीचे आ गया|
मैंने रितिका को अनु के बारे में कुछ नहीं बताया, क्यों नहीं बताया ये मैं नहीं जानता| शायद इसलिए की उसे ये जानकर जलन और दुःख होगा या फिर शायद इसलिए की कल को वो सबसे मेरे और अनु के बारे में कुछ न कह दे, या फिर इसलिए की उसका गंदा दिमाग इस सब का गंदा ही मतलब निकालता और फिर मेरा गुस्सा उस पर फूट ही पड़ता|!
मैं नीचे आया तो सब मुझे ही देख रहे थे क्योकि छत पर जब मेरी आवाज ऊँची हुई तो वो सब ने सुनी थी पर मैं कहा क्या ये वो सुन नहीं पाए थे! उनके लिए तो मैं रितिका को झाड़ रहा था| भाभी ने कहा की मैं खाना खा लूँ पर मैं बिना खाये ही बाहर चल दिया| भूख तो लगी थी पर मन अब घर में रहने को नहीं कर रहा था| मैं ने बाहर से फ्रूट चाट खाया और अनु को फ़ोन किया| उसे मैंने जरा भी भनक नहीं होने दी की अभी क्या हुआ! बात करते-करते मैं एक बगीचे में बैठ गया, कुछ देर बाद मुझे संकेत मिला और मेरी हालत देख कर वो समझ गया की लौंडा इश्कबाजी में दिल तुड़वा चूका है! उसने मुझसे लड़की के बारे में बहुत पुछा और मैं उसे टालता रहा ये कह कर की उस बेवफा को क्या याद करना! खेर मैं शाम को घर आया तो किसी ने मुझसे कोई बात नहीं की, चाय पी और आंगन में लेटा रहा| तभी वहाँ चन्दर आ गया और मुझे तना मारते हुए बोला; "मिल गई छुट्टी?" मैं एकदम से उठ बैठा और उसे सुनाते हुए कहा; "मुझे तो छुट्टी नहीं मिली पर तेरी तो बेटी की शादी है तूने कौन से झंडे गाड़ दिए?! अभी भी तो कहीं से पी कर ही रहा है!" वो कुछ बोलने को आया पर ताई जी को देख कर चुप हो गया| वो चुप-चाप अपने कमरे में घुसा और भाभी को आवाज दे कर अंदर बुलाया|
रात के खाने के समय ताई जी ने फिर मुझे बात सुनाने के लिए बोली; "भाई क्या जमाना आ गया है, चाचा की शादी हुई नहीं और हमें भतीजी की शादी करनी पड़ रही है!"
"दीदी क्या करें, बाहर जा कर इसके पर निकल आये हैं, तो ये हमारी क्यों सुनेगा?!" माँ ने कहा| मैंने चुप-चाप खाना खाया और अपने कमरे में आ गया| सर्दी शुरू हो चुकी थी इसलिए मैं दरवाजा भेड़ कर लेटा था की भाभी हाथ में दूध का गिलास ले कर आईं| आते ही उन्होंने शाल उतार कर रख दी, उन्होंने साडी कुछ इस तरह पहनी थी की उनका एक स्तन उभर कर दिख रहा था| ब्लाउज के दो हुक खोल कर वो मुझे अपना क्लीवेज दिखते हुए गिलास रखने लगीं| फिर
मेरी तरफ अपनी गांड कर के वो नीचे झुकीं और कुछ उठाने का नाटक करने लगी| पर मेरा दिमाग तो उनकी सौतेली बेटी के कारन पहले से ही आउट था! मैं एक दम से उठ बैठा और उनका हाथ पकड़ कर अपने पास खींच कर बिठाया| भाभी के चेहरे पर बड़ी कातिल मुस्कान थी, वो सोच रहीं थी की आज उन्हें मेरा लंड मिल ही जायेगा जिसके लिए वो इतना तड़पी हैं!
"क्यों करते हो ये सब?" मैंने उन्हें थोड़ा डाँटते हुए कहा|
"मैंने क्या किया?" भाभी ने अपनी जान बचाने के लिए कहा|
"ये जो अपने जिस्म की नुमाइश कर के मुझे लुभाने की कोशिश करते रहते हो!" मैंने भाभी के ब्लाउज के खुले हुए हुक की तरफ ऊँगली करते हुए कहा| ये सुन कर उनकी शर्म से आँखें झुक गई;
"बोलो भाभी? क्यों करते हो आप? आपको लगता है की इस सबसे मैं पिघल जाऊँगा और आपके साथ सेक्स करूँगा?!" अब भाभी की आँख से आँसू का एक कतरा उनकी साडी पर गिरा| ये देख कर मैं पिघल गया और समझ गया की बात कुछ और है जो भाभी मुझे बता नहीं रही;
"मुझे अपना देवर नहीं दोस्त समझो और बताओ की बात क्या है? क्यों आपको ये जिल्लत भरी हरकत करनी पड़ती है?" ये सुन कर भाभी एकदम से बिफर पड़ीं और रोने लगी, रोते-रोते उन्होंने सारी बात कही; "तुम जानते हो न अपने भैया को? बताओ मुझे और कुछ कहने की जर्रूरत है? इतने साल हो गए शादी को और मैं आज तक माँ बन नहीं पाई, बताओ क्यों? सारा दिन नशा कर-कर अपना सारा किस्म खराब कर लिया तो ऐसे में मैं क्या करूँ? कहीं बाहर इसलिए नहीं जाती की पिछली बार की तरह बदनामी हुई तो ये सब मुझे मौत के घाट उतार देंगे! इसलिए मैंने तुम्हारी तरफ आस से देखना शुरू किया! तुम्हारी तरफ एक अजीब सा खिचाव महसूस होता था| तुम्हें बचपन से बड़े होते देखा है, भले ही अब माँ बनने की उम्र नहीं मेरी कम से कम तुम्हें एक बार पा लूँ तो दिल को सकून मिले!"
“भाभी जो आपके साथ हुआ वो बहुत गलत है पर ये सब करना इसका इलाज तो नहीं? आप डाइवोर्स ले लो और दूसरी शादी कर लो!" मैंने भाभी को दिलासा देते हुए कहा|
"नहीं मानु! ये मेरी दूसरी शादी है और अब तीसरी शादी करना या करवाना मेरे परिवार के बस की बात नहीं! मेरे लिए तो तुम ही एक आखरी उम्मीद हो, रहम खाओ मुझ पर! तुम्हारा क्या चला जायेगा अगर मुझे दो पल की खुशियाँ मिल जायनेंगी?!" उन्होंने फिर रोते हुए कहा|
"नहीं भाभी मैं ये सब नहीं कर सकता!" मैंने उनसे दूर होते हुए कहा|
"क्यों?" भाभी ने अपने आँसू पोछते हुए कहा|
"क्योंकि मैं आपसे प्यार नहीं करता!"
"तो थोड़ी देर के लिए कर लो!" उन्होंने मिन्नत करते हुए कहा|
"नहीं भाभी ....मेरे साथ जबरदस्ती मत करो!"
"एक बार मानु! बस एक बार....
"
"भाभी प्लीज चले जाओ!" मैंने उन्हें थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए कहा क्योंकि उनकी आँखों में मुझे वासना नजर आ रही थी| भाभी की बातों से उनका दर्द मैं समझ सकता था पर एक उलझन थी, उन्हें बच्चा चाहिए या फिर अपने तन की आग मिटानी है| मेरा उनके साथ कुछ भी करना बहुत गलत होता इसलिए मैंने उनके साथ कुछ नहीं किया| भाभी उठ के जाने लगी तो मैंने कहा; "भाभी.... ताई जी से कहो की चन्दर को नशा मुक्ति केंद्र भेजे, थोड़ी तकलीफ होगी पर वो धीरे-धीरे सम्भल जायेगा| फिर हो सकता है की आपके रिश्ते उसके साथ सुधर जाएँ और प्लीज किसी और के साथ कुछ गलत करने की सोचना भी मत| आपकी इज्जत का बहुत मोल है, सिर्फ आपके लिए ही नहीं बल्कि इस घर के लिए भी| मैं भी दुआ करूँगा की आप को अपने पति से वो प्यार मिले जिस पर आपका हक़ है|" भाभी ने पहले हाथ जोड़ कर मूक माफ़ी माँगी और फिर हाँ में सर हिलाया और वो चली गईं| उनके जाने के बाद मुझे खुद पर गर्व हुआ क्योंकि मैं आज चाहता तो गलत रास्ते पर जा सकता था पर मैंने ऐसा नहीं किया, मैं लेट गया और चन्दर के बारे में सोचने लगा|
चन्दर बचपन से ही गलत संगत में रहा, पढ़ाई-लिखाई में उसका मन नहीं था क्योंकि वो जानता था की आगे उसे जमींदारी का काम संभालना है| उसे सुधरने के लिए घरवालों ने उसकी शादी जल्दी करा दी, ये सोच कर की वो सुधर जायेगा और वो कुछ सुधरा भी| पर फिर भाभी को वो प्यार नहीं दे पाया जो उसे देना चाहिए था| दिन भर खेत के मजदूरों के साथ गांजा फूकना शुरू किया तो भाभी पर से उसका ध्यान हटता रहा| फिर भाभी पेट से हुई, घर वाले लड़के की उम्मीद करने लगे और जब लड़की पैदा हुई तो सब ने उन्हें ही दोषी मान लिया| अब ऐसे में उन्हें खेत में काम करने वाले एक लड़के से प्यार हुआ और फिर वो काण्ड हुआ! उस काण्ड के बाद चन्दर के दोस्तों ने उसका बड़ा मजाक उड़ाया और इसी के चलते उसकी शादी फिर से करा दी| नई वाली भाभी का पति गौना होने से पहले ही मर गया था तो उनके लिए तो ये अच्छा मौका था पर उन्हें क्या पता की उन्हें एक चरसी के गले बाँधा जा रहा है, पता नहीं उसने नई भाभी को कितना प्यार दिया, या दिया भी की नहीं! बचपन से ही उसे इतने छूट दी गई थी जिसके कारन वो ऐसा हो गया| मेरे पैदा होने के बाद ना चाहते हुए भी घर में उसका और मेरा comparison शुरू हो गया और शायद इसी के चलते उसने किसी की परवाह नहीं की| खेतों में जाना छोड़ दिया, जो काम मेरे पिताजी को संभालना पड़ा| शहर वो सिर्फ और सिर्फ एक ख़ास 'माल' लेने जाता था, इस बहाने अगर किसी ने उसे कोई काम दे दिया तो वो करता या कई बार वो भी नहीं करता| ताऊ जी और पिताजी मजबूरी में सारा काम सँभालते थे क्योंकि उन्हें चन्दर से अब कोई उम्मीद नहीं थी|
यही सब सोचते-सोचते सुबह हुई और मैं जल्दी से उठ गया, छत पर योग किया और वॉक के लिए बाहर निकल गया| मेरे वापस आने तक पिताजी और ताऊ जी भी आ चुके
थे|
ताऊ जी: ये क्या हालत बना रखी है अपनी?
उन्होंने भी सब की तरह वही सवाल दोहराया|
मैं: जी बीमार हो गया था|
पिताजी: तो यहाँ नहीं आ सकता था? फ़ोन कर देता हम लेने आ जाते? यहाँ तेरी देखभाल अच्छे से होती|
मैं: आप सब को शादी-ब्याह की तैयारी करनी थी ऐसे में मुझे अपनी तीमारदारी करवाना सही नहीं लगा| अभी मैं ठीक हूँ|
पिताजी: बहुत अक्ल आ गई तुझ में? ये कुछ पत्रियाँ हैं इन्हें आज बाँट आ और वापसी में टेंट वाले को बोलता आइओ की वो कल आजाये|
पिताजी ने मुझे शादी का काम पकड़ा दिया जो मैं कर नहीं सकता था क्योंकि उस घर में हर एक क्षण मुझे सिर्फ और सिर्फ दर्द दे रहा था|
मैं: पिताजी ....आप सब से कुछ बात करनी है|
ताऊ जी: बोल? (उखड़ी हुई आवाज में)
मैं: मुझे एक प्रोजेक्ट मिला है जिसके लिए मुझे अमेरिका जाना है और फिर उसी कंपनी ने मुझे बैंगलोर में जॉब भी ऑफर की है|
मेरा इतना कहना था की ताऊ जी ने एक झन्नाटे दर तमाचा मेरे दे मारा|
ताऊ जी: चुप चाप ब्याह के कामों में हाथ बँटा, कोई नहीं जाना तूने अमेरिका!
मैं: ताऊ जी ये मेरी लाइफ का सवाल है!
पिताजी: भाई साहब ने कहा वो सुनाई नहीं दे रहा तुझे? कहीं नहीं जायेगा तू! जितना उड़ना था उतना उड़ लिया तू, अब घर बैठ!
मैं: पिताजी विदेश जाने का मौका सब को नहीं मिलता, मुझे मिला है और मैं इसे गंवाना नहीं चाहता| (मैंने थोड़ा सख्ती दिखते हुए कहा|)
ताऊ जी: तुझे विदेश जाना है ना, तू शादी कर मैं भेजता हूँ तुझे विदेश!
मैं: ताऊ जी आपको पता है की एक तरफ की टिकट कितने की है? 90,000/- रूपए है! दो लोगों का आना-जाना 4 लाख रूपए! वहाँ रहना-खाना अलग! एक ट्रिप के लिए सब कुछ बेचना पड़ जायेगा आपको!
ताई जी: तुझे शर्म नहीं आती जुबान लड़ाते?
ताऊ जी: नहीं ...नहीं...नहीं...बात कुछ और है! ये विदेश जाना इसका बहाना है, असल बात कुछ और है?
ताऊ जी कुछ-कुछ समझने लगे थे पर मुझे तो उनसे सच छुपाना था इसलिए मैं बस इसी बात को पकड़ कर बैठ गया|
मैं: नहीं ताऊ जी, मैं आपसे सच कह रहा हूँ| ये देखिये....
ये कहते हुए मैंने उन्हें फ़ोन में ई-मेल दिखाई जो उनके समझ तो आनी नहीं थी, इसलिए मैंने ऋतू को इशारे से बुलाया और उसे पढ़ने को कहा| उसने साड़ी मेल पढ़ी और ये भी की वो मेल अनु ने भेजा है|
रितिका: जी दादा जी|
पिताजी: चल एक पल को मान लेता हूँ पर तू कुछ दिन रुक कर भी जा सकता है ना? रितिका क्या तारिख लिखी है इसमें?
रितिका: जी 29 तरीक!
ताऊ जी: अब बोल?
मैं: (एक गहरी साँस लेते हुए) आपको सच सुनना ही है तो सुनिए, में इस शादी से ना खुश हूँ! इस Idiot को पढ़ाने के लिए मैंने क्या-क्या पापड़ नहीं बेले! वो पंडित याद है ना आपको जिसे आपने इसके दसवीं के रिजल्ट वाले दिन बुलाया था, उसे मैंने पूरे 5,000/- रुपये खिलाये थे ताकि वो आपके सामने झूठ बोले की इसके ग्रहों में दोष है, वरना आप तो इसकी शादी तब ही करा देते! और ये वहाँ शहर में उस मंत्री के लड़के से इश्क़ लड़ा रही थी! आप सब को पता है न उस मंत्री के बारे में की उसने क्या किया था? यही सब करने के लिए इसे शहर भेजा था आपने? शादी के बाद तो अब इसे वो मंत्री पढ़ने नहीं देगा!
मैंने जानबूझ कर रीतिका को बलि का बकरा बनाया, इधर मेरी बात सुन ऋतू का सर शर्म से झुक गया क्योंकि मैंने जो कहा था वो सच ही था! वहीं मेरे मुँह से ये सुनते ही ताऊ जी ने अपना सर पकड़ लिया और पिताजी समेत बाकी सभी लोग मुझे देखने लगे|
ताई जी: तो इसी लिए तो कल रितिका पर बरस रहा था, हमने कितना पुछा पर वो कुछ नहीं बोली बस रोती रही!
वो आगे कुछ और बोलतीं पर ताऊ जी ने हाथ दिखा कर उन्हें चुप करा दिया और खुद बोले;
ताऊ जी: तूने हम लोगों से दगा किया?
मैं: दगा कैसा? आप सब को प्यार से जब समझाया की इसे आगे पढ़ने दो तब आप सब ने मुझे ही झाड़ दिया तो मुझे मजबूरन ये करना पड़ा| मुझे क्या पता था की शहर जा कर इसे हवा लग जायेगी और ये ऐसे गुल खिलाएगी?!
पिताजी: कुत्ते! (पिताजी ने मुझे जीवन में पहली बार गाली दी|)
मैं: आप सब को मैं ही गलत लग रहा हूँ? इसकी कोई गलती नहीं? दो साल पहले तक तो आप सब इसे छोटी सी बात पर झिड़क दिया करते थे और आज अचानक इतना प्यार क्यों?
ताई जी: इसकी हिमायत इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इसके कारन हमें इतने बड़े खानदान से नाम जोड़ने का मौका मिल रहा है| समाज में हमें वो समान वापस मिलने वाला है जो इसकी माँ के कारन छीन गया था| तूने ऐसा कौन सा काम किया है?
मैं: ताई जी आपको बस घर के मान सम्मान की पड़ी है? कल से आया हूँ आप में से किसी ने भी ये पुछा की मेरी तबियत कैसी है? मुझे आखिर क्या बिमारी हुई थी? दो पल किसी ने प्यार से पुचकारा मुझे? ऐसा कौन सा जादू चला दिया इसने यहाँ रह कर?
ताऊ जी: बस कर! मैं तुझसे बस एक आखरी बार पूछूँगा, तू यहाँ रह कर शादी में शरीक होगा या फिर तुझे विदेश जाना है?
मैं: मैं विदेश जाना चाहता हूँ|
ताऊ जी: ठीक है, अपना सामान उठा और निकल जा मेरे घर से! दुबारा यहाँ कभी पेअर मत रखिओ, मैं तुझे
जायदाद से भी बेदखल करता हूँ|
ताऊ जी का फैसला सुन कर मुझे लगा की मेरे माँ-बाप रोयेंगे या मुझे समझायेंगे पर पिताजी ने गरजते हुए कहा;
पिताजी: सामान उठा और निकल जा!
मैं आँखों में आँसू लिए ऊपर अपना बैग लेने चल दिया| बैग ले कर आया और एक-एक कर सबके पेअर छुए पर किसी ने एक शब्द नहीं कहा| जब पिताजी के पाँव छूने आया तो उन्होंने मुझे दकके मारते हुए घर से निकाल दिया और दरवाजे मेरे मुँह पर बंद कर दिए| मैं अपने आँसू पोछते हुए चल दिया, आज मन बहुत दुखी था और खून के आँसू रो रहा था और इस सब का जिम्मेदार अगर कोई था तो वो थी रितिका! ना वो मेरी जिंदगी में जबरदस्त घुस आती और तबाही मचा कर मेरा हँसता-खेलता जीवन उजाड़ती! बस स्टैंड पर पहुँचने से पहले मुझे संकेत मिला और मैंने उससे मदद मांगते हुए कहा; "यार एक मदद कर दे! देख मुझे कुछ जर्रूरी काम से जाना पड़ रहा है तू प्लीज शादी के काम संभाल लिओ!" उस मिनट नहीं लगा कहने में की चिंता मत कर पर वो समझ गया की बात कुछ और है| पर मैंने उसे कहा की मैं बाद में बता दूंगा, फिलहाल वो मेरे घर में होने वाले कार्यक्रम को संभाल ले! उसकी यहाँ बहुत जान-पहचान थी और मैं जानता था की वो आसानी से सारा काम संभाल लेगा| मैं बस में बैठ कर वापस लौटा, घर आते-आते 2 बज गए थे और जैसे ही बैल बजी तो अनु ने ख़ुशी-ख़ुशी दरवाजा खोला| पर जब मेरी आँसुओं से लाल आँखें देखीं तो वो सब समझ गई और एकदम से मेरे गले लग गई और रो पड़ी| मैंने उसके सर पर हाथ फेरा और हम घर के अंदर आये| मैंने रितिका की शादी की बात छोड़ कर उसे सब बता दिया और वो भी बहुत दुखी हुई और कहने लगी की मैंने क्यों जबरदस्ती अमेरिका जाने की जिद्द की!
"वहाँ अब मेरी कोई जर्रूरत नहीं थी, मुझे अपनी जिंदगी में अब आगे बढ़ना है और वो सब मुझे अब भी इसी तरह बाँध के रखना चाहते हैं| मैं उड़ना चाहता हूँ पर उनकी सोच अब भी शादी पर अटकी हुई है! दो पल के लिए प्यार से बात कर के समझाते तो शायद मैं जाने से मना भी कर देता पर सब को मुझ पर सिर्फ गुस्सा ही आ रहा था| कल से किसी ने ये तक नहीं पुछा की मुझे बिमारी क्या हुई थी? मेरी अपनी माँ तक ने मेरा हाल-चाल नहीं लिया| तो अब क्या उम्मीद करूँ? अब या तो उनके हिसाब से चलो और जो वो कहें वो करो तो सब ठीक है पर जहाँ अपनी मर्जी चलानी चाही तो मुझे घर से निकाल दिया| मेरे अपने पिताजी ने मुझे धक्के मार कर घर से निकाल दिया|" ये कहते हुए मेरी आँखें फिर नम हो गईं| अनु ने आगे बढ़ कर मेरे आँसू पोछे और मुझे अपने सीने से लगा कर पुचकारा|
update 67
अपने ही माँ-बाप के द्वारा दुत्कारे जाने से मैं बहुत उदास था, पर इसमें उनका कोई दोष नहीं था, दोष था तो उस रितिका का!
खेर दोपहर का समय था पर खाने का जरा भी मन नहीं था| मन तो अनु का भी नहीं था पर वो जानती थी की खाना खा के मुझे दवाई लेनी है, पहले ही मैं सुबह घर से भूखे पेट निकला जा
चूका था| उन्होंने जबरदस्ती खाना परोसा और प्लेट मेरे सामने रख दी| मैंने ना में गर्दन हिला कर मना किया पर वो नहीं मानी, अपने हाथों से एक कौर मेरे होठों के सामने ले आईं| मेरा मन नहीं हुआ की मैं उनका दिल तोड़ूँ, इसलिए मैंने मुंह खोला और उन्होंने मुझे वो कौर खिला दिया| खाना खा कर मैं बालकनी में फिर अपनी जगह बैठ गया| मेरा सर चौखट से लगा था और घुटने मेरे सीने से दबे थे| अनु बिना कुछ बोले मेरे साथ बैठ गई और अपना सर मेरे दाएँ कंधे पर रख दिया| हम दोनों ऐसे ही चुपचाप बैठे रहे, मुझे लगा कहीं अनु खुद को इस सब के लिए दोषी न मानने लगे इसलिए मैंने बात शुरू की; "भगवान का शुक्र है की आप हो मुझे संभालने के लिए वरना पता नहीं मेरा क्या होता!" पर अनु खामोश रही अब उन्हें बुलवाने के लिए मुझे कुछ तो करना ही था|
"मैं तो बस तुझसे ही बना हूँ
तेरे बिन मैं बेवजह हूँ
मेरा मुझे कुछ भी नही, सब तेरा
सब तेरा, सब तेरा, सब तेरा" मैंने गाने के बोल गुनगुनाये तो अनु एक दम से मेरी तरफ देखने लगी और उनके होठों पर मुस्कराहट तैरने लगी जो मुझे पसंद थी|
"मैं तो तेरे रंग में रंग चुका हूँ
बस तेरा बन चुका हूँ
मेरा मुझमे कुछ नही, सब तेरा" अब तो ये सुन कर अनु जोश में आ गई और उसने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे खड़ा किया और अपने फ़ोन पर यही गाना लगा दिया| अनु मेरे सीने से लग कर खड़ी हुई और हम धीरे-धीरे झूमने लगे और गाने के बोल गुनगुनाने लगे| अब दोनों का मूड ठीक हो चूका था तो हमें जाने की प्लानिंग करनी थी| सामान अनु ने पहले से ही पैक कर दिया था, बस अब मेरी एक बाइक बची थी| जिसे बेचने का मन मेरा कतई नहीं था क्योंकि वो मैंने अपने पैसों से खरीदी थी, अनु मेरी परेशानी अच्छे से जानती थी इसलिए वो बोली; "तुम्हें ये बेचने की कोई जर्रूरत नहीं है|" इतना कह कर उन्होंने फटाफट एक फ़ोन घुमाया; "अक्कू! सुन बेटा मुझे लखनऊ से एक बुलेट भेजनी है बैंगलोर तो जरा पता कर के बताना कैसे भेजेंगे!" उस लड़के ने कुछ कहा होगा की अनु बोली; "ओये! तेरे लिए नहीं है, मेरे फ्रेंड की है| हाँ वही वाला!" ऐसे कहते हुए वो हँसने लगी| कॉल खत्म हुआ तो मैंने पुछा; "वही वाला? और कितने फ्रेंड हैं आपके?"
"पिछले कुछ दिनों से तुम मेल भेज रहे थे ना तो वो पूछ रहा था की वो मेल वाला फ्रेंड|" ये सुन कर मैं भी मुस्कुरा दिया| फिर मैंने उनसे उनका बैंक अकाउंट नंबर माँगा तो वो भड़क गईं; "मुझे पैसे दोगे?"
"अरे बाबा! अब यहाँ से जा रहा हूँ तो बैंक आकउंट यहाँ रख कर क्या फायदा? कौन बार-बार यहाँ आएगा, इसलिए अभी मैं आपके अकाउंट में पैसे ट्रांसफर कर रहा हूँ और बाद में वहाँ अकाउंट खुलने के बाद आप वापस मेरे अकाउंट में डाल देना||" ये सुनने के बाद वो समझीं और डिटेल्स दीं, पर जब अमाउंट ट्रांसफर हुआ और उन्होंने 4 लाख रुपये देखे तो वो आँखें फाड़े मुझे देखने लगी| "इस तरह आँख मूँद कर कभी किसी
पर विश्वास नहीं करना चाहिए!" अनु ने कहा|
"किसी पर नहीं करता, पर आप पर करता हूँ!" इतना कह कर मैं मुस्कुरा दिया|
"थैंक यू इतना विश्वास करने के लिए!" अनु ने मुस्कुराते हुए कहा| हमारे पास मुश्किल से दो दिन ही रह गए थे, मैंने अरुण-सिद्धार्थ को मिलने बुलाया, हम चारों हॉल में बैठे थे और अनु ने सब के लिए चाय बना दी थी| अनु मेरे साथ बैठी थी और अरुण और सिद्धार्थ मेरे सामने बैठे थे| पता नहीं क्यों पर वो दोनों कुछ ज्यादा ही मुस्कुरा रहे थे; "यार तुम दोनों को एक खुश खबरि देना चाहता हूँ!" मैंने कहा| इतना सुनते ही उनकी बाछें खिल गई| "बता यार, तेरे मुँह से खुशखबरी सुनने को कान तरस गए थे|" अरुण ने कहा|
"यार अनु को एक प्रोजेक्ट मिला जिसके सिलसिले में हम New York जा रहे हैं और उसके बाद वापसी में मैं अनु को ही बैंगलोर में ज्वाइन करूँगा|" मेरी बात अनु को अधूरी लगी तो उन्होंने उसमें अपनी बात जोड़ दी;
"Not as an employee but as a business partner!!!" ये सुन कर अरुण और सिद्धार्थ दोनों खुश हुए पर ये वो खबर नहीं थी जो वो सुनना चाहते थे|
"अरे wow!" अरुण ने कहा और सिद्धार्थ ने मुझसे हाथ मिलाया और इस बार उसकी पकड़ थोड़ी कठोर थी और वो मुझे आँखों से कुछ इशारा भी कर रहा था जिसे मैं समझ नहीं पाया था| "अब तो पार्टी बनती है!" अरुण बोला पर पार्टी सुनते ही अनु का चेहरा थोड़ा फीका पड़ गया क्योंकि मैं बाहर कुछ भी नहीं खा सकता था|
"Guys, डॉक्टर ने मुझे बाहर से खाने को मना किया है!" मैंने सफाई देते हुए कहा|
"अरे तो क्या हुआ? हम घर पर ही कुछ बना लेते हैं! चल गाजर का हलवा बनाते हैं!" सिद्धार्थ ने पूरे जोश में आते हुए कहा| इतना कह कर हम तीनों उठ खड़े हुए पर अनु बोल पड़ी;
"अरे तो तुम लोग बैठो मैं बनाती हूँ|"
"अरे mam आप क्यों तकलीफ करते हो, हम तीनों हैं ना!" अरुण बोला|
"ये क्या mam-मम लगा रखा है? You're not my employees anymore! Call me Anu!" अब ये सुन कर दोनों मेरी तरफ देखने लगे| तभी अनु दुबारा बोली; "मानु भी तो मुझे अनु कहता है फिर तुम्हें क्या प्रॉब्लम है?"
"Mam वो क्या है न हम इसकी तरह बद्तमीज नहीं हैं!" सिद्धार्थ ने मेरी टाँग खींचते हुए कहा|
"ओह! भाई साहब मुझे भी इन्होने ही बोला था की नाम से बुलाया करो!" मैंने अपनी सफाई दी|
"Guys, ये बात तो सच है की इससे ज्यादा तमीजदार लड़का मैंने नहीं देखा| Chivalry तो इनके रग-रग में बसी है|"
"Mam वो...
" अरुण कुछ कहने को हुआ तो अनु ने उसकी बात काट दी;
"Come on guys!" उनका इतना कहना था की दोनों मान ही गए और एक साथ बोले; "ओके अनु जी!"
"अनु जी नहीं सिर्फ अनु!" अनु ने कहा तो दोनों ने मुस्कुरा कर हाँ में सर हिलाया| उसके बाद हम तीनों ने किचन में मिलकर गाजर का हलवा बनाया और बनाते-बनाते हमारी बहुत सी बातें हुई, बहुत से राज खोले गए और हँसी मजाक खूब चला|
20 तरीक को हम सुबह एयरपोर्ट के लिए निकले, दिल का एक टुकड़ा अचानक से रो पड़ा और आँखें नम हो गईं| हम टैक्सी में बैठे थे और मेरी नजरें खिड़की से चिपकी हुईं थी, हर वो दूकान, हर वो मोहल्ला, हर वो सड़क जहाँ मैंने घूमते हुए इतने साल निकाले आज वो सब मैं पीछे छोड़ कर जा रहा था| कॉलेज से ले कर अब तक करीब 7 साल बिताने के बाद जैसे दिल का एक हिस्सा यहीं रह जाना चाहता था| इस शहर ने मेरी जिंदगी का हर एक पहलु देखा था फिर चाहे वो कॉलेज में पढ़ने वाले स्टूडेंट की आवारागर्दी हो या मोहब्बत में चोट खाये आशिक़ के आँसू! मेरे ये आँसू अनु से छुप नहीं पाए और उन्होंने मेरी ठुड्डी पकड़ के अपनी तरफ घुमाई और आँखों के इशारे से पुछा की क्या हुआ? तो मैंने उन्हें अपने मन के ख्याल सुना दिए| ये सुन कर वो मुस्कुरा दी और मेरे माथे को चूमते हुए बोलीं; "तुम शहर छोड़ कर नहीं बल्कि इस यादें अपने सीने में बसाये ले जा रहे हो|" मैंने हाँ में सर हिलाया और उनकी बात accept की!
इमोशनल होते हुए हम एयरपोर्ट पहुँचे, ये मेरी लाइफ की पहली हवाई यात्रा थी जो अनु करवा रही थी| कहने को तो ये ढाई घंटे की यात्रा थी पर मेरे लिए ये यादगार यात्रा थी| अपने फ़ोन से मैं जितनी पिक्चर ले सकता था वो लीं, अनु को मुझे ऐसा करता देख एक अजीब सा सुख मिल रहा था और वो बैठी बस मुस्कुराती हुई मुझे देख रही थी| मैं उनके पास आया और उनके साथ बहुत सी selfie खींची| रितिका और मेरी साड़ी selfie तो मैं डिलीट कर चूका था और फ़ोन खाली था, तो सोचा की उसे एक अच्छे दोस्त के साथ फोटो खींच कर भर दूँ| खेर जब बोर्डिंग शुरू हुई तो हमारी seats एक साथ नहीं बल्कि दूर-दूर थीं क्योंकि मेरी टिकट लास्ट में बुक हुई थी| पर अनु बहुत होशियार थी, उनकी बगल वाली सीट पर एक लड़की बैठी थी तो उसने उससे कहा; "excuse me, मेरे हस्बैंड और मेरी seats दूर-दूर मिली हैं तो आप प्लीज वहाँ बैठ जाओगे?" उस लड़की ने मुस्कुराते हुए हाँ भरी और मेरे पास आई और मेरे कंधे को छूते हुए कहा; "आपकी वाइफ बुला रही हैं!" मैं हैरानी से उसे देखने लगा की ये क्या बोल रही है, फिर मैंने पलट कर देखा तो अनु हँस रही थी| मैं समझ गया और उठ कर उनके पास चल दिया| "यार आपको चैन नहीं है ना?" मैंने हँसते हुए कहा| मैं उनके बगल वाली सीट पर बैठने लगा तो उन्होंने मुझे अपनी खिड़की वाली सीट दे दी| हवाई जहाज में पहलीबार बैठना वो भी खिड़की वाली सीट पर! Take off से पहले सीट बेल्ट की announcement हुई और फ़ोन switch off करने की पर आज मैं अपने जीवन
में पहली बार अपना फ़ोन 'airplane' mode में डालने को मरा जा रहा था| जब मैंने ये बात अनु को बताई तो वो भी मेरा बचपना सुन हँस पड़ी| Take off और Land करते हुए मेरी थोड़ी फटी थी पर अनु ने मेरे बाएँ हाथ पर अपने हाथ रखे हुए थे तो डर कम लगा| हम बैंगलोर पहुँचे और बाहर निकलते ही मैंने उस जमीन को अपनी उँगलियों से iछू लिया| "जब पहलीबार लखनऊ आया था कॉलेज पढ़ने तब भी मैंने ये किया था और आप देखो कितना प्यार दिया उस शहर ने और आज यहाँ नई जिंदगी शुरू करने आया हूँ तो गर्व महसूस हो रहा है|" मैंने कहा तो अनु ने मेरी पीठ थपथपाई! अनु ने अक्कू को फ़ोन किया तो उसने हमें बाहर बुलाया, बाहर पहुँच कर देखा तो मुझे विश्वास नहीं हुआ, वहाँ अक्कू मेरी बाइक के साथ खड़ा था| मैंने हालाँकि अक्कू को तो नहीं पहचाना पर अपनी बाइक को पहचान गया था| "तुम्हारा welcome gift!" अनु ने कहा तो मेरे चेहरे पर खुशियाँ अपने रंग बिखेरने लगी| "बेटा ये तीन बैग ले कर तू घर निकल हम तुझे वहीँ मिलेंगे|" अनु ने अक्कू को कहा और उसने तुरंत ऑटो कर लिया| मैंने दाहिने हाथ को चूमा और फिर उसी हाथ से बाइक को छुआ और फिर उस पर सवार हो कर बड़े स्टाइल से किक मारी, वो भड़भड़ करते हुए स्टार्ट हुई और ये आवाज नए शहर में सुन मेरे मन में रोमांच भर उठा| अनु पीछे से आ कर मेरे से सट कर बैठ गई| "सच्ची आज एक आरसे बाद तुम्हारे साथ बाइक पर बैठने का मौका मिला है|" अनु खुश होती हुई बोली और मुझे पीछे से थाम लिया| अनु मुझे रास्ता बताती रही और मैं बाइके ख़ुशी-ख़ुशी चलाता रहा, रास्ते में पड़ने वाली हर जगह के बारे में मुझे जानकारी दी| अंततः हम घर पहुँचे, नीचे बाइक खड़ी कर के हम ऊपर पहुँचे तो अनु ने घंटी बजाई दरवाजा एक मलयाली लड़की ने खोला जो वहाँ काम करती थी| उसके हाथ में पूजा की थाली थी और मेरे चेहरे पर हैरानी! "वो दीदी ने बोला की आप आ रे कर के!"
"यार मेरा ग्रह प्रवेश हो रहा है क्या?" मैंने कहा और फिर हम तीनों ठहाका मार के हँसने लगे| खेर अंदर जाने के बाद अनु ने मेरा उस लड़की से इंट्रो करवाया, उसका नाम 'रंजीथा' था| (नाम लिखने में कोई गलती नहीं हुई है, असली नाम यही था रंजीथा|) पर ये घर 1 BHK था और मुझे रंजीथा के सामने उनके कमरे में जाने में झिझक हो रही थी| इतने में अक्कू समान ले कर आ गया, मैंने फ़ौरन उसके हाथ से सूटकेस लिया| अब अक्कू और रंजीथा के सामने मैं कैसे सामान अंदर रखूँ?
मैं हॉल में ही बैठ गया और इधर अनु ने रंजीथा को खाना बनाने के बारे में instruction शुरू कर दिया| अक्कू उर्फ़ आकाश एक ट्रेनी था और उसी की तरह एक और लड़का था जिसका नाम रवि था| दोनों MBA स्टूडेंट्स थे और अनु के पास training ले रहे थे| "तो ऑफिस चलें?" मैंने पुछा तो अनु अक्कू को देखने लगी और फिर ना में सर हिला दिया| "आज ही तो आये हैं और तुम्हें आज से ही काम स्टार्ट करना है? चलो पहले थोड़ा घूम लो, ऑफिस कल से ज्वाइन कर लेना| मैंने भी सोचा की ठीक ही
तो है आज का दिन शहर ही घुमते हैं| इसलिए वो पूरा दिन हम शहर घुमते रहे और जब रात को वापस आये तो मुझे अनु के कमरे में मेरा सामान मिला| "मैं हॉल में ही सो जाता हूँ!" मैंने कहा तो अनु भड़क गई; "क्या हॉल मैं सो जाता हूँ? ये डबल बीएड पर मैं अकेले सोऊँ?"
"यार अच्छा नहीं लगता की हम दोनों एक घर में एक ही रूम में सोएं! आपके employees और रंजीथा क्या सोचेगी?"
"मानु ये लखनऊ नहीं है, यहाँ लोग Live-in रिलेशनशिप में रहते हैं और तुम हो के बेड शेयर करने से डर रहे हो? हम सिर्फ एक बेड शेयर कर रहे हैं ना और तो कुछ नहीं? So grow up!"
लेटते ही अनु को नींद आ गई पर मेरे लिए जगह नई थी तो थोड़ी बेचैनी थी! मैं चुप-चाप उठा और बालकनी में खड़ा हो गया और उस सोते हुए शहर को देखने लगा| मुझे वो शहर भी लखनऊ जैसा ही लगा बीएस दिन के समय ये लखनऊ से अलग था वर्ण रात में तो ये अब भी वैसे ही लग रहा था| मैं हाथ बाँधे खड़ा चाँद को निहारता रहा और जब लगने लगा की अब नींद आ रही है तो सोने चला गया| अगले दिन सबसे पहले उठा और चाय बनाने की सोची पर कीतचने में क्या कहाँ रखा है उसमें थोड़ा समय लगा| आखिर चाय बन गई और मैं अनु के लिए चाय ले कर पहुँचा तो वो करवट ले कर लेटी हुई थी| मैंने उनके साइड टेबल पर चाय रखी और एक आवाज दी और उन्होंने आँख खोल दी| सामने चाय देख वो उठ बैठीं; "अरे मुझे बोला होता?"
"जल्दी उठ गया था तो सोचा चाय बना लूँ!" मैंने कहा और उनके सामने बैठ कर चाय की चुस्की लेने लगा| फिर हम रेडी हुए और ऑफिस के लिए निकले, अभी मैं बाइक पार्क ही कर रहा था की अनु ने अक्कू को कॉल कर दिया| मैंने ये नहीं देखा और जब मैं आया तो हम एक बुलिडिंग में दाखिल हुए, मुझे लगा की इतनी बड़ी बिल्डिंग में ऑफिस होना ही बड़ी बात है पर जब हम ऊपर पहुँचे तो ये एक शेयर्ड ऑफिस निकला| दरवाजे पर अक्कू और रवि दोनों प्लेट ले कर खड़े थे, दरवाजे पर वेलकम का स्टीकर था और मैं ये देख कर खुश था| रवि चूँकि ब्राह्मण था तो वो मंत्र पढ़ते हुए उसने तिलक किया और फिर आरती ले कर हम अंदर घुसे| सामने ही एक छोटा सा मंदिर था मैंने वहाँ प्रणाम किया और प्रार्थना की कि भगवान हमें काम में तरक्की देना| अनु का ऑफिस कुल मिला कर बीएस दो कमरों का ही था, एक बड़ा हॉल जिसमें दो डेस्क थे जिनपर प्रिंटर और दोनों लड़कों के लैपटॉप थे| दूसरा था एक छोटा केबिन जिसमें एक बॉस चेयर, बॉस टेबल और उसके सामने दो चेयर्स अनु ने मुझे अपनी चेयर पर बैठने को कहा पर मैं नहीं माना; "ये आपकी जगह है!" मैंने कहा पर तभी अक्कू ने Partnership Deed अनु के हाथ में दी| अनु ने वो दीड टेबल पर रखी और मुझे कहा; "ये लो partnership deed इस पर साइन करो और पूरे हक़ से यहाँ बैठो|
"पर इसकी क्या जर्रूरत है?" मैंने कहा|
"अरे कमाल करते हो? बिना इस पर साइन किये हम अकाउंट कैसे खोलेंगे? और अभी तो और भी जर्रूरी डाक्यूमेंट्स हैं जिन पर तुम्हें साइन करना है!" उनकी बात सही थी
इसलिए मैंने बिना पड़े ही साइन कर दिया| "पढ़ तो लो?" अनु ने कहा|
"आपने पढ़ लिया था न? तो बस!" मैंने कहा| पर अब अनु फिर से कहने लगी की मैं उसकी सीट पर बैठूँ; "नहीं...ये आपकी जगह है धीरे-धीरे जब मैं इस ऑफिस में अपनी जगह बना लूँगा तब बैठूंगा, पर फिलहाल तो मुझे बाकियों से मिलवाओ!" इतना कह कर मैंने बात टाल दी और फिर अनु ने मुस्कुराते हुए आस-पड़ोस वाले Bosses से इंट्रो कराया ये कह के की मैं उनका Business Partner हूँ! सबसे मिलकर हम वापस आये, रवि और अक्कू अपने डेस्क पर बैठे काम कर रहे थे| "अच्छा आकाश आप मुझे clients की lists दे दो!" मैंने कहा तो उसने जवाब में "ओके सर" कहा| उस समय मेरी छाती गर्व से फूल गई| जिस इंसान ने इतने साल से सबको सर कहा हो अचानक से उसे कोई सर कहे तो उसे कितना गर्व होता है ये मुझे उस दिन पता चला| मैं तो काम में लग गया पर अनु ने शॉपिंग शुरू कर दी| लंच टाइम मैंने सबके लिए बाहर से खाना मंगाया और मेरा खाना तो मैं साथ ही लाया था| आकाश और रवि ने पुछा तो मैंने उन्हें बता दिया की मेरी तबियत ठीक नहीं है और डॉक्टर ने मुझे बाहर के खाने से परहेज करने को कहा है| शाम होते ही अनु मुझे मॉल ले गई और वहाँ उसने मुझे बिज़नेस सूट दिलवाया, अब चूँकि मुझे New York जाना था तो presentable तो लग्न था| फिर वहीँ एक saloon में मुझे एक अच्छा सा haircut और beard स्टाइल करवाया और अब मैं वाक़ई में हैंडसम लग रहा था| "हाय! मानु सच्ची बड़े सेक्सी लग रहे हो!" अनु ने कहा और इधर मेरे गाल शर्म से लाल हो गए| जब मैंने खुद को आईने में देखा तो पाया की कहाँ उस दिन जब मैंने खुद को आईने में देख कर अफ़सोस किया था और कहाँ आज जब मैं वाक़ई में इतना हैंडसम दिख रहा हूँ|
खेर दूसरे दिन हमारी New York की फ्लाइट थी और उत्साह से भरे हम दोनों वहाँ पहुँचे और होटल में check-in किया| वो पूरी रात हमने presentation और बाकी की सारी तैयारी में लगा दी| हमारी प्रेजेंटेशन से पहले एक सेमीनार था जहाँ उनहोनेकुछ guidelines दी थीं, मुझे उसके हिसाब से थोड़े changes करने पड़े और हम तैयार थे| कॉन्फ्रेंस रूम में दो Americans बैठे थे जिन्हें हमें प्रेजेंटेशन देनी थी| स्टार्ट अनु ने किया और जैसे ही data present करने की बारी आई तो उन्होंने मुझे पॉइंटर दे दिया| मैंने बड़े ही आराम से उन्हें सारा कुछ समझाया और उसके बाद उन्होंने हमें बाहर बैठने को कहा| हम दोनों ही बाहर बेसब्री से इंतजार कर रहे थे की तभी उन्होंने हमें अंदर बुलाया और कॉन्ट्रैक्ट ऑफर किया| ये सुनते ही अनु ख़ुशी से उछल पड़ी और मेरे गले लग गई और मेरे दाएं गाल को अपनी लिपस्टिक से लाल कर दिया|, ये देख वो अंग्रेज भी हँसने लगे और हम दोनों भी हँसने लगे| "Thank you sir for giving us this opportunity and I promise we’ll deliver what we promised!” मैंने ये कहते हुए उनसे हाथ मिलाया और फिर हम दोनों हँसी-ख़ुशी बाहर आये| बाहर आते ही ऋतू ने फिर से मुझे अपनी बाहों में कस लिया| आज दिवाली थी तो वहाँ से निकल कर हम सीधा होटल आये और
वहाँ नहा-धो कर हम ने कपडे बदले| मैंने कुरता-पजामा और अनु ने साडी पहनी और हम सीधा मंदिर पहुँचे| ये पहलीबार था की मैं दिवाली पर अपने परिवार के साथ नहीं था और जब हम मंदिर पहुँचे तो वहाँ सब लोगों को उनके परिवार के साथ देख आखिर मेरी आँखें छलक ही आईं| अनु ने मेरे आँसू पोछे पर उनका भी वही हाल था जो मेरा था| मैंने उनकी आँखें पोछीं और फिर हमने भगवान के दर्शन किये और अपने लिए तथा अपने परिवारों के लिए भी प्रार्थना की| पूजा के बाद मैंने संकेत को फ़ोन किया और उससे हाल-चाल लेने लगा तो उसने जो बताया वो सुन कर मैं हैरान हो गया| मेरे घर में बाकायदा पूजा हो रही थी और खुशियाँ मनाई जा रही थी, किसी को भी मेरे ना होने का गम नहीं था! दिल दुखा की मैं यहाँ सब को इतना miss कर रहा हूँ और वहाँ किसी को कोई दुःख भी नहीं, पर फिर ये सोचा की मेरी कमी शायद रितिका की शादी ने पूरी कर दी होगी| शादी की सारी तैयारियाँ संकेत करवा रहा था जिससे पिताजी और ताऊ जी को थोड़ी सहूलत थी| उन्होंने उसे ये भी बता दिया था की मुझे घर से निकाल दिया गया है क्योंकि मैंने भतीजी की शादी की जगह विदेश जाना ज्यादा जर्रूरी समझा जिस पर संकेत ने मुझे डाँटा| पर मैं उसे सच नहीं बता सकता था इसलिए जो वो कह रहा था वो सब सुनता रहा| फ़ोन पर बात करने के बाद मैं उदास खड़ा था की तभी अनु ने पीछे से आ कर मेरा दाहिना हाथ थाम लिया| "क्या हुआ? घर पर सब ठीक है ना?" अनु ने पुछा तो मैंने झूठी मुस्कान के साथ कहा; "हाँ...
सब ठीक है! चलो चल कर कुछ खाते हैं!" अब चूँकि वहाँ घर का खान नहीं मिल सकता था तो बाहर खाने के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं था| पर मेरी तबियत में पहले से काफी सुधार था इसलिए मैंने ये रिस्क ले लिया| खाना मैं कम मिर्च और तेल वाला ही खा रहा था ताकि कुछ कम्प्लीकेशन ना बढे| खा-पी कर हम होटल लौटे और लेट गए, अनु जानती थी की मेरा मन उदास है और कहीं मैं इस दुःख को फिर से अपने सीने से ना चिपका लूँ इसलिए आज लेटते समय उन्होंने मेरी कमर पर हाथ रख दिया| उनका ऐसा करना मेरे लिए बहुत अजीब था क्योंकि मेरे शरीर के सारे रोएं खड़े हो गए थे| पर मैं चुप-चाप पड़ा रहा, कुछ देर लगी सोने में और आखिर नींद आ ही गई| कुछ देर बाद उन्होंने धीरे से हाथ सरका लिया और दूसरी तरफ मुँह कर के सो गईं| अगली सुबह हम दोनों देर से उठे और उठने के बाद भी नींद पूरी नहीं हुई शायद जेट लेग हो गया था| वो पूरा दिन हमने ऊँघते हुए बिताया और कंपनी के साथ बैठ कर कुछ स्टडी किया| शाम हुई तो आज मन 'cheating' करने को कर रहा था| सर्दी का आगाज हो चूका था तो कुछ तो चाहिए था! "आज बियर पीएं?" मैंने एक्ससिटेड होते हुए पुछा तो अनु चिढ गई; "बिलकुल नहीं! जरा सा ठीक हुए नहीं की बियर पीनी है!" मैंने आगे कुछ नहीं कहा और मुस्कुरा दिया, उनका इस कदर हक़ जताना मुझे अच्छा लगता था| हम आखिर होटल आ गए तो खाना खा कर जल्दी सो गए| सुबह मैं जल्दी उठ गया और मैंने रवि को कॉल किया और उससे कुछ अपडेट लेने लगा| फिर अचानक से मुझे कुछ याद आया और मैंने कुछ पुरानी कम्पनियाँ जिनके साथ 'कुमार' काम करते थे उन्हें मैंने मेल भेज दिए| चूँकि इन कंपनियों का data मैं ही देखता था तो मेरे लिए ये काम आसान था| 8 बजे अनु भी उठ गई और मुझे ऐसे काम करते देख कर मेरे पास आईं और मेरे हाथ से लैपटॉप छीन लिया| "थोड़ा आराम भी कर लो!" इतना कहते हुए वो लैपटॉप अपने साथ ले गईं| मैंने शाम को घूमने का प्लान बना लिया, और मीटिंग के बाद हम घूमने निकल पड़े| हमारे पास दिन बहुत थे इसलिए हमें कोई जल्दी नहीं थी|
दिन निकलते गए और मेरी दोस्ती एक गोरी से हो गई, पर अनु को वो फूटी आँख नहीं भाति थी! जब भी मैं उससे बात करता तो अनु मेरे पास आ कर बैठ जाती| मुझे अनु को इस तरह सताने में बड़ा मजा आता था और मैं जानबूझ कर उससे लम्बी-लम्बी बातें किया करता था| उसकी रूचि थी इंडिया घूमने की और मैं उसे अलग-अलग जगह के बारे में बताया करता था| अनु को शायद ये डर था की कहीं मैं उस गोरी जिसका नाम लिज़ा था उससे प्यार तो नहीं करता? एक दिन की बात है हम दोनों कॉफ़ी पी रहे थे की अनु भी आ कर बैठ गईं| लिज़ा को किसी ने बुलाया तो वो excuse me बोल कर चली गई| उसके जाते ही अनु ने मेरे कान पकड़ लिए; "इससे शादी कर के यहीं सेटल होने का इरादा है क्या?" ये सुन कर मैं हँस पड़ा|
"वो मैरिड है!" मैंने हँसते हुए कहा और तब अनु को समझ आया की इतने दिन से मैं उन्हें सताये
जा रहा था| वो भी हँसने लगी और फिर एकदम से खामोश हो गई; "क्या हुआ?" मैंने पुछा|
"तुम्हारी दोस्ती खोने का डर सताने लगा|" अनु ने उदास होते हुए कहा|
"Are you mad? ऐसा कुछ नहीं होगा, मैं भला आपको छोड़ दूँ? मेलि प्याली-प्याली दोस्त को!" मैंने अनु की ठुड्डी पकड़ते हुए कहा| ये सुन कर अनु फिर से मुस्कुराने लगी| उस दिन शाम को लिज़ा और उसका पति भी हमारे साथ घूमने आये और फिर मौका आया पीने का| अब अनु उनके सामने मुझे कैसे मना करती पर फिर मैंने ही मना किया| इस बार अनु ने खुद कहा; "just one beer!" हमने बस एक-एक बियर पी और फिर होटल लौट आये| दि
न गुजरते गए और आखिर हम वापस बैंगलोर आ ही गए और अनु ने आते ही रवि और आकाश को इस प्रोजेक्ट पर लगा दिया| पर वो अकेले इसे संभाल नहीं सकते थे इसलिए मैंने उनके साथ बैठना शुरू कर दिया, अनु की involvement कम थी क्योंकि ये advanced accounting थी और Indian Accounting Standards की जगह GAAP के हिसाब से काम करना था जिसके बारे में मैंने उन कुछ दिनों में सीखा था, बाकी का सब मैंने केस-स्टडी से सीखना शुरू कर दिया| मैंने जो पुरानी कंपनियों को मेल किया था उसमें से 1-2 ने रिवर्ट किया था तो मैंने वो काम अनु को दे दिया| वो बहुत हैरान थी की मैंने उन्हें क्यों approach किया| कुमार ने तो काम बंद कर दिया अब अगर हमें उनके client मिल जाते हैं तो अच्छा ही है! वो तो मेरी repo थी की उन लोगों ने 1-1 क्वार्टर की returns का काम हमें दे दिया था| कुल मिला कर काम अच्छा चल पड़ा था, सिर्फ पुराने क्लाइंट्स से ही हमने अच्छा प्रॉफिट कमा लेना था| USA वाली का काम थोड़ा मुश्किल था पर पैसा बहुत अच्छा था| हालाँकि उन्होंने कॉन्ट्रैक्ट बहुत थोड़े टाइम का दिया था पर मुझे पूरी उम्मीद थी की वो कॉन्ट्रैक्ट आगे extend जर्रूर करेंगे|
मुश्किल से हफ्ता बीता होगा की अनु का जन्मदिन आ गया था|
update 68
19 को अनु का जन्मदिन था तो मैंने 18 को ही सोच लिया था की मुझे क्या करना है| 18 का पूरा दिन मैं ऑफिस में ही था, शाम होने को आई तो मैंने अनु को अकेले ही भेज दिया क्योंकि मुझे data फाइनल करना था ताकि कल का पूरा दिन मैं और अनु घुमते रहें! मैं रात को ठीक साढ़े ग्यारह बजे पहुंचा और चूँकि मेरे पास डुप्लीकेट चाभी थी तो मैं दबे पाँव अंदर आया| हॉल में मैंने केक रखा और मोमबत्ती लगाई और मैं पहले चेंज करने लगा, जैसे ही बारह बजे मैंने अनु को आवाज दे कर उठाया| पर वो एक आवाज में नहीं उठी, मैंने साइड लैंप जलाया और फिर पूरा हैप्पी बर्थडे वाला गाना गाय; "Happy Birthday to you,
Happy Birthday Dear Anu,
Happy Birthday to You" तब जा कर अनु की आँख खुली और उन्होंने मुस्कुराते हुए मुझे देखा| मैंने उनके सामने घुटनों के बल बैठा था, अनु एक दम से उठी और मेरे गले लग गई| "thank you" कहते-कहते उनकी आवाज रोने वाली हो गई| मैं समझ गया की वो अपने मम्मी-डैडी को miss कर रही हैं| 'अच्छा अब रोना नहीं है, चलो बाहर आओ एक सरप्राइज है!" ये कहते हुए मैं उन्हें बाहर लाया और केक
देख कर वो खुश हो गेन| उन्होंने मुझे एक बाद फिर गले लगा लिया| मैंने फ़ौरन मोमबत्ती जलाई और फिर उन्होंने केक काटा| हम दोनों हॉल में ही सोफे पर बैठ गए| "एक आरसे बाद मैं अपना birthday celebrate कर रही हूँ! पर मुझे लगा की तुम इतना busy हो तो शायद भूल गए होगे?"
"इतने साल आप से दूर रहा तब आपको wish करना नहीं भूला तो साथ रह कर भूल जाऊँगा?"
रात में भूख लगी तो मैंने मैगी बनाई और दोनों ने किचन में खड़े-खड़े खाई और फिर सोने चले गए| अगली सुबह मैं जल्दी उठा और coffee बना कर अनु के साइड टेबल पर रखते हुए कहा; "coffee for the birthday girl!" अनु एक दम से उठ बैठी और मेरा हाथ पकड़ कर वहीं बिठा लिया| "तो आज का क्या प्रोग्राम है?" अनु ने पुछा| मैं एक दम से खड़ा हुआ और दोनों हाथ हवा में उठाते हुए चिल्लाया; "Road Trip!!!!" ये सुनते ही अनु भी excited हो गई! "पर कहाँ?" अनु ने पुछा| "Shivanasamudram Falls!!!!" मैंने कहा और हम दोनों कूदने लगे, मैं जमीन पर अनु पलंग पर! रंजीथा आई तो अनु ने उसे भी केक खिलाया, मैंने आकाश और रवि को भी बुला लिया था| दोनों ने आ कर अनु को विश किया और सबने केक खाया| रवि ने मना किया क्योंकि उसे लगा की इसमें अंडा होगा पर मैंने उसे बताया की इसमें अंडा नहीं है तो उसने भी तुरंत खा लिया| हम दोनों तैयार हो कर बाइक से निकले, पूरे 135 किलो मीटर की ड्राइव थी| पहले 60 किलोमीटर में ही हवा निकल गई इसलिए मैंने बाइक एक रेस्टुरेंट पर रोकी और दोनों ने एक-एक कप स्ट्रांग वाली कॉफ़ी पी और फिर से चल पड़े| कुछ देर बाद रोड खाली आया तो अनु जिद्द करने लगी की उसे ड्राइव करना है| आजतक उन्होंने स्कूटी ही चलाई थी और ऐसे में ये भारी भरकम बाइक वो कैसे संभालती? उन्हें मना करना मुझे ठीक नहीं लगा, इसलिए मैंने उन्हें आगे आने को कहा| "ये बहुत भारी है, आप संभाल नहीं पाओगे, मैं आपके नजदीक आ कर बैठ जाऊँ?" मैंने उनसे पुछा| अब थोड़ा दर तो उन्हें भी लग रहा था क्योंकि बुलेट पर बैठते ही उन्हें उसके वजन का अंदाजा मिल गया था| "प्लीज गिरने मत देना!" इतना कहते हुए उन्होंने मुझे अपने नजदीक बैठने की इजाजत दी| मैंने उन्हें जब बाइक स्टार्ट करने को कहा तो उनसे वो भी नहीं हुई क्योंकि मैंने किक थोड़ी टाइट रखी थी ताकि मैं उसे स्टाइल से स्टार्ट करूँ| अब इसमें self था नहीं जो वो एक बटन दबा कर स्टार्ट कर लेतीं, इसलिए मुझे ही खड़े हो कर बाइक स्टार्ट करनी पड़ी| अब बुलेट की भड़भड़ आवाज सुन कर ही वो डर गईं और क्लच छोड़ ही नहीं रही थीं| "no...no ...no ...
मैं नहीं चालाऊँगी!" अनु ने घबराते हुए कहा| अब मुझे लगा की अगर इन्होने डर के एक दम से छोड़ दिया तो दोनों टूट-फुट जाएंगे! इसलिए मैंने दोनों हाथ उनके पेट पर लॉक कर दिए और बड़ी धीमी आवाज में उनके कान में कहा; "क्लच को धीरे-धीरे छोडो जैसे आप स्कूटी चलाते टाइम छोड़ते हो!" मेरे उनके छू भर लेने से अनु की सांसें तेज हो गईं थी पर जब मैंने धीरे से उनके कान में instructions दी तो उन्होंने खुद पर काबू किया और धीरे-धीरे क्लच छोड़ा| शुरुरात में थोड़े झटके लगे और फिर बाइक चल गई पड़ी| अब मुझे भी एहसास हुआ की मुझे उनको ऐसे नहीं छूना चाहिए था, मैंने धीरे-धीरे अपने हाथ उनके पेट से हटा लिए ताकि वो नार्मल हो जाएँ| अनु का ध्यान अब बाइक पर था और मेरा ध्यान सब तरफ था की कहीं कोई आकर हमें ठोक नहीं दे| कुछ देर बाद आखिर उनका हाथ बैठ ही गया, घंटे भर में ही उनका मन भर गया और उन्होंने फिर मुझे चलाने को कहा| मैंने इस बार कुछ ज्यादा ही तेजी से चलाई जिससे अनु को मुझसे चिपक कर बैठना पड़ा| साढ़े तीन घंटे मकई ड्राइव के बाद हम पहुँचे और वहाँ का नजारा देख कर शरीर में और फूर्ति आ गई| पानी का शोर सुन कर ही उसमें कूद जाने का मन कर रहा था| हमने वहाँ मिल कर खूब मौज-मस्ती की और शाम को निकले| घर आते-आते 10 बज गए, वो तो शुक्र है की रंजीथा जाते-जाते खाना बना गई थी वरना आज भूखे ही सोना पड़ता| खाना खा कर मैं उठा तो अनु बोली; "Thank you आज का दिन इतना स्पेशल और memorable बनाने के लिए!"
"Thank you आपको की आपने पहले वाले मानु को फिर से मरने नहीं दिया!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा और हम दोनों सो गए|
अब आया क्रिसमस और हररोज की तरह जब मैं अनु की बेड टी ले कर आया तो अनु बोली; "रोज-रोज क्यों तकलीफ करते हो?"
"तकलीफ कैसी ये तो मेरा प्यार है!" मैंने हँसते हुए कहा पर अनु के पास इसका जवाब पहले से तैयार था; "थोड़ा और प्यार दिखा कर खाना भी बना दो फिर!"
"अच्छा चलो आज आपको अपने हाथ का खाना भी खिला देता हूँ| उँगलियाँ ना चाट जाओ तो कहना| पर अभी तैयार हो जाओ चर्च जाना है|" मैंने कहा|
"क्यों शादी करनी है?" अनु ने मुझे चिढ़ाते हुए कहा|
"शादी तो हम रजिस्ट्रार ऑफिस में कर्नेगे पहले चर्च जा कर गॉड का आशीर्वाद तो ले लें|" ये सुनते ही हम दोनों बहुत जोर से हँसे| अनु और मेरे बीच ऐसा मजाक बहुत होता था, एक तरह से दोनों जानते थे की हमें कैसे दूसरे को हँसाना है| अब ले-दे कर हम दोनों ही अब एक-दूसरे का सहारा थे! खेर हम तैयार हो कर चर्च आये और वहाँ अपने और अपने परिवार के लिए Pray किया| भले ही उनसब ने हम से मुँह मोड़ लिया था पर हम अब भी अपने परिवार को उतना ही चाहते थे! हम दोनों ही भावुक हो कर चर्च से निकले पर जानते थे की एक-दूसरे को कैसे हँसाना है| "तो क्या खिला रहे हो आज?" अनु ने पुछा|
"यार मैं ठहरा देहाती, मुझे तो दाल-रोटी ही बनानी आती है|" मैंने बाइक स्टार्ट करते हुए कहा|
"प्यार से
बनाओगे तो दाल में भी चिकन का स्वाद आजायेगा|" अनु ने पीछे बैठते हुए कहा|
"चलो फिर आज चिकन ही खिलाता हूँ!" मैंने कहा और बाइक सीधा सुपरमार्केट की तरफ ले ली| वहाँ से सारा समान खरीदा और एप्रन पहन कर कीचन में कूद पड़ा, अनु को मैंने दूर ही रखा वरना वो टोक-टोक कर मेरी नाक में दम कर देती| Marination की और सोचा की बटर चिकन बनाऊँ लेकिन फिर मन किया की ग्रिल चिकन बनाते हैं! जब बन गया तो मैंने अनु को चखने को बुलाया, किस्मत से वो टेस्टी बना, पहलीबार के हिसाब से टेस्टी! वो तो शुक्र है की मैंने साथ में दाल बनाई थी जिसमें मेरी महारत हासिल थी तो खाना थोड़ा बैलेंस हो गया, वरना उस दिन अच्छी बिज्जाति हो जानी थी! दिन हँसी ख़ुशी बीत रहे थे और Business भी अब अच्छी रफ्तार पकड़ने लगा था|
फिर आया 31 दिसंबर और आकाश और रवि दोनों ने अनु से कहा की आज तो पार्टी होनी चाहिए| अनु का कहना था की घर पर ही करते हैं, पर मुझे पता था की लड़कों को चाहिए शराब और शबाब और वो सिर्फ pub में मिलता| मैंने जब अनु से जाने को कहा तो वो मना करने लगी| "प्लीज यार! देखो लड़कों का बड़ा मन है!" पर वो नहीं मानी, मैं जानता था की उनके न जाने का कारन मैं ही हूँ| "अच्छा बाबा I Promise 1 बियर से ज्यादा और कुछ नहीं लूँगा! फिर ये देखो team building के लिए ये अच्छा भी है|" मैंने एक बहन और जोड़ा तो अनु मान गई, पर अब दिक्कत ये आई की stag entry allowed नहीं थी| मेरे साथ तो अनु थी, पर उन लड़कों की पहले से ही गर्लफ्रेंड थी| उन दोनों लड़कियों से हमारा इंट्रोडक्शन हुआ, अब जगह पहले से ही भरी पड़ी थी तो खड़े-खड़े ही हमने पीना शुरू किया| मेरी बियर अभी आधी ही हुई थी की अनु मुझे खींच कर डांस फ्लोर पर ले गई और हम दोनों ने नाचना शुरू किया| हमारी देखा-देखि वो चारों भी डांस करने लगे| Loud Music में डांस करते-करते पता ही नहीं चला की 11 बज गए! अनु ने जैसे ही टाइम देखा वो मुझे अपने साथ ले कर निकलने लगी, हमने सबको बाई बोला और हम घर पहुँच गए| पर अनु ने घर पर सेलिब्रेट करने का प्लान बना रखा था इसलिए वो मुझे शुरू से ही कहीं नहीं जाने देना चाहती थी| मैं change कर रहा था और इधर अनु ने पूरा माहौल बनाना शुरू कर दिया था| बालकनी में गद्दियां लगी थी, ब्लूटूथ पर सारे स्लो ट्रैक्स धीमी आवाज में चल रहे थे और वाइन के दो गिलास रखे हुए थे| साइड में रेड वाइन की एक बोतल रखी थी, जब मैं बाहर वापस आया तो मैं अपने दोनों गालों पर हाथ रख कर आँखें फाड़े देखने लगा| "आँखें फाड़ कर क्या देख रहे हो, आओ बैठो|" अनु ने कहा और मैं जा कर बालकनी में फर्श पर बैठ गया| अनु ने गिलास में वाइन डाली और फिर हमने चियर्स किया, इधर अनु ने पीना शुरू कर दिया और मैंने उसे सूँघना शुरू किया| "क्या हुआ? वाइन से बदबू आ रही है?" अनु ने पुछा| मैं उस समय वाइन को गिलास के अंदर गोल-गोल घुमा रहा था; "इसे wine tasting कहते हैं!" मैंने कहा और मुस्कुरा दिया| "सारे शौक अमीरों वाले पाल
रखे हैं तुमने?" अनु ने चिढ़ते हुए कहा| "हाँ...क्योंकि मुझे अमीर बनना है, गरीब और कमजोर आदमी की यहाँ कोई औकात नहीं! याद है वो first time मुंबई जाना और वहाँ मेरा मीटिंग के बाहर वेट करना और फिर रितिका का मुझे छोड़ना| आपको पता है जब मैंने पहली बार आपका ऑफिस देखा तो मेरे मन में आया की मुझे इसे दो कमरों से पूरे हॉल पर फैलाना है|" मेरे ख्याल सुन कर अनु के चेहरे पर मुस्कान आ गई| ये कोई आम मुस्कान नहीं थी, बल्कि ये गर्व वाली मुस्कान थी| ठीक बारह बजते ही पटाखों का शोर शुरू हो गया, अनु कड़ी हुई और मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अंदर लाई| मेरे गले लगते हुए बोली; "Happy New Year!! I wish की ये साल तुम्हारे लिए खुशियां ले कर आये और तुम्हें खूब ऊँचाइयों पर ले जाए|"
"Correction: ये साल 'हमारे' लिए ढेर सारी खिशियाँ लाये और 'हमें' खूब ऊँचाइयों पर ले जाए| दुःख में साथ देते हो और खुशियों में पीछे रहना चाहते हो? अब कुछ भी मेरा नहीं बल्कि हमारा है, यो दोस्ती एक नए मुक़ाम तक जाएगी और सब के लिए मिसाल होगी!" मैंने अनु को कस कर गले लगाते हुए कहा| मेरी बात सुन कर अनु की आँखें भर आईं और उन्होंने भी मुझे कस कर गले लगा लिया|
अगले दिन सुबह-सुबह मुझे संकेत का फ़ोन आया और नए साल की मुबारकबाद के बाद वो मुझे सॉरी बोलने लगा| "तेरी भाभी मिली थी उन्होंने बताया की तू आखिर क्यों गया घर छोड़ कर! तेरी इतनी मेहनत के बाद भी रितिका ने पढ़ाई पूरी नहीं की और प्यार के चक्कर में पड़ कर शादी कर ली|"
"भाई छोड़ वो सब, ये बता वहाँ सब कैसे हैं? शादी ठीक से निपट गई ना?" मैंने पुछा|
"हाँ सब अच्छे से निपट गया पर यार सच में यहाँ तेरे ना होने से किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा| मुझे कहना तो नहीं चाहिए पर तेरे परिवार को तेरी पड़ी ही नहीं! तेरे ताऊ जी तो गाँव में छाती ठोक कर घूम रहे हैं, उन्हें ये नहीं पता की मंत्री ने ये शादी सिर्फ और सिर्फ अपने लड़के की ख़ुशी और अगले महीने होने वाले चुनाव में अपनी image बचाने को की है|" संकेत ने काफी गंभीर होते हुए कहा|
"यार छोड़ ये सब, तुझे एक गिफ्ट भेज रहा हूँ शायद तुझे पसंद आये| जब मिले तो कॉल करिओ|" मैंने ये कहते हुए बात जल्दी से निपटाई जब की मेरा दुःख मैं ही जानता था| अनु को चाय दे कर मैं हॉल में अपना काम ले कर बैठ गया क्योंकि अगर खाली बैठता तो फिर वही सब सोचने लगता| कुछ देर बाद रंजीथा आ गई और उसने नाश्ता बनाया, "अरे आज तो साल का पहला दिन है आज भी काम करोगे?" अनु ने अंगड़ाई लेते हुए कहा|
"साल की शुरुआत काम से हो तो सारा साल काम करते रहेंगे!" इतना कह कर मैं फिर से बिजी हो गया| मुझे अनु को अपने परिवार के बारे में कुछ भी कहना ठीक नहीं लगा इसलिए मैं खुद को लैपटॉप में घुसाए रहा| शाम होते-होते वो समझ गई की कुछ तो गड़बड़ है इसलिए उन्होंने मेरा लैपटॉप एक दम से बंद कर दिया जिससे मुझे बहुत गुस्सा आया; "क्या कर रहे हो?" मैंने चिढ़ते हुए कहा|
"सुबह
से इसमें घुसे हो? थोड़ी देर आराम कर लो!" अनु ने एकदम से जवाब दिया जिससे मेरा गुस्सा फूट ही पड़ा|
"आपको पता भी है की आपके आस-पास क्या हो रहा है? दुनिया चाँद पर जा रही है और आप हो की अब भी वही financial analysis में लगे हो! Social Media पर आपकी presence zero है! अपनी फोटो डालते हो, पर मैंने आपको Company Profile बनाने को कहा वो बनाई आपने? आपको मैंने service charge के बारे में मेल भेजा था उस पर बात की आपने मुझसे? AMIS traders का डाटा रेडी किया आपने? सारा काम आकाश और रवि पर छोड़ देते हो! सिर्फ contracts लाने से काम नहीं चलता, जो हाथ में काम है उसे भी करना पड़ता है!" मैं बोलता रहा और वो सर झुकाये सुनती रही| मैं आखिर बालकनी में आ करआँखें बंद कर के बैठ गया| आधे घण्टे तक मुझे कोई आवाज सुनाई नहीं दी, वरना वो सारा दिन घर में इधर से उधर चहल कदमी करती रहती थीं| मुझे एहसास हुआ की मैंने अपने घरवालों का गुस्सा उन पर उतार दिया तो मैं उठ कर उन्हें मनाने कमरे में पहुँचा तो अनु बेड पर सर झुका कर बैठी थीं|
"I'm really sorry! मुझे गुस्सा किसिस और बात का था और मैंने वो आप पर उतार दिया! Please forgive me." मैंने घुटने के बल उनके सामने बैठते हुए कहा| पर अनु ने अबतक अपना सर नहीं उठाया था और वो वैसे ही सर झुकाये हुए बोलीं; "मैं बहुत स्लो हूँ, चीजों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेती| जर्रूरी बातों को कई बार नजर अंदाज कर देती हूँ, आजतक मैंने सिर्फ और सिर्फ किसी को गंभीरता से लिया है तो वो तुम हो! मुझे बुरा नहीं लगा की तुमने जो कहा पर बुरा लगा तो ये की तुमने मुझे डाँटा!" अनु ने ये बात 'तुमने मुझे डाँटा' बिलकुल बच्चे की तरह तुतलाते हुए कहा और ये देख कर मुझे उन पर प्यार आ गया; "आजा मेरा बच्चा!"" कहते हुए मैंने अपनी बाहें खोली और अनु आ कर मेरे गले लग गई|
"अब ये बताओ की क्या बात है की सुबह से इतना गुस्सा हो!" अनु ने पुछा तो मैंने उन्हें सुबह की बात बता दी पर आधी| ये बात सुन कर उन्हें भी बुरा लगा और मैं इस बारे में ज्यादा ना सोचूं इसलिए उन्होंने मजाक में कहा; "अब सजा के लिए तैयार हो जाओ!" अनु ने कहा और मैंने सरेंडर करते हुए कहा; "जो हुक्म मालिक!"
"आज रात पार्टी करनी है, जबरदस्त वाली वरना सारा साल मुझे ऐसे ही डाँटते रहोगे|" अनु ने कहा इसलिए हम तैयार हो कर 8 बजे निकले| वहाँ पहुँचते ही अनु मस्त हो गई, अब मुझ पर तो पीने की बंदिश थी तो मैं बस एक बियर की बोतल को चुस्की ले-ले कर पीने लगा| देखते ही देखते उन्होंने 2 pints पी ली और मुझे खींच कर डांस फ्लोर पर ले आईं| बारह बजे तक उन्होंने दबा कर पी और मैं बिचारा एक बियर और स्टार्टर्स खाता रहा| बारह बजने को आये तो मैंने उन्हें चलने को कहा पर मैडम जी आज फुल मूड में थी| कैब करके उन्हें घर लाया पर अब वो टैक्सी से उतरने से मना करने लगी और सो गईं| "साहब ले जाओ ना, मुझे घर भी जाना है!" ड्राइवर बोला तो मजबूरन मुझे उन्हें गोद में उठा आकर ऊपर लाना पड़ा| ऊपर ला
कर मैंने उन्हें बेड पर लिटाया और मैं चेंज करके लेट गया| करीब घंटे भर बाद ही अनु का हाथ मेरी कमर पर था और मुझे उनकी तरफ खींच रहा था| मैं समझ गया की मैडम जी कोई सपना देख रही हैं| अब वहाँ रुकता तो पता नहीं वो नींद में क्या करतीं, इसलिए मैं बाहर हॉल में आ कर लेट गया| सुबह जब मैं बेड टी ले कर गया तो उनका सर बहुत जोर से घूम रहा था| चाय पी कर वो करहाते हुए बोलीं; "हम ....घर कब आये?"
"साढ़े बारह!" मैंने चाय की चुस्की लेते हुए कहा और ऐसे जताया जैसे मैं उनसे नाराज हूँ|
"सॉरी" उन्होंने शर्मिंदा होते हुए कहा|
"मेरी इज्जत लूटने के बाद सॉरी कहते हुए?" मैंने ड्रामा जारी रखते हुए गुस्से से कहा|
"क्या?" अनु ने चौंकते हुए कहा|
"हाँ जी! रात में पता नहीं आपको क्या हुआ की आप मेरे ऊपर चढ़ गए और मेरे कपडे नोचने शुरू कर दिए! आपको होश भी है आपने क्या-क्या किया मेरे साथ?" मैंने रोने का नाटक किया| पर अनु समझ गई थी की मैं ड्रामा कर रहा हूँ क्योंकि उन्होंने अभी तक कल रात वाले कपड़े पहने थे|
"सससस....हाय! मानु सच्ची बड़ा मजा आया कल रात! कल रात तुम्हारा ठीक से चीर हरण नहीं हो पाया था, आज मैं जी भर के तुम्हारा चीर हरण करती हूँ!" ये कहते हुए वो खड़ी हुई और मैं भी उठ कर भागा| उनको dodge करते हुए मैं पूरे घर में भाग रहा था और वो भी मेरे पीछे-पीछे कभी सोफे पर चढ़ जाती तो कभी पलंग पर| अचनक ही उन्हें ठोकर लगीं और वो मेरे ऊपर गिरीं और मैं पलंग पर गिरा| एक पल के लिए दोनों एक दूसरे की आँख में देख रहे थे पर फिर हम दोनों को कुछ अजीब सा एहसास हुआ, वो उठ कर बाथरूम में चली गईं और मैं उठ कर बालकनी में आ गाय| मन में अजीब सी तरंगें उठ रही न थी पर मैं उन तरंगों को प्यार का नाम नहीं देना चाहता था इसलिए अपना ध्यान वापस काम में लगा दिया|
दिन हँसी-ख़ुशी से बीत रहे थे और हमारा ये हँसी-मजाक चलता रहता था, मेहनत दोनों बड़ी शिद्दत से कर रहे थे और कामयाबी मिल रही थी| जिन कंपनियों के हमें एक क्वार्टर का ही काम दिया था उन्होंने हमें पूरे साल का काम दे दिया था| US वाला प्रोजेक्ट बड़े जोर-शोर से चल रहा था और मैंने अनु को उसकी प्रेजेंटेशन के काम में लगा दिया| मार्च तक हमें एक और employee चाहिए था तो अनु ने मेरी जिम्मेदारी लगा दी की मैं इंटरव्यू लूँ, आज तक जिसने इंटरव्यू दिया हो उसे आज इंटरव्यू लेने का मौका मिल रहा था| Experienced की जगह मैंने Freshie बुलाये, क्योंकि एक तो सैलरी कम देनी पड़ती और दूसरा वो जोश-जोश में परमानेंट जॉब के चक्कर में काम अच्छा करते हैं| नए लड़के को Hire कर लिया गया और उसे काम अच्छे से समझा कर टीम में जोड़ लिया गया| लड़के अनु से शर्म कर के हँसी-मजाक कम किया करते थे पर मेरे साथ उनकी अच्छी बनती थी और मैं जब उन्हें खाली देखता तो उनकी टांग खिचाई कर देता था| किसी पर भी गुस्सा नहीं करता था, मैं अच्छे से जानता था की काम कैसे निकालना है|
उनकी ख़ुशी के लिए कभी-कभार खाना बाहर से मंगा देता तो वो खुश हो जाया करते| जून में US का प्रोजेक्ट फाइनल हुआ और अब मौका था celebrate करने का, अब तो मेरी सेहत भी अच्छी हो गई थी तो इस बार जम कर दारु पी मैंने| रात के एक बजे हम दारु के नशे में धुत्त घर पहुँचे, दरवाजा बंद करके हम दोनों एक दूसरे से लिपट कर सो गए| सुबह जब मेरी आँख खुली तो मैंने अनु को खुद से चिपका हुआ पाया और धीरे से खुद को छुड़ाने लगा| पर तभी अनु की नींद खुल गई और वो मेरी आँखों में देखने लगी, फिर मेरे गाल को चूम कर वो बाथरूम में घुस गईं| दरअसल उन्होंने मेरा morning wood देख लिया था| यही वो कारन है की मैं रोज उनसे पहले उठ जाता था ताकि वो मेरा morning wood न देख लें| उसे देख कर वो मेरे बारे में गलत ही सोचेंगी|
P.S. Morning Wood का मतलब होता है जब लड़के सुबह सो कर उठते हैं तो उनका लंड टाइट खड़ा होता है उसे ही Morning Wood कहते हैं|
मैं बहुत शर्मा रहा था ये सोच कर की अनु मेरे बारे में क्या सोचती होगी? उन्हें लगता होगा की कैसा ठरकी लड़का है, एक रात साथ चिपक कर क्या सोइ की इसके लंड खड़ा हो गया! मैं यही सोचता हुआ बालकनी में बैठा था, अनु बाथरूम से बाहर निकलीं और चाय बनाने लगी| मैं अब भी शर्म के मारे बाहर बैठा था| "क्या हुआ?" अनु ने मुझे चाय देते हुए पुछा| मैं कुछ नहीं बोला बस सर झुकाये उनसे चाय ले ली| पर वो चुप कहाँ रहने वाली थीं, इसलिए मेरे पीछे पड़ गईं तो मैंने हार कर हकलाते-हकलाते कहा: "व...वो ...सुबह...मैं...वो... hard ...था!" मैं उनसे पूरी बात कहने से डर रहा था| पर वो समझ गईं और हँसने लगी; "तो क्या हुआ?"
"आपको नहीं देखना चाहिए था!.... I mean ... मुझे जल्दी उठना चाहिए था! रोज इसीलिए तो जल्दी उठ जाता हूँ|" मैंने कहा|
"ये पहलीबार तो नहीं देखा!" अनु ने चाय की चुस्की लेते हुए आँखें नीचे करते हुए कहा| पर ये मेरे लिए shock था; "क्या? आपने कब देख लिया?"
"तुम्हें क्या लगता है की मैं रात को उठती नहीं हूँ? Its okay .... ये तो नार्मल बात है!" अनु ने कहा पर मेरे शर्म से गाल लाल थे! "आय-हाय! गाल तो देखो, सेब जैसे लाल हो रहे हैं!" अनु ने मेरी खिंचाई शुरू कर दी और मैं हँस पड़ा|
खेर काम बढ़ता जा रहा था और अब हमें एक कॉन्फ्रेंस रूम चाहिए था जहाँ हम किसी से मिल सकें या फिर अगर कोई टीम मीटिंग करनी हो| उसी बिल्डिंग में सबसे ऊपर का फ्लोर खाली था, तो मैंने अनु से उसके बारे में बात की| वो शुरू-शुरू में डरी हुई थी क्योंकि रेंट डबल था पर चूँकि वहाँ कोई और ऑफिस नहीं था जबतक कोई नहीं आता तो हम पूरा फ्लोर इस्तेमाल कर सकते थे! अनु को Idea पसंद आया और हमने मालिक से बात की, अब उसे दो कमरों के लिए तो कोई भी किरायदार मिल जाता पर पूरा फ्लोर लेने वाले कम लोग थे| सारा ऑफिस सेट हो गया था, आज मुझे मेरा अपना केबिन मिला था...
मेरा अपना! ये मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी और इसके लिए मैंने बहुत मेहनत भी की थी| अपनी बॉस चेयर को मैं बस एक टक निहारे जा रहा था, मेरे अंदर बहुत ख़ुशी थी जो आँसू बन कर टपक पड़ी| अनु जो मेरे पीछे कड़ी थी उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा और मुझे ढाँढस बँधाने लगी| "काश मेरे माँ और पिताजी यहाँ होते तो आज उनका कितना गर्व हो रहा होता!" मैंने कहा पर वो सब तो वहाँ रितिका की खुशियों में लीन थे, मुझसे उनका कोई सरोकार नहीं रह गया था| "मानु आज ख़ुशी का दिन है, ऐसे आँसू बहा कर इस दिन को खराब ना करो! I know तुम अपने माँ-पिताजी को miss कर रहे हो पर वो अपनी ख़ुशी में व्यस्त हैं|" अनु ने कहा और तभी बाकी के सारे अंदर आये और मुझे ऐसा देख कर मुझे cheer करने के लिए बोले; "सर आज तो पार्टी होनी चाहिए!"
"अबे यार काम भी कर लिया करो, हर बार पार्टी चाहिए तुम्हें!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा, पर उनकी ख़ुशी के लिए बाहर से खाना मंगा लिया|
इधर US से हमें एक और कॉन्ट्रैक्ट मिल गया और वो भी पूरे साल का| काम डबल हो गया था और अब हमें एक और employee की दरकार हुई और साथ में एक peon भी जो चाय वगैरह बनाये| अब तक तो हम चाय बाहर से पिया करते थे| Peon के लिए हमने रंजीथा को ही रख लिया और एक और employee को अनु ने hire किया| अनु के शुरू के दिनों में वो यहाँ एक हॉस्टल में रहतीं थीं और ये लड़की उनकी रूममेट थी| एक लड़की के आने से लड़के भी जोश में आ गए थे और तीनों उसे काम में मदद करने के बहाने से घेरे रहते| "Guys सारे एक साथ समझाओगे तो कैसे समझेगी वो?" मैंने तीनों की टांग खींचते हुए कहा| ये सुन कर सारे हँस पड़े थे, अनु बड़ा ख़ास ध्यान रखती थी की ये तीनों कहीं इसी के चक्कर में पड़ कर काम-धाम न छोड़ दें और वो जब भी किसी को उस लड़की के साथ देखती तो घूर के देखने लगती और लड़के डर के वापस अपने डेस्क पर बैठ जाते| तीनों लड़के मन के साफ़ थे बस छिछोरपना भरा पड़ा था| अनु ने उसे अपने साथ रखना शुरू कर दिया और ये तीनों मेरे पास आये; "सर देखो न mam ने उसे अपना साथ रख लिया है, सारा टाइम वो उनके साथ ही बैठती है, ऐसे में हम उससे FRIENDSHIP कैसे करें?"
"क्या फायदा यार, आखिर में उसने तुम्हें Friendzone कर देना है!" मैंने कहा|
"सर try try but don't cry!" आकाश बोला|
"अच्छा बेटा, करो try फिर! मैंने कुछ कहा तो मेरी क्लास लग जाएगी!" मैंने ये कहते हुए खुद को दूर कर लिया| फिर एक दिन की बात है मैं और अनु अपने-अपने केबिन में बैठे थे की उस लड़की का boyfriend उसे मिलने ऑफिस आया| वो उससे बात कर रही थी और इधर तीनों के दिल एक साथ टूट गए! मैं ये देख कर दहाड़े मार कर हँसने लगा, सब लोग मुझे ही देख रहे थे और मैं बस हँसता जा रहा था| अनु अपने केबिन से मेरे पास आई और पूछने लगी तो मैंने हँसते हुए उन्हें सारी बात बताई| तो वो भी हँस पड़ीं और तीनों लड़के शर्मा ने लगे और एक दूसरे की शक्ल देख कर हँस रहे थे!
"कहा था मैंने इन्हें की friendzoned हो जाओगे पर नहीं इन्हें try
करना था!" मैंने हँसी काबू करते हुए कहा|
"क्या सर एक तो यहाँ कट गया और आप हमारी ही ले रहे हो!" आकाश बोला|
"बेटा भगवान् ने दी है ना एक गर्लफ्रेंड उसी के साथ खुश रहो, अब जा कर पंडित जी के साथ बैठ कर GST की return फाइनल कर के लाओ|" मैंने उसे प्यार से आर्डर देते हुए कहा और वो भी मुस्कुराते हुए चला गया| अनु भी बहुत खुश थी क्योंकि उन्होंने मेरी सब के साथ understanding देख ली थी|
खेर दिन बीते और फिर एक दिन हम दोनों शाम को बैठे चाय पी रहे थे;
मैं: यार थोड़ा बोर हो गया हूँ, सोच रहा हूँ की एक ब्रेक ले लेते हैं!
अनु: सच कहा तो बताओ कहाँ चलें? कोई नई जगह चलते हैं!
मैं: मेरा मन Trekking करने को कर है|
अनु: Wow!!!
मैं: खीरगंगा का ट्रेक छोटा है, वहाँ चलें?
अनु: वो कहा है?
मैं: हिमाचल प्रदेश में है| हालाँकि ये बारिश का सीजन पर मजा बहुत आएगा|
अनु: ठीक है done!
मैं: पर पहले बता रहा हूँ की trekking आसान नहीं होती, वहाँ जा कर आधे रस्ते से वापस नहीं आ सकते| चाहे जो हो ट्रेक पूरा करना होगा!
अनु: तुम साथ हो ना तो क्या दिक्कत है?!
मैं: ठीक है तो तुम टिकट्स बुक करो और मैं Gear खरीदता हूँ|
अनु: Gear?
मैं: और क्या? Ruck Sack चाहिए, raincoat चाहिए, ट्रैकिंग के लिए shoes चाहिए वरना वहाँ फिसलने का खतरा है|
अनु ने टिकट्स book की और जानबूझ कर ऐसे दिन पर करि ताकि वो मेरा बर्थडे वहीं मना सके, इधर मैंने भी अपनी तैयारी पूरी की| 30 अगस्त को हम निकले और दिल्ली पहुँचे, वहाँ दो दिन का stay था| दिल्ली में जो पहली चीज मुझे देखनी थी वो था India Gate, वहाँ पहुँच कर गर्व से सीना चौड़ा हो गया, अब चूँकि मुझ पर कोई खाने-पीने की बंदिश नहीं थी तो मैं अनु को निकल पड़ा| दिल्ली आने से पहले मैंने 'पेट भर' के research की थी जिसके फल स्वरुप यहाँ पर क्या-क्या मिलता है वो सब मैंने लिस्ट में डाल लिया था| सबसे पहले हमने पहाड़गंज में सीता राम दीवान चाँद के छोले भठूरे खाये| हमने एक ही प्लेट ली थी क्योंकि आज हमें पेट-फटने तक खाना था| वहाँ से हम Delhi Metro ले कर चावड़ी बजार आ गए और वहाँ हमने सबसे पहले नटराज के दही भल्ले खाये, फिर जुंग बहादुर की कचौड़ी, फिर जलेबी वाला की जलेबी और लास्ट में कुरेमल की कुल्फी! पेट अब पूरा गले तक भर गया था और अब बस सोना था| अगले दिन भी हम खूब घूमें और शाम 6 बजे चेकआउट किया, उसके बाद हम सीधा कश्मीरी गेट बस स्टैंड आये और वहाँ से हमें Volvo मिली जिसने हमें अगली सुबह भुंतर उतारा| हमारी किस्मत अच्छी थी की बारिशें बंद हो चुकीं थीं इसलिए हमें कोई तकलीफ नहीं हुई| भुंतर से टैक्सी ले कर हम कसोल पहुँचे और वहाँ समान रख कर फ्रेश हुए और सीधा मणिकरण गुरुद्वारे गए वहाँ, गर्म पानी में मुंह-हाथ धोये और लंगर का प्रसाद खाया| वापस आ कर हम सो गए क्योंकि अगली सुबह हमें जल्दी निकलना था| सुबह हमने एक rucksack लिया जिसमें कुछ समान था!
एक बस ने हमें वहाँ उतारा जहाँ से ट्रैकिंग शुरू होनी थी और
रास्ता देखते ही दोनों की हवा टाइट हो गई, बिलकुल कच्चा रास्ता जो एक छोटे से गाँव से होता हुआ जाता था और फिर पहाड़ की चढ़ाई! पर वहाँ का नजारा इतना अद्भुत था की हम रोमांच से भर उठे और ट्रैकिंग शुरू की| रास्ता सिर्फ दिखने में ही डरावना था पर वहाँ सहूलतें इतनी थी की कोई दिक्कत नहीं हुई लेकिन सिर्फ आधे रास्ते तक! रुद्रनाग पहुँच कर हमने वहाँ मंदिर में दर्शन किये और आगे बढे, उसके आगे की चढ़ाई बिलकुल खड़ी थी रिस्की थी! ये देख कर अनु ने ना में गर्दन हिला दी| "मैं नहीं जाऊँगी आगे!" अनु बोली|
"यार आधा रास्ता पहुचंह गए हैं और अब हार मान लोगे तो कैसे चलेगा?" ये कहते हुए मैंने उनका हाथ पकड़ा और आगे ले कर चल पड़ा| मैं आगे-आगे था और उन्हें बता रहा था की कहाँ-कहाँ पैर रखना है| आगे हमें के संकरा रास्ता मिला जहाँ सिर्फ एक पाँव रखने की जगह थी और वहाँ थोड़ा कीचड भी था| मैं आगे था और rucksack उठाये हुए था और अनु मेरे पीछे थी| उन्होंने कीचड़ में जूते गंदे ना हो जाएँ ये सोच कर पाँव ऊँचा-नीच रखा जिससे उनका बैलेंस बिगड़ गया और वो खाईं की तरफ गिरने लगीं, मैंने तुरंत फुर्ती दिखाई और उनका हाथ पकड़ लिया वरना वो नीचे खाईं की तरफ गिर जातीं| उन्हें खींच कर ऊपर लाया और वो एक दम से मेरे सीने से लग गईं और रोने लगी| इन कुछ पलों में उन्होंने जैसे मौत देख ली थी, मैंने उनके पीठ को काफी रगड़ा ताकि वो चुप हो जाएँ| आधे घंटे तक हम वहीं खड़े रहे और लोग हमें देखते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे| मैं चुपचाप था और कोशिश कर रहा था की वो चुप हो जाएँ ताकि हम वापिस जा सकें! उन्होंने रोना बंद किया और मैंने उन्हें पीने को पानी दिया, फिर खाने के लिए एक चॉकलेट दी और जब वो नार्मल हो गईं तो कहा; "चलो वापस चलते हैं!" पर वो जानती थी की मेरा मन ऊपर जाने का है इसलिए उन्होंने हिम्मत करते हुए कहा; "मैंने कहा था ना की मुझे संभालने के लिए तुम हो! तो फिर वापस क्यों जाएंगे? गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में।
वो तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले|" अनु ने बड़े गर्व से कहा| मैंने उनका हाथ पकड़ कर उन्हें उठाया और गले लगाया, उनके माथे को चूमते हुए कहा; "I'm proud of you!" हम आगे चल पड़े और बड़ी सावधानी से आगे बढे, टाइम थोड़ा ज्यादा लगा पर हम ऊपर पहुँच ही गए| सबसे पहले हमने एक टेंट बुक किया और अपना समान रख कर photo click करने लगे| आज दो तरीक थी और अनु को रात बारह बजे का बेसब्री से इंतजार था| हम दोनों कुर्सी लगा कर अपने ही टेंट के बाहर बैठे थे| अब वहाँ कोई नेटवर्क नहीं था तो हम बस बातों में लगे थे और वहाँ का नजारा देख कर प्रफुल्लित थे|
शाम को खाने के लिए वहाँ Maggie और चाय थी तो हमने बड़े चाव से वो खाई| रात के खाने में हमने दो थालियाँ ली और टेंट के बाहर ही बैठ कर खाई| बारह बजे तक अनु ने मुझे सोने नहीं दिया और मेरे साथ बैठ के बातें करती रही, अपने जीवन के किस्से सुनाती रही और मैं भी उन्हें अपने कॉलेज लाइफ के बारे में बताने लगा| इसी बीच मैंने उन्हें वो भांग वाले काण्ड के बारे में भी बताया| जैसे ही बारह बजे अनु ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे खड़ा किया और मेरे गले लग कर बोलीं; "Happy Birthday my dear! God bless you!" इतना कहते हुए उनकी आवाज भारी हो गई, माने उन्हें कस कर गले लगा लिया ताकि वो रो ना पड़ें| कुछ देर में वो नार्मल हो गईं और हम सोने के लिए अंदर आ गए| सुबह जल्दी ही आँख खुल गई, फ्रेश होने के बाद उन्होंने मुझे कहा की ऊपर मंदिर चलते हैं| मंदिर के बाहर एक गर्म पानी का स्त्रोत्र था जिसमें सारे लोग नहा रहे थे, हमने हाथ-मुंह धोया और भगवान के दर्शन करने लगे| दर्शन के बाद अनु ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे वहाँ एक पत्थर पर बैठने को कहा| "मुझे तुमसे कुछ बात करनी है!" अनु ने बहुत गंभीर होते हुए कहा| एक पल के लिए मैं भी सोच में पड़ गया की उन्हें आखिर बात क्या करनी है?
update 69
"मानु मैं तुमसे प्यार करती हूँ....
सच्चा प्यार!" अनु ने गंभीर होते हुए कहा|
"आप ये क्या कह रहे हो?" मैंने चौंक कर खड़े होते हुए कहा|
"जब हम कुमार के ऑफिस में प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे तभी मुझे तुमसे प्यार हो गया था! पर मैं उस समय कुमार की पत्नी थी, इसलिए कुछ नहीं बोली! बड़ी हिम्मत लगी और फिर तुम्हारे सहारे के कारन मैं आजाद हुई| फिर घरवालों ने मुझे अकेला छोड़ दिया ओर ऐसे में मैं तुम्हारे लिए बोझ नहीं बनना चाहती थी| इसलिए तुम से दूर बैंगलोर आ गई और सोचा की जिंदगी दुबारा शुरू करूँगी पर तुम्हारी यादें साथ नहीं छोड़ती थीं| बहुत कोशिश की तुम्हें भुलाने की और भूल भी गई, इसलिए मैंने अपना नंबर बदल लिया था क्योंकि मेरा मन जानता था की तुम मुझे कभी नहीं अपनाओगे| देखा जाए वो सही भी था क्योंकि उस टाइम तुम रितिका के थे, अगर मैं तुमसे अपने प्यार का इजहार भी करती तो तुम मना कर देते और तब मैं टूट जाती| बड़े मुश्किल से डरते हुए मैं दुबारा लखनऊ आई, क्योंकि जानती थी की तुम्हारे सामने मैं खुद को संभाल नहीं पाऊँगी पर एक बार और अपने मम्मी-डैडी से रिश्ते सुधारने की बात थी, लेकिन उन्होंने तो मुझसे बात तक नहीं की और घर से बाहर निकाल दिया| फिर उस रात जब मैंने तुम्हें उस बस स्टैंड पर देखा तो मैं बता नहीं सकती मुझ पर क्या बीती| दूर से देख कर ही मन कह रहा था की ये तुम नहीं हो सकते, तुम्हारी ऐसी हालत नहीं हो सकती! वो रात मैंने रोते-रोते गुजारी ....फिर ये तुम्हारी बिमारी और वो सब.... मैंने बहुत सम्भलने की कोशिश की पर ये दिल अब नहीं सम्भलता!" अनु ने रोते-रोते कहा|
"आप मेरे बारे में सब नहीं जानते, अगर जानते तो प्यार नहीं नफरत करते!" मैंने उनका कन्धा पकड़ कर उन्हें झिंझोड़ते हुए कहा|
"क्या नहीं पता मुझे?" अनु ने अपना रोना रोकते हुए पुछा?
"मेरे और रितिका के रिश्ते के बारे में|" मैंने उनके कन्धों को छोड़ दिया|
"तुम उससे प्यार करते थे और उसने तुमसे धोखा किया, बस!" अनु ने कहा|
"बात इतनी आसान नहीं है!.....
हम दोनों असल जिंदगी में चाचा-भतीजी थे!" इतना कहते हुए मैंने उन्हें सारी कहानी सुना दी, उसकं ुझे धोखा देने से ले कर उसकी शादी तक सब बात!
"तो इसमें तुम्हारी क्या गलती थी? आई वो थी तुम्हारे पास, तुम तो अपने रिश्ते की मर्यादा जानते थे ना? तभी तो उसे मना कर रहे थे, और रिश्ते क्या होते हैं? इंसान उन्हें बनाता है ना? हमारा ये दोस्ती का रिश्ता भी हमने बनाया ना? अगर तुमने उससे अपने प्यार का इजहार किया होता तो भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता! फर्क पड़ता है तो सिर्फ इस बात से की अभी तुम क्या चाहते हो? क्या तुम उससे अब भी प्यार करते हो? क्या तुम्हारे दिल में उसके लिए अब भी प्यार है?" अनु ने मुझे झिंझोड़ते हुए पुछा| में अनु की बातों में खो गया था, क्योंकि जिस सरलता से वो इस सब को ले रहे थीं वो मेरे गले नहीं उतर रही थी! पर उनका मुझे झिंझोड़ना जारी था और वो जवाब की उम्मीद कर रहीं थीं|
"नहीं....मैं उससे सिर्फ नफरत करता हूँ! उसकी वजह से मुझे मेरे ही परिवार से अलग होना पड़ा!" मैंने कहा|
"तो फिर क्या प्रॉब्लम है? इतने दिनों में एक छत के नीचे रहते हुए तुम्हें कभी नहीं लगा की तुम्हारे दिल में मेरे लिए थोड़ा सा भी प्यार है?" अनु ने पुछा|
"हुआ था...कई बार हुआ पर...मुझ में अब दुबारा टूटने की ताक़त नहीं है|" मैंने अनु की आँखों में देखते हुए कहा| ये मेरा सवाल था की क्या होगा अगर उन्होंने भी मेरे साथ वही किया जो रितिका ने किया|
"मैं तुम्हें कभी टूटने नहीं दूँगी! मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ!" अनु ने पूरे आत्मविश्वास से कहा| उस पल मेरा दिमाग सुन्न हो चूका था, बस एक दिल था जो प्यार चाहता था और उसे अनु का प्यार सच्चा लग रहा था| पर खुद को फिर से टूटते हुए देखने का डर भी था जो मुझे रोक रहा था|
"मैं तुम्हारा डर समझ सकती हूँ, पर हाथ की सभी उँगलियाँ एक सी नहीं होतीं| अगर एक लड़की ने तुम्हें धोखा दिया तो जर्रूरी तो नहीं की मैं भी तुम्हें धोका दूँ? उसके लिए तुम बाहर जाने का रास्ता थे, पर मेरे लिए तुम मेरी पूरी जिंदगी हो!" मेरा दिल अनु की बातें सुन कर उसकी ओर बहने लगा था, पर जुबान खामोश थी!
"हाँ अगर तुम्हें मेरी उम्र से कोई प्रॉब्लम है तो बात अलग है!" अनु ने माहौल को हल्का करते हुए कहा| पर मुझे उनकी उम्र से कोई फर्क नहीं पड़ता था, बस दिल टूटने का डर था!
"I love you!!!" मैंने एकदम से उनकी आँखों में देखते हुए कहा|
"I love you too!!!!" अनु ने एकदम से जवाब दिया और मेरे गले लग गई| हम 10 मिनट तक बस ऐसे ही गले लगे रहे, कोई बात-चीत नहीं हुई बस दो बेक़रार दिल थे जो एक दूसरे में करार ढूँढ रहे थे| "तो शादी कब करनी है?" अनु बोली और मैंने उन्हें अपने आलिंगन से आजाद किया|
"पहले इस पहाड़ से तो नीचे उतरें!" माने मुस्कुराते हुए कहा| हम दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़ कर अपने टेंट की तरफ आ रहे थे की तभी अनु बोली; "मैं बड़ी खुशनसीब हूँ, यहाँ आई थी एक
दोस्त के साथ और जा रही हूँ हमसफ़र के साथ!"
"खुशनसीब तो मैं हूँ जो मुझे तुम्हारे जैसा साथी मिला, जो मेरे सारे दुःख बाँट रहा है!" मैंने कहा|
"मैं तुम्हें इतना प्यार दूँगी की तुम सारे दुःख भूल जाओगे!" अनु ने मुस्कुराते हुए आत्मविश्वास से कहा|
'जो तू मेरा हमदर्द है.....सुहाना हर दर्द है!" मैंने कहा और अनु के सर को चूम लिया|
हमने बैग उठाया और नीचे उतर चले| इस वक़्त हम दोनों ही एक अजीब से जोश से भरे हुए थे, वो प्यार जो हम दोनों के दिलों में धधकरहा था ये उसी की ऊर्जा थी| रास्ते भर हमने जगह-जगह पर फोटोज क्लिक करी| दोपहर होते-होते हम कसोल वापस पहुँचे और सबसे पहले मैंने नूडल पैक करवाए| हाय क्या नूडल्स थे! ऐसे नूडल माने आजतक नहीं खाये थे! मैंने एक पौवा रम ली और 'माल' भी लिया! रूम पर आ कर पहले हम दोनों बारी-बारी नहाये और फिर नूडल खाने लगे, मैंने एक-एक पेग भी ना कर रेडी किया| अब रम में होती है थोड़ी बदबू जो अनु को पसंद नहीं आई| "eeew .....तुम तो हमेशा अच्छी वाली पीते हो तो आज रम क्यों?" अनु ने नाक सिकोड़ते हुए कहा| "इंसान को कभी अपनी जड़ नहीं भूलनी चाहिए! रम से ही मैंने शुरुआत की थी और पहाड़ों पर रम पीने का मजा ही अलग होता है|" मैंने कहा और नाक सिकोड़ कर ही सही पर अनु ने पूरा पेग एक सांस में खींच लिया| जैसे ही रम गले से नीचे उत्तरी उनका पूरा जिस्म गर्म हो गया| "Wow ये तो सच में बहुत गर्म है! अब समझ में आया पहाड़ों पर इसे पीने का मतलब!" अनु ने गिलास मेरे आगे सरकाते हुए कहा| "सिर्फ पहाड़ों पर ही नहीं, सर्दी में भी ये 'रम बाण्ड इलाज' है!" मैंने कहा और हम दोनों हंसने लगे| नूडल के साथ आज रम का एक अलग ही सुररोर था और जब खाना खत्म हुआ तो मैंने अपनी 'लैब' खोल दी जिसे देख कर अनु हैरान हो गई! "अब ये क्या कर रहे हो?" अनु ने पुछा|
"इसे कहते हैं 'माल'!" ये कहते हुए मैंने सिगरेट का तम्बाकू एक पेपर निकाला और मलाना क्रीम निकाली, दिखने में वो काली-काली, चिप-चिपि सी होती है| "ये क्या है?" अनु ने अजीब सा मुंह बनाते हुए कहा|
"ये है यहाँ की फेमस मलाना क्रीम!" पर अनु को समझ नहीं आया की वो क्या होती है| "हशीश!" मैंने कहा तो अनु एक दम से अपने दोनों गालों को हाथ से ढकते हुए मुझे देखने लगी! "Hawwww ....
ये तो ड्रग्स है? तुम ड्रग्स लेते हो?" अनु ने चौंकते हुए कहा| उनका इतना लाउड रिएक्शन का कारन था रम का असर जो अब धीरे-धीरे उन पर चढ़ रहा था|
"ड्रग्स तो अंग्रेजी नशे की चीजें होती हैं, ये तो नेचुरल है! ये हमें प्रकृति देती है!" मैंने अपनी प्यारी हशीश का बचाव करते हुए कहा जिसे सुन अनु हँस पड़ी| मैंने हशीश की एक छोटी गोली को माचिस की तीली पर रख कर गर्म किया और फिर उसे सिगरेट के तम्बाकू में दाल कर मिलाया और बड़ी सावधानी से वापस सिगरेट में भर दिया| सिगरेट मुँह पर लगा कर मैंने पहला कश लिया और पीठ दिवार से टिका कर बैठ गया| आँखें अपने आप बंद हो गईं क्योंकि जिस्म को आज कई महीनों बाद असली माल चखने को मिला था| "इसकी आदत तो नहीं पड़ती?" आने ने थोड़ा चिंता जताते हुए पुछा|
"इतने महीनों में तुमने कभी देखा मुझे इसे पीते हुए? नशा जब तक कण्ट्रोल में रहे ठीक होता है, जब उसके लिए आपकी आत्मा आपको परेशान करने लगे तब वो हद्द से बाहर हो जाता है|" मैंने प्रवचन देते हुए कहा, पिछले साल यही तो सीखा था मैंने!
"मैं भी एक puff लूँ?" अनु ने पुछा तो मैंने उन्हें सिगरेट दे दी| उन्होंने एक छोटा सा ड्रैग लिया और खांसने लगी और मुझे सिगरेट वापस दे दी| मैंने उनकी पीठ सहलाई ताकि उनकी खांसी काबू में आये| उनकी खांसी काबू में आई और मैंने एक और ड्रैग लिया और फिर से आँख मूँद कर पीठ दिवार से लगा कर बैठ गया| तभी अचानक से अनु ने मेरे हाथ से सिगरेट ले ली और एक बड़ा ड्रैग लिया, इस बार उन्हें खांसी नहीं आई, दस मिनट बाद वो बोलीं; "कुछ भी तो नहीं हुआ? मुझे लगा की चढ़ेगी पर ये तो कुछ भी नहीं कर रही!" अनु ने चिढ़ते हुए कहा|
"ये दारु नहीं है, इसका असर धीरे-धीरे होगा, दिमाग सुन्न हो जाएगा| मैंने कहा| पर उस पर रम की गर्मी चढ़ गई तो अनु ने अपने कपडे उतारे, अब वो सिर्फ एक पतली सी टी-शर्ट और काप्री पहने मेरे बगल में लेती थीं और फोटोज अपलोड करने लगी| इधर उनकी फोटोज अपलोड हुई और इधर मेरे फ़ोन में नोटिफिकेशन की घंटियाँ बजने लगी| मैंने फ़ोन उठाया ही था की अनु ने फिर से मेरे हाथ से सिगरेट ली और एक बड़ा ड्रैग लिया, उनका ऐसा करने से मैं हँस पड़ा और वो भी हँस दीं| मैंने अपना फ़ोन खोल के देखा तो 30 फेसबुक की नोटिफिकेशन थी! मैं हैरान था की की इतनी नोटिफिकेशन कैसे! मैंने जब खोला तो देखा की अनु ने हम दोनों की एक फोटो डाली थी और caption में लिखा था; 'He said YESSSSSSS! I Love You!!!' अनु के जितने भी दोस्त थे उन सब ने फोटो पर Heart react किया था और congratulations की झड़ी लगा दी थी! तभी आकाश का कमेंट भी आया है; "Congratulations sir and mam!" मैं मुस्कुराते हुए अनु को देखने लगा जो मेरी तरफ ही देख रही थी| चेहरे पर वही मुस्कुराहट लिए और रम और हशीश के नशे में चूर उनका चेहरा दमक रहा था| "चलो अब सो जाओ!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा और लास्ट ड्रैग ले कर मैं दूसरी तरफ करवट ले कर लेट गया| अनु ने मेरे कंधे पर हाथ रख
मुझे अपनी तरफ घुमाया और मेरे से चिपक कर लेट गई| आज पता नहीं क्यों पर मेरे जिस्म में एक झुरझुरी सी पैदा हुई और मेरा मन बहकने लगा| बरसों से सोइ हुई प्यास भड़कने लगी, दिल की धड़कनें तेज होने लगीं और मन मेरे और अनु के बीच बंधी दोस्ती की मर्यादा तोड़ने को करने लगा| मेरे शरीर का अंग जिसे मैं इतने महीनों से सिर्फ सु-सु करने के लिए इस्तेमाल करता था आज वो अकड़ने लगा था, पर कुछ तो था जो मुझे रोके हुए था| मैंने अनु की तरफ देखा तो उसकी आँख लग चुकी थी, मैंने खुद को धीरे से उसकी गिरफ्त से निकाला और कमरे से बाहर आ कर बालकनी में बैठ गया| सांझ हो रही थी और मेरा मन ढलते सूरज को देखने का था, सो मैं बाहर कुर्सी लगा कर बैठ गया| जिस अंग में जान आई थी वो वापस से शांत हो गया था, दिमाग ने ध्यान बहारों पर लगा दिया| कुछ असर सिगरेट का भी था सो मैं चुप-चाप वो नजारा एन्जॉय करने लगा| साढ़े सात बजे अनु उठी और मुझे ढूंढती हुई बाहर आई, पीछे से मुझे अपनी बाहों में भर कर बोली; "यहाँ अकेले क्या कर रहे हो?"
"कुछ नहीं बस ढलती हुई सांझ को देख रहा था|" ये सुन कर अनु मेरी गोद में बैठ गई और अपना सर मेरे सीने से लगा दिया| उसके जिस्म की गर्माहट से फिर से जिस्म में झूझुरी छूटने लगी और मन फिर बावरा होने लगा, दिल की धड़कनें तेज थीं जो अनु साफ़ सुन पा रही थी| शायद वो मेरी स्थिति समझ पा रही थी इसलिए वो उठी और मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अंदर ले आई| दरवाजा बंद किया और मेरी तरफ बड़ी अदा से देखा| उनकी ये अदा आज मैं पहली बार देख रहा था और अब तो दिल बगावत कर बैठा था, उसे अब बस वो प्यार चाहिए था जिसके लिए वो इतने दिनों से प्यासा था| अनु धीरे-धीरे चलते हुए मेरे पास आई और अपनी बाहें मेरे गले में डाल दी और कुछ पलों के लिए हमारी आँखें बस एक दूसरे को देखती रहीं| इन्ही कुछ पलों में मेरे दिमाग ने जिस्म पर काबू पा लिया, अनु ने आगे बढ़ कर मुझे Kiss करना चाहा पर मैंने उनके होठों पर ऊँगली रख दी; "अभी नहीं!" मैंने कहा और अनु को कस कर गले लगा लिया| अनु ने एक शब्द नहीं कहा और मेरी बात का मान रखा| हम वापस बिस्तर पर बैठ गए; "तुम्हारा मन था ना?" अनु ने पुछा|
"था....
पर ऐसे नहीं!!!" मैंने कहा|
"तो कैसे?" अनु ने पुछा|
"शादी के बाद! तब तक हम ये दोस्ती का रिश्ता बरकरार रखेंगे! प्यार भी होगा पर एक हद्द तक!"
"अब पता चला क्यों मैं तुमसे इतना प्यार करती हूँ?!" अनु ने फिर से अपनी बाहों में जकड़ लिया, पर इस बार मेरा जिस्म में नियंत्रण में था|
मेरा खुद को और उनको रोकने का कारन था, समर्पण! हम दोनों एक दूसरे को आत्मिक समर्पण कर चुके थे पर जिस्मानी समर्पण के लिए अनु पूरी तरह से तैयार नहीं थी| इतने महीनों में मैंने जो जाना था वो ये की अनु की सेक्स के प्रति उतनी रूचि नहीं जितनी की होनी चाहिए थी| मैं नहीं चाहता था की वो ये सिर्फ मेरी ख़ुशी के लिए करें और वही गलती फिर दोहराई जाए जो मैंने रितिका के लिए की थी!
अगले दिन हम तैयार हो कर तोश जाने के लिए निकले, यहाँ की चढ़ाई खीरगंगा के मुकाबले थकावट भरी नहीं थी| यहाँ पर बहुत से घर थे और रास्ता इन्हीं के बीच से ऊपर तक जाता था| ऊपर पहुँच कर हमने वादियाँ का नजारा देखा, अनु को इतना जोश आया की वो जोर से चिल्लाने लगी; " I Love You Maanu!" मैं खड़ा हुआ उसे ऐसा देख कर मुस्कुरा रहा था| हमने बहुत साड़ी फोटोज खईंची और वापस कसोल आ गए| शाम की बस थी जो हमें दिल्ली छोड़ती, बस में एक प्रेमी जोड़ा था जिसे देख कर अनु के मन में प्यार उबलने लगा| उसने मेरी बाँह अपने दोनों हाथों में पकड़ ली, जैसे की कोई प्रेमी जोड़ा पकड़ता है| मैंने फ़ोन निकाला और हमारी कल वाली फोटो पर आये कमैंट्स पढ़ने शुरू किये| ऐसा लग रहा था जैसे सारा बैंगलोर जान गया हो, "तैयार हो जाओ, बैंगलोर पहुँचते ही सब टूट पड़ेंगे!" अनु ने कहा| तभी मेरा फ़ोन बजने लगा; "ओ भोसड़ीवाले! हमें बताया भी नहीं तू ने और शादी कर ली?" सिद्धार्थ बोला, ये सुनते ही मेरी हँसी छूट गई| "यार अभी की नहीं है!" मैंने हँसते हुए कहा|
"मुझे तो पहले से ही पता था की तुम दोनों का कुछ चल रहा है!" अरुण बोला, दरअसल सिद्धार्थ का फ़ोन स्पीकर पर था|
"उस दिन जब तूने कहा था न की तू एक खुशखबरी बाँटना चाहता है मुझे तभी लगा था की तूम दोनों शादी की बात कहने वाले हो|" सिद्धार्थ बोला|
"तब तक हम इतने करीब नहीं आये थे ना!" अनु ने बोला, क्योंकि मेरे फ़ोन में हेडफोन्स लगे थे और एक ear पीस अनु के पास था और एक मेरे पास|
"भाभी जी! कब कर रहे हो शादी!" अरुण बोला, ये सुन कर हम दोनों ही हँस पड़े और उधर वो दोनों भी हँस पड़े|
"मैं तो अभी तैयार हूँ पर मानु मान ही नहीं रहा!" अनु ने बात साडी मेरे सर मढ़ते हुए कहा|
"यार अभी हम कसोल में हैं, पहले घर पहुँचते हैं फिर जरा workout करते हैं| चिंता मत करो 'वर दान' तुम ही करोगे!" मैंने कहा, इस बात पर हम चारों हँस पड़े|
इसी तरह हँसते हुए हम अगले दिन दिल्ली पहुँचे और वहाँ से फ्लाइट ली जिसने हमें बैंगलोर छोड़ा| घर पहुँचे तो अनु के जितने भी जानकार थे या दोस्त थे वो सब आ गए और हमें बधाइयाँ दी और सब की जुबान पर एक ही
सवाल था की शादी कब कर रहे हो| अभी तक तो हमने नहीं सोचा था की शादी कब करनी है तो उन्हें क्या बताते, हम दोनों ही इस सवाल पर एक दूसरे की शक्ल देख रहे होते और हँस के बात टाल देते| वैसे शादी के नाम से दोनों ही के पेट में तितलियाँ उड़ रहीं थी! पर अनु कुछ सोच रही थी, कुछ था जो वो चाहती थी पर मुझे बता नहीं रही थी| एक दिन की बात है, मैं ऑफिस से जल्दी आया तो देखा अनु बालकनी में चाय का कप पकडे गुम-शूम बैठी है| मैंने चुपके से आ कर उसके सर को चूमा और उसकी बगल में बैठ गया| "क्या हो रहा है?" मैंने पुछा तो अनु ने भीगी आँखों से मेरी तरफ देखा, मैं एक दम से घबरा गया और तुरंत उसके सामने बैठ गया और उसके आँसूँ पोछे! "सुबह से मम्मी-डैडी को दस बार कॉल कर चुकी हूँ पर वो हरबार मेरा फ़ोन काट देते हैं!" अनु ने फिर से रोते-रोते कहा| मैं सब समझ गया, वो चाहती थी की हमारी शादी में उसके मम्मी-डैडी भी शामिल हों और ना केवल शामिल हों बल्कि वो हमें आशीर्वाद भी दें| अब मेरे परिवार ने तो मुझसे मुँह मोड़ लिया था तो उन्हें बता कर भी क्या फर्क पड़ना था! "मम्मी-डैडी घर पर ही हैं ना?" मैंने अनु का चेहरा अपने हाथों में थामते हुए पुछा| तो जवाब में अनु ने हाँ में सर हिलाया, मैंने तुरंत फ़ोन निकाला और कल की फ्लाइट की टिकट्स बुक कर दी| "Pack your bags we're going to your parent's!" मैंने उनकी आँखों में देखते हुए कहा|
"पर वो नहीं मानेंगे! खामाखां बेइज्जत कर देंगे!" अनु ने रोते हुए कहा|
"वो हमसे बड़े हैं, थोड़ा गरिया भी दिए तो क्या? मेरे घरवालों की तरह जान से तो नहीं मार देंगे ना?!" मैंने कहा|
"तुम्हारे लिए जान देनी पड़ी तो दे दूँगी...." अनु इसके आगे कुछ बोलती उससे पहले मैं बोल पड़ा; "वाह! मेरे लिए मरने के लिए तैयार हो और मैं तुम्हारे लिए चार गालियाँ नहीं खा सकता?" मैंने कहा और अनु का हाथ पकड़ कर उसे खड़ा किया और अपने सीने से लगा लिया| अगले दीं हम सीधा अनु के मम्मी-डैडी के घर पहुँचे, मैंने डोरबेल बजाई और दरवाजा अनु की मम्मी ने खोला| उन्होंने पहले मुझे देखा पर मुझे पहचान नहीं पाईं, पर जब उनकी नजर अनु पर पड़ी तो उनके चेहरे पर गुस्सा लौट आया| वो कुछ बोल पातीं उससे पहले ही पीछे से अनु के डैडी आ गए और उन्होंने सीधा अनु को ही देखा और चिल्लाते हुए बोले; "क्यों आई है यहाँ?"
"सर प्लीज... मेरी एक बार बात सुन लीजिये उसके बाद आप जो कहेंगे हम वो करेंगे...आप कहेंगे तो हम अभी चले जाएंगे! बस एक बार इत्मीनान से हमारी बात सुन लीजिये....
!" मैंने उनके आगे हाथ जोड़ते हुए कहा| उनके मन में अपनी बेटी के लिए प्यार अब भी था इसलिए उन्होंने हाँ में गर्दन हिला कर हमें अंदर आने दिया, वो हॉल में सोफे पर बैठ गए और उनकी बगल में अनु की मम्मी खड़ी थीं| मैं अब भी हाथ जोड़े खड़ा था और अनु मेरे पीछे सर झुकाये खड़ी थी|
"सर आपकी बेटी उस रिश्ते से खुश नहीं थी, वो एक ऐसे रिश्ते में भला कैसे रह सकती थी जहाँ उसका ख्याल रखने वाला, उसको प्यार करने वाला कोई नहीं था? ऐसा नहीं है की इसने रिश्ता निभाने की कोई कोशिश नहीं की, पूरी शिद्दत से इसने उस आदमी से रिश्ता निभाना चाहा पर अगर कोई साफ़ कह दे की वो किसी और से प्यार करता है और जिंदगी भर उसे ही प्यार करेगा तो ऐसे में अनु क्या करती? आपने शायद मुझे नहीं पहचाना, मेरा नाम मानु है! कुमार ने मुझे ही बलि का बकरा बनाया था ताकि वो अनु से छुटकारा पा सके| वो आदमी कतई अनु के काबिल नहीं था! बचपन से ले कर जवानी तक अनु ने वही किया जो आपने कहा! फिर चाहे वो सब्जेक्ट choose करना हो या कॉलेज सेलेक्ट करना हो, सिर्फ और सिर्फ इसलिए की वो आपको खुश देखना चाहती है| शादी भी सिर्फ और सिर्फ इसलिए की ताकि आप दोनों को ख़ुशी मिले तो क्या उसे हक़ नहीं की वो अपनी जिंदगी थोड़ी सी अपनी ख़ुशी से जी सके?! डाइवोर्स के बाद वो आप पर बोझ न बने इसलिए उसने जॉब की, डाइवोर्स के बाद उसे जो पैसा मिला उससे खुद बिज़नेस शुरू किया और फिर आपके पास लौटी आपका आशीर्वाद लेने और आपको prove करने के लिए की उसने जिंदगी में तर्रक्की पाई है! पर शायद आप तब भी अनु से खफा थे! उस दिन अनु को मैं बहुत बुरी हालत में मिला....
" आगे मैं कुछ और बोलता उससे पहले अनु ने मेरे कंधे पर हाथ रख दिया, वो नहीं चाहती थी की मैं उन्हें रितिका के बारे में सब कहूं| इसलिए मैंने अपनी बात को थोड़ा छोटा कर दिया; "मैं लघभग मरने की हालत में था, जब अनु ने मुझे संभाला और मुझे जिंदगी का मतलब समझाया, मुझे याद दिलाया की जिंदगी कितनी जर्रूरी होती है| मुझे मेरे पाँव पर खड़ा करवाया और अपने साथ बिज़नेस में as a partner ले कर आई| पिछले साल दिसंबर से ले कर अब तक हमने बहुत तरक्की की है, दो कमरे के ऑफिस को आज हमने पूरे फ्लोर पर फैला दिया है| अब जब हम अपनी जिंदगी का एक जर्रूरी कदम लेना चाहते हैं तो हमें आपके प्यार और आशीर्वाद की जर्रूरत है! हम दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं! आप प्लीज हमें अपना आशीर्वाद दीजिये और हमें अपना लीजिये| आपके अलावा हमारा अब कोई नहीं है और बिना माँ-बाप के आशीर्वाद के हम शादी नहीं कर सकते! बस इसीलिए हम आपके पास आये हैं!" मैंने घुटनों पर बैठते हुए कहा| मेरी बातें उन पर असर कर गईं और उनकी आँखों से अश्रुओं की धारा बह निकली| उन्होंने गले लगाने को अपनी बाहें खोली और अनु भागी-भागी गई और उनके गले लग गई| मैं उठ कर खड़ा हुआ और ये मिलन देख कर मेरी भी आँखें नम हो चली थीं, क्योंकि मैं अपने माँ-बाप को miss कर रहा था| अनु से गले मिलने के बाद अनु के डैडी ने मुझे भी गले लगने को बुलाया| मैं ने पहले उनके पाँव छुए और फिर उनके गले लग गया, आज बरसों बाद मुझे वही गर्मी का एहसास मिला जो मुझे मेरे पिताजी से गले लगने के बाद मिलता था| उनसे गले लगने के बाद अनु की मम्मी ने भी मुझे गले लगने को बुलाया| मैंने पहले उनके पाँव छुए और फिर उन्होंने मेरे माथे पर चूमा और फिर अपने गले से लगा लिया| उनसे गले लग कर मुझे माँ की फिर याद आ गई|
अनु के मम्मी-डैडी ने हमें अपना लिया था, और अनु बहुत खुश थी! उन्होंने मुझे बिठा कर मुझसे मेरे परिवार के बारे में पुछा और मैंने उन्हें सब बता दिया| फिर मम्मी जी ने एक सवाल पुछा जो उनकी तसल्ली के लिए जर्रूरी था;
मम्मी जी: बेटा बुरा ना मानो तो एक बात पूछूँ?
मैं: जी जर्रूर
मम्मी जी: बेटा तुम्हारी उम्र कितनी है?
मैं: जी 28
मम्मी जी: अनु 34 की है और फिर डिवोर्सी भी है| तुम्हें इससे कोई परेशानी तो नहीं? बुरा मत मानना बेटा पर तुम या तुम्हारे परिवार वाले इसके लिए राजी होंगे?
मैं: Mam मेरे घरवालों ने मुझे घर से निकाल दिया, क्योंकि मैंने अपनी भतीजी की शादी में हिस्सा लेने की बजाय अपना career चुना! इसलिए उनका शादी में आने का सवाल ही पैदा नहीं होता! रही मेरी बात तो Mam, I assure you की मुझे अनु के डिवोर्सी होने से या उम्र में ज्यादा होने से कोई फर्क नहीं पड़ता! मैंने उनसे प्यार उनकी उम्र या उनका marital status देख कर नहीं किया|
डैडी जी: वो सब तो ठीक है बेटा पर ये तुमने sir-mam क्या लगा रखा है? तुम यहाँ
कोई इंटरव्यू देने थोड़े ही आये हो?
अनु: डैडी इंटरव्यू ही तो देने आये हैं, मेरे हस्बैंड की जॉब का इंटरव्यू!
ये सुन कर सब हँसने लगे|
डैडी जी: बेटा जब हम अनु के मम्मी-डैडी हैं तो तुम्हारे भी हुए ना?
अनु: डैडी ये ऐसे ही हैं! मुझे भी पहले ये mam ही कह कर बुलाते थे, वो तो मैंने कहा तब जा कर मेरा नाम लेना शुरू किया|
मम्मी जी: बेटा Chivalry होना अच्छी बात है पर अपनों में नहीं!
मैं: जी मम्मी जी!
डैडी जी: शाबाश!
वो पूरा दिन मैं उन्हीं के पास बैठा और हमारी बहुत सी बातें हुई जिससे उन्हें ये पता चल गया की मैं कैसा लड़का हूँ| रात को खाने के बाद सोने की बारी आई; वहाँ बस दो ही कमरे थे एक मम्मी-डैडी का और एक अनु का| अनु तो अपने ही कमरे में सोने वाली थी, मैंने सोचा मैं हॉल में ही सो जाता हूँ| पर तभी मम्मी जी आ गईं;
मम्मी जी: बेटा तुम यहाँ नहीं सोओगे!
अनु: तो क्या मेरे कमरे में? (अनु ने मजे लेने की सोची!)
मम्मी जी: वो शादी के बाद अभी मानु तेरे डैडी के साथ सोयेगा और मैं तेरे साथ! (मम्मी जी ने अनु के साथ थोड़ा मजाक में बात की और ये देख मैं मुस्कुराने लगा|)
अनु: डैडी रात में खरांटें मारते हैं!
मैं: मेरी चिंता मत करो, मैं और डैडी जी तो रात भर बातें करेंगे!
तभी डैडी जी भी आ गए|
डैडी जी: कौन बोला मैं खर्राटें मारता हूँ?
मैंने एक दम से अनु की तरफ ऊँगली कर दी|
डैडी जी: अच्छा? और जो तू 10 साल की उम्र तक रात को डर के मारे बेड गीला कर देती थी वो?
ये सुन कर मैं, मम्मी जी और डैडी जी हँस पड़े और अनु शर्म से लाल हो गई!
मैं: डैडी जी ये आपने सही बात बताई, बहुत टांग खींची है मेरी अब मेरी बारी है! आज रात तो सारे राज जानूँगा मैं तुम्हारे! (मैंने हँसते हुए कहा|)
अनु: प्लीज डैडी कुछ मत बताना वरना ये साड़ी उम्र मुझे चिढ़ाते रहेंगे!
मैं: नहीं प्लीज डैडी मुझे सब बताना, ये मेरी बहुत खिंचाई करती है|
डैडी जी: मैं तो बता कर रहूँगा!
तो इस तरह मजाक-मस्ती में वो रात गुजरी, अगली सुबह ही हम सब उनके पंडित के पास चल दिए और उन्होंने मेरी जन्म तिथि से मेरी कुंडली बनाई और शादी की तारिख 23 फरवरी निकाली| अब तारिख सुन कर हम दोनों का मुँह फीका हो गया, मम्मी जी ने अनु के गाल पकड़ते हुए कहा; "बड़ी जल्दी है तुझे शादी करने की!" उनकी बात सुन हम सब हँस दिए|
अब मम्मी-डैडी को बैंगलोर में हमारा घर देखना था और उन्हें ये नहीं पता था की हम 1BHK में रह रहे हैं वरना वो बहुत गुस्सा करते! हम ने सोचा की पहले एक 2 BHK लेते हैं और फिर उन्हें वहाँ बुला आकर घर दिखाएँगे| तो तय ये हुआ की इस साल दिवाली वो हमारे साथ बैंगलोर में ही मनाएंगे| हम हँसी-ख़ुशी वापस आये और अनु ने House Hunting का काम पकड़ लिया और मुझे पहले के पेंडिंग काम करने पड़े| अनु घर शॉर्टलिस्ट करती और रोज शाम को मुझे अपने साथ देखने के लिए ले जाती| ऐसे करते-करते 20 दिन हो गए और हमें finally पाने सपनो का घर
मिल गया| हमने मिल कर उसे सजाया, ये वो खरोंदा था जहाँ हमारी नई जिंदगी शुरू होने वाली थी! दिवाली में 10 दिन रह गए थे और मम्मी-डैडी आ गए थे| उन्हें पिक करने मैं ही गया था और नए घर में आ कर वो बहुत खुश थे| अनु ने उन्हें हमारे पुराने घर के बारे में सब सच बता दिया था और उन्होंने हमें कुछ नहीं कहा| वो जानते थे की बच्चे बड़े हो गए हैं और समझदार भी! अगले दिन हम दोनों मम्मी-डैडी को ऑफिस ले गए और अपना ऑफिस दिखाया, डैडी जी हमारे लिए एक गणपति जी की मूर्ति लाये थे जो उन्होंने ऑफिस के मंदिर में खुद रखी| फिर दिवाली की पूजा हुई और उन्होंने अपने हाथ से सारे स्टाफ को बोनस दिया| घर पर पूजा भी पूरे विधि-विधान से हुई और उन्होंने हमें ढेर सारा आशीर्वाद दिया| कुछ दिन बैंगलोर घूमने के बाद वो वापस लखनऊ चले गया| उनके जाने के अगले दिन मेरे फ़ोन पर कॉल आया, मैंने बिना देखे ही कॉल उठा लिया और फिर एक भारी-भरकम आवाज मेरे कान में पड़ी; "बेटा....घर आजा...." ये आवाज मेरे ताऊ जी की थी और उनकी आवाज से दर्द साफ़ झलक रहा था.... उनके आगे कुछ कहने से पहले ही मेरी जुबान ने हाँ कह दिया| मैंने तुरंत अपना बैग उठाया और उसमें कपडे ठूसने लगा, अनु ने मुझे ऐसा करते देखा तो वो घबरा गई; "क्या हुआ?" उसने पुछा| पर मेरे कहने से पहले ही उसे मेरी आँखों में आँसू नजर आ गए; "ताऊ जी का फ़ोन था...मुझे कुछ दिन के लिए गाँव जाना होगा!" मैंने खुद को संभालते हुए कहा| "मैं भी चलती हूँ!" अनु ने घबराते हुए कहा| "नहीं....अभी नहीं! पहले मुझे जाने दो, फिर मैं तुम्हें कॉल करूँगा तब आना|" मैंने कहा और अनु एकदम से मेरे सीने से लग गई, उसे डर लग रहा था की मैं कहीं उसे छोड़ कर तो नहीं जा रहा? "Baby ... डरो मत.... मैं वापस आऊँगा! I Promise!!!" मैंने अनु के आँसूँ पोछते हुए कहा| अनु को यक़ीन हो गया और वो मुझे छोड़ने के लिए एयरपोर्ट तक आई और आँखों में आँसू लिए बोली; "मैं तुम्हारा इंतजार करुँगी!" मैंने अपने दोनों हाथों से उनके चेहरे को थामा और माथे को चूमा; "जल्दी आऊँगा!" ये कहते हुए मैं एयरपोर्ट के अंदर घुसा और फ्लाइट में बैठ कर लखनऊ पहुंचा और वहाँ से बस पकड़ कर घर की ओर चल दिया| जहाँ पिछली बार मेरी आँखों में आँसू थे क्योंकी मेरे अपनों ने ही मुझे घर से निकाल दिया था वहाँ आज एक अजीब सी ख़ुशी थी की मेरे परिवार ने मुझे फिर वापस बुलाया|
update 70 (1)
ख़ुशी-ख़ुशी मैं बस से उतरा और अपने बचपन के हसीन दिन याद करता हुआ घर की ओर चल पड़ा| साड़ी पुरानी सुखद यादें ताज़ा हो चुकीं थीं और घरवालों से मिलने की बेचैनी बढ़ती जा रही थी| घर पहुँचा और दरवाजा खटखटाया तो ताऊ जी ने दरवाजा खोला| मुझे देखते ही उनकी आँखिन नम हो गईं, मैंने झुक कर उनके पाँव छुए और उन्होंने तुरंत मुझे अपने गले लगा लिया| रोती हुई आवाज में वो बस इतने बोले; "तेरी माँ....
" इतना सुनते ही मेरे मन की ख़ुशी गायब हो गई और डर सताने लगा की कहीं उन्हें कुछ हो तो नहीं गया| मैं तुरंत माँ के कमरे की तरफ दौड़ा वहाँ जा के देखा तो माँ लेटी हुई थी और पिताजी उनकी बगल मैं बैठे थे| जैसे ही माँ की नजर मुझ पर पड़ी उन्होंने मुझे गले लगाने को तुरंत अपने हाथ खोल दिए, मैंने अपना बैग बाहर ही छो कर अंदर आया और माँ के गले लग गया| माँ का शरीर कमजोर हो गया था पर अब भी उनके कलेजे में वो तपिश थी जो पहले हुआ करती थी| माँ ने रोना शुरू कर दिया और मैं भी खुद को रोने से ना रोक पाया| पिताजी जो अभी तक सर झुका कर बैठे थे मुझे देखते ही उठ खड़े हुए और शर्म से उनका सर झुक गया, पीछे ताई जी, ताऊ जी और भाभी भी चुप-चाप आ कर खड़े हो गए| सभी की आंखें भीगी हुई थीं पर मेरा ध्यान अभी सिर्फ और सिर्फ मेरी माँ पर था| माँ ने रोती हुई आवाज में कहा; "मुझे माफ़ कर दे बेटा!" पर मैं उन के मुँह से कुछ नहीं सुनना चाहता था क्योंकि वो बहुत बीमार थीं इसलिए मैं ने उनको आगे कुछ बोलने का मौका ही नहीं दिया| "बस माँ... सब भूल जाओ!" मैंने कहा और जब मैं उनके पास से उठा तो मैंने सब को अपने पीछे खड़ा पाया| सबसे पहले ताई जी आगे आईं और मैंने उनके पाँव छुए और उन्होंने मुझे अपने गले लगा लिया| "बेटा....माफ़ कर दे....!" ताई जी ने रोते-रोते कहा| "छोडो ताई जी!" मैंने बस इतना ही कहा| उसके बाद भाभी भी मेरे गले लग गईं और मुझे उनके पाँव छूने का मौका ही नहीं दिया| "मानु भैया! मुझसे भी नराज हो!" भाभी ने रोते-रोते कहा| मैंने धीरे से कहा; "भाभी आपने तो कुछ किया ही नहीं?" फिर नजर पिताजी पर पड़ी जो सर झुकाये खड़े थे, मैं उनके पास पहुंचा और उनके पाँव छूने को झुका तो उन्होंने सीधा मुझे अपने गले लगा लिया और फूट-फूट के रोने लगे| "बेटा...मेरे पास अलफ़ाज़ नहीं कुछ कहने को....मैंने अपने ही बेटे को धक्के मार कर घर से निकाला, उसके मुँह पर दरवाजा बंद कर दिया! मुझे तो मर जाना चाहिए!" पिताजी रोते हुए बोले| "बस पिताजी...
आपको पूरा हक़ है!" मैंने कहा और खुद को रोने से रोका| जब मैं वापस पलटा तो ताऊ जी बोले; "बेटा तू क्या गया घर से, इस घर की किस्मत ने हम से मुँह मोड़ लिया! तेरे साथ जो हमने किया उसी के कारन हम लोगों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा! 8 जुलाई को कुछ हमलावर लोग उसके ससुराल में घुस आये और इसके सास-ससुर और पति को जान से मर दिया| वो तो शुक्र है की उसने खुद को घर के गुसल खाने में छुपा लिया था वर्ण वो लोग इसे भी मार देते! पूरा का पूरा खानदान खत्म हो गया! पुलिस का चक्कर हुआ और चार महीने तक हमें इसी घर में कैद रखा गया ताकि कहीं हम लोगों पर भी हमला ना हो जाए| इन चार महीनों में सारा खेती-बाड़ी का काम खराब हो गया, फिर तेरी माँ ने अन्न-जल त्याग दिया और कहने लगी जब तक मेरा बेटा नहीं आ जाता तब तक मैं कुछ नहीं खाऊँगी! तब मैंने तुझे फ़ोन किया! और तुम लोग जानते हो, मैंने बस इतना कहा की बेटा घर आजा और इसने एक शब्द नहीं कहा और सीधा घर आगया! इसके मन में हम में से किसी के लिए दिल में कोई मलाल नहीं और हमने ऐसे फ़रमाबरदार लड़के के साथ जो सलूक किया ये सब उसकी का फल है!" ताऊ जी बोले|
"ताऊ जी जो हुआ सो हुआ! आप सब मेरा परिवार हो और अगर आपने मुझे घर से निकाला भी तो क्या हुआ? आपको पूरा हक़ था!" मैंने अपने आँसू पोछते हुए कहा| तभी पीछे छुपी हुई रितिका सामने आई, आँखें आंसुओं से लाल, काली साडी पहने हुए और आ कर सीधा मेरे गले लग गई| मेरे जिस्म को ऐसा लगा जैसे की किसी काले साये ने मुझे दबोच लिया हो, मैंने तुरंत उससे खुद से अलग कर दिया| सब ने मेरा ये बर्ताव देखा और ताई जी बोलीं; "माफ़ कर दे इसे बेटा! इस बेचारी ने बहुत कुछ सहा है!"
"कभी नहीं ताई जी! इसे तो मरते दम तक माफ़ नहीं करूँगा! इसके कारन मुझे मेरे ही घर से मेरे ही परिवार ने निकाल दिया और ये खड़ी चुप-चाप सब देखती रही| आपको याद है न इसके बचपन के दिन, जब आप सब इसे डाँटा और झिड़का करते थे? तब मैं इसे बचाता था और उस दिन इसके मुँह से एक शब्द नहीं फूटा!" ये सुन कर सब का सर झुक गया, मेरे दिल में आग तो इस बात की लगी थी की इस लड़की ने मुझे अपने प्यार के जाल में फंसा कर मेरा इस्तेमालक किया पर वो मैं कह नहीं सकता था| इसलिए मैंने बात को नया मोड़ दिया था| अब मैं अपने परिवार को और दुखी नहीं देखना चाहता था और ऊपर से मुझे माँ की भी चिंता थी; "ताऊ जी मैं जा कर डॉक्टर को ले आता हूँ|" इतना कहते हुए मैं बाहर निकला और कुछ दूरी पर पहुँच कर मैंने अनु को फ़ोन मिलाया और उसे सारी बात बताई| माँ की हालत खराब सुन वो आने की जिद्द करने लगी पर मैंने उसे समझाया की ये समय ठीक नहीं है| एक बार उनकी तबियत ठीक हो जाए मैं उन्हें सब कुछ बता दूँगा और तब अनु को माँ से मिलवाऊँगा|
"ऋतू के साथ .....
" आगे अनु कुछ कह पाती उससे पहले मैंने उसकी बात बीच में काट दी; "ऋतू नहीं रितिका! दुबारा ये नाम कभी अपनी जुबान पर मत लाना! मैं ये नहीं कहूंगा की जो हुआ वो अच्छा हुआ पर मुझे उससे घंटा कोई फर्क नहीं पड़ा! जब उसकी बला से मैं जीऊँ या मरुँ तो मेरी बला से वो जिये या मरे!" मैंने गुस्से से कहा|
"ok ...ok ... calm down! इस वक़्त तुम्हें घर को संभालना है, कहीं इतना गुस्सा कर के खुद बीमार न पड़ जाना|" अनु ने कहा| कॉल काट कार मैं कुछ दूर आया हूँगा की मुझे संकेत मिल गया| उसने अपनी बाइक रोकी और उतर कर मेरे गले लग कर रोने लगा| "भाई....." इसके आगे वो कुछ नहीं बोला| "देख मैं आ गया हूँ तो सब कुछ ठीक हो जायेगा| वैसे ये बता की घडी कैसी लगी?" मैंने बात बदलते हुए कहा| उसने तुरंत मुझे अपना हाथ दिखाया जिसमें उसने घडी पहनी हुई थी| "अब लग रहा है न तू हीरो!" मैंने हँसते हुए कहा| उसने पुछा की मैं कहाँ जा रहा हूँ तो मैंने उसे बताया की डॉक्टर को लेने तो वो बोला की मेरी बाइक ले जा| उसकी बाइक ले कर मैं फ़ौरन डॉक्टर के पहुँचा और उन्हें माँ का हाल बताया, जो-जो जर्रूरी था वो सब ले कर हम घर आये| डॉक्टर ने माँ को देखा और दवाइयां लिखीं, IV चढ़ाया और फिर मैं उसे छोड़ कर आ गया| शाम होने को आई थी और अभी तक किसी ने कुछ नहीं खाया था| तभी मुझे याद आया की चन्दर तो यहाँ है ही नहीं? "ताऊ जी चन्दर भैया कहा हैं?" मैंने पुछा तो उन्होंने कहा; "बेटा 4 महीने पुलिस का सख्त पहरा था और वो किसी को भी बाहर जाने नहीं देती थी, अब तू तो जानता ही है की चन्दर को नशे की लत है| उससे ये सब बर्दाश्त नहीं हो रहा था और उसकी हालत दिन पर दिन खराब होती जा रही थी| तब तेरी भाभी ने बताया की जाने से पहले तूने कहा था की उसे नशा मुक्ति केंद्र ले जाय जाए| इसलिए हम ने उसे वहाँ भर्ती कराया है और ईश्वर की कृपा से अब उसमें बहुत सुधार है|"
ये जान कर ख़ुशी हुई की अब चन्दर सुधर जाएगा| पकोड़े बन कर आये और मैंने माँ को अपने हाथ से खिलाये, नवंबर का पहला हफ्ता था तो सर्द हवाएँ चल रहीं थीं| सब माँ-पिताजी के कमरे में ही बैठे थे सिवाय रितिका के! "तो बेटा तू इतने दिन था कहा पर?" माँ ने पुछा|
"माँ पहले तो मैं बैंगलोर गया था जहाँ मैंने एक दोस्त की कंपनी में काम शुरू किया| उसने मुझे अपनी कंपनी में पार्टनर बनाया, मैंने इतने साल जो भी कमाया था वो मैंने उसके बिज़नेस में लगा दिया, फिर उसी के साथ मैं अमेरिका गया और वहाँ नया काम सीखा और हम वापस बैंगलोर आ गए| नया काम मिला और हम दोनों ने मिल कर काम बहुत फैलाया बाकी आप सब का आशीर्वाद है की बिज़नेस अच्छा चल रहा है|" मैंने कहा पर मैंने जानबूझ कर उन्हें अनु के बारे में कुछ नहीं बताया|
"अरे फिर तो तूने अमरीका में गाय-गोरु, सूअर, मछली, सांप, केकड़े और पता नहीं क्या क्या खाया होगा?" ताई जी ने नाक सिकोड़ते हुए कहा|
"नहीं ताई जी...
मैं उन दिनों बीमार था और बाहर का खाना नहीं खा सकता था|वहाँ जा कर मैंने सलाद या फिर एक भारतीय रेस्टुरेंट था जहाँ मैं दाल-रोटी ही खाता था|" मैंने हँसते हुए कहा, क्योंकि मेरे परिवार को अब भी लगता था की बाहर सब यही खाते हैं!
"तुझे हुआ क्या था उन दिनों? तू एक दम से सूख गया था! वो तो हम लोग शादी-ब्याह के काम में लगे थे इस करके पूछना भूल गए!" पिताजी ने पुछा|
"कुछ नहीं पिताजी....जब सपने टूटते हैं तो इंसान थोड़ा टूट ही जाता है!: ये शब्द अपने आप ही निकल पड़े जिसे रितिका ने सब के बर्तन उठाते हुए सुना और फिर चली गई|
"क्या मतलब?" ताऊ जी ने पुछा|
"जी वो...मेरी जॉब छूट गई थी! मैं मन ही मन घर लेने की तयारी कर रहा था ...तो..." मैंने बात को जैसे-तैसे संभाला|
'पर बेटा ऐसा था तो तूने हमें क्यों कुछ नहीं बताया? पिताजी बोले|
"क्या बताता पिताजी? वो हालत आप सब से देखि नहीं जाती..... बिलकुल चन्दर भैया जैसी हालत थी मेरी..... मौत के कगार पर पहुँच गया था मैं! अगर मेरा दोस्त नहीं होता और मुझे नहीं संभालता तो मैं मर ही जाता!| मैंने उन्हें सच बता दिया पर अनु का नाम अब भी नहीं बताया था| इधर सब के सब हैरानी से मुझे देख रहे थे|
"तू शराब पीटा है?" ताऊ जी ने कहा|
"ताऊ जी इतने साल शहर में रहा, कभी-कभी जब टेंशन ज्यादा होती तो पी लेता था पर कण्ट्रोल में पीता था, पर उन दिनों काबू से बाहर हो गई!" मैंने शर्म से सर झुकाते हुए कहा|
"तो तू अब भी पीता है?" माँ ने पुछा|
"माँ मैं जिस माहौल में काम करता हूँ उसमें कभी-कभी कोई ख़ुशी मनानी होती है तो थोड़ा बहुत होता है|" मैंने कहा|
"देख बेटा हम सब के लिए तू ही एक सहारा है और तू ऐसा कुछ ना कर की...." आगे बोलने से पहले माँ की आँखें गीली हो गईं|
"माँ मैं वादा करता हूँ की मैं ऐसा कभी कुछ नहीं करूँगा!"
"अब तेरा बिज़नेस भी चल पड़ा है, तो शादी कर ले!" पिताजी बोले|
"बिलकुल पिताजी....
पर पहले माँ तो ठीक हो जाए!" मैंने उत्साह में आते हुए कहा|
"तूने इतना कह दिया, मेरी आधी तबियत ठीक हो गई!" माँ ने कहा और सारे लोग हँस पड़े| रात का खाना मैंने माँ को अपने हाथ से खिलाया तो माँ बोली; "देख कितनी नसीब वाली हूँ मैं, पहले मैं तुझे खिलाती थी और आज तू मुझे खिला रहा है!" मैं ये सुन कर मुस्कुरा दिया| उन्हें अच्छे से खाना खिला कर मैंने भी उनके सामने बैठ कर खाना खाया और फिर उन्हें दवाई दी| माँ के सोने तक मैं उनके पाँव दबाता रहा और फिर अपने कमरे में आ कर पलंग पर सर झुका कर बैठ गया| मैं सोच रहा था की माँ जल्दी से तंदुरुस्त हो जाएँ तो मैं उन्हें अनु से मिलवाऊँ! पर एक ही दिक्कत है, रितिका! अभी उसका नाम लिया ही था की एक काला साया मेरे कमरे की चौखट पर खड़ा हो गया|
"आपकी बद्दुआ लग गई मुझे! कहते हैं की सेक सच्चे आशिक़ को कभी दुःख नहीं देना चाहिए और मैंने उसका दिल तोडा था, तो मुझे सजा तो मिलनी ही थी!" रितिका मेरे नजदीक आई| उसने एक शाल ओढ़ रखी थी; "मैंने कभी राहुल को आपके और मेरे प्यार के बारे में कुछ नहीं बताया| कभी हिम्मत नहीं हुई उसे कुछ कहने की, वो सच्चा प्यार करता था मुझसे पर मैं उसे भी 'छलने' लगी! ऋतू ने अपनी शाल हटाई और उसकी गोद में एक नन्ही सी जान थी, उसने उसे मेरी तरफ बढ़ाया और बोली; "ये आपके प्यार की निशानी! इसे आपको सौंपने आई हूँ....! नेहा....वही नाम जो आप देना चाहते थे!" मैं एक टक उस दो महीने की बच्ची को देखने लगा, आँखें बंद किये हुए वो सो रही थी| पर सर्द हवा से उसकी नींद टूटने लगी थी, मैंने उसे तुरंत अपनी गोद में ले लिया और अपने सीने से लगा लिया| जिगर में जल रही नफरत की आग पर आज पानी बरसने लगा था!
update 70 (2)
सीने में जितनी भी जलन थी, अगन थी वो सब ठंडी हो रही थी! आँख बंद किये मैं उस आनंद के सागर में डूब गया..... मेरे सीने की तपन पा कर वो बची भी जैसे मुझ में अपने पापा को ढूँढ रही थी| मैंने उसे अपने सीने से अलग किया और उसके मस्तक को चूमा| अपने दाहिने हाथ से उसके गाल को सहलाया! आँखें जैसे प्यासी हो चली थीं और उसके मासूम चहरे से हटती ही नहीं थी| आज मैं खुद को दुनिया का सबसे खुशकिस्मत इंसान समझ रहा था! मेरा जीवन जैसे पूरा हो चूका था! आज तक सीने में बीएस एक आशिक़ का दिल धड़कता था पर आज से एक बाप का दिल धड़कने लगा था| मैंने एक बार फिर से उसके माथे को चूमा, दिवार का सहारा ले कर मैं बैठा और अपने ऊपर चादर दाल ली और वो चादर मैंने मेरी बेटी के इर्द-गिर्द लपेटी| कुछ इस तरह से की उसे गर्माहट मिले पर सांस भी पूरा आये| नेहा की छोटी सी प्यारी सी नाक... उसके छोटे-छोटे होंठ.... गुलाब जामुन से गुलाबी गाल... तेजोमई मस्तक.... उसके छोटे-छोटे हाथ .... मैं मंत्र मुग्ध सा उसे देखता ही रहा| धौंकनी सी चलती उसकी सांसें जैसे मेरा नाम ले रही थी....
उसके छोटे-छोटे पाँव जिनमें एक छोटी सी जुराब थी| वो पूरी रात मैं बस नेहा को निहारता रहा और एक पल के लिए भी अपनी आँखें नहीं झपकाईं! सुबह कब हुई पता नहीं, कौन आया और कौन गया मुझे जैसे कोई फर्क ही नहीं पद रहा था| आँखें बस उसी पर टिकी थीं और मैं उम्मीद करने लगा था की वो अभी अपने छोटे से मुँह से 'पापा' कहेगी! सुबह जब उसकी आँख खुली तो उसने मुझे देखा और मुझे ऐसा लगा जैसे की वो मुस्कुराई हो| मैंने उसके माथे को चूमा और उसने अपने नन्हे-नन्हे हाथ ऊपर उठा दिए| मैंने जब उन्हें पकड़ा तो उसने एक दम से मेरी ऊँगली पकड़ ली| "मेरा बच्चा उठ गया?" मैंने उसकी मोतियों जैसी आँखों में देखते हुए कहा| "मैं आपका पापा हूँ!" मैंने कहा और उसके गाल को हुमा और वो मुस्कुराने लगी| मैं उठा क्योंकि मन ने कहा की उसे दूध चाहिए होगा और नीचे आया| मेरी गोद में नेहा को देख ताई जी बोलीं; "मिल लिए?" तभी रितिका सामने आई और उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी| ये मुस्कान इसलिए थी की मैं आज अपनी बेटी को पा कर बहुत खुश था| "जानता था तू नेहा की वजह से रितिका को माफ़ कर देगा!" ताऊ जी बोले| "माँ-बाप के किये की सजा बच्चों को कभी नहीं देते और फिर ये तो मेरी बेटी है, मैं भला इससे गुस्सा कैसे हो सकता हूँ|" मैंने नेहा का कमाता चूमते हुए कहा| उस पल एक बाप बोल रहा था और उसे कुछ फर्क नहीं पद रहा था की कोई क्या सोचेगा| अगर उस समय कोई मुझसे सच पूछता तो भी मैं सब सच बोल देते! मेरे मुँह से 'मेरी बेटी' सुन कर रितिका फिर से मुस्कुरा दी, वो सोच रही थी की मैंने उसे माफ़ कर दिया है| पर मेरा दिल उसके लिए अब पत्थर का बन चूका था! उसने मेरे हाथ से नेहा को लिया और युपर उसे दूध पिलाने चली गई| मैं इधर अपनी माँ के पास आया और उनका हाल-चाल पुछा| चाय पी और मेरा दिल फिर से नेहा के लिए बेकरार हो गया मैं उसे ढ़ुडंछ्ता हुआ ऊपर पहुँचा| रितिका ने उसे दूध पिलाना बंद किया था और वो अपने ब्लाउज का हुक बंद कर रही थी| मैं वहाँ रुका नहीं और छत पर चला गया| वो मेरे पीछे-पीछे नेहा को गोद में ले कर आई और फिर मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोली; "आपकी लाड़ली!" मैंने उसकी तरफ देखा भी नहीं और मुस्कुराते हुए नेहा को अपनी जो में उठा लिया| मैं नेहा की पीठ सहलाते हुए छत पर घूमने लगा| फिर अचानक से मुझे याद आया की अनु को कॉल कर के खुशखबरी दे दूँ| मैंने तुरंत उसे कॉल मिलाया और कहा की जल्दी से वीडियो कॉल पर आओ| मैं छत पर पैरापिट वॉल से पीठ लगा कर नीचे बैठा| मेरी दोनों टांगें जुडी थीं और नेहा उसी का सहारा ले कर बैठी थी, इतने में अनु का वीडियो कॉल आ गया; "आपको पता है आज है ना, मैं हैं ना, आपको है ना एक प्याली-प्याली, गोलू-गोलू princess से मिलवाना है!" मैंने तुतलाते हुए कहा| मेरी ऐसी भाषा सुन कर अनु हँसने लगी और बोली; "अच्छा जी? मुझे भी मिलवाओ ना!" मैंने फ़ोन साइड में रखा और नेहा को अपने सीने से लगा कर
बिठाया और फिर फ़ोन दुबारा उठाया| नेहा को देखते ही अनु बोल पड़ी; "ये प्यालि-पयाली छोटी सी गुड़िया कौन है?" नेहा भी फ़ोन देख कर मुस्कुराने लगी| "मेरी बेटी नेहा!" मैंने गर्व से कहा| ये सुन कर अनु को एक झटका लगा पर उसने ये बात जाहिर नहीं की और मुस्कुराते हुए कहा; "छो छवींट!" मैंने नेहा के सर को चूमा और तभी अनु ने पुछा; "माँ कैसी हैं अब?"
"कल IV चढ़ाया था और दवाइयाँ दी हैं| कल सब कह रहे थे की शादी कर ले, तो मैंने कहा की माँ की तबियत ठीक हो जाये फिर| वैसे मैंने सब को तुम्हारे बारे में थोड़ा-थोड़ा बता दिया है|"
"क्या-क्या बताया?" अनु ने उत्सुकता से पुछा|
"यही की तुम ने मुझे मरने से बचाया और फिर मुझे अपने बिज़नेस में भी पार्टनर बनाया, बस तुम्हारा नाम नहीं बताया!" मैंने कहा|
"हाय! कितना wait करना होगा!" अनु ने साँस छोड़ते हुए कहा|
"यार जैसे ही माँ ठीक हो जाएंगी मैं उन्हें सब कुछ बता दूँगा| तब तक मैं तुम्हारा परिचय मेरी बेटी से करा देता हूँ| बेटा (नेहा) ये देखो ...मैं है ना... इनसे है ना... शादी करने वाला हूँ! फिर ये है ना आपकी मम्मी होंगी!" मैंने तुतलाते हुए कहा| पर मेरी ये बात शायद अनु को ठीक नहीं लगी|
"तुम बुरा न मानो तो एक बात पूछूँ?" अनु बोली| उसी आवाज में गंभीरता थी इसलिए मैंने पूरा ध्यान नेहा से हटा कर अनु पर लगाया और हाँ में सर हिलाया| "Are you sure!" अनु ने डरते हुए कहा| ये डर जायज था क्योंकि अगर किसी बाप से पूछा जाए की ये उसका बच्चा है तो गुस्सा आना लाज़मी है|
"हाँ ये मेरा ही खून है! तुम तो जानती ही हो की रितिका के कॉलेज के दिनों में हम बहुत नजदीक आ गए थे और रितिका की लापरवाही की वजह से उसके पीरियड्स मिस हो गए! तब मैं उसे डॉक्टर के ले गया था और उन्होंने कहा था की वो physically healthy नहीं है इसलिए उस टाइम कुछ भी नहीं हो सकता था| उन्होंने उसे कुछ दवाइयां दी थीं ताकि वो अपनी pregnancy को delay करती रहे! शादी के बाद रितिका ने वो गोलियाँ खानी बंद कर दी होंगी!" मैंने कहा| अनु को विश्वास हो गया की ये मेरा ही बच्चा है पर अब मेरे दिल में एक सवाल पैदा हो चूका था; "अगर तुम बुरा ना मनो तो मैं एक सवाल पूछूँ?" मैंने कहा पर अनु जान गई थी की मैं क्या पूछने वाला हूँ और वो तपाक से बोली; "हाँ...
मैं इस प्यारी सी गुड़िया को अपनाऊँगी और अपनी बेटी की तरह ही प्यार करूंगी!" इस जवाब को सुन मेरे पास अब कोई सवाल नहीं था और मुझे मेरा परिवार पूरा होता दिख रहा था| "thank you!" मैंने नम आँखों से कहा|
"Thank you किस बात का? अगर तुम मेरी जगह होते तो मना कर देते?" अनु ने मुझे थोड़ा डाँटते हुए कहा| मैंने अपने कान पकड़े और दबे होठों से सॉरी कहा| "नेहा देख रहे हो अपने पापा को? पहले गलती करते हैं और फिर सॉरी कहते हैं? चलो नेहा को मेरी तरफ से एक बड़ी वाली Kissi दो!" अनु ने हुक्म सुनाते हुए कहा| मैंने तुरंत नेहा के दाएँ गाल को चूम लिया, नेहा एक दम से मुस्कुरा दी| उसकी मुस्कराहट देख कर हम दोनों का दिल एक दम से ठहर गया| "अब तो मुझे और भी जल्दी आना है ताकि मैं मेरी बेटी को खुद Kissi कर सकूँ!" अनु ने हँसते हुए कहा| तभी नीचे से मुझे पिताजी की आवाज आई और मैं bye बोल कर नेहा को गोद में लिए नीचे आ गया| नाश्ता तैयार था तो रितिका ने नेहा को गोद में लेने को हाथ आगे बढाए, पर मैंने उसे कुछ नहीं कहा और नेहा को गोद में ले कर माँ के कमरे में आ गया| मेरा और माँ का नाश्ता ले कर पिताजी कमरे में ही आ गए| "अच्छा बीटा अब तो नेहा को यहाँ लिटा दे और नाश्ता कर ले|" पिताजी बोले पर मेरे पास उनकी बात का तर्क मौजूद था| "आज माँ मुझे खिलाएँगी!" मैंने कहा तो माँ ने बड़े प्यार से मुझे परांठा खिलाना शुरू किया और मैंने नेहा के साथ खेलना जारी रखा| नाष्ते के बाद मैंने माँ को दवाई दी और फिर उन्हीं के बगल में बैठ गया, क्या मनोरम दृश्य था! एक साथ तीन पीढ़ी, माँ के बगल में उनका बेटा और बेटे की गोद में उसकी बेटी!
कुछ देर बाद रितिका आई और चेहरे पर मुस्कान लिए बोली; "नेहा को नहलाना है!" अब मुझे मजबूरन नेहा को रितिका की गोद में देना पड़ा पर मेरा दिल बेचैन हो गया था| नेहा से एक पल की भी जुदाई बर्दाश्त नहीं थी मुझे! माँ सो चुकी थी इसलिए मैं एक दम से उठा और ताऊ जी से कहा की मैं बजार जा रहा हूँ तू उन्होंने एक काम बता दिया| मैं पहले संकेत के घर पहुँचा और उससे चाभी माँगी और बजार पहुँचा| वहां मैंने माँ के लिए फल लिए और अपनी बेटी के लिए कुछ समान खरीदने लगा| गूगल से जो भी जानकारी ले पाया था वो सब खरीद लिया, दिआपेरस, बेबी पाउडर, बेबी आयल, बेबी वाइप्स, एक सॉफ्ट टॉवल, एक छोटा सा बाथ टब और बहुत ढूंढने के बाद हीलियम गैस वाले गुब्बारे! सब समान बाइक के पीछे बाँध कर मैं घर पहुँचा| समान मुझसे उठाया भी नहीं जा रहा था इसलिए माने भाभी को आवाज दी और वो ये सब देख कर हँस पड़ी| सारा समान ले कर हम अंदर आये, फल आदि तो भाभी ने रसोई में रख दिए और बाकी का समान ले कर मैं माँ वाले कमरे में आ गया| ये सारा समान देख सब हँस रहे थे की मैं क्यों इतना सामान ले आया| नेहा आंगन में चारपाई पर लेटी थी, मैंने सब समान छोड़ कर पहले गुब्बारे उसके नन्हे हाथों और पैरों से बाँध दिए| वो हवा में उड़
रहे थे और नेहा अपने हाथ-पैर हिला रही थी, ऐसा लगता था मानो ख़ुशी से हँसना छह रही हो! सारा घर ये देख कर खुश था और हँस रहा था| मैंने फ़ौरन एक वीडियो बनाई और अनु को भेज दी! उसने जवाब में; "Awwwwwwwwwwww" लिख कर भेजा, फिर अगले मैसेज में बोली; "मुझे भी आना है अभी!" उसका उतावलापन जायज था पर मैं मजबूर था क्योंकि घर वालों को अभी इतना बड़ा झटका नहीं देना चाहत था| माँ अकेली कमरे में थीं तो मैंने उन्हें उठा कर बिठाया और उन्हें भी कमरे के भीतर से ही ये नजारा दिखाया| उन्होंने तुरंत कहा; "जल्दी से बच्ची को टिका लगा, कहीं नजर ना लग जाए!" ताई जी ने फ़ौरन नेहा को टीका लगा दिया| पूरा घर नेहा की किलकारियों से भर चूका था और आज बरसों बाद जैसे खुशियाँ घर लौट आई हों! दोपहर खाने के बाद मैं नेहा को अपने सीने से सटाये था और माँ की बगल में लेटा था| कुछ देर बाद नेहा उठ गई क्योंकि उसने सुसु किया था| मैंने पहले बेबी वाइप्स से उसे साफ़ किया, पॉउडर लगाया और फिर उसे डायपर पहनाया| फिर रितिका का कमरे से दूसरे कपडे निकाल कर पहनाया, रितिका हाथ बाँधे मुझे ऐसा करते हुए बस देखती रही और मुस्कुराती रही, पर मेरा ध्यान सिर्फ नेहा पर था| जब नेहा को भूख लगी तो मजबूररन मुझे उसे रितिका के हवाले करना पड़ा, पर मेरा मन जानता है की उस टाइम मुझे कितना बुरा लग रहा था| तभी अनु का फ़ोन आया और उसने मुझे किसी से बात करने को कहा| मैं अपना फ़ोन ले कर आंगन में बैठ गया और पार्टी से बात कर रहा था, सारी बात अंग्रेजी में हो रही थी और मुझे ये नहीं पता था की घर के सारे लोग मुझे ही देख रहे हैं| जब मेरी बात खत्म हुई तब मैंने देखा की सब मुझे ही देख रहे हैं और गर्व महसूस कर रहे हैं|
रात को रितिका ने दूध पिला कर नेहा को मुझे दे दिया, मैंने नेहा को फिर से अपनी छाती से चिपकाया और लेट गया| अपने ऊपर मैंने एक चादर डाल ली ताकि नेहा को सर्दी ना लगे| नींद तो आने से रही और ऐसा ही हाल अनु का भी था| उसने मुझे एक miss call मारी और मैंने तुरंत कॉल बैक किया और उससे बात करने लगा| जब से हमारी शादी की तारिख तय हुई थी हम दोनों रात को एक दूसरे के पहलु में ही सोते थे और अब तो ऐसी हालत थी की उसे मेरे बिना और मुझे उसके बिना नींद ही नहीं आती थी| देर रात तक हम बस ऐसे ही खुसर-फुसर करते हुए बातें करते रहे| अनु तकिये को अपने से दबा कर सो गई और मैंने अपनी बेटी नेहा को खुद से चिपका लिया और उसके प्यारे एहसास ने मुझे सुला दिया| सुबह 6 बजे ताई जी ने मेरे सर पर हाथ फेरा तब मैं उठा और उनके पाँव छुए! फिर सब के साथ चाय पी और नहाने का समय हुआ तो रितिका फिर से नेहा को लेने आ गई पर मैंने उसकी तरफ देखे बिना ही "नहीं" कहा और राजसी में पानी गर्म करने रख दिया| नेहा अब तक उठ गई और अब उसे शायद मेरी आदत हो गई थी इसलिए उसकी किलकारियाँ शुरू हो गईं| पानी गर्म करके मैंने उसे नेहा के लिए लाये हुए टब
में डाला और फिर उसमें ठंडा पानी डाला और जब वो हल्का गुनगुना हो गया तब मैंने नेहा को उसमें बिठाया| पानी बिलकियल कोसा था इसलिए उसे ठंड नहीं लगी पर पानी का एहसास पाते ही उसने हिलना शुरू कर दिया| ताऊ जी, ताई जी, पिताजी, भाभी और रितिका सब देखने लगे की मैं कैसे नेहा को नहलाता हूँ| मैंने धीरे-धीरे पानी से उसे नहलाया और साबुन लगा कर अच्छे से साफ़ किया| फिर उसे तौलिये से धीर-धीरे साफ किया, अच्छे से तेल की मालिश की और फिर उसे कपड़े पहनाये| मैंने ये भी नहीं ध्यान दिया की सब घरवाले मुझे ही देख रहे हैं और मुस्कुरा रहे हैं| अच्छे से तेल-पाउडर लगा कर नेहा एक सुन्दर गुड़िया की तरह तैयार थी! मैंने खुद उसके कान के पीछे टीका लगाया और उसके माथे को चूमा फिर उसे अपने सीने से लगा कर मैं पलटा तो देखा सब मुझे देख रहे हैं; "चाचा जी, मानु की बीवी बड़ी किस्मत वाली होगी! उसे कुछ नहीं करना पड़ेगा, सब काम तो मानु कर ही लेता है|" भाभी बोलीं और सब हँस पड़े, जो नहीं हँसा था वो थी रितिका क्योंकि उसे अब एहसास हुआ था की उसने किसे खो दिया! उस दिन से नेहा मुझसे एक पल को भी जुड़ा नहीं होती थी, दिन में बस उसे मुझसे दूर तब ही जाना पड़ता जब उसे भूख लगती और पेट भरने के बाद वो सीधा मेरे पास आती| हफ्ता बीत गया और मेरा नेहा के लिए प्यार दिनों-दिन बढ़ता जा रहा था| हम दोनों बाप-बेटी एक दूसरे के बिना नहीं रह पाते!
सोमवार को ताऊ जी ने कहा की आज चन्दर भैया को लाने जाना है तो मैं और वो साथ निकले| जब चन्दर से मिले तो वो काफी कमजोर होगया था और मुझे देखते ही वो मेरे गले लग गया| आज बरसों बाद मुझे उसके दिल में भाई वाला प्यार नजर आया, मैं बाहर आया और टैक्सी की और हम तीनों साथ घर लौटे| ताऊ जी आगे थे और मैं चन्दर के साथ उसका समान ले कर चल रहा था| जैसे ही मैं अंदर घुसा मैंने देखा की रितिका नेहा को डाँट रही है और उसे मारने के लिए उसने हाथ उठाया है, ये देखते ही मेरे जिस्म में आग लग गई और मैं जोर से चिल्लाया; "रितिका! तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरी बेटी को मारने की!" मैंने उसे धक्का दिया और नेहा को अपने सीने से लगा लिया और उसके सर को चूमने लगा और इधर से उधर तेजी से चलने लगा ताकि वो रोना बंद कर दे| "ताई जी आप भी कुछ नहीं बोल रहे इसे?" मैंने ताई जी से शिकायत की!
"बेटा ये दूध पीने के बाद भी नहीं चुप हो रही थी, इसलिए रितिका को गुस्सा आ गया!" ताई जी बोलीं|
"इतनी छोटी बच्ची को कोई मारता है?" मैंने गुस्से से रितिका को झाड़ते हुए कहा, रितिका डरी सहमी सी अपने कमरे में चली गई और मैं नेहा की पीठ सहलाता हुआ आंगन में एक कोने से दूसरे कोने घूमता रहा| पर उसका रोना बंद नहीं हो रहा था, मुझे पता नहीं क्या सूझी मैंने गुनगुनाना शुरू कर दिया;
"कौन मेरा, मेरा क्या तु लागे
क्यूँ तु बांधे, मन के मन से धागे
बस चले ना क्यूँ मेरा तेरे आगे
कौन मेरा, मेरा
क्या तु लागे
क्यूँ तु बांधे, मन के मन से धागे
ढूंढ ही लोगे मुझे तुम हर जगह
अब तो मुझको खबर है
हो गया हूँ तेरा
जब से मैं हवा में हूँ तेरा असर है
तेरे पास हूँ एहसास में, मैं याद में तेरी
तेरा ठिकाना बन गया अब सांस में मेरी
कौन मेरा, मेरा क्या तु लागे
क्यूँ तु बांधे, मन के मन से धागे
बस चले ना क्यूँ मेरा तेरे आगे
कौन मेरा, मेरा क्या तु लागे
क्यूँ तु बांधे, मन के मन से धागे|"
इस गाने के एक-एक बोल को मैं महसूस कर पा रहा था, ऐसा लगा जैसे मैं अपने मन की बात को उस छोटी सी बच्ची से पूछ रहा हूँ! कुछ देर बाद नेहा मुझसे लिपट कर सो गई| एक बार फिर सब मुझे ही देख रहे थे; "बेटा तेरे जैसा प्यार करने वाला नहीं देखा!" ताऊ जी बोले|
"इतना प्यार तो मैंने तुझे नहीं किया!" पिताजी बोले|
"चाचा जी, सच में मानु नेहा से सबसे ज्यादा प्यार करता है|" भाभी बोली|
"भाभी सिर्फ प्यार नहीं बल्कि जान बस्ती है मेरी इसमें और आप में से कोई इसे कुछ नहीं कहेगा|" माने सब को प्यारसे चेतावनी दी| ये मेरी पैतृक वृत्ति (Paternal Instincts) थी जो अब सबके सामने आ रही थी| खेर चन्दर भैया का बड़ा स्वागत हुआ क्योंकि वो सच में एक जंग जीत कर आये थे| जब नेहा को भूख लगी तो मैंने भाभी से कहा की वो नेहा को रितिका के पास ले जाएँ; "तुम ही ले जाओ! जाके अपनी लाड़ली को भी मना लो तब से रोये जा रहे है!" उनका मतलब रितिका से था; "मेरी सिर्फ एक लाड़ली है और वो है मेरी बेटी नेहा!" इतना कहता हुआ मैं ऊपर आ आया और देखा रितिका फ्रेश पर उकड़ूँ हो कर बैठी है, उसका चेहरा उसके घटनों के बीच था और मुझे उसकी सिसकने की आवाज आ रही थी| मैंने उसके कमरे के दरवाजे पर खटखटाया तो उसने मेरी तरफ देखा, उसकी आँखें लाल थीं और वो जैसे मुझे कस कर गले लगाना चाहती थी| पर मेरा व्यवहार अभी भी उसके लिए नरम नहीं हुआ था, अब भी वही सख्ती थी जो मुझे उससे दूर खड़ा किये हुए थी| रितिका ने अपने आँसू पोछे और नेहा को प्यार से अपनी गोद में लिया और मैं छत पर चल दिया| बड़ी बेसब्री से मैं एक कोने से दूसरे कोने के चक्कर लगा रहा था और इंतजार कर रहा था की कब नेहा मेरे पास वापस आये| कुछ देर बाद रितिका नेहा को ले कर आई और मुस्कुराते हुए मुझे गोद में वापस दिया, वो पलट के जाने को हुई पर फिर कुछ सोचते हुए रुक गई| "आपने मुझे माफ़ कर दिया ना?" रितिका ने मेरी तरफ घूमते हुए पुछा| पर मैंने उसकी किसी बात का जवाब नहीं दिया और नीचे जाने लगा| रितिका ने एकदम से मेरी बाजू पकड़ी, "प्लीज जवाब तो दे दो?" उसने मिन्नत करते हुए कहा|
"किस बात की माफ़ी चाहिए तुझे? मेरा दिल तोड़ने की? या फिर नेहा पर हाथ उठाने की?" मैंने गुस्से से उसकी तरफ देखते हुए कहा|
"दोनों की!" रितिका ने सर झुकाते हुए कहा|
"नहीं!" इतना कह कर मैं नीचे आ गया|
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update 71
अगले दिन की बात है, सुबह मैं अपनी बेटी के साथ माँ के पास बैठा था की ताऊ जी आये और मुझे
एक काम सौंपा| "ताऊ जी मैं थोड़ी देर बाद चला जाऊँ? अभी नेहा सोइ नहीं है, मैं नहीं हूँगा तो ये फिर से रोने लगेगी! इसे सुला कर चला जाता हूँ!" मैंने कहा तो ताऊ जी मुस्कुरा दिए और ठीक है कहा| कुछ देर बाद नेहा सो गई तो मैंने सोचा की मैं उसे रितिका को दे दूँ पर वो मुझे घर में कहीं नहीं मिली| मैंने नेहा को माँ की बगल में लिटाया और उन्हें बता कर ताऊ जी का कहा काम करने चल दिया| हमारे गाँव में एक कुँआ है जिसका लोग अब इस्तेमाल नहीं करते और ना ही वहाँ कोई आता-जाता है क्योंकि सब ने हैंडपंप लगवा लिया है| मैं उसी के पास से गुजर रहा था की मेरी नजर वहाँ एक लड़की पर पड़ी जो बड़ी तेजी से उसकी तरफ जा रही थी| साडी का रंग देख मुझे समझते देर ना लगी की ये रितिका ही है, मैं तुरंत उसके पीछे भागा| वो अंदर कूदने के लिए अपना एक पाँव बढ़ा चुकी थी की मैंने उसका हाथ पीछे से पकड़ा और जोर से पीछे जमीन पर गिरा दिया| "मरने का इतना शौक है तो किसी ऐसे कुँए में कूद जिसमें पानी हो! इसमें मुश्किल से 4 फुट पानी होगा और उसमें तू डूब के नहीं मारेगी! जान देने के लिए कलेजा चाहिए होता है, एक चाक़ू ले और अपनी कलाई पर vertically ऊपर की तरफ काट और गहरा काट! है हिम्मत?" मैंने रितिका पर चिल्लाते हुए कहा| "तुझे क्या लगता है तेरे जान देने से तेरे पाप कम हो जाएंगे?" मैंने उसे डाँटते हुए कहा|
"कम नहीं होंगे पर मुझसे आपकी ये बेरुखी नहीं देखि जाती!" रितिका ने रोते हुए कहा|
"मेरी ये बेरुखी कभी खत्म नहीं होगी! कम से कम मेरे जीते जी तो नहीं! और तुझे क्या पड़ी है मेरी बेरुखी की? अभी तेरा परिवार होता तो तुझे घंटा कोई फर्क नहीं पड़ता! ना ही कोई मुझे यहाँ बुलाता, तुझे क्या लगता है की मैं नहीं जानता की मुझे यहाँ क्यों बुलाया गया है? आखिर अचानक से कैसे सब के मन में मेरे लिए प्यार जाग गया| जहाँ कुछ महीनों पहले तक सब मेरे बिना त्यौहार मना रहे थे और मैं वहाँ सब को याद कर के मरा जा रहा था| जब दूसरों को उनके परिवार से मिलते देखता था तो टीस उठती थी मन में! बुरा लगता था की परिवार होते हुए भी मैं एक अनाथ की जिंदगी जी रहा था, मेरा मन मेरे परिवार से दूर नहीं रहना चाहता| अपना परिवार ...
उसके प्यार के लिए स्वार्थी बन गया हूँ!" इतना कह कर मैं वहाँ से चल दिया| शाम को जब मैं वापस पहुँचा तो रितिका आंगन में सर झुकाये बैठी सब्जी काट रही थी| मैं माँ के पास पहुँचा और नेहा को अपनी छाती से लगा लिया और उसके माथे पर चुम्मियों की झड़ी लगा दी| "बड़ी मुस्किल से चुप हुई है!" माँ ने कहा| मैंने नेहा को गोदी में ऊपर उठाया, उसका मुँह मेरी तरफ था, मैं तुतलाती हुई जुबान में उससे बोला; "मेला बेटा दादी को तंग करता है! उनकी बात नहीं सुनता?" ये सुन कर नेहा की किलकारी गूंजने लगी|
मैंने उसे फिर से अपने सीने से लगाया और माँ के पास बैठ गया| माँ की तबियत में अब सुधार था पर अभी तक वो कमरे से बाहर नहीं आईं थी| कमजोरी अब भी थी, पर चूँकि मैं उनके पास रहता था और उन्हें समय पर दवाई देता था अपने हाथ से खाना खिलाता था इसलिए उनकी तबियत में अब सुधार था| रितिका जब घर आई तो मुझसे नजरें चुराती फिर रही थी, उसे डर था की कहीं मैं सबका ना बोल दूँ की वो खुदखुशी करने गई थी! खेर रात हुई और खाना खाने के बाद मैं और नेहा ऊपर मेरे कमरे में थे| नेहा को नींद नहीं आ रही थी, तो मैंने उसे अपनी जाँघों के सहारे बिठाया और उससे बात करने लगा| मुझे उस छोटी सी बच्ची से बात करना बहुत अच्छा लगता था? भले ही वो मेरी बात नहीं समझती थी पर जब वो किलकारियाँ मैं सुनता था तो दिल को एक अजीब सुकून मिलता था| रितिका का कमरा मेरे बगल में ही था तो वो चुप-चाप मेरी बातें सुना करती| जब काफी देर बात करने के बाद भी नेहा नहीं सोइ तो मैंने सोचा की उसे लोरी सूना दूँ|
"चंदनिया छुप जाना रे
छन भर को लुक जाना रे
निंदिया आँखों में आए
बिटिया मेरी मेरी सो जाए
हुम्म…निंदिया आँखों में आए
बिटिया मेरी मेरी सो जाए
लेके गोद में सुलाऊँ
गाउँ रात भर सुनाऊँ
लोरी लोरी लोरी लोरी लोरी....
"
लोरी सुनते-सुनते ही मेरी बेटी नींद की आगोश में चली गई! मैंने खुद को कंबल से लपेट लिया ताकि मेरी बेटी ठंड से ना उठ जाए! सुबह हुई और धुप अच्छी थी, मैं नेहा को ले कर छत पर आ गया और पीठ टिका कर नीचे बैठ गया| नेहा अंगड़ाई लेते हुए उठी और मुझे अपने सामने देख कर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई| मैंने उसके माथे को चूम कर Good Morning कहा! तभी रितिका ऊपर आ गई, उसके हाथ में कपड़ों से भरी एक बाल्टी थी| रितिका कपड़े सुखाने के लिए डाल रही थी और मैं नेहा के साथ खेलने में व्यस्त था| "सॉरी कल जो भी मैं करने जा रही थी! पागल हो गई थी, दिमाग काम नहीं कर रहा था!" रितिका बोली पर मैंने उसका कोई जवाब नहीं दिया और नेहा को गोद में ले कर नीचे जाने लगा| तभी रितिका ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे रोक दिया! "इन कुछ दिनों में मैं सपने सजाने लगी थी, वो सपने जिसमें सिर्फ हम दोनों और नेहा थे! क्या हम दोनों फिर से एक नहीं हो सकते? प्यार तो आप अब भी मुझसे करते हो, तो क्या हम इस बार घर से नहीं भाग सकते?" आँखों में आँसू लिए रितिका बोली|
"प्यार और तुझसे? 'बेवकूफ' समझा है मुझे? एक बार 'गलती' कर चूका हूँ तुझ पर भरोसा करने की, दुबारा नहीं करने वाला! तब तुझे ऐशों-आराम की जिंदगी चाहिए थी, अब मुझे चैन की जिंदगी चाहिए!" इतना कह कर मैंने रितिका का हाथ जतक दिया और नीचे आने लगा|
"तो आप ही बोलो की आपकी माफ़ी पाने के लिए, भरोसा वापस पाने के लिए क्या करूँ?" रितिका ने चीखते हुए कहा| उसकी आवाज नीचे तक गई और आंगन में बैठी ताईजी और भाभी ने साफ़ सुन लिया| मैं भी चिल्लाते हुए बोला; "Just leave me alone!" मेरे चिल्लाने से नेहा रोने लगी तो मैं उसे प्यार से पुचकारने लगा और बिना किसी को कुछ बोले घर से निकल गया| कुछ दूर तक पहुँचते-पहुँचते नेहा चुप हो गई; "सॉरी बेटा मैं इतनी जोर से चिल्लाया, पर आपकी मम्मी जबरदस्ती मेरे नजदीक आना चाहती है और मैं उसे जरा भी पसंद नहीं करता|" नेहा बड़ी मासूमियत से मेरी तरफ देखने लगी जैसे पूछ रही हो की क्या मैं उससे भी नफरत करता हूँ; "आप तो मेरी प्याली-प्याली राजकुमारी हो, आप में तो मेरी जान बस्ती है! मैं आपसे बहुत-बहुत प्याल करता हूँ!" ये सुन कर नेहा का चेहरा फिर से मुस्कुराने लगा| कुछ देर बाद मैं घर आया और माँ को दवाई दी और उनके पास बैठ गया| "बेटा माफ़ कर दे उसे! उसने बहुत कुछ भोगा है!" ताई जी पीछे से आईं और बोलीं| मैंने बस ना में गर्दन हिलाई और नेहा को लेके एक बार फिर से घर से बाहर आ गया| नेहा को गोद में लिए मैं ऐसे ही टहल रहा था की पिताजी का फ़ोन आया और उन्होंने मुझे जल्दी से घर बुलाया| मैं घर पहुंचा तो देखा बाहर एक पुलिस की जीप खड़ी है| अंदर पहुँच कर देखा तो थानेदार और काला कोट पहने वकील एक चारपाई पर बैठे थे और बाकी सब उनके सामने दूसरी चारपाई पर बैठे थे| पिताजी ने मुझे अपने पास बैठने को कहा, थानेदार कुछ बोल रहा था पर
मुझे देखते ही चुप हो गया| "थानेदार साहब ये मेरा बेटा है, कुछ दिन पहले ही आया है|" पिताजी बोले और थानेदार ने अपनी बात आगे बढ़ाई; "काफी मशक्कत के बाद हमें वो लोग हाथ लगे जिन्होंने मंत्री साहब के घर पर हमला किया था! हमारी अच्छी खासी खातिरदारी के बाद उन्होंने सब कबूल कर लिया है| इस सब का मास्टरमाइंड राघव नाम का आदमी है जिससे मंत्री साहब की पुरानी दुश्मनी थी! उसी ने वो आदमी भेजे थे मंत्री साहब के पूरे परिवार को मरने के लिए! फिलहाल उसकी तलाश जारी है, हमे लगता है कि या तो वो सरहद पार कर नेपाल निकल गया है या फिर कहीं अंडरग्राउंड हो गया है| जैसे ही कुछ पता चलेगा हम आपको खबर कर देंगे|"
"पर साहब हमारे परिवार को तो कोई खतरा नहीं है?" ताऊ जी ने पुछा|
"नहीं कोई घबराने की बात नहीं है! राघव की दुश्मनी सिर्फ मंत्री जी से थी, हमें नहीं लगता की वो आप पर या रितिका पर कोई जानलेवा हमला करेगा|!" थानेदार ने आश्वसन दिया| अब बारी थी वकील साहब के बोलने की, पर उनके कुछ कहने से पहले ही मेरा फ़ोन बज उठा| कॉल अनु का था और मैं उस वक़्त बात नहीं कर सकता था इसलिए मैंने; "थोड़ी देर में बात करता हूँ" कह कर काट दिया|
"देखिये अब जो मैं कहने जा रहा हूँ वो आप सभी के फायदे की है! मंत्री जी तो अब रहे नहीं, नाही उनके खानदान का अब कोई बचा, ले दे कर एक रितिका उनकी बहु और उसकी बेटी बची है| ऐसे में उनकी सारी जायदाद पर रितिका का हक़ बनता है, मुझे आपकी आज्ञा की जर्रूरत है और मैं कोर्ट में claim का केस बना देता हूँ....
" आगे वकील साहब कुछ भी कहते उसके पहले ही ताऊ जी बोल पड़े; "नहीं वकील साहब हमें कुछ नहीं चाहिए! मुझे और मेरे परिवार को इन कानूनी पचड़ों से दूर रखो|"
"भाई साहब आप दिल से नहीं दिमाग से सोचिये, कल को रितिका की बेटी बड़ी होगी उसकी पढ़ाई-लिखाई, शादी-दहेज़ का खर्चा और आप लोग जो अभी इस चार कमरों के घर में रह रहे हो उसकी जगह आलिशान महल में रहोगे! आप claim नहीं करोगे तो इसे पार्टी वाले खा जाएन्गे? फिर आपको क्या मिलेगा? कम से कम ये तो सोचिये की रितिका का सुहाग उजड़ा है!" वकील साहब ने अपनी तरफ से सारे तर्क एक थाली में परोस कर हमारे आगे रख दिए पर ताऊ जी का निर्णय अडिग था; "वकील साहब मेरा जवाब अब भी ना है, नेहा की परवरिश मैं और मेरा परिवार अच्छे से कर सकता है| उसके लिए हमें किसी की सहायता नहीं चाहिए! इसी दौलत के चलते ये हत्याकांड हुआ है और अब हम इसमें दुबारा पड़ कर फिर से कोई खतरा नहीं उठाना चाहते!" ताऊ जी ने हाथ जोड़ दिए और वकील साहब आगे कुछ न बोल पाए| ताऊ जी कहना सही था क्योंकि ये दौलत मंत्री ने खून से कमाई थी और अब इसे अपना लेना ऐसा था की गरीबों की हाय लेना! वकील साहब और थानेदार के जाने के बाद सब आंगन में बैठ गए|
भाभी ने सब के लिए चाय बनाई और सब कौरा तापने लगे| (कौरा = bonfire) रितिका सब को चाय देने लगी और ताऊ जी ने उसे वहीं बैठने को कहा| "देख बेटी तुझे चिंता करने की कोई जर्रूरत नहीं है| हम सब हैं यहाँ तेरे लिए!" ताऊ जी ने रितिका के सर पर हाथ फेरते हुए कहा| इतने में उसका रोना छूट गया और चन्दर भैया ने उसे अपने पास बिठाया और उसके आँसू पोछे| सब उसे दिलासा देने लगे और मैं नेहा को अपनी छाती से चिपकाए खामोश बैठा रहा| ताऊ जी ने जब मुझे खामोश देखा तो वो बोले; "बेटा माफ़ कर दे इसे! तू तो इसका बचपन से इसका ख्याल रखता आया है, तूने इसकी ख़ुशी के लिए हर वो चीज की जो तू कर सकता था और अब देख इसकी आँखें हमेशा नम रहती हैं! इतनी जिद्द ठीक नहीं!"
"माफ़ करना ताऊ जी, पर मैं इसे माफ़ नहीं कर सकता! इसने मुझे पुछा-नहीं, बताया नहीं और उस लड़के से प्यार करने लगी! मैं शहर में ही रहता था ना, क्या इसने मुझे बताया की ये किसी से प्यार कर रही है? आप ही कह रहे हो की मैं इसका सबसे बड़ा हिमायती था तो इसे तब मेरी याद नहीं आई? चुप-चाप इसने सब कुछ तय कर लिया! ये सब जानती थी, उस मंत्री के बारे में अपनी माँ के बारे में और फिर भी इसने वो कदम उठाया| इसे नहीं पता की उस मंत्री के घर में इसे खून में डूबी रोटियाँ खानी पड़ेंगी? पर नहीं तब तो मैडम जी को इश्क़ का भूत सवार था! जब आप सब मुझे घर से निकाल रहे थे तब ये कहाँ थी? तब बोली ये कुछ आपसे? इसने एक बार भी कहा की 'मानु चाचा' को मत निकालो? मैं आप सब के सामने झूठा बना ताकि इसे पढ़ने को मिले और इसे इश्क़ लड़ाना था तो लड़ाओ भाई!" मैंने आग बबूला होते हुए कहा|
"बेटा जो हुआ उसे छोड़ दे....
" पिताजी बोले पर उनकी बात पूरी हो पाती उससे पहले ही मेरा गुस्सा फिर फूटा;
"छोड़ दूँ? आप सब मुझे एक बात बताओ अगर ये हादसा नहीं हुआ होता, ये अपनी जिंदगी सुख से गुजार रही होती तो क्या मैं आज यहाँ बैठा होता? क्या जर्रूरत रहती इस घर को मेरी! मुझे माफ़ करना ताऊजी, पिताजी, ताई जी और माँ (जो अंदर बैठीं सब देख और सुन रहीं थीं!) पर आप सब तो मुझे घर निकला दे कर 'इसकी' खुशियों में लग गए, आप सब ने त्यौहार भी बड़े अच्छे से मनाये पर आप में से किसी ने भी मेरे बारे में सोचा? मानता हूँ की मैं इसे idiot की शादी मैं काम करने की बजाए अपनी जॉब और विदेश जाने के बारे में सोचा जो गलत था पर क्या इसकी इतनी बड़ी सजा होती है? आप सब को इसका गम दिखता है मेरा नहीं? पूरा एक साल मैंने आप सब को याद कर के कैसे गुजारा ये मैं जानता हूँ! दिवाली पर मैं रो रहा था की मेरा परिवार मुझसे दूर है! नए साल में मैं अपने माँ-बाप के पाँव छूना चाहता था, उनका आशीर्वाद लेना चाहता था पर मेरे परिवार ने तो जिन्दा होते हुए भी मुझे अनाथ बना दिया था! ऐसी भी क्या बेरुखी थी की आप सब ने मुझे इस कदर काट के खुद से अलग कर दिया जैसे मेरी आपको कोई जर्रूरत ही नहीं थी! आपको क्या लगा की संकेत आपके पास क्यों आया था? क्यों वो शादी ब्याह का काम देख रहा था? उसे पड़ी ही क्या थी पर उसने सिर्फ मेरे कहने पर ये सब किया! मैं तो ना रहते हुए भी आपको सहारा दे गया और मुझे क्या मिला? ताऊ जी के मुँह से बीएस चार शब्द सुन कर लौट आया क्यों? क्योंकि मुझे मेरा परिवार प्यारा है!" मैंने कहा तो सब के सर झुक गए| अब मैं क्या कहता इसलिए उठ कर ऊपर अपने कमरे में जाने लगा तो माँ ने अंदर से मुझे इशारे से अपने पास बुलाया, मैं नेहा को ले कर उनके पास आया तो उन्होंने मुझे अपने गले लगा लिया और रोने लगीं; "मुझे माफ़ कर दे बेटा! मैं तेरी गुनहगार हूँ...
सब की तरह मैं भी स्वार्थी हो गई और अपने ही खून से मुँह मोड़ लिया| मैं तेरे पाँव पड़ती हूँ!" माँ ने मेरे पाँव छूने चाहे तो मैंने उन्हें रोक दिया; "क्यों मुझे पाप का भागी बना रहे हो माँ! जो कुछ भी हुआ मैं उसे भूलना चाहता हूँ पर मुझे जब जबरदति रितिका से बात करने को कहा जाता है तो ये सब बाहर आ जाता है! इस घर में मेरे अलावा और 6 लोग हैं जो 'अब' उसे प्यार करते हैं तो फिर मेरे प्यार की उसे क्या जर्रूरत है?" मैंने कहा तो पीछे से ताई जी आ गईं और बोलीं; "ठीक है बेटा! आज के बाद तुझे उससे बात नहीं करनी ना कर पर हम सब को माफ़ कर दे! हम सब ने बहुत बड़ी गलती की, बल्कि पाप किया है!" ताई जी ने हाथ जोड़ते हुए कहा| माँ और मेरी बात सब बाहर सुन रहे थे और मैं अब किसी को शर्मिंदा नहीं करना चाहता था इसलिए मैंने ताई जी के गले लग कर उन्हें माफ़ कर दिया| एक-एक कर सारे मेरे गले लगे और दुबारा माफ़ी मांगी, अब मैं क्या करता वो मेरा परिवार था और दिल से माफ़ी मांग रहा था| बदला तो ले नहीं सकता था इसलिए उन्हें माफ़ कर दिया! रात में अनु से बात हुई और उसे सब कुछ बताया तो वो मेरे दिल का हाल समझ गई और कोशिश करती रही के मैं उन बातों को दिल से लगा कर फिर गलत रास्ते पर ना भटक जाऊँ|
अगली सुबह फिर रितिका ने काण्ड किया! नेहा को दूध पिला कर उसने मुझे दिया और बोली; "अब से ये आपकी जिम्मेदारी है!" उसकी ये बात ताई जी, भाभी, माँ, चन्दर भैया और पिताजी ने सुन ली| ताऊ जी उस टाइम घर पर नहीं थे, इतना कह कर रितिका दौड़ती हुई बाहर चली गई| "मानु रोक उसे कहीं कुछ गलत ना कर ले!" पिताजी चिल्लाये मैंने नेहा को माँ के पास लिटाया और मैं उसके पीछे दौड़ा| पिताजी और सब लोग जल्दी से बाहर आये, मैंने करीब 100 मीटर की दूरी पर जा कर उसका हाथ पकड़ लिया और उसे खींच कर नीचे पटक दिया| मैंने रितिका को कंधे पर उठाया और वो रोते हुए छटपटाने लगी| मैं बस अपने आपको उसे मारने से रोकता रहा वर्ण मन तो किया अभी उसे एक झापड़ रसीद करूँ! सब ने मुझे उसे कंधे पर लाते हुए देखा तो सब अंदर चल दिए| एक-दो जन मुझे रितिका को ऐसे ले जाते हुए देखने लगे तो घर की इज्जत बचने के लिए मैंने हँसता हुआ चेहरा बना लिया ताकि उन्हें लगे की यहाँ मजाक चल रहा है| शुक्र है किसी ने कुछ कहा नहीं और वो अपने-अपने रस्ते चले गए| अंदर आंगन में आते ही मैंने उसे जमीन पर पटक दिया और उस पर जोर से चिल्लाया; "खत्म नहीं हुआ तेरा ड्रामा?" फिर मैं इधर-उधर डंडा ढूँढने लगा, रसोई में मुझे एक पतली सी लकड़ी मिली तो मैं उससे रितिका की छिताई करने को उठा लाया| मेरे हाथ में डंडा देख कर पिताजी बीच में आ गए और मेरा हाथ पकड़ लिया; "छोड़ दो पिताजी, आज तो मैं इसके सर से ये खुदखुशी का भूत उतार देता हूँ! आपको बताया नहीं पर कुछ दिन पहले ये कुँए में कूदने गई थी, वो तो मैं सही समय पर पहुँच गया और इसे रोक लिया और आज फिर इसने वही
ड्रामा किया|" मैं गरजते हुए बोला| "पागल मत बन! वो दुखी है...." पिताजी बोले पर उनकी बात पूरी होने से पहले ही मैं चिल्लाया; "कुछ दुखी-वुखी नहीं है ये! इतना ही दुखी होती और सच में मरना चाहती तो उस दिन उस सूखे कुँए में कूदने ना जाती और आज भी मुझे बता कर, ढिंढोरा पीट कर जाने की क्या जर्रूरत पड़ी इसे?" माने रसोई से चाक़ू उठाया और रितिका को दिखाते हुए बताया की कैसे करते हैं खुदखुशी| "उस दिन बोला था न, ऐसे चाक़ू ले, यहाँ कलाई में घुसा और चीरते हुए ऊपर की तरफ ले जा!" मैं उस टाइम बहुत गुस्से में था और नहीं जानता था की क्या बोल रहा हूँ, तभी पिताजी ने मुझे एक थप्पड़ मारा और मेरा होश ठिकाने लगाया| रितिका जमीन पर पड़ी रोटी जा रही थी और मुझसे ये बर्दाश्त नहीं हो रहा था सो मैं नेहा को ले कर बाहर चला गया| दोपहर को खाने के समय आया, तब तक ताऊ जी भी आ चुके थे और सब आंगन में ही बैठे थे| मैंने नेहा को माँ के पास लिटाया और पिताजी से हथजोड़ कर अपने व्यवहार के लिए माफी मांगी| ताऊ जी ने मुझे अपने पास बिठाया और प्यार से समझाया की मैं अपने गुस्से पर काबू रखूँ पर जब मैंने उन्हें सारी बात बताई तो सब को समझ आ गया की ये सब रितिका का ड्रामा है! वरना अगर उसे मरना ही होता तो 36 तरीके हैं जान देने के, वो बस सब का ध्यान अपनी तरफ खींचना चाहती थी| सबसे जर्रूरी बात जो केवल मैं जानता था वो ये की रितिका मुझ पर मानसिक दबाव बना रहे थी ताकि मैं उसके बहकावे में आ जाऊँ और फिर से उससे प्यार करने लग जाऊँ| पर अब सबकुछ साफ़ हो चूका था और वो ये नहीं जानती थी की ताऊ जी के मन में क्या चल रहा है! वो पूरा दिन सभी उदास थे और चिंतित थे क्योंकि किसी के पास इसका कोई इलाज नहीं था पर ताऊ जी कुछ और सोच रहे थे| दोपहर को सब ने चुप-चाप खाना खाया और मैं माँ के पास बैठा हुआ था और उनके पाँव दबा रहा था| नेहा सो रही थी और पूरे घर में एक दम सनाटा पसरा हुआ था| मेरा फ़ोन साइलेंट था और उसमें एक के बाद एक अनु के फ़ोन आने लगे थे| फ़ोन कब switched off हुआ ये तक नहीं पता चला मुझे! रात में ताऊ जी ने भाभी को रितिका के पास सोने को कहा ताकि वो फिर से कुछ ना करे!
अगली सुबह चाय पीने के बाद सब आंगन में बैठे थे, मैंने भी सोचा की मुझे आये हुए डेढ़ महीना हो गया है और माँ अब तक उसी कमरे में हैं| मैंने आज उन्हें बाहर सब के साथ बैठने की सोची| पिछले कुछ दिनों से मैं माँ की रोज मालिश कर रहा था जिसका असर दिखा और माँ मेरा सहारा लेते हुए बाहर आंगन में आईं| माँ ने सबसे पहले सूरज भगवान को नमस्कार किया और फिर चारपाई पर बैठ गईं| नाश्ता होने के बाद ताऊ जी ने सब को आंगन में धुप में बैठने को कहा और बात शुरू की; "मैं तुम सबसे एक बात करना चाहता हूँ! भगवान् ने रितिका के साथ बड़ा अन्याय किया है, इतनी सी उम्र में उसके सर से उसका सुहाग छीन लिया! वो कैसे इतनी बड़ी उम्र अकेली काटेगी! इसलिए
मैं सोच रहा हूँ की उसकी शादी कर दी जाए!" ताऊ जी की बात सुन कर सब हैरान हुए, पहला तो उनकी बात सुन कर और दूसरा की ताऊ जी आज सबसे उनकी राय लेना चाह रहे थे जबकि आज तक वो सिर्फ फैसला करते आये हैं!
update 72
"भैया आप जो कह रहे हैं वो सही है, अभी उम्र ही क्या है बच्ची की!" पिताजी बोले और घर में मौजूद सब ने ये बात मान ली| मैं अपनी इसमें कोई प्रतिक्रिया नहीं दी क्योंकि मैं तो नेहा के साथ खेलने में व्यस्त था| मेरा मन में बीएस यही था की मैं नेहा को खुद से दूर नहीं जाने दूँगा फिर चाहे मुझे जो करना पड़े| "मानु तू भी बता बेटा?" ताऊ जी ने मुझसे पुछा| "ताऊ जी आप का फैसला सही है! एक नै जिंदगी की शुरुआत करना ही सही होता है|" मैंने कहा| पर मेरा ये जवाब रितिका को जरा भी नहीं भाया, वो तेजी से मेरी तरफ आई और नेहा को मेरे हाथ से लेने लगी| नेहा ने मेरी ऊँगली पकड़ी हुई थी और वो मेरी गोद में खेल रही थी| "क्या कर रही है?" मैंने थोड़ा गुस्सा होते हुए कहा| "ये मेरी बेटी है!" रितिका ने गुस्से से कहा और उसका ये गुस्सा देख मैं अपने गुस्से पर काबू नहीं कर पाया| "जन्म देने से कोई माँ नहीं बन जाती| तेरी शादी हो रही है ना? जा के अपनी नै जिंदगी की शुरुरात कर| क्यों नेहा को उसका हिस्सा बना रही है?" मैंने नेहा को उससे दूर करते हुए कहा| "अच्छा? नेहा मेरी बेटी है, मैं चाहे जो करूँ उसके साथ तुम होते कौन हो कुछ बोलने वाले?" रितिका बोली और उसकी बात सुन कर मुझे बहुत गुस्सा आया| मैंने एक जोरदार तमाचा उसके गाल पर मारा दूसरा तमाचा भी उसके गाल पर पड़ता इसके पहले ही चन्दर भैया ने मेरा हाथ पकड़ लिया और सिका फायदा उठा कर रितिका नेहा को मुझसे छीन कर ऊपर ले गई| अभी वो ऊपर की कुछ ही सीढ़ियां चढ़ी होगी की नेहा का रोना शुरू हो गया और उसका रोना सुन कर मेरा खून खोल गया| मैंने रितिका को रोकना चाहा पर सबने मुझे जकड़ लिया, मैं खुद को सबकी पकड़ से छुड़ाने लगा और छूट कर ऊपर भागना चाहता था ताकि आज रितिका की गत बिगाड़ दूँ! "छोड़ दो मुझे पिताजी! आज तो मैं इसे नहीं छोड़ूँगा!" पर किसी ने मुझे नहीं छोड़ा, सब के सब बस यही कह रहे थे की शांत हो जा मानु! पर मेरे जिस्म में तो आग लगी थी ऐसी आग जो आज रितिका को जला देना चाहती थी| जब मैं किसी के काबू में नहीं आया तो ताई जी ने नीचे से चिल्लाकर रितिका को आवाज मारी और उसे नीचे बुलाया| "मानु देख शांत हो जा...हम बात करते हैं!" ताई जी ने कहा पर मैं तो गुस्से से पागल हो चूका था और किसी की नहीं सुन रहा था| आखिर में माँ ही धीरे-धीरे उठीं और मेरे आगे हाथ जोड़ते हुए बोली; "बेटा....मान जा....शांत हो...जा...!" माँ ये कहते-कहते थोड़ा लडख़ड़ाईं तो मैंने एक जतके से खुद को छुड़ाया और उन्हें गिरने से थाम लिया| उन्हें सहारा दे कर बिठाया और गुस्से में उठा पर माँ ने मेरा हाथ पकड़ लिया; "तुझे मेरी कसम बेटा...
बैठ यहाँ पे!" इतने में रितिका नीचे आ गई और मेरी तरफ देखने लगी| मेरी आँखों में गुस्से की ज्वाला उसे साफ़ नजर आ रही थी जिसे देख कर उसके मन में एक अजीब सी ख़ुशी मह्सूस हुई| वो अच्छे से जानती थी की मेरा दिल नेहा के बिना जल रहा है और वो इसी बात पर अंदर ही अंदर मुस्कुरा रही थी| उसकी मुस्कराहट उसके चेहरे पर आ रही थी और मुझे न जाने क्यों नेहा को खो देने का डर सता रहा था! मेरा गुस्सा मरता जा रहा था और एक पिता का पानी बेटी के लिए प्रेम बाहर आ रहा था| आज चाहे रितिका मुझसे जो मांग ले मैं सब उसे दे दूँगा, बस बदले में मुझे मेरी बेटी दे दे! पर वो दिल की काली औरत आज मुझे ऐसा तड़पता देख कर खुश हो रही थी! आखिर एक बाप अपना गुस्सा पीते हुए, आँखों में आँसू लिए बोल पड़ा; "तु चाहती थी न मैं तुझे माफ़ कर दूँ? ठीक है...मैं तुझे दिल से माफ़ करता हूँ पर प्लीज मेरे साथ ऐसा मत कर! नेहा मेरी जान है, उसे मुझसे मत छीन!" मैंने मिन्नतें करते हुए कहा| "मुझे अब किसी की माफ़ी-वाफी नहीं चाहिए!" रितिका अकड़ कर बोली| "तो बोल तुझे क्या चाहिए? जो चाहिए वो सब दूँगा तुझे बस मुझे नेहा से अलग मत कर!" मैंने घुटनों पर आते हुए हाथ जोड़े पर रितिका का कोई फर्क नहीं पड़ा बल्कि वो क्रूरता भरी हँसी हँसने लगी! "अब पता चला की कैसा लगता है जब कोई आपसे आपकी प्यारी चीज छीन ले? You cursed me that day and I lost everything.... fucking everything! This was the payback! बहुत प्यार करते हो न नेहा से? अब तड़पो उसके लिए जैसे मैं तड़प रही हूँ अपने पति के लिए!" मैं हैरानी से उसकी तरफ देख रहा था, क्योंकि मेरा दिल कह रहा था की रितिका ने नेहा को मुझे अपने पाप के प्रायश्चित के रूप में सौंपा था पर ये तो....!!! मैं अभी अपने ख्याल को पूरा भी नहीं कर पाया की रितिका बोल पड़ी; "जो सोच रहे हो वो सही है! ये सब मेरा प्लान था.... मैंने ही आपको नेहा के इतना करीब धकेला और अब मैं ही उसे आप से दूर कर के ये यातना दे रही हूँ! जीयो अब साड़ी उम्र इस दर्द के साथ, वो सामने होते हुए भी आपकी नहीं हो सकती!" जैसे ही उसकी बात पूरी हुई चन्दर भैया ने उसे एक जोरदार तमाचा मारा| उसके सम्भलने से पहले ही भाभी ने भी एक करारा तमाचा उसे दे मारा| "हरामजादी! इतना मेल भरा हुआ है तेरे मन में? तू पैदा होते ही मर क्यों ना गई? इतनी मुश्किल से ये परिवार सम्भल रहा था पर तुझे सब कुछ जला कर राख करना है!" चन्दर भैया बोले! इस सच का खुलासा होते ही मेरे अंदर तो जैसे जान ही नहीं बची थी, सांसें जैसे थम गईं और मैं जमीन पर गिर पड़ा| उसके बाद मुझे कुछ होश नहीं रहा की क्या हुआ....
शाम को जब मेरी आँख खुली तो सब मुझे घेर कर बैठे थे, मैं उठ के बैठा तो माँ की जान में जान आई| पर मेरा मन मेरी बेटी के लिए व्याकुल था और मैं प्यासी नजरों से उसे ढूँढ रहा था| "नेहा....
?" मेरे मुँह से निकला तो भाभी ऊपर नेहा को लेने गईं, पर रितिका ने उसे उन्हें सौंपने से मना कर दिया| वो चिल्लाते हुए बोली ताकि मैं भी सुन लूँ; "मेरे साथ जबरदस्ती मत करना वरना मैं पुलिस बुला लूँगी!" ये कहते हुए उसने भाभी को डराने के लिए अपना फ़ोन उठा लिया पर बहभी को कोई फर्क नहीं पड़ा, उन्होंने पहले तो उसके गाल पर एक झन्नाटे दार तमाचा मारा और फिर उसकी गोद से नेहा को छीनते हुए बोलीं; "जो करना है कर ले!" नीचे आ कर उन्होंने नेहा को मेरी गोद में दिया| नेहा रो रही थी और जैसे ही मैंने उसे अपनी छाती से लगाया तो मेरे जोरों से धड़कते हुए दिल को चैन मिला| मिनट भी नहीं लगा नेहा को चुप होने में, मैंने उसके छोटे से हाथों में अपनी ऊँगली थमाई और उसे ये इत्मीनान हो गाय की उसके पापा उसके पास हैं| पर रितिका का दिमाग सनक चूका था, उसने पुलिस कंप्लेंट कर दी और नीचे आकर दरवाजा खोल दिया| कुछ ही देर में वही थानेदार आ गया जो उस दिन आया था, पुलिस की जीप का साईरन सुन सब बाहर आ गए थे| मैं और माँ कमरे में अब भी बैठे थे, नेहा मेरी छाती से चिपकी किलकारियाँ निकाल रही थी, ऐसा लगता था जैसे मानो कह रही हो की प्लीज पापा मुझे अपने आप से दूर मत करो! पर मैं उस वक़्त खुद को बेबस महसूस कर रहा था!
मैं कुछ कह पाता उससे पहले ही एक महिला पुलिस कर्मी और उनके साथ एक हवलदार कमरे में घुस आये और मेरी गोद से नेहा को लेने को अपने हाथ खोल दिए| मैंने ना में सर हिलाया तो पीछे से थानेदार की आवाज आई; "ये रितिका की बेटी है और तुम जबरदस्ती इसे इसकी माँ से छीन कर रहे हो!" मैं उसी वक़्त बोलना चाहता था की ये मेरी भी बेटी है पर मेरे मन में नेहा को खो देने के डर ने मेरे होंठ सिल दिए थे! "थानेदार साहब ये रितिका का चाचा है!" ताऊ जी बोले| "मौर्या साहब आप रितिका को समझाइये, कंप्लेंट इसी ने की है और हमारा काम है करवाई करना!" थानेदार बोलै और उसने महिला पुलिस कर्मी को इशारा किया की वो नेहा को मुझसे छीन ले| वो पुलिस कर्मी भी समझ सकती थी की मैं नेहा से कितना प्यार करता हूँ, फिर भी उसने जबरदस्ती नेहा को मेरी गोद से ले लिया पर नेहा अब भी मेरी ऊँगली पकडे हुए थी जिसे उसने अपने दूसरे हाथ से छुड़वाया! उसने नेहा को रितिका को सौंप दिया और रितिका मेरी तरफ देख कर मुस्कुराने लगी और ऊपर चली गई| मैं बस आँखों में आँसू लिए घुट कर रह गया, मेरा दर्द वहाँ समझने वाला कोई नहीं था| नेहा के रोने की आवाज सुन मैं आज फिर से टूटने लगा था, जिस्म में जैसे जान ही नहीं बची थी! मैं सर दिवार से टिका कर चुप-चाप बैठा रहा और हिम्मत बटोरने लगा|
थानेदार के जाने के बाद भाभी ने नीचे से रितिका को गालियाँ देनी शुरू कर दी थीं| ताऊ जी भी गुस्से में भरे थे, घर का हर एक सदस्य रितिका के पागलपन के कारन सख्ते में था और उसे कोस रहा था| माँ मेरे सर पर हाथ फेर रहीं थीं पर मेरा
दिमाग सुन्न हो गया था उसे सिवाए नेहा के रोने के और कुछ सुनाई नहीं दे रहा था| "भाभी मुझे समझ नहीं आता की आखिर हो क्या रहा है? क्यों मानु ऐसी हरकतें कर रहा है? नेहा उसकी बेटी नहीं है फिर भी वो इतना मोह में क्यों बहे जा रहा है?" मेरे पिताजी ताई जी से बोले| पर ताऊ जी मेरे इस मोह को कुछ और ही समझ रहे थे; "तुम सब जानते हो की मानु रितिका से कितना प्यार कृते आया है! बचपन से एक वही है जो उसकी हर फरमाइश पूरी करता था इतना सब कुछ करने के बाद जब रितिका ने उसे बिना बताये शादी की तो वो बहुत गुस्सा हुआ और फिर उस दिन हमने उसे घर से निकाल दिया वो बेचारा टूट गया था! इस कुलटा (रितिका) ने नेहा को जानबूझ कर आगे किया और जबरदस्ती मानु के मन में उसके लिए प्यार पैदा किया और जब मानु का लगाव उससे बढ़ गया तो जानबूझ कर नेहा को उससे दूर कर दिया| सब कुछ इसने जानबूझ कर किया, हमारे लड़के को इसी ने बरगलाया है! अँधा-लूला जो कोई भी मिलता है बांधो इसे उसके गले और छुट्टी पाओ इस मनहूस से! रही मानु की बात तो उसे कुछ टाइम लगेगा पर वो ठीक हो जाएगा|" ताऊ जी ये कहते हुए कमरे के अंदर आये और मेरे सर पर हाथ फेरते हुए बोले; "बेटा...तू चिंता ना कर! हम सब यहाँ हैं तेरे लिए! और सुनो कोई भी उसे इसके आस-पास भटकने मत देना|" ताऊ जी ने सबको आगाह किया और भाभी से कहा की वो खाना परोसें| भाभी खाना परोस कर लाइन पर मैं बस सामने की दिवार को घूर रहा था, मुझे उसमें नेहा का अक्स दिख रहा था| भाभी ने मेरा हाथ पकड़ कर झिंझोड़ा तो मैं अपने ख़्वाबों की दुनिया से बाहर आया| आँखें आँसू बहने से लाल हो चुकी थीं, भाभी के हाथ में खाना देख कर समझ ही नहीं आया की क्या कहूं? पर फिर माँ की तरफ देखा जो आस कर रहीं थीं की मैं खाना खाऊँ, मैंने एक नकली मुस्कान अपने चेहरे पर चिपकाई और माँ की तरफ थाली ले कर घूम गया| मैंने उसी नकली मुस्कराहट से माँ को खाना खिलाया, माँ बार-बार मना कर रही थीं की पहले मैं खाऊँ पर मैंने जबरस्ती करते हुए उन्हें खिलाने लगा| उनके खाने के बाद मैं थाली ले कर बाहर आया, सब को लगा की मैंने खा लिया पर भाभी जानती थी की मैंने माँ को खिला दिया है, उन्होंने मेरे लिए दूसरी थाली में खाना परोसा पर मैंने गर्दन हिला कर मना कर दिया| "मानु ऐसे मत करो! क्यों उस हरामजादी के लिए खाना छोड़ रहे हो? उसने तो पेट भर के धकेल लिया, तुम क्यों...." भाभी खुसफुसाती हुए बोलीं| "भाभी बिलकुल इच्छा नहीं है.....
आप बस किसी को कुछ मत कहना!" इतना कह कर मैं घर के बाहर आया और कुछ दूर तक जेब में हाथ डाले चल दिया| मैं जान बुझ कर घर से निकला था ताकि थोड़ी देर बाद जब मैं घर में घुसूँ तो माँ को लगे की मैं खाना खा रहा था| अकेले चलते हुए मुझे मेरी बेबसी का एहसास कचोटे जा रहा था! नेहा मेरी बेटी है और जो रितिका ने आजतक मेरे साथ किया उससे उसका नेहा पर कोई हक़ नहीं बनता! नेहा को उसने एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर के मेरे कलेजे को छलनी किया था, उसका बदला तो हो चूका था पर मेरा अभी बाकी था! मेरी बेबसी अब गुस्से में तब्दील हो गई थी| मुझे उसे जवाब देना था.....पर अभी नहीं!
कुछ देर बाद मैं घर लौटा और माँ के सामने ऐसे जताया जैसे मैंने खाना खा लिया हो! माँ को दवाई दी और सोने ऊपर जाने लगा, पर पिताजी ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे रोक लिया; "तू आज अपनी माँ के पास सो जा, वो बहुत उदास थी पूरा दिन|" मैंने पिताजी की बात मान ली और माँ के पास लेट गया| रात के 1 बजे मैं उठा, अपने गुस्से को निकालने का यही सही समय था| मैं दबे पाँव ऊपर गया और देखा की रितिका के कमरे का दरवाजा खुला है, मैंने धीरे से उसे खोला और अंदर पहुँचा| दरवाजे की आहट से रितिका उठ गई और उसने लाइट जला दी; "अब क्यों आये हो यहाँ?" रितिका अकड़ते हुए बोली| मैंने उसके बाल उसकी गुद्दी से पकडे और उसकी आँखों में झांकते हुए गुस्से से बोला; "बहुत शौक है ना तुझे बदला लेने का? अब देख तू मैं क्या करता हूँ! याद है माने तुझे क्या curse किया था? 'Every fucking day will be like hell for you!' याद राख इस बात को!" इतना कह कर मैंने उसके बाल झटके से छोड़े और अपने कमरे से फ़ोन का चार्जर ले कर मैं नीचे उतर आया| फ़ोन चार्जिंग पर लगाया और लेट गया, पर नींद नहीं आई! मन में बस नेहा को पाने की ललक लिए पूरी रात जागते हुए काटी| सुबह उठ कर मैंने अपना फ़ोन देखा जो पूरा चार्ज हो चूका था| जैसे ही फ़ोन ऑन हुआ उसमें अनु की 50 मिस्ड कॉल्स दिखीं, ये देखते ही मेरी हवा टाइट हो गई! मैं नेहा को तो लघभग खू ही चूका था, अनु को नहीं खो सकता था| मैंने तुरंत उसके नंबर पर कॉल करना शुरू किया पर उसका फ़ोन स्विच ऑफ था! मैंने ढ़ढ़ढ़ कॉल करने जारी रखे और उम्मीद करता रहा की वो उठा लेगी, पर उसका फ़ोन स्विच ऑफ ही रहा| माँ मुझे ऐसे कॉल करता देख परेशान हो रही थी, मैंने उन्हें कुछ नहीं कहा बस चुपचाप टिकट बुक करने लगा| इतने में डैडी जी (अनु के डैडी) का फ़ोन आ गया| मैं फ़ोन उठा कर आंगन में एक कोने में खड़ा हो गया; "मानु बेटा सब ठीक तो है? तुम्हारी अनु से कोई लड़ाई हुई? परसों जब से आई है बस रोये जा रही है?" ये सुनते ही मेरी हालत खराब हो गई; "डैडी जी....मैं आ रहा हूँ...3-4 घंटे में पहुँच रहा हूँ!" इतना कहते हुए मैंने फ़ोन काटा और अपना पर्स उठाने भागा; "क्या हुआ? इतना परेशान क्यों है?" पिताजी ने पुछा| "वो मेरा बिज़नेस पार्टनर यहाँ है....मुझे जल्दी जाना होगा ....
!" इतना कहते हुए मैं बिना मुँह-हाथ धोये घर से निकल गया| दाढ़ी बढ़ी हुई, बाल खड़े, रात के टी-शर्ट और पजामा पहने ही मैं निकल गया| मन में बुरे विचार आ रहे थे की कहीं अनु कुछ कर ना ले?! अगर उसे कुछ हो गया तो मैं भी मर जाऊँगा! ये सोचते हुए मैं बस में चढ़ा| पूरे रास्ते उसका नंबर मिलाता रहा पर अब भी उसका नंबर बंद था|
कॉलोनी के गेट से अनु के घर तक दौड़ता हुआ पहुँचा और घंटी बजाई, दरवाजा मम्मी जी ने खोला और मेरी हालत देख कर वो हैरान थीं| मैंने अपनी साँसों को काबू किये बिना ही हाँफते हुए कहा; "अनु.....कहा...?" मम्मी जी ने मुझे अंदर की तरफ इशारा किया| मैं तेजी से अंदर पहुँचा और देखा तो अनु दूसरी तरफ मुँह कर के लेटी है और अब भी रो रही थी| उसकी पीठ मेरी तरफ थी इसलिए वो मुझे नहीं देख पाई| उसे जिन्दा देख आकर मुझे चैन मिला, मैंने अपनी सांसें काबू की और उसके पास पहुँचा और उसे पुकारा; "अनु'| ये सुनते ही अनु बिजली की रफ्तार से उठ बैठी और मेरे गले लग गई| मुझे उसकी शक्ल देखना का भी मौका नहीं मिला| अनु का रोना और भी तेज हो गया था और मैं बस उसके सर पर हाथ फेर कर उसे चुप कराना चाह रहा था| "बस-बस...मेरा बच्चा....बस!" मैंने खुद को तो रोने से रोक लिया था पर अनु को रोक पाना मुश्किल था| "मुझे.....लगा.....आप.... अब....कभी नहीं....आओगे!" अनु ने रोते-रोते कहा| "पागल! ऐसे मत बोलो! I love you! ऐसे कैसे तुम्हें छोड़ दूँगा?" ये सुनने के बाद ही अनु ने रोना बंद किया| पीछे डैडी जी और मम्मी जी ने सब सुना और बोले; "देखा? मैं कहता था न मानु अनु से बहुत प्यार करता है!" डैडी जी बोले और हमने पलट कर देखा तो वो हमें इस तरह लिपटे हुए देख कर मुस्कुरा रहे थे| जब अनु ने मुझे ठीक से देखा तो उसकी आँखें फिर से भर आईं; "ये क्या हालत बना ली है 'आपने'? " अनु बोली| मैं चुप रहा क्योंकि मैं मम्मी जी और डैडी जी के सामने कुछ कहना नहीं चाहता था| उन्हें भी इस बात का एहसास हुआ और दोनों बाहर चले गए| "मेरी छोड़ो और ये बताओ तुमने कैसे सोच लिया की मैं तुम्हें छोड़ कर हमेशा के लिए गाँव रहूँगा? मैंने तुम्हें प्रॉमिस किया था ना की मैं वापस आऊँगा... फिर?" मैंने अनु के आँसू पोछते हुए कहा|
"मैं यहाँ आपको सरप्राइज देने के लिए आई थी, मैंने आपको कितने काल किये पर आपने एक भी कॉल नहीं उठाया! फिर फ़ोन स्विच ऑफ हुआ....मुझे लगा आपने मुझे ब्लॉक कर दिया और अब आप मुझसे शादी करने अब कभी नहीं आओगे!"
"It was a rough day .... very bad .....
" मैंने सर झुकाते हुए कहा|
"क्या हुआ? Tell me?" अनु बोली पर यहाँ कुछ भी कहना मुझे ठीक नहीं लगा और अनु ये समझ भी गई| इतने में मम्मी जी चाय ले कर आ गईं और डैडी जी भी आ गए और वहाँ बैठ गए| "बेटा ये क्या हालत बना रखी है तुमने?" डैडी जी ने पुछा|
"वो दरअसल डैडी जी घर से फ़ोन आया था, सब ने मुझे वापस बुलाया और वहाँ जा कर पता चला की मेरा परिवार बड़े बुरे हाल से गुजर रहा था| मेरी भतीजी के ससुराल वालों को दुश्मनी के चलते किसी ने सब को जान से मार दिया! बस मेरी भतीजी जैसे-कैसे बच गई| तो अभी पूरा घर बहुत परेशान है!" ये सुनते ही मम्मी और डैडी जी को बहुत दुःख हुआ और उन्होंने सब से मिलने की इच्छा जाहिर की; "जी मैं पहले अनु को सबसे मिलवाना चाहता हूँ!" मैंने कहा पर उन्हें एक डर सता रहा था की कहीं मेरे घरवालों ने शादी के लिए मना कर दिया तो? "ऐसा कुछ नहीं होगा डैडी जी! वो मान जाएंगे!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा पर ये तो मैं ही जानता था की ये कितनी बड़ी टेढ़ी खीर है! इधर अनु मुझसे मेरी हालत का कारण जानने को बेकरार थी, पर यहाँ तो मैं उसे कुछ बताने से रहा इसलिए वो उठ कर खड़ी हुई और मेरी तरफ अपने बैग से निकाल कर एक तौलिया फेंका; "Get ready!" मैं तथा मम्मी-डैडी उसकी तरफ हैरानी से देखने लगे क्योंकि जो इंसान पिछले 48 घंटों से बस रोये जा रहा था उसमें अचानक इतनी शक्ति कैसे आ गई? हम सब को हैरानी से उसे देखते हुए वो हँसते हुए बोली; "क्या? हम दोनों घूमने जा रहे हैं!" ये सुन कर मम्मी-डैडी हंस पड़े और मई भी मुस्कुरा दिया| अनु के इसी बचपने का तो मैं दीवाना था! मैं उठा और तभी मेरा फ़ोन आ गया, "जी पिताजी! नहीं सब ठीक है... जी ...नहीं कोई घबराने की बात नहीं है! मैं परसों आऊँगा? हांजी...कुछ जर्रूरी काम है!" मैंने जर्रूरी काम है बहुत धीरे से बोला जिसे कोई सुन नहीं पाया| उसके बाद मैं नहाया और अनु मेरे कुछ कपडे ले आई थी वो पहने और हम घूमने निकले| अनु जानती थी की मैंने कुछ नहीं खाया होगा इसलिए पहले उसने जबरदस्ती मुझे कुछ खिलाया और फिर आंबेडकर पार्क ले आई| वहाँ एक शांत जगह देख कर हम बैठे और अनु ने मेरा दायाँ हाथ अपने हाथ में लिया और सारी बात पूछी| मैंने रोते-रोते उसे सारी बात बताई और ये सब सुन कर उसका पारा चढ़ गया| वो एकदम से उठ खड़ी हुई और मेरा हाथ पकड़ कर खींचते हुए मुझे खड़ा किया और बोली; "चलो घर, आज इसे मैं जिन्दा नहीं छोडूँगी!" मैंने अनु के दूसरे हाथ को पकड़ लिया और उसे अपने गले लगा लिया| "आप क्यों.....
मार दो उसे जान से! बाकी सब मुझ पर छोड़ दो!" अनु ने कहा|
"मन तो मेरा भी यही किया था पर उसकी जान ले कर मैं तुम्हें भी खो दूँगा!" मैंने अनु से अलग होते हुए कहा| ये बात सच भी थी क्योंकि फिर मुझे जेल हो जाती और हम दोनों हमेशा-हमेशा के लिए जुदा हो जाते| "तो फिर क्या करें? हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे?" अनु ने गुस्से से कहा|
"शादी करेंगे!" मैंने कहा और अनु कुछ सोचते हुए बोली; "ठीक है! चलो आज ही घर चलते हैं!"
"नहीं...आज नहीं.... कल पहले तुम्हारा बर्थडे सेलिब्रेट करते हैं|" मैंने कहा|
"पर क्यों? वहाँ जा कर सेलिब्रेट करेंगे!" अनु ने कहा|
"घरवाले इतनी आसानी से हमारी शादी के लिए नहीं मानेंगे और मैं नहीं चाहता की तुम्हारा जन्मदिन खराब हो!" मैंने अनु को फिर से अपने सीने से लगा लिया| अनु मेरी बात समझ गई थी और उसने कल के लिए सारा प्लान भी बना लिया था| पर मैं तो बस उसे अपने सीने से चिपकाए नेहा की कमी को पूरा करना चाह रहा था| पर जो गर्म एहसास मुझे नेहा को गले लगाने से मिलता था वो मुझे अनु को गले लगाने से नहीं मिल रहा था| नेहा की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता था!
update 73
"आपकी दिल की धड़कनें क्यों तेज हैं?" अनु ने पूछा| अब मैं उसे क्या कहता? शायद वो मेरी बात को समझ ना पति, या फिर वो इसका कुछ और मतलब निकालती इसलिए मैंने बात घुमा दी; "इतने दिनों बाद तुम्हें गले लगा ना इसलिए दिल बेकाबू हो गया!" पर अनु मुझे अच्छे से जानती थी और ये भी जानती थी की मेरे मन में क्या चल रहा है| मेरे मन के विचारों और पीड़ा को महसूस कर के अनु डर गई थी, जिस मानु को उसने इतनी मुश्किल से संभाला था कहीं वो फिर से अंतहीन गम की खाईं में न गिर जाए! "अच्छा ये बताओ ये तुमने आजकल मुझे 'आप' कहना क्यों शुरू कर दिया?" मैंने बातों को आगे बढ़ाते हुए कहा वरना अनु को शक हो जाता की मैं अंदर से दुखी हूँ|
"मम्मी को देख कर! उस दिन मैं जब आपसे बात कर रही थी तो मम्मी ने मुझे टोका और कहा की पति परमेश्वर होता है और मुझे आदर से बात करनी चाहिए जैसे वो करतीं हैं पापा से|" अनु ने बड़े भोलेपन से जवाब दिया| मम्मी जी का तातपर्य था की शादी के बाद वो मुझे आप कहे पर ये अनु का बचपना था जो की उस बात को अभी से मानना चाहता था|
"अच्छा जी? तो ठीक है मैं भी अबसे तुम्हें आप ही कहूँगा?" मैंने कहा|
"नहीं.... इतनी मुश्किल से तो आप तुम पर आये हो अब फिर से आप पर जाना चाहते हो?" अनु ने चिढ़ते हुए कहा|
"यार अगर आप मुझे इज्जत देकर बात कर रहे हो तो मैं भी करूँगा| ये कहाँ लिखा है की सिर्फ पत्नियाँ ही पति को आप कह सकती हैं और पति नहीं?" मैंने तर्क दिया|
"वैसे .... एक बात कहूँ?" अनु ने शर्माते हुए कहा|
"आय-हाय!! शर्म से गाल लाल हो गए आपके तो?" मैंने अनु की टाँग खींचते हुए कहा|
"ये हम दोनों का एक दूसरे को आप कहना.....
एक अजीब सा एहसास दिलाता है! लगता है मानो जिस्म में हजारों तितलियाँ उड़ रही हों! क्या यही प्यार है? अनु ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा| उसकी आँखों में मुझे आज अलग ही कसक दिखी, इधर मेरी आँखों में सुनापन था और मुझे अपने जज्बात अनु से छुपाने थे!
"हम्म्म....." इसके आगे मैं कुछ बोल ना पाया और अनु को अपने सीने से लगा लिया|
शाम होने को आई थी इसलिए मैंने अनु से कहा की घर चलते हैं, ठंड में बाहर ठिठुरने से अच्छा है घर जा कर बैठें| तभी घर से फ़ोन आया; "जी .... वो एक जर्रूरी मीटिंग थी और मैं उसके बारे में भूल गया था| कपडे? जी वो मैंने यहाँ से ले लिए थे..... कल एक और मीटिंग है ....उसके बाद मैं परसों आ जाऊँगा.....और हाँ.....मैं अपने पार्टनर को भी साथ ला रहा हूँ .... जी.... जी ठीक है....माँ से कह दीजियेगा की वो चिंता ना करें!" पिताजी से बात कर के मैंने उन्हें इत्मीनान दिला दिया था की मैं ठीक-ठाक हूँ| इधर मेरे मुँह से मिलवाने की बात सुन अनु भी बहुत खुश थी! हम घर लौटे तो डैडी जी से थोड़ी डाँट पड़ी; "तुम दोनों की अभी तक शादी नहीं हुई है, ज्यादा इधर-उधर घूमा न करो!" पर मम्मी जी मेरे बचाव में सामने आईं; "इसे (अनु को) डाँटो मानु को यही ले गई थी, वो तो बेचारा कुछ कहता नहीं इसे!"
"बहुत दिन हुए ना तुझे डाँट खाये?" डैडी जी ने अनु को थोड़ा डराया और अनु का सर झुक गया| "सॉरी डैडी जी, नेक्स्ट टाइम से हम दोनों ध्यान रखेंगे!" मैंने अनु का बचाव किया और ये देख डैडी-मम्मी हंस पड़े और हम दोनों हैरानी से उन्हें देखने लगे| "बेटा अभी शादी नहीं हुई और तुम अभी से इसकी गलतियों पर पर्दा डाल रहे हो?" डैडी जी ने हँसते हुए कहा| रात को खाने के बाद मैं वॉक लेने के लिए अकेले निकल पड़ा, जब वापस आया तो अनु नराज हो चुकी थी; "अकेले क्यों गए? मैं भी चलती!" अनु बोली| "बेबी....दुबारा डाँट खानी है?" मैंने बहुत प्यार से अनु से पुछा तो उसे डैडी जी की डाँट याद आ गई| मैं वाशरूम गया और वापस आया तो अनु ने मेरा हाथ पकड़ा और हम दोनों सोफे पर टी.वी.
के सामने बैठ गए, कुछ देर बाद डैडी जी और मम्मी जी भी बैठ गए| नौ बजे और मम्मी-डैडी उठ कर सोने के लिए चले गए, उनके जाते ही अनु मुझसे सट कर बैठ गई| फिर अचानक ही उसने मुझे अपना सर उसकी गोद में रखने को कहा| वो मेरे बालों में उँगलियाँ फेरने लगी; "अगर आप आज ना आते तो मैंने सोच लिया था की मैं अपनी जान दे दूँगी!" अनु बोली| मैं उठ के बैठा और मेरी आँखें आँसुओं से भर गई; "नेहा को तो मैं खो चूका हूँ अब तुम्हें खोने की ताक़त नहीं रही मुझ में! भूलकर भी कभी ऐसा कुछ मत करना वरना तुम्हारे साथ मैं भी मर जाता!" मैंने कहा तो अनु ने मेरे आँसू पोछे और बोली; "ना आपने नेहा को खोया है और न मुझे खाओगे!" अनु ने मुस्कुराते हुए कहा, शायद वो जानती थी की उसे क्या करना है| मेरे दिमाग ने अनु की बात को ठीक से समझा ही नहीं, मुझे लगा की वो मेरा दिल रखने को ऐसा कह रही है| आगे हम कुछ बात कर पाते उससे पहले ही मम्मी जी आ गईं और हमें ऐसे गले लगे देख कर प्यार से टोकते हुए बोलीं; "बेटा और दो महीने की बात है!" ये सुन कर हम दोनों शर्म से लाल हो गए और दूर-दूर बैठ गए| "चल अनु सो जा!" मम्मी जी बोलीं| "आप चलो मैं आती हूँ!" अनु ने हँसते हुए कहा और मम्मी जी के जाते ही मेरी गोद में सर रख कर सो गई| मैंने अनु के माथे को चूमा और उसे गोद में ले कर कमरे में आया और धीरे से मम्मी जी की बगल में लिटा दिया| घडी में अभी दस बजे थे और मुझे बारह बजने का इंतजार था| मैं चुपचाप आ कर सोफे पर बैठ गया और फ़ोन में नेहा की तसवीरें देखने लगा| स्क्रीन पर उसके गालों को सहलाता और उस प्यार को महसूस करने की कोशिश करता| दिल अंदर से बहुत दुखी था और आखिर एक बाप के आँसू छलक ही आये, वो दर्द बाहर ही गया और मैं सोफे पर लेटा उस दर्द को अपने अंदर दफन करने में लग गया पर दर्द को वापस सीने में दफन करना इतना आसान नहीं होता! मुझे ये डर भी सता रहा था की अगर मम्मी-डैडी जी ने मुझे यहाँ ऐसे देखा तो मैं उनसे क्या कहूँगा? उनसे सच भी तो नहीं कह सकता था वरना वो मेरे बारे में क्या सोचते? और फिर शायद मैं और अनु फिर कभी एक नहीं हो पाते! मैंने अपने आँसू पोछे और टाइम देखा तो घडी में 11:59 हुए थे, मैं डैडी जी वाले कमरे में आया जहाँ मैंने केक रखा था जो मैंने वॉक पर जाते समय खरीदा था| उसे ला कर मैंने ड्राइंग रूम में रखा और कैंडल जलाएं फिर मैं अनु को उठाने गया| अनु बायीं तरफ करवट ले कर लेटी थी, मैं उसके सामने घुटनों पर बैठ गया, झुक कर उसके गालों को चूमा और खुसफुसाती हुए कहा; "Happy Birthday My Would Be Wife!" ये सुनते ही अनु ने मुस्कुराते हुए आँख खोली और उठ कर बैठी| कमरे में उस वक़्त रोशिनी कम थी इसलिए वो मेरी लाल आँखें नहीं देख पाई और सीधा मेरे गले लग गई| बिस्तर पर हुई हलकजहल से मम्मी जी की आँख खुल गई और उन्होंने साइड लैंप ऑन कर दिया| उन्होंने हम दोनों को गले लगे हुए देखा तो प्यार से बोलीं; "तुम दोनों की
शादी जल्दी करनी पड़ेगी वरना तुम दोनों मुझे सोने नहीं दोगे!" पर मम्मी जी की बात सुन कर भी अनु मुझसे चिपकी रही| मम्मी जी अनु का बर्थडे भूल गई थीं इसलिए मैंने अपने होंठ हिलाते हुए उन्हें इशारे से याद दिलाया की अनु का बर्थडे है| "बेटी थोड़ा तो शर्म किया कर? बर्थडे है तो क्या मानु को छोड़ेगी नहीं?" ये सुन कर अनु मुझसे अलग हुई और उसने मेरी लाल आँखें देख लीं और उसे समझते देर न लगी की ये लाल क्यों है! वो आगे कुछ कहती उससे पहले ही मम्मी जी ने उसे अपने गले लगा लिया और बोलीं; "हैप्पी बर्थडे मेरी लाडो! मेरी लाडो को दुनिया की सारी खुशियाँ मिले!" मैं भी जान गया था की अनु ने मेरी लाल आँखें देख ली हैं और अब वो ज्ररूर पूछेगी, इसलिए उससे नजरें चुराते हुए मैं डैडी जी को उठाने चल दिया| डैडी जी को तारिख का अंदाजा नहीं था और उन्हें लग रहा था की बर्थडे परसों है पर मैंने उन्हें यक़ीन दिलाया तो वो उठे और उन्हें बुरा ना लगे इसलिए मैंने उन्हें इस बात के बारे में कुछ नहीं कहा| वो बाहर आये तो ड्राइंग रूम में केक पर मोमबत्ती जलते हुए देखि और वो मेरा प्लान समझ गए| डैडी जी अनु की बाईं तरफ बैठ गए और उसे अपने गले लगा कर जन्मदिन की बधाई दी और बहुत सारा प्यार दिया पर अनु की नजरें मुझ पर गड़ी हुई थीं| अनु की नजरें मुझे चुभ रही थीं और मैं आज के दिन को अपना दुखड़ा सूना कर खराब नहीं करना चाहता था| "चलिए केक काटते हैं!" मैंने अनु से आँखें चुराते हुए कहा| केक की बात सुन कर मम्मी जी चौंक गई पर मैं नहीं चाहता था की अनु को लगे की उसके मम्मी-डैडी उसका बर्थडे भूल गए इसलिए मैंने सारा क्रेडिट उन्हें दे दिया| "डैडी जी ने केक मंगवाया है, चलो जल्दी!" इतना कह कर मैं सबसे पहले बाहर आया और सारी लाइट्स जला दीं, पीछे से मम्मी-डैडी और अनु आ गए|
केक पर मैने जानबूझ कर Happy Birthday Anu लिखवाया था क्योंकि और कुछ लिखवाता तो हम दोनों ही मम्मी-डैडी के सामने शर्मा जाते! केक काट के वो पहला टुकड़ा डैडी जी को खिलाने लगी पर डैडी जी ने उसका हाथ पकड़ कर मेरी तरफ कर दिया और अनु ने हँसते हुए मुझे केक खिलाया और फिर मैंने एक छोटी सी बाईट अनु को खिलाई उसके बाद उसने मम्मी-डैडी को खिलाया और हम सारे ड्राइंग रूम में ही बैठ गए| "डैडी कल सुबह हम दोनों बर्थडे सेलिब्रेट करने जाएँ?" अनु ने शर्माते हुए कहा|
"ठीक है....
पर रात का डिनर साथ करना है!" डैडी जी ने मुस्कुराते हुए कहा| ये सुन कर अनु खुश हो गई डैडी जी के गले लग गई| कल का प्रोग्राम सेट था तो मम्मी-डैडी और मैं उठ खड़े हुए ताकि सोने जा सकें पर अनु ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे बैठने को कहा| मैंने गर्दन ना में हिलाई क्योंकि एक तो मुझे पता था की वो क्या पूछेगी और दूसरा डैडी जी कहीं डाँट ना दे! अनु ने एक दम से मुँह बना लिया और मुझे उसके पास बैठना पड़ा, डैडी-ममममय ने जब देखा तो वो मुस्कुराते हुए बोले; "बेटा ज्यादा देर तक जागना मत!" और वो सोने चले गए| अनु ने मेरा चेहरा अपने हाथों में थाम लिया और बोली; "नेहा को याद कर के रो रहे थे ना?" नेहा का नाम सुनते ही मैं खुद को रोक नहीं पाया और आंखें फिर छलक आईं| अनु ने मुझे कस कर गले लगा लिया और बोली; "मैं हूँ ना?.... सब ठीक हो जायेगा!" फिर मेरी पीठ पर हाथ फेरती रही ताकि मैं चुप हो जाऊँ| बड़ी ताक़त लगी मुझे खुद को संभालने में ताकि मैं अनु का ये स्पेशल दिन अपने रोने-धोने से बर्बाद न कर दूँ! मैंने अपने आँसूँ पोछे और नकली मुस्कराहट होठों पर चिपकाते हुए कहा; "Thank You! चलो अब सो जाते हैं, सुबह का क्या प्लान है?" पर अनु मुझे अच्छे से समझती थी और चूँकि हम घर पर थे इसलिए यहाँ वो कुछ ज्यादा पूछ नहीं सकती थी| "कल का सारा दिन हम साथ spend करेंगे!" इतना कहते हुए वो खड़ी हुई और एक बार मुझे अपने गले लगा लिया और इस बार मैंने खुद को रोने से रोक लिया| मैंने ऋतू को उसके कमरे के बाहर छोड़ा और मैं डैडी जी वाले कमरे में आ कर सो गया|
अगली सुबह बड़ी प्यारी थी....अनु मुझे उठाने आई और चूँकि वहाँ मैं अकेला सो रहा था तो उसने मेरे गले पर अपने होंठ रखे और उन्हें अपने मुँह में भर कर धीरे से काट लिया| इस जोरदार Kiss से मेरा पूरा शरीर हरकत करने लगा, माने आँखें खोले बिना ही अनु का हाथ पकड़ कर अपने ऊपर खींच लिया और उसे अपनी बाहों में जकड़ लिया| "ससस....Good ..... Morning!!!" अनु ने मेरे जिस्म के स्पर्श से सीसियाते हुए कहा| मैंने अनु के माथे को चूमा और कहा; "Happy Birthday मल्लिकाय हुस्न जी!" अनु शर्मा गई और अपना सर मेरे सीने पर रख कर लेट गई, तभी मम्मी जी आ गईं और अपनी कमर पर हाथ रखते हुए बोली; "हे राम! सुबह-सुबह तुम दोनों का रोमांस चालु हो गया?!" उनकी आवाज सुनते ही अनु छिटक कर खड़ी हुई और बाहर भाग गई, मैं भी उठ के बैठ गया और मम्मी जी मेरे पास आईं और मेरे कान पकड़ते हुए बोलीं; "चल बदमाश बाहर!" मैं बाहर आया और मेरा डायन कान अब भी मम्मी जी के हाथ में था; "सुनते हो जी? जल्दी से शादी कराओ इनकी, ये दोनों दिन पर दिन पागल होते जा रहे हैं!" मम्मी जी की बात सुन कर मेरे और अनु के गाल शर्म से लाल हो गए और डैडी जी जोर से हँसने लगे| "सॉरी मम्मी जी! नेक्स्ट टाइम से .....
" आगे मैं कुछ कह पाटा उससे पहले अनु कूदती हुई नजदीक आई और मम्मी जी के गले लगी और उनके कान में बोली; "नेक्स्ट टाइम से आप हमें पकड़ नहीं पाओगे!" इतना कहते हुए अनु खिलखिला कर हँसी और अपने कमरे में भाग गई| "रुक जा बदमाश!" मम्मी जी मेरा कान छोड़ते हुए बोली| डैडी जी जो ये सब सुन नहीं पाए थे पूछने लगे; "क्या हुआ?"
"ये लड़की है न सच्ची बहुत बदमाश हो गई है!" ये कहते हुए मम्मी जी हँस के डैडी जी के पास जाने लगीं और मेरा हाथ भी पकड़ कर साथ ले गईं| मुझे उन्होंने डैडी जी के साथ सोफे पर बिठाया और वो मेरे सामने पफ्फी पर बैठ गईं; "बेटा.... मुझे ये कहने की जर्रूरत तो नहीं पर फिर भी एक माँ हूँ इसलिए कह रही हूँ, इसका बहुत ख्याल रखना! हम दोनों इसे एक बार लघभग खो चुके थे क्योंकि हम इसे समझ नहीं पाए थे, पर वो तुम थे जिसने हमें इसके जज्बात समझाये! इसके मन में तुम्हारे लिए बहुत प्यार है और मैं जानती हूँ तुम भी इसे बहुत चाहते हो, इसलिए इसे हमेशा खुश रखना, बहुत सारा प्यार देना! वो प्यार भी देना जो हम इसे ना दे पाए!" मम्मी जी ने रुंधे गले से कहा| मैं उनके सामने घुटनों पर बैठ गया और बोला; "मम्मी जी मैं आपसे वादा करता हूँ मैं अनु को बहुत खुश रखूँगा, पूरी कोशिश करूँगा की उसकी आँखों में कभी आँसू ना आये!"
डैडी जी ने मेरे सर पर हाथ रखा और कहा; "बेटा मुझे तुम पर पूरा भरोसा है और Thank you की कल रात तुमने केक का सारा क्रेडिट हमें दिया, वरना हम तो भूल ही गए थे!"
"डैडी जी आप केक लाओ या मैं लाऊँ बात तो एक ही है!" इतना कह कर मैं बैठ गया की अनु अपने कमरे के बाहर से चिल्लाई; "क्या प्लानिंग हो रही है?"
"किसने कहा यहाँ तेरी बात हो रही है?" डैडी जी ने उसे प्यार से डाँटते हुए कहा| पर मुझे अपने मम्मी-डैडी के इतने करीब बैठा देख अनु का दिल गदगद हो उठा!
नहा-धो कर हमें निकलते-निकलते बारह बज गए, अनु डैडी जी की गाडी ड्राइव कर रही थी, उसने पहले गाडी एक ठेके के बाहर रोकी और मुझे रेड वाइन लाने को कहा| मैंने उसके हुक्म की तामील की, फिर उसने कुछ खाने के लिए स्नैक्स लेने को कहा और फिर गाडी एक होटल के बाहर रोक दी| "हम यहाँ क्या कर रहे हैं?" मैंने पुछा|
"वही जो हम घर पर नहीं कर पाते!" अनु ने मुस्कुराते हुए कहा|
"यार ये सही नहीं है!" मैंने झिझकते हुए कहा|
"क्यों? घर पर मम्मी-डैडी होते हैं और हम साथ बैठ भी नहीं पाते!" अनु ने कहा तो मुझे इत्मीनान हुआ की अनु 'उस' काम के लिए यहाँ नहीं आई है| हम ने check in किया और रूम के अंदर आये;
"यार बड़ा अजीब सा लग रहा है?" मैंने कहा तो अनु हँसने लगी; "क्यों डर लग रहा है?" अनु ने पुछा|
"ऐसी जगह एक बॉयफ्रेंड अपनी गर्लफ्रेंड को लाता है 'उस' काम के लिए!" मैंने शर्माते हुए कहा|
"इसीलिए तो लाई हूँ आपको यहाँ! आप तो मुझे कहीं ऐसी जगह ले जाते नहीं, सोचा मैं ही ले जाऊँ?" अनु ने बिस्तर पर गिरते हुए कहा| मैं अनु की बगल में ही
लेट गया और अनु ने अपना सर मेरे सीने पर रख दिया और मेरे दिल की धड़कनें सुनने लगी;
"हाय! आपका दिल तो अभी से रोमांटिक हो गया?" अनु बोली|
"रोमांटिक नहीं डर से धड़क रहा है!" मैंने हँसते हुए कहा|
"किस बात का डर?" अनु ने हैरान होते हुए कहा|
"जिस काम के लिए यहाँ लाये हो?" मैंने अनु को चिढ़ाते हुए कहा|
"आपका मन नहीं है?" अनु ने थोड़ा सीरियस होते हुए कहा|
मैंने अनु को एक दम से मेरे नीचे किया और उसके ऊपर झुक कर उसकी आँखों में देखते हुए कहा; "बेबी ये सब सुहागरात तक बचा रहा हूँ मैं! वो रात हमारी एक दूसरे को सौंप देने की रात होगी!" मैंने कहा|
"और अगर वो रात नहीं आई तो?" अनु ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा|
"क्या? ऐसा क्यों कह रही हो?" मैंने चिंता जताते हुए कहा|
"कल हम आपके घर जा रहे हैं ना, आपको लगता है की मेरा past जानकार आपके सब घरवाले मान जायेंगे? उन्होंने अगर इस शादी से मना कर दिया तो? हमें मार दिया तो? मरना तो मैं सह लूंगी पर आपकी जुदाई नहीं सह सकती!" अनु ने कहा|
"मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा! समझ आया? रही हमें अलग करने की तो उसका उन्हें (मेरे घरवालों को) कोई हक़ नहीं है| हमारी शादी तो हो कर रहेगी चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े!" मैंने थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए कहा|
"तो मेरे लिए क्या फिर से अपना घर छोड़ दोगे?" अनु बोली|
"हाँ" मैंने इतना कहा और अनु की आँखों में आँखें डाले देखने लगा, वो कुछ कहने वाली थी पर चुप हो गई| उसके होंठ कांपने लगे थे और उसने मुझे kiss करने के लिए अपनी बाँहों को मेरी गर्दन पर लॉक कर लिया और मुझे अपने होठों पर झुकाने लगी| मैंने अपनी ऊँगली उसके होठों पर रख दी और उसके दाएँ गाल को चूम लिया| अनु मुस्कुरा दी और बोली; "वैसे आपको सुबह वाली Kissi कैसी लगी?"
"बहुत अच्छी, और आगे से मुझे ऐसे ही जगाना!" मैंने हँसते हुए कहा|
हम दोनों उठे और अनु ने गिलास में वाइन डाली और खाने के लिए जो स्नैक्स लिए थे वो खोले और मैं वाशरूम में फ्रेश होने गया| फ्रेश हो कर आया तो अनु पलंग पर बेडपोस्ट को सहारा ले कर बैठी थी और टी.वी. जोर से चल रहा था| मैं भी जूते उतार कर उसकी बगल में बैठ गया;
"टी.वी.
की आवाज कम कर दो वरना लोग सोचेंगे की यहाँ 'गर्मागर्म' प्रोग्राम चल रहा है!" मैंने हँसते हुए कहा|
"सही है, उन्हें लगना भी चाहिए!" अनु ने हँसते हुए कहा|
कुछ देर बाद अनु ने मुझे अपनी तरफ खींचा और मेरा सर अपनी गोद में रखा, मेरी शर्ट का कालर पकड़ कर नीचे की तरफ किया जिससे मेरी गर्दन उसे साफ़ नजर आने लगी| धीरे-धीरे उसने अपने होंठ मेरी गर्दन पर रखे और धीरे-धीरे अपनी जीभ से चुभलाने लगी| पता नहीं उसे इसमें क्या मजा आता था पर अगले दस मिनट तक वो इसी तरह मेरी गर्दन के माँस के टुकड़े को कभी धीरे से काटती, कभी उसे चुभलाती और कभी उसे चूसने लगती| दस मिनट बाद जब अनु ने मेरी गर्दन पर से अपने गुलाबी होंठ हटाए तो जितना हिस्सा उसके मुँह में था वो लाल हो चूका था और अनु के मुख के रस की तार मेरी गर्दन और उसके होठों को जोड़े हुए थी| मेरी आँखें बंद थीं जो ये बता रही थीं की मुझे कितना मज़ा आ रहा है! अनु की नजर मेरे अकड़ चुके लंड पर पड़ी और वो उभार देख उसकी सांसें थम गई| सेक्स का डर उसे सताने लगा और उसके हाथ-पाँव काँपने लगे! मेरी आँखें खुलीं और उसकी तेजी से ऊपर-नीचे होती छातियां देख मैं उसके डर को भाँप गया| मैं उठ कर बैठा तो अनु का दिल जोर से धड़कने लगा, मैंने अनु की तरफ देखा तो उसने अपनी आँखें झुका ली| मैं सीधा हो कर तकिये पर सर रख कर लेट गया और अपने दोनों हाथ खोल कर अनु को अपने पास बुलाया| अनु का डर एक सेकंड में फुर्र हो गया और वो आ कर मेरे सीने से लिपट गई और हम दोनों ऐसे ही लेटे रहे| जब अनु के दिल की धड़कन सामन्य हुई तो मैंने उसके कान में खुसफुसाती हुए कहा; "मेरा बेबी डर गया था? आपको क्या लगा की मैं......सेक्स....." मैंने थोड़ा अटकते-अटकते कहा और ये सुन अनु ने हाँ में सर हिलाया| "awww .... मेरा बेबी! don't worry!" फिर हम ऐसे ही लिपटे सो गए, वाइन की कुछ खुमारी थी बाकी अनु के जिस्म की गर्माहट जिसने मुझे और अनु को सुला दिया|
शाम 5 बजे डैडी जी का फ़ोन आया तब हम उठे और मुँह-हाथ धो कर निकले और घर पहुँचे| कपडे बदल कर हम सब निकले, आगे मैं और डैडी जी बैठे थे और पीछे अनु और मम्मी जी| पार्किंग में गाडी पार्क कर के हम सब अंदर जा रहे थे की मैंने एक कॉल का बहाना बनाया और 10 मिनट के लिए बाहर रुक गया! मैं जल्दी से अंदर आया तो अनु की नजरें बस मुझे ही ढूँढ रही थीं| "सॉरी जी....
वो घर से कॉल आया था!" मैंने डैडी जी को झूठ बोलते हुए कहा| अनु घर का कॉल सुनते ही थोड़ा चिंतित हो गई, मैंने गर्दन ना में हिला कर उसे कहा की कोई सीरियस बात नहीं है तब जा कर उसे इत्मीनान हुआ| खाना आर्डर हुआ और वहाँ बॉलीवुड के गाने बजने लगे, कोई शोर शराबा नहीं था बस सॉफ्ट म्यूजिक बज रहा था| इधर मम्मी जी ने मेरी गर्दन पर लाल निशान देख लिया और पुछा की ये कैसे हुआ, मैंने थोड़ा शर्माते हुए कहा "एक मच्छर ने काट लिया!" ये सुनते ही अनु ने टेबल के नीचे से मुझे पैर मारा और मैं हँसने लगा| डैडी जी मेरी बात समझ गए और वो भी हँस पड़े| अनु ने जब उन्हें हँसते हुए देखा तो वो शर्म से लाल हो गई|
फिर डैडी जी ने शादी की बातें शुरू की, वो मेरे घर आना चाहते थे और मैंने उन्हें कहा कि कल अनु को मिलवा कर वापस आता हूँ और फिर आप सब मिल लीजियेगा, इतने में खाना आया और हमने खाना शुरू किया| डेजर्ट आर्डर करने के बाद मम्मी जी और अनु वाशरूम चले गए और मुझे डैडी जी से कुछ पूछने का मौका मिल गया| "डैडी जी.... एक बात पूछनी थी?" मैंने थोड़ा झिझकते हुए कहा|
"क्या हुआ बेटा? बोलो?" डैडी जी ने मुझे इज्जाजत दी फिर भी मैंने थोड़ा डरते हुए कहा; "वो.......वो मैं ....अनु को अभी प्रोपोज़ करना चाहता था!" डैडी जी ने कहा; "भई इसमें पूछने की क्या बात है?" कुछ देर बाद जब अनु और मम्मी जी आये तो मैंने खड़े हो कर अनु का हाथ पकड़ लिया और उसे बैठने नहीं दिया, मैं एक घुटने पर झुका और जेब से रिंग की डिब्बी निकाली और कहा; "थोड़ा बुद्धू हूँ, थोड़ा स्टुपिड हूँ, थोड़ा पागल हूँ पर जैसा भी हूँ तुमसे बहुत प्यार करता हूँ! Will you marry me?" अनु ख़ुशी से कूद पड़ी और हाँ में गर्दन हिलाते हुए अपना बायाँ हाथ आगे कर दिया| मैंने अनु को अंगूठी पहनाई और उठ के खड़ा हुआ| अनु फ़ौरन मेरे गले से लग गई और बोली; "I love you!" मम्मी-डैडी भी उठ खड़े हुए और हमें अपने गले लगा लिया| बहुत सारा आशीर्वाद दिया और बहुत सारा प्यार दिया| डेजर्ट आ गया था और वो खाने के बाद डैडी जी ने जबरदस्ती बिल पे किया| फिर हम घर आ गये, मम्मी जी ने सब को सोने के लिए कहा क्योंकि कल सुबह अनु और मुझे घर के लिए जल्दी निकलना था| पर अनु कहाँ सोने वाली थी, चेंज करने के बाद मैं पानी पीने किचन जा रहा था की वो मुझे खींच कर सोफे पर ले आई| टी.वी ऑन कर के हम दोनों बैठ गए, ड्राइंग रूम में आज काफी सर्दी थी पर अनु ने सारि तैयारी कर रखी थी| अनु ने एक डबल वाला कंबल अपने और मेरे ऊपर डाल दिया, अपने घुटने उसने अपनी छाती से चिपका लिए और मेरे कंधे पर सर रख कर टी.वी.
देखने लगी| "बेबी! आज रात सोना नहीं है क्या?" मैंने खुसफुसाते हुए कहा| अनु ने ना में गर्दन हिलाई और कंबल के अंदर मेरा दायाँ हाथ पकड़ लिया| दस मिनट बाद मम्मी जी अनु को बुलाने आई; "बेटी सो जा और मानु को भी सोने दे! कल सुबह तुम दोनों को जाना है!"
"मम्मी मैं बस थोड़ी देर में आ रही हूँ!" अनु ने उनकी तरफ देखते हुए कहा| मम्मी जी मुस्कुरा दीं और सोने चली गईं| उनके जाते ही अनु ने मेरी गोद में सर रख दिया; "वैसे बेबी ....थैंक यू!" मैंने कहा|
"क्यों?" अनु ने पुछा|
"आपने मेरा इतना ध्यान रखा, एक पल भी मेरा ध्यान नेहा पर जाने नहीं दिया, उसके लिए..." मैंने कहा तो अनु मुस्कुरा दी फिर कुछ सोचते हुए बोली; "आज रात हम यहीं सोते हैं?"
"क्यों बेबी? मैंने थोड़ा हैरान होते हुए कहा|
"बस ऐसे ही, आज आप से अलग सोने को मन नहीं कर रहा है!" मैं समझ गया की उसके मन में कल के लिए डर पैदा हो चूका है|
"बेबी कल कुछ नहीं होगा! Everything will be fine!" मैंने अनु को आश्वासन दिया पर उसका दिल इस आश्वासन को मानने वाला नहीं था|
"कल अगर हम नहीं रहे.... तो कम से कम ये रात तो याद रहेगी ना?" अनु की आँखें छलक आईं| मैंने अनु को उठा के बिठाया और उसके चेहरे को अपने हाथों में थाम लिया; "तुम्हें पता है आज ही मैंने मम्मी-डैडी से वादा किया है की मैं तुम्हारी आँखों में आँसू का एक कटरा नहीं आने दूँगा और तुम हो की रो रही हो? क्यों मुझे झूठा बना रही हो? I promise तुम्हें कुछ नहीं होगा!" मैंने कहा|
"और अगर आपको कुछ हो गया तो? मैं तो तब भी मर जाऊँगी!" अनु ने अपने आँसू पोछते हुए कहा|
'किसी को कुछ नहीं होगा!" मैंने कहा पर इस बार मेरी बात में वजन कम था, मैं मन ही मन तैयारी कर चूका था की अगर हालत बिगड़े और हालत ऐसे बने जैसे तब बने थे जब भाभी वाला काण्ड हुआ तो मुझे कैसे भी कर के अनु को
update 74
सुबह नाहा धो कर तैयार हुए और नाश्ता कर के मैं और अनु मम्मी-डैडी का आशीर्वाद ले कर निकले| मम्मी-डैडी ने कहा था की अगर मेरे घर वाले नहीं माने तो वो खुद चल कर बात करेंगे और हम दोनों बस मुस्कुरा कर हाँ में गर्दन हिला कर रह गए थे| घर के बाहर से ऑटो किया और ऑटो मैंने बैठते ही अनु ने मेरा हाथ थाम लिया, आज अनु की पकड़ में कठोरता थी और डर भी छलक रहा था| ऑटो से हम बस स्टैंड उतरे और फिर बस में बैठ गए| बस में भी अनु ने हाथ पकड़ा हुआ था, मैंने अनु का हाथ एक बार चूमा और अनु के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई| कुछ देर बाद जब बस हॉल्ट के लिए रुकी तो मैंने घर फ़ोन कर दिया; "जी पिताजी.... मैं बस रास्ते में हूँ....हाँ जी...मेरे साथ ही है... जी एक बजे तक पहुँच जाऊँगा| आप सब घर पर ही हैं ना? जी ठीक है...
ओके जी!" मैंने कॉल काटा और अनु बोली; "क्या कहा पिताजी ने?"
"वो पूछ रहे थे की अपने बिज़नेस पार्टनर को साथ ला रहा है ना? और फिर मैंने पुछा की सब घर पर ही हैं ना तो उन्होंने खा की सब हमारा ही इंतजार करा रहे हैं|" ये सुन कर अनु के दिल की धड़कनें तेज हो गईं, उसके हाथ काँपने लगे थे| मैंने अनु को कस कर अपने गले लगा लिया और अनु ने जैसे-तैसे खुद को संभाला| कुछ समय बाद बस ने हमें बस स्टॉप उतारा और वहाँ से 15 मिनट की वॉक थी| मैं और अनु हाथ पकडे चल रहे थे और हर एक कदम आगे बढ़ाते हुए दोनों के दिलों की धड़कनें तेज होती जा रही थी| जब मुझे घर दूर से दिखाई देने लगा तो मैंने बात शुरू की; "बेबी! अगर मैं आपसे कुछ माँगू तो आप दोगे?"
"हाँ" अनु ने एक दम से कहा|
"प्रॉमिस?" मैंने पुछा|
"प्रॉमिस!" अनु ने आत्मविश्वास से कहा|
"अगर अभी हालात बिगड़े और बात मरने-मारने की आई तो आप यहाँ से भाग जाओगे! मैं जितनी देर तक हो सकेगा सब को रोकूँगा पर आप बिना पीछे मुड़े भागोगे! मेरे अल्वा यहाँ आपको कोई नहीं जानता, आपके घर का पता कोई नहीं जानता तो आप यहाँ बिलकुल नहीं रुकोगे! समझे?" मैंने एक साँस में कहा| ये सुनते ही अनु एकदम से ठिठक कर रुक गई, उसकी आँखें भर आईं और वो ना में गर्दन हिलाने लगी| "अनु आपने अभी प्रॉमिस किया था ना?" पर अनु अब भी ना में गर्दन हिला रही थी| मैंने अनु के दोनों कंधे पकडे और उसे समझाया; "बेबी...मैंने मम्मी-डैडी को प्रॉमिस किया था.... मेरा परिवार कैसे react करेगा मुझे नहीं पता ये सिर्फ एक contingency plan है! कम से कम आप भाग कर मेरे लिए मदद तो ला पाओगे ना? प्लीज... इस सब में आपको कुछ नहीं होना चाहिए! प्लीज....
मेरी बात मानो! आपको मेरी कसम!" मेरे पास जो भी तर्क थे मैंने वो सब दे डाले पर अनु नहीं मानी! "मरना है तो साथ मरेंगे!" अनु ने रोते हुए कहा| अनु की बात सुन कर मुझे उस पर गर्व हो रहा था, वो पीठ दिखा के भागना नहीं चाहती थी बल्कि मेरे साथ कंधे से कन्धा मिला कर हालात से लड़ना चाहती थी! मैंने अनु के आँसू पोछे और उसका हाथ पकड़ कर फिर से घर की ओर चल दिया|
जब घर करीब 50 कदम की दूरी पर रह गया तो अनु ने मेरा हाथ छोड़ दिया ताकि हमें कोई ऐसे ना देख ले| आखिर घर पहुँच कर मैंने दरवाजा खटखटाया और दरवाजा ताऊ जी ने खोला, जहाँ मुझे देख कर उन्हें ख़ुशी हुई वहां जैसे ही उनकी नजर अनु पर पड़ी उनके ख़ुशी फ़ाख्ता हो गई! वो बिना कुछ बोले अंदर आ गए और आंगन में सब के साथ बैठ गए| "ताऊ जी, ताई जी, माँ, पिताजी, भाभी और भैया ये हैं अनुराधा कश्यप, मेरी बिज़नेस पार्टनर जिसने मेरे मुश्किल समय में मुझे संभाला और फिर अपने साथ बिज़नेस में पार्टनर की तरह काम करने का मौका दिया|" ये सुनने के बाद ताऊ जी को इत्मीनान हुआ, उन्हें लगा था की मैं और अनुराधा शादी कर के यहाँ आये हैं!
अनु ने सब को हाथ जोड़ कर नमस्कार किया और एक-एक कर सब के पाँव छुए| सब ने उसे आशीर्वाद दिया और ख़ास कर माँ ने उसे अपने गले लगा लिया! "बेटी...मेरे पास शब्द नहीं है..... तेरा बहुत बड़ा एहसान है!" माँ ने रुंधे गले से कहा| "माँ एहसान कह कर मुझे शर्मिंदा मत करो!" अनु ने बड़े प्यार से माँ से कहा| रितिका उस वक़्त सबसे पीछे खड़ी थी और चूँकि मैं ने रितिका से अनु का तार्रुफ़ नहीं कराया था इसलिए वो सड़ी हुई सी शक्ल ले कर पीछे खड़ी रही| अनु उसके पास नहीं गई और चन्दर भैया से नमस्ते कर के वापस मेरे साथ खड़ी हो गई| "बहु बेटा चाय रखो!" ताऊ जी ने भाभी से कहा पर मैंने भाभी को रोक दिया; "भाभी रुक जाओ, आप बैठो कुछ बात करनी है!" मैंने थोड़ा गंभीर होते हुए कहा| "पिताजी कुछ दिन पहले आप ने कहा था ना शादी कर ले! तो मैंने अनु से शादी करने का फैसला किया हैं!" मैंने एक गहरी सांस ली और पूरी हिम्मत जुटाते हुए कहा| घर वाले कुछ कहते उसके पहले ही रितिका पीछे से बोल पड़ी; "अच्छा? ये तो वही हैं ना जिनके पति के यहाँ आप पहले ऑफिस में काम करते थे! फि उसी पति ने कोर्ट में डाइवोर्स का केस किया था और कहा था की तुम्हारे इनके साथ नाजायज तालुकात हैं!" ये सुनते ही मैं गुस्से से उठने लगा तो अनु ने मेरा हाथ पकड़ के रोक दिया, उसे भी जानना था की रितिका के मन में कितना ज़हर भरा हैं! "और हाँ...वो बंबई जाना, ट्रैन में इनका आपकी गोद में सर रख कर लेटना संकेत भैया के चाचा ने भी तो देखा था ना? फिर एक ही होटल में, एक ही कमरे में Mr. and Mrs.
Manu Maurya बन कर रात बिताना! ये सब भी तो बताओ!" रितिका बोली और फिर वही घिनौनी हँसी उसके होठों पर आ गई! ये सब सुन कर सारे घर वाले अवाक मुझे देखने लगे|
"ये सच हैं की मैं अनुराधा के पति के ऑफिस में ही काम करता था पर तब हमारा रिश्ता सिर्फ एक मालिक और नौकर का था, मुंबई जाने का प्लान बॉस ने बनाया था और मुझे फँसाने के लिए उसने मुझे इनके साथ भेजा था| ट्रैन में कुछ नहीं हुआ, वहाँ मेरी गोद में इनका सर रख कर लेटना सिर्फ और सिर्फ इसलिए था क्योंकि हमारी बोगी में दो गुंडे जैसे लड़के थे जो अनुराधा को गन्दी नजर से देख रहे थे| हम ने बीएस मिल के नाटक किया ताकि वो कोई गलत हरकत न करें! मुंबई पहुँचते-पहुँचते हमें देर रात हो गई थी, वहाँ कोई होटल नहीं मिला तो मजबूरन हमें एक कमरे में रात गुजारनी पड़ी वो भी अलग-अलग बिस्तर पर! पिताजी, ताऊ जी आप तो मुझे जानते हैं क्या आपको लगता हैं की मैं कभी किसी की मजबूरी का कोई फायदा उठाऊँगा? या कोई ऐसी हरकत करूँगा? वो आदमी बहुत नीच था और इनसे छुटकारा पाना चाहता था, उसने इन्हें कभी कोई सुख नहीं दिया, पत्नी होने का कोई एहसास नहीं दिलाया और दिलाता भी कैसे उसका खुद बाहर चक्कर चल रहा था!" मैंने घर वालों को सारी सफाई दी|
"कमाल है! अब तक तो सुना था की काजल की कोठरी में कैसो ही सयानो जाय एक लीक काजल की लागे है तो लागे है, पर यहाँ तो सब के दामन दूध के धुले हैं!" रितिका फिर बोली और ये सुनते ही मैं भुनभुना गया और जोर से चिल्लाया; "SHUT THE FUCK UP!" मेरी गर्जन सुन ताऊ जी गुस्से में दहाड़े; "तेरा दिमाग ख़रक़ाब हो गया है? होश में है या नशा कर के आया है? ये लड़की ना हमारी ज़ात की, ऊपर से तलाकशुदा!"
"उम्र में भी बड़ी है!" रितिका फिर चुटकी लेते हुए बोली पर इस बार ताऊ जी ने उसे गुस्से से चुप करा दिया; "मुँह बंद कर अपना!"
क्या ज़ात-पात देख रहे हैं आप ताऊ जी? हमारी कौन से ज़ात वाले ने आज तक मदद की है? जब घर के हालात खराब थे तब किसने आ कर पुछा था?" मैंने ताऊ जी से पुछा| मेरा आत्मविश्वास देख उनका गुस्सा भड़क उठा और वो अपने कमरे में तेजी से घुसे और दिवार पर टंगी दुनाली ले आये| दुनाली का मुँह अनु की तरफ था और हालाँकि अभी तक ताऊ जी ने बन्दूक अनु पर तानी नहीं थी पर मुझे अनु के लिए डर लगने लगा था| इधर अनु भी बहुत घबरा गई थी, मैं तुरंत अनु के आगे आ गया ताकि अगर गोली चले भी तो पहले मुझे लगे अनु को नहीं| घरवाले सब डरे-सहमे खड़े थे, माँ, ताई जी और भाभी रो रही थीं और पिताजी सर झुकाये खड़े थे| वो आज तक अपने बड़े भाई के खिलाफ नहीं गए थे| "ताऊ जी किसे गोली मारेंगे आप? इस लड़की को जिसने मेरी जान बचाई! मर गया होता मैं और आपको तो मेरी लाश देखना भी नसीब नहीं होती अगर ये लड़की ना होती तो!" मैंने कहा पर ताऊ जी पर इसका तर्री भर भी असर नहीं हुआ| वो फिर से गुस्से से चिंघाड़ते हुए बोले; "तुझे शहर जाने देना मेरी सबसे बड़ी
भूल थी, ना तू वहाँ जाता ना इस लड़की की बातों में आता!"
"मैं किसी की बातों में नहीं आया! आपको इस शादी से समस्या क्या है? आपने रितिका की शादी के समय तो कुछ नहीं कहा? वो मंत्री कौन सा हमारी ज़ात का था? उसने तो सारे काम ही गंदे किये थे, कितने लोगों के खून से हाथ रेंज थे उसके! अनु के माँ-बाप तो सीधे-साढ़े पढ़े लिखे लोग हैं!" मैंने कहा|
"वो ऊँची ज़ात का था...." ताऊ जी गुस्से से बोले और उनकी बात पूरी होती उससे पहले ही मैं बोल पड़ा; "तो ये कौन सी किताब में लिखा है की अपने से ऊँची ज़ात में शादी करो पर नीची ज़ात में नहीं! और आपको क्या लगता है की मंत्री ने अपने बेटे की शादी रितिका से क्यों की? अपने बेटे के प्यार के आगे झुक कर और अपना वोट बैंक बढ़ाने के लिए वो आपके घर आया था!" मैंने एकदम सच बात कही जो ताऊ जी को बहुत चुभी और उन्होंने फ़ौरन बन्दूक मेरे ऊपर तान दी! माँ, ताई जी और भाभी सब ताऊ जी से गुहार करते रहे की वो ऐसा ना करें पर ताऊ जी के कान उनकी गुहार नहीं सुन सकते थे! पिताजी भी उन्हें रोकने को दो कदम बढे पर ताऊ जी की आँख में अंगारे देख रुक गए और सर झुका कर खड़े हो गए| इधर मैं और अनु समझ चुके थे की आज के दिन हम दोनों ही आज मार दिए जायेंगे और शायद इसके बारे में किसी को पता भी ना चले! अनु पीछे खड़े रोने लगी थी और उसके रोने की आवाज सुन कर मेरा दिल बहुत दुःख रहा था, मुझे कैसे न कैसे करके अनु को यहाँ से निकालना था| पर मुझे ताऊ जी के सामने अडिग खड़ा देख कर अनु में हिम्मत आ गई और वो पीछे से निकल कर मेरे सामने खड़ी हो गई और बोली; ताऊ जी रुक जाइये! आपको जान लेनी है तो मेरी ले लीजिये, इनकी (मनु की) जान ले कर आप सारी उम्र खुद को माफ़ नहीं कर पाओगे| मैं तो वैसे भी इस घर की नहीं हूँ तो मेरी जान ले कर आपको उतना दुःख नहीं होगा!" मैं ने अनु का हाथ पकड़ लिया और उसे पीछे करने जा रहा था की ताऊ जी बोल पड़े; "मुझे तेरी जान लेने का भी कोई शौक नहीं है! निकल जा इस घर से भी और मानु की जिंदगी से भी!" ये सुनते ही अनु ने अपना हाथ मेरे हाथ से छुड़ा लिया और रोती हुई जाने को पलटी, पर मैंने उसका हाथ एक बार फिर पकड़ लिया; "मर तो मैं वैसे भी जाऊँगा!" मैंने कहा तो अनु एक पल को रुकी और मेरी आँखों में देखते हुए बोली; "मैं यहाँ आपको आपके परिवार के हाथों मरवाने नहीं आई थी, मैं तो यहाँ सब का आशीर्वाद लेने आई थी! पर अगर ताऊ जी नहीं चाहते की ये शादी ना हो तो, मैं बस उनसे आपको माँग सकती हूँ छीन नहीं सकती! अपने परिवार के बिना आप कितना तड़पे हो ये मैंने देखा है और फिर उसी तरह तड़पते हुए नहीं देखना चाहती!" अनु ने रोते हुए कहा| "तो तुम भी मुझे छोड़ दोगी? फिर उसी हाल में जिससे बाहर निकाला था?" अब तो मेरे आँसूँ भी बह निकले थे! "मजबूर हूँ!" अनु ने बिलख कर रोते हुए कहा| मैंने तेजी से अनु को अपने पास खींचा और उसे अपने गले लगा लिया और आँखों में गुस्सा लिए ताऊ
जी को देखा और जोर से चिल्लाया; "मार दो हम दोनों को! और इसी आंगन में गाड़ देना! रोज हमारी कबर पर बैठ कर अपनी इज्जत और शानोशौकत की पीपड़ी बजाते रहना|" इतना कह कर मैं अनु को खुद से समेटे हुए बाहर की तरफ बढ़ने लगा| ताऊजी मेरी गर्जन सुन कर काँप गए थे पर उनका अहम उनके ऊपर हावी था! उन्होंने दुनाली मेरी पीठ पर तान दी, सेफ्टी लॉक खोला और ट्रिगर दबाया......... धाँय!!! गोली चली और छत पर जा लगी| पिताजी ने आगे बढ़ कर ताऊ जी की बन्दूक की नाली छत की तरफ कर दी थी जिससे गोली छत में जा घुसी! मैं और अनु एक दम से रुक गए, अनु को लगा की वो गोली मेरे जिस्म में घुसी है और उसके प्राण सूख गए, पर जब उसने मुझे ठीक ठाक देखा तो उसकी जान में जान आई| इधर रितिका को देख कर ऐसा लग रहा था जैसे उसे उसके हिस्से की ख़ुशी लगभग मिल ही गई हो!
हम दोनों पलटे और देखा की पिताजी जीवन में पहलीबार अपने बड़े भाई की आँखों में आँखें डाल कर देख रहे हैं और तेजी से सांस ले रहे हैं|
"ये आप क्या करने वाले थे भाईसाहब? मेरे बेटे पर गोली चलाई आपने? मेरे बेटे पर?" इतना कहते हुए पिताजी ने झटके से उनके हाथ से बन्दूक छीन ली और दूर फेंक दी| "रुक जा मानु, तू कहीं नहीं जाएगा! आजतक मैने हर वो काम किया है जो इन्होने (ताऊ जी ने) कहा, चाहे सही या गलत अपने बड़े भाई का हुक्म समझ मैं वही करता आया| इन्होने उस दिन कहा की मानु को घर से निकाल दे तो मैंने वो भी किया पर आज इन्होने तुझ पर बन्दूक तान दी और गोली चलाई, ये मैं नहीं सहन करूँगा!" पिताजी बोले और ताऊ जी बस पिताजी को घूरते रहे| इधर मेरी माँ भाभी का सहारा ले कर आगे बढ़ी और ताऊ जी से बोली; "ब्याह के बाद मैंने आपको और दीदी को अपने माँ-बाप माना और आप दोनों ने भी मुझे बेटी की तरह प्यार दिया| बेटे को खो देने का गम मैं जानती हूँ, भले ही पिछली बार मैं कुछ बोल नहीं पाई पर मानु की कमी मुझे हमेशा खलती थी! आप भी तो जानते हो की बेटा जब घर नहीं होता तो घर का क्या ख्याल होता है? चन्दर जब अस्पताल में था तब आप ने दीदी की हालत देखि थी ना? मुझ में अब अपने बेटे को दुबारा खोने की ताक़त नहीं है, आजतक मैंने आपसे कुछ नहीं माँगा.....आज पहली और आखरी बार माँगती हूँ...
" माँ ने अपना आँचल ताऊ जी के सामने फैला दिया और बोलीं; मेरी झोली में मेरे बेटे का प्यार डाल दो, उसे इसी लड़की से शादी करने दीजिये!" माँ की हिम्मत देख ताई जी और भाभी भी माँ के साथ खड़े हो गये| "मानु की हालत देखि थी न उस दिन? क्या करेंगे हम जी कर हमारे बच्चे ही खुश नहीं हैं तो?" ताई जी रोती हुई बोलीं| "पिताजी मानु भैया अब बच्चे नहीं हैं, सोच समझ कर फैसला लेते हैं! आप ने कितनी बड़ाई की है मानु की और आज आप गुस्से में कैसी अनहोनी करने जा रहे थे?" चन्दर भैया बोले| भाभी कुछ बोल ना पाइन क्योंकि वो ताऊ जी से बहुत डरती थीं इसलिए उन्होंने केवल ताऊ जी के आगे हाथ जोड़ दिए| घर के सारे लोग मेरी तरफ आ चुके थे, खुद को यूँ अकेला देख ताऊ जी की आँखें झुक गई| उन्हें एहसास हुआ की उनका झूठा घमंड लगभग हमारे परिवार का अंत कर देता| ताऊ जी आँखों से पछतावे के आँसूँ बह निकले, उन्होंने अपनी बाहें खोल कर मुझे और अनु को अपने पास बुलाया| हम दोनों जा कर ताऊ जी के गले लग गए और ताऊ जी ने हम दोनों के सर चूमे और बोले; "मुझे माफ़ कर दो मेरे बच्चों! मैं गुस्से से अँधा हो चूका था! तुम सब ने आज मेरी आंखें खोल दीं! तुम दोनों की शादी बड़े धूम धाम से होगी और तुम दोनों को वो हर एक ख़ुशी मिलेगी जो मिलनी चाहिए| इतना कहते हुए ताऊ जी पिताजी के पास गए और उनके सामने हाथ जोड़े| पिताजी ने एक दम से ताऊ जी के दोनों हाथ पकड़ लिए और उनके गले लग गए और बोले; "नहीं भैया ...मैं आपसे छोटा हूँ...आज जो जुर्रत की उसके लिए माफ़ कर देना!" पिताजी रोते हुए बोले; "नहीं बेटा...तूने आज मेरी आँखें खोल दी!" ताऊ जी रोते हुए बोले| फिर ताऊ जी ने भाभी से कहा की वो नेहा को ले कर आएं और जैसे ही भाभी सीढ़ी की तरफ गईं रितिका उनके सामने खड़ी हो गई और उनका रास्ता रोक लिया| भाभी कुछ बोलती उससे पहले ही ताऊ जी तेजी से रितिका के पास पहुंचे और एक जोरदार थप्पड़ उसे मारा; "आग लगाने आई थी तू यहाँ? मंथरा!!!! जा बहु ले कर नेहा को!" रितिका डरी-सहमी सी एक कोने में खड़ी हो गई! जैसे ही भाभी ने ऊपर जा कर रितिका के कमरे का दरवाजा खोला की उन्हें नेहा के रोने की आवाज सुनाई दी! गोली की आवाज से नेहा जाग गई थी और जोर-जोर से रो रही थी! मैंने जैसे ही ये आवाज सुनी मैं तुरंत ऊपर दौड़ता हुआ पहुँचा| भाभी अभी नेहा को गोद में उठाने ही वाली थीं की मैंने उसे उनसे पहले उठा लिया और उसे एक दम से अपनी छाती से चिपका लिया| "मेरा बच्चा......
!!!" इतना ही कह पाया| आज कई दीं बाद एक पिता को उसकी बेटी मिली थी और अंदर से आँसूँ बह निकले| जब मैं नीचे आया तो ताऊ जी रितिका को डाँट रहे थे; "कैसी माँ है तू? अपनी नन्ही सी बेटी को कमरे में बंद रखती है? जा बुला ले जिस मर्जी कोतवाल को में देखता हूँ की क्या करता है!" ताऊ जी ये कहते हुए मेरी माँ के सामने आये और हाथ जोड़ते हुए बोले; "मुझे माफ़ कर दे बहु! मैं तेरा कसूरवार हूँ, तुझे तेरे बच्चे से दूर करने का पाप किया है मैंने!"
"भाईसाहब जो हुआ सो हुआ, अब बस इस घर में फिर से खुशियां गूंजने लगे मैं बस यही चाहती हूँ!" माँ बोली| तब तक मैं नेहा को ले कर नीचे आ गया था और मेरी गोद में आते ही नेहा का रोना बंद हो गया था और उसकी किलकारियाँ शुरू हो गईं थी| "देख रहे हो आप (ताऊ जी), आज दो दिन बाद इस घर में नेहा की किलकारियाँ गूँज रही हैं? तेरे जाने के बाद मानु ये एकदम से गुमसुम हो गई थी!" ताई जी बोलीं| मैंने नेहा के माथो को चूमा तो उसने एकदम से मेरी ऊँगली पकड़ ली और उसकी किलकारी की आवाज पूरे घर में गूंजने लगी| अनु हसरत भरी आँखों से मुझे नेहा से प्यार करते हुए देख रही थी, जब मेरा ध्यान अनु पर गया तो मैंने उसे नेहा को दिया| नेहा को गोद में लेते ही अनु को उसकी ममता का एहसास जीवन में पहली बार हुआ| उसकी आँखें एक दम से भर आईं और उसने नेहा को अपनी छाती से लगा लिया| जहाँ मैं ये देख कर अंदर ही अंदर ख़ुशी से फूला नहीं समा रहा था वहीँ दूसरी तरफ रितिका जलक के राख हो चुकी थी| उसकी नफरत उसके चेहरे से दिख रही थी पर वो ताऊ जी के डर के मारे कुछ नहीं कर पा रही थी| वो गुस्से में पाँव पटकते हुए ऊपर अपने कमरे में चली गई| इधर अनु नेहा को अपनी छाती से लगाए हुए माँ और ताई जी के पास बैठ गई| वहीँ ताऊजी, पिताजी और चन्दर भय ने मुझे अपने पास बिठा लिया| फिर जो बातें शुरू हुईं तो मैंने घरवालों को सब कुछ बता दिया| अब जाहिर था की ताऊजी ने अनु के घरवालों से मिलने की ख्वाइश प्रकट करनी थी| मुझे उसी वक़्त कहा गया की परसों ही सब को मिलने बुलाओ और चूँकि आज शाम होने को है तो कल मैं अनु को सुबह छोड़ने जाऊँ| मैंने फ़ोन मिलाया और ताऊ जी ने बात करने के लिए मुझसे फ़ोन लिया| उन्होंने बड़े प्यार से डैडी जी से बात की और उन्हें परसों आने का न्योता दिया, साथ ही ये भी कह दिया की अभी समय बहुत हो गया है तो आज 'अनुराधा बिटिया' यहीं रुकेगी और कल मानु आपके पास छोड़ आएगा| चाय बनने लगी तो अनु ने भाभी की मदद करनी चाही पर भाभी मजाक करने से बाज नहीं आईं और बोलीं; "अरे पहले शादी तो कर लो! उसके बाद ये सब तुम्हें ही करना है!" ये सुन कर सारे लोग हँस पड़े और घर में हँसी का माहौल बन गया| कोई अगर दुखी था तो वो थी रितिका जो ऊपर अपने कमरे में बैठी जल-भून रही थी! माँ और ताई जी ने अनु से बहुत से सवाल पूछे और मेरी बताई गई बातों को verify किया गया, तथा मेरी बचकानी हरकतों के
बारे में भी अनु को आगाह किया गया| कुल मिला कर कहें तो आज हमारे घर में खुशियाँ लौट आईं थी!
हम दोनों ही बहुत खुश थे और हमारी ख़ुशी दुगनी हो गई थी नेहा को पा कर...... पर हम छह कर भी नेहा को माँ-बाप वाला प्यार नहीं दे सकते थे क्योंकि नेहा की माँ यानी रितिका ये कभी नहीं होने देती!
update 75
रात का खाना बनने तक मैं नेहा को अपनी छाती से चपकाये रहा और घर के सब मर्दों के बीच रह कर बातें करता रहा| चूँकि ये घर के एकलौते कुंवारे लड़के की शादी थी और वो भी परिवार की आखरी शादी तो सब के मन में उत्साह भरा हुआ था| रितिका की दूसरी शादी की तरफ किसी ने तवज्जो नहीं दी थी क्योंकि अब घर वालों को रितिका के पागलपन से पीछा छुड़ाना था| ताऊ जी ने पूरे घर का रंग-रोगन का काम चन्दर भैया को सौंप दिया, और परसों के दिन जो अनु के मम्मी-डैडी का स्वागत होना था उसकी जिम्मेदारी उन्होंने पिताजी और अपने सर ले ली थी| "बेटा एक बात तो बता?" पिताजी थोड़ा हिचकते हुए बोले| "हाँ जी बोलिये?" मैंने नेहा से अपना ध्यान उनकी तरफ करते हुए कहा| "बेटा....तू हमारा रहन-सहन तो जानता है| अब बहु के घरवाले वो क्या सोचेंगे? क्या उन्हें ये रंग-ढंग जमेगा? मेरा मतलब ....वो ठहरे शहर में रहने वाले और हम ठहरे देहाती!" पिताजी बोले और ताऊ जी ने उनकी बात का समर्थन करते हुए हाँ में गर्दन हिलाई| "ताऊ जी, पिताजी वो लोग बस आपका अपनी बेटी के लिए प्यार देखना चाहते हैं| बाकी उन्हें हमारे रहन-सहन से कोई परेशान नहीं होगी| वो लोग जमीन से जुड़े लोग हैं और किसी भी तरह का कोई दिखावा नहीं करते|" मैंने सब सच ही कहा था, क्योंकि जितने भी दिन मैं वहां रहा था उतने दिन मुझे मम्मी-डैडी के बर्ताव में कोई भेदभाव या घमंड नजर नहीं आया था|
उधर माँ ने अनु को अपने साथ बिठा रखा था और उससे उसकी पसंद-नापसंद पूछी जा रही थी| जो सवाल मुझसे यहाँ पुछा गया था वही सवाल अनु से माँ ने पुछा| मेरे माँ-बाप खुद को अनु के मम्मी-डैडी के सामने कम आंक रहे थे| "माँ कोई अंतर् नहीं है? बस बुलाने का फर्क है, मैं मम्मी-डैडी कहती हूँ और 'ये' (अर्थात मैं) माँ-पिताजी कहते हैं!" अनु ने माँ के सवाल का जवाब देते हुए कहा| पर भाभी को अनु की टांग खींचने का मौका फिर से मिल गया; "ये? भला 'ये' कौन है?" भाभी ने थोड़ा जोर से कहा ताकि मैं भी सुन लूँ| "भाभी नाम नहीं ले सकती ना इसलिए!" अनु ने शर्माते हुए कहा| अनु का जवाब सुन सभी हँस पड़े| "बहु तू ज्यादा टाँग न खींच!" ताई जी प्यार से भाभी को डाँटा| "माँ एक बात बताओ, जब देवर भाभी का रिश्ता हंसी-मजाक का हो सकता है तो देवरानी और भाभी का रिश्ता ऐसा क्यों नहीं हो सकता?" भाभी ने पुछा तो अनु बोल पड़ी; "बिलकुल भाभी!" अनु का जवाब सुन माँ ने अनु के सर पर हाथ फेरा|
यहाँ ये हँसी मजाक चल रहा था और वहाँ ये हँसी-मजाक रितिका के दर्द का सबब बन चूका था| जब रितिका मानु के साथ थी तब भी उसे
अनु से चिढ होती थी और अब तो मानु उससे शादी कर रहा है तो उसका जल भून कर राख होना तय था! मानु को चाचा कहने में उसे मौत आती थी और अनु को चाची कहने के बारे में वो सोच भी नहीं सकती थी! वो बेसब्री से इससे बाहर निकलने का रास्ता ढूंढने लगी, पर उसके लिए अब सारे दरवाजे बंद हो चके थे! जिस दर्द से मानु ने विदेश जाने के बहाने खुद को बचा लिया था अब वही दुःख रितिका को अपने आगोश में लेने को मचल रहा था! वो तो आत्महत्या भी नहीं कर सकती थी, क्योंकि ऐसा करने से मानु और अनु नेहा को अपना लेते और मरने के बाद भी रितिका को शान्ति नहीं मिलती! वो तो बस यही चाहती थी की मानु भी उसी की तरह आग में जले, तड़पे और मर जाए! जहाँ एक तरफ नीचे सारा परिवार नई खुशियों के साथ नई उमंग में मानु और अनु के लिए नई जिंदगी की दुआ कर रहा था, वहीँ ऊपर बैठी रितिका बस मानु की मनोकामना कर रही थी| "मुझसे तो तूने सब कुछ छीन लिया? कम से कम मेरे दुश्मन को तो चैन से मत रहने दे? कुछ दिन पहले ही मैंने उसे इतना तड़पाया था और जो सुकून मुझे मिला उसे तो मैं ब्यान भी नहीं कर सकती| आज भी वो मौत के इतने करीब था पर तूने उसे मरने नहीं दिया! क्या बिगाड़ा है मैंने तेरा?" रोती बिलखती रितिका भगवान् से मानु की मौत माँग रही थी| "बस एक मौका मिल जाए और मैं खुद इस आदमी को तेरे पास भेज दूँगी! कम्भख्त पैसे भी नहीं मेरे पास वरना इसे मरवा देती!" रितिका ने अपनी किस्मत को कोसते हुए कहा|
इधर इस सब से बेखबर मैं अपनी और अनु की शादी को ले कर खुश था और अब तो मेरे पास नेहा भी थी! मैं जानता था की अब रितिका में इतनी हिम्मत नहीं की वो ताऊ जी के सामने कुछ बोलने की हिम्मत करे, वरना ताऊ जी की दुनाली में अभी भी एक गोली loaded थी और उन्हें वो रितिका को आशीर्वाद स्वरुप देने में जरा भी हिचक नहीं होती! खेर रात का खाना हुआ और आज बरसों बाद सब ने एक साथ बैठ कर खाया| माँ, ताई जी और भाभी ने मिलकर अनु को इतना खिलाया जितना उसने आज तक नहीं खाया था| रितिका अपना खाना ले कर राजसी में बैठी थी और सब को इस तरह अनु को प्यार देते देख जलन से मरी जा रही थी पर बेबस थी और कुछ कह नहीं सकती| खाने के बाद उसने नेहा को दूध पिलाया और नेहा को ले कर ऊपर जाने लगी तो ताई जी ने उसे रोका और नीचे ही सब के साथ सोने को कहा पर वो अपनी अकड़ी गर्दन ले कर ऊपर जाने लगी| "नेहा को दे यहाँ!" ताई जी ने उससे रूखे स्वर में कहा तो ताऊ जी के डर के मारे उसने बेमन से नेहा को ताई जी को दे दिया| सब जानते थे की रितिका का दिमाग सनका हुआ और वो गुस्से में कहीं नेहा के साथ कुछ गलत ना करे| ताई जी ने नेहा को मेरी गोदी में दिया और मैं उसे ले कर ताऊ जी वाले कमरे में अंगीठी के सामने बैठ गया| वहाँ अभी भी मेरी शादी की बातें हो रही थीं और शादी के लिए मेरे कमरे में खरीदारी करने की चर्चा चल रही थी|
इधर अनु के मन में नेहा के लिए
प्यार उमड़ पड़ा था| इन कुछ घंटों में ही उसका मन नेहा ने मोह लिया था; "माँ.... आज नेहा को मैं अपने साथ सुला लूँ?"
"बेटी कोशिश कर ले! ना तो मानु नेहा को गोद से उतारेगा और ना ही नेहा उसकी गोद से उतरेगी! दोनों में बिलकुल बाप-बेटी वाला प्यार है!" माँ ने मुस्कुराते हुए कहा| पर अनु कहाँ हार मानने वाली थी, वो माँ के कमरे से बाहर आई पर उसकी हिम्मत नहीं हुई ताऊ जी कमरे में घुसने की, क्योंकि वहाँ सब मर्द बैठे थे और ताऊ जी और पिताजी से उसकी शर्म उसे अंदर नहीं आने दे रही थी| वो कमरे के बाहर ही चक्कर लगाने लगी, तभी भाभी ने बाहर से मुझे आवाज दी और मैं उठ कर कमरे के बाहर आया| अनु ने पहले भाभी को देखा और थैंक यू कहा और फिर मेरी तरफ देखते हुए बोली; "आज मुझे भी मेरी बेटी के साथ सोने दो?" अनु की बात सुन कर मैं मंत्र-मुग्ध सा उसे देखने लगा| इतनी जल्दी अनु ने नेहा को अपना लिया था इसकी कल्पना भी मैंने नहीं की थी! मैंने एक बार नेहा के मस्तक को चूमा और उसे अनु की तरफ बढ़ा दिया, पर नेहा के नन्हे हाथों ने मेरी कमीज पकड़ ली थी| मैंने धीरे से उसके कान में खुसफुसाते हुए कहा; "बेटा आज रात आपको मम्मी के पास सोना है!" मेरा इतना कहाँ था की नेहा ने मेरी कमीज छोड़ दी और अनु ने उसे अपनी छाती से लगा लिया| अनु की आँखें बंद हो गईं, ऐसा लगा जैसे उसके जलते माँ के कलेजे को सुकून मिल गई हो| मेरी आँखें अनु के चेहरे पर टिकी थीं और मैं उस सुकून को महसूस कर पा रहा था| जब अनु ने आँखें खोली और मुझे खुद को देखते हुए पाया तो शर्म से उसके गाल लाल हो गये| उसने मुस्कुरा कर मुझे थैंक यू कहा और माँ के कमरे में चली गई| मैं मुस्कुराता हुआ वापस ताऊ जी के कमरे में आ गया और उधर जैसे ही माँ ने अनु की गोद में नेहा को देखा वो बोल पड़ीं; "लो भाई! आज पहलीबार मानु ने किसी को नेहा की जिम्मेदारी दी है वरना रात को तो नेहा उसी के पास सोती थी|" ये सुन कर अनु को खुद पर गर्व होने लगा! रात को सोने का इंतजाम कुछ ऐसा था की माँ के कमरे में साड़ी औरतें सोने वाली थीं और ताऊ जी के कमरे में सारे मर्द| मेरा बिस्तर आज ताऊ जी और पिताजी के बीच था, देर रात तक हमारी बातें चलती रहीं| अगली सुबह सब जल्दी उठे, अनु भी आज सब के साथ उठी और नेहा को ले कर मेरे पास आई जो रो रही थी| "मेरा बच्चा क्यों रो रहा है?" उस समय मैं अकेला ताऊ जी के कमरे में बिस्तर ठीक कर रहा था और मौके का फायदा उठाते हुए मैंने अनु का हाथ पकड़ लिया; "आप कहाँ जा रहे हो? नेहा बेटा आपने मम्मी को तंग तो नहीं किया?" मैंने कहा|
"रात में तो बड़े आराम से सोई पर सुबह उठते ही रोने लगी!" अनु बोली और मेरे थोड़ा नजदीक आ गई| हम दोनों की नजरें बस एक दूसरे पर टिकी थीं; "वो क्या है ना सुबह होते ही नेहा को पापा की गुड मॉर्निंग वाली kissi चाहिए होती है!" मैंने कहा|
"अच्छा? और नेहा के पापा को मेरी गुड मॉर्निंग वाली kissi नहीं चाहिए
होती?" अनु ने शर्माते हुए मुझे उस दिन वाली kissi याद दिलाई!
"चाहिए तो होती है.....पर .....!!!" मैं आगे कुछ कह पाता उससे पहले ही भाभी आ गईं जो बाहर से हमारी बातें सुन रही थीं|
"हाय राम! तुम दोनों तो बड़े बेशर्म हो? शादी से पहले ही किस्सियाँ कर रहे हो? रुको अभी बताती हूँ सबको!" भाभी बोलीं और बाहर जाने लगीं की अनु ने उनका हाथ पकड़ लिया; "नहीं भाभी प्लीज!!!" अनु घबरा गई थी और ये देख कर भाभी हँस पड़ी तब जा कर अनु को पता चला की वो बस उसकी टाँग खींच रही हैं! "अच्छा सच्ची-सच्ची बता तुझे kissi चाहिए?" भाभी ने मुझसे पुछा और ये सुन कर मेरे गाल लाल हो गए और गर्दन झुक गई| "समझ गई! चलो अब भाभी हूँ तो कुछ तो करना पड़ेगा! हम्म्म्म...." ये कहते हुए भाभी कुछ सोचने लगी| "रहने दो भाभी! अभी इन्हें मुझे छोड़ने भी तो जाना है|" अनु ने कहा|
"हाय राम! तो तुम दोनों क्या बाहर खुले में सबके सामने....... लाज नहीं आती तुम्हें!" भाभी मुँह पर हाथ रखते हुए बोलीं|
"नहीं नहीं भाभी... क्या बात कर रहे हो?" मैंने अनु का बचाव किया तब जा कर अनु को एहसास हुआ की वो क्या बोल गई थी!
"भाभी मेरा मतलब था की हम अभी थोड़ी देर में निकलने वाले हैं!" अनु ने बात संभालनी चाही|
"अरे रहने दे! तू मुझे उल्लू समझती है!" भाभी ने अनु की पीठ पर प्यार से थपकी मारते हुए कहा|
"सच भाभी आपकी कसम हमने आजतक वैसा कुछ नहीं किया.... बस कुछ दिन पहले से ही ये 'kissi' शुरू हुई है|" मैंने कहा| भाभी जानती थी की मैं कभी झूठी कसम नहीं खाता था इसलिए उन्होंने अनु की टाँग और नहीं खींची| तभी बाहर से ताई जी की आवाज आई; 'अरे तुम तीनों अंदर कौन सी खिचड़ी पका रहे हो?" उनकी बात सुन कर हम सब बाहर आये और भाभी बोलीं; "माँ मैं तो नजर रख रही थी की ये दोनों क्या बातें कर रहे हैं!" भाभी बोलीं और खिलखिला कर हँस पड़ी और इधर हम दोनों के गाल लाल हो गए|
नाश्ता कर के हम निकलने लगे तो ताऊ जी बोले; "वहाँ पहुँच कर हमें कॉल करना और कल निकलने से पहले भी कॉल करना|" अनु ने सब के पाँव छुए और हम दोनों मुस्कुराते हुए घर से निकले| जहाँ कल आते हुए हमारे प्राण सूख रहे थे की नजाने क्या होगा वहीँ आज हम इतने खुश थे की उसे व्यक्त करने के लिए हम ने एक दूसरे का हाथ थाम लिया| बस स्टैंड पहुंचे तो अनु ने बात शुरू की;
अनु: तो घर पर क्या बोलना है?
मैं: जो हुआ वो सब बताना है|
अनु: पर इतनी डिटेल की क्या जर्रूरत है? हम बस इतना कह देते हैं की सब राज़ी हैं| वैसे भी माँ का कल शाम को फ़ोन आया था और मैंने उन्हें बता दिया था की यहाँ सब शादी के लिए राज़ी हैं और हम कल आ रहे हैं|
मैं: बेबी बात को समझो! कल को ये बात अगर सामने आई तो पता नहीं डैडी जी कैसे रियेक्ट कर्नेगे! फिर वो चुड़ैल (रितिका) भी है जो इस बात को मिर्च-मसाला लगा कर कहेगी!
अनु: ये सुन कर डैडी डर जायेंगे और फिर उन्होंने शादी के लिए मना कर दिया तो?
मैं: कुछ नहीं होगा....
मैं उन्हें समझा दूँगा|
अनु को मुझ पर तो विश्वास था पर वो अपने डैडी को भी जानती थी, इसीलिए वो मना कर रही थी|
पर एक बात थी जो सब से छिप्पी थी, वो थी मेरा और रितिका का रिश्ता जो अगर सबके सामने आता तो सब कुछ तहस-नहस हो जाता| बस आई और हम दोनों बैठ गए, मेरे मन में जो बात चल रही थी उससे मेरी शक्ल पर बारह बज रहे थे|
अनु: क्या सोच रहे हो?
मैं: यही की क्या हमारे घरवालों को सब कुछ पता होना नहीं चाहिए?
अनु: सब कुछ.....नहीं! थोड़ा बहुत...हाँ! आप जब गाँव आये हुए थे तब मम्मी ने मुझसे आपके पास्ट के बारे में पुछा था| तो मैंने बता दिया पर रितिका का नाम और आपसे रिश्ता नहीं! इतना ही उनके लिए जानना काफी है, इससे ज्यादा कुछ भी बताना मतलब सब कुछ खत्म कर देना और मुझ में आपको खोने की ताक़त नहीं है| ना तो मैं उन्हें कुछ बताऊँगी और ना ही आपको बताने दूँगी!
मैं: पर क्या ये सही है?
अनु: सही है...बिलकुल सही है| सच मुझे जानना जर्रूरी था उन्हें नहीं, जिंदगी हमें साथ बितानी है उन्हें नहीं! जो बात दबी है उसे दबी रहने दो!
अनु ने मुझे आगे कुछ कहने नहीं दिया पर वो भूल रही थी की दुनिया में और भी लोग हैं जो मेरे और रितिका के रिश्ते के बारे में सब जानते हैं| अब चूँकि हमारा (मेरा और अनु का) रिश्ता सब के सामने आ रहा था तो ऐसे में रितिका और मेरे रिश्ते को ले कर कीचड उछलना स्वाभाविक था|
पर अभी के लिए हम दोनों अपने आँखों में शादी के सपने लिए बस के झटके खाते हुए घर पहुँचे| वहाँ मैंने डैडी जी को साड़ी बात बताई और सब सुन कर उन्हें ख़ुशी तो हुई पर साथ ही उन्हें चिंता भी हुई! ख़ुशी का कारन हमारी शादी के लिए मेरे घर वालों का मान जाना था और चिंता मेरे ताऊ जी का गुस्सैल स्वभाव था! "डैडी जी आप को घबराने की कोई जर्रूरत नहीं है, जो होना था वो स्वाभविक था| उसके पीछे का कारन है हमारे ही गाँव और मेरे ही घर में घाटी एक घटना|" फिर मैंने उन्हें भाभी वाले काण्ड की सारी बात बता दी; "अब उनकी जगह आप होते तो आप भी शायद नाराज होते| पर अब ताऊ जी का दिल साफ़ है| उन्होंने अनु को हमारे घर की बहु के रूप में स्वीकार लिया है| मेरी माँ तो अनु से मुझसे भी ज्यादा प्रेम करती है और सिर्फ वे ही नहीं बल्कि घर के सब लोग अनु से बहुत प्यार करते हैं!" मैंने कहा और फिर अनु ने उन्हें मेरी माँ से हुई सारी बातें बताईं, तब जा कर उनके दिल को सुकून मिला| "डैडी जी मैं आप से वादा करता हूँ की अनु हमेशा खुश रहेगी और मैं उस पर कोई आंच नहीं आने दूँगा!" मेरी बात सुन कर डैडी जी की चिंता दूर हुई और उन्होंने मुझे अपने गले लगा लिया| डैडी जी से बात होने के बाद मैंने घर फ़ोन कर के कल आने का समय बता दिया और ये सुनते ही मेरे घर में तैयारियाँ शुरू हो चुकी थीं| तम्बू-कनात वालों को बुला लिया गया, घर में कालीन बिछ गया, रसोइयों को ख़ास पकवानों की फरमाइश कर दी गई, घर पर
लाइटें लग गईं, छत पर और आंगन की क्यारियों में नए-नए पौधे लगा दिए गए| बैठने-उठने के लिए कुर्सियाँ-टेबल साफ़ करा दिए गए, घर के सारे कमरों की सफाई ढंग से हुई और सब कुछ सजा-धजा के रखा गया| पेंट नहीं हो पाया क्योंकि समय नहीं था पर घर इतना चमक गया था की पेंट ना होने पर किसी का ध्यान ही ना जाये| वहाँ बस हमारा इंतजार हो रहा था|
इधर मैं, अनु और मम्मी-डैडी निकले, बस की जगह हमने डैडी जी की गाडी ही ली| ड्राइविंग सीट पर मैं था और मेरे साथ डैडी जी थे, पीछे मम्मी जी और अनु बैठे थे| पूरे रास्ते हम सब बस बातें करते रहे, इधर हर एक घंटे में मेरे घर से फ़ोन आ रहा था| वो तो फ़ोन अनु के पास था जो पिताजी को हमारी एक्सएक्ट लोकेशन बता रही थी| मैंने गाडी सीधा अपने घर के बाहर रोकी और इधर मेरे सारे घर वाले स्वागत करने के लिए बाहर खड़े हो गए| मैंने सब का परिचय करवाया और वहीँ खड़े-खड़े सब ने एक दूसरे को गले लगाना और आशीर्वाद देना शुरू कर दिया| आस-पड़ोस वाले जो इतनी तैयारी देख कर हैरान थे वो ये मिलनी का सीन देख के समझ गए थे की यहाँ मेरे रिश्ते की बात चल रही है| फिर सब अंदर आये और आंगन में बैठ गए और बातों का सिलसिला शुरू हुआ| दाद्दी जी और ताऊ जी ने एक दूसरे से कोई बात नहीं छुपाई और दोनों परिवार एक दूसरे की गलतियों और खामियों को समझ चुके थे| जहाँ एक तरफ डैडी जी ने अपनी गलती मानी की उन्होंने अनु के साथ ज्यादती करते हुए उसे घर से निकाल दिया वहीँ मेरे पाटजी ने मेरा अमरीका जाने पर मुझे घर से निकालने की बात कबूली|
डैडी जी ने मेरी बड़ाई करनी शुरू की; "भाईसाहब आपका लड़का सच में हीरा है, पहली नजर में ही हमारे दिल में घर कर गया| जिस तरह से इसने अनु को हम से फिर से मिलाया वो काबिले तारीफ है!" ये सुन कर मेरे ताऊ जी भी अनु की बधाई करने से नहीं चूके; "भाईसाहब इसका सारा श्रेय सिर्फ अनुराधा बेटी को ही जाता है| जिस तरह उसने मानु को संभाला वो भी तब जब हम उसके पास नहीं थे....
मेरे पास तो उसे धन्यवाद देने के लिए शब्द नहीं हैं! बल्कि मैं तो उसका कसूरवार हूँ!" ताऊ जी ने अनु के आगे हाथ जोड़े तो अनु ने फ़ौरन उठ कर उनके हाथ पकड़ लिए; "ताऊ जी कोई कसूरवार नहीं हैं आप! क्या बड़ों को बच्चों को डांटने या मारने का हक़ नहीं होता?" अनु को ताऊ जी की हिमायत करते देख ताई जी संग सभी की आँखें नम हो गईं, अब मुझे सब का मूड ठीक करना था सो मैं उठ कर ऊपर गया तो देखा रितिका छत पर अकेली बैठी है और अपना सर परपेट वॉल से टकरा रही है| नीचे मिलनी होने के बाद वो ऊपर आ गई थी, पर मैं यहाँ उसे नहीं बल्कि अपनी बेटी को लेने आया था| मैंने नेहा को गोद में उठाया जो अकेली कमरे में लेटी छत की ओर देख कर अपने हाथ-पाँव हिला रहे थी| मुझे ऐसा लगा जैसे वो मुझसे शिकायत कर रही हो की पापा आप मुझे बहूल गए| मैंने तुरंत उसे अपनी गोद में उठाया ओर उससे बोला; "मेरा बच्चा! मैं आपको नहीं भूला, चलो आपको सब से मिलवाता हूँ|" मैं फटाफट नेहा को ले कर नीचे उतरा और उसे मम्मी-डैडी से मिलवाया; "ये है हमारे घर की सबसे छोटी ओर प्यारी सदस्य, नेहा!" उसे देखते ही मम्मी-डैडी ने उसे बड़ा प्यार दिया और फिर पूरे घर का माहौल वापस से खुशनुमा हो गया|
शादी की तारीक तो पहले से ही तय थी 23 फरवरी तो घर में सब के पास काफी समय था तैयारी के लिए| जैसे ही डैडी जी ने दहेज़ की बात राखी तो ताऊ जी ने इस बात को सिरे से नकार दिया; "भाईसाहब ऐसी गुणवान बहु के इलावा हमें और कुछ नहीं चाहिए!" ये सुन कर तो मैं भी हैरान था, क्योंकि गाँव-देहात में आज भी ये प्रथा चलती है और गाँव क्या शहर में भी यही प्रथा चल रही है| बाद में जब मैं ताऊजी से इसका कारन पुछा तो वो बोले; "बेटा मैंने तेरा और अनुराधा का प्यार देखा है और इसके चलते मैं या हमारे परिवार से कोई भी ऐसी कोई हरकत नहीं करेगा जिससे इस शादी में कोई बाधा आये| फिर हमें दहेज़ की क्या जर्रूरत है? तेरे और बहु के लिए सारी तैयारी मैं कर रहा हूँ, तू बस देखता जा!" ताऊ जी ने इतने गर्व से कहा की मैं उनके गले लग गया| खेर खाने का समय हुआ और फिर इतने मजेदार पकवान परोसे गए की क्या कहूँ! खाने के बाद ताऊ जी डैडी जी के साथ सब को हमारी जमीन दिखाने निकले और रास्ते में जो कोई भी मिला उससे डैडी जी का तार्रुफ़ अपने समधी के रूप में करवाया| सब कुछ देख कर हम सब ऊपर छत पर बैठे, शाम की चाय भी सब ने ऊपर पी| इस दौरान रितिका अपने कमरे में छुपी रही और इन खुशियों से जलती रही! इधर पिताजी ने एक अलाव ऊपर जलवाया और सब उसके इर्द-गिर्द बैठ गए| हँसी-मजाक हुआ और फिर डैडी जी ने मँगनी करने की बात की| हमारे गांव में ऐसी कोई रस्म नहीं थी, इसकी जगह हम 'बरेछा' की रस्म करते हैं| इस रस्म में दुल्हन के घर वाले दूल्हे का तिलक कर उसे कुछ उपहार देते हैं और इसी के साथ शादी की बात पक्की मानी जाती है| मुझे लगा की ताऊ जी मना कर देंगे पर पिताजी और ताऊ
जी दोनों ही इस बात के लिए तैयार हो गए और चन्दर भैया से पंडित जी को बुलाने को कहा| पंडित जी अपनी पोथी-पटरी ले कर आये और गुना-भाग कर 10 दिन बाद का मुहुरत निकाल दिया|
update 76
मुहूरत निकला तो सब को फिर से मुँह मीठा करने का मौका मिल गया| ताऊ जी ने रसोइये को गर्म-गर्म जलेबियाँ लाने को कहा| फटाफट गर्म-गर्म जलेबियाँ आईं और ठंडी की शाम में, अलाव के सामने बैठ के सब ने जलेबियाँ खाईं! 7 बजते-बजते ठण्ड प्रचंड हो गई इसलिए सब नीचे आ गए और नीचे बरामदे में बैठ गए| रसोइयों ने खाना बनाना शुरू कर दिया था जिसके खुशबु सब को मंत्र-मुग्ध किये हुए थी| मैं यहाँ सब मर्दों के साथ बैठा था और अनु वहाँ सब औरतों के साथ| नेहा मेरी गोद में थी और अपनी पयाली-प्याली आँखों से मुझे देख रही थी| अब अनु जब से आई थी तब से उसने नेहा को गोद में नहीं लिया था और उसकी ममता अब रह-रह कर टीस मारने लगी थी| आखिर वो भाभी को ले कर कमरे से बाहर निकली और उस कमरे की तरफ देखने लगी जहाँ मैं सब के साथ बैठा था| भाभी चुटकी लेने से बाज़ नहीं आईं और बोलीं; "बेकरारी का आलम तो देखो?" ये सुन कर दोनों खी-खी करके हँसने लगी| इधर कल सुबह जाने की बात हो रही थी तो मैंने कहा की मैं सब को घर छोड़ दूँगा पर डैडी जी बोले; "बेटा तुम्हें तकलीफ करने की कोई जर्रूरत नहीं है!" पर चन्दर भैया जानते थे की मेरा असली मकसद क्या है और वो बोल पड़े; "चाचा जी! मानु इसलिए जाना चाहता है ताकि अनुराधा के साथ रह सके!" चन्दर भैया ने बात कुछ इस ढंग से कही की सब समझ गए और हँस पड़े| "अब तो तुमने बिलकुल नहीं जाना! अब तुम दोनों शादी के बाद ही मिलोगे!" डैडी जी बोले| "सही कहा समधी जी आप ने! भाई थोड़ा रस्मों-रिवाजों की भी कदर करो!" ताऊ जी बोले| इधर अनु और भाभी ने साड़ी बात सुन ली थी और ये ना मिलने वाली बात सुन अनु का दिल बैठा जा रहा था| उसने बड़ी आस लिए हुए भाभी की तरफ देखा और भाभी सब समझ गईं| "मानु...
जरा इधर आना!" भाभी ने मुझे आवाज दी और मैं नेहा को ले कर बाहर आया| मेरी शक्ल पर बारह बजे देख वो समझ गईं की आग दोनों तरफ लगी है| भाभी कुछ कहती उसके पहले ही मेरी नजर ऊपर गई और देखा तो रितिका नीचे झाँक रही है| "भाभी कुछ करो ना? देखो कल मुझे 'इन्हें' छोड़ने भी नहीं जाने दे रहे!" मैंने मुँह बनाते हुए कहा| भाभी एक मिनट कुछ सोचने लगी और फिर ऊँची आवाज में बोलीं; "अरे मानु तुमने अनुराधा को अपना कमरा तो दिखाया ही नहीं?" उनकी बात सुन कर हम दोनों समझ गए और दोनों सीढ़ियों की तरफ जाने लगे| "अरे नेहा को तो देते जाओ, इसका वहाँ क्या काम?" भाभी ने फिर से दोनों की चुटकी लेते हुए कहा| मैंने एक बार देख लिया की कोई देख तो नहीं रहा और ये भी की रितिका देख ले, फिर मैंने झट से अनु का हाथ पकड़ा और हम दोनों ऊपर आ गए| रितिका जल्दी से अपने कमरे में छिप गई और दरवाजा बंद कर लिया| हम दोनों मेरे कमरे में घुसे, अनु आगे थी और मैं पीछे| मैंने दरवाजा हल्का से चिपका दिया और जैसे ही पलटा अनु ने मुझे कस कर गले लगा लिया| "I love you baby!" मैंने कहा और कुछ इतनी आवाज से कहा की रितिका सुन ले| अनु एक दम से मेरा मकसद समझ गई और बोली; "सससस... अब तो इंतजार नहीं होता!" ये सुन कर मेरी हँसी छूट गई पर मैंने कोई आवाज नहीं निकाली और अपने मुँह पर हाथ रख कर हँसने लगा| तभी अनु को एक शरारत सूझी और वो बोली; "कितने दिन हुए मुझे आपको वो गुड मॉर्निंग वाली kissi दिए हुए!" अनु ने मेरी कमीज के ऊपर के दो बटन खोले, मेरी गर्दन को बाईं तरफ झुकाया और अपने होंठ मेरी गर्दन पर रख दिए| मेरे हाथ उसकी कमर पर सख्त हो गए और मैंने उसे कस कर अपने से चिपका लिया| इधर अनु ने अपनी जीभ से मेरी गर्दन की muscle पर चुभलाना शुरू कर दिया| फिर अनु ने जितना हिस्सा उसके मुँह से घिरा हुआ था उसे अपने मुँह में suck कर लिया और दांतों से धीरे से काटा| मेरा लंड एक दम से फूल कर कुप्पा हो गया, अनु को उसके उभार से अच्छे से एहसास भी हुआ और डर के मारे उसने वो kissi तोड़ दी! उसकी आँखें झुक गईं और अनु मुझसे दूर चली गई| मैं समझ गया की उसे अपने इस डर के कारन शर्म आ रही है| मैं धीरे से उसके पास बढ़ा और उसे अपनी तरफ घुमाया, उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में थामा और उसकी आँखों में देखते हुए धीमे से बोला ताकि रितिका न सुन ले; "Baby ....
its okay! Don't blame yourself!" ये सुन कर अनु को तसल्ली हुई वरना वो रो पड़ती| मैंने उसके माथे को चूमा और अनु ने मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया और फिर से अपने होंठ मेरी गर्दन पर रख दिए|
इधर भाभी एकदम से धड़धड़ाती हुई अंदर आईं और हम दोनों को ऐसे गले लगे देख फिर से चुटकी लेने लगीं; "मुझे तो लगा यहाँ मुझे कुछ अलग देखने को मिलेगा पर तुम दोनों तो गले लगने से आगे ही नहीं बढे? तुम्हें और कितना टाइम चाहिए होता है?"
"क्या भाभी? अभी तो इंजन गर्म हुआ था और आपने उस पर ठंडा पानी डाल दिया!" मैंने चिढ़ने का नाटक करते हुए कहा|
"हाय! माफ़ कर दो देवर जी पर नीचे आपके ससुर जी बुला रहे हैं!" भाभी की बात सुन कर मैंने अपनी कमीज के सारे बटन बंद किये और ये देख कर भाभी की हँसी छूट गई; "तुम दोनों जिस धीमी रफ़्तार से काम कर रहे हो उससे तो तुम्हें एक रात भी कम पड़ेगी!" भाभी ने फिर से दोनों का मज़ाक उड़ाया| मैंने जा कर भाभी को गले लगाया और उन्हें थैंक यू कहा तो भाभी ने मेरी टाँग खींचते हुए कहा; "देख रही है? जब से मेरी शादी हुई है आज पहलीबार है की मानु ने मुझे ऐसे गले लगाया है! क्यों नई बहु को जला रहे हो?" ये सुन कर अनु ने भी पीछे से आ कर भाभी को गले लगा लिया| अब हम दोनों ही भाभी के गले लगे हुए थे की तभी ताई जी हमें ढूढ़ती हुई आ गईं; "अरे वाह! देवर-देवरानी और भाभी तीनों एक साथ गले लगे हुए हो?" हम दोनों ताई जी को देख कर अलग हुए और भाभी ने अपनी बात फिर से दोहराई तो ताई जी ने उनके सर पर प्यार से एक चपत लगाई और बोलीं; "जब उस दिन घर आया था तब गले नहीं लगाया था?" तब भाभी को याद आया की जब मैं पहलीबार घर आया था तब मैंने सब को गले लगाया था|
खेर रात के खाने का समय हुआ और सब ने एक साथ टेबल-कुर्सी पर बैठ कर खाना खाया, फिर जैसे ही गाजर का हलवा आया तो सारे खुश हो गए| डैडी जी ने ताऊ जी के इंतजाम की बड़ी तारीफ की, फिर खान-पान के बाद सब सोने चल दिए| ताऊ जी वाले कमरे में डैडी जी, पिताजी और ताऊ जी लेटे, चन्दर भैया वाले कमरे में भाभी और अनु सोने वाले थे और मेरे कमरे में मैं और चन्दर भैया सोने वाले थे| बाकी बची माँ, मम्मी जी और ताई जी तो वो माँ वाले कमरे में लेट गए| रसोइये जा चुके थे और बरामदे में बस मैं, चन्दर भैया, अनु और भाभी आग के अलाव के पास बैठे थे| नेहा मेरी गोद में थी और मेरी ऊँगली पकड़ कर खेल रही थी| "आपको क्या जर्रूरत थी मानु के छोड़ने जाने पर कुछ कहने की?" भाभी ने चन्दर भैया की क्लास लेते हुए कहा| "अरे मैं तो...." भैया कुछ कह पाते इससे पहले मैं बोल पड़ा; "सही में भैया एक दिन हमें साथ मिल जाता!"
"हाँ भैया ....अब देखो ना 10 दिन तक....
" जोश-जोश में अनु ज्यादा बोल गई और फिर एकदम से चुप हो गई| ये देख कर हम तीनों ठहाका मार के हँसने लगे! "चिंता मत कर बहु! मैंने बात बिगाड़ी है तो मैं ही सुधारूँगा भी! दो एक दिन रुक जा फिर हम तीनों (यानी मैं, भैया और भाभी) शहर आएंगे| हम दोनों काम में लग जाएंगे और तुम दोनों अपना घूम लेना!" भैया की बात सुन मैंने उन्हें झप्पी दे दी! कुछ देर हँस-खेल कर हम सब अपने-अपने कमरों में सोने चल दिए| अगली सुबह हुई और सब नहा-धो कर तैयार हुए और नाश्ता-पानी हुआ| फिर आया विदा लेने का समय तो ताऊ जी और पिताजी सबसे पहले अपने होने वाले समधी जी से गले मिले और ठीक ऐसा ही माँ और ताई जी ने अपनी होने वाली समधन जी के साथ किया| ताऊ जी ने चन्दर भैया को कुछ इशारा किया और वो अपने कमरे से मिठाइयाँ और कपडे का एक गिफ्ट पैक ले कर निकले; "समधी जी ये हमारी तरफ से प्यारभरी भेंट! अब हम अपनी समझ से जो खरीद पाए वो हमने आप सब के लिए बड़े प्यार से लिया|" ताऊ जी बोले और उधर डैडी जी बोले; "अरे समधी जी इसकी तकलीफ क्यों की आपने? हम तो यहाँ रिश्ता पक्का करने आये तो और आपने तो...." डैडी जी का मतलब था की वो तो जल्दी-जल्दी में खाली हाथ आ गए थे और ऐसे में उन्हें शर्म आ रही थी| पर डैडी जी की बात पूरी होने से पहले ही ताऊ जी ने उन्हें एक बार और गले लगा लिया और बोले; "समधी जी कोई बात नहीं!" ताऊ जी ने डैडी जी को इतने कस कर गले लगाया की वो कुछ आगे नहीं कह पाए और मैंने खुद ये समान गाडी में रखवाया| मैंने मम्मी-डैडी जी के पाँव छुए और उधर अनु सब से मिलने और पाँव छूने लगी| "अगली बार तुझे मैं बहु कह कर गले लगाऊँगी!" माँ बोली और फिर सब ने ख़ुशी-ख़ुशी अनु और मम्मी डैडी को विदा किया| उनके जाने के बाद सब घर में आये और ताऊ जी ने चन्दर भैया से मंगनी की रस्म की साड़ी तैयारियाँ शुरू करने को कहा| जिन लोगों ने कल मम्मी-डैडी को आते हुए देखा था वो अब सब आ कर पूछ रहे थे और ताऊ जी और पिताजी बड़े गर्व से मेरी शादी की बात बता रहे थे| दोपहर के खाने के बाद मैंने बात छेड़ते हुए कहा;
मैं: मैं सोच रहा था की शादी में और मँगनी के लिए सारे आदमी सूट पहने!
माँ: और हम लोग?
मैं: आप सब साड़ियाँ....
पर साड़ियाँ मेरी पसंद की होंगी!
ताई जी: ठीक है बेटा जैसा तू ठीक समझे|
ताऊ जी: पर बेटा हम ने कभी सूट नहीं पहना? सारी उम्र हमने धोती और कुर्ते में काटी है तो अब कहाँ हमें पतलून पहना रहा है?
मैं: ताऊ जी थोड़ा तो मॉडर्न बन ही सकते हैं? आप तीनों सूट में बहुत अच्छे लगोगे! फिर ये भी तो सोचिये की हमारे गाँव में आप अकेले होंगे जिसने सूट पहना है!
मेरी बात सुन कर ताऊ जी मान गए, और अगले दिन सुबह-सुबह जाने का प्लान सेट हो गया| कुछ देर बाद अनु का फ़ोन आया की वो घर पहुँच गए हैं और मम्मी-डैडी मेरे घर वालों से बहुत खुश हैं| मैं उस वक़्त नेहा को गोद में ले कर बैठा था और उसकी किलकारी सुन अनु का मन उससे बात करने को हुआ पर वो नन्ही सी बच्ची क्या बोलती? मैंने वीडियो कॉल ऑन की और अनु ने नेहा को अपनी ऊँगली चूसते हुए देखा और वो एकदम से पिघल गई| फिर मैंने अनु को बताया की पिताजी कजी, ताऊ जी और चन्दर भय सूट पहनने के लिए मान गए हैं तो उसने कहा की मैं उसे कलर बता दूँ ताकि वो उस हिसाब से अपने डैडी का सूट सेलेक्ट करे| इसी तरह बात करते हुए और नेहा की किलकारियां देखते हुए हमारी बात होती रही| अगले दिन सुबह हम सब दर्जी के निकल लिए और मैंने वहाँ जा कर हम चारों क सूट का कपडा और डिज़ाइन सेलेक्ट करवाया, दर्जी ने साथ ही साथ सबका मांप भी लिया| शादी के लिए कपडे सेलेक्ट करना फिलहाल के लिए टाल दिया गया था| फिर हम सारे मर्द एक साडी की दूकान में घुसे और वहाँ मैंने एक-एक कर साड़ियों का ढेर लगा दिया| घंटा भर लगा कर मैंने माँ, भाभी और ताई जी के लिए साड़ियाँ ली" उसके बाद ताऊ जी हम सब को सुनार की दूकान में ले गए और वहाँ मुझसे ही अनु के लिए अंगूठी पसंद करने को कहा गया, दुकानदार को हैरानी तो तब हुई जब मैंने उसे अनु की ऊँगली का एक्सएक्ट साइज बताया! खेर खरीदारी कर के हम घर लौट रहे थे और ताऊ जी ने मुझे कोई पैसा खर्च करने नहीं दिया था|
बजार में मोटरसाइकिल का एक नया शोरूम खुला था और मैं बातों-बातों में चन्दर भय से जान चूका था की उन्हें बाइक चलानी आती है| वो तो उनके नशे के चलते ताऊ जी बाइक लेने नहीं देते थे| मैंने सोचा की घर में एक बाइक तो होनी ही चाहिए, इसलिए मैंने चन्दर भैया का हाथ पकड़ा और एक बाइक के शोरूम में घुस गया| "बताओ भैया कौनसी पसद आई आपको?" मैंने खुश होते हुए पुछा|
"बेटा इसकी क्या जर्रूरत है?" ताऊ जी बोले|
"ताऊ जी आज तक मैं सब के लिए कुछ न कुछ लाया हूँ, भैया के लिए बस शर्ट-पैंट ही ला पाया, आज तो एक तौहफा देने दो! मैंने कहा तो ताऊ जी मुस्कुरा दिए और मेरे पिताजी की पीठ पर हाथ रखते हुए उन्हें अपने गर्व का एहसास दिलाया| इधर चन्दर भैया भी भावुक हो गए और मेरे गले लग गए| फिर मैं उनका हाथ पकड़ कर अंदर ले आया और उनसे पुछा तो उन्होंने HF Deluxe सेलेक्ट की पर मेरा मन Hero Passion Pro पर था, माने उन्हें जब उसकी तरफ इशारा किया
तो वो एकदम से खुश हो गए और लाल रंग में वही सेलेक्ट की गई| जब मैं पैसे देने लगा तो ताऊ जी ने बड़ी कोशिश की पर मैं जिद्द पर अड़ गया और मैंने उन्हें पैसे नहीं देने दिए| किस्मत से डिलीवरी भी उसी वक़्त मिल गई, मैं और चन्दर भैया फरफराते हुए पहले निकले| ताऊ जी और पिताजी बाद में आये, जैसे ही बाइक घर के बाहर रुकी भैया ने पी-पी हॉर्न की रेल लगा दी| सबसे पहले भाभी निकली और बाइक देख कर एकदम से अंदर भागीं और आरती की थाली ले आईं, ताई जी और माँ भी आ कर बाहर खड़े हो गए और भैया ने बड़े गर्व से कहा की ये मैंने उन्हें तौह्फे में दी है| रितिका ऊपर छत से नीचे झांकते हुए देख रही थी पर उसे ये देख कर जरा भी ख़ुशी नहीं हुई थी| पूजा हुई और मैंने भाभी और भैया को जबरदस्ती ड्राइव पर भेज दिया और मैं, माँ ताई जी सब अंदर आ गए| ताई जी ने हलवा बनाना शुरू किया और मैंने नेहा को गोद में ले कर खेलना शुरू किया| कुछ देर बाद ताऊ जी और पिताजी लौट आये और उनके आने के एक घंटे बाद भैया और भाभी भी लौट आये|
शाम को मैं और अनु वीडियो कॉल पर बात कर रहे थे की तभी भाभी आ गईं और उन्होंने भी अनु से बात करना शुरू कर दिया और आज के तौह्फे के बारे में बताया| तभी भाभी ने इशारे से भैया को ऊपर बुला लिया और उनसे बोली; "देखो मैं कुछ नहीं जानती कल के कल ही दोनों को मिलवाओ!" अनु उस वक़्त वीडियो कॉल पर ही थी और शर्मा रही थी की तभी भैया मुझसे बोले; "तू कपडे पहन मैं अभी ले चलता हूँ तुझे!" ये सुन मैं तो एकदम से खड़ा हुआ पर भाभी बोली; "अभी टाइम ही कहाँ बचा है? कल सुबह चलते हैं, मैं भी इसी बहाने लखनऊ घूम लूँगी|" तो बात तय हुई की कल का दिन हम चारों लखनऊ घूमेंगे, रही ताऊ जी से बात करनी तो वो भी भैया ने खुद कर ली| अगले दिन हम लखनऊ के लिए निकले और पूरे रास्ते भाभी मेरी टाँग खींचती रहीं, "आज तो अपनी होने वाली दुल्हनिया से मिलने जा रहे हो!" अनु हमें लेने बस स्टैंड पहुँच गई थी और वहाँ से हम अलग हो गए| भैया-भाभी घूमने चले गए और मैं और अनु कहीं और निकल लिए| घुमते-घुमते बात चली लोगों को invite करने की तो मैं और अनु नाम गिनने लगे की किस किस को बुलाना है|
मैं: यार मेरे कॉलेज से तो कोई नहीं आ सकता, reason obvious है सब रितिका को जानते हैं!
अनु: मेरा तो कॉलेज ही कॉरेस्पोंडेंस था! कुछ स्कूल के दोस्त हैं पर उनसे मेरी कोई ख़ास-बात चीत नहीं है| एक दोस्त है शालू जिस के घर मैं रुकी थी वो मेरी बहुत अच्छी दोस्त है तो वो जर्रूर आएगी|
मैं: अरुण-सिद्धार्थ ...... उन्हें .....
मैं आगे कुछ नहीं बोल पाया|
अनु: उन्हें बुला तो लें पर वो भी रितिका के बारे में जानते हैं|
मैं: उन्हें सच बता दूँ?
अनु: आप को विश्वास है उन पर?
मैं: बहुत विश्वास है! आपके आने से पहले वही थे जो मुझे थोड़ा-बहुत संभाल पा रहे थे| ज्यादा से ज्यादा क्या होगा की वो loud react करेंगे और दोस्ती टूट जायेगी!
अनु: जितना मैं उन्हें जानती हूँ वो शायद ऐसा कुछ न कहें!
मैंने फ़ोन निकाला और अरुण-सिद्धार्थ को कॉन्फ्रेंस कॉल पर लिया; "यार कुछ बहुत जर्रूरी बात करनी है, अभी मिलना है! प्लीज!!!" आगे मुझे कुछ बोलना नहीं पड़ा और उन्होंने फ़ौरन जगह और टाइम फिक्स किया|
मैं: मेरी कॉलेज की एकलौती दोस्त है जिसे मैं बुलाना चाहता हूँ|
अनु: मोहिनी? पर उसे भी तो पता है?
मैं: वो अकेली ऐसी दोस्त है जो सब जानते हुए भी मेरे खिलाफ नहीं थी|
मैंने मोहिनी को कॉल मिलाया और उसे सब बताया, रितिका के बारे में सुन कर उसे बहुत गुस्सा आया और वो उसे गाली देने लगी; "हरामजादी कुतिया! इसकी वजह से .....हम दोनों........" वो आगे कुछ नहीं कह पाई| पर मैं उसका मतलब समझ गया था, अगर ऋतू नहीं होती तो आज मैं और मोहिनी साथ होते! "सॉरी....तो कब आना है मुझे?" मोहिनी बोली| "आप मेरी तरफ से आजाओ! मेरे नाते-रिश्तेदार कम हैं!" अनु बोली और उसकी बात सुन मोहिनी को एहसास हुआ की कॉल स्पीकर पर था और अनु ने उसकी सारी बात सुन ली थी इसलिए वो एकदम से खामोश हो गई!
"हेल्लो? मोहिनी?" अनु बोली और तब जा कर मोहिनी ने हेल्लो कहा| "यार its okay .... I know everything ....
" ये सुन कर भी मोहिनी कुछ नहीं बोली तो मजबूरन मुझे ही बोलना पड़ा; "अच्छा बाबा आप 20 फरवरी को मेरे घर पहुँच जाना और अपना एड्रेस text कर दो मैं कार्ड भेज देता हूँ!" तब जा कर उसके मुँह से 'सॉरी' निकला और मैंने बाय बोल कर कॉल काट दिया|
मुझे भी थोड़ा awkward फील हुआ पर अनु एकदम नार्मल थी| कुछ देर बाद अरुण और सिद्धार्थ भी मिलने आ गए और मैं उन्हें एकदम से सारी बात नहीं बता सकता था इसलिए मैंने बात घुमाते हुए कहा;
मैं: यार अगर तुम लोगों को मेरे बारे में कोई ऐसी बात पता चले जिससे मेरा करैक्टर खराब हो तो क्या तुम मुझसे दोस्ती रखोगे? या फिर तुम्हारी नजरों में दोस्ती की अहमियत कम हो जाएगी? और फिर तुम सब की तरह मुझे judge करोगे?
अरुण: तू पागल हो गया है क्या?
सिद्धार्थ: हम दोनों हमेशा तेरे साथ हैं, तुझे इतने सालों से जानते हैं तू कभी कोई गलत काम कर ही नहीं सकता!
अरुण: अगर किया भी तो उससे हमारी दोस्ती में फर्क नहीं आएगा? तूने जब ये दारु पीना शुरू किया था तब हम तेरे साथ ही थे ना? तुझे समझाते थे, रोकते थे पर तूने बात नहीं मानी!
सिद्धार्थ: अच्छा अब बता भी क्या बात है?
उनकी बात सुन कर ये साफ़ हो गया था की वो मेरा साथ नहीं छोड़ेंगे| मैंने उन्हें सारी बात बता दी, मुझे पता था की वो मुझे कुछ ज्ञान की बात कहेंगे!
अरुण: यार अब तो तू अनु से प्यार करता है ना?
मैं: हाँ
सिद्धार्थ: तो प्रॉब्लम क्या है? तुम दोनों की शादी कब है?
मैं: 23 फरवरी
अरुण: ठीक है ...तो अब ये सड़ी हुई सी शक्ल क्यों बना रखी है तूने?
सिद्धार्थ: अबे साले! जो हुआ वो तेरा पास्ट था, तेरा इस्तेमाल किया उसने| अब वो सब भूल कर नई जिंदगी शुरू कर!
मैं: पर यार तुम लोगों को .....
अरुण: (मेरी बात काटते हुए) सुन मेरी बात! अगर ये सारा रायता उस लड़की ने ना फैलाया होता और तू तब हमें ये सारी बात बताता तब भी हम तेरा साथ देते, तुझे ताना नहीं मारते! तूने प्यार किया उससे...
वो भी सच्चा वाला!
अब ये बात सुन कर सब साफ़ हो चूका था की मेरे दोस्त मेरे साथ हैं और उन्हें जरा भी मतलब नहीं की मेरा और रितिका का रिश्ता क्या था! मेरे दिल पर से आज बहुत बड़ा पत्थर उतर गया था! उनसे ख़ुशी-ख़ुशी विदा ले कर हम दोनों वापस बस स्टैंड आये, जहाँ भैया-भाभी पहले से खड़े थे! भाभी ने हम दोनों के मजे लिए और फिर हम सब अपने-अपने घर लौट आये|
अगले दिन की बात है, दूध पीने के बाद नेहा सो रही थी और मुझे ऑफिस का एक जर्रूरी काम करना था| तो मैं अपना लैपटॉप ले कर छत पर आ गया था और वहाँ बैठा अपना काम कर रहा था की वहाँ पीछे से रितिका आ गई| मेरा ध्यान स्क्रीन पर था और वो मेरे पीछे खड़ी थी, वो पीछे से ही बोली; "ये सब जान बूझ कर रहे हो ना?"
update 77
अब तक आपने पढ़ा:
अगले दिन की बात है, दूध पीने के बाद नेहा सो रही थी और मुझे ऑफिस का एक जर्रूरी काम करना था| तो मैं अपना लैपटॉप ले कर छत पर आ गया था और वहाँ बैठा अपना काम कर रहा था की वहाँ पीछे से रितिका आ गई| मेरा ध्यान स्क्रीन पर था और वो मेरे पीछे खड़ी थी, वो पीछे से ही बोली; "ये सब जान बूझ कर रहे हो ना?"
‘अनु से जब प्यार हुआ तब तो मुझे तेरे साथ हुए हादसे के बारे में पता तक नहीं था, ये तो मेरी किस्मत थी जो मुझे वापस इस घर तक खींच लाई! तो ये जानबूझ कर कैसे हुआ?' मन ये सफाई देना चाहता था पर फिर एहसास हुआ की ना तो रितिका मेरी ये सफाई सुनने के लायक है और ना ही मेरे कुछ कहने से वो बात समझेगी इसलिए मैंने उसे वही जवाब दिया जो वो सुन्ना चाहती थी; "अभी तो शुरुआत है!" इतना कह मैं अपना लैपटॉप ले कर नीचे आने लगा तो वो पीछे से बोली; "मैं तुम्हारी अनु से कितना नफरत करती हूँ ...... ये जानते हुए .....तुमने ये चाल चली?" ये कहते हुए वो पीछे खड़ी ताली मारती रही और मैं चुप-चाप नीचे आ गया| नीचे आ कर मैंने खुद को नेहा के साथ व्यस्त कर लिया| उसी शाम को रितिका ने अपनी चाल चली, रात को सब खाना खा रहे थे की वो ताऊ जी के सामने कान पकड़ कर खड़ी हो गई; "दादाजी....
मैं माफ़ी के लायक तो नहीं पर क्या आप सब मुझे एक आखरी बार माफ़ कर देंगे? मैं ईर्ष्या में जलकर जो कुछ भी किया मैं उसके लिए बहुत शर्मिंदा हूँ और वादा करती हूँ की आज के बाद ऐसा कुछ भी नहीं करूँगी! इस परिवार की इज्जत मेरी इज्जत होगी और मैं इस पर कोई आँच नहीं आने दूँगी!" इतना कहते हुए रितिका ने घड़ियाली आँसू बहाने शुरू कर दिए| ख़ुशी का मौका था और डैडी-मम्मी जी भी कई बार रितिका के बारे में पूछ चुके थे, हरबार झूठ बोलना ताऊ जी को भी अच्छा नहीं लग रहा था| इसलिए उन्होंने रितिका को माफ़ कर दिया और उनके साथ-साथ घर के हर एक सदस्य ने उसे माफ़ कर दिया| पर रितिका न मेरे पास माफ़ी मांगने आई और ना ही मैं उसे माफ़ करने के मूड में था| खेर रंग-रोगन का काम शुरू हो चका था और इस बार रंग मेरे पसंद का करवाया गया था, मेरे कमरे में तो कुछ ख़ास ही म्हणत करवाई जा रही थी और उसका रंग ताऊ जी ने ख़ास कर अनु से पूछ कर करवाया था| घर भर तैयारियों में लगा था पर मुझे कोई काम नहीं दिया गया था, कारन ये की पिछले कई दिनों से मैं ऑफिस नहीं जा पा रहा था और काम बहुत ज्यादा पेंडिंग था तो मेरा सारा समय Con-Call पर जाता| अब तो नेहा भी मुझसे नराज रहने लगी थी क्योंकि मैं ज्यादातर लैपटॉप पर बैठा रहता था| वो ज्यादा कर के माँ के पास रहती और जब मैं उसे लेने जाता तो मेरे पास आने से मना कर देती; "Sorry मेरा बच्चा!" में कान पकड़ कर उससे माफ़ी मांगता तो वो मुस्कुराते हुए माँ की गोद से मेरे पास आ जाती|
सगाई से दो दिन पहले की बात है, मैं छत पर बैठा काम कर रहा था और नेहा नीचे सो रही थी की रितिका कपडे बाल्टी में भर कर आ गई| "एक बात पूछूँ? तुमने ऐसा क्या देख लिया उसमें जो तुम्हें उससे प्यार हो गया? कहाँ वो 33 की और कहाँ मैं 23 की! उसकी जवानी तो ढल रही है और मेरी तो अभी शुरू हुई है! याद है न वो दिन जो हमने एक दूसरे के पहलु में गुजारे थे? तुम तो मुझे छोड़ते ही नहीं थे! हमेशा मेरे जिस्म से खेलते रहते थे! वो पूरी-पूरी रात जागना और पलंगतोड़ सेक्स करना! सससस.... कितनी बार किया तुमने उसके साथ सेक्स? उतना तो नहीं किया होगा जितना मेरे साथ किया था? अरे वो देती ही नहीं होगी! राखी कहती थी की mam को सेक्स वाली बातें करना पसंद नहीं! जिसे बातें ही पसंद ना हो वो सेक्स कहाँ करने देगी? अभी भी मौका है....
मैं अब भी तैयार हूँ!!!!" रितिका ने ये बातें कुछ इस तरह से कहीं के मेरे बदन में आग लग गई| मैं एक दम से उठ खड़ा हुआ और बोला; "तेरी सुई घूम-फिर कर सेक्स पर ही अटकती है ना? नहीं किया मैंने उसके साथ सेक्स और अगर सारी उम्र ना करने पड़े तो भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा! पता है क्यों? क्योंकि वो मुझसे प्यार करती है और मैं भी उससे प्यार करता हूँ! तेरे लिए प्यार की परिभाषा होती होगी सेक्स हमारे लिए नहीं! हमारे लिए बस साथ रहना ही प्यार है!" इतना कह कर मैं पाँव पटककर वहाँ से चला गया| उस दिन रात को जब अनु का फ़ोन आया तो मैंने उससे ये बात छुपाई! आमतौर पर मैं अनु से कोई बात नहीं छुपाता था पर मैंने ये बात उसे नहीं बताई!
उस दिन के बाद से रितिका मुझसे कोई बात नहीं करती, हाँ उसकी घरवालों के साथ अच्छी बनने लगी थी| घर के सभी कामों में वो हिस्सा ले रही थी और उसने सब को ये विश्वास दिला दिया था की वो वाक़ई में बहुत खुश है| एक बदलाव जो मैं अब उसमें देख पा रहा था वो ये था की रितिका ने अब मुझे प्यासी नजरों से देखना शुरू कर दिया था| वो भले ही मुझसे दूर रहती पर किसी न किसी तरीके से मुझे अपने जिस्म की नुमाइश करा देती, कभी जानबूझ कर मेरे पास अपना क्लीवेज दिखाते हुए झाड़ू लगाती तो कभी साडी को अपनी कमर पर ऐसे बांधती जिससे मुझे उसका नैवेल साफ़ दिख जाता| उसकी इन हरकतों का मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था पर बड़ा अजीब सा लग रहा था, ऐसा लगता मानो मुझे उससे घिन्ना आने लगी थी|
आखिर मेरी सगाई का दिन आ ही गया और मम्मी-डैडी और अनु सब गाडी से आ गए| मैं उस वक़्त तैयार हो रहा था इसलिए मैं नीचे नहीं आ पाया, घर के सभी लोगों ने उन्हें रिसीव किया और उन्हें अंदर लाये| इधर अनु की नजरें पूरे घर में घूम रही थीं की मैं दिख जाऊँ, पर भाभी ने उनकी नजरें पकड़ ली थीं और वो उसके कान में खुसफुसाते हुए बोलीं; "आपके मंगेतर अभी तैयार हो रहे हैं!"ये सुन कर अनु शर्मा गई, तभी उसकी नजर रितिका पर पड़ी जो चेहरे पर नकली मुस्कान चिपकाए सब को देख रही थी| डैडी जी ने भी जब उसे देखा तो अपने पास बिठाया और उन्हें उस पर बड़ा तरस आया| "बेटी पिछली बार तुमसे ज्यादा बात नहीं हो पाई, तुम्हारी तबियत ठीक नहीं थी! अब कैसी है तुम्हारी तबियत?" डैडी जी ने पुछा और रितिका ने नकली हँसी हँसते हुए कहा; "जी अंकल अब ठीक है!" अभी आगे वो कुछ बोलते की मैं सूट पहने हुए नीचे उतरा| अनु ने मुझे पहले देखा और उसकी आँखें चौड़ी हो गईं! उसकी ठंडी आह भाभी ने सुन ली और वो बोलीं; "माँ आप कहो तो मानु को काला टीका लगा दूँ!" भाभी की आवाज सुन कर सब मेरी तरफ देखने लगे|
इधर मेरी नजर अनु पर पड़ी और मैं आखरी सीढ़ी पर रुक गया और आँखें फाड़े उसे देखने लगा| घर में सब का ध्यान अब हम दोनों पर ही था और सब चुप हो गए थे| आज अनु को साडी में देखा मेरा मन बावरा हो गया था| आखिर भाभी चल के मेरे पास आईं और
मेरा हाथ पकड़ कर मेरी तन्द्रा भंग की! मैं बैठक में आ कर ताऊ जी और पिताजी के बीच बैठ गया| "क्या हुआ था बेटा?" डैडी जी ने पुछा और मेरे मुँह से अचानक निकल गया; "वो बहुत दिनों बाद देखा ना....." ये बोलने के बाद मुझे एहसास हुआ और मैंने शर्म से मुस्कुराते हुए सर झुका लिया| यही हाल अनु का भी था और उसके भी मेरी तरह शर्म से हजाल लाल थे और ये सब देख कर रितिका की आँखें गुस्से से लाल थी|
खेर मँगनी की रस्म शुरू हुई और पहले अनु ने मुझे अंगूठी पहनाई जो थोड़ी loose थी और फिर जब मैंने उसे अंगूठी पहनाई तो वो उसे एकदम फिट आई| सबका मुँह मीठा हुआ और खाना-पीना शुरू हुआ, मैंने भाभी को इशारा किया और वो समझ गईं| भाभी ने अनु को कहा की वो उनके साथ चल कर कमरा देख ले जिसमें पेंट हुआ है| उनके जाते ही दो मिनट बाद मैंने फ़ोन निकाला और ऐसे जताया की मैं फ़ोन पर बात कर रहा हूँ और फिर आंगन में आ गया और धीरे-धीरे सीढ़ी चढ़ कर ऊपर पहुँच गया| भाभी और अनु मेरे कमरे में खड़े मेरा ही इंतजार कर रहे थे| मुझे देखते ही अनु बोली; 'तो आपने भाभी को सब पहले से ही समझा दिया था की उन्हें क्या बहाना कर के मुझे वहाँ से निकालना है?" अनु बोली|
"और क्या?" मैंने कहा और भाभी ये देख कर हँस पड़ी| "यार आपका (भाभी का) काम हो गया, आप जाओ!" मैंने कहा|
"अच्छा जी? ठीक है चल अनुराधा!" भाभी ने एकदम से उसका हाथ पकड़ लिया और नीचे जाने को निकलीं| "Sorry...Sorry...Sorry.... माफ़ कर दो... !!!" मैंने अपने कान पकड़ते हुए कहा| ये देख कर भाभी और अनु दोनों हँस पड़े| "वैसे भाभी आपको नहीं लगता की अनु आज बहुत ज्यादा सुन्दर लग रही है?" मैंने पुछा| मैं तो बस भाभी के जरिये अनु को ये बताना चाहता था की आज वो बहुत सूंदर लग रही है| भाभी के सामने हम दोनों थोड़ा शर्म किया करते थे!
"वो तो तुम्हारा बिना पलके झपकाए देखने से ही पता चल गया था!" भाभी ने मेरी टाँग खींचते हुए कहा|
"वैसे भाभी क़यामत तो आज आपके देवर जी ढा रहे हैं!" अनु ने मेरी तारीफ करते हुए कहा|
"मेरे देवर जी? मैं चली नीचे, वर्ण तुम दोनों मेरी शर्म कर के बार-बार मेरा ही नाम ले-ले कर बातें करोगे|" भाभी बोलीं और हँसते हुए नीचे चली गईं| उनके जाते ही मैंने अनु का हाथ पकड़ लिया; "यार सच्ची आज आप इतने सेक्सी लेग रहे हो की मन करता है आज ही शादी कर लूँ!" मैंने कहा और अनु शर्माते हुए मेरे सीने से आ लगी और बोली; "हैंडसम तो आज आप लग रहे हो!" हम दोनों ऐसे ही गले लग कर खड़े थे की तभी वहाँ हमें बुलाने के लिए रितिका आ गई| हमें इस तरह गले लगे देख उसके जिस्म में बुरी तरह आग लग गई, उसने बड़े जोर से मेरे कमरे के दरवाजे पर हाथ मारा और चिल्लाई; "अभी शादी नहीं हुई है तुम दोनों की!" उसे देखते ही हम दोनों हड़बड़ा गए और अलग हुए पर उसके इस कदर चिल्लाने से मुझे गुस्सा आ गया; "तेरी.......
!!!" मैं आगे कुछ कहता उससे पहले ही अनु ने मेरा हाथ पकड़ कर रोक लिया| "बोलने दो बेचारी को! तकलीफ हुई है!!!" अनु ने मुस्कुराते हुए कहा| अनु ने आज उसी अंदाज में कहा जिस अंदाज में उस दिन रितिका ने मेरा मजाक उड़ाया था जब मैं उससे नेहा को माँग रहा था| अनु की बात सुन कर रितिका जलती हुई नीचे चली गई, "मत लगा करो इसके मुँह! ये जानबूझ कर आपको उकसाने आती है!" अनु बोली, मैंने सर हिला कर उसकी बात मान ली और फिर उसे दुबारा अपने पास खींच लिया; "आपको Kiss करने की गुस्ताखी करने का मन कर रहा है!" मैने अनु की आँखों में देखते हुए कहा तो जवाब में अनु ने अपनी आँखें बंद कर लीं| मैंने अभी अनु के होठों पर अपने होंठ रखे ही थे की भाभी आ गई और अपनी कमर पर हाथ रखते हुए बोलीं; "शर्म करो!" उनकी आवाज सुनते ही हम दोनों अलग हो गए| "भाभी हमेशा गलत टाइम पर आते हो!" मैंने शिकायत करते हुए कहा, इधर अनु के गाल शर्म से सुर्ख लाल हो चुके थे! भाभी ने मेरे कान पकड़ लिए; "बेटा ज्यादा ना उड़ो मत! शादी हो जाने दो उसके बाद मैं आस-पास भी नहीं भटकूँगी!" अनु भाभी के पीछे छुप गई और बोली; "तो मुझे बचाएगा कौन?" ये सुन कर तो हम तीनों हँस पड़े और भाभी ने हम दोनों को अपने गले लगा लिया| तभी पीछे से मम्मी जी आ गईं मेरा कमरा देखने और हमें ऐसे गले लगे देख मुस्कुराते हुए बोलीं; "लो भाई! यहाँ तो देवर-देवरानी और भाभी का प्रेम मिलाप चल रहा है!" ये सुन कर हम अलग हुए; "बेटा (भाभी) इसका ख्याल रखना, कभी-कभी ये मनमानी करती है!" मम्मी जी बोलीं| "आप चिंता ना करो मैं अनुराधा का ध्यान अपनी दोस्त जैसा ख्याल रखूँगी|" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा| आखिर हम नीचे आ गए, फिर खाना-पीना हुआ और इस दौरान रितिका कहीं भी नजर नहीं आई! समय से मम्मी-डैडी और अनु चले गए, पर जाते-जाते अनु ने नेहा को अपनी गोद में लिया और उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा; "अब जब आपसे मिलूँगी तो आपको अपने साथ ही रखूँगी!" ये सुन कर नेहा मुस्कुराने लगी और अनु ने उसके माथे को चूमा और मुझे दे दिया|
दिन गुजरने लगे और शादी में अभी एक महीना रह गया था, शादी के कार्ड छप कर आये| मेरे दोस्तों को कार्ड मैंने भेज दिए और ऑफिस स्टाफ को भी कार्ड भेज दिए| रंजीथा को कार्ड अनु ने भेजा और साथ ही उसे टिकट भी भेज दी| इधर घरवालों ने जब नाते-रिश्तेदारों को कार्ड भेजा तो सभी ने पूछना शुरू कर दिया| ताऊ जी ने सब से यही कहा की लड़की सब की पसंद की है और उन्हें बाकी डिटेल नहीं दी, मैं तो वैसे भी इन सब बातों से अनविज्ञ था! शादी से ठीक 15 दिन पहले तक मेरा घर रिश्तेदारों से खचाखच भर चूका था| मैं उन दिनों काम के चलते बहुत ज्यादा बिजी था तो घर में जो कोई भी बात होती वो मेरे सामने नहीं होती थी| दिन में मैं छत पर अपना लैपटॉप ले कर बैठा होता था, रात में मुझे देर तक जागने की मनाही थी| मेरे कुछ cousins कभी-कबार आ कर मेरे पास बैठ जाते और
उनके साथ हँसी-मजाक होता| इतने लोग तो रितिका की शादी में भी नहीं आये थे!
एक दिन की बात है की घर में घमासान खड़ा हो गया, बात शुरू की मौसा जी ने! "भाईसाहब! आपकी अक्ल पर पत्थर पड़ गए हैं जो एक तलाकशुदा लड़की की शादी, उम्र में मानु से 5 साल बड़ी की शादी अपने लड़के से करवा रहे हो?" उनकी बात सुनते ही पिताजी और ताऊ जी भड़क उठे, पिताजी के कुछ कहने से पहले ही ताऊ जी बोल उठे; "यहाँ तुम से कुछ पुछा गया? शादी में बुलाया है, चुप-चाप आशीर्वाद दो और निकल जाओ!" मौसा जी ताऊ जी से उम्र में छोटे थे और उनका बड़ा मान करते थे, वैसे तो सभी मान करते थे या ये कहूँ की डरते थे! इसलिए जब ताऊ जी चिल्लाये तो मौसा भीगी बिल्ली बन कर चुप हो गए| बड़ी हिम्मत कर के छोटी मौसी बोलीं; "भाईसाहब लड़की तो हमारी ज़ात की भी नहीं!" उनकी बात का जवाब ताई जी ने दिया; "काहे की ज़ात? जब हम मुसीबत में थे तो कौन से ज़ात वाले सामने आये थे? सब के सब पुलिस के डर के मारे अपने घर में छुपे हुए थे!" ताई जी की बात सुन कर सब के सब चुप-चाप खड़े हो गए| "मेरी बात गौर से सुन लो सारे! तुम में से अगर किसी ने भी इस शादी में विघ्न डाला या कोई ऐसी हरकत की जिससे हमारी मट्टी-पलीत हुई तो उसे गोली से उड़ा दूँगा! तुम में से किसी ने अगर समधी-समधन को या बहु को कुछ भी ताना मारा या कहा ना तो अंजाम तुम्हें मैं बता चूका हूँ! एक आरसे बाद इस घर में खुशियाँ आ रही हैं!" ताऊ जी की दहाड़ सुन सब के सब चुप हो गए| अब मुझे कहने की तो कोई जर्रूरत नहीं की ये लगाई-बुझाई रितिका की थी, एक वही तो थी जो सब कुछ जानती थी! इसलिए मैं इंतजार करने लगा की मुझे कब मौका मिले जब वो अकेली हो| रात को जब मैं नेहा को उससे लेने के बहाने उसके कमरे में पहुँचा तो मुझे वो अकेली अपना बिस्तर ठीक करते हुए दिखी; "मिल गई तेरे कलेजे को ठंडक? लगा ली ना आग?" ये सुनते ही रितिका बोली; "मैंने क्या किया?" उसने अनजान बनने का नाटक किया पर मेरे सामने उसका ये रंग नहीं चल सकता था| "ज्यादा अनजान बनने की कोशिश मत कर! तेरे आलावा यहाँ और कोई है जिसे मेरी खुशियां देख कर आग लग रही हो! दुबारा तूने ऐसा कुछ किया ना तो दुर्गत कर दूँगा तेरी!" मैंने रितिका को हड़काया और नेहा को ले कर अपने कमरे में आ गया| अगले दिन सुबह-सुबह एक बड़ा सा ट्रक घर के आगे खड़ा हो गया, ताऊ जी ने सारे मर्दों को आवाज दी| सभी हैरान थे सिवाए उनके और पिताजी के, जब ट्रक पर से तिरपाल हटा तो उसमें पड़ा सामान देख सब समझ गए| उसमें सारा फर्नीचर था जो ताऊ जी ने स्पेशल आर्डर दे कर बनवाया था| जब सामान उतारने के लिए मैंने हाथ लगाना चाहा तो ताऊ जी ने मना कर दिया| मैं ख़ुशी-ख़ुशी ऊपर आया की एक और टेम्पो की आवाज सुनाई दी, मैंने छत से नीचे झाँका तो पता चला की डैडी जी ने भी कुछ सामान भेजा था| घर में जितने भी रिश्तेदार आये थे सब के सब सामान उतारने में लग गए और पिताजी और ताऊ जी ये
ध्यान रख रहे थे की कहीं कुछ टूट ना जाये| मेरा कमरा इतना बड़ा था पर उसमें सामान के नाम पर मेरा सिंगल बेड और एक टेबल था बाकी उसमें ट्रंक रखे हुए थे जिनमें गर्म कपडे होते थे| आज जा कर मेरे कमरे को एक डबल बेड, ड्रेसिंग टेबल, छोटा सोफा, अलमारी और स्टडी टेबल का सुख मिल रहा था| मैं ने अनु को वीडियो कॉल कर के सामान ऊपर चढ़ते हुए दिखाया और वो बहुत खुश हुई|
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शादी में एक हफ्ता रह गया था और पिताजी ने मंदिर में पूजा रखवाई थी| सारा परिवार वहीँ जमा था, में भी वहीँ था और काम में मदद कर रहा था| ताऊ जी ने मुझे कुछ सामान लाने के लिए घर भेजा| जब मैं घर पहुँचा तो वहाँ पर सिर्फ रितिका थी, उसके अल्वा वहाँ कोई नहीं था| मैं सामान लेने अपने कमरे में पहुँचा तो रितिका चुपके से मेरे कमरे के बाहर खड़ी हो गई| जैसे ही मैं सामान ले कर पलटा की रितिका ने अचानक से मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे खींच कर सीधा छत पर ले आई| मैं उसके साथ नहीं जाना चाहता था पर आज उसकी पकड़ बहुत मजबूत थी और उसमें बहुत ज्यादा ताक़त आ गई थी| छत पर आ कर उसने मेरा हाथ छोड़ दिया और वो घुटनों के बल खड़ी हो गई और अपने दोनों हाथ जोड़ लिए; "प्लीज ....प्लीज मुझे माफ़ कर दो!" रितिका की आँखें छल-छला गईं थी, पर मेरा मन तो जैसे पत्थर का हो चूका था, जिस पर उसके रोने का कोई असर नहीं हो रहा था उल्टा गुस्सा आ रहा था; "किस लिए माफ़ कर दूँ? मेरा दिल तोडा उसके लिए? या फिर मुझे मेरे ही बेटी से दूर किया उसके लिए?" मैंने गुस्से से कहा|
"सबके लिए....मैंने बहुत पाप किये हैं! तुम्हारे दिल के साथ खेल खेला.... जानते-बूझते तुम्हें बहुत दुःख दिया........" इतना कहते हुए रितिका ने मेरे पैर पकड़ लिए और बिलख-बिलख कर रोने लगी| मैंने उसके हाथों की पकड़ खोलनी चाही पर उसने मेरा दाहिना पैर अपनी छाती से जकड़ रखा था| "मैं तुम से बहुत प्यार करती हूँ और तुम्हारे बिना नहीं रह सकती!.....मैं तुम्हें अपनी आँखों के सामने किसी और का होता हुआ नहीं देख सकती! प्लीज....एक मौका दो मुझे" रितिका ने बिलखते हुए कहा| उसकी बात सुन कर एक पल को मेरा दिल पसीज गया, इसलिए मैंने उसे समझाते हुए कहा; "देख हमारे बीच जो कुछ भी था वो सब उसी दिन खत्म हो गया था जब तूने राहुल से शादी की थी| अब मैं अनु से प्यार करता हूँ और वो भी मुझसे बहुत प्यार करती है, हमारी शादी होने वाली है| अब ये पागलपन छोड़ दे और अपने मन से ये बात निकाल दे की मैं अब दुबारा तुझसे प्यार कर सकता हूँ|" मैंने फिर से अपने पाँव को छुड़ाने की कोशिश की|
"नहीं...पहले भी तुम ने मना किया था की तुम मुझसे प्यार नहीं करते पर मेरे प्यार ने तुम्हारे मन में मेरे प्यार की लौ जला दी थी! इस बार भी मैं ऐसा कर सकती हूँ...बस एक मौका दे दो! एक आखरी मौका.....अबकी बार मैंने कुछ भी गलत किया तो मेरी जान ले लेना...मैं उफ़ तक ना करुँगी!......
हम दोनों और नेहा कहीं दूर एक सुकून भरी जिंदगी जियेंगे! मेरा नहीं तो कम से कम नेहा का सोचो? यहाँ से दूर आप उसे कितना प्यार दे सकोगे? .... उसे भी तो अपने पापा का प्यार चाहिए! कल को वो बोलने लगेगी तो आपको क्या कहेगी?" रितिका की नेहा वाली बात सुन कर मैं चुप हो गया था| पर मैं अनु के साथ ये धोका नहीं कर सकता था, इसलिए मैंने ना में सर हिलाया और रितिका की पकड़ से अपना पाँव छुड़ा लिया| मैं नीचे आने को दो ही कदम चला हूँगा की रितिका जमीन से उठ खड़ी हुई और बोली; "अपनी हालत याद है न उस दिन क्या हुई थी? क्या कहा था तुमने उस दिन मुझसे?...... 'तो बोल तुझे क्या चाहिए? जो चाहिए वो सब दूँगा तुझे बस मुझे नेहा से अलग मत कर!'... यही कहा था ना उस दिन ..... ठीक है... आज माँगती हूँ..... इस शादी का ख्याल अपने मन से निकाल दो, मिटा दो अनु की सारी यादें और मैं तुम्हें नेहा दे दूँगी! ये सिर्फ मुँह से नहीं कह रही, बल्कि कानूनी रूप से तुम्हें नेहा की कस्टडी दे दूँगी! फिर बुलवा लेना उसके मुँह से पापा, मैं कुछ नहीं कहूँगी!" रितिका ने फिर से वही जहरीली हँसी हँसते हुए कहा और मुस्कुराते हुए मेरे सामने से गुजरी| मैंने उसका हाथ बड़ी जोर से पकड़ा और उसे झटके से रोका और पीछे की तरफ खींचा, मेरी आँखें आँसुओं से लाल हो गई थी; "दिखा दी ना तूने अपनी ज़ात! नेहा के नाम पर अनु की जिंदगी का सौदा करना चाहती है? तू चाहती है मैं भी उसके साथ वही करूँ जो तूने मेरे साथ किया था? पर मैं तेरी तरह मौका परस्त नहीं हूँ, मैं नेहा से बहुत प्यार करता हूँ पर उसके लिए मैं अनु को नहीं छोड़ सकता! वो मेरे बिना मर जायेगी.....तुझसे कई गुना ज्यादा उससे प्यार करता हूँ!" मैंने रोते हुए कहा, अगले ही पल मेरे आँसू सूख गए और एक बाप का प्यार बाहर आया| मैंने रितिका गाला पकड़ लिया और उसकी आँखों में देखते हुए बोला; "तू अपनी गांड का जोर लगा दे, देखता हूँ कैसे तू नेहा को मुझसे अलग रख पाती है!" मेरे आँखों में गुस्सा देख रितिका आगे कुछ नहीं बोल पाई क्योंकि वो भी जानती थी की वो चाहे कुछ भी कर ले वो ताऊ जी के रहते नेहा को मुझसे दूर नहीं कर सकती थी| "तेरे पास कोई रास्ता नहीं है! तुझे इसी घर में रहना होगा....
तेरी शादी तो उस हत्यकांड के बाद होने से रही! यहाँ रहते हुए तू नेहा को मुझसे कभी अलग नहीं कर पाएगी!" मैंने रितिका की सारी हिम्मत तोड़ दी थी, उसने जो घरवालों का प्यार जीतने के लिए जो कुछ दिन पहले ड्रामा किया था उसके चलते अब वो बुरी नहीं बन सकती थी वरना ताऊ जी समेत सारे घर वाले उसकी जान ले लेते! इतना कहते हुए मैं मंदिर लौट आया और पूजा में शामिल हो गया| पर मैं ये नहीं जानता था की वो कमिनी औरत किसी भी हद्द तक गिर सकती है!
इधर मैं पूजा में बैठा था और उधर उसने अनु को फ़ोन कर दिया| अनु का नंबर वो पहले ही भाभी के फ़ोन से निकाल चुकी थी और आज उसने अपनी गन्दी चाल चली| "हेल्लो! अनु? मैं रितिका बोल रही हूँ!" अनु रितिका की आवाज सुन कर एकदम से चौंक गई और इसके पहले वो कुछ कहती रितिका बोल पड़ी; "कैसी औरत हो तुम? तुम्हारी वजह से मानु अपनी बेटी को छोड़ कर तुमसे शादी कर रहा है! मैंने उससे आज पुछा की क्या वो नेहा के साथ रहना चाहता है या तुम्हारे साथ शादी करना चाहता है तो उसने तुम्हें चुना! शर्म आनी चाहिए तुम्हें, तुम एक बाप को उसी की बेटी से छीन रही हो! वो तुमसे को प्यार नहीं करता बल्कि वो तुम्हारी जानबचाने के लिए तुमसे शादी कर रहा है!" इतना बोल कर रितिका ने कॉल काटा और अनु को एक व्हाट्सअप्प भेजा जिसमें उसने कुछ देर पहले मेरी कही बात का ऑडियो भेजा| उसने बड़ी ही चालाकी से मेरी "तुझसे कई गुना ज्यादा उससे प्यार करता हूँ!" वाली बात को काट दिया और बाकी की बात ऐसे के ऐसे ही उसे भेज दी थी| ये ऑडियो सुन कर अनु एक दम से सन्न रह गई और उसे लगा की मैं उससे कम प्यार करता हूँ और नेहा से ज्यादा प्यार करता हूँ| मेरे इस त्याग के बारे में सोच कर अनु टूट गई, वो कतई नहीं चाहती थी की मैं नेहा को छोड़ूँ बल्कि वो अपने प्यार की कुर्बानी देने को तैयार हो गई थी! अनु ने फ़ौरन एक मैसेज टाइप किया; "I'm calling this wedding off!" और मुझे भेज दिया| मैं उस वक़्त पूजा में था तो उसका मैसेज नहीं देख पाया, पूजा रात नौ बजे तक चली और पूजा के बाद जब मैंने अनु का मैसेज पढ़ा तो मेरे होश उड़ गए, मैंने उसे कॉल करना शुरू किया पर वो फ़ोन नहीं उठा रही थी| मैंने डैडी-मम्मी को कॉल किया तो पता चला की वो बाहर किसी रिश्तेदार के आये हैं! अब मेरी हालत ख़राब हो गई क्योंकि वहाँ अनु अकेली थी और वो कुछ गलत ना कर ले इसलिए मैंने चन्दर भय से बाइक की चाभी माँगी| मेरी शक्ल देखते ही वो समझ गए की कुछ तो बात है, "भैया दोस्त का accident हो गया इसलिए मैं लखनऊ जा रहा हूँ|" इतना कह कर मैं बाइक पर बैठा और अनु के घर की तरफ निकल पड़ा| 4 घंटे का रास्ता मैंने 3 घंटों में पूरा किया, बाइक हवा से बातें कर रही थी और चूँकि मैंने कपडे कम पहने थे सो ठंड से मेरा हाल बुरा था| ये तो मेरे जिस्म में अनु को खो देने का डर था जो मुझे संभाले हुए था वरना इतनी ठंड में बाइक फुल स्पीड से चलाना?!
रात सवा
बारह बजे मैं अनु के घर पहुँचा और ताबड़तोड़ घंटियां बजाईं, अनु ने मुझे magic eye से देख लिया था और वो दरवाजे से अपनी पीठ टिकाये रो रही थी पर दरवाजा नहीं खोल रहे थी| इधर मैंने दरवाजा पीटना शुरू कर दिया था, मुझे अभी तक नहीं पता था की अनु दरवाजे से पीठ लगा कर बैठी रो रही है| "अनु....प्लीज दरवाजा खोलो....I know .... तुम घर पर हो....प्लीज....." आखिर अनु बोली; "नहीं...मुझे कोई बात नहीं करनी! Its over!" अनु ने बड़ी मुश्किल से ये कहा था और उसकी आवाज में दर्द महसूस कर मैं टूटने लगा था| "प्लीज....तुम्हें मेरे प्यार का वास्ता! बस एक बार दरवाजा खोल दो! प्लीज...." मैंने काँपते हुए कहा क्योंकि ठंड अब जिस्म पर हावी हो चुकी थी| अनु उठ कर खड़ी हुई, अपने आँसूँ पोछे और दरवाजा खोला और इससे पहले वो कुछ कहती मैं ही उस पर बरस पड़ा: "तुम्हें लगता है की तुम इतनी आसानी से कहोगी की this wedding is off और सब कुछ खत्म हो जाएगा? आखिर मैंने किया क्या है जिसकी सजा मुझे दे रही हो? तुम रितिका की तरह निकलोगी की ये मैं कतई नहीं मान सकता|" मैंने जब ये कहा तो अनु ने अपना फ़ोन निकाला और मुझे वो trimmed रिकॉर्डिंग सूना दी! वो सुनने के बाद मैं समझ गया की ये किसकी कारस्तान है पर अभ के लिए मुझे अनु को संभालना था, उसे सच से रूबरू कराना था| "ये पूरी बात नहीं है!" इतना कह कर मैंने अनु को सब सच बता दिया और अनु आँखें फाड़े सब सुनती रही; "आपने सोच भी कैसे लिया की मैं ऐसा कर सकता हूँ? ये सब उस हरामजादी का किया धरा है और आज मैं उसे जिन्दा नहीं छोड़ूँगा|" इतना कह कर मैं वापस निकलने को पलटा तो अनु ने मेरा हाथ पकड़ लिया और तब उस एहसास हुआ की मेरा पूरा जिस्म बर्फ सा ठंडा हो चूका है| "आप ऐसा कुछ नहीं करोगे! वो यही तो चाहती है.....गलती मेरी है, मुझे आपसे पहले पूछ लेना चाहिए था! पर मैं नहीं चाहती थी की आप नेहा के प्यार से वंचित रहो!" अनु रोते हुए बोली और मुझे अपने गले लगा लिया| उसके गर्म जिस्म का एहसास मुझे मेरे ठन्डे जिस्म पर होने लगा था| "Listen to me! नेहा मेरी बेटी है और इस बात को कोई झुटला नहीं सकता| मैं उससे प्यार करता रहूँगा फिर चाहे हम यहाँ रहे या बैंगलोर में! पहले तो मैं सोच रहा था की मैं नेहा को गोद ले लूँ पर घरवाले इसके लिए कभी नहीं मानेंगे! फिर आज नहीं तो कल हमारा अपना बच्चा भी तो होगा ना?! ऐसे बहुत से सवाल हैं जिनका जवाब अभी ढूंढा नहीं जा सकता, फिलहाल मेरे लिए ये शादी जर्रूरी है, उसके बाद मैं नेहा के बारे में सोचूँगा!" मैंने कहा और अनु मेरी बात समझ गई, साथ ही उसके मन में रितिका को सबक सिखाने की आग भी जल उठी!
हम दोनों ऐसे ही गले लगे हुए खड़े रहे और फिर थोड़ी देर बाद घर से फ़ोन आ गया; "हाँ जी....सब ठीक है जी...कोई घबराने की बात नहीं! जी...
मैं सुबह तक निकलता हूँ!" मैंने कहा और ये सुन अनु भी हैरान हो गई| "घर की पूजा खत्म हुई तब मैंने आपका मैसेज देखा और जिस हालत में था उसी हालत में भाग आया| चन्दर भय से ये कहा की दोस्त का एक्सीडेंट हो गया है! उसी के लिए डाँट पड़ रही थी की बता कर नहीं जा सकता था!” मैंने अनु को सच बताया तो उसने कान पकड़ कर मुझे Sorry कहा! फिर उसने कॉफ़ी बनाई जिसे पीने के बाद मेरे जिस्म में गर्मी आई| सुबह 6 बजे तक मैं वहीँ रहा और फिर बाइक से निकला, जाते-जाते- अनु ने मुझे अपनी शाल दी ताकि मैं ठंड से खुद को बचा पाऊँ| अब उसके कपडे तो मुझे आते नहीं और डैडी जी वाले कपडे भी नहीं आते इसलिए! मैं घर पहुँचा और कहानी बना कर सुना दी पर भाभी ने जब शॉल देखि तो वो सब समझ गई की बात कुछ और है| कुछ देर बाद उन्होंने मुझसे शाल के बारे में पुछा तो मैंने उन्हें ये कहा की हॉस्पिटल के बाद मैं अनु से मिलने गया था और उसी ने ये शॉल दी है| भाभी बस मुस्कुरा दी और चली गईं, अब रितिका मुझसे छुपती फिर रही थी| मेरी भी मजबूरी थी की घर में सब मौजूद थे और उनके सामने मेरा उसे कुछ कहना लाखों सवाल खड़े कर देता| हम दोनों चूँकि कई दिनों से बात नहीं कर रहे थे और जब से मैं घर पहुँचा था तब से तो रितिका डरी-डरी सी रहती थी| अब इस पर सवाल उठना तो तय था.....
update 78 (2)
अब तक आपने पढ़ा....
हम दोनों चूँकि कई दिनों से बात नहीं कर रहे थे और जब से मैं घर पहुँचा था तब से तो रितिका डरी-डरी सी रहती थी| अब इस पर सवाल उठना तो तय था.....
अब आगे....
"क्यों भाई मानु क्या बात है? जब से हम लोग आये हैं देख रहे हैं की रितिका और तुम बात भी नहीं करते? कहाँ तो पहले तुम उसका इतना ख्याल रखते थे, घर-परिवार की मर्जी के खिलाफ जा कर उसे पढ़ा रहे थे! और तो और उसकी शादी में भी तुम विदेश चले गए? क्या नाराजगी है, हमें भी बताओ?" मौसा जी बोले|
"मौसा जी जिस उल्लू को पढ़ाने के लिए इतने पापड़ बोले वो कमबख्त पढ़ाई-लिखाई छोड़ कर इश्क़-मोहब्बत करती फ़िरे, ऐसे एहसान फरामोश इंसान से क्या बात करना? यहाँ तक की मैं तो शहर में रहता था, मुझे तक इस बात की खबर नहीं की ये इश्क़ लड़ा रही हैं! जिस इंसान को मैं हमेशा डाँट से बचाता था वही इंसान जब मुझे सबसे डाँट पड़ रही थी खामोश था, यही नहीं इसने मुझे शादी के लिए रुकने तक को नहीं बोला तो मैं क्यों रुकता? मुझे इतना अच्छा मौका मिला अमेरिका जाने का, काम सीखने का, एक बिज़नेस से जुड़ने का अपना हमसफ़र चुनने का तो ऐसा मौका मैं कैसे छोड़ देता!" मेरा जवाब सुन कर मौसा जी बस मुस्कुरा दिए और बोले; "ठीक है बेटा पर अब तो सब सही हो गया ना? अब तो माफ़ कर दे इसे?!"
"नहीं मौसा जी! इतने कम पाप नहीं किये इसने की इसे माफ़ी दे दी जाए! फिर मेरे अकेले के ना बात करने से इसे क्या फर्क पड़ेगा? आप सब तो हो ना इससे बात करने को?!"
"चलो भाई, जैसी तुम्हारी मर्जी! पर ये बताओ सारा समय ये कम्प्यूटर ले कर बैठे रहते हो, शादी तुम्हारी है थोड़ा काम-वाम देखा करो!" मौसा जी शिकायत करते हुए बोले पर इसका जवाब ताऊ जी ने ही दे दिया;
"तुम्हें पता भी है ये क्या काम करता है? अमेरिका की कंपनी का काम है ये! वहाँ हमारे देश की तरह लोग छुट्टियाँ नहीं मारते, कमाई डॉलरों में होती है! $1 मतलब 70 -75 रुपये! इस काम के इसे 1 लाख डॉलर मिल रहे हैं!!!!" ताऊ जी के मुँह से इतनी बड़ी रकम सुन कर सब के कान खड़े हो गए थे और पूरे घर में मेरी तारीफें शुरू हो गई थीं! इधर मुझे रितिका की क्लास लेनी थी पर वो किसी न किसी सदस्य के साथ चिपकी हुई थी, पर आखिर वो कब तक मुझसे भागती! रात को मैं सोने जल्दी चला गया, नेहा मेरे साथ ही चिपकी सो रही थी| मेरा कमरा सब समान से भरा था और वहाँ जाने की किसी को भी इज़ाजत नहीं दी गई थी| ताऊ जी का कहना था की जब तक नई बहु नहीं आ जाती तब तक उस सामान को कोई नहीं छुएगा! रात को ग्यारह बजे नेहा ने सुसु किया और उसके डायपर के साथ उसके कपडे भी खराब हो गए| मेरी बेटी ने मुझे उसकी माँ की क्लास लेने का मौका दे दिया था| मैंने पहले तो नेहा का माथा चूमा और किलकारियां मारते हुए अपने हाथ पाँव चलाने लगी| मानो उसे भी मजा आ रहा हो की आज उसकी माँ की क्लास लगने वाली है! फिर मैंने उसके सारे कपडे निकाले और उसे कंबल ओढ़ा दिया, कमरे में हीटर चालु किया ताकि कमरा गर्म बना रहे| मैं अपने कमरे से बाहर निकला और जा कर रितिका के कमरे का दरवाजा खटखटाया| वो घोड़े बेच कर सोइ थी, इसलिए दस मिनट तक खटखटाने के
बाद उसने दरवाजा खोला| जैसे ही उसने मुझे देखा उसकी फ़ट गई और आँखें अपने आप झुक गईं| एक तो बाहर ठंड में 10 मिनट से खड़ा होना पड़ा और ऊपर से अनु की हालत देख कर जो गुस्सा आया था उससे मेरा जिस्म जलने लगा| मैंने रितिका का गला पकड़ लिया और उसे ढकेलते हुए अंदर आया और उसे उसी के बिस्तर पर गिरा दिया| रितिका छटपटा रही थी ताकि मैं उसका गाला छोड़ दूँ; "कल अगर अनु को कुछ हो जाता ना तो आज मैं तुझे जिन्दा जला देता! आज आखरी बार तुझे बताने आया हूँ, अगर तूने कोई भी लगाईं-बुझाई की ना तो अपनी खेर मना लियो फिर! मुझे मिनट नहीं लगेगा तेरी जान लेने में!" मेरी पकड़ रितिका के गले पर तेज थी और अगर दो मिनट और उसका गला नहीं छोड़ता तो वो पक्का मर जाती| मैंने जैसे ही उसका गाला छोड़ा वो साँस लेने की कोशिश करते हुए छटपटाने लगी! मैंने नेहा के कपडे लिए और वापस अपने कमरे में आ गया| नेहा अब भी जाग रही थी और कंबल के अंदर अपने हाथ-पैर मार रही थी| कुछ देर पहले जो मुझे गुस्सा आ रहा था वो रितिका को देख कर गायब हो गया था| नेहा को अच्छे से कपडे पहना कर मैं उसे अपनी छाती से चिपका कर सो गया|
अगली सुबह मोहिनी आ गई और चूँकि सब उसे सब जानते थे तो सब ने उसका बड़ा अच्छा स्वागत किया और बाकी रिश्तेदारों से मिलवाया| रितिका तो जैसे उसे देख कर वहीँ जम गई, उसकी साँस ही अटक गई! वो जानबूझ कर आगे नहीं आई और काम करने की आड़ में छिपी रही| आखिर मोहिनी को ही उसका नाम ले कर उसे बाहर बुलाना पड़ा, रितिका उसके सामने सर झुकाये खड़ी हो गई| मोहिनी ने आगे बढ़ कर उसे गले लगाया ताकि किसी को कुछ शक ना हो और उसके कान में खुसफुसाई; "तेरी जैसी गिरी हुई लड़की मैंने आज तक नहीं देखि! अगर तुझे यही खेल खेलना था तो बता देती, कम से कम मैं शादी तो ना करती और आज मैं और मानु जी एक होते! सच में तुझे मेरी भी हाय लगेगी!" इतना कहते हुए, अपने चेहरे पर जूठी मुस्कान लिए मोहिनी ऋतू से अलग हुई| "तो ताऊ जी, दूल्हे मियाँ कहाँ है?" मोहिनी ने चहकते हुए पुछा| मैं उस वक़्त छत पर नेहा को गोद में लिए कॉल पर बात कर रहा था| ताऊ जी ने जब उसे छत पर मेरे होने का इशारा किया तो मोहिनी कूदती हुई ऊपर आ गई| दरअसल मोहिनी घर के चप्पे-चप्पे से वाक़िफ़ थी क्योंकि वो मेरी गैरहाजरी में रितिका की शादी में आई थी| मैंने कॉल disconnect किया और जैसे ही पलटा की मोहिनी मुस्कुराती हुई मुझे दिखी| फिर उसकी नजर नेहा पर गई और वो सोचने लगी शायद किसी रिश्तेदार की बेटी है इसलिए वो सीधा मेरे पास आई; "दूल्हे मियाँ! कितना काम करोगे?" मोहिनी ने हँसते हुए पुछा|
"यार वो थोड़ा काम ज्यादा है, अनु भी बहुत बिजी है!" मैंने कहा|
"चलो मैं आ गई हूँ तो मैं यहाँ काम संभाल लूँगी!" मोहिनी मुस्कुराते हुए बोले|
"मेरी बेटी से तो मिलो?" मैंने मोहिनी का परिचय नेहा से कराते हुए कहा पर ये सुन कर वो सन्न रह गई और आँखें फाड़े मुझे देखने
लगी!
"ये.....तुम्हारी बेटी......सच में?" मोहिनी हैरानी से बोल भी नहीं पा रही थी|
"हाँ जी!.... मेरी बेटी!" मैंने आत्मविश्वास से कहा| मेरा आत्मविश्वास देख उसकी हैरानी गायब हुई और मैंने उसे सब सच बता दिया| मोहिनी ने नेहा को मेरे हाथ से लेना चाहा पर नेहा ने मेरी कमीज पकड़ रखी थी| "बेटा ये मोहिनी आंटी हैं, पापा की बेस्ट फ्रेंड!" मैंने तुतलाते हुए नेहा से कहा तो वो मुस्कुराने लगी और मोहिनी की गोद में चली गई| "पापा की सारी बातें मानती है? Good girl!! वैसे इसकी नाक बिलकुल तुम्हारी जैसी है!" मोहिनी ने नेहा की नाक पकड़ते हुए कहा| मोहिनी के मन के विचार मैं पड़ग पा रहा था, उसके दिल में अब मेरे लिए प्यार था| वो बस इस प्यार को दबाये हुए थी और किसी के भी सामने उसे नहीं आने देती थी| पर आज नेहा को गोद में लेने के बाद उसके मन में एक टीस उठी! टीस मुझे ना पाने की, टीस मेरे साथ एक छोटा संसार न बसा पाने की और टीस एक बच्चे के ना होने की! मोहिनी की आँखें छलछला गईं और वो नेहा को पाने गले से चिपकाते हुए रो पड़ी| मैंने मोहिनी को गले लगा लिया और उसे के सर पर हाथ फेरते हुए उसे चुप कराया| मैं समझ सकता था की उसे रितिका की करनी का कितना दुख है और अभी तो वो उसके काण्ड से अपरिचित थी वर्ण वो उसकी खाट खड़ी कर देती! "Hey...Hey....Hey calm down! शायद हमारा मिलना नहीं लिखा था!" मैंने कहा और मोहिनी के आँसूँ पोछे| "लिखा तो था पर ..... रितिका नाम के ग्रहण ने मिलने नहीं दिया!" मोहिनी ने खुद को गाली देने से रोकते हुए कहा| अब मैंने बात बदलने के लिए उससे उसके और उसके पति के बारे में पुछा और ये भी की वो कब खुशखबरी दे रही है| उसने बताया की उसके पति को गल्फ में जॉब मिल गई इसलिए वो शादी के बाद वहाँ चला गया| महीने-दो महीने में उसका भी पासपोर्ट आ जायेगा और फिर वो भी चली जायेगी! मुझे ये जानकार बहुत ख़ुशी हुई और हम छत पर खड़े बातें कर रहे थे की तभी वहाँ भाभी आ गई; "लगता है अनु को बोलना पड़ेगा की उसका दूल्हा यहाँ कुछ ज्यादा ही 'फ्री' हो गया है!" भाभी ने मजाक करते हुए कहा| "भाभी मैं अपनी होने वाली बीवी से कुछ नहीं छुपाता| वो तो मोहिनी से मिली भी है|" फिर मैंने भाभी को उस दिन का सारा किस्सा सुना दिया| "देखा भाभी मुझे तो शुरू से ही शक था!" मोहिनी मुस्कुराते हुए बोली| "तो मुझे क्यों नहीं बताया?" भाभी ने कहा और फिर हम सारे हँसने लगे|
अब चूँकि मोहिनी आ गई थी तो घर में मुझे एक दोस्त मिल गया था| जब कभी मैं काम में बिजी होता तो नेहा उसी के पास होती| मोहिनी अपनी बातों से सभी का मन लगाए हुए थी और बाकी दिन कैसे निकले पता ही नहीं चला| जो भी रस्में शादी वाले दिन से पहले निभाई जानी थीं वो सभी प्रेमपूर्वक निभाईं गईं और मोहिनी ने बहुत सारी फोटो क्लिक करीं| हमारे गाँव में शादी के एक दिन पहले पूजा होती है और उसमें दूल्हे को हल्दी लगाई जाती है| जब ये समरोह शुरू हुआ तो
मुझे एक सफ़ेद पजामा-कुरता पहना कर पहले पूजा में बिठाया गया और उसके बाद हल्दी लगना शुरू हुई| मैंने कुरता उतार दिया और आलथी-पालथी मार कर आंगन में बैठ गया| सबसे पहले माँ, ताई जी और भाभी ने मुझे हल्दी लगाई| भाभी को तो मेरी मस्ती लेने का मौका मिल गया और उन्होंने मेरा गाला और छाती हल्दी से लबेड दिया! उसके बाद सभी औरतों ने मेरे हल्दी लगाईं| इस समारोह की एक-एक फोटो और वीडियो मोहिनी ने ही शूट की! फोटोग्राफर वाला भाई भी कहने लगा दीदी मुझसे अच्छी फोटो तो आप खींच रही हो और उसकी इस बात पर सब ने मोहिनी की बड़ी तारीफ की|
शादी वाले दिन सुबह-सुबह ताऊ जी किसी को फ़ोन पर बहुत डाँट रहे थे, जब मैंने पुछा तो उन्होंने बात टाल दी| कुछ ही घंटों बाद घर के आगे एक चम-चमकती हुई रॉयल ब्लू फोर्ड इकोस्पोर्ट खड़ी हो गई| (दरअसल वो डिलीवरी लेट होने के लिए मैनेजर को डाँट रहे थे!)
ताऊ जी ने मुझे आवाज मार के नीचे बुलाया और गाडी देख मेरी आँखें चौंधियाँ गई! "ताऊ जी????..... ये आपने???? ....... पर क्यों???" मैंने पुछा|
"तो हमारी बहु क्या फटफटी के पीछे बैठ कर आती?" ताऊ जी ने सीना ठोक कर कहा और चाभी मुझे दी; "ये ले बेटा! तेरा शादी का तौहफा .... बड़ी मुश्किल हुई इसे ढूंढने में! बजार में इतनी गाड़ियाँ हैं की समझ ही नहीं आया की कौन सी खरीदूँ? फिर हमने मोहिनी बिटिया से पुछा तो उसने बताया की ये वाली मानु को पसंद है!" मैंने पलट के मोहिनी की तरफ देखा तो वो नेहा को गोद में लिए बहुत हँस रही थी! मैंने ताऊ जी और पिताजी के पाँव छुए और उन्होंने मुझे गले लगा लिया| घर में आया हर एक इंसान खुश था सिवाय एक के!
खेर शाम चार बजे तक सब तैयार हो गए थे और घर के बाहर एक के पीछे एक 3 बसें भी खड़ी थीं ताकि बाराती venue तक पहुँच सकें| मेरे दोस्त यानी अरुण-सिद्धार्थ डायरेक्ट हमें वहीँ मिलने वाले थे| ताऊ जी ने सब को जल्दी बैठने को कहा, अभी मैं पूरा तैयार नहीं हुआ था इसलिए जैसे ही मैंने ताऊ जी की आवाज सुनी तो मैं बनियान पहने ही नीचे आया| "ताऊ जी आप सब को भेज दीजिये बस, आप, मैं, पिताजी, माँ और ताई जी गाडी से जायेंगे| आज पहली ride मैं आप सब के साथ चाहता हूँ!" ताऊ जी को मेरी बात जच गई इसलिए उन्होंने सब को भेज दिया बस हम लोग ही रह गए| जब मैं तैयार हो कर नीचे आया तो जो लोग बच गए थे वो सब मुझे देखने लगे और उनकी आँखें नम हो गईं|
माँ ने फ़ौरन मुझे काजल का टीका लगाया| फिर एक-एक कर सब ने मुझे गले लगाया और आखिकार हम निकले! बसें पहले पहुँचीं और फिर हुई हमारी Grand Entry! गाडी ठीक Wedding Hall के सामने रुकी और हमें गाडी से उतरता देख मम्मी-डैडी समेत उनके सारे रिश्तेदार हैरान हो गए| सब की नजर बस मेरे ऊपर ही टिकी थी क्योंकि मैं शेरवानी में लग ही इतना हैंडसम रहा था की क्या कहें! मेरे दोनों दोस्त अरुण-सिद्धार्थ मेरे साथ खड़े हो गए थे और उन्हीं के साथ मोहिनी भी अपनी लेहंगा
चोली में बड़े रुबाब के साथ खड़ी हो गई| "हमारा दूल्हा आ गया अपनी दुल्हन को लेने!" सिद्धार्थ जोर से बोला और सभी ने शोर मचाना शुरू कर दिया| पीछे-पीछे बैंड-बाजा शुरू हो चूका था, इधर मम्मी-डैडी जी हाथ में आरती की थाली लिए खड़े हुए थे| मेरी आरती उतारी गई और फिर सबकी मिलनी हुई| यहाँ मैं बेसब्र हो रहा था क्योंकि मुझे अनु को देखना था पर सारे मिलनी में ही लगे हुए थे| बड़ी देर बाद एंट्री हुई! (वैसे बस 15 मिनट ही लगे थे पर मुझे तो ये समय घंटों का लग रहा था!)
मुझे तो podium पर बिठा दिया गया और एक-एक कर अनु के सभी रिश्तेदारों से मिलवाया गया पर मेरी नजर तो अनु को ढूँढ रही थी| वैसे ज्यादा लोगों की gathering नहीं हुई थी करीब 100 एक आदमी आये होंगे, जिसमें ज्यादातर मेरे परिवार से ही थे! गाना बज रहा था: 'तेरे इश्क़ में जोगी होना!' और इधर मैं जोगी बने-बने ऊब गया था! कुछ देर बाद आखिर मुझे विवाह वेदी पर बैठने को कहा गया जहाँ पंडित जी मंत्र जाप कर रहे थे! मैं बार-बार गर्दन इधर-उधर घुमा कर अनु के आने का रास्ता देख रहा था| अब दोस्तों को मजे लेने थे सो वो आ गए और मेरे पीछे बैठ गए; "भाई थोड़ा सब्र रख, भाभी बस आने वाली है!" अरुण बोला| "यार ये औरतों का तैयार होना कसम से बहुत बड़ा ड्रामा है! यहाँ इंतजार कर-कर के हालत बुइ है और इन्हें कोई होश ही नहीं!" मैंने कहा| सही मायने में उस दिन मुझे एहसास हो रहा था की औरतें कितना टाइम लगाती हैं तैयार होने में! पर जब अनु की एंट्री हुई तो मैं पलकें झपकना भूल गया, मेरा मुँह खुला का खुला रह गया, आँखें जितनी फ़ट कर बाहर आ सकती थी उतनी फ़ट चुकी थीं!
मैं उठ कर खड़ा हुआ और इधर अनु शर्माते हुए नजरें झुकाये आई और उसके साथ उसकी वो बेस्ट फ्रेंड भी आई| पर मेरी नजरें तो अनु पर गड़ी थीं, उसकी नजरें झुकी हुई थीं| उसने अभी तक मुझे नहीं देखा था| "क्यों भाई अब तो चैन मिल गया तुझे?" सिद्धार्थ बोला| "यार जितना भी टाइम लिया पर जो खूबसूरती दिख रही है उसके आगे ये इंतजार भी सोखा लग रहा है!" मैंने कहा जिसे सुन कर अरुण-सिद्धार्थ दोनों हँसने लगे| "जानेमन! जरा नजर उठा कर हमें भी देख लो, हम भी आपकी नजरों से घायल होना चाहते हैं|" मैंने अनु से खुसफुसाते हुए कहा| तब जा कर अनु ने अपनी नजरें उठाई और मुझे देखा, ये सब इतने स्लो मोशन में हुआ की लगा मानो ये पल यहीं रुक गया हो| "हाय! कहीं मेरी ही नजर आपको ना लग जाए!" अनु ने खुसफुसाते हुए जवाब दिया|
मैंने सिद्धार्थ से माइक माँगा और उसने मुझे माइक ला कर दिया;
"क्या पूछते हो शोख निगाहों का माजरा,
दो तीर थे जो मेरे जिगर में उतर गये|"
मैंने अनु की इबादत में जब ये शेर पढ़ा तो ये सुन सारे लोग तालियाँ बजाने लगे| ये शोर सुन अनु को बहुत गर्व हुआ और उसने मुझसे माइक माँगा और जवाब में एक शेर पढ़ा;
"जर्रूरत नहीं है मुझे घर में आइनों की अब,
उनकी निगाहों में हम अपना अक्स देख
लेते हैं...."
अनु का शेर सुन तो पूरे हॉल में शोर गूँज गया| हमारे माता-पिता हम पर बहुत गर्व कर रहे थे| तभी मोहिनी मेरे पीछे खड़े होते हुए बोली; "एक शायर को उसकी कविता मिल गई!" ये सुन कर अनु की नजर मोहिनी पर पड़ी और उसके चेहरे की ख़ुशी बता रही थी की वो हम दोनों के लिए कितनी खुश है|
खेर विधि-विधान से शादी की सारी रस्में हुईं और इस पूरे दौरान हम दोनों बहुत खुश दिख रहे थे| उसके बाद खाना-पीना हुआ, फोटो खिचवाने का काम हुआ और ये सब निपटाते-निपटाते रात के 3 बज गए| घर आते-आते सुबह हो गई थी, बड़े रस्मों-रिवाज के साथ अनु का गृह प्रवेश हुआ| भाभी ने मेरा कमरा सजा दिया था और अनु को अंदर बिठा दिया गया था| मुझे अब भी नीचे रोक कर रखा हुआ था, कुछ देर बाद जब भाभी नीचे आईं तो मेरा हाथ पकड़ कर मुझे मेरे कमरे तक ले गईं और बाहर चौखट पर खड़े हो कर बोलीं; "मेरी देवरानी का ख्याल रखना!" भाभी ने बड़े naughty अंदाज में ये कहा| पहले कुछ सेकंड तो मैं इसे समझने की कोशिश करने लगा और जब समझ आया तब तक भाभी का खिल-खिलाकर हँसना शुरू हो चूका था| "मेरे बुद्धू देवर! जाओ जल्दी अंदर तुम्हारी पत्नी इंतजार कर रही है!" इतना कहते हुए उन्होंने मुझे अंदर धकेला और दरवाजा बाहर से बंद कर दिया| इधर मैंने भी सेफ्टी के लिए अंदर से कुण्डी लगा दी की कहीं वो दुबारा अंदर ना आ जाएँ! हा...हा...हा...हा!!!
update 79
कमरे में भाभी ने मद्धम सी रौशनी कर रखी थी, जो माहौल को रोमांटिक बना रही थी| बेड के बगल में एक गिलास रखा था जिसमें दूध था! ये बड़ा ही ख़ास दूध होता है, मेरे दोस्त संकेत ने मुझे बताया था की ये दूध बहुत जबरदस्त होता है! जब मेरी नजर अनु पर पड़ी तो वो गठरी बनी पलंग पर सर झुका कर बैठी थी, लाल जोड़े में आज वो क़यामत लग रही थी! आज हमें रोकने वाला कोई नहीं था, जो बंदिश मैंने खुद पर रखी थी आज वो टूटने वाली थी! मैंने धीरे-धीरे अनु के पास पहुँचा और पलंग पर बैठ गया| अनु के पाँव जो मुझे दिख रहे थे, उसने वो अपने घूँघट के अंदर छिपा लिए| मैंने हाथ बढ़ा कर अनु का घूँघट उठाया तो देखा अनु सर झुकाये नीचे देख रही है| उसके होठों की लाली देख मेरा दिल मचलने लगा था! फिर मुझे दूध के बारे में याद आया तो मैंने वो गिलास उठाया और आधा पिया, उसका स्वाद बहुत गजब का था या फिर ये अनु के हुस्न का जादू था जिसके कारन में कुछ ज्यादा imagine करने लगा था| मैंने वो आधा दूध का गिलास अनु को दिया, अब वो बेचारी शर्म से लाल अपनी नजरें उठा कर मुझे देखना ही नहीं चाह रही थी| किसी तरह उसने वो गिलास पकड़ा और आँख बंद कर के दूध पिया| दूध पी कर खाली गिलास रखने लगी तो मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और खुद गिलास टेबल पर रखा| उसके बाद मैं वापस सीधा बैठ गया और अनु को देखने लगा| कुछ भी करने की जैसे हिम्मत ही नहीं हो रही थी! मैं सोचने लगा शायद अनु कुछ पहल करे तो मुझे आगे बढ़ने में आसानी हो और उधर अनु का
दिल धाड़-धाड़ कर के बजने लगा था| अनु का ये पहला मौका था और वो बेचारी शायद उम्मीद कर रही थी की मैं कुछ करूँगा! करीब 20 मिनट तक हम दोनों ही चुप बैठे थे, अनु की नजरें नीचे थीं और मेरी आँखें बस अनु पर टिकी थीं| मैंने नोटिस किया की अनु के होंठ थरथरा रहे हैं, मैंने इसे ही एक आमंत्रण समझा और मैं अनु के करीब खिसक कर बैठ गया| पर अनु ने कोई रिएक्शन नहीं दिया, इधर मुझे झिझक होने लगी! 5 मिनट तक मैं मन ही मन इस झिझक से लड़ने लगा और फिर यही सोचा की जो भी होगा देख लेंगे! मैने अपने दोनों हाथों से अनु के दोनों कंधे पकडे और उसे धीरे से पीछे धकेल कर लिटा दिया| अनु एक दम से सीधा लेट गई और मैं उसके ऊपर झुक गया, जाने मुझे ऐसा लगा की शायद अनु ये सब नहीं करना चाहती और मुझे उसका ये विचार ठीक लगा क्योंकि अब मुझ में आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं हो रही थी! बड़ी हिम्मत जूता कर मैंने उससे पुछा; "You don’t want to do it?” पर ये सुन कर अनु ने अपनी झुकी हुई नजर ऊपर उठा ली और मेरी आँखों में देखने लगी| अनु की आँखों में मुझे अपने लिए प्यार नजर आया पर सेक्स के लिए झिझक भी नजर आई| अब मुझ में थोड़ी हिम्मत आ गई, मैंने अपने दाएँ हाथ से अनु के बाएँ गाल को सहलाया और अपना सवाल फिर से दुहराया; "बेबी! अगर आपका मन नहीं है तो its okay! कोई problem नहीं!" ये सुन कर तो जैसे अनु को विश्वास ही नहीं हुआ की भला कोई आदमी सुहाग की सेज पर अपनी पत्नी से सेक्स करने के लिए उसकी मर्जी पूछ रहा हो! वो खामोश नहीं रहना चाहती थी पर लफ़्ज उसके गले में घुट कर रह गए| अनु ने अपनी दोनों बाहें मेरी गर्दन पर लॉक कीं और मुझे अपने ऊपर और झुका लिया| अब मुझे विश्वास हो गया की अनु ने मुझे सहमति दे दी है|
मैंने धीरे से अनु के लबों को अपने लबों में कैद कर लिया, फिर धीरे-धीरे मैंने उसके लबों को चूसना शुरू किया| मैं अनु के होठों को धीरे-धीरे, एक-एक कर चूस रहा था, उनका स्वाद बिलकुल गुलाब की पंखुड़ियों सा था| इधर मेरे Kiss के कारन अनु ने रियेक्ट करना शुरू कर दिया था, उसके हाथ मेरी गर्दन से रेंगते हुए मेरी पीठ पर पहुँच गए थे| मैंने एक पल के लिए अनु के होठों को अपने होठों की गिरफ्त से आजाद किया और मैं दुबारा से उन्हें अपने मुँह में भरता, उससे पहले ही अनु ने मेरे निचले होंठ को अपने मुँह में भर कर धीमे-धीमे चूसने लगी! ये अनु के लिए नया एहसास था इसलिए घबराहट उसके इस अंदाज में साफ़ दिख रही थी| दो मिनट बाद अब समय था अगले कदम का, मैंने धीरे से अपनी जीभ आगे सरकाई और अनु ने अपना मुँह खोल कर उसका स्वागत किया| अनु की जीभ इतनी खुश हुई की वो भी मेरी जीभ से मिलने आगे आई और दोनों का मिलन हुआ| इस Kiss के कारन अनु अब काफी खुल गई थी और हम दोनों अब शिद्दत से एक दूसरे को Kiss करने लगे थे| कभी अनु अपनी जीभ आगे करती और मैं उसे चुस्त तो कभी मैं अपनी जीभ अनु के मुँह में दाखिल कर देता! करीब 10 मिनट के इस रस
पान के बाद अब हम दोनों के जिस्म ही गर्म हो चुके थे और ये कपडे अब रास्ते की बाधा थे| मैंने अनु के चंगुल से अपनी जीभ निकाली और उसका हाथ पकड़ के उसे बिठाया| मैंने अपने कपडे उतारने शुरू किये और अनु ने अपने जेवर उतारने चाहे, "इन्हें मत उतारो!" मैंने कहा| कुछ सेकण्ड्स के लिए अनु सोच में पड़ गई की मैं क्या कह रहा हूँ; "ये आप पर बहुत अच्छे लगते हैं!" मैंने कहा और तब जा कर अनु को समझ आया| मैं तो अपनी शेरवानी उतार चूका था पर अनु अभी अपने हाथ पीछे मोड़ कर अपनी चोली की डोरी खोलने जा रही थी| मैंने फ़ौरन आगे बढ़ कर उसकी चोली की डोरी धीरे से खोली| मुझे ऐसा करता देख अनु शर्म से लाल हो गई और उसने अपनी चोली आगे से अपने दोनों हाथों को अपने स्तन पर रख कर पकड़ ली| मैं आके अनु के सामने बैठ गया, उसकी नजरें झुक गईं थीं| मैंने अनु की ठुड्डी पलकड़ कर ऊँची की तो पाया उसने आँखें मूँद रखी हैं| मैंने दोनों हाथों से अनु के दोनों हाथ उसके स्तन के ऊपर से हटाए और उसके जिस्म से चोली निकाल कर नीचे गिरा दी| अनु के पूरे जिस्म में डर की कंपकंपी छूट गई! अनु अब मेरे सामने लाल रंग की ब्रा पहने बैठी थी और उसकी आँखें कस कर बंद थी| उसके हाथ बिस्तर पर थे और काँप रहे थे| मैंने अनु का बायाँ हाथ उठाया और उसे चूमा ताकि अनु थोड़ा नार्मल हो जाये और हुआ भी कुछ वैसा ही| मेरा उसके हाथ चूमते ही वो शांत हो गई, फिर मैं अनु के और नजदीक आया और उसके बाएं गाल को चूमा| अनु ने एक सिसकी ली; "ससस!!!" फिर मैंने अपने दोनों हाथ पीछे ले जा कर अनु की ब्रा के हुक खोल दिए पर ब्रा को उसके जिस्म से अलग नहीं किया| मैंने अनु को धीरे से वापस लिटा दिया और मैं उसकी बगल में लेट गया| मैंने अपने बाएँ हाथ को उसके बाएँ गाल पर फेरा, अनु समझ नहीं पाई की हो क्या रहा है| वो तो उम्मीद कर रही थी की मैं उस पर चढ़ जाऊँगा और यहाँ मैं धीरे-धीरे उसके जिस्म को बस छू भर रहा था| दो मिनट बाद मैं उठा और अपनी दोनों टांगें अनु के इर्द-गिर्द मोड़ी और उसके लहंगे को खोलने लगा| जैसे ही लहंगा खुला अनु ने अपने दोनों हाथों से पलंग पर बिछी चादर पकड़ ली| अब भी उसकी आँखें बंद थी और डर के मारे उसके दिल की धड़कनें बहुत तेज थीं| मैंने धीरे-धीरे लहंगा निकाल दिया और नीचे गिरा दिया| अब अनु मेरे सामने एक लाल ब्रा पहने जो की उसकी छाती सिर्फ ढके हुए थी और एक लाल रंग की पैंटी पहने पड़ी थी| जैसे ही मैंने अपनी उँगलियाँ पैंटी की इलास्टिक में फँसाई अनु काँप गई| मैनेजैसे ही पैंटी नीचे धीरे-धीरे सरकानी शुरू की उसने तुरंत अपने हाथों से चादर छोड़ी और अपनी पैंटी के ऊपर रख उसे ढक दिया| मैं उसी वक़्त रुक गया और अनु के मुँह की तरफ देखने लगा| करीब मिनट बाद अनु को लगा की कहीं मैं नाराज तो नहीं होगया इसलिए उसने अपनी आँख धीरे से खोली और मुझे अपनी तरफ प्यार से देखते हुए पाया| ये देखते ही वो फिर शर्मा
गई, मैंने मुस्कुराते हुए फिर से उसकी पैंटी नीचे सरकानी शुरू की पर उसे केवल उसकी ऐड़ी तक ही नीचे ला पाया क्योंकि अनु ने अपनी टांगें कस कर भींच ली थीं| उसके दोनों हाथ उसकी बुर के ऊपर थे और मैं अभी तक अनु के पूरे जिस्म का दीदार नहीं कर पाया था|
मैं अनु के ऊपर आ गया, उसे लगा की मैं उसकी ब्रा हटाऊँगा और अब वो मुझे रोक भी नहीं सकती थी क्योंकि तब उसे अपना एक हाथ अपनी बुर के ऊपर से हटाना पड़ता! पर मैंने अनु के निचले होंठ को चूसना शुरू किया और अपनी जीभ उसके मुँह में घुसेड़ दी| मेरा पूरा वजन अनु पर था इसलिए उसने अपने दोनों हाथ अपनी बुर के ऊपर से हटा दिए और मेरी पीठ पर रख कर मुझे खुद से चिपका लिया ताकि मेरे जिस्म से उसका जिस्म ढक जाए! अगले दस मिनट तक हम एक दूसरे को धीरे-धीरे Kiss करते रहे और अब अनु की शर्म कुछ कम हुई थी जिसके फल स्वरुप उसने खुद अपनी पैंटी निकाल दी थी और अपनी दोनों टांगें मेरी कमर पर लॉक कर ली थी| दस मिनट बाद जब मैंने अनु के ऊपर से उठना चाहा तो उसने अपनी पकड़ और कस ली क्योंकि वो नहीं चाहती थी की मैं उसे बिना कपडे के देखूँ! "बेबी! मुझसे कैसी शर्म?" मैंने धीरे से अनु के कान में खुसफुसाते हुए कहा| पर ये अनु की शर्म कम और सेक्स के प्रति उसका डर था! अनु ने मेरी बात मानी और अपने हाथ और पैर ढीले छोड़ दिए पर उसने अपनी आँखें कस कर बंद कर रखी थीं| मैं वापस नीचे खिसक आया और अनु के दोनों घुटने पकड़ कर उन्हें खोलने लगा| अनु ने फिर से चादर अपने दोनों हाथों से कस कर पकड़ ली| मैंने धीरे-धीरे अनु की टांगें खोली और उसकी चिकनी और साफ़ सुथरी बुर देखि! दूध सी गोरी उसकी बुर और वो पतले-पतले गुलाबी रंग के होंठ देख मैं दंग रह गया| मैं अपने आप ही उस पर झुक गया और पहले उन गुलाबी होठों को चूमा| मेरे चूमते ही अनु की जोरदार सिसकारी निकली; "स्स्सस्स्स्साआह!" अनु ने अपनी टांगें बंद करनी चाही पर तब तक मैंने अपने दोनों हाथ उसकी जाँघों पर रख दिए थे और अनु अब अपनी टांगें फिर से बंद नहीं कर सकती थी| मैंने अपनी जीभ निकाली और अनु के भगनासे को छेड़ा, अनु के जिस्म में हरकत हुई और उसका पेट कांपने लगा| "सससस....आह!" अनु ने एक और सिसकारी ली| मैं जितनी अपनी जीभ बाहर निकाल सकता था उतनी निकाली और नीचे से अनु के भगनासे तक एक बार चाटा| अनु मस्ती से भर उठी और अपना सर इधर-उधर पटकने लगी! मैंने अपना मुँह खोला और उसके बुर के होठों को अपने मुँह में भर लिया और उन्हें चूसने लगा, इससे तो अनु की हालत खराब हो गई| उसने अपने दोनों हाथों से पकड़ रखी चादर छोड़ी और मेरे सर पर हाथ रख कर उसे अपनी बुर पर दबाने लगी| पूरा कमरा उसकी सिसकारियों से गूँज उठा था| "स्स्सस्स्स्स...आह...सससस......ममम.....ससस.....आह....हहह...ममम....आ साससससस....
" इधर मुझे अनु के बुर के होठों से एक मीठे-मीठे इत्र की महक आ रहे थी और मैं पूरी शिद्दत से उन्हें चूसने लगा| 5 मिनट नहीं हुए और अनु भरभरा कर झड़ गई और उसका नमकीन पानी मेरे मुँह में षड की तरह भरने लगा| मैं भी किसी भालू की तरह उस रस की एक-एक बूँद को चाट कर पी गया| इस बाढ़ के कारन अनु की सांसें बहुत तेज हो गईं थीं, जब मैं अनु की टांगों के बीच से निकल कर सीधा हुआ तो मैंने अनु को देखा| वो आँख मूंदें हुए अपने स्खलन को एन्जॉय कर रही थी! दो मिनट बाढ़ उसने आँखें खोली और मेरी तरफ देखने लगी और फिर बुरी तरह शर्मा गई और अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपा लिया| मैं भी उसकी इस हरकत को देख मुस्कुराने लगा पर अभी तक हम दोनों में से किसी ने भी मेरे फूल कर कुप्पा हुए लंड को नहीं देखा था! मैं अनु की बगल में लेट गया और अनु ने मेरी तरफ करवट ले ली पर उसने अभी तक अपने हाथ नहीं हटाए थे|
मैंने भी उस पर कोई जोर जबरदस्ती नहीं की क्योंकि मैं चाहता था की उसकी ये शर्म धीरे-धीरे खत्म हो| पांच मिनट बाढ़ अनु ने अपने दोनों हाथ अपने चेहरे से हटाए और मेरे चेहरे की तरफ देखने लगी, पर मैं तो कब से उसे ही देख रहा था| अनु ने दाएँ हाथ को मेरी छाती पर रख दिया और खामोशी से मुझे देखती रही| मैंने अपने दाएँ हाथ से उसके सर पर हाथ फेरा और अनु मुस्कुराने लगी| उसके मोती से सफ़ेद दाँत आज बहुत सुन्दर लग रहे थे| अनु का दाहिना हाथ मेरी छाती पर घूमने लगा और गलती से सरकते हुए मेरे लंड पर पहुँच गया| लंड का उभार महसूस होते ही अनु ने एक दम से हाथ हटा लिया और फ़ौरन अपनी आँखें उस उभार की तरफ की| उस उभार को देख कर ही उसकी हवा खराब हो गई| उसे एहसास हुआ की अभी असली काम तो बाकी है, अनु की हिम्मत नहीं हुई की वो नजर उठा कर मेरी तरफ देख सके इसलिए उसने तुरंत अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया और वापस सीधे लेट गई| उसके इस बर्ताव से मुझे एहसास हुआ की अनु बहुत डरी हुई है और नहीं चाहती की मैं आगे बढ़ूँ! मैंने फ़ौरन अनु की तरफ करवट ली और खुसफुसाते हुए बोला; "Baby don’t be afraid! If you don’t want, I won’t proceed any further!” कुछ देर उसी तरह रहने के बाद अनु ने अपने दोनों हाथ अपने चेहरे के ऊपर से हटाए और मेरी तरफ देखते हुए बोली; "Its not what I want? Its what ‘WE’ want!” मैं अनु की इस बात का मतलब समझ गया और अनु भी ये बोलने के बाद मुस्कुराई| “I’ll be gentle….
can’t hurt my wife!” मैंने धीरे से कहा और मैं अनु के ऊपर आ गया| डर तो अब भी था अनु के दिल में पर वो किसी तरह से उसे दबाने में लगी हुई थी| मैंने अपना पजामा निकाल दिया और उसे निकालते ही अनु को मेरा फूला हुआ कच्छा दिखाई दिया जिसमें से लंड अपना प्रगाढ़ रूप लिए साफ़ दिखाई दे रहा था| जैसे ही मैंने अपना कच्छा निकाला अनु के सामने वो खंजर आ गया जो कुछ ही देर में खून खराबा करने वाला था| कुछ क्षण तक तो अनु उसे देखती रही और इधर अपनी ख़ुशी जाहिर करने के लिए मेरे लंड ने pre-cum की एक अमूल्य बूँद भी बहा दी| पर अनु की बुर का डर आखिर उस पर हावी हो गया! ये दानव अंदर कैसे जाएगा ये सोच कर ही अनु ने पुनः अपनी आखें कस कर मीच लीं! इधर मैंने धीरे-धीरे अनु की टांगें पुनः खोलीं ताकि मैं अपना स्थान ग्रहण कर सकूँ| जैसे ही मैं अनु की टांगों को छुआ उसकी टांगें काँप गई, अनु का पूरा शरीर डर के मारे कांपने लगा था| मन ही मन अनु सोच रही थी की वो दर्द से बुरी तरह बिलबिला जायेगी जब ये खूँटा अंदर घुसेगा!!
मैं अनु पर झुका और मेरा लंड आ कर उसकी बुर से बीएस छुआ और अनु के पूरे जिस्म में करंट दौड़ गया! उसने घबरा कर चादर अपने दोनों हाथों से पकड़ ली और अपने आप को आगे होने वाले हमले के लिए खुद को तैयार कर लिया| मैं अनु के ऊपर छ गया और धीरे-धीरे अपना सारा वजन उस पर डाल दिया| अपनी कमर को मैंने अनु की बुर पर दबाना शुरू किया, लंड धीरे-धीरे अपना रास्ता बनाता हुआ अनु की बुर की झिल्ली से टकरा कर रुक गया| इधर अनु को जो हल्का दर्द हुआ उससे अनु ने अपनी गर्दन ऊपर की तरफ तान ली| मैं कुछ सेकंड के लिए रुक गया ताकि अनु को थोड़ा आराम हो जाए, हालाँकि उसे अभी बीएस दर्द का एक हल्का सा आभास ही हुआ था! मैंने अपनी कमर से हल्का सा झटका मारा और लंड के सुपाडे ने वो झिल्ली तोड़ दी और अभी आधा ही सुपाड़ा नादर गया था की अनु के मुंह से चीख निकली; "आअह्हह्ह्ह्ह ममममअअअअअअअअअ...
!!!!" और अनु ने अपनी गर्दन दाएँ-बाएँ पटकनी शुरू कर दी| खून की एक धार बहती हुई बिस्तर को लाल कर गई थी! मैं उसी हालत में रुक गया और मैंने अनु के स्तन के ऊपर से ब्रा हटा दी| सामने जो दृश्य था उसकी कल्पना भी मैंने नहीं की थी| अनु के स्तन बिलकुल तोतापरी आम जैसे थे, उनकी शेप देखते ही मेरा दिल बेकाबू हो गया| मैं अपना मुंह जितना खोल सकता था उतना खोल कर अनु के दाएँ स्तन को मुँह में भर कर चूसने लगा| इस दोहरे हमले से अनु की बुर का दर्द कुछ कम हुआ और अनु ने अपना हाथ मेरे सर पर रख दिया, अनु ने मेरे सर को अपने स्तन पर दबाना शुरू कर दिया| मैंने अपने दाँत अनु के दाएँ स्तन पर गड़ा दिए और धीरे से अनु के चुचुक पर काट लिया| "स्स्सह्ह्ह्ह" अनु कराही जो मेरे लिए इशारा था की उसकी बुर का दर्द कम हो चूका है| मैंने अपनी कमर से एक और हल्का सा झटका मारा और अब मेरा पूरा सुपाड़ा अंदर जा चूका था| "आअह्म्मामा" अनु धीरे से चीखी! मुझे अनु की भट्टी सी गर्म बुर का एहसास अपने सुपाडे पर होने लगा| अनु की बुर लगातर रस छोड़ रही थी ताकि लंड का प्रवेश आसान हो जाए| इधर ऊपर अनु की गर्दन फिर से दाएँ-बाएँ होनी शुरू हो चुकी थी| अनु का दर्द कम करने के लिए मैंने उसके बाएँ स्तन को अपने मुँह में भर लिया और चूसना शुरू कर दिया| अनु के हाथों की उँगलियाँ मेरे बालों में रास्ता बनाने लगी और अनु का दर्द कुछ देर में खत्म हो गया| मेरे उसके स्तनपान करने से उसके मुँह से अब सिसकारियां निकलनी शुरू हो गईं थी| अब मौका था एक आखरी हमले का और वो मैं बिना बताये नहीं करना चाहता था वर्ण अनु का दर्द से बुरा हाल हो जाता! "बेबी...एक लास्ट टाइम और....आपको दर्द होगा!" मैंने अनु से कहा और ये सुन कर अनु ने चादर को पाने दोनों हाथों से कस कर पकड़ लिया और अपनी आँखें कस कर मीच लीं| उसके चेहरे पर मुझे अभी से दर्द की लकीरें नजर आ रही थीं, दिल तो कह रहा था की मत कर पर अभी नहीं तो फिर शायद कभी नहीं! यही सोच कर मैंने एक आखरी झटका मारा जो बहुत बड़ा था| मेरा पूरा लंड अनु की बुर में प्रवेश हो चूका था और अनु की एक जोरदार चीख निकली जो कमरे में गूँज गई| "आआह्ह्ह्हह्हहहहहहहहहहहहहहहहह....हम्म्म....मममम.....ममम....ननन....
!!!" मैं इस झटके के फ़ौरन बाद रुक गया और अनु के होंठों को अपने मुँह में कैद कर लिया| लगातार दस मीनू तक मैं उसके होठों को चुस्त रहा और अपने दाएँ हाथ से अनु के स्तनों को बारी-बारी से धीरे-धीरे दबाता रहा ताकि उसका दर्द कम हो सके|
पूरे दस मिनट बाद अनु का दर्द खत्म हुआ और उसने अपने हाथों की गिरफ्त से चादर को छोड़ा और मेरी पीठ तथा मेरे बाल सहलाने लगी| मैंने अनु के होठों को आजाद किया और उसके चेहरे को देखा तो पाया की आँसू की एक धार बह कर उसके कान तक पहुँच चुकी थी| अनु की सांसें काबू हो गईं थीं और उसके जिस्म में अब आनंद का संचार हो चूका था| "सॉरी बेबी!' मैंने थोड़ा मायूस होते हुए कहा| अनु के चेहरे पर मुस्कान आ गई और उसने अपनी बाहें मेरी गर्दन के पीछे लॉक कर दी और बोली; "I love you!" ये I love you इस बात को दर्शाता था की आज हम दोनों ने जिस्मानी रूप से एक दूसरे को समर्पित कर दिया है| जाने क्यों पर मेरी नजरें एक आखरी बार अनु की रजामंदी चाहती थीं ताकि ये यौन सुख चरम पर पहुँच सके| अनु ने मुझे वो रजामंदी अपनी गर्दन धीरे से हाँ में हिला कर दी| मैंने अपनी कमर को धीरे-धीरे आगे पीछे करना शुरू किया जिससे मेरा लंड अनु की बुर में धीरे-धीरे अंदर बाहर होने लगा| मेरे धक्कों की रफ़्तार अभी धीरे थी ताकि अनु को धीरे-धीरे इसकी आदत पड़ जाए| पर इतने से ही अनु की सिसकारियाँ निकलने लगी थीं; "सससस..ससस...ममममननन...ससससस...!!!" पाँच मिनट बाद मैंने अपनी रफ़्तार धीरे-धीरे बढ़ानी शुरू की और इधर अनु अपने दूसरे चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई और अपनी दोनों टांगें मेरी कमर पर लॉक कर मुझे रुकने का इशारा किया| अनु के दोनों पाँव की ऐड़ियाँ मेरे कूल्हों पर दबाव बना कर उन्हें हिलने से रोक रहीं थी| आखिर मैंने भी थोड़ा आराम करने की सोची और अंदर को जड़ तक अंदर पेल कर मैं अनु के ऊपर ही लेट गया| अनु की सांसें उसके चरमोत्कर्ष के कारन तेज थीं और मैं अपने होंठ अनु की गर्दन पर रख कर लेट गया| अनु का स्खलन इसबार पहले से बहुत-बहुत लम्बा था जो मैं अपने सुपाडे पर महसूस कर रहा था| जब अनु का स्खलन खत्म हुआ तो उसने मेरी गर्दन पर अपनी फेवरेट जगह पर दाँत से काट लिया| ये उसका इशारा था की मैं फिर से 'काम' शुरू कर सकता हूँ! मैं उठा और इस बार पहले से बड़े और तगड़े धक्के लगाने लगा| मेरे हर धक्के से अनु के तोतापरी आम ऊपर नीचे हिलने लगे थे, इधर अनु पर एक अजब ही खुमारी चढ़ने लगी थी| अनु ने अपने दोनों हाथ अपने बालों में फिराने शुरू कर दिए, उसके अध् खुले लब हिलने लगे थे| मेरा मन तो कर रहा था उन लाल-लाल होठों को एक बार और चूस लूँ पर उसके लिए मुझे नीचे झुकना पड़ता और फिर मेरे लंड को मिल रहा मजा कम हो जाता| अगले आधे घंटे तक मैं उसी रफ़्तार से लंड अंदर-बाहर करता रहा और अनु अपनी खुमारी में अपने हाथों को अपने जिस्म पर फेरने लगी| इधर मुझे हैरानी हो रही थी की मुझ
में इतनी ताक़त कहाँ से आई जो मैं बिना रुके इतनी देर से लगा हुआ हूँ! फिर ध्यान गया उस गिलास पर और मैं समझ गया की ये सब दूध का ही कमाल है जिसने मुझे और अनु को अभी तक इतनी देर तक जोश से बाँधा हुआ है|
अनु थोड़ा उठी और मुझे अपने ऊपर खींच लिया, इधर मैं नीचे से मेहनत करने में लगा था और उधर अनु के होठों ने मेरे होठों को चूसना शुरू कर दिया था| बीच-बीच में अनु ने अपने दाँतों का प्रयोग भी करना शुरू कर दिया था! मेरे होठों को दाँतों से चुभलाने में अनु को कुछ ज्यादा ही मजा आ रहा था| अब तो मेरे दोनों हाथों को भी कुछ चाहिए था| मैंने अनु के दोनों स्तनों को अपनी हथेलियों से दबाना शुरू कर दिया था और उँगलियों से मैं उनका मर्दन करने लगा था| नीचे बाकायदा मेरी कमर अपने काम में लगी थी और लंड बड़े आराम से अंदर-बाहर हो रहा था| दोनों ही अब अपनी-अपनी चरम सीमा पर पहुँचने वाले थे, अनु ने अपने दोनों हाथों की उँगलियाँ एक बार फिर मेरे बालों में चलानी शुरू कर दी थीं| उसकी बुर ने प्रेम का गाढ़ा-गाढ़ा रस बनाना शुरू कर दिया था और अगले किसी भी पल वो उस रस को छलकाने वाली थी|
दूसरी तरफ मेरी रफ़्तार अब full speed पर थी, मेरे स्खलित होने से पहले अनु ने अपना रस बहा दिया और मुझे कस कर अपने से चिपका लिया| उसके दोनों पेअर मेरी कमर पर लॉक हो गए और जिस्म धनुष की तरह अकड़ गया| उसके इस चिपकने के कारन मैं रुक गया और अपनी सांसें इक्कट्ठा करने लगा ताकि आखरी कमला कर सकूँ! जैसे ही अनु निढाल हो कर बिस्तर पर लेटी मैंने ताबड़तोड़ धक्के मारे और मिनट भर में ही मेरे अंदर सालों से जो वीर्य भरा हुआ था वो फव्वारे की तरह छूटा और अनु की बुर में भरने लगा! मैं अब भी धीरे-धीरे धक्के लगा रहा था ताकि जिस्म में जितना भी वीर्य है आज उसे अनु की बुर में भर दूँ और हुआ भी वैसा ही| मेरे वीर्य की एक-एक बूँद पहले तो अनु के बुर में भर गई और जो अंदर ना रह सकीय वो फिर रिसती हुई बाहर बहने लगीं| अब मुझ में बिलकुल ताक़त नहीं थी सो मैं अनु के ऊपर ही लुढ़क गया और अपनी साँसों को काबू करने लगा| इधर अनु ने अपने दोनों हाथ मेरी पथ पर चलाना शुरू कर दिया जैसे मुझे शाबाशी दे रही हो| मेरे चेहरे पर थकावट झलक रही थी तो वहीँ अनु के चेहरे से ख़ुशी झलक रही थी|
कुछ देर बाद जब मैं सामान्य हुआ, मेरा लंड अब भी सिकुड़ा हुआ उसकी बुर में था और इसलिए मैंने अनु को ऊपर से हटना चाहा पर अनु ने अपने हाथों की पकड़ कस ली ताकि मैं उसके ऊपर से हिल ही ना पाऊँ| "कहाँ जा रहे हो आप?" अनु ने पुछा|
"कहीं नहीं बस साइड में लेट रहा था|" मैंने कहा|
"नहीं....ऐसे ही रहो....
वरना मुझे सर्दी लग जायेगी!" अनु ने भोलेपन से कहा| उसकी बात सुन मैं मुस्कुरा दिया और ऐसे ही लेटा रहा| घडी में सुबह के 2 बजने को आये थे और हम दोनों की आँखें ही बंद थीं| हम दोनों आज अपना सब कुछ एक दूसरे को दे चुके थे और सुकून से सो रहे थे! सुबह पाँच बजे अनु की आँख खुल गई और उसने मेरी गर्दन पर अपनी गुड मॉर्निंग वाली बाईट दी! उसके ऐसा करने से मैं जाग गया; "ममम...क्या हुआ?" मैंने कुनमुनाते हुए कहा|
"आप हटो मुझे नीचे जाना है!" अनु ने कहा| पर मैंने अनु को और कस कर अपने से चिपका लिया और कुनमुनाते हुए ना कहा| "डार्लिंग! आज मेरी पहली रसोई है, प्लीज जाने दो!" अनु ने विनती करते हुए कहा|
"अभी सुबह के पाँच बजे हैं, इतनी सुबह क्या रसोई बनाओगे?" मैंने बिना आँख खोले कहा|
"भाभी ने कहा था की पाँच बजे वो आएँगी...देखो वो आने वाली होंगी!" अनु ने फिर से विनती की, पर मैं कुछ कहता उससे पहले ही दरवाजे पर दस्तक हो गई| मैं फ़ौरन उठ बैठा और अनु को कंबल दिया ताकि वो खुद को ढक ले और मैंने फ़ौरन पजामा पहना और दरवाजा खोला| ऊपर मैंने कुछ नहीं पहना था और जैसे ही ठंडी हवा का झोंका मेरी छाती पर पड़ा मैं काँप गया और अपने दोनों हाथों से खुद को ढकने की कोशिश करने लगा| इधर भाभी मुझे ऐसे कांपते हुए देख हँस पड़ी और कमरे में दाखिल हो गईं और मैंने फ़ौरन एक शॉल लपेट ली| "तुम दोनों का हो गया की अभी बाकी है?" भाभी हम दोनों को छेड़ते हुए बोलीं| अनु तो शर्म के मारे कंबल में घुस गई और मैं शर्म से लाल होगया पर फिर भी भाभी की मस्ती का जवाब देते हुए बोला; "कहाँ हो गया? अभी तो शुरू हुआ था....
हमेशा गलत टाइम पर आते हो!" भाभी ने एकदम से मेरा कान पकड़ लिया; "अच्छा? मैं गलत टाइम पर आती हूँ? पूरी रात दोनों क्या साँप-सीढ़ी खेल रहे थे?" भाभी हँसते हुए बोली| इतने में अनु कंबल के अंदर से बोली; "भाभी आप चलो मैं बस अभी आई!"
"ये कौन बोला?" भाभी ने अनु की तरफ देखते हुए जानबूझ कर बोला| अनु चूँकि कंबल के अंदर मुँह घुसाए हुए थी इसलिए वो भाभी को नहीं देख सकती थी|
भाभी हँसती हुईं नीचे चली गईं, मैंने दरवाजा फिर से बंद किया और अनु के साथ कंबल में घुस गया| इधर अनु उठने को हुई तो मैंने उसका हाथ पकड़ कर रोक लिया| "कहाँ जा रहे हो? मुझे ठण्ड लग रही है!" मैंने बात बनाते हुए कहा|
"तो ये कंबल ओढो, मैं नीचे जा रही हूँ!" अनु ने फिर उठना चाहा|
"यार ये सही है? रात को जब आपको ठंड लग रही थी तब तो मैं आपके साथ लेटा हुआ था और अभी जो मुझे ठंड लग रही है तो आप उठ के जा रहे हो!" मैंने अनु से प्यार भरी शिकायत की जिसे सुन कर अनु को मुझ पर प्यार आने लगा| वो फिर से मेरे पास लेट गई और मुझे कास कर अपने सीने से लगा लियाऔर बोली; "आपको पता है, मैंने कभी सपने में भी ऐसी कल्पना नहीं की थी की मुझे आप मिलोगे और इतना प्यार करोगे! अब मुझे बस जिंदगी से आखरी चीज़ चाहिए!" ये कहते हुए अनु खामोश हो गई| उस चीज़ की कल्पना मात्र से ही अनु का दिल जोरों से धड़कने लगा था और मैं उसकी धड़कन साफ़ सुन पा रहा था| पता नहीं क्यों पर अनु की ये धड़कन मुझे अच्छी लग रही थी,अनु ने धीरे से खुद को मेरी पकड़ से छुड़ाया पर इस हलचल से मैं उठ कर बैठ गया| अनु ने कंबल हटाया और रात से ले कर अभी तक पहली बार अपनी नीचे की हालत देखि और हैरान रह गई| चादर पर एक लाल रंग का घेरा बन चूका था और उसके ऊपर हम दोनों के 'काम' रस का घोल पड़ा था जो गद्दा सोंख चूका था! अनु ये देख कर शर्मा गई और अपने दोनों हाथों से अपने चेहरे को ढक लिया| मैंने अनु को एक हैंड टॉवल उठा कर दिया ताकि वो अपनी नीचे की हालत कुछ साफ़ कर ले और मैं दूसरी तरफ मुँह कर के बैठ गया ताकि उसे शर्म ना आये| "आप को उधर मुँह कर के बैठने की कोई जर्रूरत नहीं है!" अनु मुस्कुराते हुए बोली और खुद को साफ़ करने लगी| मैं भी मुस्कुराने लगा पर अनु की तरफ देखा नहीं, मैं उठ कर खड़ा हुआ और अलमारी से अपने लिए कपडे निकालने लगा| इधर अनु ने भी अपने कपडे निकाले और ऊपर एक निघ्त्य डाल कर नीचे नहाने चली गई| घर में आज सिर्फ औरतें ही मौजूद थीं, बाकी सारे मर्द आज बाहर पड़ोसियों के यहाँ सोये थे, रितिका वाले कमरे में भी कोई नहीं सोया था| नीचे सब का नहाना-धोना चल रहा था और मैं नीचे नहीं जा सकता था| कुछ देर बाद भाभी नेहा को ले कर ऊपर आ गईं| मैंने भाभी को सख्त हिदायत दी थी की वो नेहा को अपने साथ रखें क्योंकि मुझे रितिका पर जरा भी भरोसा नहीं था| अपनी खुंदक निकालने के लिए वो नेहा को कुछ भी कर सकती थी| भाभी जब नेहा को ऊपर ले कर आईं तो वो रो रही थी;
"संभाल अपनी गुड़िया को सुबह से केँ-केँ लगा रखी है इसने!" भाभी नेहा को मेरी गोद में देते हुए बोली| मैंने नेहा को गोद में लिया और उसे अपने सीने से लगाया| नेहा ने ने एकदम से रोना बंद कर दिया, ये देख कर भाभी हैरान हो गईं और मुस्कुराते हुए चली गईं| इधर मैं नेहा को गोद में लिए कमरे में घूमने लगा, फिर मेरा मन किया की मैं नेहा के साथ खेलती०खेलते अनु को छेड़ूँ| अब नीचे तो जा नहीं सकता था इसलिए मैंने एक आईडिया निकाला| मैंने नेहा को ऐसे पकड़ा की उसका मुँह मेरी तरफ था और गाना गाने लगा;
साथ छोड़ूँगा ना तेरे पीछे आऊँगा
छीन लूँगा या खुदा से माँग लाउँगा
तेरे नाल तक़दीरां लिखवाउंगा
मैं तेरा बन जाऊँगा
मैं तेरा बन जाऊँगा
सोंह तेरी मैं क़सम यही खाऊँगा
कित्ते वादेया नू मैं निभाऊँगा
तुझे हर वारी अपना बनाऊँगा
मैं तेरा बन जाऊँगा
मैं तेरा बन जाऊँगा"
मेरी आवाज इतनी ऊँची थी की नीचे सब औरतें ये गाना सुन पा रही थीं और भाभी ने अनु को मेरे बदले छेड़ना शुरू कर दिया| अनु का शर्म से बुरा हाल था, उसके गाल सुर्ख लाल हो चुके थे, वो उठी और जा कर माँ के पास बैठ गई और उनके कंधे में अपना मुँह रख कर छुपा लिया| माँ भी हँसने लगी और वहाँ जो भी कोई था वो मेरा पागलपन सुन हँसने लगा|
"तेरे लिए मैं जहाँ से टकराऊँगा
सब कुछ खोके तुझको ही पाउँगा
दिल बन के दिल धडकाऊँगा"
मैं ऊपर गाना जाता जा रहा था और नेहा की नाक से अपनी नाक रगड़ रहा था| नेहा भी बहुत खुश थी और हँस रही थी, अपने नन्हे-नन्हे हाथों से मेरी बड़ी नाक पकड़ने की कोशिश कर रही थी| जैसे ही मैंने गाना बंद किया माँ नीचे बोलीं; "ओ दिल वाले....
नीचे आ तेरा दिल मैं धड़काऊँ!" माँ की आवाज सुन मैं फ़ौरन नीचे आया, माँ के पैर छुए और उन्होंने मेरे कान पकड़ लिए| "बहु को छेड़ता है? रुक तुझे में सीधा करती हूँ!" ये कहते हुए माँ ने मेरे गाल पर एक प्यार भरी चुटकी खींची और मैं हँसने लगा!
"देखत हो कितना बेसरम है ई लड़कवा! तोहार बहु तो सब के पैर छू कर आशीर्वाद ले लिहिस है और ये अभी तक केहू का नमस्ते तक ना किहिस है!" मौसी बोली| मैंने फिर एक-एक कर सबके पैर छुए और वापस ऊपर आ कर नेहा के साथ खेलने लगा| जब सब का नहाना हो गया तब मैं नहाने घुसा| गाना गुनगुनाते हुए मैं नहाया और कुरता-पजामा पहन कर तैयार हुआ| नेहा को भी मैंने ही नहलाया पर ये सब किसी को पसंद नहीं आया और उन्होंने मुझे टोका; "ओ मानु तू काहे इस सब कर रहा है?" मौसी बोलीं और उन्होंने रितिका को डाँट लगाते हुए कहा; "तू का हुआन खड़ी-खड़ी देखत है, ई काम खुद ना कर सकत है?"
"क्यों मौसी मैं क्यों नहीं कर सकता? आदमी हूँ इसलिए?" मैंने उनकी तरफ घूमते हुए कहा|
"इस घर में सबसे ज्यादा मानु प्यार करता है नेहा से! उसके इलावा वो किसी से नहीं सम्भलती!" ताई जी बोलीं|
"दीदी ईका (मेरा) बच्ची से इतनी माया बढ़ाना ठीक नाहीं!" मौसी बोलीं|
"क्यों? एक बिन बाप की बच्ची को अगर बाप का प्यार मानु से मिलता है तो क्या बुरा है?" ताई जी बोलीं और उन्होंने आगे मौसी को कुछ कहने का मौका ही नहीं दिया| पर ताई जी के ये बात मेरे दिल को लग गई! नेहा मेरी बेटी थी और सब इस सच से अनविज्ञ थे और यही सोचते थे की मेरा उससे मोह एक तरह की दया है! मैं नेहा को ले कर चुपचाप ऊपर आ गया और उसे कपडे पहनाने लगा| जहाँ कुछ देर पहले मेरे दिल में इतनी खुशियाँ थी वहीँ मौसी की बात सुन कर मेरे दिल में दर्द पैदा हो चूका था| नेहा को कपडे पहना कर मैं उसे अपनी छाती से लगा कर कमरे की खिड़की के सामने बैठ गया और नेहा की पीठ सहलाने लगा| कुछ देर में नेहा सो गई और मैं सोच में डूब गया| मुझे कुछ न कुछ कर के नेहा को अपनाना था, उसे अपना नाम देना था!
अनु समझ गई थी की मुझे कितना बुरा लगा है और कुछ देर बाद वो ऊपर आ गई और मुझे गुम-शूम खिड़की की तरफ मुँह कर के बैठा देख उसे भी बुरा लगा| वो मेरे पीछे खड़ी हो गई और मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बोली; "We’ll figure out a way!” मैंने बस हाँ में सर हिलाया पर दिमाग मेरा अब भी रास्ता ढूँढने में लगा था| पर अनु मुझे हँसाना-बुलाना जानती थी; "Now cheer up! मुझे नीचे रसोई के लिए बुलाया है और मुझे बहुत डर लग रहा है!" ये एक दम से उठ खड़ा हुआ और बोला; "चलो आज हम दोनों खाना बनाते हैं!" ये बात भाभी ने बाहर से सुन ली और बोलीं; "खाना तो बहुरानी ही बनाएगी, तुम जा कर मर्दों में बैठो!" भाभी की बात सुन हम दोनों मुस्कुरा दिए| अनु इधर खाना बनाने में लगी और मैं बाहर निकल के पिताजी के पास बैठ गया| कुछ देर बाद सबको खाना खाने के लिए बुलाया गया, खाने में अनु ने लौकी के
कोफ्ते और गोभी के सब्जी बनाई थी, साथ में रायता और गरमा-गर्म रोटियॉँ| घर के सारे लोग एक साथ बैठ गए सिर्फ भाभी, अनु और रितिका रह गए थे| अनु ने आज एक गहरे नीले रंग की साडी पहनी थी और सर पर थोड़ा घूंघट कर रखा था| ताऊ जी ने जैसे ही पहला कौर खाया उन्होंने फ़ौरन अपनी जेब में हाथ डाला और फ़ौरन कुछ पैसे निकाले| अनु को अपने पास बुलाया और उसे 5001/- देते हुए बोले; "बहु ये ले, आज तेरे हाथ की पहली रसोई थी और माँ अन्नपूर्णा का हाथ है तुझ पर, मैंने इतना स्वाद खाना कभी नहीं खाया!" उनके बाद पिताजी ने भी अनु को 5001/- दिए और बहुत आशीर्वाद भी दिया| मौसा जी ने भी अनु को 1001/- दिए, अब बारी आई ताई जी की, उन्होंने अनु को सोने के कंगन दिए और आशीर्वाद दिया| माँ का नंबर आया तो उन्होंने अनु को एक बाजूबंद दिया जो उन्हें उनकी माँ यानी मेरी नानी ने दिया था| अनु की आँखें इतना प्यार पा कर नम हो गईं थी| तब माँ ने उसके सर पर हाथ फेरा और उसके मस्तक को चूमते हुए बोली; "बेटी बस...रोना नहीं!" भाभी ने माहौल को हल्का करने के लिए बात शुरू की; "पिताजी आपको पता है मानु भैया कह रहे थे की वो भी रसोई में मदद करेंगे!" ये सुन कर सारे हँस पड़े और अनु भी मुस्कुरा दी|
"कल तू सब के लिए खाना बनायेगा!" ताऊ जी ने मुझसे कहा पर तभी भाभी बोलीं; "पर कल तू बहु चली जाएगी?!" ये सुनते ही मैं खाते हुए रुक गया और हैरानी से भाभी को देखने लगा| मेरी ये हरकत सबने देखि और भाभी को मेरी टांग खींचने का फिर मौका मिल गया| " क्या? शादी के अगले दिन बहु अपने घर जाती है!" भाभी ने मुझे रस्म याद दिलाई| पर बेटे के दिल का दर्द सिर्फ माँ ही समझती है; "बेटा बहु कुछ दिन बाद वापस आ जाएगी|" माँ की बात सुन कर मुझे तसल्ली नहीं हुई क्योंकि उन्होंने ये नहीं बताया था की ये कुछ दिन कितने होते हैं? खाना खाने के बाद सबसे बातें होने लगीं इसलिए हम दोनों को अकेले में बात करने का समय नहीं मिला| शाम को भी लोगों का आना-जाना लगा रहा और इसी बीच संकेत भी मिलने आया| वो मेरी शादी में नहीं आ पाया था क्योंकि कुछ emergency कारणों से उसे बाहर जाना पड़ा था और उसकी गैरहाजरी में उसका परिवार जर्रूर आया था| मैंने उसका इंट्रो अनु से करवाया तो उसने हाथ जोड़ कर अनु से नमस्ते कहा और फिर अपने ना आ पाने की माफ़ी भी माँगी| रात को खाना अनु ने ही बनाया और खाने के बाद भाभी ने उसे जानबूझ कर उसे अपने साथ बिठा लिया| इधर चन्दर भैया मुझे अपने साथ खींच कर छत पर ले आये जहाँ मेरे बाकी कजिन बैठे थे और वहाँ बातें शुरू हो गईं| भाभी वाले कमरे में मेरे मौसा जी के दो लड़कों की पत्नियाँ बैठी थीं और उन्हीं के साथ रितिका भी बैठी थी| भाभी जबरदस्ती अनु को पकड़ कर वहीँ ले आई| अब रितिका उठ कर भी नहीं जा सकती इसलिए नजरे झुका कर बैठी रही| "तो अनुराधा जी! बताइये पहली रात कैसी गुजरी? कहीं देवर जी ने आपको तंग तो नहीं किया?" भाभी ने
कहा और सारे हँसने लगे| पहले तो अनु ने सोचा की बात हँस कर ताल दे फिर उसे रितिका की शक्ल दिखी और उसने सोचा की क्यों न हिसाब बराबर किया जाए| अनु ने अपना हाथ भाभी के कंधे पर रखा और अपना सर उसी हाथ पर रखते हुए बोली; "हाय भाभी! आपके देवर जी ने तो मेरी जान ही निकाल दी थी! निचोड़ कर रख दिया था मुझे!" अनु की बात सुन सारे शर्मा गए और भाभी अनु को प्यार से डांटते हुए बोली; "चुप बेशर्म!" उनका इशारा रितिका की तरफ था की उसके सामने अनु ये क्या कह रही है| "अरे तो इसमें क्या शर्म की बात? इसने भी तो कभी न कभी किया होगा!" अनु ने बात घुमा के कही पर वो सीधा रितिका को जा कर लगी| अनु का तातपर्य था की उसने भी तो मेरे (मानु के) साथ सेक्स किया है| रितिका को अचानक ही वो रंगीन दिन याद आ गए और उसके दिल के साथ-साथ नीचे वाले छेद में भी हलचल मच गई| "पर भाभी एक बात तो है, 'वो' आपकी हर बात मानते हैं!" अनु बोली|
"क्या मतलब?" भाभी बोली|
"कल रात आप ने कहा था ना की मेरी देवरानी का ख्याल रखना, तो उन्होंने रात भर बड़ा ख्याल रखा मेरा!" अनु बोली और फिर शर्मा गई| ये सुन कर रितिका अंदर ही अंदर जल-भून कर राख हो गई और सर झुकाये बैठी रही|
"हाँ-हाँ वो सब मैंने आज तुम-दोनों का बिस्तर देख कर समझ गई थी! वैसे सच-सच बता तूने कल रात से पहले कभी......?" भाभी ने बात अधूरी छोड़ दी पर अनु उनकी बात का मतलब समझ गई|
"नहीं भाभी....कल रात पहली बार था.....इसीलिए तो इतनी घबराई हुई थी| पर सच्ची 'उन्होंने' मेरा बड़ा ख्याल रखा और बड़े प्यार से.....
" अनु ने भी शर्माते हुए कहा और बात अधूरी छोड़ दी|
"पर इस मुई ने सबको बता दिया!" भाभी ने मौसा जी की सबसे छोटी बहु की तरफ इशारा करते हुए कहा| अब ये सुन कर तो अनु के कान लाल हो गए; "सबको?" अनु ने पुछा|
"अरे बुद्धू सबको मतलब माँ, चाची जी और मौसी जी को| हम तीनों ने तो साक्षात् रंगोली देखि थी!" भाभी ने अनु को चिढ़ाते हुए कहा| मतलब की घर की सब औरतों को चल गया था की अनु कुँवारी थी पर ताई जी और माँ के डर के मारे मौसी जी ने उससे कुछ नहीं पुछा था| वरना शादी होने के बाद भी अनु का कुंवारा होना मौसी जी के लिए अजीब बात थी! ये बात जिस शक़्स को बहुत जोर से लगी थी वो थी रितिका! कहाँ तो वो सोच रही थी की वो मानु को ताना देगी की उसे अनु के रूप में एक used माल मिला और कहाँ अनु एकदम कोरी निकली|
आखिर सब की बातें खत्म हुई और अनु ऊपर आई और मैं भी अभी कमरे के बाहर पहुँचा था की भाभी मुझे वहीँ मिल गई| "हो गई आपकी बातें? साड़ी बातें आप ही कर लो! मेरे लिए कुछ मत छोड़ना!" मैंने भाभी से शिकायत करते हुए कहा| ये सुन कर मेरी बाकी दो भाभियाँ भी हँसने लगीं अब तो अनु भी आ कर मेरे पीछे खड़ी हो गई थी; "वैसे भाभी वो कल रात वाले दूध में क्या डाला था?" मैंने कहा और सारे हँसने लगे|
"उसका असर तो अनुराधा ने बता दिया हमें और वो तुम्हारी रंगोली भी देखि थी हमने!" मेरी छोटी भाभी बोली और ये सुन कर अनु मेरे पीछे अपना सर छुपा कर मुस्कुराने लगी|
"भाभी वो दूध आज भी मिलेगा!" मैंने कहा और साड़ी औरतों ने मुझे प्यार भरे मुक्के मारने चालु कर दिए|
"दीदी सच्ची बेशर्म हो गया है ये तो!" बड़ी वाली भाभी बोलीं| भाभी दोनों को ले कर नीचे आ गईं, इधर मैं और अनु अंदर आ गए| "तो पहले ये बताओ की कब वापस आओगे?" मैंने सीधा ही सवाल दागा|
"शायद एक हफ्ता!" अनु ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया|
"एक हफ्ता क्या करोगे वहाँ?" मैंने बेसब्री से पुछा|
"नाते-रिश्तेदारों से मिलना होता है और...." अनु अभी कुछ बोलती उससे पहले ही मैंने उसकी कमर में हाथ डाल आकर उसे अपने पास खींच लिया और उसके होठों को चूम कर कहा; "दो दिन....
बस इससे ज्यादा wait नहीं करूँगा!"
"क्या करोगे अगर मैं दो दिन बाद नहीं आई तो?" अनु अपनी ऊँगली को मेरे होठों पर रखते हुए बोली|
"फिर मैं आऊँगा अपनी दुल्हनिया को लेने!" मैंने कहा और अनु को गोद में उठा लिया और उसे बिस्तर पर लिटा दिया| मैं जानता था वो आज बहुत थकी हुई होगी इसलिए आज मैं बस उसे अपने से चिपका कर सोना चाहता था| मैं भी अनु की बगल में लेट गया, अनु ने मेरे बाएँ हाथ को अपना तकिया बनाया और मुझसे चिपक कर लेट गई| मैं अनु के सर को चूमता हुआ उसके बालों में उँगलियाँ फेरता रहा और कुछ देर बाद दोनों सो गए|
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एक अनोखा बंधन: पुनः प्रारम्भ
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सुबह की शुरुआत बड़ी मीठी हुई, पहले तो अनु ने मेरी गर्दन को प्यार से काटा और उसके कुछ देर बाद नेहा ने मेरे गाल पर Kissi की! मैं कुनमुनाता हुआ उठा और नेहा को अपने सामने देख कर बैठ गया| अनु ने नेहा को मेरी गोद में दिया और खुद नीचे चली गई| मैं नेहा को गोद में ले कर खेल रहा था की नीचे हल्ला मच गया| मैं फ़ौरन नीचे आया तो देखा सारे ख़ुशी से एक दूसरे को बधाइयाँ दे रहे हैं| "बेटा तो चाचा बनने वाला है!" ये सुनते ही मैं चौंक गया और फिर भाभी की तरफ देखा जो शरमाई हुई ताई जी के पीछे छुपी हुई थीं| इस उम्र में भाभी का conceive करना एक चमत्कार था, मेरा मन ये सोच कर खुश हुआ की चलो भाभी अभी तक जिन खुशियों से महरूम थीं वो उन्हें मिल ही गईं| मैंने भाभी को दिल से मुबारकबाद दी और फिर चन्दर भैया को भी गले लग कर मुबारकबाद दी| आज पूरा घर खुशियों से झूम रहा था और कहीं इसकी नजर किसी को न लग जाए इसलिए ताऊ जी ने जोश-जोश में पूजा का आयोजन रख दिया| अनु ने फ़ौरन हलवा बनाना शुरू कर दिया और भाभी भी उसी के साथ खड़ी हो गईं| रसोई में चूँकि बस वो दोनों ही थे तो मुझे भाभी से बात करने का मौका मिल गया| जैसे ही मैं रसोई पहुँचा भाभी ने मुझे गले लगा लिया और रुंधे गले से बोलीं; "मानु ये सब तुम्हारी वजह से हुआ, वरना मैं तो गलत रास्ते पर भटक जाती! तुम अगर मुझे इन्हें (चन्दर भैया को) पहले नशा मुक्ति केंद्र ले जाने को कहा और वहीँ मैंने डॉक्टर से इनका बाकी चेक-अप भी करवाया| अगर उस दिन तुम मुझे हिम्मत ना देते और गलत रास्ते पर नहीं जाने देते तो आज ये सब नहीं होता!"
"भाभी इस ख़ुशी के मौके पर रोते नहीं हैं! पहले चलो डॉक्टर के ताकि आपका चेकअप हो जाए!| मैंने कहा| "भाभी ये तो गलत बात है! मुझे तो गले लग कर इतना प्यार नहीं करती जितना इन्हें करती हो!" अनु ने प्यार भरे लहजे में शिकायत की|
"बदमाश! सबसे पहले तू ही गले लगी थी मेरे!" ये कहते हुए भाभी ने उसे गले लगा लिया| सबने हलवा खाया और मैंने डॉक्टर के जाने की बात राखी तो ताऊ जी ने कहा की मैं, अनु, चन्दर भैया और भाभी को अपने साथ बजार ले जाऊँ| पर तभी अनु के मौसा जी आ गए, मैंने उनके पाँव छुए और समझ गया की वो अनु को लेने आये हैं| अनु ऊपर चली गई और
उसके पीछे-पीछे मैं भी चला गया| इधर नीचे सब ने उन्हें खुशखबरी दी और मुँह मीठा करवाया, उधर ऊपर आते ही मैंने दरवाजा बंद कर दिया और अनु को पीछे से जकड़ लिया| मेरे हाथ अनु की कमर पर सामने की तरफ लॉक हो चुके थे; "दो दिन से ज्यादा नहीं वेट करूँगा!" मैंने कहा|
"I'll try!!!" अनु शर्माते हुए बोली| इतने में भाभी ने नीचे से मुझे आवाज दी| मैं थोड़ा गुस्से में नीचे उतरा और भाभी मेरे चेहरे पर गुस्सा देख हँस पड़ी| 5 मिनट बाद अनु भी नीचे आई, उसका एक छोटा सा बैग मैं पहले ही नीचे ले कर आ गया था| सारा परिवार अनु को छोड़ने बाहर आया, अनु ने भी सब के पाँव छुए और फिर गाडी में बैठ गई| मैंने तुरंत उसे मैसेज कर के एक बार फिर याद दिलाया; "बस दो दिन!" और इसके जवाब में अनु ने मुझे एक Kiss वाली emoji भेजी! अनु के जाने के कुछ देर बाद मैं तैयार हुआ और फिर भाभी, मैं और चन्दर भैया गाडी से निकले| ये आज दोनों की पहली राइड थी, हम हँसते-खेलते हुए बजार पहुंचे और डॉक्टर ने भाभी का चेकअप किया और कुछ टेस्ट वगैरह भी किये| भाभी की प्रेगनेंसी की बात कन्फर्म हुई और डॉक्टर ने कुछ मल्टीविटामिन्स लिख दिए, मैंने घर के लिए मिठाई खरीदी और हम तीनों घर लौटे| ताऊ जी ने छाती ठोक कर पूरे गाँव में मिठाई बाटी| इधर अनु के जाने से मैं अकेला हो गया था तो मैंने अपना मन नेहा के साथ लगा लिया| मैं उसे गोद में ले कर अपने लैपटॉप पर काम कर रहा था| कुछ देर बाद मैंने अनु को skype पर कॉल किया और मेरी गोद में नेहा को बैठे देख वो खुश हो गई| मैंने फिर से अपनी बात दोहराई और उसे दो दिन याद दिलाये और वो हँसने लगी| "बाबा अभी तो आई हूँ.....
और आप अभी से बेकरार हो रहे हो?!" आगे कुछ बात हो पाती उससे पहले ही मम्मी जी आ गईं और फिर उनसे बात शुरू हो गई| खेर कॉल के बाद मैं काम करने लगा, दिन तो जैसे-तैसे बीत गया पर रात लम्बी थी! पर मेरी बेटी का प्यार था जो मैं आराम से सो गया| बड़ी मुश्किल से मैंने दो दिन बिताये और फिर आया तीसरा दिन| मैंने सुबह ही अनु को फ़ोन कर के पुछा तो वो बोली की वो आज नहीं आ रही, क्योंकि कल ही पूजा खत्म हुई है और कम से कम आज उसे घर रहना है| दरअसल डैडी जी ने एक मन्नत मांगी थी की अनु की शादी अच्छे से निपट जाए तो वो मंदिर दर्शन के लिए जायेंगे| पर यहाँ मैं बेसब्र हो गया था; "मैंने कहा था ना की मैं तीसरे दिन आजाऊँगा! सामान पैक करो, मैं, माँ, ताई जी और भाभी आ रहे हैं!" इतना कह कर मैंने फ़ोन काटा और मैं नीचे आ गया| जब मैंने माँ से आज जाने की बात कही तो सबसे मुझे डाँट सुनने को मिली! एक बस भाभी थी जो मेरे दिल की हालत समझती थी पर घरवालों के आगे वो कुछ बोल नहीं पाती थी| हालाँकि घर वालों की डाँट जायज थी पर मेरा अनु के लिए बेसब्र होना भी मुझे जायज लग रहा था|
पर नेहा से अपने पापा की उदासी नहीं देखि गई, उसने अपने हाथ-पैर चलाने शुरू किये जैसे मुझे अपने पास बुला रही हो, मैंने नेहा को गोद में उठाया और छत पर आ गया| "मेरा छोटा बच्चा! एक आप हो जो पापा की उदासी समझते हो!" मैंने तुतलाते हुए नेहा से कहा तो वो मुस्कुराने लगी| कुछ देर बाद भाभी आ गईं वो जानती थी की मैं उदास हूँ तो मेरा दिल बहलाने के लिए वो बात करने लगीं; "मानु देखो कुछ दिन रुक जाओ, उसे भी तो अपने माँ-पिताजी से मिलने दो!"
"मैं जानता हूँ की आप आप सही कह रहे हो भाभी, पर कम से कम आप तो मेरी बेसब्री समझो! साल भर से उसके साथ रहने की आदत हो गई है| उस पर पिछले 3 महीने भी मैं उससे अलग रहा, अब शादी हुई तो भी उसे घर जाना पड़ा! अब कैसे ..... नई-नई शादी हुई....
दूल्हे का थोड़ा तो ध्यान रखना चाहिए ना? फिर एक बड़ी जोरदार खुशखबरी भी उसे देनी है!!" ये कहते हुए मैंने भाभी को वो खुशखबरी सुनाई और वो फ़ौरन नीचे आईं और सब को वो बात बताई| भाभी ने बड़े तरीके से मेरी खुशखबरी को मेरी बेसब्री के ऊपर रख ऐसे जताया जैसे ये खबर सुनाने को मैं मरा जा रहा हूँ| आखिर नीचे से बुलावा आया और पिताजी बोले; "देख मैं या भाईसाहब तो जाने वाले नहीं, क्योंकि हमें अच्छा नहीं लगता की हम इतनी जल्दी बहु को लेने जाएँ!" अभी पिताजी की बात पूरी भी नहीं हुई की मैं बीच में ही बोल पड़ा; "पिताजी मैं माँ, भाभी और ताई जी को ले जाता हूँ! इसी बहाने वो सब भी घूम आएंगे!"
"कुछ ज्यादा ही समझदार हो गया तू? पर जाते हुए मिठाई ले जाइओ और अपनी भाभी की खुशखबरी भी दे दिओ!" पिताजी बोले और जाने की इजाजत दी| अब मुझे माँ और ताई जी को मनाना था जो इतना मुश्किल नहीं था! आखिर हम सारे निकले, भाभी आगे बैठीं और उनकी गोद में नेहा बैठी थी| आज पहलीबार मेरी बेटी गाडी में बैठी थी और इसकी ख़ुशी अनु से मिलने की ख़ुशी के साथ जुड़ गई!
मैंने गाडी एक दूकान पर मिठाई लेने के लिए रोकी और उसी बीच अनु को फ़ोन किया; "अपनी दुल्हनिया को लेने उसके दूल्हे राजा आ रहे हैं और साथ ही आपकी चहेती (नेहा) को भी ला रहे हैं!" ये सुन कर अनु हँस पड़ी और उसने ये बात फ़ौरन मम्मी जी को बता दी| मिठाई की दूकान के बाद गाडी सीधा अनु के दरवाजे पर रुकी, जहाँ अनु पहले से ही खड़ी थी| उसे देखते ही भाभी बोलीं; "आग दोनों तरफ लगी है!" पहले भाभी गाडी से उतरीं और उनके गोद में नेहा को देख अनु फ़ौरन उनके पास पहुँची| पहले उनसे गले मिली और फिर नेहा को गोद में उठा लिया| फिर निकली माँ और ताई जी और उन्हें देख वो एकदम हैरान हो गई और दौड़ कर उनके पाँव छुए पर मुझे एक Hi तक नहीं बोला बल्कि नेहा और सब को ले कर अंदर चली गई| मैं बेचारा लास्ट में अंदर आया, सब के सब बैठक में बैठ गए और तब मैंने मम्मी-डैडी जी का मुँह मीठा करवाया| डैडी जी को (अनु के) मौसा जी ने पहले ही सब बता दिया था, मम्मी-डैडी ने भाभी को आशीर्वाद दिया और उन्होंने मंदिर में भाभी के लिए अर्चना कराई थी उसका प्रसाद भी दिया|
"समधी जी माफ़ करना हमने इस तरह बिना बताये आने की गलती की पर ये जो है ना हमारा लड़का वो थोड़ा सा पागल है!" माँ ने जैसे-तैसे बात शुरू करते हुए कहा|
"अरे समधन जी ये आप क्या कह रहीं हैं?! आप सब का हमेशा स्वागत है! वैसे हम अच्छे से जानते हैं हमारे जमाई को, पागल नहीं अनु से बहुत प्यार करता है!" डैडी जी बोले पर मुझे थोड़ा बहाना तो करना था;
"वो डैडी जी....काम....
काम बहुत पेंडिंग है!" मैंने बहाना मारा|
"हाँ बीटा जी! हम जानते हैं कितना काम पेंडिंग है?" मम्मी जी हँसते हुए बोलीं| अब मेरी पोल-पट्टी तो खुल ही चुकी थी तो मैंने सोचा की चलो सब के साथ ख़ुशी साजा कर लूँ|
"दरअसल डैडी जी मैं और अनु जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे उसी के जरिये मैंने New York में बात की थी और हमें एक और कंपनी में मिलने के लिए बुलाया गया है| पर उसके पहले हमें अपनी कुछ Highlights Pitch करनी हैं! अगर हमारा प्रपोजल उन्हें पसंद आ गया तो हमें जल्दी ही New York जाना होगा|" मैंने कहा और ये खबर सुन कर मम्मी-डैडी बहुत खुश हुए पर ठीक उसी समय पर भाभी ने अपना काम किया;
"इसी बहाने इन दोनों का वो....वो क्या होता? शादी के बाद मियाँ-बीवी कहाँ जाते हैं?" भाभी बोलीं और मैं अपने उत्साह में बोल गया;
"Honeymoon!!!" ये सुन कर सारे हँसने लगे, इधर मैं और अनु शर्म से लाल हो गए! फिर भाभी ने वहाँ सब के सामने मेरी और अनु की बड़ी खिचाई की, आखिर खाना-पीना कर के हम सब निकले| आगे की तरफ अनु बैठी और उसकी गोद में नेहा थी और पीछे माँ, ताई जी और भाभी बैठे थे| कुछ दूर आने पर मैंने अनु से शिकायत करते हुए अंग्रेजी में कहा; "You greeted everyone but didn’t even said ‘Hi’ to me, this ain’t fair!”
“Sorry!” अनु ने शर्माते हुए कहा|
"ये क्या दोनों अंग्रेजी में गिट-पिट कर रहे हो?" भाभी बोलीं तो मैंने अनु की शिकायत सबसे कर दी!
"मैं कह रहा था की जब हम आये तो इन्होने सब का प्यार से स्वागत किया और मुझे एक छोटा सा Hi तक नहीं कहा!" ये सुनते ही ताई जी अनु की हिमायत करते हुए बोलीं;
"तेरे लिए बेचारी दरवाजे पर खाड़ी इंतजार कर रही थी ना?" और बाकी की रही-सही कसर माँ ने निकाल दी; "हमारी बहु शर्मीली है, तेरी तरह बेशर्म नहीं! दो दिन भी उसके बिना नहीं रह पाया!" मैं अपना इतना सा मुँह ले कर चुप हो गया और उधर भाभी और अनु का हँस-हँस कर बुरा हाल हो गया|
खेर हम घर पहुँचे और अनु को देख कर सब खुश हुए लेकिन मुझे एक बार फिर सब की डाँट खानी पड़ी! पर कम से कम अनु घर वापस आ गई थी और मैं इसी से खुश था| रात को खाने के बाद अनु का प्यार मुझ पर बरसने लगा, पर तभी नीचे से नेहा के रोने की आवाज आई| मैं फ़ौरन नीचे पहुँचा; "तेरे बिना ये सोने वाली नहीं, इसे सुला कर मेरे पास वापस दे दे!" भाभी बोलीं| मैं उनका मतलब समझ गया था, वो चाहती थीं की अनु और मुझे अकेला टाइम मिले पर वो क्या जाने की हम दोनों नेहा से कितना प्यार करते हैं| मैंने बस ना में सर हिलाया, और नेहा को पुचकारते हुए ऊपर ले आया| नेहा को रोता देख अनु ने उसे गोद में लेने को हाथ खोले पर नेहा उसकी गोद में नहीं गई| "अच्छा बेटा! मेरे पास नहीं आओगे, ठीक है मैं आपसे बात नहीं करुँगी!" ये कहते हुए अनु रूठ गई| "Hawwwww!!! देखो मम्मा गुच्छा हो गए!" मैंने तुतलाते हुए नेहा से कहा और वो एकदम से चुप हो गई| फिर मैं उसे अनु के पास ले गया और नेहा ने अपने हाथ एकदम से खोल दिए| अनु एकदम से
पिघल गई और उसने नेहा को गोद में ले लिया और उसे प्यार करने लगी| अनु ने नेहा को बीच में लिटाया और हम दोनों उसके दोनों तरफ लेट गए| अनु ने अपना दायाँ हाथ मेरी कमर पर रखा और मैं अपने बाएँ हाथ से अनु के गाल को सहलाने लगा| "आपको पता है मैंने आपको कितना miss किया!" मैंने कहा|
"Miss तो मैंने किया आपको! आपके पास तो कम से कम नेहा थी मेरा तो वहाँ हाल ही बुरा था!" अनु बोली| फिर वो एक दम से उठी और मेरे होठों पर Kiss दे कर लेट गई| नेहा अब भी जाग रही थी तो उसे सुलाने को मैंने एक कहानी सुनाई| कहानी सुनते-सुनते माँ-बेटी सो गए और कुछ देर बाद मैं भी सो गया| अगले 3 दिन हम दोनों ने ऑफिस का काम किया, बेचारी अनु को घर का काम भी देखना पड़ता और मेरे साथ बैठ कर काम भी करना पड़ता| मैं अपनी तरफ से कोशिश कर रहा था की मैं अनु को ज्यादा तंग ना करूँ पर बिना उसके इनपुट के काम होना मुश्किल था| माँ ने भी कई बार अनु को कहा की वो काम करे और घर का काम भाभी कर लेंगी पर अनु नहीं मानी| खेर Pitch रेडी हुई और मैंने वो भेज दी और अब हम दोनों बेसब्री से जवाब आने का इंतजार करने लगे|
update 81
दो दिन बीते, मैं अब भी पुराने वाले प्रोजेक्ट में लगा था| आकाश और पंडित जी को मैंने पुराने काम दे रखे थे जैसे की GST Return भरना, बिल,वाउचर चढ़ाना, ITR फाइल करना| जब बॉस सर पर ना हो तो employee ढीले हो ही जाते हैं! अनु को तो वो अब जैसे कुछ समझते ही नहीं थे, वो तो मैं उनकी लगाम किसी तरह खींच कर रखता था| डेली उनको फ़ोन कर के जान खाता था की कितनी प्रोग्रेस हुई है तब जा कर वो सीरियसली काम कर रहे थे| पिताजी और ताऊ जी जब मुझे फ़ोन पर उन पर हुक्म चलाते हुए देखते या मुझे उनकी क्लास लेते हुए देखते तो उन्हें बड़ा फ़क्र होता! खेर दूसरे दिन की बात है, सुबह मैं अपने काम में लगा था| पिताजी और चन्दर भैया कुछ काम से शहर गए थे और ताऊ जी को एक काम था पर वो कहने में झिझक रहे थे| मैं उठ कर उनके पास बैठ गया और उनसे पूछने लगा तो उन्होंने झिझकते हुए कहा; "बेटा वो.... मिश्र से पैसे लाने थे.....तो ...." बस ताऊ जी इतना ही बोल पाए की मैं एकदम से उठ खड़ा हुआ; "तो चलिए चलते हैं!"
"पर बेटा....तेरा काम....
" ताऊ जी बोले|
"ताऊ जी वो मैं वापस आ कर कर लूँगा!" मैंने कहा तो ताऊ जी मुस्कुराते हुए खड़े हुए और मुझे आशीर्वाद दिया| फिर हम दोनों गाडी से निकल पड़े, मैंने गाडी बड़े ध्यान से चलाई और रास्ते में ताऊ जी ने मुझे हमारे खेती-बाड़ी के काम के बारे में काफी कुछ बताया| पर उन्हें जान कर हैरानी हुई जब मैंने उन्हें कुछ ऐसी दुकानों के बारे में बताया जहाँ बीज सबसे बढ़िया क्वालिटी के मिलते थे, और तो और कुछ ऐसे व्यपारियों के बारे में भी बताया जहाँ उन्हें रेट सबसे अच्छा मिलता है| ये सब मैंने कुछ साल पहले जब मैं संकेत के साथ भाई-दूज वाले दिन निकला था तब देखा और सीखा था| इधर मैं और ताऊ जी बातें करते हुए जा रहे थे और उधर घर पर काण्ड हो गया|
अनु उस वक़्त रसोई में नाहा-धो कर खाना बनाने में लगी थी, ताई जी और मान पड़ोस में किसी के यहाँ गईं थी और भाभी नहा रही थी| नेहा को नहलाने का समय हो गया था तो अनु ने पानी गर्म कर दिया था| भाभी ने नहाने जाते हुए रितिका को आवाज मार के कह दिया था की रसोई से गर्म पानी ले कर नेहा को नहला दे| अब अगर मैं घर पर होता तो मैं ही नेहा को नहला देता पर मेरी गैरहाजरी का फायदा उठा कर रितिका ने नेहा को ठंडे पानी से नहला दिया| मेरे घर लौटने तक नेहा की तबियत खराब हो चुकी थी, जैसे ही मैं घर में घुसा मुझे नेहा के रोने की आवाज आई और मैं भागता हुआ अंदर आया तो देखा अनु नेहा को गोद में ले कर चुप कराने की कोशिश कर रही है| मुझे देखते ही अनु ने फ़ौरन नेहा को मेरी गोद में दे दिया, अभी वो कुछ बोल पाती उससे पहले ही मुझे नेहा के बुखार का एहसास हो गया| "नेहा को तो बुखार है?" मैंने गुस्से में कहा और ठीक उसी वक़्त रितिका ऊपर से अंगड़ाई लेते हुए नीचे उतरी| "यहाँ रितिका को बुखार चढ़ हुआ है और तू ऊपर सो रही है?" मैंने रितिका पर चीखते हुए कहा| पर वो जहरीली नागिन पलट कर बोली; "मुझ पर क्यों चीख रहे हो? अपनी बीवी से कहो या अपनी भाभी से कहो!" इतना कह कर वो पलट कर ऊपर चली गई| मुझे उस पर बहुत गुस्सा आया पर अभी मेरे लिए नेहा की तबियत ज्यादा जर्रूरी थी| ताऊ जी भी गुस्से से तमतमा गए थे और बर्न वाले थे; "ताऊ जी अभी आप इसे कुछ मत कहना, पहले मुझे वापस आने दो!" इतना कह कर मैं और अनु दोनों डॉक्टर के निकल गए| मैंने चाभी अनु को दी और उसे ड्राइव करने को कहा| मैं नेहा को अपनी छाती से चिपकाए रखा और उसे अपने जिस्म की गर्मी देता रहा| नेहा की सांसें तेज चलने लगी थीं और मेरी जान निकलने लगी थी| "मेरा बच्चा! बस ...बस पापा है ना यहाँ! मेरा brave बच्चा....
बस थोड़ी देर में हम डॉक्टर के पहुँच जाएँगे फिर आप ठीक हो जाओगे! ओके?" मैं नेहा को हिम्मत बंधा रहा था| नेहा के नन्हे से हाथ ने मेरी ऊँगली कस कर पकड़ ली थी और मेरे मन में बैठा डर बाहर आ गया था, आँसुओं की धारा बहते हुए मेरे हाथ पर गिरी जिसे देख अनु भी घबरा गई| उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा और मुझे हिम्मत बढ़ाने लगी, मैंने भी गाडी में बैठे-बैठे भगवान को याद करना शुरू कर दिया| आखिर हम डॉक्टर के पहुँचे और मैं दौड़ता हुआ अंदर पहुँचा और डॉक्टर को नेहा को चेक करने को कहा| डॉक्टर ने नेहा का अच्छे से चेक-अप किया और मुझसे कहा; "अच्छा हुआ की आप इसे ठीक समय पर ले आये, देर करते तो ह्य्पोथेरमिआ का खरा बन जाता| वैसे हुआ क्या था?" अब मुझे तो कुछ पता नहीं था तो अनु बोली; "वो किसी ने नेहा को ठन्डे पानी से नहला दिया था!" अनु का ये बोलना था की मेरा खून खोल गया, क्योंकि मैं जानता था की ये काम किस का है| डॉक्टर ने हम दोनों को ही झाड़ा की इतनी छोटी बच्ची को ठंडे पानी से कौन नहलाता है और हम दोनों कितने गैर-जिम्मेदार माँ-बाप हैं! हम दोनों चुप-चाप सब सुनते रहे, बस मेरे मन को ये तसल्ली थी की मेरी बेटी को कुछ नहीं होगा| दवाई ले कर हम घर वापस आ गए और पूरे रास्ते ना तो में कुछ बोलै और न ही अनु कुछ बोली| नेहा मेरी गोद में ही सो चुकी थी, जैसे मैं घर में दाखिल हुआ मुझे माँ दिखीं और उन्होंने नेहा का हाल-चाल पुछा| मैंने नेहा को उनकी गोद में दिया और उन्हें कमरे में जाने को कहा| माँ के अंदर जाने तक मैं चुप रहा और तब तक घर के सारे लोग इकठ्ठा हो चुके थे, सिवाए रितिका के! मैंने दहाड़ते हुए उसे आवाज दी; "रितिका!!!!!!" मेरी दहाड़ सुनते ही वो नीचे आ गई, उसे देखते ही मैं तमतमाता हुआ उसके पास तेजी से चल कर पहुँचा और उसके गाल पर एक जोरदार तमाचा मारा| रितिका जा कर सीढ़ी पर गिरी, घर का कोई भी सदस्य कुछ नहीं बोला और न ही कोई अपनी जगह से हिला! "अगर आज मेरी बच्ची को कुछ हो जाता ना, तो तुझे आज भगवान भी नहीं बचा सकता था! तेरी जान ले लेता मैं!!!!" मैंने चीखते हुए कहा| "अनु...why the fuck you didn't call me earlier! Were you waiting for the situation to go worse? You heard what the doctor said? If we were a lil more late her situation could have gone worse!” मैंने अनु को डाँट लगाई|
"तू (रितिका) अभी तक इस घर में है तो सिर्फ इसलिए की मेरी बच्ची को माँ के दूध की जर्रूरत है वरना तुझे धक्के मार के निकाल देता!.... और आप सब भी सुन लीजिये आज से कोई भी नेहा को इसके साथ अकेला नहीं छोड़ेगा! मुझे इस नागिन पर जरा भी भरोसा नहीं, अपनी सनक के चलते ये नेहा को नुक्सान पहुँचा सकती है!....
और अगर नेहा को कुछ हुआ तो पहले इसकी जान लूँगा उसके बाद अपनी जान!" इतना कहते हुए मैं माँ के कमरे में घुसा और नेहा को गोद में ले कर ऊपर अपने कमरे में आ गया| आज फिर एक बार एक बाप का प्यार सामने आया था और घर वाले चुप-चाप सर झुकाये खड़े थे| कुछ देर बाद अनु कमरे में आई, नेहा बिस्तर पर लेटी थी और मैंने उस पर एक कंबल दाल रखा था| मैं टकटकी बंधे नेहा को देख रहा था, उसका पेट तेजी से सांस लेते हुए ऊपर-नीचे हो रहा था और मैं डिहर प्रार्थना कर रहा था की मेरी बेटी चहकती हुई उठे ताकि मैं उसे प्यार कर सकूँ| अनु दरवाजे पर कान पकड़ कर खड़ी हो गई और वहीँ से दबी हुई सी आवाज में बोली; "सॉरी!" उसकी आवाज सुन मैं ने उसकी तरफ देखा| उसके चेहरे से उसका दर्द झलक रहा था, मैं उठा और उसे अपने गले से लगा लिया| "I’m really sorry!” अनु रो पड़ी क्योंकि वो भी नेहा से बहुत प्यार करती थी| "Its okay! I'm sorry!!! मुझे आपको वहाँ सब के सामने नहीं डाँटना चाहिए था!" मैंने कहा|
"आपको सॉरी बोलने की कोई जर्रूरत नहीं है, आपने कुछ नहीं किया! मेरी जगह आपने ये गलती की होती तो मैं भी आपको ऐसे ही डाँटती!" अनु बोली|
इतने में भाभी खाना ले कर आ गईं और वो भी थोड़ी घबराई सी थीं| पर अनु को गले लगाने के बाद मेरा गुस्सा शांत हो चूका था; "माफ़ करना भाभी!" मैंने कहा, अनु ने एकदम से भाभी के हाथ से खाने की थाली ले ली और मुझे उन्हें भी गले लगाने को कहा| मैंने भाभी को गले लगाया और तभी भाभी बोली; "साऱी (सॉरी) मानु भैया! (भाभी ने अंग्रेजी बोलने की कोशिश की!) वादा करती हूँ की आज के बाद मैं नेहा का ख्याल रखूँगी!" मेरे लिए इतना ही बहुत था फिर उन्होंने मुझे खाने को कहा तो मैंने मना कर दिया; "भाभी एक बार नेहा को उठ जाने दो, फिर मैं खा लूँगा!" भाभी ने थोड़ी जोर-जबरदस्ती की पर मैं अड़ा रहा| आखिर भाभी नीचे चली गईं और उनके पीछे मैंने अनु को भी भेज दिया ताकि वो सबको खिला दे| अनु ने सब को समझबूझा कर खाना खिला दिया और सबको यक़ीन दिला दिया की मेरा गुस्सा शांत हो चूका है| शाम को चार बजे नेहा उठी और उसने उठते ही मुझे देखा| मुझे देख कर उसकी किलकारियाँ कमरे में गूंजने लगी, बुखार अब कम हो चूका था और अब उसके खाने का समय था| मैं नेहा को ले कर नीचे आया तो देखा सब के सब चुप-चाप आंगन में बैठे हैं| मैंने भाभी को इशारे से अपने पास बुलाया और उन्हें नेहा को दते हुए कह दिया की वो नेहा को दूध पिला दें| रितिका मेरी झाड़ सुनने के बाद भाभी के कमरे में ही दुबकी बैठी थी और जब भाभी नेहा को ले कर आईं तो वो समझ गई की नेहा का दूध पीने का समय हो गया है| भाभी उसी के सर पर बैठी रहीं जबतक उसने नेहा को दूध नहीं पिला दिया|
इधर मैं आंगन में बैठ गया और अनु खाना परोसने लगी| "बेटा इतना गुस्सा मत किया कर! तेरा गुस्सा देख कर तो आज मैं भी डर गया था!" ताऊ जी बोले|
"देख तेरे चक्कर में बहु ने भी खाना नहीं खाया!" माँ
बोली| मैंने सब के पाँव छू कर उनसे अपने बुरे बर्ताव की माफ़ी माँगी और उन्हें समझा दिया की मैं नेहा को ले कर बहुत possessive हूँ! मेरी मानसिक स्थिति को समझते हुए उस समय किसी ने मुझे कुछ नहीं कहा| पर ये बात अनु को भली-भाँती समझाई जा चुकी थी की मेरा नेहा से इस कदर मोह बढ़ाना सही नहीं है! अनु भी मजबूर थी और किसी से कुछ नहीं कह सकती थी वरना वो सबको सच बता देती| मैंने और अनु ने खाना खाया और कुछ देर बाद भाभी नेहा को ले कर वापस मेरे पास आ गईं, नेहा मेरी गोद में आकर मेरे सीने से चिपक गई| रात को खाना खाने तक मैं सब के साथ नीचे बैठा रहा पर नेहा को एक पल के लिए भी खुद से दूर नहीं किया| खाना खाने के बाद मैं, नेहा और अनु ऊपर आ गए| मैं कपडे बदल रहा था और नेहा बिस्तर पर चुप-चाप लेटी थी; "बेटा! I'm sorry!!! मैंने आपकी तकलीफ नहीं समझी! आप रो रहे थे और मैं ......कुछ नहीं कर पाई! I'm a bad mother!!!" अनु ने खुद को कोसते हुए कहा|
“No you’re not a bad mother! That idiot’s a bad mother! अब खुद को blame करना बंद करो और नेहा को प्यारी सी Kissi दो!" मैंने कहा तो अनु ने नेहा के गाल को चूमा| नेहा को Kissi मिली तो वो एकदम से मुस्कुरा दी और अपने नन्हे हाथों से अनु की लट को पकड़ लिया| अनु अपनी नाक को नेहा की नाक से रगड़ने लगी| मेरी बेटी फिर से हंसने लगी और उसकी किलकारियाँ कमरे में गूंजने लगी| मैं और अनु नेहा के दोनों तरफ लेट गए और उसे सुलाने के लिए मैंने कहानी सुनाना शुरू किया| कुछ ही देर में अनु सो गई पर नेहा जाग रही थी, मैंने नेहा को गोद में लिया और बेडपोस्ट का सहारा ले कर बैठ गया| आखिर कुछ देर बाद नेहा को नींद आ गई पर मैं जागता रहा और उसके प्यारे मुखड़े को देखता रहा| रात तीन बजे नेहा ने रोना शुरू किया, उसका बुखार लौट आया था| मैंने फ़ौरन नेहा का बुखार देखा तो वो थोड़ा ज्यादा था, इधर अनु ने फटाफट डॉक्टर को फ़ोन मिलाया और उसे नेहा का टेम्परेचर बताया| डॉक्टर ने बताया की हमें क्या उपचार करना है, करीब घंटे भर बाद नेहा शांत हुई और मेरी ऊँगली पकड़ कर सो गई| कुछ देर बाद थकावट के कारन अनु की भी आँख लग गई पर मैं सुबह तक जागता रहा| सुबह जब नौ उठी तो मुझे जागते हुए पाया; "आप साऱी रात सोये नहीं! थोड़ा रेस्ट आकर लो वरना बीमार पड़ जाओगे और फिर नेहा का ख्याल कैसे रखोगे|" अनु बोली तो मैं उसकी बात मान कर नेहा से लिपट कर कुछ देर के लिए सो गया| घंटेभर बाद ही नेहा उठ गई और अपने छोटे-छोटे हाथों से मेरी दाढ़ी पकड़ने लगी| उसके छोटे-छोटे हाथों का एहसास पाते ही मैं उठ गया और उसे इस तरह हँसते हुए देख जान में जान आई| मैंने नेहा का बुखार देखा तो वो अब नहीं था, मैंने चैन की साँस ली| इतने में अनु आ गई और मेरी गर्दन पर Kiss करते हुए बोली; "आपकी लाड़ली का बुखार अब उतर चूका है! अब उठो और अपनी ये दाढ़ी साफ़ करो! मुझे मेला शोना clean shaven चाहिए!" ये पहलीबार था की अनु ने मुझे 'शोना' कहा हो| "पहले तो मैं आपको दाढ़ी में
अच्छा लगता था, अब अचानक से clean shaven क्यों?" मैंने उठ कर बैठते हुए पुछा|
"पहले इसलिए कहती थी ताकि आपको Kiss न कर पाऊँ! पर अब तो जैसे आपको Kissi करने के लिए जगह का अकाल पड़ने लगा है|" अनु ने हँसते हुए कहा| मैं फटाफट तैयार हुआ और मुझे clean shaven देख अनु बहुत खुश हुई! "क्या बात है? हम कहते तक गए की दाढ़ी ना रख पर मानु भैया ने एक ना सुनी और बहु ने एक बार क्या कहा सारा जंगल छोल (साफ़) दिया|" चन्दर भैया बोले| ये सुन कर भाभी ने अनु को प्यार से कंधा मारा और दोनों खी-खी कर हँसने लगे| नाश्ता कर के हम दोनों डॉक्टर के आ गए और उसने चेक कर के बता दिया की अब घबराने की कोई बात नहीं है| कुछ हिदायतें हमें दी गईं जिसे अच्छे से समझ कर हम घर लौट आये| दोपहर को खाने के बाद नेहा मेरी गोद में सो गई और मैं मेल चेक करने लगा| तभी मैंने देखा की कंपनी का जवाब आया था और उन्होंने हमें अगले महीने New York बुलाया है| अनु ने वो मेल मुझसे पहले देख लिया था पर मुझसे उसने कुछ कहा नहीं था| कुछ देर बाद जब अनु ऊपर आई तो मैंने उससे बात की; "बेबी! एक बात बताना, वो ...कोई रिवर्ट आया?" ये सुन कर अनु कुछ सोच में पड़ गई और वो कुछ जवाब देती उससे पहले ही मैं बोल पड़ा; "मेरा बेबी मुझसे बात छिपा रहा है?" मैंने तुतलाते हुए कहा तो अनु मेरी तरफ देखने लगी; "वो....आप नेहा को ले कर इतना परेशान थे....तो मैंने ....इसलिए...." अनु ने घबराते हुए कहा| मैंने हाथ खोल कर अनु को गले लगने बुलाया और उसके कान में खुसफुसाते हुए बोला; "आपको पता है ना हमने कितनी मेहनत की है? मैं नेहा से प्यार करता हूँ पर उतना ही प्यार मैं अपने काम से भी करता हूँ| इसलिए नेक्स्ट टाइम मुझसे कोई बात मत छुपाना| हमारे पास बस एक महीना है और अभी काफी काम पेंडिंग है!" मैंने कह तो दिया पर मैं जानता था की मैं नेहा को छोड़ कर नहीं जा पाउँगा| अगर मैं चला भी जाता तो वापस गाँव नहीं लौट सकता था क्योंकि 6 महीने होने वाले थे हम दोनों को ऑफिस अटेंड किये और वहाँ काम संभालने वाला कोई नहीं था! मैं बस इसी चिंता में खोया था की अनु मेरी तकलीफ समझते हुए बोली; "I promise की हम अकेले नहीं जाएँगे! नेहा हमारे साथ जाएगी!" अनु की ये बात सुन मेरा दिल उम्मीद से भर उठा, मैं इतना खुश था की मैंने अनु से ये तक नहीं पुछा की वो ये सब कैसे करने वाली है?
अगले दिन की बात है, मैं ताऊ जी, पिताजी और चन्दर भैया एक साथ निकले| दरअसल मैं उन्हें वो सब जगह दिखाना चाहता था जहाँ से समान सस्ता मिलता है और उन व्यापारियों से भी मिलना चाहता था जिनके साथ हम काम कर रहे थे| इधर घर पर माँ, भाभी और ताई जी एक कीर्तन में चले गए| भाभी नेहा को अपने साथ ले गईं, उन्होंने अनु को भी कहा पर उसने ऑफिस के काम का बाहना बना दिया| दरअसल अनु को रितिका से बात करने का मौका चाहिए था! सब के जाने के बाद अनु ऊपर छत पर आई, रितिका वहाँ अकेली बैठी कुछ सिलाई कर रही थी| शादी के बाद
से अभी तक दोनों ने एक दूसरे से कोई बात नहीं की थी| काम को लेकर अगर कोई बात हुई हो तो हुई हो वरना और कोई बात नहीं हुई थी| अनु उसके सामने बैठ गई और बात शुरू करते हुए बोली; "देख....तेरे चाचा (अर्थात मैंने) ने मुझे सब कुछ बता दिया है!" इतना सुनते ही रितिका अनु पर बरस पड़ी; "क्या चाचा? मैं प्यार करती थी उससे और वो भी मुझसे प्यार करता था! शायद अब भी करता हो!" रितिका ने जलन की एक चिंगारी जलाते हुए कहा| अनु को गुस्सा तो बहुत आया पर अभी उसे जो बात करनी थी उसके लिए उसे ये कड़वा घूँट पीना पड़ा! "सॉरी! देख....मैं जानती हूँ तू बंध के रहने वालों में से नहीं है! तुझे उड़ना अच्छा लगता है, अपनी मनमानी करना अच्छा लगता है, ऐशों-आराम अच्छा लगता है और घूमना फिरना भी! यहाँ रहते हुए तो तेरे ये शौक पूरे नहीं हो सकते! मैं तुझे एक बहुत अच्छा मौका देती हूँ.... मैं तुझे इस घर से निकालूँगी...जहाँ तू चाहेगी वहाँ तू रहना, जो चाहे वो करना.....तुझे जो भी चाहिए होगा वो तुझे दूँगी...सारे ऐशों-आराम तेरे होंगे! जितने पैसे चाहिए सब दूँगी.....पर तुझे नेहा की कस्टडी 'इन्हें' देनी होगी!" अनु की बात सुन कर रितिका जोर से हँसने लगी| "देख मैं तेरे आगे हाथ जोड़ती हूँ....प्लीज मेरी बात मान जा!" अनु ने मिन्नत करते हुए कहा पर रितिका की हँसी और तेज होती गई| अनु को गुस्सा तो बहुत आया, मन किया की उसे छत से नीचे फेंक दे पर उससे वो मरती नहीं! इधर जब रितिका का पेट हँस-हँस कर दुःख गया तब वो अपनी हँसी रोकते हुए बोली; "ये जो नेहा को खो देना का डर तेरे पति के मन में है ना इससे कई गुना ज्यादा डर मैंने झेला है!" रितिका ने गंभीर होते हुए कहा| "पता है कैसा लगता है जब कोई तुम्हारी जान लेने घर में घुस आता है? मुझे पता है.... सब कुछ था मेरे पास...पैसा, घर, नौकर-चाकर, गाडी, इतना बड़ा घर, रुतबा.... इस घर का हर एक शक़्स गर्व महसूस कर रहा था, सिर्फ और सिर्फ मेरी वजह से! मेरी वजह से उन्हें इतने बड़े घर से नाता जोड़ने का मौका मिला था! क्या गलती थी मेरी? क्या एक लड़की को चैन की जिंदगी जीने का हक़ नहीं होता? मानु मुझे ये सब कभी नहीं दे सकता था, इसलिए मैंने उसे छोड़ दिया! Big Deal?! पर उसने मुझे बद्दुआ दी....ऐसी बद्दुआ जिसने मेरे हँसते-खेलते जीवन में आग लगा दी थी! मैं प्रेग्नेंट थी....तुम्हार पति के 'बीज' से! हाँ मैंने ये सच कभी राहुल को नहीं बताया ...खुदगर्जी की...
तो क्या? पर फिर वो काली रात आई मेरे जिंदगी में, वो चार लोग घर में घुस आये और गोलियाँ चलाने लगे| मैं कितना डर गई थी, पर राहुल ने मुझे संभाला और मुझे ऊपर के स्टोर रूम में छुपने को कहा| मैं ऊपर पहुँची और स्टोर रूम के दरवाजे के पीछे छुप गई, मैंने अपने पूरे परिवार की चीखें सुनी! सोच सकती हो वो डर क्या होता है? वो लोग मुझे ढूंढते हुए ऊपर आ गए और स्टोर रूम के बाहर खड़े हो गए| मैंने साँस लेना रोक लिया था क्योंकि अगर उन्हें मेरी साँस लेने की आवाज सुनाई दे जाती तो वो मुझे भी मार देते! वो तो मेरी क़िस्मत थी की मैं बच गई और सुबह होने तक वहीँ छुपी रही| सुबह जब वहाँ से निकली तो सबसे पहले अपनी पति की लाश देखि और उसे खून में लथ-पथ देख मैंने अपने होश खो दिए!
जब होश आया तो मैं हॉस्पिटल के बेड पर थी और मेरे आस-पास सब थे! होश आने के बाद मैंने दो दिन तक किसी से बात नहीं की, क्योंकि मेरे मन में जो आग लगी थी वो थी तुम्हारे पति से बदला लेने की! फिर नेहा पैदा हुई और जानती हो मैंने उसका नाम 'नेहा' क्यों रखा? क्योंकि मैं अपने दुश्मन का नाम भूलना नहीं चाहती थी, आखिर ये नाम उसी ने मुझे बताया था! एक-एक दिन मैंने जलते हुए काटा फिर छोटी दादी (मेरी माँ) का ड्रामा शुरू हो गया और घर में तुम्हारे पति की वापसी की बातें चलने लगी| यही वो समय था जब मैंने उससे बदला लेने का प्लान बनाना शुरू कर दिया| पर मेरे पास कोई जरिया नहीं था, उसकी कोई कमजोरी नहीं थी| इसलिए मैंने कमजोरी पैदा करने की सोची और नेहा को जानबूझ कर उसकी गोद में डाल दिया| कुछ ही दिन में उसे नेहा से प्यार हो गया, मुझे लगा शायद उसका मन मेरे लिए पिघल जायेगा और मैं एक बार फिर उसे अपने प्यार के चक्कर में फाँस कर उसका इस्तेमाल करूँ यहाँ से निकलने के लिए पर वो साला मेरे झांसे में ही नहीं आया| तो मैंने अपनी आखरी चाल चली और नेहा को उससे दूर कर दिया! वो दो दिन वो जिस तरह तड़प-तड़प कर रोया उसे देख कर मेरे दिल को सुकून मिला! पर मेरी किस्मत ने मुझे एक बार फिर धोका दे दिया.....
तुझे यहाँ भेज कर! बस तबसे मेरे सारे डाव उलटे पड़ने लगे! तुम दोनों को इस तरह रोमांस करते देख मेरा खून जलता है, कोई ऐसा दिन नहीं जाता जब मैं तुम दोनों को बद्दुआ ना दूँ!" रितिका ने अपने दिल की साऱी बढास निकाल दी थी और अनु को ये सब सुन कर बहुत बड़ा झटका लगा| उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था की रितिका अपने अंदर इतना जहर पाले है! पर अब अनु के सब्र की इंतेहा हो चुकी थी, रितिका का एक और कड़वा शब्द और वो अपना आपा खो देती!
"वैसे इतना नशा करने के बाद तो जान रही नहीं होगी उसमें जो तुझे माँ बना सके? तभी तो उसने तुझे यहाँ भी दिया मेरे पास, भीख मांगने! नामर्द कहीं का!" रितिका घमंड में बोली पर अनु ने उसे एक जोरदार जवाब देते हुए एक झन्नाटेदार तमाचा मारा| "उन्होंने मुझे यहाँ नहीं भेजा, मेरी मति मारी गई थी जो मैं यहाँ तुझे समझाने आई! तेरे साथ जो हुआ उसके लिए मुझे जरा भी अफ़सोस नहीं, तू इसी के लायक थी! बुरा कगता है तो सिर्फ उस लड़के के लिए जो तुझ जैसी मतलबी लड़की से प्यार कर बैठा! तेरी ही काली किस्मत खा गई उसे! भगवान् ने तुझे इतना प्यार करने वाला दिया जिसने तेरे पैदा होने से ले कर बड़े होने तक प्यार किया और तूने उसी के जज्बातों से खेला! तुझे समझाया था न 'इन्होने' की तेरे इस 'so called प्यार' में कितना खतरा है? बताया था न तुझे तेरी माँ की करनी पर तब तो तू 'इनसे' सच्चा प्यार करती थी! तब तो तू आग का दरिया पार करने को तैयार थी, जरा सी struggle क्या करनी पड़ी तेरी हालत खराब हो गई! हो भी क्यों न, हराम का जो खाती आई है आजतक? मर यहाँ और सड़ती रह! "प्यार क्या होता है ये तुझे कुछ दिनों में पता चल जायेगा जब मैं इनके बच्चे की माँ बनूँगी! नेहा के प्यार की कमी को तो मैं पूरा नहीं कर सकती पर जब इनकी गोद में हमारा बच्चा होगा तब ये खुद को संभाल ले लेंगे!" इतना कहते हुए अनु जाने को पलटी, रितिका अपने गाल पर हाथ रखे खड़ी रही और रोती हुई बोली; "इस थप्पड़ का बदला तू याद रखेगी!" अनु ने उसकी इस धमकी का कोई जवाब नहीं दिया और नीचे आ गई| कुछ देर बाद भाभी, माँ और ताई जी कीर्तन से लौट आये| शाम तक मैं भी सबके साथ लौट आया और अनु में अलग सा बदलाव पाया| और दिन वो सिर्फ तभी घूंघट करती थी जब ताऊजी, पिताजी या चन्दर भय सामने होते वरना वो सर पर पल्ला रखे काम करती पर आज मैं जब से आया था वो घूंघट काढ़े घूम रही थी और मुझसे नजरें चुरा रही थी| मैंने बहाने से उसे ऊपर आने को कहा तो उसने घूंघट किये हुए ही सर ना में हिला दिया| मैं समझ गया की कुछ तो बात है, मैं अपने कमरे में आया और वहाँ से आवाज लगा कर अनु को ऊपर बुलाया| आखिर अनु को ऊपर आना पड़ा और उसने अभी भी घूंघट कर रखा था| मैंने फ़ौरन उसे अंदर खींचा और दरवाजा बंद कर दिया, हाथ पकड़ कर अनु को पलंग पर बिठाया और उसके सामने घुटनों पर बैठ गया| जैसे ही मैंने अनु का घूंघट उठाया तो उसकी आँखों को आसुओं से
भरा हुआ पाया, मैं कुछ कहता उससे पहले ही वो बिफर पड़ी; "I’m sorry…. मैं अपना वादा पूरा नहीं कर सकी!” और फिर अनु ने रोते हुए साऱी बात बताई, मैंने अनु की बात बड़े इत्मीनान से सुनी और जब उसकी बात खत्म हुई तब पहले उसके आँसू पोछे; "मेले बेबी ने मेले लिए इतना कुछ किया? पर ये बताओ आपको उसके मुँह लगने की क्या जर्रूरत थी? और जो आप उसे ऐशों-आराम देने की बात कर रहे थे उसके लिए हम पैसे कहाँ से लाते? बेबी मैं नेहा से बहुत प्यार करता हूँ पर हालात ऐसे हैं की मैं उसे छह कर भी नहीं अपना सकता! कई बार जब कोई रास्ता नहीं रह जाता तो खुद को हालातों के सहारे छोड़ देना चाहिए! समय हमेशा एक सा नहीं रहता! कहने को तो जब उसने मेरा दिल तोडा तो मैं बहुत कुछ कर सकता था और उसकी शादी कभी होने नहीं देता पर मैंने ऐसा नहीं किया| मैंने खुद को हालात के सहारे छोड़ दिया और देखो मुझे आप मिल गए! आपने आज जो किया वो मेरे लिए बहुत है, रही बात नेहा की तो.......देखते हैं क्या होता है!" मैंने अनु के सर को चूमा और उसे गले लगा लिया| इतने दिनों में मुझ में इतनी तो समझ आ गई थी की मैं नेहा को अपना नाम नहीं दे सकता और रहा उसका मोह, तो वो भी मैं चाह कर भी नहीं छोड़ सकता| जानता था की जुदाई के समय बहुत दर्द होगा....पर सह लेंगे थोड़ा!
मैंने और अनु ने सब को हमारे New York जाने की बात बता दी थी और ये भी की वहाँ से लौट कर हमें बैंगलोर ही रहना है| मेरा बैंगलोर रहने का फैसला घर में सब के लिए कष्टदाई था तो अनु बोली; "माँ आप चिंता ना एक्रो, हम धीरे-धीरे अपना काम समेटना शुरू करते हैं और फिर लखनऊ में अपना ऑफिस शिफ्ट कर लेंगे! या फिर अपना मैं ऑफिस यहाँ खोल लेंगे!" अनु की बात सुन माँ को संतुष्टि हुई की उन बेटा उनके पास जल्द ही लौट आएगा| इसी के साथ अनु ने सब को बैंगलोर आने का भी निमंत्रण दे दिया और सब ख़ुशी-ख़ुशी मान गए|
update 82
दिन बीतते गए और इन बीते दिनों में मैंने नेहा को खूब प्यार दिया| इतना प्यार जो शायद आने वाले सालों तक उसके ऊपर आशीर्वाद बनकर रहता| मैंने और अनु ने मिलकर घरवालों के साथ बहुत अच्छी और प्यारी-प्यारी यादें बनाई! जहाँ माँ और ताई जी ने अनु को अपनी बेटी की तरह प्यार दिया वहीँ मैं जो की घर का सबसे छोटा बेटा था उसे उसकी जिम्मेदारी का एहसास होने पर ताऊ जी और पिताजी ने खूब आशीर्वाद दिया| चन्दर भैया और भाभी के संग मेरा और अनु का दोस्तों जैसा रिश्ता बन गया था| भाभी मेरा और अनु का खूब ख्याल रखती और कहती रहती की जल्दी से जल्दी खुशखबरी सुनाओ! अब चूँकि घर पर हम दोनों को ज्यादा प्राइवेट समय नहीं मिल पाता था तो दोनों अपने-अपने काम में लगे रहते| हमारा रोमांस केवल Kiss तक ही सिमट कर रह गया था| प्यासे दोनों ही थे पर अपने प्यास को काबू रखने जानते थे| ऐसे कई पल आया जब रितिका ने हम दोनों को रोमांस करते देखा और जलती हुई चली गई पर हमें उससे
कोई फर्क नहीं पड़ा| अनु ने नेहा को अपनी बेटी जितना प्यार दिया और अगर मेरे बाद किसी इंसान से नेहा को प्यार मिला तो वो अनु ही थी| जब कभी मैं घर पर नहीं होता तो अनु उसके साथ खेलती, नहलाती, कपडे बदलती और उस गुड़िया को अपने से चिपकाए रहती| जब मैं घर पर होता तो अनु हमारी इतनी फोटो खींचती की क्या कहूँ! हम दोनों ही जानते थे की नेहा धीरे-धीरे बड़ी होगी और उसे ये प्यार याद नहीं रहेगा, उसके लिए हम उसके दादा-दादी होंगे ना की माँ-बाप! ये एक ऐसा दर्द था जो हम अभी से महसूस कर रहे थे पर हालात के आगे मजबूर थे! हम दोनों का प्यार ही था जो हमें सहारा दे रहा था! नेहा के साथ बितायी ये यादें ही हमारे लिए सब कुछ था! उधर भाभी की डिलीवरी की डेट नवम्बर के आखरी हफ्ते की थी और भाभी ने दोनों को सख्त हिदायत दी थी की हम अगर तब यहाँ नहीं आये तो वो हमसे कभी बात नहीं करेंगी! इन खुशियों में दिन कैसे बीते पता ही नहीं चला|
हमारे जाने से एक दिन पहले की बात है, सुबह से ही मैं बहुत बुझा-बुझा था! नेहा के सुबह उठते ही मैं उसे अपनी छाती से चिपकाए कमरे में बैठा था| आज मेरी गुड़िया भी बहुत खामोश थी, और दिन तो उसकी किलकारियाँ गूंजती रहती थीं पर आज वो बहुत शांत थी| ऐसा लगा मानो उसे पता ही की कल उसके पापा चले जाएंगे! फिर एक ख्याल आया की एक बार भगवान् से मदद मांग कर देखूँ, क्या पता वो मेरी सुन लें! मैं नहा-धो कर तैयार हुआ और नेहा को भी नहला कर रेडी किया| नेहा को गोद में लिए मैं नंगे पाँव मंदिर चल दिया| जाने क्यों पर आज लग रहा था की मेरी इस तपस्या का फल मुझे अवश्य मिलेगा| मैं आजतक कभी इतना नंगे पाँव नहीं चला था, यहाँ तो मंदिर भी खेतों के बीच था सो वहाँ तक पहुँचने में जाने कितनी ही बार पाँव में कंकड़ लगे, पर भगवान पर आस्था और नेहा के प्यार ने मुझे सहारा दिया| आखिर मंदिर पहुँच कर मैंने भगवान से प्रर्थना की; "आप से आज तक मैंने आप से जो माँगा अपने मुझे वो दिया है, आज बस एक आखरी बार आपसे कुछ माँगना चाहता हूँ! मुझे मेरी बेटी दे दो! मैं नेहा को अपने साथ रखना चाहता हूँ, उसकी परवरिश करना चाहता हूँ, उसे उसके पापा का प्यार देना चाहता हूँ! वादा करता हूँ फिर आप से कुछ नहीं माँगूँगा! प्लीज भगवान जी...
कोई तो रास्ता सुझा दो मुझे या फिर इसकी माँ को ही अक्ल दे दो ताकि वो नेहा को मुझे सौंप दे!" मैं घुटनों पर खड़ा भगवान से मिन्नतें करता रहा, आसुओं की धारा नेहा पर गिरी जो चुप-चाप मेरी ही तरफ देख रही थी| नेहा ने कैसे कुछ बोलने के लिए मुँह खोला और फिर चुप हो गई, मानो कह रही हो की पापा आप मत रोइये! मैंने उसे एक बार चूमा और फिर भगवान पर सब छोड़ कर मैं घर लौट आया इस बात से अनजान की अनु पहले ही यहाँ आ कर यही दुआ माँग कर गई है| जब मैं घर पहुँचा तो माँ ने पुछा की मैं कहाँ गया था? पर माथे पर टीका देख वो समझ गईं, "मेले बच्चे को मंदील ले कल गया था!" मैंने तुतलाते हुए बोला तो नेहा की किलकारियाँ शुरू हो गईं| घर में सब जानते थे की मैं नेहा से कितना प्यार करता हूँ और उससे बिछड़ना मेरे लिए आसान नहीं होगा| पर इससे पहले मुझे ये बात कोई समझाता मैंने अपने चेहरे पर ख़ुशी का मुखौटा ओढ़ लिया| मैंने किसी को भी शक नहीं होने दिया की मैं कल नेहा से दूर जाने को ले कर दुखी हूँ| दोपहर को खाने के बाद मैं नेहा को गोद में ले कर अपने कमरे में बैठा था; "बेटा.... मुझे ना... आपको कुछ बताना है! कल है न...मैं...............जा रहा हूँ!" मैंने बड़े भारी मन से नेहा से ये बात कही, नेहा अपनी भोली सी आँखों से मेरी आँखों में देखने लगी जैसे पूछ रही हो की मैं वापस कब आऊँगा? "नेक्स्ट हम ....आपके बर्थडे पर मिलेंगे! तब मैं आपके लिए ढेर सारे गिफ्ट्स ले कर आऊँगा|" पर मेरा इतना कहते ही नेहा ने रोना शुरू कर दिया, जैसे उसे मेरी सब बात समझ आ गई हो| "awww मेरा बच्चा! बस रोना नहीं...I promise मैं आपके बर्थडे पर आऊँगा!" पर नेहा पर इस बात का कोई असर नहीं हुआ, जैसे उसे सिर्फ अपने पापा ही चाहिए और कुछ नहीं चाहिए! "I'm sorry बेटा! But हमारे हालात ऐसे हैं की मैं आपके साथ चाह कर भी नहीं रह सकता! मेरा सारा काम-धंधा बैंगलोर में सेट है....
I'm helpless!" मैंने रोते हुए कहा और नेहा को अपने सीने से लगा लिया| करीब आधे घंटे हम दोनों ऐसे ही बैठे रहे और अब नेहा का रोना बंद हो गया था| "I hope नेक्स्ट टाइम जब आप मुझे देखो तो मुझे भूलोगे नहीं!" मैंने अपने आँसू पोछते हुए कहा| "ऐसे कैसे भूल जायेगी?" अनु पीछे से बोली और चल कर मेरे पास आई| "7 महीने की बच्ची की इतनी अच्छी यादाश्त नहीं होती की वो हर किसी को याद रख सके! उस दिन देखा था जब मैंने shave की थी तो ये मुझे पहचान ही नहीं रही थी!" मैंने कहा|
"वो इसलिए क्योंकि उसे आपको दाढ़ी में देखने की आदत हो गई थी! Unfortunately उसकी माँ (अनु) को आप Clean shaven अच्छे लगते हो! पर आप कांटे हो नेहा ने आपको कैसे पहचाना? आपका स्पर्श पाते ही वो समझ गई की ये उसके पापा हैं!" अनु ने मुस्कुराते हुए कहा| अनु का तर्क emotional था scientific नहीं! पर मैंने आगे बात को नहीं खींचा और मुस्कुराते हुए अनु को अभी अपने गले लगा लिया| हम तीनों ऐसे ही गले लगे हुए खड़े थे की अनु ने हमारी सेल्फी ले ली! वो पूरा दिन मैं नेहा के साथ बातें करता रहा और उसका मन मैंने दुबारा अपने जाने पर नहीं भटकने दिया| मेरा ये बचपना देख चन्दर भय बोले; "भैया इतनी छोटी है की उसे आपकी बात क्या समझ आती होगी?" पर ताऊ जी ने उनकी बात का जवाब देते हुए कहा; "बच्चे ऐसे ही बोलना सीखते हैं!" उनकी बात लॉजिकल थी! मैं नेहा को गोद में ले कर खड़ा हुआ और उसे ऐसे पकड़ा जैसे दो लोग डांस करते हैं और गाना गन गुनाते हुए आंगन में नाचने लगा;
"दिन भर करे बातें हम
फिर भी लगे बातें अधूरी आज कल
मन की दहलीजों पे कोई आए ना
बस तुम ज़रूरी आज कल
I love you...
" पूरा घर मेरा बचपना देख खुश हो गया और नेहा भी मुस्कुराने लगी| फिर मैंने नेहा की ठुड्डी पकड़ी और उसकी आँखों में देखते हुए कहा;
"थोड़ा थोड़ा तुझसे सीखा
प्यार करने का तरीका
दिल के खुदा की मुझपे इनायत है तू
आइ लव यू
आइ लव यू"
वो नेहा ही थीं जिसने मुझे एक बाप बनने का मौका दिया और मेरे अंदर एक बाप का प्यार जगाया था! इधर अनु ने चुप-चाप मेरे डांस की वीडियो बना ली थी|
रात तक मेरा यूँ नेहा को गोद में ले कर खेलना और उससे बातें करना जारी था! खाना खाने के बाद भी मैं और नेहा साथ सोये, बेचारी अनु को नेहा को मुझसे चुराने का भी मौका नहीं मिला| पर रात को हम दोनों जागते रहे और बारी-बारी नेहा को चूमते रहे, दोनों में जैसे होड़ लगी थी की नेहा के उठने तक उसे सबसे ज्यादा कौन चूमेगा| उस खेल में पता ही नहीं चला की कब सुबह हो गई| अनु नेहा को आखरी Kiss दे कर उठी और नीचे चली गई और इधर मैं नेहा को पाने सीने से लगा कर लेट गया| मेरा दिल जोर से धड़कने लगा था| यही धड़कन सुन नेहा उठ गई, मैंने जैसे ही उसे देखा तो खुद को रोने से नहीं रोक पाया| नेहा अब भी जैसे समझने की कोशिश कर रही हो की मैं क्यों रो रहा हूँ! उसकी नन्ही सी हथेली मेरी ऊँगली के स्पर्श का इंतजार कर रही थी| मैंने उसे जैसे ही अपनी ऊँगली पकड़ाई उसने कस कर अपनी मुठ्ठी बंद कर ली ताकि कहीं मैं उसे छोड़ कर चला न जाऊँ| जैसे-तैसे मैंने खुद को काबू किया और नेहा को ले कर नीचे आ गया| मेरी शक्ल देख कर कोई भी णता सकता था की मैं रात भर नहीं सोया था और अभी आये आसुओं से मेरी आँखें नम हो चली थीं| मेरी ये हालत देखते ही माँ अनु से बोली; "बहु तुझे कहा था न की मानु से बात कर, उसे समझा की वो नेहा से इतना मोह ना बढाए? देख क्या हालत हो गई है इसकी?!" माँ ने अनु से कहा तो वो सर झुका कर खड़ी हो गई, मेरे तो जैसे मुँह में जुबान ही नहीं थी मैं बस नेहा को देखे जा रहा था और अपना रोना रोक रहा था!
माँ की देखा-देखि ताई जी भी मुझे समझाना शुरू हो गईं, मैंने बड़ी हिम्मत बटोरी और बोला; "ठीक है ताई जी....!" इतना कह कर मैंने बेमन से नेहा को अनु को दिया| मेरा ऐसा करने से सब शांत हो गए ये सोच कर की मैंने उनकी बात मान ली है और इधर अनु को भी नेहा के साथ आखरी कुछ पल मिल गए प्यार करने को| मैं ने पहले अपने सारे कपडे पैक किये और फिर नहाने घुस गया| बाथरूम में मैंने जी भर कर अपने आँसू बहाये, क्योंकि यहाँ मुझे रोकने वाला कोई नहीं था| नहा-धो कर मैं बाहर आया तो अनु ने नेहा को मेरी गोद में दे दिया, फिर सबके साथ बैठ कर हमने नाष्ता किया| "तो बेटा तुम दोनों पहले बैंगलोर जाओगे?" ताऊ जी ने पुछा|
"जी मैंने टैक्सी बुक की थी, जो अभी आती होगी| पहले हम बीएस स्टैंड जायेंगे और वहाँ से दिल्ली की Volvo लेंगे, फिर दिल्ली से डायरेक्ट फ्लाइट New York तक!.....
और चन्दर भैया, मेरे आने तक गाडी चलना सीख लेना!" मैंने कहा|
"मुझे लगा तुमलोग पहले बैंगलोर जाओगे?" पिताजी बोले|
"जी पर फिर वहाँ से वापस मुंबई आना पड़ता, इससे अच्छा है की डायरेक्ट ही चले जाते हैं| मैंने कहा और इतने में हमें बाहर से टैक्सी का हॉर्न सुनाई दिया| चन्दर भय सारा समान टैक्सी में रखने लगे और इधर हमदोनों सब के पाँव छू कर आशीर्वाद लेने लगे| माँ बहुत ज्यादा भावुक हो गईं थीं; "माँ...बस कुछ महीनों की बात है, हम नेहा के जन्मदिन पर आ जायेंगे!" मैंने कहा तो माँ खुश हो गईं| सबसे मिलने के बाद अनु ने नेहा को आखरी दफा गोद में लिया और उसे अपने सीने से लगा कर रो पड़ी| भाभी ने अनु को संभाला और उसे चुप कराया| इधर मैं हाथ बांधे नेहा को गले लगाने का इंतजार कर रहा था, बुझे मन से अनु ने नेहा को मुझे दिया| नेहा को गोद में लेते ही मुझे वो रात याद आई जब मैंने उसे पहलीबार गोद में लिया था| मेरे आँसू बह निकले और मैंने नेहा को कस कर अपने सीने से लगा लिया, मेरी तेज धड़कनें सुन नेहा रो पड़ी शायद उसे भी एहसास हो गया था की मैं जा रहा हूँ! मैंने नेहा को गोद में ले कर घूमना शुरू कर दिया और घुमते-घुमते मैं 50 कदम दूर आ गया| मैंने टैक्सी वाले को उसका मीटर चालु करने को कह दिया था ताकि उसका नुक्सान ना हो! इधर मैंने नेहा से बात करना शुरू कर दिया ताकि वो चुप हो जाए और हुआ भी यही, नेहा चुप हो गई और मेरी छाती से लग कर सो गई| आधे घंटे तक मैं उसे लेकर ऐसे घूमता रहा और उधर सबने मुझे संभालने की जिम्मेदारी अनु को दे दी; "बहु...देख मानु बहुत भावुक है! नेहा से उसका मोह कहीं उसे….तू तो जानती ही है...
वो जब उदास होता है तो खाना-पीना छोड़ देता है!" माँ अपनी चिंता जताते हुए बोलीं|
"आप चिंता न करो माँ, मैं 'इनका' बहुत अच्छे से ख्याल रखूँगी!" अनु बोली और तब तक मैं भी नेहा को गोद में लिए वापस आ गया| भाभी ने नेहा को गोद में लेना चाहा पर नही ने अपने एक हाथ से मेरी शर्ट और दूसरे से मेरी ऊँगली पकड़ रखी थी| मेरा मन नहीं हुआ उसके हाथ से खुद को छुड़ाने का, इसलिए भाभी ने ही उसके हाथ से मेरी शर्ट और ऊँगली छुड़ाई| नेहा जागने के लिए थोड़ा कुनमुनाई, तो मैंने उसके माथे को एक बार चूमा और नेहा के मुँह पर प्यारी सी मुस्कान आ गई| इसी मुस्कान को आँखों में बसाये मैं जाना चाहता था| अनु और मैं सब को नमस्ते की और गाडी में बैठ गए| कुछ दूर गए होंगे की दोनों की आँखें फिर से बहने लगीं| मैं अपना रोना तो बर्दास्त कर सकता था पर अपनी पत्नी का रोना नहीं| मैंने अनु के आँसूँ पोछे और इधर-उधर की बातें शुरू कर दीं ताकि उसका मन हल्का हो जाए| अनु समझ गई और मेरी बातों को आगे बढ़ाती रही| हम बस स्तब्ध पहुँचे और वहाँ से हमें दिल्ली के लिए Volvo मिली! Volvo में बैठते ही अनु बोली; "आपके साथ ट्रैन की यत्र कर ली, प्लेन की यात्रा कर ली, बाइक यात्रा और कार यात्रा भी कर ली एक बस यात्रा बची थी वो भी आज पूरी हो गई!"
"बेबी बस एक cruise ship की यात्रा रह गई!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा| बस चली और कुछ देर बाद नेहा को याद कर मेरी आँखें फिर से नम हो गईं, अनु ने अपना फ़ोन निकाला और भाभी को वीडियो कॉल की| भाभी ने नेहा को गोद में बिठा कर कैमरा उसकी तरफ कर दिया और इधर अनु ने मेरा ध्यान अपने फ़ोन की तरफ खींचा| नेहा को देखते ही दिल खुश हो गया, मैंने हाथ हिला कर नेहा को बुलाया, मुझे फ़ोन पर देखते ही वो खुश हो गई और अपने छोटे-छोटे हाथों को मेरी तरफ बढ़ा दिया जैसे कह रही हो की पापा मुझे गोदी ले लो! ये देखते ही दिल रोने लगा क्योंकि आज मैं छह कर भी उसे गोद में नहीं ले सकता था| अनु ने मेरा बयां हाथ कस कर दबा दिया और मुझे रोने से बचा लिया| कुछ देर ऐसे ही नेहा से बात की और मन कुछ हल्का हो गया| कॉल के बाद मैंने अनु को थैंक यू कहा तो अनु मुस्कुराने लगी|
हम अगले दिन सुबह 6 बजे दिल्ली पहुँचे और वहाँ से टैक्सी कर एयरपोर्ट पहुँचे| वहीँ पर हम दोनों बारी-बारी से फ्रेश हुए और फिर फ्लाइट ले कर नई यॉर्क पहुँचे| चूँकि हमें कनेक्टिंग फ्लाइट मिली थी तो इतनी travelling से बैंड बजना तो तय था| पूरे रास्ते मैंने खुद को अच्छे से संभाला हुआ था, क्योंकि मुझे रोता हुआ देख अनु को भी वैसे ही दुःख होता जैसा उसे रोता हुआ देख मुझे होता था| मैंने खुद को बिजी रखने के लिए काम में लगा दिया और अपनी बेटी की जुदाई के दर्द को दबाना शुरू कर दिया| होटल पहुँच कर अनु सो गई पर मैं Presentation चेक करने में बिजी हो गया| मीटिंग कल सुबह थी और मैं कुछ भी खराब नहीं करना चाहता था| सुबह जब अनु उठी तो मुझे
ऐसे काम करते हुए देख वो नाराज हो गई; "आप सोये नहीं? मुझे तो लेटते ही नींद आ गई और सीधा अभी उठी! बीमार होगये तो?" अनु ने चिंता जताते हुए कहा|
"यार अपने हनीमून पर कोई बीमार होता है?" मैंने मुस्कुरा कर कहा| "Actually कुछ चीजें edit करनी थीं और मैं एक बार साड़ी प्रेजेंटेशन को go though करना चाहता था, you know to be on a safe side!" मैंने कहा और तैयार होने चला गया| अनु ने आज साडी पहनी थी और मैंने बिज़नेस सूट! साडी में अनु कमाल की लग रही थी; "Are you sure हम प्रेजेंटेशन देने जा रहे हैं?" मैंने अनु की तारीफ करते हुए कहा जिसे सुन उसके गाल लाल हो गए|
मैं उम्मीद कर रहा था की हमारी मुलाक़ात मर्दों से होगी पर यहाँ तो साड़ी ladies बैठी थीं| अनु को साडी में देख उनमें से एक ने पूछ लिया; "Ms. Anu we were expecting you to be wearing a business suit, not a typical Indian dress!” पहली औरत ने कटाक्ष करते हुए कहा|
“Oh… its not just a dress! It represents our culture, if wearing business suit is your culture then in our country a woman after marriage wears these…and by the way its called a Saree!” अनु ने दो तुक जवाब दिया जिसे सुन मुझे लगा की गया ये कॉन्ट्रैक्ट हाथ से| पर तभी दूसरी औरत पूछने लगी; "How long have you been married?” इससे पहले अनु कुछ और बोल कर बात बिगड़ती मैंने जवाब दिया; "1 month”.
“You should be on your honeymoon, what are you doing here?” पहली वाली औरत ने हम दोनों को छेड़ते हुए कहा|
“Well my husband’s a very hardworking guy, he worked his butt off to arrange this meeting and I’m not letting him down by nagging about a honeymoon. We’ve our whole life for honeymoon?!” अनु ने फ़टाक से जवाब दिया जिसे सुन वो औरत चुप हो गई| साफ़ जाहिर था की हमें यहाँ प्रेजेंटेशन देनी ही नहीं है, क्योंकि अनु जी की बात सुन कर यहाँ से खाली हाथ ही निकलना पड़ेगा| मैंने अपना लैपटॉप बंद कर दिया और दरवाजे की तरफ देखने लगा| मैंने सोचा की इससे पहले ये सिक्योरिटी को बुलाएं और हमें धक्के मार कर निकालें बेहतर है की खुद ही निकलते हैं| पर वहाँ काफी देर से चुप बैठीं तीसरी मैडम बोलीं; "Where do you think you’re going mister? We’re waiting for your presentation!” उनका नाम जेनी था और उनकी बात सुन कर मुझे उम्मीद की किरण दिखाई दी और मैंने आगे बढ़ते हुए प्रेजेंटेशन शुरू की, Facts अनु ने संभाले तो Figures मैं संभाल रहा था| वो तीनों हम दोनों की coordination देख कर काफी प्रभावित हुए; "Look Mr.
Manu you guys lack in one field, and that’s experience! One year is not sufficient to work with us!” जेनी बोलीं| "Its better than having no experience! We just want a chance, if you like our work then give us the contract if not we won’t complain!” मैंने पूरे आत्मविश्वास से कहा जो जेनी को भा गया, उसने बिना किसी के पूछे ही हमें 1 क्वार्टर का काम ऑफर कर दिया! ये सुन कर मैं और अनु दोनों मुस्कुरा दिए और बाकी के दो मैनेजर चुप बैठे रहे| जेनी उठ के मेरे पास आईं और हमने हैंडशेक किया अब उन दोनों को भी उठ के आना पड़ा और एक फॉर्मल हैंडशेक हुआ| हम दोनों ही मुस्कुराते हुए बाहर आये और कॉन्ट्रैक्ट पाने की ख़ुशी हमारे चेहरे से साफ़ झलक रही थी| हालाँकि अनु उम्मीद कर रही थी की मैं उसे उसके attitude के लिए कुछ कहूँगा पर मैंने उसे एक शब्द भी नहीं कहा| "बेबी आपने जो कहा वो बिलकुल सही था, हमें कहीं भी dress code mention नहीं किया गया था| अब उन दोनों को आपका साडी पहनना अच्छा नहीं लगा तो वो दोनों जाएँ चूल्हे में!" मैंने कहा तो अनु हँस पड़ी! अगले 4-5 दिन हमें वहीँ रुकना था ताकि हम कुछ डाटा कलेक्ट कर सकें, काम खत्म होने के बाद अनु को लगा हम वापस जायेंगे पर जब मैंने अनु को बाकी का प्लान बताया तो वो ख़ुशी से चीख पड़ी| "हम हनीमून के लिए Vegas जा रहे हैं!" ये वो प्लान था जो मैंने अनु से छुपाया था| Vegas का नाम सुनते ही अनु झूम उठी और उसने फ़ौरन ऑफिस फ़ोन कर के अक्कू को हड़का दिया; "बेटा हमारे आने तक तुम लोगों ने अगर काम शुरू नहीं किया ना तो तुम सब की बत्ती लगा दूँगी!" अनु की बात सुन सब की एक साथ फ़ट गई और सारे अपने-अपने काम में लग गए| इधर अनु की बात सुन कर मैं खूब हँसा जो अक्कू ने भी सुनी!
कुछ देर बाद आकाश ने मुझे मैसेज कर के पुछा की Mam क्यों गुस्सा हैं तो मैंने उसे ये ही कहा की वो गुस्से में नहीं बल्कि excited हैं, क्योंकि हमें एक क्वार्टर के लिए प्रोजेक्ट मिल गया है! खेर मैं और अनु Vegas के लिए निकले और पूरे रास्ते अनु बहुत जोश में थी और बहुत खुश भी! वहाँ मैंने पहले से ही रिजर्वेशन कर दी थी जो अनु के लिए दूसरा सरप्राइज था! पहली रात थी और अनु खूब जोश में थी, एक सरप्राइज उसने भी खरीद लिया था| मैं लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था की अनु लॉन्जरी पहन कर इठला कर मेरे पास आई, मैंने फ़ौरन लैपटॉप बंद कर दियाऔर बिना पलकें झपकाए उसे देखने लगा|
लाल रंग की इस लॉन्जरी में अनु के जिस्म का एक-एक हिस्सा कातिलाना लग रहा था| जाली से कपडे में से मुझे अनु का दूधिया जिस्म साफ़ दिख रहा था| मैं उठ कर खड़ा हुआ और अनु को गोद में उठा लिया और उसे बिस्तर के बीचों-बीच लिटा दिया| अनु ने अपनी बाहों का हार मेरे गले में डाल दिया और मुझे अपने ऊपर खींचने लगी| मैंने भी झुक कर अनु के होठों को अपने होठों में कैद कर लिया और उनका रस निचोड़ने लगा| इधर अनु की कूदती हुई जीभ मेरे मुँह में प्रवेश कर गई जिसे मेरे दाँतों ने दबोच लिया| हम दोनों अभी Kiss में ही डूबे थे की भाभी का video call आ गया| इस विघ्न से पहले तो
दोनों को बहुत चिढ हुई पर फिर इस आस से की कहीं नेहा को हमसे कोई बात करनी हो अनु ने कॉल उठा लिया| अनु ने मुझे उसके ऊपर से हटने को कहा पर मैं कहाँ मानने वाला था| अनु ने फ़ोन कुछ इस तरह से पकड़ा की सिर्फ वही दिखे, पर ये कॉल भाभी ने ऐसे ही किया था, जैसे ही उन्होंने पुछा की मानु कहाँ है मैं एक दम से सामने आ गया जिससे भाभी को ये पता चल गया की हम दोनों 'प्यार' कर रहे थे| "भाभी हमेशा गलत टाइम पर कॉल करते हो!" मैंने मजाक करते हुए कहा तो भाभी शर्मा गईं और अनु का भी यही हाल था| उनके कॉल के बाद अनु बोली; "सच्ची आप न ....बड़े वो हो!" मैंने उसे सताने की सोची और एकदम से उठ गया मानो जैसे मैंने उसकी बात का बुरा माना हो| मैं उठ कर काउच पर बैठ गया, अनु डरी सहमी सी आई और बोली; "सॉरी!" उसके डरने से मुझे बहुत हँसी आ रही थी, मैं उठ कर खड़ा हुआ और बाहर जाने लगा तो अनु ने मेरा हाथ पकड़ लिया; "सॉरी!" मैं एक दम से पलटा और उसे गोद में उठा लिया| तब जाकर उसे ये एहसास हुआ की मैं बस उससे मजाक कर रहा था| हम दोनों फिर से बिस्तर पर लेटे एक दूसरे के होठों से खेल रहे थे| अनु और मैं दोनों एकदम से गर्म हो गए थे, एक-एक कर हमने कपड़े उतार फेंके और अनु ने मुझे खुद से चिपका लिया, उसकी दोनों टांगें मेरी कमर पर लोच हो गईं थीं| मेरा खड़ा लंड अनु की पनियाई बुर पर दस्तक दे रहा था| अनु ने अपना हाथ नीचे ले जा कर आज पहली बार मेरा लंड छुआ और उसे अपनी बुर के द्वार पर रखा| अनु के मुलायम हाथों के एहसास ने ही मेरे लंड से pre-cum की बूँद टपका दी थी! मैंने धीरे से लंड को अंदर दबाया और आज भी मुझे उतनी ही ताक़त लगानी पड़ी जितनी सुहागरात में लगानी पड़ी थी| "ससससस....
आह्ह!!!" अनु ने सिसकारी ली और लंड फिसलता हुआ पूरा अंदर समा गया| अनु की बुर भट्टी की तरह गर्म थी और मेरे लंड के लिए ये गर्मी झेलना मुश्किल था| इसलिए मैंने अपने लंड को तेजी से अंदर-बाहर करना शुरू किया, अनु को 5 मिनट नहीं लगे और उसने ढेर सारा पानी बाहा दिया जिससे उसकी बुर की गर्मी कुछ कम हुई| घर्षण कम होने की वजह से मुझे आधा घंटा ही मिला खुद को रोके रखने का और फिर मैं और अनु दोनों एक साथ स्खलित हुए! मैं लुढ़क कर अनु की बगल में लेट गया, अनु कुछ देर सीढ़ी लेटी रही और फिर करवट ले कर मुझसे चिपक कर सो गई|
हम वेगास में 7 दिन रुके और हर रात हमने जी भर के सेक्स किया, जिसके परिणाम स्वरुप अनु अब सेक्स में खुल गई थी| जिस दिन हमें वापस इंडिया आना था उस दिन हम एयरपोर्ट जल्दी पहुँच गए, अनु ने हमेशा की तरह आज भी साडी पहनी हुई थी| वो कॉफ़ी लेने काउंटर पर गई और मैं लैपटॉप पर काम करने लगा की एक आदमी जो बात करने के अंदाज से मुझे ऑस्ट्रेलियाई लगा वो अनु से बात करने लगा| जब 5 मिनट तक नौ नहीं आई तो मैंने उसे बैठे-बैठे ढूँढना शुरू किया तो पाया वो उस आदमी से बात कर रही है| अनु लग ही इतनी सुंदर रही थी की वो आदमी उससे बात करने लगा| इधर ये देख कर मेरी जलने लगी और जब अनु ने मेरी तरफ देखा तो मुझे और जलाने के लिए उसने उससे और बातें शुरू कर दीं| अब मुझे भी अनु को दिखाना था की मैं भी कुछ कम नहीं तो मैंने अपना ब्लेजर पहना, बालों को हाथों से सही किया और सनग्लास पहन कर बैठ गया| कुछ दूर एक सुंदर लड़की बैठी थी जो कॉफ़ी पीते हुए सब को देख रही थी| उसके हाथ में फ़ोन था और वो चार्जर कनेक्ट करने का पॉइंट देख रही थी| मैंने हाथ के इशारे से उसे बताया की चार्जिंग पॉइंट मेरे नजदीक है तो वो मुस्कुरा कर मेरे पास आई| फिर उसने मुझे थैंक्स बोलै और मैंने उससे बातें करना शुरू कर दिया| उस लड़की ने शॉर्ट्स पहनी थीं और उसकी लम्बी मखमली गोरी टांगें बहुत सेक्सी लग रही थीं| वो मेरी ही बगल में बैठ कर बातें करने लगी, उसे देखते ही अनु जल भून कर राख हो गई और उस आदमी को बोली; "My husband's waiting for me!" इतना बोल कर वो तेजी से मेरे पास आई और हाथ अपनी कमर पर रख कर गुस्से से मुझे देखने लगी| "Oh....
meet my beautiful wife Anu!” मैंने हँसते हुए कहा तो वो लड़की अनु को देखती ही रह गई! जब उसने अनु से बात शुरू की तो पता चला की वो Lesbian है और उसे अनु बहुत पसंद आई! ये सुन कर अनु की हँसी रोके नहीं रुक रही थी! वो दहाड़े मार के हँसने लगी और मैं शर्म से लाल हो गया| इस तरह हँसते हुए हम दिल्ली पहुँचे और वहाँ से बैंगलोर!
बैंगलोर पहुँचते ही मैं सीधा ऑफिस आया, अनु को घर पर कुछ काम था इसलिए वो वहीं रुक गई| ऑफिस आ कर देखा तो वहाँ का हाल एकदम बिगड़ा हुआ था! साफ़-सफाई तो छोडो तीनों ने कोई काम-धाम ही नहीं किया था! जब मैंने काम की अपडेट माँगी तो तीनों ने आधा-अधूरा काम दिखा दिया| “What the hell’s going on here? I trusted you guys here and you’ve been wasting your time! Call your home/hostels and tell them you’re not going back until you wrap all this!” मैंने तीनों को अपना फरमान सुना दिया| इधर अनु का फ़ोन आया तो मैंने उसे सब बताया और वो बहुत नाराज हुई| शाम को वो सब का खाना ले कर आई और तब तक ना मैंने कुछ खाया था ना उन तीनों ने! "दरअसल ये गलती मेरी है! मैंने इन लोगों को सर पर चढ़ा रखा है!" अनु गुस्से में बोली| तीनों जानते थे की हम दोनों जितना एम्प्लाइज का ध्यान रखते थे उतना कोई नहीं रखता था और हमें दोनों को गुस्सा दिला कर तीनों ने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी थी| तीनों ने हमें आ कर सॉरी बोला और प्रॉमिस किया की आगे से वो ऐसी लापरवाही नहीं करेंगे| आखिर अनु ने सब को खाना परोसा और खाना खा कर हम पाँचों काम में लग गए| रात 11 बजे तक बैठ कर सारा काम निपटा, अगले दिन की छुट्टी अनु ने दे दी! "कल रात सात बजे तुम तीनों रेडी रहना!" अनु बोली तो तीनों को लगा की कल रात को भी काम करना होगा| "बेवकूफों! शादी में तो आया नहीं गया तुमसे अब रिसेप्शन की पार्टी चाहिए या नहीं?" अनु ने हँसते हुए कहा तो तीनों की जान में जान आई| तीनों को हमने XL वाली कैब से ड्राप किया और फिर 1 बजे घर पहुँचे| घर पर मेरे लिए एक सरप्राइज वेट कर रहा था, जैसे ही मैं कमरे में घुसा तो वहाँ का नजारा देख मैं दंग रह गया! सारे कमरे में अनु ने नेहा और हमारी फोटो चिपका दी थी! ऐसा लगता था मानो पूरे कमरे में नेहा ही छाई हो! आज इतने दिनों बाद मुझे नेहा का एहसास हुआ तो मेरी आँखें नम हो गईं| "Hey... ये माने आपको रुलाने के लिए नहीं किया! ये इसलिए किया ताकि जो दर्द आप अपने अंदर छुपाये रहते हो उसे खत्म कर सकूँ!" अनु बोली| मैंने अनु को कस कर गले लगा लिया और उसे थैंक यू कहा!
update 83
अब तक आपने पढ़ा:
घर पर मेरे लिए एक सरप्राइज वेट कर रहा था, जैसे ही मैं कमरे में घुसा तो वहाँ का नजारा देख मैं दंग रह गया! सारे कमरे में अनु ने नेहा और हमारी फोटो चिपका दी थी! ऐसा लगता था मानो पूरे कमरे में नेहा ही छाई हो! आज इतने दिनों बाद मुझे नेहा का एहसास हुआ तो मेरी आँखें नम हो गईं| "Hey...
ये माने आपको रुलाने के लिए नहीं किया! ये इसलिए किया ताकि जो दर्द आप अपने अंदर छुपाये रहते हो उसे खत्म कर सकूँ!" अनु बोली| मैंने अनु को कस कर गले लगा लिया और उसे थैंक यू कहा!
अब आगे....
अनु चेंज करने गई और इधर मैं पूरे कमरे में घूमने लगा और हर एक फोटो को छू कर देखने लगा| मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं सच में नेहा को छू रहा हूँ, वो हर एक पल मुझे याद आने लगा जो मैंने नेहा के साथ बिताया था| इस बार मैं रोया नहीं बल्कि दिल अंदर से खुश हो गया, ये मेरे साथ पहली बार हो रहा था! कुछ देर बाद अनु चेंज कर के आई और मुझे तस्वीरों को छूता देख वो भावुक हो गई और पीछे से आ कर मुझे अपनी बाँहों में जकड़ लिया| "बेबी! आपको पता है आज मुझे कैसा फील हो रहा है? मुझे रोना नहीं बल्कि इन तस्वीरों में नेहा को देख कर ख़ुशी हो रही है! ऐसा लगता है जैसे वो मेरे सामने ही है!" फिर मैं अनु की तरफ पलटा और उसे अपने गले लगा लिया; "आपको जितना भी थैंक यू कहूँ उतना कम है!" मैंने कहा तो अनु ने मुझे और कस कर जकड़ लिया|
कुछ देर हम ऐसे ही खड़े रहे, फिर मैंने चेंज किया और एक बार फिर हम दोनों एक दूसरे की बाहों में सो गए! सुबह मैं जल्दी उठा, अनु अब भी सो रही थी इसलिए मन नहीं किया उसे जगाने का| मैं बाहर आया और अपने लिए चाय बनाई और काम में लग गया| अनु ग्यारह बजे उठी और मुझे काम करते देख वो अपनी कमर पर हाथ रख कर कड़ी हो गई और प्यार भरे गुस्से मुझे देखते हुए बोली; "सो मत जाना आप! सारा टाइम काम..काम..काम...! इधर मैं उस टाइम कॉल पर था तो मैंने बस कान पकड़ कर उसे मूक भाषा में सॉरी कहा| अनु ने दोनों के लिए चाय बनाई और कप मुझे देते हुए नाश्ते के लिए पुछा, मैं तब भी कॉल पर था सो मैं ने फिर से अनु से दो मिनट रुकने को कहा| इधर अनु गुस्से में उठी और किचन में जा कर उसने बर्तन सिंक में पटकने शुरू कर दिए| मैंने जल्दी से कॉल निपटाई और किचन में आ गया और अनु को पीछे से अपनी बाहों में जकड़ लिया| "सॉरी बेबी! वो कल रात को सारा काम फाइनल हुआ तो पार्टी को इनवॉइस भेज रहा था!" मैंने अनु के बालों को सूंघते हुए कहा पर अनु कुछ नहीं बोली; "अच्छा बाबा ....
अब से इतना काम नहीं करूँगा!" मैंने अनु को मस्का लगाने को कहा और वो थोड़ा पिघल भी गई की तभी मेरा फ़ोन बज उठा जिसे सुन अनु का पारा फिर से चढ़ गया| "Don’t you dare pick up that call?” अनु ने मुझे चेतावनी देते हुए कहा| पर कॉल पार्टी का था और मैंने स्क्रीन पर पार्टी का नाम अनु को दिखाया तो वो नाराज हो कर कमरे में चली गई| मुझे मजबूरन कॉल उठा कर बात करनी पड़ी, बात कर के मैं वापस कमरे में आया तो अनु मुँह फुलाये हुए दूसरी तरफ मुँह कर के लेटी हुई थी| "बेबी सॉरी! वो एक पार्टी ने कुछ डाटा भेजा है बस उसी के लिए कॉल किया था!" मैंने कान पकड़ते हुए कहा| पर अनु गुस्से में कुछ नहीं बोली उल्टा चादर उठा कर अपने ऊपर डाल ली| मैं समझ गया की आज तो मेरी शामत है, इसलिए मैं किचन में नाश्ता बनाने लगा| नाश्ता ले कर मैं कमरे में आया और अनु के सामने खड़ा हो गया, पर वो तब भी कुछ नहीं बोली| मैंने नाश्ता एक साइड में रखा और अनु के पास बैठ गया; "बाबा...try and understand.... हम इतने दिन बाहर बिता कर आये हैं और हमारी गैरहाजरी में तुमने देखा ना किसी ने कुछ काम नहीं किया| अब थोड़ा टाइम लगेगा ताकि सारी चीजें in-order आ जायें, बिज़नेस भी जर्रूरी है ना? वरना हम खाएंगे क्या?" मैंने अनु से प्यार से कहा तो उसने पलट कर मुझसे सवाल पूछ लिया; "क्या बिज़नेस मुझसे भी जर्रूरी है?"
"नहीं बेबी... but please समझो! सुबह इनवॉइस भेजना जर्रूरी था! Okay I promise मैं प्यार ज्यादा और काम कम करूँगा!" पर मेरी किसी भी बात का अनु पर कोई असर नहीं पड़ा, उसने दूसरी तरफ मुँह कर लिया और लेटी रही| मैं उठा और बालकनी में आ कर बैठ गया, सर पीछे टिका कर मैं सोचने लगा की अनु को कैसे मनाऊँ! कुछ देर बाद अनु खुद ही उठ कर आई, नाश्ता टेबल पर रखा और मेरी गोद में बैठ गई| अनु ने सबसे पहले मेरी गर्दन पर Good Morning वाली kissi दी और फिर मुस्कुराते हुए मुझे देखने लगी| "आपको लगता है की सिर्फ आप ही अच्छा ड्रामा कर सकते हो?" अनु ने मुझे मेरा Vegas में किया ड्रामा याद दिलाया, जिसे याद कर मैं हँस पड़ा| हमने वैसे ही बैठे-बैठे नाश्ता किया, इधर मेरा लंड खड़ा हो गया और अनु को गढ़ने लगा| अनु ने मेरी तरफ देखा और मुस्कुराई पर आगे कुछ होता उसके पहले ही दरवाजे की बेल्ल बज गई| अनु ने उठ कर दरवाजा खोला, एक आदमी आया था और फिर मुझे अगली आवाज ड्रिल की आई जिसे सुन मैं फ़ौरन हॉल में आया तो देखा की वो आदमी हम दोनों के नाम की Name plate लगा रहा है| “Mr. and Mrs.
Maurya” एक शानदार font से लिखा हुआ था, जिसका आर्डर अनु ने कल दे दिया था| अपना और अनु का नाम देख मैं मुस्कुरा दिया और यही ख़ुशी मुझे अनु के चेहरे पर दिखी| शाम होने तक आस-पडोसी आ कर हमें मुबारकबाद देते रहे और मैं और अनु सबकी खातिर-दारी करते रहे| शाम होते ही हम दोनों तैयार हुए और मैंने तीनों को बारी-बारी से कॉल किया| हमने कैब से तीनों को पिक किया और एक अच्छे रेस्टुरेंट में घुसे| अनु ने सब का खाना आर्डर किया और साथ ही ड्रिंक्स भी! अनु ने अपने लिए वाइन ली और बाकियों ने बियर| बातों का सिलसिला चालु हुआ, यहाँ से ले कर गाँव तक और न्यूयोर्क तक की साड़ी बातें अनु ने शुरू कर दीं| इधर मौके का फायदा उठा कर मैंने अपने लिए 30ml chivas आर्डर कर दी, अनु अपनी बातों में लगी रही और देखते ही देखते मैंने 5 पेग टिका लिए! इधर मैंने भी इतना ध्यान नहीं दिया की अनु ने वाइन की पूरी बोतल खत्म कर दी! रेस्टुरेंट में गाना चल रहा था और लोगों का जमावड़ा लगा हुआ था| अब मुझे तो सुररूर चढ़ने लगा था और अनु तो फुल झूम रही थी| तभी गाना लगा; 'सखियाँ ने मैनु म्हणे मार दियाँ....' ये सुनते ही अनु ने छोटे बच्चे जैसी सूरत बनाई, ठीक उसी वक़्त गाने की लाइन आई;
'Jadon kalli behni aa
Khayal ae sataunde ne
Baahar jaake sunda ae
Phone kihde aunde ne' अनु ने गाने की लाइन मुझसे शिकायत करते हुए दोहराईं| पिछले कुछ दिन से मैं काम इतना व्यस्त था की कॉल आते ही बाहर आ जाय करता था, बाहर आने का कारन सिर्फ signal reception था और कुछ नहीं|
'Kari na please aisi gall kisey naal
Aaj kise naal ne jo kal kise naal
Tere naal hona ae guzaara jatti da
Mera nahio hor koyi hal kise naal
Tere yaar bathere ne
Mera tu hi ae bas yaara
Tere yaar bathere ne
Mera tu hi ae bas yaara' अनु ने ये लाइन ये जताते हुए कही की मेरे अलवा उसका और कोई नहीं है!
'Eh na sochi tainu mutiyara ton ni rokdi
Theek ae na bas tere yaara ton ni rokdi
Kade mainu film’aan dikha deya kar
Kade kade mainu vi ghuma leya kar
Saare saal vichon je main russan ek vaar
Enna’k taa ban’da manaa leya kae
Ikk passe tu Babbu
Ikk passe ae jag saara' अनु ने हाथ जोड़ते हुए कहा तो मुझे उस पर बहुत प्यार आ गया| मैंने अपने दोनों हाथ खोल दिए और वो आ कर मेरे गले लग गई| "अभी-अभी हम घूम कर आये हैं, अब आपको फिल्म देखना पसंद नहीं तो मैं क्या करूँ? और रूठते तो आप इतना हो के की क्या बताऊँ!" मैंने अनु को गले लगाए हुए उससे कहा तो सारे हँस पड़े| मैं और अनु अब काफी चिपक कर बैठे थे और बाकी तीनों अलग-अलग बैठे थे| अनु के इस उमड़ रहे प्यार के कारन तीनों थोड़ा uncomfortable हो रहे थे| घडी में 12 बजे थे तो मैंने बिल मंगवाया और वो बहुत अच्छा खासा आया! आकाश ने XL कैब बुक की और हमने पहले दोनों लड़के को छोड़ा, अनु की दोस्त अब हॉस्टल नहीं जा सकती थी तो अनु ने उसे हमारे घर रुकने को कहा| हम तीनों घर पहुँचे तो कैब से उतरते ही अनु ने ड्रामा शुरू कर दिया| मैंने घर की चाभी अनु की दोस्त को दी और उसे फ्लैट नंबर 39 खोलने को कहा और मैं अनु को गोद में उठा लिया| नशा अनु पर चढ़ चूका था और अब उसे चलने में दिक्कत हो रही थी, या फिर ये उसका ड्रामा था! मैं और अनु अंदर आये, मैंने उस लड़की को गेस्ट रूम में
सोने को कहा| मैं अनु को ले कर अंदर आया और उसे बिस्तर पर लिटा कर उठने लगा तो उसने हमेशा की तरह अपने बाहों का हार मेरे गले में डाल कर मुझे रोक लिया| "बेबी दरवाजा तो बंद कर ने दो!" मैंने कहा और दरवाजा बंद कर के, जूते उतार के फेंक कर अनु की बगल में लेट गया| मेरा सर भी घूमने लगा था और होश अब कम होने लगा था| इधर अनु पर खुमारी छाने लगी थी, उसने मेरी तरफ करवट ली और मेरे होठों से अपने होंठ मिला दिए| अनु के मुँह से मुझे रेड वाइन की सुगंध आ रही थी, अनु ने मेरे होठों को बारी-बारी से चूसना शुरू कर दिया| उसके हाथ अपने आप फिसलते हुए मेरी छाती से होते हुए मेरे लंड पर पहुँच गए और पैंट के ऊपर से ही अनु ने उसे दबाना शुरू कर दिया| मैं समझ गया की अनु क्या चाहती है पर मेरा लंड सो रहा था और वो सिर्फ अनु के छूने भर से खड़ा नहीं हो रहा था| अनु उठी और मेरी टांगों के बीच बैठ गई, उसे काफी मेहनत करनी पड़ी मेरी पैंट की बेल्ट खोलने में| मेरा होश अब कम होने लगा था, मैं जानता था की अनु क्या करने वाली थी पर मुझे विश्वास नहीं हो रहा था की वो ये करेगी| अनु ने मेरी पैंट खोल दी और उसे नीचे खींचने लगी, पर बिना मेरे कमर उठाये वो ये नहीं कर पाती| मैंने अपनी कमर उठाई तो अनु ने पहले पैंट निकाली और फिर कच्छा| मेरा सोया हुआ लंड अनु के सामने था, अनु ने डरते हुए उसे छुआ और लंड की चमड़ी पीछे खिसकाई जिससे मेरा सुपाड़ा उसके सामने आया| अनु एकदम से नीचे झुकी और उसे मुँह में भर लिया पर इसके आगे क्या करना है उसे नहीं पता था| आखिर मैंने आँखें बंद किये हुए अनु को गाइड करना शुरू किया; "Suck it like a candy!" ये सुन अनु ने मेरे लंड को टॉफ़ी की तरह चूसना शुरू किया| लंड को जब अनु का प्यार आज पहली बार मिला तो वो ख़ुशी से फूल गया और अनु के मुँह में ही अपना अकार लेना चाहा पर अनु उसे पूरा मुँह में नहीं ले पाती इसलिए अनु ने तुरंत उसे अपने मुँह से निकाल दिया| अब अनु के सामने उसके मुँह के रस से नहाया हुआ एक विशालकाय लंड था जिसे देख अनु को उस पर प्यार आ रहा था| पर अब एक दिक्कत थी, वो थी वो तेज महक जो अनु को लंड से आ रही थी| ये महक उसे मेरे लंड को दुबारा मुँह में लेने नहीं दे रही थी, इधर मैं बेकरार हो रहा था की अनु कब मेरा लंड फिर से मुँह में ले ले! "Baby....use your saliva....! Pour it on the tip, that should ease the…..” मैंने बात पूरी नहीं की पर अनु समझ गई| उसने मेरे लंड के सुपाडे पर अपने थूक की एक धार गिराई जो धीरे-धीरे बहती हुई नीचे जाने लगी| अनु ने धीरे से लंड को फिर से अपने मुँह की गर्माहट दे दी और इस बार उसे लंड से वाइन की महक आई| अनु ने लंड मुँह में भर कर उसे चूसना शुरू किया, उसका मुँह स्थिर था और फिर मैंने उसे अगला आदेश दिया; "Baby....
थोड़ा bite करो!" ये सुनते ही अनु को क्या सूझी की उसने लंड को अपने मुँह के दाहिनी तरफ सरकाया और अपने दाँतों से दबाया| अनु की दाहिनी तरफ के सारे दाँतों का दबाव मुझे मेरे लंड के एक हिस्से पर होने लगा, फिर अनु ने अपने मुँह के बाईं तरफ से भी ऐसा ही दबाव डाला, इस एहसास ने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए| कुछ मिनट अनु ऐसे ही मेरे लंड को कभी दाँत से दबाती तो कभी उसे टॉफ़ी की तरह चूसती| मेरा लंड अब पूरी तरह सख्त हो गया था और अब मौका था अगले पड़ाव का! "Baby while sucking move your mouth in forward and backward direction!" अनु ने अच्छे विद्यार्थी की तरह ठीक वैसा ही किया और अब मेरा मजा दुगना होने लगा था| 5 मिनट की चुसाई में ही अनु ने मुझे चरम पर पहुँचा दिया, "suck me like your sipping a cold drink from a straw!" मेरा ये कहना था और अनु ने अपने मुँह के अंदर बड़ा suction बनाया और लंड चूसने लगी| कमरे में अब 'चप-चप' की आवाज गूंजने लगी, अनु बड़ी शिद्दत से चूस रही थी और हर पल मेरा हाल ऐसा था जैसे की कोई मेरे प्राण-पखेरून खींचता जा रहा हो! अनु की इस चुसाई के आगे मैं टिक ना सका और मुझे उसे अपने स्खलित होने की चेतावनी देने का समय भी नहीं मिला| अनु के मुँह में ही मेरा फव्वारा छूटा जिसे अनु सारा का सारा गटक गई! उसने एक बूँद भी बर्बाद नहीं होने दी थी, इधर अपने इस तीव्र स्खलन के बाद मुझ में जैसे जान ही नहीं बची थी| शराब की खुमारी नींद में बदल गई और मैं उसी हालत में सो गया| अनु कुछ देर बाद उठी और मुस्कुराते हुए मुझे देखने लगी| फिर जा कर बाथरूम में चेंज कर के आई और मेरे होठों को मुँह में ले कर चूसने लगी| पर मैं गहरी नींद सो चूका था सो उसकी Kiss का जवाब नहीं दे सका| अनु ने कुछ नहीं कहा और मुस्कुराती हुई मेरे सीने पर सर रख सो गई| सुबह सबसे पहले मैं ही उठा और अपनी ये हालत देख मुझे एहसास हुआ की मैं कल अनु को प्यासा ही छोड़ दिया था| मुझे पता था की सुबह उठते ही अनु नराज होगी पर ऐसा नहीं हुआ| मैं जब कॉफ़ी ले कर आया तो अनु अंगड़ाई लेते हुए उठी और मेरी गर्दन पर Kissi की और मुस्कुराते हुए कॉफ़ी पीने लगी| "सॉरी यार ...वो कल रात...
I passed out!" मैंने कहा तो अनु हँसने लगी; "तो क्या हुआ?" मैं अनु का मतलब समझ गया, तभी अनु की दोस्त उठ कर आ गई और मैंने उसे भी कॉफ़ी दी| नाश्ता कर के हमने उसे हॉस्टल छोड़ा और हम दोनों ऑफिस आ गए|
अब मस्ती-मजाक बहुत हो चूका था, काम का लोड बहुत बढ़ चूका था और फिर हमें अगस्त में गाँव भी जाना था| अगला एक महीना मैंने रात-रात जाग कर काम किया जिससे अनु को बहुत कोफ़्त होती थी, वो मेरे इस जूनून से चिढ़ने लगी थी! अब हमारे पास बस तीन महीने बचे थे और अब हम सोच में पड़ गए थे की Expand करें या न करें? Expansion के लिए हमें नया स्टाफ hire करना था और रेंट भी बढ़ने वाला था| अगर हम expansion करते हैं तो हम ये सारा काम लखनऊ शिफ्ट नहीं कर पाएंगे! अनु ने तो मना कर दिया, क्योंकि वो जानती थी की यहाँ से लखनऊ शिफ्ट करना ज्यादा जर्रूरी है आखिर उसने माँ से वादा जो किया था| "बेबी... मैं जानता हूँ की आपको लखनऊ शिफ्ट होना है पर जो काम अभी हाथ में है उसे हम ऐसे छोड़ नहीं सकते! Please bear with me! अभी के लिए एक professional hire कर लेते हैं| अगस्त में हम जब गाँव जायेंगे तो मैं अरुण और सिद्धर्थ से बात करता हूँ|" पर अनु जिद्द पर अड़ गई थी, उसे माँ से किया वादा पूरा करना था और साथ ही नेहा को अपने गले से भी लगाना था| उसका ये प्यार बिज़नेस के आगे आ गया था जो मुझे कतई गवारा नहीं था| अनु ने गुस्से से मुझ पर चिल्लाते हुए कहा; "आप शायद भूल गए हो की आप एक बाप भी हो? क्या आपका मन नहीं करता नेहा को मिलने का? या काम के आगे उसे भी भूल गए हो!" अनु की बात मेरे दिल में शूल की तरह गढ़ गई, गुस्सा तो बहुत आया पर मैंने खुद को रोक लिया और अपने गुस्से को पी गया और उठ कर घर के बाहर चला गया|
कुछ देर बाद जब अनु को उसके कहे शब्दों का एहसास हुआ तो उसने ताबड़तोड़ मुझे कॉल करना शुरू कर दिया| मैं जानबूझ कर उसके काल नहीं उठा रहा था और सर झुकाये लालबाग़ लेक के किनारे बैठा रहा| ऐसा नहीं था मैं नेहा से प्यार नहीं करता था पर मैं खुद को संभाल रहा था ताकि नेहा को याद कर के उदास न रहूँ| मैं ये मान चूका था की शायद मेरी किस्मत में नेहा का प्यार नहीं है, इस बार जब उससे मिलूँगा तो वो मुझे पहचनानेगी भी नहीं! बस इसी एक डर से दूर भाग रहा था और अनु को लग रहा था की मेरा नेहा के लिए मेरा प्यार खत्म हो चूका है! मैं जानता था की वो गलत है पर दिल नहीं कह रहा था की उसे ये कहूँ! अँधेरा होने तक मैं वहीँ बैठा रहा, जब गार्ड आया तो मैं घर लौट आया| दरवाज़ा खोला तो सामने अनु जमीन पर अपने दोनों घुटनों में सर छुपाये हुए रो रही थी| दरवाजे की आहात सुनते ही उसने मुझे देखा और एकदम से कड़ी होकर मेरे पास दौड़ती हुई आई और मेरे गले लग गई| मैंने उसके सर पर हाथ फेरा और उसे चुप कराया| "I’m sorry!!!” अनु ने सुबकते हुए कहा| "Its okay!” मैंने कहा और फिर अनु से कुछ खाने को मँगाने को कहा|
हम दोनों टेबल पर खाना खाने बैठ गए पर अनु गुम-शूम थी और कुछ बोल
नहीं रही थी, ना ही वो खाने को हाथ लगा रही थी| मैंने खुद उसे अपने से खाना खिलाना शुरू किया तब जा कर उसने खाना शुरू किया| दोनों ने चुप-चाप खाना खाया और सोने चले गए| मैं पीठ के बल सीधा लेटा था की तभी अनु ने करवट ली और अपना सर मेरे सीने पर रख दिया, कुछ देर हिम्मत बटोरने के बाद बोली; "I… think…. I can’t… conceive!” ये सुनते ही मैं चौंक कर बैठ गया और अनु को भी बिठा दिया| “What do you mean you can’t conceive? किसने बोला? कौन से डॉक्टर को दिखाया?" मैंने सवालों की बौछार कर दी! "इतने महीने हो गए....और मैं अभी तक conceive नहीं कर पाई हूँ! हर हफ्ते मैं टेस्ट (प्रेगनेंसी टेस्ट) करती हूँ...पर....! शायद मेरी उम्र की वजह से....?!" अनु ने हताश होते हुए कहा| अब मुझे सब समझ आगया की आज अनु क्यों मुझ पर बरस पड़ी थी! "Hey.... आप पागल हो क्या? हमें बस 3 महीने हुए हैं और इन तीन महीनों में हमने कितनी बार सेक्स किया? It takes time.... थोड़ा सब्र करो! (कुछ सोचते हुए) Actually इसका दोषी मैं हूँ...मैं आपको ज्यादा समय नहीं दे पाता और आप इसे अपनी उम्र से जोड़ रहे हो? पागल... बुद्धू ....डफर.... आपकी संतुष्टि के लिए कल डॉक्टर के चलते हैं okay? And I'm sure कुछ नहीं निकलेगा!" मैंने कहा और अनु को अपने गले लगा लिया| माँ न बन पाने के डर के कारन अनु हार मानने लगी थी और उसकी ममता नेहा को चाहती थी| वो मन ही मन नेहा को अपना आखरी विकल्प मान चुकी थी और उसे खोने से डरती थी| पूरी रात मैंने अनु को अपने सीने से चिपकाए रखा और उस के सर पर हाथ फेरता रहा ताकि वो चैन से सो जाए| सुबह उठते ही मैं फटाफट तैयार हुआ और कॉफ़ी ले कर अनु को उठाया| मुझे तैयार देख अनु को होश आया की हमें डॉक्टर के जाना है| वो फटाफट तैयार हुई और हम डॉक्टर के आये, कुछ टेस्ट्स वगैरह हुए और रिपोर्ट हमें कल रिपोर्ट के साथ बुलाया| वो पूरा दिन अनु डरी-डरी रही और मैं उसके साथ बैठा रहा, ऑफिस की छुट्टी की और फ़ोन भी बंद कर दिया| अगले दिन जब हम दोनों रिपोर्ट ले कर डॉक्टर के पास पहुंचे तो उसने कहा की घबराने वाली कोई बात ही नहीं है| दोनों के लिए कुछ दवाइयाँ लिखी और हमें एक साथ ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत करने को कहा| अनु अच्छे से जान गई थी की काम को ले कर मैं कितना passionate हूँ इसलिए हमने कुछ नियम-कानून बनाये| मैं किसी भी हाल में शाम 6 बजे के बाद कोई भी बिज़नेस से जुड़ा हुआ काम नहीं करूँगा| 6 बजे के बाद मेरा पूरा समय सिर्फ और सिर्फ अनु का होगा और मैंने भी एक शर्त रखी की सुबह हम दोनों जल्दी उठेंगे और योग और exercise करेंगे, बाहर से खाना-पीना बंद और एक healthy lifestyle जियेंगे| ऑफिस में एक की जगह हमें दो लोग hire करने पड़े, नए लोगों को मैंने अपने साथ U.S.
वाले प्रोजेक्ट पर लगा लिया| अनु को मैंने बाकी के काम दे दिए जो उसके लिए manage करना आसान था| बिज़नेस अब धीरे-धीरे grow कर रहा था और हम दोनों इसी से खुश थे|
इधर रितिका अंदर ही अंदर हमारे घर की बुनियाद में सेंध लगा चुकी थी| सारे घर के लोगों के दिलों में रितिका ने अपनी जगह फिर से बना ली थी, सब की बातें वो सर झुका कर मानने लगी थी और नेहा तो पहले से ही सब का प्यार पा रही थी| रितिका के मन में मेरे लिए जो गुस्सा था वो अब धधक कर आग का रूप ले चूका था| उसका बदला, उसकी नफरत अब सारी हदें पार कर चूके थे! बाहर-बाहर से तो वो ऐसे दिखाती थी की वो बहुत खुश है पर अंदर ही अंदर कुढ़ती जा रही थी| मुझसे बदला लेने के लिए उसे सब से पहले अनु को ठिकाने लगाना था, ताकि मैं उसे खोने के बाद टूट जाऊँ और तिल- तिल कर तड़पूँ और फिर वो अपने हाथों से मेरा खून करे! पर कुछ भी करने के लिए उसे चाहिए था पैसा जो उसके पास था नहीं, पर मंत्री की जायदाद तो उसकी थी! रितिका ने चोरी छुपे उस इंस्पेक्टर को कॉल किया और उससे उसने वकील का नंबर लिया| "वकील साहब मैं रितिका बोल रही हूँ!" रितिका का नाम सुनते ही वकील को याद आ गया| "वकील साहब उस दिन आप घर आये थे ना? और आपने कहा था की मंत्री यानी मेरे ससुर जी की जायदाद की एकलौती वारिस मैं हूँ?! तो आप मुझे बता सकते हैं की मैं उसे कैसे claim करूँ?" ये सुनते ही वकील खुश हो गया और उसने रितिका को कानूनी दांव-पेंच समझाना शुरू कर दिया जो उसके पल्ले नहीं पड़ा| "देखिये वकील साहब, मुझे अपनी बेटी के भविष्य की चिंता है| आपके ये दांव-पेच मेरी समझ के परे हैं, मुझे आप बस इतना बताइये की क्या आप मुझे उस जायदाद का वारिस बना सकते हैं?" रितिका ने नेहा के नाम से झूठ बोला, उसे नेहा के भविष्य की रत्ती भर चिंता नहीं थी उसे तो केवल मुझसे बदला लेना था! "आप उस जायदाद की जायज वारिस हैं और मैं आपको आपका हक़ दिलवा सकता हूँ!" वकील बोला| इससे पहले वो अपनी फीस की बात करता रितिका ने उसे पहले ही बता दिया; "देखिये वकील साहब, मेरे पास आपको देने के लिए पैसे नहीं हैं! मेरे घरवाले इस केस को ले कर मुझे रोक रहे हैं पर मैं चाहती हूँ की आप मेरी तरफ से केस फाइल कर दीजिये| जैसे ही मुझे जायदाद मिलेगी मैं उसका 10% आपको फीस के रूप में दे दूँगी| आप को यदि मुझ पर भरोसा ना हो तो आप कागज बना कर ले आइये मैं साइन कर देती हूँ!" रितिका ने अपनी चाल चली, वैसे तो वकील बिना फीस के कोई काम नहीं करता पर रितिका के 10% के लालच में पड़ कर वो मान गया| ये सारा काम चोरी-छुपे होना था इसलिए रितिका ये सोच कर बहुत खुश थी की क्या होगा जब वो केस जीत जाएगी! सारा का सारा परिवार उसके कदमों में गिर पड़ेगा यही सोच कर रितिका के मन का कमीनापन बाहर आ गया|
कुछ दिन बाद वकील अनु से मिलने आया और कागज-पत्तर ले कर आया जो उसे साइन करने थे| रितिका छुपते-छुपाते हुए उससे मिलने
कुछ दूरी पर गाँव के स्कूल पहुँची, आज चूँकि छुट्टी थी और पूरा स्कूल खाली था तो वो आराम से सारे कागज पढ़ सकती थी| उसे ये जान कर हैरानी हुई की मंत्री की जायदाद पूरे 50 करोड़ की थी और वकील को ये जान कर ख़ुशी हुई की उसे इस केस के 50 लाख मिलने वाले हैं| "देखिये रितिका जी, केस तो मैं कल फाइल कर दूँगा और आपको चिंता करने की भी जर्रूरत नहीं क्योंकि मेरी बहुत अच्छी जान पहचान है जिससे आपको ज्यादा तारीखें नहीं मिलेंगी, बस उसका खर्चा थोड़ा-बहुत होगा! मंत्री साहब की पार्टी ने claim किया था जायदाद पर मैंने फिलहाल उस पर स्टे ले रखा है| आपको एक दिन कोर्ट में पेश होना होगा, पर आपको कुछ कहना नहीं है|" वकील की बात सुन कर रितिका आश्वस्त हो गई और ख़ुशी-ख़ुशी घर लौट आई| रात को सोते समय नेहा ने सोचना शुरू किया, उस ने हर एक बात, हर एक शब्द सोच लिया था जो उसे कहना है| अब बात आई टाइमिंग की, तो वो भी उस ने सोच लिया की कौनसा समय सबसे बेस्ट होगा जिससे पूरे परिवार को एक साथ धक्का लगे! जून का महीना आते ही रितिका की जलन उस पर हावी होना शुरू हो चुकी थी, उसे जल्द से जल्द अपना बदला चाहिए था| उसने छुप के वकील को फ़ोन किया; "वकील साहब और कितना टाइम लगेगा?" रितिका ने पुछा|
"रितिका जी, अभी तो बस दो ही महीने हुए हैं!" वकील मुस्कुराता हुआ बोला|
"वो सब मुझे नहीं पता, मुझे ये प्रॉपर्टी किसी भी हालत में 10 अगस्त से पहले अपने नाम पर चाहिए!" रितिका ने अपना फरमान सुनाते हुए कहा|
"इतनी जल्दी? देखिये कोर्ट-कचेहरी में थोड़ा टाइम तो लगता है!" वकील हैरान होते हुए बोला|
"आप कह रहे थे न की कुछ खर्चा होगा? कितना लगेगा?" रितिका ने अपनी बेसब्री दिखाते हुए कहा|
"जी...वो...
यही कुछ 5 लाख!" वकील हकलाते हुए बोला|
"मैं 10 लाख दूँगी! पर काम मेरे मुताबिक करवाओ!" रितिका की बात सुन वकील हैरान हो गया और उसने अपने जुगाड़ लगाने शुरू कर दिए| विपक्ष के वकील को उसने लाख रुपये पकड़ाए और 5 लाख में उसने जज को सेट किया जिसने विपक्ष का क्लेम ख़ारिज कर दिया| जुलाई के महीने में ही कोर्ट ने फैसला रितिका के पक्ष में दे दिया वो भी बिना रितिका के कोर्ट जाए| जैसे ही ये खबर वकील ने रितिका को दी वो फूली न समाई! प्रॉपर्टी ट्रांसफर के कुछ कागजों पर साइन करने के लिए वकील ने रितिका को स्कूल बुलाया| उन कागजों में वकील ने मंत्री की जमीन का एक टुकड़ा जिसकी कीमत करीब 20 लाख थी वो रितिका से अपनी फीस के रूप में माँगी| रितिका ने मिनट नहीं लगाया उसकी बात मानने में और सारे पेपर पढ़ कर आईं कर दिए| "29 जुलाई तक सारी प्रॉपर्टी आपके नाम हो जाएगी|" वकील ने पेन का ढक्कन बंद करते हुए मुस्कुरा कर कहा|
"थैंक यू वकील साहब! आप वो हवेली खुलवा दीजिये और उसकी साफ़-सफाई करवा दीजिये! वहां एक काँटा नाम की औरत काम करती थी उसे मेरा नाम बोल दीजियेगा वो सब काम संभाल लेगी और उसके पति को कहियेगा की 19 अगस्त को मुझे लेने यहाँ आये वो भी Mercedes ले कर!" रितिका ने कमीनी हँसी हँसते हुए कहा| वकील समझ गया की रितिका 19 को ही घर लौटेगी इसलिए उसने रितिका के कहे अनुसार साफ़-सफाई करवा दी और काँटा और उसके पति को नौकरी पर रख लिया| इधर घर लौटते ही रितिका की ख़ुशी छुपाये नहीं छुप रही थी, पर उसकी ख़ुशी को ग्रहण लगने वाला था| रात को ताऊ जी ने बताया की रितिका की दूसरी शादी के लिए एक रिश्ता आया है| ये सुनते ही रितिका को बहुत गुस्सा आया, उसका मन तो किया की वो अभी ताऊ जी का खून कर दे पर उसने खुद को काबू किया और रोनी सी सूरत बना कर बोली; "दादाजी....प्लीज...ऐसा मत कीजिये!....
मैं इस परिवार को छोड़ कर नहीं जाऊँगी! मुझे इस घर से अलग मत कीजिये! आप सब ही मेरे लिए सब कुछ हो!" रितिका रोते हुए बोली, ताई जी ने माँ बन कर उसे सम्भाला और उसे पुचकारने लगीं ताकि वो चुप हो जाए| "बेटी तेरी उम्र अभी बहुत कम है! इतनी बड़ी उम्र तो कैसे काटेगी?" ताऊ जी ने प्यार से रितिका को समझाना चाहा पर वो नहीं मानी और अपना तुरुख का इक्का फेंक दिया; "आप मेरी चिंता मत कीजिये, नेहा जो है मेरे पास? मैं उसी के सहारे जिंदगी काट लूँगी, फिर आप सब भी तो हैं!" ताऊ जी शांत हो गए और रितिका की बात फिलहाल के लिए मान गए| इधर रितिका की खुशियों पर लगा ग्रहण छट गया और उसकी वही कमीनी हँसी लौट आई| "बहुत जल्दी तेरी गर्दन मेरे हाथ में होगी!" रितिका रात को सोते समय बुदबुदाई! उसका मतलब मेरी गर्दन से था! बदले का प्लान सेट था और अब बस उसे मेरे आने का इंतजार था| वो जानती थी की मैं नेहा के जन्मदिन पर जर्रूर आऊँगा और ठीक इसी समय वो अपना वार मुझ पर करेगी|
इधर इन सब बातों से बेखबर मैं और अनु अपनी नई जिंदगी अच्छे से जी रहे थे| दिन, हफ्ते, महीने गुजरे और अगस्त आ गया, अनु ने अपनी टीम यानी अक्कू, पंडित जी और अपनी दोस्त के कान खींचने शुरू कर दिए| "अगर इस बार तुम में से किसी ने भी हमारे जाने के बाद मज़े किये और काम नहीं किया तो तुम सब की खैर नहीं! मुझे डेली अपडेट चाहिए की तुम लोगों ने कितना काम किया है? कोई भी काम अगर पेंडिंग हुआ तो तुम सबकी प्रमोशन खतरे में पद जायेगी!" अनु ने सब को चेतावनी देते हुए कहा| प्रमोशन के लालच में तीनों काम करने के लिए तैयार हो गए| इधर मेरी टीम में ज्वाइन हुए दोनों मेरी उम्र के थे और मुझे उन्हें ज्यादा कुछ नहीं कहना पड़ा क्योंकि वो काम की seriousness समझते थे| हमारा प्रोजेक्ट step by step था इसलिए मेरा उनके काम पर नजर रखना बहुत आसान था| स्टाफ को अच्छे से काम समझा कर हम अगले दिन फ्लाइट से लखनऊ पहुँचे, एक दिन मम्मी-डैडी के पास रुके और फिर गाँव पहुँचे| हमने अपने आने की तारीख किसी को नहीं बताई थी, इसलिए ये सरप्राइज पा कर सब खुश हो ने वाले थे| घर आते ही सबसे पहले मैं अपनी माँ से मिला और फिर अपनी लाड़ली को ढूंढते हुए रितिका के कमरे में जा पहुँचा जहाँ भाभी और रितिका नेहा को तैयार कर रहे थे| मुझे वहां देखते ही भाभी खुश हो गईं, नेहा ने मुझे देख अपने हाथ-पाँव मारने शुरू कर दिए| मैंने उसे फ़ौरन उठा का र अपने सीने से लगा लिया और आँखें बंद किये उस पल को जीने लगा| इतने महीनों से जल रही एक बाप के सीने की आग आज शांत हुई! “I missed you so much my lil angel!!!!” मैंने नेहा को अपने सेने से लगाए हुए कहा, आँसू की कुछ बूँदें छलक कर नेहा के कपड़ों पर गिरीं तो भाभी ने मेरे कंधे पर हाथ रख मुझे नहीं रोने को कहा| उधर रितिका के चेहरे पर आज अलग ही मुस्कान थी, ऐसा लगा मानो उसे इस बाप-बेटी के मिलन से बहुत ख़ुशी हुई हो! पर मैं नहीं जानता
था की ये वो मुस्कान थी जो किसी शिकारी के चेहरे पर तब आती है जब वो अपने शिकार को जाल में फँसते हुए देखता है| इधर पीछे से अनु भी भागती हुई ऊपर आ गई| पहले उसने भाभी को गले लगाया और फिर आस भरी नजरों से मुझे देखने लगी ताकि मैं उसे नेहा को दे दूँ| मैंने नेहा को उसे दिया तो उसने फ़ौरन उसे अपने सीने से लगा लिया और उसके माथे पर पप्पियों की झड़ी लगा दी| रितिका को ये दृश्य जरा भी नहीं भाया और वो नीचे चली गई|
ताऊ जी, पिता जी, चन्दर भैया और ताई जी बाहर गए थे इसलिए उनके आने तक हम सब नीचे ही बैठे रहे| माँ ने मुझे अपने पास बिठा लिया और मुझसे बहुत से सवाल पूछती रहीं, इधर अनु नेहा को अपनी छाती से लगाए हुए उसे दुलार करने लगी| उसने नेहा से बातें करना शुरू कर दिया था और उसकी ख़ुशी से निकली आवाजों का अपने मन-मुताबिक अर्थ निकालना शुरू कर दिया था| मैं ये देख कर बहुत खुश था और उन बातों में शामिल होना चाहता था पर मेरी माँ को भी उनके बेटे का प्यार चाहिए था| इसलिए मैं माँ की गोद में सर रख कर लेट गया और माँ ने मेरे बालों को सहलाते हुए बातें शुरू कर दी| "बहु (भाभी) आज मानु की पसंद का खाना बनाना|" माँ ने कहा तो भाभी रसोई जाने को उठीं, अनु ने एक दम से उनका हाथ पकड़ कर उन्हें रोक लिया| "आप बैठो यहाँ, आज से खाना मैं बनाऊँगी!" ये कहते हुए अनु उठी| "अरे तू अभी आई है, थोड़ा आराम कर ले कल से तू रसोई संभाल लिओ!" भाभी बोलीं पर मैं उठ कर बैठा और अपनी पत्नी की तरफदारी करते हुए बोला; "आज खाना मैं और अनु बनाएंगे और माँ आप चलो मैं आपको चॉपर दिखाता हूँ!" ये कहते हुए हम सारे रसोई में पहुँच गए| मैंने भाभी और माँ को चॉपर दिखाया और वो कैसे काम करता है ये बताया तो वो ये देख कर बहुत खुश हुए| मैं और अनु हाथ-मुँह धोकर खाना बनाने घुस गए| नेहा के लिए मैं एक baby carry bag लाया था जिसे मैंने पहन लिया और नेहा को उसमें आराम से बिठा दिया| अब मैं एक कंगारू जैसा लग रहा था जिसके baby pouch में बच्चा बैठा हो! मैं और अनु खाना बना रहे थे और नेहा के साथ खेल भी रहे थे| गैस के आगे खड़े होने का काम अनु करती, और चोप्पिंग का काम मैं करता| सब्जियों को देख नेहा उन्हें पकड़ने की कोशिश करती और मैं जानबूझ कर दूर हो जाता ताकि वो उन्हें पकड़ न पाए| हमें इस तरह से खाना बनाते हुए देख माँ और भाभी हँस रही थीं| खाना बनने के 15 मिनट बाद ही सब आ गए और हम दोनों को देख कर बहुत खुश हुए| "बेटा तूने बताया क्यों नहीं की तुम दोनों आ रहे हो? हम लेने आ आ जाते!" ताऊ जी बोले तो अनु मेरी तरफ देखने लगी; "ताऊ जी आप सब को सरप्राइज देना चाहते थे!" मैंने कहा और फिर हमने सबके पाँव छुए और आशीर्वाद लिया| मेरी गोद में नेहा को देखते ही पिताजी बोले; "आते ही अपनी लाड़ली के साथ खलने लग गया?!"
"पिताजी मिली प्याली-प्याली बेटी को मैंने बहुत याद किया!" मैंने तुतलाते हुए नेहा की तरफ देखते हुए बोला,
नेहा ये सुनते ही हँसने लगी| बीते कुछ महीनों में सबसे ज्यादा वीडियो कॉल अनु ने नेहा को देखने के लिए की थी, मैं चूँकि बिजी होता था तो 15 दिन में कहीं मुझे मौका मिल पाता था वीडियो कॉल में नेहा को देखने का| "सच्ची पिताजी हम दोनों ने नेहा को बहुत याद किया, मैं तो फिर भी काम में लगा रहता था पर अनु तो हर दूसरे-तीसरे दिन भाभी को वीडियो कॉल किया करती थी|" मैंने कहा तो माँ बोली; "अब बहु भी खुशखबरी सुना दे तो उसका भी अकेलापन दूर हो जाए!" माँ की बात सुन हम दोनों शर्म से लाल हो गए थे| भाभी ने जैसे तैसे बात संभाली और बोलीं; "पिताजी खाना तैयार है!" सब खाने के लिए बैठ गए और जब मैंने और अनु ने सब को खाना परोसा तो सब हैरान हो गए| "पिताजी खाना आज दोनों मियाँ-बीवी ने मिल कर बनाया है!" भाभी हँसते हुए बोली| ये सुनकर सब खुश हुए और सब ने बड़े चाव से खाना खाया| खाने के बाद हमारे लाये हुए तौह्फे हमने सब को दिए| सब के लिए कुछ न कुछ था, यहाँ तक की हम दोनों रितिका के लिए भी एक साडी लाये थे जिसे उसने सब के सामने नकली हँसी हँसते हुए ले लिया| पर सबसे ज्यादा तौह्फे नेहा के लिए थे, 10 ड्रेसेस के सेट जिसमें से एक ख़ास कर उसके जन्मदिन के लिए था| उसके खलेने के लिए खिलोने, फीडिंग बोतल, छोटी-छोटी bangles और भी बहुत सी चीजें| मैं नेहा को गोद में ले कर उसे उसके गिफ्ट्स दिखा रहा था और नेहा बस हँसती जा रही थी!
रात को सोने के समय मैं नेहा को अपने साथ ऊपर कमरे में ले आया| रसोई के सारे काम निपटा कर अनु भी ऊपर आ गई| मैं नेहा को गोद में ले कर उससे बात करने में लगा हुआ था, अनु कुछ देर चौखट पर खड़ी बाप-बेटी का प्यार देखती रही और फिर बोली; "I'm really sorry! मैंने आपको बहुत गलत समझा! मुझे लगा था की ऑफिस के काम में आप नेहा को भूल गए!" अनु ने सर झुकाये हुए कहा| "बेबी (अनु) भूल नहीं गया था...
बस अपने प्यार को दबा कर रख रहा था| घरवायलों से तुमने वादा किया था न की तुम मेरा ख्याल रखोगी? फिर तुम्हें गलत कैसे साबित होने देता?!" मैंने अनु को उस दिन की बात याद दिलाई जब उसने अमेरिका जाते समय माँ से वादा किया था| "आपको अपनी feelings इस तरह दबानी नहीं चाहिए! It could hurt you mentally!" अनु चिंता जताते हुए बोली|
"बेबी आप जो थे मेरे पास मेरा ख्याल रखने के लिए!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा, बात को खत्म करने के लिए अनु को अपने पास बुलाया| अनु दरवाजा बंद कर के आई और हम तीनों आज महीनों बाद एक साथ गले लगे| फिर अनु ने नेहा को मेरी गोद से ले लिया और उसे चूमते हुए लेट गई| वो पूरी रात हमने जागते हुए नेहा को प्यार करके गुजारी, इतने महीनों का सारा प्यार नेहा पर उड़ेल दिया गया| नेहा को सोता हुआ देख कर हम दोनों ठंडी आहें भर रहे थे!
इस तरह से दिन कब निकले और नेहा का जन्मदिन कब आया पता ही नहीं चला| 18 अगस्त की सुबह को सब तय हुआ की कल हम केक काटेंगे और नेहा का जन्मदिन धूम-धाम से मनाएंगे| ताऊ जी ने चन्दर भैया और मेरी ड्यूटी लगाई की हम दोनों सारे इंतजाम करें और इधर उन्होंने सारे गाँव में दावत का ऐलान कर दिया| मुझे और चन्दर भैया को कुछ करना ही नहीं पड़ा क्योंकि संकेत को एक कॉल किया और उसने सारा इंतजाम करवा दिया| टेंट वाला आया और पंडाल बाँधने लगा, हलवाई बर्तन वगेरा सब घर छोड़ गए और कल शाम को आने की बात कह गए| संकेत ने बड़े-बड़े स्पीकर लगवा दिए और गानों की playlist मेरे पास थी! केक का आर्डर देने मैं, संकेत और चन्दर भैया निकले और शाम तक सब तैयारियाँ हो गईं थी| रात को खाने के बाद मैं, अनु और नेहा अपने कमरे थे और बेसब्री से 12 बजने का इंतजार कर रहे थे| हम दोनों ही नेहा को जगाये हुए थे और उसके साथ खेल रहे थे, कभी दोनों उससे बात करने लगते तो कभी उसे गुद-गुदी करते| टिक...टिक...टिक.. कर घडी ने आखिर 12 बजा ही दिए| 12 बजते ही अनु ने नेहा को गोद में ले लिया और बोली; मेरी राजकुमारी!! आपको जन्मदिन बहुत-बहुत मुबारक हो! आप को मेरी भी उम्र लगे, जल्दी-जल्दी बड़े हो जाओ और बोलना शुरू करो! मुझे आपके मुँह से पहले पापा सुनना है और फिर मेरे लिए मम्मी!" अनु ने नेहा के दोनों गाल चूमे और फिर उसे मेरी गोद में दिया; "मेला बेटा बड़ा हो गया!....बड़ा हो गया!.....awww ले...ले... 1 साल का होगया मेरा बच्चा! हैप्पी बर्थडे मेले बच्चे...आपको दुनियाभर की खुशियाँ मिले....
और आप जल्दी-जल्दी बड़े हो जाओ! I love you my lil angel! God Bless You!!!" मैंने नेहा को चूमते हुए कहा और वो भी मेरे इस तरह तुतला कर बोलने से हँस पड़ी| उस रात को नेहा के सोने तक अनु और मैं उसके साथ खेलते रहे और अनगिनत photo खींचते रहे, कभी उसे चूमते हुए तो कभी उसके सामने मुँह बनाते हुए!
फिर हुई सुबह एक ऐसी सुबह जो सब के लिए एक अलग रूप ले कर आई थी| जहाँ एक तरफ मैं और अनु खुश थे क्योंकि आज हमारी बेटी नेहा का जन्मदिन था, ताऊ जी-ताई जी खुश थे की उनके घर में आई खुशियाँ आज दो गुनी होने जा रही है, माँ-पिताजी खुश थे की उनका बहु-बेटा उनके पास हैं और बहुत खुश हैं, चन्दर भैया- भाभी खुश थे की उनकी जिंदगी में एक नया मेहमान आने वाला है और आज उनकी पोती का जन्मदिन है तो दूसरी तरफ जलन, बदले और सब को दुःख पहुँचाने वाली रितिका इसलिए खुश थी की आज वो इस घर रुपी घोंसले के चीथड़े-चीथड़े करने वाली है! वो घरोंदा जो उसे आज तक सर छुपाने की जगह दिए हुआ था आज उसी घरोंदे को वो अपने बदले की आग से जलाने वाली थी|
मैं और अनु नेहा को साथ लिए हुए नीचे आये और सब का आशीर्वाद लिया और नेहा को भी सबका आशीर्वाद दिलवाया| नहा-धो कर हम तीनों पहले मंदिर गए और वहाँ नेहा के लिए प्रार्थना की| हमने भगवान से अपने लिए कुछ नहीं माँगा, ना ही ये माँगा की वो नेहा को हमारी गोद में डाल दे क्योंकि हम दोनों ही इस बात से सम्झौता कर चुके थे की ये कभी नहीं होगा, आज तो हमने उसके लिए खुशियाँ माँगी...ढेर सारी खुशियाँ ...हमारे हिस्से की भी खुशियाँ नेहा को देने को कहा| प्रार्थना कर हम तीनों ख़ुशी-ख़ुशी घर लौटे और रास्ते में नेहा के लिए रखी पार्टी की बात कर रहे थे| सारे लोह आंगन में बैठे थे की रितिका ऊपर से उत्तरी और उसके हाथों में कपड़ों से भरा एक बैग था| उसे देख सब के सब खामोश हो गए, "ये बैग?" ताई जी ने पुछा|
"मैं अपने ससुर जी की जायदाद का केस जीत गई हूँ!" रितिका ने मुस्कुराते हुए कहा और उसकी ये मुस्कराहट देख मेरा दिल धक्क़ सा रह गया और मैं समझ गया की आगे क्या होने वाला है| "आप सब की चोरी मैंने केस फाइल किया था और कुछ दिन पहले ही सारी जमीन-जायदाद मेरे नाम हो गई!" रितिका ने पीछे मुड़ने का इशारा किया तो हम सब ने पीछे पलट कर देखा, वहाँ वही वकील जो उस दिन आया था हाथ में एक फाइल ले कर खड़ा था| "वकील साहब जरा सब को कागज तो दिखाइए!" रितिका ने वकील को फाइल की तरफ इशारा करते हुए कहा और वो भी किसी कठपुतली की तरह नाचते हुए फाइल ताऊ जी की तरफ बढ़ा दी और वपस हाथ बाँधे खड़ा हो गया| ताऊ जी ने वो फाइल मेरी तरफ बढ़ा दी, चूँकि मेरी गोद में नेहा थी तो मैंने अनु से वो फाइल देखने को कहा| सबसे ऊपर उसमें कोर्ट का आर्डर था जिसमें लिखा था की रितिका मंत्री जी की बहु उनकी सारी जायदाद की कानूनी मालिक है| अनु ने ये पढ़ते ही ताऊ जी की तरफ देखते हुए हाँ में गर्दन हिला दी| "हरामजादी! तूने....
तेरी हिम्मत कैसे हुई?" ताऊ जी का गुस्सा आसमान पर चढ़ गया था और वो लघभग रितिका को मारने को आगे बढे की पिताजी ने उन्हें रोक लिया| "तुझे पता है न उस दौलत की वजह से ही मंत्री का खून हुआ? और तू उसी के लालच में पड़ गई?" पिताजी ने कहा|
"आप सब को तो मेरी चिंता है नहीं, तो मैंने अगर अपने बारे में सोचा तो क्या गुनाह किया? मेरी भी बेटी है, कल को उसकी पढ़ाई का खर्चा होगा, शादी-बियाह का खर्चा होगा वो कौन करेगा? अब आपके पास उतनी जमीन-जायदाद तो रही नहीं जितनी हुआ करती थी, सब तो आपने इस....मनु की शादी में लगा दी!" रितिका बोली और उसकी बात सुन सब का पारा चढ़ गया|
"चुप कर जा कुतिया!" भाभी बोलीं|
"किस हक़ से मुझे चुप होने को कह रही हो? मैं तुम्हारी बेटी थोड़े ही हूँ? तुमने तो मुझे नौकरानी की तरह पाल-पोस कर बड़ा किया अब मेरी बेटी को भी नौकरानी बनाना चाहती हो?" रितिका भाभी पर चिल्लाते हुए बोली ये सुनते ही चन्दर भैया ने रितिका की सुताई करने को लट्ठ उठाया; "मुझे छूने की कोशिश भी मत करना, तुम्हें सिर्फ नाम से पापा कहती हूँ! बेटी का प्यार तो तुमने मुझे कभी दिया ही नहीं! मुझे अगर छुआ भी ना तो पुलिस केस कर दूँगी!" रितिका ने उन्हें चेतावनी देते हुए कहा पर भैया का गुस्सा उसकी धमकी सुन और बढ़ गया| मैंने और भाभी ने उन्हें शांत करने के लिए उन्हें रोक लिया| भाभी उनके सामने खड़ी हो गईं और मैंने पीछे से अपने एक हाथ को उनकी छाती से थाम लिया|
"तो इतने दिन तू बस ड्राम कर रही थी!" ताई जी बोलीं|
"हाँ!!! आज नेहा का जन्मदिन है और सब के सब यहाँ हैं जिन्होंने कभी न कभी मेरा दिल दुखाया है और तुम सब लोगों से बदला लेने का यही सही समय था| जब से बड़ी हुई हमेशा मैंने सब के ताने सुने, कोई पढ़ने नहीं देता था सब मुझसे ही काम करवाते थे! थोड़ी बड़ी हुई तो मुझे लगा ये (मेरी तरफ ऊँगली करते हुए) शायद मुझे समझेगा पर इसके अपने नियम-कानून थे! Not to mention you’re the one who cursed me! I haven’t forgotten that… हमेशा इस घर के नियम-कानून से बाँधे रखा...पर अब नहीं! अब मेरे पास पैसा है और मैं अपनी जिंदगी वैसे ही जीऊँगी जैसे मैं चाहती हूँ!” रितिका ने अपने इरादे सब के सामने जाहिर किये पर ये तो बस एक झलक भर थी|
"तुझे क्या लगता है की अपने बचपन का रोना रो कर तू सब को चुप करा सकती है? भले ही किसी ने तुझे बचपन से प्यार नहीं दिया पर जिसने किया उसे तूने क्या दिया याद है ना? तुझे सिर्फ मुझसे नफरत है तो बाकियों पर ये अत्याचार क्यों कर रही है? इतनी मुश्किल से इस घर में खुशियाँ आई हैं और तू उनमें आग लगाने पर तुली है!" मैंने गुस्से में कहा| "तेरी माँ के मरने के बाद मैंने ही तुझे संभाला था, तुझे तो याद भी नहीं होगा! बेटी तुझे किस बात की कमी है इस घर में?" माँ ने कहा|
"याद है....
आपके सुपुत्र ने ही बताया था और इसीलिए आपसे मुझे उतनी शिकायत नहीं जितनी इन सब से है! मेरा दम घुटता है यहाँ!" रितिका अकड़ कर बोली|
"तो निकल जा यहाँ से! और आज के बाद दुबारा कभी अपनी शक्ल मत दिखाइओ!" चन्दर भैया ने लट्ठ जमीन पर फेंकते हुए कहा| "मेरे ही खून में कमी थी....या फिर ये तेरी असली माँ का गंदा खून है जो अपना रंग दिखा रहा है!" भैया ने कहा और रितिका से मुँह मोड लिया! रितिका चल कर मेरे पास आई जबरदस्ती नेहा को खींचने लगी| नेहा ने मेरी कमीज अपने दोनों हाथों से पकड़ राखी थी, रितिका ने अपने हाथों से उसकी पकड़ छुड़ाई| इधर नेहा को खुद से दूर जाते हुए देख मेरी आँखों से आँसू बहने लगे, अनु का भी यही हाल था और वो लगभग रितिका से मूक जुबान में मिन्नत करने लगी| पर रितिका पर इसका रत्तीभर फर्क नहीं पड़ा, नेहा ने रोना शुरू कर दिया था और रितिका उसी को डाँटते हुए घर से निकल गई| बाहर उसकी शानदार काले रंग की Mercedes खड़ी थी जिसमें बैठ वो अपने हवेली चली गई और इधर सारा घर भिखर गया|
पिताजी और ताऊ जी आंगन में पड़ी चारपाई पर सर झुका कर बैठ गए, माँ और ताई जी रसोई की दहलीज पर बैठ गए, भाभी और चन्दर बरामदे में पड़ी चारपाई पर बैठ गए और मैं और अनु स्तब्ध खड़े रहे! जो कुछ अभी हुआ उससे हम दोनों के सारे सपने चूर-चूर हो गए थे| माँ ने हम दोनों को 2-3 आवाजें मारी पर हमारे कानों में जैसे वो आवाज ही नहीं गई| आखिर भाभी ने उठ कर हमारे कन्धों पर हाथ रखा तब जा कर हमें होश आया| अनु ने मेरी तरफ देखा तो मेरी आँखें आंसुओं की धारा बहा रही थी| वो कस कर मुझसे लिपट गई और जोर-जोर से रोने लगी! भाभी ने उसके कंधे पर हाथ रख कर उसे शांत करवाना चाहा पर वो चुप नहीं हुई| वो रो रही थी पर मैं तो रो भी नहीं पा रहा था, दिल में आग जो लगी हुई थी! आज तीसरी बार मैंने नेहा को खोया था और ये दर्द दिल में आग बन कर सुलग उठा था| मैंने अनु को खुद से अलग किया और तेजी से दरवाजे की तरफ बढ़ा तो अनु ने एकदम से मेरा हाथ पकड़ कर मुझे रोक लिया| वो जानती थी की मैं रितिका की जान ले कर रहूँगा; "प्लीज....अभी आपकी जर्रूरत… यहाँ इस घर को है!" अनु ने रोते हुए कहा और कस कर मेरा हाथ थामे रही| उसकी बात सही थी, पहले मुझे अपने परिवार को संभालना था उसके बाद मैं रितिका की हेकड़ी ठिकाने लगाने वाला था| मैंने हाँ में सर हिला कर उसकी बात मान ली और वापस आंगन में आ गया|
मैं ताऊ जी के सामनेघुटने मोड़ कर बैठ गया और उनसे पूछने लगा; "ताऊ जी...आप ने मेरी शादी में कितने पैसे खर्चा किये?....बोलिये?"
"मैंने जो भी किया वो सब से पूछ कर अपनी ख़ुशी से किया! ये हमारे घर की आखरी शादी थी....
अगली शादी देख सकूँ इतनी मेरी उम्र नहीं! और तू भी उसकी बातों पर ध्यान मत दे!" ताऊ जी बोले| फिर उन्होंने चन्दर भय से कहा की वो सब को मना कर दें आज की पार्टी के लिए! इतना कह कर ताऊ जी उठ कर जाने लगे तो मैं उनके गले लग गया| "बेटा......!!!" वो बस इतना कह पाए और फिर अपनी आँखों में आँसू लिए अपने कमरे में चले गए| पिताजी ने मुझे अपने पास बैठने को कहा, उधर अनु और भाभी माँ-ताई जी के पास बैठ गईं| "बेटा.....हम सब ने ये सोचा भी नहीं था.... इस परिवार को फिर से बिखरने मत दिओ!" पिताजी रोते हुए बोले| मैंने उनके आँसू पोछे और उनसे घर के असली हालात जाने| रितिका की शादी में मेरी शादी से भी दुगना खर्च हुआ था और इसके चलते घर के हालात डगमगा गए थे| ताऊ जी और पिताजी ने जैसे-तैसे हालात संभाले ही थे की रितिका के साथ वो काण्ड हुआ, फिर चन्दर भैया का नशा मुक्ति केंद्र जाना और पोलिस की पहरेदारी, इस सब के चलते हालात खराब होने लगे| ले दे कर अब हमारे पास जमीन के दो बड़े टुकड़े बचे थे जिनसे आराम से गुजर-बसर हो रही है| ऐसा नहीं था की हालात बहुत पतले थे पर अब हालत वो नहीं थे जो 2 साल पहले हुआ करते थे| मुझे ये सब जानकार बहुत धक्का लगा था पर मैं इसे जताना नहीं चाहता था| कुछ देर बाद जब चन्दर भैया वापस आये तो मैं उन्हें ले कर ताऊजी के कमरे में गया| ताऊ जी दिवार से सर लगाए जमीन पर बैठे थे, मैं और चन्दर भैया उनके सामने बैठ गए; "ताऊ जी आप चिंता क्यों करते हैं? आपके दोनों बेटे आपके सामने बैठे हैं, हम दोनों मिल कर घर संभाल सकते हैं और देखना इस बार फिर से खुशियाँ वापस आएँगी!" मैंने ताऊ जी को उम्मीद बंधाते हुए कहा, उन्होंने मुझे और चन्दर भैया को अपने गले लगने को बुलाया| हमें अपने सीने से लगाए वो बोले; "बच्चों अब तुम दोनों का ही सहारा है! संभाल लो इस घर की कश्ती को!" ताऊ जी से मिल कर मैं और भैया वापस आये तो मैंने उन्हें भाभी का ख़ास ख्याल रखने को कहा क्योंकि वो 6 महीना प्रेग्नेंट थीं| मैं माँ और ताई जी के पास आया और उनके बीच में बैठ गया, दोनों ने अपना सर मेरे दोनों कन्धों पर रख दिया| "माँ, ताई जी आपका बेटा है ना यहाँ तो फि आपको कोई चिंता करने की कोई जर्रूरत नहीं|" मैंने कहा तो दोनों रो पड़ीं, तभी अनु आ गई और उसने माँ को संभाला और मैंने ताई जी को| कुछ देर बाद अनु को मैं वहीँ छोड़ कर भाभी के पास आया| चन्दर भैया भाभी के पास सर झुका कर बैठे थे; "क्या भैया मैंने आपको यहाँ भाभी का ख्याल रखने को भेजा और आप हो की सर झुका कर बैठे हो?! अच्छा भाभी ये बताओ, आप चाय पीओगे?" मैंने कमरे में कैद शान्ति को भंग करते हुए कहा, भाभी ने मुझे इशारे से अपने पास बुलाया और अपने पास बिठाया| "तूने दुःख छुपाना कहाँ से सीखा?" भाभी ने भीगी आँखों से पुछा| "जब लगने लगा की मेरे रोने से मेरे परिवार को कितना दुःख होता है तो ये आँसूँ अपने आप सूख गए!" मैंने कहा और सब
के लिए चाय बनाने लगा| चाय बना कर मैने सब को दी, दोपहर में किसी ने कुछ नहीं खाया और मैं बस एक कमरे से दूसरे कमरे में आता-जाता रहा ताकि थोड़ी चहल-पहला रहे और घर वाले ज्यादा दुखी न हों| संकेत ने भी जब फ़ोन किया तो मैंने उसे सब बता दिया|
रात हुई और अनु ने सब के लिए खाना बनाया पर किसी का मन नहीं था, मैंने एक-एक कर सबको उनके कमरों से बाहर निकाला और एक साथ बिठा कर सब को खाना खिलाया| जैसे-तैसे सब ने चुप-चाप खाना खाया, और सब सोने चले गए| मैं और अनु साथ ही ऊपर आये और उस सूने कमरे को देख दोनों भावुक हो गए, अनु मेरे कंधे पर सर रख कर रोने लगी| पर मेरी आँखों में अब आँसू नहीं बचे थे, मुझे इस वक़्त मजबूत बनना होगा यही सोच कर मैंने अपने होंठ सी लिए| अनु को बड़ी मुश्किल से चुप करा कर लिटाया और मैं भी उसकी तरफ करवट ले कर लेट गया| अनु मेरे नजदीक आई और अपना सर मेरे सीने में छुपा कर सोने की कोशिश करने लगी| आज उसे भी वही दर्द हो रहा था जो मुझे 'मुन्ना' के चले जाने के बाद हुआ था| कुछ देर बाद अनु सो गई, पर मैं सोचता रहा....
अगले दो दिन इसी तरह गमगीन निकले, इधर मैं अरुण और सिद्धार्थ से मिला और उनसे बिज़नेस यहाँ शिफ्ट करने की बात की| जब मैंने उन्हें detail में सब बताया तो वो दोनों मान गए, पर partnership के लिए नहीं| उनका family background इतना strong नहीं था और उन्हें एक constant और stable income चाहिए थी जो उन्हें सैलरी से मिलती| वो मेरे साथ सैलरी पर काम करने को मान गए, उनके साथ मिल कर मैंने ऑफिस के लिए जगह देखनी शुरू की| मैंने बैंगलोर फ़ोन कर के पांचों को हालात बता दिए और ये भी की मैं ऑफिस लखनऊ शिफ्ट कर रहा हूँ| उनके पास बतेहरा टाइम था नै जॉब ढूँढने के लिए| मैंने ये बात घर में भी बता दी तो सब को इत्मीनान हुआ की जल्द ही मैं उनके नजदीक रहूँगा| अनु ने घर के साथ-साथ ऑफिस का काम भी संभाला| खेती का काम मैंने समझना शुरू कर दिया, ताऊ जी, पिता जी और चन्दर भैया मुझे साड़ी चीजें समझा रहे थे और खुश भी थे की मैं इतनी दिलचस्पी ले रहा हूँ| एक दिन वो मुझे व्यापारियों से मिलने ले गए तो मैंने उनके साथ रेट को ले कर भाव-ताव करना शुरू कर दिया| मैंने थोड़ी जांच-पड़ताल के बाद खेतों का soil test भी करवा दिया और उससे जो बातें सामने आईं उसे जान कर पिताजी और ताऊ जी काफी हैरान हुए| दिन बीतते गए और घर के हालत अब सुधरने लगे, पैसों के तौर पर नहीं बल्कि घर की सुख और शान्ति के तौर पर|
2 सितंबर आया और सुबह मैं सब के लिए चाय बना रहा था की अनु को उल्टियाँ शुरू हो गईं| मैं चाय छोड़ कर उसके पास जाने को हुआ तो माँ हँसती हुईं मेरे पास आईं और बोलीं; "तू बाप बनने वाला है!" ये सुन कर मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा, मैं दौड़ता हुआ ऊपर आया और अनु ने मुझे एकदम से गले लगा लिया, उसकी ख़ुशी आज सैकड़ों गुना ज्यादा थी| “Thank you baby!!!!” मैंने अनु को कस कर बाहों में जकड़ा और उसे कमर से उठा कर छत पर गोल
घूमने लगा| अब तक माँ ने सब को ये खबर दे दी थी, ताऊ जी ने मुझे नीचे से आवाज मारी और हम दोनों नीचे आये| अनु ने हमेशा की तरह घूंघट किया हुआ था, ताऊजी उसके पास आये और जेब से 2000 का नोट निकाला और अनु के सर से वार कर ताई जी को देते हुए कहा की वो ये मंदिर में दान कर दें| ताऊ जी ने मुझे अनु को डॉक्टर के ले जाने को कहा ताकि अनु का एक बार चेक-अप हो जाए, मैंने चन्दर भैया से कहा की वो भाभी को भी ले लें एक साथ दोनों का चेक-अप हो जायेगा| भैया को उस समय कहीं जाना था सो मैं दोनों को ले कर डॉक्टर के पास आ गया| डॉक्टर ने पहले अनु का चेक-अप किया और उसके प्रेग्नेंट होने की बात कन्फर्म की| ये सुनते ही हम तीनों के चेहरे खिल उठे, फिर डॉक्टर ने भाभी का भी चेक-अप किया और उन्हें भी सब कुछ नार्मल ही लगा| मैंने अनु के घर फ़ोन लगाया और अनु ने मेरे घर फ़ोन लगा दिया| डैडी जी को जब ये बात पता चली तो वो बहुत खुश हुए और कल आने की बात कही" इधर अनु ने माँ से बात कर के बताया की सभी लोग मंदिर में हैं| हम तीनों मिठाई ले कर सीधा मंदिर गए जहाँ पुजारी जी ने अनु और मुझे ख़ास भगवान् का आशीर्वाद दिया| फिर हम सब घर लौट आये, हमारा घर खुशियों से भर गया था और चूँकि कल मेरा जन्मदिन था तो पूरा परिवार डबल ख़ुशी मना रहा था| ताऊ जी ने ये डबल खुशखबरी मनाने के लिए तुरंत अपने समधी जी (अनु के डैडी) को कॉल किया और कल की दावत के बारे में बता दिया| पूरे गाँव भर में ढिंढोरा पीटा जा चूका था, ये खबर उड़ती-उड़ती रितिका तक भी जा पहुँची थी| उसे अनु की प्रेगनेंसी के बारे में जान कर बहुत कोफ़्त हुई क्योंकि अब उसका तुरुख का पत्ता पिट चूका था| उसने अपनी अगली चाल की प्लानिंग शुरू कर दी थी! रितिका ने अपने पाँव राजनीति की तरफ बढ़ा दिए थे और उसने अब वहाँ कनेक्शन बनाने शुरू कर दिए थे......
रात को खाने के बाद मैं लैपटॉप पर काम कर रहा था की अनु बिस्तर से उठ कर मेरे पास आई| उसने पीछे से अपनी बाहों को मेरी गर्दन पर सामने की तरफ लॉक किया और मेरे कान में फुसफुसाई; "Happy Birthday my शोना!" मैं उठा और अनु को गोद में उठा लिया और उसे बिस्तर पर लिटा दिया, झुक कर उसके होठों को मुँह में भर चूसने लगा| अनु कसमसा रही थी, मैं रुका और उसकी आँखों में देखते हुए मुस्कुराया और बोला; "ऐसे सूखे-सूखे कौन बर्थडे wish करता है!" मैंने कहा तो अनु मुस्कुराई और बोली; "तो मेरे शोना, बोलो क्या चाहिए आपको?"
"आपने मुझे दुनिया का सबसे बेस्ट गिफ्ट दिया है!" मैंने कहा और अनु की बगल में लेट गया| अनु कसमसाती हुई मेरे से चिपक गई और सोने लगी| मैं उसके बालों में हाथ फेरता रहा और नेहा को याद करता रहा| महीना होने वाला था मुझे नेहा से दूर, आज बाप बनने की इस ख़ुशी ने मुझे जिंझोड़ कर रख दिया था| नेहा के लिए प्यार आज फिर उमड़ आया था और आँखों से एक क़तरा निकल कर तकिये पर जा गिरा| अगली सुबह मैं जल्दी उठा और सब ने बारी-बारी मुझे जन्मदिन की बधाइयाँ दी और मैंने सब का आशीर्वाद लिया| इतने में मम्मी-डैडी जी भी आ गये और मेरे हाथ में चाय की ट्रे देख हैरान हुए, दोनों ने मुझे खूब प्यार दिया और आशीर्वाद दिया! इतने में अनु ऊपर से उत्तरी और अपने मम्मी-डैडी को देख कर उसने उनका आशीर्वाद लिया| फिर उन्होंने सवाल अनु से सवाल पुछा; "तू पहले ये बता की मानु चाय की ट्रे ले कर क्यों खड़ा है?" अनु कुछ बोल पाती उससे पहले मैं ही उसके बचाव में कूद पड़ा; "डैडी जी ये तो रोज का है, मैं जल्दी उठ जाता हूँ तो सब के लिए चाय बना लेता हूँ|" मेरा जवाब सुन ताऊ जी बोले; "समधी जी, ये छोटे-मोटे काम करने के लिए हमने इसे (यानी मुझे) रखा हुआ है|" ताऊ जी की बात सुन सारे हँस पड़े! मम्मी-डैडी जी को दरअसल शाम को वापस जान था इसलिए वो जल्दी आये थे, पर ताऊ जी कहाँ मानने वाले थे उन्होंने जबरदस्ती उन्हें भी शाम के जश्न में शरीक होने के लिए रोक लिया| शाम को बड़ी जोरदार पार्टी हुई और पूरा गाँव पार्टी में हिस्सा लेने आया| रात के 8 बजे थे और अँधेरा हो गया था, सारे आदमी लोग ऊपर छत पर थे और सभी औरतें नीचे आंगन में, खाना-पीना जारी था की तभी घर के सामने रितिका की काली Mercedes आ कर रुकी| उसकी गाडी देखते ही मैं तमतमाता हुआ नीचे आया, वो गाडी से अकेली उतरी काली रंग की शिफॉन की साडी, लो कट ब्लाउज जो देख कर ही लगा रहा था की बहुत टाइट है, स्लीवलेस और वही कमीनी हँसी! अब सारे घर वाले नीचे मेरे साथ खड़े हो गए थे| वो कुछ बोलती उसके पहले ही मैं चिल्लाते हुए बोला; "Get the fuck out of here!" मेरे गुस्से से आज भी उसे डर लगता था इसलिए वो एक पल को सहम गई, फिर हिम्मत बटोरते हुए बोली; "मैं तो तुम्हें wish करने आई थी!"
"Fuck you and fuck your wishes! Now get lost or I'll call the cops!" मैंने फिर से गरजते हुए कहा| वो अकड़ कर गाडी में बैठ गई और चली गई, सब का
मूड खराब ना हो इसलिए मैंने संकेत को इशारा कर के म्यूजिक चालू करने को कहा और फिर सब को ले कर अंदर आ गया| "सब चलिए ऊपर...अभी तो पार्टी शुरू हुई है!" मैंने बात पलटते हुए कहा और सब ऊपर आ गए पर सब का मूड ऑफ था!
ये मायूसी देख मेरे मुँह से ये शब्द निकले;
"ना जाने वक्त खफा है या खुदा नाराज है हमसे,
दम तोड़ देती है हर खुशी मेरे घर तक आते-आते।"
ये सुनते ही ताऊ जी उठे और संकेत से बोले; "अरे बेटा जरा मेरा वाला गाना तो लगा..." मैं हैरानी से ताऊ जी को देखने लगा और तभी गाना बजा; "दर्द-ऐ-दिल ....दर्द-ऐ-जिगर दिल में जगाया आपने|" ताऊ जी ने ताई जी की तरफ इशारा करते हुए गाना शुरू किया| उनका गाना सुन पार्टी में जान आ गई और सब खुश हो गए| इधर ताई जी शर्म के मारे लाल हो गईं अब तो पिताजी भी जोश में आ गए और उन्होंने गाने का अगला आन्तरा संभाला;
"कब कहाँ सब खो गयी
जितनी भी थी परछाईयाँ
उठ गयी यारों की महफ़िल
हो गयी तन्हाईयाँ"
अब शर्म से लाल होने की बारी माँ की थी, माँ तो ताई जी के पीछे छुप गईं| इधर डैडी जी ने संकेत से गाना बदलवाया जिसे सुन सारे जोश में आ गए, आदमियों की एक टीम बन गई और औरतों की एक टीम|
'ऐ मेरी जोहराजबीं' ओये होये होये !!! क्या महफ़िल जमी छत पर की अंताक्षरी शुरू हो गई| मर्द गा रहे थे और औरतें शर्मा रहीं थी, सब को उनकी जवानी के दिन याद आ गए| इस सब का थोड़ा बहुत श्रेय शराब को भी जाता है जिस ने समां बाँधा था और सब मर्द थोड़ा झूम उठे थे| तभी अनु उठ के जाने लगी तो मैंने गाना शुरू किया; "आज जाने की जिद्द न करो!" मेरा गाना सुन वो वहीं ठहर गई, घूंघट के नीचे उसके गाल लाल हो गए थे और भाभी उसका हाथ पकड़ उसे अपने पास बिठा लिया| रात दस बजे तक महफ़िल चली और फिर सब धीरे-धीरे जाने लगे| आखिर बस परिवार के लोग रह गए, ताऊ जी ने मुझे अपने पास बुलाया और बोले; "बेटा दुबारा उदास मत होना!" मैंने सर हाँ में हिला कर उनकी बात मानी| आज एक बार रितिका को हार मिली थी....वो आई तो थी यहाँ मेरा बर्थडे और अनु के माँ बनने की ख़ुशी को नजर लगाने पर आज उसे एक बार मुँह की खानी पड़ी थी| उसकी लाख कोशिशों के बाद भी मेरा परिवार नहीं टूटा बल्कि ताऊ जी की वजह से वो एक साथ खड़ा रहा| रात को सारे मर्द छत पर सोये थे और तब ताऊ जी ने डैडी जी से साड़ी बात कही जिसे सुन वो बहुत हैरान हुए और मुझे डाँटा भी की मैंने उन्हें क्यों कुछ नहीं बताया, पर काम के चलते मुझे होश ही नहीं रहा था| अगली सुबह को मम्मी-डैडी अयोध्या चले गए, उन्हें वहाँ मंदिर में माथा टेकना था|
डैडी जी के जाने के बाद अनु मेरे पास आई और मुझसे बोली; "आपको लगता है की वो वाक़ई में wish करने आई थी?"
"वो यहाँ सिर्फ हमारी खुशियों को नजर लगाने आई थी! अपना रुपया-पैसा और ऐशों-आराम की झलक दिखाने आई थी! इतनी मुश्किल से ये परिवार सम्भल रहा था और वो ....
" मेरे मुँह से गाली निकलने वाली थी सो मैंने खुद को रोक लिया और आगे बात पूरी नहीं की| खेर दिन बीतने लगे और हमदोनों बैंगलोर वापस नहीं गए| जाते भी कैसे? यहाँ कोई नहीं था जो घर संभाल सके और भाभी का ख्याल रख सके| "बेटा काम भी जर्रूरी होता है, तुम दोनों जाओ और काम सम्भालो हम सब हैं यहाँ!" ताऊ जी बोले पर अनु ने साफ़ मना कर दिया; "ताऊ जी, भाभी की देखभाल जर्रूरी है और मेरे न होने से यहाँ घर का काम कौन देखेगा? आखिर माँ, ताई जी और भाभी को ही काम करना पड़ेगा और ये मुझे कतई गवारा नहीं|" अनु बोली|
"ताऊ जी, अनु ठीक कह रही है| मैं वैसे भी लखनऊ में घर और ऑफिस की जगह देख रहा हूँ तो हम दोनों का ही यहाँ रहना जर्रूरी है|" मैंने कहा, ताऊ जी ने मेरी पीठ थपथपाई और बोले; "मुझे मेरे बच्चों पर नाज है!"
चूँकि अनु भी प्रेग्नेंट थी और उसे ही ज्यादा काम करना पड़ता था इसलिए मैंने घर के लिए एक वाशिंग मशीन ले ली, जिससे अनु का काम काफी कम हो गया|
दिन बीतने लगे और भाभी का नौवाँ महीना शुरू हो गया और अनु ने भाभी का बहुत ख्याल रखना शुरू कर दिया| भाभी का लगाव भी अनु से बहुत ज्यादा बढ़ गया था, दोनों साथ खाते और रात में अनु भाभी के पास ही सोती| ऑफिस का सारा काम मेरे ऊपर था और मैं रात-रात भर जाग कर सारा काम करने लगा था| खेती-किसानी का काम चन्दर भय ने संभाल लिया था और अब पैसे के तौर पर हालात सुधरने लगे थे| इधर दिवाली आ गई और घर की साफ़-सफाई मैंने और चन्दर भैया ने संभाली| दिवाली से 2 दिन पहले पिताजी ने घर में हवन करवाया ताकि घर में सुख-शान्ति बनी रहे| धन तेरस पर मैं माँ और ताई जी को बजार ले कर गया और उन्होंने शॉपिंग की| दिवाली के एक दिन पहले मम्मी-डैडी जी आये और वो भी बहुत तौह्फे लाये, ख़ास कर भाभी के लिए| आखिर दिवाली वाले दिन अच्छे से पूजा हुई, चूँकि शादी के बाद अनु की ये पहली दिवाली थी तो पूजा में हमें सबसे आगे बिठाया गया| पूजा के बाद सब ने अनु को उपहार में बहुत से जेवर दिए और उसे बहुत सारा आशीर्वाद मिला| अनु की आँखें उस पल नम हो गईं थीं, माँ ने उसे अपने पास बिठा कर खूब दुलार किया| दिवाली के 5 दिन बाद सुबह भाभी को लेबर पैन शुरू हो गया, मैं और अनु उन्हें ले कर तुरंत हॉस्पिटल भागे| हम समय से पहुँच गए थे और डॉक्टर ने प्राथमिक जाँच शुरू कर दी थी| इधर सभी घरवाले पहुँच गए थे, कुछ देर बाद नर्स ने हमें खुशखबरी दी; "मुबारक हो लड़का हुआ है!" ये खुशखबरी सुनते ही सब ख़ुशी से झूम उठे| ताऊ जी ने नर्स को 2,001/- दिए और सब भाभी से मिलने आये| मैं और अनु भाभी के पास खड़े थे और उनका हाल-चाल पूछ रहे थे| भाभी का दमकता हुआ चेहरा देख सब को ख़ुशी हो रही थी| सब ने बारी-बारी बच्चे को चूमा और आशीर्वाद दिया, बस हम दोनों ही बचे थे| पहले मैंने अनु को मौका दिया तो अनु ने जैसे ही बच्चे को गोद में उठाया वो रोने लगा| ये देख वो घबरा गई और तुरंत बच्चे को
मेरी गोद में दे दिया| मैंने जैसे ही उसके मस्तक को चूमा वो चुप हो गया और उसके चेहरे पर मुस्कराहट की एक किरण झलकने लगी| "लो भाई, अब जब कभी मुन्ना रोयेगा तो उसे मानु को दे देना| उसकी गोद में जाते ही बच्चे चुप जाते हैं!" भाभी बोलीं| पता नहीं क्यों पर उस बच्चे को देख मुझे नेहा की याद आ गई और मेरी आंखें छल-छला गईं| जिस प्यार को मैं अंदर दबाये हुआ था वो बाहर आ ही गया, अनु ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे रोने से रोकना चाहा पर अब ये आँसूँ नहीं रुकने वाले थे| मैंने बच्चे को अनु को सौंपा और सबकी नजर बचा कर बाहर आ गया, बाहर एक बेंच थी जहाँ मैं सर झुका कर बैठ गया और रोने लगा| कुछ देर बाद अनु भी सब से नजर बचा कर आई और मुझे बाहर ढूँढने लगी| मैं उसे सर झुका कर रोता हुआ दिखा तो वो मेरी बगल में बैठ गई, मेरे कंधे पर हाथ रख कर बोली; "प्लीज मत रोइये....मैं जानती हूँ आपकी जान नेहा में बस्ती है...पर हालत ऐसे हैं की....." अनु आगे बोलते-बोलते रुक गई|
"हालातों से तो मैं लड़ सकता हूँ पर उसकी नामुराद माँ का क्या करूँ? कमबख्त ....क्या बिगाड़ा था मैंने उसका? सब कुछ उसी ने किया ना? मैंने तो नहीं कहा था की मुझे प्यार कर! खुद मेरी जिंदगी में आई और सारी दुनिया उजाड़ दी! नहीं भूल सकता मैं नेहा को...she is my first born! कभी-कभी तो इतना दिल जलता है की मन करता है की उसे (रितिका को) बद्दुआ दे दूँ! पर फिर इस डर से रुक जाता हूँ की एक बार उसे बद्दुआ दी थी तो उसका पूरा घर उजड़ गया था, इस बार अगर उसे कुछ हो गया तो नेहा का क्या होगा?!" मैंने रोते हुए कहा| "जानती हूँ मैं कभी नेहा की कमी पूरी नहीं कर सकती पर शायद आपको अपनी औलाद दे कर उस दर्द को कुछ कम कर पाऊँ!" अनु मेरी आँखों में देखते हुए बोली और मेरे आँसूँ पोछे| "थैंक यू!" मैंने कहा और मुँह धो कर मैं अनु को अपने साथ अंदर ले आया| जब सब ने पुछा तो मैंने कह दिया की एक कॉल करना था| शाम तक भाभी को डिस्चार्ज मिल गया, बाकी घर वाले पहले ही घर आ चुके थे| मैं, चन्दर भैया, भाभी और अनु गाडी से घर पहुँचे, जहाँ पहले से ही पूजा की तैयारी हो चुकी थी| पूरे विधि-विधान से भाभी और मुन्ना ने घर में प्रवेश किया| शुरू के पंद्रह दिनों में जो रस्में निभाईं जाती हैं वो सब निभाईं गई| नामकरण हुआ तो मुन्ना का नाम किशोर रखा गया| जब वो रोता तो पूरे घर में उसे चुप कराने वाला कोई नहीं था| तब भाभी मुझे आवाज दे कर बुलाती और कहती; "लो सम्भालो अपने भतीजे को, जान खा जाता है मेरी| आखिर ऐसी कौन सा जादू है की तुम्हारी गोद में जाते ही चुप हो जाता है?" भाभी ने पुछा तो अनु पीछे से बोली; "भाभी जादू नहीं...
ये तो प्यार है इनका!" ये सुनते ही भाभी ने अनु को छेड़ते हुए बोला; "कितना प्यार है वो तो दिख ही रहा है?!" अनु शर्म से लाल हो गई|
दिन बड़े प्यार से गुजरे, लखनऊ में मुझे ऑफिस के लिए जगह मिल गई, घर भी ढूँढ लिया था अब बस शिफ्टिंग का काम रह गया था| इसलिए अब हमें बैंगलोर वापस आना था ताकि शिफ्टिंग शुरू की जा सके| सारा स्टाफ जॉब छोड़ चूका था और ऑफिस अब खाली था| सबसे विदा ले कर हम निकलने लगे तो भाभी ने अनु को अपने गले लगाया और कहा; "जल्दी आना...और अपना ध्यान रखना" और फिर मेरे कान पकड़ते हुए बोलीं; "पिछली बार इसे तेरी जिम्मेदारी दी थी और इस बार तुझे दे रही हूँ! अगर इसका ख्याल नहीं रखा तो तेरी पिटाई पक्की है!" ये सुन कर सब हँस पड़े| माँ और ताई जी ने भी भाभी को खुली छूट दे दी की वो चाहे तो मार-मार के मेरा भूत बना दें और इसका सारा मजा अनु ने लिया| रास्ते भर वो मुझे डराती रही की मैं अभी भाभी को फ़ोन कर देती हूँ!
खेर हम बैंगलोर पहुँचे और मैंने ऑफिस का सारा सामान पैक करवा कर फिलहाल के लिए घर शिफ्ट करवाया और ऑफिस खाली कर दिया जिससे एक महीना का रेंट बच गया| मैंने Packers and movers से बात करनी शुरू की और इधर अनु ने लिस्ट बनानी शुरू कर दी की कौन-कौन सा सामान उसे लखनऊ भेजना है और कौन सा यहीं बेच देना है| ऑफिस का काम सर पर पड़ा था जिसे मैंने अरुण-सिद्धार्थ को दे दिया पर US वाला प्रोजेक्ट मेरे सर पर तलवार की तरह लटक रहा था, अनु चाह कर भी मेरी उसमें मदद नहीं कर पा रही थी| हफ्ता बीता होगा की अनु का जन्मदिन आ गया, पूरा घर सामान से भरा पड़ा था और ऐसे में हम कोई पार्टी नहीं कर सकते थे, ऊपर से बैंगलोर आने के बाद मैंने अनु को जरा सा भी टाइम नहीं दिया था जिसकी उसने कोई शिकायत नहीं की थी| अब चूँकि उसका बर्थडे था तो मुझे आज का दिन उसके लिए स्पेशल बनाना था| रात को 12 बजे मैंने अनु को उठा कर बर्थडे wish किया और फिर हमने केक काटा| अब हम सेक्स तो कर नहीं सकते थे क्योंकि अनु का अब चौथा महीना चल रहा था, इसलिए वो रात हम बस एक दूसरे की बाहों में सिमटे हुए काटी| अगली सुबह अनु को मैंने कॉफ़ी दी और उसे बिस्तर से उठने से मना कर दिया, वो पूरा दिन मैंने घर का सारा काम किया| सुबह से ही उसे सब के फ़ोन आने लगे और सब ने उसे बहुत आशीर्वाद और प्यार दिया| दोपहर का खाना भी मैंने बनाया जो की अनु को बहुत पसंद था| "माँ के बाद अगर मुझे किसी के हाथ का खाना पसंद है तो वो है आपके हाथ का खाना|" अनु बोली| रात को मैंने अनु की स्पेशल दाल मखनी बनाई और उसके साथ गर्म-गर्म फुल्के बनाये| अनु का मन किया और उसने कबर्ड से वाइन निकाल ली, वो उसे गिलास में डाल ही रही थी की मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और प्यार से कहा; "बेबी...
no drinking during pregnancy!" ये सुनते ही अनु को याद आया और उसने एकदम से अपने कान पकडे; "सॉरी! शोना!!! मैं भूल गई थी!" अनु बोली और एकदम से भावुक हो गई| मैंने उसे अपने गले लगाया और उसके सर को चूमते हुए बोला; "बेबी its okay!" ये सुनते ही वो एकदम से चुप हो गई और कुछ देर बाद मुस्कुराने लगी| उस दिन से अनु के mood swings बहुत ज्यादा common हो गए| कभी-कभी वो इतने जोश में होती की पैकिंग करने लगती और फिर थोड़ी देर बाद भावुक हो कर मुँह फुला कर बैठ जाती| जैसे ही उसका मुँह बनता वो मेरे पास आती, लैपटॉप उठा कर दूर रखती और मेरी गोद में बैठ जाती| "मेला बेबी sad है!" मैं अनु को थोड़ा प्यार से pamper करता और कुछ ही देर में वो नार्मल हो जाती और मेरी गर्दन पर Kiss करने लगती| कभी तो कभी बच्चों की तरह अपने baby bump पर हाथ रख कर देखती और आईने के सामने जा कर कहती; "मैं मोटी हो गई हूँ ना?" मैं उसकी इस बात पर इतना हँसता की मेरे पेट में दर्द होने लगता| कभी वो कहती; "प्रेगनेंसी 9 महीने की क्यों होती है?" तो कभी-कभी वो तकिये को गोद में ले कर बेबी को पकड़ने की practice करने लगती| उसका ये भोलापन देख कर मैं उसे हमेशा अपनी बाहों में भर लेता| ऐसे करते-करते जनवरी आ गया, US का एक प्रोजेक्ट पूरा हो गया था और उसकी पेमेंट आने वाली थी|
इधर रितिका ने अपने सारे मोहरे बिछा दिए थे, प्लान सेट था अब बस देरी थी तो मानु के उसमें फँसने की| राजनीति में उसके पाँव पसारने से अच्छे-बुरे लोगों से उसका वास्ता पड़ने लगा था| पार्टी ने सोचा था की वो रितिका को मंत्री की बहु के रूप में project करेगी, ऐसी बहु जिसने सब कुछ खो दिया हो और इसी को वो इस्तेमाल करना चाहते थे| लोगों की सहानुभूति जीतना रितिका ने शुरू कर दिया था, छोटी-छोटी रैलियों में रितिका जाती और अपना दुखी चेहरा दिखा कर लोगों का दिल जीत लेती| ऐसा नहीं था की उसके बदले की आग शांत हो चुकी थी, बल्कि वो तो सही मौके का इंतजार कर रही थी| गाँव में वो कुछ भी नहीं कर सकती थी क्योंकि उससे ना केवल उसे जेल जाने का खतरा था बल्कि उसकी पार्टी को भी अपने नाम पर कीचड़ उछलने का खतरा पैदा हो जाता| पर बैंगलोर में वो मानु और अनु पर हमला करवा सकती थी, उसने दो गुंडों को बैंगलोर में मुझ पर नजर रखने को भेजा| मेरा एड्रेस तो वो आहूत पहले ही अनु के जरिये सुन चुकी थी| कुछ ही दिनों में रितिका को पता चल गया की मैं कब घर आता हूँ और कब बाहर जाता हूँ|
मैंने पैकर्स एंड मूवर्स से बात पक्की कर ली थी और एक दिन पहले ही उन्होंने सारा समान लोड कर लिया था| आज मुझे उन्हें पेमेंट करने जाना था साथ अनु ने कार्टन और पैक किये थे जो मुझे ड्राइवर को सौंपने थे| मालिक ने मुझे सुबह जल्दी बुलाया ताकि ड्राइवर समय से समान ले कर निकल सके| सुबह 7 बजे मैं तैयार हो कर निकलने लगा तो अनु जिद्द करने लगी की उसे कुछ फ्रूट्स लेने हैं तो वो भी मेरे साथ नीचे चलेगी| इसलिए मैं उसे ले
कर नीचे आया और कार्टन कैब में डालकर पहले उसे फ्रूट्स खरीदवाए और फिर उसे वापस बिल्डिंग के parking lot तक छोड़ मैं कैब में बैठ कर निकला" 100 मीटर जाते ही मुझे याद आया की मैं पैसों का पैकेट लेना भूल गया तो मैंने कैब वापस घर की तरफ मुड़वाई| कैब अभी गेट पर ही पहुँची ही थी की आगे का नजारा देख मेरी हालत खराब हो गई| पार्किंग लोट में दो आदमी थे, एक ने वॉचमन को चाक़ू की नोक पर डरा कर चुप करा रखा था और दूसरे ने अनु की गर्दन पर चाक़ू लगा रखा था| अनु एक पिलर के सहारे खड़ी थी और उस आदमी से मिन्नत कर रही थी की वो उसे छोड़ दे! चूँकि आज संडे का दिन था और ज्यादा तर लोग अभी बाहर नहीं आये थे इसलिए नीचे कोई नहीं था| मैंने टैक्सी वाले को कहा की वो जल्दी से पुलिस को फ़ोन लगाए और बुलाये| मैं धीरे से उतरा और दबे पाँव आगे बढ़ा, मेरा कुछ भी आवाज करना अनु के लिए खतरनाक साबित होता| दोनों आदमियों की पीठ जिस तरफ थी मैं घूम कर उसी तरफ से पहुँचा, रास्ते में मैंने एक बड़ा पत्थर का टुकड़ा उठा लिया| वॉचमन ने मुझे देख लिया और उसने एक आदमी का ध्यान अपने रोने-धोने से भटकाया, मैं एक दम से उस आदमी के पीछे खड़ा हो गया जिसने अनु की गर्दन पर चाक़ू लगा रखा था| वो अनु को गन्दी-गन्दी गालियाँ दे रहा था और किसी 'मेमसाहब' का नाम बड़बड़ा रहा था| मैंने उसके दाहिने कंधे पर अपने बाएं हाथ से थपथपाया तो वो एकदम से पलटा, मैंने अपने दाहिने हाथ में पकड़ा पट्ठा से उसके सर पर एक जोरदार हमला किया और वो चिल्लाते हुए नीचे जा गिरा| उसकी चिल्लाने की आवाज सुन दूसरा आदमी मेरी तरफ तेजी से दौड़ा, मैंने वो पत्थर खींच कर उसके मुँह पर मारा| वो पत्थर जा कर उसकी नाके बीचों-बीच लगा और वो भी चिलाते हुए नीचे गिरा| "अनु ऊपर जाओ और दरवाजा लॉक करो!" मैंने अनु से कहा पर वो घबराई हुई बस वहीँ जम कर खड़ी हो गई, मैं उसकी तरफ बढ़ा और उसे झिंझोड़ कर उसे होश में लाया और उसे घर जाने को कहा| अनु ऊपर गई और मैं नीचे पड़े आदमी की छाती पर बैठ गए और मुँह पर मुक्के मार कर उससे पूछने लगा; "बोल बहनचोद किस ने भेजा था तुझे? बोल वर्ण आज तेरी जान ले लूँगा!" मैंने उसके मुँह पर जगहसे मारने चालु कर दिए इतने में वो टैक्सी ड्राइवर भाग कर वॉचमन के पास आ गया जो अपने डंडे से दूसरे आदमी को (जिसे मैंने पत्थर फेंक कर मारा था|) पीट रहा था| शोर मच गया था और लोग इकठ्ठा होने लगे थे, इधर मेरी पिटाई और पत्थर से लगी चोट के कारन पहला आदमी बोल उठा; "री...
रितिका मेमसाब!" मेरा इतना सुनना था की मेरा गुस्सा फुट पड़ा, मैंने उसे और पीटना शरू कर दिया, उसकी गर्दन अपने दोनों हाथ से पकड़ ली और दबाने लगा| कुछ पड़ोसियों ने मुझे पकड़ कर पीछे खींचा जिससे वो मरने से बच गया| इतने में पुलिस अपना साइरेन बजाती हुई आ गई और फटाफट दोनों आदमियों को हिरासत में लिया| "तुम्हें तो चोट लगी है!!" पुलिस इंस्पेक्टर बोला तब जा कर मेरा ध्यान अपनी शर्ट पर गया जहाँ चाक़ू से घाव हो गया था| जब मैंने पहले आदमी के कंधे पर थपथपाया था तो वो थोड़ा हड़बड़ा दिया था और मेरी तरफ घुमते हुए उसने मेरे सीने को अपने चाक़ू से जख्मी कर दिया था| जख्म ज्यादा खतरनाक नहीं था, बस उससे मेरी कमीज फ़ट गई थी और कुछ खून की बूँदें मेरी शर्ट पर दिख रही थी| हमारी बिल्डिंग में ही एक डॉक्टर शाब थे जिन्होंने मेरा First aid कर दिया| "तुम्हें पता है ये कौन लोग हैं?" इंस्पेक्टर ने मुझसे पुछा तो मैंने बस ना में गर्दन हिला दी और मैं वहां से निकल कर फ़ौरन अनु के पास ऊपर आ गया| "अनु दरवाजा खोलो...मैं हूँ!" मेरी आवाज सुनते ही उसने दरवाजा खोला और रोती हुई मुझसे लिपट गई| पीछे से इंस्पेक्टर भी आ गया, मैंने अनु को आराम से बिठाया और उसे पानी पीला कर शांत करवाया| उसने जैसे ही मेरी शर्ट पर खून देखा तो वो और भी डर गई, मैंने उसे विश्वास दिलाया की मुझे कुछ नहीं हुआ| उसके बाद इंस्पेक्टर ने हम से सारा वाक़्या पुछा| अनु इतनी घबराई हुई थी की उससे कुछ बोला ही नहीं जा रहा था और वो बस मेरे कंधे पर सर रख कर रोये जा रही थी| मैंने इंस्पेक्टर को अपनी साइड की सारी कहानी बता दी| पर उसे अनु की साइड की भी कहानी सुननी थी पर अनु अभी ब्यान देने की हालत में नहीं थी| इतने में वही डॉक्टर मियां-बीवी आ गए और इंस्पेक्टर को समझाते हुए बोले; "इंस्पेक्टर आप देख सकते हो she's in shock! Give her some time!" चूँकि अनु प्रेग्नेंट थी इसलिए वो उससे ज्यादा पूछताछ नहीं कर सकता था| "अनु...देखो मैं हूँ यहाँ आपके पास! You're safe now! Relax ...
okay!!!!" बड़ी मुश्किल से मैंने अनु को शांत किया और उसके सर पर हाथ फेरता रहा ताकि वो दुबारा से शॉक में न चली जाए| पड़ोसियों का ताँता लग चूका था और सभी हैरान थे की भला हम दोनों ने किसी का क्या बिगाड़ा हो सकता है| कोई कहता की ये professional rivalry है तो कोई कहता की चोर चोरी करने आये थे! मैं जानबूझ कर चुप था क्योंकि मेरे मन में अब बदले का ज्वालामुखी फुट चूका था! अब इस लावा से मैं रितिका को खुद जला कर राख करने वाला था| पर मैं जोश में होश खोने वालों में से नहीं था, मुझे मेरा बदला पूरी प्लानिंग से लेना था| अभी मुझे पहले अपनी बीवी को संभालना था, करीब घंटे बाद अनु स्टेबल हुई और मैंने इंस्पेक्टर को उसका ब्यान लेने को बुलाया; "मैं फ्रूट्स ले कर ऊपर आ रही थी की दो लोगों ने मेरा रास्ता रोक लिया, और दोनों मुझ पर चिल्लाते हुए बोले की वो मेरा खून करने आये हैं! ये शोर सुन वॉचमन भैया आ गए तो उनमें से एक ने चाक़ू निकाला और वॉचमन भैया को उससे डरा कर दूर ले गया| बस एक आदमी था जो मुझे गालियाँ दे रहा था और कह रहा था की 'मेमसाहब ने कहा है की पहले तेरा बलात्कार करें और फिर तुझे तड़पा-तड़पा कर मरेंगे!'" ये बोलते-बोलते अनु फिर से रो पड़ी, मैंने उसे संभाला और उसने आगे की बात रोते हुए कही; "वो बड़े गंदे-गंदे शब्द बोल रहा था और मुझे छूने की कोशिश कर रहा था, मैं हरबार उसका हाथ झटक देती और उसे खुद को छूने नहीं देती| गुस्से में आ कर उसने चाक़ू निकाला और मेरी गर्दन पर लगा दिया और फिर से गालियाँ देने लगा| तभी मेरे पति आ गए और उन्होंने उसपर हमला कर दिया|" अनु की बात सुन कर मेरा खून खौल रहा था और आँखें गुस्से से लाल हो गईं थी| अनु ने जब मेरी आँखें देखि तो वो डर गई और फिर से रोने लगी| मैंने उसे अपने सीने से लगा लिया और उसके सर को सहलाने लगा| मैं चाहता तो इंस्पेक्टर को बता सकता था की ये सब किस की करनी है पर जो इंसान अनु और मुझ पर इस कदर हमला करवा सकता है उसे कानून को चकमा देना कितना आसान हो गए ये मैं जानता था| इंस्पेक्टर ने मेरी बहादुरी की तारीफ की और साथ ही उसने उस ड्राइवर और वॉचमन की हिम्मत को सराहया| मेरे पास पैकर्स एंड मोवेर्स वाले का फ़ोन आया तो मैंने उसे घर बुला लिया और उसे कहा की घर पर कुछ प्रॉब्लम आ गई है तो वो किसी को भेज दे और मैं उसी को पैसे दे दूँगा| मेरी गंभीर आवाज सुन वो समझ गया की कुछ हुआ है और खुद ही आ गया| मैंने उसे पैसे और वो दोनों cartons दे दिए|
इधर धीरे-धीरे कर सब चले गए और अब घर में सिर्फ मैं और अनु ही रह गए थे| मैंने अनु को सहारा दे कर उठाया और अपने कमरे में लाया, अभी तक मैंने इस घटना की खबर किसी को नहीं दी थी| अनु को बिस्तर पर बिठाया और मैं उसी के साथ बैठ गया, "बेबी भूख लगी है? कुछ बनाऊँ?" अनु ने ना में गर्दन हिलाई और अपना सर मेरे कंधे पर रख दिया| "बेबी अपने लिए नहीं तो हमारे बच्चे के लिए खा लो!"
मैंने अनु को हमारे होने वाले बच्चे का वास्ता दिया तो वो मान गई| मैं उसे कमरे में छोड़ जाने लगा तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया; "बाहर से मंगा लो!" मैंने खाना बाहर से मंगाया और मैं खुद अनु के साथ बैठ गया| अनु मेरे कंधे पर सर रख बैठी रही और उसकी आँख लग गई, कुछ देर बाद जब बेल्ल बजी तो वो एकदम से डर गई; "बेबी खाना आ गया!" मैंने अनु को विश्वास दिलाया की उसे डरने की कोई जर्रूरत नहीं| खाना परोस कर मैं अनु के पास आया और उसे खुद अपने हाथ से खिलाया, अनु ने भी मुझे अपने हाथ से खिलाया| खाना खा कर मैंने अनु को लिटा दिया और मैं भी उसकी बगल में ले गया| अनु ने मेरा बायाँ हाथ उठा कर अपनी छाती पर रख लिया क्योंकि उसका डर अब भी खत्म नहीं हुआ था और मेरा हाथ उसकी छाती पर होने से उसे सुरक्षित महसूस हो रहा था| कुछ देर बाद अनु सो गई और सीधा शाम को उठी, मैं अब भी उसकी बगल में लेटा था और अपने बदले की प्लानिंग कर रहा था|
मैंने रात को अरुण को फ़ोन किया और उसे बताया की परसों सारा समान पहुंचेगा तो वो सब समान शिफ्ट करवा दे| मेरी गंभीर आवाज सुन वो भी सन्न था पर मैंने उसे कुछ नहीं बताया, बस ये कहा की अनु की तबियत ठीक नहीं है इसलिए थोड़ा परेशान हूँ! रात को जब मैं खाना बनाने लगा तो अनु मेरे सामने बैठ गई और मुझे गौर से देखने लगी, मैंने माहौल को हल्का करने के लिए उससे थोड़ा मज़ाक किया; "बेबी...ऐसे क्या देख रहे हो? मुझे शर्म आ रही है!" ये कहते हुए मैं ऐसे शरमाया जैसे मुझे सच में शर्म आ रही हो| अनु एकदम से हँस दी पर अगले ही पल उसे वो डरावना मंजर याद आया और उसकी आँखें फिर नम हो गईं| मैं रोती बनानाना छोड़ कर उसके पास आया और उसे अपने सीने से लगा लिया| "बस...बस! मेला बहादुर बेबी है ना?" मैं तुतलाते हुए कहा तो अनु ने अपने आँसूँ पोछे और फिर से मुझे गौर से देखने लगी| "Baby… I know its not easy for you to forget what happened today but please for the sake of our child try to forfet this horrific incident.
Your seriousness, your fear is harmful for our kid!” मैंने अनु को एक बार फिर अपने होने वाले बच्चे का वास्ता दिया| अनु ने अपनी हिम्मत बटोरी और पूरी ताक़त लगा कर मुस्कुराई और बोली; "मुझे हलवा खाना है!" मैंने उसके मस्तक को चूमा और उसके लिए बढ़िया वाला हलवा बनाया| रात में हम दोनों ने एक दूसरे को खाना खिलाया और फिर दोनों लेट गए| अनु ने रात को मेरा हाथ फिर से अपनी छाती पर रख लिया, कुछ देर बाद उसने बायीं करवट ली जो मेरी तरफ थी और मेरा हाथ फिर से अपनी कमर पर रख लिया| मैंने अनु के मस्तक को चूमा तो वो धीरे से मुस्कुराई, उसकी मुस्कराहट देख मेरे दिल को सुकून मिला| सुबह जागते हुए ही निकली, मैंने अनु के लिए कॉफ़ी बनाई और उसे प्यार से उठाया| अनु ने आँखें तो खौल लीं पर वो फिर से कुछ सोचने लगी| मुझे उसे सोचने से रोकना था इसलिए मैंने झुक कर उसके गाल को चूम लिया, मेरे होठों के एहसास से अनु मुस्कुराई और फिर उठ कर बैठ गई| नाश्ता करने के बाद मैं अनु के पास ही बैठा था और उसका ध्यान अपनी इधर-उधर की बातों में लगा दिया| पर उसका दिमाग अब भी उन्हीं बातों को याद कर रहा था, कुछ सोचने के बाद वो बोली; "मेमसाब ...रितिका ही है ना?" अनु की बात सुन कर मैं एकदम से चुप हो गया| अनु ने फिर से अपनी बात दोहराई; "है ना?" मैंने ना में सर हिलाया तो उसने दूसरा सवाल पुछा; "तो फिर कौन है?"
"मुझे नहीं पता? शायद जैस्मिन (कुमार की गर्लफ्रेंड) हो?" मैंने बात बनाते हुए कहा|
"उसे हमारे घर का एड्रेस कैसे पता?" अनु ने तीसरा सवाल पुछा| "हमारे घर अक एड्रेस मैंने सिर्फ भाभी को बताया था और हो न हो रितिका ने सुन लिया होगा!" अनु बोली| ये सुनने के बाद मेरा गुस्सा बाहर आ ही गया;
"हाँ वो ज़लील औरत रितिका ही है और मैं उसे नहीं छोड़ूँगा!" मैंने गुस्से से कहा और अनु को सारा सच बता दिया जो मैंने उस आदमी से उगलवाया था|
"नहीं...
आप ऐसा कुछ नहीं करोगे?" अनु ने मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा|
"तो हाथ पर हाथ रखा बैठा रहूँ? या फिर इंतजार करूँ की कब वो अगलीबार हमें नुक्सान पहुँचाने में कामयाब हो? ना तो मैं इस डर के साये में जी सकता हूँ ना ही अपने बच्चे को इस डर के साये में जीने दूँगा!" मैंने खड़े होते हुए कहा|
"आप ने ऐसा कुछ भी किया तो आप जानते हो उसका क्या नतीज़ा होगा? आपको जेल हो जाएगी, फिर मेरा क्या होगा और हमारे बच्चे का क्या होगा? आप पुलिस में कंप्लेंट कर दो वो अपने आप देख लेगी!" अनु बोली|
"आपको लगता है की पुलिस कंप्लेंट करने से सब सुलझ जायेगा? जो अपने गुंडे यहाँ भेज सकती है क्या वो खुद को बचाने के लिए पुलिस और कानून का इस्तेमाल नहीं कर सकती? इस समस्या का बस एक ही अंत है और वो है उसकी मौत!" मैंने कहा|
"फिर नेहा का क्या होगा? कम से कम उसका तो सोचो?" अनु बोली|
"उसे कुछ नहीं होगा, उल्टा रितिका के मरने के बाद हम उसे आसानी से गोद ले सकते हैं| हमें हमारी बेटी वापस मिल जाएगी!" मैंने कहा|
"और जब उसे पता लगेगा की उसकी माँ का खून आपने किया है तब?" अनु के ये आखरी सवाल ऐसा था जो मुझे बहुत चुभा था|
"जब वो सही और गलत समझने लायक बड़ी हो जाएगी तो मैं खुद उसे ये सब बता दूँगा और वो जो भी फैसला करेगी मैं वो सर झुका कर मान लूँगा|" मैंने बड़े इत्मीनान से जवाब दिया|
"ये पाप है...आप क्यों अपने हाथ उसके गंदे खून से रंगना चाहते हो! प्लीज मत करो ऐसा कुछ!....सब कुछ खत्म हो जायेगा!" अनु गिड़गिड़ाते हुए बोली| मैंने अनु को संभाला और उसकी आँखों में देखते हुए कहा;
"जब किसी इंसान के घर में कोई जंगली जानवर घुस जाता है तो वो ये नहीं देखता की वो जीव हत्या कर रहा है, उसका फ़र्ज़ सिर्फ अपने परिवार की रक्षा करना होता है| रितिका वो जानवर है और अगर मैंने उसे नहीं रोका तो कल को इससे भी बड़ा कदम उठाएगी और शायद वो अपने गंदे इरादों में कामयाब भी हो जाए| मैं तुम्हें नहीं खो सकता वरना मेरे पास जीने को रहेगा ही क्या? प्लीज मुझे मत रोको....मैं कुछ भी जोश में नहीं कर रहा ....सब कुछ planned है!" मैंने कहा और फिर अनु को सारा प्लान सुना दिया| Plan foolproof था, पर अनु का दिल अब भी इसकी गवाही नहीं दे रहा था| "अच्छा ठीक है...मैं अभी कुछ नहीं कर रहा...
okay?" मैंने फिलहाल के लिए हार मानी पर अनु को संतुष्टि नहीं मिली थी; "Promise me, बिना मेरे पूछे आप कुछ नहीं करोगे?" अब मेरे पास सिवाय उसकी बात मानने के और कोई रास्ता नहीं था| इसलिए मैंने अनु से वादा कर दिया की बिना उसकी इज्जाजत के मैं कुछ नहीं करूँगा| मेरे लिए अभी अनु की ख़ुशी ज्यादा जर्रूरी थी, मेरी बात सुन अनु को अब पूर्ण विश्वास हो गया की मैं कुछ नहीं करूँगा| 20 जनवरी को हम ने बैंगलोर का घर खाली कर दिया और हम लखनऊ के लिए निकल गए| पहले अनु ने नया घर देखा और फिर नया ऑफिस, अनु बहुत खुश हुई, फिर हम गाँव लौट आये| यहाँ सब की मौजूदगी में अनु ज्यादा खुश रहने लगी| अनु ने मुझे साफ़ मना कर दिया की मैं उस घटना के बारे में किसी से कोई जिक्र न करूँ, इसलिए मैं चुप रहा|
इधर फरवरी का महीना शुरू हुआ और मैंने ऑफिस शुरू कर दिया, पूरा घर उस दिन पूजा में सम्मिलित हुआ| पूजा के बाद सब हमारे फ्लैट पर आये और वहाँ भी ग्रह-पूजन उसी दिन हुआ| सब को घर बहुत पसंद आया और हमें आशीर्वाद दे कर सभी लौट गए| बिज़नेस बड़े जोर-शोर से शुरू हुआ, अनु ने अभी ऑफिस ज्वाइन नहीं किया था क्योंकि मैं उसे स्ट्रेस नहीं देना चाहता था| सारे पुराने क्लाइंट्स अरुण-सिद्धार्थ हैंडल कर रहे थे और US का वो एक क्वार्टर का काम मैं अकेला देख रहा था| मैं अब अनु को ज्यादा से ज्यादा समय देता था, सुबह-शाम उसके साथ सोसाइटी के गार्डन में घूमता, हर इतवार उसे मंदिर ले जाता जहाँ पाठ हो रहा होता था ताकि होने वाले बच्चे में अच्छे गुण आयें| कुछ बदलाव जो मैं अनु में देख रहा था वो ये की उसका baby bump कुछ ज्यादा बड़ा था, उसका वजन कुछ ज्यादा बढ़ गया था| पर अनु कहती थी की मैं उसका इतना ख्याल रखता हूँ उसे इतना प्यार करता हूँ की उसका वजन बढ़ गया है| मैंने हँसते हुए उसकी बात मान ली, दिन बड़े प्यार भरे गुजरने लगे थे और बिज़नेस में अरुण और नए कोंट्राक्टे ले आया था| संडे को कभी कभार अरुण-सिद्धार्थ की बीवियाँ घर आतीं और जल्द ही तीनों की अच्छी दोस्ती हो गई| बैंगलोर वाले हादसे के बाद मैं अनु को कहीं भी अकेला नहीं जाने देता था, जब भी हम कभी बाहर निकलते तो साथ निकलते और दिन में निकलते| जितनी भी जर्रूरी precautions लेनी चाहिए वो सब मैं ले रहा था और मैंने इसकी जरा सी भी भनक अनु को नहीं लगने दी थी वरना वो भी डरी-डरी रहती| कुछ दिन बाद मुझे किसी काम से बरेली जाना पड़ा और वापस आते-आते रात हो गई| दस बज गए थे और इधर अनु बार-बार मुझे फ़ोन कर के मेरी लोकेशन पूछ रही थी| "बेबी...
बस लखनऊ enter हुआ हूँ maximum पोना घंटा लगेगा|” पर अनु उधर बेचैन हो रही थी, मैं ड्राइव कर रहा था और फ़ोन लाउड स्पीकर पर था| मेरी गाडी एक चौराहे पर पहुँची जहाँ दो जीपें रास्ता रोके खड़ी थीं| मैंने गाडी रोक दी और अनु को होल्ड करने को कहा, दोनों जीपों के सामने 3 लोग खड़े थे| मैं गाडी से उतरा और उनसे बोला; "रास्ता क्यों रोक रखा है?" अभी इतना ही बोला था की किसी ने मेरे सर पर पीछे से जोरदार हमला किया| मैं चिल्लाता हुआ सर पकड़ कर गिर गया, "मेमसाब से पन्गा लेगा तू?" एक आदमी जोर से चिल्लाया और हॉकी मेरी पीठ पर मारी| उसके सारे साथियों ने हॉकी, बैट, डंडे निकाल लिए और मुझे उनसे पीटना शुरू कर दिया| मैं दर्द में पड़ा करहाता रहा और वो मुझे मारते रहे, तभी वहाँ से पुलिस की एक जीप पेट्रोलिंग के लिए निकली जिसे देख सारे भाग खड़े हुए, पर जाते-जाते भी उन्होंने गाडी की wind shield तोड़ दी थी! पुलिस वालों ने मुझे खून से लथपथ हालत में हॉस्पिटल पहुँचाया, गाडी से उन्हें जो फ़ोन मिला था उसे उन्होंने देखा तो अनु फ़ोन पर रोती हुई चीख रही थी; "प्लीज...छोड़ दो मेरे पति को!" शायद उसने मेरी दर्द भरी चीख सुन ली थी| पुलिस ने उसे भी अस्पताल बुला लिया, अनु ने फ़ौरन सब को खबर कर दी थी और देखते ही देखते हॉस्पिटल में मेरे दोस्त और मम्मी-डैडी आ गए| गाँव से चन्दर भैया, ताऊ जी, पिताजी और संकेत बाइक पर निकल चुके थे जो रात के 20 बजे हॉस्पिटल पहुँचे| डॉक्टर ने प्राथमिक उपचार शुरू किया, भगवान् का शुक्र था की पुलिस की पैट्रॉल जीप को देख कर सारे भाग खड़े हुए और उन्हें मुझे जान से मारने का मौका नहीं मिला| अनु मुझसे मिलने को आतुर थी पर मैं उस वक़्त होश में नहीं था| मुझे सुबह के 10 बजे होश आया, बड़ी मुश्किल से मैंने अपनी आँख खोली और सामने अनु को देखा जिसकी रो-रो कर हालत खराब हो गई थी| अनु एक दम से मेरे गले लग गई और फफक कर रो पड़ी| मेरे सर पर पट्टी थी, बायाँ हाथ पर hair line फ्रैक्चर और पीठ पर जो हमला हुआ था उससे मेरी रिड की हड्डी बस टूटने से बच गई थी| मैं और अनु दोनों ये जानते थे की ये किसकी करनी है पर दोंनो ही खामोश थे| तभी इंस्पेक्टर आया और बोला की वो लोग चोरी करने के इरादे से आये थे और हमला किया था| उनकी तलाश जारी है, ये सुनते ही अनु उस पर चीख पड़ी; "चोरी करने के लिए कौन जीप से आता है? देखा था न आप लोगों ने उन्हें जीप से भागते हुए? जानना चाहते हो न कौन हैं वो लोग तो नंबर लिखो और अगर है हिम्मत तो उन्हें पकड़ कर जेल में डालो!" माँ ने अनु को शांत करवाया पर अनु ने बैंगलोर में जो हुआ वो सब बता दिया और रितिका का नाम भी बता दिया| ये सब जानकार सब को बहुत धक्का लगा, पिताजी ने मेरे पर चिल्लाना शुरू कर दिया की मैंने उनसे इतनी बड़ी बात छुपाई| अनु बेचारी कुछ बोलने को हुई तो मैंने इसे आँखों से इशारा कर के चुप रहने को कहा| सब मुझे डांटते रहे और मैं सर झुकाये
सब सुनता रहा| पर जो गुस्से का ज्वालामुखी मेरे अंदर उसदिन फूटा था वो अब अनु के अंदर सुलग उठा था| इधर लखनऊ पुलिस बैंगलोर पुलिस के साथ coordinate करने लगी पर मैं जानता था की इसका कोई नतीजा नहीं निकलेगा और हुआ भी वही| अगले दिन ही हमें बताया गया की उन दोनों को तो लखनऊ जेल भेजा गया पर वो यहाँ तो आये ही नहीं?! मतलब रितिका ने पैसे खिला कर मामला सुलटा दिया था| लखनऊ पुलिस ने जब कल के वाक़्या के बारे में उससे पुछा तो उसने पार्टी मीटिंग में होने की बात कह कर अपना पला साफ़ झाड़ लिया| पुलिस ने केस बंद कर दिया, घर वाले बड़े मायूस हुए और इन्साफ न मिल पाने से सभी के मन में एक खीज जर्रूर थी| दो दिन बाद मुझे डिस्चार्ज मिला और मैं गाँव आ गया, अब मेरी हालत में थोड़ा बहुत सुधार था| उसी रात को अनु मेरी पीठ में दवाई लगा रही थी, की मेरी पीठ की हालत देख वो रो पड़ी| "Hey .... इधर आओ!" मैंने अनु को अपने सामने बुलाया और उसकी ठुड्डी ऊपर करते हुए बोला; "ये जख्म ठीक हो जायेंगे!" अनु ने गुस्से में आ कर अपने आँसूँ पोछे और मेरी टी-शर्ट के कालर पकड़ कर मेरी आँखों में देखते हुए बोली; "You've my permission! Kill that bitch!" अनु की आँखों में अंगारे दहक रहे थे और उसने फैसला कर लिया था की अब वो उस कुतिया को अपने घरोंदे को तबाह करने नहीं देगी| “उसने मुझ पर हमला किया, वो तो मैं सह गई पर उसने आपकी ये हालत की और ये मैं कतई बर्दाश्त नहीं करुँगी! उस हरामजादी की हिम्मत कैसे हुई मेरे पति को नुक्सान पहुँचाने की?” अनु गुस्से में गरजी, उसकी सांसें तेज हो चली थीं और उसकी पकड़ मेरी टी-शर्ट पर और कठोर होती जा रही थी| अनु की 'अनुमति' के बाद बाद मेरे चेहरे पर शैतानी मुस्कान आ गई, मैंने आगे बढ़ कर अनु के मस्तक को चूमा और हाँ में गर्दन हिला कर उसकी बात का समर्थन किया| अनु को उसके गुस्से का एहसास हुआ और ये भी एहसास हुआ की उसने तेश में आ कर मेरी टी-शर्ट के कालर पकड़ लिए थे| उसने कालर छोड़ दिया और एकदम से मेरे गले लग गई, पर उसकी आँखों से एक बूँद आँसूँ नहीं गिरा| मैं अनु के बालों में हाथ फिर रहा था और उसे शांत कर रहा था की तभी अनु का फ़ोन बज उठा| ये कॉल किसी अनजान नंबर से आया था इसलिए अनु ने कॉल उठा लिया, ये कॉल किसी और का नहीं बल्कि रितिका का ही था| "तुम दोनों ने क्या किस्मत लिखवाई है यार? साला दोनों बार बच गए, चलो कोई नहीं आखरी हमला बड़ा जबरदस्त होगा और अचूक होगा!" रितिका अपनी अकड़ दिखाते हुए बोली|
"कुतिया!!!!" अनु बहुत जोर से चीखी| "अब तक मैंने अपने पति को रोक रखा था, पर अब मैं ने उन्हें खुली छूट दे दी है....
" अभी अनु की बात पूरी भी नहीं हुई थी की नेहा बरस पड़ी; "ओ हेल्लो! तूने मुझे समझ क्या रखा है? मैं अब वो डरी-सहमी सी रितिका नहीं हूँ! मैंने अब शिकार करना सीख लिया है, तुझे पता भी है मेरी पहुँच कहाँ तक है? नहीं पता तो जा के उस इंस्पेक्टर से पूछ जिसे तूने मेरे पीछे लगाया था! सीधा कमिश्नर ने उसे डंडा किया है और उसने केस बंद कर दिया| होली के बाद गाँव में मुखिया के चुनाव हो रहे हैं और उस में मेरी पार्टी का भी उमीदवार खड़ा है, ये चुनाव तो मैं चुटकी बजा कर जीत जाऊँगी और फिर तू और तेरे पति को मैं कहीं का नहीं छोडूंगी! बड़ा नेहा के लिए प्यार है ना उसके मन में, अब देख तू उसे ही कैसे केस में फँसाती हूँ| मैं पंचायत में चीख-चीख कर कहूँगी की बचपन से ही वो मेरा रेप करता आया है और नेहा उसी का खून है! फिर देखती हूँ वो लोग कैसे उसे छोड़ते हैं?! ना मैंने उसे उसी खेत में जिन्दा जलवाया जहाँ मेरी माँ को जलाया था तो मेरा नाम रितिका नहीं!" इतना कह कर उसने फ़ोन काट दिया| रितिका की बात में दम था, उसके झूठे आरोप के सामने हमारी एक नहीं चलती| हमारे पास कोई सबूत नहीं था जिससे ये साबित हो सके की रितिका झूठ बोल रही है| अनु पर रितिका की बातों का बहुत गहरा असर हुआ था और वो एक दम से खामोश हो गई थी| मैंने कई बार उसे झिंझोड़ा तो वो फिर से रो पड़ी और रोते-रोते उसने सारी बात बताई| अब तो मेरे लिए रितिका की जान लेना और भी ज्यादा जर्रूरी हो गया था, क्योंकि अगर मैं पीछे हटता तो उसका इन्तेक़ाम पूरा हो जाता और मेरा पूरा परिवार तहस-नहस हो जाता! "आपको घबराने की कोई जर्रूरत नहीं है! मैं अपने उसी प्लान पर काम करता हूँ और अब तो मेरे पास परफेक्ट cover है अपने प्लान को अंजाम देने का!" मैंने अनु के आँसू पूछते हुए कहा| “Trust me!!!” मैंने अनु की आँखों में देखते हुए उसे विश्वास दिला दिया|
सुबह हुई और मैं उठ कर नीचे आया, मेरा जिस्म अभी भी रिकवर होना शुरू ही हुआ था, पर बदले की आग ने उस दर्द को दबाना शरू कर दिया था| "रात को तुम-दोनों झगड़ रहे थे?" माँ ने पुछा तो अनु का सर झुक गया, शुक्र था की किसी ने पूरी बात नहीं सुनी थी| "वो...माँ....वो....
" मुझे कोई बहाना सूझ नहीं रहा था, इधर ताऊ जी ने मुझे अच्छे झाड़ दिया; "तुझे शर्म आनी चाहिए! बहु माँ बनने वाली है और तू है की उससे लड़ता फिर रहा है? सारा वक़्त तेरी तीमारदारी करती रहती है और तू है की???"
"ताऊ जी मैं तो बस इतना कह रहा था की वो चैन से सो जाए पर वो मान ही नहीं रही थी!" मैंने झूठ बोला|
"कैसे सो जाए वो?" ताई जी बोलीं तो मैंने माफ़ी माँग कर बात वहीं खत्म कर दी| नाश्ते के बाद मुझे घर से निकलना था सो मैंने डॉक्टर के जाने का बहाना किया; "पिताजी मैं एक बार physiotherapy करवाना चाहता हूँ, उससे शायद जल्दी आराम मिले!" ये सुन कर अनु चौंक गई पर खामोश रही, पिताजी ने चन्दर भैया से कहा की वो मुझे डॉक्टर के ले जाएँ| मैं और भैया बाइक से निकले और मैं उनसे रास्ते भर बातें करता रहा और बातों-बातों में मैंने रितिका के घर का पता उनसे निकलवा लिया| कुछ देर बाद हम ट्रीटमेंट के बाद वापस आ गए, अगले दिन मुझे पता था की चन्दर भैया को आज व्यापारियों से मिलने जाना है तो मैं उनके जाने का इंतजार करने लगा| पिताजी और ताऊ जी तो पहले ही कुछ काम से जा चुके थे, जैसे ही भैया निकले मैं उनके पीछे-पीछे ही फिर से physiotherapy करवाने के बहाने से निकला| इस बार मैं सीधा रितिका के घर के पास वाले पनवाड़ी के पास रुका और उससे एक सिगरेट ली| वहीं खड़े-खड़े मैं आराम से पीता रहा और रितिका के घर पर नजर रखता रहा| अगले कुछ दिन तक ऐसे ही चला और वहाँ खड़े-खड़े सबकी बातें सुनते-सुनते मुझे रितिका के घर आने-जाने वालों और उसके नौकरों के नाम भी पता चल गए| अब वक़्त था उस घर में घुसने का ताकि मैं ये अंदाजा लगा पाऊँ की घर में रितिका का कमरा कौन सा है? पर उसके लिए मुझे एक लिबाज की जर्रूरत थी, मेक-अप की जर्रूरत थी| हमारे गाँव में एक नट था, जो हरसाल ड्रामे में हिस्सा लेता था| संकेत की उससे अच्छी दोस्ती थी क्योंकि वो उसे मस्त वाला माल दिलवाया करता था| 1-2 बार संकेत ने मुझे उससे मिलवाया भी था एक वही था जो मुझे मेक-अप का समान दे सकता था, पर उससे माँगना मतलब मुसीबत मोल लेना था| इसलिए मेरे पास सिवाए चोरी के कोई रास्ता नहीं रह गया था| मैं उससे मिलने निकला और कुछ देर उसी के पास बैठा तो बातों-बातों में पता चला की उसे पैसों की सख्त जर्रूरत है| मेरे पास उस वक़्त 4,000/- थे जो मैंने उसे दे दिए, इस मदद से वो बहुत खुश हुआ| फिर मैंने उससे चाय माँगी तो वो चाय बनाने लग गया| वो चूँकि अभी तक कुंवारा था सो उसके घर में बस एक बूढी माँ थी जो बिस्तर से उठ नहीं पाती थी| इधर वो चाय बनाने में व्यस्त हुआ और इधर मैंने बातों-बातों में ही उसके पास से एक दाढ़ी और मूछ चुरा ली! चाय पी कर मैं घर लौट आया और अगले दिन की तैयारी करने लगा| मेरी एक पुरानी टी-शर्ट जो घर में गंदे कपडे की तरह इस्तेमाल होती थी मैंने वो उठा ली, एक पुरानी पैंट जो की भाभी धोने वाली थी वो भी मैंने उठा ली| अगले
दिन मैंने नीचे वो फटी हुई पुरानी टी-शर्ट पहनी और उसके ऊपर अपनी एक कमीज पहन ली, नीचे वही गन्दी पैंट पहन ली, कंधे पर मैंने अंगोछा रखा और घर से निकलने लगा| "मानु ये कौन सी पैंट पहन रखी है?" भाभी ने पुछा तो मैंने बोल दिया की भाभी आप इसे धोना भूल गए और इस कमीज के साथ यही मैच होती है| इतना बोल मैं घर से निकल गया, रितिका के घर से कुछ दूर पहुँच कर मैंने अपनी कमीज निकाल दी, अपने साथ लाये लिफाफे से मैंने वो नकली दाढ़ी-मूछ भी लगा ली| अब किसी के लिए भी मुझे पेहचान पाना नामुमकिन था| मेरी calculations और information के हिसाब से आज रितिका अपने घर पर मौजूद नहीं थी और हुआ भी यही| मैं जब उसके घर पहुँचा तो बाहर उसकी काली Mercedes नहीं थी, इसका मतलब घर पर सिर्फ कान्ता (उसनी नौकरानी) ही होगी| मैंने दरवाजा खटखटाया तो काँटा ने दरवाजा खोला और मेरी गरीब हालत देख कर चिढ़ते हुए बोली; "क्या है?" मैंने अपनी आवाज बदली और कहा; "जी...वो मेमसाब ने बुलाया था....कुछ मदद देने के लिए!" वो मेरे हाथ का प्लास्टर देख समझ गई की मैं पैसे माँगने आया हूँ| "घर पर कोई नहीं है, बाद में आना!" वो मुँह सिकोड़ कर बोली| "रहम करो हम पे! बहुत दूर से आये हैं और बड़ी आस ले कर आये हैं| ऊ दिन मेमसाब कही रही की आज वो घर पर होंगी!" मैंने अपना ड्रामा जारी रखा पर काँटा टस से मस नहीं हुई, इसलिए मुझे अपनी दूसरी चाल चलनी पड़ी; "देवी जी तनिक पानी मिलेगा पीने को?" मेरे मुँह से देवी जी सुन कर वो खुश हो गई और अभी लाइ बोलकर अंदर गई जिसका फायदा उठा कर मैं अंदर घुस गया और अंदर का मोआईना बड़ी बारीकी से किया| कान्ता को रसोई से पानी लाने में करीब दो मिनट लगे, जो मेरे लिए काफी थे घर का नक्शा दिमाग में बिठाने को|
शादी के बाद रितिका का कमरा उसके सास-ससुर के कमरे के सामने पहली मंजिल पर था पर उस हत्याकांड में उसके पति की मौत उसी कमरे के बाहर हुई थी| शायद उसी डर से रितिका अब पहली मंजिल पर भटकती नहीं थी और उसने नीचे वाला कमरा जो की राहुल का स्टडी रूम था उसे ही अपना कमरा बना लिया था|
इधर कान्ता मुस्कुराती हुई गिलास में पानी ले आई, मैंने लगे हाथों उसकी तारीफों के पुल बाँध दिए जिससे मुझे उससे और बात करने का मौका मिल जाए| वो मुझसे मेरे बारे में पूछने लगी तो मैंने उसे झूठ-मूठ की कहानी सुना दी| बातों ही बातों में उसने मुझे काफी जानकारी दे दी, अब अगर मैं वहाँ और देर रुकता तो वो अपना घागरा उठा के दिखा देती! उससे शाम को आने का वादा कर मैन वहाँ से निकल आया और कुछ दूर आ कर अपने कपडे ठीक करके घर लौट आया|
मेरी रेकी का काम पूरा नहीं हुआ था, अब भी एक बहुत जर्रूरी मोहरा हाथ लगना रह गया था| पर किस्मत ने मुझे उससे भी मिलवा दिया, हमेशा की तरह मैं उस पनवाड़ी से सिगरेट ले कर पी रहा था और अखबार पढ़ रहा था की एक आदमी पनवाड़ी के पास आया और उससे बात करने लगा; "अरे राम खिलावन भैया, कइसन
बा!" वो आदमी बोला|
"अरे हम ठीक हैं, तुम कहो सरजू भैया कितना दिन भय आजकल हिआँ दिखातो नहीं?" पनवाड़ी बोला|
"अरे ऊ हमार साहब, सेक्रेटरीवा ...ससर हम का काम से दिल्ली भेज दिया रहा! कल ही आये हैं और आज रितिका मेमसाब के फाइल पहुँचाय खतिर भेज दीस!" सरजू बोला|
"अरे बताओ तोहार छमिया कान्ता कैसी है?" पनवाड़ी बोला|
"अरे ऊ ससुरी हमार 'लिए' खातिर पियासी है! होली का अइबे तब ऊ का दबा कर पेलब!" इतना कह कर सरजू चला गया| यानी कान्ता और सरजू का चक्कर चल रहा है!
खेर मुझे मेरा स्वर्णिम मौका मिल गया था, अब बस मुझे होली के दिन का इंतजार था| वहाँ से मैं सीधा अपने घर के लिए पैदल निकला और एक आखरी बार अपने सारे पत्ते जाँचने लगा|
घर का layout - चेक
घर के नौकर के नाम - चेक
घर घुसने का कारन- चेक
हथियार - X
नहीं हथियार का इंतजाम अभी नहीं हुआ था| मैंने वापस अपने चेहरे पर दादी-मूछ लगाई और बजार की तरफ घूम गया, वहाँ काफी घूमने के बाद मैंने एक रामपुरी चाक़ू खरीदा| इतनी आसानी से उसे मारना नहीं चाहता था, मरने के टाइम उस्की आँखों में वही दर्द देखना चाहता था जो मेरी पत्नी की आँखों में थी जब उसने मुझे हॉस्पिटल में पड़ा हुआ देखा था| मैंने बजार से कुछ साड़ियाँ भी खरीदीं जिन्हें मैंने गिफ्ट wrap करवा लिया| चूँकि हमारा गाँव इतना आधुनिक नहीं था तो वहाँ अभी भी CCTV नहीं लगा था जो मेरे लिए बहुत कामगर साबित होना था| अब बस होली का इंतजार था जो 2 दिन बाद थी| पर कल होलिका दहन था और गाँव के चौपाल पर इसकी सारी तैयारी की जा चुकी थी| सभी बरी परिक्रम कर रहे थे और अग्नि को नमस्कार कर रहे थे| मुझे और अनु को भी साथ परिक्रमा करनी थी, जिसके बाद अनु ने मुझसे कहा; "कहते हैं होलिका दहन बुराई पर अच्छाई का प्रतीक है!"
"हाँ" मैंने बस इतना ही कहा क्योंकि मैं अनु की बात का मतलब समझ गया था| उसी रात को मम्मी-डैडी जी भी आ गए हमारे साथ होली मनाने| पिछले 20 दिनों में अनु ने मुझसे मेरी प्लानिंग के बारे में कुछ नहीं पुछा था, हम बात भी कम करते थे| घर वालों के सामने हम खुश रहने का नाटक करते रहते पर अकेले में हम दोनों जानते थे की मैं कौन सा बड़ा कदम उठाने जा रहा हूँ| उस रात मैंने अनु से बात शुरू की; "कल आपको मेरे लिए cover करना होगा, याद रहे किसी को भी भनक नहीं होनी चाहिए की मैं घर पर मौजूद नहीं हूँ| घर पर बहुत सारे लोग होंगे तो किसी को जल्दी पता नहीं चलेगा!" मैंने अनु से इतना कहा और फिर मैं जल्दी सो गया| लेट तो मैं गया पर नींद बिलकुल नहीं आई, कारन दो, पहला ये की कल मेरी जिंदगी का बहुत बड़ा दिन था| मैं कुछ ऐसा करने जा रहा था जिसके बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था, एक सीधा-साधा सा इंसान किसी का कत्ल करने जा रहा था! दूसरा कारन था मेरा बायाँ हाथ, अपने प्लान के तहत मैंने बहाना कर के आज अपना प्लास्टर कटवा दिया था| इस बहाने के लिए मुझे किशोर का सहारा
लेना पड़ा था, मैंने जानबूझ कर उसका सुसु अपने बाएं हाथ पर करवाया ताकि मुझे प्लास्टर कटवाने का अच्छा बहाना मिल जाये| हालाँकि इस हरकत पर सब ने खूब जोर से ठहाका लगाया था की भतीजे ने आखिर अपने चाचा के ऊपर सुसु कर ही दिया| प्लास्टर कटने के बाद मेरे हाथ में दर्द होने लगा था|
खैर सुबह हुई और मैं जल्दी से उठा और सबका आशीर्वाद लिया, अपने बाएँ हाथ पर मैंने दो गर्म पट्टियां लपेटीं ताकि दर्द कम हो| जोरदार म्यूजिक बज रहा था और घर के सारे लोग चौपाल पर आ गए थे| घर पर सिर्फ औरतें रह गईं थीं, सब ने होली खेलना शुरू कर दिया था| शुरू-शुरू में ताऊ जी ने इस आयोजन के लिए मना कर दिया था कारन था मुझ पर हुआ हमला| पर मुझे कैसे भी कर के ये आयोजन खूब धूम-धाम से करना था ताकि मुझे घर से निकलने का मौका मिल जाये इसीलिए मैंने ये आयोजन सुबह जल्दी रखवाया था, मुझे बस इसके लिए ताऊ जी के सामने अनु की पहली होली का बहाना रखना पड़ा था| सारे लोग खूब मजे से होली खेल रहे थे और मैं इसी का फायदा उठा के वहाँ से सरक गया| चेहरे और कपड़ों पर खूब सारा रंग पोत रखा था जिससे मुझे कोई पहचान ना पाए| मैं संकेत की बाइक ढूंढते हुए पहुँचा, सुबह मैं उसी की बाइक पर यहाँ आया था और उसे ईस कदर बातों में उलझाया की वो अपनी बाइक लॉक करना ही भूल गया| मैंने धीरे से बाइक को धक्का दे कर कुछ दूर तक ले गया और फिर स्टार्ट कर के सीधा संकेत के खेतों की तरफ चल दिया| उसके खेतों में जो कमरा था, जिस में मैंने वो साड़ियाँ गिफ्ट wrap कर के छुपाई थीं| उन्हें ले कर मैं सीधा रितिका के घर पहुँच गया| अभी सुबह के 7 बजे थे, मैंने संकेत की बाइक दूर एक झाडी में छुपा दी और वो गिफ्ट्स ले कर सीधा रितिका के घर पर दस्तक की| मेरी इनफार्मेशन के हिसाब से वो घर पर ही थी और सिवाए कान्ता के वहाँ और कोई नहीं था| दरवाजा कान्ता ने ही खोला और मेरे मुँह पर पुते हुए रंग को देख वो समझ नहीं पाई की कौन है| "आरी छम्मक छल्लो ई टुकुर-टुकुर का देखत है?" मैंने आवाज बदलने की कोशिश की पर ठीक से बदल नहीं पाया था पर उसे फिर भी शक नहीं हुआ क्योंकि मेरे मुँह में पान था! "सरजू तू?!" कान्ता ने चौंकते हुए कहा| मेरी और सरजू की कद-काठी कुछ-कुछ मिलती थी इसलिए उसे ज्यादा शक नहीं हुआ| "काहे? कोई और आने वाला है का?" मैंने कहा तो वो शर्मा गई और पूछने लगी की मैं इतनी जल्दी क्यों आ गया; "अरे ऊ सेक्रेटरीवा कहिस की जा कर एही लागे ई गिफट रितिका मेमसाब को दे कर आ तो हम इहाँ परकट होइ गए! फिर तोहरे से आजका वादा भी तो किये रहे!" मैंने कहा तो वो हँस दी और वो gift ले लिए और उसे सामने के टेबल पर रख दिए| "अरे मरी ई तो बता की मेमसाब घर पर हैं या नहीं?" मैंने पुछा तो उसने बताया की रितिका नहा रही है| अब मुझे उसे वहाँ से भेजना था सो मैंने कहा; "कछु पकोड़े-वकोडे हैं का?" तो वो बोली की मैं उसके क्वार्टर में जाऊँ और
उसका इंतजार करूँ, वो गरमा-गर्म बना कर लाएगी| उसके जाते ही मैंने surgical gloves पहने और मैन गेट लॉक अंदर से लॉक कर दिया और क्वार्टर की तरफ खुलने वाला दरवाज खोल दिया ताकि उसे लगे की मैं बाहर हूँ| मैंने जेब से चाक़ू निकाला और उसे खोल कर बाएँ हाथ में पकड़ लिया| इसका कारन ये था की पुलिस को लगे की खुनी लेफ्टी है, चूँकि मेरे बाएँ हाथ में फ्रैक्चर है तो मुझ पर शक जाने का सवाल ही नहीं होता| सुबह की टाइट बाँधी हुई पट्टियां काम कर गईं, मैंने गिफ्ट्स पर से भी अपनी उँगलियों के निशान मिटा दिए| मेरा दिल अब बहुत जोरों से धड़क रहा था, सांसें भारी हो चली थीं और मन पूरी कोशिश कर रहा था की मैं ये हत्या न करूँ पर मेरा दिमाग गुस्से से पागल हो गया था| इधर बाहर ढोल-बगाडे और लाउड म्यूजिक बजना शुरू हो चूका था| 'रंग बरसे' वाला गाना खूब जोर से बज रहा था| मैंने रितिका के कमरे का दरवाजा जोर से खटखटाया, तो वो गुस्से में बड़बड़ाती हुई बाथरूम से निकली और एकदम से दरवाजा खोला|
अपने सामने एक गुलाल से रंगे आदमी को देख वो चौंक गई और इससे पहले वो कुछ बोल पाती या चिल्लाती मैंने अपने दाएँ हाथ से उसका मुँह बंद कर दिया और बाएँ हाथ में जो चाक़ू था उससे जोर दार हमला उसके पेट पर किया| चाक़ू एक ही बार में उसकी पेट की मांस-पेशियाँ चीरता हुआ अंदर चला गया| रितिका की चीख तो तब भी निकली पर बाहर से आ रहे शोर में दब गई, मैंने चाक़ू को उसके पेट में डाले हुए एक बार जोर से बायीँ तरफ घुमा दिया जिससे वो और बिलबिला उठी और अपने खून भरे हाथों से मेरा कालर पकड़ लिया| उसकी आँखें फटने की कगार तक खुली थीं पर अभी उसे ये बताना जर्रूरी था की उसका कातिल आखिर है कौन; "I loved you once! But you had to fuck all this up! You made me do this!" मेरी आवाज सुनते ही वो समझ गई की उसका कातिल कोई और नहीं बल्कि मानु ही है| वो कुछ बोलना चाहती थी पर उसे उसका मौका नहीं मिला और वो पीछे की ओर झुक गई| उसका सारा वजन मेरे बाएँ हाथ पर आ गया जिसका दर्द से बुरा हाल हो गया था| मैंने उसे छोड़ दिया और एक नजर कमरे में दौड़ाई तो पाया की मेरी नन्ही सी पारी नेहा चैन की नींद सो रही थी| उसे सोते हुए देख मेरा मन उसे छूने को किया पर दिमाग ने मुझे बुरी तरह लताड़ा की मैं भला अपने खून से रंगे हाथों से उसे कैसे छू सकता हूँ?! इसलिए मैं वहाँ से भाग आया और वो गिफ्ट्स ले कर घर से भाग आया, फ़ौरन बाइक स्टार्ट की ओर घर की तरफ बढ़ा दी| बहुत दूर आ कर मैंने वो साड़ियाँ और ग्लव्स जला दिए, उस रामपुरी चाक़ू को मैंने एक जगह गाड़ दिया जिससे कोई सबूत न बचे और चुपचाप होली के समारोह में शामिल हो गया और अपने ऊपर और रंग डाल लिया| किसी को भनक तक नहीं लगी थी की मैं गया था, पर मेरा मन अब अंदर ही अंदर टूटने लगा था| मैंने अपने परिवार को बचा लिया था पर अपने द्वारा किये गुनाह से बहुत दुखी था| मुझे अपने आप से घिन्न आने लगी थी, मुझे अपने सर से ये
पाप का बोझ उतारना था| पर ये पाप पानी से धुलने वाला नहीं था इसे धोने के लिए मुझे किसी पवित्र नदी में नहाना था| हमारे गाँव के पास बस एक ही नदी थी वो थी सरयू जी! मैंने संकेत से कहा की चल कर सरयू जी नहा कर आते हैं, वो ये सुन कर हैरान हुआ पर जब मैंने जबरदस्ती की तो वो मान गया| हम सब को बता कर सरयू जी निकले, हमारे साथ ही कुछ और लोग जुड़ गए जिन्हें मेरी बात सही लगी थी| पहले हमने घर से अपने कपडे लेने थे पर मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी की मैं अंदर घुसून इसलिए मैंने भाभी को आवाज दे कर उनसे मेरे कपडे लाने को कहा| भाभी ने एक अंगोछा और कपडे ले कर बाहर आईं, फिर वहाँ से हम संकेत के घर गए ताकि वो भी अपने कपडे ले ले| आखिर हम सरयू जी पहुँचे, मैंने उन्हें प्रणाम किया और मन ही मन अपने किये पाप के लिए उनसे माफ़ी माँगी| जाने क्यों पर मेरा दिल कहने लगा था की जिस प्रकार भगवान राम चन्दर जी ने रावण का वद्ध किया था और फिर ब्रह्महत्या के पाप से निवारण हेतु उन्होंने स्नान और पूजा-पाठ इत्यादि किया था उसी तरह आज मैं भी रितिका की हत्या करने के बाद इस पवित्र जल से अपने पाप धोने आया हूँ| मैं खुद की तुलना भगवान राम चंद्र जी से नहीं कर रहा था बस हालत को समान मान रहा था!
सरयू जी में प्रवेश करते हुए मुझे वो सारे पल याद आ रहे थे जो मैंने ऋतू के साथ बिताये थे! वो उसका मेरे सीने से लग कर खुद को पूर्ण समझना, उसकी छोटी-छोटी नादानियाँ, मेरा उसे पीछे से अपने हाथों से जकड़ लेना, उसका ख्याल रखना वो सब याद कर के मैं रो पड़ा| बहुत प्यार करता था मैं उससे, पर अगर उसके सर पर बदला लेने का भूत ना चढ़ा होता तो आज मुझे ये नहीं करना पड़ता| ये सब सोचते हुए मैं अच्छे से रगड़-रगड़ कर नहाया, मानो जैसे उसका खून मेरे जिस्म से पेंट की भाँती चिपक गया हो! नहाने के बाद मैं बाहर निकला और किनारे पर सर झुका कर बैठ गया| सूरज की किरणे जिस्म पर पड़ रही थीं और ऐसा लगा मानो जैसे मेरी मरी हुई आत्मा फिर से जीवित हो रही हो! कुछ देर बाद हम घर के लिए निकल पड़े और जैसे ही संकेत ने मुझे घर छोड़ा तो ताऊ जी और पिताजी बाहर मेरी ही राह देख रहे थे| मैं बाइक से उतरा तो ताऊ जी ने रितिका का खून होने की खबर दी, मैं कुछ react ही नहीं कर पाया और मेरे मुँह से बस नेहा के लिए चिंता बाहर आई; "नेहा कहाँ है?" इतने में डैडी जी गाडी की चाभी ले कर आये और हम उनकी गाडी से रितिका के घर पहुँचे| पुलिस की जबरदस्त घेराबंदी थी पर चूँकि वो दरोगा ताऊ जी को जानता था सो उसने हमें आगे आने दिया और सरे हालत के बारे में बताया| दरवाजे के पास एक महिला पुलिस कर्मी कान्ता का ब्यान लिख रही थी और एक दूसरी पुलिस कर्मी रोती हुई नेहा को गोद में लिए हुए ताऊ जी के पास आई और उन्हें नेहा को गोद में देने लगी पर ताऊ जी चूँकि दरोगा से बात कर रहे थे सो मैंने फ़ौरन नेहा को गोद में ले लिया और उसे
अपनी छाती से लगा लिया| नेहा को जैसे ही उसके पापा के जिस्म का एहसास हुआ वो एकदम से चुप हो गई और आँखें बड़ी करके मुझे देखने लगी| मैंने उसके माथे को चूमा और उसे फिरसे अपने गले लगा लिया| मेरा दिल जो उसके कान के पास था वो अपनी बेटी से उसके बाप द्वारा किये हुए पाप की माफ़ी माँगने लगा था| मेरी आँखें एक बार फिर भीग गईं, पीछे खड़े डैडी जी ने मेरी पीठ सहलाई और मुझे हौंसला रखने को कहा| थोड़ी बहुत पूछ-ताछ के बाद हम घर लौट आये, जैसे ही मैं नेहा को गोद में लिए हुए आंगन में आया की अनु दौड़ती हुई मेरे पास आई| मेरी आँखों में देखते हुए उसने नेहा को गोद में ले लिया, मैंने उससे नजरें फेर लीं क्योंकि मुझ में अब हिम्मत नहीं हो रही थी की मैं उसका सामना कर सकूँ| रितिका की मौत का किसी को उतना अफ़सोस नहीं हुआ जितना होना चाहिए, कारन आफ था की जो उसने मेरे और परिवार के साथ किया| अगले दिन मम्मी-डैडी जाने वाले थे की पुलिस आ धमकी और सबसे सवाल-जवाब करने लगी| चूँकि हमने रितिका पर आरोप लगाया था की उसने मुझ पर हमला करवाया था इसलिए ये कार्यवाही लाजमी थी| मुझे इसका पहले से ही अंदेशा था इसलिए मैंने इसकी तैयारी पहले ही कर रखी थी| जब दरोगा ने मुझसे पुछा की मैं कत्ल के समय कहाँ था तो मैंने उसे अपनी कहानी सुना दी; "जी मैं अपने परिवार के साथ होली खेल रहा था, उसके बाद हम दोस्त लोग नहाने के लिए गए थे| जब वापस आये तो मुझे ये सब पता चला|"
"तुम्हारे ऊपर जब हमला हुआ तो तुम्हें रितिका पर गुस्सा नहीं आया?" दरोगा ने पुछा|
"आया था पर मैं अपाहिज कर भी क्या सकता था?!" मैंने अपनी टूटी-फूटी हालत दिखाते हुए कहा| पर उसे मुझ पर शक था सो उसने मेरी बातों को चेक करना शुरू कर दिया| अपना शक मिटाते-मिटाते वो उस physiotherapy क्लिनिक जा पहुँचा जहाँ मैं जाय करता था| उन लोगों ने भी मेरी बात को सही ठहराया, चूँकि वो क्लिनिक रितिका के घर से अपोजिट पड़ता था इसलिए अब उसे मेरी बात पर इत्मीनान हो गया था और उसने मुझे अपने शक के दायरे से बाहर कर दिया था| सारी बात आखिर कार घूम कर 'राघव' पर आ कर अटक गई, उसी को main accused बना कर केस बंद कर दिया गया| इधर अनु मेरे बर्ताव से परेशान थी, मैं उसके पास हो कर भी नहीं था| होली के तीसरे दिन घर के सारे बड़े मंदिर गए थे, अनु जानबूझ कर घर रुकी हुई थी| मैं जैसे ही निकलने को हुआ की अनु ने मेरा दायाँ हाथ कस कर पकड़ लिया और मुझे खींच कर ऊपर ले आई और दरवाजा बंद कर दिया| "क्या हो गया है आपको? किस बात की सजा दे रहे हो खुद को? ना ठीक से खाते हो ना ठीक से सोते हो?! रातबेरात उठ जाते हो और सिसकते रहते हो?! मुझसे नजरें चुराए घुमते हो, मेरे पास बैठना तो छोडो मुझे छूते तक नहीं! और मुझे तो छोड़ो आप नेहा को भी प्यार से गले नहीं लगाते, वो सारा-सारा दिन रोती रहती है अपने पापा के प्यार के लिए!" अनु रोते हुए बोली| मैं सर झुकाये उसके सारे
आरोप सुनता रहा, वो चल कर मेरे पास आई और मेरी ठुड्डी पकड़ कर ऊपर की; "जानते हो न की अगर आप ये कदम नहीं उठाते तो क्या होता? आप नहीं होते, मैं नहीं होती, हमारा बच्चा नहीं होता, माँ-पिताजी....सब कुछ खत्म हो जाता! मैं समझ सकती हूँ की आपको कैसा लग रहा है?! पर आपने जो किया वो गलत नहीं था, पाप नहीं था! आप ही ने कहा था ना की जब घर में कोई जंगली-जानवर घुसा आता है तो आदमी पहले अपने परिवार को बचाता है, फिर क्यों आप खुद को कसूरवार ठहराए बैठे हो?!" अनु मेरी आँखों में देखते हुए बोली| उसकी बात सुन कर मुझे एहसास हुआ की वो सच ही कह रही है और मेरा यूँ सबसे दूर रहना और खुद को दोषी मानना गलत है! मैंने आज तीन दिन बाद अनु को कस कर अपने सेने से लगा लिया, अंदर जो भी बुरे विचार थे वो अनु के प्यार से धुल गए| मैंने उसके माथे को चूमा और मुझे इस काली कोठरी से आजाद कराने के लिए शुक्रिया कहा| "हर बार जब मैं खुद को अंतहीन अँधेरे में घिरा पाता हूँ तो तुम अपने प्यार की रौशनी से मुझे उजाले में ले आती हो!" मैंने कहा और अनु के माथे को एक बार फिर चूम लिया|
चूँकि रितिका का हमारे अलावा कोई परिवार नहीं था तो चौथे दिन हमें रितिका की body सौंपी जानी थी| परिवार में किसी को भी इससे कतई फर्क नहीं पड़ रहा था| आखरी बार जब मैंने ऋतू का चेहरा देखा तो मुझसे खुद को संभाला नहीं गया और मैं घुटनों पर गिर कर रोने लगा| अनु जो मेरे पीछे थी उसने मुझे संभाला और बड़ी मुश्किल से संभाला| एक ऐसी लड़की जिसे मैं इतना प्यार करता था उसने मुझे उसी का खून करने पर मजबूर कर दिया था! ये दर्द मेरे लिए सहना बहुत मुश्किल था| "तेरे साथ जो उसने किया, उसके बाद भी तू उसके लिए आँसू बहा रहा है?" ताऊ जी बोले|
"मैंने कभी उससे कोई दुश्मनी नहीं की, वो बस पैसों की चका-चौंध से अंधी हो गई थी पर अब तो रही नहीं तो कैसी दुश्मनी!" मैंने जवाब दिया और खुद को किसी तरह संभाला| बड़े बेमन से ताऊ जी ने सारी क्रियाएँ करनी शुरू कीं, पर ऋतू को आज मुखाग्नि दी जानी थी| अनु मुझे एक तरफ ले गई और बोली; "मुखाग्नि आप दोगे ना?" मैंने हाँ में सर हिलाया|
भले ही मेरी और ऋतू की शादी नहीं हुई पर उसे मंगलसूत्र सबसे पहले मैंने बाँधा था, उन कुछ महीनों में हमने एक पति-पत्नी की तरह जीवन व्यतीत किया था और अनु ये सब जानती थी इसलिए उसने ये बात कही थी| जब मुखाग्नि का समय आया तो मैं आगे आया; "ताऊ जी सबसे ज्यादा ऋतू को प्यार मैंने ही किया था, इसलिए कृपया मुझे ही मुखाग्नि देने दीजिये!" मैंने कहा और ताऊ जी को लगा की मैं चाचा-भतीजी वाले प्यार की बात कर रहा हूँ इसलिए उन्होंने इसका कोई विरोध नहीं किया| रितिका को मुखाग्नि देते समय मैं मन ही मन बोला; "आज हमारे सारे रिश्ते खत्म होते हैं! मैं भगवान से दुआ करूँगा की वो तेरी आत्मा को शान्ति दें!" आग की लपटों ने ऋतू की जिस्म को अपनी आगोश में ले
लिया और उसे इस दुनिया से आज मुक्ति मिल गई! अगले कुछ दिनों में जो भी जर्रूरी पूजा और दान होते हैं वो सब किये गए और मैं उनमें आगे रहा|
आखिर अब हमारा परिवार एक जुट हो कर खड़ा था और फलने-फूलने लगा था| खुशियाँ अब permanently हमारे घर आ आकर अपना घर बसाने लगीं थी| नेहा को उसके बाप और माँ दोनों का लाड-प्यार मिलने लगा था| अनु उसे हमेशा अपने से चिपकाए रखती और कभी-कभी तो मेरे और अनु के बीच मीठी-मीठी नोक-झोक हो जाती की नेहा को प्यार करने का मौका बराबर मिलना चाहिए! मई का महीना लगा और अनु का नौवां महीना शुरू हो गया, अनु ने मुझसे कहा की मैं घर में नेहा को कानूनी रूप से गोद लेने की बात करूँ| दोपहर को जब सब का खाना हो गया तो मैंने बात शुरू की; "पिताजी....मैं और अनु नेहा को कानूनी रूप से गोद लेना चाहते हैं!" ये सुन कर पिताजी और ताऊजी समेत सारे लोग मुझे देखने लगे| "पर बेटा इसकी क्या जर्रूरत है तुझे? घर तो एक ही है!" पिताजी बोले|
"जर्रूरत है पिताजी... नेहा के साथ भी कुछ वैसे ही हो रहा है जो उसकी माँ ऋतू के साथ हुआ| अनु की डिलीवरी के बाद मुझे और अनु को शहर वापस जाना होगा और फिर यहाँ नेहा अकेली हो जाएगी| अगर मैं उसे साथ ले भी जाऊँ तो वहाँ लोग पूछेंगे की हमारा रिश्ता क्या है? कानूनी तौर पर गोद ले कर मैं उसे अपना नाम दे पाउँगा और वो मुझे और अनु को अपने माँ-बाप कह सकेगी| समय के साथ ये बात दब जाएगी की वो अनु की बेटी नहीं है!" मैंने बात घुमा-फिर कर कही| थोड़ी बहुत न-नुकूर होने के बाद आखिर ताऊ जी और पिताजी मान गए| मैंने अगले ही दिन ये कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी और चूँकि अनु की कुछ जान-पहचान थी सो ये काम जल्दी से हो भी गया| मंत्री की जायदाद का सारा क्लेम मैंने कानूनी रूप से ठुकरा दिया और साडी जायदाद बूढ़े माँ-बाप की देख रेख करने वाले ट्रस्ट को दे दी गई|
अनु की डिलीवरी से ठीक एक दिन पहले हमें नेहा के एडॉप्शन पेपर्स मिल गए और अब नेहा कानूनी तौर पर मेरी बेटी बन गई थी| मैं ये खुशखबरी ले कर घर आया, अनु को पेपर्स दिए और उसे जोर-जोर से पढ़ के सुनाने को कहा| इधर मैंने नेहा को अपनी गोद में उठा लिया और उसे चूमने लगा| अनु जैसे-जैसे पेपर्स के शब्द पढ़ती जा रही थी वैसे-वैसे उसकी ख़ुशी बढ़ती जा रही थी| जब उसका पढ़ना पूरा हो गया तब मैंने नेहा से सबके सामने कहा; "आज से मेरी बच्ची मुझे सब के सामने पाप कहेगी!" ये सुन कर नेहा मुस्कुराने लगी और उसके मुँह से आवाज आने लगी; 'डा...ड....' इन्हें सुन कर मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा और मैंने नेहा को कस कर अपने गले लगा लिया| "मुझे भी मेरी बेटी के मुँह से मम्मी सुनना है!" अनु बोली और मैंने नेहा को उसकी गोद में दे दिया, अनु ने नेहा को गले लगाया और फिर उसके माथे को चूमते हुए बोली; "बेटा एक बार मम्मी बोलो!" पर नेहा के मुँह से डा..ड...
ही निकल रहा था जिसे सुन सब हँसने लगे| वो रात बड़ी खुशियों भरी निकली और इस ख़ुशी को देख ताऊ जी बैठे प्रार्थना करने लगे की अब कभी भी किसी की गन्दी नजर इस परिवार को ना लगे|
अगले दिन सब कुछ हँसी-ख़ुशी चल रहा था की दोपहर को खाने के बाद अनु ने मुझे अपने पास बुलाया और uncomfortable होने की शिकायत की| मैं उसे और भाभी को ले कर तुरंत हॉस्पिटल पहुँचा, डॉक्टर ने बताया की घबराने की कोई बात नहीं है, अनु जल्द ही लेबर में जाने वाली है| ठीक शाम को 4 बजे डॉक्टर ने उसे लेबर रूम में शिफ्ट किया, मैं थोड़ा घबराया हुआ था की जाने क्या होगा और उधर भाभी मेरा होंसला बढ़ाने लगी थी की सब ठीक ही होगा| पर मैं घबराया हुआ था तो भाभी ने घर फ़ोन कर के सब को बुला लिया| कुछ ही देर में पूरा घर हॉस्पिटल आ गया, भाभी ने माँ से कहा की वो नेहा को मुझे सौंप दें| नेहा जैसे ही मेरी गोद में आई मेरे दिल को कुछ चैन आया और ठीक उसी वक़्त नर्स बाहर आई और बोली; "मानु जी! मुबारक हो आपको जुड़वाँ बच्चे हुए हैं!" ये सुनते ही मैं ख़ुशी से उछल पड़ा और फ़ौरन अनु को मिलने कमरे में घुसा| अनु उस वक़्त बेहोश थी, मैंने डॉक्टर से पुछा तो उन्होंने बताया की अनु आराम कर रही है और घबराने की कोई बात नहीं है| ये सुन आकर मेरी जान में जान आई! कुछ मिनट बाद नर्स दोनों बच्चों को ले कर आई, एक लड़का और एक लड़की! दोनों को देख कर मेरी आंखें छलछला गईं| मैंने पहले नेहा को माँ की गोद में दिया और बड़ी एहतियात से दोनों बच्चों को गोद में उठाया| ये बड़ा ही अनोखा पल था जिसने मेरे अंदर बड़ा अजीब सा बदलाव किया था| दोनों बच्चे शांत थे और सो रहे थे, उनकी सांसें तेज चल रही थीं| मैंने एक-एक कर दोनों के माथे को चूमा, अगले ही पल मेरे चेहरे पर संतोष भरी मुस्कराहट आ गई| मेरी छोटी सी दुनिया आज पूरी हो गई थी! बारी-बारी से सब ने बच्चों को गोद में उठाया और उन्हें प्यार दिया| तब तक अनु भी जाग गई थी, मैं उसके पास पहुँचा और उसका दाहिना हाथ पकड़ कर उसके माथे को चूमा| "Baby .... twins!!!!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा| अनु के चेहरे पर भी मुस्कराहट आ गई, इतने में भाभी मसखरी करते हुए बोलीं; "हाय राम! तुम दोनों सच्ची बेशर्म हो! हम सब के सामने ही ....
!" भाभी बोलीं तो ताई जी ने उनके कान पकड़ लिए और बोलीं; "तो तू आँख बंद कर लेती!" ये सुन कर सारे हँस पड़े| "अच्छा बेटा कोई नाम सोचा है तुम दोनों ने?" ताऊ जी ने पुछा तो अनु मेरी तरफ देखने लगी; "आयुष" मैंने कहा और मेरे पीछे-पीछे अनु बोली; "स्तुति"! दोनों नाम सुन घरवाले खुश हो गए और ताऊ जी ने यही नाम रखने को कहा| कुछ देर बाद डॉक्टर साहिबा आईं और हमें मुबारकबाद दी| साथ ही उन्होंने मेरी तारीफ भी की कि मैंने अनु का इतना अच्छा ख्याल रखा की twins होने के बाद भी डिलीवरी में कोई complications नहीं हुई| शाम को मैं अनु और बच्चों को लेकर घर आया, तो सारे विधि-विधान से हम घर के भीतर आये| रात को सोने के समय मैंने अनु से बात की; "थैंक यू! मेरी ये छोटी सी दुनिया पूरी करने के लिए!" उस समय पलंग पर तीनों बच्चे एक साथ सो रहे थे और ये ही मेरी दुनिया थी! मेरे लिए तीनों बच्चों को संभालना एक चैलेंज था, जब एक रोता तो उसकी देखा देखि बाकी दो भी रोने लगते और तीनों को चुप कराते-कराते मेरा बैंड बज जाता| जब तीनों घुटनों पर चलने लायक हुए तब तो और गजब हुआ! तीनों घर भर में रेंगते हुए घूमते रहते! जब उन्हें तैयार करना होता तब तो और भी मजा आता क्योंकि एक को तैयार करने लगो बाकी दोनों भाग जाते| अनु मेरी मदद करती तब भी एक तो भाग ही जाता और जब तक उसे तैयार करते बाकी दोनों अपने कपडे गंदे कर लेते| मैं और अनु हँस-हँस के पागल हो जाते| मेरे दोस्त अरुण ने तो मुझे एक स्पेशल triplets carry bag ला कर दिया जिससे मैं तीनों को एक साथ गोद में उठा सकता था| दिन प्यार-मोहब्बत भरे बीतने लगे और बच्चे धीरे-धीरे बड़े होने लगे, मैं और अनु दोनों ही के बाल अब सफ़ेद हो गए थे पर हमारा प्यार अब भी वैसा का वैसा था| बच्चे बड़े ही फ़रमाबरदार निकले, कोई गलत काम या कोई बुरी आदत नहीं थी उनमें, ये अनु और मेरी परवरिश का ही नतीजा था| साल बीते और फिर जब नेहा शादी के लायक हुई तो मैंने उसे अपने पास बिठा कर सारा सच ब्यान कर दिया| वो चुप-चाप सुनती रही और उसकी आँखें भर आईं| वो उठी और मेरे गले लग कर रो पड़ी; "पापा... I still love you! आपने जो किया वो हालात के आगे मजबूर हो कर किया, अगर आपने वो नहीं किया होता तो शायद ाजे ये सब नहीं होता| आप कभी भी इसके लिए खुद को दोषी मत मानना, मुझे गर्व है की मैं आपकी बेटी हूँ! और माँ... आपने जितना प्यार मुझे दिया शायद उतना मेरी सगी माँ भी नहीं देती| मेरे लिए आप ही मेरे माता-पिता हो, वो (ऋतू) जैसी भी थी मेरा past थी...
उनकी गलती ये थी की उन्होंने कभी पापा के प्यार को नहीं समझा अगर समझती तो इतनी बड़ी गलती कभी नहीं करती!" इतना कह कर नेहा ने हम दोनों को एक साथ अपने गले लगा लिया| नेहा के मुँह से इतनी बड़ी बात सुन कर हम दोनों ही खुद पर गर्व महसूस कर रहे थे| आज मुझे मेरे द्वारे किये गए पाप से मुक्ति मिल गई थी!
नेहा की शादी बड़े धूम-धाम से हुई और विदाई के समय वो हमारे गले लग कर बहुत रोई भी| कुछ समय बाद उसने अपने माँ बनने की खुश खबरी दी....
उसके माँ बनने के साल भर बाद आयुष की शादी हुई, उसे USA में एक अच्छी जॉब मिल गई और वो हमें अपने साथ ले जाना चाहता था पर अनु ने मना कर दिया और हमने हँसी-ख़ुशी उसे वहाँ सेटल कर दिया| कुछ महीने बाद स्तुति के लिए बड़ा अच्छा रिश्ता आया और सुकि शादी भी बड़े धूम-धाम से हुई| हमारे तीनों बच्चे सेटल हो गए थे और हम दोनों से खुशनसीब इंसान सहायद ही और कोई होता| एक दिन शाम को मैं और अनु चाय पी रहे थे की अनु बोली; "थैंक यू आपको की आपने इस प्यारी दुनिया को इतने प्यार से सींचा!" ये थैंक यू उस थैंक यू का जवाब था जो मैंने अनु को आयुष और स्तुति के पैदा होने के बाद दिया था| हम दोनों गाँव लौट आये और अपने जीवन के अंतिम दिन हाथों में हाथ लिए गुजारे| फिर एक सुबह हम दोनों के जीवन की शाम साबित हुई, रात को जो हाथ में हाथ ले कर सोये की फिर सुबह आँख ही नहीं खुली और दोनों ख़ुशी-ख़ुशी एक साथ इस दुनिया से विदा हुए!
Happy Ending !!!!